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वाईफाई में आ रही है दिक्कत ? ऐसे पाएं चुटकियों में छुटकारा

रोजमर्रा की जिंदगी में हमें वाई-फाई की जरूरत वैसे ही पड़ती है, जैसे बिजली और पानी की. स्मार्टफोन, टीवी, कंप्यूटर और वीडियो गेम कंसोल को Wi-Fi के जरिए इंटरनेट से कनेक्ट किया जा सकता है. ज्यादातर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स बेसिक मौडम राउटर देते हैं, जिसके चलते घर के काफी कोने वाई-फाई की जद में नहीं आ पाते. ऐसे में अगर Wi-Fi में कुछ दिक्कतें आ जाएं, तो उन्हें इस तरह दूर करें.

राउटर को सही जगह पर रखें

वाई-फाई राउटर को रखने का सबसे बढ़िया तरीका घर का सेंटर प्वाइंट है. इससे आपको अपने घर के हर कोने में वाई-फाई के सिग्नल मिलेंगे. साथ ही, आप वाई-फाई के राउटर को अपने आई लेवल या फिर इससे ऊपर के लेवल पर रखने की कोशिश करें, इससे आपका वाई-फाई सिग्नल बेहतर बना रहेगा.

अच्छी रेंज के लिए रिपीटर्स

कई बार इंटरनेट सर्विस प्रोवाइड करने वाली कंपनी, जो राउटर देती है, वह अक्सर पूरे घर में वाई-फाई का नेटवर्क नहीं पहुंचा पाता. इसके लिए आप रिपीटर का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह डिवाइस आपके राउटर से वाई-फाई सिग्नल लेकर उसके कवरेज एरिया को बढ़ा देगी. रिपीटर से कनेक्ट होने के लिए डब्लूपीएस सबसे आसान तरीका है. इसके लिए आपको अपने राउटर के डब्लूपीएस को इनेबल करने के साथ रिपीटर के डब्लूपीएस बटन को औन करना होगा.

गेस्ट नेटवर्क

आप अपने राउटर पर गेस्ट नेटवर्क को इनेबल कर, उसका सेपरेट पासवर्ड रख लें. इससे घर पर आने वाले मेहमानों को आपको मुख्य पासवर्ड नहीं बताना पड़ेगा, जब आपके दोस्त घर से चले जाएं, तो आप गेस्ट नेटवर्क को बंद करके अपने होम वाई-फाई को फिर से शुरू कर सकते हैं.

रीबूट करते रहें

वैसे तो राउटर्स हमेशा काम करते रहने के लिए बनाए गए हैं, मगर कभी-कभार आप इन्हें रीबूट भी कर सकते हैं. ध्यान रहे रीबूट करें, रीसेट नहीं. सबसे बेहतर तरीका यह होगा कि आप राउटर को औफ करके कुछ देर बाद औन करें. कई बार कनेक्टिविटी में समस्या आने पर भी यह तरीका काम करता है. बंद करके औन करने पर इंटरनेट सही से चलने लगता है.

एशिया कप : मयंक का चयन न होने पर भड़के हरभजन

एशिया कप के लिए भारतीय टीम की घोषणा हो गयी है. विराट कोहली को आराम दिया गया है, जबकि उनकी जगह रोहित शर्मा को कप्‍तानी सौंपी गयी है. इधर टीम की घोषणा के चार दिनों के बाद भारत के सफल औफ स्पिनर हरभजन सिंह ने इसपर सवाल खड़ा कर दिया है. हरभजन सिंह ने बीसीसीआई के चयनकर्ताओं पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया. उन्होंने एक बल्लेबाज को लगातार नजरअंदाज किए जाने पर सवाल खड़े किए हैं. हरभजन ने पूछा कि क्या अलग-अलग खिलाड़ियों के लिए अलग-अलग नियम हैं?

हरभजन ने चयनकर्ताओं को आड़े हाथों लेते हुए ट्वीट किया, “इस टीम में (एशिया कप) मयंक अग्रवाल कहां हैं? इतने सारे रन बनाने के बाद भी उन्हें टीम में शामिल नहीं किया गया. मुझे लगता है कि अगल-अलग लोगों के लिए अलग-अलग नियम हैं.

एशिया कप के लिए भारतीय टीम इस प्रकार है : रोहित शर्मा (कप्तान), शिखर धवन (उप कप्तान), केएल राहुल, अंबाती रायडू, मनीष पांडेय, केदार जाधव, एमएस धौनी(विकेट कीपर), दिनेश कार्तिक, हार्दिक पांड्‌या, कुलदीप यादव, अक्षर पटेल, यजुवेंद्र चहल, भुवेश्वर कुमार,  जसप्रीत बुमराह, खलील अहमद और शार्दुल ठाकुर.

एशिया कप में अहम होंगे रोहित और धवन : ब्रेट ली

औस्ट्रेलिया के पूर्व तेज गेंदबाज ब्रेट ली ने रोहित शर्मा और शिखर धवन का समर्थन करते हुए कहा कि ये दोनों आगामी एशिया कप में अच्छा प्रदर्शन करेंगे और नियमित कप्तान विराट कोहली की अनुपस्थिति में भारत की योजना के लिए महत्वपूर्ण होंगे.

कोहली को इंग्लैंड दौरे के बाद आराम दिया गया है, जबकि रोहित भारतीय टीम की अगुआई करेंगे, जो 18 सितंबर से एशिया कप में अभियान शुरू करेगी. धवन को वनडे टूर्नामेंट के लिए उप कप्तान चुना गया है.

ली ने कहा, ‘एशिया कप में भारत के लिए दो अहम बल्लेबाज हैं शिखर धवन और रोहित शर्मा. मेरा मानना है कि रोहित अपना और टीम के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे, क्योंकि उन्हें भारतीय टीम की अगुआई की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है. विराट कोहली नहीं खेल रहे हैं तो रोहित और धवन भारतीय बल्लेबाजी के लिए दो अहम खिलाड़ी होंगे.’

ली 76 टेस्ट और 221 वनडे खेल चुके हैं. उन्हें लगता है कि रोहित संयुक्त अरब अमीरात में बेहतरीन खेल दिखाएंगे, क्योंकि वहां का विकेट उन्हें मदद करेगा. इस 41 वर्षीय पूर्व क्रिकेटर ने कहा, ‘कोहली को टूर्नामेंट के लिए आराम दिया गया है तो इससे शिखर और रोहित के पास खुद की काबिलियत दिखाने का मौका होगा. बातें हो रही हैं कि कैसे रोहित बायें हाथ के तेज गेंदबाजों का सामना नहीं कर सकते. लेकिन, मैं इससे सहमत नहीं हूं पर मैं यह कह सकता हूं कि संयुक्त अरब अमीरात में उन्हें अलग चुनौती का सामना करना होगा. हां, वे रोहित के लिए बायें हाथ के तेज गेंदबाज को लगाएंगे, लेकिन मेरा मानना है कि धीमे विकेट की वजह से रोहित दबदबा बनाएंगे.

जहां पावर वहां अमर : राजनीतिक परंपरा का निर्वाह करते अमर सिंह

योगी आदित्यनाथ सरकार ने विकास का चमचमाता मौडल दिखाने की कड़ी में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी का आयोजन किया. इस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित देश के बड़ेबड़े बिजनैसमेन शामिल हुए. प्रधानमंत्री ने 60 हजार करोड़ रुपए की 81 योजनाओं का शिलान्यास किया. लेकिन विकास से अधिक चर्चा का विषय अमर सिंह रहे.

अमर सिंह की खासियत है कि वे जहां होते हैं, खबरों का झुकाव उन की तरफ ही रहता है. अमर सिंह फोटो में भी आकर्षण का केंद्र बने रहे. भगवा कुरते में उन की छवि निखर रही थी. अमर सिंह का कद उस समय और ऊंचा हो गया जब प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘अमर सिंह बैठे हैं, सब की हिस्ट्री निकाल देंगे.’’ अमर सिंह ने बाद में ट्वीट किया कि वे ‘बूआ’ और ‘बबुआ’ के नहीं, विकास के साथ चलेंगे.

अमर सिंह के इस कदम के बाद उन के खिलाफ एक वाकयुद्ध शुरू हो गया. किसी ने तर्क दिया कि वे जहां जाते हैं वहां तोड़फोड़ कर देते हैं. इस के लिए बच्चन, अंबानी और मुलायम परिवारों के उदाहरण दिए गए. किसी ने कहा कि वे अपनी राज्यसभा की सदस्यता बचाना चाहते हैं. अमर सिंह को खलनायक बना कर पेश किया जाने लगा. यह सही बात है कि अमर सिंह पहले कांग्रेस के करीबी थे. इस के बाद उन का लंबा समय समाजवादी पार्टी खासकर सपा नेता मुलायम सिंह के साथ बीता.

अमर सिंह उद्योगपतियों और फिल्मी हस्तियों के बहुत करीबी रहे हैं. ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में भी वे फिल्म और उद्योगजगत की हस्तियों के बीच ही बैठे थे. जितनी चर्चा अमर सिंह के एक सम्मेलन में शामिल होने से शुरू हो गई उतनी चर्चा तो रामविलास पासवान, उदित राज और रामदास अठावले की नहीं हुई जो अपनी विचारधारा छोड़ कर भाजपा के साथ आए.

विचारधारा की राजनीति

राजनीतिक दल या राजनेता की अपनी एक विचारधारा होती थी. सत्ता से मिलने वाली पावर ने उस सिद्धांत को खत्म कर दिया. अब सत्ता जाते ही नेता पलटी मारने के प्रयास में लग जाते हैं. कोई ऐसा दल नहीं जिस में दलबदलू नेता नहीं हैं. जिस दल में नेता जाते हैं उसी दल की विचारधारा को वे मानने लगते हैं. वे अपने पुराने बयानों तक को याद नहीं रखते. सोशल मीडिया के जमाने में ऐसे सुबूत आसानी से मिलने लगे हैं. वे पिछली बातों पर कोई अफसोस तक नहीं जताते. बस, नई पार्टी के सुर में सुर मिलाने लगते हैं. ऐसे में केवल अमर सिंह जैसे नेता पर ही सवाल क्यों?

भाजपा को मनुवादी कहने वाले रामविलास पासवान, उदित राज जैसे नेता भाजपा के कदम से कदम मिला कर चल रहे हैं, जो नेता पूजापाठ और रूढि़वादिता के खिलाफ थे, खुद को नास्तिक कहते थे वे अब आस्तिक हो गए हैं.

अब यह साफ हो गया है कि राजनीतिक गठजोड़ विचारधारा पर नहीं, बल्कि सत्ता की अवसरवादी राजनीति पर हो रहा है. जहां सत्ता दिखती है, नेता वहीं खड़ा हो जाता है. ऐसे में अमर सिंह और रामविलास पासवान, उदित राज और अनुप्रिया पटेल में अंतर नहीं दिखता. सभी एक ही छत के नीचे खड़े हैं जहां सत्ता की ताकत है.

जनता को यह समझना जरूरी है कि उन के ये नेता केवल चुनाव जीतने के लिए ही जाति व धर्म की बात करते हैं. वोट ले कर चुनाव जीतने के बाद पावर मिलते ही केवल कुरसी ही अहमियत रखती है. ऐसे में नेता जाति व धर्म के नाम पर लोगों को केवल भड़काते हैं. उन का मकसद केवल सत्ता हासिल कर राज करना होता है.

अमर सिंह हैं खास

अमर सिंह सत्ता के साथ अपना कदम बदलते हैं. इस के बाद भी वे सभी दलों में बराबर की दोस्ती रखते हैं. अमर सिंह और बसपा नेता मायावती के बीच बेहतर रिश्ते नहीं रहे. समाजवादी पार्टी की तरफ से अमर सिंह मायावती के खिलाफ तीखी बयानबाजी करते रहे हैं. ऐसे में जब सपा व बसपा के बीच रिश्ते मधुर हो रहे हैं, अमर सिंह के लिए वहां जगह नहीं रह गई. सपा में अमर सिंह को मुलायम सिंह यादव खेमे का माना जाता है.

मुलायम परिवार में विवाद के समय भले ही अमर सिंह का कोई रोल न रहा हो पर सपा नेता अखिलेश यादव अमर सिंह को ही इस का जिम्मेदार मानते थे. सपा में मुलायम की पकड़ खत्म होने के बाद छोटेबड़े तमाम नेता अमर सिंह के खिलाफ टिप्पणी करने लगे थे. ऐसे में अमर सिंह सपा, बसपा के गठजोड़ में सहज नहीं रह सकते थे. अब अमर सिंह भाजपा के पाले में हैं.

अमर सिंह ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में हिस्सा लेने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले. इस के बाद जब प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में अमर सिंह का नाम लिया तो यह पक्का हो गया कि अमर सिंह केसरिया सदरी पहन कर ऐसे ही नहीं आए हैं.

भाजपा के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में अमर सिंह बहुत काम के नेता साबित हो सकते हैं. उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल में वे अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं. इस के अलावा राष्ट्रीय राजनीति में समीकरण बनाने में वे अहम किरदार निभा सकते हैं. कई बार सरकार को बनानेगिराने में उन का रोल सामने आता रहा है.

अमर सिंह अपनी बात बड़ी साफगोई से कहते हैं. मुखर होने के कारण वे मीडिया में आकर्षण का केंद्र रहते हैं. लिहाजा, भाजपा के लिए वे एक अच्छे मैनेजर साबित हो सकते हैं.

भाजपा के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव से 2019 का लोकसभा चुनाव अलग है. केवल मोदी के चेहरे पर इस चुनाव को जीतना व सरकार बनाना उस के लिए संभव नहीं है. ऐसे में अमर सिंह विपक्ष की काट साबित हो सकते हैं.

एयरलाइंस कंपनियों का खास औफर, मात्र 999 रुपये में करें हवाई सफर

आगर आप कहीं घूमने का प्लान कर रहे हैं तो आपके लिए एक खुशखबरी है. आप बेहद ही कम कीमत में हवाई सफर का आनंद ले सकते हैं. जी हां यह सच है, क्योंकि एयरलाइंस कंपनियां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट टिकटों पर डिस्काउंट औफर दे रही हैं. जिनमें जेट एयरवेज चुनिंदा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट टिकटों पर 30 फीसद छूट दे रही है. डिस्काउंट प्रीमियर और इकोनौमी क्लास में बेस किराये पर उपलब्ध है. वहीं इंडिगो की शुरुआती कीमत 999 रुपये है. गोएयर ने टिकट का शुरुआती किराया 1,099 रुपये रखा है. जबकि एयरएशिया इंडिया चुनिंदा रूट्स पर 999 रुपये में टिकट औफर कर रही है.

गो एयर : अन्य विमानन कंपनियों को टक्कर देने के लिए गो एयर भी औफर लेकर आई है. औफर के तहत सिर्फ 1099 रुपए में यात्री अपना टिकट बुक कर सकते हैं. इसमें सितंबर 2018 से लेकर 31 मार्च 2019 तक यात्रा की जा सकती है. यह औफर सीमित अवधि के लिए सीमित सीटों पर ही उपलब्ध होंगी. 5 सितंबर को इस सेल का आखिरी दिन होगा.

इंडिगो : इंडिगो के टिकट बुकिंग की कीमत 999 रुपये से शुरू होगी. कंपनी ने अपनी 10 लाख सीटों की सेल शुरू की है. इंडिगो की यह सेल 3 सितंबर से शुरू होकर 6 सितंबर को खत्म हो जाएगी. स्कीम के तहत इंडिगो की घरेलू फ्लाइट टिकट का किराया 999 रुपये से शुरू हो रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट के लिए 3,199 रुपये किराया रखा गया है. मोबाइल वॉलेट मोबीक्विक के माध्यम से पेमेंट करने वाले ग्राहकों को कंपनी 600 रुपये तक (20%) का कैशबैक भी देगी. इसके तहत यात्री 18 सितंबर 2018 से 30 मार्च 2019 तक यात्रा कर सकते हैं.

एयर एशिया : एयर एशिया 999 रुपये में देश और 1399 में विदेश घूमने का मौका दे रही है. टिकट की बिक्री 1 सितंबर से शुरू होकर 9 सितंबर तक चलेगी. जबकि यात्रा फरवरी 2019 से नवंबर 2019 के बीच की जा सकती है. घरेलू स्थानों में बेंगलूरू, नई दिल्ली, कोलकाता, कोच्चि, गोवा, जयपुर, चंडीगढ़, पुणे, गुवाहाटी, इंफाल, विशाखापट्नम, हैदराबाद, श्रीनगर, बागडोगरा, रांची, भुवनेश्वर, नागपुर, इंदौर, सूरत, अमृतसर और चेन्नई शामिल है. विदेश यात्रा के लिए कुआलालंपुर, बैंकाक, क्राबी, सिडनी, औकलैंड, मेलबर्न, सिंगापुर, बाली आदि स्थानों के टिकट बुक किए जा सकते हैं.

जेट एयरवेज : जेट एयरवेज के औफर के तहत घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट टिकटों पर 30 फीसद छूट है. स्कीम बुकिंग के सभी माध्यमों पर 7 सितंबर तक और कंपनी की वेबसाइट और ऐप के जरिए 9 सितंबर तक उपलब्ध रहेगी. यह औफर 25 लाख सीटों पर उपलब्ध है. इसमें 10 सितंबर से बाद की यात्रा के टिकट बुक किए जा सकते हैं.

आप की प्राइवेसी के लिए खतरा हैं स्मार्टफोन फीचर्स

स्मार्टफोन के माइक और कैमरा आपके लिए खतरा हो सकते हैं. कई लोग बताते हैं कि ये आपके बारे में आसानी से जानकारी देते रहते हैं. हो सकता है कि स्मार्टफोन के माइक और कैमरा आपकी बातें सुन रहे हों, आप कहां हैं उसके बारे में फोटो या जानकारी ले रहे हों.

कई लोग जो ऐप डाउनलोड करते हैं, उनसे ये सभी करने की इजाजत मांग ली जाती है. अलग अलग समय पर लोगों ने पाया कि उनके स्मार्टफोन को जो भी उनके बारे में जानकारी रही, वो उनके लिए हैरानी की बात है.

इस रिपोर्ट के अनुसार बीबीसी के रिपोर्टर को अपने दोस्त के एक दुर्घटना का शिकार होने के बारे में पता चला. थोड़ी ही देर में उस दोस्त के बारे में जानकारी, जहां दुर्घटना हुई थी उस जगह के बारे में भी जानकारी, रिपोर्टर को अपने गूगल के सर्च बॉक्स में मिली.

ऐसी दूसरी घटनाओं के बारे में भी लोगों ने बात की है और इस रिपोर्ट में लिखा है कि कैसे घर में देख रहे टेलीविजन शो के बारे में गूगल सर्च को पता चल सकता है.

आपके बिना जाने स्मार्टफोन का कैमरा आपकी फोटो लेकर भेज सकता है

फोर्ब्स मैगजीन की इस रिपोर्ट के अनुसार आपके बिना जाने स्मार्टफोन का कैमरा आपकी फोटो लेकर भेज सकता है. इस रिपोर्ट के अनुसार स्मार्टफोन का माइक आपकी बातें भी सुन सकता है.

ऐसी कई और घटनाओं के बारे में आप इंटरनेट पर पढ़ सकते हैं. लेकिन ये जरूरी है कि सावधानी बरतें ताकि बाद में परेशानी नहीं हो.

स्मार्टफोन के माइक्रोफोन को तो डिसएबल नहीं किया जा सकता है क्योंकि कॉल आने पर बात करने के लिए वो जरूरी है. लेकिन कैमरे पर कुछ चिपका कर उसे डिसएबल कर सकते हैं. और जब जरुरत हो तभी उसे हटाकर इस्तेमाल कर सकते हैं.

अपने स्मार्टफोन की सेटिंग में जाकर माइक्रोफोन में चेक कर लीजिए, किन ऐप को माइक्रोफोन के लिए इजाजत दी गयी है. अगर आपकी बातों तक पहुंचने की इजाजत बंद करनी है तो उसे ऑफ कर दीजिए.

इलैक्ट्रौनिक वाहन संचालन के लिए प्रोत्साहन योजना

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ की एक रिपोर्ट आई है जिस में भारत सरकार की महत्त्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण की तारीफ की गई है और इस की 4 साल की उपलब्धि को उल्लेखनीय बताया गया है. इस में यह भी कहा गया है इस से न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता के प्रति लोगों में असाधारण जागरूकता आई है बल्कि गंदगीजनित बीमारियों से लाखों लोगों की जान बची भी है.

एक अन्य रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने उत्सर्जन को कम करने तथा धरती को प्रदूषण से बचाने के भारत के प्रयासों की सरहाना की है. पर्यावरण को नियंत्रण करने और रेफ्रीजरेटर व एसी से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए एक साल में एक लाख एसी/फ्रिज तकनीशियनों को प्रशिक्षित करने का कौशल विकास मंत्रालय का उद्देश्य है.

यह कदम छोटा हो सकता है लेकिन प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है और इस तरह के प्रयास निरंतर जारी रहने आवश्यक हैं. वहीं, इलैक्ट्रौनिक वाहन प्रदूषण से राहत देने में उपयोगी साबित हो रहे हैं. टाटा जैसी बड़ी कंपनियां 2020 तक बड़े स्तर पर इलैक्ट्रौनिक वाहन बनाने पर सहमत हो चुकी हैं. मतलब डीजलपैट्रोल पर निर्भरता कम करने की तैयारी चल रही है. इन वाहनों की बैटरी को रिचार्ज करने की ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है कि बैटरी बहुत कम समय में रिचार्ज हो कर लंबी दूरी तय कर सके.

सड़कों पर इलैक्ट्रौनिक रिकशा की सफलता धूम मचा रही है. अब यदि चारपहिया वाहन सड़कों पर इसी ताकत के साथ ढोते हैं तो पर्यावरण प्रदूषण रोकने तथा ईंधन के परंपरागत साधनों को बदलने की यह क्रांतिकारी पहल होगी. इधर, सरकार की योजना डीजलपैट्रोल वाहनों के इंजिन पर शुल्क बढ़ाने और उस राशि का इस्तेमाल इलैक्ट्रौनिक वाहनों को बढ़ावा देने में करने की है.

‘बुसान फिल्म फेस्टिवल’ में पहुंची ‘‘विडो आफ सायलेंस’’

इसी वर्ष लद्दाखी फिल्म ‘‘वाकिंग विथ द विंड’’ के लिए तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके  फिल्मकार प्रवीण मोरछले के सितारे बुलंदियों पर हैं. उन्होने खुद ही सूचित किया है कि उनकी नई व तीसरी फिल्म ‘‘विडो आफ सायलेंस’’ इस वर्ष 4 से 11 अक्टूबर के बीच संपन्न होने वाले ‘‘बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’’ में भारतीय फिल्म के रूप में प्रदर्शित की जाएगी.

85 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘विडो आफ सायलेंस’’ कश्मीर की पृष्ठभूमि पर है. इसमें समसामायिक भारत में औरतों की स्थिति का चित्रण है. तीन औरतों के नजरिए से पूरी बात कही गयी है. खुद प्रवीण मोरछले बताते हैं-‘‘वर्तमान भारतीय समाज की जो स्थिति है, उस पर एक विचारोत्तेक फिल्म है. फिल्म की कहानी एक नारी, उसकी बेटी और उसकी सास की है. इस महिला का अपने वजूद को बनाए रखने का संघर्ष है. कहानी गांव की ही है. मैंने अपनी फिल्म में कहीं इस बात को दिखाने की कोशिश नहीं की कि इन तीनों में से कौन सही है, कौन गलत है? पर फिल्म वर्तमान भारत को पूरी तरह से लोगों के सामने लेकर आती है.’’

फिल्म ‘‘विडो आफ सायलेंस’’ को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं-अजय चैरे, शिल्पी मारवाह बिलाल, नूरजहां, सब्बीर और तमाम गांव वाले. फिल्म के कैमरामैन मोहम्मद रेजा जहां पनाह, कास्ट्यूम डिजायनर निकिता शाह, साउंड डिजायनर सनल जौर्ज, साउंड मिक्सिंग जस्टिन जोसे व अन्य.

‘‘लव सोनिया’’ सेक्स के अनैतिक व्यापार के खिलाफ जागरूकता लाती है : रिया सिसोदिया

वुमन ट्रैफिकिंग पर आधारित और विश्व के कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत फिल्म ‘‘लव सोनिया’’ में सेक्स रैकेट में फंसी 14 साल की लड़की प्रीति का किरदार निभाकर चर्चा बटोर रहीं अभिनेत्री रिया सिसोदिया कभी भी अभिनेत्री नही बनना चाहती थीं. पर इस फिल्म की पटकथा ने उन्हें अभिनेत्री बना दिया.

खुद रिया सिसोदिया बताती हैं- ‘‘मैं मुंबई के एक कौलेज में बीकाम की पढ़ाई के साथ साथ मौडिंलंग कर रही थीं और बुहत खुश थीं. अभिनय करने का मेरा मन नहीं था. सच कह रही हूं अभिनय में मेरी कभी कोई रूचि नहीं थी. लेकिन एक विज्ञापन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर के कहने पर मैंने ‘लव सोनिया’के लिए औडीशन दे दिया. पर औडीशन देने के बाद भी मन में ख्याल आया कि फिल्म में अभिनय नहीं करना चाहिए. पर जब मैंने फिल्म की पटकथा पढ़ी, तो मेरा निर्णय बदल गया. पटकथा पढ़ते पढ़ते मेरी आंखें व मेरा चेहरा एकदम लाल हो गया था. उस वक्त मेरी छोटी बहन भी मेरे साथ बैठी थी. मेरे अंदर से सवाल आया कि यदि मेरी छोटी बहन के साथ ऐसा कुछ हो जाए, जैसा फिल्म में प्रीति के साथ हो रहा है, तो मैं क्या करूंगी? इसी ख्याल ने मुझे इस फिल्म को करने के लिए प्रेरित किया. ’’

रिया सिसोदिया आगे कहती हैं- ‘‘पटकथा पढ़ने के बाद दो बातों ने मुझे फिल्म करने के लिए उकसाया. पहला तो दो बहनों का आपसी प्यार और दूसरा 16 साल की लड़की के साथ जबरन जो कुछ होता है. आपको शायद पता होगा कि पूरे विश्व में वुमन ट्रैफिकिंग और सेक्स रैकेट का अरबों रूपए का धंधा हर साल होता है. एक आंकड़े के अनुसार सिर्फ भारत में हर वर्ष 270 लड़कियां जबरन सेक्स के धंधे में ढ़केली जाती हैं. पटकथा पढ़ने के बाद मेरे दिमाग में ख्याल आया कि यदि इनमें मेरी बहन भी हो तो? इसलिए मैंने सोचा कि जो पटकथा पढ़कर मैंनें अहसास किया, वह फिल्म देखकर हर इंसान अहसास करे और इस अनैतिक व्यापार पर रोक लगाने की दिशा में सोचे.’’

फिल्म ‘‘लव सोनिया’’ में रिया सिसोदिया ने एक किसान की 14 साल की लड़की का किरदार निभाया है, जिसे धोखे से सेक्स के धंधे में ढ़केल दिया जाता है. इस किरदार को निभाने से पहले रिया सिसोदिया व मृणाल ठाकुर कलकत्ता की सोनागाची देह मंडी जाकर कई लड़कियों से मिलें और उनकी दर्द नाक कहानी सुनी. जिससे उन्हें अपने किरदार को निभाने में आसानी हुई. वह कहती हैं- ‘‘उन लड़कियों की दुःखभरी कहानी सुनकर हमें रोना आया. अब मेरा कलकत्ता जाने का मन नहीं होता है. मेरे दिमाग में अभी भी उन लड़कियों की कहानियां गूंजती हैं. 15 साल की लड़की बता रही थी कि उसके साथ क्या क्या हुआ? किस तरह के ग्राहक आते हैं? उसे हर दिन कम से कम चालिस पुरुषों के साथ सोना पड़ता है.’’

आपने उन लड़कियों से बात की. अब वह क्या महसूस करती हैं? इस सवाल पर रिया सिसोदिया ने बताया- ‘‘सोनागाची की वेश्या मंडी की लड़कियों ने उसी को अपनी जिंदगी व अपनी तकदीर मान लिया है. अब वह वहां से निकलना नहीं चाहतीं. अब उनके परिवार के लोग उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहते. कुछ लड़कियां भागकर अपने माता पिता के पास गयी थीं, पर उनके माता पिता ने कह दिया कि वह तो उनके लिए मर गयी. 2 लड़कियों ने बताया कि उन्होंने भाग कर शादी कर ली थी, पर कुछ समय बाद वह पुरुष भी उन्हें यहीं पर बेच गए, वह सभी एक ही बात कर रही थीं, अब तो हम मैले हो चुके हैं, हमारा अपना कोई नहीं.’’

फिल्म में इस समस्या का कोई समाधान बताया गया? इस सवाल पर रिया ने कहा- ‘‘फिल्म का मकसद लोगों के बीच जागरूकता लाना है. वैसे हमारे देश में कई एनजीओ इस दिशा में काम कर रहे हैं. इन एनजीओ ने कई लड़कियों को बचाकर उन्हें जीवन की नई राह पर अग्रसर किया है. हमारी फिल्म के निर्देशक तबरेज नूरानी ने खुद कुछ लड़कियों को बचाया और उन्हें शरण दिलायी. फिल्म में राज कुमार राव का जो किरदार है, वह वास्तव में फिल्म के निर्देशक तबरेज नूरानी से ही प्रेरित है. इतना ही नहीं रिचा चड्ढा ने भी 15 लड़कियों की मदद की. रिचा तो ऐसी लड़कियों की मदद के लिए एनजीओ खोलने वाली हैं. पर सौ में से मुश्किल से दो लोग ऐसी लड़कियों की मदद के लिए आगे आते हैं. हमारी फिल्म ‘लव सोनिया’ का मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा लोग आगे आएं और इन्हें बचाने के लिए कुछ करें.’’

फिल्म को कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समोरोहों में पुरस्कृत किया गया. आप खुद वहां गयी थीं? इस सवाल पर रिया ने कहा-‘‘जी हां! हम गए थे. पहली ही फिल्म के लिए तमाम विदेशी फिल्मकारों के सामने खड़े होना ही अपने आप में काफी गर्व का अहसास दिला रहा था. एक इंसान ने मुझसे कहा कि उसने दो बच्चों को एडाप्ट किया है. पर अब वह एक सेक्स रैकेट से मुक्त करायी गयी लड़की को एडाप्ट कर उसे नई जिंदगी, नया नाम व नया परिवार देगा. एक औरत ने कहा कि वह अंदर से काफी दुःखी हो गयी हैं और कुछ कह नहीं सकतीं. कुछ लोगों ने सवाल किया कि आप तो मार्डन लड़की लग रही हो, पर फिल्म में आप गांव की लड़की के किरदार में थी, इसलिए वह हमें पहचान नहीं पाए. उन्होंने पूछा कि आपने गांव की लड़की का किरदार कैसे निभाया? पर ऐसे लोगों को मेरी बगल में खड़ी रिचा चड्ढा ने जवाब देते हुए कहा कि किताब को उसके कवर से जज नहीं करना चाहिए. मैंने कहा कि हम वह लड़कियां नही है. हम कलाकार हैं. हमने उन लड़कियों का किरदार निभाया है. कई लोग सवाल कर रहे थे कि ऐसी लड़कियों को बचाने में वह किस तरह से मदद कर सकते हैं? हमें लगा कि इससे लोगों को जागरूक करने का हमारा मकसद कामयाब हुआ.’’

माई बौडी माई राइट

‘अगर 2 बालिगों के बीच सहमति से संबंध बनते हैं तो इसे अपराध नहीं कहा जा सकता.’ सुप्रीम कोर्ट की बीती 11 जुलाई की यह टिप्पणी लाखों एलजीबीटी यानी लैस्बियन, गे, बाई सैक्सुअल और ट्रांसजैंडर्स को राहत देने वाली थी. हालांकि लंबी सुनवाई के बाद भी यह अभी पूरी तरह तय नहीं हो पाया है कि समलैंगिकता अब अपराध नहीं है.

पर यह दिख रहा है कि समलैंगिक अपने अधिकारों की लड़ाई जीतते नजर आ रहे हैं. इस के हकदार वे हैं भी और क्यों हैं इस का खुलासा खुद उच्चतम न्यायालय एक वाक्य में कर चुका है कि अगर 2 वयस्क अपनी सहमति से संबंध बनाएं तो यह अपराध कैसे मान लिया जाए.

सुप्रीम कोर्ट में 3 दिन चली यह बहस उस बहस से कहीं ज्यादा दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण थी जो चौराहों और सोशल मीडिया पर आएदिन होती रहती है. गौरतलब है कि समलैंगिकों की ओर से दायर एक याचिका पर चली सुनवाई में केंद्र सरकार ने यह जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी थी कि वह तय करे कि समलैंगिक संबंध अपराध हैं या नहीं.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार का कहना था कि समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है. यौन रुझान और लैंगिक पहचान दोनों समान रूप से किसी की प्राकृतिक प्रवृत्ति के तथ्य हैं और किसी व्यक्ति का यौन रुझान अलग है तो उसे अपराध नहीं कहा जा सकता.

इस दिलचस्प बहस में सुप्रीम कोर्ट का मूड समलैंगिकों के पक्ष में दिखा तो इस की कई वजहें भी हैं, उन पर भी अदालत में खुल कर चर्चा हुई. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने पुराने आदेश पर पुनर्विचार का फैसला लिया था. याचिकाकर्ताओं की दलील यह थी कि इंडियन पीनल कोड की धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है. यह आश्चर्य है कि 60 वर्ष के जज आज के युवा नेताओं से ज्यादा उदार हैं.

केंद्र सरकार की तरफ से एडिशनल सौलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह मामला धारा 377 तक सीमित रहना चाहिए. इस का उत्तराधिकार, शादी और संभोग के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए.

इस पर पूर्व अटौर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि हां, ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के वर्ष 1860 के नैतिक मूल्यों से प्राकृतिक सैक्स को परिभाषित नहीं किया जा सकता. प्राचीन भारत की नैतिकता, विक्टोरियन नैतिकता से अलग थी.

इस तर्क पर जस्टिस आर एस नरीमन का सवाल था कि क्या आप का तर्क यह है कि समलैंगिकता प्राकृतिक होती है. इस पर मुकुल रोहतगी ने महाभारत के शिखंडी और अर्धनारीश्वर का भी उदाहरण दिया. उन का यह कहना काफी महत्त्वपूर्ण था कि धारा 377 मानवाधिकारों का हनन करती है. समाज में बदलाव के साथ ही नैतिकता बदल जाती है. हम कह सकते हैं कि 160 साल पुराने नैतिक मूल्य आज के नैतिक मूल्य नहीं होंगे.

अपनी एक और टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि भारतीय समाज में ऐसा माहौल बनाया गया जिस से समलैंगिकों के साथ भेदभाव होता है.

तो अपराध क्यों

5 जजों की संवैधानिक पीठ ने यह भी स्वीकारा कि समलैंगिक समुदाय के साथ भेदभाव से उन के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. किसी भी समलैंगिक शख्स के साथ महज इसलिए भेदभाव नहीं किया जा सकता कि यौन संबंधों के लिए उस का झुकाव किस तरफ है.

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की यह टिप्पणी भी गौरतलब थी कि परिवार और सामाजिक दबाव के चलते समलैंगिक समुदाय के लोगों की शादी जबरन विपरीतलिंगी से करा दी जाती है. इस से बाइसैक्सुएलिटी को बढ़ावा मिलता है. समाज के पूर्वाग्रहों के चलते समलैंगिकों को डाक्टरी परामर्श के लिए जाना पड़ता है.

याचिकाकर्ताओं की एक और अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने संविधान के अनुच्छेद 15 (लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के भी हवाले दिए थे.

कोर्ट की इन तमाम बातों से साफ लग रहा है कि उम्मीद इस बात की ज्यादा है कि अब समलैंगिकता अपराध नहीं रह जाएगी और धारा 377 समाप्त की जा सकती है जिस में समलैंगिकों को सजा देने का प्रावधान है.

कानून तो अपना काम कर ही रहा है पर उस से परे ये दलीलें बेहद आम हैं कि समलैंगिकता से नफरत क्यों, समलैंगिक किसी का क्या बिगाड़ते हैं. समलैंगिकता कोई हिंसा नहीं है, न ही किसी को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाती है. यह 2 लोगों की इच्छा है कि वे कैसे यौन संपर्क या यौन क्रियाएं करें. इस पर समाज के ठेकेदारों के पेट में नैतिकता की मरोड़ें उठती हैं तो उठती रहें. अगर वे किसी के प्रति कोई फसाद खड़ा करें तो बात जरूर चिंता की है.

सुप्रीम कोर्ट में यह बात बेवजह नहीं उठी कि यौन रुझान एक निहायत ही प्राकृतिक और व्यक्तिगत बात है. एक हद तक कभीकभी यह आनुवंशिक भी होती है. ऐसे में समलैंगिकों को यौन सुख से वंचित रखना उन के साथ ज्यादती नहीं तो क्या है?

दिक्कत की एक बड़ी बात समलैंगिकों के साथ दुर्व्यवहार, उन का तिरस्कार और बहिष्कार है जिस से देशभर के समलैंगिक दुखी हैं, मानो वे कोई अछूत, आतंकी, नक्सली, घुसपैठिए या फिर असामाजिक तत्त्व हों. उन के नागरिक अधिकार महज इस बात पर छीने जाना, उन पर एतराज जताना या वैचारिक हमला करना उन के प्रति किसी अपराध से कम नहीं. यही लड़ाई समलैंगिक और उन के संगठन लंबे समय से लड़ रहे हैं, जो उन के स्वाभिमान और आत्मसम्मान से भी जुड़ी है.

परेड से समानता की आवाज

सुप्रीम कोर्ट में हुई चर्चा से देशभर के समलैंगिकों में खुशी की लहर दौड़ गई, जिस का जश्न मनाने के लिए उन्होंने जगहजगह एलजीबीटी प्राइड परेड आयोजित कर डाली.

भोपाल में आयोजित एक एलजीबीटी परेड में जब देशभर से आए समलैंगिकों से इस प्रतिनिधि ने बात की तो उन्होंने अपना दर्द और खुशी दोनों बेहद भावुक अंदाज में बयां किए.

एलजीबीटी प्राइड परेड में शामिल समलैंगिकों का स्लोगन था, ‘माई बौडी, माई राइट.’ इस परेड में सैकड़ों समलैंगिक भिन्नभिन्न अंदाज और ड्रैस में शामिल हुए. किसी ने रंगबिरंगे कपड़े पहन रखे थे तो किसी ने अपने चेहरे पर रंगीन मेकअप किया हुआ था. सभी के हाथों मेें बैनर थे.

समानता की बात कर रहे इन समलैंगिकों में कोलकाता से आए वैंकटेश ने बिना किसी झिझक के बताया, ‘‘यस, आइ एम गे और मुझे यह मानने में कोई शर्म नहीं है, यह परेड दरअसल एक सैलिब्रेशन है.’’ वैंकटेश का कहना था कि हम भी आम लोगों की तरह हैं. हमें भी समानता चाहिए.

मुंबई से खासतौर से इस परेड में शामिल होने आए युवा सुमित पवार ने अपना दर्द जाहिर करते हुए कहा, ‘‘जब मुझे ऐसा लगा कि मैं एक गे हूं तो मेरे सामने यह समाज बहुत बड़ी समस्या के रूप में आ खड़ा हुआ. घर वालों और दोस्तों के ताने बुरे लगते थे और अब भी लगते हैं.’’ सुमित चाहता है कि समाज में उसे भी आजादी और बराबरी मिले.

एक और समलैंगिक श्वेता ने बड़े सहज ढंग से स्वीकारा कि वह एक बाईसैक्सुअल है. उस का एक बौयफ्रैंड भी है और एक गर्लफ्रैंड भी. श्वेता बताती है कि उस के दोस्तों और परिचितों को यह बात पता है, लेकिन अभी मम्मीपापा को मालूम नहीं है. वह केवल समानता के लिए परेड में शामिल होने आई है.

भोपाल एलजीबीटी प्राइड परेड में इन लोगों ने खूब गुब्बारे उड़ाए और अनुशासित ढंग से रैली निकाली. समलैंगिकों की यह परेड राह चलते लोगों के आकर्षण का केंद्र रही.

पहले अदालत में हुई बहस और फिर इस परेड से यह तो साफ हो गया कि समलैंगिकता कोई असमानता या अपराध नहीं और इसे किसी कानूनी या गैरकानूनी डंडे से रोका भी नहीं जा सकता. यह केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक व भावनात्मक जरूरत को पूरी करती है. इसलिए इसे सहज ढंग से स्वीकार कर लेने में हर्ज क्या है. बस, एक नफरत और पूर्वाग्रह ही तो लोगों को छोड़ना है.

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