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बहुवर्षीय चारा गिनी घास

पशुपालकों के लिए सालभर हरे चारे का मिलना काफी मुश्किल है. यह संकट पशुपालन की कठिनाइयों के लिहाज से एक प्रमुख समस्या मानी जाती है जबकि पशुओं के समुचित विकास और ज्यादा दूध के लिए सही मात्रा वाले पोषक तत्त्व से युक्त हरा चारा खिलाना बेहद जरूरी होता है.

पशुपालकों के लिए साल के कुछ महीने ऐसे होते?हैं जिस में वह आसानी से हरा चारा ले सकता है. लेकिन गरमियों में ज्यादा पानी व सिंचाई की कमी में पशुओं के लिए जरूरी मात्रा में हरा चारा उगा पाना कठिनाई भरा होता है.

ऐसे हालात में पशुपालकों को हरे चारे के संकट से उबारने में बहुवर्षीय चारे की प्रजातियां बेहद फायदेमंद साबित होती हैं. गिनी घास की खेती इस लिहाज से काफी फायदेमंद साबित होती है.

इस फसल में पानी और सिंचाई की जरूरत दूसरे चारे की अपेक्षा कम होती है. इस की फसल कम नमी की अवस्था में भी बड़ी तेजी से बढ़ती है. गिनी घास में पोषक तत्त्वों की प्रचुर मात्रा और उस का स्वाद दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाने में कारगर साबित होता है.

गिनी घास की खेती आसान तरीकों से की जा सकती है. इस के लिए दोमट या बलुई दोमट सही होती है, जिस से जल निकासी की सही व्यवस्थ होना जरूरी है. गिनी घास की फसल के लिए अम्लीय व क्षारीय मिट्टी सही नहीं होती है.

गिनी घास की फसल को छायादार जगहों, मेंड़ों, नहरों के किनारे पर भी आसानी से उगाया जा सकता है. गिनी घास की फसल लेने के लिए इस की बोआई सीधे बीज द्वारा, तने की कटिंग द्वारा या जड़ों को रोप कर की जा सकती है.

पोषक तत्त्वों की मौजूदगी : कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, जनपद बस्ती के विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के मुताबिक, गिनी घास में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्त्व पाए जाते हैं. इस में रेशा 28-36 फीसदी, प्रोटीन 6.10 फीसदी, फास्फोरस 0.29 फीसदी, कैल्शियम 0.29 फीसदी, मैग्नीशियम 0.38 फीसदी व पत्तों की पाचन कूवत 55-58 फीसदी की मात्रा मौजूद होती है जो पशुओं के विकास व दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाने में सहायक होती है.

नर्सरी तैयार करना : गिनी घास की रोपाई जड़ों से करना ज्यादा मुफीद होता है क्योंकि इस से पौधे से पौधे की दूरी व लाइन से लाइन की दूरी का निर्धारण आसानी से किया जा सकता है.

जड़ों से रोपाई के लिए सब से पहले इस की नर्सरी तैयार करनी पड़ती है. नर्सरी डालने के लिए एक हेक्टेयर खेत में जड़ों की रोपाई के लिए 3-4 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

नर्सरी डालने का सब से सही समय अप्रैल व मई है. इस के लिए 6 मीटर लंबी और 1 मीटर चौड़ी 10-20 क्यारियां बनानी पड़ती हैं. इन क्यारियों में बीज डालने के पहले गोबर की कंपोस्ट खाद मिलाना नर्सरी में मददगार साबित होता है. नर्सरी में बीज डालने के बाद फव्वारे से सिंचाई करते रहें.

बोआई का सही समय : गिनी घास को सालभर में कभी भी बोया या रोपा जा सकता है. फिर भी ठंड के मौसम में गिनी घास को रोपने से बचना चाहिए. बारिश के मौसम में गिनी घास रोपने का सब से सही समय है.

गिनी घास की बोआई या रोपाई के पहले खेत की एक जुताई रोटावेटर या हैरो से करने के बाद दूसरी जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए. अगर फसल की बोआई बीज से की जा रही है तो बीज को एक से डेढ़ सैंटीमीटर गहराई में डालें. तने की कटिंग की रोपाई की दशा में कटिंग कम से कम 3 माह पुराना होना जरूरी है.

कटिंग के समय यह ध्यान दें कि जमीन के भीतर आधे से ज्यादा गाड़ देना चाहिए. खेत में रोपी गई इस कटिंग में जो गांठ जमीन के अंदर होती?है, उसी से जड़ें निकलती हैं, जबकि ऊपरी गांठ से तना निकलता है.

गिनी घास की रोपाई करते समय पौधों से पौधों की दूरी 50 सैंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 100 सैंटीमीटर रखना न भूलें.

अगर इस को दूसरी फसलों के साथ रोपा जा रहा?है तो यह दूरी और बढ़ा देनी चाहिए. यह दूरी 100 से 250 सैंटीमीटर तक हो जाती है. दूसरी फसलों के साथ लेने की अवस्था में इसे बोई गई फसल के 2 लाइनों के बीच में बोया जाता है. 1 हेक्टेयर खेत के लिए गिनी घास की 40,000 से 50,000 जड़ों की जरूरत पड़ती है.

उन्नत प्रजातियां : गिनी घास की जो प्रजातियां ज्यादा प्रचलित?हैं, उन में कोयंबटूर 1, कोयंबटूर 2, डीजीजी 1, बुंदेल गिनी 1, बुंदेल गिनी 2, बुदेल गिनी 4, कमौनी, गटन, पीजीजी 1, पीजीजी 9, पीजीजी 14, पीजीजी 19, पीजीजी 101, हेमिल खास हैं.

खाद व उर्वरक : कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया, जनपद बस्ती के कृषि विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के मुताबिक, हरे चारे की फसल के लिए गोबर की सड़ी खाद, कंपोस्ट खाद या केंचुआ खाद ज्यादा फायदेमंद होती है. ज्यादा चारा उत्पादन के लिए बोआई के पहले ही 200 से 250 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद का उपयोग 1 हेक्टेयर खेत के लिए करें.

जब जड़ों की रोपाई खेत में की जा रही हो तब 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश की मात्रा का इस्तेमाल प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों की जड़ों में देना चाहिए. इस के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से हर कटाई के बाद 40 किलोग्राम नाइट्रोजन और 10 किलोग्राम फास्फोरस की मात्रा फसल में दें.

सिंचाई : गिनी घास की जड़ों की रोपाई खेत में करने के तुरंत बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद बारिश न होने पर 10-15 दिन के अंतराल पर नियमित सिंचाई करते रहें. फसल में उग आए गैरजरूरी खरपतवार को समयसमय पर निकालते रहना जरूरी है.

कटाई व उत्पादन : गिनी घास की पहली कटाई फसल रोपे जाने के 2 से 3 माह बाद से शुरू की जा सकती है. इस के बाद की नियमित कटाई 30-45 दिन के अंतराल पर की जा सकती है या फसल की लंबाई तकरीबन 5 फुट के करीब हो जाए तो भी फसल को जमीन में 15 सैंटीमीटर के ऊपर से काटा जा सकता है.

सर्दियों की पहली कटाई जमीन से सटा कर करनी चाहिए. इस से फसल में खराब तने अपनेआप हट जाते हैं. गिनी घास की फसल उत्तर भारत व मध्य भारत के लिहाज से सालभर में 5-7 बार व दक्षिण भारत में पूरे साल ली जा सकती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियों की फसल लेने की दशा में औसतन उत्पादन 200-250 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टेयर प्रति कटाई हासिल होती है. इस तरह साल का औसत उत्पादन 1200 से 1300 क्विंटल तक हासिल हो सकता है.

गिनी घास की खेती के बारे में ज्यादा जानकारी व बीज हासिल करने के लिए भारतीय घास और चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई), (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ग्वालियर रोड, झांसी- 284003, उत्तर प्रदेश से संपर्क किया जा सकता है

पशुपालन व्यवसाय में तकनीक से तरक्की

पशुपालन के बारे में यह आम सोच है कि इसे व्यवसाय के रूप में चुनने के लिए किसी खास पढ़ाई या डिगरी की जरूरत नहीं होती. यह व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. अगर इस व्यवसाय को आधुनिक तकनीक के साथ मिला दिया जाए तो किसी भी क्षेत्र में नए आयाम बनाए जा सकते हैं.

पशुपालन के क्षेत्र में ऐसे ही कुछ सुनहरे पन्ने जोड़े हैं बीकानेर के एक नौजवान टैक्नोग्रेड नवीन सिंह तंवर ने. यूथ आईकौन के रूप में उभरने वाले नवीन सिंह तंवर ने नौजवानों के लिए उन्नत कृषि और पशुपालन व्यवसाय में संभावनाओं के नए दरवाजे खोले हैं.

आज हर ओर मिलावटी दूध की चर्चा देखनेसुनने और पढ़ने को मिलती है. यूरिया और डिटर्जैंट जैसे हानिकारक तत्त्व दूध के नमूनों में पाए जाते हैं. लेकिन नवीन सिंह ने साबित कर दिखाया है कि किस तरह आधुनिक तकनीक को अपना कर बिना सेहत से खिलवाड़ किए ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है.

इस सिलसिले में नवीन सिंह तंवर से बातचीत की गई. पेश हैं, उसी के खास अंश:

एक छोटी सी नौकरी पाने के लिए भी नौजवानों को कड़ी मेहनत करते हुए देखा जा सकता है. ऐसे में लाखों रुपए का पैकेज छोड़ कर दूध डेरी खोलने का विचार आप को कैसे आया?

मेरी 3 साल की बेटी के लिए घर में जो दूध आता था, एक दिन मैं ने उस का सैंपल टैस्ट करवाया तो मुझे पता चला कि इस में कितनी पेस्टीसाइड की मिलावट की जाती है.

मेरे एक डाक्टर दोस्त ने कहा कि इस रूप में हम एक तरह से धीमा जहर पी रहे हैं. बस… बच्चों और परिवार की सेहत को ध्यान में रखते हुए मैं होलस्टन नस्ल की 2 गाएं ले आया.

यहीं नहर के किनारे हमारा फार्म है. चूंकि हाथों से दूध निकालते समय भी दूध में कीटाणु जा सकते?हैं इसलिए हम ने मशीन मिल्किंग को अपनाया. धीरेधीरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी शुद्ध दूध लेने की इच्छा जाहिर की तो फिर इसे एक व्यवसाय के रूप में अपनाने का विचार आया क्योंकि लोग अपनी सेहत को ले कर जागरूक हो गए हैं.

आज जहां आएदिन खानेपीने की चीजों में मिलावट की खबरों से अखबार भरे रहते हैं, वहीं लोग अतिरिक्त पैसा खर्च कर के भी शुद्ध खानपान अपनाना चाह रहे हैं.

इसी सोच ने मुझे डेरी खोलने की प्रेरणा दी. हम ने उत्तर भारत की बहुत सी डेरियां देखी हैं. होलेस्टन नस्ल की गायों के बारे में इंटरनैट से भी बहुत सी जानकारी इकट्ठा की. हम हर साल धीरेधीरे गायों की तादाद बढ़ाते गए. आज हमारे पास तकरीबन 200 गाएं हैं. यहां इस नस्ल को और बेहतर करने का काम भी किया जाता?है ताकि गायों की ज्यादा दुधारू नस्ल विकसित की जा सके.

बीकानेर शहर को एशिया का डेनमार्क कहा जाता है. ऐसे में कड़ी होड़ में न केवल टिके रहना बल्कि मुनाफा कमाना भी एक चुनौती है. आप की क्या रणनीति रही?

आप ने बिलकुल सही?कहा है कि एशिया में सब से ज्यादा डेरी फार्म बीकानेर में ही हैं, लेकिन फिर भी यहां तकरीबन 70 फीसदी दूध मिलावटी पाया जाता है. दूध में पानी की ही नहीं बल्कि यूरिया, डिटर्जैंट और दूसरे हानिकारक कैमिकल मिलाए जाते हैं.

ऐसा एक एनजीओ के सर्वे में सामने आया है. 1,200 घरों से दूध के सैंपल ले कर यह सर्वे किया गया था. तब हम ने अपने उत्पाद की शुद्धता और अच्छी क्वालिटी को पैमाना बना कर इस व्यवसाय में कदम रखा. साथ ही, हम ने अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया.

मिल्क पार्लर में गायों का दूध निकालने के बाद पैक्ड कैन से पाइप के जरीए दूध को बल्क कूलर में सप्लाई किया जाता है. यहां इसे 4 डिगरी तक ठंडा किया जाता है. बल्क कूलर से दूध को पाइप के जरीए ही पैकेजिंग मशीन में लगे बरतन में सप्लाई किया जाता है. यहां से इस की एकएक लिटर की पैकिंग होती है.

हम ने ‘काऊबेस’ नाम से अपना ब्रांड बनाया और क्वालिटी के मानक तय किए. हम ने सोशल मीडिया सहित हर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया. हम ने उपभोक्ता और उत्पादक के बीच से मिडिल की कड़ी को हटा दिया. दूध दुहने से ले कर उस की पैकिंग तक का काम पूरी तरह से मशीनी होता है.

हमारे यहां हर रोज 1500 लिटर दूध तकरीबन 650 घरों में सीधे ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है. हम इसे विनायक परिवार कहते हैं. सभी ग्राहक ह्वाट्सऐप ग्रुप के जरीए हम से सीधे जुड़े हैं.

हमें खुशी है कि हम लोगों का भरोसा बना पाए. हमारी डेरी का सालाना टर्नओवर डेढ़ करोड़ रुपए है. यही हमारी कामयाबी का राज है.

गाय एक ऐसा पशु है जिसे जो कुछ भी खिलाया जाता?है, उस का असर जैसे स्वाद, महक और गुण दूध में आ जाते हैं. ऐसे में आप दूध की शुद्धता कहां तक बना कर रखेंगे क्योंकि चारे और दाने में भी तो हानिकारक कैमिकलों की मिलावट हो सकती है?

बीकानेर की ज्यादातर डेरियों में पशुओं को मूंगफली का चारा खिलाया जाता?है, जिस में पेस्टीसाइड भरपूर मात्रा में होते हैं. ऐसे में अगर दूध में कोई बाहरी मिलावट न भी की जाए तब भी पेस्टीसाइड का असर आ जाता है.

दूध में पोषक तत्त्वों को बनाए रखने के लिए हम गायों को पूरे साल अपने ही फार्म में उगा हरा चारा खिलाते हैं. गरमियों में ज्वार और सर्दियों में जई. फार्म में सिर्फ और्गेनिक खाद ही इस्तेमाल की जाती है.

गायों पर कभी भी औक्सीटोसिन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. जरूरत होने पर होमियोपैथी दवाएं दी जाती हैं. यहां तक कि गायों में चिचड़ी होने पर भी किसी तरह की दवा नहीं दी जाती. इस के अलावा यहां मुरगीपालन किया गया है, क्योंकि वे चिचड़ी को खोजखोज कर खा जाती हैं. हाईजीन के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जाता. पूरा फार्म सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में है.

यह फार्म 3 भागों में बंटा हुआ है. पहले भाग में हरा चारा सूखी तूड़ी के साथ मिला कर भरपेट खिलाया जाता है. यह सभी के लिए समान है. वहीं दूसरे भाग में पेट से होने वाली गायों को रखा जाता है. यहां उन्हें उन की जरूरत के मुताबिक दाना यानी बांट खिलाया जाता है. दाने या बांट की मात्रा हरेक पशु के लिए उस की बौडी साइज, वजन और दूध देने की कूवत के मुताबिक तय की जाती?है.

पेट से होने वाली गायों की खास देखभाल की जाती है. इन्हें बाईपास फैट खिलाया जाता?है जो कि एक विशेष प्रकार का आहार है और न्यूट्रीशन का बहुत ही रिच सोर्स है. यह सीधा गायों की आंतों में घुलता?है और उस का पूरा फायदा पशु को मिलता है. इस से ब्याने के बाद उस का दूध अच्छी?क्वालिटी का होगा और उस की मात्रा भी ज्यादा होगी.

तीसरे?भाग में नई ब्या चुकी गाएं हैं. नई ब्याई गायों को 2 महीने तक गुड़, अजवाइन और मेथी का बांट पका कर खिलाया जाता है ताकि दूध की मात्रा और पौष्टिकता बनी रहे यानी परंपरागत नुसखों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ कर गायों की बेहतरीन देखभाल की जाती है.

गरमियों में राजस्थान का तापमान 45 से 50 डिगरी तक पहुंच जाता?है. पशुओं का दूध?भी कम हो जाता है. आप गायों की इन समस्याओं से कैसे निबटते हैं?

हमारी गाएं संकर नस्ल की हैं. ये गाएं 50 डिगरी के तापमान पर भी बेहतर काम करती हैं. साथ ही, यहां पर गायों को पूरी तरह कुदरती माहौल दिया जाता है यानी घने पेड़ों की छाया और और्गेनिक हरा चारा.

चूंकि गायों को पसीना नहीं आता इसलिए इन की डाइनिंग टेबल के आसपास पंखे और फौगर लगाए गए हैं ताकि उन के शरीर में ठंडक बनी रहे. गायों को सैंधा नमक भी चारे के साथ चटाया जाता है. इस का सोडियम पशु को?स्वस्थ रखता है. यहां बड़ेबड़े ब्रश भी लगाए गए हैं. यहां आ कर गाएं अपनेआप को खुजा कर जाती हैं. ये छोटेछोटे उपाय पशुओं को सेहतमंद रखने में कारगर साबित होते हैं.

हमारे यहां हरेक गाय के दूध का रिकौर्ड रखा जाता है. 1-2 किलोग्राम लिटर दूध का उतारचढ़ाव आते ही उसे डाक्टरी मदद मुहैया कराई जाती है. इस के लिए प्रतिदिन एक पशुचिकित्सक की विजिट होती है. आप अपने भविष्य की योजनाएं हमारे युवा दोस्तों के साथ साझा कीजिए.

आने वाले समय में हम फार्म पर ही केंचुआ खाद बनाएंगे. बायोगैस से बिजली बनाने की भी योजना है. इस के अलावा दूसरे दूध उत्पाद जैसे दही, घी, मक्खन, पनीर वगैरह भी हम सहयोगी उत्पाद के रूप में बनाने पर विचार कर रहे हैं.

परंपरागत जानकारी के साथसाथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किसी भी व्यवसाय को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है. इस क्षेत्र में भी काफी संभावनाएं हैं. सरकार भी खेती और पशुपालन को बढ़ावा दे रही है. बहुत सी आधुनिक तकनीक इस क्षेत्र में आ चुकी हैं. उन से अपडेट रहना समझदारी है. बस थोड़ा सा सब्र और अपने पेशे के प्रति ईमानदारी रखी जाए तो यह नौजवानों के लिए एक बेहतर भविष्य वाला व्यवसाय है. ज्यादा जानकारी के लिए आप नवीन सिंह तंवर के मोबाइल फोन नंबर 9829217401 पर संपर्क कर सकते हैं.

क्या आपने भी स्मार्टफोन को लेकर पाल रखे हैं ये भ्रम

स्मार्टफोन्स के फीचर्स को लेकर कई भ्रम है जो आज भी यूजर्स के दिमाग में बैठे हुए है. अफवाहों और कंपनियों की मार्केंटिंग नीति के चलते कई गलत जानकारियां यूजर्स के पास पहुंचती है, जिन्हें यूजर्स अक्सर सही मान लेते हैं. ऐसे में हम आपको तीन ऐसी बातों के बारे में बताएंगे जिनके बारे में आपको अबतक गलत जानकारी मिलती आई है.

ज्यादा मेगापिक्सल मतलब बेहतर इमेज क्वालिटी

स्मार्टफोन को लेकर सबसे बड़ा भ्रम ये है कि ज्यादा मेगापिक्सल मतलब बेहतर इमेज क्वालिटी होता है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है. दरअसल मेगापिक्सल ओवरऔल रेजोल्यूशन्स और कैमरे की जूम की क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे आपके फोन की इमेज क्वालिटी सबसे बेहतर हो जाएगी. इमेज क्वालिटी न सिर्फ मेगापिक्सल पर बल्कि सेंसर की साइज, अपर्चर, लेंस की औप्टिक्स क्वालिटी और सबसे बड़ा स्मार्टफोन कैमरे के एल्गोरिथ्म पर निर्भर करती है.

उदाहरण के लिए सैमसंग गैलेक्सी S9 का रियर कैमरा 12 मेगापिक्सल का है, वहीं सैमसंग गैलेक्सी A8 Plus का कैमरा 16 मेगापिक्सल का है, लेकिन गैलेक्सी S9 की इमेज क्वालिटी A8 Plus के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छी है.

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इमेज को bokeh इफेक्ट देता है ड्यूल कैमरा

ऐप्पल ने अपने आईफोन 7 Plus में Portrait mode फीचर को शामिल करते हुए बताया था कि फोन का सेकेंडरी लेंस डीएसएलआर जैसा ब्लर (blur) इफेक्ट देगा. इसके बाद से दूसरी स्मार्टफोन कंपनियों ने ड्यूल कैमरा फीचर को अपने फोन में शामिल करना शुरू कर दिया और इस तरह से कंपनियों की मार्केटिंग के चलते bokeh इफेक्ट का भ्रम यूजर्स के बीच फैल गया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण गूगल पिक्सल 2 स्मार्टफोन है.

एआई तकनीक से बेहतर इमेज क्वालिटी आती है

स्मार्टफोन्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फीचर कोई नया नहीं है. ऐसे में सवाल है कि क्या एआई इंजन के इस्तेमाल से बेहतर इमेज क्वालिटी आती है, तो इसका जवाब है नहीं. ऐसा जरूरी नहीं है कि इस फीचर की मदद से हमेशा बेहतर इमेज क्वालिटी मिले. यह इस बात पर निर्भर करता है कि फोन को बनाने वाली कंपनी ने फोन में किस तरह से मशीन लर्निंग और एआई तकनीक को डिजाइन किया है.

बाजार की जानकारी ले कर ग्वारपाठा की करें खेती

एलोवेरा यानी ग्वारपाठा एक ऐसा औषधीय पौधा?है जिस का इस्तेमाल अनेक तरह के आयुर्वेदिक उत्पादों में होता है. यह कम लागत में की जाने वाली और मुनाफा देने वाली फसल है. इस को लगाने से पहले बाजार की जानकारी जरूर ले लें क्योंकि लीक से हट कर कोई भी खेती करना आसान तो है, लेकिन उस के लिए बाजार ढूंढ़ना कठिन होता है. लेकिन आज के समय में अनेक आयुर्वेदिक कंपनियां ऐसी हैं जो किसानों से सीधे माल खरीदती हैं या उन से पहले ही ठेके पर खेती की बात कर ली जाती?है.

एलोवेरा की खेती किसी भी तरह की मिट्टी में की जा सकती है. बंजर जमीन में भी इसे उगाया जा सकता है. ऐसी जगह का चुनाव न करें जहां पानी इकट्ठा होता हो. इस की खेती में खास दवा पड़ती है.

खास बात यह भी है कि पशु इसे नहीं खाते हैं इसलिए इस फसल में नुकसान होने की संभावना न के बराबर होती है. इस की एक बार फसल लगाने पर कई साल तक इस से पैदावार ली जा सकती है.

जलवायु : यह भारत के आमतौर पर सभी इलाकों में उगाया जा सकता है. इस को पानी की बहुत कम जरूरत पड़ती है. इस को राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा के शुष्क इलाकों में भी उगाया जा सकता?है.

जमीन की तैयारी :

20-30 सैंटीमीटर तक की गहराई वाली 1-2 जुताई काफी हैं. इस की खेती के लिए खेत में छोटीछोटी क्यारियां बना लेनी चाहिए.

खाद : 5-6 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ जमीन को तैयार करते समय अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए. अगर राख मिल सके तो राख को बीजाई के समय और बाद में पौधों के चारों ओर बिखेर देना चाहिए.

बीजाई का समय : इस की बीजाई सर्दी के महीनों को छोड़ कर पूरे साल की जा सकती?है, परंतु अच्छी पैदावार के लिए इस की बीजाई जुलाईअगस्त के महीनों में करनी चाहिए.

बीजाई का तरीका : 3-4 महीनों के पौधे 4 से 5 पत्तों वाले तकरीबन 20-25 सैंटीमीटर लंबाई के 60×60 सैंटीमीटर की दूरी पर लगाने चाहिए. पौधे के चारों तरफ जमीन को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए जिस से पौधे मजबूती से जमीन पकड़ सकें. एक एकड़ जमीन के लिए 5000 से 5500 पौधे काफी हैं.

सिंचाई : पहली सिंचाई बीजाई के तुरंत बाद करनी चाहिए. 2-3 सिंचाई जल्दीजल्दी कर देनी चाहिए ताकि पौधों की जड़ें अच्छी तरह से जम सकें. 4-6 सिंचाइयां हर साल करनी चाहिए.

निराईगुड़ाई : बीजाई के एक महीने बाद पहली गुड़ाई करनी चाहिए. बाद में 2-3 गुड़ाइयां हर साल करनी चाहिए. खरपतवार बिलकुल नहीं होने चाहिए. बीमारी वाले और सूखे पौधों को निकाल देना चाहिए. निराईगुड़ाई के समय पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए, जिस से पौधे गिरें नहीं.

बीमारी व कीड़े : अभी तक किसी बीमारी व कीड़ों का प्रकोप इस फसल पर नहीं पाया गया है. कभीकभी दीमक लग जाती है या छोटे कीड़े (मिलीबग) आ जाते हैं. इस को रोकने के लिए हलकी सिंचाई जरूर करनी चाहिए. जरूरत हो तो कीटनाशक का इस्तेमाल किसी विशेषज्ञ से सलाह ले कर करें.

कटाई : पौधा लगाने के एक साल बाद फसल काटने लायक हो जाती है. हर 3 माह में हर पौधे पर 3-4 छोटी पत्तियां छोड़ कर बाकी सभी पत्तियों को तेज धारदार हंसिए से काट लेना चाहिए. कटे हुए पत्तों में फिर से नई पत्तियां बननी शुरू हो जाती हैं. पत्तों की पैदावार एक बार लगाने से 5 साल तक फसल हासिल कर सकते हैं.

असली और नकली के फेर में किसान

फसलों को कीटपतंगों के हमलों से बचाने के लिए किसानों को कई तरह के कीटनाशकों की जरूरत होती?है और इस के लिए वे दुकानदार के कहे मुताबिक कीटनाशक खरीदते हैं.

देश में ऐसे बहुत कम दुकानदार हैं जिन के पास डिगरी या डिप्लोमा हो. इसी वजह से अकसर किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि किस फसल के कीट के लिए कौन सी दवा ज्यादा कारगर होगी और कितनी मात्रा में, इस की जानकारी ज्यादातर दुकानदारों को नहीं होती. किसानों को इस की भी जानकारी नहीं होती कि कौन सी खाद असली है या नकली.

किसानों के सामने जो सब से बड़ी दिक्कत है, वह है कैमिकल खाद और कीटनाशक की. कौन सी खाद या कीटनाशक असली है या नकली, वे इस की पहचान नहीं कर पाते.

हैरानी की बात यह है कि जब हम ने भोपाल के कुछ दुकानदारों से इस बारे में जानकारी जाननी चाही तो उन का जवाब गोलमोल था. मतलब, उन्होंने माना कि आमतौर पर उन्हें भी इस के बारे में कोई खास पहचान नहीं होती, इसलिए उन के पास जो सब से ज्यादा बिकने वाली दवा होती है, उसी को किसानों को देने की कोशिश करते हैं.

इस में एक बात और गौर करने वाली है कि असली की पहचान ज्यादा बिकने और महंगे होने से है, क्योंकि नकली उत्पाद असली के मुकाबले काफी कम कीमत पर दुकानों में मिल जाते हैं, जिन के इस्तेमाल से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. साथ ही, मिट्टी की उर्वराशक्ति कमजोर हो जाती है इसलिए बड़े ब्रांड को देख कर खरीदारी करें. साथ ही, कुछ ऐसे तरीके भी हैं, जिन से असली और नकली कीपहचान की जा सकती है.

नकली और मिलावटी कीटनाशकों की वजह से देश में हर साल करोड़ों रुपए की फसलें तबाह हो जाती हैं. इस से किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है. किसान कर्ज ले कर फसलें उगाते हैं, फसलों को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन नकली और मिलावटी कीटनाशक कीटों पर प्रभावी नहीं होते. इस वजह से कीट और पौधों पर लगने वाली बीमारियां फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. उत्पादन कम होता?है या कई बार पूरी फसल ही खराब हो जाती है.

एक अनुमान के मुताबिक, देश में हर साल औसतन 3,000 करोड़ रुपए के नकली कीटनाशक बेचे जाते हैं, जबकि कीटनाशकों का कुल बाजार 7,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है. यहां हर साल तकरीबन 80,000 टन कीटनाशक बनाए जाते?हैं.

इंडियन काउंसिल औफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की मानें तो देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों में से तकरीबन 40 फीसदी हिस्सा नकली है.

काबिलेगौर है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में नकली कीटनाशक बनाने का करोबार बड़े पैमाने पर होता है. नामीगिरामी कंपनियों के लेबल का ये लोग इस्तेमाल करते हैं. अधिकारियों की मिलीभगत के चलते इन कारोबारियों के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही नहीं हो पाती है.

किसानों को असली और नकली कीटनाशकों और उर्वरकों की पहचान नहीं होती इसलिए वे दुकानदार पर भरोसा कर के कीटनाशक खरीद लेते हैं.

ऐसा नहीं है कि सभी दुकानदार नकली कीटनाशक बेचते हैं. जिन दुकानदारों को बाजार में अपनी साख बनाए रखनी है, वे सीधे कंपनी से माल खरीदते हैं. ऐसे दुकानदारों की भी कमी नहीं है, जो किसी बिचौलिए से माल खरीदते हैं.

दरअसल, बिचौलिए ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में दुकानदारों को असली की जगह नकली कीटनाशक बेचते हैं. नकली कीटनाशकों की पैकिंग भी हूबहू नामीगिरामी कंपनियों की तरह ही होती है.

यूरिया से किसान करें तोबा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में कहा था, ‘हम यूरिया से धरती मां को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं. लेकिन किसान तो धरती मां का पुत्र है. वह अपनी मां को नुकसान कैसे पहुंचा सकता है? किसान एक संकल्प लें कि वे आजादी के 75 साल पूरा होने पर यानी साल 2022 तक यूरिया का इस्तेमाल आधा कर देंगे.’

फर्टिलाइजर एसोसिएशन औफ इंडिया (एफएआई) का अनुमान है कि देश में अगले एक दशक में कैमिकल उर्वरक की खपत 20 फीसदी ज्यादा हो जाएगी. 2024-25 तक नाइट्रोजन की मात्रा 2 करोड़ टन तक हो जाएगी. वहीं फास्फोरस की खपत 93 लाख टन और पोटाश की खपत 42 लाख टन तक पहुंच जाएगी.

भारत में हर साल 3 करोड़ टन यूरिया की खपत होती है, जबकि हरित क्रांति से पहले यह लैवल 10 लाख टन हर साल था. साथ ही, इस का आयात पिछले कुछ सालों के 90 लाख टन के मुकाबले साल 2017 में घट कर 60 लाख टन रह गया.

यह आयात पर निर्भरता में कमी को दिखाता है. भारत में किसान औसतन एक हेक्टेयर खेती पर 158 किलोग्राम उर्वरक का इस्तेमाल करते?हैं, जबकि चीन, बंगलादेश और वियतनाम में यह क्रमश: 420 किलोग्राम, 278 किलोग्राम और 270 किलोग्राम है.

मुश्किल है डगर

प्रोफैसर अशोक गुलाटी कहते हैं, ‘‘खाद्य मांग में जोर के चलते साल 2022 तक इस टारगेट को हासिल कर पाना मुश्किल है, जब तक कोई बड़ा चमत्कार नहीं हो जाता.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘अगर यूरिया की खपत में 50 फीसदी की कमी करनी है तो अगले 3 साल में इस का आयात शून्य हो जाना चाहिए.’’

अशोक गुलाटी कहते?हैं कि मैं ऐसा होते हुए नहीं देख रहा. उर्वरक वितरण में तस्करी और दूसरे उद्योगों में वितरण वगैरह लूपहोल को बंद करने से थोड़ाबहुत फायदा मिल सकता है लेकिन अगले 5 से 10 साल में भारत में कुल यूरिया की खपत बढ़ेगी.

इसी तरह से किसान कुछ सावधानी बरत कर उर्वरक की पहचान कर सकते हैं, जिस से उन के खूनपसीने की कमाई पर पानी न फिरे. हमारी सलाह है कि उन्हें छोटीमोटी दुकानों से इस तरह की चीजें खरीदने से परहेज करना ही मुनासिब रहेगा, क्योंकि छोटे दुकानदार कम ग्राहकों से ज्यादा फायदा वसूलना चाहते हैं.

साथ ही, किसानों को समय के साथ यूरिया के इस्तेमाल पर भी निर्भरता कम करनी चाहिए, क्योंकि देश में सब से ज्यादा यूरिया खाद का ही इस्तेमाल किया जाता है. इस से मिट्टी भी खराब न होगी और किसानों का पैसा भी बचेगा.

गन्ने की पैदावार लाए खुशियां हजार

उत्पादन अच्छा होने के कारण गन्ना देश की खासमखास नकदी फसलों में आता है. देश के 18 राज्यों में गन्ने की बहुतायत थी, लेकिन गन्ने की खेती अब लगातार घट रही है. मसलन, साल 2014 में कुल रकबा 5,341 हजार हेक्टेयर था, जो घट कर साल 2015 में 5,307 हजार हेक्टेयर रह गया.

इसी तरह गन्ने की पैदावार में भी कमी आ रही है. साल 2015 के दौरान देश में गन्ने की कुल पैदावार 3,456 लाख टन थी, जो साल 2016 में गिर कर 3369 लाख टन रह गई. यदि गन्ने का रकबा व पैदावार इसी तरह घटती रही तो जाहिर है कि भारतीय चीनी उद्योग के सामने कच्चे माल की तंगी आ सकती है.

गन्ने की 1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज मुहैया कराने के लिए उन्नत प्रजाति को चुनना और बोआई के लिए यंत्रों का इस्तेमाल ही संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन और सहफसली खेती द्वारा ही मुनासिब है.

गन्ने की फसल लेना मालीतौर पर किसानों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि उन्नत तकनीक अपना कर ही उत्पादन को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है. उत्पादन में ज्यादा इजाफा इस तरह भी किया जा सकता है:

गन्ने की 1 एकड़ बोआई में खादों का इस्तेमाल:

* गोबर की खाद-25 क्विंटल.

* डीएपी-50 किलोग्राम.

* यूरिया-30 किलोग्राम.

* माइक्रोन्यूटैंट-13-500.

* सल्फर-3 किलोग्राम.

* एजो फास्फोरस-1 लिटर फास्फोरस.

* ट्राइकोडर्मा-1 लिटर.

* पोटाश-50 किलोग्राम.

नोट-: अच्छे नतीजे लाने के लिए मिश्रण बोआई से 2 हफ्ते पहले मिला कर छाया में रखें.

खेत की करें तैयारी

* सब से पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें. उस के बाद हैरो टिलर से जुताई करें.

* गहरी जुताई करने के बाद 5 फुट की गहराई पर कूंड़ निकालें.

बीज का चयन

* गन्ने का बीज मोटा, ताजा, लंबी पोरी वाला, 8-10 महीने वाला व उन्नत प्रजाति का हो.

* गन्ने की नीचे की 3-4 पोरी बीज में न लें.

* गन्ने का बीज जड़ वाला गिरा हुआ चूहे द्वारा काटा हुआ, चोटीबेधक कीट व बीमारी से बिलकुल ग्रसित न लें.

* गन्ने का बीज टूटनेफूटने से बचाने के लिए बीज को एक जगह से दूसरी जगह पर अगोला व पत्ती सहित ही ले जाएं.

* गन्ने की आंखें धूप से बचाएं.

* गन्ने की आंखों के ऊपर से पत्ती पूरी तरह साफ करें.

* गन्ने के बीज को 2 ही आंख के टुकड़ों में काटें.

* गन्ने के बीज के टुकड़े काटने के बाद जल्दी से जल्दी कूंड़ों में डाल कर मिट्टी से ढक दें वरना इस के जमाव पर असर पडे़गा.

यों करें बोआई

ट्रैंच विधि से 2 पंक्ति में बोआई : ट्रैंच विधि से एक लाइन से दूसरी लाइन में बोआई उन रकबों में फायदेमंद है, जहां हलकी मिट्टी या क्षारीय मिट्टी हो. इस विधि से जल की बचत के साथसाथ सहफसली खेती कर के मुनाफा लिया जा सकता है.

ट्रैंच विधि से लागत कम आती है, उपज ज्यादा मिलती है और सहफसली खेती जैसे लहसुन, प्याज, चना, मटर, मसूर, खीरा व टमाटर भी आसानी से की जा सकती है.

इस विधि में यू आकार की 25 सैंटीमीटर गहरी और 30 सैंटीमीटर चौड़ी खाई 90 सैंटीमीटर की दूरी पर ट्रैक्टरचालित ट्रैंचर से खोदी जाती है.

इस मशीन द्वारा एक बार में 2 खाई बनाई जाती हैं और तीसरीचौथी खाई दूसरे चक्कर पर मशीन में लगे गाइडर की मदद से बराबर की दूरी पर बनती हैं. इन ट्रैंचों (खाइयों) में गन्ने के टुकड़े खाई के बीच में समानांतर यानी पैरलल अथवा क्रौस डाले जाते हैं. दोहरी जुड़वां लाइन में गन्ना बोआई के लिए पेयर्ड रो प्लाटिंग रिजर द्वारा बीच में 120 सैंटीमीटर चौड़ी बेड बना कर उस के दोनों तरफ 30-30 सैंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ निकाले जाते हैं.

इस तरह 2 जुड़वां खाइयों के बीच की दूरी 120+30 या 150 सैंटीमीटर होती है. गन्ने के टुकडों की बोआई मजदूरों द्वारा ट्रैंच की तली में एक तरफ डाल कर की जाती है. सिंचाई भी ट्रैंचों में ही की जाती है.

* 2 आंख वाले गन्ने के बीज टुकड़े से टुकडे़ के बीच 4 इंच का अंतर रख कर ही बोआई करें.

* गन्ने के टुकड़े के ऊपर फावड़े या औजार से 1-2 इंच मिट्टी चढ़ा दें. हलकी मिट्टी करने के लिए पाटे का इस्तेमाल कतई न करें.

* हलकी मिट्टी चढ़ाने के बाद तुरंत पानी लगा दें. पानी लगाते समय कूंड़ों की लंबाई कम रखें अन्यथा कूंड़ों में पानी रुकेगा तो जमाव प्रभावित होगा.

* खेत में अच्छी नमी होने पर ही खरपतवारनाशी काम करेगी.

* खरपतवारनाशी का इस्तेमाल करने के लिए साफ पानी का ही इस्तेमाल करें.

* खरपतवारनाशी का छिड़काव नोजल से ही करें.

* पूरी तरह से नियंत्रण पाने के लिए खरपतवारनाशी दवा का दूसरा छिड़काव 10 दिन पर करें.

* यदि खरपतवारनाशी का इस्तेमाल नहीं किया गया है तो 25 दिन व 65 दिन पर खुरपा चला कर खरपतवार निकाल दें.

छिड़काव

उर्वरकों को गोबर की सड़ी खाद में मिला कर फिर गुड़ाई करें. गोबर की खाद 15 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से इस्तेमाल करें.

फसल की सुरक्षा

बोआई के समय कीटनाशक दवा डेंटसू 100 ग्राम और टेल स्टार 400 मिलीलिटर या लिसेंटा 160 मिलीलिटर प्रति एकड़ में पहला छिड़काव करें. बोआई के समय कूंड़ों में गन्नों के टुकड़ों के ऊपर मिट्टी चढ़ाने से पहले छिड़काव करें.

दूसरा कीटनाशक का इस्तेमाल बोआई के 45-60 दिन बाद 150 मिलीलिटर प्रति एकड़ कोराजन ड्रेंचिंग कर के सिंचाई कर दें या सिंचाई करने के बाद ड्रेंचिंग करें.

कीटनाशक का इस्तेमाल सिंचाई करने के बाद जब हलका सा पैर घुसता हो तब करें.

मिट्टी चढ़ाना

* गन्ने की फसल में 2 बार मिट्टी चढ़ाएं.

* 60-65 दिन पर कल्ले निकलते समय उर्वरक और कोराजन का इस्तेमाल कर के हलकी मिट्टी चढ़ाएं. मिट्टी चढ़ाने के बाद पानी दे कर पत्तियों के ऊपर माइक्रोन्यूटैंट का छिड़काव करें.

* दूसरी भारी मिट्टी 120 से 150 दिन पर उर्वरक की तीसरी मात्रा और कोराजन की दूसरा ड्रेंचिंग कर भारी मिट्टी चढ़ाएं. मिट्टी चढ़ाने के बाद सिंचाई कर के गन्ने की पत्तियों पर दूसरा माइक्रोन्यूटैंट का छिड़काव जरूर करें.

सिंचाई

* खेत में हमेशा नालियों में हलकी सिंचाई करें.

* खेत में कहीं भी पानी नहीं रुकना चाहिए.

* खेत में हमेशा नमी बनाए रखें.

* नाली विधि से पानी की बचत होती है और एक बार में 4-5 लाइन से आलू विधि से पानी दें.

20 साल बाद आईफा में रेखा ने बिखेरा अपना जलवा

बैंकौक में हुए आईफा अवौर्ड्स 2018 में बौलीवुड के फैंस को वो नजारा देखने को मिला जिसको देखे 20 साल हो गए थे. जी हां हम बात कर रहे हैं आईफा अवौर्ड्स में हुए बौलीवुड की एवरग्रीन एक्ट्रेस रेखा के जादुई डांस परफौर्मेंस की. बौलीवुड की शान रेखा ने ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और ‘सलाम-ए-इश्क मेरी जां जरा कबूल कर लो’ जैसे हिट सौग्स पर डान्स परफौर्मेंस देकर फैंस का दिल जीत लिया. स्टेज पर रेखा के करिश्माई परफौर्मेंस ने एक बार फिर दर्शकों की दिल की धड़कने बढ़ा दी. 20 साल बाद भी रेखा की सुन्दरता और जादूई अदाओं ने फैंस को हैरान कर दिया.

थाईलैंड की राजधानी बैंकौक में हुए 19वें इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकेडमी अवौर्ड्स (आईफा) का आयोजन सियाम निरामित थिएटर मे हुआ. बता दें कि आईफा अवौर्ड शो की शुरूआत बैंकौक से ही हुई थी. आईफा के रेड कार्पेट पर रणबीर कपूर, शाहिद कपूर, अर्जुन कपूर, कृति सैनन, बौबी देओल और नुसरत भरुचा जैसी फिल्मी हस्तियां नजर आई. लेकिन रेखा के स्टेज परफौर्मेन्स ने सब पर भारी पड़ी. रितेश देशमुख और करन जौहर ने अवार्ड शो की मेजाबनी की.

रेखा के अलावा बौलीवुड के अभिनेता रणबीर कपूर ने भी अपने हिट गानों से जोरदार परफौर्मेन्स दिया. वहीं सालो बाद आईफा में अभिनेता बौबी देओल ने भी अपनी परफौर्मेन्स दी. लाइट पिंक कलर के अनारकली सूट में सिर से पैर तक सजी हुई रेखा बेहद खूबसूरत लग रही थीं. ट्रेडिशनल अवतार में रेखा की इस करिश्माई परफौर्मेंस के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं. जो ये साबित करता है कि आज भी रेखा के लिए बी-डाउन और फैंस की दिवानगी कम नही हुई है.

क्या करें जब आप का फोन हो जाए आउटडेटेड

हर साल स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियां नए फीचर्स वाले नए मॉडल लॉन्च करती हैं. लेकिन लेटेस्ट स्मार्टफोन यूज करने वालों के सामने यह समस्या होती है कि आखिर पुराने फोन का क्या किया जाए. जरूरी नहीं कि अगर आप नए स्मार्टफोन को इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपका पुराना फोन किसी काम का नहीं रहा. तो हम आपको बता रहे हैं ऐसे तरीके जहां आप अपने पुराने स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं.

निगरानी करने में

स्मार्टफोन काफी अच्छे कैमरे के साथ आते हैं. इसलिए आप इसका इस्तेमाल अपने आसपास की निगरानी करने में कर सकते हैं. इसके लिए बस आपको IP Webcam या tinyCam Monitor जैसे ऐप की जरूरत होगी. इनका इस्तेमाल वेब ब्राउजर के जरिए लाइव विडियो देखने, रिकॉर्ड विडियो को क्लाउड स्टोरेज सर्विस पर अपलोड करने के लिए किया जा सकता है.

कार GPS के रूप में

जब भी आप किसी नई जगह या नए शहर में जाते हैं तो आपको सही रास्ता ढूंढने में बड़ी परेशानी होती है. ऐसे में आप अपने पुराने स्मार्टफोन का कार में जीपीएस के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए बस आपको अपने पुराने फोन में HERE WeGo या Google Maps जैसे ऐप डाउनलोड करने हैं जो आपको वॉइस नेविगेशन की सुविधा प्रदान करते हैं. इसके अलावा आप ऑफलाइन यूज के लिए अपने फोन से फुल मैप भी डाउनलोड कर सकते हैं.

डिजिटल फोटो फ्रेम

लगभग हम सभी अपनी ऑफिस डेस्क के आसपास अपने खास लोगों या परिवार की फोटो रखना पसंद करते हैं. आप अपने पुराने स्मार्टफोन का इस्तेमाल डिजिटल फोटो फ्रेम की तरह कर सकते हैं. बस आपको Digital Photo Frame जैसे ऐप को डाउनलोड करना है. ऐसे ऐप के जरिए तस्वीरों को स्लाइड शो के रूप में देखा जा सकता है. इसके अलावा, इन ऐप्स में ऐनिमेशन इफेक्ट, बैकग्राउंड साउंड जैसे ऑप्शन भी आते हैं.

मीडिया सर्वर

अगर आप किसी अलग डिवाइस में मल्टीमीडिया कॉन्टेंट जैसे म्यूजिक या विडियो स्ट्रीम करना चाहते हैं तो आप इसके लिए अपने पुराने स्मार्टफोन का इस्तेमाल मीडिया सर्वर के रूप में कर सकते हैं. Plex या BubbleUPnP जैसे ऐप्स की मदद से आप आसानी से ऐसा कर सकते हैं. ज्यादातर DLNA कम्पैटिबल डिवाइस में स्ट्रीमिंग फीचर आसानी से काम करता है.

यूनिवर्सल रिमोट

आजकल लगभग सभी इलैक्ट्रॉनिक सामान जैसे एसी, टीवी, म्यूजिक सिस्टम आदि सभी अपने अलग रिमोट के साथ आते हैं. लेकिन अगर आपका पुराना स्मार्टफोन IR blaster से लेस है तो आप सारे रिमोट की जगह अपने फोन का इस्तेमाल एक यूनिवर्सल रिमोट के रूप में कर सकते हैं. इसके लिए Easy Universal TV Remote और Peel Smart Remote जैसे ऐप्स भी उपलब्ध हैं जो लगभग सभी घरेलू उपकरणों को सपोर्ट करते हैं.

मीडिया प्लेयर/गेमिंग डिवाइस

लगभग सभी लोग अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल संगीत सुनने, विडियो देखने या गेम्स खेलने के लिए करते है. लेकिन अगर आपके पास एक अतिरिक्त फोन है तो आप इसका इस्तेमाल मीडिया प्लेयर या पोर्टेबल गेमिंग डिवाइस के तौर पर कर सकते हैं. इसके लिए आपको कुछ अच्छे मीडिया प्लेयर ऐप इन्सटॉल करने होंगे. गेमिंग के लिए आप अपने फोन के हार्डवेयर के हिसाब से टेम्पल रन 2 से लेकर मॉर्टल कॉम्बैट जैसे गेम डाउनलोड कर सकते हैं.

ईबुक रीडर

जहां तक बात किताबों को डिजिटल रूप में पढ़ने की है तो ऐमजॉन किंडल जैसे ई रीडर्स बेस्ट हैं लेकिन अगर आपके पास पहले से ईबुक रीडर नहीं है तो आप अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल इसके लिए कर सकते हैं. ऐमजॉन, बर्नस एंड नोबेल और कोबो जैसे ई रीडर बनाने वाली लगभग सभी कंपनियों के पास अपने ऐप हैं जिनका इस्तेमाल ईबुक पढ़ने के लिए किया जा सकता है.

वायरलस हॉटस्पॉट

आप अपने पुराने स्मार्टफोन का इस्तेमाल वायरलस हॉटस्पॉट के रूप में भी कर सकते हैं. इसके लिए आपको एक 3G या 4G सिम लेकर अपने फोन का वायरलस हॉटस्पॉट ऑप्शन ऑन करना है. पुराने फोन के जरिए, यह वाई-फाई इस्तेमाल करने का आसान और सस्ता तरीका हो सकता है.

बच्चों का पहला स्मार्टफोन

एक जमाना था जब बच्चे खिलौनों से खुश हो जाते थे. आज हर बच्चे को डिजिटल गैजेट और स्मार्टफोन अच्छे लगते हैं. क्योंकि नया और महंगा स्मार्टफोन बच्चों को देना नुकसानदेह हो सकता है. इसलिए आप अपने बच्चों को अपना पुराना स्मार्टफोन दे सकते हैं.

आज तक ‘डक आउट’ नहीं हुआ है यह भारतीय क्रिकेटर

वनडे क्रिकेट के इतिहास में कई रिकॉर्ड्स बने हैं. इनमें से एक है शून्य पर आउट नहीं होने का. वनडे मैचों में कुछ ऐसे भी बल्लेबाज है, जो अपने पूरे करियर में कभी भी शून्य पर आउट नहीं हुए. इनमें एक भारतीय खिलाड़ी भी है जो कभी शून्य पर आउट नहीं हुआ. भारत का यह खिलाड़ी 1983 विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा भी रह चुका है.

जी हां, इस क्रिकेटर का नाम है यशपाल शर्मा. 11 अगस्त 1954 को लुधियाना में जन्में इस खिलाड़ी ने 1978 में पाकिस्तान के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू किया था. यशपाल 1983 में वर्ल्ड कप विजेता भारतीय टीम के सदस्य भी रहे हैं. वनडे में उन्हें सात साल तक कोई भी गेंदबाज शून्य पर आउट नहीं कर सका.

मध्यक्रम के बल्लेबाज यशपाल शर्मा ने 42 एकदिवसीय मैचों की 40 पारियों में 63.02 की स्ट्राइक रेट के साथ 883 रन बनाए. इस विकेटकीपर-बल्लेबाज का सर्वश्रेष्ठ स्कोर 89 रन रहा है. उन्होंने इसके साथ ही 4 अर्धशतक भी जड़े हैं.

बात अगर टेस्ट मैच की करें तो यशपाल शर्मा ने 37 मैचों की 59 पारियों में दो शतक और 9 अर्धशतक की मदद से 1606 रन बनाए हैं. वह अपने करियर में 6 छक्के भी लगा चुके हैं. टेस्ट में उनका बेस्ट 140 रहा है.

इसके अलावा वह अंतर्राष्ट्रीय मैचों में 2 विकेट भी ले चुके हैं. इस खिलाड़ी ने 160 फर्स्ट क्लास मैचों में 8933 रन बनाने के साथ दोहरा शतक भी जड़ा है. यशपाल शर्मा ने इंग्लैंड के खिलाफ चंडीगढ़ में 27 जनवरी 1985 को आखिरी अंतर्राष्ट्रीय मैच खेला था. हालांकि वह 1993 तक प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलते रहे.

आइए जानते हैं विश्व के उन पांच खिलाड़ियों के बारे में जो कभी शून्य पर आउट नहीं हुए है.

पीटर क्रिस्टन (दक्षिण अफ्रीका)

तीन साल तक दक्षिण अफ्रीका के लिए खेलने वाला यह बल्लेबाज कभी भी शून्य पर आउट नहीं हुआ. क्रिस्टन ने इस दौरान अपने 40 मैच के उतने ही पारियों में 1293 रन बनाएं. इसमें 9 अर्धशतक शामिल है. वह इस दौरान 6 बार नॉटआउट भी रहे.

केपर वेसेल्स (आस्ट्रेलिया)

1984 में पर्दापण करने वाला यह बल्लेबाज आस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका दोनों की तरफ से खेल चुका है. वेसेल्स ने अपने 10 साल के अंतराष्ट्रीय करियर में 109 वन डे मैच खेले. उन्होंने 105 पारियों में बल्लेबाजी करते हुए एक शतक और 26 अर्धशतक की बदौलत 3367 रन बनाए. वन डे सर्वोच्च व्यक्तिगत 107 रन बनाने वाले वेसेल्स अपने करियर में कभी भी शून्य पर आउट नहीं हुए. वे 7 बार नॉटआउट भी रह चुके हैं.

जैकस रूडोल्फ (दक्षिण अफ्रीका)

दक्षिण अफ्रीका के बाएं हाथ के इस खिलाड़ी ने 2003 से 2006 तक 45 वन डे मैच खेले. इस दौरान रूडोल्फ ने 39 पारियों में बल्लेबाजी की, जिसमें वह 6 बार नॉटआउट भी रहें. रूडोल्फ ने अपने करियर में सात अर्धशतक की मदद से 1174 रन बनाए.

शमीउल्लाह शेनवारी (अफगानिस्तान)

भले ही अफगानिस्तान को टेस्ट टीम का दर्जा प्राप्त नहीं है. लेकिन वनडे में उसके खिलाड़ी लगातार बेहतरीन करते रहें हैं. अफगानिस्तान का यह खिलाड़ी पिछले सात सालों से अंतराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहा है. शेनवारी ने इस दौरान 61 मैचों के 51 पारियों में कुल 1379 रन बनाए. शेनवारी वन डे में अब तक एक बार भी 0 पर आउट नहीं हुए है. उनका सर्वोच्च स्कोर 96 है. शेनवारी अपने पारी के दौरान 7 बार नॉटआउट रहे हैं.

पंजाब में जन्मा यह खिलाड़ी अब भारत को हराने की कर रहा है तैयारी

आयरलैंड ने भारत के खिलाफ दो टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए गैरी विल्सन की अगुआई में 14 सदस्यीय टीम का ऐलान किया. इस टीम में पंजाब में जन्मे औफ स्पिनर सिमरनजीत ‘सिमी’ सिंह को भी जगह मिली है. 27 और 29 जून को होने वाले इस मैच में कप्तान गैरी विल्सन टीम का नेतृत्व करना जारी रखेंगे.

आयरलैंड ने भारत के खिलाफ होने वाली दो मैचों की घरेलू टी-20 सीरीज के लिए जोशुआ लिटल और एंडी मैक्ब्राइन को अपनी 14 सदस्यीय टीम में शामिल किया है. 27 और 29 जून को होने वाले इस 18 साल के तेज गेंदबाज लिटल ने अब तक दो टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैच खेले हैं जबकि 25 साल के मैक्ब्राइन ने आयरलैंड के लिए अब तक 30 वनडे और 19 टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैच खेले हैं.

वहीं, सिमी सिंह ने न्यूजीलैंड के खिलाफ पदार्पण किया था लेकिन इस मैच के अलावा उन्हें किसी अन्य बड़ी टीम के खिलाफ खेलने का मौका नहीं मिला. वह अब तक सात एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय और चार टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं. न्यूजीलैंड के खिलाफ खेलते हुए सिमी सिंह ने 3 विकेट झटकने के साथ-साथ शानदार अर्धशतक भी लगाया था.

एक ट्राई सीरीज में आयरलैंड टीम में रहते हुए सिमी ने एक अर्धशतक और 150 की स्ट्राइक रेट के साथ 96 रन बनाए थे. इसी टी-20 ट्राई सीरीज टूर्नामेंट में सिमी सिंह छठे और आयरलैंड के तीसरे सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज भी बने थे. इस दौरान सिमी ने 6 विकेट भी चटकाए हैं.

पंजाब के खरड़ जिले के बथलाना गांव में जन्मे सिमी ने वनडे में 8 जबकि टी-20 में 6 विकेट चटकाए हैं. बता दें कि सिमी सिंह पंजाब की अंडर-14, अंडर-17 और अंडर-19 टीम के लिए खेले हैं, लेकिन उसके बाद सिमी को मौका नहीं मिला. पंजाब की अंडर-19 टीम से बाहर होने के बाद एक दोस्त की सलाह पर वह डबलिन पहुंचे और यहां आकर अपना क्रिकेट करियर आगे बढ़ाया. सिमी का सपना टीम इंडिया के लिए खेलने का था, लेकिन मौका नहीं मिलने के बाद उन्होंने अपने क्रिकेट के पैशन को नहीं छोड़ा और दूसरे देश का रुख कर लिया.

31 साल के सिमी सिंह 2006 में आयरलैंड बस गए थे. सिमी सिंह युजवेंद्र चहल, सिद्धार्थ कौल, मनप्रीत गोनी, गुरकीरत सिंह जैसे क्रिकेटर्स के साथ खेल चुके हैं. सिमी सिंह जब पंजाब के लिए खेलते थे तो वो एक बल्लेबाज थे लेकिन आयरलैंड में उन्होंने अपनी स्पिन गेंदबाजी पर ध्यान दिया और अब वो एक औलराउंडर के तौर पर टीम में शामिल किए गए हैं.

आयरलैंड ने भारत के खिलाफ एकमात्र टी 20 अंतरराष्ट्रीय मैच इंग्लैंड में 2009 विश्व टी 20 के दौरान खेला था. भारत ने यह मैच 4.3 ओवर शेष रहते आठ विकेट से जीता था. जहीर खान ने इस मैच में 19 रन देकर चार विकेट चटकाए थे.

आयरलैंड की टीम

गैरी विल्सन (कप्तान), एंड्रयू बिलबिर्नी, पीटर चेज, जौर्ज डाकरेल जोशुआ लिटल, एंडी मैकब्रायन, केविन ओब्रायन, विलियम पोर्टरफील्ड, स्टुअर्ट पायंटर, बौयड रैनकिन, जेम्स शेनन, सिमी सिंह, पौल स्टर्लिंग और स्टुअर्ट थौम्पसन.

भारतीय टीम

विराट कोहली (कप्तान), सुरेश रैना, मनीष पांडे, महेंद्र सिंह धोनी, शिखर धवन, रोहित शर्मा, के एल राहुल, दिनेश कार्तिक, उमेश यादव, सिद्धार्थ कौल, कुलदीप यादव, वाशिंगटन सुंदर, भुवनेश्वर कुमार, जसप्रीत बुमराह, हार्दिक पांड्या और युजवेंद्र चहल.

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