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सुवर्णा : क्या सुवर्णा के साथ सुमन का बंधन अटूट रह पाया

पूर्व कथा

टूर से घर वापस जाते हुए सुमन की ट्रेन में सरयूप्रमोद से जानपहचान होती है. उन की गोद ली 5 साल की बेटी सुवर्णा सुमन के मन में रचबस गई.

सुमन ने सरयू के मायके का फोन नंबर लिया और उसे अपने घर सपरिवार आने का निमंत्रण भी दिया. घर आने के बाद सुमन अपने पति विकास और बेटे सुदीप से सुवर्णा के विषय में ढेर सी बातें करती है.

थोड़े दिन बाद सरयूप्रमोद सुवर्णा के साथ सुमन के घर आते हैं. सरयू सुमन को बताती है कि नानानानी की सुवर्णा लाडली बन गई है लेकिन दादादादी उसे देख खुश नहीं हुए. पराए खून को वह अपना नहीं पाए.

सुमन उसे धीरज से काम लेने की सलाह देती है. दोनों परिवार आपस में अच्छी तरह हिलमिल जाते हैं. सुवर्णा के कहने पर सरयू एक गीत गाती है जिसे सुन सब विभोर हो जाते हैं.

अब आगे…

गाना सुन कर सुमन उस से बोली, ‘‘सरयू, तुम्हारी आवाज बहुत मीठी है.’’ ‘‘दीदी, सरयू पहले रेडियो के लिए गाती थी,’’ प्रमोद बोले, ‘‘लेकिन बीच में इस की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए गाना बंद कर दिया. अब सुवर्णा के आने के बाद इस ने फिर रियाज करना शुरू किया है.’’

‘‘फिर सरयू, तुम को अपना रियाज जारी रखना चाहिए. क्या तुम अगले साल यहां रेडियो स्टेशन पर अपना कार्यक्रम पेश करना चाहोगी? इस कार्यक्रम में ‘नवोदित गायक’ शीर्षक से मासिक कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है, जिस में नवोदित गायक कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर दिया जाता है. इसी बहाने तुम फिर नागपुर आ सकोगी,’’ सुमन बोली. ‘‘अब तो आनाजाना जारी रहेगा, दीदी. अगर तुम लोग हमें भूलना चाहो तब भी हम तुम्हें भूलने नहीं देंगे,’’ सरयू और प्रमोद हंसते हुए बोले.

‘‘चेन्नई पहुंचने पर खत लिखना,’’ सुमन ने याद दिलाई. ‘‘दीदी, हम यहां से पहले पुणे जाएंगे. फिर वहां से टैक्सी ले कर चेन्नई जाएंगे. उस के बाद जरूर खत लिखेंगे. हमारे साथ अब मेरे मातापिता भी जाने वाले हैं. वे भी करीब 6 माह तक हमारे साथ रहेंगे,’’ सरयू ने अपना पूरा कार्यक्रम बता दिया.

‘‘अच्छा, बीचबीच में खत लिखते रहना. गाड़ी की पहचान समझ कर भूल मत जाना,’’ सुमन ने उसे प्यार से ताकीद की. ‘‘और मौसी, तुम भी मुझे भूलना नहीं.’’

सुवर्णा की यह हाजिरजवाबी सब को भा गई. सुमन ने सुवर्णा की पप्पी ली और फिर छाती से लगा कर बोलीं, ‘‘नहीं बिटिया रानी, मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं.’’ इस बात को बीते पूरे 4 महीने हो चुके थे. सरयूप्रमोद का खत तो दूर कोई फोन भी नहीं आया था. सरयू के मातापिता भी उन के साथ 6 माह रहने वाले थे. इसलिए उन के घर फोन करने का कोई लाभ नहीं था. फिर भी सुमन ने दोचार बार फोन करने की कोशिश की. लेकिन किसी ने भी फोन नहीं उठाया.

सरयू की ससुराल का फोन नंबर उन के पास नहीं था तो सुमन क्या करती, लेकिन उस की बातचीत में सुवर्णा का जिक्र जरूर आता. आखिर विकास और सुदीप बोले, ‘‘लगता है गाड़ी में मिली तुम्हारी सहेली आखिर तुम्हें भूल ही गई.’’ सुमन को भी अब ऐसा आभास होने लगा था.

कुछ दिनों बाद सरयू के खत या फोन आने की प्रतीक्षा करना छोड़ कर सुमन अब रोजाना के अपने कामों में व्यस्त हो गई. उस दिन लेटरबाक्स में एक खत देख कर वह खुश हो गई. शायद सरयू का खत होगा, लेकिन खत देखा तो वह सुभी का था.

सुभी यानी सुभाषिनी, उस की बचपन की सहेली जिस ने उसे अपनी इकलौती बेटी की शादी में शामिल होने का बुलावा भेजा था. खत में लिखा था :

‘मैं खुद आ कर तुम्हें आमंत्रित करना चाहती थी लेकिन लगता कि यह संभव नहीं हो पाएगा. 8 जनवरी को शादी तय हो चुकी है. तुम्हें पूरे परिवार के साथ यहां आना है. और यहां तुम्हें 4-6 रोज रहना है. यह सोचसमझ कर तुम्हें आना होगा. रिजर्वेशन की टिकटें मैं यहीं से भेज रही हूं, इसलिए समय पर छुट्टी ले कर आना है, बाद में तुम्हारा कोई बहाना नहीं सुनूंगी.’ खत पढ़तेपढ़ते सुमन को ही हंसी आ गई. विकास ने खत पढ़ा तो कहने लगे, ‘‘यह आमंत्रण है या धमकी. नाम सुभाषिनी और खत में धमकियों की बरसात.’’

शादी में शरीक होना जरूरी था. इसलिए सुमन और विकास ने छुट्टी के लिए अर्जियां दे दीं और उन्हें छुट्टी मिल भी गई. वह समय पर पुणे पहुंच गई और शादी ठीक से हो गई. शादी के 2 दिन बाद सुभी के पास काफी समय था. सुमन से बातचीत करना और पुणे के दर्शनीय स्थलों का पर्यटन आदि उसे कराना था. सुमन के अनुरोध पर सब लोग दर्शनीय स्थल देखने गए तो सुमन को सरयू व सुवर्णा की फिर से याद आ गई, लेकिन वह किसी से कुछ नहीं बोली. उस दिन शाम को सुभी बोली, ‘‘सुमन, हमारी संस्था हर साल मकर संक्रांति के बाद एक दिन अवश्य बच्चों को तिलगुड़ खिलाने का आयोजन करती है. चूंकि इस बार हम शादी के कामों में व्यस्त रहे अत: बच्चों को कुछ खिला- पिला नहीं सके. वह अधूरा पड़ा कार्यक्रम हम कल पूरा करने वाले हैं. तुम घर में बैठीबैठी बोर होगी अत: मेरे साथ चल पड़ो.’’

‘‘चलो, ऐसे काम में मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी,’’ अगले दिन सुमन समय पर तैयार हो गई. जातेजाते एक दुकान से आर्डर किए हुए तिलगुड़ के डब्बे गाड़ी में रखवा दिए और आगे बढ़ गई. ‘‘आयोजन कहां है?’’ सुमन ने पूछा.

‘‘एक अनाथाश्रम में? अनाथ बच्चों को समाज के मिठास की कल्पना होनी चाहिए, इसलिए वरना उन के हिस्से में समाज की नफरत ही आती है.’’ ‘‘बहुत अच्छी बात है.’’

‘‘हम यह आयोजन पिछले 4-5 साल से लगातार कर रहे हैं. खासतौर पर त्योहारों पर यानी दीवाली, गुढीपाडवा, संक्रांति आदि के मौके पर हम अनाथाश्रम में जाते हैं. इस से उन अनाथ बच्चों का दिल बदल जाता है.’’ वे अनाथाश्रम पहुंच चुकी थीं. सुमन और सुभाषिनी नीचे उतरीं. वहां की महिला कर्मचारी आगे आईं और सुभाषिनी ने अपने साथ लाए डब्बे उन्हें सौंप दिए. आश्रम की महिलाएं डब्बे उठा कर भीतर ले गईं. सुभी के महिला मंडल की बाकी महिलाएं भी वहां आई हुई थीं. वे सब कार्यक्रम के आयोजन को सफल बनाने में जुट गईं. सुमन एक कुरसी पर बैठ कर सब तरफ देखने लगी.

आश्रम की महिला कर्मचारियों ने बच्चों को कतार में बिठाना शरू कर दिया. अलगअलग उम्र के मासूम बच्चे. बिलकुल सामने 3 साल की उम्र के बच्चे और उन के पीछे उन से बड़ी उम्र के बच्चे कतार में बैठे थे.

थोड़ी ही देर में कार्यक्रम शुरू हो गया. संस्था की महिलाएं एक के बाद एक आ कर अपनीअपनी बात कहती रहीं. उधर सुमन ने अपनी नजर सभी बच्चों पर डाली और मूक बच्ची पर उस की नजर मानो जम सी गई. अबतक तो यह बच्ची वहां नहीं थी फिर वहां कब आई. उस का चेहरा जानापहचाना क्यों लगता है. बच्ची के हाथ में एक गुडि़या थी और बच्ची भी लगातार उसी की ओर देख रही थी. सुमन ने धीमी आवाज में पड़ोस में बैठी आश्रम की एक महिला से पूछा, ‘‘वह आखिर में बैठी बच्ची कौन है?’’ उस महिला ने उस बच्ची को देखा और बोली, ‘‘वह है न, अभी यहां नईनई आई है, 3-4 महीने पहले. वह किसी से बात नहीं करती. हमें लगा कि वह गूंगी है, लेकिन अब वह ‘क्या चाहिए, क्या नहीं’ इतनी ही बात करती है. वह दूसरे बच्चों से अलगथलग रहती है और कुछ बोलती भी नहीं.’’

‘‘इतनी बड़ी बच्ची को यहां कौन छोड़ गया?’’ ‘‘यह भी एक कहानी है. उस के मातापिता एक सड़क दुर्घटना में चल बसे. अब वह बिलकुल अकेली है. आप इतनी दिलचस्पी से पूछ रही हैं इस बच्ची के बारे में, क्या बात है?’’

‘‘हां, मेरा परिचित एक परिवार था, लेकिन वह चेन्नई का रहने वाला था,’’ सुमन ने बताया. ‘‘इस बच्ची की एक मजे की बात बताऊं. वह अभी बाहर आने के लिए तैयार न थी, लेकिन उस से कहा गया कि नागपुर की रहने वाली एक चाची आई हुई हैं तो बाहर आ कर पीछे बैठ गई. मैं भी देख रही हूं कि बच्ची आप की ओर टकटकी लगाए देख रही है.’’

‘‘क्या उस बच्ची का नाम सुवर्णा है?’’ ‘‘हां.’’

सुमन यह जान कर भौचक्की रह गई. ‘‘इस के मातापिता तो दुर्घटना में चल बसे पर इस के नानानानी हैं.’’

तभी कार्यक्रम समाप्त हो गया और तिलगुड़ बांटने का काम शुरू हो गया. सुमन ने तिल की एक डली उठाई और सीधे सुवर्णा की ओर चल दी. सुवर्णा के पास पहुंचते ही उस ने आवाज दी, ‘‘सुवर्णा, पहचाना अपनी मौसी को. क्या भूल गई?’’ सुवर्णा ने अब सुमन को पहचान लिया था और वह दौड़ कर ‘सुमन मौसी’ कह कर उस की कमर से लिपट गई. सुमन ने उस मासूम को गले से लगा लिया और सुवर्णा जोरों से रोने लगी.

यह देख कर आश्रम की संचालिका प्रेरणा ने सुमन को दफ्तर में आने का अनुरोध किया. सुवर्णा को गोद में उठा कर सुमन आगे बढ़ी तो सुभी भी उस के पीछे चलने लगी. प्रेरणा दीदी ने सब को बैठने के लिए कहा.

इधरउधर की बातें न करते हुए वह सीधे मुद्दे की बात पर आ गई, ‘‘सुमन, आप सुवर्णा को जानती हैं, ऐसा मालूम होता है, और इस से भी बड़ी बात यह है कि आप को देख कर वह खुशी से खिल उठी है.’’ सुवर्णा से मुलाकात कैसे हुई और जानपहचान कैसे बढ़ी, यह बातें संक्षेप में बताने के बाद सुमन बोली, ‘‘इस के मातापिता दुर्घटना में चल बसे. यह बात आप के यहां काम करने वाली एक महिला ने बताई, क्या यह सच है?’’

‘‘हां, सिर्फ मातापिता ही नहीं, इस के नानानानी भी.’’

यह सुन कर सुमन को भारी आघात पहुंचा है. यह उस के चेहरे से साफ जाहिर हो रहा था. सुमन सरयू का खत न पा कर उस पर भूल जाने का आरोप लगा रही थी, इस पर उसे बहुत अफसोस हो रहा था. अब सुमन का ध्यान प्रेरणा की बातों पर गया.

‘‘पुणे से चेन्नई जाते समय एक टैक्सी दुर्घटनाग्रस्त हो गई. उस में सिर्फ यह बच्ची बच पाई. कुछ लोगों ने दुर्घटनाग्रस्त लोगों को अस्पताल पहुंचाया. तब तक रक्तस्राव ज्यादा होने से सब लोग मारे गए. उस में टैक्सी ड्राइवर भी शामिल था. डाक्टर की कोशिश से यह मासूम बच गई. उस दुर्घटना से बेचारी अनाथ हो गई. सुवर्णा को मानसिक रूप से काफी आघात लगा था, इसलिए वह हमेशा खामोश रहती थी, मानो मौन धारण कर लिया हो. अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर उसे कहां रखा जाए, यह सवाल खड़ा हो गया था. पुलिस ने बड़े प्रयास के बाद इस के दादादादी का पता लगाया, लेकिन उन्होेंने इसे अपनाने से साफ इनकार कर दिया. इसलिए पुलिस इसे सीधे यहां ले कर आई.’’

पे्ररणा के मुंह से यह सुन कर सुमन का दिल सन्न रह गया है, ‘‘और…’’ ‘‘और क्या?’’

‘‘सुवर्णा गोद ली हुई थी अत: अब मांबाप के जाने पर इस दुनिया में इस का कोई नहीं, यह सोच कर इस को भारी सदमा पहुंचा है. ‘‘इस बच्ची को कैसे रिझाया जाए, उसे ठीक करना मेरे सामने एक टेढ़ा सवाल था. इसलिए अगर आप दोचार दिन यहां रह कर इसे मिलती रहें, तो इस की हालत में कुछ सुधार हो सकता है. इसलिए आप इतना उपकार हम पर जरूर कीजिए. वैसे अभी आप यहां रहने वाली हैं न?’’ प्रेरणा दीदी ने पूछा.

‘‘हां, दोचार दिन तो मैं हूं.’’ इतनी देर तक सुमन का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर रखने वाली सुवर्णा अचानक बोल पड़ी, ‘‘तो मौसी तुम भी मुझे छोड़ कर चली जाओगी, मम्मीपापा गए, नानानानी भी गए, अब तुम भी जाओगी और मुझे भी भूल जाओगी,’’ कहतेकहते वह बेहोश हो गई और सुमन की जांघ पर आड़ी हो गई.

प्रेरणा दीदी और सुभी ने झट से उठ कर सुवर्णा को गोद में उठा कर पड़ोस के सोफे पर लिटा दिया. प्रेरणा ने घंटी बजाई और कर्मचारी को आदेश दिया कि वह तुरंत डाक्टर ले आए. फिर सुमन और सुभी से उन्होंने कहा, ‘‘अब आप जा सकती हैं. कल आप जरूर आएं, तब तक मैं इसे मानसिक रूप से तैयार कर के रखूंगी. आज अचानक मौसी को देख कर इसे बहुत खुशी हुई थी, लेकिन विरह की कल्पना से इसे फिर गहरा आघात लगा है. इसलिए कल आप थोड़े समय के लिए यहां आएंगी तो यह बच्ची सदमे से उबर जाएगी.’’ सुभाषिनी और सुमन गाड़ी में बैठ कर निकल पड़ीं. थोड़ी देर वे खामोश रहीं. फिर सुभी बोली, ‘‘बड़ी प्यारी बिटिया है. तुम्हें देख कर तो वह बहुत खुश हो गई थी.’’

‘‘हां.’’ ‘‘तुम्हारे जाने के बाद वह फिर मुरझा जाएगी यह सच है. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए.’’

सुमन काफी देर तक खामोश रही, फिर अचानक बोल पड़ी, ‘‘मेरे मन में एक बात आई है. अगर मैं सुवर्णा को अपने घर ले जाऊं तो?’’ ‘‘इरादा तो नेक है, लेकिन इस उम्र में क्या यह ठीक रहेगा? अगले कुछ सालों में सुदीप की शादी हो जाएगी. तुम भी अब 40-45 की हो गई हो.’’

‘‘हां, लेकिन बच्ची बहुत होशियार और समझदार है.’’ ‘‘अगर तुम ऐसा सोचती हो तो अच्छी बात है. एक बच्ची का भला हो जाएगा, लेकिन यह सवाल अब तुम्हारा ही नहीं है. तुम्हें विकास और सुदीप की राय भी लेनी पडे़गी.’’

घर लौटने पर सुमन का चेहरा देख कर विकास बोला, ‘‘तुम्हारा चेहरा देख कर ऐसा लगता है कि तुम्हारी अपने किसी प्रिय से मुलाकात हो गई है.’’ सुभी चौंक कर बोली, ‘‘आप को कैसे मालूम?’’

‘‘मैं ने इस के साथ 25 साल गुजारे हैं तो इतनी बात तो मैं समझ सकता हूं.’’ ‘‘लेकिन असली सवाल तो आगे है.’’

‘‘क्यों? क्या हुआ?’’

सुमन ने सुवर्णा से मिलने का सारा किस्सा बयान कर दिया और बोली, ‘‘वह अपनेआप को बहुत अकेली महसूस करती है, अत: इस हालत से उबरने में पता नहीं कितने दिन लग जाएंगे.’’ सुमन ने विकास की ओर देखा. विकास उस की भावनाओं को समझ रहा था. सवाल मुश्किल था.

दूसरे दिन सुमन अनाथाश्रम जाने लगी तो विकास भी उन के साथ हो लिए. अपेक्षानुसार सुवर्णा दरवाजे पर खड़ी उन का इंतजार कर रही थी. गाड़ी में बैठी सुमन को देख कर वह दौड़ कर आई और विकास को देख कर बहुत खुश हो गई. दोनों के हाथों में हाथ डाल कर उन्हें आश्रम की संचालिका प्रेरणा दीदी के आफिस में ले गई. उन के आने की खबर मिलते ही प्रेरणा दीदी आईं.

‘‘आइए, बैठिए, सुवर्णा आप लोगों का ही इंतजार कर रही थी. सुबह से नहाधो कर वह दरवाजे पर ही बैठी है. उस ने खाना भी नहीं खाया. बोली, ‘अगर मौसी को मैं नहीं दिखाई दूंगी तो वह घबरा जाएंगी.’ ‘‘सुबह से 10 बार तो पूछ चुकी है कि क्या मौसी आएंगी? क्या मौसी मुझे भूल जाएंगी.’’

‘‘शायद इस बच्ची को यही डर लग रहा था,’’ सुमन ने विकास की ओर देखा. विकास ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर धीरज बंधाया. फिर सुवर्णा को नजदीक बुला कर पूछा, ‘‘सुवर्णा, क्या तुम्हें यह मौसी अच्छी लगती है?’’ ‘‘हां.’’

‘‘तो तुम इस मौसी के पास आ कर रहना चाहोगी?’’ ‘‘कितने दिन? 1-2-3…’’ सुवर्णा उंगलियां गिनने लगी. दोनों हाथों की उंगलियां खत्म होने पर बोली, ‘‘10 दिन.’’

‘‘हां, 10 दिन, 10 साल या खूब बड़ी होने तक,’’ विकास उस मासूम बच्ची की ओर देखते हुए बोले. शायद सुवर्णा 10 साल समझ नहीं पाई. वह भ्रमित मुद्रा में बोली, ‘‘क्या मैं जब तक चाहूं रह सकती हूं?’’

‘‘हां, तुम जब तक चाहो तब तक रह सकती हो,’’ विकास ने उसे आश्वस्त किया. उस की यह बात सुन कर प्रेरणा दीदी, सुमन और सुभाषिनी की आंखों से आंसू निकल पड़े और सुवर्णा…

सुवर्णा विकास के गले में अपनी नन्ही बांहें डाल कर लिपट गई.

व्हाट्सऐप बनाम व्हाट्सऐप : इस फैसले के क्या हैं मायने

व्हाट्सऐप ने अपने सौफ्टवेयर में बदलाव कर एक बार में 5 से ज्यादा सदस्यों को मैसेज फौरवर्ड करने पर रोक लगा दी है. अभी तक स्मार्टफोन में सेव्ड कौंटैक्टों में से जितनों को चाहो उतनों को एक बार में ही कोई भी मैसेज, फोटो या वीडियो फौरवर्ड किया जा सकता था. इस का जम कर दुरुपयोग हो रहा है. एक तो, निरर्थक जोक, जमा किए फोटो व वीडियो बिना सोचेसमझे फौरवर्ड किए जा रहे हैं और दूसरे, घृणा फैलाने वाले मैसेज आसानी से वायरल किए जा रहे हैं.

हिंदू श्रेष्ठ हैं, यह सिद्ध करने के बहुत से मैसेज लगातार, बारबार फौरवर्ड किए जा रहे हैं. व्हाट्सऐप के गु्रपों में आप उन लोगों को भी मैसेज पढ़वा सकते हैं जिन्हें जानते तक नहीं, क्योंकि कब कौन से गु्रप में आप को क्यों एड किया गया, यह पक्का नहीं होता. बहुतों से आप कभी न मिलेंगे या उन्हें देखेंगे.

व्हाट्सऐप एक शानदार तरीका है अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से लगातार संपर्क बनाए रखने का. मोबाइल तकनीक आधीअधूरी रह जाए अगर व्हाट्सऐप न हो या केवल पैसे देने पर मिले. अपने कौंटैक्टों का डेटा बेच कर व्हाट्सऐप बिना विज्ञापन लिए अपने सदस्यों को मुफ्त में सेवा दे रहा है. तभी थोक में इस में वीडियो और सहीगलत मैसेज डाले जा रहे हैं और फिर फौरवर्ड किए जा रहे हैं. व्हाट्सऐप कंपनी चाहती है कि आप ऐसा करें.

व्हाट्सऐप असल में दिल्ली के चांदनी चौक में बांटे जा रहे हैंडबिलों की तरह हो गया है जो जानेअनजाने लोगों को चाहीअनचाही जानकारी पहुंचा रहा है. यह सस्ता है, इसलिए दंगा फैलाने वालों के लिए वरदान है. कितने ही मैसेजों में साफ लिखा होता है कि हिंदू खतरे में है और इस मैसेज को फैलाओ ताकि हिंदू एक हो सकें. बहुमत वाले देश में हिंदुओं को एक करने की बात का उत्पात मचाने के अलावा क्या कोई और उद्देश्य होता है. व्हाट्सऐप इस देश में बढ़ते दंगों व मौब लिंचिंग का बड़ा हथियार बन गया है.

अब सरकारी दबाव में व्हाट्सऐप ने भारत में, केवल भारत में, एकसाथ 5 से ज्यादा लोगों को मैसेज करने पर रोक लगा दी है. हालांकि, 5-5 कर के आप कितनों ही को पहले की तरह मैसेज भेज सकते हैं. व्हाट्सऐप ने भारत में ही ऐसा क्यों किया, शायद इसलिए कि इसी देश में बैठेठाले हैं, इसी देश में अफवाहों पर ध्यान देने वाले हैं, इसी देश में तर्कहीन बातों को मानने वाले हैं, इसी देश में लोगों का धर्म के नाम पर खून खौलता है, इसी देश में धर्म और धार्मिक दुकानदारी सब से ज्यादा पनप रही है.

भारत में ही लोग पहले से जानते थे कि शनिदेव की महिमा के 100 परचे छपवा कर लोगों में बांटने से पुण्य मिलता है. अब छपाने का झंझट भी दूर. 100 लोगों को व्हाट्सऐप मैसेज फौरवर्ड करो और छुट्टी.

आखिर इस तरह के पुण्य कमाने वाले, धर्म की रक्षा करने वाले कौन हैं और यहीं क्यों हैं? दरअसल, ये धर्म की दुकानदारी के पीडि़त हैं. जिस तरह धर्म को इस देश में बेचा जा रहा है, उस तरह किसी और देश में नहीं. केवल इसी देश में झूठ को सही मानने की आदत खासे पढ़ेलिखों में भी है. यहां युवा भी तर्क के बदले अंधी सोच पर जोर देते हैं. व्हाट्सऐप को 20 करोड़ लोगों ने यहीं डाउनलोड किया है ताकि मुफ्त में गप्पें मारी जा सकें और तथाकथित पुण्य भी कमाया जा सके.

व्हाट्सऐप के नए कदम से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. असल में यह सेवा पैसे दे कर मिलनी चाहिए. लेकिन जब ऐसे ही फायदा हो रहा है तो क्यों व्हाट्सऐप कंपनी हरेक से डौलर दो डौलर लेती फिरे?

आजकल फिल्में रेस्तरां के लिए बनाई जा रही हैं : विवेक वासवानी

चर्चित शो ‘खानदान’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता विवेक वासवानी, एक फिल्म निर्माता और लेखक भी हैं. वे अधिकतर उन फिल्मों में अधिक नजर आये जिसे उन्होंने प्रोड्यूस किया. उन्होंने 100 से अधिक फिल्मों में काम किया है. जब शाहरुख खान एक्टर बनने की आशा लेकर मुंबई आये थे. रहने की जगह न होने की वजह से तब वे विवेक वासवानी के पास ही रहे थे. जिसके बाद उन्होंने उसे फिल्म ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ में ब्रेक दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने कई नए कलाकारों को आगे बढ़ने में मदद की, जिसमें राहुल बोस, बोमन ईरानी, कोयल पूरी आदि प्रमुख हैं. वे मानते हैं कि हर नए कलाकार को एक मौका अवश्य मिलना चाहिए, ताकि वह अपने आप को सिद्ध कर सकें.

फिल्म निर्माण के अलावा विवेक छात्रों को अभिनय की तालीम विभिन्न संस्थाओं में जाकर देते हैं. उनसे चौथी देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के विमोचन पर मुलाकात हुई. पेश है अंश.

आजकल कई फिल्म फेस्टिवल होते हैं, इसका फायदा किसे होता है?

फिल्म फेस्टिवल के 4 मकसद होते हैं, पहला जो छोटी अच्छी फिल्में है, जो कभी रिलीज नहीं हो पाती उनको फिल्म फेस्टिवल में डालने से पब्लिक को उसे देखने का मौका मिलता है. फिल्म फेस्टिवल एक बहुत बड़ा बाजार होता है. जहां फाइनेंसर फिल्में खोजते हैं और फिल्म बनाने वाले फाइनेंसर को खोजते हैं और उन्हें वह मिल जाता है, जो मुश्किल फिल्में होती हैं, जो सेंसर बोर्ड की बुरी तरह से शिकार होती हैं, उन्हें ओरिजिनल रूप में देखने का मौका मिलता है. इसके अलावा ये छात्रों के लिए बहुत फायदेमंद होता है, जहां से उन्हें सीखने का बहुत मौका मिलता है. इस तरह से फिल्म फेस्टिवल के द्वारा मनोरंजन के अलावा, मार्केट, शिक्षा आदि सब हो जाता है. असल में सिनेमा का मकसद होता है टिकट बेचना, क्योंकि इसकी इन्वेस्टमेंट बहुत बड़ी होती है और ये एक बहुत बड़ा व्यापार होता है.

फिल्मों का दौर बदलता जा रहा है, आजकल की फिल्में पहले से काफी अलग हैं, इसे आप कैसे लेते हैं?

अभी की फिल्में और पहले की फिल्मों में कोई खास अन्तर नहीं है. पहले जब राजकपूर फिल्में बनाते थे तो उसमें गाने होते थे. फिल्म तीन घंटे तक चलती थी ,क्योंकि दर्शक वही चाहते थे. आजकल लोग इतनी बड़ी फिल्में देखना पसंद नहीं करते. इन्टरनेट के जरिये सभी को सब पता होता है, ऐसे में ढीली ढाली पहले जैसी फिल्में नहीं चल सकती. ये सही है कि समय के साथ सिनेमा बदला है. आज सिनेमा हौल में टिकट बेचने से अधिक लोग पौपकौर्न बेचने के शौकीन हैं, क्योंकि वहां उनका प्रौफिट मार्जिन फिल्मों के टिकट से अधिक है. इसलिए आजकल हम सिनेमा रेस्तरां के लिए ही बना रहे हैं. इसे सारें फिल्म निर्माता भुगत रहे हैं.

आज के फिल्म निर्माता और निर्देशक फिल्मों में मनोरंजन कम और रियलिटी को अधिक लाने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में भविष्य में फिल्मों को कोई खतरा तो नहीं?

फिल्म के ट्रेंड को दर्शक ही तय करते हैं. आज उन्हें यही पसंद है, इसलिए बनायीं जा रही है. पहले फिल्मों को देखने के बाद लोग खुश हो जाया करते थे, जो अब नहीं है. जो लोग ऐसी फिल्में बना रहे हैं उन्हें उसे बनाने देना चाहिए, लेकिन इस साल की सबसे हिट फिल्म वही है, जिसमें कौमेडी और मनोरंजन दोनों है. मेरे हिसाब से फिल्में वही चलेगी, जिसमें मनोरंजन हो.

क्या आप किसी खास विषय पर फिल्में बनाने की इच्छा रखते हैं?

मैंने कई फिल्म बनायीं है और अपनी जर्नी से संतुष्ट हूं. मैंने हाल ही में एक फिल्म ‘रफ बुक’ बनायीं थी, जो शिक्षा पर आधारित थी. जिसे सभी ने पसंद किया था. ऐसे किसी भी नए विषय पर फिल्म बनाना मुझे पसंद है.

आज के नए कलाकारों में आप किस तरह की प्रतिभा को देखते हैं?

आज के एक्टर एक्टिंग से अधिक टिकट बेचने का काम करते हैं और परफोर्मेंस निकालने का काम निर्देशक का होता है. नसरूद्दीन शाह जैसे बड़े कलाकार ‘जैकपोट’ फिल्म में गन्दा परफोर्मेंस देते है, जबकि फिल्म ‘डेढ़ इश्किया’ में अच्छा एक्टिंग करते है. एक्टर तो वही है, एक निर्देशक परफोर्मेंस निकाल सका, दूसरा नहीं निकाल सका. एक्टर अच्छा या खराब नहीं होता.

किसी फिल्म के सफल होने में किसका हाथ सबसे अधिक होता है?

प्रोजेक्शनिस्ट, जिसके हाथ में पूरी फिल्म की डोर होती है, जिसे हम अधिकतर इग्नोर करते हैं.

रिजनल फिल्में आजकल काफी बन रही हैं और आगे भी आ रही हैं, आप किस रीजन को और अधिक सहयोग देना चाहते हैं?

तमिल, तेलगू, मलयालम, बांग्ला, ओरिया, मराठी आदि सभी अच्छी फिल्में बना रहे हैं. कुछ की तो रीमेक भी हिंदी फिल्मों में बनी है. आजकल सबटाइटल के जरिये सब फिल्में देखी जा सकती हैं. इसलिए रीजनल से अधिक अभी फिल्में ग्लोबल हो चुकी हैं. मैं किसी भी अच्छी कहानी को बनाना पसंद करता हूं.

अभी फिल्मों के कलाकार पारिवारिक से अधिक प्रोफेशनल हो चुके हैं, जो पहले नहीं था, आप इसे कैसे देखते हैं?

अभी इंडस्ट्री बदल चुकी है यहां कोई परिवार नहीं, बल्कि टिकट बेचने का काम किया जाता है. ये इंडस्ट्री डिस्ट्रीब्यूटर्स की है. अगर वे जीतेंगे तो प्रोड्यूसर्स हारेंगे और अगर प्रोड्यूसर्स जीतेंगे तो डिस्ट्रीब्यूटर हारेगा. सनी देओल की हिट फिल्म में एक ही आदमी पैसा बनाता है और वह है सनी देओल खुद.

आप किसकी फिल्में आज भी देखते हैं?

विमल रौय और नसीरहुसैन की फिल्में मैं अधिकतर देखता हूं. इसके अलावा आज की फिल्मों में ‘सोनू के टीटू की स्वीटी, स्त्री, उड़ता पंजाब आदि फिल्में भी मुझे पसंद हैं.

आपके फिटनेस का राज क्या है?

मैं खुद ड्राइव करता हूं और जहां तक हो सके खूब पैदल चलता हूं. जरुरत पड़े तो बस और ट्रेन में भी सफर कर लेता हूं. इससे मैं फिट रहता हूं.

मेरे माथे के दोनों तरफ झांइयां हैं. कृपया कोई उपचार बताएं.

सवाल
मेरे माथे के दोनों तरफ झांइयां हैं. कृपया कोई उपचार बताएं.

जवाब
चेहरे की झांइयों को दूर करने के लिए बेसन उपयोगी होता है.1/2 चम्मच नीबू, 1/2 चम्मच हलदी और 2 चम्मच बेसन को आपस में अच्छी तरह मिला कर पेस्ट बना लें. इस मिश्रण से बना मास्क चेहरे पर नियमित दिन में 1 बार लगाएं. झांइयां समाप्त हो जाएंगी.

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मुल्तानी मिट्टी व ऐलोवेरा पैक: मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधनों में सदियों से होता आ रहा है. यह त्वचा को ठंड देता है और त्वचा की इरिटेशन कम करता है, रैशेज, मुंहासे और दाग-धब्बे हटाता है. ऐलोवेरा जेल धूप में जली त्वचा को ठंडक प्रदान करता है और टैनिंग हटाता है. यह त्वचा को नमी देता है और इसे मुलायम बनाता है. मुल्तानी मिट्टी, ऐलोवेरा जेल और गुलाब जल मिलाकर इसका पैक तैयार करें.

टमाटर, दही और नींबू का रस: इन तीनों ही चीजों में मिलने वाले तत्व त्वचा पर प्राकृतिक ब्लीच का काम करते हैं. इसके अलावा टमाटर का जूस प्राकृतिक टोनर भी होता है जो आपके रोमछिद्रों को टाइट करता है और त्वचा से अतिरिक्त तेल हटाता है. नींबू ब्लीच और एंटी बैक्टीरियल तत्व का काम करता है. वहीं दही त्वचा को नमी प्रदान करती है जिससे आपकी त्वचा रूखी नहीं होती.

आलू और नींबू के रस का फेस पैक: आलू न सिर्फ मुंह में पानी लाने वाले स्नैक्स बनाने के काम आता है बल्कि त्वचा पर भी कमाल का असर दिखाता है! आलू विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होता है. आलू का जूस त्वचा की एजिंग, झाइयां और सनबर्न ठीक करने में भी सहायक होता है. यह त्वचा को मुलायम बनाता है और इसे ठंडक देता है. एक आलू को छीलकर इसे ग्राइंडर में पीस लें, फिर निचोड़कर इसका रस निकाल लें. इसमें एक चम्मच नींबू का रस मिलाएं और चेहरे व अन्य प्रभावित त्वचा पर इसे लगाएं. इसे 30-40 मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें. इसके बाद ताजे पानी से धो लें.

बत्ती गुल मीटर चालू : बिजली का मुद्दा तो हवा में ही रह गया

सामाजिक मुद्दों या आम जनता से जुड़े किसी भी मुद्दे पर एक कमर्शियल मनोरंजक फिल्म लिखना या निर्देशित करना हर किसी के बस की बात नहीं हो सकती. आम जनता के मुद्दे पर मनोरंजक फिल्म का मतलब रिश्तों की कहानी के साथ चलो और क्लायमेक्स में अदालत के अंदर दुनियाभर का संदेश परोसने वाला भाषण देते हुए उसे मन की भड़ास कहना तो कदापि नहीं होना चाहिए. मगर फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ के लेखक व निर्देशक ने इस फिल्म में यही किया है. परिणामतः देश का आम इंसान से कहीं ज्यादा निरीह और बेचारे तो लेखक व निर्देशक ही नजर आते हैं.

पूरे देश में हर घर में 24 घंटे बिजली का न होना और बिजली बिल का अनाप शनाप यानी कि जितनी बिजली उपयोग की, उसके मुकाबले कई गुना ज्यादा बिल का आना आम समस्या है. मगर इस समस्या को फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ के लेखक द्वय सिद्धार्थ व गरिमा तथा निर्देशक श्री नारायण सिंह ने उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्र में बिजली मुहैय्या कराने वाली एक निजी कंपनी ‘सूरज पावर टेक्नालाजी लिमिटेड’ नामक कंपनी को जिम्मेदार ठहराते हुए पूरी फिल्म गढ़ी है. और यहीं पर उनकी फिल्म कमजोर हो जाती है.

जब फिल्म की नींव कमजोर हो, तब महज आम हिंदी फिल्मों के चर्चित कमर्शियल मसाले भरने से फिल्म अच्छी कैसे बनेगी? लेखक ने इस समस्या पर फिल्म की पटकथा लिखने या निर्देशक ने निर्देशन करने से पहले कोई शोध कार्य किया होता, तो उन्हें इस बात का अहसास रहता कि उत्तराखंड में इलेस्ट्रीसिटी की सप्लाई यानी मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी किसी निजी कंपनी के पास नहीं बल्कि यह काम सरकार खुद कर रही है. मुंबई और दिल्ली के कुछ इलाके में निजी कंपनियां बिजली मुहैय्या करा रही हैं. पर इस फिल्म में उत्तराखंड में बिजली मुहैया कराने वाली कंपनी के मालिक को भी अदालत में तलब कर लिया गया. यह है कल्पना की पराकाष्ठा…वैसे लेखक व निर्देशक दोनों के दावे हैं कि उन्होंने कुछ माह उत्तराखंड में बिताकर इस समस्या पर गहन शोध किया था.

इतना ही नहीं फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ में वकील एस के यानी कि शाहिद कपूर का मजेदार संवाद है. वह अपनी नाराज दोस्त ललिता यानी कि श्रद्धा कपूर को सुनाते हुए कहते हैं कि वह बिजली कंपनी पर इन इन धाराओं में मुकदमा दायर करेगें. छह सात धाराओं में से वह एक धारा 498 भी बोल जाते हैं. अब यह धारा बिजली कंपनी के खिलाफ कितनी जायज है, यह तो पढ़ा लिखा वकील बेहतर जानता है.

खैर, फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ की कहानी है उत्तराखंड की. कहानी शुरू होती है बचपन के तीन दोस्त सुशील कुमार पंत उर्फ एस के (शाहिद कपूर), ललिता नौटियाल उर्फ नौटी (श्रद्धा कपूर) और सुंदर मोहन त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) से. तीनों युवावस्था मे पहुंच चुके हैं. एस के वकील है, जो कि वकालत कम पर लोगों को ब्लैकमेल कर पैसा कमाते रहते हैं. वह लोगों को झूठे केस मे फंसाकर पैसा ऐंठता रहता है. नौटी खुद को बहुत बड़ी कास्ट्यूम डिजायनर मानती है. जबकि सुंदर मोहन त्रिपाठी किसी तरह एक प्रिंटिंग व पैकेजिंग फैक्टरी ‘यू के प्रिंटर्स’ खोलने में सफल होता है.

अब आम हिंदी कमर्शियल फिल्मों की तरह यहां भी इन तीन दोस्तों के बीच त्रिकोणीय प्रेम कहानी शुरू हो जाती है. एक दिन नौटी कहती है कि वह दोनों के साथ अलग अलग एक एक सप्ताह तक डेट करेगी, उसके बाद अपना निर्णय लेगी. पहले वह एस के के साथ डेट करती है, फिर दूसरे सप्ताह वह सुंदर मोहन त्रिपाठी के साथ डेट करती है. नौटी तय करती है कि उसे सुंदर मोहन त्रिपाठी के ही साथ जिंदगी बितानी है. एक दिन इन दोनों को प्यार /चुंबन करते एस के देख लेता है. तो उसे जलन होती है. जिसके चलते एस के अपनी तरफ से दोस्ती खत्म कर देता है.

इधर सुंदर की फैक्टरी में पहले माह डेढ़ लाख रूपए का बिल आता है. तो वह इसकी शिकायत करने के लिए बिजली उपभोक्ता मंच में जाता है.पर वहां के अधिकारी उसे समझाकर भेज देते हैं कि मीटर को चेक करने वाला एक दूसरा मीटर लगा देते हैं. उसके बाद उसे छह माह के बाद 54 लाख रूपए का बिल आता है. सुंदर अपनी इस समस्या को लेकर कई जगह जाता है, पर कोई समाधान नहीं निकलता.

अब तो फैक्टरी के साथ साथ घर के बिकने की नौबत आ जाती है. तब नौटी व सुंदर अपने चलता पुर्जा नुमा दोस्त व वकील एस के के पास मदद के लिए जाते हैं. एस के उनकी मदद करने की बजाय फैक्टरी बंद करने की वजह देकर भगा देता है. अंततः हारकर रात के अंधेरे में सुंदर मोहन त्रिपाठी आत्महत्या करने के लिए अपनी बाइक के साथ गंगा नदी में कूद जाता है. दूसरे दिन पुलिस को नदी से बाइक मिलती है. पर सुंदर मोहन त्रिपाठी का शरीर नहीं मिलता.

अब अपने दोस्त को इंसाफ दिलाने के लिए एस के अदालत का दरवाजा खटखटाता है और फिर वही आम फिल्मों का कमर्शियल मसाला. टीवी चैनल पर खबरें..व्हाट्सअप पर वीडियो वगैरह वगैरह..चलता है. सूरज पावर टेक्नालाजी की तरफ से अदालत में मुकदमा लड़ने आती है वकील गुलनार (यामी गौतम). पर अदालती लड़ाई में समस्या को लेकर गंभीर बातें नही की जाती. पर अदालत में अपनी मौजूदगी से सुंदर मोहन त्रिपाठी बता देते हैं कि वह जीवित बच गए.

अंत में एस के यानी कि शाहिद कपूर का लंबा  चौड़ा भाषण है कि विकास, कल्याण या अच्छे दिन के नाम पर कुछ नहीं हुआ. पर अपनी बात खत्म करने से पहले वह इसे अपने मन की भड़ास की संज्ञा देते हैं. फिर जज महोदया के निर्णय के साथ फिल्म खत्म.

पटकथा के स्तर पर कई कमियों के अलावा फिल्म में कुमायूंनी भाषा का उपयोग किया गया है. फिल्म में बहुत ही ज्यादा ‘बल’ और ‘ठहरा’ शब्द का उपयोग भी लोगों को खलता है. फिल्म की लंबाई भी बेवजह लंबी खींची गयी है. फिल्म की पटकथा के साथ साथ निर्देशन व एडीटिंग भी बहुत कमजोर है. इतना ही नहीं लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते फिल्म का मूल मुद्दा ही गायब हो गया. फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ देखकर यह कहना मुश्किल है कि इस फिल्म के निर्देशक श्री नारायण सिंह ने ही ‘टौयलेट:एक प्रेम कथा’ का निर्देशन किया था.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो पूरी फिल्म सिर्फ व सिर्फ दिव्येंदु शर्मा की फिल्म है. उन्होंने कमाल का अभिनय किया है. शाहिद कपूर से बेहतर अभिनय की उम्मीदें खत्म होती जा रही हैं. श्रद्धा कपूर ने ठीक ठाक काम किया है. यामी गौतम के हिस्से करने के लिए कुछ खास था ही नहीं. फिल्म के कैमरामैन अंशुमान महाले प्रशंसा के पात्र हैं.

दो घंटे 43 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ का निर्माण नितिन चंदंचूड़, श्री नारायण सिंह, कुसुम अरोड़ा , निशांत पट्टी ने ‘टीसीरीज’ कंपनी के साथ मिलकर किया है. निर्देशक श्री नारायण सिंह, पटकथा लेखक विपुल रावल, गरिमा वहल व सिद्धार्थ सिंह, संवाद लेखक गरिमा वहल व सिद्धार्थ सिंह, संगीतकार अनु मलिक, रोचक कोहली व सचेत परंपरा, कैमरामैन अंशुमान महाले व कलाकार हैं – श्रद्धा कपूर, शाहिद कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम, सुधीर पांडे, समीर सोनी, फरीदा जलाल, सुप्रिाया पिलगांवकर, अतुल श्रीवास्तव व अन्य.

चांद पर जाने वाले पहले व्यावसायिक यात्री होंगे युसाकू माइजावा

बड़े बुजुर्गों से चांद की कहानियां सुनकर बड़े होने वाले अमूमन लोग बचपन में चांद पर घूमकर आने के सपने देखते हैं और बड़े होकर इसे असंभव मानकर भूल जाते हैं. लेकिन जापान के उद्योगपति युसाकू माइजावा (42) का बचपन का सपना सच होगा. असल में चांद पर पहले व्यवासयिक यात्री के रूप में उन्हें चुना गया है. मशहूर टेक कंपनी इलोन मस्क 2023 में अपने यान ‘बिग फॉल्कन रॉकेट’ से उन्हें चंद्रमा पर ले जाएगी.

बिग फॉल्कन रॉकेट की प्रणाली को चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने के लिए काम में लाने योग्य माना जा रहा है. हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब रॉकेट तैयार कर रही कंपनी मस्क ने पर्यटकों को चंद्रमा की सैर कराने का वादा किया है. गौरतलब है कि अब तक अमेरिकी ही पृथ्वी की कक्षा से बाहर गए हैं.

1969 में चांद पर कदम रखने वाले नील आर्मस्ट्रांग पहले मानव थे. वह नासा के अपोलो मिशन के तहत अपने दल के साथ चंद्रमा पर गए थे. युसाकू माइजावा की यात्रा के खर्च के बारे में अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है पर उनका कहना है कि साथी कलाकारों के लिए यह यात्रा मुफ्त होगी.

387 फुट लंबा यान कराएगा सात दिन की यात्रा

बीते सोमवार को टेक कंपनी इलोन मस्क ने माइजावा को बिग फॉल्कन रॉकेट का पहला यात्री चुने जाने की घोषणा की. माइजावा ने अपने इस बचपन के सपने को ‘डियर मून’ नाम दिया है. 387 फुट लंबा यह यान फिलहाल स्पेसएक्स कंपनी के पास निर्माणाधीन है. यह अमेरिका की एरोस्पेस विनिर्माता एवं अंतरिक्ष परिवहन सेवा कंपनी है, जिसके संस्थापक ने ही टेस्ला भी स्थापित की है.

यह यान 2023 तक उड़ान के लिए तैयार हो जाएगा. मानव उड़ान से पहले यान का कई बार मानव रहित उड़ान परीक्षण किया जाएगा. यान को इंटर प्लेनेटरी ट्रांसपोर्ट सिस्टम में बदला जाएगा जो कि पृथ्वी से उड़कर सौर मंडल में कहीं भी जाने की क्षमता रखता है.

खरबपति माइजावा ने पूरा यान कर लिया है बुक

बिग फॉल्कन रॉकेट नामक विशेष अंतरिक्षयान में सौ सीटों की क्षमता है. खास बात यह है कि कंपनी के अनुसार माइजावा ने सभी सीटें खरीद ली हैं. उन्होंने घोषणा की हैकि वह अपने साथ यात्रा पर छह से आठ चित्रकारों को भी मुफ्त में ले जाएंगे. माइजावा के पास वर्तमान में तीन खरब संपत्ति है. वह जापान की सबसे बड़ी ऑनलाइन फैशन रिटेलर वेबसाइट जोजो के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं. फोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें जापान के अमीरों की सूची में 18वां स्थान दिया है. साथ ही उनकी पहचान वैश्विक कला संरक्षक के रूप में भी दुनियाभर में है.

एक झटके में सुशांत को छोड़ गईं कृति

पिछले काफी समय से खबरें आ रही थीं कि सुशांत सिंह राजपूत को लेकर कृति सैनन बहुत सीरियस हैं. वह उनके साथ अपना रिश्ता आगे बढ़ाना चाहती हैं. खुद सुशांत भी इसी मुगालते में जी रहे थे कि उनकी एक्स गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे की तरह कृति भी उनके प्यार में गिरफ्तार हो जाएंगी लेकिन कृति ने बहुत जल्द उनकी गलतफहमी दूर कर दी.

अपने करियर का हवाला देते हुए उन्होंने सुशांत को हमेशा के लिए टाटा बाय-बाय कह दिया. कृति कभी सुशांत के लिए सीरियस थी ही नहीं. वह भी उनके साथ अपना टाइम पास ही कर रही थीं. दरअसल, सुशांत के दिलफेंक रवैये से कृति अच्छी तरह वाकिफ थीं. उन्होंने सुशांत से साफ कह दिया कि वह अपने काम पर फोकस करना चाहती हैं. वह प्यार के चक्कर में अपने करियर से किसी तरह का कोई समझौता नहीं करेंगी.

सुनने में आ रहा है कि कृति को सुशांत से अलग होने का जरा भी अफसोस नहीं है. वह अपनी लाइफ पहले की तरह ही एंजॉय कर रही हैं. हाल ही में कार्तिक आर्यन के साथ फिल्म ‘लुका छिपी’ की रैप अप पार्टी में भी उन्होंने जमकर मस्ती की.

काम का भूत सवार

कृति कई बार यह बोल चुकी हैं कि वह दोस्ती या प्यार की वजह से अपने करियर को दांव पर नहीं लगा सकतीं. वह अपने अच्छे काम को लेकर लोगों के बीच चर्चा का विषय बनना चाहती हैं. उन्हें अपनी निजी जिंदगी को लेकर जबरदस्ती की लाइमलाइट बटोरना पसंद नहीं है. उनकी पिछली फिल्म ‘बरेली की बर्फी’ में उनके काम की खूब तारीफ हुई. यही वजह है कि अब अपनी आने वाली फिल्मों के लिए वह डबल मेहनत कर रही हैं.

इन दिनों कृति ‘हाउसफुल-4′ की शूटिंग में व्यस्त हैं. बताया जा रहा है कि बीमार होने के बावजूद वह लगातार काम कर रही हैं. इसके बाद कृति ‘पानीपत’ और ‘अर्जुन पटियाला’ जैसी फिल्मों के काम पर जुट जाएंगी. वैसे यह भी सच है कि कृति ने भले ही सुशांत के बाद बॉलीवुड में कदम रखा हो लेकिन लोकप्रियता के मामले में वह सुशांत से आगे हैं.

छोटी बचत पर अब मिलेगा बड़ा फायदा, जानिए कैसे

छोटी बचत करने वाले जमाकर्ताओं को केंद्र सरकार ने गुरुवार को बड़ा तोहफा दिया है. वित्त मंत्रालय ने आठ तरह की लघु बचत योजनाओं की ब्याज दरों में 0.4 फीसदी का इजाफा किया है. इससे डाकघर और बैंकों में छोटी बचत योजनाएं चलाने वाले ग्राहकों को बड़ा फायदा मिलेगा.

वित्त मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2018-19 की तीसरी तिमाही के लिए विभिन्न लघु बचत योजनाओं की ब्याज दरें संशोधित की जाती हैं. इसके तहत ब्याज दरों में 0.3 प्रतिशत से लेकर 0.4 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गई है, जो एक अक्तूबर 2018 से 31 दिसंबर 2018 तक प्रभावी रहेंगी.

बढ़ी हुई ब्याज दरें पांच वर्ष की सावधि जमा, आवर्ती जमा और वरिष्ठ नागरिक बचत योजनाओं पर लागू होंगी. यह निर्णय लघु बचत को प्रोत्साहित करने और वरिष्ठ नागरिकों एवं बच्चियों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए लिया गया है. लघु बचत योजनाओं के लिए ब्याज दरों को तिमाही आधार पर संशोधित किया जाता है. हालांकि, सरकार ने बचत जमा के लिए ब्याज दरों में कोई संशोधन नहीं किया है और इसे चार प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है.

कई साल बाद बढ़ोतरी

एनएससी, पीपीएफ जैसी लघु बचत योजनाओं की ब्याज दरों में बढ़ोतरी करीब सात साल बाद की गई है. कई लघु बचत योजनाओं पर ब्याज दरें एक अप्रैल 2012 से लगातार कम हो रही थीं. इससे पहले जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए एनएससी,पीपीएफ समेत लघु बचत की अन्य योजनाओं की ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया था.

आठ तरह की योजनाओं पर असर होगा

वरिष्ठ नागरिक बचत योजना

पांच साल की इस योजना पर ब्याज दर को 8.3% से बढ़ाकर 8.7% किया गया है. इसका तिमाही आधार पर भुगतान होता है.

टाइम डिपॉजिट (टीडी)

एक साल के टीडी पर ब्याज दर 6.6% से 6.9% की गई है. वहीं, दो साल पर 6.7% से 7%, तीन साल पर 6.9% से 7.2% और पांच साल के टीडी पर 7.4% से 7.8% किया गया है.

सुकन्या योजना

सुकन्या समृद्धि योजना पर ब्याज दर 8.1% से बढ़ाकर 8.5% कर दी गई है. इसका भुगतान सालाना आधार पर किया जाता है.

एनएससी

राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र पर भी ब्याज दरों को 7.6% से बढ़ाकर 8.0% किया गया है. इसमें भी सालाना भुगतान होता है.

पीपीएफ

लोक भविष्य निधि की योजनाओं पर मौजूदा 7.6 फीसदी के ब्याज को बढ़ाकर 8.0% किया गया है. इसका भुगतान सालाना होता है.

रिकरिंग

डाकघर की पांच साल की रिकरिंग डिपॉजिट (आरडी) पर ब्याज 6.9% से 7.3% हो गया है. इसका भुगतान तिमाही होता है.

मासिक आय खाता

पांच वर्ष की सावधि जमा, आवर्ती जमा खाते पर ब्याज 7.3% से 7.7% कर दिया गया है. इसका भुगतान मासिक होता है.

केवीपी

किसान विकास पत्र पर अब 7.3% की जगह 7.7% की दर से ब्याज मिलेगा. यह 118 माह की जगह 112 माह में परिपक्व होगा.

हर तीसरे सेकंड में एक शख्स खो रहा है अपनी याददाश्त

दुनिया में हर तीसरे सेकंड एक शख्स भुलक्कड़ बनता जा रहा है. भागती-दौड़ती जिंदगी के तनाव, सही खानपान व कसरत की कमी और बढ़ती उम्र जैसे कई कारण हमारी याददाश्त छीनने में लगे हुए हैं. डिमेंशिया के ही एक प्रकार अल्जाइमर में खासतौर से बुजुर्ग धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खोने लगते हैं. हालांकि सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे भी इस बीमारी की गिरफ्त में आने लगे हैं. विश्व अल्जामइर दिवस के मौके पर आइए जानते हैं इस खतरे के बारे में.

दुनिया का हाल

– 4.68 करोड़ लोग डिमेंशिया से पीड़ित

– 7.47 करोड़ मरीजों की संख्या 2030 तक पहुंचने की आशंका

– 13.15 करोड़ तक पहुंच सकती है यह संख्या 2050 तक

भारत की स्थिति

– 40 लाख भारतीय डिमेंशिया से पीड़ित वर्तमान में

– 16 लाख इनमें से अकेले अल्जाइमर के शिकार

एशिया में समस्या ज्यादा

– 2.29 करोड़ डिमेंशिया के मरीज एशिया में

– 98 लाख लोग दक्षिण एशिया में इस बीमारी से ग्रस्त

– 1.05 करोड़ के साथ यूरोप दूसरे नंबर पर

– 94 लाख इस बीमारी के शिकार अमेरिका द्वीप में

– 40 लाख अफ्रीकी भी डिमेंशिया की चपेट में

चीन-अमेरिका के बाद भारत का नंबर

देश                                     मरीज (लाख में)

चीन                                             95

अमेरिका                                      42

भारत                                           41

जापान                                         31

ब्राजील                                        16

जर्मनी                                         16

रूस                                           13

इटली                                         12

इंडोनेशिया                                 12

फ्रांस                                         12

मध्यम और उच्च आय वाले देशों पर खतरा

68 % मामले मध्यम आय वर्ग देशों में होंगे 2050 तक 58 फीसदी मामले इन्हीं देशों से थे 2015 तक

देश की कुल अर्थव्यवस्था जितना खर्च

1 लाख करोड़ रुपये का बोझ साल 2018 में 81,800 करोड़ डॉलर का बोझ था 2015 में इस बीमारी की वजह से 18वीं बड़ी अर्थव्यवस्था होती दुनिया में अगर यह बीमारी एक देश होती

इन कंपनियों से भी बड़ी

74,200 करोड़ डॉलर की कंपनी एप्पल की

36,800 करोड़ डॉलर से ज्यादा कीमत गूगल की

क्या है अल्जाइमर

अल्जाइमर डिमेंशिया का ही एक रूप है, जिसका असर याददाश्त पर होता है. यह एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जो मस्तिष्क कोशिकाओं के लगातार नुकसान के कारण होती है.

डिमेंशिया के खतरों को करें कम

भूलने की बीमारी से बचने के लिए तनाव से दूर रहने के अलावा नियमित तौर पर शारीरिक व मानसिक व्यायाम करें. स्वस्थ आहार के साथ शराब व धूम्रपान से भी दूर रहें.

(स्रोत : विश्व अल्जाइमर रिपोर्ट-2015)

खुशखबरी : इन सामानों के दाम 15 से 20 फीसदी तक होंगे कम

ग्रॉसरी और रोजमर्रा के उपयोग के दूसरे सामान खरीदने वालों को इस त्योहारी तिमाही में पिछले दो साल के मुकाबले 10-15 प्रतिशत कम दाम पर खरीदारी करने का मौका मिल सकता है. नवंबर 2016 में नोटबंदी और पिछले साल जुलाई में जीएसटी लागू होने के कारण लगातार दो साल दिसंबर क्वॉर्टर में सुस्ती का सामना कर चुकी कंपनियां इस बार प्राइसिंग ऑफर और प्रमोशनल स्कीमों के जरिए उपभोक्ताओं को लुभाने की तैयारी कर रही हैं.

ITC के डिविजनल चीफ (फूड्स) हेमंत मलिक के अनुसार, ‘हम अपने सभी ब्रांड्स के दाम इस फेस्टिव सीजन में आकर्षक स्तर पर रखेंगे. कंज्यूमर्स को ऐसे स्पेशल ऑप्शंस में वैल्यू दिखती है. हमें डिमांड पिछले साल से बेहतर रहने की उम्मीद है.’ होलसेलर मेट्रो कैश एंड कैरी ऐसे डिस्काउंट्स ऑफर करेगी, जिसे किराना स्टोर अपने ग्राहकों को दे सकें. इसके चीफ एग्जिक्यूटिव अरविंद मेदीरत्ता ने कहा, ‘आगामी त्योहारी तिमाही दो साल बाद पहली ऐसी तिमाही होगी, जिसमें नोटबंदी या जीएसटी का कोई असर नहीं दिखेगा. हमें जोरदार बिक्री की उम्मीद है.’

पारले प्रॉडक्ट्स के कैटेगरी हेड (बिस्किट्स एंड स्नैक्स) मयंक शाह ने कहा, ‘हम इस फेस्टिव क्वॉर्टर में ऑर्गनाइज्ड ट्रेड, किनारा स्टोर्स और कंज्यूमर्स के लिए कई प्राइसिंग प्वाइंट्स और पैक्स बना रहे हैं. हालांकि हम यह ध्यान भी रख रहे हैं कि अपने किसी भी ट्रेड चैनल में मौजूदा समीकरण न बिगड़ें.’ रिटेल इंडस्ट्री के एग्जिक्यूटिव्स ने कहा कि दिसंबर क्वॉर्टर में कई लॉन्च होने वाले हैं.

कंसल्टिंग और ऑडिट फर्म डेलॉयट इंडिया के पार्टनर अनिल तलरेजा ने कहा, ‘इंडस्ट्री नोटबंदी के असर से पूरी तरह और जीएसटी के असर से काफी हद तक उबर चुकी है. लिहाजा हमें इस फेस्टिव सीजन में डिस्काउंट ज्यादा रहने की उम्मीद है. हालांकि इसी दौरान कॉम्पिटीटिव डिस्काउंटिंग के कारण हमें ट्रेड चैनलों पर कुछ असर पड़ने की भी आशंका है.’मार्केट रिसर्चर नीलसन ने पिछले महीने अनुमान दिया था कि फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स सेक्टर कैलेंडर ईयर 2018 में 12-13 प्रतिशत बढ़ेगा.

नील्सन इंडिया के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर समीर शुक्ला ने रिपोर्ट में कहा था, ‘नोटबंदी और जीएसटी के कारण ट्रेड पर पड़ा असर पूरी तरह खत्म हो गया है.’ डाबर के सीईओ सुनील दुग्गल ने कहा, ‘यह फेस्टिव सीजन निश्चित तौर पर पिछले साल से बेहतर दिख रहा है. हमारे कंज्यूमर ऑफर और प्राइसिंग इसी के मुताबिक होंगे.’

नीलसन की रिपोर्ट में कहा गया था कि ओवरऑल एफएमसीजी मार्केट में करीब 10 प्रतिशत योगदान देने वाले मॉडर्न ट्रेड चैनल्स में ज्यादा ग्रोथ दिखी है, वहीं सिस्टम में कैश बढ़ने से रूरल मार्केट्स में भी तेजी आई है. जून क्वॉर्टर में एफएमसीजी सेल्स सालभर पहले के मुकाबले 10.9% बढ़ी थी. जून तक के 12 महीनों में इसमें 11.6% बढ़ोतरी आई.

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