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आयकर इंसपेक्टर का खतरनाक खेल : क्या बच पाया लोकेश

12 अप्रैल की बात है. एक अधेड़ आदमी जयपुर के गांधीनगर पुलिस थाने पहुंचा. उस ने थाने के गेट पर खड़े संतरी से कहा, ‘‘भैया, मुझे रिपोर्ट दर्ज करानी है.’’

संतरी ने अधेड़ को अंदर ड्यूटी अफसर से मिलने को कहा. अंदर एक सबइंसपेक्टर ड्यूटी अफसर की कुरसी पर बैठा था. आसपास पुलिस के 2 जवान बैठे कुछ लिखापढ़ी कर रहे थे. ड्यूटी अफसर के सामने रखी कुर्सियों पर 2 लोग पहले से बैठे थे, जिन से ड्यूटी अफसर बात कर रहा था.

ड्यूटी अफसर को बातों में व्यस्त देख कर अधेड़ कुछ देर खड़ा रहा. फिर बेचैनी से इधरउधर देखने लगा. अधेड़ की बेचैनी देख कर सबइंसपेक्टर ने पूछा, ‘‘बताएं साहब, क्या बात है?’’

‘‘थानेदार साहब, मेरे बेटे की बहू नहीं मिल रही है. आप उसे ढूंढ देंगे तो भला होगा.’’ अधेड़ ने अपने आने का मकसद बता दिया.

‘‘आप की बहू कब से गायब है?’’ ड्यूटी औफिसर ने पूछा.

‘‘साहब, वह एक दिन पहले से गायब है.’’ अधेड़ ने अपने कंधे पर पड़े अंगौछे से माथे पर आया पसीना पोंछते हुए कहा.

‘‘आप की बहू आप के बेटे के पास ही रहती होगी, फिर वह गायब कैसे हो गई?’’ ड्यूटी अफसर ने अधेड़ के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपनी मरजी से किसी के साथ चली गई हो?’’

‘‘नहीं थानेदार साहब, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ अधेड़ ने ड्यूटी अफसर को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटा आयकर विभाग में इंसपेक्टर है. उस की पोस्टिंग गुजरात के वड़ोदरा में है. मेरी बहू यहीं जयपुर के बापूनगर में एक पीजी हौस्टल में रह कर टीचर भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रही थी.’’

ड्यूटी अफसर ने अधेड़ को एक कागज देते हुए कहा, ‘‘आप अपनी लिखित रिपोर्ट दे दो, हम रिपोर्ट दर्ज कर के आप की बहू को जरूर तलाश करेंगे.’’

अधेड़ ने कागज ले कर थानाप्रभारी के नाम एक प्रार्थनापत्र लिखा. अधेड़ ने वह प्रार्थनापत्र ड्यूटी अफसर को देते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरी यह रिपोर्ट दर्ज कर लो.’’

ड्यूटी अफसर ने उस प्रार्थनापत्र पर सरसरी नजर डाली.

प्रार्थनापत्र का लब्बोलुआब यह था कि रिपोर्ट दर्ज कराने आया वह अधेड़ अलवर जिले के कठूमर का रहने वाला बृजेंद्र सिंह था. उस का बेटा लोकेश चौधरी आयकर विभाग में निरीक्षक था.

लोकेश चौधरी गुजरात के वड़ोदरा शहर में तैनात होने के कारण वहीं रहता था. लोकेश की शादी कोई सवा साल पहले भरतपुर जिले के सिनसिनी गांव में रहने वाले रामकुमार सिनसिनवार की बेटी मुनेश से हुई थी.

मुनेश शिक्षक भरती परीक्षा की तैयारी कर रही थी. इस के लिए वह जयपुर के बापूनगर में डी-126 कृष्णा मार्ग पर स्थित एक पीजी हौस्टल में रहती थी. मुनेश इसी हौस्टल से 11 अप्रैल को लापता हो गई थी.

गांधीनगर पुलिस थाने में 12 अप्रैल को बृजेंद्र सिंह की लिखित रिपोर्ट पर मुनेश की गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया गया. रिपोर्ट में बृजेंद्र सिंह ने अपनी पुत्रवधू के गुम होने में किसी पर शक जाहिर नहीं किया था, इसलिए पुलिस ने सामान्य तरीके से जांचपड़ताल शुरू कर दी.

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इस के दूसरे ही दिन लोकेश चौधरी जयपुर आ कर पुलिस अफसरों से मिला और अपनी पत्नी को तलाश करने की गुहार लगाई. पुलिस अधिकारियों ने लोकेश की परेशानी समझते हुए उस की पत्नी की हरसंभव तरीके से तलाश करने का आश्वासन दिया.

1-2 दिन बाद लोकेश जयपुर कमिश्नरेट के आला पुलिस अफसरों से मिला और उन से गांधीनगर थाना पुलिस की शिकायत करते हुए कहा कि पुलिस सही तरीके से उस की पत्नी की तलाश नहीं कर रही है.

लोकेश का कहना था कि मुनेश का अपहरण हुआ है. लोकेश बारबार पुलिस अफसरों से मिल कर अपनी पत्नी को तलाश करने का दबाव बनाने लगा.

इस पर पुलिस उपायुक्त (पूर्व) कुंवर राष्ट्रदीप ने मुनेश की तलाश के लिए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पूर्व) हनुमान प्रसाद मीणा और गांधीनगर के सहायक पुलिस आयुक्त राजपाल गोदारा के सुपरविजन में इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह, सबइंसपेक्टर कृष्ण कुमार, कांस्टेबल ओमप्रकाश और नरेंद्र कुमार की एक टीम गठित कर दी.

इस पुलिस टीम ने जांच के दौरान हौस्टल के आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं. इस के अलावा मुनेश और उस के पति लोकेश चौधरी सहित अन्य संदिग्ध लोगों के मोबाइल नंबरों की कालडिटेल्स भी निकलवाई. पुलिस ने मुनेश व लोकेश के दोस्तों का भी पता लगाया. साथ ही दोनों की पुरानी हिस्ट्री भी पता कराई. व्यापक जांचपड़ताल में पुलिस अफसरों को मुनेश के गुम होने का मामला संदिग्ध नजर आया.

पुलिस इस मामले की तह तक जाने के लिए जांचपड़ताल में जुटी हुई थी कि इसी बीच 21 अप्रैल को मुनेश के पिता रामकुमार सिनसिनवार ने गांधीनगर थाने में एक लिखित रिपोर्ट दी. रिपोर्ट में लिखा था कि मेरी बेटी मुनेश 11 अप्रैल से गायब है. इस के बाद मेरा दामाद लोकेश जयपुर आया तो हम ने उस का मोबाइल चैक कराने के लिए कहा था. इस पर लोकेश ने अपना मोबाइल फोरमैट कर डेटा डिलीट कर दिया.

मुनेश के पिता ने रिपोर्ट में लिखा कि लोकेश व उस के घर वाले मेरी बेटी को दहेज के लिए प्रताडि़त करते रहते थे. उन्होंने इसी साल फरवरी में मुनेश की 10 लाख रुपए की एफडी तुड़वा कर पैसे निकलवा लिए थे.  रिपोर्ट में आगे लिखा था कि लोकेश और उस के घर वालों ने मिल कर मेरी बेटी मुनेश का षडयंत्रपूर्वक अपहरण कर के उस की हत्या कर दी है. इस पर गांधीनगर थाने में उसी दिन भादंसं की धारा 364, 498ए, 302, 304बी और 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

इस मामले की जांच मालवीयनगर के सहायक पुलिस आयुक्त (प्रशिक्षु) आईपीएस औफिसर कावेंद्र सिंह सागर को सौंपी गई. कावेंद्र सिंह सागर ने रिपोर्ट दर्ज होते ही लोकेश चौधरी की तलाश कराई. पता चला कि वह जयपुर में ही है. इस के बाद उसी दिन यानी 21 अप्रैल को लोकेश चौधरी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की. उस की पूर्व हिस्ट्री और मोबाइल काल विश्लेषण के आधार पर उस से कई सवाल किए गए.

पुलिस के सवालों के आगे लोकेश ज्यादा देर तक नहीं टिक सका, वह टूट गया. उस ने बताया कि अपने एक साथी के सहयोग से उस ने अपनी पत्नी मुनेश को जयपुर से गुजरात के वड़ोदरा बुलाया था. वड़ोदरा में मुनेश की हत्या कर के उस की लाश जमीन में गाड़ दी गई थी. लोकेश ने बताया कि उस ने मुनेश की हत्या की साजिश अपनी प्रेमिका से शादी करने के लिए रची थी. पुलिस ने उसी दिन लोकेश को गिरफ्तार कर लिया.

लोकेश की स्वीकारोक्ति से पुलिस अधिकारी दंग रह गए. पत्नी के गुम होने का नाटक रच कर जो आयकर निरीक्षक पुलिस पर ढिलाई बरतने का आरोप लगा रहा था, उस ने 10 दिन पहले ही पत्नी की हत्या कर दी थी.

यह खुलासा होने पर उसी दिन जयपुर से प्रशिक्षु आईपीसी औफिसर कावेंद्र सिंह सागर के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम आरोपी आयकर निरीक्षक लोकेश चौधरी को साथ ले कर गुजरात के वड़ोदरा शहर के लिए रवाना हो गई. 22 अप्रैल को लोकेश की निशानदेही पर जयपुर पुलिस ने वड़ोदरा में हरणी एयरपोर्ट क्षेत्र स्थित तृषा डुप्लेक्स में बगीचे की जमीन खोद कर गाड़ा गया मुनेश का शव बरामद कर लिया. मुनेश का शव बगीचे में एक कोने में करीब 7 फीट गहरा गड्ढा खोद कर दफनाया गया था.

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मुनेश का शव निकालने के लिए गड्ढा खुदवाना पड़ा, इस काम में पुलिस को मजदूरों के अलावा जेसीबी की मदद भी लेनी पड़ी. गड्ढा खोदने में ही 3 घंटे लग गए. मुनेश के शरीर पर बहुत कम कपड़े मिले.

लोकेश ने मुनेश का शव जमीन में गाड़ कर उस पर करीब 15 किलो नमक भी डाल दिया था ताकि शव जल्दी से गल जाए और बदबू भी न फैले. बाद में गड्ढे में मिट्टी भर दी गई. फिर उसे समतल कर पानी का छिड़काव कर दिया गया था ताकि मिट्टी जम जाए.

वड़ोदरा से मुनेश का शव बरामद कर पुलिस दल उसी रात जयपुर के लिए वापस चल दिया. 23 अप्रैल को जयपुर पहुंच कर पुलिस ने मुनेश के शव का सवाई मानसिंह अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया. दोपहर बाद मुनेश का शव उस के पिता को सौंप दिया गया. मुनेश के घर वाले उस का शव भरतपुर जिले के अपने पैतृक गांव सिनसिनी ले गए.

सिनसिनी में जब मुनेश का शव पहुंचा तो पूरे गांव में शोक छा गया. सवा साल पहले जिस बेटी को गांव वालों ने दुलहन बना कर विदा किया था, अब कफन में लिपटी उस की लाश गांव पहुंची थी. हजारों लोगों की मौजूदगी में मुनेश का गांव में अंतिम संस्कार कर दिया गया. पुलिस ने मुनेश की हत्या के मामले में लोकेश चौधरी के दोस्त प्रवेंद्र शर्मा को 23 अप्रैल की रात गिरफ्तार कर लिया.

लोकेश ने प्रवेंद्र शर्मा को जयपुर भेज कर मुनेश को वड़ोदरा बुलवाया था और उसी की मदद से मुनेश की हत्या कर उस का शव जमीन में गाड़ दिया था. प्रवेंद्र आयकर निरीक्षक लोकेश का दोस्त और उसी के गांव का रहने वाला था.

पुलिस की ओर से लोकेश और प्रवेंद्र से की गई पूछताछ में मुनेश की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह सन 2015 में प्रदर्शित अजय देवगन की फिल्म ‘दृश्यम’ से मिलतीजुलती है. हालांकि लोकेश ने पुलिस को बताया कि उस ने फिल्म ‘दृश्यम’ देखी जरूर है, लेकिन मुनेश की हत्या इस फिल्म से प्रेरित हो कर नहीं की.

अलवर जिले के कठूमर के रहने वाले लोकेश की शादी 5 फरवरी, 2017 को भरतपुर जिले के सिनसिनी गांव के रहने वाले रामकुमार सिनसिनवार की बेटी मुनेश से हुई थी. शादी के बाद मुनेश अपने आयकर निरीक्षक पति लोकेश चौधरी से खूब खुश थी. उसे अपनी किस्मत पर रश्क होता था कि उसे प्यार करने वाला अफसर पति मिला है. शादी के बाद कुछ समय वह पति के साथ वड़ोदरा में रही, फिर ससुराल आ गई. बीच में जब भी मौका मिलता, लोकेश अपने गांव आ जाता या मुनेश वड़ोदरा चली जाती. इस तरह दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से बीत रही थी.

मुनेश पढ़ीलिखी थी. उस की इच्छा थी कि वह भी सरकारी नौकरी करे. वह अध्यापिका बनना चाहती थी. एक दिन उस ने पति लोकेश से कहा कि राजस्थान में हजारों शिक्षकों की भरती होने वाली है. वह शिक्षक भरती परीक्षा देना चाहती है, जिस के लिए उसे जयपुर में रह कर तैयारी करनी पड़ेगी. जयपुर में रहने से उस पर घर के कामकाज का बोझ भी नहीं रहेगा और वह आराम से अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सकेगी.

मुनेश की इस इच्छा पर न तो लोकेश को कोई ऐतराज था और न ही उस के घर वालों को. लोकेश ने उस की बात पर सहमति जताते हुए कहा कि यह तो अच्छी बात है. आजकल वैसे भी महंगाई इतनी हो गई है कि पतिपत्नी मिल कर कमाएं, तभी अच्छे तरीके से जिंदगी गुजर सकती है.

लोकेश ने जयपुर के बापूनगर में डी-126 कृष्णा मार्ग पर स्थित एक पीजी हौस्टल में मुनेश के रहने की व्यवस्था कर दी. मुनेश इसी हौस्टल में रह कर अपनी पढ़ाई कर रही थी. दूसरी ओर लोकेश का पहले से एक युवती से प्रेमप्रसंग चल रहा था. हालांकि मुनेश में कोई बुराई नहीं थी. लोकेश को भी उस से कोई शिकायत नहीं थी.

मुनेश पढ़ीलिखी थी, शक्लसूरत से भी खूबसूरत थी. आधुनिक और फैशनेबल भी थी, लेकिन पता नहीं लोकेश को अपनी प्रेमिका में ऐसा क्या नजर आता था कि वह उसी के खयालों में खोया रहता था.

लोकेश अपनी प्रेमिका से शादी करना चाहता था, लेकिन न तो कानूनी दृष्टि से यह संभव था और न ही सामाजिक रूप से. सरकारी नौकरी करते हुए दूसरी शादी करने पर उस की नौकरी भी जा सकती थी. इसलिए वह मुनेश को ठिकाने लगाने की साजिश रचने लगा. साजिश रचने के साथ वह ‘दृश्यम’ फिल्म की तरह पुलिस के हर संभावित सवालों के जवाब भी तय करने लगा.

लोकेश को पता था कि मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस उस तक पहुंच जाएगी, इसलिए उस ने हर कदम बहुत सोचसमझ कर उठाया.

पति पर संदेह का सब से पहला कारण प्रेमप्रसंग और अवैध संबंध होते हैं, इसलिए उस ने अपनी प्रेम कहानी को छिपाने के लिए अपने मोबाइल से प्रेमिका से बात करना बंद कर दिया था.

उस ने अपने एक साथी कर्मचारी की आईडी हथिया कर उस के नाम से सिम खरीदी. इस सिम से वह केवल अपनी प्रेमिका से ही बात करता था. अन्य किसी से बात करने के लिए वह अपने दूसरे मोबाइल नंबरों का उपयोग करता था.

लोकेश ने खुद को संदेह से दूर रखने के लिए मुनेश को एक महीने पहले ही जयपुर में स्कूटी दिलवाई. वह जानबूझ कर दिन में कई बार वड़ोदरा से जयपुर में पत्नी मुनेश को फोन करता था ताकि दोनों के बीच अच्छे संबंधों की बात साबित हो सके.

साजिश के तहत लोकेश के कहने पर उस के दोस्त प्रवेंद्र शर्मा ने वड़ोदरा में हरणी एयरपोर्ट क्षेत्र स्थित तृषा डुप्लेक्स में ग्राउंड फ्लोर पर किराए का मकान लिया. लोकेश व प्रवेंद्र ने 10 अप्रैल को इस मकान के बगीचे के एक कोने में मजदूरों से करीब 7 फुट गहरा गड्ढा खुदवाया.

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इन्होंने मजदूरों से कहा कि वे यह गड्ढा खाद बनाने के लिए खुदवा रहे हैं. बगीचे में गड्ढा खुदाई का काम आसपड़ोस के लोगों को न दिखाई दे, इस के लिए उन्होंने ग्रीन नेट से बगीचे को कवर कर दिया था.

लोकेश इतना शातिर दिमाग था कि खुद की फोन लोकेशन वड़ोदरा में ही बनाए रखना चाहता था. गड्ढा खुद जाने के बाद उस ने अपने दोस्त प्रवेंद्र को उसी रात वड़ोदरा से जयपुर के लिए रवाना कर दिया. लोकेश ने प्रवेंद्र का मोबाइल खुद के पास रख लिया और उसे दूसरा नया मोबाइल दे कर जयपुर भेजा.

प्रवेंद्र दूसरे दिन यानी 11 अप्रैल को जैसे ही जयपुर पहुंचा, लोकेश ने अपनी पत्नी को फोन कर कहा कि मैं एक केस में फंस गया हूं, बड़ी परेशानी में हूं. मेरा दोस्त जयपुर आया हुआ है. तुम उस के साथ वड़ोदरा आ जाओ. मैं अपने दोस्त से कह देता हूं कि वह तुम्हें हौस्टल से ले लेगा.

मुनेश कुछ सोचतीविचारती, इस से पहले ही प्रवेंद्र बापूनगर स्थित पीजी हौस्टल पहुंच गया. प्रवेंद्र ने मुनेश से कहा, ‘‘भाभीजी, भैया ने वड़ोदरा बुलाया है और चलना भी अभी है.’’

मुनेश को किसी बात का कोई शकशुबहा तो था नहीं, इसलिए वह प्रवेंद्र के साथ चल दी. प्रवेंद्र ने हौस्टल से रवाना होते ही बहाने से मुनेश का मोबाइल ले लिया और उस की सिम निकाल ली.

मुनेश के मोबाइल की सिम निकालने से उस की आखिरी लोकेशन जयपुर में गांधीनगर, बापूनगर व लालकोठी इलाके में आती रही. इस के पीछे लोकेश की मंशा थी कि पुलिस का संदेह गुजरात और वड़ोदरा तक न पहुंचे.

12 अप्रैल की दोपहर मुनेश और प्रवेंद्र वड़ोदरा पहुंच गए. प्रवेंद्र मुनेश को सीधे अपने किराए के मकान पर ले गया. वहां लोकेश पहले से मौजूद था.

मुनेश जैसे ही उस मकान में पहुंच कर अपने पति लोकेश से मिलने के लिए आगे बढ़ी तो लोकेश ने उस का गला घोंट दिया. प्रवेंद्र ने उस का मुंह दबा लिया, इस से मुनेश की चीख भी किसी ने नहीं सुनी.

मुनेश की हत्या के बाद लोकेश और प्रवेंद्र ने मिल कर उस का शव मकान के बगीचे में पहले से खुदवाए हुए गड्ढे में डाल दिया. फिर शव पर नमक व मिट्टी डाल कर दोनों ने उस गड्ढे को भर दिया. बाद में पानी का छिड़काव भी कर दिया.

मुनेश की हत्या के बाद लोकेश ने अपने पिता बृजेंद्र सिंह को फोन कर के कहा कि मुनेश नहीं मिल रही है. पुलिस में इस की रिपोर्ट दर्ज करा दो. बेटे के कहने पर बृजेंद्र सिंह ने उसी दिन गांधीनगर थाने में मुनेश के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के अगले दिन लोकेश वड़ोदरा से जयपुर आ गया. उस ने पुलिस को मुनेश के अपहरण की आशंका जताई और कहा कि उस की मुनेश से मोबाइल पर आखिरी बार 11 अप्रैल को बात हुई थी. उस समय उस ने कहा था कि वह किसी दोस्त के पास जा रही है.

बाद में पुलिस ने जब मुनेश की तलाश में लोकेश और मुनेश के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली तो लोकेश की वड़ोदरा से जयपुर में मुनेश से 11 अप्रैल को बात होने की तो पुष्टि हुई. इस के बाद मुनेश के मोबाइल की टावर लोकेशन जयपुर में गांधीनगर, बापूनगर और लालकोठी के आसपास ही घूमती रही.

इसीलिए पुलिस लोकेश पर संदेह नहीं कर पा रही थी और लोकेश इस का फायदा उठा कर पुलिस पर दबाव बना रहा था ताकि पुलिस मुनेश के अपहरण की कहानी में उलझ कर रह जाए.

प्रवेंद्र शर्मा गुजरात के भावनगर में नौकरी करता था. लोकेश ने उसे आयकर विभाग में नौकरी दिलवाने का झांसा दे कर मुनेश की हत्या की साजिश में शामिल किया था.

लोकेश ने पुलिस से बचने के लिए करीब एक दर्जन प्लान बनाए थे. इसीलिए जयपुर पुलिस शुरू में मुनेश के अपहरण की कहानी में ही उलझ कर रह गई. पुलिस ने इस मामले को सुलझाने के लिए लोकेश और मुनेश के मोबाइल फोंस की साल भर की करीब 15 हजार कालडिटेल्स की जांच की.

लोकेश ने मुनेश की हत्या की साजिश रचने के साथ ही करीब 3 महीने पहले अपनी प्रेमिका से बातचीत के लिए दूसरे के नाम से सिम ले ली थी. उस ने प्रेमिका को भी सख्त हिदायत दे दी थी कि वह उस के पुराने नंबरों पर काल न करे. इस के पीछे लोकेश का मानना था कि पुलिस ज्यादा से ज्यादा 2-3 महीने की काल डिटेल्स देखेगी, इस में उस की प्रेमिका का नंबर नहीं आएगा.

प्लान के तहत लोकेश ने मुनेश को जयपुर में स्कूटी दिलवाई और शिक्षक भरती परीक्षा के लिए उस का पीजी हौस्टल में एडमिशन कराया ताकि ससुराल वालों की नजर में वह एक अच्छा दामाद बना रहे. इस के अलावा वह रोजाना मुनेश को कई बार फोन करता और मैसेज भेजता ताकि लोगों को लगे कि दोनों एकदूसरे को खूब प्यार करते हैं.

लोकेश खुद वड़ोदरा में रहा. दोस्त प्रवेंद्र के नाम पर उस ने वड़ोदरा में किराए का मकान लिया. फिर प्रवेंद्र को नया मोबाइल दे कर जयपुर भेजा. योजनानुसार प्रवेंद्र ने मुनेश के साथ जयपुर से वड़ोदरा के लिए रवाना होते ही उस के मोबाइल की सिम निकाल कर फेंक दी ताकि उस की लोकेशन जयपुर में आती रहे.

इतना ही नहीं, उस ने पिता से पुलिस में बहू के लापता होने की रिपोर्ट भी दर्ज करवाई. फिर दूसरे दिन ही जयपुर आ कर लोकेश ने मुनेश के अपहरण की कहानी गढ़ कर गांधीनगर थाना पुलिस की शिकायत की ताकि पुलिस अफसर शिकायत और अपहरण की कहानी में उलझे रहें.

लोकेश ने अपना मोबाइल हैंग होने का बहाना बना कर उसे फोरमैट करा दिया. इस से उस का संदिग्ध डाटा, मैसेज आदि डिलीट हो गए.

11 अप्रैल की रात हौस्टल में मुनेश की रूममेट आशा ने लोकेश को फोन कर के कहा कि मुनेश का टिफिन आया हुआ है लेकिन न तो मुनेश मिल रही है और न ही उस का नंबर लग रहा है. इस पर लोकेश ने रूममेट को सख्ती से कहा कि पीजी हौस्टल संचालक से मुनेश के बारे में पूछो, क्योंकि यह उस की जिम्मेदारी है.

मामले का खुलासा होने से पहले तक लोकेश अपने ससुराल वालों के साथ मिल कर मुनेश की तलाश में जुटा रहा ताकि उस पर किसी को कोई संदेह न हो.

लोकेश ने भले ही फिल्म दृश्यम से प्रेरित हो कर मुनेश की हत्या की साजिश नहीं रची हो, लेकिन उस ने 10 दिन तक पुलिस को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

यह विडंबना ही है कि केंद्र सरकार के अधिकारी लोकेश चौधरी ने प्रेमिका से शादी रचाने के लिए अपने हाथ पत्नी के खून से रंग लिए. भोलीभाली मुनेश शादी के सवा साल बाद भी अपने पति की शातिर चालों को नहीं समझ सकी. वह पति के विश्वास के भरोसे मारी गई. उस ने तो लोकेश के साथ सात जनम तक जीनेमरने की कसमें खाई थीं.

लोकेश और उस के दोस्त प्रवेंद्र ने जो कुछ किया, उस की सजा उन्हें कानून देगा. सवाल यह भी है कि लोकेश की प्रेमिका क्या कातिल प्रेमी का इंतजार करती रहेगी.

छोटे से गांव से निकल बने 100 करोड़ की कंपनी के मालिक

हर प्रदेश में कुछ गांव पिछड़े हुए होते हैं, केरल में भी हैं. पी.सी. मुस्तफा केरल के जिला वायनाड के एक छोटे से गांव में जन्मे थे, एकदम गरीब परिवार में. घर की स्थिति ऐसी थी कि पिता को चौथी तक पढ़ाई के बाद नौकरी करनी पड़ी. मां घरेलू महिला थीं, साथ ही घर में 2 छोटी बहनें भी थीं.

अभावों के चलते मुस्तफा ने गांव के स्कूल से 5वीं पास की. आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे गांव के स्कूल में जाना पड़ा, जहां जाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. इस के बावजूद मुस्तफा छठीं में फेल हो गए. लेकिन पढ़ाई के जुनून के चलते फिर भी स्कूल नहीं छोड़ा.

इस का नतीजा भी सार्थक रहा. पढ़ाई जारी रखते हुए मुस्तफा ने कोलकाता से एनआईआईटी और बेंगलुरु से आईआईएम की पढ़ाई की. घर का खर्च जैसेतैसे चल रहा था, लेकिन 3 बहनों की शादी की जिम्मेदारी मुस्तफा के कंधों पर थी.

मुस्तफा इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन बन गए बिजनैसमैन. हुआ यह कि एक दिन उन के चचेरे भाई शम्सुद्दीन ने एक दुकान पर देखा कि डोसा बनाने का घोल (डोसा बैटर) प्लास्टिक की थैलियों में बेचा जा रहा है. शम्सुद्दीन ने मुस्तफा से कहा कि इस काम को हम इस से बेहतर ढंग से कर सकते हैं.

बस मुस्तफा को आइडिया क्लिक कर गया. उन्होंने अपने 5 चचेरे भाइयों को साथ लिया और 25 हजार रुपए लगा कर एक कंपनी शुरू कर दी, जिस में डोसे का घोल बनाया जाता था. कंपनी का नाम रखा ‘आईडी फ्रैश’.

कंपनी की शुरुआत छोटी सी जगह, एक ग्राइंडर, एक मिक्सर और एक सीलिंग मशीन के साथ हुई.

शुरुआती दिनों में उन की कंपनी दिन में 10 पैकेट बेचा करती थी, लेकिन अब 10 साल बाद यह कंपनी प्रतिदिन 50 हजार पैकेट बेचती है. कंपनी में 11 सौ कर्मचारी काम करते हैं. पिछले साल अक्तूबर में इस कंपनी ने अपनी सफलता का जश्न मनाया.

मुस्तफा की खास बात यह है कि वह कंपनी में ज्यादातर अपने गांव के लोगों को ही काम देते हैं, जिस से बेरोजगारी की समस्या खत्म हो रही है. इस वक्त मुस्तफा सौ करोड़ की कंपनी के मालिक हैं.

लेडी डौन बनने की चाहत : कैसा जाल बिछाती थी प्रिया

प्रिया सेठ. यही नाम है उस भोलीभाली और खूबसूरत चेहरे वाली लड़का का. वह चंद पलों में नौजवानों के दिल में उतर जाती है. अपनी इसी खूबसूरती से प्रिया हजारों लोगों को शिकार बना चुकी है. पुलिस के रिकौर्ड में प्रिया के खिलाफ  केवल 4 मामले दर्ज हैं. इन में एक हत्या, दूसरा एटीएम तोड़ने, तीसरा ब्लैकमेलिंग और चौथा पीटा एक्ट का.

वह पढ़ीलिखी है. राजस्थान के पाली जिले के छोटे से शहर फालना में नेहरू कालोनी की रहने वाली प्रिया के पिता अशोक सेठ सरकारी कौलेज में लेक्चरर हैं. मां अध्यापिका रही हैं. दादा सिरोही में प्रिंसिपल रहे. फूफा जोधपुर की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. एक बहन और एक भाई है.

इंगलिश मीडियम से 82 प्रतिशत अंकों के साथ प्रिया ने फालना से 10वीं कक्षा पास की थी. फिर सीनियर सेकैंडरी में 78 प्रतिशत नंबर आए. मातापिता अपनी इस लाडली बड़ी बेटी को प्रोफेसर बनाना चाहते थे. इसलिए कौलेज की पढ़ाई के लिए 20 साल की उम्र में ही जयपुर भेज दिया. यह सन 2011 की बात है.

छोटे से शहर फालना से जयपुर आ कर प्रिया ने मानसरोवर कालोनी के एक निजी कौलेज में प्रवेश लिया तो उस की आंखों में प्रोफेसर बनने के सपने तैर रहे थे. पहले वह रिश्तेदार के घर पर ठहरी. कौलेज जाने के बाद जब भी मौका मिलता, वह जयपुर में घूमती. कभीकभी दिन ढले घर लौटती.

जल्दी ही वह जयपुर महानगर की चकाचौंध में खो गई और उन्मुक्त जीवन जीने के बारे में सोचने लगी, जिस में ना किसी की रोकटोक हो और ना ही कोई बंधन.

प्रिया की उन्मुक्तता में प्रोफेसर बनने का सपना धुंधला सा गया. वह रिश्तेदार का घर छोड़ कर मानसरोवर में ही पेइंगगेस्ट के रूप में रहने लगी. वैसे तो मातापिता उसे जयपुर में रहनेखाने और पढ़ाई के खर्च के लिए पैसे भेज देते थे, लेकिन उन पैसों से उस की मनचाही आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती थीं. अपने शौक पूरे करने के लिए प्रिया को पैसों की जरूरत महसूस होने लगी. अकेले रहते हुए दौलत की चाह में वह कब अनैतिक काम करते हुए अपराध की दलदल में उतर गई, उसे खुद पता नहीं चला.

आज प्रिया के हाथ खून से रंगे हुए हैं. उस ने जयपुर में रहते हुए 5 साल के दौरान हर तरह के हथकंडे अपनाए. आलीशान फ्लैट में रहना, लग्जरी कार में घूमना, महंगी शराब पीना, गांजे की सिगरेट का नशा और मौजमस्ती. उस ने सब तरह की ऐश की. अपने हुस्न की झलक दिखाने के लिए वेबसाइट भी बनाई.

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वह करोड़पति और अरबपति लोगों को अपने हुस्न के जाल में फांसने की फिराक में रहती थी. बहुत से नवधनाढ्य उस की अदाओं पर फिदा हुए. प्रिया ने उन को अपने गोरे बदन की चमक दिखाई और पैसे झटकने के बाद उन को ही झटक दिया.

पहली मुलाकात में ही अपनी मोहक मुस्कान दिखा कर वह 20-25 हजार रुपए आराम से झटक लेती थी. बीच में कुछ समय के लिए वह दिल्ली और नोएडा में जा कर रहने लगी थी, लेकिन वहां से जल्दी ही वापस जयपुर लौट आई.

अब वह जयपुर के व्यवसायी दुष्यंत शर्मा की हत्या के मामले में अपने बौयफ्रैंड और एक दोस्त के साथ सलाखों के पीछे है. 3 बार पहले भी वह गिरफ्तार हो चुकी है. उसे ना तो दुष्यंत की हत्या का मलाल है और ना ही कोई अपराधबोध.

प्रिया कुख्यात लेडी डौन बनना चाहती है. वह कहती है, ‘मैं ने दुनिया का कोई पहला मर्डर नहीं किया है.’ शायद उसे पता नहीं है कि कोई मर्डर पहला या आखिरी नहीं होता. प्रिया कहती है, ‘मुझे सिर्फ  दौलत चाहिए. मैं पैसे की बदौलत वे सब चीजें खरीदना चाहती हूं, जिस की मुझे ख्वाहिश है.’ वह यह भी कबूलती है कि 2 साल में उस ने डेढ़ करोड़ रुपया कमाया है.

प्रिया की घुमावदार राहें

प्रिया जितनी खूबसूरत है, उस की मेधावी लड़की से कातिल बनने और लेडी डौन बनने की तमन्ना रखने तक की कहानी उतनी ही घुमावदार है. अपनी तमन्नाओं को पूरा करने के लिए ही उस ने दुष्यंत का अपहरण कर लिया और फिरौती वसूलने के बाद भी उसे मौत के घाट उतार दिया.

जयपुर में शिवपुरी विस्तार झोटवाड़ा के रहने वाले रामेश्वर प्रसाद शर्मा सहकारिता विभाग में नौकरी करते हैं. उन का इकलौता बेटा दुष्यंत फ्लाई ऐश और बिल्डिंग मैटेरियल का काम करता था. दुष्यंत की शादी करीब 3 साल पहले विनीता से हुई थी. उन का करीब डेढ़ साल का एक बेटा है, जिस का नाम है कान्हा.

इसी 2 मई की शाम करीब 6 बजे दुष्यंत अपने घर पहुंचा था. इस के कुछ देर बाद ही उस के मोबाइल पर फोन आया तो वह परिवार वालों से यह कह कर कार में बैठ कर घर से निकला कि जरूरी काम है, निपटा कर आता हूं. दुष्यंत देर रात तक घर नहीं लौटा तो पिता रामेश्वर ने उस की तलाश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

दुष्यंत अगले दिन सुबह भी घर वापस नहीं लौटा तो परिवार वाले चिंतित हो गए. वे उस के कारोबारी दोस्तों और अन्य लोगों से पता करने लगे. इस बीच, सुबह करीब सवा 10 बजे रामेश्वर प्रसाद शर्मा के मोबाइल पर दुष्यंत का फोन आया. दुष्यंत ने मोबाइल पर ही रोते हुए पिता से कहा, ‘ये लोग मुझे मार देंगे या रेप के केस में फंसा देंगे. इन को पैसे दे दो.’

रामेश्वर प्रसाद बेटे की बात समझ पाते, इस से पहले ही दुष्यंत से एक युवती ने फोन छीन लिया और रामेश्वर प्रसाद से कहा, ‘दुष्यंत हमारे कब्जे में है. अभी आधे घंटे में 10 लाख रुपए इस के खाते में जमा करा दो, पुलिस को बताया तो इस को मार डालेंगे.’

युवती की बात सुन कर रामेश्वर प्रसाद समझ गए कि बेटा दुष्यंत किसी संकट में है. वे दुष्यंत को मारने की धमकी दिए जाने से घबरा गए. उन्होंने युवती से फोन पर गिड़गिड़ाते हुए कहा कि इतने पैसे तो हमारे पास नहीं हैं. अभी मैं 3 लाख रुपए दे सकता हूं. इस पर वह युवती गालियां देने लगी और तुरंत पैसे जमा कराने को कहा.

रामेश्वर प्रसाद ने करीब एक घंटे में 3 लाख रुपए का इंतजाम कर दुष्यंत के खाते में डलवा दिए. फिर दुष्यंत के फोन पर उस युवती को 3 लाख रुपए जमा कराने की सूचना दी. इस पर युवती ने वाट्सऐप पर 3 लाख रुपए की रसीद मंगवाई और बाकी रुपए जल्दी से जल्दी डालने को कहा.

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इस बीच, दुष्यंत की पत्नी विनीता को पति के अपहरण और हत्या की धमकी की बात पता चली, तो उस ने अपने भाई को यह  बात बताई. विनीता के भाई ने पुलिस को सूचना दी.

दुष्यंत के अपहरण की सूचना पर पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) अशोक कुमार गुप्ता ने अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) रतन सिंह, झोटवाड़ा के सहायक पुलिस आयुक्त आस मोहम्मद, करघनी थानाप्रभारी अनिल जसोरिया, झोटवाड़ा थानाप्रभारी गुर भूपेंद्र सिंह, सबइंसपेक्ट हेमंत व मानसिंह और कांस्टेबल सुरेश, अमन एवं प्रवीण की एक टीम गठित की.

इस पुलिस टीम ने दुष्यंत की तलाश की. उस की मोबाइल लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवाई गई. दुष्यंत के घरवालों, रिश्तेदारों, दोस्तों और कारोबारियों से पूछताछ की गई. दुष्यंत के मोबाइल की लोकेशन जयपुर में बजाजनगर, अनिता कालोनी के आसपास आ रही थी. इस पर पुलिस दोपहर करीब साढ़े 12 बजे अनिता कालोनी पहुंच गई और दुष्यंत व उस की कार को तलाशती रही, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

पुलिस जांचपड़ताल में जुटी थी. उसे यह पता लग गया था कि दुष्यंत के अपहर्त्ताओं ने उस के बैंक खाते में रकम डलवाई है. इसलिए पुलिस उस के बैंक खाते पर भी नजर रखे हुए थी. इसी बीच, पता चला कि दुष्यंत के खाते से जयपुर में टोंक रोड पर नेहरू उद्यान के पास स्थित एक एटीएम से किसी युवती ने 20 हजार रुपए निकाले हैं.

एक तरफ  पुलिस की टीमें दुष्यंत को तलाश कर रही थीं. दूसरी ओर 3 मई की देर शाम जयपुर के ही आमेर थाना इलाके में दिल्ली बाईपास पर नई माता मंदिर के पास सुनसान जगह पर ट्रौली वाले सूटकेस में एक युवक की लाश बरामद हुई. मृतक के सिर पर चोट के निशान मिले. गले पर भी 4-5 निशान थे.

वह दुष्यंत ही था

जहां सूटकेस मिला, वहां एक कार के पहियों के निशान भी नजर आए. ट्रौली सूटकेस में लाश मिलने की सूचना पर पुलिस उपायुक्त (उत्तर) सत्येंद्र सिंह मौके पर पहुंचे. युवक के हाथपैर चुनरी व स्कार्फ से बंधे हुए थे. उस के कपड़ों की जेब में ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त होती.

दूसरी ओर, पुलिस की एक टीम ने दुष्यंत की काल डिटेल्स के आधार पर कुछ मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया तो पता चला कि दुष्यंत ने उन से पैसे मांगे थे, लेकिन वह पैसे लेने नहीं आया. एक मोबाइल नंबर पर पुलिस की बात दुष्यंत के दोस्त महेश से हुई.

महेश ने पुलिस को बताया कि दुष्यंत का एक युवती से प्रेमप्रसंग चल रहा था. वह युवती बजाजनगर अनिता कालोनी के ईडन गार्डन अपार्टमेंट में रहती है.

दुष्यंत की प्रेमिका का पता चलते ही झोटवाड़ा पुलिस 3 मई की रात अनिता कालोनी के ईडन गार्डन अपार्टमेंट स्थित 402 नंबर के फ्लैट पर पहुंची. वहां एक युवती और एक युवक कहीं जाने की तैयारी करते मिले. पुलिस ने फ्लैट की तलाशी ली तो वहां खून फैला हुआ था. दोनों से पूछताछ की गई, तो युवती का नाम प्रिया सेठ और युवक का नाम दीक्षांत कामरा पता चला. उन्होंने दुष्यंत का अपहरण करने के बाद उस की हत्या करने की बात बता दी.

दुष्यंत की हत्या होने का पता चलने पर मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारी सन्न रह गए. उन्होंने दुष्यंत की लाश के बारे में पूछा तो प्रिया व दीक्षांत ने बताया कि उन्होंने दुष्यंत की लाश एक ट्रौली सूटकेस में बंद कर के आमेर

इलाके में फेंक दी है. इस पर पुलिस ने दुष्यंत के परिजनों से लाश की शिनाख्त कराई. दुष्यंत की लाश मिलने के बाद मामला बेहद संगीन हो गया था.

पुलिस ने दुष्यंत के अपहरण और हत्या के मामले में प्रिया सेठ व दीक्षांत कामरा से पूछताछ के बाद एक दूसरे युवक लक्ष्य वालिया को भी हिरासत में ले लिया. बाद में तीनों को भादंसं की धारा 364ए एवं 302 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया.

प्रिया के अपार्टमेंट में खड़ी दुष्यंत की कार भी बरामद कर ली गई. गिरफ्तार आरोपियों में दीक्षांत कामरा श्रीगंगानगर जिले के पदमपुर कस्बे में इंद्रा कालोनी और लक्ष्य वालिया श्रीगंगानगर के चावला चौक पुरानी आबादी का रहने वाला था.

ऊंचे सपनों की चाह वाले बने कातिल

दीक्षांत कामरा मुंबई में मौडलिंग करता था. वह आजकल प्रिया सेठ के साथ लिवइन रिलेशनशिप में जयपुर के ईडन गार्डन अपार्टमेंट में रह रहा था. दीक्षांत के पिता सरकारी स्कूल में हैडमास्टर हैं. लक्ष्य वालिया जयपुर में मालवीय नगर स्थित तनिश अपार्टमेंट में रहता था. उस के पिता जीवित नहीं हैं. मां सेल्स टैक्स विभाग में कर्मचारी है. प्रिया सेठ ने ईडन गार्डन अपार्टमेंट में करीब डेढ़ महीने पहले ही दिल्ली निवासी हर्ष कुमार यादव से 402 नंबर का फ्लैट किराए पर लिया था.

तीनों आरोपियों से पूछताछ में दुष्यंत के अपहरण और हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

प्रिया सेठ सोशल मीडिया टिंडर ऐप पर एक्टिव थी. इसी साल फरवरी-मार्च महीने में इसी ऐप पर दुष्यंत का प्रिया से संपर्क हुआ था. दुष्यंत ने खुद को दिल्ली निवासी विवान कोहली बता कर प्रिया से चैटिंग शुरू की थी. चैटिंग करते हुए दोनों के बीच दोस्ती हो गई. फिर मिलनाजुलना और घूमनाफिरना भी होने लगा.

दुष्यंत ने प्रिया से खुद को विवान कोहली के रूप में दिल्ली का अरबपति व्यापारी बताया था. उस ने प्रिया से कहा था कि उस के बिजनैस का सालाना टर्नओवर 25 करोड़ रुपए से ज्यादा का है. दुष्यंत का रहनसहन करोड़पति व्यापारी जैसा था भी.

विवान कोहली को अरबपति व्यापारी समझ कर प्रिया उसे अपने हुस्न के जाल में फांसना चाहती थी. दरअसल, प्रिया के बौयफ्रैंड दीक्षांत कामरा पर काफी कर्जा हो गया था. इसलिए प्रिया ने दीक्षांत का कर्ज उतारने के लिए अपने दोस्तों के साथ मिल कर विवान कोहली को फांसने की योजना बनाई.

योजना के अनुसार, प्रिया ने 2 मई को विवान कोहली बने दुष्यंत को फोन कर के जयपुर में अपने फ्लैट पर बुलाया. दुष्यंत उस दिन शाम को प्रिया के ईडन गार्डन अपार्टमेंट स्थित फ्लैट पर पहुंचा तो प्रिया ने अपने दोस्तों दीक्षांत कामरा और लक्ष्य वालिया के साथ मिल कर उसे बंधक बना लिया.

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दुष्यंत को बंधक बनाने के बाद प्रिया ने उस के कपड़ों की तलाशी ली, तो जेब में मिले दस्तावेजों से उसे पता चला कि वह दिल्ली का विवान कोहली नहीं, बल्कि जयपुर के झोटवाड़ा का रहने वाला दुष्यंत है. उस के बैंक खाते में भी ज्यादा रकम नहीं थी. इस पर तीनों ने मिल कर पहले दुष्यंत के परिजनों से फिरौती वसूलने की बात तय की. इसी के तहत 3 मई को सुबह करीब सवा 10 बजे दुष्यंत से उस के पिता रामेश्वर प्रसाद को फोन कर 10 लाख रुपए मांगे गए.

ऐसे लिखी गई खूनी स्क्रिप्ट

रामेश्वर प्रसाद ने बेटे दुष्यंत के खाते में 3 लाख रुपए डाल दिए, तो प्रिया सेठ ने कुछ देर बाद ही अपने फ्लैट से कुछ दूर स्थित एटीएम से 20 हजार रुपए निकाल भी लिए. बाद में प्रिया और उस के दोस्तों को यह डर लगा कि दुष्यंत को छोड़ देने से उन का भांडा फूट जाएगा.

इसलिए 3 मई की दोपहर में फ्लैट पर ही उन्होंने चाकू से गोद कर दुष्यंत को मार डाला. फिर उस के हाथपैर बांध दिए. इस के बाद ये लोग दुष्यंत के शव को एक ट्रौली सूटकेस में रख क र दुष्यंत की ही कार से उसी दिन दोपहर को आमेर इलाके में दिल्ली बाईपास पर फेंक आए.

प्रिया के लालच ने रामेश्वर प्रसाद शर्मा के घर का आखिरी चिराग भी बुझा दिया. 2 बेटों की अर्थियों को कंधा दे चुके रामेश्वर प्रसाद की आंखें पथरा गईं. उन का सबसे बड़ा बेटा हिमांशु 30 साल पहले महज डेढ़ साल की उम्र में ही चल बसा था. इस के बाद 2 बेटे दुष्यंत और पीयूष पैदा हुए, तो उन की जिंदगी फिर पटरी पर लौटने लगी.

लेकिन करीब 6 साल पहले सड़क दुर्घटना में पीयूष की मौत हो गई थी. दुखों का पहाड़ छंटा भी नहीं था कि इन लोगों ने दोस्त बन कर अपने लालच के लिए दुष्यंत को मौत की नींद सुला कर रामेश्वर के बुढ़ापे का आखिरी सहारा भी छीन लिया.

सन 2011 में कालेज की पढ़ाई करने जयपुर आई प्रिया अपनी रूममेट के साथ रहते हुए देह व्यापार से जुड़े गिरोह के संपर्क में आई थी. पहली बार जुलाई 2014 में जयपुर के श्याम नगर थाना इलाके में वह देह व्यापार में पकड़ी गई थी.

इस के 5 महीने बाद ही 30 नवंबर, 2014 की रात वह मानसरोवर इलाके में रजत पथ पर एक एटीएम तोड़ने के प्रयास में अपने साथी अनिल जांगिड़ के साथ पकड़ी गई. उस समय वह जयपुर में गजसिंहपुरा के सुंदर नगर में किराए पर रहती थी.

अनिल जांगिड़ अजमेर में किशनगढ़ के पास कासिर गांव का रहने वाला है. वह जयपुर में गजसिंहपुरा में रहता था और फर्नीचर का काम करता था. प्रिया ने एक दिन अनिल को अपने कमरे का फर्नीचर ठीक करने के लिए बुलाया था. इस के बाद दोनों मिलने लगे. प्रिया ने अनिल को मोटा पैसा कमाने का झांसा दिया और एटीएम लूटने की योजना बनाई.

कैसेकैसे खेल खेले प्रिया ने

योजनानुसार वे रैकी करने के बाद गैस कटर और जरूरी औजार ले कर टैक्सी से बैंक औफ  इंडिया का एटीएम लूटने रजतपथ पर पहुंचे.

टैक्सी उन्होंने दूर खड़ी कर दी. उन्होंने गैस कटर से एटीएम को काट भी दिया. इस दौरान पुलिस का मोटरसाइकिल गश्ती दल आ गया. पुलिस को देख कर प्रिया भाग गई. पुलिस ने अनिल जांगिड़ को मौके पर ही पकड़ लिया. कई घंटे बाद मोबाइल लोकेशन के आधार पर पुलिस ने प्रिया सेठ को भी गिरफ्तार कर लिया.

एटीएम लूटने के मामले में जमानत पर छूटने के बाद प्रिया जयपुर छोड़ कर दिल्ली चली गई. वहां नोएडा में रहते हुए जयपुर के रहने वाले गजराज सिंह से उस की जानपहचान हुई. इस दौरान प्रिया व गजराज सिंह आपस में मिलनेजुलने लगे. बाद में प्रिया सेठ वापस जयपुर आ गई.

इसी साल जनवरी में जयपुर के वैशाली नगर में रहने वाले गजराज सिंह ने प्रिया के खिलाफ  वैशाली नगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. रिपोर्ट में कहा था कि 4 महीने पहले प्रिया ने गजराज को रेप केस में फंसाने की धमकी दे कर 10 लाख रुपए मांगे थे और कहा था कि पैसे नहीं दिए तो तेजाब फेंक कर जलवा भी दूंगी.

इस से घबरा कर गजराज ने प्रिया को साढ़े सात लाख रुपए दे दिए थे. पूरे 10 लाख रुपए नहीं मिलने पर वह आए दिन गजराज के घर आ कर हंगामा करने की धमकी देने लगी. तब गजराज ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई. गजराज की रिपोर्ट पर वैशाली नगर थाना पुलिस ने इसी साल 8 मार्च को प्रिया को गिरफ्तार किया था.

पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि प्रिया अनैतिक काम के लिए औनलाइन एस्कौर्ट सेवा भी चलाती थी. इस के अलावा ऐप की मदद भी लेती थी.

औनलाइन संपर्क होने के बाद प्रिया कार से अपने ड्राइवर गणेश के साथ ग्राहक के पास पहुंचती और वहां अनैतिक काम का 10 से 50 हजार रुपए में सौदा कर पैसे ले लेती. इस के बाद पैसे गाड़ी में रख कर आने की बात कह कर वह ड्राइवर के साथ अपनी कार से भाग जाती थी.

प्रिया ने पैसे के लिए सोशल मीडिया को बनाया मीडियम

सोशल मीडिया के जरिए प्रिया लोगों से दोस्ती करती और मिलने के लिए फ्लैट पर बुलाती. वह पहले महंगी शराब पिला ती और आवभगत करने के बाद खुद ही अपने कपड़े फाड़ कर रेप केस में फंसाने की धमकी देती और पैसों की डिमांड करती. पीडि़त लोग मजबूरन उसे पैसे दे कर पीछा छुड़ाते. लोकलाज के भय से पुलिस में शिकायत भी नहीं करते.

प्रिया सेठ ने इस तरह की सैकड़ों वारदातें की हैं, लेकिन वे पुलिस के रिकौर्ड में कहीं दर्ज नहीं हैं, क्योंकि पीडि़त लोगों ने ऐसे मामलों की शिकायत ही नहीं की.

प्रिया इतनी शातिर है कि जब उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर 3 मई को दुष्यंत की हत्या की थी, तभी उस के पास एक व्यक्ति का अनैतिक काम के लिए फोन आया. उस व्यक्ति ने प्रिया को रेलवे स्टेशन के पास नामचीन होटल में बुलाया. प्रिया कैब ले कर उस होटल में पहुंच गई और उस व्यक्ति से रुपए ले कर भाग आई.

पूछताछ में सामने आया कि प्रिया और दीक्षांत का एक महीने का खर्चा करीब 2 लाख रुपए है. खाने से पहनने तक उन के लग्जरी शौक हैं. दीक्षांत 80 हजार के विदेशी ब्रांड के जूते और 45 हजार की घड़ी पहनता है. कपड़े भी ऐसे ब्रांड के पहनता है, जिन के स्टोर राजस्थान में नहीं हैं. प्रिया भी 45 हजार रुपए कीमत के सैंडल पहनती थी. उसे महंगे कपड़े, परफ्यूम, सौंदर्य प्रसाधन के अलावा कीमती शराब व नशीली सिगरेटों का शौक था. वह हमेशा हवाई जहाज में सफर करती थी.

यह भी विडंबना है कि प्रिया और उस का बौयफ्रैंड दीक्षांत लोगों को ही नहीं, एकदूसरे को भी धोखा दे रहे थे. वैसे तो दोनों ने अपने हाथों पर एकदूसरे के नाम के टैटू बनवा रखे थे. दोनों के ही कई लोगों से संबंध थे. प्रिया ने दीक्षांत का पासपोर्ट भी छीन कर अपने पास रखा हुआ था.

एक बार दीक्षांत प्रिया को छोड़ कर गंगानगर चला गया, तो प्रिया ने उसे रेप केस में फंसाने की धमकी दे कर ब्लैकमेल भी किया था. बाद में दीक्षांत वापस जयपुर आ कर प्रिया के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगा था. प्रिया ही उस का खर्च उठाती थी.

लक्ष्य इन दोनों का दोस्त था. ये तीनों मिल कर शराब पार्टी करते थे. 2 मई को भी लक्ष्य वालिया शराब पीने प्रिया के फ्लैट पर आया था. वहां दुष्यंत से मोटी रकम वसूलने की योजना बनाई गई. बाद में अगले दिन प्रिया और दीक्षांत का साथ देते हुए उस ने दुष्यंत की हत्या में सहयोग किया. दुष्यंत की लाश ठिकाने लगाने भी वह कार से प्रिया और दीक्षांत के साथ गया था.

दीक्षांत का ईवौलेट अकाउंट है. आरोपियों का दुष्यंत के बैंक खाते से 3 लाख रुपए ईवौलेट में ट्रांसफर कराने का इरादा था. यह काम करने से पहले ही वे पुलिस की पकड़ में आ गए. आरोपियों का इरादा दुष्यंत की कार ले कर जयपुर से बाहर भाग जाने का भी था. इस के लिए उन्होंने फरजी नंबर प्लेट भी तैयार करवा ली थी, लेकिन वे पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस ने तीनों आरोपियों को 5 मई को अदालत में पेश कर 11 मई तक रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में पुलिस ने प्रिया के फ्लैट से बैग, चाकू, खून से सने कपड़े, चादर, रस्सियां और सूटकेस आदि बरामद किए. इस के अलावा शराब की बोतलें, कागज में लिपटी नशीली सिगरेट आदि भी मिलीं.

स्वप्न नगरी के जहरीले सपने : मीनाक्षी को किस ने दिया धोखा

9 मई, 2018, दिन बुधवार. उस दिन मुंबई की सेशन कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. वजह यह थी कि न्यायाधीश शेट्टी उस दिन अभिनेत्री मीनाक्षी थापा के अपहरण और हत्या के आरोपियों को दोषी, निर्दोष या संदेह का लाभ देने का फैसला सुनाने वाले थे.

अदालत सबूतों को देखने परखने के साथसाथ केस के 36 गवाहों की गवाही सुन चुकी थी. दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की ओर से बहस भी पूरी हो चुकी थी. इस केस में अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता थे विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम, जो अपनी धारदार दलीलों के लिए महाराष्ट्र ही नहीं, देश भर में मशहूर हैं. उज्जवल निकम की दलीलों ने ही मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के आरोपी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया था.

न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी 10 बजे ही अदालत में पहुंच गए थे. दोनों पक्षों के अधिवक्ता, दोनों आरोपी, मीनाक्षी थापा के परिवार वाले, कुछ मुख्य गवाहों और दर्शकों की अच्छीभली भीड़ अदालत में मौजूद थी. सुनवाई शुरू हुई तो बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कुछ दलीलें अदालत के सामने रखीं. फिर नंबर आया विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम का.

उन्होंने अपनी अंतिम दलीलों से पहले मीनाक्षी थापा के दोस्त आलोक थापा को पुन: अदालत के सामने खड़ा किया. आलोक थापा ने पहले हुई गवाही की तरह अदालत को बताया, ‘‘12 मार्च, 2012 को मीनाक्षी ने मुझ से कहा था कि वह प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल के साथ एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में गोरखपुर जा रही है. इतना ही नहीं, मीनाक्षी ने 12 मार्च, 2012 को लोकमान्य तिलक टर्मिनस स्टेशन पर मुझे प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल से मिलवाया भी था.’’

आरोपी प्रीति एल्विन के पिता नवीन सुरीन ने अदालत को बताया, ‘‘मैं अदालत को पहले भी बता चुका हूं और अब फिर बता रहा हूं कि 14 मार्च, 2012 को प्रीति और अमित इलाहाबाद स्थित हमारे घर आए थे.’’

मीनाक्षी थापा की मां कमला थापा ने अपनी गवाही में बताया, ‘‘14 मार्च, 2012 को मीनाक्षी ने मुझे फोन कर के बताया था कि वह इलाहाबाद पहुंच चुकी है और प्रीति के घर जा रही है, रात का खाना वह उसी के घर खाएगी. इस के अगले दिन मीनाक्षी की भाभी ने मैसेज कर के मुझे बताया कि मीनाक्षी को ले कर घर के सब लोग चिंतित हैं और उस के लापता होने की शिकायत दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं.’’

कमला थापा ने अपने बयान में आगे बताया, ‘‘इस के बाद अपहरणकर्ताओं की ओर से मैसेज आया कि मीनाक्षी को जिंदा देखना है तो उस के खाते में 15 लाख रुपए जमा कर दो. मैसेज पढ़ कर हम लोग घबरा गए और मुंबई के थाना अंबोली में एफआईआर दर्ज करा दी. बाद में दोनों आरोपियों को 14 अप्रैल, 2012 को गिरफ्तार कर लिया गया.’’

महत्त्वपूर्ण गवाहियां दोबारा हो जाने के बाद विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम ने अपनी दलील देते हुए अदालत से कहा, ‘‘सर, इन गवाहियों और पेश किए गए सबूतों के बाद, साफ हो जाता है कि मीनाक्षी थापा के अपहरण और हत्या के गुनहगार प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल ही हैं.

‘‘मैं अदालत से दरख्वास्त करूंगा कि दोनों आरोपियों को दोषी करार दे कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो इस तरह के अपराधी बचते रहेंगे और मीनाक्षी थापा, जो मुंबई में अपना कैरियर बनाने आई थी, जैसी लड़कियां छलावे में आ कर मारी जाती रहेंगी.’’

सुनवाई पूरी हो चुकी थी. न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी ने एकएक पौइंट पर ध्यान देते हुए प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल पर एक नजर डाली और अपना फैसला सुना दिया, ‘‘तमाम सबूतों को देखनेपरखने और गवाहों की बात सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि मीनाक्षी थापा के अपहरण और हत्या के दोषी प्रीति एल्विन और अमित जायसवाल ही हैं. यह अदालत दोनों को दोषी करार देती है और साथ ही घोषणा करती है कि दोनों दोषियों को 11 मई शुक्रवार को सजा सुनाई जाएगी.’’

अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन की किस्मत का फैसला क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए इस पूरे केस के बारे में जान लें.

मूलरूप से नेपाल की रहने वाली मीनाक्षी के पिता तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) देहरादून में पोस्टेड थे. वर्षों पहले वह देहरादून आ कर बस गए थे. उन की पत्नी कमला थापा भी फौरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में सरकारी नौकरी में थीं. परिवार में उन के 2 बेटे नवराज और विक्की के अलावा 2 बेटियां हेमू और मीनाक्षी थीं. हेमू की शादी अजय थापा से हो चुकी थी. नवराज मिलिट्री में था.

मीनाक्षी ने देहरादून के मशहूर दून स्कूल से शिक्षा ग्रहण की थी. इस के बाद उस ने फेंकसिन इंस्टीट्यूट से एविएशन में डिप्लोमा किया. मीनाक्षी खूबसूरत थी, इसलिए उस के मन में फिल्मों में काम करने की इच्छा जागृत हुई. इस के लिए उस ने विधिवत डांस सीखा और सेंट जोसेफ एकेडमी में डांस टीचर बन गई. लेकिन उस की मंजिल यह नहीं मुंबई थी.

मीनाक्षी को अभिनय का भी शौक था. इसलिए कुछ दिनों तक स्थानीय स्तर पर मौडलिंग करने के बाद वह फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए मुंबई चली गई. मुंबई में स्ट्रगल करने पर उसे फिल्म ‘बंगला नंबर 404 एरर नौट फाउंड’ में एक छोटा सा रोल मिला.

इस रोल का भले ही उसे मेहनताना ज्यादा नहीं मिला, लेकिन पहली बार फिल्म में काम मिलने पर वह बहुत खुश थी. उसे 1-2 फिल्मों में छोटीछोटी भूमिकाओं के अलावा कुछ विज्ञापन भी मिले. हालांकि मीनाक्षी को ग्लैमर की लाइन में आगे बढ़ने का सही मौका नहीं मिल पा रहा था, फिर भी वह अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए कोशिश कर रही थी.

मीनाक्षी मुंबई में रह जरूर रही थी, लेकिन वह लगभग रोजाना फोन पर अपनी मां कमला थापा से बात करती थी. कह सकते हैं कि वह फोन द्वारा बराबर मां के संपर्क में रहती थी. 12 मार्च, 2012 को मीनाक्षी ने मां को फोन कर के कहा कि वह 2-3 दिनों के लिए इलाहाबाद जा रही है.

मां के पूछने पर उस ने बताया कि उसे एक भोजपुरी फिल्म में काम मिलने की संभावना है, लेकिन इस के लिए उसे इलाहाबाद जा कर फिल्म निर्माता से बात करनी होगी. चूंकि मीनाक्षी को फिल्म लाइन में काम करना था और उस के बारे में वह खुद बेहतर जानती थी, इसलिए कमला थापा ने कुछ नहीं कहा. बाद में मीनाक्षी ने 14 मार्च, 2012 को मां को फोन कर के कहा कि वह इलाहाबाद पहुंच चुकी है और प्रीति के घर जा रही है.

अचानक लापता हुई मीनाक्षी

इस के बाद 2 दिनों तक कमला थापा के पास मीनाक्षी का कोई फोन नहीं आया तो उन्होंने उस का मोबाइल ट्राई किया. लेकिन उस का फोन बंद मिला. मीनाक्षी कभी भी अपना फोन बंद नहीं करती थी. यह पहला मौका था, जब कमला को बेटी का फोन बंद मिला. बेटी से बात न होने पर कमला थापा को चिंता हुई.

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उन्होंने कई बार मीनाक्षी का फोन ट्राई किया, लेकिन उस का फोन बंद ही मिला. तीसरे दिन कमला थापा का माथा तब घूम गया जब उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. मैसेज में लिखा था, ‘मीनाक्षी हमारे कब्जे में है, हम ने उस का अपहरण कर लिया है. अगर उसे जिंदा देखना चाहते हो तो उस के खाते में तुरंत 15 लाख रुपए जमा कर दो. अगर हमारी बात नहीं मानोगे तो हम उस की हत्या कर देंगे.’

उस एसएमएस को पढ़ कर कमला थापा को एक बारगी विश्वास नहीं हुआ कि यह बात सच भी हो सकती है. उन्होंने तुरंत बेटी के नंबर पर फोन मिला दिया. इस बार उस के फोन की घंटी बज रही थी. कमला थापा ने सोचा कि अब बात होने पर ही सच्चाई पता चलेगी. लेकिन काल रिसीव करने के बजाए किसी ने तुरंत फोन काट दिया. बात के बदले दूसरी ओर से फिर मैसेज आया, ‘‘जो भी बात करनी है, एसएमएस से करो.’’

इस से कमला थापा की चिंता बढ़नी स्वाभाविक ही थी. उन्हें कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने फोन कर के यह बात अपने बेटे नवराज को बताई. नवराज उस समय देहरादून में ही था. वह शाम तक घर आ गया. बहन के बारे में जान कर नवराज भी बहुत चिंतित हुआ.

उस ने भी मीनाक्षी के नंबर पर बात करने की कोशिश की, लेकिन दूसरी ओर फोन रिसीव नहीं किया जा रहा था. इस से परिवार के लोगों को लगा कि मीनाक्षी का सचमुच अपहरण हो चुका है और अपहर्त्ता फिरौती के लिए उसी का मोबाइल इस्तेमाल कर रहे हैं.

मीनाक्षी के अपहरण ने उस के घर वालों के होश उड़ा दिए. उन की माली हालात ऐसी नहीं थी कि अपहर्त्ताओं की मांग को पूरा किया जा सकता. चूंकि मीनाक्षी उन लोगों के कब्जे में थी. इसलिए वह कोई रिस्क भी नहीं लेना चाहते थे. अपहर्त्ताओं की बात मानने के अलावा उन के पास कोई दूसरा चारा नहीं था. लेकिन सवाल उस रकम का था, जो वे मांग रहे थे.

नवराज ने अपने हालातों का हवाला दे कर एसएमएस भेज कर कहा कि वह थोड़ाथेड़ा कर के पैसा दे सकते हैं. एसएमएस के जरिए ही तय हुआ कि फिरौती की रकम किस्तों में दी जा सकती है. अपहर्त्ता इस के लिए तैयार हो गए तो नवराज ने पहली किस्त के रूप में मीनाक्षी के बैंक में 30 हजार रुपए जमा कर दिए.

मीनाक्षी के घर वालों के लिए इस बात का पता लगाना बहुत मुश्किल था कि मीनाक्षी कहां है. और उस के फोन से कहां से मैसेज आ रहे हैं.

कोई रास्ता न देख नवराज ने देहरादून के थाना बसंत विहार जा कर पुलिस को पूरी बात बताई. साथ ही आए हुए मैसेज भी पुलिस को दिखाए. लेकिन देहरादून पुलिस ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह मामला मुंबई का है, इसलिए मुंबई पुलिस ही कुछ कर सकती है.

बहन की तलाश में नवराज पहुंचा मुंबई

नवराज किसी भी तरह बहन को बचाना चाहता था, सो वह उसी दिन मुंबई के लिए रवाना हो गया. मीनाक्षी मुंबई के अंधेरी स्थित अंबोली थानाक्षेत्र में रहती थी, इसलिए नवराज ने थाना अंबोली जा कर पुलिस को पूरी बात बताई.

फिरौती के एसएमएस पढ़ कर मुंबई पुलिस को यह मामला अपहरण का लगा. 18 मार्च को मुंबई पुलिस ने मीनाक्षी के अपहरण का मामला दर्ज तो कर लिया, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया.

उसी दिन पैसे के लिए जब अपहर्त्ताओं का एसएमएस फिर आया तो नवराज ने मीनाक्षी के खाते में 10 हजार रुपए और जमा किए. तीसरी किस्त के तौर पर उस ने 20 हजार रुपए फिर जमा करा दिए. इस सब के चलते अपहर्त्ता एसएमएस के जरिए इस बात पर अड़े थे कि मीनाक्षी को छोड़ने की एवज में उन्हें पूरे 15 लाख रुपए ही चाहिए.

अपहर्त्ताओं को जिद पर अड़ा देख कर नवराज ने एसएमएस कर के कहा, ‘‘जब तक मेरी बात मीनाक्षी से नहीं कराई जाएगी, तब तक मैं कोई पैसा नहीं दूंगा.’’ इस के बाद अपहर्त्ताओं की ओर से कोई जवाब नहीं आया. उन्होंने मीनाक्षी के मोबाइल का स्विच भी औफ कर दिया. जब बातचीत का रास्ता बंद हो गया तो नवराज को बहन के साथ किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी.

अंबोली पुलिस द्वारा कोई काररवाई न करने पर नवराज ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से गुहार लगाई. इस पर यह मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया. इस बीच अपहर्त्ताओं से पूरी तरह संपर्क टूट चुका था. न उन का कोई एसएमएस आ रहा था और न ही फोन. मीनाक्षी ने जब आखिरी बार अपनी मां से बात की थी तो इलाहाबाद जाने की बात कही थी.

मोबाइल की काल डिटेल्स के सहारे क्राइम ब्रांच ने शुरू की जांच

क्राइम ब्रांच ने नवराज से पूछताछ के बाद इसी बात को ध्यान में रख कर अपनी जांच शुरू की. इस के लिए पुलिस ने सब से पहले मीनाक्षी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. इस से यह तो साफ हो गया कि वह इलाहाबाद गई थी, लेकिन किस के साथ गई थी, यह पता नहीं लग सका.

मीनाक्षी के फोन की काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पुलिस को उस में 2 नंबर ऐसे मिले, जिन पर मीनाक्षी की ज्यादा देर तक बातें होती थीं. पुलिस ने उन नंबरों का पता लगाया तो वे नंबर अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन सुरीन के निकले.

छानबीन करने पर पता चला कि अमित और प्रीति इलाहाबाद के रहने वाले थे और फिल्मों में काम करने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे. उन का इलाहाबाद का पता भी मिल गया.

अमित और प्रीति के बारे में जानकारी मिलते ही मुंबई क्राइम ब्रांच की एक टीम 29 मार्च को इलाहाबाद के लिए रवाना हो गई. अमित ममफोर्डगंज, निवासी सुरेंद्र जायसवाल का बेटा था. पता चला कि वह अपनी किस्मत आजमाने मुंबई गया था और मौडलिंग के साथसाथ फिल्मों में छोटीमोटी भूमिकाएं करता था.

प्रीति एल्विन उस की प्रेमिका थी, जिस के लिए उस ने अपना घर छोड़ दिया था. अमित न केवल विवाहित था, बल्कि 2 बच्चों का बाप भी था. उस की पत्नी का नाम भी प्रीति ही था. सुरेंद्र जायसवाल ने पुलिस को बताया कि अमित से उन का ज्यादा संपर्क नहीं है.

प्रीति एल्विन इलाहाबाद की ही दरभंगा कालोनी के दुर्गापूजा पार्क के सामने स्थित एक बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में रहा करती थी. उस के पिता नवीन मूलत: झारखंड के रहने वाले थे और एक स्कूल में मामूली सी नौकरी करते थे. वह पिछले 30 साल से सपरिवार इलाहाबाद की दरभंगा कालोनी स्थित एक बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में रह रहे थे.

प्रीति की मां कई साल पहले घर छोड़ कर चली गई थी. नवीन ने पुलिस को बताया   कि वह अपनी एकलौती बेटी प्रीति की हरकतों से परेशान थे. उस के सिर पर हीरोइन बनने का भूत सवार था और समझाने पर भी उस ने उन की बात नहीं मानी थी.

नवीन ने मुंबई क्राइम ब्रांच को बताया कि उन्हें बंगले के चौकीदार भोलाराम पांडे से पता चला था कि प्रीति 13 मार्च को अमित के साथ आई थी और एक रात वहां रुकी थी. उन दोनों के साथ खूबसूरत सी एक अन्य लड़की भी थी. वह लड़की कौन थी, इस बारे में न तो नवीन को पता था और न भोलाराम पांडे को.

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भोलाराम पांडे ने मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम को अमित और प्रीति के साथ आई लड़की का हुलिया बताया तो क्राइम ब्रांच अफसरों ने पक्का यकीन हो गया कि वह लड़की मीनाक्षी ही रही होगी. पुलिस ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन लोगों ने मीनाक्षी की हत्या कर के उस की लाश इधरउधर फेंक दी हो.

इसी आशंका की वजह से मुंबई क्राइम ब्रांच ने जिला पुलिस से अज्ञात शवों के बारे में जानकारी हासिल की. लेकिन इस तरह के किसी शव की जानकारी नहीं मिली. निराश हो कर मुंबई पुलिस वापस लौट गई.

मुंबई क्राइम ब्रांच की पहली सफलता

मुंबई पुलिस को अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन पर ही शक था. उन दोनों के फोन भी बंद थे. कोई और रास्ता न देख क्राइम ब्रांच ने उन दोनों के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि 14 मार्च को उन दोनों की लोकेशन भी इलाहाबाद थी.

14 मार्च को अमित, प्रीति और मीनाक्षी के फोन की लोकेशन इलाहाबाद में ही थी. इस का मतलब अमित और प्रीति से बात कर के ही मीनाक्षी के बारे में जाना जा सकता था. इसलिए क्राइम ब्रांच अमित और प्रीति तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी.

इस के लिए अमित के मोबाइल की काल डिटेल्स में ऐसे नंबरों को जांचा गया, जिन पर वह ज्यादा फोन किया करता था. उन नंबरों में ज्यादातर उस के दोस्तों के थे. उन नंबरों पर संपर्क किया गया तो पुलिस को अमित का नया नंबर मिल गया. उस के साथ ही प्रीति का नंबर भी मिल गया.

दोनों के फोन नंबर मिल जाने के बाद पुलिस ने दोनों की लोकेशन सर्च की तो पता चला कि दोनों मुंबई में ही हैं. इस के बाद क्राइम ब्रांच की टीम ने 15 अप्रैल, 2012 को जाल बिछा कर दोनों को हिरासत में ले लिया और पूछताछ के लिए अंबोली पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने उन से मीनाक्षी के बारे में पूछताछ की. शुरू में दोनों कहते रहे कि उन्हें मीनाक्षी के बारे में कोई पता नहीं है, लेकिन जब उन के साथ सख्ती बरती गई तो वे टूट गए. उन्होंने जो कुछ बताया, उसे सुन कर सब के रोंगटे खड़े हो गए. पता चला कि अमित और प्रीति ने मीनाक्षी को इलाहाबाद ले जा कर उस की हत्या कर दी थी और सिर व धड़ अलगअलग जगहों पर फेंक दिए थे.

पुलिस ने अमित और प्रीति के खिलाफ अपहरण व हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच इंसपेक्टर सुजीत कुमार गोविस्कर को सौंपी गई. पुलिस पूछताछ में मीनाक्षी की हत्या की जो कहानी पता चली, वह चौंकाने वाली तो थी ही, उन युवाओं के लिए नसीहत भरी भी थी, जो बिना आगापीछा सोचे सपनों के पीछे भागते हैं.

मीनाक्षी के सपनों की उड़ान

देहरादून के एक मध्यमवर्गीय परिवार की मीनाक्षी थापा खूबसूरत और हुनरमंद लड़की थी. जवानी की दहलीज पर आतेआते उस की खूबसूरती ने उस के सपनों को पंख लगा दिए थे. जब वह इंटरमीडिएट में थी, तभी उस ने सोच लिया था कि वह फिल्मों में हीरोइन बनेगी.

इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया था. इस के साथसाथ वह मौडलिंग भी करती थी.

चूंकि देहरादून में बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं, इसलिए उस ने मायानगरी मुंबई जाने का फैसला कर लिया. लेकिन बिना परिवार वालों की मरजी के वह मुंबई नहीं जा सकती थी. इस बारे में उस ने मां से बात की तो उन्होंने दो टूक मना कर दिया.

भैयाभाभी ने भी साफ कह दिया कि वह कहीं नहीं जाएगी. लेकिन मीनाक्षी फिल्म लाइन में जाने का फैसला कर चुकी थी, इसलिए उस ने घर वालों को समझाने की कोशिश की. जब उस की यह कोशिश कमयाब नहीं हुई तो उस ने जिद पकड़ ली.

अंतत: घर वालों को उस की जिद के सामने झुकना पड़ा. 2 साल पहले मीनाक्षी अपने एक परिचित के माध्यम से मुंबई चली गई. मायानगरी मुंबई में हजारों लोग फिल्मों में किस्मत आजमाने आते हैं. इन में से चंद खुशकिस्मत वालों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के सपने टूटते ही हैं.

लाखों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाना जंग जीतने से कम नहीं है. मीनाक्षी ने भी मुंबई में अपने पैर जमाने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी. देखतेदेखते 2 वर्ष गुजर गए. इन 2 सालों में उसे निम्न स्तर की एकाध फिल्म, मौडलिंग और कुछ विज्ञापनों में ही काम करने का मौका मिल पाया.

मीनाक्षी संघर्ष करना चाहती थी. उस ने आगे बढ़ने के लिए अपने सपने को मरने नहीं दिया था. उसे बी ग्रेड की फिल्मों में जूनियर आर्टिस्ट के छोटेमोटे रोल मिलने लगे थे. इस से वह इतना कमाने लगी थी कि अपनी जिंदगी आराम से चला सके. मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया में बने रहने के लिए स्टेटस की जरूरत होती है.

अपना स्टेटस बनाए रखने के लिए मीनाक्षी ब्रांडेड कपड़े पहनती थी. उस के लाइफस्टाइल में वह सब झलकता था, जो ऊंचे घराने की लड़कियों में होता है. इस सब के बीच वह अपने घर वालों से बराबर संपर्क बनाए रखती थी. सन 2010 में उसे हिंदी फिल्म ‘404: एरर नौट फाउंड’ में काम करने का मौका मिला.

अमित और प्रीति भी उसी की तरह फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने मायानगरी आए थे. अमित व प्रीति की मीनाक्षी से मुलाकात मधुर भंडारकर की फिल्म ‘हीरोइन’ के सेट पर हुई थी, जिस की मुख्य भूमिका में करीना कपूर थीं. मीनाक्षी को इस फिल्म में छोटा सा रोल मिला था. फिल्म हीरोइन में अमित और प्रीति की भी छोटीछोटी भूमिकाएं थीं. अमित ने मीनाक्षी से खुद को भोजपुरी फिल्मों का फिल्म प्रोड्यूसर बताया और प्रीति को मौडल.

मीनाक्षी भी इस मामले में कहां पीछे रहने वाली थी, उस ने भी खुद को नेपाल राजघराने से संबंधित बता दिया. फलस्वरूप जल्दी ही तीनों की दोस्ती हो गई.

मुंबई आने के पीछे अमित व प्रीति की अपनी अलग कहानी थी. अमित इलाहाबाद के ममफोर्डगंज निवासी अधिवक्ता सुरेंद्र जायसवाल का बेटा था. सुरेंद्र चाहते थे कि अमित भी उन्हीं की तरह नामी वकील बने, इसीलिए उन्होंने उसे एलएलबी कराई थी.

पिता की बात मान कर अमित ने वकालत की पढ़ाई तो कर ली, लेकिन उस की ख्वाहिश थी कि वह फिल्मों में काम करे.

अमित के घर वालों ने 7 साल पहले उस का विवाह प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले ओमप्रकाश जायसवाल की बेटी प्रीति जायसवाल के साथ कर दिया था. वह 1 बेटे और 1 बेटी का पिता भी बन गया था.

इस के बावजूद अमित की फिल्मों में काम करने की हसरत मरी नहीं थी. इसी चाह में वह हीरो की तरह बनठन कर रहता था और शरीर को फिट रखने के लिए रोजाना व्यायाम भी करता था. उस ने छिटपुट मौडलिंग भी की थी और अपना प्रोफाइल भी बनवा रखा था.

अमित की असलियत और चाहत

पूर्वी उत्तर प्रदेश में यदाकदा भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग होती रहती थी. अमित को अगर किसी भोजपुरी फिल्म की शूटिंग की जानकारी मिलती तो वह वहां पहुंच जाता और डायरेक्टरों को अपना हुनर दिखाने की कोशिश करता. लेकिन इस से बात नहीं बन पाती थी. फिर भी उस ने अपनी कोशिश जारी रखी. इसी बीच वह भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाले कुछ लोगों के संपर्क में आया तो उन की बदौलत उसे जूनियर आर्टिस्ट के रोल मिलने लगे.

ये छोटीछोटी भूमिकाएं न तो गुजारे लायक थीं और न ही उस की इच्छाओं के अनुरूप. वैसे तो अमित संपन्न परिवार से था. उस का परिवार फाफामऊ, इलाहाबाद के अपने मकान में रहता था. उन का ममफोर्डगंज वाला मकान खाली था. अपनी जीविका चलाने के लिए अमित ने उस मकान में डांस स्कूल खोल लिया था.

जब इस में भी उस का मन नहीं लगा तो उस ने उसी मकान में तिरुपति एकेडमी के नाम से कोचिंग सेंटर शुरू कर दिया. छात्रछात्राओं को वह खुद तो पढ़ाता ही था, साथ ही उस ने कुछ अन्य शिक्षकों को भी अपने यहां नौकरी पर रख लिया था.

अमित की एकेडमी में प्रीति एल्विन सुरीन भी पढ़ने के लिए आती थी. प्रीति गरीब परिवार की लड़की थी. जवानी की दहलीज तक पहुंचतेपहुंचते उसे गरीबी से नफरत होने लगी थी. वह महत्त्वाकांक्षी थी. उस ने मन ही मन ठान लिया था कि चाहे कुछ भी करना पड़े. वह अपनी तकदीर खुद लिखेगी. परिवार की हालत खस्ता होते हुए भी पिता नवीन सुरीन उसे पढ़ा रहे थे.

चूंकि प्रीति खूबसूरत थी, इसलिए उस ने मौडलिंग करने का फैसला कर लिया. यह बात अलग है कि इस काम में वह ज्यादा सफल नहीं हो पाई. प्रीति की इच्छा मुंबई जाने की थी. इस के लिए वह अपनी अंगरेजी में सुधार करना चाहती थी. अंगरेजी सीखने के लिए उस ने तिरुपति एकेडमी में दाखिला ले लिया था.

बाद में प्रीति को पता चला कि तिरुपति एकेडमी का मालिक अमित अच्छा डांसर है और भोजपुरी फिल्मों में भी काम करता है. प्रीति को लगा कि अमित के सहयोग से वह भी आगे बढ़ सकती है. इसलिए उस ने जल्दी ही अमित से नजदीकी बढ़ा ली.

अमित व प्रीति फिल्मों व मौडलिंग को ले कर अकसर बातें किया करते थे. बातोंमुलाकातों के इसी दौर में दोनों के दिलों में चाहत ने जन्म ले लिया. बातोंबातों में एक दिन अमित ने प्रीति के सामने अपने प्यार का इजहार कर दिया.

बन गई अमित और प्रीति एल्विन की जोड़ी

प्रीति को अमित की बात पर कोई हैरत नहीं हुई, बल्कि उस के दिल की कलियां खिल उठीं. उस ने भी मुसकरा कर जाहिर कर दिया कि वह भी उसे प्यार करती है. प्रीति जानती थी कि अमित शादीशुदा है, लेकिन हीरोइन बनने के सपने ने उस की आंखों पर पट्टी बांध दी थी.

आगे बढ़ने के लिए अमित बहुत बड़ा सहारा बन सकता था, इसलिए प्रीति ने उस के शादीशुदा होने की बात को नजरअंदाज कर दिया. अमित जो कमाता था, उस का ज्यादातर हिस्सा अपनी प्रेमिका प्रीति एल्विन सुरीन पर खर्च करने लगा. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के करीब आते गए.

दोनों प्यार के नाम पर एक नैया पर सवार तो हो गए थे, लेकिन जब उन की नैया जन सागर में उतरी तो उस पर लोगों की नजर पड़ गई. कानोंकान हो कर यह बात अमित की पत्नी तक भी पहुंची. पति की करतूत सुनते ही वह आगबबूला हो उठी. उस ने अमित को लताड़ा तो उस ने सफाई दी कि चूंकि प्रीति और वह एक ही पेशे में हैं, इसलिए दोनों में केवल दोस्ती है और कुछ नहीं.

लेकिन प्रीति जायसवाल के मन में संदेह घर कर चुका था. इसलिए परिवार में कलह रहने लगी. सुरेंद्र जायसवाल को भी बेटे की करतूत का पता चल गया था. उन्होंने भी उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन अमित ने अपनी सफाई दे कर बात खत्म कर दी.

प्रीति एल्विन के पिता को भी अमित और अपनी बेटी के चक्कर की बात पता चल चुकी थी. बेटी के बहकते कदमों से उन्हें चिंता हुई. उन्होंने उसे जमाने की ऊंचनीच समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ, पिता के बारबार समझाने पर भी वह अमित का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हुई.

अमित और प्रीति की एक जैसी सोच थी. दोनों ने मिल कर तय किया कि वे उस शहर को ही छोड़ देंगे. जहां के लोग उन के प्यार, उन के सपनों की कीमत नहीं समझते. उन के सपनों का शहर मुंबई था.

सपनों की उस दुनिया में अपने हिस्से की जमीन तलाशने के लिए अगस्त, 2011 में दोनों इलाहाबाद छोड़ कर मुंबई चले गए और लिव इन रिलेशन में रहने लगे. काफी भागदौड़ के बाद दोनों को कुछ फिल्मों में छोटेमोटे रोल भी मिले, जिस के सहारे गुजरबसर होने लगी.

उधर अमित की पत्नी प्रीति जायसवाल को जब यह पता चला कि उस का पति प्रीति सुरीन के साथ मुंबई में रह रहा है तो उसे बहुत दुख हुआ. अमित अपने घर फोन करता रहता था. उस के पिता फोन पर उसे समझाते, लेकिन वह उन की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता था. जब सुरेंद्र जायसवाल ने समझ लिया कि अमित नहीं आएगा तो उन्होंने ममफोर्डगंज वाला मकान किराए पर उठा दिया.

सितंबर, 2011 में अमित को जब पता चला कि उस के पिता बीमार हैं और अस्पताल में एडमिट हैं तो वह उन्हें देखने के लिए इलाहाबाद आया और 2 दिनों बाद मुंबई लौट गया. नवंबर के महीने में वह फिर घर लौटा तो पिता ने उस से पूछा, ‘‘तुम मुंबई में क्या करते हो?’’

‘‘पापा, मैं एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करता हूं और मुझे 16 हजार रुपए सैलरी मिलती है.’’ अमित ने बताया.

‘‘मुंबई जैसे शहर में इतने पैसों में क्या होता होगा. तुम घर चले आओ. ममफोर्डगंज वाले मकान के किराए के जो 25 हजार रुपए मिलते हैं, उन पैसों को तुम ही लेते रहना. कम से कम तुम हमारी आंखों के सामने तो रहोगे.’’ सुरेंद्र ने अमित को समझाने की कोशिश की. लेकिन अमित पर पिता के समझाने का कोई असर नहीं हुआ और वह मुंबई लौट गया.

प्रीति के लिए तो पिता के मायने ही खत्म हो गए थे. मुंबई जा कर वह पूरी तरह आजाद खयाल हो चुकी थी. इसी दौरान अमित और प्रीति को मधुर भंडारकर की करिश्मा कपूर स्टारर मूवी ‘हीरोइन’ में काम मिल गया था, जहां मीनाक्षी भी काम कर रही थी.

मीनाक्षी से मुलाकात के बाद तीनों अच्छे दोस्त बन गए. तीनों का सपना एक था और सोच भी लगभग एक जैसी थी. इसलिए तीनों अकसर साथ घूमतेफिरते, खातेपीते. कुछ दिनों तक सब ठीक चला. फिर अचानक प्रीति को लगने लगा कि मीनाक्षी उस के मुकाबले सुंदरता में भी अव्वल है और काम में भी. इसलिए उसे मन ही मन उस से जलन सी होने लगी.

अमित अच्छा डांसर था, मीनाक्षी उस से डांस सीखती थी. उन दोनों को डांस करते देख प्रीति मन ही मन कुढ़ कर रह जाती थी. उन  दोनों का हंसनाबोलना भी उसे बिलकुल पसंद नहीं था. दोनों की नजदीकियों की वजह से कई बार मीनाक्षी से उस की तकरार भी हो जाती थी. एक तो वे दोनों आर्थिक तंगियों से जूझ रहे थे, ऊपर से अमित और मीनाक्षी की नजदीकी प्रीति को कांटे की तरह चुभती थी.

बंधने लगी भविष्य की खतरनाक भूमिका

प्रीति जानती थी कि मीनाक्षी खूबसूरती और अपने टैलेंट से कोई अच्छा मुकाम हासिल कर लेगी. ऐसे में अमित उस के प्यार में पड़ कर आगे बढ़ने के चक्कर में उसे छोड़ देगा. यही सोच कर उस ने मन ही मन एक खतरनाक योजना तैयार कर ली. वह अपनी इस योजना में किसी तरह अमित को भी शामिल करना चाहती थी.

अमित और प्रीति ने एकदूसरे का साथ पाने और कैरियर बनाने के लिए ही घर छोड़ा था. दोनों भले ही पैसे के लिए परेशान थे, लेकिन जब भी मीनाक्षी को देखते थे तो उस के रहनसहन, खानपान व पहनावे को देख कर जरूर चौंकते थे. उस का लाइफ स्टाइल बिलकुल मुंबईया और पैसे वालों जैसा था. मीनाक्षी ने उन्हें बता रखा था कि उस का परिवार भले ही देहरादून में रहता है, वह नेपाल के राजघराने से ताल्लुक रखती है.

साथ ही उस ने यह भी बताया था कि अनबन की वजह से उस के पिता उन के साथ नहीं रहते. एक बार बातोंबातों में इलाहाबाद का जिक्र आया तो मीनाक्षी ने कहा, ‘‘सुना है, इलाहाबाद बड़ा अच्छा शहर है. 3 नदियों का संगम होता है वहां. मेरा मन है, इलाहाबाद जा कर संगम देखूं.’’

मीनाक्षी के मुंह से अपने शहर की तारीफ सुन कर अमित को अच्छा लगा. उस ने बिना सोचेसमझे कह दिया, ‘‘जब चाहो चलो, मैं तुम्हें पूरा शहर घुमाऊंगा.’’

दरअसल, अमित मीनाक्षी के साथ मौजमस्ती करना चाहता था, जो प्रीति के रहते संभव नहीं था. इसलिए उस ने बिना सोचेसमझे उसे इलाहाबाद ले जाने की बात कह दी थी. लेकिन बाद में जब उस ने इस मुद्दे पर सोचा तो उसे लगा कि बिना प्रीति की सहमति के वह मीनाक्षी को इलाहाबाद नहीं ले जा सकता. सोचविचार कर एक दिन अमित ने प्रीति से कहा, ‘‘मैं सोच रहा हूं कि 1-2 दिन के लिए इलाहाबाद हो आऊं. पैसे की परेशानी है, घर से पैसे भी ले जाऊंगा.’’

पैसे की वाकई परेशानी थी. दोनों साथसाथ जाते तो आनेजाने में ज्यादा खर्च होता. इसलिए प्रीति ने उसे अकेले जाने की स्वीकृति दे दी, लेकिन जब अमित ने उसे बताया कि मीनाक्षी भी इलाहाबाद घूमने जाना चाहती है, तो उस के कान खड़े हो गए. वह जानती थी कि जब उस ने अमित को उस की पत्नी से छीन लिया है तो मीनाक्षी भी अमित को उस से छीन सकती है. मनचले आदमी का क्या भरोसा?

अगर वह उस के हाथ से निकल गया तो वह न घर की रहेगी न घाट की. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए उस ने अमित से दो टूक कह दिया, ‘‘हम दोनों ने एकदूसरे का हाथ थाम कर घर छोड़ा था. अब हम साथ जिएंगे साथ मरेंगे. मैं तुम्हें मीनाक्षी के साथ जाने की छूट नहीं दे सकती. अगर तुम उसे साथ ले कर जाओगे तो मैं भी साथ चलूंगी.’’

अमित ने प्रीति को समझाया, खर्चे का वास्ता दिया, लेकिन प्रीति अपनी बात पर अड़ गई. परेशानी यह थी कि अमित मीनाक्षी को इलाहाबाद ले जाने का वायदा कर चुका था. जब बात खर्चे की आई तो प्रीति अपनी योजना के पहले हिस्से को ध्यान में रख कर बोली, ‘‘मीनाक्षी को इलाहाबाद घुमाना है न, कोई बात नहीं. हम अपना खर्च उसी से वसूल करेंगे.’’

‘‘मतलब, मैं कुछ समझा नहीं?’’ अमित ने पूछा तो प्रीति बोली, ‘‘तुम इलाहाबाद चलने की योजना बनाओ. मीनाक्षी पैसे वाले घर की लड़की है. हम उस का अपहरण कर के मोटी रकम वसूलेंगे.’’

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अमित प्रीति की बात सुन कर चौंका तो वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘देखो अमित, हम यहां कैरियर बनाने के लिए आए हैं. भावनाओं में बहने नहीं. कैरियर बनाने के लिए पैसा चाहिए, जो हमारे पास है नहीं. प्रीति का अपहरण कर के हम मोटी रकम वसूल करेंगे और फिर आराम से मुंबई में रह कर कैरियर बनाएंगे.’’

प्रीति की बात सुन कर अमित का दिमाग घूम गया. उसे भी लगा कि प्रीति जो कह रही है, वह सही है. जबकि प्रीति का मकसद मीनाक्षी के घर वालों से पैसा वसूलना ही नहीं, बल्कि उसे अमित की जिंदगी से पूरी तरह दूर करना था. चूंकि अमित को पैसों की जरूरत थी, इसलिए वह प्रीति की बातों में आ गया.

मीनाक्षी के मन में बोया हीरोइन बनने का सपना

जब दोनों एक मत हो गए तो उन्होंने मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जो बहुत ही खतरनाक थी. मीनाक्षी उन दोनों को अपना दोस्त मानती थी और उन पर हर तरह से विश्वास करती थी. इसी का फायदा उठा कर वे दोनों उसे अपने जाल में फांसना चाहते थे.

उन की योजना थी कि मीनाक्षी को इलाहाबाद ले जा कर मार डालेंगे और फिर उस के घर वालों से मनचाहा पैसा वसूलेंगे. वे दोनों सोच भी नहीं सकते थे कि जिस मीनाक्षी को वे किसी अमीर खानदान की समझ रहे हैं, वह एक मामूली घर की लड़की है.

जब योजना तैयार हो गई तो एक दिन अमित ने मीनाक्षी से कहा, ‘‘मीनाक्षी इलाहाबाद में एक भोजपुरी फिल्म की शूटिंग चल रही है. मेरे पास फोन आया था, मुझे वहां काम के सिलसिले में बात करने जाना है. मेरी जानपहचान के लोग हैं. तुम चाहो, तो मैं डायरेक्टर से कहसुन कर तुम्हें काम दिलवा सकता हूं. बाद में वह तुम्हें हीरोइन का रोल दे देगा.’’

मुंबई में जमे रहने के लिए मीनाक्षी को काम की जरूरत थी. स्ट्रगलर छोटामोटा काम कर के ही आगे बढ़ते हैं, इसलिए वह इलाहाबाद जाने के लिए तैयार हो गई.

मीनाक्षी के हां करते ही अमित और प्रीति के चेहरों पर चमक आ गई. वे दोनों पहले ही सारी योजना बना चुके थे. योजनानुसार 13 मार्च को तीनों इलाहाबाद के लिए रवाना हो गए.

अमित और प्रीति के सपनों को तब झटका लगना शुरू हुआ, जब सफर के दौरान मीनाक्षी ने उन्हें अपनी असलियत बताई. उस ने उन्हें बताया कि ग्लैमर की दुनिया में बने रहने के लिए कदमकदम पर झूठ बोलने पड़ते हैं. पेट भले ही खाली हो, पर दिखावे के लिए अच्छे कपड़े पहनने पड़ते हैं.

ऐसा न हो तो कोई पूछेगा ही नहीं. बातों के दौरान उस ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में भी बताया. यह सब मीनाक्षी ने इसलिए बताया था, जिस से अमित उस की मजबूरी को समझ कर उसे भोजपुरी फिल्म में काम दिला दे.

मीनाक्षी की हकीकत जानने के बाद अमित और प्रीति को वह सोने का अंडा देने वाली मुरगी की जगह बिना पंखों की चिडि़या दिखने लगी. उन्होंने सोचा था कि काम दिलाने के नाम पर भी मीनाक्षी के घर वालों से पैसा लेंगे, लेकिन यहां तो कहानी ही उलटी निकली. मीनाक्षी की सच्चाई जान कर उन दोनों को बहुत गुस्सा आया.

14 मार्च, 2012 की शाम तीनों इलाहाबाद पहुंच गए. रेलवे स्टेशन से वे दरभंगा कालोनी स्थित बंगले के उस सर्वेंट क्वार्टर में पहुंचे, जहां प्रीति के पिता रहते थे, लेकिन उस समय उस के पिता क्वार्टर में नहीं थे. क्वार्टर पर प्रीति का चचेरा भाई जौन सुरीन मिला.

कुछ देर रुक कर प्रीति ने जौन को गोरखपुर जाने के लिए चौरीचौरा ट्रेन के 2 साधारण टिकट लेने इलाहाबाद जंक्शन भेज दिया. उस ने जौन से कहा कि टिकिट ले कर वह जंक्शन के सामने ही मिले, वह वहीं पहुंच कर उस से टिकिट ले लेगी.

जौन के जाने के बाद जब अमित, प्रीति और मीनाक्षी अंदर बैठे थे तो प्रीति ने खिन्न हो कर कहा, ‘‘मीनाक्षी, तुम्हारी सारी बात तो हम ने सुन ली. अब मैं भी तुम्हें सच्चाई बता देना चाहती हूं. सच्चाई यह है कि तुम्हें भोजपुरी फिल्मों मे काम नहीं मिल पाएगा.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मीनाक्षी ने चौंक कर पूछा तो प्रीति बोली, ‘‘क्योंकि इस के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, जो तुम्हारे पास नहीं हैं.’’

‘‘यह बात तो तुम मुझे मुंबई में भी बता सकते थे. मुझे पता होता, तो मैं यहां आती ही क्यों?’’

‘‘बताते कैसे, हम तो सोच रहे थे कि तुम रईस परिवार की हो. हमें क्या पता था कि तुम बिलकुल फटीचर हो.’’

‘‘तुम हद से आगे बढ़ रही हो प्रीति. रईस तो तुम भी नहीं हो, तुम्हारा फटीचरपन यहां साफ दिख रहा है. रही बात मेरी तो मैं चाहे जो भी हूं, मैं ने तुम लोगों पर इतने अहसान किए हैं, जिन्हें तुम लोग कभी नहीं उतार पाओगे. मीनाक्षी ने प्रीति को ही नहीं, अमित को भी खूब खरीखोटी सुनाई.

मौत आ खड़ी हुई मीनाक्षी के सिर पर

मीनाक्षी और प्रीति के बीच इतनी गरमागरमी हुई कि नौबत मारपीट तक पहुंच गई. किसी तरह अमित ने दोनों को समझाबुझा कर शांत किया. जब बात आई गई हो गई तो तीनों ने खाना खाया. खाना खा कर तीनों लेट गए. थोड़ी देर में मीनाक्षी तो सो गई, लेकिन अमित और प्रीति की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वे दोनों उस के सोने का इंतजार कर रहे थे. जब उन्हें विश्वास हो गया कि मीनाक्षी सो गई है तो अमित ने उस के गले में दुपट्टे का फंदा कस दिया. सांसें रुकीं, तो मीनाक्षी की आंखें खुल गईं.

उस ने देखा कि अमित और प्रीति के रूप में उस की मौत सामने खड़ी है. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे दोनों इस तरह उस की जान के दुश्मन बन जाएंगे. गले पर दबाव और बढ़ा तो मीनाक्षी ने छटपटाते हुए हाथपैर चलाए. कहीं वह बेकाबू न हो जाए, यह सोच कर प्रीति ने उस के दोनों हाथ पकड़ लिए. अमित उस के गले पर तब तक दबाव बनाए रहा, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई.

प्रीति और अमित मीनाक्षी की हत्या कर चुके थे. अब उन्हें उस की लाश को ठिकाने लगाना था. इस मुद्दे पर बात हुई तो तय हुआ कि चाहे जो भी करना पड़े, मीनाक्षी की लाश की शिनाख्त नहीं होनी चाहिए. जिस बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में मीनाक्षी की हत्या की गई थी, उस के पीछे एक पतली नालीनुमा गली थी. वे दोनों मीनाक्षी की लाश को उठा कर वहां ले गए.

प्रीति रसोई से चापड़ उठा लाई थी. उसी गली में रख कर दोनों ने मीनाक्षी की गरदन काट कर अलग कर दी. उस वक्त प्रीति उस का सिर पकड़े हुए थी, ऐसा करते वक्त उस का दिल जरा भी नहीं कांपा. सिर काटने के बाद दोनों ने सीवर का ढक्कन खोल कर मीनाक्षी का धड़ उस में डाल दिया और उस का कटा सिर व चापड़ 2 अलगअलग पौलीथीन में रख लिए.

मीनाक्षी का पर्स, मोबाइल फोन व एटीएम कार्ड कमरे में ही रखा था. प्रीति और अमित को विश्वास था कि मीनाक्षी की लाश सीवर में गल जाएगी और उन तक कोई भी नहीं पहुंच पाएगा. उस के सिर को उन्होंने कहीं दूर जा कर ठिकाने लगाने का फैसला किया.

अमित और प्रीति दोनों थैला थामे इलाहाबाद जंक्शन पहुंचे. वहां प्रीति ने जौन से गोरखपुर जाने के रेलवे टिकट ले लिए. फिर जौन के वहां से जाने के बाद प्रीति ने गोरखपुर जाने का कार्यक्रम बदल कर रेलवे टिकिट वापस कर दिए और इलाहाबाद बसअड्डे की तरफ चल दिए.

बसअड्डे जा कर दोनों ने लखनऊ जाने वाली एसी बस पकड़ी. उन्होंने सोचा था कि रास्ते में कोई सुनसान जगह देख कर मीनाक्षी के सिर को फेंक देंगे लेकिन चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर सके. क्योंकि एसी बस में शीशा खोलने की व्यवस्था नहीं थी. वह रात दोनों ने लखनऊ में ही बिताई. अगले दिन दोनों ने लखनऊ से बनारस जाने वाली बस पकड़ी. रास्ते में मीनाक्षी के सिर व चापड़ वाली पौलीथिन उन्होंने अलगअलग जगहों पर फेंक दीं, वह जगह इलाहाबाद से 108 किलोमीटर दूर थीं.

इस तरह मीनाक्षी की लाश को ठिकाने लगने के बाद अमित और प्रीति ने उस के ही मोबाइल से उस के घर वालों से फिरौती वसूलने के लिए मैसेज भेजने शुरू किए. मीनाक्षी के एकाउंट में पैसा डालने के लिए उन्होंने इसलिए कहा था, क्योंकि उन के पास उस का एटीएम कार्ड तो था ही, उस का पिन नंबर भी था. जब मीनाक्षी के भाई ने उस के एकाउंट में पैसे डाल दिए तो एटीएम से पैसे निकाल कर दोनों मुंबई के लिए रवाना हो गए.

मीनाक्षी का सिर या शव तो बरामद नहीं हुआ, यह जानने के लिए अमित और प्रीति 25 मार्च को फिर इलाहाबाद आए थे. इंटरनेट और समाचार पत्रों में भी दोनों इस मामले से जुड़ी खबरें देखते रहते थे.

जब मीनाक्षी का भाई उस से बात कराने के बाद ही फिरौती देने की जिद करने लगा तो अमित और प्रीति को लगा कि शायद अब बात आगे नहीं बढ़ पाएगी. इसलिए उन्होंने मीनाक्षी का मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया. इसी के साथ दोनों ने अपने फोन नंबर भी बदल दिए.

अपराध से पीछा छुड़ाने की कोशिश

हैवानियत भरा कृत्य कर के अमित और प्रीति अपने पाप से पीछा छुड़ाने के लिए फिरौती के पैसों से वैष्णो देवी व शिरडीधाम भी घूमने गए थे. कई शहरों में घूमने के बाद वे लोग मुंबई लौटे और जगह बदल कर रहने लगे. उन दोनों को लग रहा था कि मीनाक्षी के घर वाले मुंबई आ कर ज्यादा पूछताछ नहीं करेंगे. लेकिन उन की सोच गलत निकली और वे पुलिस के शिकंजे में फंस गए.

पुलिस के लिए मीनाक्षी का शव और वह हथियार बरामद करना जरूरी था, जिस से कत्ल हुआ था. इस के लिए मुंबई पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को इलाहाबाद ले जाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम के इलाहाबाद रवाना होने से पहले इलाहाबाद पुलिस से बात कर ली गई थी.

इंसपेक्टर सुजीत कुमार के नेतृत्व वाली मुंबई पुलिस की टीम में 2 सबइंसपेक्टर, 3 कांस्टेबल और 2 महिला कांस्टेबल शामिल थीं. 17 अप्रैल की दोपहर यह पुलिस टीम अमित और प्रीति को ले कर गोदान एक्सप्रेस से इलाहाबाद पहुंच गई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले इलाहाबाद के तत्कालीन एसएसपी नवीन अरोड़ा से मुलाकात की. एसएसपी ने स्थानीय पुलिस की एक टीम मुंबई पुलिस के साथ लगा दी.

18 अप्रैल को मुंबई व स्थानीय पुलिस दोनों अभियुक्तों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और सीवर से मीनाक्षी का धड़ बरामद कर लिया. उस का शव सड़गल चुका था. काररवाई के बाद पुलिस ने मीनाक्षी के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. वीडियोग्राफी के बीच उसी दिन शव का पोस्टमार्टम कर दिया गया. पता चला मीनाक्षी की हत्या गला दबा कर की गई थी.

उस के दाएं पैर की हड्डी टूटी हुई थी. यह हड्डी संभवत: लाश सीवर में डालने के दौरान टूटी होगी. हालांकि शव की शिनाख्त मीनाक्षी के रूप में ही हुई थी, लेकिन सबूत पुख्ता करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने का फैसला किया गया. इस के लिए उस के खून, बाल व हड्डी के नमूने ले कर डीएनए टेस्ट के लिए भेजे गए.

मीनाक्षी के शव को उस के भाई नवराज व जीजा अजय थापा के हवाले कर दिया गया. शव की हालत ऐसी नहीं थी कि उसे देहरादून ले जाया जा सकता, इसलिए उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में इलाहाबाद के दारागंज घाट पर उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पुलिस ने चापड़ रायबरेली के ऊंचाहार के पास झाडि़यों से बरामद कर लिया. मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस ने अमित और प्रीति को साथ ले कर गोरखपुर, लखनऊ व वाराणसी रोड के किनारे 2 दिनों तक तलाशी अभियान चलाया. लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका. निराश हो कर पुलिस टीम मुंबई लौट गई.

बौलीवुड में सपने पूरे करने की चाह ले कर मुंबई आई मीनाक्षी की खूबसूरती और साथियों पर आंख मूंद कर किया गया विश्वास ही उस की जान का दुश्मन बन गया. महत्त्वाकांक्षा के चक्कर में उस की जान तो गई ही, साथ ही उस की तरह बौलीवुड के रुपहले परदे पर अपनी पहचान बनाने के सपने देखने वाले अमित और प्रीति भी कहीं के नहीं रहे.

मुंबई पुलिस ने विस्तृत पूछताछ के बाद दोनों आरापियों को अदालत पर पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. जांच के बाद पुलिस ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दोनों के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया, जहां लंबी सुनवाई के बाद यह मामला फैसले के लिए सत्र न्यायालय पहुंचा.

सत्र न्यायालय में इस की सुनवाई करीब 5 साल चली. अभियोजन पक्ष की ओर से फोरैंसिक रिपोर्ट, मृतका की डीएनए रिपोर्ट और हत्या में इस्तेमाल हथियार के साथसाथ तमाम सबूत पेश किए गए. इस केस में 36 गवाहों की गवाहियां भी हुईं. न्यायाधीश महोदय ने इस केस को रेयरेस्ट औफ रेयर नहीं माना.

लंबी सुनवाई के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.जी. शेट्टी ने 9 मई, 2018 को अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन सुरीन को अपहरण, हत्या और साजिश रचने का दोषी करार दिया. 11 मई, 2018 को न्यायाधीश जी.एस. शेट्टी ने अमित जायसवाल और प्रीति एल्विन सुरीन को आजन्म कारावास की सजा सुनाई. सजा सुनाने के बाद दोनों को जेल भेज दिया गया.

प्रीत किए दुख होए: भाग 4

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था:
काजल और सुंदर बचपन से एकदूसरे से प्यार करते थे. सुंदर ऊंची जाति का था और काजल दलित थी. सुंदर के पिता ने उसे मामा के पास भेज दिया. वहां सुंदर का शोषण हुआ. वह वापस आ गया. इसी बीच उस की मुलाकात मीनाक्षी से हुई. वह उसी की जाति की थी. काजल पढ़ाई में होशियार निकली और पढ़ने शहर जा पहुंची. मीनाक्षी सुंदर को चाहती थी.

अब पढ़िए आगे…

यह बात सुंदर के भी कानों में पड़ी कि पूरे ही गांव का कायाकल्प हो रहा है और वह भी काजल की बदौलत. सुंदर पिंजरे में बंद पंछी की तरह तड़प उठा. सुंदर की यह तड़प देख कर मीनाक्षी उस पर हंस पड़ती, ताने देती. एक बार तो सुंदर ने मीनाक्षी को पीट दिया क्योंकि उस ने काजल के लिए बेहूदा बात कही थी. लेकिन एक सच्ची प्रेमिका की तरह वह यह सब झेल गई और परिवार को इस की भनक तक न लगने दी.

‘‘सुंदर, तुम मेरी जान भी ले लोगे न तो भी मैं उफ न करूंगी,’’ रोने के बजाय मीनाक्षी ने बेबाक हो कर कहा था. सुंदर घबराया और मीनाक्षी के पैर पकड़ लिए, ‘‘मुझे माफ कर दो. मेरे दिल को समझो. मैं अपना दिल काजल के नाम कर चुका हूं.’’

मीनाक्षी ने आंसू पोंछे, ‘‘अगर तेरा प्यारा सच्चा होगा तो तुझे मिल जाएगी काजल.’’ ‘‘नहीं मीनाक्षी, मैं इस जेल में बेकुसूर कैदी हूं. मुझे तुम आजाद कर दो. मीनाक्षी, तुम मेरी प्रेरणा हो तो मंजिल

है काजल. मैं तुम्हारा बड़ा एहसानमंद रहूंगा, अगर मुझे मंजिल तक पहुंचाने में मदद कर दी.’’ ‘‘जब कुदरत तेरे साथ होगा तो कोई रोक सकता है क्या?’’

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‘‘चलो, अपने कमरे में. मां शायद इधर ही आ रही हैं,’’ दोनों अपनेअपने कमरे में चले गए. कुछ दिन बाद सुंदर के कालेज में टूर का प्रोग्राम बना. सरकारी फंड से एक बस की गई. उस में पहले साल के सभी छात्रछात्राएं सवार हो शहर घूमने चले. गाइड के रूप में 2 टीचर साथ थे, जिन में एक मिश्राजी भी थे.

शहर घूमने के बाद तकरीबन 4 बजे बस जिले के राजकीय महाविद्यालय परिसर में रुक गई. सभी छात्रछात्राएं बाहर निकल कर घूमने लगे. गाइड से सुंदर को पता चला कि वह जिले का सब से अच्छा कालेज है जहां टौपर छात्रछात्राएं ही पढ़ते हैं. उस ने अंदाजा लगाया कि हो सकता है कि काजल भी यहीं पढ़ती हो.

सुंदर काजल को ढूंढ़ने लगा. काजल अभीअभी क्लास में से बाहर निकली. सिक्योरिटी गार्ड भी पीछेपीछे था. सुंदर को गार्ड का पता नहीं था, सो उस ने धीरे से पुकारा, ‘‘काजल…’’

इतना सुनना था कि काजल दौड़ कर उस के गले लग गई. ‘‘तू ने मुझे भुला दिया काजल?’’

‘‘नहीं रे, कहां भूली हूं मैं? देख मेरी हालत. क्या ऐसी थी मैं?’’ और काजल ने सुंदर को जोर से भींच लिया. सुरक्षा गार्ड ने देखा तो उस ने दौड़ कर सुंदर को पकड़ा और गेट के पास बने थाने में डीएसपी अंजन कुमार को सौंप दिया.

डीएसपी अंजन कुमार ने सुंदर की बेरहमी से पिटाई कर दी और थाने में बंद कर दिया. सारे छात्रछात्राएं धरने पर बैठ गए और नारेबाजी करने लगे. मामला गंभीर होता देख कर डीएसपी अंजन कुमार ने सुंदर को छोड़ दिया और मिश्राजी ने राजकीय अस्पताल में उसे भरती करा दिया.

थाने में सुंदर की इतनी पिटाई की गई थी कि 3 महीने तक उसे अस्पताल में रहना पड़ा. मीनाक्षी कभीकभी अस्पताल आती तो उस पर ताना कसती, ‘‘दिल दिया, दर्द लिया. वही थी न तुम्हारी काजल…? अच्छी है तुम्हारी पसंद.’’ सुंदर कुछ नहीं बोला, बस सिसकता रहा. आखिर डाक्टरों के इलाज और मीनाक्षी की सेवा से वह घर जाने लायक हो गया. छुट्टी के दिन वह किसी

की निगरानी न देख चुपके से अपने घर आ गया. उधर मीनाक्षी अस्पताल पहुंची तो बिस्तर खाली देख बगल वाले से पूछा. पता चला कि सुंदर अभीअभी घर चला गया है.

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मीनाक्षी ने घर जा कर अपने पिता को बताया तो मिश्राजी के तनबदन में आग लग गई. उन्होंने प्रण किया कि चाहे जान चली जाए, सुंदर को मीनाक्षी से शादी करनी ही पड़ेगी. उधर, डीएसपी अंजन कुमार भी काजल की चाहत में दीवाने हो गए थे.

कालेज में 15 दिन की छुट्टियां हुईं. काजल के मन में आया कि मां के साथ गांव घूम लिया जाए. दोनों मांबेटी गांव आ गईं. बदलाव देख कर वे दंग रह गईं. काजल के कच्चे घर के बजाय वहां पक्का बड़ा घर बन गया था. ठेकेदार ने आ कर घर की चाबी देते हुए सारी बातें बताईं कि यह काजल का ही कमाल है.

फ्रूटी एंड टेस्टी बाइट्स : ब्लैक ग्रेप गजपाचो

ब्लैक ग्रेप गजपाचो

सामग्री

  • 50 ग्राम काले अंगूर
  • 5 कालीमिर्च
  • 1 चम्मच नीबू का रस
  • 11/2 कप व्हाइट अंगूरों का रस
  • 20 एमएल रैड वाइन
  • 10 ग्राम चीनी
  • 10 ग्राम बादाम बारीक कटे
  • 5 एमएल लालमिर्च की चटनी

विधि

अंगूरों के जूस और बादाम का पेस्ट तैयार करें. फिर वाइन में अंगूरों का रस और चीनी डाल कर अच्छी तरह मिलाएं. अब इस मिक्स्चर को मलमल के कपड़े में छान कर नीबू का रस और कुटी कालीमिर्च डालें. फिर इस सूप को एक बाउल में डाल कर ठंडा कर लाल मिर्च की चटनी और नमक डाल कर सर्व करें.

– व्यंजन सहयोग : सेलिब्रिटी शैफ अजय चोपड़ा

फ्रूटी एंड टेस्टी बाइट्स : बालिनेज रा मैंगो प्रौंस

सामग्री रा मैंगो स्ला की

  • 100 ग्राम कच्चे आम के टुकड़े
  • 3 ग्राम फ्रैश रैड चिली जूलिएन
  • 10 ग्राम गाजर कटी
  • 4 पत्तियां काफिरलाइम की
  • 15 ग्राम धनियापत्ती कटी
  • 10 ग्राम पात्र जिग्गेरी
  • 10 एमएल सेब का सिरका

सामग्री फ्राई की

  • 250 ग्राम मीडियम आकार के प्रौंस
  • 20 ग्राम प्याज का जूलिएन
  • 5 ग्राम अदरक का जूलिएन
  • थोड़ा से करी पत्ते
  • 10 ग्राम अंकुरित फलियां
  • 10 ग्राम हरा प्याज
  • 5 ग्राम मूंगफली भुनी
  • 10 एमएल लाइट सोया सौस
  • 5 एमएल फिश सौस
  • 15 ग्राम भीगी गिलास नूडल्स
  • 8 ग्राम मद्रास करी पाउडर
  • थोड़ी सी पुदीनापत्ती कटी
  • 20 एमएल औयल
  • 2 चम्मच पानी
  • नमक स्वादानुसार

विधि

रा मैंगो स्ला बनाने के लिए सारी सामग्री को अच्छी तरह मिक्स कर के 2 घंटों के लिए एक तरफ रख दें. फिर एक कड़ाही में तेल डाल कर प्याज, अदरक और कड़ी पत्ते डाल कर 2 मिनट तक भूनें. फिर इस में प्रौंस और अंकुरित फलियों में 2 चम्मच पानी डाल कर पकने तक चलाएं. फिर मूंगफली, काजू, सोया सौस, फिश सौस, नमक, हरा प्याज, नूडल्स, मद्रास करी पाउडर डाल कर अच्छी तरह मिक्स करें. जब प्रौंस मिक्सचर अच्छी तरह पक जाए तो उसे आंच से उतार कर उस में रा मैंगो स्ला डाल कर 10 सैकंड तक पकाएं फिर धनिया व पुदीनापत्ती से सजा कर सर्व करें.

– व्यंजन सहयोग : सेलिब्रिटी शैफ अजय चोपड़ा 

सावित्री के सत्य वचन से कैसे निपटेगी भाजपा

उत्तर प्रदेश की बहराइच सीट से भाजपा की सांसद सावित्री फुले की हेयरस्टाइल और नैननक्श तो कुछकुछ बसपा प्रमुख मायावती से मिलतेजुलते हैं ही लेकिन दिलचस्प इत्तफाक यह भी है कि उन के विचार भी वैसे ही हो चले हैं जैसे राजनीतिक कैरियर की शुरुआत में मायावती के हुआ करते थे.

फर्क इतनाभर है कि तेजतर्रार सावित्री अभी सीधे यह नहीं कह पा रहीं कि तिलक, तराजू और तलवार इन को मारो जूते चार. 2 अप्रैल के हिंसक भारतबंद के बाद से दलित हितों को ले कर अपनी ही पार्टी पर निशाना साध रहीं सावित्री का ताजा दुख यह है कि जिन्ना विवाद का मकसद गरीबी और भुखमरी जैसे मुद्दों पर से जनता का ध्यान भटकाना है और संविधान की समीक्षा के बहाने आरक्षण हटाने की साजिश हो रही है.

सावित्री फुले अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ने वालों को बचाने वालों पर भी सवाल उठाने लगी हैं. अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा आलाकमान उन्हें कैसे मैनेज करता है.

फ्रूटी एंड टेस्टी बाइट्स : रागी परांठा

रागी परांठा

सामग्री आटा बनाने की

  • 1 कप रागी का आटा
  • थोड़ा सा घी
  • नमक स्वादानुसार

सामग्री स्टफिंग की

पनीर, अनारदाना, धनियापत्ती कटी.

विधि

सब से पहले रागी में नमक, घी व पानी डाल कर डो तैयार करें. उस के बाद पनीर को मैश कर के उस में सारी सामग्री को अच्छी तरह मिलाएं. फिर इस स्टफ को डो में भर कर रोल बनाएं और तवे पर सेक कर दही के साथ गरमगरम सर्व करें.

– व्यंजन सहयोग : सेलिब्रिटी शैफ अजय चोपड़ा

घातक है स्वास्थ्य सेवा का व्यापारीकरण

आप की सेहत पर कंपनियां अब मोटा नहीं बहुत मोटा पैसा बना रही हैं. देश में अपोलो, मैक्स और फोर्टिस जैसे मल्टी स्पैश्यलिटी अस्पतालों पर खरीदार 5,000 करोड़ से 10,000 करोड़ खर्चने को तैयार बैठे हैं और उन के मूल प्रमोटर अब बापदादाओं की मेहनत का बहुत मोटा मुनाफा कमा रहे हैं. अब स्वास्थ्य सेवा स्वास्थ्य सेवा नहीं रह गई है, कमाऊ गाय बन गई है जिसे आधुनिक तकनीक व नित नए शोधों से भरपूर खिलायापिलाया जा रहा है.

इन स्वास्थ्य कंपनियों को पैसा उन आम लोगों की जेबों से आता है जो अपनी या अपने अजीजों की जान बचाने के लिए अपनी आखिरी कौड़ी तक कुरबान करने को तैयार हो जाते हैं. बढ़ते प्रदूषण और बदलते लाइफस्टाइल से नित नई बीमारियां पैदा हो रही हैं. इन की वजह से लोगों को पहले से कई गुना ज्यादा पैसा खर्चना पड़ रहा है और इसी की वजह से अस्पतालों की चेनें बन रही हैं, जिन्हें खुले बाजार में बेचा जा रहा है. फोर्टिस अस्पतालों को खरीदने के लिए देशीविदेशी कंपनियां 2,500 करोड़ तक लगाने को

तैयार हैं और 10-20 दिन में जब यह डील हो जाएगी तो इन अस्पतालों के कर्ताधर्ता एक बार फिर बदल जाएंगे. स्वाभाविक है कि अब अस्पतालों के नए मालिकों को अपनी लगाई पूंजी का लाभ चाहिए होगा, मरीजों का हित नहीं.

स्वास्थ्य तो असल में सरकार यानी समाज के हाथों में रहना चाहिए ताकि हर मरीज को इलाज मिल सके और बीमारियों के कारण लोग न मरें. इन महंगे अस्पतालों ने तो लाखों की आखिरी आस भी छीन ली.

सरकारी अस्पतालों में धांधलियों, निकम्मेपन और लापरवाही के कारण लोगों का इन पर से विश्वास ही उठ गया है. निजी अस्पताल कंपनियां अच्छे डाक्टरों को मोटा वेतन व कमीशन दे कर आकर्षित कर लेती हैं और इसीलिए सरकारी अस्पतालों के योग्य डाक्टर भी उन की शरण में चले जाते हैं. सरकारी अस्पतालों में योग्य डाक्टर कम ही रह जाते हैं, जिन्हें या तो ऊपरी कमाई के अवसर मिल जाते हैं या सरकारी तंत्र जिन्हें मकानों, यात्राओं की सुविधा दे देते हैं.

फोर्टिस के बिकने का मामला इसलिए चिंता की बात है कि इस से सारे देश के अस्पतालों को फर्क पड़ेगा. जहां भी डाक्टर निजी छोटे अस्पताल सफलता से चला रहे हैं उन का अस्तित्व अब खतरे में है. बड़े अस्पताल उन्हें लपकने को दौड़ेंगे. चिकित्सा का प्रबंध अब डाक्टरों के हाथों से निकल कर काले कोटधारी अकाउंटैंटों के हाथों में आ जाएगा जिन्हें सिर्फ पैसे से मतलब होगा.

सरकार लाख कोशिश कर ले कि इन अस्पतालों की कुछ आय गरीबों को इलाज के रूप में मिले पर यह संभव नहीं दिखता. सरकार ने अपने कर्मचारियों को ही अपने खर्च पर इन अस्पतालों में भेजना शुरू कर दिया है. सरकार पर असल गरीबों का दबाव फिर कौन कराएगा? गरीबों को तो फिर से झाड़फूंक वालों के पास जाना पड़ेगा. इतना पक्का है कि गायों और कुत्तों की चिकित्सा सुविधाओं की कमी नहीं रहेगी, गरीबों को नहीं मिलेगी.

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