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टेढ़ी राह वाला पत्रकार : अंजना का किस ने किया शोषण

बात 17 मई, 2018 की है. मध्य प्रदेश के उज्जैन रेंज के आईजी राकेश गुप्ता अपने औफिस में  विभागीय कार्य निपटा रहे थे, तभी अंजना नाम की एक युवती उन के पास अपनी शिकायत ले कर पहुंची. अंजना उज्जैन के ही पटेल नगर में अपने पति और 2 बच्चों के साथ रहती थी. जो शिकायत ले कर वह आईजी साहब के पास पहुंची थी, वह शिकायत इलैक्ट्रौनिक मीडिया के एक तथाकथित पत्रकार जगदीश परमार के खिलाफ थी.

महिला ने आरोप लगाया कि उज्जैन के सेठी नगर के रहने वाले जगदीश परमार ने न सिर्फ उस के साथ बलात्कार किया बल्कि उस से लाखों रुपए भी ठगे हैं. चूंकि मामला गंभीर और नारी अपराध से जुड़ा था, इसलिए आईजी राकेश गुप्ता ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उस की प्रारंभिक जांच कराई तो उस के आरोपों में सच्चाई नजर आई.

इस के बाद उन के निर्देश पर एडीशनल एसपी रंजन भट्टाचार्य खुद अंजना को ले कर महिला थाने पहुंचे. वहां पर अंजना की तरफ से जगदीश परमार के खिलाफ भादंवि की धारा 376, 384, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई. इस के बाद महिला थानाप्रभारी रेखा वर्मा ने सरकारी अस्पताल में रात में ही अंजना का मैडिकल परीक्षण कराया.

चूंकि यह काररवाई आईजी साहब के निर्देश पर की गई थी इसलिए एडीशनल एसपी ने की गई काररवाई की जानकारी आईजी राकेश गुप्ता को दे दी. पुलिस को अगली काररवाई पत्रकार जगदीश परमार के खिलाफ करनी थी.

चूंकि जगदीश परमार के जिले के अधिकांश अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध थे, इसलिए आईजी राकेश गुप्ता ने उस की गिरफ्तारी के लिए एक विशेष टीम का गठन करने के बाद टीम को स्पष्ट निर्देश दे दिया था कि उस की गिरफ्तारी में कोई भी कोताही न बरती जाए.

विशेष टीम ने सेठीनगर में स्थित जगदीश परमार के घर दबिश दी, लेकिन शायद उसे इस बात की भनक लग चुकी थी, इसलिए वह पुलिस के पहुंचने से पहले ही भूमिगत हो चुका था. तब एसपी सचिन अतुलकर ने क्राइम ब्रांच के एडीशनल एसपी प्रमोद सोनकर व महिला थाने की प्रभारी रेखा वर्मा को उस की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी सौंपी.

दोनों अधिकारियों ने जगदीश के छिपने के संभावित ठिकानों पर ताबड़तोड़ दबिशें डालीं. लेकिन उस का पता नहीं चल सका. लेकिन जगदीश को अपने साथियों की मदद से पुलिस काररवाई की सारी जानकारी मिल रही थी.

पत्रकारिता की ओट ले कर जगदीश परमार ने पिछले कुछ सालों में जिले के अनेक अधिकारियों के बीच अपनी जो पहचान बना रखी थी, उसे देखते हुए उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि पुलिस उस के खिलाफ ऐसी काररवाई भी कर सकती है.

पुलिस कारवाई को देखते हुए जगदीश समझ गया था कि अब उस का बच पाना मुश्किल है, इसलिए 2 दिन बाद ही उस ने खुद महिला थाने पहुंच कर आत्मसमर्पण कर दिया.

उसे गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने सब से पहले उस का मोबाइल फोन और लैपटाप बरामद कर लिया.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो पहले तो वह खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता रहा लेकिन बाद में उस ने अंजना के साथ अपने संबंध होना तो स्वीकार कर लिया, लेकिन उस ने ब्लैकमेलिंग और बलात्कार की बात से इनकार किया. उस का कहना था कि हम दोनों के बीच संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने थे.

अंजना ने उसे जो लाखों रुपए दिए थे, उस के सबूत वह पुलिस को सौंप चुकी थी. उन सबूतों के आधार पर पुलिस ने जब जगदीश से पूछताछ की तो वह इस आरोप को झुठला नहीं सका. वह पुलिस की कार्यप्रणाली से वाकिफ था.

वह जानता था कि पुलिस किसी न किसी तरह सच्चाई उगलवा ही लेती है. लिहाजा उस ने झूठ बोलने के बजाय सच्चाई पुलिस को बता दी. इस के बाद वाहन चोर से पत्रकार बने जगदीश परमार के ब्लैकमेलर बनने की कहानी इस प्रकार सामने आई—

जगदीश परमार मूलरूप से बड़नगर तहसील में खरसोद कला गांव का रहने वाला था. बचपन से ही वह शातिर और तिकड़मी था, जिस के कारण घर वाले इस से खासे परेशान रहते थे. उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा था और गलत बच्चों की संगति में पड़ गया, जिस से वह फेल हो गया. तब उस के पिता ने उसे गुस्से में डांट कर घर से निकल जाने को कह दिया तो जगदीश सचमुच में घर छोड़ कर इंदौर भाग आया.

इंदौर के खजराना इलाके में वह पहुंचा तो उस की मुलाकात शाकिर नाम के युवक से हुई. शाकिर एक जानामाना वाहन चोर था, इसलिए जगदीश भी उस के साथ मिल कर वाहन चोरी करने लगा. इस मामले में वह पहली बार पंडरीनाथ पुलिस के हाथ लग गया.

पुलिस ने कानूनी काररवाई कर के उसे जेल भेज दिया. वह 3 महीने जेल में रहा. गैंग के लोगों ने ही उस की जमानत कराई. उसे लगा कि यह गलत काम उस के लिए ठीक नहीं है. तब वह अपने गांव पहुंच गया और घर जा कर अपने पिता से माफी मांगते हुए वह उन के कदमों में गिर गया.

पिता का दिल पिघल गया और उन्होंने उसे घर में पनाह दे दी. जगदीश को तिकड़म की कमाई खाने की आदत पड़ चुकी थी, इसलिए उस ने गांव में गैस सिलेंडर की कालाबाजारी करनी शुरू कर दी. लेकिन इतने से उस का मन नहीं भर रहा था. वह जल्द मोटी कमाई करने के चक्कर में था.

फिर कुछ दिनों बाद गांव के ही एक आदमी के साथ मिल कर वह सट्टा लगवाने का काम करने लगा. जिस के चलते जगदीश परमार का नाम पूरे इलाके में मशहूर हो गया. उस का यह धंधा भी बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया.

थाना भाटपचाला पुलिस को इस की जानकारी हुई तो तत्कालीन थानाप्रभारी धर्मेंद्र तोमर ने उसे गिरफ्तार कर के उस का पूरे गांव में जुलूस निकाला. इस से पूरे गांव में उस की बहुत बदनामी हुई.

जगदीश की जिंदगी में यह वह मोड़ था जब उसे लगा कि अपराध की दुनिया में जमे रहने के लिए पुलिस से संबंध बनाना जरूरी है. इस के लिए उस ने पत्रकारिता का रास्ता चुना.

जगदीश ने उज्जैन से प्रकाशित होने वाले एक छोटे से अखबार में संपर्क बना कर उस के लिए काम करना शुरू कर दिया. इस के बाद उस ने पुलिस अधिकारियों से दोस्ती की और उन के लिए मुखबिरी और दलाली करने लगा. फिर इन संबंधों की ओट में वह लोगों को ब्लैकमेल करने लगा.

बताया जाता है कि कुछ समय पहले जगदीश ने महिदपुर की एक महिला को भी ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी. उस महिला की शिकायत पर उसे जेल भी जाना पड़ा था. इस के बाद जगदीश ने उज्जैन को अपना ठिकाना बनाया. यहां आ कर वह अफसरों की चाटुकारिता करने लगा.

बताते हैं कि वह पहले अफसरों को लाभ पहुंचा कर बाद में खुद उन से फायदा उठाने की नीति पर काम करता था इसलिए जल्द ही वह सभी विभागों में अधिकारियों का कृपापात्र बन गया.

उज्जैन आ कर उस ने एक लोकल न्यूज चैनल में बात की और वहां कैमरामैन बन गया. इस के साथ वह अफसरों के लिए दलाली कर अपना उल्लू सीधा करने लगा.

कहानी की दूसरी किरदार अंजना की कहानी भी काफी उतारचढ़ाव भरी है. पटेल नगर में रहने वाली अंजना की आंखें किशोरावस्था में ही मोहल्ले के रहने वाले संजय से लड़ गई थीं.

अति संपन्न किसान परिवार से संबंध रखने वाला संजय उतना ही स्मार्ट था जितनी कि खूबसूरत अंजना थी, इसलिए दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी और प्यार में बदल गई.

अंजना उस समय बीकौम कर रही थी. बीकौम की डिग्री पूरी होते ही दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया. बाद में इन के 2 बच्चे हुए. अंजना की जिंदगी हंसीखुशी से बीत रही थी कि अचानक शराब ने उस के खुशहाल जीवन में जहर घोल दिया.

संजय को दोस्तों के साथ शराब पीने की ऐसी लत लगी कि वह दिनरात शराब के नशे में डूबा रहने लगा. अंजना ने उसे रोकने की कोशिश की तो संजय उस के साथ मारपीट करने लगा. अंजना के लिए यह बात किसी अजूबे से कम नहीं थी क्योंकि कभी उस के लिए जान देने की बातें करने वाला संजय उस पर हाथ जो उठाने लगा था. ऐसे में अंजना अपने पति को रास्ते पर लाने के प्रयास करने लगी.

जाहिर है कि उज्जैन में लोगों के संकट के समय सब से पहले महाकाल ही याद आते हैं, इसलिए अंजना नियमित रूप से महाकाल के दरबार में प्रार्थना करने के लिए जाने लगी. दुर्भाग्य से खबरों के जुगाड़ में जगदीश परमार अकसर इस मंदिर में मौजूद रहता था.

जगदीश ने 1-2 बार अंजना को मंदिर में भगवान के सामने आंसू बहाते देखा था. दूसरे अंजना के शरीर पर कीमती जेवर देख कर वह समझ गया कि पार्टी पैसे वाली होने के साथसाथ परेशान हालत में है. इसलिए आसानी से इसे जाल में फंसाया जा सकता है. यह बात 2 साल पहले की है.

इस के बाद जगदीश ने अंजना को फांसने के लिए उस के चारों तरफ जाल बुनना शुरू कर दिया. एक दिन मंदिर में काफी भीड़ थी, अपना प्रभाव जमाने के लिए जगदीश खुद अंजना के पास पहुंचा और बोला, ‘‘मैं देख रहा हूं कि आप बहुत परेशान हैं. आइए, मैं आप को दर्शन करवा देता हूं. आप शायद मुझे नहीं जानतीं लेकिन मैं ने अकसर आप को यहां आंसू बहाते देखा है. मैं एक पत्रकार हूं, इस वजह से आप को आसानी से दर्शन करवा सकता हूं. आप को परेशान देख कर शायद महाकाल ने ही मुझे आप की मदद के लिए भेज दिया है.’’

जगदीश की बातों से अंजना काफी प्रभावित हुई और उसी समय उस के साथ हो गई. तब जगदीश ने वीआईपी गेट से ले जा कर अंजना को महाकाल के दर्शन करवा दिए. इस के बाद जगदीश अंजना को अकसर मंदिर में मिलता और वीआईपी गेट से अंदर ले जा कर उसे दर्शन करा देता. इस से कुछ ही दिनों में दोनों के बीच दोस्ताना ताल्लुकात बन गए.

जब जगदीश को भरोसा हो गया कि लोहा चोट करने योग्य गरम हो चुका है तो उस ने एक दिन अंजना से पूछा, ‘‘अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं पूछ सकता हूं कि आप की परेशानी क्या है, जिस के लिए आप रोज महाकाल के दरबार में हाजिरी लगा रही हैं?’’

अब तक अंजना जगदीश को भला आदमी समझने लगी थी, इसलिए उस ने किशोरावस्था में हुए प्यार से ले कर अब तक की अपनी सारी कहानी उसे बता दी.

तब जगदीश बोला, ‘‘आप की समस्या सुन कर अब मुझे विश्वास हो गया कि सचमुच ही महाकाल ने आप की सहायता के लिए ही मुझे आप से मिलवाया है.’’

‘‘वो कैसे?’’ अंजना ने पूछा.

‘‘वो ऐसे कि मक्सी रोड पर एक नशा मुक्ति केंद्र है. वहां मेरी अच्छी पकड़ है. आप चिंता न करें, मैं वहां से आप के पति का नशा छुड़ाने का इलाज करवा दूंगा, जिस से वह बिलकुल ठीक हो जाएंगे.’’ जगदीश ने कहा.

‘‘अगर ऐसा है तो मैं आप का अहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी.’’

‘‘अहसान भले ही अगले दिन भूल जाना, लेकिन हम दोनों की दोस्ती जिंदगी भर याद रखना. सच मानिए, मेरी जिंदगी में अब तक आप के जैसा कोई दोस्त नहीं आया, इसलिए मैं आप को खोना नहीं चाहता.’’ जगदीश परमार ने अंजना को अपनी गिरफ्त में ले भावुक हो कर कहा.

बात ही जगदीश ने ऐसी कही थी कि अंजना भी भावुक हो गई और उस ने जगदीश से जिंदगी भर यह दोस्ती निभाने का वादा कर लिया.

इस के अगले दिन वह अंजना को अपने साथ नशा मुक्ति केंद्र ले गया, जहां उस ने अपनी पत्रकारिता का प्रभाव दिखा कर अंजना को उस के पति का नशा छुड़ाने की दवा दिलवा दी.

अब तक अंजना जगदीश परमार पर आंख बंद कर के भरोसा करने लगी थी. जगदीश को इसी मौके का इंतजार था, इसलिए उस ने 2 जुलाई, 2016 को अंजना को अपने घर दवाई लेने बुलाया. अंजना बिना किसी संकोच के जगदीश के घर पहुंच गई जो उस की सब से बड़ी भूल साबित हुई.

जगदीश को अब अपनी हसरतें पूरी करनी थीं. उस ने अंजना को अपने घर में कैद करने के बाद डराधमका कर उस के साथ न केवल बलात्कार किया, इस की वीडियो भी बना ली और अंजना के निर्वस्त्र फोटो भी अपने मोबाइल फोन में कैद कर लिए.

इतना ही नहीं, इस बात का जिक्र किसी से करने पर उसे व उस के बच्चों को जान से मारने की धमकी भी दी. साथ ही यह भी कहा कि उस ने मुंह खोला तो उस के अश्लील फोटो और वीडियो पूरे उज्जैन में वायरल कर देगा.

अंजना को जगदीश से इतने बड़े धोखे की उम्मीद नहीं थी. वह जगदीश को उस के पाप की सजा दिलाना चाहती थी, लेकिन उस की धमकी से डर कर वह चुप रही.

अंजना को इस घटना का इतना सदमा लगा कि वह इस के बाद 15 दिन तक मंदिर भी नहीं गई. उस का सोचना था कि न वह मंदिर जाएगी और न उस धोखेबाज से उस की मुलाकात होगी.

लेकिन जगदीश का काम अभी पूरा कहां हुआ था. वह अंजना का तन तो लूट चुका था, धन लूटना तो अभी बाकी था इसलिए कुछ दिनों बाद उस ने अंजना को फोन कर अकेले में मिलने के लिए बुलाया. इतना ही नहीं, उस ने साथ में बड़ी रकम भी लाने को कहा.

अंजना ने मना किया तो जगदीश ने उसे अश्लील वीडियो और फोटो वायरल करने की धमकी दी. जिस से न चाहते हुए भी उसे उस के द्वारा मांगी गई रकम ले कर उस से मिलने के लिए जाना पड़ा. उस से पैसे लेने के बाद जगदीश ने एक बार फिर अंजना के साथ बलात्कार किया.

अंजना ने पुलिस को बताया कि पिछले 22 महीनों में जगदीश ने कई बार उस का यौनशोषण किया. उस ने यह भी बताया कि अब तक वह उसे 10 लाख रुपए और अपने जेवर भी दे चुकी है. अब घर से पैसे दे पाना संभव नहीं था, लेकिन वह उस के तन से तो खिलवाड़ कर ही रहा था साथ में लगातार ब्लैकमेल भी कर रहा था.

अंजना ने बताया कि उस ने जगदीश को सारी स्थिति बता दी थी कि अब किसी स्थिति में वह उसे और पैसे नहीं दे सकती, लेकिन जगदीश के मन में इतना जहर भरा था कि वह हर हाल में उस से पैसे चाहता था.

इसी दौरान अंजना को पता चला कि जगदीश उस की तरह और भी कई लड़कियों का शारीरिक ही नहीं बल्कि आर्थिक शोषण कर रहा है, तब उस ने उस के खिलाफ कानून की मदद लेने का फैसला किया. और फिर इस के अलावा उस के पास कोई रास्ता नहीं बचा था. इसलिए वह शिकायत ले कर आईजी राकेश गुप्ता के पास पहुंची थी.

इस संबंध में जांच अधिकारी रेखा वर्मा का कहना है कि तथाकथित पत्रकार जगदीश परमार के खिलाफ पुख्ता सबूत इकट्ठे हो गए हैं. उस का मोबाइल और लैपटाप भी बरामद कर के जांच के लिए भेज दिया गया है.

जगदीश परमार से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के पुलिस ने उसे न्यायिक हिरासत में पहुंचा दिया.       ?

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित और कथा में अंजना नाम परिवर्तित है.

कैंसर की तरह परिवार में फैलता अलगाव

हिंदी फिल्मों में से आजकल परिवार उसी तरह गायब हो गया है जैसे काफी समय से हौलीवुड की फिल्मों से हुआ है. हौलीवुड की फिल्मों में अब मारधाड़, स्पैशल इफैक्ट, स्पीड, तरहतरह की बंदूकें और स्पाइइंग ही दिखती है. भारतीय फिल्मों में बायोपिक बनने लगी हैं और जो परिवार दिखता है उन्हीं में होता है पर वे आमतौर पर एक पर्सनैलिटी पर केंद्रित रहती हैं.

परिवार को सफल बनाने के लिए निरंतर पाठ पढ़ना जरूरी है. यह ऐसा नहीं कि विवाह करते समय किसी विवाह कराने वाले ने विवाह की शर्तें सुना दीं और हो गई इति. यह रोज का मामला है और रोज हर युगल के सामने एक नई चुनौती, एक नई समस्या, एक नई उपलब्धि, एक नया व्यवधान होता है और यदि आसपास के माहौल, समाचारों, पठनीय सामग्री, टीवी, फिल्मों में यह न दिखे तो वैवाहिक जीवन वैसे ही लड़खड़ाने लगता है जैसे विटामिनों की कमी के कारण शरीर.

लोग अब मैडिकल हैल्प के लिए डाक्टरों के पास ज्यादा जा रहे हैं बजाय फैमिली हैल्प के लिए जानकारी जुटाने या किसी विशेषज्ञ के पास. बढ़ते मानसिक रोगों और पारिवारिक तनाव का कारण यही है कि परिवार की सेहत का खयाल बिलकुल नहीं रखा जा रहा जबकि जिम जा कर शरीर की मेहनत पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है.

यह फिल्मों में दिखने लगा है. अगर 1950-60 की फिल्में जम कर चलीं तो इसीलिए कि पतिपत्नी और बच्चों के परिवारों ने तब अचानक सदियों पुरानी संयुक्त परिवार प्रणाली से मुक्त हो कर राहत की सांस ली थी और वे अपने संबंधों को अपने अनुसार चलाने के तरीके ढूंढ़ रहे थे. तभी नई नौकरियों, बढ़ते शहरों, सहशिक्षा, दफ्तरों आदि में आदमियों और औरतों के मिलने, प्रेम विवाहों के कारण जो समस्याएं पैदा हो रही थीं लोग उन के हल खोज रहे थे. कुछ पत्रिकाओं और उपन्यासों में पाते थे तो कुछ फिल्मों में.

पारिवारिक फिल्में मानसिक और पारिवारिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी हैं और इन का कम बनना एक गंभीर चिंता का विषय है. पारिवारिक फिल्में चाहे परिवार को किसी भी ढंग से देखें कुछ सवालों के हल जरूर करता है. ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्मों की छद्म नैतिकता को चाहे हम पुरातनवादी और दकियानूसी कह लें पर कम से कम वे कुछ सवालों के जवाब तो देती थीं. ‘दंगल’ जैसी सफल फिल्में चाहे परिवार से बहुत दूर नहीं हैं पर उन में परिवार की कम खिलाड़ी की अपनी समस्याओं की चर्चा ज्यादा है.

परिवार पर व्यक्ति हावी रहे इस में किसी को आपत्ति नहीं पर व्यक्तित्व निखारने के लिए जो नींव चाहिए होती है वह परिवार ही देता है. हिंदी फिल्में अब अकसर दिखाने लगी हैं कि टूटा परिवार होता है तो कैसे रहते हैं पर उन में अपनी सफलता से जूझ रहे पात्र साथसाथ परिवार की समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं.

‘इंगलिशविंगलिश’ और ‘हिंदी मीडियम’ जैसी फिल्मों में परिवार के अच्छे चित्रण हैं और तभी बिना सितारों के भी ये चलीं. जो फिल्में अचानक सफल हुईं उन में अधिकांश में परिवार केंद्र में था और दर्शकों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया.

परिवार के प्रति उदासीनता दुनियाभर में बुरी तरह फैली है. सैल्फ डैवलपमैंट पर हजारों किताबें लिखी गई हैं. ‘मैं’ की महत्ता बहुत बढ़ी है पर इसी चक्कर में परिवारों के दीवाले निकल रहे हैं और बिना तलाक लिए भी पतिपत्नी और बच्चे मुंह फुलाए घूम रहे हैं. आमतौर पर लोगों के पास अपने दुख व्यक्त करने के शब्द ही नहीं होते. उन्हें समझ ही नहीं आता कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें. वे अपनी धुन में मस्त रहते हैं और उसी को जीवन की सफलता मानते हैं पर कैंसर की तरह परिवार में फैलता अलगाव का ट्यूमर एक दिन अचानक फट जाता है.

उस समय दवा नहीं मिलती सिर्फ या तो सर्जरी, रैडिएशन होती है या फिर मौत.

स्वच्छ ईंधन से संचालित वाहनों का युग जल्द

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही बिजली खपत कम करने के लिए एलईडी बल्बों के इस्तेमाल पर जोर दिया था और उस के कुछ समय बाद ही वह सौरऊर्जा जैसी गैरपरंपरागत ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के काम में जुट गई. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौरऊर्जा को भविष्य की ऊर्जा करार देते हुए इस के लिए शोध तथा तकनीकी विकास के वास्ते जरमनी जैसे देशों के साथ समझौता किया. अब उसी अंदाज में मोदी सरकार ईंधन की परंपरागत व्यवस्था पैट्रोल व डीजल के स्थान पर इलैक्ट्रौनिक वाहनों के संचालन को महत्त्व दे रही है.

प्रधानमंत्री ने इस के लिए तकनीकी विशेषज्ञों से नईनई तकनीक सृजित करने का आग्रह किया और कहा कि इस क्षेत्र के विशेषज्ञ जो भी खोज करेंगे उस को संज्ञान में ला कर उपयोग में लाने का प्रयास किया जाएगा. उन का यह भी कहना है कि सरकार इलैक्ट्रौनिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति बना रही है.

सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्री नितिन गडगरी का कहना है कि सरकार स्वच्छ ईंधन से चलने वाले वाहनों को विशेष छूट दे रही है. इस के लिए उन्होंने इथेनौल, मिथेलौन व बायो सीएनजी से चलने वाले वाहनों को परमिटमुक्त करने की घोषणा की है. उन का कहना है कि इस से उन वाहनों का उपयोग बढ़ेगा.

स्वच्छ ईंधन से चलने वाले ईरिकशा पहले ही बाजार में क्रांति ला चुके हैं और इलैक्ट्रौनिक बस व कारों के निर्माण का परीक्षण चल रहा है. इस में सब से बड़ी दिक्कत महंगी बैटरी और उस को रिचार्ज करने की बताई जा रही है. लेकिन सरकार का दावा है कि इस दिशा में सुधार के लिए काम चल रहा है.

कुछ वाहन निर्माता कंपनियों का भी दावा है कि 2 सौ किलोमीटर तक चलने वाली बैटरी का परीक्षण चल रहा है. स्वच्छ ऊर्जा से चलने वाले वाहनों से न सिर्फ पर्यावरण को वाहनों के धुएं से होने वाले नुकसान से बचाया जाएगा बल्कि पैट्रोलडीजल के आयात पर निर्भरता भी कम होगी और देश का पैसा बचेगा.

को नहीं जानत…

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मन में वह शांति नहीं है जो कभी मठमंदिरों में हुआ करती थी. शांति की तलाश में धार्मिक शहरों का रुख करने योगी बीते दिनों मथुरा गए और वहां करोड़ों की योजनाओं का शिलान्यास कर डाला.

मथुरावासियों ने मुख्यमंत्री के सामने शिकायत रखी कि बंदर बहुत परेशान करते हैं. इस दिलचस्प समस्या का समाधान योगी ने बड़े दिलचस्प तरीके से किया, कहा कि जब भी बंदर परेशान करें तो आप हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दें, बंदर शांत हो जाएंगे.

हर कोई जानता है कि बंदर चंचल, नकलची और उत्पाती जानवर है. हनुमान नाम के बंदर ने रावण को मारने में राम की बड़ी मदद की थी, तभी से बंदर पूजे जाने लगे. योगी चाहते हैं कि लोग बंदरों को मारें या भगाएं नहीं, उलटे, हनुमान चालीसा पढ़ते आंख बंद कर लें ठीक वैसे ही जैसे काल्पनिक भूतप्रेतों के डर से कर लेते हैं. इस से साबित हो गया कि सच्चा महंत वही है जो धार्मिक अंधविश्वास फैलाने का कोई मौका न चूके.

 

हेयर टिप्स : नैचुरल तरीकों से इस तरह रंगे बाल

लंबे हेयर कलर करने का ट्रेंड आज काफी बढ़ गया है. इस के लिए महंगे महंगे सैलून में जा कर कलर करवाने के लिए अपनी जेबें खाली करने से भी महिलाएं नहीं कतरातीं क्योंकि वे किसी भी कीमत पर नहीं चाहतीं कि उन की खूबसूरती में कोई कमी आए. लेकिन सवाल यह है कि खूबसूरती सिर्फ कैमिकल्स वाले प्रोडक्ट्स का यूज कर के ही कायम की जा सकती है? ऐसा बिलकुल नहीं है. खुद को ग्लैमरस लुक देने के लिए आप घर पर भी खुद के बालों को नए अंदाज में देख सकती हैं.

इस के लिए आप इंडिगो, हीना, चाय, कौफी, फूल और नट पाउडर का बिना टेंशन इस्तेमाल कर के खुद के बालों को नैचुरली ढंग से रंग सकते हैं. इस के लिए हमारे द्वारा बताई जा रही विधियों पर गौर करें.

रैड कलर के लिए हीना बैस्ट: आज से नहीं बल्कि पुराने समय से महिलाएं अपने बालों को रेडीश ब्राउन कलर में रंगने के लिए हीना का ही इस्तेमाल करती आ रही हैं ताकि उन के सफेद बाल कवर हो सकें और यह बहुत ही नैचुरल तरीका है.

कैसे तैयार करें पेस्ट: आधे कप हीना पाउडर में थोड़ा सा गरम पानी और तीन बूंदें केयोकार्पिन लाइट हेयर ऑयल की डालें. आसानी से पेस्ट बालों से निकल जाए इस के लिए आधा चम्मच नीबू का रस भी मिला सकती हैं. साथ ही बालों में हीना लगाने के बाद भी सॉफ्टनेस बरकरार रहे तो इस के लिए उस में अंडा या फिर दही डालें. इस पेस्ट को आप कम से कम एक घंटा अप्लाई करने के बाद वॉश करें.

कैसे अप्लाई करें: बालों के छोटे छोटे सैक्शन ले कर उन में हीना अप्लाई करें. इस से हर बाल में हीना अच्छे से लग जाती है.

रैड/बरगंडी कलर: दो कप पानी ले कर उस में आधा कप केलैन्डयुला की पत्तियां, दो जपाकुसुम (हिबिस्कस के फूल) और आधा चुकुंदर ले कर उसे आधे घंटे के लिए उबालें. फिर उसे निचोड़ कर ठंडा होने के लिए फ्रिज में रख दें. शैंपू करने के बाद ही इसे बालों में अप्लाई करें. बालों में ड्राइनैस न रहे इस के लिए केयोकार्पिन लाइट हेयर ऑयल लगाना न भूलें.

ब्लैक हेयर्स: दो चम्मच अखरोट के पाउडर को मलमल के कपड़े में बांध कर उसे दो कप गरम पानी में रातभर के लिए भिगो दें. फिर शैंपू करने के बाद इस पूरे मिक्सचर को बालों में लगा कर धोएं. इस प्रक्रिया को प्रत्येक हफ्ते दोहराने से बाल कालेपन में आने लगते हैं.

इंडिगो: ब्लू ब्लैक हेयर्स: यह नैचुरल हेयर डाई है. अपने बालों की लंबाई और मोटाई के हिसाब से आप इंडिगो पाउडर को गरम पानी में डाल कर योगर्ट की तरह पेस्ट तैयार करें. फिर बालों के सैक्शन ले कर इन्हें 30 मिनट के लिए अप्लाई कर के छोड़ दें. ऐक्चुअल कलर आने में पूरा दिन लग सकता है लेकिन रिजल्ट काफी बेहतर आता है.

ब्राउन हेयर्स: ब्राउन हेयर्स के लिए आप गरम पानी में तीन चम्मच चाय की पत्ती ले कर उस में केयोकार्पिन हेयर ऑयल की डाल कर एक घंटे के लिए रख दें. फिर हर बार शैंपू करने के बाद इसे बालों में अप्लाई करें.

इसी तरह आप कौफी के पेस्ट में कुछ बूंदें केयोकार्पिन हेयर ऑयल की भी हर वॉश के बाद लगा सकती हैं.

कैरमल हाईलाइट्स: बालों पर कैमोमाइल चाय के पेस्ट से स्प्रे करें जिसे बनाने के लिए डेढ़ कप चाय को 2 कप गरम पानी में भिगो दें. फिर उसे 3-4 घंटे भिगोने के बाद आप अप्लाई करें. कुछ देर बाद रिजल्ट सामने होगा. और अगर आप हाईलाइट्स को लाइट करना चाहते हैं तो पानी में नीबू का रस मिला कर अप्लाई करें.

लेकिन ध्यान रखें ये दोनों चीजें शैंपू करने के बाद करने से ही फायदा मिलता है.

कुछ अन्य जरूरी टिप्स प्रिसिला से जानें-

– हमेशा नैचुरल तरीके से ही बालों को कलर करें.

– आप के लुक पर कौन सा कलर सूट करेगा इस बात का खास ध्यान रखें.

– शैंपू के बाद केयोकार्पिन हेयर आयल से मसाज करना न भूलें.

– बालों की लंबाई के हिसाब से ही पेस्ट तैयार करें.

मदर्स डे : कैसे बदला छोटी का अपनी सास के प्रति व्यवहार

‘‘अम्मां,हैप्पी मदर्स डे.’’

‘‘थैंक्स बेटा.’’

‘‘कौन था?’’

‘‘ईशा थी.’’

‘‘तुम्हारी बेटियां भी न उठते ही फोन पर शुरू हो जाती हैं.’’

‘‘आप से बात नहीं करतीं क्या?’’

‘‘मुझे इतनी बातें आती ही कहां?’’

तभी फिर फोन बज उठा. उधर इरा थी. उस का तो रोज का समय तय है. सुबह औफिस के लिए निकलते हुए जरूर फोन करती है.

‘‘अम्मां हैप्पी मदर्स डे’’

‘‘थैंक्स बेटा’’

इरा ने हंसते हुए पूछा, ‘‘अम्मां, इस बार क्या गिफ्ट लोगी?’’

‘‘कुछ भी नहीं बेटा. मैं ने पहले भी कहा था कि तुम तीनों एकसाथ आओ और 2-4 दिन रह जाओ.’’

‘‘आप भी अम्मां… अभी तो मुझे आए साल भी नहीं हुआ है.’’

‘‘वह भी कोई आना था. सुबह आई थीं और अगली सुबह चली गई थीं.’’

‘‘ठीक है अम्मां प्रोग्राम बनाते हैं.’’

अगले दिन शाम के 7 बज रहे थे. सुषमाजी पति सुरेश के साथ बैठी चाय पी रही थीं. तभी दरवाजे की घंटी बजी. वे पति से बोलीं, ‘‘आज दूध वाला बहुत जल्दी आ गया.’’

‘‘दरवाजा भी खोलोगी कि बातें ही बनाती रहोगी,’’ सुरेशजी बोले.

वे खिसिया कर बोलीं, ‘‘क्या दरवाजा आप नहीं खोल सकते? सारे कामों का ठेका क्या मेरा ही है?’’

फिर दरवाजा खोलते ही सुषमाजी चौंक उठीं. दरवाजे पर छोटी खड़ी थी. वह मम्मी से एकदम से लिपट कर बोली, ‘‘हैप्पी मदर्स डे मौम.’’

‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं? पापा स्टेशन लेने आ जाते.’’

‘‘लेकिन मैं तो गाड़ी से आई हूं.’’

‘‘गोलू और आदित्य कहां हैं?’’

‘‘अम्मा मैं अकेले आई हूं, गोलू समर कैंप में और आदित्य टूअर पर.’’

बेटी की आवाज सुनते ही सुरेशजी भी बाहर आ गए और फिर छोटी को बांहों में भर कर बोले, ‘‘आओ अंदर चलें. तुम्हारी मम्मी की तो बातें ही कभी खत्म नहीं होंगी.’’

पीछे से ईशा और इरा दोनों ने आवाज लगाई, ‘‘पापा हम दोनों भी हैं.’’

सुषमाजी और सुरेशजी तीनों बेटियों को एकसाथ अचानक आया देख आश्चर्यचकित हो उठे. वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे.

सुषमाजी का दिमाग किचन में क्याक्या है, इस में उलझ गया था.

इरा बोली, ‘‘मां परेशान क्यों दिख रही हो? आप ही कब से कह रही थीं कि तीनों साथ आओ तो हम तीनों साथ आ गईं.’’

‘‘सोच रही हूं, तुम लोगों के लिए जल्दी से क्या नाश्ता बनाऊं.’’

‘‘बस सब से पहले अपने हाथों की अदरक वाली गरमगरम चाय पिलाओ. हम सब के लिए गरमगरम जलेबियां और कचौडि़यां लाई हैं,’’

इरा बोली.

‘‘सुषमा… सुषमा… मुझे बताओ तो कौन आया है?’’

छोटी बोली, ‘‘यह तो ताईजी की आवाज लग रही है.’’

‘‘अम्मां, आप ने बताया नहीं कि ताई यहां हैं?’’ ईशा बोली.

‘‘क्या करती, तुम लोगों को बताती, तो तुम तीनों नाराज होतीं. इसीलिए मैं ने किसी को नहीं बताया.’’

‘‘भरत और लखन ने मिल कर अपना मकान बेच दिया. जेठानीजी को अपने साथ ले गए. दोनों हैदराबाद में रहते हैं. 15 दिन एक के घर 15 दिन दूसरे के घर. रोधो कर यह व्यवस्था 7-8 महीने चली.

‘‘भरत और उस की बहू अवनी की व्यस्त दिनचर्या में भाभी के लिए किसी के पास समय ही नहीं था. सुखसुविधा के सारे साधन मौजूद थे, परंतु मशीनी जिंदगी में वह हर क्षण खुद को अकेली और उपेक्षित महसूस करती थीं. मुंह अंधेरे अवनी अपनी गाड़ी निकाल कर औफिस के लिए निकल जाती थी. 8 बजे तक भरत भी बाय मौम कह कर चल देता था.

‘‘घर में दिन भर नौकरानी रहती, जो समयसमय पर खाना, नाश्ता बना कर देती रहती थी. दोनों देर रात घर आते. डाइनिंगटेबल पर बैठ कर अंगरेजी में गिटरपिटर करते हुए उलटापुलटा खाते और फिर कमरे में घुस जाते. शनिवार व रविवार को उन्हें आउटिंग और पार्टियों से ही फुरसत नहीं रहती.

‘‘लखन के यहां की दूसरी कहानी थी. भाभी को देखते ही नौकरानी की छुट्टी कर दी जाती. सुबह बच्चों के टिफिन से ले कर रात के दूध तक का काम भाभी को करना पड़ता. भाभी काम करकर के परेशान हो जातीं, क्योंकि दीपा खुद तो कोई काम नहीं करती पर भाभी के हर काम में मीनमेख निकाल कर उन्हें शर्मिंदा करने से कभी नहीं चूकती.

‘‘लखन बीवी के सामने जबान खोलने से डरता था और भाभी को भी चुपचाप काम करने की सलाह देता था, क्योंकि वह औफिस में दीपा से काफी जूनियर पोस्ट पर था. इसीलिए बीवी से बहुत डर कर रहता था. दीपा परीक्षाएं पास करती हुई मैनेजर बन गई थी. लखन एक भी परीक्षा पास नहीं कर सका था.

‘‘भाभी लखन के यहां ही बाथरूम में फिसल गई थीं और पैर की हड्डी टूट गई थी,  भरत ने प्लास्टर बंधवा दिया था, लेकिन इन्होंने यहां आने की जिद पकड़ ली. फोन पर पापा से रोरो कर बोलीं कि भैयाजी, मुझे जीवित देखना चाहते हो, तो आ कर अपने साथ ले जाओ.’’

‘‘तुम्हारे पापा ने एक क्षण की भी देर नहीं की. टैक्सी कर के गए और भाभी को ले कर आ गए. अब तो भाभी काफी ठीक हो गई हैं. छड़ी ले कर चलने लगी हैं.’’

ताई के विषय में सारी बातें सुन कर ईशा तो सिसकती हुई अंदर चली गई और ताई का हाथ पकड़ कर बैठ गई.

इरा कहने लगी, ‘‘भरत भैया तो ऐसे नहीं थे… लखन तो शुरू से ही ऐसा था.’’

सुषमाजी चाय बना कर ताई के पास ही ले कर आ गई थीं. ताई फूटफूट कर रो रही थीं, ‘‘ईशा हम ने सुषमा को कभी चैन से नहीं रहने दिया. यह ब्याह कर आई तो तुम्हारे ताऊजी और पापा के कान भर दिए कि पढ़ीलिखी बहू ला रहे हो सब को अपनी उंगलियों पर नचाएगी,’’ फिर अपने आंसू पोंछते हुए इरा से बोली, ‘‘तुम लोग बताओ कैसी हो? तीनों को एकसाथ देख कर मेरा कलेजा ठंडा हो गया.’’

‘‘ताईजी आप कैसी हैं?’’

‘‘बिटिया हम तो अपने कर्मों का फल भुगत रहे हैं… सुषमा से हमेशा दुश्मनी करते रहे… आज वही मेरी खिदमत कर रही है.’’

तभी छोटी ताई से धीमी आवाज में यह कह कर कि अभी आई अम्मां के पास किचन में आ कर खड़ी हो गई. वह बचपन से गुस्सैल और मुंहफट थी. अम्मां से फुसफुसा कर बोली, ‘‘बहुत अच्छा हुआ… हम तीनों की नाक में दम किए रहती थी… ईशा दीदी को तो कभी चैन ही नहीं लेने देती थीं. बातबात में डांटती रहती थीं. इरा दीदी को तो काला जिराफ कह कर पुकारती थीं… बेटों का बड़ा घमंड था न.’’

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद फिर वह क्रोधित हो कर पापा से बोली, ‘‘पापा, आप भी कम थोड़े ही हो. क्या जरूरत थी ताईजी को यहां लाने की? अम्मां के लिए आप ने एक मुसीबत खड़ी कर दी है.’’

सुषमाजी ने छोटी के मुंह पर अपना हाथ रख दिया, ‘‘चुप हो जाओ छोटी… भाभीजी सुन लेंगी तो उन्हें कितना बुरा लगेगा.’’

‘‘अम्मां, आप ने हमेशा हम तीनों को ही चुप कराया है.’’

अभी तक ईशा भी आ गई थी, ‘‘जब ताईजी पापा के सामने रो रही थीं तो बताओ भला पापा कैसे उन्हें यहां न लाते.’’ वह बोली.

‘‘ईशा दीदी, तुम तो सब भूल गई हो, लेकिन मैं ताईजी की बातें जिंदगी भर नहीं भूल सकती. याद नहीं है, जब भरत भैया ने तुम्हारी कौपी पानी में फेंक दी थी, तो तुम फूटफूट कर घंटों रोई थीं. तब ताई कैसे डांट कर बोली थीं कि कौपी ही तो भीगी है, फिर से लिख लेना. ऐसे दहाड़ें मार कर रो रही हो जैसे तेरा कोई सगा मर गया हो.’’

इरा बात संभालने के लिए बोली, ‘‘छोटी, भूल जाओ यार, जो बीत गया उसे भूलना ही पड़ता है.’’

‘‘अम्मां आज डिनर में क्या खिला रही हो?’’

‘‘तुम तीनों जो कहेंगी बना दूंगी.’’

छोटी तुरंत चिल्ला पड़ी, ‘‘अम्मां मेरे लिए दही वाले आलू और परांठे बनाना.’’

‘‘ठीक है, सब के लिए यही बना दो,’’ ईशा और इरा ने भी छोटी की बात का समर्थन किया.

‘‘तुम तीनों अपने बच्चों को छोड़ कर आई यह बहुत गलत किया. बच्चों के बिना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा है.’’

‘‘अम्मां, आजकल बच्चे हम लोगों की तरह अपनी मम्मी का पल्लू पकड़ कर नहीं रहते. उन की बहुत व्यस्त दिनचर्या होती है. किसी की क्लास, किसी की कोचिंग, किसी की पार्टी, तो किसी का कैंप. उन के पास इतना समय नहीं होता कि वे अपनी मम्मी के साथ 2-4 दिन इस तरह खराब करें.’’

सुषमा के साथ तीनों बेटियां अपने कमरे में आ गईं. शोे केस में लगी बार्बी डौल पर निगाह पड़ते ही इरा बोल पड़ी, ‘‘छोटी, देख तेरी पहली वाली बार्बी डौल आज तक अम्मां ने संभाल कर रख रखी है.’’

‘‘अम्मां की तो पुरानी आदत है… कूड़े को भी सहेज कर रखेंगी.’’

ईशा भी कुछ याद कर के बोली, ‘‘याद है हम लोगों ने जब इस की शादी की थी. शादी

अच्छी तरह निबट गई. खानापीना भी हो गया था. विदा करने के समय छोटी अपनी डौल को ले कर भाग गई थी. राधिका से लड़ाई कर के बोली थी कि मुझे नहीं देनी अपनी गुडि़या. तुम से मेरी आज से कुट्टी, किसी के समझाने से भी यह नहीं मानी थी.’’

तभी अम्मां की आहट से उन का ध्यान बंट गया.

‘‘अम्मां खाना बन गया?’’ इरा ने पूछा.

‘‘कब का. मैं ताई को खिला भी चुकी. तेरे पापा भी खा चुके हैं. मैं इंतजार करतीकरती थक गई तो तुम लोगों के पास आ गई कि देखूं मेरी रचनाएं कमरे में बैठी क्या बातें कर रही हैं.’’

ईशा प्यार से मां से लिपट कर बोली, ‘‘पहले की तरह किचन से डांट कर पुकारतीं तो मजा आ जाता.’’

‘‘बेटा तब बात और थी. अब कहां रहे वे दिन.’’

‘‘अम्मा आप ने परांठे नहीं सेंके?’’

‘‘2 दिनों के लिए आई हो… गरमगरम खिलाऊंगी कि ठंडे परोसूंगी.’’

प्यार से अम्मां से लिपटते हुए छोटी बोली, ‘‘आज अम्मां के लिए मैं परांठे सेंकूंगी… पहले आप खाएंगी, फिर हम तीनों.’’

सुषमाजी की आंखें भर आईं. इस तरह प्यार से तो उन्होंने अपने बचपन में अपनी मां के हाथों ही खाया था. फिर डबडबाई आंखों से बोलीं, ‘‘छोटी अब बड़ी और जिम्मेदार बन गई है. लगता है अपनी मम्मीजी को ऐसे ही प्यार से खिलाती है.’’

यह सुनते ही छोटी के चेहरे का रंग उड़ गया.

सुरेशजी को बैठा देख ईशा बोली, ‘‘अरे पापा, आज आप भी अभी तक जाग रहे हैं.’’

‘‘अपनी लाडलियों के साथ बैठने की चाह में आज इन्हें नींद कहां?’’

‘‘अम्मां आज हम लोग पहले की तरह जमीन पर बैठ कर खाएंगे. कितना मजा आता था जब हम तीनों बहनें एक परांठे के 3 टुकड़े कर के साथसाथ खाती थीं.’’

इरा कुहनी मारते हुए बोली, ‘‘दीदी, पापा को अच्छा नहीं लगेगा.’’

‘‘नहींनहीं, तुम तीनों को एकसाथ वैसे ही खाते देख कर खुशी होगी मुझे, क्योंकि पहले तो इसलिए डांटता था कि तुम लोग टेबल मैनर्स अच्छी तरह सीख सको.’’

‘‘हां पापा, आप ने ही तो हम लोगों को हाथ में कांटा पकड़ना सिखाया था,’’ कह तीनों खाना खा कर अपने कमरे में पलंग पर पसर गईं. पीछेपीछे सुषमाजी भी आ गईं.

‘‘आप लेटो अम्मां. आज थक गई होंगी.’’

‘‘तुम लोग लेटो… मैं तो देखने आई थी कि देख लूं कुछ जरूरत तो नहीं है.’’

‘‘पापा सो गए क्या?’’ हां, पापा तो लेटते ही खर्राटे भरने लगते हैं. उन की तो पुरानी आदत है. मुझे ही नींद नहीं आती. घंटों करवटें बदलती रहती हूं.

‘‘अम्मां आप कुछ कमजोर दिख रही हैं… चेहरे पर परेशानी सी झलक रही है. किसी भी तरह की कोई दिक्कत हो तो बताओ न.’’

‘‘नहीं बेटा, तुम्हारे पापा मेरा बहुत खयाल रखते हैं. अभी तो हम दोनों बिलकुल ठीक हैं… कल किसी को कोई तकलीफ हुई तो क्या होगा, बस यही चिंता सताती है.’’

तीनों बहनें उठ कर सुषमाजी से लिपट कर बोलीं, ‘‘हम किस मर्ज की दवा हैं… यह कैसे सोच लिया आप ने कि आप दोनों अकेले हैं… हम लोग दिन भर में 2-3 बार आप को क्यों फोन करते हैं? इसीलिए न?’’

‘‘आओ आज हमारे साथ ही लेटो, कह तीनों बहनों ने उन्हें पकड़ कर अपने साथ लिटा लिया.’’

‘‘तभी बिजली चली गईं. गरमी से सभी पसीनापसीना हो गईं.’’

‘‘बिजली का क्या भरोसा कब आए. चलो छत पर लेटते हैं,’’ ईशा बोली तो तीनों बहनें छत पर आ गईं.

एक अरसे बाद छत पर लेटने का आनंद ही अनूठा था. सिर पर चमकता पूर्णिमा का  चांद, ठंडी बयार जैसे अमृत बरसा रही हो. अनगिनत चमकते तारे देख तीनों बहनें अपने बचपन में खो गईं…

ईशा कहने लगी, ‘‘न्यूयौर्क और लंदन के फ्लैट और होटल वाली व्यस्त जिंदगी में इस स्वर्णिम अनूठे आनंद की अनुभूति करना संभव ही नहीं है. काश, बच्चे भी हम लोगों के साथ आते.’’

इरा कुछ याद करते हुए बोली, ‘‘हम लोग छोटे थे तब कैसे पूरी छत पर बिस्तर लगते थे. अम्मां मिट्टी की सुराही ले कर ऊपर आती थीं. सुराही के पानी में मिट्टी की कितनी सोंधीसोंधी महक आती थी.’’

पुरानी यादों के साए में सब की आंखों की नींद उड़ी हुई थी.

‘‘भरत भैया और लखन भी हम लोगों के साथ ही सोने की जिद करते थे, लेकिन ताईजी हमेशा उन्हें डांट कर बुला लेती थीं,’’ छोटी बोली.

आहिस्ताआहिस्ता सीढि़यां चढ़ कर अम्मां भी ऊपर आ गईं. बोलीं, ‘‘मुझे तो छत पर चढ़े महीनों हो गए होंगे. शांति ही आ कर छत पर झाड़ू लगा देती है.’’

‘‘अम्मां मीरा बूआ कैसी हैं?’’

‘‘अच्छी हैं, बेटा. फूफाजी के जाने के बाद उन्हें संभलने में वक्त लगा, परंतु उन्होंने हार नहीं मानी. दोनों बच्चे पढ़लिख कर नौकरी पर लग गए हैं.’’

‘‘रजत की बीवी कैसी है? बूआ से तो बहुत पटती होगी. हम लोगों से ही इतना लाड़ करती थीं, तो अपनी बहू को तो और भी ज्यादा प्यार करती होंगी.’’

‘‘3-4 साल तो बहू की तारीफ करती रहीं… कुछ दिन पहले फोन आया था. अब सजल के साथ दूसरे फ्लैट में अलग रह रही हैं.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘पहले जब बूआ छुट्टियों में रहने आती थीं तो क्या मस्ती होती थी. एक दिन खुसरो बाग, फिर एक दिन कंपनी बाग, फिर पिक्चर बस मजा ही मजा.’’

‘‘छोटी तुम बिलकुल चुप हो, क्या हुआ? सो गईं क्या?’’

‘‘नहीं अम्मां, बातों में भला नींद कहां.’’

इरा कहने लगी, ‘‘दीदी आज तुम ताई को देख कर रो रही थीं. भूल गईं तुम्हारे बीटैक में दाखिले के समय इन्होंने कितना हंगामा किया था कि देवरजी पैसा कहां से लाएंगे. पहले क्व10 लाख पढ़ाई में खर्च करो, फिर क्व10 लाख शादी में. एक थोड़े ही है, 3-3 लड़कियां हैं.’’

‘‘मीरा बूआ चिल्ला पड़ी थीं कि भाभी आप क्या परेशान हो रही हैं. ईशा मैरिट से पास हुई है. सरकारी कालेज में इतना पैसा नहीं लगता है. हर होशियार बच्चे को स्कौलरशिप भी मिलती है. अभी तक ईशा को हमेशा वजीफा मिला है. देखना उसे यहां भी मिलेगा.

‘‘खिसिया कर ताई बोली थी कि बीवीजी आप तो नाहक नाराज हो गईं. हम तो बेटियों की भलाई की ही बात कर रहे हैं. 1-1 कर तीनों ब्याह जाएं… कच्ची उम्र में बिटिया ससुराल में दब कर रह लेती है.’’

अब सुषमाजी भी मुखर हो उठी थीं, ‘‘हां, भाभी की सोच पुरानी थी, लेकिन मैं तो स्तंभ की तरह अपनी बेटियों के साथ खड़ी थी.

‘‘शुरूशुरू की बात है. ईशा छोटी थी. सैंट मैरी स्कूल में नाम लिखाने के समय बहुत बवाल हुआ था. भाई साहब और भाभी ने बहुत शोर मचाया था कि ईशा का नाम वहीं लिखवाओ जहां भरत और लखन पढ़ते हैं. लेकिन मैं अकेले ईशा को साथ ले कर सैंट मेरी स्कूल गई. वहां उस का दाखिला करवा दिया. फिर तो रास्ता निकल पड़ा. तुम तीनों वहीं पढ़ीं. भाभी अकसर व्यंग्यबाण चलाती थीं. शुरूशुरू में तो तुम्हारे पापा भी मुझ से नाराज थे, लेकिन बाद में जब इस की अहमियत समझी तो तारीफ करने लगे.

‘‘इसी पढ़ाई की बदौलत तुम तीनों का जीवन बन गया. अच्छी नौकरी और अच्छा जीवनसाथी मिल गया. तुम तीनों अपनेअपने परिवार में सदा खुश रहो.’’

इरा कहने लगी, ‘‘मम्मी, आप हमेशा चुप रहती थीं. ताई शुरू से ही गरममिजाज थीं क्या? कुछ पुरानी बातें बताइए न?’’

‘‘तुम्हारी ताई को बेटे होने का बहुत घमंड था. तुम्हारे दादीबाबा पापा के बचपन में ही चल बसे थे. ताऊजी ने ही पापा को पालपोस कर बड़ा किया. उन्हें पढ़ायालिखाया. दुकान करने के लिए भी पैसों से मदद की थी. इसीलिए पापा हमेशा ताईताऊजी की इज्जत करते थे.

‘‘तुम्हारे ताऊजी इंजीनियर थे, तुम ने देखा ही है. उन की अफसरी का और घूस की आमदनी का ताई को बहुत गुमान था. कभी छोटे शहर तो कभी बड़े शहर में उन की पोस्टिंग होती रहती थी. 2-4 नौकर उन को सरकार की ओर से मिला करते थे. इन सब कारणों से उन्होंने हमेशा मुझे और तुम तीनों को नीची निगाहों से देखा.

‘‘कभीकभी उन की बातें मेरे दिल में चुभ जाती थीं. पापा की आमदनी इतनी तो थी नहीं. सो अकसर सुनासुना कर दूसरों से कहतीं कि 3-3 पैदा कर ली हैं. छोटी सी दुकान से दालरोटी का जुगाड़ हो जाए वही बहुत है. ब्याह तो दूर की कौड़ी है, पास में पैसा है नहीं, ब्याह करते समय न हाथ फैलाएं तो कहना. मैं तो कुछ न दूंगी. मुझे भी तो अपने लड़कों के लिए और बुढ़ापे के लिए सोचना है. इरा छोटी थी तो इसे रात में दूध पीए बिना नींद नहीं आती थी, तो ताई कहतीं कि देवरजी तो सांप पाल रहे हैं.

‘‘मैं अपने कमरे में जा कर जी भर कर रो लेती थी, परंतु पापा की खुशी के लिए चुप रहती थी. बस हाथ जोड़ कर मन ही मन यही कामना करती थी कि तेरे पापा को कभी किसी के सामने हाथ न फैलाने पड़े.

‘‘धीरेधीरे तीनों बड़ी होती गईं तो झगड़ेझमेले कम होते गए. भरत और लखन पढ़ने के लिए बाहर चले गए. तुम दोनों भी ताई के स्वभाव को समझने लगी थीं. फिर ताऊजी का ट्रांसफर हो गया तो इन लोगों का आना भी होलीदीवाली पर ही होने लगा. ताऊजी ने लखनऊ में ही मकान बनवा लिया.’’

अम्मां के बारे में जान कर छोटी की आंखों से नींद कोसों दूर हो गई थी. वह सोच में पड़ गई कि अम्मां ताईजी की इतनी कड़वी बातों और व्यवहार के बावजूद आज भी कितने प्यार और इज्जत के साथ उन की देखभाल कर रही हैं और एक वह है कि शादी के 8 वर्ष होने को आए, लेकिन वह आज तक मम्मीजी (सासूमां) को प्यार और सम्मान नहीं दे पाई. उस में और दीपा भाभी में क्या अंतर है. वह भी तो मम्मीजी के साथ ऐसा ही व्यवहार करती आई है. उस ने तो दीपा भाभी से एक कदम आगे बढ़ कर नैट पर वृद्धाश्रम ढूंढ़ढूंढ़ कर लिस्ट तैयार कर आनंद को दे डाली है.

आज तो उस ने सारी सीमाएं तोड़ कर आनंद को अल्टीमेटम भी दे दिया कि इस घर में या तो मम्मीजी रहेंगी या वह.

उस ने मम्मीजी को नौकरानी से ज्यादा कभी कुछ नहीं समझा. उन्होंने अकेले अपने कंधों पर सारे घर की जिम्मेदारी संभाल रखी है. आरुष को उन्होंने ही इतना बड़ा किया है. वह भी दादी की रट लगाए रहता है. उन्हीं का पल्लू पकड़ कर खातापीता है. आज भी उस के साथ नहीं आया.  दादी से चिपक गया कि वह मम्मी के साथ नहीं जाएगा. बस इसी बात पर उस ने गुस्से में उसे 2 थप्पड़ मार दिए.

फिर तो बात बढ़ गई और फिर वह गुस्से में गाड़ी ले कर दीदी लोगों के पास एअरपोर्ट पहुंच गई. अब वह मन ही मन पछता रही थी कि वह यह क्यों नहीं सोच पाई कि जैसे उसे अपनी मम्मी प्यारी है वैसे ही आनंद को भी अपनी मम्मी प्यारी होगी. काश पहले उसे यह बुद्धि आई होती.

सुबह  होते ही सुषमाजी उठीं तो छोटी तैयार खड़ी थी. वह अपना बैग बंद कर जूते पहन रही थी.

सुषमाजी अचकचा कर बोली, ‘‘छोटी, सब ठीक तो है?’’

‘‘अम्मां अभी तक तो ठीक नहीं था, लेकिन अब मैं सब ठीक कर लूंगी. आज आप ने अनजाने में ताई और दीपा भाभी की बातें बता कर मेरे मन को झकझोर दिया. अब मुझे तुरंत निकलना होगा वरना बात बिगड़ जाएगी. मैं मम्मीजी की गुनहगार हूं.

अम्मां इस बार आप ने मुझे मदर्स डे का ऐसा अनूठा उपहार दिया है कि यह जीवन को सही दिशा देगा.’’

जब तक सुषमाजी कुछ कहतीं, उस की गाड़ी रफ्तार पकड़ कर आंखों से ओझल हो चुकी थी.

मी टू अभियान : आज की लड़कियों के लिए सुरक्षा कवच

यौन शोषण के खिलाफ मी टू अभियान जोर पकड़ रहा है. बौलीवुड से ले कर मीडिया और राजनीति की दुनिया से जुड़े दिग्गजों के नाम आरोपों के घेरे में सामने आ रहे हैं. एक के बाद एक  नामचीन लोगों की इज्जत की धज्जियां उड़ रही हैं, उस से राजनीति, मीडिया, फिल्म, साहित्य जगत में एक भय का माहौल व्याप्त है.

मी टू अभियान से लंपट पुरुषों की दुनिया थर्रा उठी है. पता नहीं कब, कौन महिला किस के खिलाफ आरोप लगा कर उसे बेनकाब कर दे. जिस तरह से रोज खुलासे हो रहे हैं उस से लग रहा है कि यह तो बस शुरुआत है. अभी और आवाजें सामने आएंगी. कइयों की लंगोटियां उतरेंगी.

इस अभियान से सदियों पुरानी बेड़ियां टूट रही हैं. सामाजिक वर्जनाओं को चुनौतियां मिल रही हैं. यह अच्छी बात है कि सामाजिक व्यवस्था में पीड़ित रहीं महिलाओं में स्वतंत्रता, बराबरी के लिए जाग्रति उत्पन्न हुई है.

यौन उत्पीड़न पर हमेशा चुप रहने वाली औरतें मी टू अभियान के तहत अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की बात खुल कर कबूल कर रही हैं. 10-20 साल पहले  के मामले सामने लाए जा रहे हैं तो समझना चाहिए कि इतना वक्त बीत जाने के बावजूद महिलाओं को यौन उत्पीड़न के जख्म सता रहे हैं. यह इतने गहरे हैं कि आखिर पीड़िताओं को साहस करना पड़ा. यह हिम्मत पहले नहीं थी.

दरअसल यौन उत्पीड़न का शिकार हुईं अधिकांश महिलाएं उस वक्त कमजोर थीं. यौन उत्पीड़न की यह एक विशेषता है कि वह ताकतवर द्वारा कमजोर के साथ किया जाता है. इस में कमजोर किसी न किसी वजह से चुप रहता है.

अब ताकतवरों को यह भय सताएगा कि आज नहीं तो आने वाले समय में उस की हरकतों का भांडा फूट सकता है. शोषक के सिर पर हमेशा भय की तलवार लटकी रहेगी. उस की बदनामी हो सकती है. यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता आज कमजोर है, कल को वह ताकतवर बन सकती है और शोषक किसी और बड़े पद पर पहुंच जाए. अब उसे डर बना रहेगा.

मी टू अभियान का असर यह होगा कि आज जिस वजह से पीड़िता चुप है, वह भविष्य में भी चुप रहने पर मजबूर नहीं रहेगी. अब पुरुष को बेईज्जती झेलनी पड़ेगी. मी टू की चपेट में आए हौलीवुड प्रोड्यूसर हार्वे वाइंस्टीन, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज ब्रेट कैवनाघ, विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर, सुभाष घई, अभिनेता नाना पाटेकर, अनु कपूर, रजत कपूर, लेखक सुहेल सेठ, गीतकार पीयूष मिश्रा, साजिद खान, जेन दुर्रानी खान की इज्जत का आवरण उतर गया है.

पिछले साल से इस अभियान ने दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि गलत काम कई वर्षों बाद भी सामने आ सकता है. इन दिग्गजों ने ऐसा तो सोचा भी नहीं होगा कि सालों बाद वे दुनिया के सामने नंगे हो जाएंगे. हो सकता है इन में से किसी को मामला अदालत में जाने से सजा भी मिल जाए जिस तरह  अमेरिकी हास्य अभिनेता बिल कौस्मी को 14 साल पहले किए गए यौन उत्पीड़न की सजा पिछले महीने मिली है.

यह मुहिम औरतों के पक्ष में है और यौन उत्पीड़न को कम करने में सहायक सिद्ध होगी. मी टू अभियान सामाजिक दकियानूसी बेड़ियों को तोड़ेगा. किसी भी दोष के लिए औरत को अभिशप्त समझने की मानसिकता बदलेगी. उसे दोषी, पाप की गठरी मानने वाली मानसिकता ही पुरुष को हिम्मत देती आई है. वह सोच अब टूटेगी.

अब कोई भी असरदार, शक्तिशाली व्यक्ति किसी भी महिला को कमजोर समझने की गलती नहीं कर सकेगा. नई लड़कियों के लिए मी टू अभियान यौन शोषण से बचने के नए रास्ते खोल रहा है. सदियों से स्त्री विरोधी रहे हमारे समाज को औरतों के प्रति अपनी सोच बदलने का यह एक सशक्त माध्यम बन रहा है. यह अभियान आज की युवतियों के लिए सुरक्षा कवच है.

बिहार की एक ऐसी जगह, जहां चलता है बदमाशों का राज

लगता है बिहार में सुशासन बाबू का शासन अब राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था, घोर बेरोजगारी और भ्रष्टाचार में सिमट कर रह गया है. राज्य की व्यवस्था या तो भ्रष्टाचार में है या फिर अपराधियों के हाथों में.

अपराधी भी ऐसे जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. बलात्कार, दिनदहाड़े अपहरण, दंगा अब बिहार की पहचान बन चुके हैं और हालात इतने खराब हैं कि आम जनता तो क्या पुलिस भी अपराधियों की गोलियों के शिकार बन रहे हैं.

bihar gangwar

थानाध्यक्ष को मारी गोली

ताजा मामला खगड़िया जिले के नवगछिया सीमा स्थित सलारपुर मोजमा दियारा क्षेत्र की है, जहां शनिवार, 13 अक्तूबर की सुबह पुलिस व अपराधियों की मुठभेड़ में पसराहा थानाध्यक्ष आशीष कुमार शहीद हो गए.  मुठभेड़ के दौरान हालांकि पुलिस ने एक डकैत को भी मार गिराया है. इस गोलाबारी में सिपाही दुर्गेश यादव घायल हुआ है, जिसका इलाज भागलपुर में चल रहा है.

अपराधियों का गढ़

आगे बढने से पहले यह बताते चलें कि बिहार के मुंगेर, भागलपुर, खगड़िया, नवगछिया जिला अपराधियों का गढ़ रहा है. गंगा नदी के किनारे होने की वजह से इन जिलों में दूर तक रेत, जंगल हैं जिनसे यह अपराधियों का सुरक्षित ठिकाना भी है.

दूरदूर तक न तो सड़कें हैं और न ही बिजली. यहां रेत माफियाओं का कब्जा रहता है जो नदी किनारे से रेत को बेचकर लाखों रूपए कमाते हैं. यह क्षेत्र आमतौर पर दियारा कहलाता है, जहां पुलिस की जाने की हिम्मत भी नहीं होती. जिसने हिम्मत की या करने की कोशिश की उन्हें अपराधी मारने तक से नहीं चूकते.

बेखौफ बदमाश

पसराहा भी उनमें से एक ऐसा ही जगह है. रेतों के बीच से गुजरते हाईवे एनएच 31प र भी आएदिन बसों ट्रकों को अपराधी हथियार के बल पर लूटते रहे हैं. बेखौफ अपराधी जरा जरा सी बात पर किसी को भी गोली मार देते हैं.

यह घटना भी उस वक्त हुई जब देर रात पसराहा पुलिस को यह सूचना मिली कि सलारपुर दियारा में खगड़िया व नवगछिया इलाके के अपराधियों का जमावड़ा हो रहा है. इसके बाद थानाध्यक्ष आशीष कुमार पुलिसफोर्स के साथ दियारा की ओर रवाना हो गए.

पुलिस को आते देख डकैतों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी गोली चलानी शुरू कर दी. गोलीबारी में थानाध्यक्ष आशीष कुमार शहीद हो गए. 2009 बैच के दारोगा आशीष कुमार 2017 में भी मुफस्सिल थाना क्षेत्र में अपराधियों से मुठभेड़ में गोली लगने से घायल हुए थे.

जनता का भरोसा खत्म

राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था से आम जनता अब ठगा महसूस कर रही है, जिन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से काफी उम्मीदें थीं.

उधर गुजरात में हिंदी भाषी और खासकर बिहारी मजदूरों के गुजरात से पलायन पर भी नीतीश कुमार खामोश ही रहे हैं. मालूम हो कि बिहार में जदयू और भाजपा के गठबंधन से सरकार चल रही है, जिसमें भाजपा के सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री हैं.

#MeToo : सपना भवनानी ने कहा, ‘जल्दी सामने आएगी अमिताभ बच्चन की सच्चाई’

मी टू मूवमेंट का स्वरूप फैलता जा रहा है और लगातार बड़े नाम सामने आ रहे हैं. नाना पाटेकर के नाम से शुरू हुए इस मूवमेंट में अब तक 25 से ज्यादा बड़ी हस्तियों के नाम सामने आए हैं. पर इन सब के बावजूद अब एक ऐसे नाम पर खतरा आया है जिसे देश ही नहीं दुनिया भर में काफी सम्मान की नजरों से देखा जाता है. हाल ही में हेयर स्टाइलिस्ट सपना भवनानी ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की सच्चाई सामने लाने की बात कही है.

दरअसल अमिताभ ने मी टू मूवमेंट के सपोर्ट में फेसबुक पर एक पोस्ट किया था. जिसको अपनी ट्वीट में अटैच करते हुए ही सपना ने लिखा कि, ‘ये शायद दुनिया का सबसे बड़ा झूठ होगा. सर, पिंक फिल्म रिलीज होकर जा चुकी है और इसी तरह आपकी ऐक्टिविस्ट की इस इमेज के साथ भी ऐसा ही होगा. आपका सच बहुत जल्द सामने आएगा.’

महिलाओं को सामने आने के लिए कहते हुए सपना ने दावा किया कि, ‘मैंने निजी तौर पर अमिताभ बच्चन के सेक्सुअल मिसकंडक्ट की कई खबरें पढ़ी और सुनी है. उम्मीद करती हूं कि वो महिलाएं जल्दी सामने आएंगी.’

गौरतलब है कि 11 अक्टूबर को अपने 74वें जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन ने मी टू मूवमेंट पर एक लंबे पोस्ट में अपनी बात रखी थी. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट में कहा था कि किसी भी महिला के साथ खासतौर पर वर्कप्लेस पर कभी कुछ भी गलत नहीं किया जाना चाहिए.

खुलवाएं बच्चों का पीपीएफ अकाउंट, मिलेगा ये फायदा

पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) के तहत आप अपने और अपने नाबालिग बच्चों का भी अकाउंट खोल सकते हैं. ऐसा करना काफी फायदेमंद होता है. इसका पहला कारण है कि पीपीएफ अकाउंट की लौन-इन अवधि 15 साल की होती है. इसलिए अगर बचपन में ही बच्चे का पीपीएफ अकाउंट खुलावा दिया जाता है तो उसके बालिग होने तक यह खाता मैच्योर हो जाएगा. तब कई कामों के लिए इस पैसे का इस्तेमाल किया जा सकता है.

यहां पर ध्यान रखने वाली बात है कि आपके और आपके बच्चे, दोनों के अकाउंट में एक साल में जमा होने वाली रकम 1.5 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. मौजूदा कानून के मुताबिक, एक साल में पीपीएफ अकाउंट में इतनी ही रकम जमा हो सकती है. आयकर कानून के तहत एक वित्त वर्ष में 1.5 लाख रुपये की रकम पर ही टैक्स से छूट मिलती है.

बच्चों के पीपीएफ अकाउंट का फायदा

बच्चे के बालिग होते ही इस अकाउंट का संचालन उसके हाथ में आ जाएगा. इसका मतलब यह है कि बच्चे के बालिग होने के बाद उसके अकाउंट से पैसे निकालने के लिए उसके सिग्नेचर की जरूरत होगी. बालिग होने के बाद वह तय कर पाएगा कि उसे यह अकाउंट आगे चलाना है या बंद करना है.

इसके अलावा पीपीएफ खाते को ईईई का दर्जा मिला है. इसका मतलब है कि इसमें पैसे जमा करने पर टैक्स में छूट मिलती है. साथ ही खाते में जमा रकम निकालने पर भी टैक्स नहीं लगता. साथ ही पीपीएफ को निवेश के लिए अच्छा विकल्प माना जाता है. अगर किसी बच्चे का पीपीएफ अकाउंट बचपन में खुलवा दिया जाता है तो उसके बालिग होने तक यह अकाउंट मैच्योर हो जाता है.

एक बार यह अकाउंट मैच्योर होने के बाद खाताधारक के पास इसे बंद करने या आगे बढ़ाने का विकल्प होता है. खाताधारक योगदान के साथ या बिना योगदान के इस खाते को चालू रख सकता है. इस स्थिति में लौक-इन अवधि 5 साल होगी. इसे पांच-पांच साल के ब्लौक में बढ़वाया जा सकता है.

निकासी की सुविधा

पीपीएफ खाते से 7वें साल के बाद शर्तों के साथ पैसे निकालने की अनुमति होती है. हालांकि, जिनमें पीपीएफ को बढ़ाया जाता है उनमें निकासी के अलग नियम है. इस खाते में वित्त वर्ष में एक बार पैसा निकाल सकते हैं.

इस बात का ध्यान रखें

पीपीएफ अकाउंट मैच्योर होने पर अकाउंट औफिस को सूचना जरूर दें. आपको यह सूचना अकाउंट के मैच्योर होने से एक साल पहले देनी होगी कि आप इस अकाउंट को जारी रखना चाहते हैं या बंद करना चाहते हैं. अगर आप औफिस को सूचना नहीं देते हैं तो आपका अकाउंट बिना किसी नए योगदान के विस्तारित मान लिया जाता है.

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