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जानिए, कहीं कोई आपके वाई-फाई में सेंध तो नहीं लगा रहा..?

आज इंटरनेट की पहुंच हर जगह है. आज लगभग हर काम के लिए इसकी आवश्यकता पड़ती है. विश्वविद्यालयों में रिसर्चर्स और स्कालर्स भी बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल करते हैं. लोगों के स्मार्टफोन्स में उनके घरों, कार्यालयों और कैफे जैसे सार्वजनिक स्थानों पर वाई-फाई की सुविधा मिलती है. आजकल वाई-फाई राउटर्स की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि अगर आपने अपने वाई-फाई कनेक्शन में सिक्योरिटी की सेटिंग अच्छे से नहीं की है तो आपके वाई-फाई कनेक्शन में कोई और आसानी से सेंध लगा सकता है. यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि अगर कोई बिना आपसे पूछे आपके वाई-फाई कनेक्शन तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है तो आप कैसे उसका पता लगाएंगे. उसके लिए इन स्टेप्स को फौलो करें…

इंटरनेट कनेक्शन का धीमा होना

अगर आपका वाई-फाई कनेक्शन धीमा चल रहा है या आपके इंटरनेट की स्पीड पिछले कुछ दिनों से कम हो गई है तो इस बात की संभावना है कि कोई दूसरा भी आपके इंटनेट कनेक्शन का इस्तेमाल कर रहा है. हालांकि इंटरनेट कनेक्शन सर्वर और नेटवर्क इशू के कारण भी धीमा हो सकता है.

कनेक्टेड डिवाइसेज की लिस्ट खोजना

जितनी भी डिवाइस आपके प्राइवेट नेटवर्क कनेक्शन से जु़ड़ी हैं, उन्हें राउटर सेटिंग की मदद से कनेक्टेड डिवाइसेज की लिस्ट में ‘(माय कंप्यूटर’ जैसे किसी रैंडम नाम) से यूनिक आईपी और MAC अड्रेस को देखा जा सकता है. इसलिए अगर आप अपने नेटवर्क पर अनजाने नाम देखते हैं तो इस बात की संभावना है कि वो आपके इंटरनेट कनेक्शन का इस्तेमाल करते हों. अगर आप ऐसा कोई नाम नहीं पाते हैं तब भी आप सभी कनेक्टेड डिवाइसेज की संख्या देखकर अनजान कनेक्शन को ढूंढ़ सकते हैं…

यहां हम आपको वाई-फाई नेटवर्क को सुरक्षित करने के लिए कुछ तरीके बता रहे हैं-

मजबूत WPA2 पासवर्ड सेट करके

WPA2 एक प्रकार का इन्क्रिप्शन प्रोटोकौल होता है. इसका पूरा नाम ‘वाई-फाई प्रोटेक्टेड ऐक्सेस’ होता है. यह WPA2 नया होने के साथ पुराने WPA और WEP जैसे पुराने प्रोटोकौल्स से अधिक सुरक्षित भी है. अपने वाई-फाई राउटर पर WPA2 सिक्योरिटी सेट करके कोई मजबूत पासवर्ड सेट करें. इसके लिए ऐसा लम्बा और कौम्प्लेक्स पासवर्ड सेट करें, जिसे आप याद रख सकें और जिसका अनुमान दूसरे लोग न लगा सकें.

राउटर की लौगइन इन्फर्मेशन को बदलकर

ज्यादातर वाई-फाई राउटर में 192.168.1.1 या 192.168.2.1 दो आईपी अड्रेस होते हैं. इन्हें किसी भी ब्राउज़र से ऐक्सिस किया जा सकता है. अधिकतर राउटर निर्माता ‘root’ और ‘admin’ जैसे शब्दों को लौग-इन और पासवर्ड के लिए इस्तेमाल करते हैं. इन पर एक बार लौग्ड-इन करते ही आप राउटर की सेटिंग तक पहुंच जाते हैं. इसका पासवर्ड इतना आसान है कि कोई भी लौग-इन करके आसानी से राउटर सेटिंग में जा सकता है. इससे बचने के लिए अपने राउटर के लौग-इन इन्फर्मेशन से ‘admin’ को बदल दें.

राउटर की SSID को हाइड कर दें

नेटवर्क को सुरक्षित रखने का एक बेहतरीन तरीका यह भी है कि राउटर की SSID को हाइड कर दें. इससे यह केवल कनेक्टेबल नेटवर्क को नहीं दिखाएगा. इसमें आपको अड्रेस को मैन्युअली एंटर करना होगा.

इंटरनेट मॉनीटरिंग साफ्टवेयर का इस्तेमाल करके

AirSnare जैसे कुछ ऐसे साफ्टवेयर हैं, जिन्हें आप इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर कोई अनजान डिवाइस आपके नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश करता है तो ये आपको अलर्ट करने लगते हैं.

जब कोहली ने मैच रेफरी से मांगी माफी और कहा, ‘प्लीज मुझे बैन मत करना’

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली का विवादों से भी पुराना नाता रहा है. कोहली मैदान पर अपने आक्रामक अंदाज के लिए भी जाने जाते हैं. वे कई बार खेल के इतर अपने व्यवहार के चलते चर्चाओं में रहे हैं. ऐसा ही एक वाकया 2012 के औस्ट्रेलिया दौरे पर सामने आया था. उस दौरे पर एक मैच में वह औस्ट्रेलियाई फैन्स को मिडल फिंगर (एक अभद्र इशारा) करते हुए कैमरे पर कैद हो गए थे. यह टेस्ट मैच ऐडिलेड में खेला गया था.

एक मासिक पत्रिका से बात करते हुए विराट ने कहा, ‘जो चीज मुझे सबसे ज्यादा याद है वह औस्ट्रेलियाई फैंस को (2012) मेरा उंगली से इशारा करना है.’ कोहली ने उस घटना को याद करते हुए कहा- ‘मैच रेफरी रंजन मदुगले ने अगले दिन मुझे अपने कमरे में बुलाया. मुझे लगा कि आखिर क्या मामला है. मैच रेफरी ने मुझसे पूछा कल बाउंड्री पर क्या हुआ?’ कोहली ने कहा मुझे कुछ समझ नहीं आया. उन्होंने कहा, ‘मैंने रेफरी से कहा कि वह मजाक था.’ इसके बाद रेफरी ने मेरे सामने अखबार फेंका जिसमें फ्रंट पेज पर मेरी बड़ी तस्वीर थी. मैंने कहा, ‘मैं माफी चाहता हूं, प्लीज मुझे बैन मत करना!’ विराट ने कहा कि मैं उससे बच निकला. मैच रेफरी अच्छे इंसान थे, वह समझ गए कि मैं युवा था और ऐसी चीजें हो जाती हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं युवावस्था में किए गए कई कामों पर काफी हंसता हूं लेकिन मुझे गर्व है कि मैंने अपना तरीका नहीं बदला क्योंकि इसी वजह से मैं यहां हूं और मैं किसी के लिए खुद को बदलना नहीं चाहता. मैं जो था उसे लेकर मैं काफी खुश हूं.’

बता दें कि कोहली इंग्लैंड के खिलाफ चल रही सीरीज में बतौर बल्लेबाज तो काफी कामयाब रहे हैं लेकिन पांच मैचों की सीरीज में इंग्लैंड ने 3-1 की अजेय बढ़त बना ली है. सीरीज का पांचवां और आखिरी मैच 7 सितंबर से ओवल में खेला जाएगा.

रुपये में गिरावट का आम आदमी पर पड़ता ‘साइड इफेक्ट’

रुपये में गिरावट लगातार छठे दिन, बुधवार को भी जारी रही. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और उभरती अर्थव्यवस्था वाले बाजारों में कमजोरी के रुख के कारण रुपया डालर के मुकाबले 17 पैसे की एक और बड़ी गिरावट के साथ 71.75 के नए सर्वकालिक निम्न स्तर पर बंद हुआ. दिन के कारोबार के दौरान रुपया 71.97 रुपये के ऐतिहासिक निम्न स्तर तक लुढ़क गया था जहां कारोबार के अंत की ओर उसे कुछ राहत मिलती दिखाई दी. पिछले छह कारोबारी सत्रों के दौरान रुपये में 165 पैसे की गिरावट आई है.

हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने हरकत में आते हुए रुपये की गिरावट को थामने के कुछ उपाय किए जिसकी वजह से यह भारी गिरावट की स्थिति से बच गया. बढ़ते व्यापार युद्ध की आशंकाओं तथा कच्चे तेल की वैश्विक कीमत के बढ़ते जाने की पृष्ठभूमि में वैश्विक व्यापार की स्थिति बिगड़ने से विदेशीमुद्रा विनिमय कारोबार से जुड़े व्यापारियों में घबराहट फैल गई.

भारतीय रुपया हर दिन गिरने का नया रिकौर्ड बना रहा है. करीब 68.50 पर बने रहने वाले रुपये में डालर के मुकाबले 4 प्रतिशत की गिरावट आई है. बुधवार सुबह सकारात्मक शुरुआत करने वाला रुपया गिरकर 71.79 के नए स्तर तक पहुंच गया है. दलाल स्ट्रीट में बिक्री की शुरुआत के साथ ही मंदी की स्थिति देखने को मिली.

रुपये में गिरावट की वजह

भारतीय रुपये में आई रिकौर्ड गिरावट के पीछे की वजह उभरते हुए बाजारों में आई गिरावट, अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और डालर का मजबूत होना है. तुर्की की मुद्रा लीरा और कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें भी रुपये की ऐतिहासिक गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं. अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें और एफआईआई की तेज बिक्री एक अन्य कारण है.

आम आदमी पर असर

एक कमजोर मुद्रा हमेशा देश को नुकसान पहुंचाती है. चाहे फिर वह भारत हो या फिर दुनिया का कोई दूसरा हिस्सा. आसान शब्दों में कहा जाए तो मुद्रा में गिरावट होने से सबकुछ महंगा हो जाता है. इसमें विलासिता शामिल है जैसे विदेश में छुट्टी मनाना, विदेशों में पढ़ाई, आयातित सामान जैसे कि कार और स्मार्टफोन खरीदना आदि. यह मुद्रास्फीति को जन्म देता है और रोटी, कपड़ा और मकान महंगा हो जाता है.

रुपये में गिरावट का एक सीधा असर होम लोन पर पड़ता है. इसका मतलब यह है कि यह घर खरीदने के लिए सही समय नहीं है. एक और क्षेत्र जो चिंता करने वाला है वह है आयात. डालर के मुकाबल रुपये की कम कीमत आयात को महंगा बनाता है. कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जिन्हें आयात करना ही पड़ता है. भारत में तेल का आयात जरूरी है. जो चालू खाता घाटे के मोर्ट पर निश्चित तौर पर दोहरा झटका है.

हालांकि, निर्यातकों के लिए यह अच्छी खबर है, क्योंकि रुपये में गिरावट के कारण निर्यात में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होती है, हालांकि व्यापार युद्ध ने भारत को नकारात्मक रुप से प्रभावित किया है. आईटी और फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज को रुपये की कीमत गिरने का लाभ मिल सकता है लेकिन तभी जब व्यापार युद्ध इसमें बाधा न बने.

दिलीप कुमार की तबीयत बिगड़ी, लीलावती अस्पताल में हुए भर्ती

बौलीवुड के मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार (95 वर्ष) को सीने में संक्रमण के बाद मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया है. यह खबर सबसे पहले अभिनेता के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर उनके भतीजे फैसल फारूकी द्वारा साझा किया गया. उन्होंने कहा कि दिलीप कुमार को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया है क्योंकि वह सीने के संक्रमण से प्रभावित हैं. वह ठीक हो रहे हैं.

उनकी पत्नी सायरा बानू ने कहा, “हम यहां लीलावती में हैं और हम नियमित जांच के लिए यहां आते हैं. वह कुछ दिनों तक यहां रहेंगे, जब तक डाक्टर टेस्ट करना चाहते हैं. यहां सभी प्रकार की जांच की जाएगी. यहां डाक्टरों की एक टीम है, चेस्ट स्पेशलिस्ट, न्यूरोलौजिस्ट हैं. उन्होंने कहा, डा. नितिन गोखले के निरीक्षण में जांच की जा रही है. हमें आपकी दुआओं की आवश्यकता है ताकि हम जल्द से जल्द घर जा सकें.

लीलावती अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि यह बताना कठिन है कि दिलीप कुमार अस्पताल में कब तक रहेंगे. उन्होंने कहा कि चिंता करने की कोई बात नहीं है.

गली गुलियां : सीमित दर्शकों को भाएगी

मनोवैज्ञानिक रोमांचक फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ इंसान द्वारा अपने अंदर के अंधेरे से लड़ने का रूपक है. यह संघर्ष भावनात्मक आरोप प्रत्यारोप, अकेलापन, एकता, पाप, अपराध, स्वतंत्रता व उम्मीदों का है. इस फिल्म को अब तक 27अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया जा चुका है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है पुरानी दिल्ली की कई गलियों में से एक गली के अंदर बने मकान से. जहां तमाम कम्प्यूटर, जो कि आसपास की गलियों व कई मकानों में चोरी से लगाए गए सीसीटीवी कैमरों से जुड़े हुए हैं के सामने बैठे पेशे से इलेक्ट्रीशियन खुद्दोस से. उलझे व तितर बितर बाल, बढ़ी दाढ़ी वाले खुद्दोस (मनोज बाजपेयी) व उसकी हरकतों को देखकर कुछ लोग उसे मनोरोगी भी समझ सकते हैं. वह कई माह तक घर से नहीं निकलता. गणेशी (रणवीर शोरी) के अलावा उसका अपना कोई दोस्त नहीं.

खुद्दोस (मनोज बाजपेयी) अपनी रहस्यमयी दुनिया में अकेलेपन की जिंदगी जी रहे हैं. वह अपने द्वारा दूसरों के घरो के अंदर या गली में लगाए गए कैमरों में उनके घरों के अंदर हो रहे घटनाक्रमों को लेकर उनकी कहानियां समझ रहा है. इस तरह अजनबियों के घरों की कहानी देखते हुए वह खुद को व्यस्त रखता है. खुद्दोस का दोस्त गणेशी (रणवीर शोरी) कई बार उसे वहां से निकलने के लिए कहता रहता है. अचानक उसे एक दिन बच्चे इदरीस (ओम सिंह) के पीटे जाने व उसके रोने की आवाजें आती हैं, तो वह विचलित हो उठता है. खुद्दोस बिना किसी सुराग के उस बालक को बचाना चाहता है, मगर उसने जितने कैमरे लगा रखे हैं, उनमें से किसी भी घर के अंदर वह बालक नहीं है. अब खुद्दोस उस बालक की तलाश शुरू करता है, जिसे उसने देखा तक नहीं है. अब उस बालक की तलाश का खुद्दोस की संघर्ष पूर्ण यात्रा शुरू होती है. पर एक मोड़ पर आकर वह कहता है- ‘‘मैं कहां खो गया हूं.’’

gali guliyan film review

खुद्दोस की इस यात्रा के समांनांतर इदरीस की कहानी चलती रहती है. इदरीस के क्रूर स्वभाव के पिता लियाकत (नीरज काबी) बूचड़ खाना चलाते हैं और वह चाहते हैं कि इदरीस भी बूचड़खाने पर बैठे, पर वह नहीं बैठना चाहता. खुद्दोस गणित में तेज है और उसका दोस्त इंग्लिश में तेज है, दोनों एक दूसरे की मदद करते रहते हैं. दोनों अक्सर एक साथ दूसरों के घरों में खिड़कियों से ताक झांक करते रहते हैं. इदरीस की लापवरवाही के चलते लियाकत अक्सर उसकी पिटाई करते रहते हैं. पिता की पिटाई से तंग आकर इदरीस जब अपने पिता का पीछा करता है, तो उसे पता चलता है कि उसके पिता का एक अन्य औरत से संबंध हैं, जो कि उसकी मां सायरा (शहाना गोस्वामी) नही है. एक दिन इदरीस अपनी मां से कहता है कि हमें यह जगह छोड़कर कहीं दूर चले जाना चाहिए. पर मां तैयार नही है. एक दिन इदरीस पिता की मार का विरोध करते हुए अपने पिता पर ही हाथ उठा देता है और घर से भागकर चला जाता है. अपने दोस्त से कहकर वह अपने घर में छिपाए गए पैसे मंगवाता है. इदरीस अपने दोस्त का रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इंतजार कर रहा होता है.  उसका दोस्त इदरीस के पिता लियाकत के साथ पहुंचता है. अब पिता के साथ इदरीस को घर जाना पड़ता है. फिर पिटाई होती है, पर भावनाओं में बहकर इदरीस अपनी मां से वादा करता है कि वह उन्हें व इस घर को छोड़कर कभी नहीं जाएगा. पर उसका गुस्सा कम नही हुआ है. रात में वह अपने पिता की हत्या कर देता है.

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जब फिल्म का अंत होता है, तो वह दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है. पुरानी दिल्ली की संकरी व भूल भुलैय्या वाली गलियों में रहने को बेबस, मानसिक संकीर्णता व पूर्वाग्रह से ग्रसित एकाकी जीवन जी रहे इंसान के इर्द गिर्द सिनेमा का निर्माण करना हिम्मत व जुनून ही कहा जाएगा और इस जुनूनी व हिम्मती काम के लिए फिल्मकार दीपेश जैन तथा अभिनेता मनोज बाजपेयी बधाई के पात्र हैं.

कहानी व पटकथा के स्तर पर दीपेश जैन ने काफी प्रशंसनीय काम किया है. फिल्म में मनोवैज्ञानिक अलगाव के साथ पालकों का अपने बच्चों के साथ खंडित होते रिश्ते पर भी रोशनी डाली गयी है, जो कि वर्तमान परिस्थितियों में चिंता का विषय है. फिल्म इस बात को भी रेखांकित करती है कि किस तरह माता पिता अपने बच्चों को अपना अनुकरण करने के लिए बाध्य करते हुए अपने अंदर के रहस्य व अपराध जाने अनजाने उनमें भी भर देते हैं.

कथानक के स्तर पर रोजमर्रा की पिटाई का बाल मस्तिष्क पर जो असर दिखाया गया है, वह काफी विचलित करने के साथ ही सोचने पर मजबूर करती है. अति डार्क मनोवैज्ञानिक फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ विचलित जरुर करती है, पर इस तरह की कहानी कही जानी चाहिए.

इस अति डार्क फिल्म में आशा की किरण तो शहाना गोस्वामी का किरदार सायरा ही है. सायरा ने हालात से समझौता कर लिया है, पर उसे अपने बच्चों को लेकर काफी उम्मीदें हैं. इस मनोवैज्ञानिक फिल्म की कहानी ऐसे इंसान की है,जिसकी आत्मा दुर्व्यवहार और त्रासदी की जड़ों से गहराई के साथ जुड़ी हुई है. अफसोस एडीटिंग कमी के कमियों के चलते कई दृश्यों व विचारों का दोहराव फिल्म को कई जगह कमजोर करते हैं.

मगर यह फिल्म उन दर्शकों के लिए नहीं है, जिन्हे सपाट कहानी व नाच गाने की दरकार होती है. मनोरंजन की आस लेकर जाने वालों के लिए भी यह फिल्म नहीं है. यह अति डार्क फिल्म है. यूं कहें कि यह फिल्म आम दर्शकों के लिए नहीं है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. यह फिल्म फिल्म समाराहों में फिल्म देखने के शौकीनों को ही पसंद आ सकती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो खुद्दोस का किरदार काफी जटिल है. यह किरदार शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर काफी फंसा हुआ जटिल व कठिन किरदार है. इस किरदार को निभाने के लिए मनोज बाजपेयी की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है. खुद्दोस को अभिनय से साकार करने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी के करियर का यह अति जटिल व कठिन किरदार रहा, जिसे निभाते हुए उन्होंने शानदार अभिनय किया है. खुद्दोस की बौडी लैंगवेज, उसकी बारीकियों को पेश कर मनोज बाजपेयी काफी प्रभावित करते हैं. कम संवादों के बावजूद अपने हाव भाव व चाल से वह दर्शकों से काफी कुछ कह जाते हैं.

इदरीस के किरदार में बाल कलाकार ओम सिंह ने जबरदस्त अभिनय किया है. एक भी दृश्य में वह इस बात का अहसास नहीं होने देता कि यह उसकी पहली फिल्म है. उसमें एक मंजे हुए अभिनेता की तरह अपने किरदार को निभाया है. रणवीर शोरी की प्रतिभा को जाया किया गया है. नीरज काबी और शहाना गोस्वामी ने भी बेहतरीन अभिनय किया है.

कैमरामैन ने अपने काम को काफी अच्छे ढंग से अंजाम दिया है. एक घंटे 54 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ का निर्माण दिपेश जैन व सुचि जैन ने किया है. लेखक व निर्देशक दीपेश जैन, संगीतकार दना नियू, कैमरामैन कई मैडेनड्राप और कलाकार हैं- मनोज बाजपेयीबाल कलाकार ओम सिंह, नीरज काबी, रणवीर शोरीशहाना गोस्वामी व अन्य.

80 शिक्षक ‘‘डा. एस राधकृष्णन मेमोरियल अवार्ड’’ से  पुरस्कृत

‘‘शिक्षक दिवस’’ के अवसर पर दो दिन पहले ही मुंबई के होटल जुहू प्लाजा में ‘‘इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स कौंसिल’’ द्वारा आयोजित खास कार्यक्रम में 80 शिक्षकों, प्रधानाध्यापकों व शिक्षाविदों को ‘‘डा. एस राधाकृष्णन मेमोरियल अवार्ड 2018’’ से पुरस्कृत किया गया.

इस अवसर पर शिक्षा जगत से जुड़ी हस्तियों के अलावा बौलीवुड की हस्तियों ने भी शिरकत की. ‘‘इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स काउंसिल’’ के सन्नी शाह द्वारा आयोजित यह चौथा पुरस्कार समारोह था.
इस अवसर पर अमिताभ बच्चन के निजी मेकअप मैन व भोजपुरी फिल्म निर्माता दीपक सावंत, फिल्म यूनियन फेडरेश गंगेश्वर लाल श्रीवास्तव व बी एन तिवारी, दादा साहेब फाल्के फाउंडेशन के अशफाक खोपीकर, भोजपुरी फिल्मों की अदाकारा संगीता तिवारी, फिल्म अभिनेत्री सगारिका, वाणी वशिष्ठ, अभिनेत्री व मौडल अर्चना गौतम, कौमेडियन सुनील पौल व दीपू श्रीवास्तव, मानवाधिकारों पर पीएचडी करने वाली महिला शिक्षक एम. इरफान, अधिवक्ता साहिल शाह सहित कई हस्तियों की मौजूदगी ने समारोह में चार चांद लगाए.

teachers day

‘‘इंटरनेशनल ह्यूमन राईट्स काउंसिल’’ के संस्थापक सन्नी शाह ने इस मौके पर शिक्षक और शिक्षा की अहमियत की बात सामने रखते हुए कहा कि, ‘‘शिक्षक दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा और गुरू की अहमियत को सम्मानित करना है.

इस दिन उन शिक्षकों के कार्यों को याद किया जाता है, जो शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. गुरू अंधेरे से रोशनी की तरफ ले जाते हैं. इसीलिए ‘इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स काउंसिल’ ने ‘शिक्षक दिवस’ को ध्यान में रखते हुए मुंबई और देशभर के लगभग 80 शिक्षकों, शिक्षाविदों और प्रधानाध्यापकों को सम्मानित करने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया है.’’

teachers day

इस कार्यक्रम का संचालन सौंदर्या गर्ग ने किया. अंत में ‘इंटरनेशनल ह्यूमन राईट्स काउसिंल’ के महासचिव रामा मेहरा ने सबका आभार व्यक्त किया.

‘लैला मजनूं’ के बाद पता चल जाएगा मैं हीरा हूं या नहीं : अविनाश तिवारी

थिएटर करने व बैरी जौन और अमरीका के रौयल एक्टिंग स्कूल से प्रशिक्षण पाने के बाद भी अविनाश तिवारी को बौलीवुड में काम पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा. इतना ही नहीं अमिताभ बच्चन के साथ सीरियल ‘‘युद्ध’’ में अभिनय कर शोहरत बटोरने के बाद उनकी फिल्म ‘‘तू है मेरा संडे’’ को बाक्स आफिस पर सफलता नहीं मिली थी, जबकि उनके अभिनय की तारीफें हुई थी. इसके बावजूद संघर्ष जारी है. फिलहाल व एकता कपूर व इम्तियाज अली निर्मित तथा साजिद अली निर्देशित फिल्म ‘‘लैला मजनूं’’ को लेकर उत्साहित हैं.

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

हम मूलतः बिहार के गोपालगंज के पास मणी रहमान गांव के रहने वाले हैं. छह सात साल की उम्र में हम मुंबई आ गए थे. पिता आरएएस सर्विस में थे. अब अवकाशप्राप्त कर चुके हैं. हमारी शिक्षा मुंबई में ही हुई थी. हम इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, इसलिए घर से बाहर निकलने का मौका मिला. पढ़ने लिखने में हम ठीक थे, पर समझ में नहीं आ रहा था कि हमें करना क्या है? पर काफी सोचने के बाद मेरे दिमाग में आया कि हमें अभिनय करना है. अब यह जवाब क्यों आया, यह हमें पता ही नहीं चला. पर मैं आज भी अपने आपको डांटता रहता हूं कि किसने अभिनेता बनने के लिए कहा था. क्योंकि यह क्षेत्र बाहर से जितना चमकदार लगता है, उतना अंदर से नहीं है. इसमें मेहनत बहुत ज्यादा है. संघर्ष बहुत ज्यादा है. यहां काफी तकलीफ उठानी पड़ती है. मेरे परिवार में इस क्षेत्र से कोई जुड़ा हुआ नहीं है. परिवार के सदस्यों को उम्मीद थी कि हम आईएएस बनेंगे. खैर, हम मुंबई के ठाकुर कालेज से इंजीनियरिंग की डिग्री की पढ़ाई कर रहे थे, पर दूसरे वर्ष में छोड़ दिया. मेरी मम्मी आज भी कहती हैं कि घर में जो पेंटर आता है, वह भी बारहवीं पास है. कम से कम डिग्री तो हासिल कर लेते. मैं अपनी तरफ से इसी प्रयास में लगा हुआ हूं कि एक दिन मां की नजरों में लायक बेटा बन जाउं.

आपने अभिनय की कोई ट्रेनिंग हासिल की या..?

मैंने अभिनय करियर की शुरुआत ओम कटारे के साथ थिएटर करते हुए की थी. ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’, ‘चोर चोरी से’ जैसे कुछ नाटकों में अभिनय किया. उसके बाद मैं दिल्ली चला गया. वहां बैरी जान से अभिनय की ट्रेनिंग हासिल की. उनके साथ एक नाटक ‘‘कन्यादान’’ किया. उसके बाद मैं अमरीका की ‘‘न्यूयार्क फिल्म अकादमी’’ चला गया. लगभग सवा साल की ट्रेनिंग रही. ट्रेनिंग लेने के अलावा वहां पर एक नाटक किया. फिर कुछ लघु फिल्में की. यहां पर अब लघु फिल्में बनने लगी हैं, जबकि वहां पर 2005 से बन रही हैं. वहां से लौटते वक्त मैं सोच रहा था कि बौलीवुड में मेरा इंतजार कर रहे होंगे और वह मेरा स्वागत करेंगे. मगर बहुत जल्द सपना टूट गया. काफी संघर्ष करते हुए यहां तक पहुंचा हूं?

भारत में बैरी जान से अभिनय का प्रशिक्षण लेने के बाद अमरीका जाकर प्रशिक्षण लेने की जरुरत क्यों महसूस की और क्या फर्क पाया?

उस वक्त भारत में बैरी जान एकमात्र ऐसे टीचर थे, जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर का अभिनय प्रशिक्षण देते थे और वह भी थिएटर का. मैं कनाडा में रौयल अकादमी आफ ड्रामैटिक जाना चाहता था. इसी की तैयारी के लिए मैं बैरी जान के पास गया था. ‘रौयल अकादमी आफ ड्रामैटिक’ की शर्त होती है कि एक टेस्ट पास करना होगा. उसकी तैयारी करना जरुरी थी. पर बैरी जान ने कहा कि मुझे उनके यहां पूरा कोर्स करना पड़ेगा.

दूसरी बात उन दिनों ‘ग्लेाबलाइजेशन’ की बातें होने लगी थी. तो मुझे लगा कि यहां का टैलेंट वहां जाएगा और वहां का टैलेंट यहां आएगा. इसके अलावा मैंने देखा कि हौलीवुड के स्टूडियो बौलीवुड में आ रहे हैं. इसलिए मैंने अमरीका जाकर प्रशिक्षण लेने का निर्णय लिया. ‘न्यूयार्क फिल्म अकादमी’ फिल्म को लेकर खास कोर्स चलाता है, जहां हमें पहले दिन से ही कैमरा फेस करना होता है. वहां पहुंचते ही मैंने ‘न्यूयार्क फिल्म अकादमी’ के अलावा कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी सहित कईयों के साथ काम करना शुरू किया.

हां! उस वक्त तक हालीवुड में भारतीय कलाकारों को स्टीरियो टाइप यानी कि दुकानदार या चौकीदार के ही किरदार मिलते हैं. मुझे लगा कि मैं इसमें फंसता जा रहा हूं. वैसे भी मुझे हर हाल में भारतीय सिनेमा ही करना था. इसलिए लौट आया. पर मैं अपने आपको परिपक्व बनाने के लिए ट्रेनिंग लेने गया था. मेरी सोच यह है कि यदि मैं दस लोगों के साथ आडीशन के लिए खड़ा हूं, तो कम से कम मैं अपने अंदर आत्मविश्वास से भरा रहूं.

क्या आपको लग रहा था कि हालीवुड के स्टूडियो भारत आ रहे हैं, तो आपके लिए काम मिलना ज्यादा आसान हो जाएगा?

मुझे यह लग रहा था कि बौलीवुड में भी एक सिस्टम आएगा. हमारे यहां सिस्टम का अभाव है. बौलीवुड में कोई स्ट्रक्चर नहीं है. स्टूडियो के आने से स्ट्रक्चर का आना शुरू होगा, तो मैं कुछ समझ सकूंगा. पर अब आप देखिए कि, अभिनय करने का तरीका, अंदाज भी बदलता जा रहा है. अब दिन प्रतिदिन सिनेमा व अभिनय वास्तविक और स्वाभाविक होता जा रहा है. मुझे शुरू से इसी तरह का अभिनय लुभाता रहा है. मुझे लगा था कि मैं जो करना चाहता हूं, वह तब तक नहीं कर पाउंगा, जब तक हौलीवुड में जाकर काम करके नहीं समझूंगा. फिर समय बड़ा बलवान होता है. जब आपका समय आएगा, तभी आप किसी मुकाम पर पहुंच पाएंगे. पर मैं खुद को आने वाले समय के लिए तैयार रखना चाहता था. मेरा मानना रहा है कि तुम हीरा हो, पर चमकोगे तभी, जब रोशनी तुम पर पड़ेगी, तो मैं उसी रोशनी के इंतजार में था. अब ‘‘लैला मजनूं’’ के प्रदर्शन के बाद पता चल जाएगा कि मैं हीरा हूं या नहीं.

पर हौलीवुड के सफल स्टूडियो बौलीवुड में असफल रहे?

इस पर भी मैंने सोचा. मुझे लगता है कि बौलीवुड इंडीवीज्युअल स्तर पर चलती है. यहां पर स्टार सिस्टम हावी है. जब एक इंसान पर इंडस्ट्री चलाने लग जाते हैं, तो समस्या आनी ही है. हौलीवुड में स्टूडियो सिस्टम कंटेट प्रधान है, पर यहां ऐसा नही है. हमारे यहां कहानी की बजाय स्टार को प्राथमिकता देते हैं. दूसरी बात हमारे यहां बड़ी से बड़ी फिल्म सिर्फ चार से पांच हजार स्क्रीन्स में रिलीज होती है. जबकि हालीवुड फिल्में पूरे विश्व में लाख स्क्रीन्स में रिलीज होती हैं. पर अब बौलीवुड में बदलाव आ रहा है. अब हर कलाकार स्टार बन गया है. फिर चाहे वह रियालिटी शो करके आने वाला कलाकार ही क्यों न हो. मुझे लगता है कि अब स्टार भी अपने आप में छोटा होता जा रहा है.

आप अमरीका से प्रशिक्षण लेकर आए तो किस तरह से संघर्ष करना पड़ा?

यहां आने पर पता चला कि मुझे अपना पोर्टफोलियो बनाना पड़ेगा. अमरीका वगैरह में ऐसा नहीं है. वहां आठ बाय दस की एक तस्वीर के साथ अपने बारे में संक्षिप्त जानकारी देनी होती है और उसी आधार पर वह तय करते हैं कि आप फलां किरदार के लिए उपयुक्त हैं या नहीं. जबकि यहां आपकी पोर्टफोलियो की आठ दस तस्वीरें देखकर तय करते हैं. मैंने अपना पोर्टफोलियो बनवाया नहीं था. पहले तो भारत में कास्टिंग डायरेक्टर नहीं होते थे. अब कुछ कास्टिंग डायरेक्टर आ गए हैं. पर हम अभी भी बहुत पीछे चल रहे हैं. लेकिन अब दिख यह रहा है कि बालीवुड में भी कलाकारों के चयन की प्रकिया धीरे धीरे हौलीवुड के ढर्रे पर जा रही है. पहले से काफी बदलाव आया है, पर अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है. यहां जो कास्टिंग का प्रोसेस है, वह भी सही नहीं है. आडीशन के समय कलाकार को एक सीन दे दिया जाता है, पर कलाकार को उस सीन का आगे पीछे कुछ पता ही नहीं होता है. आडीशन के दौरान कलाकार को पता ही नहीं होता है कि निर्देशक को चाहिए क्या? तो यह सारी बहुत समस्याएं हैं. हौलीवुड में मैनेजर व एजेंट सब अलग अलग होते हैं. यहां सारा काम एक ही इंसान करता है. तो बौलीवुड में कमियां बहुत हैं. पर आप जहां रहते हैं, उसी हिसाब से काम करना पडे़गा.

बौलीवुड में काम पाने के लिए किस तरह का संघर्ष करना पड़ा?

अमरीका में मैंने जिन लघु फिल्मों में काम किया था, उनके कुछ दृश्यों को लेकर एक शो रील बनायी थी. मैं शो रील की सीडी लेकर जाता था, जिसे लोग देखना पसंद नहीं करते थे. वह सिर्फ तस्वीर मांगते थे. मैं इस सोच के साथ दौड़ भाग कर रहा था कि एक बार जहां काम मिलेगा, वहां बार बार मिलेगा. काफी चक्कर लगाता था. रिजेक्शन पर रिजेक्शन हो रहे थे. अंदर से तकलीफ भी हो रही थी. पर धीरे धीरे समझ में आया कि सामने वाले का कमेंट आपके उपर निजी स्तर पर नहीं है. बल्कि काम को लेकर है. पर घर चलाने लायक काम मिलता रहा.

बौलीवुड में अभिनय करियर की शुरुआत कहां से हुई?

सबसे पहले लेख टंडन जी के डीडी वन पर प्रसारित सीरियल ‘बिखरी आस निखरी आस’ में काम करने का मौका मिला. उसके बाद लेख टंडन के ही सीरियल ‘एक आंगन के हो गए दो’ किया. इन सीरियलों को करने के बाद मैं मुंबई में घर खरीद सका. कुछ विज्ञापन फिल्में कीं. 2014 में अमिताभ बच्चन के साथ सीरियल ‘युद्ध’ किया था. उसमें मैं एंटी हीरो था. ‘युद्ध’ से मुझे पहचान मिली. जिसके चलते मुझे एक फिल्म ‘‘तू है मेरा संडे’’ मिली. इस फिल्म को बाक्स आफिस पर खास सफलता नहीं मिली. मगर मेरे काम को बहुत सराहा गया. यह फिल्म ठीक से रिलीज नहीं हो पायी थी. उसके बाद मुझे फिल्म ‘‘लैला मजनूं’’ मिली.

आपको फिल्म ‘‘लैला मजनूं’’ कैसे मिली?

मैं 2015 में इम्तियाज अली व साजिद अली से मिला था. उनके कहने पर मैंने आडीशन दिया था और मुझे आश्वासन मिला था कि मेरा चयन हुआ है, पर फिल्म के लिए कोई अनुबंध नहीं हुआ था. पूरे दो साल तक इंतजार करने के बाद फरवरी 2017 में मैं इस फिल्म के लिए अनबंधित किया गया.

अपने मजनूं के किरदार पर रोशनी डालेंगें?

लैला मजनूं की प्रेम कहानी तो सदियों पुरानी है. मगर यह आधुनिक परिवेश की कहानी है. इसमें मजनूं अमीर बाप का बेटा है. जिसका कश्मीर में बहुत बड़ा होटल है. काफी जमीनें हैं. वह अपने पिता के पैसे पर ऐश कर रहा है. उसे किसी की तलाश है, जो कि लैला पर जाकर पूरी होती है. मजनूं ऐसे प्यार को जाहिर करने का प्रयास करता है, जो कि हर तरह के ढांचों से अलग है. वह अपने अंदर व बाहर को जोड़ने का प्रयास करता है. प्रेम कहानी के साथ ही इसमें स्प्रिच्युअल बातें भी हैं.

स्प्रिच्युअल बात क्या है?

लैला मजनूं की प्रचलित कहानियों में एक वर्जन है कि बचपन में जब कैश को कुरान पढ़ायी जाती थी, तो  जब भी ‘ला इलाहा’ आता था, तो उसके मुंह से लैला लैला निकलता था. तो लोगों ने उसे काफिर घोषित कर दिया. जब भटकते हुए मजनूं पागल हो जाता है और पुनः अपनी लैला से मिलता है, तो कहता है-हर पत्ते हर बूते हर जर्रे में एक ही नाम लैला की जगह उसके मुंह से ‘ला इलाहा’ निकलता है. इसी पर हमारी फिल्म का गाना है-‘काफिर काफिर..’. यानी कि अंततः लैला और ला इलाहा एक हो गए थे. पर इसी के साथ फिल्म में मनोरंजन भी है.

मजनूं का किरदार निभाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ी?

फिल्म ‘‘लैला मजनूं’’ के लिए मैंने काफी मेहनत की. पूरे दो माह तक हमारा वर्कशाप हुआ. इम्तियाज अली ने हमें यह भी सिखाया कि गाने की शूटिंग के दौरान हमें किस तरह अपने होंठ चलाने चाहिए. इसके अलावा इस फिल्म के लिए मैंने महज 17 दिनों के अंदर 12 किलो वजन बढ़ाया. इतना ही नहीं मजनूं संजीदा प्यार में यकीन करता है. उसके लिए प्यार साधारण नहीं बल्कि पैशनेट और किसी की भी कल्पना से परे है. मजनूं की इस संजीदगी को समझने के लिए मुझे काफी होमवर्क करना पड़ा. किरदार की आत्मा में घुसने के लिए जब सभी कलाकार व यूनिट के लोग कश्मीर में होटल में रह रहे थे, तब भी मैं कश्मीर की ठंड में बाहर लकड़ी पर बैठकर समय बिताता था. वहां गांव के लोग मुझे पागल पुकारने लगे थे.

प्यार को लेकर आपकी अपनी क्या सोच है?

मेरे लिए प्यार एक भाव है. प्यार व रिश्ते में काफी फर्क है. रिश्तों का इजहार करने में प्यार एक माध्यम है. मगर हमारे यहां लोग रिश्ते को ही प्यार का नाम दे देते हैं. जबकि प्यार बहुत अलग और पवित्र है. मजनूं तो पा चुका है.

सोशल मीडिया पर कितना व्यस्त रहते हैं?

बहुत कम. अब फिल्म के रिलीज के समय मुझे सोशल मीडिया से जुड़ने का दबाव बना है. अब मैं भी इस तरह की दौड़ का हिस्सा बन गया हूं. मुझे शायरी लिखने का शौक है. बचपन से कविताएं लिखता रहता हूं. पढ़ता बहुत हूं.

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान एलिस्टेयर कुक ने लिया संन्यास

खराब दौर से गुजर रहे इंग्लैंड के पूर्व कप्तान एलिस्टेयर कुक ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी. हालांकि, कुक भारत के खिलाफ वर्तमान सीरीज का लंदन के ओवल में होने वाला आखिरी टेस्ट मैच खेलेंगे और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहेंगे. यह इत्तेफाक ही है कि कुक ने 21 साल की उम्र में में भारत के खिलाफ ही टेस्ट पदार्पण किया था. उन्होंने अपने करियर में अब तक 160 टेस्ट मैचों में 12,254 रन बनाए हैं, जिसमें 32 शतक और 56 अर्धशतक शामिल हैं.

कुक घरेलू क्रिकेट में अपने काउंटी क्लब एसेक्स के लिए खेलना जारी रखेंगे. कुक टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में सबसे अधिक रन स्कोर करने वाले छठे बल्लेबाज हैं. वह इंग्लैंड की ओर से सबसे ज्यादा टेस्ट खेलने वाले और सबसे ज्यादा रन व शतक बनाने वाले खिलाड़ी हैं. हाल-फिलहाल इंग्लैंड का कोई भी खिलाड़ी कुक के इन तीनों रिकॉर्ड के आस-पास पहुंचता भी नजर नहीं आ रहा है.

कुक ने कहा कि पिछले कुछ माह से काफी सोच विचार के बाद मैंने भारत के खिलाफ टेस्ट सीरीज के बाद अपने संन्यास की घोषणा करने का फैसला लिया है. अपनी टीम के साथी खिलाड़ियों के साथ भविष्य में ड्रेसिंग रूम साझा नहीं करने का विचार जानने के बाद भी मेरे लिए यह फैसला लेना मुश्किल था, लेकिन यही सही समय है. हालांकि, यह मेरे लिए काफी दुख भरा दिन है. मैं अपने चेहरे पर बड़ी मुस्कान के साथ यह कह सकता हूं, यह जानते हुए कि अब मेरे अंदर कुछ नहीं रह गया है.

टेस्ट मैचों में इंग्लैंड की कप्तानी करने वाले कुक की फॉर्म ने उन्हें कई बार चेताया भी, लेकिन उन्होंने इसके बावजूद पिछले साल वेस्टइंडीज और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दोहरे शतक लगाए. इस साल उन्होंने केवल एक ही अर्धशतक लगाया है और उन्हें यह अहसास हो गया कि यह संन्यास लेने का उनके लिए सही समय है. उन्होंने कहा कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी क्रिकेट से प्यार किया है. मेरे लिए इंग्लैंड की टीम की जर्सी पहनना कितना खास है, यह कोई नहीं समझ पाएगा. मैं जानता हूं कि अब युवा क्रिकेट खिलाड़ियों की नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का मौका देने का सही समय है, ताकि वह भी अपने देश के लिए खेलने का गौरव हासिल कर सकें.

कुक ने अपने लंबे समय के मेंटर और कोच ग्राहम गूच की प्रशंसा करते हुए कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से कई लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं, लेकिन सबसे खास गूच का धन्यवाद करना चाहता हूं.

सचिन के रिकॉर्ड से दूर रह गए

संन्यास लेने की वजह से एलिस्टेयर कुक दिग्गज भारतीय बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक 121 रन का विश्व रिकॉर्ड तोड़ने से दूर रह गए. 33 साल के कुक सचिन के इस रिकॉर्ड तोड़ने के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे थे और सचिन के इस रिकॉर्ड से सिर्फ 3667 रन पीछे थे. कुक के बाद अब कोई बल्लेबाज सचिन के रिकॉर्ड के आसपास भी नहीं है.

आवास देने की चुनौती से निबटने के कदम

सरकार का लक्ष्य सब को आवास उपलब्ध कराने का है. यह लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार कई कदम उठा रही है. इस क्रम में जहां बिल्डरों पर नकेल कसी जा रही है वहीं रियायती दरों पर मकान बनाने वाले निजी भवन निर्माताओं को प्रोत्साहित करने पर बल भी दिया जा रहा है.

सरकारीनिजी भागीदारी यानी पीपीपी के तहत भवन निर्माण पर जोर दिया जा रहा है. इस योजना के तहत निजी भूमि पर निर्मित किए जाने वाले भवनों के निर्माण पर ब्याज में ढाई लाख रुपए तक की मदद की योजना है. इस के अलावा जो बिल्डर बिना बैंककर्ज के भवन निर्माण करेंगे, निजी जमीन पर भवन बनाने पर डेढ़ लाख रुपए तक की मदद सरकार करेगी. इस के अलावा सरकारी जमीन पर बिल्डरों को भवन निर्माण की इजाजत दी जाएगी और भवन निर्माता वहां मकान बना कर उपभोक्ताओं को बेच सकेंगे.

इस लक्ष्य को हासिल करने में सरकार को दिक्कत न आए, इस के लिए दीवाला तथा अक्षमता शोधन संशोधन विधेयक पारित किया गया है. इस विधेयक को हाल ही में लोकसभा की मंजूरी भी मिल गई है. इस विधेयक में घर खरीदारों को जबरदस्त राहत दी गई है. बिल्डर के दीवालिया घोषित होने पर भी खरीदार को कोई नुकसान नहीं होगा. इस कानून के तहत विवाद का समाधान 270 दिनों में किए जाने का प्रावधान किया गया है.

अब जबकि आम चुनाव करीब हैं तो सरकार तरहतरह के कदम उठा रही है, दरअसल, ये सब चुनावी नारे हैं, क्योंकि मकान बनाने के लिए जिस पूंजी की जरूरत होती है वह न आम आदमी के पास है, न बिल्डरों के पास और न ही सरकार के.

नोटों से फैल रहीं बीमारियां? कारोबारियों ने सरकार से की जांच की मांग

क्या आपने ऐसा सुना है कि करेंसी नोट आपको बीमार कर सकते हैं? आप कहेंगे ऐसा कैसे हो सकता है. लेकिन यह सवाल छोटे व्यापारियों के देशव्यापी संगठन कन्फेडरेशन औफ औल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूछा है. संगठन ने ऐसा इसलिए पूछा है क्योंकि दो शोध रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि करेंसी नोट कई तरह की बीमारियों को न्योता देते हैं.

बता दें कि कैट ने मुद्रा नोटों से स्वास्थ्य संबंधी खतरा पैदा होने वाली खबरों का हवाला देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली को रविवार को चिट्ठी लिखी और इसके संबंध में जांच करने का आग्रह किया है. संगठन ने लोगों को करेंसी नोट के जरिए होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए कारगर उपाय करने की भी अपील की है. कन्फेडरेशन औफ औल इंडिया ट्रेडर्स ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा एवं केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डा. हर्षवर्धन से भी मामले पर तुरंत संज्ञान लेने का आग्रह किया है.

संगठन ने विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्ष का हवाला देते हुए दावा किया कि नोटों में बैक्टीरिया पाये गये हैं, जो बीमारियां फैलाते हैं और इनसे पेट खराब होना, टी.बी और अल्सर जैसी अन्य बीमारियों को खतरा हो सकता है. कैट के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि हर साल इस तरह की रिपोर्ट विज्ञान पत्रिकाओं में प्रकाशित होती है लेकिन दुख की बात स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. उन्होंने कहा की देश में व्यापारी वर्ग मुद्रा नोट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है क्योंकि अंतिम उपभोक्ता से उसका सीधा संपर्क होता है और यदि यह शोध रिपोर्ट सत्य हैं तो यह व्यापारियों के स्वास्थ्य के लिए घातक है. यही नहीं, यह उपभोक्ताओं को भी प्रभावित करेगा.

काउंसिल औफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) के तहत आने वाले टौप रेटिड संस्थान इंस्टीट्यूट औफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलौजी (IGIB) ने पाया कि करेंसी नोट से करीब 78 बीमारियां फैलती हैं. उनमें से ज्यादातर फुइंगि पाए गए थे लेकिन बैक्टीरिया भी थे जो डिसेंटरी, ट्यूबरक्युलोसिस और अल्सर जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं. स्टडी में पाया गया था कि मुद्रा नोट पर अक्सर सूक्ष्म जीवों पाए जाते हैं और वह एक नोट पर ही एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं और माइक्रोबियल रोगों को फैला सकते हैं.

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