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रवि शास्त्री को पृथ्वी शौ में दिखती है इन 3 महान बल्लेबाजों की झलक

भारतीय टीम के कोच रवि शास्त्री ने युवा खिलाड़ी पृथ्वी शौ की एक बार फिर से जमकर तारीफ की. पिछले मैच में पृथ्वी शौ को सचिन और सहवाग दोनों की तरह बताने वाले शास्त्री ने अब उनके अंदर एक और महान बल्लेबाज की झलक बताई है. शास्त्री ने रविवार को वेस्टइंडीज के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की श्रृंखला में 2-0 से जीत दर्ज करने के बाद कहा कि 18 साल के इस सलामी बल्लेबाज में सचिन तेंदुलकर और वीरेन्द्र सहवाग के साथ ब्रायन लारा की झलक भी दिखती है.

भारतीय कोच ने कहा, ” उसका (शौ) जन्म क्रिकेट खेलने के लिए ही हुआ है. वह आठ साल की उम्र से मुंबई के मैदानों में खेल रहा है. आप उसकी कड़ी मेहनत देख सकते हैं. दर्शकों को भी उसका खेल शानदार लगता है. उसमें थोड़ी सचिन की और थोड़ी सहवाग की झलक दिखती है और जब वह चलता है तो उसमें लारा की भी झलक दिखती है. उन्होंने कहा, ”अगर वह खुद को एकाग्र रखता है और खेल पर ध्यान देता है तो उसका भविष्य उज्ज्वल है.”

अपने पहले टेस्ट में शतक लगाने वाले शौ ने दूसरे टेस्ट मैच के दूसरे दिन 53 गेंद में 70 रन की पारी खेल भारत को शानदार शुरूआत दिलायी. वह दूसरी पारी में भी 33 रन पर नाबाद रहे. यह शौ के करियर की पहली टेस्ट सीरीज थी. इस सीरीज में 118.5 के बेहतरीन औसत के साथ उन्होंने सबसे ज्यादा 237 रन बनाने और इसलिए वो मैन औफ द सीरीज भी चुने गए.

अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है ‘रेमिटेंस’, जानिए ये है क्या

जब एक प्रवासी अपने मूल देश को बैंक, पोस्ट औफिस या औनलाइन ट्रांसफर से धनराशि भेजता है तो उसे रेमिटेंस कहते हैं. उदाहरण के लिए खाड़ी के देशों में काम कर रहे भारतीय कामगार या अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में डॉक्टर और इंजीनियर की नौकरी कर रहे प्रवासी भारतीय जब भारत में अपने माता-पिता या परिवार को धनराशि भेजते हैं तो उसे रेमिटेंस कहते हैं. जो देश रेमिटेंस प्राप्त करता है, उसके लिए यह विदेशी मुद्रा अर्जित करने का जरिया होता है और वहां की अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है. खासकर छोटे और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को गति देने में रेमिटेंस ने अहम भूमिका निभाई है.

कई देश ऐसे हैं, जिनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में रेमिटेंस से प्राप्त राशि का योगदान अन्य क्षेत्रों के मुकाबले काफी अधिक है. मसलन नेपाल, हैती, ताजिकिस्तान और टोंगा जैसे देश अपने जीडीपी के एक चौथाई के बराबर राशि रेमिटेंस के रूप में प्राप्त करते हैं.

वैसे राशि के हिसाब से देखें तो दुनियाभर में सर्वाधिक रेमिटेंस भारत प्राप्त करता है. विश्व बैंक के अनुसार 2017 में विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों ने 69 अरब डॉलर रेमिटेंस के रूप में स्वदेश भेजे. यह राशि भारत के जीडीपी की 2.7 प्रतिशत है और पिछले साल देश में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से काफी अधिक है.

रेमिटेंस प्राप्त करने के मामले में भारत ने पड़ोसी देश चीन को भी पीछे छोड़ दिया है. एक समय था, जब सबसे ज्यादा रेमिटेंस चीन में ही आता था. 2017 में चीन को रेमिटेंस से 64 अरब डॉलर, फिलीपींस को 33 अरब डॉलर, मैक्सिको को 31 अरब डॉलर, नाइजीरिया को 22 अरब डॉलर और मिस्न को 20 अरब डॉलर प्राप्त हुए. कुल मिलाकर पूरी दुनिया में 613 अरब डॉलर राशि का रेमिटेंस के रूप में आदान-प्रदान हुआ. इस तरह पता चलता है कि रेमिटेंस के रूप में कितनी बड़ी राशि का आदान-प्रदान वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के मध्य होता है.

हालांकि प्रवासियों को अपने मूल देश में रेमिटेंस भेजने में कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है. सबसे बड़ी कठिनाई रेमिटेंस भेजने की लागत है. विश्व बैंक के अनुसार लगभग 200 डॉलर भेजने पर 7.1 प्रतिशत लागत आती है, जो सतत विकास लक्ष्यों में तय किए गए तीन प्रतिशत के लक्ष्य की तुलना में दोगुने से ज्यादा है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस की महत्वपूर्ण भूमिका है. फिलहाल भारत का चालू खाते का घाटा जीडीपी के दो प्रतिशत के बराबर है. चालू खाते का घाटा देश के भीतर आने वाली विदेशी मुद्रा और देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा के अंतर को दर्शाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनिवासी भारतीय रेमिटेंस के रूप में विदेशी मुद्रा नहीं भेजते तो यह पांच प्रतिशत के आसपास होता और भारत भी तुर्की व अजेर्ंटीना जैसे देशों की कतार में खड़ा होता.

कोई नारी सशक्तिकरण नहीं हो रहा है : नीना गुप्ता

नीना गुप्ता उन अभिनेत्रियों में से हैं, जिन्होंने बचपन में अभिनेत्री बनने की बात नहीं सोची थी. अतिमहत्वाकांक्षी नीना गुप्ता तो अपनी मां के सपने को पूरा करने के लिए आईएएस आफिसर बनना चाहती थीं. मगर फिलोसफी विषय के साथ मास्टर की डिग्री की पढ़ाई के दौरान उनका थिएटर से जुड़ना हुआ. जिसने उन्हें अभिनय को करियर बनाने के लिए उकसाया और वह दिल्ली से मुंबई पहुंच गयी थीं. उन्हें शुभशंकर घोष की फिल्म ‘‘छोकरी’’ के लिए ‘‘सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री’’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. मगर करियर के शुरुआती दौर में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा. उन्हें फिल्मों में छोटे किरदारों को निभाना स्वीकार करना पड़ा था. तो दूसरी तरफ उनकी निजी जिंदगी भी कई तरह की समस्याओं से घिरी हुई थी. पर वह विजेता बनकर उभरी. खुद नीना गुप्ता कहती हैं- ‘‘मेरे करियर के पहले पड़ाव में मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा, पर मैंने उसे भी इंज्वाय किया था. मैंने खुद को शक्तिशाली बनाकर उन सारी समस्याओं का डटकर मुकाबला किया. मेरी सशक्त नारी की ईमेज ने ही बाद में मुझे अच्छे किरदार भी दिलाए.’’

इन दिनों आप एकदम अलग तरह की फिल्में कर रही हैं ?

मेरे लिए खुशी की बात है कि उम्र के इस पड़ाव पर मुझे विविधतापूर्ण किरदार निभाने के मौके मिल रहे हैं. जबकि बौलीवुड में यह आम धारणा है कि यह अभिनेत्री इस तरह के किरदार निभाती है, तो इसे वैसे ही किरदार दिए जाने चाहिए. यह सोच पूरी तरह से गलत है. अन्यथा पत्रकार के किरदार के लिए किसी पत्रकार को बुलाया जाना चाहिए, कलाकार को क्यों बुलाया जाता है? पर सिनेमा में आए बदलाव के बाद यह भ्रम लोगों का टूटा है और अब हमें विविधतापूर्ण किरदार मिल रहे हैं.

आप पिछले 35 वर्षो से अभिनय करती आ रही हैं. हमारे यहां हर कलाकार को किसी एक इमेज में बांधकर देखे जाने की धारणा की वजह क्या समझ में आयी?

वजह मुझे नहीं पता. मगर यदि हमने किसी कौमेडी फिल्म में काम कर लिया, तो हमें कौमेडी आर्टिस्ट की कैटेगरी में डाल दिया जाता. फिल्मकारों ने विभाजित कर रखा है. लो मिडल क्लास की महिला का किरदार के लिए फलां कलाकार, उच्च वर्ग की महिला के किरदार के लिए फलां अभिनेत्री को ले लो. कई बार मुझे लगता है कि क्या हमारे यहां के फिल्म निर्देशकों की कल्पना शक्ति कमजोर है?

पर आप सफल निर्देशक रही हैं?

हां!! तो मैंने निर्देशक के तौर पर प्रयोग किए थे. फिल्मों में हमेशा विलेन के किरदार निभाने वाले कलाकार को मैंने अपने सीरियल में रोमांटिक किरदार दिया था. जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया था. पर बाकी सभी निर्देशक भेड़चाल का शिकार हैं.

फिल्म ‘‘मुल्क’’ की रिलीज के बाद किस तरह की प्रतिक्रिया मिली?

लोगों ने कहा कि मैं इस फिल्म में बहुत नेचुरल नजर आयी हूं. देखिए, इस फिल्म में 40 प्रतिशत कोर्ट ड्रामा है. कोर्ट ड्रामा में तापसी पन्नू और ऋषि कपूर के किरदार अहम थे. तो फिल्म के प्रमोशन के दौरान मुझे किसी ने तवज्जो ही नहीं दी. लोगों ने सिर्फ तापसी और ऋषि को ही हाईलाइट किया. फिर भी मैं लोगों को बहुत अच्छी लगी. मेरा काम लोगों को बहुत पसंद आया. अनुभव सिन्हा जिन बातों में यकीन रखते हैं, वही उन्होंने अपनी फिल्म में कहा.

आपकी नजर में ‘‘मुल्क’’ में आपके किरदार की अहमियत नहीं थी?

ऐसा मैंने कब कहा. मैं मानती हूं कि इस फिल्म में मेरा किरदार सशक्त था. पर प्रमोशन में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया. मेरा किरदार एक घरेलू महिला का है. मुस्लिम परिवारों में घरेलू महिला यानी कि मेरा किरदार यूं भी घर से बाहर कम निकलता है. कहानी घर के अंदर नहीं, कोर्ट के अंदर थी. इसलिए भी प्रमोशन के दौरान मुझे यानी कि मेरे किरदार को तवज्जों नहीं दी गयी. मुझे बुरा भी नहीं लगा.

अमित शर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘बधाई हो’’ करने की मुख्य वजह क्या रही ?

आप यकीन करें या न करें, मगर हकीकत यह है कि मैंने इसकी पटकथा नहीं पढ़ी. क्योंकि इसकी विषय वस्तु ही अपने आप में काफी दिलचस्प है. बौलीवुड में हमारी उम्र की महिला कलाकारों को ऐसे रोचक किरदारों को अभिनय से संवारने के मौके मिलते ही नहीं है. कहानी चालिस की उम्र पार कर चुके एक पति पत्नी के जोड़े के इर्द गिर्द घूमती है, जहां पत्नी अप्रत्याशित रूप से गर्भवती हो गयी है.

फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगी ?

यह मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है, जो कि रेलवे कालोनी में रहता है. मैंने परिवार के मुखिया मिस्टर कौशिक (गजराव राव) की पत्नी का किरदार निभाया है. वह रेलवे में टिकट चेकर हैं. दो बेटे हैं. एक का नाम नकुल व दूसरे का गुलेर है. सुरेखा सीकरी सास हैं. हमारे घर में टिपिकल सतसंग, माता का पाठ होता रहता है. सब कुछ ठीक ठाक चल रहा होता है कि एक दिन पता चलता है कि मैं गर्भवती हूं. उसके बाद लोगों की तरह तरह की प्रतिक्रिया मिलती हैं. लोग कहते हैं कि बेटा शादी करने वाला हो गया है और खुद मां बनने जा रही हैं. परिवार का हर सदस्य अम्बरेस्ड हो जाता है. मेरी भी आंखें नीची रहती हैं. मैं कहीं आती जाती नही हूं. उधर सास भी कहती हैं कि, ‘बहू, इस उम्र में तूने क्या किया.’ तो यह जो हालात बनते हैं, उससे पूरा परिवार कैसे डील करता है, उसी पर यह पूरी फिल्म है.

क्या बड़ी उम्र में किसी महिला के मां बनने को लेकर जो कुछ बातें होती हैं, वह मध्यवर्ग में ही है या उच्च समाज में रहने वालों के साथ भी है?

शायद ऐसा ही है. मुझे लगता है कि उच्च वर्ग में किसी को इन सब बातों की परवाह नहीं होती है. मुझे लगता है कि निम्न और मध्यवर्ग परिवारों में मनोरंजन के साधन कम हैं. इसलिए लोग इस तरह की गपशप में मनोरंजन तलाशते रहते हैं.

नारी सशक्तिकरण की बहुत बातें हो रही हैं ?

सब बकवास है. कोई नारी सशक्ति करण या वुमन इम्पावरमेंट नहीं हो रहा है. औरतें जहां थीं, वहीं हैं. उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. नारी नौकरी करे, धन कमाए, कुछ भी करे, पर वुमन इम्पावरमेंट नही है.

आपको नहीं लगता कि वुमन इम्पावरमेंटऔर नारी स्वतंत्रता के क्षेत्र में सबसे पहला कदम आपने उठाया था?

हां! पर देखो न, तकलीफ तो मुझे ही हुई. देखिए मेरे कदम उठाने से क्या हुआ. आप अपनी बेटी को पढ़ा लो, फिर उससे नौकरी करा लो और उसके बाद उससे कहो कि वह पति यानी कि पुरुष के पैरों की दासी बनकर रहे. तो इसमें वुमन इम्पावरमेंट कहां हुआ? इस समस्या का कोई हल नही है.

यह हालात कैसे बदल सकते हैं?

यह हालात तभी बदल सकते हैं, जब हर औरत अपने बेटे को औरत का सम्मान करना सिखाए, इसमें काफी वक्त लगेगा. वह अपने बेटे को इस योग्य बनाए कि वह आटा भी गूंद सके और रोटी भी बना सके. जब वह अपने बेटे को सिखाएगी कि औरत पर हाथ नहीं उठाना चाहिए, तभी बदलाव आएगा. फिलहाल मुझे कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है.

आपकी बेटी ने अपने पति मधु मांटेना से तलाक लेने का जो निर्णय लिया, उससे भी आपको तकलीफ हुई होगी ?

पहली बात तो अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है. लेकिन जो कुछ भी हुआ है, उससे मैं बहुत दुःखी हूं और डिप्रेशन में हूं.

आपने अपनी बेटी माशाबा को समझाने की कोशिश नहीं की ?

एक मां होने के नाते मैंने अपने सारे प्रयास किए और कोशिश अभी भी जारी है. मैं तो यही चाहती हूं कि तलाक ना होने पाए. मैं अपनी बेटी की रगरग से वाकिफ हूं. तो उसे सर्वश्रेष्ठ सलाह मैं ही दे सकती हूं. अब वह मुझसे ज्ञान ले या ना ले,  यह उस पर निर्भर है. मेरी कोशिश में कोई कमी नहीं आएगी.

पर पति पत्नी के रिश्ते तीन चार साल में ढह क्यों जाते हैं ?

देखिए, ऐसा है कि समाज में रिश्ते कैसे बनेंगे? मेरी बेटी हो या कोई दूसरी औरत, जो नौकरी कर रही है, पैसे कमा रही है, वह नौकरी से आकर घर का काम भी करे, ऐसा नहीं हो सकता. कुछ जगह तो हालात यह हैं कि पत्नी, पति से ज्यादा कमा रही है. ऐसे में पत्नी घर का काम नहीं करना चाहेगी. नौकरी करके घर पहुंचने पर वह रोटी नहीं पकाना चाहेगी. तो स्वाभाविक तौर पर यदि पति घर के काम में पत्नी का हाथ नही बंटाएगा, तो झगड़े होंगे. गाड़ी नहीं चलेगी. वैवाहिक जीवन की गाड़ी तभी आगे चलती है, जब पति पत्नी दोनों में से कोई उपर नीचे हो. अब जिस तरह के हालात हैं, जहां पति और पत्नी दोनों कमा रहे हैं, वहां वैवाहिक जीवन तभी सफल होगा, जब पति शादी से पहले यह मानकर चले कि अब मुझे बदलना है और पत्नी के साथ मिलकर खाना भी पकाना है, कपड़े भी धोने हैं. यदि आप सोचें कि पत्नी आफिस से आकर आपको चाय बनाकर देगी, तो ऐसा कम ही होगा.

आप दूसरी महिलाओें को क्या संदेश देना चाहेंगी?

हर औरत को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह किसी भी पुरुष को इस बात का अहसास न होने दे कि वह पुरुष उसकी जिंदगी के लिए बहुत जरुरी है. जिस दिन औरत, पुरुष को जरुरी होने का अहसास दिला देती है, पुरुष उसका फायदा उठाने लगता है. कड़ी मेहनत करते हुए आर्थिक रूप से स्वतंत्र बने, अपने आप पर यकीन करें. खुद से प्यार करें. अपनी पहचान ना खोएं.

सोशल मीडिया की बड़ी चर्चा है. कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया में समाज व देश को बदलने की ताकत है. आपको क्या लगता है?

सोशल मीडिया ताकतवर है. सोशल मीडिया के ही चलते मुझे पुनः अभिनय करने का काम मिला. मैंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था कि मुझे काम चाहिए, मैं दिल्ली नहीं मुंबई में रहती हूं. उसके बाद मुझे काम मिलना शुरू हो गया. डेढ़ माह पहले इंस्टाग्राम पर मेरे ग्यारह हजार फौलोअर्स थे. अब पचास हजार फौलोअर्स हैं. तो इसका फायदा हो रहा है.

सोशल मीडिया पर आपको अपने जीवन के अनुभव लिखने चाहिए, जो कि युवा पीढ़ी को प्रेरणा दे सकते हैं ?

मैंने कई बार सोचा. मैंने किताब लिखने के बारे में भी सोचा, पर फिर नहीं लिखा गया. क्योंकि मेरे अनुभव में तो अपने निजी लोग ही जुड़े हुए हैं. मैं सच लिखती तो जिनसे मेरे संबंध रहे हैं, उन्हें तकलीफ देता. वह कोई भी हो सकता है. यदि आप यह सोचकर लिखेंगे कि किसी को तकलीफ न हो, तो आप इमानदार नहीं रह सकते. मैं वह काम नहीं करना चाहती, जहां मैं इमानदार न रहूं. मैं ईमानदारी से कोई बात लिखती, तो मेरी बेटी माशाबा को तकलीफ पहुंचती. सच ना लिखने का मजा ही नही है.

‘‘बधाई हो’’ के बाद किन फिल्मों में नजर आएंगी?

वृंदावन की विधवाओं पर एक फिल्म ‘‘द लास्ट कलर’’ की शूटिंग पूरी की है. इसके अलावा अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म ‘पंगा’ और एक अन्य फिल्म ‘मीठा पान’ कर रही हूं.

मिन्नतें करने पर भी नहीं आया बेटा, फ्लैट में मिला मां का शव

वह बीमार थीं. अकेली भी. सप्ताह में दो बार डायलिसिस होती थी. खुद अस्पताल भी आ-जा नहीं सकती थीं. पति से तलाक के बाद इकलौते बेटे का सहारा था, जो दो साल पहले बेंगलुरु में नौकरी करने चला गया था. 25 दिन पहले तबीयत ज्यादा खराब हुई तो बेटे को फोन किया. रोती हुई नोएडा आने की मिन्नतें कीं, लेकिन वह नहीं पसीजा. शनिवार को उनके फ्लैट से बदबू आने लगी. पड़ोसियों की सूचना पर रविवार को अभागा बेटा फ्लाइट से पहुंचा भी, लेकिन तब तक मां का शरीर गल चुका था.

मूलत: पश्चिम बंगाल की रहने वालीं बबीता बसु (52) की मौत रिश्तों में खत्म होती संवेदना और दम तोड़ते मूल्यों की दर्दनाक कहानी है. एक मीडिया संस्थान में काम करने वालीं बबीता सेक्टर-99 स्थित सुप्रीम अपार्टमेंट में दो साल से किराये पर रह रही थीं. पति मधुसूदन पाल से 10 साल पहले तलाक हो चुका था. इकलौता बेटा सिद्धार्थ दो साल से बेंगलुरु में रह रहा है. वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. बबीता की दोनों किडनी खराब थी और एक साल से डायलिसिस चल रहा था. देखभाल के लिए कोई नहीं था और वह अकेले ही डॉक्टर के पास जाती थीं. दो महीने से तबीयत ज्यादा बिगड़ने से सप्ताह में दो बार डायलिसिस हो रही थी.

शव के पास टेबलेट, पानी की बोतल व फल मिले

शनिवार देर रात फ्लैट से बदबू आने पर पड़ोसियों ने उनके फ्लैट का दरवाजा खुलवाना चाहा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. तब उन्होंने फोन कर उनके बेटे को जानकारी दी. सिद्धार्थ बेंगलुरु से फ्लाइट से सुबह करीब 9 बजे घर पहुंचा. इसके बाद मकान मालिक से डुप्लीकेट चाबी लेकर फ्लैट खोला. अंदर देखा तो बबीता का सड़ा गला शव बिस्तर पर पड़ा था. उस पर मक्खियां और चिटियां रेंग रही थीं. पास ही दवा, पानी की बोतल व फल आदि पड़े थे.

मां बहुत काम है

पुलिस को बबीता के फोन की ऑडियो रिकॉर्डिग मिली है. 19 सितंबर को वह बेटे से फोन पर कह रही हैं, अब सप्ताह में दो बार डायलिसिस होने लगी है, आ जाओ. सिद्धार्थ ने काम अधिक होने का हवाला देते हुए दिवाली में आने की बात कही थी. इसके बाद एक बार भी मां से बात नहीं की.

आखिरी बार 28 को दिखी थीं

सुप्रीम टावर के आरडब्ल्यूए के सदस्य भानू प्रताप गुप्ता ने बताया कि बबीता लोगों से कम मिलती थीं. वह आखिरी बार 28 सितंबर को देखी गई थीं. पुलिस के मुताबिक मौत दस दिन के अंदर हुई है, हालांकि सच्चाई पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलेगी.

फेफड़े थाम कर बैठिए, आ रही है पराली वाली हवा

इस बार भी अधूरी तैयारियों के साथ एनसीआर में GRAP को लागू करना पड़ा है. अभी नोएडा, गुरुग्राम जैसे शहरों में भी डीजल सेट को बंद करने के लिए सरकारें तैयार नहीं है, जिसकी वजह से इस नियम से उन्हें छूट दी गई है. इस पर पर्यावरणविद् सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि अगर प्रदूषण से सख्ती से निपटना है, तो दिल्ली के आसपास तो नियमों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है.

डीजल सेट पर रोक की बात पर सेफ (सोशल एक्शन फॉर फारेस्ट एंड एनवायरमेंट) के फाउंडर विक्रांत तोंगड ने कहा कि अभी तो GRAP दिल्ली में ही ठीक से लागू नहीं हो पा रहा है. गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहर इसे लागू नहीं कर पा रहे हैं, जो भिवाड़ी, ग्रेटर नोएडा, मेवात जैसे एनसीआर के अन्य इलाकों का हाल तो काफी बुरा है. सिर्फ दिल्ली में डीजी सेट पर रोक से बात नहीं बनेगी, जबकि दिल्ली से काफी अधिक डीजी सेट एनसीआर खासतौर पर नोएडा और गुरुग्राम में इस्तेमाल हो रहे हैं. दूसरे साल में भी इन शहरों में बिजली की व्यवस्था नहीं हो सकी है.

वहीं दूसरी तरह अभी बड़ी संख्या में रामलीलाओं के दौरान डीजी सेट का प्रयोग हो रहा है. दुर्गा पूजा में भी डीजी सेट चल रहे हैं. ऐसे में देखना यह होगा कि सोमवार से यहां लगे डीजी सेट बंद होंगे या इन पर क्या एक्शन लिया जाता है. पिछले साल भी डीजी सेट बैन के बावजूद कहीं जगहों पर चलते रहे. कुछ जगहों पर इन पर कार्रवाई भी की गई. हालांकि डिस्कॉम कंपनियों ने दावा किया है कि वह बिजली के अस्थाई कनेक्शन लोगों को 24 से 30 घंटे में उपलब्ध करवा देंगी. इसके अलावा नवंबर में शादियां शुरू होने पर डीजी सेट की डिमांड बढ़ेगी.

पिछले साल से कितना सुधार

  • ईस्टर्न एक्सप्रेस वे शुरू हो चुका है. इससे दिल्ली आने वाले ट्रकों की संख्या कम हुई है
  • दिल्ली के पास सड़कों को साफ करने के लिए अधिक मैकेनाइज्ड मशीनें हैं
  • एयर क्वॉलिटी काफी अधिक स्टेशनों से की जा रही है,पिछली बार डीपीसीसी के 20 स्टेशन GRAP से नहीं जुड़े थे
  • पराली जलाने से रोकने के लिए यूपी और हरियाणा में स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम अपनाया गया है
  • आईएमडी का अर्ली वॉर्निंग सिस्टम शुरू हो गया है
  • टास्क फोर्स टीमें दिल्ली के अलावा एनसीआर में भी जा रही हैं

पंजाब-हरियाणा में रोज 40 से 70 जगहों पर जलाई जा रही है पराली

पंजाब और हरियाणा में रोज 40 से 70 जगहों पर पराली जल रही है. नासा मैप से मिले सबूतों के आधार पर सीएसई ने यह दावा किया है. हालांकि राज्य सरकारों के अनुसार पिछले साल की तुलना में पराली जलाने की घटनाओं में 50 पर्सेंट की कमी आई है. बहरहाल उत्तर पश्चिमी हवाओं के साथ अब पराली का धुंआ दिल्ली पहुंचने लगा है और दिल्ली की हवा खराब हो रही है.

पिछले साल भी पराली की समस्या की वजह से अक्टूबर में ही दिल्ली का दम घुटना शुरू हो गया था. स्मॉग की चादर दिल्ली और एनसीआर में काफी अधिक छाई रही थी. शनिवार को बने हालातों से इस बार भी स्थिति उसी तरह इशारा कर रही है. दिल्ली एनसीआर में पहले ही लोगों ने एंटी पल्यूशन मास्क निकाल लिए हैं. लोगों को लंबे समय तक बाहर न रहने की सलाह दी जाने लगी है. खरीफ फसलों की कटाई अब जोर पकड़ने लगी है और इसी के साथ पराली जलाने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. नासा अर्थ से मिली तस्वीरों के अनुसार हरियाणा और पंजाब में 25 सितंबर और 11 अक्टूबर को काफी संख्या में आग लगाई गई.

हवा में हुआ कुछ सुधार, लेकिन राहत नहीं

दिल्ली की हवा में कुछ सुधार हुआ है, दिन के समय धूप निकलने और हवाओं की रफ्तार में मामूली तेजी आने से एयर इंडेक्स कुछ सुधरा है, लेकिन अधिक राहत नहीं मिली है. सफर के अनुसार आने वाले दो दिनों में फिर से एयर इंडेक्स में गिरावट आएगी. हवा में पीएम 10 के अलावा पीएम 2.5 का स्तर भी बढ़ेगा. दिल्ली में उत्तर पश्चिमी हवाएं आ रही हैं जो पंजाब और हरियाणा से पराली का धुआं लेकर दिल्ली पहुंच रही है. इसकी वजह से प्रदूषण का स्तर भी बढ़ रहा है.

GRAP के मानक

खतरनाक प्लस या इमरजेंसी

कब : पीएम 2.5 का स्तर 300 और पीएम 10 का स्तर 500 एमजीसीएम से अधिक

ये कदम उठाने जरूरी

  • दिल्ली में ट्रकों की एंट्री पर रोक (जरूरी सामान को छूट)
  • निर्माण पर रोक,प्राइवेट गाड़ियों पर ऑड-ईवन लागू
  • टास्क फोर्स स्कूल बंद करने जैसे जरूरी कदम उठा सकती हैं

खतरनाक

कब : 2.5 का स्तर 250 और पीएम 10 का 430 एमजीसीएम से अधिक

ये कदम उठाने जरूरी

  • ईंट भट्ठे बंद करने,हॉट मिक्स प्लांट बंद करने के आदेश
  • बदरपुर पावर प्लांट बंद गैस बेस्ड प्लांट से ज्यादा बिजली
  • सड़कों की सफाई मशीनों से और सड़कों पर पानी का छिड़काव

बेहद खराब

कब : पीएम 2.5 का स्तर 121 से 250 एमजीसीएम, पीएम 10 का स्तर 351 से 430 एमजीसीएम

ये कदम उठाने जरूरी

  • डीजी सेट पर रोक,कोयले व लकड़ी के प्रयोग पर प्रतिबंध
  • पार्किंग चार्ज में तीन से चार गुना का इजाफा
  • बस-मेट्रो की सर्विस में बढ़ोत्तरी

खराब

कब : पीएम 2.5 का स्तर 61 से 120 एमजीसीएम, पीएम 10 का स्तर 101 से 350 एमजीसीएम

ये कदम उठाने जरूरी

– थर्मल पावर प्लांट पर प्रदूषण से जुड़े मानकों का सख्ती से पालन

– समय-समय पर सड़कों की मशीनों से सफाई

सिनेमा में बदलाव और नीना गुप्ता

बौलीवुड में पिछले 36 वर्षों से कार्यरत अभिनेत्री नीना गुप्ता का करियर काफी उथल पुथल वाला रहा है. जबकि उन्होंने थिएटर, टीवी व फिल्म तीनों माध्यमों में जमकर काम किया. नीना गुप्ता ने बतौर निर्माता व निर्देशक ‘सांस’, ‘दर्द’ जैसे कुछ टीवी सीरियल भी बनाए. बीच में वह कुछ समय के लिए गायब हो गयी थीं. खुद को पुनः बौलीवुड से जोड़ने के लिए लगभग डेढ़ वर्ष पहले नीना गुप्ता ने ‘‘इंस्टाग्राम’’ पर पोस्ट किया था कि वह मुंबई में ही रहती हैंं और फिल्मों में बेहतरीन किरदार निभाना चाहती हैं.

इंस्टाग्राम पोस्ट के बाद अचानक नीना गुप्ता की लाटरी लग गयी. उन्हें ‘‘वीरे दी वेडिंग’’, ‘‘मुल्क’’ व ‘‘बधाई हो’’ सहित कई बेहतरीन फिल्मों में बेहतरीन रोचक किरदार निभाने के मौके मिल गए. अमित शर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘बधाई हो’’ 19 अक्टूबर को प्रदर्शित होने वाली है. इन दिनों वह दो वेब सीरीज व तकरीबन चार फिल्मों में अभिनय कर रही हैं.

bollywood talk with Neena Gupta over change in cinema and television

नीना गुप्ता ने अपने 36 वर्ष के करियर में जहां खुद काफी उतर चढ़ाव देखा, वहीं उन्होने सिनेमा में आ रहे बदलाव को काफी करीब से देखा व महसूस किया. हाल ही में एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान जब हमने नीना गुप्ता से पूछा कि सिनेमा में जो पिछले 30 वर्षों में बदलाव आया, वह बदलाव कैसा रहा और उस बदलाव के चलते उनके करियर पर क्या असर पड़ता रहा?

हमारे इस सवाल पर नीना गुप्ता ने बड़े ही सधे हुए शब्दों में कहा – ‘‘जब मैंने बौलीवुड में कदम रखा, उस समय सिर्फ सिनेमा था. उस वक्त डीडी मेट्रो भी नहीं था. मैंने फिल्मों में नौकरानी के किरदार सहित छोटे छोटे किरदारों को निभाते हुए करियर शुरू किया. मैंने सबसे पहले फिल्म ‘‘साथ साथ’’ में बड़ा किरदार निभाया था. जिसमें मैंने एक कौमेडियन लड़की का किरदार निभाया था. इस फिल्म के रिलीज के चंद रोज पहले एक फिल्मी पार्टी में गिरीष कर्नाड ने मुझसे कहा था, ‘नीना अब तुम खत्म हो गयीं.

कौमेडियन लड़की का किरदार निभाकर तुमने गलती कर दी. अब तुम कभी भी फिल्मों में हीरोइन नहीं बन पाओगी.’ उनकी बात सच साबित हुई. मेरे साथ वही हुआ.’’

bollywood talk with Neena Gupta over change in cinema and television

वह आगे कहती हैं – ‘‘उन दिनों कला सिनेमा काफी अच्छा बन रहा था. जिसे श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकार बना रहे थे और कला सिनेमा में हर किरदार स्मिता पाटिल या शबाना आजमी या दीप्ति नवल को जा रहे थे. मैंने श्याम बेनेगल के साथ बहुत फिल्में कीं, मगर ष्याम बेनेगल की हर फिल्म में मुख्य किरदार हमेशा शबाना आजमी को जा रहे थे. उन दिनों कमर्शियल फिल्मों में तो हम घुस ही नही पा रहे थे. डीडी मेट्रो के शुरू होने के बाद मैंने ‘सांस’, ‘दर्द’, ‘गुमराह’ सहित कई सीरियलों का निर्माण व निर्देशन किया. जिससे मुझे एक नयी जिंदगी मिली. मुझे विभिन्न प्रकार के किरदार निभाने के मौके मिले. उस वक्त भी मुझे कमर्शियल फिल्मों में किरदार नहीं मिल रहे थे. कमर्शियल में तो कभी मौका ही नहीं मिला. टीवी में हम बहुत अच्छा काम कर रहे थे. तो फिर हमने भी फिल्मों को बाय बाय कर दिया.’’

सिनेमा के बदलाव की चर्चा करते हुए नीना गुप्ता ने कहा – ‘‘अब सिनेमा काफी बदला है. अब सिनेमा में मध्यवर्गीय परिवार की कहानियां ली जा रही हैं. छोटे शहरों की कहानी व किरदारों को भी महत्व दिया जा रहा है. सबसे बड़ी बात यह हुई है कि युवा फिल्मकार बहुत तेजी से आगे आए हैं. तो हम जैसे कलाकारों को भी कुछ नया करने का मौका मिल रहा है.’’

मी टू पर आयोग क्यों

मी टू मुहिम की आंच नेताओं तक नहीं पहुंचना कम हैरत की बात नहीं रही, वजह शोषण राजनीति में भी कम नहीं होता, हैरत की बात यह भी है की मी टू के हो हल्ले में सबसे ज्यादा दिलचस्पी राजनेताओं ने ही ली और सबसे ज्यादा बयानबाजी भी उन्होंने ही की मानो नैतिकता की सारी ज़िम्मेदारी निभाने का ठेका उन्हीं के कंधों पर आ गया हो. शुरुआत चूंकि एम जे अकबर से हुई थी इसलिए तमाम नेता संभल कर बोले. सबसे ज्यादा अहम बयान एक्ट्रेस से केंद्रीय मंत्री बनीं स्मृति ईरानी ने दिया कि जिस पर आरोप लगा है वही सफाई भी देगा.

एम जे अकबर ने विदेश से लौटने के बाद उम्मीद के मुताबिक ही बयान दिया कि वे निर्दोष हैं और उन पर लगाए गए तमाम आरोप झूठे हैं लेकिन इससे बात नहीं बनने वाली क्योंकि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी पहले ही ऐलान कर चुकीं थीं कि मी टू मुहिम से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए चार रिटायर्ड जजों की कमेटी बनाई जाएगी जो ऐसे हर मामले की व्यापक सुनवाई करेगी.

बकौल मेनका गांधी कमेटी यानि आयोग में वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी और कानून के जानकार होंगे. यौन शोषण की शिकायतों से निबटने के सभी तरीकों और इससे जुड़े कानूनी और संस्थागत ढांचे को तैयार करने में यह कमेटी मदद करेगी.

अब यह तो मेनका गांधी भी नहीं बता सकतीं कि देश में कितने मामलों की जांच करने अभी तक कितने हजार आयोग बने हैं और उनका हश्र क्या हुआ है इन आयोगों की रिपोर्टें और सिफारिशें कहां कहां धूल चाट रहीं हैं इसका हिसाब किताब किसी के पास नहीं. यह तजुरबा जरूर हर किसी के पास है कि आयोग या कमेटी बनने से मामला आया गया हो जाता है और कोई चूं भी नहीं करता.

मी टू के लिए चार बेदाग जज मिल जाएंगे, इसमें कोई शक नहीं, ये जज आरोपियों और पीड़िताओं को तलब कर उनका पक्ष सुनेंगे, लेकिन फैसला देने का हक इन्हें नहीं रहेगा फिर इसके गठन के माने क्या.

क्या यह घोषणा सिर्फ हल्ला बंद करने की गई है दूसरे जब पीडिताओं के लिए अदालतें मौजूद हैं तो आयोग क्यों जिसमें करोड़ों रुपये फूंक जाएगा. मी टू कोई बहुत बड़ा स्केण्डल या घपला नहीं है इसके बारे में आम राय यह बन चुकी है कि दुखड़ा रो रही सभी महिलाएं दूध की धुली नहीं हैं कुछ शोहरत और दुश्मनी भुनाने भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहीं हैं जिनके चक्कर में वे महिलाएं भी शक के दायरे में आ रहीं हैं जो वास्तविक पीड़ित हैं और आरोपी को सजा दिलवाना चाहती हैं.

अगर आयोग बना तो उसके सामने एक बड़ा संकट समय सीमा का होगा कि क्या सालों बाद आरोपी को तलब किया जाना न्याय संगत होगा. लिमिटेशन एक्ट 1963 में स्पष्ट प्रावधान है कि इस प्रवृति के मामलों की शिकायत की अधिकतम अवधि तीन साल है अब क्या इस अधिनियम में संशोधन किया जाएगा और किया गया तो शिकायत की अधिकतम समय सीमा कितनी तय की जाएगी.

अलावा इसके यह साफ होना भी जरूरी है कि अगर पीड़िता ही झूठी पाई गई तो उसके खिलाफ क्या कारवाई की जाएगी, एम जे अकबर शिकायतकर्ता पत्रकार के खिलाफ मानहानि का मामला लेकर जाएंगे या नहीं यह और बात है लेकिन झूठी शिकायतों पर अंकुश लगाने जरूरी है कि मी टू की पीड़िताओं को यह स्पष्ट मालूम हो कि उनकी झूठी शिकायत से चूंकि एक इज्जतदार पुरुष की इमेज खराब होती है उसकी घर गृहस्थी पर बुरा असर पड़ता है उसकी नौकरी और व्यवसाय पर बुरा असर पड़ता है इसलिए आरोप साबित न होने की स्थिति में उन्हें भी सजा भुगतने तैयार रहना चाहिए.

प्रस्तावित आयोग को भी विचार कर लेना चाहिए कि वह शिकायतों को दहेज कानून के नजरिए भर से न देखे कि शिकायत हुई नहीं कि पति और उसके घरवाले अंदर, ये शिकायतें प्रामाणिक होनी चाहिए और आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी भी पीड़िता की ही होनी चाहिए, नहीं तो यह आयोग भी मजाक बन कर रह जाएगा, जो अपने खर्चे के बिल सरकार से वसूलता रहेगा और किसी को कुछ हासिल नहीं होगा.

पृथ्वी शौ : उम्मीद की नई उपजाऊ धरती

छोटा सा कद. ज्यादा वजन भी नहीं और उम्र महज 18 साल. यह सौरमंडल का कोई नया ग्रह नहीं है पर चमकता किसी सितारे की तरह है. हम बात कर रहे हैं मुंबइया क्रिकेटर पृथ्वी शौ की जिन्होंने हाल ही में वेस्टइंडीज के साथ हुई 2 मैचों की टेस्ट सीरीज से अपने टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत की और धमाल मचा दिया. इन 2 टेस्ट मैचों में पृथ्वी शौ ने 237 रन बनाए. रन बनाने की औसत रही 118.5 और स्ट्राइक रेट 94 थी. इस में एक शतक और एक अर्धशतक शामिल था.

पृथ्वी शौ ने राजकोट में खेले गए अपने पहले टेस्ट मैच की पहली पारी में शानदार 134 रन बनाए थे. इस मैच में भारत एक पारी और 272 रनों से जीता था. हैदराबाद में खेले गए दूसरे मैच में पृथ्वी शौ ने पहली पारी में ताबड़तोड़ 72 रन बनाए थे जबकि दूसरी पारी में वे 33 रन बना कर नाबाद रहे थे. नतीजतन, भारत ने इस सीरीज में जीत हासिल की और पृथ्वी शौ के हाथ में थी ‘मैन औफ द मैच’ की चमचमाती ट्रौफी.

अपने पहले ही टेस्ट मैच में शतक जमाने वाले पृथ्वी शौ के उम्दा खेल से भारतीय टीम के कोच रवि शास्त्री इतने खुश हुए कि उन्होंने पृथ्वी को सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा और वीरेंद्र सहवाग का ‘डेडली कौम्बिनेशन’ बता दिया.

पृथ्वी शौ की तेजतर्रार बल्लेबाजी के खुद सचिन तेंदुलकर कायल हैं. उन्होंने पृथ्वी की तारीफ करते हुए कहा, “बिना डर के बल्लेबाजी करना जारी रखो.”

पृथ्वी शौ को भी सचिन तेंदुलकर की तरह बल्लेबाजी करना पसंद है लेकिन साथ ही वे हमेशा पृथ्वी ही बने रहना चाहते हैं.

पृथ्वी शौ का पहला टेस्ट तो अव्वल दर्जे में पास हुआ है पर असली इम्तिहान तो अभी आना बाकी है. मुंबई के बाहरी इलाके विरार में पले बढ़े इस ‘टाइनी लिटिल मास्टर’ को अगर टीम में जगह मिली तो औस्ट्रेलिया में अपना हुनर दिखाना होगा.

पर अपने पिता पंकज शौ का लाडला यह बच्चा इस बात से न तो हैरान है और न ही परेशान है. उसे इस बात का भी डर नहीं है कि क्रिकेट के कुछ माहिरों को उस के खेल में कई तकनीकी कमियां दिखाई देती हैं. वे तो बेखौफ हो कर कहते हैं,” मुझे नहीं पता आगे क्या होने वाला है. मैं तो अभी इस पल का मजा ले रहा हूं. मैं भारत के लिए खेलते हुए ज्यादा से ज्यादा मैच जीतना चाहता हूं, वर्ल्ड कप भी.”

भले ही कमजोर दिखने वाली वेस्टइंडीज टीम के साथ टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत कर पृथ्वी शौ ने बेहतरीन शुरुआत की है लेकिन उन के खेलने की काबिलियत तो बचपन में ही उन के पिता को पता चल चुकी थी तभी तो आज महज 18 साल की उम्र में उन्होंने डोमेस्टिक क्रिकेट में इतने रिकौर्ड बना दिए हैं कि अगर उन का खेल पर ही फोकस रहा तो वे आने वाले कई साल तक क्रिकेट की दुनिया के चमकते सितारे बने रहेंगे.

बसपा के हाथी पर बैठ कितनी दूर चलेंगे अजीत जोगी

छतीसगढ़ में बड़े उलटफेर की उम्मीदें संजोये अजीत जोगी और मायावती को उस वक्त करारा झटका लगा जब बिलासपुर के सरकंडा में आयोजित उनकी संयुक्त जनसभा  में 30 हजार के ही लगभग भीड़ इकट्ठा हो पाई जबकि दावा 5 लाख की भीड़ जुटाने का था. गौरतलब है कि बसपा और अजीत जोगी की छतीसगढ़ जनता कांग्रेस पार्टी  90 सीटों वाले इस आदिवासी बाहुल्य राज्य में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. गठबंधन के तहत बसपा 35 और जनता कांग्रेस 55 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और अजीत जोगी इस गठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री होंगे.

सभा को संबोधित करते हुए दोनों नेता एक दूसरे के कानों को खुश करते रहे. मायावती ने अजीत जोगी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की बात कही तो अजीत जोगी ने भी उनकी उधारी तुरंत चुकाते उन्हें देश का अगला प्रधानमंत्री घोषित करते 2019 के लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ की पूरी 11 सीटें जिताने का वादा कर डाला.

बात पूरी तरह सूत न कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा वाली इस लिहाज से नहीं है कि यह गठबंधन सत्ता में आए न आए, लेकिन तकरीबन 15 सीटों पर तो भाजपा और कांग्रेस दोनों का खेल बिगाड़ने की स्थिति में है, लेकिन उसे मिलने वाली सीटों की संख्या 5 से 8  के बीच ही आंकी जा रही है. यानि यह गठबंधन  सीधी लड़ाई लड़ रहे दोनों प्रमुख दलों के लिए बराबरी से नुकसान पहुंचाएगा, खुद कोई खास फायदा नहीं उठा पाएगा.

इस गठबंधन की बड़ी दिक्कत दोनों ही दलों का प्रभाव क्षेत्र बिलासपुर के इर्दगिर्द ही सिमटा रहना है, इस इलाके की 15 सीटों के अलावा 3-4 सीटों पर उसके उम्मीदवार 10 हजार तक वोट ले जाने की स्थिति में हैं, लेकिन वे किसके वोट ज्यादा काटेंगे इस सवाल पर कोरबा के एक युवा पत्रकार सुब्रत राय का कहना है कि यह उम्मीदवारों की घोषणा के बाद समझ आएगा.

हाल फिलहाल जो समझ आ रहा है वह यह है कि बसपा का ग्राफ इस राज्य में भी चुनाव दर चुनाव गिरा है. साल 2003 में बसपा को यहां 6.94 फीसदी वोट मिले थे जो 2008 के चुनाव में 6.12 फीसदी रह गए थे लेकिन 2013 के चुनाव में यह तादाद और गिरकर 4.29 फीसदी पर आ गई थी तब उसका एक ही विधायक चुना गया था. इस चुनाव में बसपा के 6 उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचा पाये थे. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो बसपा सबसे दयनीय हालत में अगर कहीं है तो वह छत्तीसगढ़ है.

बात कम हैरत की नहीं, केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी बसपा के परंपरागत दलित वोटों का झुकाव कांग्रेस की तरफ ज्यादा बढ़ रहा है. 2013 के चुनाव के बाद एक एजेंसी सेंटर फार स्टडीज ऑफ द डेवलपिंग सोसाइटीज़ के एक सर्वे में यह उजागर हुआ था कि छत्तीसगढ़ में महज 11.5 फीसदी ही दलितों ने बसपा को वोट दिया था जबकि कांग्रेस को वोट करने वाले दलितों की तादाद 48.7 फीसदी थी.

सरकंडा में मायावती ने कांग्रेस पर अपना आरोप दोहराया कि वह बसपा को खत्म कर देना चाहती है, इसलिए उसने गठबंधन नहीं किया उलट इसके कांग्रेस का कहना यह है कि मायावती जरूरत से ज्यादा मुंह फाड़ रहीं थीं. सच जो भी हो पर छत्तीसगढ़ में इस बार भी बसपा कुछ खास कर पाएगी ऐसा लग नहीं रहा,क्योंकि अजीत जोगी के पाकेट में आदिवासी वोट न के बराबर हैं इसलिए दलित उनकी पार्टी को वोट देगा इसमे शक है.

छत्तीसगढ़ के दलित आदिवासी भी आरक्षण को लेकर डरे हुये हैं कि कहीं भाजपा इसे उनसे छीन न ले ऐसे में उन्हें कांग्रेस बेहतर विकल्प लग रहा है. मायावती और अजीत जोगी दोनों भाजपा और कांग्रेस पर बराबरी से बरसे लेकिन वोटर का भरोसा नहीं जीत पा रहे तो अब इसकी वजहें राजनैतिक कम सामाजिक ज्यादा हैं जिन्हें मायावती भी समझ रहीं हैं लेकिन उनकी कई मजबूरिया हैं.  हालफिलहाल उनकी ख़्वाहिश किसी तरह तीनों राज्यों में अपनी नाक बचाए रखने की है जिसके लिए वे अब छोटी पार्टियों का सहारा ले रहीं हैं.

कम भीड़ देखकर अजीत जोगी का भी चेहरा उतरा हुआ था जिनकी मंशा 10 से ज्यादा सीटें ले जाकर सरकार बनाने में अपनी टांग फसाने की है, लेकिन अब उन्हें भी समझ आ रहा है कि राजनीति उतनी आसान है नहीं जितनी कांग्रेस से निकाले जाने के बाद वे सोच रहे थे कि उनके हटते ही हाहाकार मच जाएगा. अब सिर्फ उनके अलावा कोई भी यह मानने तैयार नहीं कि अजीत जोगी के बगैर कांग्रेस छत्तीसगढ़ में कुछ नहीं. देखना दिलचस्प होगा के बसपा के हाथी पर बैठकर वे कितने दूर चल पाते हैं.

संदेह की दोधारी तलवार : भाभी के साथ भिंदा ने क्या किया

‘‘बीजी, आप आशू को साफसाफ कह क्यों नहीं देतीं कि वह हमारे घर न आया करे. पता नहीं क्यों, उसे देख कर मेरा खून खौल उठता है. मुझे डर है कि कहीं मुझ से कोई अनहोनी न हो जाए.’’ भिंदा ने अपनी मां कश्मीर कौर उर्फ कश्मीरो को समझाते और चेतावनी देते हुए कहा.

कश्मीर कौर जालंधर जिले के शहर नकोदर के आदी गांव के रहने वाले सतनाम सिंह की पत्नी थी. उस के छोटे बेटे भिंदा ने जब उस से यह बात कही तो वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर आज वह ऐसी बात क्यों कह रहा है. क्योंकि आशू तो भिंदा का जिगरी दोस्त था. फिर भी वह उस से बोली, ‘‘क्यों बेटा, आज आशू पर इतना नाराज क्यों हो रहा है? तेरा तो वह बचपन का दोस्त है. हम भी तो समयबेसमय उस के घर आतेजाते हैं.’’

मां की बात सुन कर भिंदा और भड़क गया. उस ने गुस्से से कहा, ‘‘मेरी बात आप को समझ नहीं आ रही, बीजी. अगर आशू मुझे इस घर में दिख गया तो मैं उस का कत्ल कर दूंगा.’’

‘‘अरे बेटा, तेरी तबीयत तो ठीक है.’’ कश्मीरो ने चिंतित होते हुए कहा, ‘‘तू आज कैसी बहकीबहकी बातें कर रहा है.’’

‘‘बहकीबहकी नहीं बीजी, मैं आप को समझाने के साथ चेतावनी भी दे रहा हूं. आप मेरी बात समझ जाएं तो अच्छा है वरना बहुत खूनखराबा होगा.’’ भिंदा ने यह बात दांत भींच कर कही थी.

कश्मीरो भिंदा का गुस्सा अच्छी तरह जानती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि ये दोनों तो बचपन से एक साथ खातेपीते उठतेबैठते थे. दांत काटी रोटी का याराना था उन के बीच तो फिर अचानक भिंदा आशू से इतनी नफरत क्यों करने लगा है.

बेटे के तेवर देख वह बोलीं, ‘‘ठीक है पुत्तर, मैं उसे समझा दूंगी कि वह यहां न आया करे.’’

अपनी मां से बात करने के बाद भिंदा आंगन में गेहूं साफ कर रही अपनी 25 वर्षीय भाभी नवप्रीत कौर उर्फ लवप्रीत के पास पहुंचा और उसे धमकी देते हुए बोला, ‘‘आप भी अपने कान खोल कर सुन लो, आशू अब इस घर में कदम नहीं रखेगा. लेकिन आप भी घर के बाहर उस से न कभी बात करना और न ही उस के घर जाना. अगर मेरी बात नहीं मानी तो ठीक नहीं होगा.’’

भिंदा की धमकी भरी बात सुन कर लवप्रीत को बड़ा गुस्सा आया. वह भी गुस्से में भिंदा को धमकाते हुए बोली, ‘‘खबरदार, जो मुझ पर कोई हुक्म चलाया. और फिर तुम होते कौन हो मेरे ऊपर अपना रौब जमाने वाले? यह हक केवल मेरे पति या सासससुर का है. तुम छोटे देवर हो, छोटों की तरह रह कर बड़ों की इज्जत करना सीखो.’’

‘‘वाह क्या कहने, नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली.’’ व्यंग्य कसते हुए भिंदा ने कहा, ‘‘मैं आशू और आप की सारी रामकहानी जानता हूं. पता है, सारा गांव आप की ही प्रेम कहानियों के गीत गा रहा है और आप मुझे…’’

‘‘बंद करो अपनी बकवास,’’ लवप्रीत ने भिंदा की बात बीच में ही काटते हुए कहा, ‘‘क्या देखा है तुम ने मेरे और आशू के बीच. और फिर वह मेरा कोई चहेता नहीं है, तुम्हारा और तुम्हारे भाई का ही दोस्त है. मेरी शादी के पहले से ही वह इस घर में आताजाता रहा है. तुम्हारी मां ने अपना बेटा बना रखा है उसे. तब तुम्हें कोई तकलीफ नहीं हुई, जब तुम्हारी और तुम्हारे भाई की गैरमौजूदगी में वह इस घर के सारे काम किया करता था.’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहता. अगर आज के बाद आप ने उस के साथ बात की तो ठीक नहीं रहेगा बस. मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं.’’

इस के बाद दोनों देवरभाभी में इसी बात को ले कर तकरार होने लगी और देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि लवप्रीत ने गुस्से में आ कर भिंदा को एक थप्पड़ जड़ दिया.

जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा सतनाम सिंह का छोटा बेटा था. सतनाम सिंह की कुछ साल पहले मौत हो जाने के कारण मां कश्मीरो ने ही घर की बागडोर संभाली. अपनी थोड़ी सी जमीन को संभालने के साथ दोनों बेटों तीरथ सिंह और जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा की परवरिश भी की थी. दोनों बेटे जब बड़े हुए तो उन के मन में विदेश जा कर पैसा कमाने की ललक जागी.

भागदौड़ करने के बाद उन्होंने अरब देश में काम पाने का जुगाड़ कर लिया. दोनों भाइयों ने अपनेअपने पासपोर्ट बनवाए और कतर में नौकरी के लिए चले गए. वहां दोनों भाई खूब मेहनत कर पैसा कमा कर अपने घर भेजते रहे.

विदेश से पैसा आने के कारण घर के हालात बेहतर होने लगे. गांव में पुराने मकान की जगह पर नया मकान बनवा लिया. दोनों भाइयों के लिए रिश्ते भी आने लगे थे. कश्मीरो ने नवप्रीत कौर उर्फ लवप्रीत कौर को अपने बड़े बेटे तीरथ सिंह के लिए पसंद कर लिया था.

करीब 5 साल पहले सन 2013 में तीरथ की शादी लवप्रीत कौर के साथ हो गई थी. अपनी शादी के एक महीना तक घर में पत्नी के साथ रहने के बाद तीरथ अपने भाई भिंदा के साथ वापस कतर चला गया.

आशू पुत्र रौनकी राम भी इसी गांव का मूल निवासी था. तीरथ सिंह, भिंदा और आशू तीनों बचपन से ही साथसाथ खेले और पलेबढ़े थे. उन के बीच गहरी दोस्ती थी जो युवा होने तक कायम रही. बल्कि युवा होने के बाद तो उन के बीच बहुत गहरे संबंध बन गए थे.

साथसाथ घूमनाफिरना, एकदूसरे के दुखसुख, शादीब्याह आदि के मौकों पर आगे बढ़ कर काम करना उन की आदत में शामिल था. तीरथ सिंह और आशू की दोस्ती की तरह दोनों के परिवारों का भी आपस में बड़ा प्रेम था. तीरथ सिंह की शादी में आशू ने बढ़चढ़ कर भाग लिया था.

तीरथ और भिंदा के कतर जाने के बाद आशू अकसर उन के घर आताजाता रहता था और छोटेबड़े काम कर दिया करता था. वह लवप्रीत को भाभी कहता था. देवरभाभी का रिश्ता होने की वजह से उन के बीच हलकीफुलकी हंसीमजाक भी होती रहती थी.

पति और देवर के विदेश चले जाने के बाद लवप्रीत अपने आप को अकेला महसूस करती थी. हालांकि उस की सास कश्मीरो उस का बहुत खयाल रखती थी पर उस के लिए यही पर्याप्त नहीं था. वह भी चाहती थी कि इधरउधर घूमे. लेकिन समस्या यह थी कि वह घूमने किस के साथ जाए, क्योंकि उस के साथ सास ने सैरसपाटे करने से मना कर दिया था तो वह अपने पति और देवर के दोस्त आशू के साथ ही घूमने के लिए निकल जाती थी.

पति से दूर और अकेले होने के कारण लवप्रीत को भी आशू का साथ अच्छा लगता था. दोनों का साथसाथ घूमना गांव के कुछ लोगों को पसंद नहीं था लेकिन तीरथ और आशू के परिवारों की घनिष्ठता देखते हुए लोगों ने अपना मुंह बंद ही रखा था.

दिसंबर 2017 में आशू का विवाह था. दोस्त की शादी से 2-3 महीने पहले भिंदा काम से छुट्टी ले कर कतर से गांव आ गया. आशू की शादी में उस ने बढ़चढ़ कर भाग लिया. उसी दौरान गांव के किसी व्यक्ति ने उस के कान भरते हुए कह दिया कि आजकल लवप्रीत और आशू का मेलमिलाप ज्यादा बढ़ गया है. लवप्रीत उस के साथ घूमती है.

यह सुनने के बाद भिंदा को आशू से नफरत होने लगी. इस के बाद उस ने आशू से बोलना तक बंद कर दिया था. इस के बाद भिंदा विदेश नहीं गया. कुछ दिनों में यह बात स्पष्ट हो गई थी कि किसी बात को ले कर आशू और भिंदा के बीच अनबन है. हालांकि यह बात आशू को भी नहीं पता थी कि भिंदा को उस से क्या परेशानी है.

उस ने इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया. वह पहले की तरह ही भिंदा के घर जाता रहा. कश्मीरो से भी बोलता रहा और लवप्रीत से भी. कश्मीरो को वह मौसी कहता था और उसे अपनी मां की तरह समझता था.

जून 2018 के आरंभ से ही भिंदा के तेवर कुछ अजीब से बन गए थे. वह बातबात पर राह चलते हुए भी आशू को रोक कर झगड़ा करने की कोशिश करता और उसे धमकी देता कि वह उस के घर न आया करे और न ही उस के परिवार से कोई वास्ता रखे.

एक दिन आशू ने उस से कहा, ‘‘भिंदा, तुम बेवजह मुझ से मत उलझा करो, अगर कश्मीरो मौसी मुझे घर आने से मना करेंगी तो मैं हरगिज नहीं आऊंगा.’’

आशू की पत्नी उन दिनों गर्भवती थी. उस की गोदभराई की रस्म में कश्मीरो और लवप्रीत भी गए थे पर भिंदा इस रस्म में शामिल नहीं हुआ था. वह तो इस फिराक में था कि कब उसे मौका मिले और वह आशू को सबक सिखाए. आखिर 9 जून, 2018 की शाम को उसे यह मौका मिल ही गया.

उस दिन शाम 5 साढ़े 5 बजे गांव के बीच में घने पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर गांव के कुछ लोग बैठे बातें कर रहे थे. आशू का चाचा बिक्कर सिंह उर्फ बिट्टू भी उन के साथ था. उसी समय आशू अपने घर से निकल कर उस चबूतरे के पास स्थित किराने की दुकान पर कोई सामान लेने के लिए जा रहा था, तभी अचानक वहां आ कर भिंदा ने आशू का रास्ता रोक लिया. मारे गुस्से के उस के जबड़े भिंचे हुए थे और आंखें लाल थीं.

भिंदा को अचानक अपने सामने देख आशू ने वहां से बच निकलने में ही समझदारी समझी. वह भिंदा की साइड से निकल जाना चाहता था लेकिन भिंदा ने मौका देखते ही अपने साथ लाए दरांत से उस पर हमला कर दिया. दरांत से ताबड़तोड़ हमला करने की वजह से आशू के शरीर से खून बहने लगा और वह चक्कर खा कर जमीन पर गिर गया. सामने चबूतरे पर बैठे आशू के चाचा व अन्य लोग यह नजारा देख रहे थे. वे आशू को बचाने के लिए आते, उस से पहले ही भिंदा वहां से भाग गया.

खून से सना दरांत ले कर वह अपने घर पहुंचा. उस समय घर पर उस की भाभी लवप्रीत कौर और मां कश्मीरो आंगन में कुछ काम कर रही थीं. भिंदा ने वहां आते ही अपनी भाभी की गरदन पर उसी दरांत से भरपूर वार कर उसे घायल कर दिया. लवप्रीत की गरदन से खून बहने लगा था. इस के बाद भिंदा मौके से फरार हो गया.

इस वारदात के बाद कश्मीरो के घर के भीतर और बाहर चबूतरे पर चीखपुकार मच गई. शोर सुन कर पूरा गांव कश्मीरो के घर और चबूतरे पर जमा हो गया. दोनों घायलों की हालत नाजुक थी. लवप्रीत और आशू को लोग उठा कर नकोदर के सरकारी अस्पताल ले गए. पर दोनों की नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें जालंधर रेफर कर दिया गया.

लवप्रीत कौर की सास कश्मीरो उसे सिविल अस्पताल ले गई थी और आशू को खांबड़ा स्थित एक प्राइवेट अस्पताल में भरती करवाया गया था. इसी बीच पुलिस को भी इस वारदात की खबर मिल गई थी.

सूचना मिलते ही थाना सदर नकोदर के थानाप्रभारी जसविंदर सिंह और चौकी उग्गी के चौकी इंचार्ज गगनदीप सिंह सेखों भी अस्पताल पहुंच गए. डाक्टरों से बातचीत करने पर उन्हें पता चला था कि दोनों की हालत गंभीर बनी हुई है और वे बयान देने की स्थिति में नहीं हैं.

डाक्टरों से बात करने के बाद थानाप्रभारी चौकी इंचार्ज गगनदीप सिंह को अस्पताल में छोड़ कर खुद घटनास्थल का मुआयना करने आदी गांव रवाना हो गए. सूचना मिलते ही डीएसपी (नकोदर) डा. मुकेश कुमार भी अस्पताल पहुंच गए.

2 अलगअलग अस्पतालों में भरती आशू और लवप्रीत कौर को डाक्टर बचाने की कोशिश में लगे हुए थे पर वे अपनी कोशिश में असफल रहे. पौने 9 बजे लवप्रीत कौर ने दम तोड़ दिया और उस के थोड़ी देर बाद आशू की भी मौत हो गई. भनक लगते ही मीडियाकर्मियों का भी वहां जमघट लग गया था.

कश्मीरो को यह पता नहीं था कि भिंदा ने आशू को भी मार दिया है, इसलिए बेटे को बचाने के लिए वह बहू की मौत के बाद खूब चिल्लाई. उस का कहना था कि मेरी बहू अपने देवर भिंदा को बचाते हुए जान गंवा बैठी है.

कश्मीरो ने मीडिया के सामने यह भी कहा था कि इसी गांव का रहने वाला आशू उस के बेटे भिंदा से रंजिश रखता था, जो साथियों सहित उन के घर आया और तेजधार हथियारों से भिंदा पर हमला किया. उस की बहू लवप्रीत देवर को बचाने के लिए आगे आई तो आशू और उस के साथियों ने उस पर भी तेजधार हथियारों से वार किए.

लेकिन देर रात तक नकोदर पुलिस ने मामले की मौके पर जांच कर कश्मीरो द्वारा बेटे को बचाने की रची गई झूठी कहानी को नाकाम कर दिया था. मीडियाकर्मियों और पुलिस को उस की बातों पर विश्वास नहीं आया था.

आशू पर जब हमला हो रहा था, उस समय उस के चाचा बिक्कर सिंह उर्फ बिट्टू ने यह पूरा क्राइम सीन अपनी आंखों से देखा था. पुलिस को दर्ज करवाए अपने बयानों में बिक्कर सिंह ने थानाप्रभारी को आशू पर हुए हमले वाली बात बता दी.

बिक्कर सिंह के बयानों पर थानाप्रभारी ने 10 जून, 2018 को भादंवि की धारा 302 के तहत जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी भिंदा की गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.

लाशों का पोस्टमार्टम होने के बाद आशु की लाश उस के परिजनों के हवाले कर दी गई और लवप्रीत कौर उर्फ प्रीति का शव सिविल अस्पताल जालंधर की मोर्चरी में रखवा दिया क्योंकि उस के परिजनों ने कहा कि उस का पति तीरथ सिंह विदेश में है, उस के आने के बाद ही वह उस का अंतिम संस्कार करेंगे.

इस घटना के बाद समाजसेवी कामरेड दर्शन नाहर पीडि़त पक्ष के परिजनों व गांव के लोगों के साथ थाना सदर पहुंचे. उन्होंने पुलिस अधिकारियों से जल्द से जल्द कातिल को गिरफ्तार करने की मांग की.

पुलिस ने भिंदा की तलाश के लिए मुखबिरों को भी लगा दिया. पुलिस ने उस का फोन नंबर सर्विलांस पर लगा दिया था. उस की आखिरी लोकेशन नकोदर के दशमेश नगर के पास की मिली थी. इस के बाद उस ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था.

5 दिन की लगातार भागदौड़ के बाद आखिर 15 जून, 2018 की रात को एक गुप्त सूचना के आधार पर उग्गी चौकी इंचार्ज एएसआई गगनदीप सिंह ने भिंदा को गांव रहमीपुर के पास से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने उसी दिन आरोपी भिंदा को अदालत में पेश कर 18 जून तक के पुलिस रिमांड पर ले लिया. पुलिस रिमांड के दौरान डीएसपी नकोदर डा. मुकेश कुमार और थानाप्रभारी जसविंदर सिंह के समक्ष अपना अपराध स्वीकार करते हुए जतिंदर सिंह उर्फ भिंदा ने इस दोहरे हत्याकांड की कहानी का खुलासा इस प्रकार किया.

भिंदा का भाई तीरथ सिंह विदेश में रहता था. भिंदा को शक था कि उस की भाभी और आशू के बीच अवैध संबंध हैं. इसी के चलते उस ने दोनों का कत्ल कर दिया.

अपनी भाभी और आशू का कत्ल करने के बाद भिंदा बस से दिल्ली चला गया था और दिल्ली में कुछ दिन गुजार कर वह सूरत के लिए निकल गया था. वहां उस के रुकने का कोई ठिकाना तो था नहीं, इसलिए वह कभी सड़क किनारे खड़े किसी ट्रक या बस के बराबर में सो कर रात गुजारता तो कभी किसी सुनसान जगह पर.

जब उस के पास पैसे खत्म हो गए तो वह पैसों का इंतजाम करने के लिए वापस अपने गांव आया जहां पुलिस पहले से ही उस की ताक में बैठी थी, उस ने सूचना मिलते ही उसे गिरफ्तार कर लिया.

रिमांड के दौरान भिंदा की निशानदेही पर उस से दरांत भी बरामद कर लिया. भिंदा ने ये दोनों हत्याएं केवल शक के आधार पर की थीं. उस ने गांव के कुछ लोगों के सुनने पर ही मान लिया था कि आशू के उस की भाभी के साथ अवैध संबंध हैं.

पुलिस काररवाई पूरी करने और रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भिंदा को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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