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ऐक्सरसाइज के अनुसार ऐसे करें सही ब्रा का चुनाव

महिलाएं जूतेचप्पलों और कपड़ों पर तो काफी खर्च करती हैं, मगर लौंजरी पर ज्यादा ध्यान नहीं देती हैं, जिस से कई बार उन्हें परेशानी का भी सामना करना पड़ता है. सही लौंजरी पहननी बहुत जरूरी है ताकि आप फिट रहें.

इस बारे में जीएनसी फिटनैस ऐक्सपर्ट निशरिन पारीख कहती हैं, ‘‘वर्कआउट के समय सही लौंजरी के न होने पर बैक पेन हो सकता है, क्योंकि लगातार वर्कआउट से ब्रैस्ट टिशू खराब होने लगते हैं जिस से उन में लचीलापन आ जाता है. शरीर के लिए सपोर्ट सिस्टम का सही होना बहुत ही जरूरी होता है.’’

चुनें सही ब्रा

लड़कियों से ले कर उम्रदराज महिलाओं तक सभी को अपनी ब्रैस्ट के साइज के हिसाब से सही ब्रा पहननी चाहिए, क्योंकि वर्कआउट का असर पूरे बदन पर पड़ता है. वर्कआउट कई प्रकार के होते हैं जिन में से रनिंग, ऐरोबिक, जुंबा आदि का बदन पर ज्यादा असर रहता है. आजकल हर तरह की ब्रा मार्केट में आराम से मिल जाती है.

– वर्कआउट के लिए सूती की जगह लाइक्रा ब्रा पहनें.

– अगर आप मैडिटेशन करती हैं तो लाइट सपोर्ट वाली ब्रा पहने, क्योंकि इस में ज्यादा मूवमैंट नहीं होता.

– वाक करती हैं तो मीडियम सपोर्ट वाली ब्रा पहनें.

– अगर स्ट्रौंग वर्कआउट करती हैं तो फुल सपोर्ट वाली ब्रा पहनें.

वर्कआउट के समय स्पोर्ट्स ब्रा पहनना सब से अच्छा रहता है. यह ब्रैस्ट शेप को बनाए रखती है. बहुत अधिक मूवमैंट से ब्रैस्ट के चारों ओर के लिगामैंट खिंच जाते हैं. इस से ब्रैस्ट लटक सकती है. इस स्थिति को सही स्पोर्ट्स ब्रा पहन कर ही रोक सकती हैं.

आप की जरूरत के हिसाब से अलगअलग तरह की ब्रा बाजार में उपलब्ध है जैसे:

योगा ब्रा: यह ब्रा पिलेट्स और मैडिटेशन के लिए सब से अच्छी है. यह सौफ्ट मैटीरियल से बनी होती है. टी शेप की इस ब्रा को पहनना बहुत आरामदायक रहता है.

हाइपर क्लासिक पैडेड स्पोर्ट्स ब्रा: यह आरामदायक ब्रा है, जिस के पैड को भी आप जरूरत के अनुसार निकाल सकती हैं. यह ब्रा कसरत के समय पूरी ब्रैस्ट को फिट रखती है. कार्डियो के समय इसे पहनना अच्छा रहता है.

रेपअप ब्रा: यह ब्रा भी कसरत और पिलेट्स के लिए पहनी जा सकती है. हाईनैक लाइन और डबल लेयर के कपड़े से बनी यह क्रौप टौप ब्रा ब्रैस्ट को पूरी तरह कवर करती है. भले आप की ब्र्रैस्ट कितनी भी बड़ी हो, यह पूरा आराम देती है.

हाइपर स्ट्राइप डबल डेयर ब्रा: यह सुपर सौफ्ट सीमलेस, लाइट वेट और पसीने को सोखने वाली ब्रा है. दोनों तरफ से की होल जैसी बनी होने की वजह से इस में वर्कआउट के समय सांस लेना आसान होता है. इस ब्रा को पहन कर जौगिंग कर सकती हैं.

टेक लेयर ब्रा टौप: स्मूद और फ्लैटरिंग फिट वाली यह ब्रा लो टू मीडियम वर्कआउट के लिए सही होती है. यह भी पसीने को सोख कर बदन को ठंडा रखती है.

रेसर स्पोर्ट्स ब्रा: इसे पहन कर रनिंग कर सकती हैं. इस की सौफ्ट पट्टी और मैटीरियल इतना हलका होता है कि इसे पहनने के 2 मिनट बाद इस के होने का एहसास तक नहीं होता.

अंडरआर्मर इक्लिप्स स्पोर्ट्स ब्रा: यह ब्रा कार्डियो और स्ट्रौंग वर्कआउट के लिए सब से फायदेमंद होती है. स्लिक, स्किन फिट और मीडियम इंपैक्ट ब्रा ब्रैस्ट को पूरी तरह होल्ड करती है. किसी भी प्रकार के मूवमैंट में यह ब्रा मददगार साबित होती है.

न्यू बैलेंस कौंफी कौन्फौर्मर ब्रा: यह ब्रैस्ट को हाई कवरेज देती है और इसे पहनने पर किसी भी स्ट्रौंग मूवमैंट का पता नहीं चलता. इसे जीरो बाउंस वाली ब्रा भी कह सकती हैं. स्किन फिट इस ब्रा को पहन कर महिलाएं किसी भी तरह का वर्कआउट आसानी से कर सकती हैं.

ईवनिंग गाउन के साथ कुछ इस तरह करें मैचिंग मेकअप

वैस्टर्न थीम पार्टी में जाने के लिए आप ने ड्रैस तो सीजन व पार्टी के हिसाब से परफैक्ट खरीदी, लेकिन क्या आप ने मेकअप व हेयरस्टाइल पर ध्यान दिया, क्योंकि भले ही आप की ड्रैस कितनी भी खूबसूरत हो, लेकिन पहली नजर चेहरे पर और उस के बाद हेयरस्टाइल पर ही जाती है. ऐसे में अगर आप पार्टी में हिट दिखना चाहती हैं, तो दिल्ली प्रैस में आयोजित फेब वर्कशौप में आईं मेकअप ऐंड हेयर स्किन स्पैशलिस्ट व एजुकेटर पूनम चुग के इन उपयोगी टिप्स पर गौर फरमाना न भूलें:

वैस्टर्न मेकअप

भले ही स्किन कितनी भी पिंपल्स वाली या फिर अनईवन टोन वाली हो, उस पर भी अगर परफैक्टली मेकअप किया जाए तो काफी अच्छा लुक उभर कर आता है. इस के लिए सब से पहले फेस पर प्राइमर अप्लाई करना जरूरी है. यह मेकअप बेस होता है, जिसे लगाने के 4-5 मिनट बाद वैट टिशू से स्किन को साफ करें. फिर कंसीलिंग करें, क्योंकि इस की मदद से जो दागधब्बे व अनईवन टोन होती है उसे एक टोन करने में मदद मिलती है.

कंसीलर के तुरंत बाद यलो पिगमैंट यूज करें और फिर पिंपल्स पर ग्रीन कलर का कंसीलर अप्लाई करें. अगर स्किन प्रौब्लमैटिक है, तो डर्मा बेस यूज करें. इस के बाद फिक्सर लगाएं ताकि मेकअप अच्छी तरह फिक्स हो जाए. फिर जौ लाइन, नाक, चीक्स पर कंट्रोलिंग करने के लिए मिग्रो कलर यूज करें. इस के बाद पीच कलर का ब्लशर इस्तेमाल करें. ध्यान रखें कि जब भी कंट्रोलिंग करते हैं तो डार्क कलर का ब्लशर मैरून कलर में बदल जाता है, इसलिए कंट्रोलिंग के साथ पीच या पिंक कलर ही यूज करें.

आईब्रोज मेकअप

आईब्रोज को नैचुरल तरीके से डिफाइन करें और फिर उन के नीचे हाईलाइटिंग करें. ब्राउन कलर से क्रीज लाइन बनाएं. ध्यान रखें कि आईबौल एरिया या ड्रैस से मिलताजुलता कलर ही यूज करें. फिर 1-2 मिनट रुक कर जैल लाइनर अप्लाई करने के साथसाथ आर्टिफिशियल आईलैशेज यूज करें.

आईलैशेज लगाने से पहले ग्लू लगा कर उसे 40 सैकंड्स लगा रहने दें. ऐसा करने से लैशेज बहुत जल्दी फिक्स हो जाती हैं. फिर लैशेज लगाने के बाद नैचुरल व आर्टिफिशियल लैशेज मसकारा ब्रश से फिक्स करें. इस बात का ध्यान रखें कि अगर नैचुरल लैशेज पहले से ही घनी हैं, तो उन्हें मसकारा से ही ग्रूम करें.

करें चेहरा हाईलाइट

चेहरे के जिन हिस्सों को उठाना होता है उन  के लिए हाईलाइटर यूज करना होता है और इंडियन स्किन के हिसाब से व्हाइट ग्लो कलर अच्छा रहता है. इसे आमतौर पर चीकबोंस, नोज टिट, फोरहैड व थोड़ा सा चिन एरिया पर यूज करते हैं.

अगर वैस्टर्न मेकअप के हिसाब से आंखें ज्यादा उभारी गई हैं, तो लिप्स न्यूड ही रखें यानी लाइट ग्लौस अप्लाई करें. आखिर में फेस पर मेकअप फिक्सर लगाएं. यह मेकअप को 15-20 घंटे तक फिक्स रखता है.

अच्छे मेकअप के लिए अच्छी स्किन होनी चाहिए और अच्छी स्किन के लिए अच्छी डाइट, अच्छा लाइफस्टाइल, पौजिटिव सोच, खूब सारा पानी पीना और नैचुरल चीजें लेते रहना जरूरी होता है.

हेयरस्टाइल

अब बारी आती है हेयरस्टाइल की और जब हम वैस्टर्न मेकअप करते हैं, तो बालों को क्रिंप किया जाता है, क्योंकि क्रिंप करने से बाल मैनेजेबल हो जाते हैं और ऐसे बालों पर कोई भी हेयरस्टाइलिंग की जा सकती है. अच्छी हेयरस्टाइलिंग के लिए बालों का साफ होना बहुत जरूरी है. अगर बालों में शैंपू के साथ कंडीशनिंग की है, तो बालों में गांठें नहीं पड़ती हैं.

हेयरस्टाइल बनाते हुए हमेशा फीचर्स को ध्यान में रखना जरूरी है. लंबे चेहरे पर पफ नहीं बनाना चाहिए, छोटी गरदन पर लो बन नहीं और हैवी फेस पर कर्ली बाल नहीं. इसी तरह पतले चेहरे पर स्ट्रेट बाल नहीं रखते. हमेशा हेयरस्टाइल करते हुए उम्र और अवसर का ध्यान रखना चाहिए.

जिस हेयरस्टाइल की हम बात कर रहे हैं वह वैस्टर्न हेयरस्टाइल है, जिस के लिए पहले इयर टू इयर पार्टिंग करें और फिर सैंटर के बालों में पोनी. पोनी के ऊपर डोनट फिक्स करें और बचे सारे बालों में कर्ल्स बनाएं. इस के बाद बालों के छोटेछोटे सैक्शन ले कर रूट के पास बैक कौंबिंग कर के रोल बनाएं. बालों को एस और सी शेप में डिजाइन करें यानी चेहरे के हिसाब से सैट करें.

यह हेयरस्टाइल ईवनिंग गाउन और वैस्टर्न ड्रैसेज पर बहुत खूबसूरत लगता है.

फादर्स डे : एक घटना ने खड़ी कर दी वरुण और मेरे बीच खामोश दीवार

मुझे रात को जल्दी सोने की आदत है. बेटेबहू की तरह मैं देररात तक जागना पसंद नहीं करता. शाम का खाना जल्दी खा कर थोड़ी देर टहलने जाना और फिर गहरी नींद का मजा लेने के लिए बिस्तर पर लेट जाना मेरी रोज की दिनचर्या है. इस में मैं थोड़ा सा भी बदलाव नहीं करता.

उस दिन भी मैं अपनी इसी दिनचर्या के अनुसार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. किंतु जाने क्या हुआ मुझे नींद ही नहीं आ रही थी. बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते जब मैं उकता गया तो सोचा क्यों न कुछ देर पोतापोती के साथ खेल कर मन बहला लूं.

मैं जब पोतापोती के कमरे में पहुंचा तो देखा वे लोग कुछ काम कर रहे थे. पहले तो मुझे लगा कि शायद वे पढ़ाई कर रहे हैं और उन की पढ़ाई में खलल डालना उचित नहीं होगा, मगर फिर ध्यान से देखने पर पता चला कि वे दोनों तो चित्रकारी कर रहे थे. मैं उन के पीछे जा कर खड़ा हो गया और उन की चित्रकारी देखने लगा. जल्द ही उन दोनों को एहसास हो गया कि मैं उन के पीछे खड़ा हूं. उन्होंने आश्चर्य से मेरी तरफ कुछ ऐसे देखा मानो पूछ रहे हों, ‘आप इस समय यहां क्या कर रहे हैं?’

‘‘क्या कर रहे हो बच्चो, किस का चित्र बना रहे हो, जरा मुझे भी तो दिखाओ.’’

आंखों ही आंखों में दोनों में कुछ इशारेबाजी हुई और फिर दोनों लगभग एकसाथ बोले, ‘‘कुछ खास नहीं दादाजी, हमें स्कूल में एक प्रोजैक्ट मिला है, वही कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा. लाओ मुझे दिखाओ, क्या प्रोजैक्ट मिला है. मैं मदद कर देता हूं.’’

‘‘नहींनहीं दादाजी, मुश्किल नहीं है, हम कर लेंगे. वैसे भी थोड़ा सा ही काम बचा है. आप अभी तक सोए नहीं, काफी देर हो गई है?’’ मेरी पोती ने पूछा.

‘‘मैं पानी पीने के लिए उठा था. तुम्हारे कमरे की लाइट जल रही थी, इसलिए तुम से मिलने आ गया.’’

‘‘मैं आप के लिए पानी लाती हूं,’’ पोती ने उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, रहने दो, मैं पानी पी चुका हूं.’’

‘‘मैं आप को कमरे तक छोड़ आऊं दादाजी.’’ मेरे पोते ने बड़ी मासूमियत से यह कहा तो मुझे उन दोनों पर बड़ा प्यार आया. मैं उन दोनों के सिर पर हाथ फेर कर अपने कमरे में चला आया. यों तो मेरे पोतापोती बड़े अच्छे बच्चे हैं, दोनों मेरा हमेशा ही आदर करते हैं और मेरी परवा भी, किंतु उन का आज का व्यवहार मेरे प्रति कतई सम्मानजनक नहीं था बल्कि वे दोनों मुझे जल्दी से जल्दी अपने कमरे से बाहर करना चाहते थे.

खैर, मैं वापस अपने कमरे में आ गया. हालांकि बच्चों ने तो छिपाने की पूरी कोशिश की थी पर मुझे पता चल ही गया कि वे दोनों क्या कर रहे थे. वे फादर्स डे के मौके पर अपने पापा के लिए कार्ड बना रहे थे और कहीं मैं उन के इस सरप्राइज के बारे में जान न जाऊं, इसीलिए उन्होंने जल्द से जल्द मुझे अपने कमरे से टालने की कोशिश की.

फादर्स डे पर न जाने क्यों मेरे कदम अपनेआप ही अपनी अलमारी की तरफ उठ गए. मैं ने अलमारी खोली और उस में से एक डब्बा निकाला. यह डब्बा टाई का था. मैं ने डब्बे में से टाई निकाली और उसे प्यार से सहला दिया. यह टाई मेरे बेटे वरुण ने तोहफे में दी थी. वह फादर्स डे के मौके पर इसे मेरे लिए अपनी पहली तनख्वाह से खरीद कर लाया था. हालांकि मुझे इसे कभी पहनने का मौका नहीं मिला, लेकिन यह मेरे दिल के बेहद करीब है. मैं ने इसे संभाल कर रखा है.

सुबह नाश्ते की मेज पर दोनों बच्चों ने अपने पापा को कार्ड भेंट किया. मेरा बेटा कार्ड देख कर अपने बच्चों पर निहाल हो गया. उस ने दोनों को अपनी गोद में बैठा लिया और उन्हें अपने हाथों से नाश्ता करवाने लगा. बच्चों द्वारा बनाया गया कार्ड देखने को मुझे भी मिला. उन के द्वारा बनाई गई अपने बेटे की कार्टून जैसी सूरत देख कर मेरे होंठों पर मुसकान आ गई जिसे मैं बहुत कोशिश कर के भी अपने बेटे से छिपा नहीं पाया.

‘‘बच्चों की कोशिश बहुत अच्छी थी. हमें उन का हौसला बढ़ाना चाहिए. प्यार से दिया गया  हर तोहफा अनमोल होता है, हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए. मगर कुछ लोग दूसरों की भावनाओं को समझते ही नहीं या तो तोहफा देने वाले को डांट देते हैं या उस का मजाक उड़ाने लगते हैं,’’ वरुण ने सख्त शब्दों में अपनी नाराजगी व्यक्त की.

उस की यह नाराजगी उस के बच्चों के कार्ड का मजाक उड़ाने के लिए नहीं थी, बल्कि उस की इस नाराजगी की असली वजह वह टाई थी जिसे खरीदने पर मैं ने उसे डांटा था. वह पुराना वाकेआ हम पितापुत्र के बीच आज भी मौजूद है. न उस वाकए को कभी मैं भुला पाया और न ही कभी वो. यह बात उस के दिल में ऐसी घर कर गईर् कि उस के बाद मेरा बेटा मुझ से दूर हो गया.

हालांकि कोई भी यह कह सकता है कि मुझ से तब बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं खुद भी कभी इस बात के लिए खुद को माफ नहीं कर सका. सफाई भी क्या दूं, जब यह हुआ उस समय मेरे हालात से वह बिलकुल अनजान तो नहीं था. एक तो उस समय मेरी आर्थिक स्थिति काफी नाजुक थी, उस पर पत्नी का स्वास्थ्य दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा था और वह हमारा साथ छोड़ने की तैयारी में थी. ऐसे में इन औपचारिकताओं के लिए जिंदगी में जगह ही कहां थी.

मैं कुछ कहता तो बात और बढ़ती, उस से पहले मेरी बहू सुमी हमेशा की तरह आगे आई, ‘‘अच्छा अब छोड़ो पुरानी बातें और जल्दी से नाश्ता खत्म करो. फिर बाजार भी जाना है. आज बच्चे अपने पापा के लिए दोपहर के खाने में कुछ खास बनाना चाहते हैं.’’ वह बातें करतेकरते सब के लिए नाश्ता भी परोसती जा रही थी. सब पनीरसैंडविच खा रहे थे जबकि मुझे उस ने दूध व कौर्नफ्लैक्स खाने को दिए. यह भेदभाव देख कर मुझे बुरा लगा.

वरुण ने बाजार जाने से मना कर दिया. उसे दफ्तर की कोई जरूरी फाइल देखनी थी. सुमी भी इतवार की सुबह काफी व्यस्त रहती है. सो, बाजार जाने की जिम्मेदारी मैं ने ले ली. सुमी ने सामान की सूची और झोले के साथ यह हिदायत भी दे डाली कि मैं अधिक दूर न जा कर पास की मार्केट से ही सामान ले आऊं.

सुमी की हिदायत के बावजूद मैं दूर सब्जी मंडी चला गया. शायद सुबह की खीझ मिटाने और रास्ते में अपने मित्र रामलाल हलवाई की दुकान तक पहुंच कर मेरा सब्र टूट गया और वहां मैं ने डट कर कचौरी व जलेबी का नाश्ता किया. नाश्ता करते समय मैं ने ‘फादर्स डे’ के मौके पर बड़े ही भावपूर्ण तरीके से अपने पिताजी को याद किया और बेटे के लिए उस की सलामती की कामना की.

‘‘बड़ी देर लगा दी पापाजी, कहां चले गए थे?’’ घर पहुंचते ही सुमी ने इस सवाल के साथ मेरा स्वागत किया.

‘‘मैं मंडी चला गया था. वहां सब्जी सस्ती और अच्छी मिलती है न.’’ अपनी इस समझदारी पर दाद मिलने की उम्मीद से मैं ने उस की ओर देखा पर उस ने मेरा दिल तोड़ दिया.

‘‘सब्जी लेने ही गए थे न या फिर कुछ और भी?’’ उस के इस आधेअधूरे सवाल का मतलब मैं बखूबी समझ गया था और जवाब में उसे घूर कर भी देखना चाहता था मगर चोरी पकड़ी जाने के डर से ऐसा कर न सका. थकान का बहाना बना कर मैं अपने कमरे में चला आया.

रसोई में हंगामा सा मचा हुआ था. बच्चे खाना बना रहे थे और उन के मातापिता उन की मदद कर रहे थे. पता नहीं खाना ही बना रहे थे या कोई खेल खेल रहे थे, मुझे समझ नहीं आया. अच्छा ही हुआ जो मैं बाहर से खा कर आ गया, पता नहीं घर में तो आज खाना बनेगा भी या नहीं.

मेज पर खाना लग चुका था. मेरा पोता मुझे बुलाने आया. मेरा पेट जरा भारी सा हो रहा था. इस समय भोजन करने का बिलकुल भी मन नहीं था. पर मना करने का तो सवाल ही नहीं उठता, कमजोरी मेरी ही थी. मैं मन ही मन अपनी मधुमेह आदि बीमारियों को कोसते हुए, जो मुझे अपने बच्चों से झूठ बोलने को मजबूर कर देती हैं, बाहर चला आया.

यों तो आज भी मेरे लिए लौकी की सब्जी और चपाती बनी थी पर शायद आज बच्चों को मुझ पर थोड़ा ज्यादा प्यार आ गया, इसलिए उन्होंने अपने खाने में से भी थोड़ा सा चखने के लिए दे दिया. खाना बेहद स्वादिष्ठ बना था, शायद इसलिए कि उस में बच्चों का प्यार भी मिला था, पर मजा नहीं आ रहा था. इस का कारण भी मैं जानता था.

‘‘क्या बात है पापाजी, आप खाना नहीं खा रहे? अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’ बहू ने मुझे प्लेट में चम्मच घुमाते देख पूछा. वह खोजी नजरों से मुझे देख रही थी. मुझे उस की इस अदा से बड़ा डर लगता है, लगता है मानो अंदर झांक कर सारे राज मालूम कर लेगी.

‘‘नहीं बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है. खाना बहुत अच्छा बना है,’’ मैं ने जल्दीजल्दी निवाले निगलते हुए कहा. उस समय मुझे अपनी पोल खुलने से अधिक फिक्र अपने बच्चों की भावनाओं की थी. मैं ने सब के साथ भरपेट भोजन किया और दिल खोल कर भोजन की तारीफ भी की.

शाम को बच्चों का बाहर जाने का प्लान था. जब वे लोग मुझ से इजाजत लेने आए तब मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था, लेकिन मैं ने उन्हें इस बाबत बताना ठीक नहीं समझा क्योंकि वे लोग अपना प्लान रद्द कर देते. मेरे पोतापोती मुझे बाय कर रहे थे और मैं किसी तरह अपने दर्द को दबाए हुए मुसकराने की कोशिश कर रहा था. सुमी अब भी मेरे लिए खाना बना कर गई थी. मुझे बड़ी खुशी हुई यह देख कर कि वह मेरी हर छोटीबड़ी जरूरत का हर तरह से ध्यान रखती है. मन तो किया कि उस के लिए ही सही, दो निवाले खा लूं, मगर मुझ से नहीं हुआ. हार कर मैं अपने बिस्तर पर पड़ गया.

मैं इतनी तकलीफ में था कि बच्चे कब घर वापस आए, मुझे पता ही नहीं चला. मुझे सोया जान उन्होंने मुझे नहीं जगाया. मैं रातभर दर्द से तड़पता रहा. सुबह खाई कचौरियां मेरे पेट में कुहराम मचाए हुए थीं. ऐसे में ठीक तो यही रहता कि मैं अपने बेटाबहू को जगा देता पर सब थके हुए थे और मुझे उस समय उन्हें परेशान करना ठीक नहीं लगा. मगर परेशान तो वे लोग फिर भी हो गए. मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें मेरी तकलीफ के बारे में पता चल गया. मेरे वाशरूम से बारबार आती फ्लश की आवाज ने चुगली जो कर दी थी.

वरुण और सुमी मेरे कमरे में चले आए. मेरी हालत देख कर वे घबरा गए. वे तो उसी समय डाक्टर को बुलाना चाहते थे मगर इतनी रात डाक्टर का आना मुश्किल था. सो, खुद ही मेरी तीमारदारी में जुट गए. मुझे उस समय अपने बच्चों पर प्यार आ रहा था और शायद उन्हें गुस्सा, तभी तो वरुण मुझे घूर कर देख रहा था. वरुण के इस तरह घूरने से मुझे डर लगता था. उस के गुस्से से खुद को बचाने के लिए मैं आंखें बंद कर के लेट गया. थोड़ी देर में मुझे दवा के कारण नींद आ गई.

10 बजे के करीब मेरी नींद टूटी. मैं चौंक कर उठ बैठा. सुमी का दफ्तर जाने का समय हो रहा था. आज मैं अपनी आदत के उलट बहुत देर तक सोता रहा. मैं ने उठने की कोशिश की, पर उठ नहीं पाया. बड़ी कमजोरी महसूस हो रही थी. कुछ ही देर में सुमी मुझे देखने आई. मुझे जगा हुआ देख कर वह चाय बना लाई. तब तक वरुण ने मुझे सहारा दे कर बैठा दिया. दोनों को उस समय घर के कपड़ों में देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ, ‘‘तुम दोनों अब तक तैयार नहीं हुए. आज औफिस नहीं जाना है क्या?’’

‘‘आप को ऐसी हालत में छोड़ कर औफिस कैसे जाएं. आज हम दोनों ने दफ्तर से छुट्टी ले ली है,’’ वरुण ने जवाब दिया.

‘‘नहीं बेटा, इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं अब ठीक महसूस कर रहा हूं. तुम लोग आराम से दफ्तर जाओ,’’ जाने मैं बच्चों से झूठ बोल रहा था या फिर खुद से, मुझे समझ नहीं आया.

‘‘हां, पता है हमें कितना ठीक महसूस कर रहे हैं आप. आप का चेहरा देख कर ही पता चल रहा है. अब आप कुछ नहीं बोलेंगे, सिर्फ आराम करेंगे. आज हम आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. पूरा दिन आप पर नजर रखेंगे और आप वो करेंगे जो हम कहेंगे. चलिए, लेट जाइए.’’ बहू की यह मीठी झिड़की मुझे अच्छी लगी. इस के बाद दोनों पूरा दिन मेरी इस तरह देखभाल करते रहे जैसे कि मैं एक छोटा बच्चा हूं और वे दोनों मेरे अभिभावक, मैं भी उन की हर आज्ञा का पालन करता रहा.

शाम तक मेरी हालत में काफी सुधार हो चुका था. मैं अपने कमरे में बैठेबैठे बोर हो गया था. सो, उठ कर हौल में चला आया. मुझे देख कर सुमी ने चाय का कप और एक प्लेट में बिस्कुट परोस कर मेरे सामने रख दिए. मुझे बड़ी हसरत से पैस्ट्री और समोसों की ओर ताकते देख उस के होंठों पर शरारती मुसकान आ गई जिसे देख कर मैं शरमा गया.

‘‘कल आप कहां गए थे पापा?’’ वरुण ने मेरी ओर सवाल दागा.

उस के इस सवाल के लिए मैं तैयार नहीं था, इसलिए कुछ पलों के लिए तो हड़बड़ा गया लेकिन फिर विरोध करने वाले अंदाज में बोला. ‘‘तुम्हारी याददाश्त अभी से कमजोर हो गई है क्या? याद नहीं तुम्हें, सब्जी लेने गया था, बहू ने ही तो भेजा था.’’

‘‘मेरी याददाश्त बिलकुल ठीक है. आप की बहू ने तो आप को पास वाली मार्केट भेजा था, पर आप रामलाल चाचा की दुकान पर पहुंच गए. पूछ सकता हूं क्यों?’’

‘‘मैं रामलाल की दुकान पर नहीं, मंडी गया था, अच्छी और सस्ती सब्जी लेने.’’ मैं जानता था अब मेरा झूठ ज्यादा देर तक नहीं चलेगा, पर फिर भी मैं ने एक आखिरी कोशिश की.

‘‘मेरे दोस्त दिनेश ने आप को रामलाल चाचा की दुकान पर देखा था वह भी जलेबी और कचौरी खाते हुए.’’

मेरे बेटे के बिगड़े तेवरों ने मुझे सीधा कर दिया. दिनेश को तो मैं ने भी देखा था उस दिन पर यह नहीं सोचा था कि वह मेरे बेटे से मेरी चुगली कर देगा, चुगलखोर कहीं का. आजकल के लड़कों में बड़ों के लिए आदरसम्मान रहा ही नहीं. मैं ने अपने बेटे की ओर देखा. वह सच सुनने के इंतजार में लगातार मुझे घूर रहा था. अब और किसी झूठ के लिए जगह नहीं थी, बहाने भी लगभग खत्म हो चुके थे. सो, अब सच बोलने में ही भलाई थी.

‘‘कल तुम लोगों को फादर्स डे मनाते देख मेरा भी मन कर गया. मैं वहां फादर्स डे मनाने गया था.’’ मेरा यह मासूमियत भरा जवाब सुन कर मेरी बहू की हंसी छूट गई. जाने उस की हंसी में क्या था कि पहले मैं, फिर मेरा बेटा भी उस के साथ खुल कर हंस दिए. हम हंसे जा रहे थे और दोनों बच्चे हमारी ओर आश्चर्यभरी नजरों से देख रहे थे.

सरकारी बंगलों पर भेदभाव की राजनीति

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 23 अगस्त को भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में स्थित अपना सरकारी आवास खाली कर चाबी लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को सौंप दी. गौरतलब है कि 19 जुलाई को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि एक महीने के अंदर सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी आवास खाली कराए जाएं.

इस फैसले की हद में 3 पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्री कैलाश जोशी, उमा भारती और बाबूलाल गौर भी आ रहे थे, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते सरकारी बंगलों में रहने दिया. इन तीनों को समाजसेवियों की हैसियत से उन्हीं बंगलों में रहने दिया गया जिन में वे दिग्विजय सिंह की तरह सालों से रह रहे थे.

पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्रियों को बंगलों की सुविधा देने के लिए उन से एक औपचारिक आवेदन भर लिया गया था. यह सुविधा दिग्विजय सिंह को भी दी जा सकती थी लेकिन अपना स्वाभिमान दिखाते उन्होंने साफ कर दिया कि वे शिवराज सिंह चौहान को कोई आवेदन नहीं देंगे. सियासी गलियारों में यह उम्मीद की जा रही थी कि दिग्विजय सिंह सरकारी बंगले के लालच में शिवराज सिंह के आगे झुक जाएंगे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया तो साफतौर पर हर कोई कह रहा है कि यह तो सरासर भेदभाव है या तो सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों से बंगले खाली कराओ या सभी को रहने दो.

एक पूर्व मुख्यमंत्री की अपनी अलग सियासी हैसियत होती है जिसे जताने में दिग्विजय सिंह चूके नहीं. बंगला खाली करने के साथ ही उन्होंने राज्य सरकार को यह आवेदन जरूर दिया कि उन के स्टाफ व कार्यालय के लिए नियमानुसार आवास आवंटित किया जाए.

इस पर राज्य सरकार उन्हें पहले की तरह कोई आलीशान बंगला देने को तैयार नहीं हुई लेकिन उन्हें ई टाइप का आवास देने की बात कही. इस पेशकश में हैरानी की एकलौती बात यह है कि सरकार के पास कोई ई टाइप का आवास खाली ही नहीं है और जिन कई अधिकारियों को ये आवास आवंटित हैं उन्होंने लोक निर्माण विभाग को आधिपत्य ही नहीं दिया है यानी अधिकृत तौर पर बंगले खाली नहीं किए हैं.

दिग्विजय सिंह किराए का मकान ले कर अपना दफ्तर चलाएंगे या सरकारी आवास मिलने का इंतजार करेंगे, यह तो वही जानें लेकिन इस बहाने यह जरूर साबित हो गया कि बड़ेबड़े सरकारी बंगलों पर सत्तारूढ़ दल की ही मनमानी चलेगी. सरकार अपने चहेतों को बंगले देगी, जबकि विपक्षी नेताओं से खाली करवाएगी जिस से वे सुचारु रूप से काम न कर पाएं.

यह हकीकत उत्तर प्रदेश से भी उजागर हुई थी जब इसी साल राज्य सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव से बंगले खाली करा लिए थे. ये लोग भी दिग्विजय सिंह की तरह बड़े बेआबरू हो कर सरकारी बंगलों से निकले थे तो तय है इन सभी के मन में यह बात जरूर उमड़घुमड़ रही होगी कि अब एक बार फिर सत्ता मिले तो गिनगिन कर भाजपाइयों से खाली करवाएंगे बंगले. तब उन की समझ में आएगा कि सरकारी बंगले किसी की बपौती नहीं होते बल्कि हकीकत में जनता के होते हैं.

इन पर इनायत क्यों

अंगरेजों के जमाने से सरकारी अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था होती रही है. यह परंपरा आजादी के बाद भी परिवर्तित रूप से कायम रही और जजों, आईएएस अधिकारियों सहित दूसरे विभागों के उच्चाधिकारियों के लिए भी कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक आलीशान महलनुमा बंगले बने. हर राज्य की राजधानी में ये पौश इलाके अलग ही चमकते हैं.

आईएएस अधिकारी, जज और दूसरे अधिकारियों से नाममात्र का किराया इन बंगलों का लिया जाता है जिन के रखरखाव पर खरबों रुपए खर्च होते हैं.

एक आईएएस अधिकारी के बंगले के रखरखाव पर कई बार उस की तनख्वाह से ज्यादा खर्च हो जाता है. इन साहबों के अपने शौक होते हैं जिन्हें वे सरकारी पैसौं से पूरा करते हैं. मसलन, जो आवास उन्हें आवंटित होता है उस में वे नए टाइल्स लगवाते हैं, पूरी सैनिटरी और इलैक्ट्रिक फिटिंग बदलवाते हैं. फिर भले ही उस की जरूरत हो या न हो. हरेक बंगले पर सिक्योरिटी गार्ड के लिए केबिन बनता है और नए सिरे से रंगरोगन होता है.

जज भी कम जिद्दी नहीं होते. वे भी नए आवास में आते ही तमाम मनमाने बदलाव करवाते हैं. यही हाल आला पुलिस अफसरों का है जिन की खिदमत में कई अधीनस्थों की ड्यूटी लगी रहती है.

फिर नेताओं के बंगलों और सुखसुविधाओं पर ही एतराज क्यों?

ऐसे में उन सरकारी बंगलों की तरफ ध्यान जाना स्वभाविक बात है जिन में आईएएस अधिकारी, जज जैसे दूसरे बड़े अधिकारी रहते हैं. इन के बंगले नेताओं के बंगलों से कम आलीशान नहीं होते. इन पर विवाद न के बराबर होता है. क्योंकि आवंटन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी इन्हीं की बिरादरी वालों के पास होती है. लिहाजा, ये लोग बगैर किसी चूंचपड़ के शान से रहते हैं और राजयोग भोगते हैं. इस राजयोग में मुफ्त का पैट्रोल, असीमित फोन और इंटरनैट, सरकारी वाहन सहित मुफ्त के भाव की बिजली वगैरह शामिल हैं.

यह ठीक है कि इन अधिकारियों को भी आवास की पात्रता पद के मुताबिक है. लेकिन वह नेताओं को भी होनी चाहिए. नेता और अफसर एकदूसरे के कई मामलों में पूरक होते हैं, इसलिए होता यह है कि अधिकारी सत्तारूढ़ दल के नेताओं की खुशामद करते नजर आते हैं जिस से उन के बंगले पर किसी की नजर न लगे.

जनप्रतिनिधियों यानी नेताओं का काम प्रशासनिक अधिकारियों से कमतर नहीं होता, इसलिए वे भी सरकारी बंगलों और दूसरी सुखसुविधाओं के स्वभाविक हकदार होते हैं जो उन्हें नहीं मिलता या छीन लिया जाता है और फायदा सत्तारूढ़ दल को होता है. क्या किसी पूर्व मुख्यमंत्री को बेइज्जत कर बंगला खाली करा कर उस के वैकल्पिक आवास की व्यवस्था न की जा कर उसे दरदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देना व्यवाहारिक या न्यायसंगत है? इस मसले पर अधिकारियों के लिहाज से सोचें तो साफ नजर आता है कि लोकतंत्र के असली राजा नेता नहीं, बल्कि ये अधिकारी हैं जिन से बंगला खाली कराने में सरकार को भी पसीने छूट जाते हैं.

राजनीति क्यों

संपदा विभाग, भोपाल के एक कर्मचारी का कहना है कि सैकड़ों बंगलों में अधिकारी गलत तरीके से रह रहे हैं. वे बंगले खाली नहीं कर रहे हैं और उन का कोई कुछ बिगाड़ नहीं पा रहा. सरकार कभी इन के खिलाफ ऐक्शन नहीं लेती क्योंकि ये उस की कमजोर नब्ज पकड़ कर रखते हैं.

जब पूर्व प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों और जजों को बंगले दिए जा सकते हैं तो पूर्व मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने कौन सा गुनाह किया है जो उन्हें रहने को जगह नहीं दी जाती. जब यह सबकुछ जनता के पैसों से ही होता है तो नेताओं और अधिकारियों में भेदभाव क्यों? जनता भी कभी इस बात पर एतराज नहीं जताती कि उस के पैसों से कौन, कहां, कितने ऐशोआराम से रह रहा है.

इस भारतीय खिलाड़ी ने तोड़ा 20 साल पुराना रिकौर्ड, 10 रन देकर लिए 8 विकेट

झारखंड के बाएं हाथ के स्पिनर शाहबाज नदीम ने गेंदबाजी में लिस्ट ए क्रिकेट का सबसे बड़ा रिकौर्ड तोड़ दिया है. नदीम ने विजय हजारे ट्रौफी में राजस्थान के खिलाफ केवल 10 रन देकर 8 विकेट झटके और यह रिकौर्ड अपने नाम किया. उनका गेंदबाजी विश्लेषण इस प्रकार रहा 10 ओवर, 4 मेडन, 10 रन, 8 विकेट.

नदीम लिस्ट ए क्रिकेट में सबसे कम रन खर्च करके सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज बन गए हैं. उन्होंने दिल्ली के राहुल संघवी का रिकौर्ड तोड़ा, जिन्होंने 1997-98 सीजन में हिमाचल प्रदेश के खिलाफ 15 रन देकर 8 विकेट झटके थे. बता दें कि सीमित ओवर क्रिकेट में सबसे पहले 8 विकेट लेने का कारनामा कीथ बोयस ने किया था. 1971 में कीथ ने 26 रन देकर 8 विकेट झटके थे. दूसरे नंबर पर डेरेक अंडरवुड हैं, जिन्होंने 1987 में 31 रन देकर 8 विकेट चटकाए.

बोयस का रिकौर्ड अगले साल टूटा जब माइकल होल्डिंग ने 21 देकर 8 विकेट लिए. संघवी ने फिर 20 साल के बाद होल्डिंग के रिकौर्ड को बेहतर किया. बहरहाल, टीम इंडिया में जगह पाने के बेहद करीब नदीम ए साइड के नियमित खिलाड़ी हैं. उन्होंने विकेट के मामले में संघवी सहित 10 गेंदबाजों की बराबरी की, लेकिन रन खर्च करने के मामले में उन्होंने यह रिकौर्ड अपने नाम कर लिया.

वन-डे क्रिकेट में यह रिकौर्ड अभी भी श्रीलंका के पूर्व महान तेज गेंदबाज चामिंडा वास के नाम दर्ज है, जिन्होंने जिम्बाब्वे के खिलाफ कोलंबो में 8 दिसंबर 2001 को 19 रन देकर 8 विकेट चटकाए थे. बता दें कि एक समय ऐसा लग रहा था कि नदीम 10 विकेट चटका लेंगे क्योंकि उनके स्पेल के 8वें ओवर में वह 8 विकेट अपने खाते में जोड़ चुके थे.

मगर एक और बाएं हाथ के स्पिनर अनुकूल राय ने राहुल चाहर को आउट करके नदीम के 10 विकेट लेने के सपने को तोड़ दिया. बहरहाल, झारखंड ने राजस्थान को 7 विकेट से मात दी. 74 रन का पीछा करते हुए झारखंड ने 15वें ओवर में मैच जीत लिया. इस जीत के साथ ही उसे 4 अंक मिले.

गूगल से भी कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं ये सर्च इंजन

आमतौर पर हम जो भी पॉप्युलर सर्च इंजन इस्तेमाल करते हैं, वे सर्च की गई बातों को ट्रैक करते हैं, ताकि उसके हिसाब से ऐड वगैरह दिखा सकें. अगर आप चाहते हैं कि सर्च इंजन न तो आपकी हिस्ट्री स्टोर करे और न ही आपके द्वारा सर्च किया जाने वाला कॉन्टेंट तो आप प्राइवेट सर्च इंजन इस्तेमाल कर सकते हैं. बहुत से प्राइवेट सर्च इंजन ऐसे हैं, जो न तो आपके द्वारा सर्च की गई बातों को स्टोर करते हैं और न ही आपको ट्रैक करते हैं.

कुछ ऐसे सर्च इंजन हैं, जो सिक्यॉरिटी और प्रिवेसी दोनों का ख्याल रखते हैं. हो सकता है कि आपको इनका इंटरफेस देखने में अच्छा न लगे, मगर सेफ्टी चाहिए तो थोड़ा बहुत समझौता तो करना ही पड़ेगा.

1. WolframAlpha

यह कंप्यूटेबल सर्च इंजन है, जो सटीक जवाब ढूंढता है. यह भी आपके द्वारा सर्च किए गए कॉन्टेंट को स्टोर नहीं करता और न ही कुछ ट्रैक करता है. यह प्राइवेट सर्च इंजन इनबिल्ट ऐल्गॉरिदम्स से कैलकुलेशन करता है और हेल्थ, फिटनेस, म्यूजिक और मूवीज वगैरह के बारे में एक्सपर्ट नॉलेज शो करता है.

2. Gibiru

यह भी पूरी तरह से अनसेंसर्ड मगर एनक्रिप्टेड सर्च इंजन है, जिसमें किसी भी थर्ड पार्टी डेटा लीक होने की गुंजाइश नहीं है. यह अन्य कई प्राइवेट सर्च इंजन्स से तेज चलता है, क्योंकि यह गूगल कस्टम सर्च को इस्तेमाल करता है. हालांकि यह गूगल द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सभी ट्रैकिंग मेथड को हटा देता है.

3. Startpage

स्टार्टपेज प्रॉक्सी सर्वर के जरिए ब्राउजिंग का ऑप्शन देता है, जिससे वेबसाइट्स आपका आईपी अड्रेस या लोकेशन ट्रैक नहीं कर पातीं. इसे आप अपने ब्राउजर में ऐड कर सकते हैं तो कलर थीम्स भी चुन सकते हैं.

4. Privatelee

प्राइवेट ली की ‘पावरसर्च’ कमांड्स से आप अपना सर्च सोर्स व अन्य चीजें चुन सकते हैं. इसका एक और नाम Qrobe.it भी है.

5. Yippy

इसकी मदद से आप रिजल्ट को मैन्युअली फिल्टर कर सकते हैं और किसी खराब रिजल्ट को फ्लैग कर सकते हैं. इस पर आप वेब, तस्वीरें, न्यूज, ब्लॉग्स और सरकारी डेटा वगैरह को सर्च कर सकते हैं. इसपर आप गूगल की ही तरह कैश्ड पेज (Cached page) देख सकते हैं.

6. Lukol

यह गूगल के कस्टमाइज्ड सर्च रिजल्ट दिखाने के लिए प्रॉक्सी सर्वर इस्तेमाल करता है. इसे बेस्ट प्राइवेट सर्च इंजन्स में से एक माना जाता है. यह ऑनलाइन फ्रॉड करने वालों और स्पैमर्स को दूर रखता है. आपके सर्च भी गुप्त रहते हैं.

7. Hulbee

यह सर्च इंजन भी आपके सर्च या लोकेशन हिस्ट्री को ट्रैक किए बिना इंटेलिजेंट इन्फर्मेशन देता है. आपके सर्च को सिक्यॉरिटी के लिए एनक्रिप्ट किया जाता है.

8. Gigablast

इसने अरबों वेब पेज इंडेक्स किए हैं और आपके ऑनलाइन सर्च को ट्रैक किए बिना तुरंत रिजल्ट दिखाता है. इसे भी बेस्ट प्राइवेट सर्च इंजन्स में शुमार किया जाता है.

9. DuckDuckGo

यह सबसे सिक्यॉर सर्च इंजन्स में से एक है. यह आपके द्वारा सर्च की गई चीज़ों को कभी ट्रैक नहीं करता. यह बिना ऐप के तुरंत रिजस्ट दिखाता है. इसमें एक दिन में 10 करोड़ सर्च होते हैं.

10. Oscobo

यह सर्च इंजन किसी भी तरह का डेटा स्टोर नहीं करता और न ही थर्ड पार्टी को यूजर्स का डेटा इस्तेमाल करने देता है.

11. Disconnect Search

डिस्कॉनेक्ट सर्च दरअसल गूगल, बिंग और याहू जैसे बड़े सर्च इंजन्स से सर्च में मदद लेता है, मगर आपके ऑनलाइन सर्च या आईपी अड्रेस को ट्रैक नहीं करता. इससे आप लोकेशन के आधार पर सर्च कर सकते हैं.

12. MetaGer

यह सर्वर भी गोपनीय सर्च में आपकी मदद करता है. यह प्रॉक्सी सर्वर को इस्तेमाल करता है और डेस्टिनेशन सर्वर से आपके आईपी को छिपाए रखता है. इसकी डिफॉल्ट लैंग्वेज जर्मन है.

मंटो : नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने किया मंटो के किरदार को जीवंत

किसी भी इंसान के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्म में उस इंसान के व्यक्तित्व को सही अंदाज में पेश करना एक फिल्मकार की सबसे बड़ी कसौटी होती है. इस कसौटी पर अपने समय के मशहूर, सच को अपनी लेखनी के जरिए पेश करने वाले निडर विवादास्पद उर्दू भाषी लेखक सआदत हसन मंटो पर बायोपिक फिल्म का निर्माण करने वाली फिल्मकार नंदिता दास खरी नहीं उतरती हैं.

जी हां! फिल्म ‘‘फिराक’’ के साथ निर्देशन में कदम रखने वाली अदाकारा नंदिता दास अब लेखक व निर्देशक के तौर पर मशहूर निडर उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो की बायोपिक फिल्म ‘‘मंटो’’ लेकर आयी हैं. जिसमें उन्होने अपने समय के मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन की कहानी 1946 में बांबे (आज का मुंबई) शहर से शुरू की है. नंदिता दास का दावा  है कि उन्होंने इस फिल्म का निर्माण, लेखन व निर्देशन करने से पहले गहन शोध किया है. पर अफसोस फिल्म देखकर कुछ कमी महसूस होती है. दर्शक मंटो से वाकिफ नहीं है, जिन्होने मंटो पढ़ा नहीं है, उनके लिए तो यह फिल्म समझ से परे है. पर जिन्होने मंटो व मंटो की कहानियों को पढ़ा है, उन्हे इस फिल्म से जबरदस्त निराशा होगी.

लघु कथाकार सआदत हसन मंटो (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) 1946 में मुंबई (1946 का बांबे) में फिल्म पटकथा लेखक के तौर पर कार्यरत थे. एक दिन उनका एक फिल्म निर्माता (ऋषि कपूर) से धन तथा कहानी में बदलाव को लेकर झगड़ा हो जाता है. पता चलता है कि निर्माताओं के साथ उनके इस तरह के झगड़े आम बात हैं. उस वक्त ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ के साथ उनके रिश्ते काफी कमजोर थे. जबकि इस संगठन से जुड़े कृष्णचंद्र और महिला लेखक इस्मत चुगताई (राजश्री देशपांडे) सहित कई लेखक उनके दोस्त थे.

अभिनेता श्याम चड्ढा (ताहिर राज भसीन) और मशहूर अभिनेता व निर्माता अशोक कुमार उर्फ दादा मुनि से उनके काफी घनिष्ठ संबंध थे. श्याम चड्ढा महज मंटो के दोस्त और उनकी तमाम कहानियों के प्रेरणा स्रोत भी हैं. पर उनकी सर्वाधिक मददगार और रीढ़ की हड्डी उनकी पत्नी साफिया थीं. भारत में सआदत हसन मंटो को तीन मुकदमों में बरी किया जा चुका था. तो वहीं साफिया एक बेटी की मां बन चुकी हैं.

15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होते ही नए राष्ट्र पाकिस्तान के लाहौर शहर में साफिया (रसिका दुग्गल) अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए जाती हैं. इस बीच वह दूसरी बार मां भी बनने वाली हैं. हिंदू मुस्लिम के बीच तनाव के बावजूद मंटो मुंबई में ही रुकने का फैसला लेते हैं, क्योंकि उन्हें मुंबई से बेइंतहा प्यार है. पर एक दिन जब श्याम चड्ढा के परिवार को मुस्लिम हमले से बचाते हुए पाकिस्तान छोड़ना पड़ता है. तो श्याम क्रोध में मंटो से मुस्लिमों को लेकर अपशब्द कहते हैं. बात आगे बढ़ती है, तो मंटो के एक सवाल पर श्याम कह देते हैं कि पर ‘शायद मैं तुम्हारी हत्या कर सकता हूं.’ तब पहली बार मंटो को अपना धर्म याद आता है और वह पाकिस्तान जाने का निर्णय लेते हैं.

1948 लाहौर रिफ्यूजियों से भरे शहर की टूटी फूटी इमारत में मंटो रहना शुरू करते हैं. वह खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं. इसी बीच उनकी कहानी ‘ठंडा गोश्त’ को लेकर अदालत में मुकदमें शुरू हो जाते हैं. मुसीबत के वक्त उनकी पत्नी साफिया उनके साथ खड़ी रहती हैं. साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उनके विचार भी कईयों को पसंद नहीं आते हैं. वह शराब पीने लगते हैं. मगर अपनी पत्नी व दो बेटियों के सुखद भविष्य के लिए वह लेखन जारी रखते हैं. उन्हे अपनी नन्ही बेटी के इलाज के लिए पैसे का मोहताज होना पड़ता है, पर वह समाज के विकृत मानसिकता के लोगों को अपनी लेखनी के जमीर कुचलने का हक नहीं देते. उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है. बीच बीच में मंटो की ‘ठंडा गोश्त’, ‘खोल दो’, ‘तोबा टेक सिह’ जैसी कहानियों का नाट्य रूपांतरण भी दिखाया जाता है. पर अपनी शराब की लत व  बिगड़ते स्वास्थ्य व लेखन के बंद हो जाने पर एक दिन वह स्वयं लाहौर मेंटल अस्पताल के ‘‘अल्कोहल रिहैबिलेशन सेंटर’’ में भर्ती हो जाते हैं.

बतौर निर्देशक नंदिता दास ने फिल्म में चालीस के दशक, उस वक्त के उपकरण, वेषभूषा आदि को बहुत ही बेहतर तरीके से उकेरा है. वह मंटो के एकाकीपन, बेचैनी, खालीपन के साथ उनके कुछ अफसानों को जीवंत करने में सफल रही हैं. मगर मंटो के साथ वह पूर्ण न्याय करने में बुरी तरह से विफल रही हैं. मंटो के रहन सहन, खान पान आदि का चित्रण सही है. मगर जब उनके लेखन की बात आती है, तो मंटो की आत्मा की हत्या कर दी गयी. पूरी फिल्म में मंटो का वास्तविक व्यक्तित्व पूर्णरूपेण उभर नहीं पाया.

मंटो के लेखन और उनके जीवन में भी देश के बंटवारे का जो दर्द नजर आता है, वह फिल्म में कहीं नहीं उभर पाया. मंटो लिखित कहानी ‘खोल दो’ पढ़कर हर आम इंसान न सिर्फ विचलित होता है, बल्कि उसे रोना आ जाता है और कम से कम तीन चार दिन उसका जीवन अवसाद भरा रहता है. पर नंदिता दास ने इस फिल्म में ‘खोल दो’ कहानी को इतने सतही अंदाज में पेश किया है कि दर्शक के चेहरे पर कोई भाव ही नहीं उभरता. यह लेखक व निर्देशक के तौर पर बहुत बड़ी विफलता है. यहां तक कि मंटो की जिंदगी में सबसे बड़ा भूचाल लेकर आने वाली कहानी थी-‘‘उपर नीचे और दरमियान’’. पर नंदिता दास ने तो इस कहानी का कहीं जिक्र ही नहीं किया.

कैमरामैन कार्तिक विजय ने भी काफी अच्छा काम किया है. संगीतकार स्नेहा खानविलकर व रफ्तार के कुछ गीत अच्छे बन पड़े हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो मंटो के किरदार को जीवंत बनाने में नवाजुद्दीन सिद्दिकी पूरी तरह से सफल रहे हैं और वह एक बेहतरीन अभिनेता हैं, यह बात पुनः उजागर हो गयी. नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपने अभिनय से विवादास्पद लेखक मंटो के एक पिता, पति और दोस्त के रूप को मुखर रूप से साकार किया है. साफिया के किरदार में रसिका दुग्गल और श्याम के किरदार में ताहिर राज भसीन ने जबरदस्त अभिनय किया है. इसके अलावा छोटे छोटे किरदारों में फरयना वझेर, जावेद अख्तर, चंदन रौय सान्याल, विनोद नागपाल, ऋषि कपूर, परेश रावल, इनामुल हक, रणवीर शौरी, राजश्री देशपांडे आदि की भी परफार्मेंस ठीक है.

एक घंटे 56 मिनट की अवधि की अवधि वाली फिल्म ‘‘मंटो’’ का निर्माण नंदिता दास ने ‘वायकाम 18’ के साथ मिलकर किया है. फिल्म की लेखक व निर्देशक नंदिता दास, संगीतकार स्नेहा खानविलकर व रफ्तार, पार्श्व संगीत  कार जाकिर हुसेन, कैमरौन कार्तिक विजय तथा फिल्म के कलाकार हैं – नवाजुद्दीन सिद्दिकी, रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन, फरयना वझेर, जावेद अख्तर, चंदन रौय सान्याल, विनोद नागपाल, ऋषि कपूर, इनामुल हक, रणवीर शौरी, राजश्री देशपांडे, इला अरूण, दिव्या दत्ता, परेश रावल, तिलोत्तमा सोम, शशांक अरोड़ा, गुरूदास मान, दानिश हुसेन व अन्य.

आरबीआई के आदेश के बाद अब बैंक भेज रहे एटीएम कार्ड बंद होने के मैसेज

देश में इस वक्‍त दो तरह के डेबिट और क्रेडिट कार्ड चलन में हैं. एक मैग्‍नेटिक स्‍ट्राइप वाला और दूसरा चिप वाला. लेकिन अब बैंक ग्राहकों से अपना मैग्‍नेटिक स्‍ट्राइप कार्ड चिप वाले कार्ड से जल्‍द से जल्‍द रिप्‍लेस करने की अपील कर रहे हैं. वह फोन पर मैसेज के जरिए ग्राहकों से डेबिट और क्रेडिट बदलने को कह रहे हैं. बता दें कि बैंक कार्ड फ्री में बदल रहे है. इसके लिए RBI ने आदेश जारी किया है. जिसकी डेडलाइन 31 दिसंबर 2018 है. RBI की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया है कि जून 2018 तक देश में 94.4 करोड़ एटीएम कार्ड (डेबिट कार्ड) जारी हुए. इसमें कुल 3.94 करोड़ कार्ड एक्टिव है.

क्या है मामला- आरबीआई ने बैंकिंग ग्राहकों के एटीएम-डेबिट व क्रेडिट कार्ड की डिटेल्‍स सिक्‍योर रहें, इसलिए यह कदम उठाया है, क्योंकि नए EMV कार्ड ज्यादा सुरक्षित है, और उनसे फ्रौड करना आसान नहीं है. आपको बता दें कि  मैग्‍नेटिक स्‍ट्राइप कार्ड पुरानी टेक्‍नोलाजी है, और इस तरह के कार्ड बनना बंद हो चुके हैं. इसकी वजह है इनका कम सिक्‍यो‍र होना है.

EMV चिप कार्ड को शुरू किया गया है. RBI ने साल 2016 में ही सभी बैंकों को आदेश दे दिया था कि ग्राहकों के साधारण मैग्‍नेटिक स्‍ट्राइप कार्ड्स को चिप वाले कार्ड से रिप्‍लेस किया जाए. लेकिन इसके बाद इसकी डेडलाइन को आगे बढ़ा दिया था. अब इन कार्ड को बदलने की आखिरी तारीख 31 दिसंबर 2018 तय की गई है.

मुफ्त में बदल रहे हैं बैंक- देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक SBI अपने ग्राहकों को नए EMV कार्ड मुफ्त में दे रहा है. इसके लिए आप बैंक में जाकर, औनलाइन अप्लाई कर सकते हैं.

अगर नहीं बदला- आपने अपना मैग्‍नेटिक स्‍ट्राइप कार्ड को नहीं बदला तो आप एटीएम मशीन से पैसे नहीं निकाल पाएंगे. साथ ही, आप कोई भी ट्रांजेक्शन से संबंधित काम नहीं कर पाएंगे.

भाग्यश्री के बेटे ने डेब्यू फिल्म से इस इंटरनेशनल फेस्टिवल में मचाया तहलका

बौलीवुड के दबंग खान यानी सलमान खान के साथ फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ में नजर आईं अदाकारा भाग्यश्री ने शादी के बाद फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया था. साल 1990 में हिमालय दसानी से शादी के बाद भाग्यश्री अपने दोनों बच्चों अभिमन्यु और अवंतिका दसानी की परवरिश में व्यस्त हो गईं. मां की राह पर चलते हुए अब भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु दसानी ने अपनी बौलीवुड पारी की शुरुआत फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ से कर ली है. निर्देशक वसन बाला की रोमांच और मारधाड़ से भरपूर फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता को रिलीज होने में अभी काफी वक्त है. लेकिन फिल्म ने रिलीज होने से पहले ही ‘टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (TIFF) में तहलका मचा दिया है. TIFF 2018 में अभिमन्यु की डेब्यू फिल्म ने शीर्ष पुरस्कार जीता है.

यह फिल्म भारत की ओर से फिल्म फेस्टिवल के ‘मिडनाइट मैडनेस’ सेगमेंट में अब तक की पहली एंट्री थी. इसने पीपुल्स च्वाइस मिडनाइट मैडनेस अवार्ड जीता है. लेकिन कुल मिलाकर निर्देशक पीटर फेरेली की फिल्म ‘ग्रीन बुक’ ने ‘इफ बिएल स्ट्रीट कुड टौक’ को हराकर पीपुल्स च्वाइस अवार्ड का शीर्ष पुरस्कार जीता.

वसन बाला की फिल्म ने ‘असेसिनेशन नेशन’ और ‘हैलोवीन’ को हराकर पीपुल्स च्वाइस मिडनाइट मैडनेस अवार्ड जीता. एक्ट्रेस राधिका मदान और अंकुर नय्यर के साथ अवार्ड को ग्रहण करते हुए बाला ने कहा, “मुझे इससे पहले मंच पर उस समय बुलाया गया था, जब मैं चौथी कक्षा में था और यह आर्ट और क्राफ्ट के लिए था.. मैंने कार्डबोर्ड काटे और फिर उन्हें चिपका दिया.. मेरे लिए यह समान अनुभव है. पहले आप पटकथा लिखते हैं और फिर फिल्म बनाने से इसका मतलब नहीं होता और फिर जब आप फिल्म बना लेते हैं तो फिल्म महोत्सव में आने को लेकर संजीदा नहीं होते और जब फिल्म महोत्सव में आते हैं तो फिर इसकी स्क्रीनिंग सही समय पर पूरा करने से मतलब नहीं होता..यह मेरी जिंदगी है..मेरा मतलब कहीं होने से नहीं था..इसे बदलने के लिए टीआईएफएफ का शुक्रिया.”

गौरतलब है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ से अभिनेत्री भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु दसानी ने अपने फिल्मी करियर का आगाज किया है. यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे बिल्कुल दर्द नहीं होता. आरएसवीपी फिल्म्स की इस परियोजना का निर्देशन वसन बाला ने किया है. फिल्म में राधिका मदान और अभिमन्यु दसानी लीड रोल निभा रहे हैं.

एक साल पहले हमारे ट्विंस हुए हैं. वे उन में से एक बच्चे को अपने फ्रैंड को देने की जिद कर रहे हैं क्योंकि उन के कोई बच्चा नहीं है. मुझे क्या निर्णय लेना चाहिए.

सवाल
मेरे पति पढ़ेलिखे और आधुनिक विचारों के हैं. एक साल पहले हमारे ट्विंस हुए हैं. वे उन में से एक बच्चे को अपने फ्रैंड को देने की जिद कर रहे हैं क्योंकि उन की शादी के 10 साल होने के बाद भी कोई बच्चा नहीं है. अपने बच्चे को उन्हें देने के पति के प्रस्ताव पर सोचसोच कर मैं अंदर ही अंदर घुट रही हूं. तनाव में होने के कारण पति से छोटीछोटी बातों पर नोकझोंक हो जाती है, जिस से हम एकदूसरे से काफी दूरी महसूस करने लगे हैं. ऐसे में मुझे क्या निर्णय लेना चाहिए?

जवाब
पहले तो आप शांत हो जाएं क्योंकि जल्दबाजी में लिए गए फैसले हमेशा नुकसानदायक होते हैं. भले ही आप के पति कितने भी आधुनिक विचारों के हों व अपने फ्रैंड से कितनी भी घनिष्ठता रखते हों, लेकिन अपने बच्चे अपने ही होते हैं, उन्हें किसी को सौंपा नहीं जा सकता, यह बात उन्हें समझाएं. उन्हें बताएं कि जिस बच्चे को 9 महीने कोख में रख कर मैं ने इतनी पीड़ा सही है, उन्हें मैं कैसे किसी को सौंपने के बारे में सोच सकती हूं.

हो सकता है कि आप के दर्द को आप के पति समझ जाएं. अगर न समझें तो बड़ों को बीच में ला कर मामला सुलझाएं. लेकिन पूरी स्थिति आप को ठंडे दिमाग से ही सुलझानी पड़ेगी वरना बात बिगड़ने से आप के रिलेशन खराब हो सकते हैं.

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क्या आप भी जुड़वां बच्चे चाहतीं हैं

31 वर्षीय अनामिका और उन के परिवार की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्हें पता चला कि वह जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली है. कहां तो उन की शादी के 6 साल बाद भी 1 औलाद होने का सुख नहीं मिल पा रहा था और कहां अब जुड़वां बच्चे अमायरा और अरमान के जन्म से उन्हें जिंदगी का सब से खूबसूरत तोहफा मिला. अनामिका ने दोनों बच्चों को आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक के जरीए बिना किसी परेशानी के जन्म दिया था. आईवीएफ के जरीए गर्भधारण करने के बाद जब अनामिका और उस के पति कुशाल डाक्टर के पास अल्ट्रासाउंड कराने गए, तो उन्हें अंदाजा भी न था कि अनामिका के गर्भ में जुड़वां बच्चे हैं. अनामिका और उस के पति कुशाल ने जुड़वां बच्चों के लिए कोशिश भी नहीं की थी. लेकिन अनामिका के डाक्टर ने आईवीएफ के जरीए 2 भ्रूण अनामिका के गर्भ में प्रत्यारोपित किए थे. उसी के परिणामस्वरूप उसे जुड़वां बच्चे हुए और उन की खुशी दोगुनी हो गई.

इस तकनीक से संभव

मगर अनामिका और कुशाल की तरह कई दंपती ऐसे भी होते हैं, जो जुड़वां बच्चे पाने की चाह में आईवीएफ तकनीक अपनाते हैं. वास्तव में आईवीएफ तकनीक के द्वारा मातापिता बनने की चाह रखने वाले दंपती जब अस्पताल आते हैं, तो आधा समय वे यही पूछते रहते हैं कि क्या आईवीएफ के जरीए जुड़वां या 3 बच्चों को एकसाथ जन्म देने के अवसर बढ़ जाते हैं? तो इस प्रश्न का उत्तर है कि यह दंपती के ऊपर निर्भर करता है. एकसाथ 2 या 2 से अधिक बच्चों का जन्म होना पहले के मुकाबले आज के दौर में कहीं ज्यादा आम है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि आज ज्यादातर महिलाएं बांझपन का इलाज करा लेती हैं. इस के साथ ही आज ज्यादातर दंपती कामकाजी हैं. ऐसे में उन की यही सोच होती है कि क्यों न एक बार में ही 2 बच्चों को जन्म दिया जाए. इस तरह एक बार में ही परिवार पूर्ण हो जाएगा. बुनियादी तौर पर आईवीएफ के जरीए आप और आप के डाक्टर इस बात का निर्धारण कर सकते हैं कि आप के गर्भ में कितने भू्रण हस्तांतरित किए जाएं. यहां यह जानना जरूरी है कि अगर आप केवल एक ही भू्रण हस्तांतरित कराती हैं, तो आप को जुड़वां या एकसाथ 3 बच्चे होना असंभव है. यहां तक कि एकल भू्रण हस्तांतरित कराने से सफल गर्भधारण की संभावना भी कम हो जाती है, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि आप का भू्रण बच्चेदानी में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित हो ही जाएगा.

यही कारण है कि बहुत सी महिलाएं, जो बारबार गर्भधारण नहीं कर पाती हैं, वे एकसाथ 1 से ज्यादा भू्रण प्रत्यारोपित कराती हैं.

बढ़ रही है मांग

यह जानना मजेदार है कि एकल भू्रण के मुकाबले गर्भ में एकसाथ कई भू्रण स्थानांतरित कराने से गर्भधारण करने के अवसर में जहां बहुत मामूली वृद्धि होती है, वहीं एकसाथ कई बच्चों के जन्म देने के अवसर भी बढ़ जाते हैं. आईवीएफ चक्र की सफलता में कई कारकों के साथ ही महिला की उम्र, उस का स्वास्थ्य, भू्रण की जीवनक्षमता आदि मुख्य भूमिका निभाते हैं. अगर आप अपने आईवीएफ चक्र के दौरान 1 से ज्यादा भू्रण हस्तांतरित कराने का विकल्प चुनती हैं, तो आप के जुड़वां या 3 बच्चों के जन्म देने के चांसेज काफी बढ़ जाते हैं. एकसाथ कई भू्रण प्रत्यारोपित कराने का चलन आज युवा दंपतियों के बीच आम हो चला है, क्योंकि एक बार में ही उन के घर 2 बच्चों का जन्म हो जाता है. आईवीएफ की मांग आजकल इसलिए भी है, क्योंकि आज आम राय है कि 1 बच्चे का जन्म हो या 2 का, खर्च तो बराबर ही आता है. चूंकि आईवीएफ तकनीक बेहद खर्चीली है, इसलिए ज्यादातर दंपती चाहते हैं कि एक बार में ही उन का परिवार पूरा हो जाए.

इस का मतलब यह नहीं है कि दंपती 1 से ज्यादा बच्चों के लिए दबाव डालते हैं, लेकिन हां, इस के लिए अपनी इच्छा जाहिर जरूर करते हैं, खासकर कामकाजी महिलाएं, क्योंकि वे चाहती हैं कि 1 बार में ही उन का परिवार पूरा हो जाए ताकि उस के बाद वे अपने कैरियर पर पूरा ध्यान दे सकें.

– डा. अरविंद वैद, फर्टिलिटी ऐक्सपर्ट

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