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सावधान : आप भी करें सुरक्षित एटीएम का इस्तेमाल

एटीएम फ्रौड की घटनाएं लगातार पढ़ने को मिल रही हैं. इन में कुछ घटनाएं एटीएमधारकों की लापरवाही के कारण होती हैं. कुछ घटनाएं धोखाधड़ी करने वालों के तकनीकी कौशल के कारण होती हैं. इस तरह की घटनाएं न हों, इस के लिए देश के सब से बड़े बैंक स्टेट बैंक औफ इंडिया ने ग्राहकों को धोखाधड़ी से बचाने के लिए ऐसी चिप विकसित की है जिस से एटीएम फ्रौड से पूरी तरह से बचा जा सकता है. चिप लगा यह अत्यधिक सुरक्षित एटीएम कार्ड है.

बैंक ने अपने सभी पुराने एटीएम कार्ड्स बदलने के लिए अपने ग्राहकों से अपील की है. ग्राहकों को यह बदलाव अनिवार्य रूप से करना है और इस साल 31 दिसंबर तक अपना पुराना कार्ड बदलना है. इस के लिए सख्ती बरती गई है, बैंक ने कहा है कि पुराना कार्ड पहलीजनवरी से काम करना बंद कर देगा. इस का मतलब है कि 31 दिसंबर तक ग्राहकों के पास नया एटीएम कार्ड होना आवश्यक है.

बैंक ने कहा है कि नया और सुरक्षित कार्ड निशुल्क बदला जा सकता है. एटीएम कार्ड बदलने के लिए बैंक की अपनी शाखा पर जाना होगा या इस के लिए औनलाइन आवेदन करना होगा. इस के लिए बैंक की वैबसाइट पर एटीएम कार्ड सर्विस पर क्लिक कर कार्ड बदलने की प्रक्रिया का अनुपालन करना होगा.

एसबीआई ने यह कदम रिजर्व बैंक के दिशानिर्देश पर अपने 40 करोड़ ग्राहकों की सुरक्षा के मद्देनजर उठाया है. बैंक की यह तकनीक कितनी सुरक्षित साबित होगी, यह तो समय ही तय करेगा लेकिन बैंक के परिवर्तन के लिए उठाए गए इस कदम से साबित हो गया है कि वह हर स्थिति में ग्राहक को सुरक्षित रखना चाहता है.

ग्राहकों को भी खुद की सुरक्षा के लिए सतर्क रहने की जरूरत है. सभी बैंकों का स्पष्ट कहना है कि वे निजी जानकारी कभी भी अपने ग्राहक से फोन पर नहीं मांगते हैं लेकिन फिर भी ग्राहक धोखाधड़ी करने वालों के चंगुल में फंसते हैं, जिस से उन्हें सावधान रहने की जरूरत है.

गडकरी का गणित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य कभीकभी सच बोल कर अपने अपराधबोध व ग्लानि नाम के मनोविकारों से मुक्ति पा लेते हैं. ऐसा ही कुछ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने यह कहते किया कि जब सरकारी नौकरियां ही नहीं हैं तो आरक्षण कहां से दें.

अब यह और बात है कि इस बेबाक बयानी का दूसरा पहलू यह भी है कि नौकरियां तो इफरात से हैं पर सरकार इस डर से उन्हें नहीं दे रही कि अगर ऐसा किया तो आरक्षितों की भी भरती करनी पड़ेगी.

वाणिज्य और कानून के स्नातक गडकरी नौकरियों का गणित पढ़ाते वक्त भूल गए कि नौकरी कोई मंदिर या कुआं नहीं जहां आप लठ के दम पर दलित को जाने देने से रोक सकते हैं.

दलित युवाओं को बहलाने के लिए यह नया मंत्र एक तरह का षड्यंत्र ही है जिस से सवर्णों को भी छला जा रहा है.

भोजपुरी गाने : नौजवानों को देते सपनों की नई उड़ान

भोजपुरी गाने केवल मनोरंजन ही नहीं करते हैं, बल्कि समाज और राजनीति की घटनाओं पर वार भी करते हैं. ‘नोटबंदी’, ‘नीतीश कुमार के महागठबंधन के टूटने’, ‘पतंजलि के सामान बेचने’ जैसी घटनाओं पर भोजपुरी में तुरंत गाने रैकौर्ड हो कर म्यूजिक बाजार में आ जाते हैं. ‘शादीब्याह’, ‘प्रेमविवाह’, ‘सुहागरात’ जैसे मुद्दों पर लिखे गए भोजपुरी गाने सब से ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं.

अब फिल्मों के बराबर ही भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री बन गई है. पहले जहां गायकों को कैसेट कंपनियों के आगेपीछे चक्कर लगाने पड़ते थे, वहीं अब वे अपने गाने का आडियोवीडियो खुद ही बना कर यूट्यूब पर पोस्ट कर देते हैं.

भोजपुरी गानों में अपना कैरियर बनाने वाले ज्यादातर लड़केलड़कियां गायकी की कोई बड़ी ट्रेनिंग ले कर नहीं आते हैं. गांवों और छोटे शहरों में रहने वाले नौजवानों के लिए भोजपुरी म्यूजिक  ने कैरियर बनाने के नए दरवाजे खोल दिए हैं.

भोजपुरी में गाने वाली लड़कियों की तादाद सब से ज्यादा है. कल्पना और इंदू सोनाली जैसी लड़कियों ने भोजपुरी फिल्मों में गाने गा कर धूम मचाई है.

भोजपुरी गानों से चमकने वाली लड़कियों में खुशबू उत्तम, निशा पांडेय,  अमृता दीक्षित, मोहिनी पांडेय, खुशबू तिवारी, पिंकी सिंह, निशा दुबे, ब्यूटी पांडेय, आर्या नंदिनी, अलका सिंह पहाडि़या, ज्योति गुप्ता और सोना सिंह जैसे तमाम नाम हैं.

इन लड़कियों में सब से अलग बात यह है कि  ये लोकगीत से ले कर हर तरह के गाने गाती हैं. ये लड़कियां बड़े आराम से ‘राजा छोट बा सामान धर के बड़ा करा’ जैसे गाने गाती हैं. ब्यूटी पांडेय का गाया यह गाना खूब सुना जा रहा है.

बात केवल ब्यूटी पांडेय की नहीं है, बल्कि और भी लड़कियां खूब नाम कमा रही हैं. खुशबू उत्तम का छोटू छलिया के साथ गाया गाना ‘धीरेधीरे डालो न अबहि जगइयां छोट बा’ लोगों में खूब पसंद किया जा रहा है.

इसी तरह खुशबू तिवारी का गाना ‘भतरू से पहले दे ले बानी’, पिंकी सिंह का गाना ‘राजा भंड़ुया सुताला

बजत खटिया’ और मोहिनी पांडेय के विवाह गीतों में गाली गीत ‘रहरी की तीन पत्ता तीनों कचनार जी, अगुवा की तीन बहिनियां तीनों पक्की छिनार जी’ खूब बज रहा है.

भोजपुरी फिल्मों में हीरो का रोल निभाने वाले पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, अरविंद अकेला, चिंतामणि सिंह, रितेश पांडेय, नीलकमल सिंह, प्रमोद प्रेमी, गुंजन सिंह, गोलू गोल्ड, समर सिंह, आलम राज, दीपक दिलदार और आनंद राज जैसे गायक आज नौजवान दिलों की धड़कन बन गए हैं.

बदलते गांव की झलक

गायक चिंतामणि सिंह कहते हैं, ‘‘भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री में रोज नया हुनर आ रहा है. ऐसे में यहां पर गायकों के बीच कंपीटिशन बढ़ता जा रहा है. जिन गायकों को फिल्मों में गाने को नहीं मिल रहा है, वे अपने सुर की बदौलत अपना काम कर रहे हैं.

‘‘भोजपुरी गानों में आज की जिंदगी की झलक होती है, जिस के चलते लोग इन को खूब पसंद करते हैं. जो गायक समय के हिसाब से गाने देता है वही हिट होता है.’’

चिंतामणि सिंह का गाना ‘टोपेटोपे चुअता’ पहली बार में ही लोगों की पसंद बन गया है.

आज गांवदेहात और छोटे शहरों में भी कपड़ों की पसंद के लिए औनलाइन शौपिंग का क्रेज बढ़ रहा है.

खेसारी लाल यादव ने अपने गाने ‘यूट्यूब पर देखले बानी वीडियो ब्लाउज रेडीमेड चाही’ में इस बात को समझाने की कोशिश की गई है.

इन गानों में गांव में प्रधान की दबंगई के साथ महिला प्रधान के बनने पर आए बदलाव को दिखाया जाता है. यह भी कि किस तरह से भौजी बन कर घर में रहने वाली औरत अब थानाकचहरी जाती है.

एक समय सारे गानों के केंद्र में सिपाही और दारोगा होते थे पर अब स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर और प्रधान भी गानों के केंद्र में आने लगे हैं.

पहले ये गाने केवल देवरभाभी, जीजासाली के रंगीन किस्सों पर ही बनते थे, पर अब शादी से पहले और शादी के बाद के संबंधों पर भी तैयार होते हैं.

सैक्स को ले कर गांवों में भले ही औरतों को कुछ कहने की आजादी न हो, पर भोजपुरी गानों में सैक्स सुख के लिए परेशान औरत की दास्तान सुनाने की हिम्मत दिखाई जाती है.

स्टूडियो की भरमार

भोजपुरी से ज्यादा खुलापन पंजाबी, गुजराती और हिंदी के गानों में है, पर जितनी बुराई भोजपुरी गानों के खुलेपन की होती है इतनी किसी और की नहीं होती. इस के बावजूद भोजपुरी गानों के आलोचकों से ज्यादा इन को पसंद करने वाले हैं. यही वजह है कि यूट्यूब पर सब से ज्यादा डाउनलोड होने वाले गानों में भोजपुरी गाने हैं.

भोजपुरी फिल्मों के बराबर ही भोजपुरी म्यूजिक का उद्योग खड़ा हो गया है. कुछ समय पहले तक तो गाने रैकौर्ड कराने और उन का वीडियो बनवाने के लिए लोगों को दिल्ली, मुंबई और वाराणसी के चक्कर लगाने पड़ते थे, पर अब ऐसे वीडियो पटना, हाजीपुर, छपरा, गोपालगंज और रांची में ही तैयार हो जाते हैं.

झारखंड और बिहार के शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवकसबों तक में गाने के डाउनलोड करने वाली दुकानें खुल गई हैं. गाने डाउनलोड करने की जितनी दुकानें बिहार और झारखंड में खुली हैं उतनी दुकानें किसी और प्रदेश में नहीं मिलेंगी.

35 से 40 रुपए में एक जीबी वाला मैमोरी कार्ड गानों से डाउनलोड किया जा रहा है. केवल पटना शहर में आडियो और वीडियो अलबम बनाने वाले तकरीबन 50 से ज्यादा स्टूडियो हैं.

हर स्टूडियो में एक महीने में 5 से 6 अलबम तैयार होते हैं. एक अलबम में तकरीबन 8 गाने होते हैं. एक आडियोवीडियो 50,000 से ले कर 80,000 हजार रुपए तक में तैयार हो जाता है.

पटना के अलावा हाजीपुर, छपरा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज और रांची में भी ऐसे वीडियो अलबम बनते हैं. बिहार में ऐसे बढ़ते रोजगार को देखते हुए मुंबई व दिल्ली जाने वाले यहां के रहने वाले लोग वापस अपने शहरों को लौट आए हैं.

बेहूदगी का दाग

जिस तेजी से भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, उसी तेजी से इस के गानों पर बेहूदा होने का दाग भी लग रहा है. मजेदार बात यह भी है कि हर कोई दूसरे पर बेहूदगी फैलाने का जिम्मेदार मान रहा है. पर सचाई यह है कि भोजपुरी गानों पर इस तरह के आरोप पुराने समय से ही लगते आ रहे हैं. इन गानों को सुनने वालों का एक बड़ा तबका है.

भोजपुरी फिल्मों की कामयाबी का फार्मूला भी ऐसे गाने ही होते हैं. हर फिल्म में 7 से 8 गाने होते हैं, इन में 1 से 2 आइटम गीत होते हैं. ठीक इसी तरह से वीडियो अलबम में भी बनते हैं. वैसे तो एक अलबम में हर तरह के गाने होते हैं, पर हिट वही होते हैं जो बेहूदा कहे जाते हैं.

यूट्यूब पर ऐसे भोजपुरी गाने ‘हौट सौंग’ के नाम से जाने जाते हैं. इन के नाम भी इसी तरह से रखे जाते हैं. यही नहीं, केला और बैगन तक का इस्तेमाल कर के शब्दों से बेहूदगी फैलाने का पूरा इंतजाम किया जाता है.

वीडियो अलबम के ‘गुदगुदी होता ए राजाजी’, ‘सील टूट जाई’, ‘खुलल इंटरनैट’, ‘डिस्कवरी देखा ए देवरू’, ‘दरदिया उठे ये ननदी’, ‘बाइलेंस ब्लाउज के’, ‘लहंगा में धइले बांटी सर्दी’, ‘जोवन चूसे देवरा’, ‘हमार लहंगा के अंदर वाईफाई बाटे’ जैसे नाम रखे जाते हैं.

गायिका खुशबू उत्तम कहती हैं, ‘‘गाना लिखने वाले ऐसे गानों के बीचबीच में कुछ शब्द डाल देते हैं. जब गाने वाला एतराज करता है तो वह लिखने वाला कहता है कि इसी शब्द में तो गाने का पूरा रस है.’’

दरअसल, ऐसा म्यूजिक बनाने वाले लोग गानों को जल्दी बाजार तक पहुंचा देते हैं जिन को लोग चटकारे ले कर सुनते हैं. लेखक और गायक को फायदा उसी गाने से होता है जिसे लोग मजे ले कर सुनते हैं. केवल अकेले में ही नहीं बल्कि शादीब्याह, बरात और ऐसे तमाम दूसरे मौकों पर भी ऐसे गाने खूब बजते हैं, जिन पर लोग डांस भी करते हैं.

अब ज्यादातर लोग अपने मोबाइल फोन में लोड कर के ऐसे गानों को सुनते हैं. कई ऐसे शब्द होते हैं जो भोजपुरी में खराब लगते हैं पर असल में उन का मतलब ऐसा नहीं होता है. आम भाषा में पति शब्द का प्रयोग किया जाता है, पर जब गाने में पति को भतार कहा जाता है तो यह बुरा लगता है.

जातिगत रिश्तों का जोर

जाति और धर्म के आधार पर भी गायक खूब गाने लिखते हैं. बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यादव और भूमिहार बिरादरी के लोग ज्यादा हैं. ऐसे में इन जातियों को ले कर गाने ज्यादा बनने लगे हैं.

आलम राज का गाना ‘अहिरन की जौन हाउ’ और ‘यादवजी के बेटा पीछे पड़ गईल’ जैसे अनेक गाने हैं. पहले इन गानों में ऊंची जातियों में ठाकुर और पंडितों का जोर ज्यादा होता था. गानों के किरदार उसी तरह के बनते थे. फिल्मों की ही तरह गानों में भी दबंगई खूब पसंद की जाती है.

दबंगई के लिहाज से मशहूर जिलों के नाम पर गाने भी बनते हैं. आरा, आजमगढ़ और बलिया के नाम पर गाने खूब बनते हैं.

जानकार लोग बताते हैं कि पहले गायकों में ऊंची जाति के ही लोग आते थे, पर अब पिछड़ी और दलित जातियों के लोग भी गायकी में किसी से पीछे नहीं रहते हैं, जिस से वे अपने समाज पर ज्यादा लिखते हैं.

डांसर का बढ़ा रोल

गानों में आडियो से ज्यादा वीडियो का जोर रहता है. ऐसे में डांसर का रोल अहम हो जाता है. कई गाने आडियो में उतने पसंद नहीं किए जाते जितना वीडियो में पसंद किए जाते हैं. हर गायक को लगता है कि वह एक बार हिट हो जाए तो भोजपुरी गानों के सहारे उस को काम मिलने लगेगा.

वीडियो बनने के बाद ऐसे गाने स्टेज शो पर भी पसंद किए जाते हैं. ऐसे शो 50,000 से 5 लाख रुपए तक में होते हैं.

गानों से केवल गायक ही नहीं वीडियो डांस में भी कैरियर बन गया है. चांदनी सिंह, डिंपल सिंह, प्रिया शर्मा और प्रियंका ऐसे नाम हैं जो डांस के चलते ही रातोंरात चर्चा में आ गए.

निशा पांडेय का नाम तेजी से स्टेज डांसर के रूप में उभरा है. वे भोजपुरी की सपना चौधरी कही जाती हैं. पहले के मुकाबले गायकगायिका बदल गए हैं. पहले के गायक गांव तक सिमटे रहते थे, पर अब वे अपने गानों के ट्रैक रैकौर्ड कर के खुद ही रिलीज कर रहे हैं, जिस से उन को ज्यादा से ज्यादा लोग जानने लगे हैं.

वीडियो : बिग बौस के घर में फोन का इस्तेमाल करते दिखे श्रीसंत ?

बिग बौस-12 को औनएयर हुए सिर्फ 3 दिन ही हुए हैं और शो लगातार सुर्खियों में बना हुआ है. श्रीसंत के घर से बाहर जाने के हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद अब उन्हें लेकर एक नया विवाद सामने आया है. सोशल मीडिया पर श्रीसंत का बिग बौस हाउस में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने का दावा किया जा रहा है.

दूसरे एपिसोड के शुरुआती सीन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है. इसमें श्रीसंत लाउंज एरिया में अपने बेड पर बैठे हुए हैं. घर की लाइट्स औफ हैं. वे कंबल के नीचे हाथों से कुछ प्रेस करते हुए दिख रहे हैं. कुछ लोगों का दावा है कि उनके हाथों में फोन है, जिसका वे अंधेरे में इस्तेमाल कर रहे हैं.

 

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वैसे इन दावों में सच्चाई नजर नहीं आती है. बिग बौस के घर में मोबाइल फोन मना है. ऐसे में क्रिकेटर के पास फोन कहां से आ सकता है? वे कैसे घरवालों से छुपाकर इसे रख रहे हैं? ये बड़ा सवाल है. औनएयर का एक-एक सीन एडिट के बाद टीवी पर दिखाया जाता है. अगर बिग बौस ने चुपके से श्रीसंत को फोन का इस्तेमाल करने की सुविधा दी होती, तो इस सीन को टीवी पर यकीनन ही औनएयर नहीं किया जाता. कुछ लोगों का कहना है कि श्रीसंत कंबल के नीचे मोबाइल नहीं बल्कि अपने पैरों के तलवे को प्रेस कर रहे हैं.

भिक्षा अब अपराध नहीं, यह तो हमारी संस्कृति है न..!

दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि भीख मांगने वालों को दंडित करने का प्रावधान असंवैधानिक है और यह रद्द करने लायक है. अदालत ने इस कानून की कुल 25 धाराओं को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया. कानून का दायरा दिल्ली तक बढ़ाया गया है.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और जस्टिस सी हरिशंकर की पीठ ने कहा कि भीख मांगने को अपराध बनाने वाले ‘बौंबे भीख रोकथाम अधिनियम’ के प्रावधान संवैधानिक जांच में टिक नहीं सकते. लोग सड़कों पर इसलिए भीख नहीं मांगते कि ऐसा करना उन की इच्छा है, बल्कि इसलिए मांगते हैं क्योंकि यह उन की जरूरत है. भीख मांगना जीने के लिए उन का अंतिम उपाय है. उन के पास जीविका चलाने के लिए कोई अन्य साधन नहीं है.

यह ठीक भी है. सरकार के पास जनादेश सभी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए होता है जिस से सभी नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मिलना सुनिश्चित हो सके. लेकिन भीख मांगने वालों की मौजूदगी इस बात का सुबूत है कि सरकार सभी नागरिकों को जरूरी चीजें उपलब्ध कराने में कामयाब नहीं रही.

भीख मांगने को अपराध बनाना पुलिस  को भिखारी माफिया बनाने का निमंत्रण देता रहा है. भिखारियों को भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें मिलती ही नहीं और ऊपर से उन्हें अपराधी बताना दुर्दशा से निबटने के मौलिक अधिकार से रोकता है.

इस फैसले का असर यह होगा कि भीख मांगने को अपराध कह कर मुकदमे नहीं हो सकेंगे. अदालत ने भीख मांगने को मजबूर करने वाले गिरोहों को काबू करने के लिए सरकार को वैकल्पिक कानून बनाने की स्वतंत्रता दी है, पर यह टेढ़ी खीर है. हाईर्कोर्ट ने यह फैसला हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी की जनहित याचिकाओं पर सुनाया.

अदालत ने सरकार से पूछा था कि  ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है जहां सरकार भरपेट भोजन और नौकरियां प्रदान करने में असमर्थ है.

‘बौंबे भीख रोकथाम अधिनियम’ के तहत भिखारियों को जेल में डाला जाता है. यह कानून पुलिस और प्रशासन को तुरंत और बिना वारंट के गिरफ्तारी का अधिकार देता है. इस कानून के तहत अगर कोईर् पहली बार भीख मांगते हुए पकड़ा जाता है तो उसे 3 साल तक सजा हो सकती है. इस के अलावा इस कानून के अंतर्गत 10 साल तक हिरासत में रखने का भी प्रावधान है.

भिक्षावृत्ति धर्म की देन

वैसे हमारे यहां भिक्षावृत्ति धर्म और जातिप्रथा की देन है. धर्म की किताबों में भीख मांगना सर्वोत्तम कार्य माना गया है, लेकिन यह काम केवल ब्राह्मणों व साधुओं के हिस्से ही था. दूसरे लोगों के जिम्मे इन को भीख देना होता था. भीख लेने वाले चूंकि ऊंची जातियों के थे तो उस में पुण्य मिलने की गारंटी है. सदियों से भीख मांगना अपराध नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का एक सम्मानजनक पहलू समझा गया. ‘भिक्षाम् देहि’ हिंदू समाज में एक ईश्वरीय आदेशात्मक मंत्र बन गया.

हिंदू समाज में भिक्षावृत्ति को मिली धार्मिक मान्यता के चलते सालों से भिखारियों की संख्या बढ़ती गई. भिक्षा ग्रहण करने का पात्र केवल ऊंची जाति का होता था लेकिन हमारी चातुर्वर्ण्य धार्मिक व्यवस्था में काम के बंटवारे के चलते जो निचला शूद्रवर्ग था वह छुआछूत का शिकार रहा. वह ऊपर के 3 वर्णों की सेवा के धार्मिक आदेश के अलावा और कोई काम नहीं कर सकता था. सेवा के बदले उसे ऊंचे वर्णों की जूठन खा कर, उतरे हुए कपड़े पहन कर ही अपना जीवनयापन करना होता था. उसे अन्य कोई काम करने का अधिकार नहीं था.

अब हुआ यह कि धर्म की इस व्यवस्था के कारण जो निचला अछूत वर्ग था, वह अपना पेट भरने के लिए अन्य कोई काम नहीं कर सकता था तो जिंदा रहने के लिए उस के पास भीख मांगने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. आज मंदिरों के बाहर, चौराहों पर भिखारियों की जो भीड़ लगी रहती है, ये वे लोग हैं जिन्हें अछूत मान कर दूसरे कामों से वंचित रखा गया. इन्हें अपनी इस दशा के लिए पूर्वजन्म के कर्मों का फल बता कर दूर रखा गया. यह वर्ग मेहनतकश था, पर छुआछूत के कारण इस को छूने से परहेज किया गया.

सरकारें और समाज इन के लिए भोजन और नौकरियों के पर्याप्त इंतजाम करने में नाकाम रही हैं, इसलिए जीवनयापन के लिए विवशतावश इन लोगों को भिक्षावृत्ति का सहारा लेना पड़ रहा है. मंदिरों की अपार आय में से इन्हें कुछ नहीं मिलता. बचा हुआ प्रसाद भी नहीं.

अदालत ने हालांकि अपने फैसले में धर्म का कहीं कोई जिक्र नहीं किया है पर फैसले से साफ है कि सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों के चलते कोई भिखारी बनता है. यह ठीक है कि अदालत ने

भीख मांगने की परिस्थितियों पर मानवीय दृष्टिकोण से विचार किया है और इसे देखते हुए संवैधानिक आधार पर फैसला सुनाया है.

भीख मांगने वाले धर्म के सताए हुए हैं, लेकिन धर्म को चलाने वाले संगमरमर के भव्य मंदिरों, मठों, एसी गाडि़यों में घूमने वाले पंडे, पुरोहित, साधु, संन्यासी भी भीख मांगने का ही काम कर रहे हैं. उत्पादकता से उन का कौन सा रिश्ता है? एक जिंदा रहने के लिए भीख मांगता है, दूसरा ऐशोआराम के लिए दानदक्षिणा मांगता है. उत्पादकता की सीख अदालत नहीं देगी, और न सरकारें सब को भोजन व नौकरियां देंगी. सो, भीख का धंधा बदस्तूर चलता ही रहेगा.

कास्टिंग काउच का सियाह सच, आखिर कैसे लगेगी रोक

कास्टिंग काउच आज की दुनिया का एक सियाह सच है. फिर चाहे वह फिल्मी दुनिया, टीवी इंडस्ट्री या मौडलिंग क्षेत्र हो या फिर नौकरी या शिक्षा का क्षेत्र, कास्टिंग काउच होता है, यह सभी जानते हैं. लेकिन कोई इस के बारे में बात नहीं करना चाहता. बहुत कम लोग ऐसे हैं जो इस मामले को सब के सामने उजागर करने की हिम्मत जुटाते हैं. यही नहीं, आजकल हर तरफ एक जाल बिछा है जिस का युवक हों या युवती, दोनों को ही कभी न कभी किसी रूप में सामना करना पड़ता है. हो सकता है युवकों को इस का कम सामना करना पड़े. युवती से तो पहली शर्त होती है कि अकेले में आ कर मिलो. मेरी एक सहेली, सीमा (परिवर्तित नाम) लेखिका है. उस के अनुसार लेखन की दुनिया भी इस से अछूती नहीं. सीमा ने जो भी बताया, बहुत चौंकाने वाला था.

सीमा और उसी के शहर के एक दैनिक अखबार के संपादक के बीच की वार्त्ता से आप रूबरू हों : संपादक : सुप्रभात.

सीमा : नमस्ते सर.

संपादक : आप की मेल मिली.

सीमा : धन्यवाद.

संपादक : क्या करती हो?

सीमा : लेखिका हूं.

संपादक : लेखन से गुजारा हो जाता है और क्या करती हो?

सीमा : नहीं, हाउसवाइफ हूं.

संपादक : अपनी रचना और 2 फोटो भेजो, यहीं इनबौक्स में.

सीमा : मेल से नहीं?

संपादक : तुम्हारी खुली नहीं. मैं ने तो बहुत कोशिश की. इसीलिए इनबौक्स में ही आओ. वैसे तुम बहुत अच्छी हो. संपर्क बनाए रखो. बताओ, अच्छी हो या नहीं?

सीमा : पता नहीं. सीमा को यह वार्त्तालाप अजीब लगा. उस ने कुछ दिनों तक कोई कविता नहीं भेजी. फिर एक दिन उन्हीं संपादक महोदय का मैसेज आया.

संपादक : मन सागर तन गागर, मिले कैसे प्रेम बागर.

हम ने कहा था फोन करना, क्यों नहीं किया? समय निकाल कर फोन करो. अकेलापन रहने नहीं देता. पर सीमा ने फोन नहीं किया. फिर एक मैसेज आया.

संपादक : जीवन बेनूर हो गया है, हर सपना चूर हो गया है,

उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद खाक, ईमानदार पत्रकारिता का जो गरूर हो गया है.

सीमा ने गुस्से में कौल किया तो उस की आवाज सुनते ही महाशय बोले,’’ अरे जान, तुम कहां थीं? तुम्हारी आवाज सुनते ही तनमन झूम गया. सीमा ने कहा,’’ आप की हिम्मत कैसे हुई इस तरह बात करने की?

‘‘क्या हुआ तुम्हें प्रिये? कविता नहीं छपवानी क्या?’’ ‘‘नहीं,’’ सीमा ने साफ मना कर दिया. लालच दिया संपादक ने.

संपादक ने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा, ‘‘पैसा नहीं कमाना चाहती क्या?’’ ‘‘इस तरह से बिलकुल नहीं, आप ने शायद मुझे गलत समझा,’’ सीमा ने हिम्मत दिखाई.

अब संपादक गिड़गिड़ाया, ‘‘अरे नहीं, मैं ने गलत नहीं समझा. मैं तो बस इतना कह रहा हूं. एक दिन अकेले में आ कर मिलो. एक कप साथ में बैठ कर कौफी पी लें. थोड़ी सी बातें कर लें. एकदूसरे को जान लें.’’ सीमा ने उस संपादक के नंबर को ब्लौक कर दिया. पर मन में डर बना रहा कि कहींकोई अनहोनी न हो, क्योंकि मेल में उस ने घर का पता भी भेजा था.

यही नहीं, इस के अलावा भी कुछ लोगों ने सीमा को लालच दिया कि मंथली बेसिस पर लेख लेंगे लेकिन शर्त वही, ‘एक मुलाकात अकेले में.’ अकेले का मतलब क्या है, आप समझ ही गए होंगे. शुरूशुरू में उसे बहुत बुरा लगा क्योंकि वह पत्रकारिता की दुनिया को साफसुथरा समझती थी. सीमा के अनुसार, धीरेधीरे औफर्स इतने कौमन होते जाते हैं कि फिर इन से फर्क पड़ना बंद हो जाता है.

महिला का शोषण हर जगह और हर रूप में हो रहा है. कहीं दहेज तो कहीं शादी और कहीं नौकरी के नाम पर उस का यौनशोषण किया जाता है. कहीं गरीबी तो कहीं स्टेटस के नाम पर वह बिकने को मजबूर है. ***

झारखंड में तो औरत की इज्जत बिकना जैसे उस की नियति बनती जा रही है. कुछ ही दिनों पहले एक ऐसा मामला सामने आया है जिस में छात्रा दिल्ली के दौलतराम कालेज में पढ़ती है. कालेज के राजनीति शास्त्र के प्रोफैसर कक्षा के दौरान छात्रा के संपर्क में आए और फिर नजदीक आने का बहाना ढूंढ़ने लगे. 17 वर्षीया छात्रा का आरोप है कि प्रोफैसर शुरू से ही उस पर गलत निगाह रखते थे और नजदीक जाने पर किसी न किसी बहाने से उसे गलत तरीके से छूते थे. लिहाजा, वह प्रोफैसर से दूरियां बनाने लगी.

एक दिन प्रोफैसर ने छात्रा को कैंटीन के पास रोक लिया और गंदे शब्दों से संबोधित कर उस से छेड़छाड़ की. छात्रा के मुताबिक, प्रोफैसर उसे अकेले मिलने को बुलाते थे और अश्लील व्हाट्सऐप मैसेज भेजते थे. छात्रा का कहना है कि जब उस ने छेड़छाड़ की शिकायत करने को कहा तो प्रोफैसर ने उस को फेल करने की धमकी दी. इन बातों से छात्रा मानसिकतौर से काफी परेशान रहने लगी. बाद में दोस्तों की सलाह पर छात्रा ने प्रोफैसर के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज करा दी. ***

महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक के खेल निदेशक देवेंद्र ढुल के खिलाफ यूजीसी-नैट क्लीयर करवाने का झांसा दे कर यौन शोषण करने के आरोप में केस दर्ज कराया गया था. ढुल पर आरोप लगाने वाली छात्रा ने अपनी शिकायत में लिखा था कि अधिकारी ने उसे नैट परीक्षा में पास कराने व पीएचडी की डिगरी दे कर लैक्चरर की नौकरी दिलवाने के एवज में औफिस के बजाय कहीं बाहर अकेले मिलने को कहा था. ***

उत्तर प्रदेश, ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी की एक छात्रा ने अपने प्रोफैसर पर यौनउत्पीड़न का आरोप लगाया था. छात्रा के अनुसार, उपस्थिति कम होने की वजह से उसे एग्जाम में बैठने से रोक दिया गया. इस के बाद उस ने ब्रांच के प्रोफैसर से मुलाकात कर एग्जाम में बैठाने की अपील की. प्रोफैसर ने उसे ज्यादा नंबर दिलाने और प्रतिदिन अधिक क्लासेस पढ़ने के लिए कहा. प्रोफैसर ने 3 दिनों तक तो उसे यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाया. इस के बाद उस से घर पर आ कर पढ़ने के लिए कहा. घर पर बुलाने के बाद प्रोफैसर उस छात्रा का रोज यौनउत्पीड़न करता रहा. ***

साहित्य विभाग के एक युवा असिस्टैंट प्रोफैसर ने एक छात्रा को पढ़ाने के बहाने अपने घर बुला कर उस के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए और चुप रहने की धमकी भी दी. यही नहीं, इस प्रोफैसर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर उस लड़की को एमए कोर्स में फेल भी करा दिया. ***

दरअसल, आप किसी भी पद पर हों, उस से फर्क नहीं पड़ता, पर आप एक महिला हैं तो सिर्फ इस कारण आप को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे कई पुरुष मिल जाएंगे जो मिलने पर हायहैलो करना नहीं भूलते. पर पीठपीछे उन की निगाहें लड़की होने का अर्थ समझा देती हैं. यह सच है कि हमारे देश में महिलाएं प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं, फिर भी वे शोषण का शिकार हैं. यह एक कड़वी सचाई है. बजाय इस के कि हम उन की मानसिक पीड़ा को कम करें, हम महिला शोषण पर लिख कर उन के प्रति सिर्फ सहानुभूति दर्शाति हैं और इतने ही कर के अपने कर्तव्यों का पूरा होना मान लेते हैं.

समाज में महिलाओं की स्थिति अत्याचार सिर्फ वही नहीं होता जो कानून की दफाओं में दर्ज हो. हमारे देश में महिलाओं की हालत सिर्फ नारों के आसपास ही घूमती रहती है. सशक्तीकरण, आजादी, इज्जत और बराबरी का हक सिर्फ किताबों में धूल फांक रहा है. इन का जमीनी हकीकत से कोई लेनादेना नहीं है.

आज की महिला को जो विशेष सम्मान या दर्जा मिला है, वह सिर्फ कैलेंडर और तसवीरों की शोभा बढ़ाता है. जमीनी हकीकत में तो वह अब भी सिर्फ मांस का लोथड़ा भर है, जो पुरुषों के नोचनेखसोटने भर के लिए है. उस की अपनी कोई इच्छा नहीं है, अपना कोई वजूद नहीं है. वह तब तक आजाद है जब तक पुरुष चाहे. वह तब तक खुश रह सकती है जब तक कि पुरुष उस में बाधा न डाले. समाज और समुदायों में इसी ‘मर्दानगी’ को मजबूत किया जाता है. इसी से महिलाओं को पुरुषत्व का बोध कराया जाता है और इस चल रही रीति को आगे बढ़ाया जाता है. लिहाजा, मर्द महिला का बलात्कार कर अपनी कुंठा को निकालता है. दोनों तरफ से सहमति

लखनऊ स्थित एजुकेशनल टीवी सैंटर एसआईई के हेमंत का इस बारे में कहना है, ‘‘यौन उत्पीड़न की घटनाएं हर क्षेत्र में होती हैं.’’ आज से 8-10 साल पहले का वाकेआ बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘उस समय दूरदर्शन पर औडिशन हुआ तो एनाउंसर की पोस्ट के लिए एक युवती का सिलैक्शन हुआ. डायरैक्टर साहब आशिकमिजाज थे, वे उस युवती के पीछे पड़ गए. उसे जबतब गंदे मैसेज कर देते थे. एक दिन तो हद ही हो गई जब वे शराब पी कर सीधे उस के घर पहुंच गए. युवती के परिवार वालों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. तब वे अपनी इस आदत से बाज आए. उस युवती की गलती यह थी कि आगाह करने के बाद भी उस ने उसे अपने घर का नंबर दे दिया.’’ हेमंत का यह भी कहना है, ‘‘कास्टिंग काउच में सिर्फ एक पक्ष की गलती होती है, ऐसा नहीं है. यह दोनों पक्षों से जुड़ा मामला है. यह दोनों तरफ से सहमति के बाद ही संभव होता है. कास्टिंग काउच तभी संभव है, जब दूसरा इंसान भी तैयार होता है.’’

सवाल उठता है कि क्या कास्टिंग काउच आज के समय में बिलकुल नौर्मल बात है? क्या टैलेंट की कोई कद्र नहीं? क्या आगे बढ़ने के लिए घिनौनी शर्तों को मानना पड़ता है? बहरहाल, ऐसी भी बहुत युवतियां हैं जो कास्टिंग काउच के सामने घुटने टेकने के बजाय उस की असलियत सब के सामने लाने में यकीन रखती हैं जबकि कुछ कामयाबी के लिए इसे एक आसान राह मान कर समझौता कर लेती हैं.

चमक खोता इंजीनियरिंग का कैरियर, क्या हैं इस के कारण

लाखों रुपए खर्च कर के बनने वाले देश के 95 प्रतिशत इंजीनियर और सौफ्टवेयर डैवलपमैंट से जुड़ी नौकरियों के काबिल ही नहीं हैं. यह आकलन है रोजगार से जुड़ी कंपनी एस्पायरिंग माइंड्स का. इस के एक अध्ययन में सामने आया है कि लगभग 4.77 प्रतिशत उम्मीदवार ही प्रोग्राम के लिए सही लौजिक लिख पाते हैं जोकि प्रोग्रामिंग की नौकरी के लिए न्यूनतम आवश्यकता है. छात्रों की इस भयानक खामी का तब पता चला जब आईटी संबंधित कालेजों की 500 ब्रांचों के 36 हजार से ज्यादा छात्रों ने औटोमेटा नाम के एक टैस्ट में हिस्सा लिया. इन में से दोतिहाई छात्र सहीसही कोड भी नहीं डाल सके. इस स्टडी में सामने आया कि जहां 60 प्रतिशत उम्मीदवार सही से कोड नहीं डाल पाए वहीं सिर्फ 1.4 प्रतिशत छात्र ही ऐसे निकले जिन्होंने सही कोड डालने में सफलता प्राप्त की.

क्या हमारे इंजीनियरिंग के छात्रों की यही खामी उन के बड़ेबड़े सपनों के लिए सब से बड़ी बाधा बन गई है? जी, हां, पूरी दुनिया में भारतीय इंजीनियरों की बौद्धिक क्षमताओं और तकनीकी कुशलता को ले कर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. 6 साल पहले तब के मानव संसाधन विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि हमारे आईआईटी से निकलने वाले तमाम छात्रों में से महज 15 फीसदी छात्र ही रोजगार के काबिल हैं. उन के इस हंगामा खड़ा करने वाले बयान के कुछ ही दिनों बाद सौफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस के तत्कालीन अध्यक्ष एन नारायण मूर्ति ने भी यही कहा था.

यह बात सिर्फ एक शोध या अध्ययन की नहीं है, बल्कि इस सचाई को पहले से ही हमारे देश के तमाम रोजगारप्रदाता जानते हैं. इसीलिए जब आईआईटीज में कैंपस रिक्रूटमैंट होता है तो सभी छात्रों को नौकरियां नहीं मिलतीं और करोड़ों के पैकेज बस, खूबसूरत कल्पना बन कर रह जाते हैं, तो कोई हंगामा खड़ा नहीं होता. स्किल्स की कमी

वास्तव में हमारे इंजीनियरों की कुशलता में कमी ही उन के लिए रोजगार का संकट और आकर्षक वेतन का अकाल पैदा कर रही है. लेकिन इसे स्वीकारने की जगह मायूस छात्र इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ रहे हैं. यह अकारण नहीं है कि पिछले 5 सालों में 200 से ज्यादा इंजीनियरिंग कालेजों में छात्र न मिलने के कारण उन में ताले पड़ गए हैं. हर गुजरते साल के साथ इंजीनियरिंग के क्षेत्र में देश के प्रीमियम संस्थान आईआईटीज के प्लेसमैंट में भी 5 फीसदी से ज्यादा की सालाना गिरावट आ रही है. नतीजा यह है कि प्रोफैशनल पढ़ाई के संबंध में इंजीनियरिंग अब छात्रों की पहली पसंद नहीं रही. ज्यादातर छात्रों का इंजीनियरिंग की डिगरी से मोहभंग होता जा रहा है. तकनीकी शिक्षा में लगातार गिरावट और नौकरी की मांग में कमी को देखते हुए इस साल भी 20 हजार से ज्यादा इंजीनियरिंग की सीटें या तो खाली रह गईं या खाली हो गई हैं.

दुनिया की 100 सर्वश्रेष्ठ आईआईटीज में शुमार भारत की आईआईटीज में साल 2014-15 में 12,553 छात्रों ने प्लेसमैंट में भाग लिया, जिन में महज 9,141 छात्र ही चुने गए यानी प्लेसमैंट प्रतिशत 72.82 फीसदी रहा. वहीं, वर्ष 2015-16 में 75.79 फीसदी छात्र चुने गए. जबकि 2016-17 में 12,525 छात्रों में से 8,874 छात्रों को ही नौकरी मिली. इंजीनियरिंग की पढ़ाई का स्तर तो लगातार गिर ही रहा है, एक बड़ी समस्या देश के फर्जी इंजीनियरिंग कालेज भी हैं, जिन से हासिल डिगरीडिप्लोमा वाले छात्रों को नौकरी मिलने में काफी परेशानी होती है.

फर्जी कालेज भी जिम्मेदार मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल में जारी रिपोर्ट में बताया है कि देश में ऐसे 277 इंजीनियरिंग कालेज हैं जिन्हें अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) से मान्यता प्राप्त नहीं है. केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने संसद में जानकारी देते हुए बताया था कि पिछले 3 सालों में ऐसे फर्जी इंजीनियरिंग कालेज होने की जानकारी सरकार को मिली थी. हैरानी की बात यह है कि ऐसे फर्जी इंजीनियरिंग कालेज सब से ज्यादा राजधानी दिल्ली में हैं, जहां पढ़ाईलिखाई का माहौल है और देश के दूसरे शहरों से कहीं ज्यादा सुविधाएं मौजूद हैं.

एआईसीटीई ने देश के जिन 15 राज्यों के लिए इस सूची को जारी किया है. उन में दिल्ली पहले स्थान पर है. राजधानी में 66 कालेज ऐसे हैं, जहां पर बिना किसी मान्यता के ही छात्रों को डिगरीडिप्लोमा दिया जाता है. दूसरे नंबर पर तेलंगाना है, जहां ऐसे कालेजों की संख्या 35 है. पश्चिम बंगाल 27 के साथ तीसरे स्थान पर है. पिछले दिनों एआईसीटीई अध्यक्ष अनिल सहस्रबुद्धे ने यह जानकारी देते हुए कहा कि इन कालेजों द्वारा कराए जा रहे सभी कोर्स, डिप्लोमा और डिगरी मान्य नहीं हैं. सवाल उठता है कि जब फर्जी संस्थानों पर नजर रखने के लिए सरकार के कई संगठन और संस्थाएं हैं तो फिर सब की आंख में धूल झोंकते हुए आखिर ये फर्जी संस्थान कैसे फलफूल रहे हैं? यह बात तो एक आम आदमी भी समझता है कि नकली संस्थानों की गिरफ्त में आ कर उन के जिंदगी के तमाम सपने बेमानी हो जाते हैं. इस तरह के डिप्लोमा या तथाकथित डिगरी कोर्सों के आधार पर सरकारी तो दूर, प्राइवेट सैक्टर में भी कहां नौकरी नहीं मिल पाती है. यहां तक कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में भी शामिल होने की इजाजत नहीं मिलती.

ऐसे में या तो छोटीमोटी नौकरी करने को मजबूर होना पड़ता है या दोबारा किसी मान्यताप्राप्त संस्थान में दाखिले के लिए जद्दोजेहद करनी पड़ती है. किसी भी फर्जी संस्थान में दाखिला लेने से छात्र के कैरियर से तो खिलवाड़ होता ही है, साथ ही पेरैंट्स को भी भारी आर्थिक नुकसान होता है. मान्य संस्थान में अमान्य कोर्स

सवाल है कि फर्जी संस्थान का मतलब क्या होता है? फर्जी संस्थान से मतलब उन शिक्षण संस्थानों से है जो किसी भी सरकारी नियामक संस्थान या प्राधिकरण से मान्यताप्राप्त नहीं हैं. ऐसे संस्थान बिना किसी इजाजत के ऐसे कोर्स कराते हैं जिन्हें कराने का न तो उन्हें अधिकार है, न ही उन के पास इस के लिए कोई संसाधन होते हैं. हैरानी की बात तो यह है कि इतना गंभीर अपराध करने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारें ऐसे संस्थानों की महज सूची जारी करती हैं, जबकि होना यह चाहिए था कि उस के प्रबंधन पर इतना भारीभरकम जुर्माना लगाया जाता जिस से दूसरा कोई फर्जी संस्थान इस तरह की हिमाकत न कर पाता. यदि भारीभरकम जुर्माना वसूल करना संभव न भी हो तो भी ऐसे संस्थानों की इमारत सहित उस की तमाम परिसंपत्तियों को जब्त कर लिया जाना चाहिए.

वास्तव में प्रोफैशनल कोर्सों की बात करें तो देश के विभिन्न हिस्सों में केंद्र व राज्य स्तर पर बहुत सी सरकारी संस्थाएं हैं जो सरकारी और प्राइवेट शिक्षण संस्थानों को संबंधित कोर्स कराने की इजाजत देती हैं. इन में खासतौर पर औल इंडिया काउंसिल फौर टैक्निकल एजुकेशन एसोसिएशन औफ इंडियन यूनिवर्सिटीज, फार्मेसी काउंसिल औफ इंडिया, नर्सिंग काउंसिल आदि हैं.

ग्रीन सिगनल

खामोश थीं निगाहें उन की मैं समझ न सका.

ये प्यार है या फरेब निगाहों से तीर मारे थे हजारों

दिल में इस तरह चुभ कर रह गए सभी के सभी

निकाल न सका कोई उन को. प्यार की घंटी बज चुकी थी

जब हम चौराहे पर मिले थे ग्रीन सिगनल मिलते ही

साथसाथ चल पड़े थे समाज ने रैड सिगनल दे कर

दो दिलों की धड़कनों को रोक दिया था.

मुद्दतों के बाद ऐसे मिले जैसे हम अनजान थे.

उस के दिल में राज किया था मैं ने क्यों न मैं दो कदम

आगे बढ़ कर उस को रोकूं क्यों न मैं बहते हुए

आंसुओं को पोछूं. जोरजबरदस्ती का अंजाम देखा

हम ने चुपके से समाज से दूर हो कर एक आशियाना बनाया

जहां सुकून मिल सके. लेकिन वह भी ज्यादा दिन

ठहर न सका आंधीतूफान में सब खाक हो गया

उन सुर्खियों की ढेर में फिर भी भावनाएं ढूंढ़ती रहती हैं

उस ग्रीन सिगनल को.

– अरुण कटकवार

सिंगल पेरेंट का आखिर गुनाह क्या है

देश में ही नहीं लगभग दुनिया भर में सिंगल पेरेंट को अलग निगाहों से देखा जाता है. आमतौर पर लोग सिंगल पेरेंट को अकेले रहने का गुनहगार मारते हैं और यह भी कह डालते हैं कि उस की गलती से बच्चों को मातापिता दोनों का प्यार व सुरक्षा नहीं मिल रही. सिंगल पेरेंट को यदाकदा ही दोहरा ही नहीं तीहरा बोझ उठाने के लिए शाबाशी दी जाती है. तीहरे बोझ का अर्थ है काम कर घर भी चलाना.

अभी हाल में चेन्ने हाई कोर्ट के एक जज ने टिप्पणी की कि सिंगल पेरेंट की प्रवृत्ति गलत है. यानी न्यायिक सोच है कि किसी भी सहूलियत के लिए कोर्ट के दरवाजे खटखटाने वाले सिंगल पेरेंट को सहानुभूति तो मिलेगी पर उसे दोषी भी ठहराया जाएगा. दुनिया भर में 230 करोड़ बच्चों में से 32 करोड़ बच्चे आज सिंगल पेरेंटों के साथ पल रहे हैं. बच्चों का मतलब है 17 साल तक के बच्चे.

इतने सारे बच्चों का बोझ उठाने के बावजूद हर जगह सिंगल पेरेंट शक और लालफीताशाही के शिकार रहते हैं. सिंगल पेरेंटों को शादी करने के लायक साथी मुश्किल से ही मिलते हैं, उन्हें दोस्त भी नहीं मिलते. शादीशुदा दोस्त सोचते हैं कि उन पर कभी कभार बच्चों का बोझ न डाल दिया जाए और अविवाहित बच्चों की चिलपों से घबराते हैं. उन्हें अकेलेपन का दर्द भी सहना पड़ता है.

अफसोस यह है कि कानून भी सिंगल पेरेंटों को महत्व नहीं देता. चूंकि ज्यादातर मामलों में बच्चों का बोझ सिंगल मां को उठाना पड़ता है. पुरुष कानून व नियम बनाने में ढीले रहते हैं. हर दफ्तर में सिंगल औरत को ला…. नजरों से देखा जाता है. हर कोई लालफीताशाही के नाम पर उन्हें लूटने की कोशिश करता है.

छोटे बच्चों को पालने वाली अकेली मांएं और पिता दोनों सिस्टम के बहुत ज्यादा लाचार हैं. उन्हें न आसानी से मकान किराए पर मिलते हैं न दोस्त. परिवार भी साथ नहीं देता और समाज व सरकार भी नहीं. अगर यह अकेलापन तलाक या बिना विवाह मां बनने के कारण हुआ हो तो लोग अपराधी ही समझते हैं और पूरी तरह कन्नी काट लेते हैं. पुनर्विवाह यदाकदा ही होता है और बस फिल्मों में दिखता है.

बच्चों से लाड़ प्यार में बुराई नहीं, पर उन की जिद जान न ले ले

कई बार पेरैंट्स अपने बच्चों की नाजायज बात भी मान लेते हैं. पेरैंट्स को लगता है कि बच्चों की खुशी के लिए उन की बात को मान लेना चाहिए. कई मामलों में देखा गया है कि बच्चों की नाजायज मांग मान लेना दुख का कारण भी बन जाता है. बच्चे अपनी जिद में अनजाने में अपनी ही जान के दुश्मन बन जाते हैं जिस से पूरा परिवार अवसाद में डूब जाता है.

प्रणव का 16वां बर्थडे था. घर में हंसीखुशी का माहौल था. प्रणव अपने मातापिता का इकलौता बेटा था. इसलिए घर में लाड़प्यार खूब मिलता था. प्रणव के पिता का काफी बड़ा कारोबार था. बच्चे की खुशी के लिए वे हरदम तैयार रहते थे.

प्रणव की मां गृहिणी थी. अपने बेटे को देख कर वह हमेशा खुश होती थी. वह गर्व से कहती भी थी, ‘मेरा बेटा बहुत स्मार्ट और होनहार है. अपनी उम्र के दूसरे लड़कों के मुकाबले ऐसे काम करता है जो उस से 5 साल बड़ी उम्र के लड़के करते हैं’.

प्रणव के पापा ने उस से पूछा, ‘‘बर्थडे पर तुम को क्या गिफ्ट चाहिए?’’ प्रणव ने हाईस्पीड बाइक की मांग रख दी. प्रणव के पिता ने उसे एक लाख रुपए की कीमत वाली बाइक गिफ्ट दे दी. प्रणव के 2 दोस्तों के पास भी वैसी बाइक थीं. वह उन से बाइक चलाना सीख चुका था.

प्रणव के पास ड्राइविंग लाइसैंस नहीं था. उस ने ड्राइविंग लाइसैंस बनवाने का पता किया. परिवहन औफिस से पता चला कि 18 साल से नीचे के बच्चों का ड्राइविंग लाइसैंस नहीं बनता है. इस पर उस के कारोबारी पिता ने नंबर दो का रास्ता निकाला और रिश्वत के बल पर ड्राइविंग लाइसैंस बनवा दिया.

प्रणव का एक साथी अरनव ही ऐसा था जिस के पास बाइक नहीं थी. अरनव का बर्थडे आने वाला था. उस ने भी अपने पापामम्मी से बाइक दिलाने की बात कही. अरनव के पेरैंट्स ने उसे समझाया कि अभी तुम्हारी उम्र बाइक चलाने वाली नहीं है. जब बड़े हो जाओगे तो बाइक दिला देंगे. यह बात अरनव को अच्छी नहीं लगी.

दूसरे दोस्तों को देख कर अरनव को लगता कि वे लोग बहुत स्मार्ट हैं, केवल वह ही सब से पीछे रह गया है. अरनव अपनी मां को बैस्ट फ्रैंड मानता था. उस ने मां से कहा, ‘‘आप लोग मुझे बाइक क्यों नहीं दिला देते? स्कूल में सभी मेरा मजाक उड़ाते हैं.’’ उस की मां ने समझाया, ‘‘हम लोग तुझे बहुत प्यार करते हैं. हम नहीं चाहते कि बाइक चलाते समय तेरा कोई ऐक्सिडैंट हो जाए और तुम को चोट लग जाए. जब तुम बड़े हो जाओगे तो मैं खुद तुम को बाइक ले कर दूंगी.’’

अरनव को मां की कुछ बात समझ में आई और कुछ उस ने समझने की जरूरत नहीं समझी. दिन निकलने लगे. अरनव ने अब प्रणव से दोस्ती कम कर दी. वे लोग उसे नीचा दिखाते थे. स्कूल में गरमी की छुट्टियां हो चुकी थीं. बच्चे नई क्लास में चले गए थे. गरमी की छुट्टियों के बाद सभी दोस्त मिलने वाले थे. अरनव को प्रणव नहीं दिखा, वह पता करने लगा. प्रणव के दोस्त ने बताया कि उस का बाइक चलाते हुए ऐक्सिडैंट हो गया जिस से उस का एक पैर टूट गया. उस में रौड पड़ी है. अब वह कभी बाइक नहीं चला पाएगा.

स्कूल की छुट्टी के बाद अरनव प्रणव के घर गया. प्रणव घर के लौन में कुरसी पर बैठा था. उस के चलने के लिए वाकर वहीं रखा था. उसे पकड़ कर वह इधरउधर जाता था. प्रणव ने बताया कि डाक्टर ने अभी उसे 3 माह बिस्तर पर रहने की हिदायत दी है. प्रणव को देख कर अरनव के सामने मां की बात याद आने लगी. प्रणव की मां को इस बात का अफसोस था कि बेटे को बाइक क्यों दिलाई? घर आ कर अरनव ने अपनी मां को सौरी बोला. इस के बाद प्रणव और उस की मां की पूरी बात बताई.

प्रणव के साथ हुए हादसे के बाद स्कूल वालों ने बच्चों को बाइक लाने से मना कर दिया. कुछ पेरैंट्स ने बच्चों से उन की बाइक छीन ली. अगर प्रणव के साथ हादसे से पहले दूसरे बच्चों के पेरैंट्स ने भी अरनव की मां जैसा व्यवहार किया होता तो शायद प्रणव का यह हाल न होता. वह भी दूसरे बच्चों की तरह हंसखेल रहा होता.

रफ्तार में फंसी जिंदगी

प्रणव कोई अकेला ऐसा बच्चा नहीं है जिस के साथ ऐसी दुर्घटना घटी हो. तेज रफ्तार बाइक के चलते रोज ही कहीं न कहीं हादसे होते रहते हैं. तेज रफ्तार का जनून टीनएज बच्चों पर भारी पड़ने लगा है. यह बात केवल लड़कों तक ही सीमित नहीं है बल्कि लड़कियों में भी बिना गियर के हाईस्पीड स्कूटी का प्रयोग बढ़ गया है. इस के चलते उन के साथ भी हादसे होने लगे.

इंटरमीडिएट की छात्रा शिवानी अपने घर से 6 किलोमीटर दूर स्कूटी से स्कूल जाती थी. एक दिन वह एक ट्रक को ओवरटेक कर रही थी. सामने से औटो आ गया जिस से उस का ऐक्सिडैंट हो गया. मौके पर ही शिवानी की मौत हो गई. आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटनाओं में सब से ज्यादा हादसे बाइक सवारों के साथ होते हैं. इन में युवाओं और छात्रों के साथ होने वाले हादसों की संख्या सब से ज्यादा है.

अब शहर बड़े हो गए हैं. सड़कें चौड़ी और हाइवे से जुड़ गई हैं. तेज स्पीड वाहन आ गए हैं. ऐसे में ऐक्सिडैंट का खतरा बढ़ गया है. मई, जून और 15 जुलाई, 2017 तक केवल लखनऊ शहर में 290 सड़क  हादसे हुए. इन में करीब 110 लोगों की जानें गईं. 180 लोग गंभीररूप से घायल हुए.

सड़क दुर्घटनाओं पर काम करने वाली डाक्टर रमा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘हादसों में मरने वालों की संख्या बढ़ने का सब से बड़ा कारण दुर्घटना से निबटने के सही उपाय का न होना है. हादसों में घायल होने वाले अगर समय से अस्पताल पहुंच जाएं तो उन की जान बच सकती है. एंबुलैंस और अस्पताल का सही इंतजाम न होने से हादसे और भी गंभीर हो जाते हैं. इन से बचने के लिए सब से ज्यादा जरूरी है कि पेरैंट्स जागरूक हों. अगर समय रहते वे न चेते तो जिंदगीभर का दुख झेलना पड़ सकता है.’’

दुर्घटना का सबब

सड़क हादसों की तादाद में बढ़ोतरी का सब से बड़ा कारण सड़कों का खराब होना है. बरसात के मौसम में सड़कों पर पड़ी बजरी निकल आती है, यह तेज रफ्तार बाइक और दूसरी दोपहिया गाडि़यों के बैलेंस को बिगाड़ सकती है. जिस से दुर्घटनाएं बढ़ जाती हैं. बरसात के दिनों में बाइक में ब्रेक सही से नहीं लगते हैं, जिस से सड़क हादसे बढ़ जाते हैं.

परिवहन विभाग में एआरटीओ के पद पर सेवारत रीतू सिंह कहती हैं, ‘‘शहर के अधिकांश छात्र और युवा बिना हैलमेट के बाइक चलाते हैं, जिस से सड़क हादसे होने पर बचाव नहीं हो पाता है. ऐसे बच्चे एक बाइक पर अकेले नहीं चलते हैं. वे अपने 2-3 दोस्तों को भी बाइक पर बैठा लेते हैं, जिस से हादसे होने की आशंका बढ़ जाती है.’’

लखनऊ की अलीगंज कालोनी में सड़क क्रौस करने के लिए ओवरब्रिज का प्रयोग न कर के गलत दिशा से सड़क क्रौस करने वाले एक ही बाइक पर सवार 3 छात्रों की मौत हो गई. इन लोगों ने भी सिर पर हैलमेट नहीं पहना था. हादसे के बाद इन के सिर खंभे से टकरा गए. 2 की घटनास्थल पर ही मौत हो गई और एक की मौत अस्पताल पहुंच कर हो गई.

पुलिस विभाग के एक इंस्पैक्टर का कहना है, ‘‘हम लोग वाहन चैकिंग के समय जब गलत तरह से वाहन चलाने वालों का चालान करते हैं तो उन को बचाने के लिए सिफारिशी फोन आते हैं. अगर बच्चों को पुलिस चालान का सामना करना पड़े तो शायद वे दोबारा ऐसी गलती न करें.’’

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