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तरह तरह की फिल्मी सेवाएं

नैटफ्लिक्स चैनल की सफलता के बाद अब हौलीवुड की अन्य फिल्में दिखाने के लिए वाल्ट डिज्नी कंपनी भी अपना चैनल शुरू करने वाली है. डिज्नी की अपनी फिल्में व जिन फिल्मों के कौपीराइट्स उस ने ले रखे हैं, वे सभी उसी के चैनल पर औनलाइन रिलीज होंगी और जब चाहो, देखी जा सकेंगी. ब्रौडबैंड इंटरनैट की स्पीड जैसेजैसे सुधर रही है, लोग बिना इंटेरप्शन या विज्ञापनों के हाई क्वालिटी में स्ट्रीमिंग फिल्में नैटफ्लिक्स और अमेजौन पर देख रहे हैं. ग्राहकों को अब इन चैनलों को अलगअलग सब्सक्राइब करना पड़ेगा जब तक कोई ऐसा औप्शन नहीं आ जाता जिस में सैटटौप बौक्स की तरह आप चैनल बदल कर स्ट्रीमिंग कंपनी बदल सकें लेकिन भुगतान एक ही जगह पर कर सकें.

बड़ी स्क्रीन पर दिखने वाली ये फिल्में शायद एक बार फिर सिनेमाहौलों पर संकट ला दें. मल्टीप्लैक्सों में अरबों रुपए लगाए गए हैं जिन में एक ही लौबी, एक ही फूड सर्विस के माध्यम से कई हौलों में फिल्में दिखाना संभव हुआ है. सिनेमा हौलों के दरवाजे पहले हर 2-3 घंटे में खुलते थे, पर अब मल्टीप्लैक्सों के दरवाजे हर समय खुले रहते हैं. दर्शकों को यह सुविधा भी हो गई है कि एक ही मल्टीप्लैक्स में कई फिल्में देखने को मिल जाती हैं. इस सुविधा ने सिंगल स्क्रीन हौलों को तो खत्म कर दिया लेकिन मल्टीप्लैक्सों को जान दे दी है. अब स्ट्रीमिंग औनलाइन फिल्मी सेवाएं मल्टीप्लैक्सों को चुनौती पेश कर रही हैं. एंड्रौयड टीवी आने के कारण यह काम और आसान हो रहा है. एंड्रौयड स्टिक भी आ गई है जिस से पुराने टीवी पर स्ट्रीमिंग फिल्में देखना संभव हो गया. इस सब का दुखद पक्ष यह है कि यह सारी मेहनत केवल कोरा मनोरंजन देने के लिए की जा रही है. डिज्नी, नैटफ्लिक्स, अमेजौन या इसी तरह की कोई और सेवा न ज्ञान बांटने वाली हैं न मार्गदर्शन करने वाली. तमाशा ही जीवन का बड़ा हिस्सा बन रहा है.

कठिनाई यह है कि सर्कस से कभी रोटी पैदा नहीं होती. ग्रीक और रोमन राजाओं ने जनता को बहलाने के लिए सर्कसों का आयोजन किया और बड़ेबड़े पैंथियन बनाए थे पर उसी ने रोमन सभ्यता का अंत किया, क्योंकि आम जनता को कुछ साल तो बहकाया जा सका पर उसे रोटी न दी जा सकी. स्ट्रीमिंग फिल्मी सेवाएं लोगों को बहलाएंगी, फिल्म एडिक्ट बनाएंगी पर नया करने या जीवन के संघर्षों से मुकाबला करना नहीं सिखाएंगी. भारत जैसे गरीब देश ही नहीं, अमेरिका जैसे अमीर देशों में भी जरूरत उत्पादकता की है, मनोरंजन की नहीं. ये सेवाएं लोगों को निचोड़ कर रख देंगी. ये अफीम से कम नहीं हैं.

हकीकत : धार्मिक जगहों से सड़कों पर भीड़

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के जस्टिस विक्रम नाथ और अब्दुल मोईन ने वकील मोतीलाल की याचिका पर फैसला देते हुए 20 दिसंबर, 2017 को धार्मिक जगहों व शादी समारोहों पर बिना इजाजत के लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर सख्त एतराज जताया.

कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या ऐसी जगहों पर लाउडस्पीकर लगाने को ले कर लिखित इजाजत ली गई है? अगर इजाजत नहीं ली गई तो इन के खिलाफ क्या कार्यवाही की गई है? कोर्ट ने यह भी पूछा है कि प्रदेश में शोर प्रदूषण रोकने के लिए क्या कोई मशीनरी बनी है?

कोर्ट ने यह भी पूछा है कि जब कानून बना है तो अफसर उस का कड़ाई से पालन क्यों नहीं कराते हैं? शोर प्रदूषण से आजादी और शांतिपूर्ण नींद को संविधान के अनुच्छेद में होने की बात को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा कि बारबार इस मुद्दे पर याचिकाएं दाखिल होने से एक बात तो तय है कि या तो संबंधित अफसरों के पास 2000 के रूल्स के प्रावधान को लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं है या उन की जवाबदेही तय नहीं है.

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अफसरों को जवाब देने का सख्त आदेश दिया है. नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने अमरनाथ में दर्शन करने वालों से कहा है कि वहां पर जयकारे नहीं लगाए जाएं. समझने वाली बात यह है कि कोर्ट के ऐसे बहुत सारे आदेशों को दरकिनार कर के धार्मिक जगहों पर काम हो रहे हैं.

धार्मिक जगहों पर भीड़

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि हाईवे सड़क के किनारे मंदिर न बनाए जाएं. तमाम सरकारों ने धार्मिक जगहों को हटाने की जगह पर सड़क को ही हाईवे कैटेगरी से बाहर कर दिया. देश में शायद ही ऐसी कोई सड़क होगी जहां पर मंदिर या दूसरी धार्मिक जगहें न बनी हों. सड़क पर ही नहीं शहरों में भी भीड़ को देखें तो सब से ज्यादा कब्जा पूजा वाली जगहों के पास ही दिखता है.

सड़कों पर भीड़ के लिए मंदिरों में दर्शन करने आने वाले ही जिम्मेदार होते हैं. यहां पर ट्रैफिक पुलिस भी कभी गाडि़यों का चालान नहीं करती है. केवल दर्शन करने वाले ही नहीं बल्कि मंदिरों के आगे फूल वाले, प्रसाद की दुकानों, दर्शन के लिए लाइनोें, गाडि़यों वगैरह का रुकना भी भीड़ को बढ़ाता है.

मंदिरों में आने वाले भक्त तो यह सहन कर लेते हैं, पर आम आदमी को क्यों सहन करें? यह बात अदालत समझती है पर अफसरशाह, नेता और जनता नहीं समझती है. इस की 2 वजहें हैं. एक तो नेताओं पर वोट बैंक का दबाव होता है. ज्यादातर पार्टियां धर्म के नाम पर वोट लेती हैं. ऐसे में वे धर्म के नाम पर कानून में हुए बदलाव को लागू करने की कोशिश में नहीं रहती हैं. इसी वजह से कोर्ट को दखल देना पड़ता है.

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दूसरी, नौइज पौल्यूशन रैज्यूलेशन ऐंड कंट्रोल रूल्स 2000 को बने हुए इतने साल का समय हो गया, पर यह ठीक से लागू नहीं हो पाया है.

लखनऊ हाईकोर्ट ने इस बात को महसूस करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया है. देखने वाली बात यह है कि अब सरकार इस को कैसे लागू करती है. शोर प्रदूषण को ले कर इस के पहले भी कई जगहों पर बात उठती रहती है. मंदिरों के बाहर होने वाले कब्जों को ले कर लोग कम सवाल करते हैं.

कानून का नहीं होता पालन

धार्मिक जगहों के बाहर भीड़ के लिए केवल मंदिर ही दोषी नहीं हैं, बल्कि मसजिद, चर्च और गुरुद्वारे भी भीड़ के लिए जिम्मेदार होते हैं. ऐसे में सड़क पर चलने वाले हर किसी को तकलीफ होती है. जरूरी है कि धार्मिक जगहों के सामने होने वाली भीड़ को रोका जाए.

त्योहारों और दूसरे मौकों पर यह परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है. दर्शन करने वालों को भी सड़क पर लगे जाम से रूबरू होना पड़ता है. इस के बाद भी वे धर्म के नाम पर सहन करते हैं.

धार्मिक मसलोें को ले कर सब से ज्यादा सड़क पर जाम होता है. जाम लगाने वाले दूसरों की सुविधा का ध्यान नहीं रखते हैं. इस वजह से परेशानी और बढ़ जाती है.

गायक सोनू निगम ने मसजिद में लगे लाउडस्पीकर पर सवाल उठाया था. ऐसे में उन का विरोध होने लगा. दरअसल, धर्म को ले कर कायम अंधविश्वास को ले कर सभी एकमत हैं. मंदिर के समर्थकों को लगता है कि अगर मसजिद के लाउडस्पीकर पर सवाल उठेंगे तो मंदिर के लाउडस्पीकर भी हटाने पड़ेंगे.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने बयान में कहा था कि जब हम सड़क पर होने वाली नमाज को नहीं रोक सकते तो हमें कांवड़ यात्रा को रोकने का हक नहीं है.

कांवड़ यात्रा के समय कुछ शहरों में यातायात इतना प्रभावित होता है कि वहां सड़कों पर लोगों के चलने पर बैन लगा दिया जाता है. कई शहरों में तो कईकई दिनों तक वहां का जनजीवन प्रभावित हो जाता है. स्कूलकालेज, बाजार बंद करने और दूसरे काम रोकने पड़ते हैं. पहले धर्म के नाम पर जुटने वाली भीड़ कम होती थी. तब ये बातें जिंदगी को इतना प्रभावित नहीं करती थीं. अब भीड़ के बढ़ने से मामला गंभीर हो गया है.

बढ़ती आस्था जिम्मेदार

धर्म के नाम पर बढ़ती भीड़ केवल आस्था के चलते ही नहीं होती, बल्कि धार्मिक जगहों में भीड़ की आड़ में कई तरह के रोजगार भी बढ़ जाते हैं. ऐसी जगहों पर दुकान लगाने वाले मंदिर से जुड़े लोग होते हैं. दरगाह के सामने भी ऐसी भारी भीड़ जुटने लगी है. वहां भी फूल से ले कर चादर और दूसरे सामान बिकने लगे हैं.

इन दुकानों से पुलिस से ले कर जिला प्रशासन तक कोई वसूली नहीं कर पाता है. इस वजह से वहां दुकान लगाने वालों को आसानी रहती है. धर्म के नाम पर किसी तरह का भी संरक्षण मिल जाता है. ऐसे में अब धार्मिक जगहें किसी न किसी तरह से दुकानों के अड्डे बनती जा रही हैं.

धार्मिक जगहों पर होने वाली भीड़ में चोरीचकारी, धक्कामुक्की और छेड़खानी तक होती है. यही वजह है कि हर मंदिर में यह नोटिस लिखा दिख जाता है कि चोरउचक्कों से सावधान रहिए. यह बताता है कि भीड़ में होने वाले अपराध मंदिरों में भी होते हैं.

धर्म के नाम पर लोग हर तरह की बातें स्वीकार कर लेते हैं. ऐसे में केवल उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो ऐसी जगहों के पास रहते हैं.

अयोध्या में राम मंदिर के पास रहने वाले किशन कुमार कहते हैं, ‘‘मंदिर में जब भीड़ बढ़ती है तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ता है. कई बार तो हम घरों में ही कैद हो कर रह जाते हैं. हमें अपने घरों में कई तरह के सुधार तक करने की छूट नहीं होती है. हरबात के लिए प्रशासन की इजाजत लेनी पड़ती है.’’

ऐसी परेशानियां बहुत से लोगों को सहन करनी पड़ती हैं. सड़क नागरिकों के चलने के लिए होती है. यहां पर लगने वाली भीड़ से नागरिक अधिकारों का हनन होता है. ऐसे में जरूरी है कि धार्मिक जगहों के बाहर होने वाली भीड़ को रोका जाए.

एक वेश्या की कहानी

आप मुझे किसी भी नाम से बुला सकते हैं… धंधे वाली या वेश्या. समाज में मुझे कभी भी इज्जत की नजरों से नहीं देखा गया है. मेरे पास हर तरह के ग्राहक आते हैं, इसलिए मुझे थोड़ीबहुत अंगरेजी भी आती है.

मैं मुंबई के करीब ही 15 किलोमीटर के दायरे में एक जिले में रहती हूं. आप रेड लाइट एरिया नियर मुंबई शब्द डाल कर कंप्यूटर पर सर्च करेंगे तो मेरा यह इलाका आसानी से मिल जाएगा. यहां पर तकरीबन 800 औरतें इसी धंधे में लगी हैं.

यों तो हम समाज से अलगथलग रहती हैं पर हमें सब की खबर रहती है. सर्जिकल स्ट्राइक से ले कर ईवीएम घोटाले तक… कश्मीर में पत्थरबाजी से ले कर नक्सली इलाकों में औरतों से किए गए बलात्कार तक…

आप के साफसुथरे किरदार वाले समाज में हमारी जिंदगी के बारे में जानने की बड़ी इच्छा होती है, जैसे हमारा अतीत क्या था? हम कैसे इस दलदल में आईं? हमारी बातचीत का लहजा क्या है? हमारा पहनावा… हमारी अछूत सी जिंदगी… हमारे ग्राहक… और हमारे एचआईवी मरीज होने का डर… सबकुछ जानना चाहते हैं.

कुछ लोगों को लगता है कि यह धंधा आसानी से पैसा कमाने का सब से अच्छा तरीका है. लोगों को लगता है कि हम इस पेशे में मरजी से आई हैं.

मैं एक बात जानना चाहती हूं कि आप किसी भी साधारण औरत से पूछिए कि अगर कोई मर्द आप को गलत नजर से देखता है तो कितना गुस्सा आता है? आप कितना असहज महसूस करती हैं?

जब उस ने आप को छुआ नहीं सिर्फ देखा तो आप असहज हो जाती हैं, तो हमें यह सब कर के कैसे अच्छा लगता होगा? यह सोच जानबूझ कर बनाई गई है कि यह पेशा अच्छा लगने की वजह से फलफूल रहा है.

आप के सभ्य समाज ने इस चलन को मंजूरी सी दे दी है कि मर्द हमारे शरीर को नोचने, तोड़ने और काटने का हक रखते हैं. यह आसानी से पैसा कमाने वाली सोच बिलकुल गलत है. इस पेशे में आने वाली लड़कियां ज्यादातर मजबूर होती हैं, अनपढ़ होती हैं… उन का परिवार बेहद गरीब और लाचार होता है. उन का कोई सहारा नहीं होता है.

कोई उन का ही नजदीकी दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी उन की मजबूरी का फायदा उठाता है और पैसों के लिए ऐसे नरक में धकेल देता है. मेरे साथ काम करने वाली कुछ लड़कियां तो रद्दी से भी सस्ते दामों पर खरीदी गई हैं.

आमतौर पर 14 साल से 15 साल की लड़की 2,500 रुपए से ले कर 30,000 रुपए के बीच खरीदी जाती है. साल 2017 में एक 16 साल की और दूसरी 14 साल की 2 बहनों को सिर्फ 230 रुपए में खरीदा गया.

2 लड़कियां 230 रुपए में बिक गईं. अगर दोनों लड़कियों का कुल वजन 80 किलो भी था तो इस का मतलब 3 रुपए प्रति किलो… जरा याद कर के बताइए कि आप ने पिछली बार रद्दी अखबार किस भाव में बेचे थे?

शुरुआत के दिनों में खरीद कर लाई गईं लड़कियों को समझाने का काम हमें ही करना पड़ता है. कोई भी लड़की सिर्फ बात करने से नहीं मानती. फिर उसे खूब डरायाधमकाया जाता है. बहुत सारी लड़कियां डर के चलते मान जाती हैं और जो नहीं मानती हैं, उन के साथ बलात्कार करते हैं… मारतेपीटते हैं… बारबार, लगातार… जब तक वे इन जुल्मों के चलते टूट नहीं जातीं और काम करने के लिए हां नहीं कर देतीं.

पर कुछ लड़कियां फिर भी नहीं मानतीं. तब उन को बलात्कार करने के बाद बेहद बुरी तरह से सताया जाता है. कभीकभार उन की हत्या भी कर दी जाती है या वह लड़की खुदकुशी कर लेती है. ऐसी लड़कियों की लाश नदी किनारे या जंगल में पड़ी मिल जाती है जिसे लावारिस बता दिया जाता है.

मैं 18 साल से इस पेशे में हूं. मैं ने भी डर और जख्मों को भोगा है. हर पल मौत से भी बदतर रहा. दूसरी लड़कियों को इस दलदल में धकेले जाते हुए देखा है… और कोई कुछ नहीं कर पाता.

हम सिर्फ एक शरीर हैं. आप का साफसुथरा समाज सबकुछ देखता है और अपने काम में लग जाता है.

अब आइए बताती हूं… अपने ग्राहकों के बारे में.

पहले हमारे ग्राहक अधेड़ हुआ करते थे, पर अब नौजवान और यहां तक कि नाबालिग भी आते हैं.

इस पेशे का एक डरावना चेहरा यह भी है कि नाबालिग बहुत दरिंदे होते हैं. ये लड़के हम से अलगअलग डिमांड करते हैं. वे इंटरनैट पर जैसे सीन देखते हैं उन्हें दरिंदगी के साथ अपनाते हैं. हमारे मना करने पर खतरनाक हो जाते हैं क्योंकि पैसा दे कर मनमानी करना इन का हक है. ये लड़के काफी बेरहम होते हैं. पर हमारे पास चुनाव की गुंजाइश नहीं होती है. किसी तरह से उस वक्त को गुजारना होता है.

समाज में बैठे लोगों को लगता है कि हम बैठेबैठे मलाई खा रही हैं और हमारे पास बेतहाशा पैसे हैं. सच तो यह है कि हमारी हालत को देश के बजट जितना ही मुश्किल है समझना. हमें जब खरीदा जाता है तो वह रकम हमें ब्याज समेत चुकानी पड़ती है, जिसे हम 4 से 8 साल तक ही चुका पाती हैं.

क्या आप को पता है कि हमारी खरीद और बिक्री में लगी हुई पूंजी की ब्याज दरें कितनी होती हैं?

यह हमारा मालिक या दलाल तय करता है. लड़की की उम्र, खरीद की रकम, उस के चेहरेमोहरे… और आखिर में बिचौलिए होते हैं जिस में पुलिस और मानव अधिकार संस्थाएं चलाने वालों का भी हिस्सा होता है. सब मिल कर हमारी कीमत तय करते हैं.

यह भी एक बड़ा सच है कि एक धंधे वाली को मिलने वाले पैसे से बहुत से लोगों के घर पलते हैं. पर वह सभी लोग सभ्य समाज का हिस्सा बन जाते हैं और हम बदनाम गलियों की रोशनी…

शुरुआत के दिनों में सिर्फ हमें खाना और कपड़ा व मेकअप का कुछ सामान ही दिया जाता है. मुझे साल 1997 में महज 8,000 रुपए में खरीदा गया था. शुरू के 5 साल तक मुझे कभी कुछ नहीं मिला यानी 8,000 रुपए चुकाने के लिए मुझे 1000 से ज्यादा लोगों के साथ जिस्मानी संबंध बनाने पड़े.

मतलब प्रति ग्राहक मेरी लागत 8 रुपए थी. हालांकि अब इस समय हर लड़की को एक ग्राहक से 100 से 150 रुपए मिल रहे हैं.

आमतौर पर खुद का सौदा करने के लिए मजबूर एक लड़की महीने में 4,000 से 6,000 रुपए कमाती है. इस के बाद उसे घर का किराया 1,500 रुपए, खानापीना 3,000 रुपए, खुद की दवा 500 रुपए और बच्चों की पढ़ाईलिखाई अगर मुमकिन हो पाई तो 500 रुपए और सब से ज्यादा खर्च हमारे मेकअप का.

आप सोचते होंगे कि मेकअप की क्या जरूरत है? पर यदि मेकअप ही नहीं होगा तो ग्राहक हमारे पास नहीं आएगा.

पिछले 18 सालों में देशी और विदेशी तकरीबन 200 गैरसरकारी संस्थाएं देखी हैं. इन में से 7-8 को छोड़ कर बाकी सब फर्जी हैं.

ऐसा लगता है कि सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं मिल कर हमारी बस्तियों को बनाए रखने के लिए काम कर रही हैं.

हमारे लिए ऐसी संस्थाएं चंदा मांगती हैं, डौक्यूमैट्री फिल्में बनाती हैं… पर वह चंदा हमारे पास कभी नहीं पहुंचता.

अच्छी फिल्म बनने पर डायरैक्टर को और काम करने वाले कलाकारों को अवार्ड मिल जाता है, और हम जहां के तहां फंसी रहती हैं.

हम भी काम करना चाहती हैं. हम आलसी नहीं हैं. पर सच तो यह है कि हमें इस दलदल से निकलने ही नहीं देना चाहते समाज के ये ठेकेदार. हम जैसी औरतों का 2 बार जन्म होता है. एक बार मां के पेट से… और दोबारा समाज में धंधे वाली के रूप में.

हमारी सामाजिक जिंदगी भी आप की जैसी ही है. हम भी उत्सव मनाते हैं. जैसे ईद, दीवाली, क्रिसमस… सबकुछ… उस की बहुत बड़ी वजह है कि हमारे इलाके में सभी राज्यों से और विदेशी जैसे नेपाल, बंगलादेश, म्यांमार, रूस, आयरलैंड और भी बहुत से देश की लड़कियां इस चक्रव्यूह में फंसी हुई हैं.

हमारा रहनसहन पहले अलग था, पर अब नहीं… हमारी भाषा अलग है, हमारे धर्म अलग हैं, हमारी जाति अलग है… पर 18 साल से एकसाथ रहतेरहते हम लोगों ने एकदूसरे को अपना लिया है.

क्या आप ने कभी सुना है कि ऐसे इलाके में कभी दंगे हुए? झगड़े हुए? नहीं… क्योंकि हम एकदूसरे के दर्द के रिश्ते से जुड़ी हुई हैं.

मुझे कभीकभी फख्र महसूस होता है धंधे वाली होने पर… क्योंकि हम में बहुत एकता है, प्यार है, ईमानदारी है, इनसानियत है… हम में दर्द है और दर्द के होने का एहसास भी जिंदा है.

पर जिस समाज से आप आते हैं उस समाज में इन सारी बातों के लिए कहीं कोई जगह नहीं है और इसीलिए हमारे लिए भी आप के उस समाज में कहीं कोई जगह नहीं है. न दिल में, न समाज में.

अगर कुछ मिला है तो वह है नफरत और बातबात पर वेश्या की गाली… आप के लिए यह गाली होगी, पर यह हमारी जिंदगी है. एक ऐसी जिंदगी जिस को हम ने खुद नहीं चुना. हमें जबरन इस में धकेला गया और निकलने नहीं दिया जा रहा है.

एक बार दिल पर हाथ रख कर बताइए कि क्या आसान है एक धंधे वाली की जिंदगी?

बरसात के मौसम में क्या पहनें और क्या नहीं, हम बताते हैं

मौनसून शुरू होने से पहले ही महिलाओं को चिंता सताने लगती है कि इस मौसम में क्या पहनें और क्या नहीं. अगर आप भी उन में शामिल हैं तो घबराएं नहीं, क्योंकि हम बता रहे हैं कि इस मौसम में क्या पहनना चाहिए और क्या पहनने से बचना चाहिए:

– बरसात में हमेशा ऐसे कपड़ों का इस्तेमाल करें जो भीगने पर जल्दी सूख जाएं.

– बरसात में कौटन व लिनेन के कपड़े न पहनें. ये जल्दी नहीं सूखते हैं.

– पौलिएस्टर, क्रैप्स, नायलोन जैसे कपड़े भीगने के बाद जल्दी सूख जाते हैं. अत: इन का इस्तेमाल करें.

– जौर्जेट, शिफौन या अन्य पारदर्शी कपड़े न पहनें, क्योंकि ऐसे कपड़ों के भीगने पर अंगप्रदर्शन हो सकता है.

– अगर आप को लगता है कि कपड़े भीगने पर आप के अंतर्वस्त्र दिख सकते हैं तो आप कपड़ों के अंदर मोटी स्लिप और स्लैक्स पहनें. इस से कपड़ों के भीगने के बाद आप के अंतर्वस्त्र नहीं दिखेंगे.

– बरसात के मौसम में लैदर की फैशनेबल चीजों का इस्तेमाल न करें.

– अगर बरसात में भीगने की संभावना हो तो हमेशा गहरे रंग के कपड़े पहनें. इन के भीग जाने पर अंतर्वस्त्र दिखेंगे नहीं.

– ज्यादा तंग कपड़े न पहनें, क्योंकि इन के भीगने पर आप का पूरा शरीर नजर आएगा.

– बरसात में नायलोन, पौली कौटन टीशर्ट और थ्रीफोर्थ पैंट पहनना सुविधाजनक रहेगा.

– बरसात में साड़ी न पहनें. ढीलेढाले और आरामदायक कपड़े पहनें.

– पीरियड्स का समय हो तो रेनकोट जरूर पहनें. इस से कपड़े भी गीले नहीं होंगे और आप को आराम भी महसूस होगा.

पौष्टिक डाइट बनाए भीतर से स्ट्रौंग

परिवार की फिटनैस में घर की गृहिणियों का अहम रोल होता है क्योंकि वे परिवार को टैस्ट के साथसाथ पौष्टिक भोजन परोसने में विश्वास जो रखती हैं. उन का यह मानना है कि परिवार तभी खुश रह सकता है जब वे भीतर से स्ट्रौंग हो. उन की इसी कोशिश में दिल्ली प्रैस द्वारा गत 12 व 18 मई को द्वारका के एसडीएमसी कम्युनिटी हौल व रोहिणी स्थित टैक्निया इंस्टीट्यूट के औडिटोरियम में आईटीसी आशीर्वाद सर्वगुण संपन्न इवैंट का आयोजन किया गया.

रोटी मेकिंग ऐक्टीविटी

दोनों ही इवैंट की शुरुआत ऐंकर अंकिता मंडल ने रोटी मेकिंग की ऐक्टिविटी से की. इस ऐक्टिविटी को कराने का मकसद यह था कि आशीर्वाद सलैक्ट आटे से बनी रोटी की अलग से ही पहचान की जा सकती है क्योंकि वह सौफ्ट व टैस्टी जो होती है. इस में भाग लेने वाली महिलाओं ने इसे खूब ऐंजौय किया. क्योंकि रोटी बनाने में तो वे ऐक्सपर्ट होती ही हैं लेकिन जहां प्रतियोगिता की बात आ जाती है तो उन में उत्सुकता और बढ़ जाती है.

शैफ सैशन

इस के तुरंत बाद शैफ सैशन शुरू हुआ जिस में शैफ निशांत चौबे व तरुण ने अपनी क्रिएटिविटी दिखा कर सभी के चेहरों पर खुशी ला दी. शैफ निशांत चौबे ने शुगर रिलीज कंट्रोल आटे से बहुत कम समय में पैन केक व शैफ तरुण ने पाई बना कर दिखा दिया कि कम शुगर से भी हैल्दी रैसिपी बनाई जा सकती है.

फिर न्यूट्रिशनिस्ट डा. नेहा पठानिया व डा. करुणा चतुर्वेदी ने बताया कि भले ही आज मार्केट में ढेरों आटे मौजूद हैं लेकिन आप हमारे कहने से नहीं बल्कि खुद पर्सनल ऐक्सपीरियंस कर के देखें कि आशीर्वाद मल्टीग्रेन आटा सच में अलग व विशेषताओं से भरा हुआ है. उन्होंने कहा कि हमें खुद को फिट रखने के लिए क्वालिटी चीजें खाने पर जोर देने के साथसाथ पौष्टिक डाइट थोड़ीथोड़ी देर में लेते रहनी चाहिए और आप खुद ऐसा कर के चेंज भी फील करेंगी.

इस के बाद मल्टी टास्किंग दीवा व पौपुलर दीवा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिस में 18 मई को आयोजित इवैंट में मल्टी टास्किंग दीवा की प्रथम विजेता रहीं ममता व द्वितीय पुरस्कार हासिल किया शालू ने. वहीं पौपुलर दीवा प्रतियोगिता में रेशमा रहीं पहले स्थान पर और दीपाली रहीं द्वितीय स्थान पर. ये दोनों ही ऐक्टिविटीज अलग थीं और इस में आशीर्वाद मल्टीग्रेन और पौपुलर आटे का इस्तेमाल किया गया था.

हुनर को मिला पुरस्कार

फिर रैसिपी कौंटैस्ट के विनर्स की घोषणा की गई जिस में 12 मई के विजेता इस प्रकार हैं: प्रथम सांत्वना पुरस्कार मिला आटा केक बना कर सुहानी को, द्वितीय सांत्वना पुरस्कार मिला आशा वार्शने को वीट बनाना

केक बनाने पर, वहीं आटा पिज्जा बना कर नीरू गुप्ता ने तृतीय सांत्वना पुरस्कार जीता.

इसी के साथ इस राउंड में भारवर बड़ी बना कर वनीता रस्तोगी ने तृतीय पुरस्कार, आटे का पेठा बना कर निर्मला ने द्वितीय पुरस्कार व बिलम गरह बना कर सत्या कुमार ने प्रथम पुरस्कार अपने नाम किया.

वहीं 18 मई के रैसिपी कौंटैस्ट में प्रथम सांत्वना पुरस्कार मिला निशा को मटीजा बनाने पर, द्वितीय सांत्वना पुरस्कार विजेता रहीं बाटी बना कर मृदुला जैन, तृतीय सांत्वना पुरस्कार मिला आटा स्प्रिंग रोल बना कर मधु अग्रवाल को. इस कौंटैस्ट में तृतीय पुरस्कार जीता सरिता अग्रवाल ने मूंग दाल कचोरी बना कर वहीं वैजी डिलाइट बना कर अनीता जैन ने द्वितीय पुरस्कार और आटा अप्पम केक बना कर राजेश्वरी ने प्रथम पुरस्कार का खिताब अपने नाम किया.

अंत में सभी को गुडी बैग्स दिए गए.

बढ़ाएं फोन की स्पीड

चाहे जितने भी स्मार्टफोन खरीद लो, लेकिन फोन के जरा सा पुराने होते ही उसकी स्पीड में दिक्कतें आने लगती है. इसलिए अगर आपके फोन के साथ भी इस तरह की समस्याएं आ रही हैं तो आप इन उपायों को अपना कर अपने फोन की स्पीड बढ़ा सकते हैं.

होम स्क्रीन को साफ रखें

कई लोग ऐसे होते हैं कि स्मार्टफोन की होम स्क्रीन पर बहुत सारे ऐप रखते हैं जो कि फोन के धीमा होने का सबसे बड़ा कारण है. ऐसे में आपके भी फोन के होम स्क्रीन पर कई मौसम, लाइव वौलपेपर जैसे ऐप के आईकन हैं तो उन्हें हटा दें.

डाटा सेवर मोड को औन करें

फोन में मौजूद गूगल क्रोम में डाटा सेवर मोड औन करने का फायदा यह होता है कि आप कोई भी साइट ओपन करते हैं तो उस पेज पर मौजूद वीडियो और फोटो की क्वालिटी थोड़ी कमजोर हो जाती है. ऐसे में हेवी पेज आसानी से लोड हो जाते हैं और आपका फोन तेजी से काम करता है.

कैशे मेमोरी क्लियर करें

कुछ देर फोन को इस्तेमाल करने पर स्टोरेज में कैशे मेमोरी बनती है जो आपके फोन की स्टोरेज को घेरती है और ऐसे में आपका फोन स्लो हो जाता है. कैशे क्लियर करने के लिए फोन की सेटिंग्स में जाकर स्टोरेज में जाकर कैशे मेमोरी को क्लियर कर दें.

औटो सिंक

आजकल अधिकतर स्मार्टफोन में औटो सिंक औन ही रहता है जिसे कारण आपके फोन के डाटा का बैकअप बैकग्राउंड में चलता रहता है. फोटो और वीडियो खुद ही गूगल ड्राइव में अपलोड होते रहते हैं. औटो सिंक को बंद कर दें, आपका फोन पहले के मुकाबले तेज चलने लगेगा.

फोन के औपरेटिंग सिस्टम को अपडेट रखें

कई कंपनियां समय-समय पर स्मार्टफोन के लिए अपडेट जारी करते है. ऐसे में आपके फोन में अपडेट आया है तो जरूर अपडेट करें. इसके अलावा आप सेटिंग्स में अबाउंट में जाकर भी अपडेट के लिए चेक कर सकते हैं.

कोई उपाय काम ना करें तो रीसेट करें

अगर सारे जतन करने के बाद भी फोन तेज नहीं चल रहा है तो डाटा का बैकअप लेने के बाद फोन को फैक्टरी रीसेट करें. रीसेट करने के बाद फोन में सेव, गाना, वीडियो, फोटो औऱ मैसेज सबकुछ डिलीट हो जाएंगे. फोन एकदम नए जैसा हो जाएगा.

भारत में बनी सैमसंग की सबसे बड़ी मोबाइल फैक्ट्री, क्या है इसकी खासियत

दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल फैक्ट्री जिसकी स्थापना सैमसंग ने की है. कंज्यूमर इलेक्ट्रौनिक्स के मामले में दुनिया के मानचित्र पर सबसे बड़ी मोबाइल फैक्ट्री होने का टैग चीन या दक्षिण कोरिया के पास नहीं है. अमेरिका के पास भी नहीं है, बल्कि यह भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के शहर नोएडा के नाम है. नोएडा के सेक्टर 81 में स्थित सैमसंग इलेक्ट्रौनिक्स की 35 एकड़ में फैली है. इस फैक्ट्री का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन करेंगे. उनके हेलिकॉप्टर को उतारने के लिए फैक्ट्री के पास ही हेलिपैड बनाया गया है.

क्या हैं इस फैक्ट्री की खासियत

– नोएडा के सेक्टर 81 में सैमसंग इलेक्ट्रौनिक्स की यह फैक्ट्री 35 एकड़ में फैली है.

– दक्षिण कोरियाई कंपनी की इस फैक्ट्री में 4,915 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है.

– सैमसंग की नई फैक्ट्री में दोगुना उत्पादन करने की क्षमता है.

– सैमसंग अभी भारत में 6.7 करोड़ स्मार्टफोन बना रही है. इस फैक्ट्री के शुरू होने पर करीब 12 करोड़ मोबाइल फोन की मैन्युफैक्चरिंग होगी.

– नई फैक्ट्री में सिर्फ मोबाइल ही नहीं बल्कि सैमसंग के कंज्यूमर इलेक्ट्रौनिक सामान का उत्पादन भी होगा.

1990 में देश में पहली यूनिट हुई थी शुरू

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सैमसंग के देश में दो मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं. एक नोएडा और दूसरा श्रीपेरुंबदूर में है. इसके अलावा सैमसंग के पास देश में पांच रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर हैं. देश में कंपनी के 1.5 लाख रिटेल आउटलेट हैं. कंपनी का 2016-17 में मोबाइल बिजनेस रेवेन्यू 34,400 करोड़ रुपए और कुल बिक्री 50,000 करोड़ रुपए रही. सैमसंग के जरिए 70 हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है.

भारत में ही क्यों लगी सबसे बड़ी फैक्ट्री

सैमसंग ने दुनिया के कई बड़े देशों को छोड़कर भारत में ही सबसे बड़ी फैक्ट्री क्यों शुरू की. दरअसल, इसके कई कारण हैं. लेकिन, सबसे बड़ा यह कि भारत में मोबाइल कंपनियों को अपनी फैक्ट्री लगाने में ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी पड़ती. वहीं, दूसरे देशों में कई तरह की कानूनी बाधाएं और प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. दूसरा यह कि भारत के मुकाबले दूसरे देशों में टैक्स की भी अधिकता है. श्रम लागत भी ज्यादा होती है. भारत में विनिर्माण कंपनियों के लिए इसलिए फायदेमंद होता है क्योंकि यहां एक बड़ा घरेलू बाजार है. इसलिए वैश्विक निर्माता यहां जोखिम लेने के लिए भी तैयार रहते हैं. दूसरे देशों की अपेक्षा भारत उनके लिए एक बेहतरीन विकल्प है. यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी विनिर्माण इकाई भारत में खोला है.

3P’ एजेंडे को बढ़ाना चाहते हैं मून

भारत में दक्षिण कोरिया की सैमसंग, एलजी, हुंडई समेत 500 से ज्यादा कंपनियां हैं. भारत चाहेगा कि कोरिया इन परियोजनाओं में भूमिका और बढ़ाए. कोरिया डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया के साथ ही भारत की 70 हजार करोड़ रुपए जुटाने में मदद कर रहा है. यही वजह है कि पहली बार मून खुद भारत दौरे पर हैं. मून नई दक्षिण नीति के तहत ‘3P’ एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहते हैं. ‘3P’ में पीपुल्स, प्रौसपेरिटी(समृद्धि) और पीस शामिल है.

क्या है 3P’ का मकसद

  • पीपुल्स: लोगों के जरिए संबंध बढ़ाना
  • प्रौसपेरिटी: साझेदारी निर्माण
  • पीस: शांति

अब आप भी करें हवाई यात्रा, इंडिगो ने निकाली अब तक की सबसे बड़ी सेल

इंटरग्लोब एविएशन की निजी एयरलाइन इंडिगो ने मेगा औफर शुरू किया है. अपनी 12वीं सालगिरह मना रही इंडिगो ने चार दिनों के लिए सेल निकाली है. इसके तहत 1212 रुपए में टिकट बुक की जा सकेगी. इंडिगो की यह सेल मंगलवार से शुरू हो चुकी है. इस मेगा औफर में कंपनी अपनी एयरलाइन की 12 लाख सीटें भी सस्ती कर रही है. इंडिगो के मेगा औफर पर 25 जुलाई 2018 से 30 मार्च 2019 तक के लिए टिकट बुकिंग की जा सकती है.

क्या है इंडिगो का मेगा औफर

इंडिगो ने 57 शहरों में औपरेशन के तहत 12 लाख सीट पर 25 फीसदी डिस्काउंट औफर किया है. 10 जुलाई से 13 जुलाई तक चलने वाले इस मेगा औफर में इंडिगो की सीटें 1212 रुपए से शुरू हो रही हैं. बाकी टिकटों पर भी 25 फीसदी तक की छूट दी जा रही है. इसके अलावा, स्टेट बैंक औफ इंडिया के क्रेडिट कार्ड से कम से कम 3000 रुपए के टिकट बुक करने पर अतिरिक्त 5 फीसदी कैशबैक (अधिकतम 500 रुपए) का भी फायदा मिलेगा.

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अब तक की सबसे बड़ी सेल

इंडिगो के चीफ स्ट्रैटजी औफिसर विलियम बूल्टर का कहना है कि ‘इंडिगो 4 अगस्त 2018 को अपने 12 साल पूरे करने जा रहा है. इस मौके पर एयरलाइन ने 57 शहरों के लिए 12 लाख सीट की बुकिंग पर स्पेशल औफर दिया है. इंडिगो देश में अब तक की सबसे बड़ी एयरलाइन सेल औफर की है.’

6E नेटवर्क पर औफर

सस्ते किराए के लिए मशहूर इंडिगो एयरलाइन की इस सेल में कंपनी के 6E नेटवर्क पर औफर दिया गया है. इस नेटवर्क में इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी शामिल हैं. हालांकि, कुछ समय पहले ही इंडिगो ने अपने टिकट के दामों में बढ़ोत्तरी की थी. घरेलू मार्केट शेयर में देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो फिलहाल 1086 फ्लाइट्स को औपरेट करती है. इसमें 42 घरेलू और 8 अंतरराष्ट्रीय रूट भी शामिल हैं.

व्हाट्सऐप ने दिए फर्जी खबरों को पहचानने के ये 10 टिप्स

देश में लगातार सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रहे अफवाहों और फर्जी मैसेज के बाद अब व्हाट्सऐप ने खुद भारत के कई प्रमुख अखबारों में विज्ञापन जारी कर इससे बचने का उपाय सुझाया है. बता दें कि लगातार फर्जी मैसेज से मौब लिंचिंग की घटनाओं के बाद सरकार ने व्हाट्सऐप से इसे रोकने को कहा था जिसके बाद व्हाट्सऐप ने संदिग्ध लिंक जैसे कई फीचर्स को जारी करने का वादा किया और अब फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सऐप ने अखबारों में विज्ञापन देकर अपने यूजर्स को फर्जी खबरों और अफवाह वाले मैसेज पहचानने के 10 टिप्स दिए हैं.

आइए जानते हैं व्हाट्सऐप के इन टिप्स के बारे में.

  • फौरवर्ड मैसेज को पहचानें

हमने इस सप्ताह की शुरुआत में ही फौरवर्ड मैसेज का फीचर जारी किया है जिससे पता लगा सकते हैं कि वह मैसेज फौरवर्ड किया जा रहा है. जब भी आपको फौरवर्ड मैसेज प्राप्त होता है तो आप उसके तथ्यों की जांच करें.

  • मैसेज पर सवाल उठाएं

अगर आपको व्हाट्सऐप पर ऐसा कोई मैसेज प्राप्त होता है जिससे आपको गुस्सा आता है या डर लगता है उस मैसेज के बारे में पड़ताल कीजिए और पता लगाइए कि कहीं वह मैसेज आपकी भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से तो नहीं भेजा गया है. मैसेज पर यकीन होने के बाद ही उसे आगे किसी को भेजें नहीं तो तुरंत डिलीट कर दें.

  • ऐसे मैसेज की जांच करें जिस पर यकीन करना मुश्किल हो

कई बार ऐसे मैसेज भी आते हैं जिस पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल होता है, ऐसे मैसेज अक्सर सच नहीं होते. ऐसे में आप किसी अन्य स्रोत से पता लगाएं कि उस मैसेज में कितनी सच्चाई है.

  • अलग दिखने वाले मैसेज से बचें

कई बार ऐसे मैसेज आपको मिलते हैं जिनमें वर्तनी की गलती होती है. ऐसे अधिकांश मैसेज फर्जी और झूठे होते हैं. ऐसे मैसेज को तुरंत डिलीट करें और किसी को ना भेजें.

  • फोटो की जांच करें

जब आपको व्हाट्सऐप पर कोई फोटो और विडियो प्राप्त होता है तो उसकी जांच करें और उसे ध्यान से देखें. अक्सर फोटो और वीडियो को एडिट करके भेजा जाता है.

  • लिंक की जांच करें

ऐसा लग सकता है कि संदेश में मौजूद लिंक किसी परिचित या जानी-मानी साइट का है, लेकिन अगर उसमें गलत वर्तनी या विचित्र वर्ण मौजूद है तो संभव है कि कुछ गलत जरूर है.

  • अन्य सोर्स का प्रयोग करें

किसी भी खबर की जांच करने के लिए किसी अन्य समाचार साइट की मदद लें या टीवी से उसकी जांच करें. अगर उस घटना के बारे में कई जगहों पर लिखा गया है तो वह सच हो सकती है.

  • बिना समझे मैसेज आगे ना भेजें

किसी भी मैसेज को आगे भेजने से पहले एक बार जरूर सोचें कि उसमें दी गई जानकारी सही या गलत.

  • नापसंद वाले नंबर और ग्रुप को ब्लॉक कर दें

अगर आपको लगता है कि किसी नंबर से उल्टे-सीधे मैसेज मिल रहे हैं तो आप उसे ब्लॉक कर दें. इसके अलावा अफवाह फैलाने वाले ग्रुप को भी आप छोड़ सकते हैं.

  • झूठी खबरें अक्सर फैलती हैं

आप इस पर ध्यान न दें कि आपने संदेश को कितनी बार प्राप्त किया है. सिर्फ इसलिए कि संदेश कई बार साझा किया गया है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह खबर सच्ची हो. इसलिए जरा सावधान से मैसेज पढ़े.

सलमान की ‘भारत’ में हुई कटरीना की एंट्री

बौलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा एक बार फिर सलमान खान की अगली फिल्म भारत से बौलीवुड में कमबैक करने जा रही हैं. अभी तक हम सबको पता था कि यह दिशा पटानी और प्रियंका चोपड़ा की फिल्म है, लेकिन अब खबरें आ रही हैं कि इस फिल्म में प्रियंका के साथ कटरीना भी स्क्रीन शेयर करती नजर आएंगी. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा पहली बार होने जा रहा है जब कटरीना कैफ और प्रियंका चोपड़ा एक साथ किसी फिल्म में दिखाई देंगी. इसका क्रेडिट किसी और को नहीं बल्कि सलमान खान को जाता है.

खबरों के मुताबिक कटरीना व प्रियंका भारत के डायरेक्टर अली अब्बास जफर की काफी करीबी दोस्त हैं. अली की पहली फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हनिया’ में कटरीना ने लीड रोल अदा किया था. जबकि प्रियंका चोपड़ा, अली अब्बास की फिल्म गुंडे में लीड रोल में नजर आईं थीं. अली इन दोनों अदाकारा के काफी करीब हैं इसलिए अपनी फिल्म भारत में इन दोनों अभिनेत्रियों को अहम किरदारों में फिट कर सकते हैं.

रिपोर्ट्स यह भी बताते हैं कि कटरीना का फिल्म में स्पेशल रोल है जिसमें वह सलमान के अपोजिट दिखाई देंगी. उनका रोल प्रियंका जितना बड़ा नहीं होगा लेकिन महत्वपूर्ण होगा. बता दें कि सलमान खान की फिल्म भारत एक पीरियड फिल्म है और इसमें 70 साल के इतिहास की कहानी है जिसमें इतिहास के कई सारे पहलुओं को दर्शाया गया है. ये फिल्म के साल 2019 में ईद पर रिलीज हो सकती है.

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