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बड़े काम के हैं ये 5 औफलाइन ऐप, करेंगे आपकी मदद

1. गूगल मैप्स
गूगल ने पिछले साल अपने पॉपुलर नेविगेशन ऐप गूगल मैप्स में ऑफलाइन फीचर जोड़ा था. इस ऐप को ऑफलाइन इस्तेमाल करने के लिए आपको अपने पसंद के एरिया का मैप अपने डिवाइस में डाउनलोड करना होगा. फोन में मैप सेव होने के बाद यूजर को एक-एक करके ड्राइविंग डायरेक्शन की जानकारी मिलती रहेगी. आपको कब और कहां टर्न लेना है, इसकी ये जानकारी देता है. ट्रैवलिंग के दौरान जब भी डिवाइस इंटरनेट से कनेक्ट होगा, यह अपने आप ऑनलाइन मोड में आ जाएगा. ये मोड एक्टिवेट होते ही ऐप यूजर को ट्रैफिक अपडेट देता है. इस ऐप को गूगल प्ले स्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है.

2. रीडवेयर
रीडवेयर ऐप बुक्स और मैग्जीन का सबसे बड़ा ऑनलाइन स्टोर है. इसमें कई भाषाओं में अखबार, मैग्जीन, किताबें, कॉमिक्स वगैरह उपलब्ध हैं जिन्हें डाउनलोड कर आप ऑफलाइन भी पढ़ सकते हैं. इसमें आप अपने फेसबुक या गूगल अकाउंट से लॉगइन कर सकते हैं. रीडवेयर में हर यूजर का पर्सनल शेल्फ होता है जिसमें आपकी डाउनलोड की हुई किताबें, अखबार सेफ रहते हैं. इस ऐप से किसी मैग्जीन को सब्सक्राइब भी कर सकते हैं. इस सब्सक्राइब मैग्जीन को ऑफलाइन भी पढ़ सकते हैं. इस ऐप को गूगल प्ले स्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है.

3. गूगल ट्रांसलेट ऐप
गूगल ट्रांसलेट ऐप अनुवाद के लिए सबसे पॉपुलर ऐप में से एक है. गूगल ने इसे ऑफलाइन मोड में भी लॉन्च किया है. ये ऐप दुनिया की कुल 27 भाषाओं को सपोर्ट करता है. इसके पिक्चर मोड से टेक्स्ट के स्नैपशॉट के जरिए भी ट्रांसलेशन किया जा सकता है. ये ऐप गूगल प्ले स्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है.

4. जेंडर
ये एक फाइल शेयरिंग ऐप है. इससे आप दो स्मार्टफोन को भी कनेक्ट कर डाटा ट्रांसफर कर सकते हैं. जिन डिवाइस के बीच फाइल ट्रांसफर करना है, उन्हें साथ रख दीजिए. जैसे ही आप फोन पर जेंडर ऐप ओपन करेंगे, वह पहचान लेगा कि साथ वाले डिवाइस में जेंडर इन्स्टॉल है. इसके बाद डिवाइस को ग्रुप में एड कीजिए और फाइल चुनकर सेंड कर दीजिए. इसे गूगल प्लेस्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है.

5. Drugs Dictionary Offline
ये एक हेल्थ ऐप है जो यूजर्स को दवाओं और उनके इस्तेमाल के बारे में बताता है. यह ऐप यूजर को किस बीमारी में कौन सी दवा लेनी है, दवा का डोज, कैसे लें, साइड इफेक्ट, बचाव और स्टोरेज से जुड़ी सभी जानकारियां देता है. इस ऐप को गूगल प्ले स्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है.

आखिर प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास का हो गया ‘रोका’

गत दो माह से प्रियंका चोपड़ा और अमेरिकन पौप गायक निक जोनास की प्रेम कहानी व इनकी सगाई की खबरें काफी गर्म रही हैं. इस बीच प्रियंका चोपड़ा भी अपने हाथ की अंगूठी को कभी दिखाते तो कभी छिपाते नजर आयी. मगर जब 17 अगस्त को निक जोनास का परिवार अमेरिका से मुंबई पहुंचा और प्रियंका चोपड़ा के जुहू इलाके के बंगले पहुंचा,तो बौलीवुड व मीडिया में चर्चा गर्म हो गयी थी कि अब प्रियंका चोपड़ा निक के साथ अपने रिश्तों को जग जाहिर कर देंगी.

अंततः 18 अगस्त की सुबह से प्रियंका चोपड़ा के बंगले पर उनके करीबी रिश्तेदारों का जुटना शुरू हो गया. उनकी चचेरी बहन व अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा भी पहुंची. फिर कुछ देर बाद मीडिया में प्रियंका चोपड़ा व निक जोनास के एक साथ बैठकर पूजा करने की तस्वीरें बाहर आयी. इन तस्वीरों में निक के माता पिता भी पूर्णरूपेण भारतीय परिधान में नजर आए. पूजा खत्म करने के बाद जब पूजा कराने वाले पंडित बाहर निकले तो उन्होंने मीडिया से गोलमेाल बात करते हुए कहा-‘‘हमने प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास के सुखद भविष्य के लिए पूजा की है. इस पूजा में यह दोनों बैठे थे. मगर इनकी सगाई या रोका को लेकर मुझे कुछ पता नहीं है.’’

मगर कुछ देर बात खबर पक्की हो गयी कि प्रियंका चोपड़ा ने अपनी उम्र से ग्यारह वर्ष छोटे अपने प्रेमी व पौप गायक निक जोनास के साथ पारिवारिक सदस्यों की मौजूदी के बीच रोका कर लिया. रोका की रस्म पूरी होते ही परणीति चोपड़ा सहित बौलीवुड के तमाम कलाकारों व फिल्मकारों ने सोशल मीडिया पर जमकर शुभकामनाएं दे डाली. मगर शाम को आयोजित रंगारंग कार्यकम में बौलीवुड की उपस्थिति न के बराबर रही. निक, प्रियंका और परिणीति चोपड़ा ने रात की पार्टी के वीडियो व तमाम तस्वीरें इंस्टाग्राम पर पोस्ट की. कहने का अर्थ यह कि प्रियंका चोपड़ा के रोका की खबर व तस्वीरें आदि सोशल मीडिया पर पिछले तीन दिन से हावी हैं.

दिन में रोका के बाद रात में आयोजित रंगारंग नृत्य के कार्यक्रम से बौलीवुड ने दूरी बनाकर रखी. बौलीवुड से परिणीति चोपड़ा, आलिया भट्ट, विशाल भारद्वाज, आयुष शार्मा, अर्पिता खान, अनुषा दांडेकर, संजय लीला भंसाली और सिद्धार्थ रौय कपूर ही मौजूद रहे. हां. उद्योगपति अंबानी का परिवार जरुर इसका हिस्सा बना. बौलीवुड की गैर मौजूदगी को लेकर अब कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं.

मजेदार बात यह है कि सोशल मीडिया पर प्रियंका को बधाई देने वालों में शाहिद कपूर, रितिक रोशन व रणवीर सिंह सबसे आगे रहे. परिणीरति चोपड़ा ने तो अपनी बहन के नाम सोशल मीडिया पर भावना प्रधान तक पोस्ट कर डाला.

ज्यादा क्रेडिट कार्ड रखना हो सकता है खतरनाक, जानिए क्यों?

अक्सर नौकरीपेशा लोगों के पास बैंकों की ओर से क्रेडिट कार्ड लेने के औफर्स आते रहते हैं. कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले आकर्षक औफर्स के कारण अक्सर लोग काफी सारे क्रेडिट कार्ड ले लेते हैं और उनका इस्तेमाल शुरू कर देते हैं. ऐसे में लोग इन कार्ड का इस्तेमाल तो आसानी से कर लेते हैं लेकिन बिल के भुगतान में लेट-लतीफी करते हैं जिससे उनका सिबिल स्कोर खराब हो जाता है. हालांकि अगर आप दो या तीन बैंकों से क्रेडिट कार्ड लेकर यूज कर रहे हैं और उसका पेमेंट एकमुश्त या किश्तों में समय-समय पर कर रहे हैं तो यह भविष्य में आपके बैंक लोन के लिए बेहतर होगा.

सिबिल स्कोर के बारे में जानिए?

सिबिल स्कोर से पता चलता है कि आपने पहले कितना लोन ले रखा है और उसका भुगतान समय पर किया है या नहीं. बैंक कोई भी कर्ज देने से पहले आपका सिबिल स्कोर चेक करते हैं. आपको क्रेडिट कार्ड देने के पहले भी सिबिल स्कोर चेक किया जाता है. अगर आपने नियमित कर्ज चुकाया है तो आपका सिबिल स्कोर या क्रेडिट स्कोर अच्छा रहता है. जितना अच्छा सिबिल स्कोर होता है, उतनी ही आसानी से कर्ज मिलता है. सिबिल स्कोर को 24 महीने की क्रेडिट हिस्ट्री के हिसाब से तैयार किया जाता है.

अगर आपने क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान देरी से किया है या आपका ईएमआई बाउंस हो गया है तो आपको डिफाल्टर घोषित किया जा सकता है जिससे आपके क्रेडिट स्कोर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

आपके नाम पर क्रेडिट खातों की संख्या

समय पर कर्ज चुकाने को लेकर 30 फीसद सिबिल स्कोर बनता है. इसलिए आपको अपने क्रेडिट कार्ड की क्रेडिट लिमिट और बकाया रकम को कम रखना चाहिए और क्रेडिट कार्ड से ज्यादा लोन नहीं लेना चाहिए. आपको होम लोन, औटो लोन जैसे सिक्योर्ड लोन को ज्यादा महत्व देना चाहिए और अनसिक्योर्ड लोन से बचना चाहिए. बता दें कि सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड लोन पर 25 फीसद सिबिल स्कोर बनता है.

अगर आपकी आमदनी औसत आय से ज्यादा है और आप तीन क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह आपके लिए चिंता की बात नहीं है, लेकिन अगर आप अपने क्रेडिट कार्ड का यूज उपलब्ध लिमिट 60 फीसद से ज्यादा करते हैं तो यह आपके लिए चिंता का विषय हो सकता है.

यदि आप क्रेडिट कार्ड पर ज्यादा क्रेडिट का इस्तेमाल कर रहे हैं और कभी कार्ड के बिल का भुगतान देर से करते हैं या मासिक भुगतान में चूक हो जाती है तो यह आपके क्रेडिट स्कोर को खराब कर देगा. इसका मतलब यह है कि आपकी अधिकांश आय क्रेडिट कार्ड के बिल भुगतान में ही खत्म हो जा रही है, जिससे बैंक आपको लोन देने में जोखिम महसूस करेंगे. इसलिए बेहतर होगा कि आप कम से कम क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करें और अगर कर भी रहे हैं तो उसके बिल का भुगतान समय पर कर दें.

मुझे हास्य किरदार निभाने में कुछ ज्यादा ही मजा आता है : सोनाक्षी सिन्हा

सोनाक्षी सिन्हा की पिछली कुछ फिल्में बाक्स आफिस पर बुरी तरह से असफल रही हैं, मगर इसके लिए वह खुद को दोषी नहीं मानती. उनके अनुसार हर फिल्म में उनके अभिनय की तारीफ हुई. फिलहाल वह 24 अगस्त को प्रदर्शित होने वाली निर्माता आनंद एल राय व निर्देशक मुदस्सर अजीज की फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ को लेकर उत्साहित हैं. जो कि ‘हैप्पी भाग जाएगी’की सिक्वअल फिल्म है. मजेदार बात यह है कि सोनाक्षी सिन्हा ने पहली फिल्म ‘हैप्पी भाग जाएगी’ करने से इंकार कर दिया था.

आपने ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ करने से इंकार कर दिया था. पर अब उसकी सिक्वल फिल्म कर रही हैं?

मैं पहले भी ‘हैप्पी भाग जाएगी’ करना चाहती थी, लेकिन दूसरी फिल्मों में अपनी व्यस्तता के चलते नहीं कर पायी थी. उसके बाद मैंने यह फिल्म देखी, तो मुझे बहुत पसंद आयी. इसलिए जैसे ही मुझे इसके सिक्वल के लिए मुदस्सर ने संपर्क किया, मैंने हामी भर दी. सिक्वअल फिल्म की टीम वही है, कलाकार वही हैं, सिर्फ मैं और जस्सी गिल इस फिल्म में नए जुड़े हैं. तो मुझे लगा कि पूरी टीम एक बार फिर अच्छी फिल्म बनाएगी. इसके अलावा जब निर्देशक मुदस्सर अजीज ने हमें कहानी सुनायी, तो हमें काफी पसंद आयी. हम तो पटकथा सुनते हुए हंस रहे थे. इस व्यंगात्मक हास्य फिल्म में बहुत कुछ सकारात्मक है. मेरा किरदार भी काफी अलग है. मुझे हास्य किरदार निभाने में कुछ ज्यादा ही मजा आता है. यदि आप गौर करेंगे, तो पाएंगे कि मेरी हर फिल्म में हास्य का कुछ तो पुट रहता ही है.

हैप्पी भाग जाएगीको मिली सफलता ने भी आपको..?

देखिए, हर फिल्म का सफल होना जरुरी है. फिल्म से जुड़े हर तकनीशियन व कलाकार की इच्छा यही होती है कि उनकी फिल्म को बाक्स आफिस पर सफलता मिले. लेकिन इससे कलाकार की जिंदगी किस तरफ जाएगी, यह तय नहीं होता पर यह आवश्यक है कि दर्शक आपके काम को सराहें. आप मेरी 2013 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘लुटेरा’’को लीजिए. मेरी इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर सबसे कम कमाई की थी. लेकिन इस फिल्म में मेरे काम को काफी सराहा गया था. इसलिए मेरा सारा ध्यान सिर्फ अपने अभिनय पर रहता है. मैं बाक्स आफिस पर ध्यान नहीं देती.

फिल्म‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’के अपने किरदार पर रोशनी डालेंगी?

मेरे किरदार का नाम हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी ही है. यह अमृतसर की रहने वाली पंजाबी लड़की है, जो कि अपने परिवार से बहुत प्यार करती है. पर उसकी अपनी कुछ महत्वाकांक्षाएं हैं. खुशमिजाज है. आप इसे एक अच्छी आधुनिक पंजाबी लड़की कह सकते हैं. पर किस तरह वह पुरानी वाली हैप्पी की वजह से ऐसी परिस्थितियों में फंस जाती हैं जहां उसे नहीं फंसना चाहिए था. उसके बाद तमाम हास्य घटनाक्रम शुरू होते हैं.

फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ के लेखक व निर्देशक मुदस्सर अजीज को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

वह बहुत अच्छा लिखते हैं. सेट पर वह बहुत ही खुले दिमाग से आते हैं. उनकी भाषा बहुत अच्छी है. वह इतनी सरलता से सीन समझाते हैं कि कलाकार के तौर पर हमारे लिए अभिनय करना आसान हो जाता है. उनकी यह खूबी मुझे बहुत पसंद है.

आप अपने भाईयों के साथ होम प्रोडक्शन शुरू करने वाली थीं. उसका क्या हुआ?

इसका जवाब तो मेरे भाईयों से पूछिए. जब उनकी तैयारी पूरी हो जाएगी, तो मेरे पास आएंगे. कलाकार के तौर पर मैं हमेशा अपने भाईयों की फिल्म करने के लिए तैयार हूं. फिलहाल मुझे नहीं पता कि उनकी कितनी तैयारी हुई है.

आप सोशल मीडिया पर क्या लिखना पसंद करती हैं?

मैं ट्वीटर पर ज्यादा सक्रिय नही हूं. क्योंकि ट्वीटर पर हर कोई अपनी अपनी राय लिखता रहता है. सच कहूं तो ट्वीटर पर बहुत बदतमीज लोग आ गए हैं. मैं नकारात्मकता से दूर रहना पसंद करती हूं. हां! जब कुछ बहुत ज्यादा जरूरी लगता है, तो उसे जरूर लिखती हूं. या अपने काम से रिलेटेड कुछ लिख देती हूं. हां! इंस्टाग्राम पर फोटो बहुत डालती हूं और लोगों को अच्छा भी लगता है.

सोशल मीडिया पर बढ़ रही अराजकता को रोकने का कोई रास्ता आपको समझ आता हैं?

इन्हें रोकेगा कौन? यह तो वह कायर हैं, जो कि अपना चेहरा छिपाकर गालियां बकते हैं. इन्हें लगता है कि एक सेलीब्रिटी को हम कुछ भी बोल सकते हैं. पर हमें बुरा लगता है कि हमारे समाज के लोग यहां तक पहुंच गए हैं. मेरा मानना है कि हर इंसान को यह याद रखना चाहिए कि जो चीज आप किसी के चेहरे/मुंह पर नहीं कह सकते, उसे आप औन लाइन ना कहें. हां! सोशल मीडिया पर जो अराजकता है, उस पर रोक तो सोशल मीडिया के कर्ताधर्ता ही लगा सकते है. अन्यथा बंदिश नहीं लगा सकते. हां! हम ऐसे लोगों की अनदेखी करके उन्हें जवाब दे सकते हैं.

आप मानती हैं कि सोशल मीडिया का गलत उपयोग हो रहा है?

सोशल मीडिया बहुत सशक्त माध्यम हैं. इसके माध्यम से हम तमाम अच्छी चीजें लोगों तक पहुंचा सकते हैं. पर ऐसा हो नहीं रहा है. क्योंकि यदि आप कोई एक अच्छी चीज डालते हैं, तो दस लोग उसे तोड़ मरोड़ कर नगेटिव बनाकर पेश कर देते हैं. पर मैंने देखा है कि 100 सकारात्मक चीजें आ रही हैं. मैं तो नगेटिव चीजों की बजाय पाजीटिव चीजों पर अपना ध्यान रखती हूं.

दूसरी फिल्में कौन सी कर रही हैं?

करण जोहर की फिल्म‘कलंक’की शूटिंग चल रही है. इसके बाद सलमान खान के साथ ‘दबंग 3’ की शूटिंग शुरू होगी. ‘यमला पगला दीवाना फिर’ भी जल्द रिलीज होने वाली है. इसमे मैं सिर्फ एक गाने में नजर आउंगी. शायद मुदस्सर अजीज की अगली फिल्म भी करुं.

भ्रामक उपचार का प्रचार : जागरूक जनता और बाजारवाद

पिछले कुछ सालों से बाजारवाद के चलते जनता सेहत के प्रति बहुत जागरूक हुई है. जागरूक होना अच्छी पहल है, लेकिन इस जागरूकता के पीछे बाजारवाद का होना खतरनाक है.

टैलीविजन चैनलों पर देशी नुसखे और 100 फीसदी फायदे की गारंटी के साथ इश्तिहार दिखाए जाते हैं. इन में 7 दिनों में सिर पर बाल आना, 10 दिनों में डायबिटीज की बीमारी ठीक होना और 7 दिनों में चेहरे की झुर्रियां गायब कर देने की देशी दवाएं बताई जाती हैं. बाद में एक बात कही जाती है कि

इसे सब्सक्राइब करें यानी इन का यह सब्सक्राइब हजार से ऊपर होने पर चैनल उस पर उसी हिसाब से इश्तिहार डालता है और हर इश्तिहार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा फर्जी लोगों के पास चला जाता है.

कुछ लोगों के इंटरव्यू भी दिखाए जाते हैं. उसी के साथ एक झूठी कहानी भी बताई जाती है कि किस तरह अफ्रीका के घने जंगलों में फलां फल को खोजा गया और उस का इस्तेमाल किया गया, जिस से शर्तिया फायदा मिल गया.

कौन सा फल? उस के रासायनिक गुण क्या हैं? उस के साइड इफैक्ट क्या हैं? इस बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता है, जो ड्रग ऐेंड कंट्रोल के कायदे के मुताबिक कंपनी द्वारा बताया जाना जरूरी है.

पिछले दिनों शुगर की बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए एक ऐसा ही तकरीबन 2,000 रुपए का प्रोडक्ट आया. हैरानी की बात यह है कि उसे लाखों लोगों ने खरीदा, जिस से कंपनी करोड़पति बन गई. पर उस प्रोडक्ट में जो दवाएं मिलाई गई थीं वे कितनी मात्रा में थीं, इस का कहीं भी जिक्र नहीं था और उस का भी प्रचार अफ्रीका के जंगलों और हिमालय पर्वत की घाटियों से लाई गई जड़ीबूटियों के नाम से किया गया था.

न तो 7 दिनों में झुर्रियां जाती हैं और न ही सिर पर 7 दिनों में बाल उगते हैं, लेकिन चैनल पर बैठे वैद्य या डाक्टर खुद के मरीजों द्वारा फायदा दिए जाने की दुहाई देते हैं और आखिर में यह कहते सुनाई देते हैं कि इस जानकारी को जनहित में प्रचारित कीजिए, जितने लाइक और सब्सक्राइब बढ़ेंगे, चैनल पर उस के भाव और बढ़ेंगे, लेकिन इस नीमहकीमी से जो परेशानियां होंगी उन्हें कैसे दूर करना है, इस का कोई जिक्र नहीं होता है.

कुछ कंपनियों के बनाए सामान को आप नहीं जानते हैं, जबकि उन की कीमत लोकल ब्रांडेड कंपनियों के बनाए गए सामान से 50 से 80 गुना ज्यादा होती है. आप को सिर्फ फोन करना होता है, दवा घर पहुंच जाती है. अगर वीपीआर नहीं छुड़वाया तो उन्हें कुछ नुकसान नहीं होता है क्योंकि पहले ही वे कई गुना ज्यादा किसी से वसूल चुके होते हैं, इसलिए अपनी सेहत से खिलवाड़ न करें. आप के फैमिली डाक्टर जो सलाह दें उसी के मुताबिक दवाओं का सेवन करें.

अगर टैलीविजन चैनल की दवा खाने से कुछ साइड इफैक्ट हो गया तो आप भी परेशान होंगे और आप का डाक्टर भी.

बहुत सी दवाओं का ऐंटी डोज दवा में रखे कागज पर होता है लेकिन इन  दवाओं का ऐंटी डोज क्या लेना है, ऐसा कुछ लिखा नहीं होता है. ये लोग अपना सामान बेच कर कई गुना फायदा कमाते हैं, ऊपर से इश्तिहार से भी आमदनी हासिल करते हैं. नुकसान में ग्राहक ही रहते हैं जो रुपयों के अलावा सेहत भी खोते हैं, इसलिए टैलीविजन चैनल पर घर बैठे शर्तिया इलाज के उपयोग से बचें और अपनी सेहत को महफूज रखें.

कौन है गीता की बदहाली का जिम्मेदार

अनाथ गीता शायद दुनिया की पहली ऐसी लड़की है जिस के मांबाप, पता, जातिधर्म का किसी को पता नहीं. यहां तक कि गीता नाम भी उसे पाकिस्तानियों ने दिया है.

गीता की दुखद कहानी तो उस के पैदा होने के साथ ही शुरू हो गई थी क्योंकि वह न तो बोल सकती थी और न ही सुन सकती थी. सरकारी जबान में कहें तो वह मूकबधिर यानी गूंगीबहरी है.

गीता कौन है और कहां की है, इस सवाल का जवाब हासिल करने की जीतोड़ कोशिशें सरकार के विदेश मंत्रालय ने कीं, लेकिन अब तक वह भी नाकाम ही रहा है.

साल 2003-04 में मासूम गीता भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली ट्रेन में लावारिस हालत में पाकिस्तानी सैनिकों को मिली थी.

पाकिस्तानी सैनिकों ने तरस खा कर उसे कराची की मशहूर समाजसेवी संस्था ईधी फाउंडेशन के हवाले कर दिया तो गीता वहीं की हो कर रह गई. इस फाउंडेशन के कर्ताधर्ता पाकिस्तान के नामी समाजसेवी अब्दुल सत्तार और उन की बीवी बिल्किस बेगम ने उसे हिंदू मानते हुए गीता नाम दे दिया था.

इन दोनों मियांबीवी ने लाख कोशिशें कीं, पर गीता के घरबार और मांबाप का पता नहीं चला.

गीता चूंकि हिंदू और हिंदुस्तानी मान ली गई थी, इसलिए ईधी फाउंडेशन में ही उस के पूजापाठ के इंतजाम कर

दिए गए. लेकिन भगवान भी गीता के पूजापाठ के आगे नहीं पसीजा और गीता गुमनामी की जिंदगी जीने लगी.

और जब वतन आई  गीता की कहानी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की जानकारी में आई तो वे पसीज उठीं. उन्हें लगा कि अपने देश की इस लड़की को अगर उस के घर और मांबाप से मिला दिया जाए.

गीता 14 साल पाकिस्तान के ईधी फाउंडेशन में रही और वहीं जवान हुई. एक तरह से पाकिस्तान ही उस का घर और वतन हो गया था. यह कशिश मिट्टी की ही कही जाएगी कि उसे इतने साल बाद भी अपना घर और देश याद आते थे.

सुषमा स्वराज ने पहल करते हुए पाकिस्तान से गीता मांगी तो पाकिस्तान ने मना नहीं किया और गीता को सौंपने के लिए राजीखुशी रजामंदी जता दी.

लंबी सरकारी कवायद के बाद आखिरकार 26 अक्तूबर, 2015 को गीता के भारत आने की तारीख तय हुई.

इस के पहले गीता की वापसी को ले कर खूब होहल्ला मचा. मीडिया ने स्क्रीन और पन्ने गीता की वापसी से रंग डाले थे. सुषमा स्वराज की नेकदिली की तारीफ हुई. तब तय है कि तब उन्हें कतई अहसास नहीं रहा होगा कि वे हवन करते अपना हाथ जला रही हैं.

तयशुदा तारीख को गीता पाकिस्तान एयरलाइंस के हवाईजहाज से भारत आई तो उस का स्वागत राजकुमारियों सरीखा किया गया. हवाईअड्डे पर नेताओं और अफसरों की फौज खड़ी हुई थी. तब गीता के साथ उस की मुंहबोली मां बिल्किस बेगम और उन का बेटा फैजल ईधी भी था.

वाहवाही लूटने की गरज से गीता को तब के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से खासतौर से मिलवाया गया. हालांकि यह एक बेतुकी बात थी क्योंकि गीता तो जानतीसमझती ही नहीं थी कि इन हस्तियों के माने क्या होते हैं और इन तीनों को भी समझ नहीं आ रहा था कि गीता से क्या बात करें और कैसे करें.

इस के पहले गीता जब पाकिस्तान में थी तब उस का फोटो विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर वायरल किया था. मंशा और मकसद यह था कि गीता के मांबाप मिल जाएं और उसे घर ले जाएं.

देशभर के राज्यों के कोई दर्जनभर मांबापों ने गीता पर दोवदारी जताई, तो विदेश मंत्रालय ने तय यह किया कि गीता का डीएनए मैच किया जाएगा जिस से उसे उस के असली मांबाप को ही सौंपा जाए. ईधी फाउंडेशन भी इसी शर्त पर तैयार हुआ था.

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जब दावेदारों के फोटो गीता को दिखाए गए तो उस ने बिहार के सहरसा जिले के रहने वाले जनार्दन महतो नाम के शख्स को अपना पिता बताया. जनार्दन महतो ने भी कहा था कि गीता ही उन की खोई हुई बेटी है जो सालों पहले बिछुड़ गई थी.

एक वक्त में यह मान लिया गया था कि जनार्दन महतो ही गीता के असली पिता हैं. हालांकि ईधी फाउंडेशन के फैजल ईधी को शक था कि गीता महज भारत जाने की गरज से झूठ बोल रही है. इस बाबत उन्होंने कहा भी था कि मुमकिन है, गीता गुमराह कर रही हो लेकिन भारत में गीता की वापसी को ले कर इतना होहल्ला मचा दिया गया था कि फैजल की आवाज उस में दब कर रह गई.

गीता को कई हस्तियों से मिला कर मध्य प्रदेश के इंदौर के एक मूकबधिर केंद्र भेज दिया गया. इस की कर्ताधर्ता वहां की मशहूर समाजसेविका मोनिका पंजाबी हैं. गीता की देखरेख और खर्चे के लिए सरकार उन के केंद्र को 30,000 रुपए महीना देती है. लेकिन अब तक गीता के स्वागतसत्कार पर ही लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं.

गीता का डीएनए जनार्दन महतो से नहीं मिला तो मानो गाज सी गिरी. उसी समय में यह बात उजागर हुई कि जर्नादन महतो की गुम लड़की की शादी तो लुधियाना के उमेश महतो नाम के शख्स से बचपन में ही हो चुकी थी और उमेश से उसे एक बेटा भी है. इधर गीता इशारों में बता रही थी कि उस की तो कभी शादी ही नहीं हुई थी.

लेकिन उम्मीद की किरण अभी बाकी थी. सोचा यह गया कि जनार्दन महतो न सही किसी और दावेदार से उस का डीएनए मैच हो सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं तो सुषमा स्वराज की कवायदों और कोशिशों पर पानी फिरता नजर आया. 2 साल में कई बार वे गीता से मिलीं तो गीता ने हर बार उन्हें मांबाप से मिलाने का वादा इशारों में याद दिलाया.

खजूर पे अटकी

इंदौर के सैंटर में रहतेरहते एक दफा गीता भाग गई तो खासा हड़कंप मच गया. शहर के 3 थानों की पुलिस उसे ढूंढ़ने में जुट गई. दोपहर को गायब हुई गीता शाम को एक हनुमान मंदिर में मिली तो नेताओं और अफसरों ने चैन की सांस ली.

गीता क्यों और कैसे भागी थी, इस सवाल का जवाब देने से हर कोई खासतौर से मोनिका पंजाबी बचती ही रहीं. मीडिया वाले जब इस सवाल को ले कर मूकबधिर केंद्र पहुंचे तो उन्हें वहां की एक मुलाजिम ने फटकार कर भगा दिया. इस पर गुस्साए मीडिया ने यह कहना शुरू कर दिया कि गीता को मूकबधिर केंद्र में पूरी सहूलियतें नहीं मिल रही हैं और वह कैद से परेशान है.

बात आईगई हो गई, लेकिन गीता को ले कर इंदौर प्रशासन की नींद उड़ी हुई थी. गीता को ले कर तरहतरह की खबरें रोज आने लगी थीं. लिहाजा, प्रशासन भी गीता को ले कर एहतियात बरतने लगा.

मांबाप के मिलने की आस 2 साल में पूरी तरह टूट गई तो गीता की उदासी और गुस्सा दोनों बढ़ने लगे. हालत यह थी कि प्रशासन और मूकबधिर केंद्र वाले इस डर को ले कर हलकान रहने लगे कि कहीं गीता खुद को कोई नुकसान न पहुंचा ले, नहीं तो लेने के देने पड़ जाना तय बात थी.

बुरे और मुश्किल दौर से गुजरती गीता के एक मददगार हैं इंदौर के ही ज्ञानेंद्र पुरोहित और उन की पत्नी मोनिका पुरोहित, जो सालों से मूकबधिरों के लिए काम कर रहे हैं और कई मूकबधिर लड़कियों को उन के घर वालों से मिलवा चुके हैं.

ज्ञानेंद्र ने गीता को सांकेतिक भाषा यानी साइन लैंग्वेज सिखाई और हर तरह से उस के जज्बातों को समझा.

ज्ञानेंद्र गीता की दिमागी हालत देख खौफजदा थे क्योंकि वह गहरे तनाव में थी और इस की वजह भी थी कि जिस नाम और पहचान के लिए वह भारत आई थी, वे उसे लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मिल रहे थे. उस की हालत आसमान से गिरे और खजूर पे अटके जैसी हो गई.

स्वयंवर का फ्लौप ड्रामा

जब यह तय हो गया कि अब गीता के मांबाप का मिलना मुश्किल काम है तो उस की शादी की बात उठी. कहा गया कि खुद गीता ने शादी की ख्वाहिश जताई थी, लेकिन यह चर्चा भी रही कि गले की हड्डी बनती जा रही गीता से अब सरकार पल्ला झाड़ना चाहती है इसलिए उस की शादी पर जोर दे रही है जिस से वह ससुराल चली जाए.

गीता की शादी को ले कर भी सरकार ने जल्दबाजी दिखाते हुए ऐलान कर दिया कि गीता का स्वयंवर होगा जिस में जिसे भी वह शौहर चुनेगी उसे सरकारी नौकरी और घर के अलावा तमाम दूसरी सहूलियतें दी जाएंगी. इस स्वयंवर का भी खूब ढिंढोरा पीटा गया. गीता के लिए पति चुनने में खासतौर से फेसबुक पर एक पेज बनाया गया.

उम्मीद थी कि सरकारी दहेज के लालच में सरकारी दामाद बनने के लिए लड़कों की लाइन लग जाएगी लेकिन हुआ उलटा. केवल 14 उम्मीदवारों ने ही गीता से शादी करने में दिलचस्पी दिखाई. बीती 7 और 8 जून को इंदौर में मूकबधिर गीता के स्वयंवर में कुल 6 लोग आए. इन में से किसी ने गीता को रिजैक्ट कर दिया तो किसी को गीता ने.

गीता की शर्तें थीं कि लड़का खाताकमाता और शहरी होना चाहिए, उसे सांकेतिक भाषा भी आनी चाहिए. उसे इंदौर में ही रहना होगा और वह उस के मांबाप को ढूंढ़ने में उस की मदद करने को बाध्य होगा.

इतनी कड़ी और बेतुकी शर्तें सुन कर सभी उम्मीदवार खिसक लिए तो बात फिर वहीं अटक गई, जहां से शुरू हुई थी. यह चर्चा होना कुदरती बात थी कि इंदौर आने के बाद ढाई साल में ही गीता इस हद तक सयानी हो गई है कि उसे अपनाने आए उम्मीदवारों पर ऐसी शर्तें थोप रही है, जिन्हें पूरा कर पाना किसी के बस की बात नहीं.

जाहिर है, गीता सरकारी ऐशोआराम छोड़ कर घरगृहस्थी के बंधन में नहीं बंधना चाहती जहां चूल्हाचौका करना पड़े. 19 जून, 2018 को गीता इस बात पर अड़ गई कि वह शादी तभी करेगी जब उस के मांबाप मिल जाएंगे.

उम्मीदवार भी उम्मीद से कम आए तो इस की और भी वजहें थीं. हर किसी को अहसास था कि अगर शादी के बाद गीता ने जरा सी भी शिकायत की तो घर और नौकरी तो छिनेंगी ही, साथ ही जेल की चक्की और पीसनी पड़ेगी क्योंकि गीता कोई ऐसीवैसी लड़की नहीं, बल्कि सरकारी राजकुमारी है जिस के नखरे उठाना मजबूरी हो जाएगी. इस के अलावा जातपांत और धर्म का बंधन भी आड़े आता दिखा.

अब क्या होगा

2 बार की तामझाम के बाद गीता अब फिर मूकबधिर केंद्र में गुमसुम बैठी है. उस के हमदर्द और मैंटर ज्ञानेंद्र पुरोहित को इस बात का डर है कि वह कहीं गुस्से और दुख में कहीं ऐसावैसा कदम न उठा ले. अगर ऐसा हुआ तो किरकिरी सरकार और सुषमा स्वराज की होगी जो गीता को देश लाई थीं.

गीता बदहाल और गुमनाम जिंदगी जी रही है. जी क्या रही है, बल्कि ढो रही है तो साफ है इस की जिम्मेदार सरकार है जिस ने शोहरत के लिए जल्दबाजी में फैसले लिए और अब गीता के भविष्य के लिए कुछ नहीं कर पा रही है.

गीता की बदकिस्मती बरकरार है और उसे ले कर प्रशासन फिर डरासहमा है तो किसी को कुछ नहीं सूझ रहा है कि अब क्या किया जाए.

यह परेशानी उस वक्त और बढ़ जाती है, जब वह कभी ऐक्टर सलमान खान तो कभी क्रिकेटर विराट कोहली से मिलने की जिद पकड़ लेती है.

अंधविश्वास : डाक्टर की मानें झाड़फूंक की नहीं

रीमा कैंसर की पहले स्टेज से जूझ रही थीं. डाक्टरों का कहना था कि अगर वे समय से पूरा इलाज करा लेंगी तो ठीक हो सकती हैं. लेकिन रीमा के परिवार वालों का डाक्टर के इलाज से ज्यादा झाड़फूंक पर यकीन था. वे उन्हें एक बाबा के पास ले कर पहुंचे.

उस बाबा ने अपने तंत्रमंत्र से रीमा को ठीक करने का दावा किया जिस पर परिवार वालों ने आंख मूंद कर यकीन कर लिया.

उस बाबा ने इस के एवज में न केवल ढेर सारे रुपयों की मांग की, बल्कि रीमा को डाक्टर के पास ले जाने से मना भी कर दिया.

परिवार के लोग रीमा को अकसर उस बाबा के पास झाड़फूंक के लिए ले जाने लगे. रीमा की बीमारी बढ़ती जा रही थी लेकिन उन के घर वालों को उस बाबा पर इस कदर यकीन था कि रीमा की पीड़ा को भी वे महसूस नहीं कर पा रहे थे.

एक दिन रीमा की हालत ज्यादा खराब होने लगी. उन के परिवार वालों को लगा कि उन्हें एक बार फिर से डाक्टर को दिखाना चाहिए.

डाक्टर ने बताया कि झाड़फूंक के चलते रीमा की बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है और उन का बचना मुश्किल है. आखिरकार एक दिन रीमा की मौत हो गई.

इस देश में आज भी लोग बीमारियों का इलाज माहिर डाक्टरों से न करा कर बाबाओं, पीरफकीरों की शरण में खोजते हैं. ऐसे में हर रोज हजारों लोगों को पाखंड और पोंगापंथ के चक्कर में अपनी जान गंवानी पड़ती है.

डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि उन के पास हर रोज ऐसे मरीज आते हैं जो झाड़फूंक के चक्कर में पड़ कर अपनी बीमारी को गंभीर बना लेते हैं या मौत के मुंह में चले जाते हैं. कई बार मरीजों को झाड़फूंक न कराने की सलाह देने पर उन्हें भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है.

पढ़ेलिखे भी शिकार

एक मनोविज्ञानी राधेश्याम चौधरी का कहना है कि पढ़ेलिखे लोगों की इलाज के लिए बाबाओं के आगे लाइन लगाने की खास वजह यह होती है कि उन के मन में बचपन से ही भूतप्रेतों और बाबाओं को ले कर डर बैठा दिया जाता है जिसे वे बड़ा होने पर भी अपने मन से निकाल नहीं पाते हैं.

अगर ऐसे लोग कभी बीमार पड़ते भी हैं या परेशानियों का शिकार होते हैं तो उन्हें इस का इलाज बाबाओं के पास ज्यादा दिखाई देता है. उन को इस बात की समझ तब आती है जब वे बाबाओं के झांसे में पड़ कर अपना नुकसान कर बैठते हैं. हमें बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा करनी चाहिए जिस से उन के मन में भूतप्रेतों का डर न रहने पाए.

ऐसे मरीज हैं ज्यादा

पीरफकीरों के यहां झाड़फूंक कराने आए ज्यादातर लोग दिमागी बीमारियों से जूझ रहे होते हैं. ऐसे मरीजों के परिवार वाले मरीज की ऊलजुलूल हरकतों को भूतप्रेत का साया मान लेते हैं जिस के चलते वे बाबाओं की शरण में पहुंच जाते हैं.

झाड़फूंक की दुकान चलाने वाला बाबा सब से पहले उन्हें डाक्टरों के पास ले जाने से मना करता है, क्योंकि उसे पता होता है कि अगर मरीज डाक्टर के पास चला गया तो न केवल आसानी से ठीक हो जाएगा बल्कि उसे अपनी झाड़फूंक की दुकान भी बंद करनी पड़ जाएगी. इस से लंबे समय तक जेब ढीली करने वालों की तादाद में कमी आ जाएगी और उस की पोल खुलने का भी डर बना रहेगा.

मानसिक रोग विशेषज्ञ डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि दिमागी बीमारी के ज्यादातर मरीज तो उन के पास तब आते हैं जब उन की हालत बहुत ज्यादा बिगड़ चुकी होती है.

परिवार से पूछने पर पता चलता है कि मरीज की अजीबोगरीब हरकतों को भूतप्रेतों का साया मान कर वे उस की झाड़फूंक करा रहे थे.

अजीब हरकतें करना दिमागी बीमारी की निशानी है. इस में कई तरह के लक्षण एकसाथ दिखाई पड़ सकते हैं. इन में स्किजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऔर्डर या कैटाटोनिक अवसाद जैसी कई बीमारियां शामिल हैं.

इन बीमारियों में मरीज के विचारों और बरताव में बदलाव आ जाता है. इस के चलते वह कुछ समय के लिए अपनी देखभाल करने में नाकाम हो जाता है.

इसी तरह के लक्षण दूसरी दिमागी बीमारियों में भी पाए जाते हैं. कुछ बीमारियों में मरीज अपनेआप को किसी दूसरे के किरदार के साथ जीने लगता है. लोग समझते हैं कि उस पर कोई ऊपरी साया है, जबकि भूतप्रेत या ऊपरी साया सब बकवास है जो पोंगापंथियों के दिमाग की उपज होती है.

ऐसी बीमारियों में डाक्टरी इलाज का सहारा लेना चाहिए, न कि बेसिरपैर की बातों में फंस कर अपनी जेब ढीली कर दी जाए.

डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि सामान्य या गंभीर बीमारियों की दशा में हमें डाक्टर से इलाज कराना चाहिए जिस से समय रहते बीमारी से न केवल नजात मिलेगी बल्कि बच्चा न पैदा होने जैसी समस्याओं से जूझ रही औरतों का बाबाओं द्वारा यौन शोषण भी नहीं हो पाएगा.

अगर कोई भी इलाज के लिए पीरफकीरों और बाबाओं की शरण में जाने को कहता है तो उसे अंधविश्वास फैलाने के जुर्म में जेल भिजवाने का डर दिखाएं.

याद रखिए, कोई भी आप को झाड़फूंक कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. अगर कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उस के ऊपर सख्त कानूनी कार्यवाही की जा सकती है.

अग्निवेश की पूजा

दिनरात मंदिरों में मूर्तियों के आगे घंटेघडि़याल बजा कर पेट पालने वालों के धंधे पर यदि कोई चोट करता है तो वे तिलमिला कर उस के पीछे पड़ जाते हैं. मशहूर समाजसेवी और आर्यसमाजी स्वामी अग्निवेश को कुछ हिंदूवादियों ने झारखंड के पाकुड़ नामक कसबे में मंदिर के घंटे की तरह ही धुन डाला.

उन का गुनाह इतनाभर था कि वे न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी मंदिरों में घंटों पूजापाठ करने की आलोचना कर रहे थे बल्कि लोगों को भूगोल भी समझा रहे थे कि अमरनाथ में बर्फ का शिवलिंग बनना कोई दैवीय नहीं, बल्कि प्राकृतिक घटना है जिस पर भी पंडों ने अपनी दुकान चला रखी है.

अब भला आरएसएस और भाजपा से जुड़े लोग कैसे यह सच हजम कर लेते. लिहाजा, उन्होंने वही किया जो सदियों से करते चले आ रहे हैं. संदेश यही है कि साढ़े 4 वर्षीय राष्ट्रवाद की बलि चढ़ने को तैयार भगवा फौज से होशियार रहें.

प्रोटीन खाएं और मसल्स बनाएं

सेहतमंद शरीर के लिए मजबूत मसल्स यानी मांसपेशियों का होना बहुत जरूरी है. नौजवान लड़केलड़कियां जिम में मेहनत करने चले तो जाते हैं लेकिन कसरत करने के बाद उन्हें क्या खानापीना चाहिए, इस के बारे में वे लापरवाही बरत जाते हैं.

अब आप प्रोटीन को ही लीजिए. मसल्स को फिट रखने के लिए प्रोटीन से भरपूर भोजन करना बहुत जरूरी होता है.

प्रोटीन न सिर्फ मसल्स को बनाने में मदद करता है, बल्कि यह हमारे शरीर की टूटफूट की मरम्मत भी करता है. बैलैंस बौडी बनाने के लिए बैलैंस डाइट का होना भी बेहद जरूरी है. इस के लिए आप के भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का बैलैंस होना चाहिए.

कुदरत की बात करें तो पालक और दूसरी हरी सब्जियां मसल्स के लिए बहुत फायदेमंद रहती हैं. भारी कसरत करने के बाद मसल्स को आराम की जरूरत होती है. हरी सब्जियां मसल्स को रिलैक्स करने में भी मदद करती हैं.

सूखे मेवों, पनीर, दूध वगैरह में भी खूब प्रोटीन पाया जाता है. कसरत करने वालों को इन का सेवन जरूर करना चाहिए. काजू, बादाम और अखरोट को भी सही मात्रा में खाना चाहिए.

अगर आप मांसाहारी हैं तो प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए अंडा, मांस, चिकन और टर्की लीन मीट को भोजन का हिस्सा बनाया जा सकता है.

अगर कोई शख्स जिम में पसीना बहाता है और सही मात्रा में प्रोटीन नहीं ले पाता है तो समझ लीजिए कि मसल्स के लिए ईंधन रूपी प्रोटीन न मिलने से उस का ईंधन खत्म होता?है और मसल्स मजबूत बनने के बजाय और भी कमजोर हो जाती हैं.

इस के अलावा प्रोटीन हमारी बौडी में ह्वाइट ब्लड सैल वगैरह बनाने में मदद करता है जो हमें कई बीमारियों से बचाती हैं.

कुदरत से मिलने वाले प्रोटीन के अलावा बाजार में कई तरह के प्रोटीन सप्लीमैंट भी मिलते हैं जो हमारे शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करते हैं.

ऐसे प्रोटीन किसी माहिर डाक्टर की सलाह पर लेने चाहिए क्योंकि जब से इन का बाजार बढ़ा है, तब से इन की क्वालिटी भी शक के दायरे में आ गई है.

जिम चलाने वाले ट्रैनर लोगों को ऐसे प्रोटीन सप्लीमैंट लेने की सलाह दे तो देते हैं, लेकिन ज्यादातर यह नहीं बता पाते हैं कि बाजार में मुहैया कौन सा प्रोटीन सप्लीमैंट सेहत के लिए सही है.

अगर अच्छी क्वालिटी का प्रोटीन सप्लीमैंट मिल भी जाता है तो उसे कितनी मात्रा में खाना है, यह भी पता होना चाहिए. इन का ज्यादा सेवन करना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है.

अमूमन किसी बालिग को 50 से 70 ग्राम प्रोटीन अपने रोजाना के भोजन में शामिल करना चाहिए. अगर आप जिम में कसरत करते हैं तो किसी माहिर डाक्टर से अपने शरीर के हिसाब से प्रोटीन की मात्रा पता कर लेनी चाहिए.

इस मसले पर फरीदाबाद में अपना फिटनैस ग्रुप चलाने वाले कपिल गुप्ता ने बताया कि अब तो अखाड़ों में कुश्ती लड़ने वाले पहलवान भी डाइट चार्ट के मुताबिक खातेपीते हैं. प्रोटीन सप्लीमैंट की डिमांड भी खूब जोर पकड़ रही है, बस इस बात का खयाल जरूर रखना चाहिए कि किसी के लालच में आप नकली प्रोटीन सप्लीमैंट का सेवन तो नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह आप की सेहत के लिए खतरनाक भी साबित हो सकता है.

बीमारियों से बचाता है सैनेटरी पैड : डाक्टर सुनीता चंद्रा

माहवारी के दिनों में इस्तेमाल किए जाने वाले सैनेटरी पैड का इस्तेमाल दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. इस के बाद भी गांवदेहात में इस का इस्तेमाल कम ही हो रहा है जिस से वहां की लड़कियों और औरतों को सेहत से जुड़ी तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इस संबंध में डाक्टर सुनीता चंद्रा से बात की गई. पेश हैं, उसी बातचीत के खास अंश:

गांव देहात में लड़कियों और औरतों में सैनेटरी पैड का कितना इस्तेमाल बढ़ा है?

पिछले कुछ साल से गांवों में सेहत के लिए काम करने वाले लोगों ने सैनेटरी पैड के इस्तेमाल को ले कर जागरूकता फैलाने का काम शुरू किया है. इस से लड़कियों और नई शादीशुदा औरतों में सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करने की आदत बढ़ी है. इस के बावजूद वहां 70 से 85 फीसदी औरतें और लड़कियां इस का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं.

आज भी गांवदेहात में रहने वाली ज्यादातर लड़कियां और औरतें माहवारी के दिनों में सैनेटरी पैड की जगह पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं. वे सैनेटरी पैड की जगह पुराने कपड़े क्यों इस्तेमाल करती हैं?

पुराना कपड़ा घर में ही मिल जाता है और सस्ता पड़ता है. कई बार तो जब खून का बहाव ज्यादा होता है तो वे कपड़े के अंदर और कई कपड़े भर लेती हैं. कई बार जब नए कपड़े नहीं मिलते हैं तो वे पहले इस्तेमाल किए गए कपड़ों को धो कर दोबारा इस्तेमाल कर लेती हैं. कई बार तो वे कपड़े के अंदर चूल्हे की राख या बालू भर कर अंग पर बांध लेती हैं.

इस की वजह से वे कई तरह की बीमारियों की शिकार हो जाती हैं.

माहवारी में सैनेटरी पैड का इस्तेमाल न करने से किस तरह की बीमारियां हो सकती हैं?

गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करने से उस जगह पर खुजली होती है, दाने और लाल चकत्ते पड़ने लगते हैं. धीरेधीरे गंदगी से इंफैक्शन अंदर तक पहुंच जाता है. इस से सफेद पानी आना, ल्यूकोरिया और दूसरी तरह की तमाम बीमारियां लग सकती हैं. ये बीमारियां औरत के मां बनने की कूवत पर बुरा असर डालती हैं. कई बार तो उन को बांझपन का दंश झेलना पड़ता है. यह इंफैक्शन कैंसर की वजह भी बन जाता है.

माहवारी के दिनों में औरतों को सामाजिक रूप से किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है?

माहवारी के दौरान औरतों को अछूत सा समझा जाता है. इस वजह से माहवारी के संबंध में बात करने को भी गलत माना जाता है. जब किसी औरत को माहवारी आती है तो उस के साथ भेदभाव सा होता है.

कई घरों में उस को सोने के लिए अंधेरे कमरे में बिस्तर लगा दिया जाता है. उस को किसी दूसरे घर वाले के साथ उठनेबैठने नहीं दिया जाता है. साफसफाई रखने के बजाय उसे नहाने नहीं दिया जाता है. सामान्य खाने की जगह रूखासूखा खाना दिया जाता है. रसोई में जाने से मना किया जाता है.

माहवारी में इस्तेमाल किए गए कपड़े या सैनेटरी पैड को किस तरह से नष्ट किया जाता है?

आमतौर पर इन को बाहर खुले में फेंक दिया जाता है जिस से ये गंदगी फैलाने की वजह बनते हैं. जो औरतें खुले में शौच के लिए जाती हैं वहीं फेंक देती हैं. कुछ समझदार औरतें इन को मिट्टी के बड़े बरतन में रख देती हैं. बरतन ऊपर से बंद कर दिया जाता है. हवा आनेजाने के लिए बरतन में छेद कर दिया जाता है. कुछ दिन बाद जब कपड़े सूख जाते हैं तो खेत या खुली जगह में ले जा कर जला दिया जाता है.

शहरों में इन को ठीक तरह से कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए.

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