Download App

सड़क पर कोई शौक से नहीं रहता

पहले बसाई जाती है, फिर खाली कराई जाती है, झुग्गी बस्ती से कुछ ऐसे वफा निभाई जाती है.

यह खेल न जाने कितने सालों से बदस्तूर चल रहा है. अब तो अतिक्रमण को ले कर सुप्रीम कोर्ट के तेवर भी तीखे हैं. वह कहता है कि दिल्ली की सड़कें साफ चाहिए ताकि सड़क व फुटपाथों पर चलने वालों को राहत मिले.

अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जगहों और अनऔथराइज्ड कालोनियों मे गैरकानूनी निर्माण पर फौरन रोक लगे.

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से दिल्ली की सियासत में एक तरह की लड़ाई चल रही है. भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस तीनों के बीच एकदूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला शुरू हो गया है.

आरोपप्रत्यारोप की इस राजनीति में गरीब लोगों का नुकसान होता है. बड़ी गाज तो उन गरीबों पर पड़ती है जो रहते भी कब्जाई जगह पर हैं और खातेकमाते भी कब्जाई जगह पर ही.

मान लीजिए कोई आदमी किसी झुग्गीझोंपड़ी बस्ती में रहता है, जहां उस पर यह तलवार हमेशा लटकती रहती है कि कब सिर से छत हट जाए. अगर किसी सड़क किनारे वह छोलेकुलचे बेचने का ठेला लगाता है, तो वहां भी उसे यही डर सताता रहेगा कि कब ‘कमेटी वाले’ अपनी गाड़ी लेकर आ धमकेंगे और उस का तामझाम फेंक कर सामान अपने साथ ले कर चलते बनेंगे या कभी ऐसा सरकारी फरमान ही न आ जाए कि भविष्य में कोई भी सड़क किनारे, फुटपाथ पर अपना?ठेला लगा कर सामान नहीं बेच पाएगा.

यहां पर ऐसे लोगों का कतई पक्ष नहीं लिया जा रहा है जो कानून या सरकार के बनाए कानून की धज्जियां उड़ा कर सड़कों पर अतिक्रमण करते हैं पर अगर सभी को रोजीरोटी कमाने, सिर पर छत होने का बुनियादी हक है, तो फिर ऐसे लोगों के साथ तो ज्यादती ही कही जाएगी जो मेहनत की कमाई से अपनी जिंदगी गुजरबसर करना चाहते हैं. उन का कुसूर बस इतना है कि उन्हें अपनी ईमानदारी की कमाई सड़क या फुटपाथ का एक छोटा सा हिस्सा घेर कर करनी पड़ रही है.

यहां एक और बात गौरतलब है कि सड़कों पर सामान बेचने वालों के ग्राहक भी गरीब या मिडिल क्लास होते हैं. इन में से बहुत से ऐसे होते हैं जो अपने घरगांव से आ कर दिल्ली जैसे बड़े शहर में छोटी नौकरी और कम तनख्वाह पर अपना परिवार पालते हैं. बहुत से तो रोजाना ऐसे ठेलों पर खाना खाते हैं, क्योंकि यहां से उन्हें खाना सस्ता जो पड़ता है.

मिसाल के तौर पर कोई आदमी सड़क किनारे छोलेभटूरे का ठेला लगाता है और एक प्लेट 30 रुपए की देता है. अगर कोई आदमी जिस की तनख्वाह 12 हजार रुपए महीना है, 25 दिन नौकरी करने आता है और रोजाना उसी आदमी से छोलेभटूरे खाता है तो वह 25 दिन में 30 रुपए प्लेट के हिसाब से 750 रुपए के छोलेभटूरे खाता है.

अब अगर सड़क पर से सभी ठेले वालों को हटा दिया जाए तो उस आदमी को किसी रैस्टोरैंट में जाना पड़ेगा जहां हो सकता है कि छोलेभटूरे की एक प्लेट की कीमत 60 रुपए हो यानी 25 दिन में वह आदमी 1500 रुपए का खाना खाएगा. मतलब उस का खर्चा दोगुना हो जाएगा.

अगर अपने दफ्तर से रैस्टोरैंट तक बस से आनेजाने में 20 रुपए खर्च होंगे तो 25 दिन के हिसाब से उस का 500 रुपए का ऐक्स्ट्रा खर्च बढ़ जाएगा. छोलेभटूरे वाला तो बेरोजगार हुआ ही इस गरीब ग्राहक का भी खर्चा बढ़ गया. 750 और 500 रुपए जोड़ लो तो 1250 रुपए महीना की चपत.

अब छोलेभटूरे का ठेला लगाने वाले की बात करते हैं. सड़क से ठेला उठा तो रोजगार गया. अगर वह किसी ऐसी झुग्गी बस्ती में रहता है जो सरकारी जमीन पर गैरकानूनी तौर पर बनी है तो उसे यह डर भी लगा रहेगा कि कल को झुग्गी खाली करने का सरकारी फरमान न आ जाए.

society

झुग्गी बस्तियों की बदहाली

इस मुद्दे पर बात करने से पहले यह जान लें कि अतिक्रमण क्यों होता है. दरअसल, यह समस्या देश की तरक्की के मौडल में खामियों और उस से गांवदेहात के लोगों का अपना घरबार छोड़ने से जुड़ी है. आजादी के बाद से धीरेधीरे लोगों का शहरों की ओर भागना देखा गया है. आजादी के बाद यह कानून तो बना दिया गया कि हमारे देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी बसने का हक है लेकिन जो गरीब पहले जंगली इलाकों में रहते थे उन को नैशनल पार्क या अभयारण्य घोषित करते वक्त यह तय नहीं किया गया कि अब वहां रहने वाले लोग कहां बसाए जाएंगे. ऐसे लोगों के पास जमीन का कोई पट्टा नहीं था, इसलिए न वे घर के रहे और न घाट के.

जंगलों का दोहन भी लोगों को शहरों की ओर भागने की वजह बना. ईंधन, फर्नीचर और घर बनाने के लिए शहरों में लकडि़यों की मांग बढ़ गई. इस से आदिवासियों को सब से ज्यादा नुकसान हुआ.

पिछले 20 सालों में तो गांवदेहात के लोगों का बड़े शहरों की ओर भागना हद से ज्यादा बढ़ा है. रोजगार की कमी, पढ़ाईलिखाई की बदहाली और डाक्टरी इलाज में खामियां इस की खास वजहें रही हैं.

जातिवाद के जहर की तो पूछिए ही मत. शहरों में जानवरों की तरह गंदी बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग निचले तबके के होते हैं. वे गांव में भी सताए जाते हैं और शहरों में भी उन्हें इज्जत की जिंदगी नहीं मिल पाती है. इस की वजह यह रही है कि गांवदेहात में खेतीबारी महंगी होती गई तो इस के साथसाथ हस्तशिल्प, कुटीर व लघु उद्योग भी उजड़ते गए.

नतीजतन, लोग बसों, रेलों में लद कर, ठुंसठुंसा कर शहरों की ओर भागने लगे. वहां रहने की समस्या आई तो जिस को जहां जगह मिली उस ने वहां अपना तंबू तान दिया. नेताओं को ऐसे लोग पकेपकाए वोट लगे तो पुलिस और दूसरे सरकारी विभागों को आमदनी का आसान जरीया.

नौकरशाही ने तिकड़में लड़ा कर ऐसे लोगों को सरकारी जमीनों पर झुग्गियों के रूप में बसा दिया, तो नेताओं ने उन्हें अपनी सरपरस्ती में बेखौफ रहने की इजाजत दे दी. अमीरों को सस्ते में नौकर, सब्जी वाले, प्रैस वाले, चौकीदार, साफसफाई करने वाले मिलने लगे तो उन्होंने भी ऐसी बस्तियों पर कभी नाकभौं नहीं सिकोड़ी.

लेकिन जब बेतरतीब बसी ऐसी सड़ांध मारती बस्तियों की बदबू आसपास के इलाकों में फैलने लगी, लोग बीमार होने लगे, अपराध बढ़ने लगे, आबोहवा खराब होने लगी तो ये गरीब शहर पर कोढ़ की तरह दिखने लगे.

धरती पर अगर नरक देखना हो तो गैरकानूनी तौर पर बसी ऐसी झुग्गी बस्तियों में आप का स्वागत है. यहां के ज्यादातर परिवार चूंकि छोटी जाति के होते हैं इसलिए उन के सपने भी झुग्गी की टुच्ची औकात के बन कर रह जाते हैं. मर्द रोजीरोटी के लिए खोमचा लगाते हैं, दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, कहीं किस्मत अच्छी हुई तो ठेकेदारी या ड्राइवरी कर लेते हैं. औरतें बड़े घरों में बरतन मांजने, साफसफाई का काम करती हैं तो बच्चे सरकारी स्कूल में इसलिए भेज दिए जाते हैं ताकि सारा दिन आवारागर्दी करने से बच जाएं.

दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में जी ब्लौक की झुग्गी बस्ती बहुत पुरानी है. यह एक नाले के आसपास बसी है, जिस में बदहाली का आलम अपनी हद पर है. पहले जो झुग्गियां तिरपाल या कच्ची छत की बनी थीं अब पक्के घरों में तबदील हो चुकी हैं. किसी भी गली में घुस जाओ, दड़बों से बेतरतीब बने छोटेछोटे घर आप को घूरते नजर आएंगे. कुछ ने तो 3-4 मंजिलें भी खड़ी कर दी?हैं.

वहां तकरीबन 30-35 साल से रह रही एक माई ने बताया, ‘‘हम जब यहां आए, तब 2-3 झुग्गियां थीं. नाले की जमीन थी, इसलिए सड़क से 6-7 फुट नीची थी. बरसात के मौसम में पानी भर जाता था. एक तरह से जंगल ही था. हमारे गांव में जमीन नहीं थी. खाने के लाले पड़ने लगे तो काम की तलाश में यहां आ गए. अब तो यही हमारा घर है.’’

यहां तकरीबन सभी लोगों के आधारकार्ड बन चुके?

हैं. घरों में बिजलीपानी के मीटर हैं पर सीवर नहीं डाले गए हैं. शौचालय की समस्या है. पास में ही एक सार्वजनिक शौचालय जरूर है, जहां एक आदमी की ड्यूटी भी लगती है. पर औरतों की समस्या यह है कि देर रात में वे अपने बच्चों खासकर लड़कियों को कैसे वहां शौच के लिए भेजें.

अंधेरा होने के बाद तो वहां नशेडि़यों का जमघट लग जाता है. शौचालय की देखभाल करने वाला आदमी अगर उन्हें जाने को कहता है तो वे लड़ाईझगड़े पर उतारू हो जाते हैं.

एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाले दीपक ने बताया, ‘‘इस झुग्गी बस्ती में सब से बड़ी समस्या सीवर की है. कुछ लोगों ने बड़े नाले में कनैक्शन करा कर अपना शौचालय बनवा लिया तो ठीक, नहीं तो बाहर सार्वजनिक शौचालय में जाना पड़ता है. अगर घर के नीचे गड्ढा खुदवा कर बनवाना चाहें तो बाद में सफाई कराने में दिक्कत आती है.

‘‘अगर सरकार इसी जमीन पर यहां रहने वाले लोगों को 12-12 गज के प्लाट किसी कालोनी की तरह काट कर दे दे तो यहां का नक्शा बदल सकता है. स्मार्ट शहर से पहले स्मार्ट झुग्गी बस्तियां बनाना जरूरी है.’’

सरकारी लोगों के रवैए से गुस्साई एक औरत सरला देवी ने बताया, ‘‘अगर हम अपनी समस्याएं ले कर सरकारी विभाग में जाते हैं तो वे कहते हैं कि यह हमारा काम नहीं है. पहला दूसरे के पास और दूसरा तीसरे के पास भेज देता?

है. नेता के नुमांइदे आते हैं, नाले की भी सफाई के फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर डाल कर वाहवाही बटोर लेते हैं, लेकिन गंदगी वहीं की वहीं रहती है.

‘‘हम औरतों ने अपनी मेहनत से कच्ची झुग्गियों को इन छोटेछोटे घरों में बदला है. अगर हमें यहां से हटा दिया गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. गांव में जमीन नहीं है. यहां छत नहीं है. हम गरीबों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है.’’

भारत सरकार के सर्वे 2011 के मुताबिक, दिल्ली की तकरीबन 15 फीसदी आबादी झुग्गी बस्तियों में रहती है. आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली में तकरीबन 7 सौ एकड़ एरिया में झुग्गियां हैं, जिन में 10 लाख के आसपास लोग रहते हैं. दिल्ली में तकरीबन 90 फीसदी झुग्गियां सरकारी जमीन पर बसी हैं, जिन में से 40 फीसदी दिल्ली नगरनिगम और लोक निर्माण विभाग, 28 फीसदी रेलवे और 16 फीसदी दिल्ली सरकार की जमीन पर कायम हैं.

इस तरह दिल्ली में तकरीबन 860 झुग्गी बस्तियां हैं. तकरीबन 1700 ऐसी कच्ची कालोनियां हैं जो हमेशा से सरकार की अनदेखी का शिकार रही हैं.

राजनीतिक दल इन लोगों की भलाई की तो छोडि़ए, इन के नाम पर अपनी सियासी रोटियां सेंकते हैं. भारतीय जनता पार्टी आरोप लगाती है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार केंद्र सरकार की योजनाओं का फायदा दिल्ली की पुनर्वास बस्तियों और झुग्गीझोंपड़ी में रहने वालों तक पहुंचने ही नहीं देती है.

इस पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार के अर्बन रिनुअल फंड से कई राज्यों के साथ ही नोएडा व गुड़गांव में भी झुग्गी बस्तियों में तरक्की के काम किए हैं या कराए जा रहे हैं, पर दिल्ली के झुग्गी वालों को इस फंड से कोई फायदा नहीं मिला है.

इस के उलट दिल्ली सरकार कहती है कि केंद्र सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल उसे कोई काम ही नहीं करने देते हैं. नगरनिगम पर विपक्ष

का कब्जा है जो उस के द्वारा किए जाने वाले काम खासकर गरीबों की भलाई के कामों में हमेशा अड़ंगा अड़ाता है.

ऐसे में जब कभी सुप्रीम कोर्ट अतिक्रमण को ले कर सख्त होता है तो आननफानन झुग्गी बस्तियों का वजूद मिटाने और वहां के बाशिंदों को कहीं दूसरी जगह बसाने की कवायद शुरू हो जाती है. लेकिन यह सब करना क्या आसान काम है?

यह एक कड़वी सचाई है कि दिल्ली में गैरकानूनी तरीके से बसाई गई झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों को खाली कराने और वहां के बाशिंदों को दोबारा कहीं ओर बसाने का तरीका बड़ा पेचीदा है. इस में तमाम तरह की प्रशासनिक चुनौतियां होती हैं.

2 बड़ी समस्याएं इस तरह हैं. पहली, एक नोडल एजेंसी होने के बावजूद ऐसी बस्तियों को दोबारा बसाने का काम विभिन्न सरकारी एजेंसियों के जिम्मे होता है, जिन के बीच तालमेल की कमी दिखाई देती है, जिस से इस सब में तमाम तरह की रुकावटें पैदा होती हैं. दूसरी, इस तरह की झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों में रहने वालों को अपने हकों का पता नहीं होता है. मसलन, हटाए गए लोगों में से किसकिस को दोबारा बसाया जाएगा? बस्ती खाली कराने का कानूनी तरीका क्या है? इन सब बातों की उन्हें जानकारी नहीं होती है.

सरकारी जमीन पर बसी झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों को वहां से हटाने और कहीं ओर बसाने की जिम्मेदारी दिल्ली नगरनिगम, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड, लोक निर्माण विभाग, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग जैसी सरकारी संस्थाओं पर होती है.

मान लीजिए सरकार को कोई सड़क चौड़ी करनी है और इस की जिम्मेदारी वह लोक निर्माण विभाग को सौंपती है. लेकिन वहीं पर एक ऐसी झुग्गीझोंपड़ी बस्ती है जिस का कुछ हिस्सा सड़क को चौड़ा करने में रुकावट पैदा कर रहा है तो लोक निर्माण विभाग उस हिस्से से अतिक्रमण हटाने के लिए क्या करेगा? क्या वह उन लोगों को कोई आधिकारिक नोटिस भेजेगा या किसी तरह का आदेश दिखाएगा या वहां जा कर इतना कह देगा कि हम यह हिस्सा ढहाने जा रहे हैं, आप अपना इंतजाम कर लो. अगर बस्ती वाले लोग समय मांगते हैं तो क्या उन्हें कानूनन समय दिया जाता?है या आपसी समझ से जगह खाली करने पर सहमति बन जाती है?

‘सैंटर फौर पौलिसी रिसर्च’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के आरके पुरम सैक्टर 7 इलाके में सोनिया गांधी कैंप झुग्गीझोंपड़ी बस्ती थी. 25 फरवरी, 2013 को लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने इस कैंप के बाशिंदों को बताया कि वे बस्ती का उत्तरपूर्वी हिस्सा ढहाने जा रहे?हैं.

लोगों को बताया गया कि बस्ती का यह हिस्सा लोक निर्माण विभाग की जमीन पर था और एक सड़क चौड़ी करने के लिए उन्हें उस की जरूरत थी.

हालांकि लोगों को न तो कोई आधिकारिक नोटिस और न ही किसी तरह का कोई आदेश दिखाया गया. जब इंजीनियरों ने कहा कि वे मकान ढहाने का काम फौरन शुरू करना चाहते हैं तो बस्ती के लोगों ने थोड़ा समय मांगा. इंजीनियर मान गए.

एक हफ्ते बाद यानी 6 मार्च, 2013 को इंजीनियर निर्माण ढहाने का काम शुरू करने के लिए कैंप पहुंचे. कुछ लोगों ने थोड़ा समय और मांगा तो 30 मार्च, 2013 तक साजोसामान हटाने वाली एक चिट्ठी पर उन के दस्तखत करा लिए गए. चिट्ठी में लिखा था कि अगर वे 30 मार्च तक ऐसा नहीं करेंगे तो लोक निर्माण विभाग उन के घरों को ढहा देगा.

यहां मामले में पेंच था कि बस्ती वालों के मुताबिक लोक निर्माण विभाग ने वह चिट्ठी खुद तैयार की थी और उन से दस्तखत करने को कहा था, जबकि विभाग के स्टाफ का दावा था कि बस्ती के लोग चिट्ठी तैयार करने में भागीदार थे.

बस्ती वालों ने यह भी बताया कि उन्होंने उस जमीन से, जिसे लोक निर्माण विभाग अपनी बता रहा था, 30 मार्च, 2013 तक अपना सामान हटा लिया था. पर न तो उस दिन लोक निर्माण विभाग की तरफ से झुग्गियां ढहाने के लिए कोई आया और न ही अप्रैल महीने के शुरुआती दिनों में ही कोई आया. लिहाजा, लोग अपनी झुग्गियों में वापस आ गए.

15 अप्रैल, 2013 को लोक निर्माण विभाग ने बिना कोई सूचना दिए तकरीबन 35 झुग्गियों को ढहा दिया. झुग्गियां तोड़े जाने के साथसाथ कैंप के बाशिंदों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शौचालयों में पानी की सप्लाई वाले पाइप हटा दिए गए. इस से शौचालय बेकार हो गए.

22 अप्रैल, 2013 को लोक निर्माण विभाग के 2 इंजीनियर आए और एक नई चौड़ी सड़क के लिए जमीन का सीमांकन कर गए. बस्ती वालों के कहने के बावजूद उन्हें सीमा दिखाने वाला कोई भी दस्तावेज या नक्शा नहीं दिखाया गया. तभी लोक निर्माण विभाग द्वारा किराए पर रखा हुआ एक प्राइवेट ठेकेदार कुछ मजदूरों और सामान के साथ वहां पहुंचा और उस ने तय की गई सीमा के साथसाथ एक दीवार बनानी शुरू कर दी. एक बुलडोजर और एक ट्रक में ढहाई हुई झुग्गियों का मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया.

इस तरह झुग्गियां ढहाने के मामले में लोक निर्माण विभाग, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और इलाके के विधायक की ओर से अलगअलग जवाब आए. लोक निर्माण विभाग के एक सीनियर इंजीनियर ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि उन के विभाग ने किसी झुग्गी को नहीं हटाया है, बल्कि सिर्फ ‘अतिक्रमण को हटाया’ है. उन्होंने आगे कहा कि विभाग की जमीन से अतिक्रमण हटाना उन का काम था.

जिस इंजीनियर की निगरानी में झुग्गियों को ढहाया गया था, वह इस बात पर कायम रहा कि उजड़े परिवारों को दोबारा बसाने में लोक निर्माण विभाग का कोई रोल नहीं है और इस की जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण या दिल्ली नगरनिगम की थी.

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के एक बड़े अफसर ने बताया कि अगर किसी सरकारी प्रोजैक्ट के लिए कोई बस्ती ढहाए जाने की जरूरत है तो जिस एजेंसी की जमीन पर वह बस्ती बसी है, उसे ऐसा कदम उठाने की ठोस वजह देनी पडे़गी. इस के साथ ही एजेंसी को बस्ती के बाशिंदों के रहने के लिए कोई औप्शनल इंतजाम करते हुए उन्हें दोबारा बसाना होगा.

लोक निर्माण विभाग के मुताबिक, ‘राइट औफ वे’ के आधार पर यह पूरी प्रक्रिया जायज थी. यह कदम मौजूदा सड़कों के अतिक्रमण हटाने की मंशा से उठाया गया था.

‘राइट औफ वे’ के नियमों के चलते झुग्गियों को हटाते वक्त वहां के लोगों और बाकी एजेंसियों को सूचित करना लोक निर्माण विभाग के लिए जरूरी नहीं था. अतिक्रमण हटाने के लिए विभाग को नोटिस देने की जरूरत नहीं, चाहे अतिक्रमण एक झुग्गी का हो या एक बंगले का. विभाग को सिर्फ इलाके के एसएचओ को पुलिस मुहैया कराने के लिए कहना पड़ता है, ताकि झुग्गियों को ढहाने के दौरान कोई हिंसा न भड़के.

इस के बाद विधायक ने लोगों की तोड़ी गई झुग्गियों की लिस्ट तैयार करने को कहा और लिस्ट के साथ अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज भी लगाने को कहा. कुछ दिन बाद कैंप से विस्थापित हुए लोगों ने ढहाई गई झुग्गियों का ब्योरा विधायक के दफ्तर जा कर जमा करा दिया. विधायक ने कहा कि किसी भी तरह की मदद मिलने में कुछ महीने का समय लग सकता है.

8 मई, 2013 को झुग्गी वाले विधायक के पास दोबारा पहुंचे. विधायक ने उन्हें आश्वासन दिया कि तोड़ी गई झुग्गियों के बदले उन्हें पुनर्वास नीति के तहत नरेला में फ्लैट दिए जाएंगे. 10 मई या 15 मई, 2013 को सोनिया गांधी कैंप में एक रजिस्ट्रेशन कैंप लगाया जाएगा जहां पर जिन लोगों की झुग्गियां तोड़ी गई हैं उन को ‘टाइम ऐलौटमैंट स्लिप’ दी जाएगी. लाभार्थी परिवार को फ्लैट लेने के लिए 72 हजार रुपए देने होंगे. फ्लैट हासिल करने के लिए तोड़ी गई झुग्गियों के मालिकों को अपने मतदान प्रमाणपत्र देने होंगे जो यह साबित कर सकें कि वे पिछले 8-10 सालों से सोनिया गांधी कैंप में रह रहे थे.

लेकिन बताई गई किसी तारीख पर कोई भी रजिस्ट्रेशन कैंप नहीं लगाया गया. झुग्गी वाले दोबारा विधायक की चौखट पर गए. विधायक ने बताया कि उन्होंने दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड से पूछा था कि जिन परिवारों की झुग्गियां तोड़ी गई हैं उन्हें पुनर्वास के तौर पर दूसरी जगह क्यों नहीं दी गई है?

विधायक के मुताबिक, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने जवाब में कहा था कि झुग्ग्यों को ढहाने का काम लोक निर्माण विभाग द्वारा किया गया और जिस के बारे में उस विभाग ने उन्हें कोई सूचना नहीं दी. इसी के चलते दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने प्रभावित परिवारों के लिए कोई पुनर्वास योजना तैयार नहीं की.

जब एक झुग्गीझोंपड़ी बस्ती की केवल 35 तोड़ी गई झुग्गियों को दोबारा बसाने में इतना झमेला था, तो सोचिए कि पूरी दिल्ली की ऐसी बस्तियों में रहने वाले लोगों को कहीं दूसरी जगह बसाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे.

सुप्रीम कोर्ट दिल्ली को खूबसूरत बनाना चाहता है, सड़कें साफसुथरी देखना चाहता है, वह सरकार को चेतावनी देते हुए यह भी कहता है कि दिल्ली के आम लोग मवेशी नहीं हैं पर दिल्ली की जो एकतिहाई जनता कब्जाई गई कालोनियों या झुग्गी बस्तियों में रहती है, क्या उसे एक झटके में दिल्ली से बाहर फेंक दिया जाए?

लोग अपना घरबार छोड़ कर शहरों में मस्ती मारने नहीं आते हैं. वहां उन्हें रोजगार नहीं मिलता इसलिए उन्हें कंक्रीट के जंगल में बंधुआ मजदूर बनना भी मंजूर होता है, ताकि उन के परिवार का पेट पल सके. शहर में जहां वे अपना छोटा सा आशियाना बसाते?हैं वहां उन्हें रोजमर्रा की चीजों की जरूरत होती है, सस्ती चीजों की, इसलिए शहरों में यह अतिक्रमण दिखाई देता है. गैरकानूनी बस्तियां बस रही?हैं, सरकार की नाक के नीचे. सड़कों पर ठेले वालों का मजमा लगता है, ताकि दूसरे गरीब भी अपनी जरूरतों का सामान कम दाम पर खरीद सकें, कम पैसों में वे अपने पेट की आग बुझा सकें.

ऐसे लाखों लोगों को शहर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए बलि का बकरा बनाना कहां की अक्लमंदी है, जबकि इस देश में किसी को कहीं भी रहनेबसने का बुनियादी हक मिला हुआ है. क्या ऐसे लोगों की कीमत उस गमले से भी गईगुजरी है जो शहर की शान बढ़ाने के लिए सड़क किनारे फुटपाथ की शोभा बढ़ाता है.

अंधविश्वास : सेंदरा यानि जान लेनेदेने का खूनी पर्व

कई आदिवासी मर्द अपनेअपने धनुष को घुमाफिरा कर देख रहे थे. उस की प्रत्यंचा की जांचपड़ताल कर रहे थे. वे तीरों के नुकीलेपन को मापते दिख रहे थे.

कुछ आदिवासी अपने तीरों को और नुकीला और मारक बनाने के लिए उन्हें पत्थरों पर घिस रहे थे. कोई तीरों के किनारों पर बेहोशी की दवा लगा रहा है.

मर्दों की इस गहमागहमी के बीच उन की बीवियां खामोशी के साथ उन्हें टुकुरटुकुर देख रही थीं. हर आदिवासी औरत की आंखें आंसुओं से तर थीं. वे अपने शौहरों को रोकना चाहती थीं, पर परंपराओं और अंधविश्वास की जंजीरें उन्हें ऐसा नहीं करने दे रही थीं. उन्हें पता था कि सेंदरा पर्व के लिए निकलने वाले मर्दों की टोली में से कई मर्द जिंदा लौट कर घर नहीं आएंगे.

जिन के शौहर जिंदा वापस नहीं आ सकेंगे, उन औरतों को अपनी मांग का सिंदूर पोंछना पड़ेगा, चूडि़यां तोड़नी पड़ेंगी. किसी अनहोनी के डर से आदिवासी औरतों ने कंघी करना छोड़ रखा था. वे सादा खाना बना रही थीं.

झारखंड की राजधानी रांची से तकरीबन 130 किलोमीटर दूर बसे जमशेदपुर के दलमा जंगल में हर साल आदिवासी सेंदरा पर्व मनाते हैं. इस पर्व के बहाने मासूम जानवरों को मारने का खूनी खेल खेला जाता है.

सेंदरा पर्व में आदिवासी दलमा की वनदेवी की पूजा करते हैं. वे मानते हैं कि जानवरों को मारने से वनदेवी खुश होती हैं और बारिश भी अच्छी होती है.

पहले केवल खतरनाक जानवरों का ही शिकार किया जाता था. इस के पीछे यह माना जाता था कि खतरनाक जानवरों को मार कर आदिवासी अपनी हिफाजत करते हैं, पर धीरेधीरे इस पर्व पर अंधविश्वास ने अपना कब्जा जमा लिया. आज आदिवासी खरगोश और मोर को मारने से भी हिचकते नहीं हैं.

जमशेदपुर शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर दलमा का घना जंगल है. वहां तकरीबन 125 गांवों में तकरीबन 6000 आदिवासी रहते हैं. सेंदरा उन का खास पर्व है. वे पूरे साल इस पर्व की तैयारी करते रहते हैं.

हर गांव से आदिवासी टोलियां बना कर जंगली जानवरों का शिकार करने निकलते हैं. खरगोश, हिरण, मोर वगैरह का शिकार तो वे आसानी से कर लेते हैं, पर मरनेमारने के हालात तब पैदा होते हैं, जब उन का सामना खतरनाक जंगली सूअरों से होता है.

society

जान लेने और देने के इस खेल में हमेशा तीरधनुष और भालों से लैस आदिवासी कामयाब नहीं होते हैं. कई बार जंगली सूअर आदिवासियों की टोली पर भारी पड़ते हैं और जिस से कई आदिवासियों की जान चली जाती है.

2 दिनों तक चलने वाले इस खूनी खेल के बाद जो आदिवासी जिंदा लौट कर घर आ जाते हैं, उन का स्वागत किसी योद्धा की तरह किया जाता है. ढोल, मृदंग वगैहर बजते हैं. उन की बीवियां उन के माथे पर टीका लगाती हैं, आरती उतारती हैं.

जिस औरत का शौहर जिंदा नहीं लौट पाता है, उन के घर में मातम छा जाता है. एक ही गांव में जहां कई घरों में जीत की खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं कई घरों में रोने, चिल्लाने और तड़पने का नजारा देखने को मिलता है. इस के बाद भी आदिवासी इस खतरनाक और जानलेवा खेल को परंपरा की दुहाई दे कर खेल रहे हैं.

इस साल 23 अप्रैल, 2018 को सेंदरा पर्व मनाया गया. झारखंड सरकार ने इस बार सेंदरा पर्व पर रोक लगाने का ऐलान कर रखा था, इस के बाद भी हजारों आदिवासी सेंदरा के लिए निकल पड़े थे.

सेंदरा पर रोक लगाने के लिए सैकड़ों पुलिस और वन महकमे के मुलाजिमों की तैनाती की गई थी. इस के बाद भी सरकार सेंदरा पर्व पर रोक लगा पाने में नाकाम रही क्योंकि बीहड़ जंगलों के अंदर तक पहुंच पाना सरकारी मुलाजिमों के लिए आसान नहीं था. आदिवासियों ने पुलिस को ठेंगा दिखाते हुए सेंदरा पर्व को अंजाम दे डाला.

जमशेदपुर प्रशासन ने सेंदरा पर्व पर रोक लगाने के लिए 15 जगहों पर चैकपोस्ट बनाई थीं और जानवरों को मारने वालों को वन प्राणी हत्या अधिनियम के तहत 12 साल की जेल और 25000 रुपए जुर्माने का ऐलान किया था, पर आदिवासियों ने प्रशासन को चकमा दे डाला.

अंधविश्वास में डूबे आदिवासियों का मानना है कि जानवरों के शिकार के बगैर सेंदरा पर्व का कोई मतलब नहीं है. इस में आदिवासियों की जान जाने के सवाल पर वे कहते हैं कि जंगल में तो आदिवासी हर पल खतरों से खेलते और उन से लड़ते हैं. आदिवासी जान की परवाह नहीं करते हैं.

दलमा बुरू सेंदरा समिति के राकेश हेम्ब्रम तैश में आ कर कहते हैं कि सेंदरा पर्व पर सख्ती से रोक लगाने का मतलब आदिवासियों और उन की परंपरा पर सीधा हमला है. सेंदरा पर्व पर लगी रोक को किसी भी तरह से कामयाब नहीं होने दिया जाएगा.

सेंदरा पर्व के मसले पर आदिवासी समाज 2 हिस्सों में बंटा दिखने लगा है. कुछ पढ़ेलिखे आदिवासी पोंगापंथ में डूबे इस खतरनाक और खूनी पर्व के विरोध में आवाजें उठाने लगे हैं.

सांसद रह चुके सालखन मुर्मू ने सेंदरा पर्व की आड़ में जानवरों को मारने के खिलाफ झंडा उठा लिया है. इस से उन्हें आदिवासियों के गुस्से का भी सामना करना पड़ रहा है.

सालखन मुर्मू सेंदरा पर्व के नाम पर जानवरों को मारने की परंपरा को सती प्रथा और बाल विवाह से भी खतरनाक करार देते हुए कहते हैं कि किसी पर्व या पूजा के नाम पर मासूम जानवरों को मारना ठीक नहीं है. इस के बहाने कुछ आदिवासी अपना उल्लू सीधा करते हैं और जंगली जानवरों की खाल और सींगों को बेचने के गैरकानूनी कारोबार में लगे हुए हैं. सरकार को इस परंपरा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की दरकार है.

एसएसपी की घूसलीला

कमाई की कुल रकम 80 लाख रुपए और नकदीगहने साढ़े  4 करोड़ रुपए से ज्यादा के. यह है आईपीएस और बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सीनियर सुपरिंटैंडैंट पुलिस विवेक कुमार की काली कमाई का आंकड़ा. इतने की तो नकदी, फिक्स्ड डिपौजिट और गहने मिले हैं.

आमदनी से ज्यादा धनदौलत होने के मामले में छापामारी के बाद एसएसपी विवेक कुमार को सस्पैंड कर दिया गया है. उन पर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत विशेष निगरानी इकाई ने केस दर्ज किया है.

एसएसपी विवेक कुमार के ठिकानों पर छापामारी के बाद 4 करोड़, 35 लाख रुपए की चल संपत्ति का पता चला है. मुजफ्फरपुर के विजया बैंक के 2 लौकरों से 35 लाख, 97 हजार, 5 सौ रुपए नकद, 10 लाख, 75 हजार रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात और 9 लाख, 61 हजार रुपए के गहने बरामद किए गए.

मुजफ्फरपुर के यूको बैंक के 3 लौकरों से 18 लाख रुपए नकद, एक करोड़, 85 लाख रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात और 31 लाख, 75 हजार रुपए के गहने मिले. ओवरसीज बैंक के 2 लौकरों में 75 लाख, 49 हजार, 5 सौ रुपए नकद पाए गए.

केनरा बैंक के एक लौकर से 29 लाख, 38 हजार रुपए नकद बरामद किए गए. बैंक औफ बड़ौदा के एक लौकर से 480 ग्राम सोना, 570 ग्राम चांदी के गहने और विदेशी करंसी मिली.

एसएसपी विवेक कुमार के ठिकानों के बाद जब स्पैशल विजिलैंस यूनिट की टीम ने उन की ससुराल में छापा मारा वहां बैंक लौकर की 6 चाबियां मिलीं.

इस के साथ ही ससुर वेदप्रकाश कर्णवाल, सास उमा रानी और साले निखिल कर्णवाल के साथ विवेक कुमार द्वारा सौ से ज्यादा बार नकदी निकालने व जमा किए जाने का पता चला. विवेक कुमार इन लोगों के खातों में रकम जमा कर के निकाल लेते थे.

एसएसपी विवेक कुमार के खिलाफ आमदनी से ज्यादा संपत्ति होने के मामले में 22 पन्ने की एफआईआर दर्ज की गई. उन के ऊपर आमदनी से 30 गुना ज्यादा दौलत होने का खुलासा हुआ है.

एसएसपी विवेक कुमार और उन की पत्नी निधि कुमारी के पास तकरीबन एक करोड़, 6 लाख रुपए की दौलत होने और तकरीबन एक करोड़, 27 लाख रुपए के गैरकानूनी लेनदेन होने का पता चला है.

15 अप्रैल, 2018 को साल 2007 बैच के आईपीएस और मुजफ्फरपुर के एसएसपी विवेक कुमार के सरकारी आवास, दफ्तर, ससुराल और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के वरुण विहार महल्ले के घर समेत कुल 4 ठिकानों पर छापामारी की गई थी.

मुजफ्फरपुर के सरकारी आवास से 6 लाख, 25 हजार रुपए नकद, साढ़े 5 लाख रुपए के गहने, 45 हजार के पुराने नोट समेत जायदाद से जुड़े कई दस्तावेज मिले थे, जबकि ससुराल में तकरीबन 2 करोड़ रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात मिले. उन में से 22 लाख, 74 हजार रुपए के 23 फिक्स्ड डिपौजिट विवेक कुमार की पत्नी निधि कुमारी के नाम से हैं.

crime

विवेक कुमार की अब तक की आमदनी 80 लाख रुपए है, जिस में से 46 लाख, 48 हजार रुपए का खर्च दिखाया गया है.

इस हिसाब से विवेक कुमार की बचत 33 लाख, 31 हजार रुपए होती है, जबकि उन्होेंने बचत की रकम में एक करोड़, 6 लाख रुपए दिखाए हैं.

विवेक कुमार की सास उमा रानी और निधि कुमारी के नाम से 3 लाख रुपए के जौइंट फिक्स्ड डिपौजिट मिले हैं. विवेक कुमार के ससुर और सास के नाम से 46 लाख, 70 हजार रुपए के 29 फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात मिले हैं. ससुर वेदप्रकाश के नाम से 14 लाख रुपए के 5 फिक्स्ड डिपौजिट हैं.

वेदप्रकाश और साले निखिल कर्णवाल के नाम से 35 लाख, 18 हजार रुपए के 27 फिक्स्ड डिपौजिट मिले हैं. निखिल कर्णवाल के नाम से डेढ़ लाख रुपए के फिक्स्ड डिपौजिट हैं.

विवेक कुमार ने अपने साले की पत्नी के नाम से भी 45 लाख रुपए के 2 फिक्स्ड डिपौजिट करवा रखे थे.

विवेक कुमार के ससुर रिटायर्ड सरकारी अफसर हैं और उन्हें महज 23 हजार रुपए बतौर पैंशन मिलती है और उन की सास हाउसवाइफ हैं. इस के बाद भी उन के नाम पर एक करोड़, 6 लाख रुपए निधि के फिक्स्ड डिपौजिट के कागजात मिले.

एसएसपी विवेक कुमार ने अपनी बीवी के नाम पर किए गए 5 फिक्स्ड डिपौजिट को ससुर से मिले गिफ्ट के तौर पर दिखाया गया. उसी दिन उतनी ही रकम सासससुर के अकाउंट में भी डाल दी.

एसएसपी विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपनी संपत्ति का ऐलान करते हुए सरकार को यह जानकारी दी थी कि उन के और उन की पत्नी के पास 7 लाख रुपए के गहने हैं, लेकिन छापामारी में 60 लाख रुपए के गहने मिले.

सरकार को दी गई जानकारी में उन्होंने अपने पास 5 हजार रुपए और पत्नी के पास 36 हजार रुपए नकद होने की बात कही थी, पर छापा पड़ा तो पौने 2 करोड़ रुपए नकद मिले.

इस के अलावा 1685 कनाडाई डौलर, 498 अमेरिकी डौलर और 1468 मलेशियाई करंसी भी छापामारी में विवेक कुमार के घर से मिली.

विवेक कुमार की शराब माफिया से भी सांठगांठ के सुराग मिले हैं. निगरानी सूत्रों के मुताबिक, मुजफ्फरपुर के मारीपुर इलाके के एक होटल में एसएसपी विवेक कुमार के साथ शराब माफिया की मीटिंग भी हुई थी.

उस मीटिंग में बिहार के 4 शराब माफिया के अलावा हरियाणा के भी एक शराब कारोबारी ने हिस्सा लिया था.

उस मीटिंग के बाद जिले के 6 ऐसे थानेदारों को हटा दिया गया था जो शराबबंदी के लिए मुस्तैदी से काम कर रहे थे. उन थानों में एसएसपी विवेक कुमार ने अपने वफादारों को तैनात कर दिया था.

पुलिस हैडर्क्वाटर के सूत्रों के मुताबिक एसएसपी विवेक कुमार की पोस्टिंग जहां भी रही वहां वे विवादों में रहे. भागलपुर जिले में वे 28 जून, 2014 से ले कर 8 अप्रैल, 2016 तक एसएसपी रहे. वहां के थानेदारों की पोस्टिंग के मामले में वे कई बार विवादों में घिरे थे. जगदीशपुर थाने के थानेदार ने आईजी से विवेक कुमार की शिकायत की थी.

जगदीशपुर थाना बालू की गैरकानूनी खान से होने वाली कमाई के लिए बदनाम है. थानेदार ने एसएसपी विवेक कुमार पर बालू माफिया से संबंध होने का आरोप लगाया था.

इश्क के मामले में एक लड़की पर ही बाप की हत्या का आरोप लगाने के मामले में विवेक कुमार की जम कर किरकिरी हुई थी.

कोर्ट ने जब एसएसपी विवेक कुमार से पूछा कि केस डायरी में क्या कोई सुबूत है, जिस के आधार पर लड़की को बाप का कातिल बताया गया है, तो विवेक कुमार सही से जवाब नहीं दे सके थे.

दारोगा की खुदकुशी में विवेक का हाथ?

मुजफ्फरपुर जिले के कांटी थाना क्षेत्र के पानपुर करियात ओपी में तैनात दारोगा संजय कुमार गौड़ की मौत के बाद उन की पत्नी ने 3 जुलाई, 2017 को दरौली थाने में एसएसपी विवेक कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए अर्जी दी थी. उस अर्जी में एसएसपी पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे.

दारोगा की पत्नी कल्याणी देवी दरौली थाना के मुड़ा कर्मवी गांव की रहने वाली हैं. उन्होंने कहा कि उन के पति खुदकुशी नहीं कर सकते हैं. उन की हत्या की गई है. पति इस बात से काफी परेशान थे कि एसएसपी ने उन से थानेदार बनाने के लिए 10 लाख रुपए मांगे थे, जिस के बाद साढ़े 6 लाख रुपए दिए गए. साढ़े 3 लाख रुपए बाद में देने के लिए कहा था.

साढ़े 6 लाख रुपए ले कर उन की पोस्टिंग थानेदार के तौर पर कर दी गई, पर तुरंत ही बकाया साढ़े 3 लाख रुपए देने का दबाव बनाने लगे. जब उन के पति ने बकाया रकम नहीं दी तो एक दिन बाद ही उन्हें थानेदार के पद से हटा दिया गया था. इस मामले में उस समय एसएसपी विवेक कुमार ने सफाई दी थी कि थानेदारी के लिए रुपए मांगने और सताने का आरोप झूठा है.

दारोगा संजय कुमार गौड़ की खुदकुशी के मामले की जांच का जिम्मा सीआईडी को सौंपा गया था. संजय कुमार ने 2 जुलाई, 2017 को खुदकुशी कर ली थी. पानपुर करियात ओपी में तैनात दारोगा मोहम्मद हारून की सर्विस रिवाल्वर से उन के ही कमरे में संजय ने अपने सिर में गोली मार ली थी. इस घटना के पिछले 5 महीने से उन की तनख्वाह रोक कर रखी गई थी.

साल 2009 बैच के दारोगा संजय कुमार गौड़ मुजफ्फरपुर से पहले वैशाली जिले में तैनात थे. एक दिन के लिए उन्हें गायघाट थाने का प्रभारी बनाया गया था.

बिहार पुलिस एसोसिएशन ने एडीजी हैडर्क्वाटर एसके सिंघल से मिल कर मुजफ्फरपुर के एसएसपी विवेक कुमार को हटाने की मांग की थी. एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह और महामंत्री दीनबंधु राम कहते हैं कि एसपी और एसएसपी अकसर दारोगा, जमादार और सिपाहियों को सताते रहते हैं. छुट्टी तक नहीं देते हैं. ठीक से बरताव नहीं करते हैं. 5 महीने तक तनख्वाह नहीं मिलने पर परिवार की क्या हालत हो सकती है, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है.

पुलिस अफसरों से तंग आ कर पिछले कुछ महीनों में जमुई, आरा, नवादा, बक्सर जिलों के दारोगा खुदकुशी कर चुके हैं.

संजय कुमार गौड़ सिवान जिले के दरौली थाने के मुड़ा कर्मवीर गांव के रहने वाले थे. उन के पिता का नाम काशीनाथ गौड़ है.

नरेंद्र मोदी, उज्ज्वला योजना, चिमटा और सिलैंडर

मशहूर कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की एक मार्मिक कहानी ‘ईदगाह’ का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रहस्योद्घाटन किया कि उन्हें उज्ज्वला योजना की प्रेरणा इस कहानी से मिली जिस में एक बच्चा हामिद मेले से मिठाई के बजाय चिमटा खरीद कर ले जाता है जिस से उस की दादी के हाथ रोटी बनाते वक्त न जलें.

प्रेरणा वह भी साहित्य से लेना बुरी बात नहीं है लेकिन इस में पारदर्शिता का होना जरूरी है. नरेंद्र मोदी ने अपने इंगलैंड प्रवास के दौरान भी उज्ज्वला का जिक्र किया था लेकिन उस वक्त वे हामिद प्रसंग को भूल गए थे. चूल्हे पर रोटी सेंकती मांबहनों की गरीबी उन्हें याद रही थी. खुद अपनी पूर्व गरीबी का रोना भी उन्होंने बदस्तूर रोया था.

गरीबी भले ही, बकौल राहुल गांधी, एक मानसिक अवस्था हो पर प्रेरणा का चलायमान होना अच्छी बात नहीं. अच्छा तो यह रहा कि नोटबंदी जैसा घातक प्रयोग कर चुके नरेंद्र मोदी ने मांओं के हाथ जलने से बचाने के लिए फायरप्रूफ दास्तानों की बात नहीं की.

निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों में नौकरी के अवसर

विपक्षी दल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर 2 करोड़ नौकरियां हर साल देने के वादे से मुकरने का आरोप लगा कर जम कर हमला कर रहे हैं. विपक्ष के इस हमले से बचने के लिए मोदी सरकार ने निजी कंपनियों से इस काम में मदद करने को कहा है. इस संबंध में हाल ही में एक सर्वेक्षण आया है जिस में कहा गया है कि 4 कंपनियां अपने कामगारों की संख्या बढ़ा सकती हैं. 42 प्रतिशत कंपनियों ने कहा है उन का प्रबंधन जल्द ही 15 प्रतिशत कर्मचारियों की भरती करेगा. इस से बडे़ स्तर पर युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे.

अच्छी बात यह है कि इन कंपनियों में एअरटेल, मारुति सुजुकी, ग्लैक्सो जैसी करीब 1,000 कंपनियां हैं. इन कंपनियों ने कहा है कि भरती में 5 वर्ष तक के अनुभव वाले युवाओं को अवसर मिलेगा.

सर्वेक्षण में कहा गया है कि इस में 881 बड़ी कंपनियों को शामिल किया गया है. इस प्रक्रिया में सभी क्षेत्रों में भरती होगी और न्यूनतम एक साल के अनुभव को भी महत्त्व दिया जाएगा.

इन कंपनियों ने यह भरती प्रक्रिया चुनावी साल में शुरू की है. अगले साल मई में केंद्र में नई सरकार होगी यानी 6-7 माह बाद चुनावी माहौल में तेजी आनी शुरू हो जाएगी. नौकरियों के सवाल पर घिर रही केंद्र सरकार को इस से जरूर फायदा मिलेगा और इस मुद्दे पर उस की आलोचना करने वालों को सीधे हमले करने के अवसर कम मिलेंगे.

बहरहाल, राजनीति कुछ भी हो लेकिन इस का सीधा लाभ युवाओं को मिलेगा, यही अच्छी बात है.

सैक्स फीलिंग्स के ये 5 सीक्रेट्स दिलाएंगे असली आनंद

ज्यादातर महिलाएं चाहती हैं कि उन के कुछ सैक्स सीक्रेट्स उन के पतियों को खुद जानने चाहिए. नौर्थवैस्टर्न यूनिवर्सिटी इलिनौयस की सैक्सुअलिटी प्रोग्राम की थेरैपिस्ट पामेला श्रौक कहती हैं कि ज्यादातर विवाहित पुरुष अपनी पत्नी की सैक्सुअल प्राथमिकताओं और चाहतों को नहीं समझते. पामेला ने इस विषय पर पत्नियों के मन में झांकने की कोशिश की तो उन्हें

कुछ ऐसे सैक्स सीक्रेट्स का पता चला, जिन्हें महिलाएं अपने पति से कहना तो चाहतीं, पर कह नहीं पातीं.

महिलाओं के लिए अच्छा सैक्स सिर्फ इंटरकोर्स नहीं: महिलाओं को आनंददायक सैक्स के लिए सिर्फ इंटरकोर्स ही नहीं, बल्कि पति के साथ दिन के अन्य क्षणों में भी अच्छी फीलिंग्स और अनुभव की जरूरत होती है. महिलाओं को यह बात कतई अच्छी नहीं लगती कि पति दिन भर सिर्फ अपने ही काम में व्यस्त रहे, रात को घर लौट कर खाना खा देर तक टीवी देख कर फिर बिस्तर पर आते ही पत्नी को दबोच ले. इस से पत्नी के मन में खुद को औब्जैक्ट समझने की भावना आती है. वह अपने पति को बेहद स्वार्थी और खुद को भोग की वस्तु समझने लगती है.

हर पत्नी चाहती है कि उस का पति उसे सिर्फ बिस्तर पर ही नहीं बिस्तर के बाहर भी उतना ही प्यार करे, उस पर ध्यान दे, उस के साथ अपनी बातें शेयर करे, प्रेमपूर्वक बातें करे, उस की भावनाओं को जानने की कोशिश करे आदि.

समाजशास्त्री डालिया चक्रवर्ती कहती हैं, ‘‘पत्नियां अपनी जिंदगी के हर पहलू को एकदूसरे से जोड़ कर देखती हैं जबकि पति समझते हैं कि स्ट्रैस और झगड़ों को सैक्स के वक्त एक तरफ रख देना चाहिए और इन चीजों को सैक्स के साथ नहीं जोड़ना चाहिए. सच यह है कि सैक्स का असली मजा अफैक्शन के कारण ही आता है. मानसिक रूप से अपनापन, प्यार और नजदीकियां होती हैं तभी सैक्स संबंध सही माने में उत्तेजनापूर्ण होता है.

जब कोई पति अपनी पत्नी को समयसमय पर छोटेमोटे उपहार देता है, बीवीबच्चों को घर से बाहर ले जाता है, परिवार का खयाल रखता है और बीवी को स्पैशल फील करवा कर घर का माहौल खुशनुमा रखता है, तो सैक्स का मजा कई गुना बढ़ जाता है.

महिलाओं को टर्नऔन करने के लिए प्रेम पगी बातें चाहिए: रात के भोजन के वक्त मीठीमीठी छेड़छाड़, रोमांटिक बातें और गुदगुदाने वाले किस्से पत्नियों को भीतर तक भिगो देते हैं. इस से उन का मूड बन जाता है. इसी तरह सैक्स के दौरान पत्नी की प्रशंसा, उस के साथ प्यार का इजहार और उस का नाम लेना पत्नी को उत्तेजना से भर देता है.

सैक्स थेरैपिस्ट लिन एटवाटर कहती हैं, ‘‘महिलाओं की शारीरिक संबंधों से ज्यादा दिलचस्पी मानसिक उत्तेजना और मानसिक संबंधों में होती है.’’

यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया मैडिकल स्कूल की साइकोलौजिस्ट लोनी बारबच कहती हैं, ‘‘अकसर घरेलू कामों, बच्चों की देखभाल, पति के हजार काम और फिर औफिस वर्क के दबाव के बीच किसी पत्नी को सब से ज्यादा जरूरत सहानुभूति और प्रेमपूर्ण बातों की होती है. उसे शरीर सहलाने से जितना मजा आता है उस से कहीं ज्यादा उस का मन सहलाने से आनंद मिलता है. हर पत्नी चाहती है कि उस का पति उस के साथ रोमांटिक बातें करे.’’

महिलाओं में भी होती है परफौर्मैंस ऐंग्जाइटी: कई अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है कि सिर्फ 60% ऐसी पत्नियां हैं, जिन्होंने जितनी बार संभोग किया उस से कम से कम आधी बार चरम आनंद का अनुभव किया. लेकिन उन्हें पति को खुश करने के लिए सैक्स के दौरान चरम आनंद का दिखावा करना पड़ा. कई बार तो उन के मन में अपराधबोध आ जाता है कि कहीं उन्हीं में तो कोई कमी नहीं.

पत्नियों में भी अपने अंगों की बनावट, आकार और साफसफाई को ले कर तुलनात्मक हीनता की भावना होती है. इसीलिए वे अंधेरे में ही निर्वस्त्र होना चाहती हैं. ऐसे में वे अपने पति से प्रोत्साहन, अपने शारीरिक अंगों की प्रशंसा और सौंदर्य के बखान की अपेक्षा रखती हैं.

कई पति तो अपनी पत्नी की प्रशंसा करना ही नहीं जानते और कई सैक्स के दौरान उस के अंगों में भी मीनमेख निकालने लगते हैं. पत्नी को मोटी, थुलथुल आदि न जाने क्याक्या कहने लगते हैं. ऐसे में पत्नी के मन का बुझ जाना, उस का तनावग्रस्त हो जाना स्वाभाविक है. ऐसी पत्नी अपने पति के साथ सैक्स संबंध बनाने से कतराने लगती है.

जाहिर है, इन का यौन जीवन नीरस और आनंदविहीन हो जाता है. झूठी बढ़ाई की जरूरत नहीं, लेकिन समझदार पति वही है जो अपनी पत्नी की त्वचा की कोमलता, आंखों या उस का जो कुछ भी अच्छा लगे उस की सराहना कर के पत्नी का आत्मविश्वास बढ़ाए और हंसीठिठोली करे ताकि पत्नी ऐंग्जाइटी से ग्रस्त न हो.

सैक्स के बाद भी चाहिए अटैंशन: कई पति पत्नी के साथ अंतरंग क्षणों का जम कर आनंद उठाते हैं और फिर चरम पर पहुंच कर स्खलित होते ही ऐसे मुंह फेर कर सो जाते हैं जैसे उन्हें पत्नी से कोई लेनादेना ही नहीं. ऐसे में पत्नी खुद को बेहद अकेली, उपेक्षित समझने लगती है. उसे लगता है कि बस पति का यही अंतिम उद्देश्य था. पत्नी चाहती है कि सैक्स और स्खलन के बाद भी पति उसे सहलाए, चूमे उस के अंगों को छेड़े. साथ ही उसे धन्यवाद दे व प्यार जताए. ऐसा करतेकरते ही पत्नी को बांहों में भरे हुए उसे नींद आ जाए. इस से पत्नी को बड़ा आत्मसंतोष महसूस होता है.

नौनसैक्सुअल टच: पत्नियों को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगती है कि दिन भर में पति उन्हें एक बार भी न छुए या चूमे.

बस बिस्तर पर फोरप्ले के लिए ही उन के हाथ बढ़ते हैं. वे चाहती हैं कि दिन में भी पति उन्हें छूएं, लेकिन यह टच नौनसैक्सुअल हो. वे छेड़छाड़ या हंसीमजाक के लिए अथवा

अपनापन जताने के लिए छूएं. कभी बालों को सहलाएं या पीठ पर हाथ फेरें, गालों को चूमें, गालों को थपथपाएं.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि पति और पत्नी के संबंध सिर्फ और सिर्फ सैक्स के लिए ही नहीं होने चाहिए. सैक्स के अलावा भी दुनिया में और बहुत कुछ ऐंजौय करने को होता है. संबंधों में प्रगाढ़ता और केयरिंग होना ज्यादा जरूरी है. पत्नी की कुकिंग को सराहते हुए उस के हाथों को चूम लेना, उस की ड्रैसिंग सैंस की प्रशंसा करना, बात करने के तरीके को सराहना आदि उस के मन को गहराई तक छू लेता है. रिश्तों में मजबूती के लिए यह बेहद जरूरी है. पत्नी को जताएं कि आप उसे सिर्फ सैक्स के लिए ही नहीं चाहते.

कोचिंग का गोरखधंधा

5 जून के समाचारपत्र बड़ेबड़े विज्ञापनों से भरे थे जिन में युवा चेहरे झांक रहे थे. ये विज्ञापन कोचिंग इंस्टिट्यूट्स के थे जिन के छात्रों ने नीट की परीक्षा में अच्छे रैंक्स पाए हैं. जाहिर है इन विज्ञापनों का पैसा उसी फीस से आया जो इन छात्रों ने इन कोचिंग इंस्टिट्यूट्स को दी थी.

12 लाख से ज्यादा छात्रछात्राएं नीट की परीक्षा में शामिल हुए. उन्होंने निजी तौर पर लाखों नहीं, हजारों तो कोचिंग क्लासों पर खर्च किए ही होंगे. फिर उन्होंने हजारों रुपए एक्जामिनेशन सैंटर में जाने या वहां रहने पर खर्च किए होंगे. मातापिता ने उन पर जीभर कर पैसा लुटाया होगा ताकि वे 66 हजार सीटों में से कोई एक पा सकें और डाक्टरी की पढ़ाई शुरू कर सकें.

12वीं की परीक्षा के बाद मैडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए एक नीट की परीक्षा थोप दी गई है. इंजीनियरिंग में भी इसी तरह की एक अतिरिक्त परीक्षा है. कई जगह दाखिलों में इस तरह की प्रवेश परीक्षाएं हैं ताकि अलगअलग बोर्डों के मार्क्स का संतुलन बैठाया जा सके और सभी विद्यार्थियों को एक पैमाने पर तोला जा सके.

यह असल में, शिक्षा उद्योग को बढ़ावा देने की साजिश है. इन परीक्षाओं के लिए कोई अतिरिक्त पढ़ाई नहीं होती. जो होती है वह कोचिंग इंस्टिट्यूट्स में होती है. प्रश्नपत्र इतने कठिन बनाए जा रहे हैं कि स्टूडैंट्स को कोचिंग क्लासों में जबरन जाना पड़े. 12वीं तक की कक्षाओं में जो सीखा, उस का इस तरह की परीक्षाओं से लेनादेना नहीं होता. योग्यता या मैरिट परखने के नाम पर कोचिंग उद्योग को पनपा दिया गया है और देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह कोचिंग सैंटर उग आए हैं. ये लौबी बना कर सरकार पर दबाव डालते हैं कि ऐसे टेढ़ेसीधे नियम बनें कि कोचिंग क्लासें जरूरी हो जाएं. ये कोचिंग संस्थान लाखों रुपए रिश्वत दे कर पेपर भी खरीदते हैं जो कई बार लीक होने पर हंगामा मचवा देता है.

अच्छी पढ़ाई आज इतनी महंगी कर दी गई है कि इस से मातापिता का पैसा और युवाओं के कीमती साल बरबाद हो रहे हैं. यह धंधा नहीं, गोरखधंधा है.

पसीना खराब कर देता है मेकअप, तो ये उपाय आजमा कर देखें

मौनसून सीजन में पसीना और बरसात का पानी मेकअप को बिगाड़ देता है. ऐसे में मेकअप सुंदर बनाने के बजाए बदसूरत बना देता है. मेकअप की दुनिया में वाटरप्रूफ मेकअप प्रोडक्ट्स के आने के बाद अब मौनसून में मेकअप की परेशानियां खत्म हो गई हैं.

वाटरप्रूफ  मेकअप की सब से खास बात यह होती है कि बारिश का पानी भी इस का कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. केवल बरसात में ही नहीं रेन डांस और स्विमिंग पूल का मजा लेते वक्त भी वाटरप्रूफ  मेकअप का कमाल दिखता है. पसीना आने पर मेकअप त्वचा के रोमछिद्रों में घुल कर अंदर चला जाता है, जिस से वह खराब हो जाता है. मेकअप रोमछिद्रों के जरीए शरीर के अंदर न जाए, वाटरप्रूफ  मेकअप में यही किया जाता है. त्वचा के रोमछिद्रों को बंद कर के किया गया मेकअप ही वाटरप्रूफ  मेकअप कहलाता है.

मौनसून में वाटरप्रूफ  मेकअप उत्पादों का इस्तेमाल करना आसान उपाय है. आप चाहें तो कौंपैक्ट पाउडर और फ ाउंडेशन भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे आप हलके गीले स्पंज से लगा सकती हैं या फिर सूखे पाउडर के तौर पर भी लगा सकती हैं. हमेशा लिपस्टिक, मसकारा और लाइनर के 2 कोट लगाएं ताकि ये ज्यादा देर तक टिके रहें. किसी भी उत्पाद को खरीदते समय यह जरूर पढ़ लें कि वह वाटरपू्रफ  है या नहीं और वह कितने घंटों तक टिका रह सकता है.

ब्लशर: पाउडर ब्लश के बजाय आप क्रीम ब्लश इस्तेमाल कर सकती हैं. अगर आप कलर को थोड़ा और उभारना चाहती हैं तो क्रीम ब्लश के ऊपर पाउडर ब्लश लगाएं ताकि यह आप के गालों पर ज्यादा देर तक टिका रहे. यह आप के चेहरे पर चमक व कलर लाने के साथ ही खूबसूरती भी बढ़ाता है.

बैंग्स: बैंग्स यानी सामने के छोटे बाल बहुत महिलाओं को पसंद होते हैं. मगर कई बार वे मौनसून में उलझ जाते हैं. बैंग्स चेहरे का करीब आधा हिस्सा ढक लेते हैं, जिस से त्वचा को सांस लेने का मौका नहीं मिलता. इस के कारण मौसम में नमी की वजह से पसीना आने लगता है. इस से न केवल बाल चिपचिपे दिखते हैं, बल्कि गरमी व पसीने की वजह से आप को मुंहासे भी हो सकते हैं.

काजल: काजल वाली आंखें हमेशा ख़ूबसूरत लगती हैं. लेकिन जब मौसम में नमी ज्यादा हो तो काजल फैल सकता है, जिस से आंखें देख कर ऐसा लगेगा जैसे आप को डार्क सर्कल्स हों. ऐसे में वाटरपू्रफ  लिक्विड लाइनर लगाएं.

वाटरपू्रफ  मसकारा: बारिश में वाटरप्रूफ मेकअप का ही इस्तेमाल करना चाहिए. वाटरप्रूफ मसकारे का इस्तेमाल करें या फिर क्लियर मसकारा भी अच्छा विकल्प हो सकता है.

लिक्विड फाउंडेशन: नम मौसम में लिक्विड फ ाउंडेशन चेहरे पर पिघलने लगता है. ज्यादा फाउंडेशन लगाना भी अच्छा साबित नहीं होता. एकसमान रंगत और बेदाग बेस पाने के लिए बीबी क्रीम या औयल फ्री कुशन फाउंडेशन का इस्तेमाल करें.

क्रीमी कंसीलर: मौनसून में कंसीलर के इस्तेमाल से बचें, क्योंकि पसीने वाला यह मौसम कंसीलर को चेहरे पर टिका नहीं रहने देता. फिर भी कंसीलर की बहुत जरूरत हो तो क्रीमी कंसीलर का विकल्प चुन सकती हैं.

ग्लिटर आईशैडो: ग्लिटर आईशैडो कई महिलाओं को बहुत पसंद हो सकता है. लेकिन इस के प्रयोग से मौनसून में वे भयावह नजर आ सकती हैं. हवा में मौजूद नमी ग्लिटर को चिपचिपा और धब्बेदार दिखा सकती है और यदि बारिश हो गई तो यकीनन आप का आईशैडो आप के गालों को धब्बेदार चमक देगा. ग्लिटर बह कर आंखों में भी जा सकती है जिस से आप को आंखों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.

स्ट्रेट हेयर: नमी से बाल चिपचिपे और बिखरे नजर आते हैं. यदि आप इस गड़बड़ से बचने के लिए हेयर स्ट्रेटनिंग का विकल्प चुनने के बारे में सोच रही हैं तो यह गलती कभी न करें, क्योंकि कुछ दिनों तक तो आप के बाल काफी चिकने और चमकीले नजर आएंगे, लेकिन लंबे समय तक ऐसा न रहेगा. इस के बजाय बालों को पोषित करने वाले ट्रीटमैंट्स आजमाएं.

वाटरप्रूफ  मेकअप प्रोडक्ट्स

वाटरप्रूफ मेकअप की बढ़ती मांग को देखते हुए मेकअप प्रोडक्ट्स बनाने वाली कंपनियों ने वाटरप्रूफ मेकअप प्रोडक्ट्स बनाने शुरू कर दिए हैं. इन प्रोडक्ट्स के अंदर ऐसे तत्त्व डाल दिए जाते हैं, जो मेकअप करने के दौरान त्वचा के रोमछिद्रों को बंद कर देते हैं. इस से मेकअप त्वचा के अंदर नहीं जा पाता और पसीना या पानी उसे नहीं बहा पाता. इस तरह के मेकअप प्रोडक्ट्स से मेकअप करते समय त्वचा को वाटरप्रूफ करने की जरूरत नहीं रहती है. वाटरपू्रफ  मेकअप प्रोडक्ट्स में क्रीम, लिपस्टिक, फेस बेस, रूज, मसकारा, काजल जैसी ढेर सारी चीजें अब बाजार में मिलने लगी हैं.

वाटरप्रूफ मेकअप की सावधानियां

वाटरप्रूफ  मेकअप प्रोडक्ट्स सिलिकोन का प्रयोग कर के बनाए जाते हैं. इन में प्रयोग होने वाला डाइनोथिकोन औयल त्वचा को चमकदार बनाता है. यह वाटरप्रूफ  मेकअप को आसानी से फैलने में मदद करता है, लेकिन वाटरप्रूफ  के जहां तमाम फायदे हैं वहीं इस की कुछ खराबियां भी हैं. वाटरप्रूफ  मेकअप को हटाने के लिए पानी का प्रयोग ही काफी नहीं होता है. इसे हटाने के लिए बेबी औयल या फिर सिलिकोन औयल का प्रयोग करना होता है. वाटरप्रूफ  मेकअप का प्रयोग त्वचा पर खराब प्रभाव डालता है. इस से त्वचा को नुकसान पहुंचता है. त्वचा पर इन्फैक्शन हो जाता है. ज्यादा प्रयोग करने से समय से पहले त्वचा पर झुर्रियां भी पड़ने लगती हैं. वाटरप्रूफ  मेकअप का प्रयोग खास अवसरों पर ही करें, रोज इस का प्रयोग न करें.

मौत के रहस्य में लिपट गई अर्पिता तिवारी: भाग 2

सुबह 9 बजे जब आंखें खुलीं तो वहां अर्पिता नहीं थी. खोजबीन करने पर उसी बिल्डिंग के दूसरी मंजिल पर उस की लाश डक्ट पर झूलती हुई मिली.

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो कमरे में महंगी शराब की कई खाली बोतलें मिलीं. जांचपड़ताल से पता चला कि अर्पिता की मौत वाशरूम की खिड़की से गिरने से हुई थी. पुलिस ने जब वाशरूम का दरवाजा खोला तो वह भीतर से बंद था. फिर इस से अनुमान लगाया गया कि अर्पिता ने आत्महत्या के लिए वाशरूम की खिड़की तोड़ कर छलांग लगाई होगी. पुलिस वाशरूम का दरवाजा तोड़ कर भीतर दाखिल हुई. खिड़की के कांच के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे, अब तक की परिस्थितियां आत्महत्या की ओर इशारा कर रही थीं.

जहां पुलिस अभिनेत्री अर्पिता तिवारी की मौत को एक हादसा मान कर चल रही थी, वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद उस का नजरिया बदल गया. रिपोर्ट में मल्टीपल इंजरी यानी शरीर पर लगी जगहजगह चोट किसी और तरफ इशारा कर रही थी. यानी अर्पिता की मौत एक हादसा नहीं, बल्कि हत्या थी.

श्वेता जैसी बनना चाहती थी अर्पिता

त्रिवेणीनाथ तिवारी की तहरीर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मालवणी पुलिस ने मृतका के प्रेमी पंकज जाधव सहित 5 आरोपियों अमित हाजरा, श्रवण सिंह, मनीष जायसवाल और कृष्णा के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

जैसेजैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ती गई, वैसेवैसे अर्पिता की मौत का राज भी गहराता गया. पुलिस ने पांचों आरोपियों पंकज, अमित, श्रवण, मनीष और कृष्णा को थाने बुला कर उन से पूछताछ की.

एंकर अर्पिता तिवारी की रहस्यमयी मौत को तकरीबन एक महीना होने जा रहा था, लेकिन अभी तक मौत की वजह को ले कर पुलिस के हाथ खाली थे. इस गुत्थी को सुलझाने के लिए मुंबई पुलिस ने वारदात के दौरान अर्पिता के साथ मौजूद रहे पांचों लोगों का कलिना स्थित डाइरेक्टोरेट औफ फोरैंसिक साइंस लेबोरेटरी (डीएफएसएल) में लाई डिटेक्टर टेस्ट कराया. डीएफएसएल स्टाफ ने पौलीग्राफी टेस्ट करने से पहले जांच करने वाले पुलिस अधिकारी से भी पूछताछ की.

5 लोग जिन में एक कुक भी था, उन्हें मालवणी पुलिस स्टेशन में बुला कर रोज पूछताछ की जा रही थी, लेकिन पुलिस पांचों आरोपियों द्वारा दिए गए बयानों की कडि़यों को मिलाने में नाकाम रही.

पुलिस ने इस मामले की गहराई से जांच की तो जो जानकारी सामने निकल कर आई, वह काफी दिलचस्प निकली.

24 वर्षीया अर्पिता त्रिवेणीनाथ तिवारी की 3 बेटियों में सब से छोटी और चुलबुली थी. तिवारीजी मूलत: झारखंड के जमशेदपुर जिले के रहने वाले थे. कालांतर में वे मुंबई में आ कर बस गए थे और घोड़ाबाधा के सरस्वती अपार्टमेंट में परिवार सहित रहने लगे थे.

बड़ी बेटी श्वेता तिवारी ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा तो उन की किस्मत के सितारे चमक उठे. एंकरिंग से कैरियर शुरू करने वाली श्वेता तिवारी ने कई धारावाहिकों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया. इस के बाद उन्होंने भोजपुरी फिल्मों में भी अभिनय कर के सफलता हासिल की.

बड़ी बहन की कामयाबी देख कर बचपन से ही अर्पिता के मन में भी फिल्मी दुनिया में जाने का शौक था. वह भी रुपहले परदे पर चमकते सितारों की तरह खुद दिखने के सपने देखने लगी थी. तब वह छोटी थी और जमशेदपुर के हिलटौप स्कूल में पढ़ती थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई में पिता के पास आ कर रहने लगी, जिस के बाद उस ने इवेंट मैनेजमेंट का कोर्स किया और एक्टिंग भी सीखी.

society

इसी दौर में उसे टेलीविजन पर एंकरिंग करने का मौका मिल गया. यहीं से उस के कैरियर की शुरुआत हुई. कैरियर के पहले पायदान पर कदम रखते ही उस की किस्मत के सितारे बुलंद होते गए. धीरेधीरे अर्पिता आगे बढ़ती गई. उस ने ऐंकरिंग से मौडलिंग और मौडलिंग से फिल्मी दुनिया में पांव जमाए. सफलता उस के कदम चूमती गई. अपनी मेहनत से उस ने करोड़ों रुपए कमाए थे.

बात उन दिनों की है जब अर्पिता 16-17 साल की रही होगी. तब उस के जीवन में पंकज जाधव ने कदम रखा. अर्पिता ने उसे अपने दिल में बसा लिया. दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे. पंकज जाधव उस के पड़ोस में ही रहता था. वह बेहद खूबसूरत और कसरती बदन का लड़का था.

श्वेता तिवारी ने बताया कि अर्पिता एक कामयाब लड़की थी. लाखों कमा रही थी. जबकि पंकज जाधव बेरोजगार था. वहअपनी कमाई से पंकज को जेबखर्च देती थी.

प्रेम संबंधों का खेल बना मूल कारण

धीरेधीरे अर्पिता के मांबाप और बहनों को उस के प्रेमसंबंधों के बारे में पता चल गया था. आधुनिक खयालातों के त्रिवेणीनाथ तिवारी ने बेटी को अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया था. उन्हें उस पर पूरा भरोसा था कि वह जीवन में कोई ऐसा गलत कदम नहीं उठाएगी, जिस से घर वालों को शर्मिंदगी उठानी पड़े.

बाद के दिनों में अर्पिता ने मीरा रोड पर एक फ्लैट ले लिया. पंकज जाधव ने भी मलाड कच्चा रोड स्थित मानवस्थल बिल्डिंग में एक फ्लैट ले लिया था. दोनों अपने परिवारों से अलग अपनेअपने फ्लैट में रहते थे. अर्पिता के इस फैसले से न तो त्रिवेणीनाथ तिवारी को आपत्ति हुई और न ही किसी और को. बल्कि घर वाले उस के फैसले से खुश थे.

धीरेधीरे अर्पिता और पंकज जाधव के रिलेशनशिप को 8 साल बीत चुके थे. पंकज जाधव जहां 8 साल पहले खड़ा था, आज भी वहीं था. उस के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया था. वह अर्पिता की कमाई पर ऐश कर रहा था.

अर्पिता पंकज पर शादी के लिए दबाव बना रही थी, जबकि वह शादी के लिए तैयार नहीं था. इन्हीं बातों को ले कर अकसर दोनों में झगड़ा भी हो जाता था. रोजरोज के झगड़े से अर्पिता ऊब चुकी थी. उस ने पंकज से अपने संबंधों को तोड़ने का फैसला कर लिया था.

अर्पिता की दोस्ती या प्यार पंकज जाधव से नहीं अमित हाजरा से था इस बीच दोनों के बीच एक नई कहानी ने जन्म ले लिया. इस कहानी में अर्पिता को चाहने वाला एक और प्रेमी आ गया जो अर्पिता को पंकज जाधव से कहीं ज्यादा प्यार करता था. वह कोई और नहीं, पंकज जाधव का दोस्त अमित हाजरा था. जिस बिल्डिंग में पंकज जाधव रहता था, उसी की 15वीं मंजिल पर अमित भी रहता था. पंकज के माध्यम से ही अमित का परिचय अर्पिता से हुआ था. बाद में मिलनसार अर्पिता से जल्द ही उस की दोस्ती हो गई.

अर्पिता और पंकज जाधव के रिश्ते टूटने और अलग हो जाने के बाद अमित की अर्पिता से ज्यादा नजदीकी हो गई. उस ने अर्पिता की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. अर्पिता अमित की मंशा समझ गई थी. वह उस की ओर ध्यान देने के बजाय पंकज से संबंध सुधारने की कोशिश करने लगी. लेकिन पंकज अपनी आदतों में सुधार लाने को तैयार नहीं था.

घटना से करीब 4 दिन पहले अर्पिता और अमित हाजरा के बीच फेसबुक पर लंबी बातचीत हुई थी. अमित अर्पिता से संबंध बनाने के लिए उस पर दबाव बना रहा था. इस बात को ले कर दोनों के बीच खासा विवाद हुआ था. उस ने अर्पिता को देख लेने की धमकी तक दे डाली थी, लेकिन अर्पिता ने यह बात अपने तक ही सीमित रखी. घर में किसी को नहीं बताई.

बहरहाल, अब लौट कर क्राइम सीन पर आते हैं. एक महीने की जांचपड़ताल के बाद पार्टी में मौजूद रहे अमित के नौकर ने पुलिस के सामने चौंका देने वाला बड़ा खुलासा किया. उस ने उस रात अमित हाजरा को अर्पिता के कपड़े खोलते हुए देखा था. उस ने बताया कि 10 दिसंबर की सुबह करीब साढे़ 5 बजे उस की नींद खुली. उस ने देखा कि अमित अर्पिता के बेहद करीब सो रहा था. जबकि जब वे सोने गए थे तो तीनों अलगअलग सो रहे थे.

नौकर ने सब को चौंका दिया बयान दे कर  नौकर के मुताबिक उस ने उस दिन औरों के मुकाबले कम शराब पी थी, इसलिए उस की आंखें सुबह जल्दी खुल गईं. जब उस की आंखें खुलीं तो उस ने देखा कि अर्पिता के बगल में सोया अमित उस के कपड़े हटा रहा था. नौकर को जगा देख कर वह आंख बंद कर लेट गया. नौकर को लगा कि यह सब अर्पिता की मरजी से हो रहा है, इसलिए वह चुपचाप वहां से चला गया.

नौकर के बयान ने पुलिस को बुरी तरह उलझा दिया था. हालांकि जिस हालत में अर्पिता की लाश बरामद की गई थी, उसे देख कर यही लग रहा था कि उस के साथ दुष्कर्म किया गया होगा. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सब का भ्रम तोड़ दिया. रिपोर्ट में अर्पिता के साथ कोई जोरजबरदस्ती वाली बात नहीं बताई. उस के बाद अर्पिता की मौत की गुत्थी उलझ कर रह गई. पुलिस अब भी उलझी हुई गुत्थी को सुलझाने में जुटी हुई थी.

अर्पिता की मौत के बाद सभी दोस्तों ने बयान दिए थे कि अर्पिता ने खुदकुशी की है. मगर बाद में पुलिस ने इसे हत्या बताया था और अब चारों दोस्तों में से एक अमित हाजरा को 15 जनवरी, 2018 को गिरफ्तार किया गया है. हालांकि जांच का दायरा बड़ा होने की बात कह कर पुलिस हत्या का मकसद अभी नहीं बता रही है.

पुलिस के मुताबिक अमित ने अलगअलग बयान बदले. पुलिस को दिए गए बयान और पौलीग्राफी टेस्ट में दिए गए बयान में अंतर पाया गया. पुलिस को शक है कि अमित हाजरा इस हत्याकांड में पुलिस को गुमराह कर रहा है. बस इसी आधार पर अमित हाजरा को गिरफ्तार किया गया है.

पुलिस ने पंकज जाधव को क्लीन चिट नहीं दी है. वह भी संदेह के दायरे में है. सबूत मिलने पर पंकज जाधव को भी गिरफ्तारी होगी. सूत्रों की मानें तो अमित हाजरा के बयान से पुलिस को कुछ ऐसे सबूत मिले हैं, जिस से हत्या में शामिल होने की पुष्टि होती है.

कथा लिखे जाने तक अमित हाजरा के वकील बी. हैटकर ने 8 फरवरी, 2018 को सेशन कोर्ट में उस की जमानत की अरजी दाखिल की, जो अदालत ने खारिज कर दी.

अमित अभी भी जेल में बंद है. बाकी के आरोपियों की जांच चल रही थी. पुलिस इस बात की पड़ताल कर रही थी कि अर्पिता हत्याकांड में इन की भूमिका क्या है. फिलहाल कथा लिखे जाने तक पुलिस मौत की उलझी गुत्थी सुलझाने में जुटी हुई थी.

करें व्हाट्सऐप स्टेटस के वीडियो डाउनलोड, ये है तरीका

साल 2017 में सोशल मीडिया प्लेटफौर्म (फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम) ने अपने साथ एक नया स्टोरी फीचर जोड़ा था. इस फीचर में यूजर्स आसानी से अपनी तस्वीरें या वीडियो पोस्ट कर सकते हैं, जो कि 24 घंटे बाद खुद ब खुद डिलीट हो जाती है. इस स्टोरी फीचर को सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर काफी पसंद किया गया और लोगों ने धड़ाधड़ इसका इस्तेमाल शुरु कर दिया.

इस फीचर को आए करीब एक साल हो चुका है, लेकिन अभी भी लोगों में इसका काफी क्रेज है. व्हाट्सऐप की बात करें तो इस पर हर रोज करीब 10 लाख से भी ज्यादा स्टोरीज पोस्ट होती हैं, जिनमें से हजारों ऐसी होती हैं जो वीडियो के रुप में होती हैं. लेकिन यदि कोई वीडियो हमें पसंद आ जाए और हम उसे अपनी टाइमलाइन पर शेयर करना चाहे तो इस वीडियो को सेव करने के बारे में काफी कम लोग जानते हैं. अपने इस लेख में हम व्हाट्सऐप की इन्हीं वीडियो को सेव करने का आसान सा तरीका बता रहे हैं.

हिडन व्हाट्सऐप स्टेट्स फोल्डरः यह सुविधा आपके फोन में ही उपलब्ध है. दरअसल जब वीडियो पर, जिसे आप सेव करना चाहते हैं, राइट क्लिक करते हैं तो यह वीडियो औटोमैटिक आपके फोन के हिडन फोल्डर जिसे statuses कहा जाता है, उसमें सेव हो जाती है. लेकिन कौपीराइट इश्यू से बचने के लिए यह फोल्डर हिडन रहता है. ऐसे में आपको सिर्फ इस फोल्डर को अनहाइड करना है और आप व्हाट्सऐप वीडियो आसानी से सेव कर सकेंगे.

एप्सः व्हाट्सऐप की स्टोरी वीडियो को सेव करने का दूसरा तरीका ऐप्स की मदद से इन वीडियो को सेव करना है. बता दें कि ये एप्स, व्हाट्सऐप ने लौन्च नहीं की हैं, लेकिन ये इस्तेमाल में काफी आसान हैं. इसके लिए सबसे मशहूर ऐप ‘स्टोरी सेवर फौर व्हाट्सऐप’ है. इस ऐप को गूगल प्लेस्टोर से बेहद आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है. डाउनलोड करने के बाद यह ऐप अपने आप आपके व्हाट्सऐप अकाउंट से कनेक्ट हो जाएगा और सिर्फ एक क्लिक की मदद से स्टोरी वीडियो डाउनलोड की जा सकेंगी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें