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मिक्स ऐंड मैच के ये ट्रिक्स अपनाएं और फैशनेबल बन जाएं

हर किसी की अच्छा दिखने की तमन्ना होती है. लेकिन इस के लिए लेटैस्ट फैशन ट्रैंड को समझना जरूरी होता है. कुछ ट्रैंड समय के अनुसार चलन में होते हैं, जिन्हें फौलो करने वाले फैशन की दुनिया में तो छाते हैं ही, साथ ही बदलते ट्रैंड के अनुसार अपना लुक भी बदलते रहते हैं. आप भी अपना लुक बदल कर फैशनेबल कहलाएं. पेश हैं कुछ टिप्स:

आजकल गीले बालों का लुक फैशन में है. बालों में जैल लगा कर, मांग निकाल कर कस कर काढ़ा जाता है. यह लुक बेहद बोल्ड लगता है.

यदि आप अकसर छोटी बिंदी लगाती हैं या लगाती ही नहीं हैं, तो कहीं आनेजाने पर बड़ी बिंदी लगाने पर आप का लुक बिलकुल बदल जाएगा.

भले आप ने साधारण पोशाक पहनी हो, उस के संग कर्णफूलों की अदा से आप अपना पूरा लुक बदल सकती हैं. कानों में बड़े झाले सजा लें या फिर बड़े आकार के स्टड्स आप की साधारण पोशाक में भी चार चांद लगा जाएंगे.

नाक में पुरानी डिजाइन वाली चांदी की छोटी नथ पहनने से आप के चेहरे में एक अलग ही आकर्षण पैदा होगा.

छोटी ड्रैस के साथ एक पैर में पायल जो ‘ऐंक्लेट’ के नाम से बाजार में मिल जाएगी, पहन लें. इस से आप का पूरा लुक समरी या बीच स्टाइल हो जाएगा.

पद्मावत’ मूवी में हीरोइन दीपिका पादुकोण ने अपनी दोनों भवों को जोड़ कर एक नए फैशन को जन्म दिया. पतले चेहरे वाली महिलाएं ऐसी भवें रख कर अपना लुक बदल सकती हैं.

नब्बे के दशक में फैशन में आई चौड़ी बैल्ट एक बार फिर फैशन में है. वनपीस ड्रैस पर आप चौड़ी बैल्ट पहन कर एकदम लेटैस्ट फैशन लुक पा सकती हैं.

  • आजकल चौड़े पायंचों वाले प्लाजो, कुलोट्स, ट्राउजर फैशन में हैं. डैनिम से ले कर सिल्क, चिकनकारी तक जो आप को भाता हो, आप उस का प्लाजो या ट्राउजर खरीद सकती हैं. इस के साथ छोटे या लंबे कुरते, टौप, टीशर्ट सब खूब फबते हैं.
  • आप ने चाहे साड़ी पहनी हो या सलवारकुरता यदि उस पर एक जैकेट या पोंचू पहन लेंगी तो फैशन में आप को कोई नहीं हरा पाएगा.
  • शरारा भी फैशन में लौट आया है. ढीलीढीली शरारासलवार आप रोजमर्रा के कुरते या फिर पार्टीवियर, अवसर के अनुसार पहन सकती हैं.
  • कौकटेल रिंग बहुत ही फैशनेबल गहना है. इसे आप इंडोवैस्टर्न या इंडियन दोनों परिधानों के साथ पहन सकती हैं. कौकटेल रिंग से आप का अंदाज ए बयां बदल जाएगा.

सोशल मीडिया : भरम फैलाती खबरों का दलदल

एक नया इसथान (स्थान) गांव-गढ़ौत, तहसील-मैहर, जिला-सतना में नया ऊदगम (उद्गम). 13 वर्ष की कन्या से जो भी अर्जी करता है उस की मनोकामना पूरी होती है. 21 लोगों को फैलाओ आप की भी मनोकामना पूरी होगी. प्रेम से बोलो जय माता दी.

ह्वाट्सऐप पर यह मैसेज 29 जुलाई, 2018 की देर रात भोपाल के एक ग्रुप में किसी ने डाला था जिस के साथ एक लड़की की तसवीर भी थी जिस में उस के बाल बिखरे हुए थे और वह गले में फूलों की माला पहने हुए थी.

लड़की के माथे पर एक लंबा सा टीका भी लगा था. लड़की के पीछे किसी देवीदेवता की फोटो थी जिस से लग रहा था मानो वह कोई सिद्ध है.

इस मैसेज में मनोकामना पूरी करने के लिए लोगों को गढ़ौत गांव नहीं बुलाया गया था बल्कि मैसेज फौरवर्ड करने की सलाह दी गई थी जिसे कई लोगों ने किया भी और देखते ही देखते यह चमत्कारिक मैसेज कई ह्वाट्सऐप ग्रुपों में फैल गया.

यह और इस तरह के कई ऊटपटांग मैसेज आज के दौर की हकीकत बयान करते हैं कि लोग सोशल मीडिया की लत के चलते दिमाग से इतने पैदल हुए जा रहे हैं कि अपना भलाबुरा और सहीगलत सोच ही नहीं पाते हैं.

बात जहां तक किसी लड़की से अर्जी लगाने पर मनोकामना पूरी होने की थी तो यह लोगों को धर्म के नाम पर ठगने और बेवकूफ बनाने वाली बात थी जिस का मकसद इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का था.

विलाशक जमाना सोशल मीडिया का है लेकिन अफसोस की बात यह है कि यही सोशल मीडिया झूठी और भ्रामक खबरों का दलदल बनता जा रहा है जिस में रोजाना करोड़ों लोग धंसते जा रहे हैं.

एक और बानगी

ब्रेकिंग न्यूज- मुख्य चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित राजस्थान में विधानसभा चुनावों कि तारिखों का किया ऐलान. 15 दिसंबर से होगा पहले चरण का मतदान. कुल 4 चरणों में होगा मतदान.

15 दिसंबर, 5 जनवरी, 7 जनवरी, 20 जनवरी 4 चरणों में होंगे विधानसभा चुनाव.

जून के महीने से वायरल हो रहे इस मैसेज का कोई सिरपैर नहीं है. जिस ने भी इसे बनाया होगा उसे ‘कि’ और ‘की’ की मात्रा लगाने की भी तमीज नहीं है. तारीख शब्द में भी ‘रि’ की मात्रा गलत है. यह मैसेज भी झूठा था, यह 4 महीनों में हर किसी को समझ आ चुका है लेकिन इस के बाद भी लोग इसे वायरल किए जा रहे हैं तो इस के पीछे छिपी मंशा सिर्फ लोगों को बेवकूफ बना कर मजा लूटने की ही है.

चुनाव वाले मैसेज और 13 साल की लड़की वाले मैसेज में फर्क सिर्फ इतना है कि चुनाव वाला मैसेज वायरल करने से सीधे किसी को कोई नुकसान नहीं हो रहा है लेकिन लड़की वाले मैसेज का मकसद दोहरा है. पहला लुत्फ उठाना और दूसरा धार्मिक अंधविश्वास को फैलाना.

दहशत फैलाते मैसेज

ऊपर के दोनों मैसेज जिन्हें खबर की शक्ल दे कर वायरल किया गया, वे बेमकसद नहीं थे. एक में खुदगर्जी भी थी, पर दूसरे में नहीं थी. यह आदमी की फितरत है कि उसे झूठी खबरें फैलाने में एक खास किस्म का सुख मिलता है फिर इस से किस का कैसा नुकसान होता है, यह झूठी खबरें फैलाने वाले नहीं सोचते.

लेकिन चिंता की बात वे खबरें भी हैं जो इस तरह बनाई और वायरल की जाती हैं कि जिन में 2 धर्मों, जातियों या संप्रदायों के बीच कटुता बढ़े. इस तरह की खबरें जाहिर हैं एक खास मकसद से एक खास तबके के लोग गढ़ते हैं जिन से दहशत फैलती है और माहौल भी बिगड़ता है.

एक वायरल मैसज में अकसर बताया जाता है कि रतलाम से राजस्थान होते हुए गायों से भरा एक ट्रक मुंबई या पाकिस्तान ले जाया जा रहा है. ट्रक ले जाने वाले मुसलमान हैं जो इन गायों को काटेंगे. यह हिंदू धर्म के  खिलाफ है. लिहाजा, गाय को माता मानने वाले लोग इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा इतना फौरवर्ड करें कि बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचे.

मैसेज के साथ गायों से भरा एक ट्रक भी अटैच होता है. मैसेज फैलाने के लिए मां की कसम भी दी जाती है. ऐसे भड़काऊ मैसेज न केवल हिंदूमुसलमानों के बीच दरार डाल कर हिंसा फैलाते हैं बल्कि दहशत का माहौल भी बनाते हैं. कट्टरवादी बिना किसी जांचपड़ताल किए इन्हें सच मान लेते हैं और मैसेज आगे खिसका देते हैं.

गौहत्या और गौतस्करी को ले कर मौब लिंचिंग अब बेहद आम है जिस में अकसर मरने वाला मुसलमान या दलित ही होता है.

इस बहस से परे कोई यह नहीं सोचता कि बड़े पैमाने पर साजिश रची जा रही है और आम लोगों को धर्म और देवीदेवताओं की आड़ ले कर उकसाया जा रहा है. हमारी माता गाय को कोई कत्लखाने ले जाए यह किसी को गवारा नहीं होता. ये वही लोग होते हैं जिन्हें अपने महल्ले की गाय से कोई लगाव या उस के लिए श्रद्धा नहीं होती पर बात धर्म की आती है तो इन का खून खौल उठता है.

धर्म से इतर इस तरह की झूठी खबरों से कैसे लोगों को डराया जाता है इसे समझने के लिए 2 मैसेज देखना काफी है जो हर उस शख्स ने पढ़े होंगे जो सोशल मीडिया पर हैं.

काकड़ीघाट, अल्मोड़ा से भिखारी की शक्ल में 500 लोगों को मार कर कलेजे और किडनी निकाल रहे हैं. 6-7 लोग पकड़े भी गए हैं. जो पकड़े गए हैं उन्होंने कड़ी पूछताछ के बाद 500 लोगों को मारने की बात कबूली है. कृपया सावधान रहें. 15 से 20 लोगों की टोली आई है. उन के साथ बच्चे और लेडीज भी हैं और उन के पास हथियार भी हैं. आधी रात को वे किसी भी वक्त आते हैं और बच्चों के रोने की आवाज आती है.

यह मैसेज खबर जैसा लगता है इसलिए लोग दहशत में आ जाते हैं और यह नहीं सोच पाते कि 500 लोगों की हत्या हो गई और न्यूज चैनल, अखबार और पत्रिकाएं हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं. फिर यह सोचने की उम्मीद तो लोगों से करनी ही नहीं चाहिए कि किसी को हथियार से मार कर उस की किडनी या कलेजा निकाल भी लिया जाए तो वह किसी काम का नहीं रह जाता.

ऐसा ही एक और मैसेज देखें. ‘अलर्ट उत्तराखंड’ खासकर घरेलू महिलाओं से अनुरोध है कि किसी भी अजनबी जैसे कबाड़ी वाला, फेरी वाला या भिखारी कोई भी हो, उस के लिए दरवाजा न खोलें और न ही कोई बात करें. बस, हल्ला कर के भगा दें. गलती से भी ये शब्द न कहें, ‘अभी कोई घर में नहीं है, बाद में आना’ या ‘चले जाओ’. घर में अगर कुत्ता है तो उसे खोल दो उसी टाइम और मेन गेट मत खोलो. अपना और अपने बच्चों का ध्यान रखिए. सतर्क रहें, सुरक्षित रहें.

इस तरह के मैसेज से खासतौर से पूरे उत्तराखंड में ऐसी दहशत फैली थी कि वहां के अपर पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने 20 जुलाई, 2018 को कहा था कि सोशल मीडिया पर इस तरह की झूठी खबरें भेजना दंडनीय अपराध है. नैनीताल में ऐसे 2 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था जो ऐसी झूठी खबरें फैला रहे थे.

अशोक कुमार ने लोगों से अपील की थी कि वे फेसबुक, ट्विटर या ह्वाट्सऐप पर पोस्ट डालने या फौरवर्ड करने से पहले अपने दिमाग से काम लें और कोई भी मैसेज या वीडियो शेयर करने से पहले उस की सचाई का पता लगा लें.

समझें अपनी जिम्मेदारी

सरकार भी अब अखबारों में बड़ेबड़े इश्तिहार देने लगी है जिन में जनता से वही अपील की जाती है जो उत्तराखंड के आला पुलिस अफसर ने की. पर इस के बाद भी लोग भ्रामक खबरों को फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं तो इस की एक बड़ी वजह तुरंत उन के खिलाफ कोई कार्यवाही न होना है.

सख्त कानून बन जाए और कार्यवाही होने भी लगे तो कोई खास फर्क अब लोगों पर पड़ेगा ऐसा लगता नहीं, क्योंकि उन्हें सच्ची से ज्यादा झूठी खबरें अच्छी लगती हैं. वजह, उन में मिर्चमसाला, हिंसा, छलकपट सब होता है.

इन से ऐसे बचें

जरूरत इस बात की है कि लोग भ्रामक खबरों के दलदल में न फंसें. इस में मजा आता है लेकिन वह मजा कभी भी सजा बन सकता है. हर वह आदमी गैरजिम्मेदार ही कहा जाएगा जो भ्रामक खबरें फैलाने में उन लोगों का काम आसान करता है जो उन्हें अपनी खुदगर्जी, दुकानदारी और धर्म समेत सियासत के लिए बनाते हैं.

जब भी ऐसी खबरें सोशल मीडिया पर दिखें तो उन्हें नजरअंदाज करें और पोस्ट करने वाले को लताड़ लगाने की हिम्मत दिखाएं. इस से भी जरूरी और अहम बात यह है कि आप इस दलदल में बिलकुल न फंसें, समझदार बनें और अपना जिम्मेदारी भरा रोल बखूबी निभाएं.

बिचौलियों के हाथों लुटते किसान

मंडी टैक्स के नाम पर देशभर की मंडियों में किसानों के साथ लूट की जा रही है. मुरादाबाद की सब्जी मंडी का एक सीन:

मंडी में एक आढ़ती के यहां आलू की नीलामी चल रही है. आलू कन्हैयालाल नाम के किसान का है. पास में वरदी पहने 2 आदमी खड़े हैं. ये वरदी वाले मंडी समिति के मुलाजिम हैं.

एक बोली लगाता है और दूसरा परची बनाता है.

‘‘नया आलू 200 रुपए क्विंटल,’’ वरदी वाले एक मुलाजिम ने बोली लगाई. आसपास कुछ कारोबारी खड़े हैं. वे कन्हैयालाल के आलू हाथ में उठा कर परख रहे हैं.

एक कारोबारी ने बोली लगाई, ‘‘280 रुपए क्विंटल.’’

यह उन कारोबारियों में से है जिन्होंने मंडी समिति में अपना रजिस्ट्रेशन कराया हुआ है. मंडी में जो कारोबारी रजिस्टर्ड होते हैं, वे ही बोली में भाग ले सकते हैं.

मुलाजिम ने चिल्ला कर कहा, ‘‘280 एक, 280 दो…’’ इतने में एक और कारोबारी बोला, ‘‘285 रुपए क्विंटल.’’

इस तरह बोली बढ़ती गई. कुछ देर बाद गुन्नू सेठ ने 310 रुपए की बोली लगाई. मंडी समिति का एक मुलाजिम चिल्लाया, ‘‘310 एक, 310 दो, 310 तीन.’’

310 रुपए नीलामी की आखिरी बोली हो गई. आखिरी बोली के बाद समिति के मुलाजिम ने गुन्नू सेठ को परची काट कर थमा दी.

कन्हैयालाल और गुन्नू सेठ ने कांटे पर आलू तुलवाए. 10 बोरी यानी 10 क्विंटल आलू तुले. आलू तुलवाने के बाद गुन्नू सेठ ने परची में लिखे भाव व वजन के मुताबिक बिल बनाया और कन्हैयालाल को रुपए दिए.

कन्हैयालाल के आलू की बिक्री 310 रुपए प्रति क्विंटल पर तय हुई थी, पर एक दूसरे किसान रिंकू ने अपने आलू के लिए 300 रुपए प्रति क्विंटल ही लिए. इस तरह सब किसानों के आलू की नीलामी के भाव अलगअलग बोलियों पर तय हुए.

मंडी से माल खरीदने वाले कारोबारी को मंडी समिति को कुछ टैक्स देना पड़ता है. मसलन, गुन्नू सेठ ने दिनभर में जितने रुपए का माल खरीदा, उस का एक फीसदी मंडी समिति को दिया. इस आलू की खरीद पर उस ने मंडी समिति को 31 रुपए दिए.

मंडी समिति नीलामी करवाने के लिए कारोबारियों से पैसा लेती है. इसे मंडी शुल्क कहते हैं. मंडी में आलू के अलावा दूसरी सब्जियों की भी नीलामी हो रही थी.

मंडी में आने वाले कारोबारियों और किसान नेताओं का कहना है कि नीलामी में तयशुदा भाव के हिसाब से भी किसानों को कई बार पैसे नहीं दिए जाते हैं. तोल में भारी गड़बडि़यां की जाती हैं. इस में मंडी मुलाजिम और कारोबारी मिले हुए रहते हैं.

मंडी में बिक्री का पूरा इंतजाम मंडी समिति की देखरेख में होता है. इस तरह का कारोबार केवल सब्जी मंडी में ही नहीं, अनाज मंडी, फल मंडी, तेल मंडी, कपड़ा मंडी में भी होता है.

मंडी कानूनों में समयसमय पर बदलाव होते रहे हैं. पहले मंडी समिति के मुलाजिम नीलामी नहीं कराते थे. अनाज की सारी नीलामी आढ़तियों के हाथ में होती थी. किसान अपना अनाज और सब्जी ले जा कर मंडी में आढ़तियों की दुकान पर रख देता था और बेचने के लिए नंबर लगाता था. जब बारी आती थी तब आढ़ती बोली लगाता था. भाव तय होने पर वह किसान को पैसा देता था. बाद में कारोबारी से आढ़ती पैसा वसूल करता था.

मंडी कानून में बदलाव इसलिए किया गया ताकि किसान लुटने न पाए. किसान को आढ़त न देनी पड़े. पहले आढ़ती सौदा तय करने के लिए किसानों से आढ़त वसूल करता था. अब केवल खरीदने वाले कारोबारी से मंडी शुल्क लिया जाता है लेकिन इस तरह के बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ा है.

अब आढ़तियों की जगह मंडी समिति के मुलाजिमों ने ले ली लेकिन बिचौलिए फिर भी बने रहे. इस बदलाव के बाद मंडी मुलाजिम और कारोबारी 2-4 बिचौलिए हो गए और किसान लुट रहा है.

वैसे, इस बदलाव की वजह यह भी रही है कि नीलामी कराने से किसानों के साथ कोई धोखा न हो और किसानों को भुगतान तुरंत मिल जाए. इस से न तो किसानों के साथ धोखा होना रुक पाया है और न ही भुगतान की समस्या का समाधान हुआ है.

मंडी शुल्क की दर हर राज्य में अलगअलग है. उत्तर प्रदेश मंडी समिति में गेहूं खरीद पर ढाई फीसदी मंडी शुल्क और 4 फीसदी बिक्रीकर लिए जाने का प्रावधान है. पर पंजाब, हरियाणा में यह 4 फीसदी है. उत्तर प्रदेश में सब्जियों पर 3 फीसदी मंडी शुल्क व 8 फीसदी बिक्रीकर लिया जाता है. फल खरीद पर ढाई फीसदी मंडी शुल्क व 6 फीसदी बिक्रीकर है.

दिल्ली मंडी समिति में गेहूं खरीद पर 2 फीसदी मंडी शुल्क व 3 फीसदी बिक्रीकर है. यहां फल खरीद पर एक फीसदी मंडी शुल्क व 3 फीसदी बिक्रीकर है. सब्जी खरीद पर डेढ़ फीसदी मंडी शुल्क व 3 फीसदी बिक्रीकर लिया जाता है. यही नहीं, चोरी से आने वाले माल पर बोरी की दर से मंडी मुलाजिमों द्वारा ‘सुविधा शुल्क’ वसूला जाता है.

जीएसटी लागू होने के बाद से सभी तरह के टैक्सों के खत्म होने का दावा किया जाता रहा है पर उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्य अब भी मंडी टैक्स वसूल रहे हैं. कारोबारियों की शिकायतों के बाद केंद्र सरकार का तर्क सामने आया कि मंडी टैक्स से मिलने वाली रकम राज्य सरकार के खजाने में नहीं जाती, बल्कि उस का इस्तेमाल मंडियों के रखरखाव और किसानों व कारोबारियों की सुविधाओं के लिए खर्च किया जाता है.

जीएसटी लगने के बाद कई राज्यों में मंडी शुल्क जारी रहने का नतीजा यह है कि आम लोगों को दाल, चावल, सब्जी, गेहूं, सुपारी, जीरा, सिंघाड़ा, लकड़ी, प्लाइवुड समेत मंडी से हो कर गुजरने वाला हर सामान दूसरे राज्यों की तुलना में यहां ढाई फीसदी महंगा मिलता है.

देश में सभी चीजों के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं पर कृषि उत्पादन के दाम नहीं बढ़ रहे हैं. फसल जब तक किसान के यहां रहती है सस्ती होती है, पर बाजार में आढ़तियों के यहां पहुंच जाती है तो महंगी हो जाती है.

कृषि उत्पादन के लिए मंडियों में आढ़तियों और मंडी मुलाजिमों की बेईमानी रुकने का नाम नहीं ले रही है. ज्यादातर आढ़ती किसान की उपज का मनमुताबिक भाव तय करवाते हैं और किसानों को एकमुश्त भुगतान नहीं करते. अगर किसान को तुरंत भुगतान चाहिए तो 2 रुपए प्रति सैकड़ा काट कर भुगतान किया जाता है.

उत्तर प्रदेश में कोई भी ऐसी मंडी नहीं है जो सूरज छिपने के देर बाद और सूरज उगने से 2 घंटे बाद ही बंद हो जाती हो. इस बीच जो खेल होता है वह सुन कर आप हैरान रह जाएंगे. मजे की बात यह है कि यहां बहुत सी दुकान मंडी समिति के दफ्तर में रजिस्टर्ड नहीं हैं. सैकड़ों की तादाद में ऐसी दुकानें चल रही हैं. हर एक दुकानदार ट्रांसपोर्टर का बैनर लगा कर इस गोरखधंधे को अंजाम देता है.

पहली बात तो यहां कोई कांटा नहीं होता, न ही बाट और किसी तरह की सरकारी रसीद काटी जाती?है जिस पर लिखा हो कि अमुक ट्रांसपोर्ट कंपनी. यानी रात के अंधेरे में किसान की जेब पर डाका डाला जाता है.

ये तथाकथित आढ़ती किसी कपड़े में हाथ ढक कर आगे वाले खरीदार से सांकेतिक भाषा में सौदा कर लेते हैं और उसी सांकेतिक भाषा में अपना कमीशन तय करते हैं.

भाव कुछ तय होता है और बेचारे किसान को कुछ बताया जाता है. इस में खरीदार भी शामिल होता है. उसी वक्त नकद भुगतान कर बिना किसी कानूनी लिखापढ़ी के किसान को मीठे शब्दों में प्रणाम कह कर रात में ही लुटनेपिटने को भेज दिया जाता है.

मंडियों में आढ़तियों, दलालों के साथसाथ यहां सटोरिए भी होते हैं. ये वे दलाल होते हैं जो फसल का अंदाजा लगा कर उस की जमाखोरी कर लेते हैं.

ऐसे सटोरिए और दलाल हर जगह होते हैं. फसल आने पर सटोरिए कम दाम पर किसानों से खरीद कर उसे जमा कर रखते हैं और फिर इन की कोशिश होती है कि बाजार के भाव तेज रहें.

मंडी से जुड़े महकमे राज्य सरकार के तहत आते हैं. ये मंडियां भ्रष्ट, बेईमान, लुटेरे मुलाजिमों के अड्डे बनी हुई हैं. हालांकि मंडियों के मुखिया बड़े सरकारी अफसर होते हैं. इस के बावजूद मंडियों में काली करतूतें जारी रहती हैं.

हमारे देश में खेतीबारी से होने वाली आमदनी को टैक्स से मुक्त रखा गया है ताकि किसानों को फायदा हो, पर कारोबारियों, दलालों और सरकारी अफसरों ने किसानों से पैसा वसूलने के दूसरे गैरकानूनी रास्ते निकाल लिए हैं.

न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर भी मंडी के अफसर और कारोबारी किसानों को घोषित दर पर भुगतान नहीं करते हैं. मंडी टैक्स चोरी कर कारोबारी किसानों के पास सीधे खेतों में या बाहर पहुंच कर खरीदारी करते हैं जहां कम कीमत पर अनाज, सब्जियां, फल खरीद लिए जाते हैं. इस से टैक्स चोरी भी होती है और किसानों को भी पूरी कीमत नहीं मिल पाती.

यहां तक कि किसानों को लागत मूल्य भी नहीं मिल पाता है. कर्ज ले कर किसान बोआई करता है. उस में भी मौसम की मार के साथसाथ उसे मंडी अफसरों, बिचौलियों और पुलिस वालों की लूट का शिकार होना पड़ता है.

वसूली होने के बावजूद भी मंडियों में किसानों और कारोबारियों के लिए सुविधाएं न के बराबर हैं. तकरीबन हर मंडी में गंदगी का आलम है. आवारा पशुओं की भरमार है. किसानों को मंडी में खुले में अनाज, फल, सब्जियां रखनी पड़ती हैं जहां बारिश, सर्दी, गरमी में नुकसान उठाना पड़ता है.

दिल्ली में देश की सब से बड़ी आजादपुर मंडी में किसानों से उन की उपज बिकवाने के बदले दलाली वसूलने का खेल जारी है. आढ़ती उन से कमीशन लेते हैं.

पूठकलां गांव के किसान जगवीर सिंह कहते हैं कि किसान आढ़ती के यहां माल बेचने पर मजबूर है. अगर वह विरोध करेगा तो आढ़ती कहेगा कि अपना माल उठाओ और कहीं और बेच दो. सारे आढ़ती कमीशन वसूलते हैं. अगर माल बेचने में देरी हुई तो फलसब्जियों के खराब होने का डर रहता है.

कहने को यहां किसानों के हितों के लिए एपीएमसी यानी मंडी समिति है पर वह भी किसानों के हित के बजाय अपना हित देख रही है. मंडी समिति किसानों को दलालों की लूट से बचाने में मददगार साबित नहीं हो पा रही है.

मंडी समिति के सदस्य मानते हैं कि किसानों से गैरकानूनी वसूली हो रही है. सदस्य खुद इस बारे में शिकायत करते हैं पर अफसर कार्यवाही करने को तैयार नहीं हैं. कभीकभार दिखावे के तौर पर मामूली कार्यवाही कर दी जाती है पर इस से किसानों से लूट थमती नहीं.

मंडियों में पैसों के भ्रष्टाचार की वजह से आज किसान परेशान है. सरकारी नीतियां उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही हैं. किसानों के साथ लूट का खेल जब तक बंद नहीं होगा तब तक किसानों का भला नहीं हो पाएगा.

पेटीएम के डेटाबेस में सेंध लगा कर की ब्लैकमेलिंग, सेक्रेटरी गिरफ्तार

औनलाइन पेमेंट ऐप पेटीएम से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है. खबर है कि पेटीएम के फाउंडर शेखर शर्मा और विजय शर्मा को ब्लैकमेल करने के मामले में सेक्रेटरी को गिरफ्तार किया गया है. आरोप है कि सोनिया धवन ने पेटीएम यूजर्स का डेटा चोरी कर उसे सार्वजनिक करने की धमकी दे रही थी, इसके बदले में वो उनसे 20 करोड़ रुपये की मांग रखी थी. इस मामले में सोनिया समेत 3 आरोपियों की गिरफ्तारी की गई है और एक आरोपी फरार है.

इस मामले की पूरी जानकारी देते हुए अजय शेखर ने बताया कि पहली बार 20 सितंबर को थाईलैंड के एक वर्चुअल नंबर से संर्पक किया गया था. जिसमें ब्लैकमेलर ने डेटा लीक करने की धमकी दी थी. फिर अगले दिन उसी नंबर से विजय को फोन किया गया था.

ब्लैकमेलिंग और सारी छानबीन के बाद इसकी शिकायत नोएडा सेक्टर 20 के थाने में की गई थी. खबरों की माने तो साइबर एक्सपर्टों के बहुत कोशिशों के बावजूद फोन काल की जानकारी नहीं पता की जा सकी थी, दरअसल पुलिस वर्चुअल नंबर को ट्रेस नहीं कर पा रही थी, इसलिए कंपनी के अधिकारियों ने इजराइली साइबर एक्सपर्ट की मदद ली. तब जा कर आरोपियों की असलियत सामने आ सकी.

नोएडा के एसएसपी अजय पाल शर्मा ने बताया कि पेटीएम के मालिक ने एक महिला और उसके सहयोगियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में कंपनी के डेटा चुराए जाने और ब्लैकमेलिंग की बात कही थी. जिसके बाद पुलिस ने तीनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और तुरंत कार्रवाई करते हुए तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

अजय के मुताबिक, ब्लैकमेलिंग एक अक्टूबर से शुरू हुई थी. हमने 10 अक्टूबर को महज 67 रुपए आरोपी के अकाउंट में डालकर उसके बैंक की डिटेल ली. फिर 15 अक्टूबर को 2 लाख रुपए उनके बताए बैंक अकाउंट में जमा भी करा दिए. इससे आरोपियों का हौसला बढ़ गया. फिर हमने पुलिस में शिकायत की.

‘मुगल’ में हुई आमिर खान की वापसी

आमिर खान ने टी सीरीज की फिल्म ‘‘मुगल’’ में अपनी वापसी के संकेत दे दिए हैं. ‘‘मी टू’’ प्रकरण के चलते जब फिल्म ‘मुगल’ के निर्देशक सुभाष कपूर पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली गीतिका त्यागी ने सोशल मीडिया पर उम्मीद जतायी कि उनहोंने सुभाष कपूर पर जो यौन शोषण के आरोप लगाए हैं, उसमें उन्हें आमिर खान व अन्य लोगों का साथ मिलेगा.

उसके बाद दस अक्टूबर को आमिर खान व उनकी पत्नी किरण ने एक साझा बयान जारी करते हुए कहा, ‘‘आमिर खान प्रोड्क्शन हमेशा से यौन शोषण के प्रति जीरो टोलरेंस पौलिसी अपनाता आया है. हमें पता चला है कि हम जिनके साथ काम करने जा रहे हैं, उन पर यौन शोषण का आरोप लगा है. यह अब कानूनी प्रक्रिया में भी है. इसलिए हमने उनसे दूरी बनाने का फैसला लिया है….’’

इसके बाद फिल्म ‘‘मुगल’’ से आमिर खान के अलग हो जाने की खबर आ गयी. फिल्म ‘मुगल’ के निर्देशक सुभाष कपूर ने आमिर खान की प्रशंसा करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि वह जल्द ही यौन शोषण के आरोपों से बरी हो जाएंगे.

ज्ञातव्य है कि टी सीरीज के मालिक स्व.गुलशन कुमार की बायोपिक फिल्म है ‘‘मुगल’’. जिसका निर्माण गुलशन कुमार के बेटे भूषण कुमार, ‘टी सीरीज’ के बैनर तले ही कर रहे हैं. पहले इस फिल्म में अक्षय कुमार अभिनय करने वाले थे. पर बाद में वह इस फिल्म से अलग हो गए. तब इस फिल्म के साथ आमिर खान जुड़े. सूत्र दावा करते है कि आमिर खान को इस फिल्म की पटकथा बहुत पसंद आयी. फिल्म ‘‘मुगल’’ में आमिर खान, स्व.गुलशन कुमार का किरदार निभाने के साथ साथ फिल्म के निर्माण से भी जुड़े.

मगर ‘मी टू’ में सुभाष कपूर का नाम आने के बाद आमिर खान ने इस फिल्म से दूरी बना ली थी. इसके बाद भूषण कुमार ने फिल्म ‘‘मुगल’’ के निर्देशक सुभाष कपूर को बाहर का रास्ता दिखा दिया. उसके दो दिन बाद ही भूषण कुमार का भी नाम ‘मी टू’ के तहत आ गया. तब भूषण कुमार ने बयान जारी कर खुद को पाक साफ बता दिया.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. सूत्र बताते हैं कि इसके बाद टी सीरीज की तरफ से ‘‘मुगल’’ में अभिनय करने के लिए अन्य कलाकार की तलाश शुरू हो गयी. इतना ही नही जब टी सीरीज ने ‘मुगल’ में अभिनय करने के लिए दो कलाकारों से बात कर ली, तब आमिर खान को अपने हाथ से एक पसंदीदा पटकथा वाली फिल्म के जाने का डर सताया और उन्होने तुरंत आत्मसमर्पण करते हुए फिल्म में अपनी वापसी के संकेत देते हुए मीडिया में खबर फैला दी.

मगर अब आमिर खान के लिए फिल्म ‘‘मुगल’’ में वापसी करने का मसला गले की हड्डी बनता जा रहा है. बौलीवुड का एक तबका अब आमिर खान के इस निर्णय को लेकर सवाल उठा रहा है. बौलीवुड से जुड़े कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब आमिर खान ने पहली बार फिल्म ‘मुगल’ से जुड़ने का फैसला किया था, तब क्या उन्हें पता नहीं था कि सुभाष कपूर पर यौन शोषण के आरोप हैं.

ज्ञातव्य है कि सुभाष कपूर पर यौन शोषण के आरोपों को लेकर पिछले तीन वर्ष से अदालत में मुकदमा लंबित है. अब जबकि आमिर खान ने ‘मुगल’ छोड़ने के बाद दुबारा इससे जुड़ने का फैसला लिया है, तब भी लोग सवाल उठा रहे हैं कि फिल्म ‘मुगल’ को लेकर ऐसा क्या बदल गया कि आमिर खान इस फिल्म से जुड़ने जा रहे हैं. माना कि निर्देशक सुभाष कपूर को फिल्म से बाहर किया जा चुका है. मगर ‘मुगल’ के निर्माता व टी सीरीज के मालिक भूषण कुमार पर भी यौन शोषण के आरोप लग चुके हैं.

बहरहाल, बौलीवुड से जुड़े कुछ लोगों के इन सवालों के जवाब को लेकर आमिर खान ने चुप्पी साध रखी है.

50 हजार नौकरियां तलाश रहीं स्किल्ड प्रोफेशनल्स

रोजगारों की घोर कमी के बीच कुछ रोज़गार ऐसे हैं जिन के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे. डेटा साइंस, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में जितने लोग नौकरी तलाश रहे हैं, उस से दोगुना नौकरियां मौजूद हैं.

एक औनलाइन हाइब्रिड एजुकेशन कंपनी की अध्यन रिपोर्ट के मुताबिक, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग में 50 हज़ार से ज्यादा पद योग्य उम्मीदवारों की कमी के चलते खली पड़े हैं. इन पदों के लिए प्रोफेशनल्स तो हैं लेकिन वे योग्य नहीं हैं. ऐसे में प्रोफेशनल्स को अपनी स्किल्स यानी कुशलता को अपग्रेड करना चाहिए.

दरअसल, कालेज में डेटा साइंस, मशीन लर्निंग और एआई के बारे में स्टूडेंट्स को जो सिखाया जा रहा है, वह इंडस्ट्री के किसी काम का नहीं है. डेटा साइंस और एआई की पढ़ाई जिन लोगों ने पहले की थी, उन्हें अपनी स्किल को अपग्रेड करना होगा. आज कई चीजें औटोमेटेड हो रही हैं और इन से नई उम्मीदें पैदा हो रही हैं. कंपनियों को इस मामले में टैलेंट की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, एनालिटिक्स और डेटा साइंस प्रोफेशनल्स के लिए बैंकिंग और फाइनैन्शिअल सर्विसेज सबसे बड़ा मार्किट है. पिछले वर्ष इन प्रोफेशनल्स के लिए इन दोनों सेक्टरों में 44 फीसदी नौकरियां पैदा हुई थी. एनालिटिक्स प्रोफेशनल्स के लिए ई-कौमर्स सेक्टर दूसरा बड़ा मार्किट है, जिस का इस सेगमेंट के जौब में पिछले साल 12 फीसदी योगदान था.

डेटा साइंस प्रोफेशनल्स के लिए जिन दूसरे सेक्टर्स में जौब देखने को मिल रहे हैं उन में हेल्थकेयर, एनर्जी एंड यूटिलिटीज, टेलीकोम, मीडिया, रिटेल, औटोमोबाइल और ट्रेवल सेक्टर्स शामिल हैं. अध्ययन के मद्देनज़र, इन क्षेत्रों में नौकरियों को पाने के लिए क्लाउड, बिग डेटा, एनालिटिक्स, मशीन लर्निंग और एआई जैसी स्किल्स डेटा साइंस प्रोफेशनल्स के लिए काफी अहम् हैं.

एक रिसर्च एंड एडवाइजरी फर्म के अनुसार, भारत में रजिस्टर्ड तकरीबन 10 लाख कंपनियों में से करीब 75 फीसदी कंपनियों ने या तो मशीन लर्निंग या डेटा साइंस में इन्वेस्ट किया है या इस की तैयारी कर रही हैं. प्रोफेशनल्स द्वारा जौब के लिए सबसे ज्यादा सर्च एसक्यूएल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज के लिए की गयी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा साइंस, डेटा एनालिस्ट, डेटा आर्किटेक्ट, डेटा स्टेटीशियन, मशीन लर्निंग इंजीनियर, मशीन लर्निंग स्पेशलिस्ट, टेक्निकल आर्किटेक्ट और डेटा इंजीनियर की नौकरियों की भरमार है.

जब औपरेशन थिऐटर से इंसानी पैर ले भागा आवारा कुत्ता

देश में चिकित्सा सेवा आजकल वाकई ‘राम भरोसे’ है. अस्पतालों में सुविधाएं न के बराबर हैं. आधुनिक उपकरण व प्रशिक्षित डाक्टरों की कमी से आएदिन कुछ ऐसी घटनाएं भी घटित हो जाती हैं कि देखसुन कर रोंगटे खड़े हो जाएं.

वैसे हमारे देश के अस्पतालों में औपरेशन के दौरान मरीज के पेट में तौलिया छोड़ देने की बात तो आपने सुनी होगी पर हम आपको एक ऐसी घटना के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे जान कर आप के होश उड़ जाएंगे.

ट्रेन से गिरा व्यक्ति

बिहार के आरा का रहने वाला एक शख्स बक्सर से आरा जाने के लिए श्रमजीवी ऐक्सप्रैस ट्रेन पर सवार होने वाला था कि तभी उस का पैर ट्रेन से फिसल गया और वह ट्रेन से नीचे गिर गया.

हादसे में उक्त शख्स का एक हाथ और एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया. आननफानन में राजकीय रेल थाना पुलिस द्वारा उसे सदर अस्पताल पहुंचाया गया.

औपरेशन थिऐटर में कुत्ता आया कैसे

जानकारी के अनुसार मरीज को बचाने के लिए उसका एक पैर काटना जरूरी था लिहाजा डाक्टरों ने मरीज का एक पैर काट कर अलग रखा हुआ था कि तभी बाहर से पहुंचे एक आवारा कुत्ते ने पैर को मुंह में दबोचा और भाग खड़ा हुआ.

इस से पहले कि लोग कुछ समझ पाते कुत्ता पैर को मुंह में दबाए मुख्य सड़क से होते हुए लोगों की नजरों से ओझल हो गया. इस रोंगटे खङे कर देने वाली घटना ने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है.

चिंता लाजिम है

किसी अस्पताल का औपरेशन थिऐटर बेहद सुरक्षित जगह बना होता है, जहां चिकित्सकों की खास टीम के अलावे किसी और को जाने की अनुमति नहीं होती. कोई कुत्ता अस्पताल के अंदर चला जाए और वह भी औपरेशन थिऐटर में, तो इस से यह चिंता लाजिम है कि मरीज जाए तो जाए कहां?

चिकित्सा के बहाने लूट

प्राइवेट अस्पताल वाले अपने अस्पतालों में मरीजों की सेवा से ज्यादा खुद की जेबें भरते हैं. वहीं सरकारी अस्पतालों की भयावहता किसी हौरर फिल्म की तरह है जहां भरती हुआ मरीज स्वस्थ हो कर घर लौट आए यही गनीमत है.

उक्त घायल मरीज का नाम रामनाथ मिश्रा बताया जा रहा है जिसकी मौत इलाज के दौरान बाद में हो गई थी.

हालांकि, अस्पताल प्रशासन की मीडिया में खबर आने के बाद पसीने छूट गए और प्रशासन ने ऐसी किसी भी घटना से साफ इनकार करते हुए कहा है कि अगर इस तरह की लापरवाही वास्तव में बरती गई है तो दोषियों पर कड़ी कारवाई की जाएगी.

लौन्च हुआ ओप्पो R15x, ड्यूल रियर कैमरा और 6 जीबी रैम से है लैस

स्मार्टफोन कंपनी ओप्पो ने अपना  R15x हैंडसेट अपनी चीन की आधिकारिक ई-काैमर्स वेबसाइट पर लिस्ट कर दिया है.  इस फोन का स्ट्रक्चर बिल्कुल ओप्पो K1 की तरह लगता है. इसकी खासियत फिंगरप्रिंट, इन-डिस्प्ले सेंसर, स्टाइल नाच, वाटरड्रप, वर्टिकल, ड्यूल कैमरा, सेटअप और ग्रेडिएंट कलर डिजाइन है.

ओप्पो R15x के फीचर्स

यह फोन एंड्रॉइड 8.1 आरियो पर आधारित कलरओएस 5.2 पर काम करता है. इसमें 6.4 इंच का डिस्प्ले दिया गया है जिसका स्क्रीन टू बौडी रेश्यो 91 फीसद है. इस लिस्टिंग में प्रोसेसर के बारे में जानकारी नहीं दी गई है लेकिन फोन क्वालकौम स्नैपड्रैगन 660 प्रोसेसर दिए जाने का दावा किया गया है. इस पर कौर्निंग गोरिल्ला ग्लास 5 की प्रोटेक्शन दी गई है. यह फोन 6 जीबी रैम और 128 जीबी दी गई है.

इसे 3डी कर्वड डिजाइन के साथ पेश किया गया है. इस फोन में 6.41 इंच का हेलो फुलव्यू FHD+ सुपर एमोलेड डिस्प्ले दिया गया है. इसके बेजल्स 1.6 एमएम और आस्पेक्ट रेश्यो 19.5:9 है. इसके साथ ही इसका स्क्रीन-टू-बौडी रेश्यो 91.27 फीसद है. फोन को स्टारी नाइट और डैजलिंग गोल्ड कलर वेरिएंट में पेश किया गया है. वहीं, इसमें 25 मेगापिक्सल का सेल्फी कैमरा भी दिया गया है. फोन को पावर देने के लिए 3500 एमएएच की बैट्री दी गई है.

ओप्पो R15x की कीमत

इस फोन की कीमत 2499 चीनी युआन यानी रुपए में करीब 26,400 रुपये हुआ. इसे भारत में कब लौन्च किया जाएगा इसकी जानकारी फिलहाल नहीं दी गई है. कीमत के आधार पर इस फोन की टक्कर विवो V11 Pro से हो सकती है.

व्हाट्सऐप लेकर आया यह 3 कमाल के फीचर

व्हाट्सऐप अपने ग्राहकों की सुविधाओं के लिए लगातार नए नए फीचर्स लाता रहता है. अब एक बार फिर व्हाट्सऐप ने अपने सिस्टम में 3 नए फीचर्स एड किए हैं. हालांकि नए फीचर्स का फायदा अभी सिर्फ iOS ऐप यूजर्स को ही मिल सकेगा. बता दें कि नए फीचर्स के तहत व्हाट्सऐप ने प्लेबैक औडियो मैसेज, बब्बल मेन्यू के लिए नई इंटरफेस समेत कई अहम बदलाव किए हैं.

नए फीचर्स आईफोन के हाल ही में लौन्च हुए iPhone Xr, iPhone Xs और iPhone Xs Max पर इस्तेमाल किए जा सकेंगे. नए फीचर्स के तहत यदि iOS यूजर किसी अन्य iOS यूजर्स को व्हाट्सऐप पर लगातार औडियो मैसेज भेजता है तो यूजर बिना अगले मैसेज पर टैप किए ही उन संदेशों को सुन सकेगा. पहले यूजर को एक एक मैसेज पर टैप करना पड़ता था, जिसकी अब जरुरत नहीं होगी. इसके अलावा व्हाट्सऐप ने बब्बल एक्शन मेन्यू में भी एक फीचर एड किया है. इस नए फीचर के तहत बब्बल मेन्यू पौप अप अब थोड़ा लंबा दिखाई देगा, जिसमें डिलीट, रिप्लाई, फौरवर्ड, स्टार, कौपी आदि विकल्प होंगे. व्हाट्सऐप ने इसे रि-डिजाईन करार दिया है और मैसेजेस का आदान-प्रदान इसकी मदद से और तेज गति से हो सकेगा.

तीसरे नए फीचर के तहत व्हाट्सऐप के नए अपडेट एडिशन के तहत स्टेट्स में रिप्लाई के लिए कई नए विकल्प जुड़े हैं. पहले स्टेट्स पर टेक्सट मैसेज, इमेज, जीआईएफ इमेज और वीडियो की मदद से रिप्लाई किया जाता था, लेकिन नया फीचर जुड़ने के बाद वौइस मैसेज, लोकेशन, डौक्यूमेंट और vCards की मदद से रिप्लाई दिया जा सकेगा. खास बात ये है कि ये फीचर एंड्रायड ऐप पर भी उपलब्ध होगा. इनके अलावा व्हाट्सऐप ने एक और फीचर एड किया है. WABetainfo, व्हाट्सऐप के अनुसार, व्हाट्सऐप के वर्जन 2.18.100 में वीडियो प्रिव्यू का विकल्प नोटिफिकेशन पैनल में एड किया गया है. हालांकि अभी यह फीचर ‘भविष्य’ में एक्टिव होगा. ऐसी भी खबरें हैं कि व्हाट्सऐप ने अपने अल्फा स्टेज में डार्क मोड भी एड किया है. हालांकि इसे एक्टिव होने में अभी थोड़ा वक्त लग सकता है. इसके अलावा व्हाट्सऐप अपने वैकेशन मोड, साइलेंट मोड और लिंक्ड अकाउंड पर भी काम कर रहा है, जिनमें भी जल्द ही कुछ फीचर्स देखने को मिल सकते हैं.

अब जीवन में शांति के पल नहीं रह गए हैं : मकरंद देशपांडे

थिएटर से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता और निर्देशक मकरंद देशपांडे अपनी ओरिजिनल एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने हिंदी के अलावा कन्नड़, मराठी, तेलगू और मलयालम फिल्मों का भी निर्देशन किया है. थिएटर इंडस्ट्री में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है.

उन्होंने 50 छोटे नाटकों और 40 बड़े नाटकों में काम किया है. चरित्र अभिनेता के रूप में उन्होंने अधिकतर फिल्में में अपनी एक अलग पहचान बनायी है. जंगली, सरफ़रोश, स्वदेश, मकड़ी, डरना जरुरी है आदि फिल्मों में उन्होंने बहुत अच्छा काम किया. जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया. बचपन से ही अभिनय की इच्छा रखने वाले मकरंद को आज भी बच्चों की फिल्मों और नाटकों में काम करना पसंद है.

अभी वे एंड टीवी पर प्रसारित शो विक्रम बेताल की रहस्य गाथा में बेताल की भूमिका निभा रहे हैं. उनसे मिलकर बातचीत करना रोचक था. पेश हैं कुछ अंश :

इस शो को करने की ख़ास वजह ?

इस शो के ज़रिये मैं अपने बचपन को देखता हूं. जब मैं बच्चों की किताबें और कहानियां पढ़ा करता था. इस प्रकार जो मैं अब तक पढ़ रहा था. उसी को अभिनय कर रहा हूं. बचपन की कहानियां जिसे किसी और ने कभी किया था, आज मुझे उसे करने का मौका मिल रहा है. ये मेरे लिए एक अच्छी बात है.

हमारा अनुभव रंगमंच का है जिसमें आप कुछ भी कर सकते हैं और यही मौका मुझे यहां बेताल को एक अलग रूप में प्रस्तुत करने का मिल रहा है. इसमें मैं मौखिक नहीं आंगिक अभिनय कर रहा हूं. जो बहुत ख़ास और अलग है.

बच्चों के लिए फिल्में कम हैं और जो बनती भी हैं वो कुछ खास नहीं होतीं, आपके हिसाब से कहां कमी है ?

इसके लिए हमारी अर्थव्यवस्था जिम्मेदार है. बीच में कुछ फिल्में बनी भी थीं. एक फिल्म मकड़ी मैंने की थी. मेरे हिसाब से इसका कारण पैसे की कमी है. लेकिन टीवी पर बच्चों की फिल्में बन सकती हैं. कई बार फिल्में बनने पर भी बच्चे उसे देखने नहीं जाते. असल में बच्चों को उनके माता पिता फिल्मों तक ले जाते हैं. लेकिन महंगे टिकट होने की वजह से वे उन्हें नहीं ले जाते. लेकिन हौलीवुड की फिल्मों में वे उन्हें ले जाते हैं इसका अर्थ ये निकलता है कि वैल्यू फौर मनी अंग्रेजी फिल्मों में उन्हें अधिक दिखता है. अच्छी कहानियों और अच्छे बजट की यहां जरुरत है.

आप अपनी जर्नी को कैसे देखते हैं, क्या कोई मलाल रह गया है ?

जर्नी तो ठीक ही थी, लेकिन जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसा लगता है कि जिन फिल्मों के लिए मैंने ना कही थी, उसे कर लेनी चाहिए था. मसलन फिल्म मुन्नाभाई एम बी एस में सर्किट की भूमिका कर लेता या फिल्म लगान कर लेता, तो कुछ फर्क पड़ता या नहीं पड़ता ये कहना संभव नहीं, क्योंकि तब मैं थिएटर कर रहा था. अब लगता है कि उन फिल्मों को कर लेना चाहिए थी. हालांकि रंगमंच ने मुझे बहुत कुछ दिया है. जहां मन और मस्तिष्क दोनों को ही संतुष्टि मिलती है.

आजकल फिल्मों का दौर बदल चुका है, इस दौर को आप कैसे लेते हैं?

बदलाव फिल्मों में काफी हुआ है, क्योंकि आज हर एक कलाकार के लिए काम है, जो पहले नहीं था. मुझे याद आता है कि जब मैंने अभिनय शुरू किया था. उस समय फ़ोन नहीं थे. इससे किसी से मिलना उसका समय लेना बहुत मुश्किल होता था. ऐसे में कई मौके आप तक पहुंचे बगैर ही चले जाते थे. लेकिन पहले लोगों में सहनशीलता अधिक थी. जो अब नहीं है.

पहले फिल्मों में काम करने वाले एक परिवार में बंध जाते थे. जो अब नहीं है. इसकी वजह क्या मानते हैं?

अभी सब कुछ बंटा हुआ है. कई किसी से एक धारावाहिक में काम करते हुए भी नहीं मिल पाते. आज लोग अधिक प्रोफेशनल हो चुके हैं. कलाकार एक शो से खाली होकर दूसरे शो के लिए चले जाते हैं.

आज लोगों की गति बढ़ गयी है. उनके जीवन में शांति के दो पल अब नहीं रह गए हैं कि वे अपने बारे में कुछ सोच सकें. जब भी वे फ्री होते हैं तो फ़ोन पर लग जाते हैं.

आगे की योजनायें क्या हैं ?

इस शो के अलावा एक मराठी और हिंदी फिल्म कर रहा हूं.

“मी टू” को लेकर आजकल बहुत चर्चा है. इस तरह की बातें कलाकारों के लिए कितनी घातक हैं ?

मेरे हिसाब से ये सब बातें किसी भी इंडस्ट्री के लिए सही नहीं है. लेकिन मुद्दा ये है कि ऐसी बातें कब और कैसे बोलनी चाहियें, इसे कानून को समझना पड़ेगा. ये सही है कि अगर आपने अपने बचाव के लिए मर्डर किया है, तो वह इंसान बच सकता है, लेकिन अगर आपने सोच समझकर किसी की हत्या की है, तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए. उसी प्रकार ये बातें तभी बताई जानी चाहिए थीं. जब ये हुआ था. इतना सोच समझने के बाद नहीं. जब आपके साथ कुछ भी गलत होता है तो तुरंत उसे सबके सामने लाना अच्छा होता है.

आप एक लेखक भी हैं किस तरह का लेखन अधिक करते हैं?

मैं फिक्शन वाले नाटक अधिक लिखता हूं, जिसमें ह्यूमन रिलेशन की बातें अधिक होती हैं.

रिश्तों की अगर हम बात करें तो उसके मायने आजकल बदल चुके हैं. आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

रिश्तों को रिलेट करना बहुत जरुरी है. जिसकी आजकल के यूथ में कमी होती जा रही है. रिश्ते हर किसी के जीवन में जरुरी हैं और इसे निभाना पड़ता है. आज अगर हमारा कोई वर्कर बीमार पड़ता है, तो उसे हटाने के बजाय उसे अच्छे डाक्टर के पास ले जाने की जरुरत है और ये आजकल कोई करना नहीं चाहता.

आप अपनी कामयाबी का श्रेय किसे देते हैं?

मेरी कामयाबी में मेरी मां का सबसे बड़ा हाथ है, जिन्होंने मुझे काम करने की आज़ादी दी. इसके बाद मैंने जिसे सही समझा उसे करता गया.

सफलता और असफलता आपके जीवन में क्या मायने रखती है?

जिसे करने में आपको आसानी हो, वह सफलता है और जिसे करने पर आपको तृप्ति न मिले वह असफलता है.

अगर आपको कोई सुपर पावर मिले, तो क्या करना चाहेंगे?
सब एक दूसरे को प्यार करें और प्यार से रहें, इसे बांटने की कोशिश करूंगा.

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