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निजामुद्दीन : बस, ट्रेन, टैक्सी, मेट्रो..अब सब मिलेंगी साथ-साथ

दिल्ली मेट्रो के फेज-3 की पिंक लाइन पर बनाए गए हजरत निजामुद्दीन मेट्रो स्टेशन के खुलने का लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. मजलिस पार्क से शिव विहार के बीच स्थित मेट्रो की सबसे बड़ी पिंक लाइन पर सराय काले खां बस अड्डे के पास यह अंडरग्राउंड स्टेशन बनाया गया है. डीएमआरसी का मानना है कि जब यह स्टेशन यात्रियों के लिए खुल जाएगा, तो यह दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ा और प्रमुख ट्रांजिट हब बन जाएगा, जहां इंटरस्टेट बसें, सिटी बसें, ऑटो, टैक्सी, ट्रेन और मेट्रो जैसी तमाम पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेवाएं एक साथ एक ही जगह से मिल सकेंगी.

यह स्टेशन सराय काले खां बस अड्डे और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन की कनेक्टिविटी को भी और बेहतर बनाएगा. मेट्रो स्टेशन से बस अड्डे और रेलवे स्टेशन की तरफ आने-जाने के लिए इस स्टेशन में डेडिकेटेड एंट्री एग्जिट पॉइंट्स बनाए गए हैं. एक पॉइंट सराय काले खां बस अड्डे महज 50 मीटर दूर बनाया गया है, तो वहीं निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से मेट्रो का एंट्री-एग्जिट गेट भी महज 150 मीटर दूर ही होगा. यानी मेट्रो या रेलवे स्टेशन से निकलकर लोग आराम से एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं.

इस स्टेशन के खुलने के साथ ही दिल्ली का चौथा सबसे प्रमुख रेलवे स्टेशन और तीसरा सबसे बड़ा इंटरस्टेट बस अड्डा भी मेट्रो नेटवर्क से जुड़ा जाएगा. अभी सराय काले खां बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से अगर किसी को मेट्रो लेनी है, तो उसे 3-4 किमी दूर इंद्रप्रस्थ या लाजपत नगर मेट्रो स्टेशन से आना-जाना पड़ता है, मगर अब यहीं पर लोगों को मेट्रो की सुविधा मिल जाएगी. इस स्टेशन पर दिल्ली के बाहर आने-जाने वाले यात्रियों का रश ज्यादा रहेगा, जिनके पास लगेज भी होगा, इसलिए यहां चौड़ी सीढ़ियां और ज्यादा चौड़े एस्केलेटर्स लगाए गए हैं, ताकि यात्री अपने सामान के साथ आराम से आ-जा सकें.

दिल्ली के प्रमुख पार्कों में से एक इंद्रप्रस्थ पार्क और जल्द ही बनने जा रहा सेवन वंडर्स पार्क भी इस मेट्रो स्टेशन के नजदीक होगा. स्टेशन के बाहर पैदल चलने वालों के सुरक्षित तरीके से सड़क पार करने के लिए टेबलटॉप पेडस्ट्रियन क्रॉसिंग भी बनाई गई है.

पेटीएम पर जानें अपने ट्रेन का लाइव स्टेटस, यह है तरीका

ज्यादातर लोग अपने ट्रेन के टिकट का पीएनआर स्टेटस जानने के लिए आमतौर पर रेलवे की औफिशियल वेबसाइट irctc पर ही जाते हैं. या फिर ‘139’ पर SMS या कौल करते हैं. इस दौरान काफी असुविधा भी होती है, क्योंकि एक बार में कई लोग irctc के जरिए अपनी ट्रेन का लाइव स्टेटस या पीएनआर चेक करते हैं. इसकी वजह से कई बार वेबसाइट हैंग हो जाती है.

ऐसे में लोगों की सहूलियत के लिए अब पेटीएम भी पीएनआर स्टेटस चेक करने की सुविधा उपलब्ध करा रहा है. दरअसल अब तक लोग पेटीएम के जरिए केवल अपनी ट्रेन टिकट ही बुक सकते थे लेकिन, अब पेटीएम की नई ‘पीएनआर स्टेटस सर्विस’ के जरिए पीएनआर स्टेटस भी चेक कर सकते हैं. इसके अलावा लोग ट्रेन का लाइव स्टेटस भी पेटीएम की नई सर्विस के जरिए चेक कर सकते हैं.

खबरों के मुताबिक पेटीएम के वाइस प्रसिडेंट अभिषेक रंजन ने बताया कि हम इस साल कई नई सर्विस शुरू करने वाले जिसमें पीएनआर स्टेटस पहली सर्विस है. इससे पहले पेटीएम ने बताया कि एक महीने में एक मिलियन से ज्यादा ट्रेन टिकट बुक कर पेटीएम irctc के बाद ट्रेन टिकट के लिए देश का सबसे बड़ा बुकिंग प्लेटफौर्म बन गया है.

पेटीम पर ऐसे करें चेक

अपनी टिकट का पीएनआर स्टेटस चेक करने के लिए आपको पहले पेटीएम की वेबसाइट https://paytm.com/train-tickets पर जाना होगा. फिर ट्रेन पर क्लिक करके अपना पीएनआर नंबर एंटर करना होगा जिसके बाद आप अपना पीएनआर स्टेटस चेक कर सकेंगे.

बैंकों के एनपीए पर राजन की दवा का इंतजार

अर्थशास्त्री रघुराम राजन के 3 वर्षों तक भारतीय रिजर्व बैंक  के गवर्नर के तौर पर अपनी सेवाएं देने के बाद मोदी सरकार ने अचानक दिसंबर 2016 में उन्हें पद से हटा दिया. उस के 2 माह बाद देश में नोटबंदी लागू की गई थी. राजन शिकागो के एक मशहूर बिजनैस स्कूल में प्रोफैसर बन गए. हाल ही में उन की विशेषज्ञता को देश के बैंकों में लगातार बढ़ रहे गैर निष्पादित संपत्ति यानी एनपीए का समाधान निकालने के उपाय सुझाने को आर्थिक मामलों की एक समिति के समक्ष बुलाया गया है.

समिति के अध्यक्ष तथा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने राजन को इस मामले में पत्र लिख कर उन्हें समिति के पैनल के समक्ष उपस्थित होने को कहा है. डा. जोशी ने पूर्व गवर्नर को यह पत्र सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की सलाह पर लिखा है.

एनपीए के संकट से चिंतित समिति ने पिछले महीने अरविंद सुब्रमण्यम को अपने सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया था. उन्होंने समिति को सलाह दी कि रघुराम राजन इस मामले के विशेषज्ञ हैं और वे इस संबंध में बेहतर सलाह दे सकते हैं. बैंकिंग क्षेत्र के लिए एनपीए एक बड़ी समस्या बन गई है. सार्वजनिक बैंकों का कहना है कि उन का 7.77 लाख करोड़ रुपए डूब गया है. इस एनपीए को बचाने के लिए बैंक सरकार से गुहार लगा रहे हैं.

आखिर संसदीय समिति ने इस मामले को गंभीरता से लिया तथा वित्त सचिव सहित सभी प्रमुख अधिकारियों को तलब कर उन से बड़ा ऋ ण देने के बारे में हुई बैंकों के निदेशक मंडल की बैठक का पूरा विवरण देने को कहा है. रघुराम राजन के बारे में खबरें आई थीं कि उन्होंने नोटबंदी जैसे प्रस्तावों का विरोध किया था, जिस के कारण उन्हें पद से हटाया गया.

राजन यदि समिति को कोई उत्कृष्ट सुझाव देते हैं तो उस से बैंकों को बड़ा लाभ होगा और मोदी सरकार का उन्हें हटाने का निर्णय सवालों के दायरे में आएगा.

भारतीय कबड्डी टीम : बादशाह से फकीर क्यों

जकार्ता में खेले गए एशियन खेलों में भारतीय कबड्डी टीम की ईरान के हाथों सैमीफाइनल में शर्मनाक हार किसी को हजम नहीं हो रही है और लंबे समय तक यह हार खेलप्रेमियों को सालती रहेगी. एशियाड खेलों में 1990 से शामिल कबड्डी भारत के लिए शर्तिया गोल्ड मैडल दिलाने वाला खेल था ठीक वैसे ही जैसे 60-70 के दशक में हौकी हुआ करता था. जरूरी यह नहीं है कि महिला और पुरुष कबड्डी में देश गोल्ड मैडल से चूक गया, जरूरी यह है कि अप्रत्याशित परिणाम की वजहें क्या हैं.

वजहें कई हैं. मसलन, कबड्डी का ग्लोबल और प्रोफैशनल हो जाना जिस के तहत प्रो कबड्डी लीग में खिलाड़ी करोड़ों में बिकने लगे. हालांकि यह कोई हर्ज की बात नहीं है लेकिन इस से एक बात यह साबित हुई कि कबड्डी विलासियों का नहीं बल्कि दमखम वालों का खेल है जिस के लिए भारतीय खिलाड़ी जाने जाते हैं.

इस बार सैमीफाइनल में ही ईरान ने हरा कर यह जता दिया कि अगर खेल को गंभीरता से नहीं खेला तो हारने के लिए तैयार रहें. महज पिछली उपलब्धियों के आधार पर सोने का सपना देखना मुंगेरी लाल के सपने जैसा होगा. फिर आप सूरमा नहीं रह सकते.

हार के बाद भारतीय खिलाड़ी फूटफूट कर रोए लेकिन प्रशंसकों ने कोई हमदर्दी नहीं दिखाई. वह इसलिए कि वे कोई अच्छा प्रदर्शन कर नहीं हारे थे. इतनी गैरजिम्मेदाराना कबड्डी और वह भी एशियन खेलों में पहली बार खेली गई. खिलाडि़यों के बीच कोई तालमेल नहीं था और कोई भी आक्रामक मूड में नहीं दिखा. ऐसा लग रहा था कि 7 बार स्वर्णिम सफलता हासिल करने वाली भारतीय टीम इस बार हार का संकल्प ले कर गई थी जिस का ठिकरा किसी एक खिलाड़ी के सिर नहीं फोड़ा जा सकता.

ईरान की टीम लगातार 2 बार से भारत के हाथों एशियाई खेलों के फाइनल में हार रही थी जिसे बहुत हलके में लिया गया. वर्ष 2016 के विश्वकप में अहमदाबाद में पहले ही मैच में दक्षिण कोरिया ने जब भारत को हराया था तभी हम सचेत हो जाते और खिलाडि़यों की कमजोरियों को वक्त रहते दूर कर पाते तो हमें जकार्ता में पटखनी नहीं खानी पड़ती.

पुरुष टीम की हार इत्तफाक मान कर नजरअंदाज की जा सकती थी लेकिन महिला टीम ने भी फाइनल गंवा कर संदेश दे दिया कि अब कबड्डी नाम के मिट्टी के खेल से भारत की बादशाहत खत्म हो रही है. खोट खेल में नहीं खिलाडि़यों में है जो जरा सा पैसा हाथ में आते ही आसमान में उड़ने लगे हैं. सुविधाभोगी होते खिलाड़ी धार खोने लगे हैं और नियमित अभ्यास करने में उन्हें अब शर्म आने लगी है.

विश्लेषणों का दौर जारी है जिस में कबड्डी महासंघ के विवाद भी शुमार हैं, लेकिन इस से खिलाडि़यों की कमजोरियां नहीं ढकी जा सकतीं. समय है कि कबड्डी खिलाडि़यों के कान उमेठे जाएं नहीं तो देश के पास एक सुनहरा अतीत ही हौकी की तरह रह जाएगा कि हम कबड्डी के बेताज बादशाह थे और आज फकीर हो गए हैं.

एशियाई खेलों में भारत

एशियाई खेलों में कुछ भारतीय खिलाडि़यों ने शानदार प्रदर्शन कर स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक हासिल किए तो कुछ खिलाडि़यों ने प्रशंसकों को निराश भी किया. इस साल का प्रदर्शन 1978 के बाद सब से बेहतर रहा.

हरियाणा के नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया. यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि एशियाई खेलों के इतिहास में पहली बार पुरुषों की भाला फेंक प्रतियोगिता में भारत को सोने का तमगा मिला. इस से पहले वर्ष 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों में गुरतेज सिंह ने कांस्य पदक जीता था, लेकिन इसे इस देश के लिए विडंबना ही कहेंगे कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में भाला फेंक जैसे खेल में आखिर 36 वर्षों तक वंचित क्यों रहना पड़ा?

इस का मतलब साफ है कि यहां खेलनीति पर ध्यान ही नहीं दिया जाता. प्रतिभाओं की खोज नहीं होती अगर प्रतिभाओं की खोज होती भी है तो उन प्रतिभाओं को सही से प्रशिक्षण नहीं मिलता, जबकि एशियाई खेलों में जिस तरह का खेल खेला जाता है उस के लिए गांवकसबों में बहुत सारी प्रतिभाएं मिल सकती हैं. उन्हें अगर सही ढंग से प्रशिक्षित किया जाए तो ये प्रतिभाएं एशियाई जैसे खेलों में पदकों की संख्या में इजाफा कर सकते हैं. पर यहां इक्कादुक्का खेल को ही तवज्जुह दी जाती है जिस में पैसों की बारिश हो, नाम हो, इज्जत हो, शोहरत हो.

इस से बाकी खेलों पर असर पड़ना लाजिमी है. ऐसे में संबंधित खेल से जुड़ी संस्थाएं, खेल मंत्रालय व संबंधित अधिकारियों को यह निश्चय करना होगा कि भारत को खेलों में अव्वल आना है तो एकदो खेल नहीं बल्कि बाकी खेलों के बारे में भी नई नीति बनानी होगी तभी हम चीन व जापान के खिलाडि़यों को पछाड़ सकते हैं.

भोजपुरी की कुछ हिट फिल्में

भोजपुरी सिनेमा का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है, लेकिन इस भाषा में बनी बहुत सी फिल्मों ने उत्तर प्रदेश, बिहार समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में अपनी अमिट छाप छोड़ी थी.

उन्हीं में से कुछ फिल्मों की जानकारी यहां दी जा रही है, जिन्होंने अपने समय में कामयाबी के नए कीर्तिमान बनाए थे.

गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो

आज भोजपुरी सिनेमा जिस मुकाम पर?है, उस की बुनियाद साल 1963 में रखी गई थी. कहते हैं कि भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने भोजपुरी फिल्म बनाने की पेशकश की थी.

फिल्म भी ऐसी, जिस ने सिनेमाघरों में आते ही धमाल मचा दिया था. पहली ही फिल्म इतनी सुपरहिट हुई थी कि लगा अब भोजपुरी सिनेमा के आने वाले दिन सुनहरे साबित होंगे.

देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने खुद इस फिल्म को देखा था, जिस का नाम?था ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’.

किसी विधवा की दूसरी शादी की कहानी पर बनी इस फिल्म का डायरैक्शन कुंदन कुमार ने किया था, जिस में कुमकुम, असीम कुमार और नजीर हुसैन ने अहम किरदार निभाए थे.

जब यह फिल्म पटना के ‘वीणा’ सिनेमाघर पर लगी थी, तब लोग बैलगाडि़यों पर सवार हो कर इसे देखने दूरदूर से आए थे.

नदिया के पार

हालांकि यह फिल्म बौलीवुड में बनाई गई थी, लेकिन थी भोजपुरी. साल 1982 में आई इस फिल्म को राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनाया गया?था. केशव प्रसाद मिश्र के हिंदी उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ पर बनी इस फिल्म में सचिन, साधना सिंह, इंद्र ठाकुर, मिताली, लीला मिश्रा और राम मोहन ने बतौर कलाकार काम किया था.

‘नदिया के पार’ एक खालिस गंवई फिल्म?थी, जिस में पारिवारिक ड्रामा बड़ा गजब का था. बड़े भाई के लिए अपने प्यार की कुरबानी देने वाले छोटे भाई को बड़ा भाई आखिर में?क्या तोहफा देता था, यह देखना बड़ा ही रोचक था.

फिल्म ‘नदिया के पार’ के सारे गाने बेहतरीन थे. हालांकि उन में देहाती पुट था, लेकिन शहरों में?भी उन्हें खूब सुना गया था. ‘कौन दिशा में ले के चला रे बटोहिया’, ‘सांची कहे तोरे आवन से हमरे’ और ‘जोगीजी वाह’ गीतों की मधुरता ने सब का दिल जीत लिया था.

पान खाए सैयां हमार

साल 1984 में आई फिल्म ‘पान खाए सैयां हमार’ भोजपुरी की बहुत कामयाब फिल्मों में से एक मानी जाती है.

हिंदी फिल्मों में चरित्र व खलनायक का किरदार निभाने वाले सुजीत कुमार ने इस फिल्म का डायरैक्शन किया था, जिस में वे हीरो भी खुद ही बने थे. उन के साथ बंदिनी और एसएन त्रिपाठी ने भी अहम किरदार निभाए थे.

इस फिल्म की एक और खासीयत यह थी कि इस में अमिताभ बच्चन और रेखा ने मेहमान कलाकार का किरदार निभा कर सब को चौंका दिया था.

गंगा

साल 2006 में आई इस फिल्म में जिन कलाकारों ने काम किया था, उन के नाम से ही?भोजपुरी सिनेमा में एक नई जान सी आ गई थी. वजह, इस फिल्म में बौलीवुड के ‘महानायक’ अमिताभ बच्चन और ‘ड्रीम गर्ल’ रहीं हेमामालिनी ने?भोजपुरी संवादों से जनता का दिल जीता था. उन के साथ नगमा, रविकिशन, मनोज तिवारी और अजल शर्मा ने भी अपनी अदाकारी के जलवे बिखेरे थे.

इस फिल्म की कहानी ठाकुर विजय सिंह के इर्दगिर्द घूमती है. ठाकुर का वफादार नौकर बजरंग लालची रिश्तेदारों से छुटकारा दिलाना चाहता है.

इस फिल्म में ‘गंगा’ का किरदार नगमा ने निभाया था, जिन्हें भोजपुरी की ‘माधुरी दीक्षित’ कहा गया था.

ससुरा बड़ा पईसावाला

भोजपुरी सिनेमा में आए उतारचढ़ाव को फिर से नई बुलंदी पर ले जाने का काम फिल्म ‘ससुरा बड़ा पईसावाला’ ने किया था. साल 2005 में आई इस फिल्म ने कामयाबी के नए झंडे गाड़े थे और गायक से ऐक्टर बने मनोज तिवारी को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया था.

राजेश गुप्ता के डायरैक्शन में बनी इस फिल्म में भरपूर मनोरंजन था और यह माली तौर पर बड़ी कामयाब फिल्म साबित हुई थी.

भोले शंकर

साल 2008 में जब फिल्म ‘भोले शंकर’ सिनेमाघरों में रिलीज की गई थी, उस समय इस ने टिकट खिड़की पर सब से ज्यादा ओपनिंग का रिकौर्ड बनाया था और यह तब की सुपरहिट फिल्म मानी गई थी.

यह मिथुन चक्रवर्ती की पहली भोजपुरी फिल्म थी, जिस में उन्होंने शंकर का किरदार निभाया था, जो एक डौन होता है.

भारत में बढ़ती बेरोजगारी पर बनी इस फिल्म में भोले का किरदार मनोज तिवारी ने अदा किया था.

पंकज शुक्ला के डायरैक्शन में बनी फिल्म ‘भोले शंकर’ में मोनालिसा ने बतौर हीरोइन काम किया था.

नया पता

साल 2014 में बड़े परदे पर आई भोजपुरी फिल्म ‘नया पता’ ने भोजपुरी में नए सिनेमा के दरवाजे खोल दिए थे.

घर छोड़ कर परदेश में कमाने गए गंभीर मुद्दे पर यह फिल्म बनी थी, जिस के?डायरैक्टर पवन के. श्रीवास्तव थे.

इस फिल्म में यशवर्धन सिंह, शाह अहमद, अभिषेक शर्मा, जूली वर्शी वगैरह कलाकारों ने काम किया था.

दुलारा

साल 2015 में आई फिल्म ‘दुलारा’ के डायरैक्टर राजकुमार आर. पांडे ने आज की नौजवान पीढ़ी को उस लौंडा नाच से रूबरू कराया था, जिस में आदमी औरत के कपड़े पहन कर डांस करता था.

इस फिल्म के हीरो प्रदीप पांडेय ‘चिंटू’ ने पहले तो यह किरदार निभाने से मना कर दिया था, पर फिल्म की कहानी की मांग को समझते हुए हां कर दी थी. उन्होंने इस किरदार को काफी अच्छे तरीके से निभाया था.

मुंबई में हुए भोजपुरी फिल्म अवार्ड, 2016 में फिल्म ‘दुलारा’ को बैस्ट सोशल इशू के लिए स्पैशल जूरी अवार्ड दे कर सम्मानित किया गया था. इस में तनुश्री, रितु सिंह और मोहिनी घोष ने भी अपनी शानदार अदाकारी दिखाई थी.

बमबम बोल रहा है काशी

साल 2016 में आई फिल्म ‘बमबम बोल रहा है काशी’ ने जम कर कमाई की थी. इस फिल्म में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ और आम्रपाली दुबे की जोड़ी ने गजब का कमाल दिखाया था.

इस फिल्म की फिल्मकार बौलीवुड की हीरोइन प्रियंका चोपड़ा थीं. इसे सब से?ज्यादा थिएटर मिले थे और काशी यानी बनारस में इस ने पहले 3 दिनों में अपनी लागत वसूल ली थी.

यह एक पारिवारिक फिल्म थी, जिस में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने काशी के किरदार में नेकदिल इनसान के किरदार को निभाया था, जो गरीब लोगों की मुफ्त में सेवा करता है.

सनातन धार्मिक संस्था का आतंकी चेहरा

महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक में सक्रिय धार्मिक संस्था सनातन इन दिनों आतंकवाद के आरोपों से घिरी हुई है. पिछले 10 वर्षों में कई बार उस पर आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक के 4 बुद्धिजीवियों नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएं आज भी पहेली बनी हुई हैं.

इन के सिलसिले में इस धार्मिक संगठन और इस से जुड़ी संस्था हिंदू जन जागृति समिति का नाम अकसर आता है. कई और बुद्धिजीवी इस के निशाने पर बताए जाते हैं, जिन में गिरीश कर्नाड और निकिल वागले के नाम शामिल हैं. हाल ही में उस के कई कार्यकर्ताओं के पास से नालासोपारा में हथियार और विस्फोटक बरामद किए गए. पहले भी कई आतंकवादी गतिविधियों में इस के कार्यकर्ता पकड़े जा चुके हैं. चारों बुद्धिजीवियों की हत्या में सनातन या उस से जुड़ी संस्था का कोई न कोई कार्यकर्ता पकड़ा गया है.

महाराष्ट्र के एंटी टैररिस्ट स्क्वैड यानी एटीएस ने एक छापेमारी में दक्षिणपंथी संगठन सनातन संस्था के एक कथित समर्थक के घर से विस्फोटक बरामद किया. हालांकि संस्था ने उक्त व्यक्ति को अपना सदस्य मानने से इनकार किया है लेकिन कानूनी लड़ाई में उस की मदद करने को भी कहा है. एटीएस ने वैभव राउत के घर में छापा मारा था और 8 देशी बम बरामद किए थे. घर से कुछ दूर उस की दुकान से सल्फर (गन पाउडर) और डेटोनेटर भी बरामद हुए हैं. जब्त किए गए विस्फोटकों से 25-30 बम बनाए जा सकते हैं. छापेमारी के बाद वैभव राउत को गिरफ्तार कर लिया गया.

गोवा और महाराष्ट्र में सनातन संस्था और अपने को प्रगतिशील व रेशनलिस्ट कहने वाली संस्थाओं के बीच लंबे समय से चल रहा शीतयुद्ध अब गरमा गया है. बुद्धिजीवियों की हत्या के सिलसिले में सनातन के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद से सारी गैर धार्मिक पार्टियां और रेशनलिस्ट संगठन व हस्तियां एकजुट हो कर क्षेत्रीय हिंदुत्ववादी संस्था सनातन पर पाबंदी लगाने के लिए अभियान चला रही हैं. दूसरी तरफ हिंदुत्ववादी संगठन पाबंदी का विरोध कर रहे हैं.

संस्था की वैबसाइट व दूसरी जगहों पर दी गई जानकारी के अनुसार, सनातन का उद्देश्य अध्यात्म का अध्ययन विज्ञान के रूप में करना है. इस के लिए यह संस्थान ‘सनातन प्रभाव’ नाम का अखबार, धार्मिक साहित्य का अलगअलग भाषाओं में प्रकाशन, नियमित सत्संग मेले व भव्य हिंदू धर्म जागृति परिषद जैसे उपक्रम चलाती है.

आतंकी गतिविधियां

भारत के कई राज्यों और विदेशों में सनातन संस्था के केंद्र हैं जो मासूम बच्चों से ले कर बुजुगों तक को हिंदू धर्म के ‘विज्ञान’ से परिचित करवाने, उन्हें संगठित करने व उन का धार्मिक ‘उन्नयन’ करने का काम करते हैं.

सनातन की पहली आतंकी गतिविधि 2008 में ठाणे व वाशी के नाटकघरों में देखी गई. ‘आम्ही पाचपुते’ नाम के मराठी नाटक में हिंदू देवीदेवताओं की असलियत की पोल खोलने को अपमान कह कर विरोध में वाशी के विष्णुकदास भावे नाटकघर में व उस के बाद 4 जून को ठाणे के गडकरी नाटकघर की पार्किंग में बम विस्फोट किए गए.

इस प्रकरण में संस्था के 6 साधकों को गिरफ्तार किया गया पर उन में 4 को न्यायालय ने सुबूतों की कमी के कारण रिहा कर दिया जबकि 2 को 10 साल की सजा सुनाई. अभियुक्तों ने किसी संस्था की तरफ से विस्फोट किए हैं, ऐसा न्यायालय ने अपने फैसले में नहीं कहा.

इस के बाद 2009 में गोवा के मडगांव में फिर एक बम विस्फोट हुआ. दीवाली के पहले दिन उत्सव के रंग में रंगी भीड़ के बीच बम रखने जा रहे संस्था के 2 साधकों की ही मृत्यु हो गई और एक बार फिर पुलिस की नजर संस्था की तरफ गई. इस घटना में भी संस्था के 5 दूसरे साधकों को पुलिस ने गिरफ्तार किया पर सुबूतों के अभाव में वे भी छूट गए. रूद्रा पाटील व दूसरे 2 आरोपी आज तक फरार हैं.

2013 में अंधविश्वासों के खिलाफ अभियान चलाने वाली संस्था के अध्यक्ष नरेंद्र दाभोलकर की हत्या में भी सनातन संस्था के हाथ होने की आशंका जाहिर की जा रही थी. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गोविंद पानसरे की हत्या में समीर गायकवाड़ की गिरफ्तारी के बाद नरेंद्र दाभोलकर के साथसाथ कर्नाटक के बसवेश्वर के अध्येता बुद्धिजीवी प्रोफैसर कलबुर्गी की हत्या में सनातन के हाथ होने की आशंका को ज्यादा बल मिल रहा है. डा. नरेंद्र दाभोलकर के अंधश्रद्धा निर्मूलन के कार्यों का सनातन संस्था हमेशा से विरोध करती आई थी.

डा. दाभोलकर, कामरेड पानसरे व प्रोफैसर कलबुर्गी की हत्याओं में मडगांव बम विस्फोट प्रकरण में फरार चल रहे रूद्रा पाटील व दूसरे साधकों के हाथ होने की आशंका जाहिर की जा रही है. ये हत्याएं जहांजहां हुईं वहां सनातन संस्था काफी सक्रिय है.

इस बात को ले कर कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और तमाम गैरधार्मिक संगठन भी सनातन पर पाबंदी लगाने की अपील कर रहे थे. पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में सनातन संस्था पर आरोपपत्र तैयार करवाया था. तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम के सामने संस्था पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया था. लेकिन चिदंबरम को इस मामले में कोई सुबूत नहीं मिला.

कट्टरता और झूठ का सहारा

सनातन के संस्थापक जयंत बालाजी आठवले कभी हिप्नोथेरैपिस्ट थे यानी उन का दावा था कि वे लोगों को सम्मोहित कर सकते हैं.

सनातन संस्था का मुख्यालय उत्तर गोवा जिले के रामनाथी आश्रम में है. उन की वैबसाइट और साहित्य को देखने पर स्पष्ट होता है कि यह संस्था भारत को हिंदूराष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. इस के साथ अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति जैसी संस्थाओं द्वारा हिंदू धर्म के कर्मकांड आदि के खिलाफ किए जा रहे प्रचार से उस की रक्षा करती है.

अंधश्रद्धा समिति पर वह मानहानि के मुकदमे दायर कर उन की बोलती बंद करने की कोशिश करती रही है. सनातन कई देशों में सक्रिय है. कुछ देशों में इस पर प्रतिबंध है.

संस्था के संस्थापक डा. जयंत बालाजी आठवले कहते हैं कि वर्ष 2023 में हिंदू राष्ट्र स्थापित हो कर उस के द्वारा सर्वत्र सात्विकता का प्रसार होगा.

सनातन संस्था के बारे में अब अजीबोगरीब तथ्य सामने आ रहे हैं. इस के संस्थापक जयंत बालाजी आठवले के बारे में इस संस्था की वैबसाइट ने ऐसीऐसी गपें हांकी हैं कि जिन्हें सुन कर कोई भी मसखरा अपनी मसखरी तक भूल सकता है. पहले जरा गपें सुनिए. आठवले के केशों का रंग सुनहरा होता जा रहा है. उन के शरीर में दैवीय परिवर्तन हो रहे हैं. उन के शरीर से दिव्यकण निकलते हैं, उन में जबरदस्त खुशबू होती है. उन के नाखूनों, जबान और पेशानी पर ओम (ऊं) के चिह्न उभर आए हैं. वे शौचालय में जिस ब्रश का इस्तेमाल करते हैं उस का रंग बदल गया है. वह गुलाबी हो गया है. आठवलेजी तो भगवान के साक्षात अवतार हैं. वे विष्णु के अवतार हैं. उन के शरीर पर कमल और त्रिशूल भी उभर आए हैं. वे तो भगवान ही हैं. वे हिंदू राष्ट्र की स्थापना करेंगे.

उन की वैबसाइट उन्हें दूसरा विवेकानंद कहती है और उन्हें भारत का भाग्यविधाता मानती है. उन के बारे में यह भी बताया गया है कि वे पहले लंदन में सम्मोहन विद्या और सम्मोहन चिकित्सा का अभ्यास करते रहे थे.

उन के विरोधी उन पर आरोप लगाते हैं कि वे युवकों को सम्मोहित कर के उन से काम करवाते हैं. बहरहाल, आज सनातन संस्था का धार्मिक चेहरा बेनकाब हो कर आतंकवादी चेहरा नजर आ रहा है.

आत्महत्या पर नया विधेयक : समझें जीवन की अहमियत

देश में आत्महत्या का प्रयास अब जुर्म के दायरे से बाहर होगा. बीती 29 मई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मानसिक चिकित्सा अधिनियम 2017 की अधिसूचना जारी कर देश में आत्महत्या की कोशिश को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है. इस के साथ ही, 1863 से देश में प्रचलित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-309 की वैधानिकता भी खत्म हो गई. गौरतलब है कि एक विधेयक के रूप में यह अधिनियम राज्यसभा से 8 अगस्त, 2016, जबकि लोकसभा से 27 मार्च, 2017 को पारित हुआ था. एक साल बाद इस संबंध में सरकार ने अधिसूचना जारी कर इसे प्रभावी बनाने की घोषणा की है. नए कानून में क्या है खास

नए कानून में आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा गया है. अब यह कृत्य केवल मानसिक रोग की श्रेणी में आएगा. भारतीय दंड संहिता की धारा-309 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है. अब अगर कोई शख्स आत्महत्या का प्रयास करता है, तो उसे अपराधी नहीं बल्कि मानसिक रोगी समझा जाएगा. इस कानून के जरिए मानसिक रोगियों के साथ अमानवीय बरताव करने पर भी पूरी तरह कानूनी रोक लगा दी गई है. मानसिक रोगियों के इलाज में बिजली के झटकों का प्रयोग अब एनेस्थीसिया (बेहोशी) के बाद ही किया जा सकेगा. महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों और डाक्टरों को सजा व जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है. पहली बार नियम तोड़ने पर आरोपियों

को 6 महीने की जेल या 10 हजार रुपए जुर्माना या दोनों हो सकता है, जबकि अपराध दोहराने पर 2 साल की जेल और 50 हजार से 5 लाख रुपए तक जुर्माना या दोनों हो सकता है. आत्महत्या एक गंभीर प्रवृत्ति

मौजूदा समय की बात करें, तो आत्महत्या की प्रवृत्ति भारत सहित दुनिया के कई देशों में गंभीर समस्या बन चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो विश्व में प्रति 40 सैकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है, जबकि इस तरह प्रति वर्ष करीबन 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं. भारत में भी आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. आत्महत्या के मामले में हमारा देश विश्व के शीर्ष देशों में शामिल है. भारतीयों में आत्महत्या की दर की बात की जाए, तो प्रति एक लाख जनसंख्या में से 20 लोग आत्महत्या कर अपने जीवन का असमय त्याग कर देते हैं. दरअसल, बदलते सामाजिक परिवेश में समाज के हर वर्ग के लोगों में हताशा के भाव देखने को मिल रहे हैं. हताशा व अवसाद का यही भाव व्यक्ति को आत्महत्या करने पर मजबूर करता है. दरअसल, पारिवारिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने का एक आखिरी तरीका आत्महत्या के रूप में निकल आया है.

लोगों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार और विश्वास में कमी आने के कारण हमें अपनी मानसिक या शारीरिक समस्याओं को दूसरे के समक्ष रखने में झिझक होने लगती है. परिणामस्वरूप मन में कुंठा के भाव जागते हैं और फिर इंसान आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठा लेते हैं. अब इस नए कानून से कितना बदलाव आएगा, कहना मुश्किल है.

कस्टमर : प्रिया का दिमाग न जाने क्या सोचने लगा था

पूर्व कथा

प्रिया के पति ध्रुव की ज्वैलरी शाप थी. ध्रुव के मोबाइल पर कुछ दिन से रोज सुबह 9 बजे एक महिला का फोन आता है. रोजाना फोन आने से प्रिया कुछ परेशान हो जाती है.

एक दिन जब वह ध्रुव के साथ ज्वैलरी शाप में थी तभी उन के घर के नजदीक रहने वाली रीतिका वहां आती है. उस की आवाज सुन कर प्रिया जान जाती है कि यह वही ध्रुव के मोबाइल पर फोन करने वाली औरत है. वह ध्रुव से सहज ढंग में अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में बातें कर रही थी और ध्रुव भी कस्टमर की हैसियत से उस से अच्छी तरह बात कर रहा था. प्रिया को रीतिका से जलन महसूस होती है.

थोड़े दिन बाद रीतिका की नौकरानी उस के कुछ गहने ठीक करने के लिए घर पर देने के लिए आती है. ध्रुव छत पर था सो प्रिया गहने ले लेती है. दूसरे दिन रीतिका मोबाइल पर फोन कर ध्रुव से गहनों के बारे में पूछती है. प्रिया मन ही मन कुढ़ती है कि रीतिका दुकान के बजाय घर पर क्यों फोन करती रहती है.

अब आगे…

मन में मची खलबली को दबाए शिष्टाचार का लबादा ओढे़ मैं अनमनी सी गेट खोलने बाहर आई और अनजाने ही मेरे मुंह से निकला, ‘‘वेलकम, रीतिका. कैसी हैं आप?’’

‘‘वेरीवेरी गुडमार्निंग,’’ कहते हुए रीतिका ने बडे़ स्नेह से मेरे अभिवादन का जवाब दिया, पर मैं ही जानती थी कि यह मेरी कैसी सुबह है. मैं उस के मुखौटे लगे चेहरे के पीछे के चेहरे को अच्छे से देख रही थी पर कुछ कर नहीं पा रही थी. वह हमारी ‘कस्टमर’ जो ठहरी. मन की बात न चाहते हुए भी कई बार जबान पर आ ही जाती है. अपने को लाख संभालने की कोशिश करते हुए भी मैं रीतिका से पूछ ही बैठी, ‘‘सुबह बड़ी जल्दी फ्री हो जाती हैं?’’

‘‘हां, उठती जल्दी हूं न, फिर हमारी काम वाली बाई लोग भी बड़ी कापरेटिव हैं, स्पेशली गिरजा, शी इज रियली वेरी कापरेटिव और आप? बिजी रोज ही की तरह हैं?’’ मैं समझ नहीं पा रही थी कि बिजी कह कर रीतिका मुझे चांटा मार रही है या फिर मेरी तारीफ कर रही है. पर इतना सच था कि उसे मालूम था कि सुबह धु्रव के दुकान जाने से पहले अकसर मैं व्यस्त रहती हूं. तब तक धु्रव उस की ज्वैलरी का सामान ले कर आ गए.

धु्रव के आते ही मैं किचन में चली गई, वैसे भी सुबह के समय किसी के पास वक्त ही कहां रहता है फिर आज तो बर्तन वाली नौकरानी भी नहीं आई थी. उन के लिए पानी का गिलास ले कर जो मैं ड्राइंगरूम में पहुंची, तो दोनों को गुटरगूं करते पाया. कितने खुश थे धु्रव उस समय. अगली दफा जब चाय ले कर पहुंची तब भी मुसकरा कर बातें हो रही थीं. काम का दबाव या कहूं मन का अविश्वास था जो रीतिका के जाते ही मैं फट गई, ‘‘धु्रव यह और अब मुझ से झेली नहीं जाती… ठिगन्नी कहीं की.’’

मेरे मनोभावों की गंभीरता से अनजान यह भी छेड़ते हुए बोले, ‘‘उस के ठिगनेपन से तुम्हें क्या? देखो, कस्टमर है कस्टमर. मुझ से एक पैसा कम नहीं कराती. सुबहसुबह 10 हजार का फायदा करवा गई और क्या चाहिए?’’ यह कहते हुए धु्रव ने 10 हजार की गड्डी मेरे हाथों में रख दी. वाकई रुपए में बड़ी गरमी होती है, तभी तो मैं क्राकरी साफ करते, ठंड से कंपकंपाती शांत हो गई. उस दिन मैं सोच रही थी कि बेचारे धु्रव सीधे घर से दुकान और दुकान से घर आते हैं. मेरे दुकान पर बैठने पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं फिर उन के लिए मुझे इस तरह से नहीं सोचना चाहिए. माना कि उस औरत के मन में धु्रव को ले कर कोई भाव हो भी तो रहे, क्या कर लेगी हमारा? आएगी, जाएगी खर्च करेगी और चली जाएगी. पर हमारा घर तो अच्छे से चलता रहेगा, अधिक शक करने से घर बरबाद ही होता है.

मन तो आखिर मन ही था, कब तक शांत रहता? अब तो आएदिन कभी सामान लेने, तो कभी देने, तो कभी रिपेयरिंग तो कभी रिश्तेदारों तथा सहेलियों के कामों को ले कर रीतिका का हमारे घर पर आनाजाना हो गया. गाहेबगाहे वह मुझे भी अपने घर आने को कह जाती. भले ही यह उस की व्यवहार- कुशलता हो, पर मुझे लगता कि यह सब भूमिका वह हमारे घर में घुसने के लिए बना रही है.

अगली दफा वह हमारे घर लगभग 10 दिन बाद आई. उस दिन धु्रव मार्निंग वाक पर गए थे. वह हमारे घर से माणिक की अंगूठी उठाने आई थी. धु्रव का इंतजार करने के बहाने वह बैठ गई. मन में मची खलबली को दबाते हुए मैं ने उस से उस के घरपरिवार तथा नौकरचाकरों के बारे में पूछ डाला. बातोंबातों में मुझे पता चला कि वह दिल्ली के एक प्रसिद्ध रेस्तरां गु्रप के मालिक की बेटी है. उस के मायके के लोग पढे़लिखे और मिलनसार हैं. जहां तक पैसे का सवाल है तो आज तक उस ने कभी पैसों की कमी नहीं जानी पर 2 जवान होती लड़कियों के चलते घर में ड्राइवर रखने से डरती है. बात को आगे बढ़ाते हुए रीतिका बोली, ‘‘आप लोगों को बहुतबहुत थैंक्स जो मेरा सारा काम यहीं घर बैठे हो जाता है वरना जराजरा से कामों के लिए मेन मार्केट में जाना बड़ा अनसेफ होता है.’’

मैं ने बात की सचाई की तह तक जाने की गरज से अपनी भावनाओं को संभालते हुए कहा, ‘‘और भैया?’’ मेरे इस प्रश्न को सुनते हुए भी न सुनने का बहाना कर, वह इधरउधर देखने लगी. उस का यह व्यवहार मेरे लिए कुछ संदिग्ध सा था पर यह सोच कर मैं शांत थी कि यह तो केवल कस्टमर है, हमें इस से क्या? शायद धु्रव का व्यवहार उस की ईमानदारी और सहयोगात्मक रवैया इस को पसंद आया होगा इसलिए सुविधा के कारण यह अकसर हमारे घर आया करती है.

उस दिन भी वह बड़ी रोमांटिक ड्रेस में थी. मन ही मन मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था पर अपने को शांत करते हुए मैं ने धु्रव के अभी तक न आने की बात कर कहा, ‘‘कोई खास काम है? पता नहीं वह कब आएं, चाहो तो मुझे बता दो.’’ ‘‘नहीं, ऐसा कोई खास काम नहीं है. कल ऋदिमा को भेज दूंगी. असल में माणिक की अंगूठी बनवाई है. कल रविवार को पहननी है. गाड़ी से जाना हैवी ट्रैफिक के कारण बड़ा मुश्किल हो जाता है.’’

तभी धु्रव भी टहल कर आ गए. दबी जबान से मुझे सेब का जूस लाने को कह कर कस्टमर अटैंड करने लगे जबकि मैं चुपचाप उन की बातें सुनने का प्रयास करती रही. आज वह नए जड़ाऊ सेट का आर्डर दे रही थी, फिर दोबारा घर में घुसने का षड्यंत्र? समझ में नहीं आ रहा था कि गुस्सा करूं या शांत रहूं? चली आती है मरी हमारी हरीभरी बगिया में आग लगाने. जाने इस के आने से हमारा घर आबाद होगा या फिर बरबाद? पर ऐसे भी यह चली न आती होगी? जरूर धु्रव ही इसे घर पर बुलाते होंगे. जूस लाते समय जैसे ही मैं ड्राइंगरूम में घुसी, उसे पति को थैंक्स कहते पाया. उस के हाथपैर कुछ खास अंदाज में हिल रहे थे, मन ही मन मुझे उस पर बड़ी कोफ्त हो रही थी कि देखो, लोग कैसे सज्जनता का मुखौटा लगाए दूसरों को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. कहीं यह मीठी छुरी न हो? पर यह नहीं मालूम कि दूसरों को बेवकूफ बनाने वाला खुद सब से बड़ा बेवकूफ होता है.

तभी, अरे, यह क्या इस की चुन्नी का पल्ला भी गिर गया, अगर अनजाने गिरा था तो मुझे देखते ही उठ कैसे गया? नहीं, इस तरह काम नहीं चलेगा, अब मुझ से और नहीं घुटा जाता, शायद उस दिन उमाकांतजी ठीक कह रहे थे, ‘विश्वास धोखा है.’ आज तक मैं इसी विश्वास के धोखे में रही पर अब ध्रुव से खुल कर बात करनी ही पडे़गी. उस के जाते ही तेजी से, नागिन की तरह फुफकार मारती, मैं ध्र्रुव से बोली, ‘‘हटाओ, यह सब कस्टमर, कस्टमर. नहीं चाहिए ऐसा कस्टमर, हमारा घर है या कि किसी की खाला का घर? चली आती है रोजरोज, अपने आदमी के पास बैठने से जी नहीं भरा जो यहां चली आती है.’’

धु्रव ने समझाने के लहजे में कहा, ‘‘देखो, यह एक पैसे वाले घर की बहू है, सोसायटी में बडे़बडे़ लोगों के बीच इस का उठनाबैठना है. आज छोटेमोटे कामों में यदि हम इसे सहयोग देंगे, तो कल जाने कौन सा बड़ा आर्डर हमें मिल जाए, फिर दोनों लड़कियों की शादी के लिए भी तो अभी जेवर खरीदेगी?’’ यह कह कर उन्होंने मुझे अपनी दूरदृष्टि का परिचय दिया, पर अशांत मन कुछ भी सुनने को तैयार न था. मैं ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मरी, कभी अपने आदमी के साथ भी यहां आई है? कितना जेवर पहनेगी?’’ ‘‘हमें इस से क्या, हमारी तो मार्केट की चुकता हो रही है. तुम तो जानती हो उस का आदमी पूरा सनकी है.’’

नाराज होते हुए, कुछ आश्चर्य तथा जिज्ञासा से उन की ओर देखते हुए मैं बोली, ‘‘और क्या? सनकी ही तो है, दोस्तयार सब उसे ‘जीतू घाट वाला’ कहते हैं, किसी की बीमारी में कभी न जाएगा पर मरे आदमी को फूंकने घाट पर सब से पहले जाएगा, अजीब पागल आदमी है? सारे दिन गधे के जैसे काम करता है, फुर्सत है उसे एक पल की?’’

धु्रव ने संयत हो कर कहा, ‘‘तो क्या मेरे घर फुर्सत मनाने आएगी?’’ गुस्से में मैं वह सब कह गई जो आज तक मेरे मन को कचोट रहा था. आज मेरे मन का हर भाव गुबार बन कर बाहर निकल जाना चाहता था. धु्रव भी शायद अपनी सहृदयता के वशीभूत हो मेरी मनोदशा को समझते हुए, बिना एक भी शब्द कहे घर से दुकान चले गए, कहने को तो आवेश में आ कर मैं धु्रव से न जाने क्याक्या कह गई, पर अगले ही पल, मुझे वे सभी घटनाएं याद आ गईं जब मैं रीतिका के कई बार बुलाने पर अचानक उस के घर पहुंच गई थी.

घंटी बजते ही एक व्यक्ति बाहर निकला. मैं ने अपना परिचय देते हुए रीतिका से मिलने की इच्छा जाहिर की. बिना कुछ कहे वह अंदर चला गया, तभी एक नौकरानी ट्रे में पानी का गिलास ले कर आई, उस ने मुझे पास पडे़ सोफे पर बैठने को कहा. पर यह क्या, उस के कहने से पहले तो मैं लगभग सोफे पर बैठ ही गई थी. मन में आया कि बड़ा अजीब आदमी है? क्या इसे मेरा यहां आना अच्छा नहीं लगा? पर यह तो मुझे जानता भी नहीं है? या फिर यह नीरस इनसान है? गूंगा तो वह हो नहीं सकता था क्योंकि कमरे के अंदर से उस की किसी को डांटने की जोरजोर की आवाजें आ रही थीं. घर का अजीब सा माहौल था. आधुनिक सुखसुविधाओं, झाड़फानूस और आधुनिक किचन व फर्नीचर्स से सजे उस मकान में मुझे अजीब सी मनहूसियत दिखाई दे रही थी. पूछने पर उस की नौकरानी ने बताया कि भाभी बगल वाले फ्लैट में अपनी बीमार सास को देखने गई हैं. मैं ने खबर कर दी है, आती ही होंगी. इस बीच वह व्यक्ति सूटटाई लगा कर, बिना कुछ कहे, तेज कदम बढ़ाता, बाहर चला गया.

शायद, यही इस का पति ‘घाट वाला’ होगा? कैसा विचित्र आदमी है? कैसे रहती होगी रीतिका इस के साथ? अनायास ही रीतिका के लिए मेरे मन में दर्द की एक छोटी सी लहर उठ गई. तभी सामने से मुझे डस्टिंग करती हुई गिरजा आती दिखाई दी. डांट खाने के मारे, उस की जबान तो जैसे बहुत कुछ कहने को बेचैन हो रही थी. सो एक ही सांस में वह बोले जा रही थी, ‘‘आग लगे मरी जबान को…बड़ा ‘चोर’ आदमी है यह. अभी परसों ही तो ‘श्रीचंद्र जनरल स्टोर्स’ में इंपोर्टेड सेंट की शीशी चोरी करते पकड़ा गया. बताओ क्या इज्जत रह गई होगी बापदादाओं की? हम चोरी करें तो चोर कहलाएं और बड़ा आदमी करे तो ‘मेनिया’. कैसा बेवकूफ बनाते हैं ये बड़े लोग. यह तो रीतिका भाभी के मारे बने हैं. लेनेदेने में हाथ अच्छा है, काम भी कोई खास नहीं और बोलती भी कायदे से हैं, नहीं तो इस सरफोडू के मारे कोई 2 मिनट न रुके.’’

मुझे उसी दिन अपनी बातों का जबाव मिल गया था. मैं विस्मृत नजरों से उसे देख रही थी. उस समय मुझे खुद पर गर्व और दूसरी तरफ रीतिका पर तरस आ रहा था. तभी रीतिका भी मुझ से मिलने आ गई थी. मेरे आने पर खुशी जाहिर करते हुए जिस तरह वह मेरे स्वागत में लगी थी, सही अर्थों में मुझे वह एक व्यवहारकुशल, सुघड़ गृहिणी लग रही थी. माहौल को समझते हुए वह बोली, ‘‘योर हसबैंड हैस गौन टू शाप? ही इज वेरी सोफेस्टीकेटेड एंड हानेस्ट मैन.’’

प्रिया, तुम कितनी लकी हो, जो तुम्हें ऐसा पति मिला. विजयी के समान कंधे सीधे किए मैं उस दिन झूठे से भी रीतिका के पति की तारीफ नहीं कर पा रही थी, पर उस दिन मैं ने रीतिका की आंखों का सूनापन पढ़ लिया था. कभीकभी अधिक सहृदयता किसी और सहृदयी के मन को किस तरह न चाहते हुए भी छलनी कर देती है, यह बात उस दिन मैं ने जानी.

फिर भी न जाने मुझे क्या होता चला जा रहा था. मैं अपनी ही बनाई दुनिया में, दूर कहीं अंधेरी सुरंग में खड़ी खुद को महसूस कर रही थी और जहां खुद को अकेला पा कर घबराने लगी थी. मेरी दशा उस निरीह पक्षी की तरह हो गई थी, जिस के सारे पंख ही कतर दिए गए हों.

मुझे इस तरह उदास देख ध्रुव ने कारण जानना चाहा. शायद उस का अबोध मन किसी भी शंकाओं से परे होने के कारण? पर मैं आज ऐसी कोई भी बात धु्रव से नहीं करना चाहती थी, मुझे डर था कि यदि यह बात मिथ्या साबित हुई तो ध्रुव का मन कितना आहत होगा? शायद मैं तुम्हें कुछ अधिक ही चाहने लगी थी. धु्रव के दूसरी बार पूछने पर सिरदर्द का बहाना बना गई, पर मैं उदास थी, मन ने, न जाने अब तक कितने चक्रव्यूह रच डाले थे.

एक दिन जब धु्रव ने फिर से मेरी उदासी का कारण जानना चाहा तो मैं ने खाना बनाने वाली दिन भर की बाई रखने का प्रस्ताव रखा. मैं बोली, ‘‘धु्रव, घर में अब फुटकर काम वालों से काम नहीं चलता. मैं ने एक औरत से बात की है, वह गिरजा के गांव से आई उस की विधवा ननद है. औरत भरोसेमंद लगती है. मुझे लगता है कि वह हमारा घर अच्छे से संभाल लेगी. अब बच्चे भी बड़े हो गए हैं, मैं तुम्हारे साथ व्यापार संभालना चाहती हूं.’’ ‘‘हां, क्यों नहीं, यही तो मैं भी सोच रहा था… पर तुम्हारी व्यस्तता के कारण कह नहीं पाता था. क्यों न अब से तुम घर ही रह कर कुछ कस्टमर अटैंड कर लिया करो. इस तरह मैं दुकान बेहतर तरीके से चला सकूंगा. आशा है कि तुम्हें मेरा यह प्रस्ताव पसंद आएगा. मैं कस्टमर से कह दूंगा कि वे अब से सीधे तुम्हीं से बात करें.’’

काश, हम मिले न होते

काश, हमतुम न कभी

यों कहीं मिले होते

चाहतों के फिर नहीं

ऐसे सिलसिले होते.

तुम्हें चाह कर भी

न जतलाने की खता मेरी

अपनी तकदीर से

शिकवे न कुछ गिले होते.

चश्मेनम दर्देजिगर

पाते नहीं रातों में

सपने आंखों में मेरी

उन के न पले होते.

ख्वाहिशों की मजारें

बनती नहीं सीने में

बेकसी के चिराग

उन पे न जले होते.

राहों पर तनहा

गुजरने की जो आदत होती

दिल से दिल मिलने के

हादसे टले होते.

जिंदगी कट रही थी

चैनोअमन से अपनी

सर्द आहों के कुसुम

फिर क्यों जलजले होते.

घरों में औरतों को सही स्थान कब मिलेगा

लड़कियों की शिक्षा में मातापिता की सोच तो आड़े आती ही है, इस के साथ बड़ी समस्या है लड़कियों की होने वाली छेड़छाड़. बड़ी हो चली लड़कियों के साथ भद्दे मजाक करना, उन्हें गलत ढंग से छूना, उन की मौजूदगी में आपस में लड़कों का सैक्सी पौर्न देखना, पर्चियों पर प्रेम इजहार करना है तो पुरानी बात पर हर बड़ी होती लड़की के लिए यह चुनौती होता है.

लड़कियों को यह छेड़खानी आमतौर पर हंसने तक पर पाबंदी लगा देती हैं. गंभीरता का दुपट्टा ओढ़े रखना इन के लिए एक जरूरत बन जाती है. हंसे और फंसे की परंपरा में किसी भी छेड़खानी या चुटकुले की प्रतिक्रिया का न्यौता समझा जाता है. जो लड़कियां बोल्ड होते हैं, हर तरह की छेड़खानी का बराबर का जवाब देती हैं उन्हें होशियार नहीं माना जाता, चालू माना जाता है और उन्हें पटाने में लड़कों को कोई रुचि नहीं रहती.

लड़कों के साथ न पढ़ने या रहने देने की अपनी मुसीबतें होती हैं. जो सिर्फ लड़कियों के स्कूलों व कालेजों में पढ़ती हैं वे बहुत खुश नहीं रह पातीं और एक तरह से लड़कियों ने  स्कूल जेल से हो जाते हैं. जब बाहर जो भी लड़के मिलते हैं उन्हें लपक लिया जाता है क्योंकि चुनने का अवसर ही नहीं मिलता.

बनठन कर मनचाहा और थोड़ा बोल्ड व सैक्सी पहनने की चाह बहुत लड़कियों में होती है पर छेड़छाड़ का भय उन्हें अपनी खूबियों को दिखाने से रोकता है. इसलिए लड़कियां रेव पार्टियों को ढूंढ़ती हैं जहां चुने हुए लड़के हों जो चाहे अति करते हों पर छोटे स्तर के हैं और उन्हें किसी न किसी ने बुलाया होता है. रेव पार्टियों में लड़के अति करते भी हों तो सड़कछाप छेड़छाड़ नहीं कर पाते क्योंकि पार्टी के आयोजक को गुस्से डर होता है.

पिछड़ी व दलित जातियों की लड़कियां भारी गिनती में अब पढ़ने आ रही हैं और उन का प्रदर्शन अब तथाकथित सवर्णों से अच्छा है. ये लड़कियां पहली पीढ़ी की लढ़ीलिखी हैं और घरों में गरीबी के बावजूद जोखिम ले रही हैं. घर का घुटन भरा माहौल और बाहर छेड़छाड़ की बंदिशें लड़कियों को बेहद परेशान कर देती हैं. यह वैसे अच्छा भी है क्योंकि लड़कियां अब इसी वजह ज्यादा अच्छे नंबर लाने लगी हैं और नौकरियों के नए अवसर उन्हें ही मिल रहे हैं और छेड़छाड़ करने वाले लड़के अब दरदर भटक रहे हैं.

छेड़छाड़ वैसे हर समाज में, हर देश में हो रही है और इस का कोई सरल उपाय नहीं क्योंकि यह थोड़ी प्राकृतिक है. इस पर अगर कोई अंकुश लगा सकता है तो केवल घरों का माहौल. घरों में यदि लड़कियों को सही आदर मिले और बराबरी से रखा जाए तो बाहर ऐसे घरों के लड़के अपने आप सीमा में रहेंगे. जिन घरों में लड़कियों को पैर की जूती समझा जाता है वहीं के लड़के बाहर निकल कर छेड़ने को मर्दानगी मानते हैं. घरों में औरतों को सही स्थान कब मिलेगा यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि फिलहाल कई दशकों से कुछ हुआ नहीं है. 1950-70 के बीच बहुत बदलाव आया पर अब थम गया है.

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