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करिश्मा कपूर ने संदीप तोषनीवाल से भी बढ़ायी दूरियां

इन दिनों बौलीवुड से अच्छी खबरें कम ही आ रही हैं. अब खबर है कि अभिनेत्री करिश्मा कपूर और उनके प्रेमी व उद्योगपति संदीप तोषनीवाल ने आपसी सहमति से एक दूसरे से दूर होने का निर्णय ले लिया है. जबकि इस वर्ष के आरंभ से ही अटकलें लगाई जा रही थीं कि इस वर्ष कभी भी यह दोनों शादी कर सकते हैं.

करिश्मा कपूर का अपने पति संजय कपूर और संदीप तोषनीवाल का अपनी पत्नी डाक्टर अक्षिता से तलाक होने के बाद से करिश्मा और संदीप खुलकर एक साथ घूमते, पार्टियों में जाते व एक दूसरे के परिवार से भी मिल-जुल रहे थे. मगर अब इन दोनों की नजदीकी सूत्रों का दावा है कि करिश्मा कपूर और संदीप तोषनीवाल ने आपसी सहमति से अपने रिश्ते को खत्म कर एक दूसरे से दूर होने का फैसला ले लिया है.

यूं तो कुछ दिन पहले करिश्मा कपूर के पिता रणधीर कपूर की बातों से भी यह बात उजागर हुई थी कि करिश्मा कपूर अपेन प्रेमी संदीप तोषनीवाल के संग विवाह नहीं करने वाली हैं. वास्तव में कुछ दिन पहले जब कुछ पत्रकारों ने करिश्मा कपूर के पिता रणधीर कपूर से करिश्मा कपूर व संदीप तोषनीवाल की शादी को लेकर सवाल किया था.

तब रणधीर कपूर ने कहा था-”करिश्मा की दूसरी शादी में कोई सच्चाई नहीं है. मैं चाहता हूं कि वह शादी कर अपना घर परिवार बसाए. मगर वह दुबारा शादी करने के लिए इच्छुक नहीं है. मैंने उससे लंबी बात की. पर उसने मुझसे कहा कि वह अपने बच्चों समायरा व कियान की अच्छे ढंग से परवरिश करना चाहती है. फिलहाल उसकी यही योजना है.”

और अब तो करिशमा कपूर व संदीप तोषनीवाल के दोस्त भी कहने लगे हैं कि करिश्मा शादी की बजाय अपने बच्चों की परवर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं.

दीपिका और रणवीर की शादी इटली नहीं मुंबई में

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी की तारीख के ऐलान के 48 घंटे के अंदर ही सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यह बात साफ हो गयी है कि इनकी शादी इटली के लेक कोमो की बजाय मुंबई के वकोला, सांताक्रुज इलाके में स्थित पांच सितारा होटल में संपन्न होगी और इस शादी में दोनों परिवारों के करीबन तीन हजार मेहमान शामिल होंगे.

मेहमानों के लिए आज ही होटल ग्रैंड हयात को बुक किए जाने की भी खबरे हैं. इसके अलावा फिल्म नगरी से जुड़े लोगों के लिए मुंबई में 30 नवंबर और एक दिसंबर को तथा उससे पहले बंगलौर में 28 और 29 नवंबर को रिसेप्शन पार्टी आयोजित की जाएगी.

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विवाह स्थल बदलने को लेकर कई तरह की बातें की जा रही हैं. दीपिका व रणवीर के अति करीबी लोगों का दावा है कि भारत देश में पांच नवम्बर 2018 से नौ नवंबर 2018 तक दीवाली का बड़ा त्यौहार मनाया जाएगा. जिसकी वजह से सभी जगह छुट्टी का माहौल रहेगा. दीवाली के त्यौहार की व्यस्तता के चलते दीपिका व रणवीर सिंह के कई महत्वपूर्ण रिश्तेदारों ने इटली पहुंचने में असमर्थता व्यक्त की. तब आनन फानन में संगीत, मेंहदी व शादी की रश्में मुंबई में ही आयोजित करने का फैसला लिया गया.

इन सात बैंको के ऐप्स इस्तेमाल करते हैं तो हो जाइए सावधान, लुट सकते हैं पैसे

दुनिया भर में सूचना की सुरक्षा का मुद्दा लोगों के लिए सिर दर्द बना हुआ है. हाल में फेसबुक से जुड़े कैंब्रिज एनेलिटिका के मामले ने दुनिया भर में सनसनी मचा दी थी, उसकी गंभीरता देखिए कि उसकी वजह से कंपनी के मालिक मार्क जुकरबर्ग की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा है. इन सब के बीच कुछ फर्जी बैंक ऐप्स की खबर सामने आई है.

दरअसल गूगल प्ले स्टोर पर भारतीय स्टेट बैंक समेत 7 बैंको के फर्जी ऐप्स मौजूद हैं. इसमें आईसीआईसीआई, ओवरसीज बैंक, बैंक औफ बड़ौदा, एक्सिस बैंक, यस बैंक औस सिटी बैंक शामिल हैं. आशंका जताई जा रही है कि इन ऐप्स के जरिए ग्राहकों की सूचनाएं चोरी की जा रही हैं. एक आईटी फर्म के रिपोर्ट में ये बात सामने आई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि फर्जी ऐप ग्राहकों को रिवार्ड प्वाइंट, कैश बैक, फ्री डेटा और बिना ब्याज के लोन जैसे लुभावने औफर्स के साथ लोगों को बरगलाते हैं. कई ऐप में तो एटीएम से कैश निकालकर ग्राहकों के घर तक पहुंचाने का दावा किया गया है.

रिपोर्ट में कंपनी ने कहा कि इस फ्राड में बैंक कर्मी भी शामिल हो सकते हैं. उनकी मिली भगत के कारण लोग सही और फर्जी ऐप्स में अंतर नहीं कर पा रहे हैं. खबर सामने आते ही यस बैंक के साइबर फ्राड डिपार्टमेंट ने जांच शुरू कर दी है. वहीं बाकी बैंको से इसपर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है.

नींद चुराई है…

छोरी छरहरी की
कोमल कलाई ने
नींद चुराई है.
काली कजरारी की
चंचल चमकाई ने
नींद चुराई है.
गोरी के गालों पर
अंकुरी अरुणाई ने
नींद चुराई है.
घुमड़ी घटाओं की
नागिन निराली ने
नींद चुराई है.
गजरे के गुच्छे की
मादक महकाई ने
नींद चुराई है.
प्रीत की प्याली की
रसमय रचाई ने
नींद चुराई है.
अकुलाती अंगिया में
उमड़ी उफनाई ने
नींद चुराई है.
निखरे नितंबों की
अद्भुत अंगड़ाई ने
नींद चुराई है.

– डा. सुरेश मोहन प्रसाद

हमसफर (भाग – 1) : क्या राहुल की हमसफर बनने में कामयाब रही पूजा

शादी में बस चंद दिन ही रह गए थे. पिछली बार जब पूजा अपने मंगेतर राहुल से मिली थी तो दोनों में यह तय हुआ था कि शादी के करीब होने से उन को अब मुलाकातों का सिलसिला रोक देना चाहिए. यह दुनियादारी के लिहाज से ठीक भी था.

इस आपसी फैसले को अभी कुछ ही दिन बीते थे कि पूजा के पास राहुल का फोन आ गया. उस ने कहा, ‘‘पूजा, मैं आप से मिलना चाहता हं. कल शाम को 5 बजे मैं लाबेला कौफी हाउस में आप का इंतजार करूंगा. कुछ ऐसी बातें हैं जो शादी से पहले मेरे लिए आप को बतलाना बहुत जरूरी है.’’

‘‘क्या इन बातों को कहने के लिए शादी तक इंतजार नहीं हो सकता?’’

‘‘नहीं, ऐसी बातें शादी से पहले बतला देना जरूरी होता है.’’

मंगेतर के फोन से बेचैन पूजा को अगले दिन के इंतजार में रात भर नींद नहीं आई. आखिर क्या बतलाना चाहता था वह शादी से पहले उस को? अपने किसी अफेयर के बारे में तो नहीं? अगर इस तरह की कोई बात थी तो पहले की इतनी मुलाकातों में राहुल ने उस को क्यों नहीं बतलाई? अब जबकि शादी की तारीख बिलकुल सिर पर आ गई तो इस तरह की बात उस को बतलाने का क्या तुक और मकसद हो सकता था?

पूजा खुद से ही तरहतरह के सवाल लगातार पूछती रही.

दूसरे दिन शाम को राहुल से मिलने के लिए घर से निकलते वक्त पूजा ने सुषमा भाभी को ही इस बारे में बतलाया. ‘लाबेला’ कौफी हाउस में पूजा पहले भी 2-3 बार राहुल के साथ बैठ चुकी थी. अत: उम्मीद के अनुसार राहुल कौफी हाउस में बाईं तरफ वाले कोने की एक मेज पर बैठा उस के आने का इंतजार कर रहा था.

टेबल की तरफ बढ़ती हुई पूजा तनाव और अनिश्चितता से घिर गई. बैठते ही बोली, ‘‘मैं सारी रात सो नहीं सकी. ऐसी क्या बात थी जो आप फोन पर नहीं कह सकते थे? मेरे मन में कई तरह के विचार आते रहे.’’

‘‘किस तरह के विचार?’’ राहुल ने पूछा. वह काफी थकाथका नजर आ रहा था.

‘‘मैं सोचती रही, शायद आप शादी से पहले अपने किसी अफेयर के बारे में मुझ से कुछ कहना चाहते हैं,’’ पूजा ने अपने मन की बात कह दी.

‘‘एक लड़की होने के नाते आप इस से ज्यादा शायद सोच भी नहीं सकतीं.’’

‘‘फिर आप ही बतलाएं वह ऐसी कौन सी बात है जिसे कहने के लिए आप शादी तक इंतजार नहीं कर सकते थे?’’

‘‘इंतजार में शायद बहुत देर हो जाती.’’

‘‘राहुल, आप की बातें पहेली जैसी क्यों हैं? जो भी आप कहना चाहते हैं खुल कर क्यों नहीं कहते?’’

‘‘अगर इस समय मैं आप से यह कहूं कि मैं आप से शादी नहीं कर सकता तो आप को कैसा लगेगा?’’ राहुल ने कहा.

‘‘मैं समझूंगी कि आप अच्छा मजाक कर लेते हैं.’’

‘‘मैं मजाक कभी नहीं करता,’’ राहुल ने कहा.

उस के शब्दों में छिपी संजीदगी से पूजा जैसे ठिठक सी गई. उसे सारी उम्मीदें और सपने बिखरते हुए लगे.

‘‘शादी से इनकार तो आप पहले दिन भी कर सकते थे, अब जब शादी की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. इस इनकार का मतलब?’’ सदमे की हालत में पूजा ने पूछा.

‘‘शायद अपनी झूठी और खोखली खुशियों की खातिर मैं आप की जिंदगी बरबाद नहीं कर सकता,’’ शून्य में देखते हुए राहुल ने कहा.

‘‘बहुत खूब, आप को लगता है कि शादी के टूटने से मैं आबाद हो जाऊंगी,’’ पूजा ने कहा.

‘‘इनकार के पीछे की सचाई को जानने के बाद शायद आप को ऐसा ही लगे.’’

‘‘कैसी सचाई?’’

‘‘एक ऐसी सचाई जो पिछले 2 महीनों से मेरी अंतरात्मा को कचोट रही है. मैं आप को किसी धोखे में नहीं रखना चाहता. मुझे इस बात की भी परवा नहीं कि सच को जानने के बाद आप मुझ से नफरत करेंगी या हमदर्दी. असलियत यह है पूजा कि मैं एच.आई.वी. पोजिटिव हूं, मुझ को एड्स है. मौत मेरे काफी करीब है,’’ वीरान आंखों से पूजा को देखते हुए राहुल ने शांत स्वर में कहा.

पूजा को ऐसा लगा जैसे उस के सिर पर कोई बम फटा हो. गहरे सदमे की हालत में हक्कीबक्की सी वह राहुल के चेहरे को देखती रह गई. एक खौफ का सर्द एहसास पूजा को अपनी रगों में उतरता महसूस हुआ.

यह देख राहुल के अधरों पर एक फीकी मुसकराहट की रेखा खिंच गई. वह बोला, ‘‘अब मैं ने जब इस बदनाम और जानलेवा बीमारी का जिक्र आप से कर ही दिया है तो इस को ले कर जरूर आप के दिमाग में कुछ सवाल उठ रहे होंगे. सब से बड़ा सवाल तो यही होगा कि मुझ में ऐसी लाइलाज बीमारी आई कहां से? शायद आप को ऐसा लग रहा होगा कि मैं ने गंदी बाजारू औरतों से सेक्स संपर्क कर के इस बीमारी को अपने खून में दाखिल किया है. मगर ऐसा नहीं है. मैं ने कभी भी किसी औरत से सेक्स संपर्क नहीं किया. यह बीमारी तो उस संक्रामक खून का नतीजा है जो 2 वर्ष पहले एक एक्सीडेंट के बाद डाक्टरों की लापरवाही से मुझ को चढ़ा दिया गया था. मौत चुपके से मेरी धमनियों में उतर गई और मुझ को इस का पता भी नहीं चला.

‘‘मैं लगातार मौत के करीब जा रहा हूं, मगर मेरे घर के लोगों को मेरी बीमारी की कोई जानकारी नहीं. इसलिए जो हुआ उस में उन का जरा भी कुसूर नहीं. मैं भी असलियत को भूल कर कुछ समय के लिए स्वार्थी हो गया था मगर मेरी अंतरात्मा लगातार मुझ को कचोटती रही. यह शादी एक धोखे और पाप से ज्यादा कुछ नहीं होगी जो मैं नहीं करूंगा. इस के साथ ही उस एक बात को स्वीकार करने में मुझ को जरा भी हिचक नहीं कि आप को देखने और शादी की बात पक्की होने के बाद अपनी कल्पनाआें में मैं ने संपूर्ण जीवन जी लिया. मरने का शायद मुझे अब बहुत गम नहीं होगा.’’

जैसे ही राहुल ने अपनी बात खत्म की, खामोशी से सब सुन रही पूजा ने कहा, ‘‘आप ने अपनी बात तो कह दी, अपना फैसला भी सुना दिया लेकिन यह कैसे सोच लिया कि आप ने जो फैसला किया है वही मेरा फैसला भी होगा?’’

पूजा के शब्दों से हैरान राहुल खालीखाली नजरों से उस को देखने लगा.

पूजा ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया और बोली, ‘‘अगर आप में सच को कहने की हिम्मत है तो मुझ में भी सच का साथ देने की ताकत है. आप की जिंदगी का बाकी जितना भी सफर है उस में मैं आप को अकेला नहीं छोड़ूंगी. यह शादी हर हालत में होगी.’’

‘‘आप भावुकता में ऐसा कह रही हैं. आप को शायद ठीक से मालूम नहीं कि एड्स क्या है? लोग तो एड्स के शिकार व्यक्ति के पास भी नहीं फटकते और आप एक ऐसे व्यक्ति के साथ शादी करना चाहती हैं.’’

‘‘मैं लोगों की तरह गलतफहमियों में नहीं जीती. एड्स किसी इनसान के साथ उठनेबैठने या उस के साथ खानेपीने से तो नहीं होता. शादी के बाद अगर हम पतिपत्नी के बजाय 2 दोस्तों की तरह रहेंगे और उन खास पलों से परहेज करेंगे जिन से इस बीमारी का दूसरे में जाने का अंदेशा होता है तो शादी के बंधन से हमें कोई भी समस्या नहीं होगी.

‘‘जिंदगी कितनी बाकी है? मौत कब आएगी, मेडिकल साइंस और डाक्टर इस की भविष्यवाणी नहीं कर सकते जो मौत कल आनी है उस के लिए आज की जिंदगी की कुर्बानी क्यों करें हम? जितना भी वक्त बचा है उसी में पूरी जिंदगी जीनी होगी अब आप को. मैं उस जिंदगी में आप की हमसफर रहूंगी, यह मेरा फैसला है,’’ राहुल के हाथ को अपने हाथों से दबाते पूजा ने दृढ़ स्वर में कहा.

पूजा के शब्दों से राहुल की उदास और बुझी आंखों में जिंदगी जीने की चमक आ गई.

पूजा ने राहुल के अंदर के विश्वास को बढ़ाने के लिए उस के हाथ को सहलाया ओर बोली, ‘‘जब मैं ने जिंदगी के सफर में आप का हमसफर बनने का फैसला कर लिया है तो एक वचन आप को भी मुझे देना होगा.’’

‘‘कैसा वचन?’’ राहुल ने पूछा.

‘‘जैसे आप ने अब तक अपनी बीमारी को राज रखा है, शादी के बाद भी आप इस को ऐसे ही राज रखेंगे. इस के बारे में कभी भी अपनी जबान पर एक शब्द न लाएंगे.’’

‘‘इस से क्या होगा? मौत जैसेजैसे करीब होगी, बीमारी को लोगों से छिपाना आसान नहीं होगा. उन को कुछ तो जवाब देना ही होगा,’’ राहुल की आवाज में उदासी थी.

‘‘शादी के बाद वह सब देखना मेरा काम होगा. लोगों को क्या जवाब देना है, यह भी मैं ही देखूंगी. मगर आप किसी से कुछ नहीं कहेंगे.’’

‘‘अगर आप की ऐसी जिद है तो मैं वादा करता हूं कि मैं अपनी जबान पर कभी अपनी बीमारी का जिक्र नहीं लाऊंगा. मेरी कोशिश रहेगी कि मेरी बीमारी का राज मेरे साथ ही इस दुनिया से जाए,’’ राहुल ने कहा.

एक सप्ताह बाद दोनों की शादी हो गई. शादी पूरी धूमधाम के साथ हुई. इस शादी के पीछे का भयानक सच उन दोनों के अलावा शादी में शामिल कोई भी तीसरा नहीं जानता था.

अग्नि के इर्दगिर्द शादी के फेरे लेते हुए दोनों के मस्तिष्क में कुछकुछ चल रहा था, मगर उन के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी.

– क्रमशः

खिलाड़ी कभी आत्महत्या नहीं करते : दिव्या सिंह

‘रानी लक्ष्मी बाई ब्रेवरी अवार्ड 2017’ से सम्मानित दिव्या सिंह नैशनल वूमन बास्केटबौल टीम की फौरमर कैप्टन हैं. छोटे कटे स्टाइलिश बाल, गोरे रंग, मुसकराते चेहरे और स्मार्ट लुक वाली दिव्या 2006 में मेलबौर्न कौमन वैल्थ गेम्स में भारतीय बास्केटबौल टीम की कैप्टन थीं. कैप्टनशिप के बाद वह लगातार कोच के रूप में युवा खिलाडि़यों को ट्रेनिंग देती रहीं. अपने गेम स्किल्स, लीडरशिप क्वालिटी, ऐकैडमिक स्ट्रैंथ और पर्सनैलिटी के लिए पहचानी जाने वाली दिव्या ने हाल ही में भारत में होने वाले पहले एनबीए (नैशनल बास्केटबौल एसोसिएशन) ऐकैडमी वूमंस कैंप में बास्केटबौल कोच के रूप में हिस्सा लिया.

बास्केटबौल की तरफ रूझान मूलरूप से जौनपुर की दिव्या का बचपन बनारस में बीता. यहां उन के पिता जौब करते थे. बनारस में ही उन की पढ़ाईलिखाई हुई. स्कूल के समय से ही बास्केटबौल उन के जीवन का अहम हिस्सा बन गया. पहले कालेज की बास्केटबौल टीम का हिस्सा बनीं, फिर स्टेट लैवल पर खेलीं. इस के बाद नैशनल और इंटरनैशनल लैवल पर खेलना शुरू किया.

उन का पूरा परिवार खिलाड़ी परिवार है. कुल 5 बहनों में 4 इंटरनैशनल खेल चुकी हैं. इन में सब से छोटी बहन की शादी क्रिकेटर इशांत शर्मा से हुई है. एक टूर्नामैंट के दौरान दोनों का परिचय हुआ. बात आगे बढ़ी तो हमेशा के लिए एकदूसरे का हाथ थाम लिया. एक जीजा भी बास्केटबौल खिलाड़ी हैं. भारत में बास्केटबौल खिलाडि़यों का भविष्य कैसा है? पूछने पर वे कहती हैं, ‘‘भारत में बास्केटबौल खिलाडि़यों के पास बहुत कम साधन हैं, फिर भी वे काफी अच्छा खेल रहे हैं. थोड़ाबहुत ध्यान दिया जाए तो हमारे खिलाड़ी काफी कुछ कर सकते हैं.’’

महिला सुरक्षा और रेप की बढ़ रही घटनाओं के मसले पर क्या कहेंगी? के उत्तर में दिव्या कहती हैं, ‘‘हमारे जैसी स्पोर्ट्स वूमन को ही लें. हम अकसर देशविदेश घूमती हैं. पर क्या हमारे साथ कुछ हुआ? हमारे परिवार में भाई हैं, बाहर दोस्त है, घर में इतने लोग हैं तो क्या वे रेप करते फिरते हैं? नहीं न? दरअसल, भारत में होहल्ला ज्यादा हो जाता है. यह गलत है. इस के बजाए इसे रोकने के लिए सभी को आगे आना चाहिए. ‘‘मैं मानती हूं कि दुनिया में बुरे लोग हैं पर उन की संख्या काफी कम है. उदाहरण के लिए छोटेछोटे शहरों में अकसर बुजुर्ग और अधेड़ उम्र के लोग कम उम्र की लड़कियों को छेड़ते या गलत ढंग से छूतें दिख जाते हैं. यह बुरा है.’’

क्या खेल के जरीए लड़कालड़की के बीच का भेदभाव कम हो सकता है? पूछने पर वे बताती हैं, ‘‘लड़कालड़की के बीच विभाजन रेखा हर जगह मौजूद है. खेल के क्षेत्र में भी लड़कियों को अधिक ऐक्सपोजर नहीं मिलता. क्वालिटी होने के बावजूद वे ऊपर नहीं जा पातीं, जबकि लड़कियों की रैंकिंग हर तरह से लड़कों से बेहतर है. ‘‘दरअसल, हम 2 तरह से जीते हैं. एकतरफ तो हम बहुत मौडर्न हो चुके हैं पर दूसरी तरफ कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां हमारी सोच पिछड़ी हुई है. बैलेंस नहीं है. यह बैलेंस खेलों के जरीए आ सकता है.

‘‘जब बनारस में मैं ने खेलना शुरू किया था तब लड़कालड़की के बीच बहुत भेदभाव था. पर अब वह स्थिति नहीं है. दरअसल, खेल हर बुरी चीज हटा सकता है. खेल से हम स्वस्थ रहते हैं, मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी. यह हमें संघर्ष करना सिखाता है. आप ने देखा होगा एक खिलाड़ी कभी आत्महत्या नहीं करता. खेल हमें मानसिक शक्ति देता है. मातापिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को किसी न किसी खेल से जरूर जोड़े रखें.’’ आप खेल की वजह से कई देश घूम चुकी हैं. आप को कौन से देश सब से अच्छे लगते हैं? प्रश्न पर दिव्या कहती हैं, ‘‘मुझे 2 देश बहुत पसंद हैं पहला न्यूजीलैंड जहां कम लोग हैं यानी भीड़ कम और खूबसूरती बहुत ज्यादा और दूसरा अमेरिका. यहां के लोग काफी हंसमुख होते हैं. आप उन से आराम से घुलमिल सकते हैं. मगर जब बात रहने की आती है तो मुझे इंडिया ही बैस्ट लगता है.’’

भोजपुरी सिनेमा : कम दाम में ज्यादा मजा

भोजपुरी सिनेमा ने 55 साल से भी ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है लेकिन भद्दे गाने, फूहड़ डायलौग, गंदी हरकतें और इशारेबाजी ही भोजपुरी फिल्मों की पहचान बन कर रह गए हैं. हिंदी फिल्मों की अंधी नकल के बाद भी भोजपुरी सिनेमा का काफी बड़ा बाजार है और इस से जुड़े ज्यादातर लोग मुनाफा कमा रहे हैं.

मजदूर, ड्राइवर, खलासी जैसा कम कमाई वाला तबका भोजपुरी फिल्मों का सब से बड़ा दर्शक है. इन फिल्मों के टिकट की कीमत काफी कम होती है. सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में भोजपुरी फिल्मों की टिकट 40 से 60 रुपए में आसानी से मिल जाती है. यही वजह है कि दर्शक कम पैसे में भोजपुरी फिल्मों में सैक्स के तड़के का मजा उठा रहे हैं.

गौरतलब है कि भारत समेत मौरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसे देशों में तकरीबन 25 करोड़ लोग भोजपुरी बोलनेसमझने वाले हैं. हमारे देश में बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सब से ज्यादा लोग हैं. महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात वगैरह राज्य भी भोजपुरी सिनेमा के बड़े बाजार हैं क्योंकि बिहार व उत्तर प्रदेश के हजारोंलाखों लोग वहां के कलकारखानों में काम करते हैं. दर्जनों भोजपुरी फिल्मों में काम कर चुके कलाकार धामा वर्मा कहते हैं कि परदेश में अपनी बोली की फिल्म देख कर लोग अपने गांव की मिट्टी की खुशबू जैसा मजा लेते हैं. इसी वजह से बिहार और उत्तर प्रदेश समेत दूसरे कई राज्यों में भी भोजपुरी फिल्में काफी चलती हैं.

कलाकार धामा वर्मा ने जिस मिट्टी की खुशबू की बात की वह भले ही आज की भोजपुरी फिल्मों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है, लेकिन भोजपुरी का बाजार बढ़ता ही जा रहा है. भोजपुरी के सुपरस्टार पवन सिंह की फिल्म ‘गदर’ ने करोड़ों रुपए की कमाई की है. एक औसत दर्जे की भोजपुरी फिल्म बनाने में 1-2 करोड़ रुपए लगते हैं और वह 10 से 20 करोड़ रुपए तक की कमाई कर लेती है. इस से चोखा धंधा और क्या हो सकता है.

भोजपुरी फिल्मों के नाम भी दर्शकों को लुभाने के खयाल से ही रखे जाते हैं. ‘पैप्सी पी के लागेलू सैक्सी’, ‘अजब देवरा के गजब भौजाई’, ‘लैला माल छैला धमाल’, ‘दारोगा बाबू आई लव यू’ जैसे नाम दर्शकों को गुदगुदाते हैं और उन्हें सिनेमाघरों की ओर खींच लाते हैं. भोजपुरी फिल्मों के सैक्सी नामों के साथ उन के गाने और उन गानों का फिल्मांकन भी बड़े ही सैक्सी अंदाज में किया जाता है. ‘हमर जवानी खोजेला डबल मरद…’, ‘नथुनी पागल करेली हो रानी…’, ‘लगावे लू जब लिपिस्टिक…’, ‘लौलीपौप लागे लू…’ जैसी गानों में हीरोहीरोइन के सैक्सी लटकेझटके दर्शकों को सिनेमाघरों में सिसकारी भरने के लिए मजबूर कर देते हैं.

भोजपुरी फिल्में अपने शुरुआती दिनों में गंगा, मैया, भौजी, सैंया जैसे नामों के आसपास घूमती रही थीं. 5 लाख रुपए में बनी ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ ने 75 लाख रुपए की कमाई की थी. विश्वनाथ शाहाबादी की बनाई इस फिल्म को मिली भारी कामयाबी के बाद तो भोजपुरी सिनेमा का रास्ता ही खुल गया था और एक के बाद एक धड़ाधड़ भोजपुरी फिल्में बनने लगी थीं. ‘सैंया से भइल मिलनवा’, ‘तुलसी सोहे तोहार अंगना’, ‘सोलहो सिंगार करे दुलहनिया’, ‘बिदेसिया’, ‘पान खाए सैंया हमार’, ‘लागी नाही छूटे राम’ जैसी कई फिल्में आईं और भोजपुरी सिनेमा को नई ताकत मिली.

साल 1977 में हिंदी सिनेमा के खलनायक रहे सुजीत कुमार और छोटेमोटे रोल करने वाली प्रेमा नारायण भोजपुरी फिल्म ‘दंगल’ में हीरोहीरोइन बन कर आए थे. ‘दंगल’ भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी जिस ने आखिरी सांस ले रहे भोजपुरी सिनेमा में नई जान फूंक दी थी. इस फिल्म के सुपरहिट गीत ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा हिलहिल जाए…’ को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी थी.

उस के बाद राकेश पांडे और पद्मा खन्ना की जोड़ी फिल्म ‘बलम परदेसिया’ ले कर आई थी, जिस ने कामयाबी के झंडे गाड़े थे. साल 2003 में रिलीज हुई फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को काफी दमदार बना दिया. बिहार के भोजपुरी गायक मनोज तिवारी और रानी चटर्जी की इस फिल्म को मिली कामयाबी ने भोजपुरी सिनेमा के परदे को फिर से चमकदार बना डाला. उस के बाद तो एक बार फिर भोजपुरी फिल्मों की झड़ी लग गई.

फिल्म वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि भोजपुरी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता का ही नतीजा था कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जैकी श्रौफ, शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, रति अग्निहोत्री, नगमा, भाग्यश्री, भूमिका चावला जैसे बौलीवुड के कलाकारों ने इस में काम किया. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने कुणाल सिंह, राकेश पांडे के बाद मनोज तिवारी, रविकिशन, दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, सुदीप पांडे को सुपरस्टार बना दिया.

पिछले 4-5 सालों में भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार की नई खेप पैदा हो चुकी है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने पवन सिंह, खेसारी लाल, राकेश मिश्रा, धीरज मिश्रा, पाखी हेगड़े, रानी चटर्जी, मोनालिसा, श्वेता तिवारी, दिव्या देसाई, रिंकू घोष, जैसे तमाम कलाकारों को पैसा और पहचान दिला दी है. भोजपुरी सिनेमा की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए कई बाहरी लोग भोजपुरी सिनेमा बनाने लगे हैं. साउथ फिल्म इंडस्ट्री के कई लोग भोजपुरी फिल्म बना रहे हैं.

हिंदी फिल्मों और हौलीवुड की नामचीन हीरोइन प्रियंका चोपड़ा द्वारा बनाई गई फिल्म ‘बम बम बोल रहा है काशी’ ने खासी कमाई थी.

क्या गुल खिलाएंगे हाथ और हाथी?

‘राहुल गांधी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि वे अपने पिता राजीव गांधी से ज्यादा विदेशी मूल की अपनी मां सोनिया गांधी की तरह दिखते हैं.’ यह बयान इस दफा किसी भाजपाई ने नहीं, बल्कि बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह ने दिया था. यह बयान हैरान कर देने वाला इस लिहाज से था कि नैशनल लैवल पर कांग्रेस और बसपा महागठबंधन और सीटों के तालमेल की बात कर रही हैं और बसपा के एक जिम्मेदार नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ भाजपाइयों सरीखी बयानबाजी कर रहे हैं.

इस से पहले कि जयप्रकाश सिंह का बयान कोई सियासी गुल खिला पाता, बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें तुरंत ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा कर यह साफ कर दिया कि कांग्रेस और सोनिया व राहुल गांधी के खिलाफ ऐसी कोई बयानबाजी बरदाश्त नहीं की जाएगी, जिस से इस गठबंधन पर फर्क पड़े. मायावती की नजरें सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनाव पर ही नहीं हैं, बल्कि इस साल के आखिरी में होने जा रहे

3 अहम राज्यों के विधानसभा चुनावों पर भी हैं, जहां भाजपा का सफाया करने में वे कांग्रेस से हाथ मिलाने का इशारा कर चुकी हैं. इस बाबत दोनों दलों में 2 दौर की बातचीत भी हो चुकी है.

मध्य प्रदेश पर ज्यादा जोर

उत्तर प्रदेश से बाहर अगर किसी राज्य में बसपा की जड़ें आज भी गहरे तक जमी हैं, तो वह मध्य प्रदेश है जहां साल 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा 4 सीटें ले गई थी और 11 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. इस के अलावा तकरीबन 30 सीटों पर उस ने 10 फीसदी के आसपास वोट हासिल कर भाजपा की जीत आसान कर दी थी. जैसे ही कर्नाटक के नतीजों के बाद सोनिया गांधी और मायावती बेंगलुरु में बिछड़ी बहनों की तरह गले मिली थीं उस से साफ हो गया था कि अब वे दोनों मिल कर चुनाव लड़ेंगी.

यह बात उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, फूलपुर और बाद में कैराना लोकसभा के चुनावी नतीजों से जाहिर भी हो गई थी कि अगर विपक्ष एकजुट हो कर लड़े तभी भाजपा की मुश्कें कसी जा सकती हैं, नहीं तो उसे वोटों के बंटवारे का खमियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बसपा खासा वोट और सीटें ले जाती रही है. मध्य प्रदेश के चंबल और विंध्य इलाके उस के मजबूत गढ़ हैं. इन इलाकों की दलित बहुल सीटों पर थोक में हाथी के निशान पर वोट पड़ते हैं.

2013 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 36.38 और बसपा को 6.29 फीसदी वोट मिले थे जबकि भाजपा ने 44.87 फीसदी वोट हथियाए थे. अब हालात बदले हैं. राज्य में सत्ता विरोधी लहर है और खुद दलित समुदाय चाहता है कि बसपा और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ें. इस के लिए चाहे वे गठबंधन करें या फिर कुछ सीटों पर तालमेल करें. यह ऊंची जाति वालों के कहर और दबदबे से हैरानपरेशान दलितों का ही दबाव है कि मायावती को कांग्रेस और कांग्रेस को मायावती की तरफ बढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

इस जुगलबंदी से बौखलाई भाजपा को अभी समझ नहीं आ रहा है कि वह इस दूध में कैसे नीबू निचोड़े जिस से दोनों के बीच खटास पैदा हो. गाय के इस दूध का दही जमाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी लगातार सोचविचार हो रहा है और भाजपा आलाकमान भी कांग्रेस और बसपा की मेलमुलाकातों पर नजर रखे हुए है. मध्य प्रदेश में बात सीटों पर अटकी हुई है. बसपा चाहती है कि उस के हिस्से में वे सभी 40 सीटें आएं जिन पर वह अब तक अलगअलग चुनावों में ही सही जीती है. यह आंकड़ा कांग्रेस को ज्यादा लग रहा है. वजह, इन में से कई सीटों पर बसपा अपना असर खो चुकी है. मौजूदा 4 विधायकों वाली सीटों और साल 2013 में 11 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही बसपा को 15 सीटें देने में उसे कोई नुकसान नहीं दिख रहा लेकिन बाकी 25 सीटों पर दावेदारी उस से छोड़ी नहीं जा रही है.

हर कोई यह मान कर चल रहा है कि चूंकि बसपा और कांग्रेस हाथ मिलाने का मन बना चुकी हैं इसलिए बसपा 25 से ले कर 30 सीटों पर राजी हो जाएगी. कांग्रेस की मंशा यह है कि सब से बड़ा विपक्षी दल होने के नाते वह 230 विधानसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में 200 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े और अपने दम पर बहुमत की 115 सीटों पर जीत हासिल करे. इतनी सीटें अगर नहीं मिलती हैं तो वह बसपा के जीते उम्मीदवारों की मदद से सरकार बना सकती है. बसपा भी यही सोच रही है कि अगर 25-30 सीटों पर दमदार तरीके से चुनाव से लड़ा जाए तो पिछले तमाम रिकौर्ड तोड़ते हुए 15 के लगभग सीटें हासिल करते हुए सत्ता में भागीदारी हासिल की जा सकती है. यह गुणाभाग बसपा सुप्रीमो मायावती और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को भी समझ आ रहा है. लिहाजा यह तो तय है कि वे साथ मिल कर भाजपा से लड़ेंगे, इस बाबत 2-4 सीटें दोनों दल कुरबान करने को तैयार हैं.

गठबंधन या तालमेल में इन दोनों पार्टियों को ही फायदा नजर आ रहा है जिस की अपनी अहम वजहें भी हैं. 230 में से तकरीबन 80 सीटों पर बसपा 10 हजार तक वोट ले जाती है जिन का समझौते के बाद कांग्रेस के खाते में जाना तय माना जा रहा है.

मुमकिन है कि मध्य प्रदेश में भी वोट शिफ्टिंग का फार्मूला अपनाया जाए जो उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनावों में काफी कारगर साबित हुआ था. इस बाबत दोनों ही पार्टियों के रणनीतिकार हिसाबकिताब लगा रहे हैं कि इस में कोई जोखिम तो नहीं और भाजपा इस हालत में क्या करेगी. वजह, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सियासत में जमीनआसमान का फर्क है. पिछड़े वोटों पर वोट शिफ्टिंग का असर नहीं पड़ेगा क्योंकि मध्य प्रदेश में अगड़ों के बाद भाजपा का तगड़ा वोट बैंक पिछड़ों का ही है.

ये भी हैं तैयार अकेली बसपा ही नहीं, बल्कि सपा समेत भाजपा विरोधी तमाम छोटे दल भी कांग्रेस का साथ देने के लिए तैयार हो रहे हैं तो इस के अपने अलग माने हैं. सपा मुखिया अखिलेश यादव 19 जुलाई, 2018 को भोपाल आए और साफ किया कि वे गठबंधन के लिए तैयार हैं और कमलनाथ से उन के अच्छे ताल्लुकात हैं.

हालांकि सपा का कोई खास वोट बैंक अब मध्य प्रदेश में नहीं रहा है लेकिन बुंदेलखंड इलाके की यादव बहुल 6 सीटों पर वह मजबूत है. मुमकिन है कि गठबंधन का ऐलान होतेहोते कांग्रेस 2-4 सीटें सपा को भी देने के लिए तैयार हो जाए. ग्वालियरचंबल संभाग में जमीन तैयार कर चुका बहुजन संघर्ष दल भी कांग्रेस की छतरी के नीचे आने के लिए बेताब है. इस पार्टी के अध्यक्ष फूलसिंह बरैया ने भोपाल की एक बड़ी रैली में कहा था कि वे भाजपा के सफाए के लिए कांग्रेस से समझौता करने के लिए तैयार हैं.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ गठबंधन और तालमेल के मसले पर फूंकफूंक कर अपने कदम रख रहे हैं. आदिवासियों की पार्टी गोंंडवाना गणतंत्र पार्टी को भी वे 2-4 सीटें दे सकते हैं. हालात छत्तीसगढ़ के गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का असर छत्तीसगढ़ की भी चुनिंदा सीटों पर है. यहां भी कांग्रेस उस से सौदेबाजी कर सकती है. इस के पीछे उस का मकसद पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस को पछाड़ना होगा.

छत्तीसगढ़ में बसपा भी कुछ सीटों पर मजबूत है. 2013 के विधानसभा चुनाव में उस ने एक सीट जीती थी और तकरीबन 4.5 फीसदी वोट हासिल किए थे. 10 सीटों पर तगड़े वोटों के साथ वह तीसरे नंबर पर रही थी. मायावती तीनोें राज्यों में तालमेल इसीलिए चाहती हैं कि मध्य प्रदेश में कुछ ढील दे कर छत्तीसगढ़ में ज्यादा सीटें हासिल कर सकें. बसपा यहां 90 में से 10 सीटें चाह रही है जबकि कांग्रेस 6 से ज्यादा सीटें देने के लिए तैयार नहीं है.

गौरतलब है कि बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत इसी राज्य की जांजगीर सीट से की थी. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग में बसपा मजबूत हालत में है और यहां की 8 सीटों पर वह 10 हजार से ज्यादा वोट ले कर भाजपा की राह आसान करती रही है. साल 2013 के चुनावी नतीजे साफ बताते हैं कि अगर वह चुनाव बसपा और कांग्रेस ने मिल कर लड़ा होता तो इस गठबंधन को 51 सीटें मिलतीं जिन में 39 सीटें कांग्रेस पार्टी की और 12 सीटें बसपा की होतीं.

मुश्किल में भाजपा

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की नींद कांग्रेसबसपा के गठजोड़ को ले कर उड़ी हुई है. जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान शिवराज सिंह चौहान अपनी तकलीफ यह कहते हुए कम कर कहते हैं कि जो भी दल कांग्रेस से गठबंधन करता है वह मिट जाता है.

दरअसल, शिवराज सिंह चौहान बसपा के कार्यकर्ताओं को भड़काने का काम कर रहे हैं लेकिन बसपा इस बात से बेफिक्र है क्योंकि पार्टी में मायावती का दबदबा किसी सुबूत का मुहताज नहीं है. रमन सिंह को भी समझ आ रहा है कि अगर यह गठबंधन हुआ तो भाजपा को 35 सीटों का आंकड़ा छूने में पसीने छूट जाने हैं. राज्य की 8 सीटों पर बसपा 10 हजार से 30 हजार तक वोट ले जाती है जिस से भाजपा का उम्मीदवार आसानी से जीत जाता है. लेकिन इस दफा ऐसा होता नहीं दिखाई दे रहा है.

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चिंता विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव की भी है. अगर बसपाकांग्रेस गठबंधन कायम रहा तो साफ दिख रहा है कि बसपा को मध्य प्रदेश में 4 सीटें रीवां, सतना, भिंड और मुरैना की मिल सकती हैं. इन सीटों पर उसे हर चुनाव में खासा वोट मिलते रहे हैं और 1-1 दफा उस के उम्मीदवार जीते भी हैं. यही हाल छत्तीसगढ़ में जांजगीर और बिलासपुर सीटों का है जिन पर कांग्रेस अगर बसपा का साथ दे तो भाजपा की जीत मुश्किल हो जाएगी. इस सौदे के एवज में कांग्रेस को मध्य प्रदेश में 25 और छत्तीसगढ़ में 7 लोकसभा सीटों पर बसपा के वोट मिलने से भाजपा की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.

5 राज्यों के चुनाव हैं मोदी का इम्तिहान

5 राज्यों के चुनाव जो नवंबरदिसंबर में होंगे 2019 की दस्तक देंगे. कांग्रेस के लिए तो नहीं पर नरेंद्र मोदी के लिए ये बड़े इम्तिहान हैं. एक तरफ पैट्रोल के दाम बढ़ने से जनता खाने को तैयार बैठी है तो दूसरी ओर दलित सवर्णों की धौंसबाजी से परेशान हैं. मुसलिम वोट तो पहले भी भाजपा को नहीं जाते थे पर अब सवाल उठ रहा है कि दलितों को मनाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं उन से ऊंची जातियां ही नाराज न हो जाएं. देश की हालत पतली है, यह पक्का है. 2014 में जो उम्मीद जगी थी वह तो अब धुल चुकी है. आस है तो यही कि कांग्रेस अकेले अपने दम पर कुछ नहीं कर पाएगी और मायावती व अखिलेश यादव भाजपा के खिलाफ वोटों का बंटवारा कर के भाजपा को आखिर में जिता ही देंगे.

देश को ऐसी सरकार चाहिए जो चले. आम आदमी बेहतर जिंदगी चाहता है पर इस का फार्मूला किसी के पास नहीं है. कांग्रेस कहे कि उस का राज बेहतर होगा इस की कोई गारंटी नहीं है. सरकारों का रवैया एक तरह का हो गया है कि जहां चोट लगे वहीं मरहमपट्टी कर दो. चोट लगी ही क्यों इस पर सोचने और करने को तैयार नहीं. नरेंद्र मोदी अगर आम लोगों की निगाह में खरे नहीं उतरे तो इसलिए कि उन्होंने सरकार चलाने का जो ब्लूप्रिंट दिया वह सिर्फ मंचों और फीते काटने तक रह गया.

बैंक फेल से न हों. सड़केंसुरंगें बनाने वाली कंपनियां दीवाला न पीटें. स्टील मिलें बंद न हों. नौकरियां कम न हों. पढ़ाई खराब न हो. जनता को सड़क पर निकलने में डर न लगे. कल क्या होगा, इस की चिंता न हो. यह नरेंद्र मोदी की सरकार न कर पाई. हिंदू धर्म बचा रहे, इस से किसी को दो रोटी ज्यादा नहीं मिलेगी. वह जमाना लद गया जब लोग धर्म के नाम पर मरमिटते थे. कुछ हैं आज जो अपना सबकुछ धर्म को दे देते हैं पर सब नहीं ऐसे. वे हिंदू धर्म को बचा कर रखने में एक हद तक ही जा सकते हैं. अपने वजूद या कल की बलि दे दें, जरूरी नहीं.

नरेंद्र मोदी के पास अब कुछ करने का समय बचा नहीं है. हां, वे कांग्रेस और दूसरों के बीच खाइयां खोद सकते हैं. यह दूसरों की कमजोरी है कि वे अपना घर संभाल नहीं सकते. दूसरों को बांट कर राज करना पुरानी कला तो हम लोग सदियों से जानते हैं पर इस चक्कर में देश को गुलामी सहनी पड़ती रही है. उम्मीद है कि बांटने वालों और बंटने वालों को सबक मिलेगा.

आधी आबादी के आगे बढ़ने की राह दुश्वार क्यों

‘जोरू का गुलाम’ जैसी कहावतों को अकसर लोग मजाक में लेते हैं, क्योकि आमतौर पर पूरी दुनिया में महिलाओं को दोयमदर्जे का समझा जाता है और पुरुष ही घर का मुखिया होता है. मगर आप को यह जान कर हैरानी होगी कि एक खप्ती से ग्रुप ने एक इलाके का नाम दे कर ऐसा तंत्र स्थापित किया है जहां वाकई पुरुष महिलाओं के गुलाम होते हैं.

‘वूमन ओवर मैन’ मोटो वाले इस तथाकथित देश का शासन भी एक महिला के हाथों में ही है. यह देश है ‘अदर वर्ल्ड किंगडम’ जो 1996 में यूरोपियन देश चेक रिपब्लिकन में एक फार्म हाउस में बना. इस देश की रानी पैट्रिसिया प्रथम हैं, पर उन का चेहरा आज तक बाहरी दुनिया ने नहीं देखा है.

इस देश की मूल नागरिक सिर्फ महिलाएं होती हैं और पुरुष महज गुलामों की हैसियत से रहते हैं. यह शगूफे की तरह का देश है पर फिर भी साबित करता है कि दुनिया में ऐसे लोग मौजूद हैं जो औरतों के संपूर्ण शासन में विश्वास रखते हैं.

भारत के मणिपुर की राजधानी इंफाल का  इमा बाजार सब से बड़ा बाजार है. इसे मणिपुर की लाइफलाइन भी कह सकते हैं. इस बाजार की खासीयत यह है कि यहां ज्यादातर दुकानदार भी महिलाएं ही हैं और खरीदार भी.

4 हजार से ज्यादा दुकानों वाले इस बाजार में सागसब्जी, फल, कपड़े, राशन से ले कर हर तरह की चीज मिल जाएगी. यहां किसी भी दुकान पर पुरुषों को काम करने की इजाजत नहीं है.

इमा बाजार की बुनियाद 1786 में पड़ी थी जब मणिपुर के सभी पुरुष चीन और बर्मा की सेनाओं से युद्ध में शामिल होने चले गए और महिलाओं को परिवार संभालने के लिए बाहर आना पड़ा. उन्होंने दुकानें लगा कर धन कमाया. इस तरह जरूरत के हिसाब से सामाजिक व्यवस्था में आया यह बदलाव परंपरा में बदल गया.

खुद रचा समाज

दरअसल, जिस समाज में हम रहते हैं उस की संरचना हम ने ही की होती है. जिंदगी को आसान बनाने, एकरूपता लाने व दूसरी जरूरतों के लिहाज से आवश्यकतानुसार इंसान ने समाज के तौरतरीके व परंपराएं बनाईं. महिलाओंपुरुषों की भूमिकाएं तय की गईं. पुरुष चूंकि शारीरिक रूप से थोड़े ज्यादा शक्तिशाली होते थे, इसलिए उन्हें बाहर की दौड़धूप व धनसंपत्ति जुटाने का जिम्मा सौंपा गया. वहीं महिलाएं चूंकि बच्चों को जन्म देती हैं, इसलिए बच्चों का पालनपोषण और घर संभालने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई.

मगर इस का मतलब यह नहीं कि स्त्रीपुरुष के बीच कोई जन्मजात अंतर होता है. वे हर तरह से समान हैं. समाज ही उन के स्वभावगत गुणों व भूमिकाओं से उन्हें अवगत कराता है और वैसी ही भूमिकाएं निभाने की उम्मीद रखता है.

न तो लड़कियां अधिक संवेदनशीलता और बुद्धिकौशल ले कर पैदा होती हैं और न ही लड़के सत्ता व शक्ति ले कर आते हैं. समाज ही बचपन से उन्हें इस प्रकार की सीख देता है कि वे स्त्री या पुरुष के रूप में बड़े होने लगते हैं.

क्यों बंटी भूमिकाएं

इस संदर्भ में पुराने समय की जानीमानी मानवशास्त्री और समाज वैज्ञानिक मागर्े्रट मीड का अध्ययन काफी रोचक है. मीड ने पूरी दुनिया की अलगअलग सामाजिक व्यवस्थाओं की रिसर्च कर पाया कि लगभग सभी समाजों में पुरुषों का ही बोलबाला है और स्त्रीपुरुष की भूमिकाएं भी बंटी हुई हैं.

रिसर्च के बाद मीड को कुछ ऐसी जनजातियां भी दिखीं जहां की सामाजिक व्यवस्था बिलकुल भिन्न थी. 1935 में प्रकाशित उन की किताब ‘सैक्स ऐंड टैंपरामैंट इन थ्री प्रीमिटिव सोसाइटीज’ में ऐसी 3 जनजातियों का विवरण है जहां स्त्रीपुरुष की भूमिकाएं बिलकुल अलग तरह से तय की गई थीं.

मीड ने पाया कि न्यू गुयाना आइलैंड के पहाड़ी इलाकों में रहने वाली अरापेश नामक जनजाति में महिलाओं और पुरुषों की भूमिकाएं एकसमान थीं. बच्चों के पालनपोषण में दोनों समान रूप से सहयोग करते, मिल कर अनाज का उत्पादन करते, खाना बनाते और कभी भी झगड़ों या विवादों में उलझना पसंद नहीं करते.

इसी तरह एक दूसरी जनजाति मुंडुगुमोर में भी स्त्रीपुरुषों की भूमिकाएं समान थीं. फर्क इतना था कि यहां स्त्रीपुरुष दोनों ही ‘पुरुषोचित’ गुणों से युक्त थे. वे योद्धाओं की तरह व्यवहार करते थे. शक्ति और ओहदा पाने के लिए प्रयासरत रहते थे और बच्चों के पालनपोषण में कोई रूचि नहीं रखते थे.

तीसरी जनजाति जिस का मार्ग्रेट मीड ने उल्लेख किया वह थी न्यू गियाना की चांबरी कम्यूनिटी. यहां स्थिति बिलकुल अलग थी. स्त्रीपुरुषों के बीच अंतर था, मगर पारंपरिक सोच से बिलकुल भिन्न.

पुरुष इमोशनली डिपैंडैंट और कम जिम्मेदार थे. वे खाना बनाने, घर की साफसफाई व बच्चों की देखभाल का काम करते थे जबकि महिलाएं अधिक लौजिकल, इंटैलिजैंट और डौमिनैंट थीं.

जैंडर इक्वैलिटी की अवधारणा

19वीं सदी में इजराइल के ‘किबुट्ज’ नामक समुदाय जैंडर इक्वैलिटी का खूबसूरत उदाहरण प्रस्तुत करते थे. यह दौर था औद्योगिकीकरण से पहले का. यहां के लोग खेती का काम कर अपना जीवननिर्वाह करते. इस समुदाय के पुरुषों को महिलाओं के पारंपरिक काम जैसे खाना बनाना, बच्चों की देखभाल आदि करने को प्रोत्साहित किया जाता. वैसे महिलाएं खुद भी ये काम करती थीं.

इस के साथ ही पुरुषों वाले काम जैसे अनाज का उत्पादन, घरपरिवार की सुरक्षा आदि स्त्रीपुरुष दोनों मिल कर करते थे. वे प्रतिदिन या सप्ताह के हिसाब से अपने काम बदलते रहते ताकि स्त्रीपुरुष दोनों ही हर तरह के कामों में अपना योगदान दे सकें. आज भी इजराइल में 200 से ज्यादा किबुट्ज समुदाय मौजूद हैं, जहां सामाजिक व्यवस्था जैंडर इक्वैलिटी के सिद्धांत पर आधारित है.

देखा जाए तो इस तरह की सामाजिक व्यवस्था ही आदर्श कही जा सकती है. पर हकीकत में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं. पूरी दुनिया में हमेशा से आलम यही रहा है कि महिलाएं घर संभालें और पुरुष बाहर के काम करें, पैसे कमा कर लाएं. इस से पुरुषों के अंदर वर्चस्व की भावना घर करती रही. महिलाओं को परिवार व समाज में दोयमदर्जा मिला. वे घर की चारदीवारी में कैद होती गईं जबकि पुरुष घर के मुखिया बनते गए.

पिछले कुछ दशकों में स्थिति थोड़ी बदली है. कितनी ही महिलाएं हैं, जिन्होंने अपने साथसाथ परिवार, देश का नाम रोशन किया. खेलकूद, मैडिकल, इंजीनियरिंग, पर्वतारोहण जैसे क्षेत्र हों या फिर ऐक्टिंग, राइटिंग, सिंगिंग जैसे कला के क्षेत्र हर जगह महिलाओं ने अपना परचम लहराया. मगर इन सब के बावजूद आज भी उन की आगे बढ़ने की राह आसान नहीं.

सामाजिक कार्यकर्त्ता शीतल वर्मा कहती हैं, ‘‘यकीनन स्त्री और पुरुष दोनों जैविक रूप से भिन्न हैं, परंतु सामाजिक भेद हमारी समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा पैदा किया जाता है. पुरुषप्रधान समाज में नारी की स्थिति दूसरे दर्जे के नागरिक की रही है और आज भी ऐसा ही है. ऐसा हर देश और हर युग में होता रहा है. नारी ने अपने अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ कर कुछ अधिकार प्राप्त किए हैं, परंतु स्थिति अब भी ज्यादा बेहतर नहीं है. हर स्तर पर महिला का संघर्ष जारी है.

सक्षम महिलाएं भी शोषित

यदि महिला आर्थिक रूप से सक्षम है तब भी उसे कार्यस्थल पर शारीरिक शोषण, अपमान, कटाक्ष आदि का सामना करना पड़ता है. यह बहुत दुखद है कि हमारे समाज में महिलाओं के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार एक परंपरा सी बन गई है.

घर, औफिस या सड़क, कहीं भी स्त्री पुरुषों द्वारा शोषण की शिकार हो सकती है. कमजोर समझ कर प्रताडि़त किए जाने के अवसर कभी भी आ सकते हैं.

इस संदर्भ में शीतल वर्मा कहती हैं, ‘‘महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाना है तो खुद महिलाओं को भी इस दिशा में प्रयास करना होगा और सकारात्मक कदम उठाने होंगे. महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना होगा. उन्हें अपना स्वतंत्र वजूद गढ़ने और उसे कायम रखने के लिए आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना बहुत जरूरी है.’’

सच तो यह है कि समाज में शक्तिशाली ही शक्तिहीनों का शोषण करता है. फिर क्यों न अपने अंदर वह ताकत जगाई जाए कि कोई भी शख्स किसी तरह का अन्याय करने की बात सोच भी न सके.

पुरुष सत्तावादी सामाजिक संरचना का बहिष्कार करते हुए कई महिलाओं ने अपना अलग वजूद कायम कर समाज के आगे उदाहरण पेश किए हैं.

हैदराबाद में वारंगल की डी. ज्योति रेड्डी एक ऐसा ही नाम है. 1989 तक वे रु 5 प्रति दिन पर मजदूरी करती थीं. लेकिन आज वे यूएसए की एक कंपनी की सौफ्टवेयर सौल्यूशंस की सीईओ हैं और करोड़ों के बिजनैस को हैंडल कर रही हैं.

एक ऐसे समाज, जिस में महिलाओं का सदियों से प्रतिकार किया जाता है, वहां से निकल कर एक ऊंचा मुकाम हासिल कर ज्योति रेड्डी ने साबित कर दिया कि रूढि़वादी सामाजिक संरचना से बाहर निकलना कठिन है नामुमकिन नहीं. बस जरूरत है अपनी ताकत को पहचानने की.

बुलंद हौसला है जरूरी

स्त्री या पुरुष होना माने नहीं रखता. सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि पुरुष ही शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं और स्त्रियां कमजोर. मगर ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं, जिन्होंने इस मान्यता को गलत साबित किया है.

48 वर्षीय सामान्य कदकाठी की सीमा राव भी ऐसी ही एक शख्सीयत हैं. सैवेंथ डिग्री ब्लैक बैल्ट होल्डर, कौंबेट शूटिंग इंस्ट्रक्टर, फायर फाइटर, स्कूबा डाइवर और रौक क्लाइबिंग में एचएमआई मैडलिस्ट सीमा राव पिछले 20 सालों से भारतीय जवानों को अवेतनिक तौर पर ट्रेनिंग दे रही हैं. वे भारत की एकमात्र महिला कमांडो ट्रेनर हैं.

3 बहनों में सब से छोटी सीमा राव के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्हीं की प्रेरणा से सीमा के मन में अपने देश के लिए कुछ करने की इच्छा जगी. मैडिकल लाइन छोड़ कर वे स्वेच्छा से कमांडो ट्रेनर बनीं. अब तक वे 2 हजार से ज्यादा जवानों को ट्रेंड कर चुकी हैं.

उन्हें अपने पति मेजर दीपक राव का पूरा सहयोग मिलता है. बतौर स्त्री, घरपरिवार और बच्चों के साथ इस तरह के कामों में इन्वौल्व रहना आसान नहीं.

सीमा राव बताती हैं, ‘‘मैं ने और मेरे पति ने आपसी सहमति से यह तय किया कि हम अपनी संतान पैदा नहीं करेंगे. अपने काम के सिलसिले में अकसर हमें बाहर रहना पड़ता है. मैं साल में 8 महीने ट्रैवल करती हूं. ऐसे में सब मैनेज करना आसान नहीं. मेरे पति ने मेरी भावनाओं को मान दिया और इस अनुरूप परिस्थितियां दीं कि मैं बेफिक्र हो कर अपना काम कर सकूं.

‘‘बचपन से ही महिलाओं को यह समझाया जाता है कि उन्हें जिंदगी में शादी करनी है, बच्चे पैदा करने हैं और घर संभालना है. मगर इस का मतलब यह नहीं कि स्त्री दूसरे काम नहीं कर सकती. जब मैं फील्ड में होती हूं तो जवानों की आंखों में यह सवाल नजर आता है कि क्या एक स्त्री हमें ट्रेनिंग दे सकेगी? मगर मेरी आदत है कि कुछ भी सिखाने से पहले वह कार्यवाही मैं स्वयं कर के दिखाती हूं. इस से उन को अपने सवाल का जवाब भी मिल जाता है.’’

शारीरिक रूप से फिट रहने के लिए सीमा राव हफ्ते में 2 बार 5 किलोमीटर तक दौड़ती हैं. 2 बार जिम में जा कर वेट लिफ्टिंग करती हैं, 2-3 बार फाइटिंग, बौक्सिंग, कुश्ती करती हैं. वे अपने से दोगुने वजन और आधी उम्र के पुरुषों के साथ फाइट करती हैं.

अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हुए सीमा कहती हैं, ‘‘ट्रेनिंग के दौरान मेरा दिन सुबह 5 बजे से शुरू हो जाता है. 6 से 7 बजे तक पहला सैशन होता है. 9 से 1 बजे तक शूटिंग और शाम 5 बजे से फिर लैक्सर्च, डैमो, वगैरह का दौर शुरू आता है. क्लोज क्वार्टर बैटल वगैरह के सैशन रात 3 बजे तक चलते रहे हैं.’’

सीमा को अब तक कई अवार्ड्स मिल चुके हैं. वे कई किताबें भी लिख चुकी हैं. उन का मानना है कि जिन लड़कियों में में आगे बढ़ने की चाह है, उन्हें पहले स्वयं को मजबूत बनाना होगा औ तय करना होगा कि यह काम करना ही है. फिर उन्हें कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता.

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