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कपिल शर्मा की शादी की तारीख का ऐलान, गिन्नी संग लेंगे सात फेरे

मशहूर कौमेडियन कपिल शर्मा अपनी गर्लफ्रैंड गिन्नी चतरथ के साथ शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं. सूत्रों के अनुसार कपिल और गिन्नी इसी साल पंजाब में 12 दिसंबर को शादी करेंगे. और 14 दिसंबर को एक ग्रैंड पार्टी का आयोजन किया जाएगा, इस पार्टी में फिल्म जगत और टीवी इंडस्ट्री से जुड़े कपिल शर्मा के दोस्त शामिल होंगे.

एक टीवी चैनल से बातचीत में कपिल शर्मा ने बताया कि गिन्नी चतरथ के होमटाउन जालंधर में शादी समारोह होगा. हम इस शादी को साधारण तरीके से करना चाहते थे, लेकिन गिन्नी अपने परिवार की एकलौती बेटी हैं इसीलिए उनकी फैमिली चाहती है कि शादी समारोह का सेलिब्रेशन बड़े पैमाने पर किया जाए. अब मैं भी उनकी भावनाओं का सम्मान करता हूं और मेरी मां भी यही चाहती हैं.

इस बातचीत में कपिल ने बताया कि जब मेरे भाई की शादी हुई, तब मैं बहुत अच्छा नहीं कमाता था. हम बहुत छोटी सी बारात ले गए थे और भाभी को घर लाए थे. पर जब मेरी बहन की शादी हुई, तब मैं अच्छा कमाने लगा था, ये हमारे स्टैंडर्ड के हिसाब से काफी भव्य शादी थी.

आपको बता दें, कपिल की गर्लफैंड गिन्नी चतरथ भी मशहूर कामेडियन और अभिनेत्री हैं. कपिल, गिन्नी के लिए अपना प्यार बहु‍त पहले ही इजहार कर चुके हैं. पिछले साल उन्होंने ट्विटर पर गिन्नी के साथ एक फोटो शेयर करते हुए ट्वीट किया था कि इन्हें मेरा बेटर हाफ नहीं बोलिए, यह मुझे पूरा करती हैं, लव यू गिन्नी. प्लीज इनका वेलकम करें, मैं इनसे बहुत प्यार करता हूं.

क्रेडिट कार्ड गुम होने पर बैंक देता है मुआवजा, यह है प्रक्रिया

भारत में करोड़ों लोग डेबिट और क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं, बैंकों द्वारा ये सुविधा प्रत्येक ग्राहक को दी जाती है. अक्सर आपने देखा होगा कि क्रेडिट कार्ड के खोने पर लोग टेंशन में आ जाते हैं. लोग यह सोचकर परेशान हो जाते हैं कि कहीं इसका दुरुपयोग न हो जाए. क्रेडिट कार्ड खोने पर यह भी टेंशन होती है कि इससे होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा. अगर आपका क्रेडिट कार्ड खो जाता है या इसका दुरुपयोग होता है तो आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है. ऐसा होने पर क्रेडिट कार्ड जारी करने वाला बैंक मुआवजा देता है. इसके लिए बैंक का बीमा कंपनी के साथ समझौता होता है. आइये जानते हैं कि मुआवजे का दावा कैसे किया जा सकता है.

– सबसे पहले अगर आपका क्रेडिट कार्ड गुम होता है तो आपको इसका सबूत देना होगा.

– अगर कार्ड खोने वाला व्यक्ति कार्ड खोने का मजबूत सबूत पेश नहीं कर पाता है तो बैंक मुआवजे की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाएगा.

– यह बात हमेशा ध्यान रखें कि कार्ड के गुम होते ही इसकी जानकारी बैंक को दें और इसे ब्लाक करवा दें. इससे इस कार्ड का गलत इस्तेमाल होने की संभावना कम हो जाती है.

– कार्ड गुम होने की शिकायत पुलिस में भी दर्ज कराएं और इसकी कौपी ले लें. कई राज्यों में औनलाइन शिकायत दर्ज करने की भी व्यवस्था है. इससे आपके पास एक मजबूत सबूत भी हो जाएगा.

– इसके बाद बैंक मुआवजा देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं.

– कार्ड खोने के बाद कार्डहोल्डर को मिलने वाला मुआवजा इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि कार्ड का मिसयूज करने वाले से पैसे वसूले गए हैं या नहीं. बीमा कवर में होने के कारण आपको इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए.

– गौरतलब है कि देश में लाखों करोड़ों ग्राहक क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं और इसका भुगतान भी ग्राहक द्वारा निश्चित समय सीमा में किया जाता है. वहीं आपके क्रेडिट कार्ड का बैंक द्वारा बीमा भी कराया जाता है जिसके तहत आपको मुआवजा दिया जाता है.

तीन राज्यों के चुनाव में यूपी के नेता स्टार प्रचारक

देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण स्थान है. चुनाव किसी भी प्रदेश में हो उत्तर प्रदेश के नेताओं का दखल वहां प्रमुखता से रहता है. कर्नाटक चुनाव में सरकार बनाने के खेल में उत्तर प्रदेश के नेताओं की भूमिका असरदार रही.

अब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में उत्तर प्रदेश के नेता स्टार प्रचारक होंगे. केन्द्र और प्रदेश में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी तीन राज्यों के चुनाव में अपने धर्मिक एजेंडा सबसे उपर रखना चाहती है. इस काम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पार्टी के सबसे बड़े मददगार होंगे. उत्तर प्रदेश सरकार ने धर्मिक एजेंडा को बनाये रखने के लिये ही ‘अर्ध कुंभ’ का नाम बदल कर ‘कुंभ’ कर दिया. ‘इलाहाबाद’ का नाम बदल कर ‘प्रयागराज’ कर दिया. कुंभ स्नान करने वालों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लोग बहुतायत होते हैं.

अपने पहनावा, पहचान और बातचीत के अंदाज से ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धर्मिक एजेंडे को पूरा कर देते हैं. उनको धर्म पर कोई बयान देने की भी जरूरत नहीं पड़ती, उनके बिना बोले ही भाजपा का धर्मिक एजेंडा पूरा हो जाता है. वैसे तो उमा भारती भी उसी अंदाज में रहती हैं पर विधानसभा चुनावों के प्रचार में जो महत्व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का है वह उमा भारती का नहीं है. जबकि उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और केंद्र सरकार में मुख्यमंत्री हैं.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की जनता में उत्तर प्रदेश के नेताओं का क्रेज अधिक है. वह केवल योगी आदित्यनाथ को ही नहीं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती का भी है. योगी आदित्यनाथ की तरह ही यह नेता भी वहां मशहूर हैं. विधानसभा चुनावों के प्रचार में यह नेता भी वहां पर स्टार प्रचारक होंगे. बसपा नेता मायावती 25 अक्टूबर से तीन राज्यों में अपना चुनावी प्रचार शुरू करेंगी. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में वह 36 रैलियां करेगीं.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 23 अक्टूबर से ही अपना छत्तीसगढ़ दौरा शुरू कर रहे हैं. वह 2 नवम्बर को राजस्थान का दौरा भी करेंगे. भाजपा सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री,  भाजपा अध्यक्ष के बाद सबसे अधिक डिमांड योगी आदित्यनाथ की  है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के भाजपा मुख्यमंत्रियों डाक्टर रमन सिंह, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान से ज्यादा योगी आदित्यनाथ वहां डिमांड में हैं. सपा नेता अखिलेश यादव भी जल्द ही इन राज्यों में चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे. इन राज्यों के विधानसभा चुनावों की हार और जीत का प्रभाव लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा. ऐसे में कोई भी पार्टी अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती है.

मैच फिक्सिंग पर लगाम लगाने के लिए श्रीलंका ने भारत से मांगी मदद

श्रीलंका ने मैच फिक्सिंग से जुड़े मामलों को निपटाने के लिए भारत से मदद मांगी है. श्रीलंका सरकार में मंत्री और क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान अर्जुन रणतुंगा का कहना है कि उनके देश में मैच फिक्सिंग से जुड़े मामलों की जांच और कानूनी मसौदा बनाने में भारत मदद करेगा. श्रीलंकाई पेट्रोलियम मंत्री रणतुंगा ने कहा कि भारत का केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) श्रीलंका क्रिकेट में बड़े पैमाने पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच में तकनीकी विशेषज्ञता मुहैया करा सकता है.

रणतुंगा ने नई दिल्ली से कोलंबों लौटने के बाद कहा, ‘हमारे पास इस समस्या से पूरी तरह से निपटने की विशेषज्ञता या कानून नहीं हैं. भारत इससे जुड़ा कानूनी मसौदा बनाने में भी हमारी मदद करेगा.’

बता दें कि सीबीआई ने साल 2000 में रणतुंगा और टीम के उपकप्तान अरविंद डि सिल्वा पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया था लेकिन बाद में दोनों को आरोप मुक्त कर दिया गया था.

श्रीलंका ने क्रिकेट से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले उजागर होने के बाद वादा किया था कि मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के लिए विशेष पुलिस इकाई का गठन किया जाएगा. मैच फिक्सिंग के ये आरोप मई में जारी डौक्यूमेंट्री में लगाये गये थे. हाल के दिनों में देश के पूर्व दिग्गज खिलाड़ी सनथ जयसूर्या पर आईसीसी ने मैच फिक्सिंग से जुड़ी जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया है.

गाले मैदान के ग्राउंड्समैन थरंगा इंडिका और क्रिकेटर थरींडू मेंडिस पर फिक्सिंग के आरोप लगे थे. दोनों पर लगा था कि उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट के चौथे दिन मेजबान टीम को फायदा देने के लिए पिच बनाया था. दोनों को श्रीलंका क्रिकेट ने प्रतिबंधित कर दिया. इस मामले में प्रोविंसियल कोच जीवंता कुलतुंगा पर भी प्रतिबंध लगा था.

सीबीआई की प्रतिष्ठा पर घूसखोरी के घात

जिन संस्थाओं पर जनता भरोसा करती है और जहां उसे लगता है कि मामले की जांच सही तरह से नहीं की जा रही है तो मांग की जाती है कि फलां संस्था से जांच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके. अगर जनता अपनी भरोसमंद संस्था के बारे मे ऐसा सोचती है तो वह मुगालते में है.

देश की खुफिया एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो औफ इंवेस्टीगेशन [सीबीआई] के बारे में लोगों का ऐसा ही सोचना है पर इस संस्था में इतना ही भ्रष्टाचार व्याप्त है जितना किसी भी अन्य सरकारी विभाग में.

सीबीआई भी ऐसी ही संस्था है जिस में अंदरूनी काले कारनामों का समयसमय पर खुलासा होता रहा है. ताजा मामला सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच झगड़े का है. इस झगड़े के पीछे घूसखोरी है. दो दिन पहले राकेश अस्थाना पर मीट व्यापारी मुईन कुरैशी से साढे तीन करोड़ रुपए घूस का आरोप सामने आया था. अब अस्थाना के नेतृत्व वाली एसआईटी के डीएसपी देवेंद्र कुमार को गिरफ्तार किया गया है.

आरोप है कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक कुमार को फंसाने के लिए देवेंद्र कुमार ने हैदराबाद के एक कारोबारी सतीश बाबू सना का फर्जी बयान दर्ज किया था. सीबीआई ने 15 अक्तूबर को राकेश अस्थाना, देवेंद्र कुमार और अन्य के खिलाफ घूसखोरी का मामला दर्ज किया था.

सीबीआई ने अपने ही स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना के खिलाफ 6 मामलों में एफआईआर दर्ज की हैं. दर्ज मामले में सीबीआई ने वडोदरा भेज कर कई कारोबारियों से पूछताछ की है. मामला स्टर्लिंग बायोटेक के 5000 करोड़ रुपए के केस का है. इस कंपनी में अस्थाना का बेटा काम करता है. राकेश अस्थाना पर तीन करोड़ रुपए की रिश्वत लेने का आरोप है.

उधर अस्थाना ने भी आलोक वर्मा पर मीट व्यापारी मोइन कुरैशी के मामले में दो करोड़ रुपए घूस लेने का आरोप लगाया है. इस से पहले 24 अगस्त को अस्थाना ने सीवीसी को पत्र लिख कर वर्मा पर सतीश बाबू सना से दो करोड़ रुपए लेने का आरोप लगाया था. इस के बाद दोनों उच्च अधिकारियों के बीच टकराव खुल कर सामने आ गया.

स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना ने अपने ही निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी को करीब एक दर्जन मामलों में भ्रष्टाचार की शिकायतें भेजी थीं. शिकायतों की प्रति कैबिनेट सचिव के पास भी भेजी गईं.

दरअसल अस्थाना की टीम हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू की मोइन कुरैशी के साथ हुई 50 लाख रुपए के लेनदेन की जांच कर रही थी. आरोप है कि डीएसपी देवेंद्र कुमार ने सना का फर्जी बयान दर्ज कर लिया. सना ने इस बयान में रिश्वत देने की बात कबूली थी. साथ ही कहा था कि उस ने जून में टीडीपी के राज्यसभा सांसद सीएम रमेश के जरिए सीबीआई डायरेक्टर से बात की थी. उन्होंने भरोसा दिया था कि अब उसे तलब नहीं किया जाएगा. यह बयान 26 सितंबर 2018 को दिल्ली में दर्ज हुआ था लेकिन सीबीआई जांच में पता चला कि उस दिन सना हैदराबाद में था.

सीबीआई अधिकारियों पर सरकार की शह पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं. पिछली संप्रग सरकार के समय भी सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के बंगले पर कोयला खदान आवंटन घोटाले के आरोपियों के बेरोकटोक आनेजाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था. इस में टूजी समेत भ्रष्टाचार के मामलों के आरोपी थे. वकील प्रशांत भूषण ने बंगले पर रजिस्टर में दर्ज आनेजाने वाले आरोपियों के नामों की प्रति अदालत को सौंपी थी.

रंजीत सिन्हा के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला भी दर्ज किया गया था. समयसमय पर सीबीआई को अदालतों की फटकार पड़ती रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कोयला खदान मामले की जांच रिपोर्ट के मूल तत्व में बदलाव को ले कर सरकार और सीबीआई की तीखी आलोचना की थी और कहा था कि सीबीआई तो पिंजरे में बंद तोते जैसी है.

सीबीआई जैसी प्रमुख संस्था के अफसरों की कार्यप्रणाली की निगरानी सीवीसी जैसी संस्था करती है. सीवीसी के सुझावों से सीबीआई में निष्पक्ष और ईमानदार अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं लेकिन मामला उलटा है.

सीबीआई अधिकारियों पर सरकारों और नेताओं के इशारे पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं. राकेश अस्थाना पर भी आरोप है कि वह हमेशा सत्ताधारी नेताओं के करीब रहे हैं. अस्थाना की नियुक्ति  के बाद वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी.

सीबीआई वह संस्था है जो ताकतवर लोगों के भ्रष्टाचार की जांच करती है. इस के अपने ही शीर्ष अधिकारियों के झगड़े से इस संस्था की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है.

देश में किसी भी विभाग, अधिकारी पर जिम्मेदारी तय नहीं है. अधिकारी अपनी जिम्मेदारी केवल सरकार और अपने आका के प्रति समझते है. ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए देश की सरकारें और अधिकारियों के आकाओं के चेहरे सामने आते रहे हैं. जब चोर और पुलिस दोनों मिल कर लूटने लगे तो उन का कौन क्या बिगाड़ सकता है.

विश्व कुश्ती चैंपियनशिप: बजरंग पूनिया को सिल्वर मैडल

पिछले कुछ समय से भारतीय कुश्ती में तेजी से नाम कमाने वाले पहलवान बजरंग पूनिया ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के फ्रीस्टाइल 65 किलोग्राम भारवर्ग में सिल्वर मैडल हासिल किया है. उन्हें जापान के पहलवान ताकुटो ओटुगुरो ने फाइनल मुकाबले में 16-9 से मात दी.

हालांकि, हंगरी के बुडापेस्ट में हुई इस चैंपियनशिप में मिली इस हार के बावजूद बजरंग पूनिया एक रिकौर्ड बनाने में जरूर कामयाब रहे और वह यह कि विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में उन का यह दूसरा मैडल है. यह कारनामा करने वाले वे पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए हैं. उन्होंने साल 2013 में हंगरी के बुडापेस्ट में ही हुई इस चैंपियनशिप के 60 किलोग्राम भारवर्ग में ब्रौन्ज मैडल जीता था.

वैसे, इस से पहले साल 2010 में भारत के स्टार पहलवान सुशील कुमार ने रूस के मास्को शहर में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में 66 किलोग्राम भारवर्ग में गोल्ड मैडल जीता था.

बेहतरीन रहा है यह साल

साल 2012 के लंदन ओलिंपिक में ब्रौन्ज मैडल जीतने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त के प्रिय शिष्य बजरंग पूनिया के लिए अब तक यह साल जबरदस्त रहा है. उन्होंने इस साल औस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में हुए 21वें कौमनवेल्थ खेलों और इंडोनेशिया के जकार्ता में हुए 18वें एशियाई खेलों में गोल्ड मैडल हासिल किया था. इन्हीं कुछ उपलब्धियों की वजह से बजरंग पूनिया को इस विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में तीसरे नंबर की वरीयता दी गई थी जिसे उन्होंने सिल्वर मैडल जीत कर सही साबित कर दिखाया.

फाइनल में शुरुआत नहीं रही सही

हंगरी के बुडापेस्ट में हुए फाइनल मुकाबले में 24 वर्षीय भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया शुरुआत में ही थोड़े दबाव में आ गए थे. जापानी पहलवान ने 5 पौइंट ले कर उन्हें मानसिक तनाव में ला दिया था पर इस के बाद बजरंग ने पलटवार किया और 2-2 पौइंट ले कर स्कोर 4-5 कर दिया. इस के बाद ताकुटो ओटुगुरा ने 2 पौइंट और लिए, जिस से उन के पास 3 पौइंट की बढ़त हो गई. हालांकि, बजरंग ने जबरदस्त टक्कर देते हुए 2 पौइंट और बनाए और स्कोर 6-7 कर दिया.

ब्रेक के बाद जब मुकाबला शुरू हुआ तो बजरंग पूनिया अपने ही एक दांव में उलझ गए और विपक्षी पहलवान ने 4 पौइंट ले कर 10-6 की बढ़त बना ली.

बजरंग ने वापसी के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी और जापानी पहलवान ने यह मुकाबला 16-9 से अपने नाम करते हुए गोल्ड मैंडल जीत लिया.

इस से पहले बजरंग पूनिया ने सेमीफाइनल मुकाबले में क्यूबा के एलेंजांड्रो वाल्देस तोबिएर को 4-2 से मात दी थी. दूसरी ओर, जापानी खिलाड़ी ने सेमीफाइनल मुकाबले में रूस के पहलवान अखमेद चाकाऐव को 15-10 से हराया था.

खराब रेफ्रीशिप का शिकार

‘अर्जुन अवार्ड’ विजेता कुश्ती कोच कृपाशंकर बिश्नोई बजरंग पूनिया की हार को खराब रेफ्रीशिप का शिकार मानते हैं. उन्होंने बताया, “मेरे मुताबिक जापानी पहलवान कुश्ती नहीं खेल रहा था, वह तो कबड्डी खेल रहा था. वह कभी मनमुताबिक निष्क्रियता क्षेत्र में रह कर विश्राम करने लग जाता तो कभी झूठी चोट का बहाना कर अपना दम ठीक करने लग जाता.

“यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग के डाक्टर ने भी जापानी पहलवान की चोट को बेवजह का बहाना बताया और उसे कुश्ती करने की हिदायत दी. रेफरी द्वारा नकारात्मक कुश्ती खेलने वाले खिलाड़ी को बढ़ावा दिया गया, यह देख कर मै हैरान हूं. ऐसे में कौशन (caution) का नियम होता है जो रेफरी की तरफ से दिया नहीं गया. बाद मे 2 कौशन जरूर दिए गए पर पहले का एक कौशन नहीं दिया गया. नियमानुसार तीसरा कौशन मिलने पर कुश्ती खत्म मान ली जाती है. ऐसे पहलवान को डिसक्वालिफाई करने का प्रावधान है.

“रेफरी संरक्षण मे जापानी पहलवान कुश्ती के दौरान लगातार पैसिविटी जोन में खेल रहा था जो एक अपराध था. भारतीय कुश्ती संघ के माध्यम से मैं यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग से आग्रह करता हूं कि ऐसे अपराधी रेफरी टिम को सजा दी जाए जिस में उस की कैटेगिरी डाउन करने का प्रावधान शामिल है.”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दीवाली पर बैन नहीं होंगे पटाखे

इस दीवाली पटाखे जलाने का रास्ता तब साफ हो गया है जब देश के कई शहरों सहित दिल्ली में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है. पटाखे जलाने को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला देते हुए कहा कि दीवाली के दौरान देश भर में पटाखों के उत्पादन और बिक्री पर रोक नहीं लगाई जाएगी.

दीवाली पर नहीं होंगे बैन

कोर्ट ने कहा कि दीवाली पर पटाखों को बैन नहीं किया जाएगा. साथ ही साथ SC ने यह भी कहा कि शाम 8 से 10 बजे के बीच ही पटाखे जलाएं. कोर्ट ने लोगों को यह भी सलाह दी कि कम वायु प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे ही जलाएं.

फैसला सुरक्षित रखा था

इस मामले पर 28 अगस्त, 2018 को अपना फैसला सुरक्षित रखने वाली न्यायमूर्ति एके सीकरी और अशोक भूषण की पीठ ने आज यह फैसला सुनाया है. SC ने पहले कहा था कि प्रतिबंध से जुड़ी याचिका पर विचार करते समय पटाखा उत्पादकों के आजीविका के मौलिक अधिकार और देश के 1.3 अरब लोगों के स्वास्थ्य अधिकार समेत विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखना होगा.

बढ़ जाता है प्रदूषण

मालूम हो कि पटाखे जलाने से दिल्ली सहित देश के कई शहरों का प्रदूषण मास इंडैक्स खतरनाक स्तर पर जा पहुंचता है. कोर्ट ने हालांकि वायु और ध्वनि प्रदूषण के मानकों का खयाल रखा है पर ऐसा लगता नहीं कि लोग इन मानकों के आधार पर पटाखे जलाएंगे.

सावधानी हटी दुर्घटना घटी

देश में दीवाली के मौके पर सब से अधिक पटाखे जलाए जाते हैं. दिल्ली में पटाखे जलाने से हर साल लोगों को प्रदूषण की दोहरी मार झेलनी पड़ती है. एक तरफ वाहनों और अवैध कारखानों की वजह से तो दूसरी ओर पटाखे जलाने से दिल्ली की स्थिति खतरनाक लेवल पर जा पहुंचती है.

अब चूंकि इस पर एससी का निर्णय आ गया है इसलिए कोई कुछ भले ही इस के विरोध में न बोले पर पटाखे जलाते समय सावधानी बरतें और खासकर बच्चों को सावधानी बरतने की सलाह दें.

*पटाखे कम आवाज वाली जलाएं.

*बच्चे अपने अभिभावक के सामने पटाखे जलाएं.

*पटाखे जलाते समय उचित दूरी बनाए रखें.

*उचित मापदंड वाले पटाखे ही जलाएं.

*घर में फर्स्ट एड बौक्स जरूर रखें.

*जलने की स्थिति में तुरंत प्राथमिक उपचार लें और अस्पताल जाएं.

कैंसर से जूझ रहीं सोनाली बेंद्रे का नया लुक आया सामने

हाईग्रेड कैंसर से जूझ रहीं सोनाली बेंद्रे लोगों के लिए किसी मिसाल से कम नहीं हैं. इस मुश्किल वक्त में भी उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है. सोनाली न्यूयार्क में अपना इलाज करवा रही हैं. मुश्किल की इस घड़ी में भी वह सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस से जुड़ी हुई हैं और लगातार सभी को अपनी सेहत के बारे में अपडेट देती रहती हैं. हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने नए हेयर स्टाइल के साथ कुछ फोटोज शेयर की है. इन फोटोज में सोनाली शार्ट हेयर में नजर आ रही हैं. फोटो के साथ उन्होंने अपनी हेयर स्टाइलिस्ट के लिए एक मैसेज भी लिखा और उनको धन्यवाद दिया.

 

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इससे पहले सोनाली ने एक इमोशनल पोस्ट करते हुए लिखा था, ‘पिछले कुछ महीनों से मेरी जिंदगी में कभी अच्छे दिन आए तो कभी बुरे. कुछ ऐसे दिन रहे जब मैं इतनी थक जाती थी और मुझे इतना दर्द होता था कि एक उंगली उठाना भी मेरे लिए मुश्किल हो जाता था. मुझे लगता है यह पूरा एक साइकल है जिसमें दर्द शरीर से शुरू होकर दिमाग और फिर भावनाओं तक पहुंच जाता है. कीमो और सर्जरी के बाद हंसना भी मुश्किल हो गया था.’

सोनाली ने आगे लिखा, ‘मैं इस लंबी और थका देने वाली लड़ाई को लड़ती रहती क्योंकि मैं जानती थी कि यह लड़ाई लड़ने लायक है. यह जानना जरूरी है कि हमारी जिंदगी में थोड़े बुरे दिनों से गुजरने की हमें इजाजत है. खुद को जबरन खुश रखने की कोशिश करना बेमतलब है. हम यह ढोंग भला क्यों और किसके लिए कर रहे हैं?’ सोनाली बेंद्रे ने अपनी पोस्ट के अंत में घर लौटने की इच्छा जाहिर करते हुए लिखा, ‘फिलहाल जब मेरा इलाज जारी है, मेरा पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर है कि मैं बेहतर होकर घर लौटना चाहती हूं.’

विधानसभा चुनाव : मतदाता खामोश, नेताओं के उड़े होश

तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में शुरुआती गहमागहमी के बाद पसरते सन्नाटे से सभी प्रमुख राजनैतिक दल और नेता सकते में हैं कि मतदाता चुनाव में उम्मीद के मुताबिक दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहा है. वोटर्स को लुभाने में जुटे नेता अपनी तरफ से पूरा जोर लगा रहे हैं लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही है तो इसकी अपनी वजहें भी हैं कि लोग सभी दलों से नाउम्मीद हो चुके हैं. मतदाता की यह उदासीनता और खामोशी अगर किसी बड़े तूफान का इशारा है तो भाजपा को सत्ता मुट्ठी में बनाए रखने ज्यादा कोशिशें करना पड़ रहीं हैं जो इस खामोशी का मतलब समझ रही है कि लोग उसे लेकर खुश नहीं हैं.

दूसरी तरफ सत्ता की दौड़ में बराबरी से दौड़ रही कांग्रेस भी बेफिक्र नहीं है क्योंकि मतदाता उसके पक्ष में भी खुल कर नहीं बोल रहा है. आमतौर पर हिन्दी भाषी राज्यों में चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही चुनावी चहल पहल और सरगरमिया शुरू हो जाती हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है तो नेताओं को प्रचार के मुद्दे तय करने में कठिनाइयां पेश आ रहीं हैं.

लोगों की खामोशी बेवजह नहीं है क्योंकि भाजपा ने अपना चुनाव प्रचार अभियान एक साल पहले से ही शुरू कर दिया था, जिसके केंद्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे, वे अभी भी ऐसे हीरो हैं जिनकी फिल्में देख देख कर जनता ऊबने लगी है. एक साल से प्रदेश में घूम रहे शिवराजसिंह इतने वादे जनता से कर चुके हैं जितने आजकल के आशिक भी अपनी माशूका से नहीं करते. इन वादों की हकीकत वक्त से पहले ही सामने आने लगी है तो गड़बड़ाए शिवराज सिंह देश भर के जादूगरों को चुनाव प्रचार के लिए बुला रहे हैं. जल्द ही ये जादूगर गांव देहातों के हाट बाजारों में जाकर मजमा लगाएंगे और लोगों को सरकार की उपलब्धियां गिनायेंगे. इससे भी ज्यादा अहम बात ये कि वे दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल की बदहाली भी जादू के साथ दिखाएंगे.

अच्छा तो यह है कि शिवराज सिंह राज्य के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के जमाने की बदहाली की बात नहीं कर रहे कि देखो भाइयों और बहिनो तब गांवों में बिजली बिलकुल नहीं थी अब आ रही है इसलिए समृद्ध मध्यप्रदेश के लिए मुझे चौथी बार मौका दें. यही वह बिन्दु है जहां शुरुआती बढ़त बनाने के बाद वे तेजी से पिछड़ते जनता की निगाह से उतरने भी लगे हैं, खासतौर से शहरी इलाकों में जहां लोग उनकी सभा के नाम से ही मुंह फेरने लगते हैं.

गांव देहातों में तो और भी बुरी हालत है जहां भाजपा कार्यकर्ता लोगों की मिन्नतें करते नजर आते हैं कि दादा, काका चलो मीटिंग में और दादा काका हैं कि पूछ रहे हैं कि क्यों चलें, हमें 15 साल में उन्होंने सिवाय वादों और भाषणों के दिया क्या है. इतनी दुर्गति तो कांग्रेस के टाइम में नहीं हुई थी जितनी अब दो चार साल में हो गई है कि हाथ में चार पैसे भी बचाए नहीं बचते. ये लोग मानते हैं कि पांच साल पहले तक शिवराज सरकार ठीक ठाक काम कर रही थी.

दरअसल में इस चुनाव में मुद्दे गायब हैं और राष्ट्रीय नेताओं को भी लोग अब भाव नहीं दे रहे हैं. नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी तक की सभाओं और मीटिंगों के लिए कार्यकर्ताओं को भीड़ जुटाना पड़ रही है ऐसा इसलिए कि लोग समझ गए हैं कि इन नेताओं के पास भी अब बोलने कुछ खास और नया नहीं है. मोदी जी जब भी बोलेंगे तो उसका सार यही होगा कि कांग्रेस शासन काल में विकट का भ्रष्टाचार था और नेहरू गांधी खानदान ने देश को दीमक की तरह चाट चाट कर खोखला कर दिया है. दूसरी बात अब वे शिवराज सिंह की अगुवाई में मध्यप्रदेश की तरक्की की बातें करते हैं, यही बात वे राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए करते हैं तो जनता अब बजाय मोदी मोदी करने के चिढ़ उठती है.

इधर राहुल गांधी की धार्मिक ड्रामेबाजी भी लोगों को रास नहीं आ रही है कि पूजा पाठ करने की बिना पर ही हमें वोट डालना है तो फिर भाजपा क्या बुरी है जिसके नेता तो चौबीसों घंटे घंटे घड़ियाल बजाते रहते हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और कांग्रेस के दूसरे दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया में जरूर लोग थोड़ी बहुत दिलचस्पी ले रहे हैं लेकिन वह सत्ता दिलाने लायक नहीं हैं. ये दोनों नेता चूंकि पहली दफा प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुये हैं इसलिए जनता इनमें संभावनाएं टटोल रही है पर दिक्कत यह है कि कांग्रेस ने इन दोनों में से किसी को बतौर मुख्यमंत्री पेश नहीं किया है. कांग्रेस की एकता पर भी वोटर यकीन नहीं कर रहा है.

मुद्दे न हों, राष्ट्रीय नेता चमक खोने लगें और दलों के कार्यकर्ता भी बेमन से काम करें तो ऐसी स्थिति बनना लाजिमी है जिसमें वोटर खुलकर किसी पार्टी का समर्थन या विरोध न करे. इससे  नेताओं की सांसें फूलना भी कुदरती बात है. तीनों राज्यों में कोई तीसरा विकल्प मतदाता के पास हैं नहीं लिहाजा भाजपा और कांग्रेस दोनों चुनाव में जान फूंकने की कोशिश में लगे हैं कि मतदान की तारीख आते आते वे वोटर को रिझा लेंगे, लेकिन लोकतन्त्र में सत्तारूढ़ दल की सेहत के लिहाज से यह खामोशी अक्सर उसे ही आखिर में मंहगी पड़ती है.

पत्रकार खशोगी की हत्या : बिन सलमान की सुधारवादी साख को धक्का

पिछले समय से सऊदी अरब के प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान द्वारा किए जा रहे सुधारवादी कार्यों पर वहां के जानेमाने पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या का धब्बा लग गया है. पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या में सऊदी अरब सरकार का हाथ होने का खुलासा होने के बाद दुनिया भर के मीडिया जगत में शाही शासन की निंदा की जा रही है. खशोगी तुर्की में अंकारा स्थित सऊदी अरब वाणिज्य दूतावास से दो अक्तूबर से गायब हैं. अभी तक इस के सबूत नहीं मिले कि वह जिंदा बाहर निकले हैं.

हत्या को  ले कर दुनिया भर में प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान पर सवाल उठ रहे हैं. सऊदी अरब के करीबी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कह रहे हैं कि अगर इस मामले में सऊदी अरब की गलती साबित हो जाती है तो कड़ी सजा मिलनी चाहिए. अमेरिका और सऊदी अरब के आपसी हित जुड़े होने के बावजूद ट्रंप सऊदी अरब को आंख दिखा रहे हैं. दोनों देशों के बीच अरबों डौलर के हथियार सौदे हैं.

दरअसल 2 अक्तूबर को खशोगी तुर्की स्थित अंकारा के वाणिज्य दूतावास में अपनी मंगेतर हदीजे जेनगीज के साथ गए थे. उन की मंगेतर दूतावास के बाहर ही उन का इंतजार कर रही थीं. वह उन से शादी करना चाहते थे और दूतावास में कुछ जरूरी कागजी दस्तावेज लेने गए थे.

तुर्की के मीडिया का कहना हैकि उन्होंने संदिग्ध सऊदी एजेंटों की एक 15 सदस्यीय टीम की पहचान की है जो खशोगी के गायब होने के दिन इस्तांबूल से बाहर निकल गई. एक अखबार ने खशोगी को यातना दिए जाने के दौरान चीखों की आवाज आने का दावा किया है.

तुर्की के अधिकारियों का कहना है कि उन के पास ऐसे सबूत हैं जिन से पता चलता है कि खशोगी की सऊदी अरब के एजेंटों की एक टीम ने हत्या की है. खशोगी की गुमशुदगी का वक्त गुजरने के साथ दुनिया के तमाम बड़े देश सऊदी अरब पर जांच के लिए दबाव बनाने लगे. सब से अधिक दबाव तुर्की के राष्ट्रपति रेचेपे तैय्यप अर्दोवान ने बनाया. उन्होंने खुलेआम इस मामले में सऊदी नेताओं को फटकार लगाई और उन पर जांच में बाधा पहुंचाने का आरोप लगाया.

अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद आखिर सऊदी अरब ने मान लिया कि खशोगी उन के वाणिज्य दूतावास में ही मारे गए. सऊदी अरब के सरकारी टीवी चैनल ने शुरुआती जांच के हवाले से कहा था कि दूतावास के भीतर बहस हुई थी और उस के बाद झगड़े में वह मारे गए.

हत्या को ले कर अलगअलग खबरें आ रही हैं. कहा गया है कि सऊदी अरब दूतावास के भीतर सऊदी अधिकारियों की निगरानी में पूछताछ और यातना के बाद उन्हें मारा गया. खबरों में यह भी कहा गया है कि सऊदी अधिकारियों ने शव के टुकड़ेटुकड़े किए और पूरे अपराध का वीडियो बना कर प्रिंरस मुहम्मद बिन सलमान को भेजा गया ताकि उन्हें भरोसा हो जाए कि मिशन पूरा हो गया है.

खशोगी वाशिंगटन पोस्ट में कौलम लिखते थे और वह प्रिंस सलमान की आलोचना की वजह से वांटेड थे. गिरफ्तारी के डर से खशोगी सऊदी अरब से बाहर अमेरिका में रहते थे. इस हत्या का यह अर्थ है कि सऊदी सरकार की आलोचना करने वाले विरोधी विदेशों में भी सुरक्षित नहीं हैं.

मामले में सऊदी अरब के 15 लोगों को हिरासत में लिया गया. साथ ही कई उच्व अधिकारियों को उन के पदों से बर्खास्त कर दिया गया. तुर्की पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ा दिया और खशोगी के शव को बेलग्रेड जंगल और इस के आसपास की जमीन में दफनाए जाने के शक में ढूंढा जा रहा है.

33 वर्षीय प्रिंस सलमान को सुधारवादी के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने कुछ बेहतर आधुनिकता की ओर बढने वाले सुधार किए, जिन में महिलाओं को गाड़ी चलाने का  अधिकार, इंटरटेनमेंट के लिए नियम उदार बनाए गए और धार्मिक पुलिस की शक्ति कम की गई. उन्होंने पिछले दिनों शाही परिवार के दर्जनों सदस्यों और व्यापारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में बंद कर दिया था.

सऊदी अरब में काफी कुछ बदलने के बावजूद बीचबीच में ऐसी घटनाएं हुई हैं जो इस बात का संकेत देती हैं कि प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान उदार सुधारक नहीं हो सकते. प्रिंस सलमान ने यह आदेश भी दिया था कि उन के सुधार पर सवाल उठाने वाले हर शख्स को जेल भेज दिया जाए. यदि कोई ट्वीट भी इस सुधार के विरोध में किया जाता है तो भी उस की गिरफ्तारी के आदेश दिए गए.

किसी पत्रकार को सरकार या शाही खानदान का आलोचक होने की वजह से जान गंवानी पड़े, इस तरह के मामले कम ही सामने आते हैं. सरकार की खिलाफत करने वाले पत्रकारों को दबाया, डराया जाना तो आम है लेकिन शासकों द्वारा हत्या कर देना गंभीर मामला है. अमेरिका ने कहा है कि वह खशोगी की हत्या मामले में सऊदी  अरब के खिलाफ प्रतिबंध जैसे कदम उठा सकते हैं.

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