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विराट बने 10 हजारी, तोड़ा सचिन का 17 साल पुराना रिकार्ड

अपने 10 साल के इंटरनैशनल करियर में विराट कोहली रिकार्ड का पर्याय बन चुके हैं. अब जब भी विराट बल्ला थामे क्रीज पर पहुंचते हैं, तो वहां कोई न कोई खास रिकार्ड उनके स्वागत के लिए तैयार होता है. वेस्ट इंडीज के खिलाफ विशाखापत्तनम में खेले जा रहे वनडे मैच में भी उन्होंने कुछ रिकार्ड अपने नाम किए. अपने वनडे करियर का 213वां मैच खेल रहे कोहली ने आज 10 हजार इंटनरनैशनल रन के खास क्लब में एंट्री की. विराट इस क्लब में सबसे तेज जगह बनाने बल्लेबाज हैं. उन्होंने मात्र 205 पारियों में इस क्लब में जगह बनाई.

वेस्टइंडीज के खिलाफ विशाखापत्तनम मैच के दौरान बुधवार को उन्होंने पारी के 37वें ओवर में एश्ले नर्स की गेंद पर यह मुकाम हासिल किया. कोहली ने सिर्फ 205 पारियों में 10 हजार रन पूरे कर लिए. विराट से पहले सबसे तेज 10,000 रन बनाने का यह रिकार्ड महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के नाम था. उन्होंने सचिन तेंदुलकर के 17 साल पुराने वर्ल्ड रिकार्ड को तोड़ दिया है. सचिन तेंदुलकर ने 31 मार्च 2001 को 259 पारियों में 10 हजार रन पूरे किए थे. इस लिहाज से देखें तो विराट ने सचिन से 54 पारियां कम खेली हैं. इस पर सचिन और कई खिलाड़ियो ने ट्वीट कर विराट को बधाइयां दीं.

सबसे कम पारियों में 10 हजार रन पूरे करने में तीसरे पायदान पर भारत के ही पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली हैं, जिन्होंने 263 पारियों में 10000 का आंकड़ा छुआ था. 18 अगस्त 2008 को श्री लंका के खिलाफ अपने वनडे करियर की शुरुआत करने वाले कोहली ने जनवरी 2017 में सीमित ओवरों की कप्तानी संभाली थी.

अब भले ही सबसे तेज 10,000 रन बनाने के मामले में विराट टौप पर हों, लेकिन इस लिस्ट में टौप 3 बल्लेबाजों की बात करें, तो यहा भारतीय खिलाड़ी ही मौजूद हैं. विराट (205 पारियां), सचिन तेंदुलकर (259 पारियां) और फिर सौरभ गांगुली (263 पारियां) का नाम मौजूद है. इसके बाद पूर्व आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज रिकी पोन्टिंग (266 पारियां) का नाम आता है.

इस मामले में भी विराट ने सचिन को पीछे किया. अब तक सचिन तेंदुलकर के ही नाम सबसे कम पारियों के रिकार्ड थे. विराट ने उन्हें यहां भी बड़े अंतर से मात दी. विराट ने मजह 78 पारियों में ही अपने घर पर 4000 इंटरनैशनल रन बनाने का रिकार्ड अपने नाम कर लिया. इससे पहले सचिन ने 92 पारियों में यह मुकाम हासिल किया था.

विराट कोहली ने एक साल में सबसे तेज 1000 रन बनाने का रिकार्ड भी अपने नाम कर लिया. इस साल 1000 रन बनाने के लिए इस बल्लेबाज ने सिर्फ 11 पारियों का सहारा लिया.

समाजवादी पार्टी की तर्ज पर ही चल रहे शिवपाल

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी शिवपाल यादव की पार्टी का नया नाम है. इसको कम शब्दों को ‘पीएसपी लोहिया’ कहा जा रहा है. पार्टी का लखनऊ में एक बडा सम्मेलन कराया गया. इसके बाद पहले पदाधिकारी के नाम के रूप में शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव का नाम सामने आया है. आदित्य यादव को पीएसपी लोहिया का महासचिव बनाया गया है. समाजवादी पार्टी के परिवारवाद के तर्ज पर शिवपाल यादव की पार्टी पीएसपी लोहिया भी अब चल पडी है.

पीएसपी लोहिया के पहले सम्मेलन में शिवपाल यादव ने कहा कि ‘सपा में चापलूसों की चलती है. हमारी पार्टी चापलूसों और चुगलखोरों से दूर रहेगी. कोई भी कार्यकर्ता सीधे अपनी बात कह सकेगा.’ सम्मेलन में सपा के बड़े नेता भगवती सिंह का नाम बैनर पर होने के बाद भी वह दिखे नहीं. बताया जा रहा है कि वह अपनी बीमारी के कारण नहीं आये. मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव का न होना भी अलग संकेत दे रहा था. अपर्णा यादव कुछ दिन पहले ही चाचा शिवपाल के साथ मंच पर थी पर सम्मलेन से वह दूर रही.

शिवपाल यादव ने भाजपा की केन्द्र और प्रदेश सरकार की आलोचना की. नोट बंदी से लेकर मंहगाई तक के मुद्दों पर चर्चा की. शिवपाल यादव ने भले ही पार्टी के संगठन की कोई घोषणा न की हो पर मीडिया से बात करने के लिये 19 लोगों के नाम तय कर दिये. जानकार सूत्रों का कहना है कि नवम्बर माह में पार्टी का संगठन तैयार हो जायेगा. इसके साथ ही साथ लोकसभा चुनाव लड़ने वाले लोगों के नाम भी तय हो जायेंगे. पार्टी लोकसभा चुनाव पूरी ताकत से लड़ेगी.

वीडियो : राखी सावंत बोलीं तनुश्री ने मेरा बार बार रेप किया

बौलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर और तनुश्री दत्ता के बीच शुरू हुए पुराने विवाद में अब राखी सावंत भी कूद पड़ी हैं. दोनों के बीच शुरू हुई तीखी जुबानी जंग मानहानी के मुकदमे तक पहुंच गई. लेकिन अब भी दोनों अभिनेत्रियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है. राखी सावंत ने मुंबई में प्रेस कौन्फ्रेंस बुलाकर कई खुलासे किए. पहले तो राखी ने तनुश्री को काफी बुरा भला कहा फिर उनपर रेप का आरोप लगाया.

राखी ने कहा कि “मुझे यह कहते हुए बहुत शर्म आ रही है और दुख हो रहा है कि आज से 12 साल पहले मेरे साथ भी बलात्कार हुआ था. मुझे ये शब्द नहीं कहने चाहिए. एक लड़की होने के नाते एक लड़की के बारे में ये सब बताते हुए मुझे काफी शर्म आ रही है, पर यही सच है. तनुश्री बौलीवुड को बदनाम करने की कोशिश कर रही हैं. वह अंदर से एक लड़का है. उसने मेरे साथ बार-बार रेप किया.”

राखी सावंत ने आगे कहा, “मेरे आंखों में आंसू है. मेरा ह्रदय अंदर से बिल्कुल छलनी हो चुका है. मुझे अंदर से बहुत तकलीफ हो रही है. आज तक मैंने जुबान नहीं खोली. लेकिन हर लड़की बहती गंगा में हाथ धो रही है. चलती ट्रेन पकड़ रही है. मुझे काफी दुख हो रहा है. इसलिए मुझे लगा कि अब मुंह खोलना चाहिए कि मेरे साथ अत्याचार हुआ. मैं बताना चाहती हूं कि ये घिनौनी हरकत मेरे साथ हुई. एक बार नहीं, बार-बार हुई. मुझे नाम लेते हुए काफी डर लग रहा है क्योंकि मुझे मारने की धमकियां दी जा रही है. गैंगरेप की धमकियां मिल रही है. पुलिस स्टेशन में भी मैं शिकायत दर्ज करवा चुकी हूं.”

राखी ने कहा, “बहुत मी टू-मी टू हो रहा है. अब मैं चाह रही हूं कि शी टू हो. मैं बता दूं कि राखी सावंत का रेप बार-बार तनुश्री दत्ता ने किया. आपको हंसी आ रही होगी, अब आप बालेंगे कि ये कैसे हो सकता है? लेकिन धारा 377 कानून लागू हो चुका है. आप जानते हैं कि ही टू ही और शी टू शी. आपको क्या लगता है कि तनुश्री दत्ता ने बाल क्यों मुंडवाए. उसने मेरे लिए बाल मुंडवाएं. उसने मेरे प्राइवेट पार्ट छुए. वो अंदर से पूरा लड़का है. तनुश्री दत्ता आज से 12 साल पहले मेरी बेस्ट फ्रेंड थी. वो मुझे रेव पार्टियों में लेकर जाती थी और इसका फायदा उठाती थी.”

पेट्रोल से महंगा हो सकता है डीजल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत के साथ डीजल के मूल्य में वृद्धि लगातार जारी रही तो जल्द ही डीजल की कीमत पेट्रोल से अधिक हो जाएगी. फिलहाल पेट्रोल के मुकाबले डीजल पर टैक्स ज्यादातर राज्यों में काफी कम है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कीमतों में उछाल से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अंतर तेजी से कम होता जा रहा है.

इंडियन ऑयल के आंकड़ों के मुताबिक, डीलर मूल्य (बिना किसी टैक्स और डीलर कमीशन के) पर डीजल की कीमत पेट्रोल की तुलना में पांच रुपये छह पैसे प्रति लीटर अधिक है. लेकिन पेट्रोल के मुकाबले डीजल पर टैक्स और डीलर कमीशन 11 रुपये 58 पैसे प्रति लीटर कम है. इस कारण बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमत में अभी अंतर सिर्फ छह रुपये 52 पैसे प्रति लीटर (22 अक्तूबर के मूल्य के मुताबिक) है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कीमत बढ़ी तो यह फर्क और कम होगा.

तीन मानकों पर तय होता है दाम

सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां प्रतिदिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव करती है. यह दाम तीन आधार पर तय किए जाते हैं. पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत, दूसरा कच्चे तेल का आयात करते वक्त डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रोडक्ट (पेट्रोल-डीजल) का भाव. इंडियन ऑयल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कीमत पेट्रोल से अधिक है. इसलिए, डीलर मूल्य के डीजल के दाम पांच रुपये प्रति लीटर अधिक हैं.

डीजल का असर महंगाई पर

डीजल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर मंहगाई पर पड़ता है. इसके साथ किसानों की कृषि लागत भी बढ़ जाती है. देश में डीजल की कुल खपत का 70 प्रतिशत हिस्सा यातायात के लिए इस्तेमाल किया जाता है. डीजल के दाम बढने से सामान की ढुलाई मंहगी होती है, इससे चीजों के दाम बढ जाते हैं. वहीं, कुल खपत का 13% डीजल कृषि में इस्तेमाल किया जाता है.

ओडिशा में पेट्रोल से महंगा बिक रहा डीजल

ओडिशा में पेट्रोल से डीजल महंगे दाम पर बिक रहा है. राज्य में एक लीटर डीजल का दाम पेट्रोल के मुकाबले 12 पैसे अधिक है. राज्य में पेट्रोल का दाम बुधवार को 80.24 रुपये प्रति लीटर था और डीजल 80.38 रुपये प्रति लीटर. दूसरे राज्यों में पेट्रोल और डीजल पर वैट की दर अलग-अलग लगाई जाती है जबकि ओडिशा में दोनों ईंधनों पर 26 प्रतिशत की दर से वैट लगाया जाता है.

संघ को रिपोर्ट कर रहे हैं योगी सरकार के मंत्री

बेसिक शिक्षा, बाल विकास व पुष्टाहार राज्यमंत्री अनुपमा जायसवाल का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानि आरएसएस को लिखा पत्र उजागर हुआ है. जिसके बाद यह बात पुख्ता हो गई है कि योगी सरकार के मंत्री संघ को सीधे रिपोर्ट करते हैं. अनुपमा जायसवाल इस पत्र को फर्जी बता रही हैं. इस पत्र में अनुपमा जायसवाल ने देवरिया दौरे की रिपोर्ट संघ को भेजी है. पत्र आरएसएस के सह कार्यवाहक को लिखा गया है. पत्र में सरकार की प्राथमिकताओं और विकास कार्यक्रमों की प्रभावी मानिटरिंग की रिपोर्ट भी सलग्न कहने की बात हुई है.

modi government ministers reports to mohan bhagwat rss

अब इस पत्र की सच्चाई का पता लगाने की बात हो रही है. असल में पहली बार जनता के सामने ऐसा कोई लिखित प्रमाण भले ही आया हो पर जो लोग भाजपा सरकार के कार्यक्रमों को देखते और समझते हैं उनको साफ पता है कि संघ का भाजपा सरकार पर प्रभाव है. बिना संघ की मर्जी के टिकट वितरण से लेकर पदाधिकारियों की नियुक्ति तक कुछ भी संभव नहीं है. भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल को सबसे पावरपफुल माना जाता है.

2019 के चुनावों को लेकर लखनऊ के आनंदी पार्क में हुई बैठक में सरकार और संघ दोनों के प्रतिनिधि थे. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अलावा संघ के लोगों ने भी हिस्सेदारी की. भाजपा और संघ से जुडे 40 संगठनों के 300 से अध्कि पदाधिकारी मौजूद थे. ऐसे में मंत्री का संघ को रिपोर्ट करना कोई बडा मुद्दा नहीं है.

परेशानी वाली बात यह है कि भाजपा अभी तक अपनी सफाई में यह कहती रही है कि वह संघ के दबाव में काम नहीं करती. पहली बार जनता के सामने यह पत्र आया है. जिससे साफ पता चल रहा है कि मंत्री अपनी दैनिक रिपोर्ट संघ को भेजते हैं.

यह धार्मिक नक्सलवाद है

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण पूरे भक्ति भाव से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने छुए. गनीमत की बात यह रही कि श्रद्धा के अतिरेक में उन्होंनेयोगी के पांव धोकर पानी यानि चरणामृत नहीं पिया, नहीं तो देश में इस तरह के दृश्य भी आम हैं कि घर में आरओ या फिल्टर का पानी पीने वाले सभ्य शहरी भी बाबाओं, पंडों और संत महात्माओं के मैले कुचेले पैर धोकर गंदा पानी से हिचकते नहीं. तब इन्हें पेट के किसी इन्फेक्शन या एमीबायोसिस का डर नहीं लगता. गौरतलब है कि सितंबर के तीसरे हफ्ते में ही झारखंड के गोड्डा जिले में कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं ने सांसद निशिकांत दुबे के पैर धोकर पानी सरेआम पिया था.

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छोटी डिग्री वाले ही सही पेशे से डाक्टर रमन सिंह इस हद तक नहीं जा पाये तो इसकी दोषी कमबख्त मेडिकल की उनकी वह पढ़ाई रही होगी जिसमें यह बताया जाता है कि गंदे पानी में सैकड़ों तरह के बेक्टीरिया और वायरस होते हैं जो श्रद्धालु की भावनाओं से कोई इत्तफाक न रखते उन्हें बीमार करने का अपना धर्म निभाने में कोई चूक नहीं करते. हालांकि धर्म के मारे ये शिक्षित सीना ठोककर दलील दे सकते हैं कि फलां धर्म ग्रंथ में लिखा है कि संतों के पैरों का चमत्कारी पानी उनके तेज व तपस्या के चलते हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है.

इसके बाद भी रमन सिंह ने अपनी पत्नी और बेटे से आदित्यनाथ के पैर छुलाकार यह तो साबित कर ही दिया कि हिन्दू धर्म की मान्य परम्पराओं के सामने उनकी रीढ़ की हड्डी कुछ नहीं. आदित्यनाथ रायपुर गए थे रमनसिंह का नामांकन फार्म भरवाने लेकिन वहां खुद से सीनियर रमन सिंह जो उम्र में उनसे 20 साल छोटे हैं से अपने पैर पड़वाने में कोई हिचक नहीं हुई क्योंकि इससे ज्यादा उम्र के भी लोग उनके पैर पड़ते हैं.

इस पैर पड़ाई कार्यक्रम के पहले रमन सिंह ने बाकायदा विधि विधान से आदित्यनाथ का पूजन भी किया जिसके लिए पांच ब्राह्मण खासतौर से बुलाये गए थे. इसे इस साल का बेस्ट व्यक्तिपूजा का खिताब देना कोई हर्ज की बात नहीं. लोकतन्त्र में साधु संतों और महंतों के तो दूर की बात है धर्मभीरु नेता संपेरों और भगवा कपड़े वाले भिखारियों तक के पैर पड़ लेते हैं इससे पता चलता है कि उनमें इच्छाशक्ति नाम की कोई चीज नहीं होती.

रमन सिंह भले ही सार्वजनिक कर दिये गए उनके धार्मिक इवैंट को तरह तरह की लच्छेदार बातों से ढकने की कोशिश करते रहें लेकिन इसे छत्तीसगढ़ के स्वाभिमानी आदिवासियों के नजरिए से देखा जाये तो बात हजम नहीं होती. एक चुने गए मुख्यमंत्री को प्रदेश की जनता की भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए क्योंकि वह सभी का प्रतिनिधित्व करता है. आदिवासियों में पैर पड़ने का रिवाज नहीं है. बड़ों या दूसरों का सम्मान करने के उनके अपने तौर तरीके हैं जिनमें अभिवादन प्रमुख है.

इसमें कोई शक नहीं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा संकट में है उसकी जीत अब पहले की तरह गारंटेड नहीं रह गई है लेकिन अगर आदित्यनाथ के पैर पड़ने से सफलता मिलती हो तो शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे को भी पार्टी निर्देशित कर जीत सुनिश्चित कर सकती है कि खामोख्वाह पसीना बहाने की जरूरत नहीं असली जनार्दन जनता नहीं योगी आदित्यनाथ हैं इसलिए उनके पैर पड़ने का शार्टकट अपनाया जाये जो गणेश ने पार्वती की परिक्रमा कर अपनाया था.

बकौल रमन सिंह आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की नहीं बल्कि संत की भूमिका में आए थे तो उन पर और भी तरस खाया जा सकता है कि संत महंतों को कब से सरकार हवाईजहाज और रेल किराए का खर्च देने लगी और क्यों उनकी खिदमत में सारा सरकारी अमला लगाया गया था. सिर्फ एक ही लिहाज से उनकी यह दलील ठीक थी कि उत्तरप्रदेश में भी आदित्यनाथ महंत की भूमिका में ज्यादा रहते हैं और पाठ शालाओं के बजाय गौ शालाओं पर ज्यादा ज़ोर देते हैं.

दरअसल में यह ड्रामा जानबूझ कर किया गया था जिससे खुलेआम पुरोहितवाद दिखे, हिन्दुत्व चमके और भगवाधारियों की पूछ परख बढ़े. भाजपा के इस खुले एजेंडे से आम लोगों को कुछ हासिल नहीं होना है जिन्हें बड़े बड़े सब्जबाग ये नेता दिखाते हैं लेकिन आखिर में पंडों महंतों और बाबाओं के पैरों में लोट लगाते नजर आते हैं.

यह लोकतन्त्र का सबसे वितृष्णा भरा दौर है जब किसी सांसद के पैर धोकर गंदा पानी पिया जाता है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अवतार बताया जाता है और एक गैर महंत मुख्यमंत्री दूसरे महंत मुख्यमंत्री के पैर छूकर ऐसे गदगद हो उठता है मानो साक्षात विष्णु या शंकर सामने आ गया हो. इस खेल या प्रक्रिया में विकास या जनहित कहीं नहीं होता. रमन सिंह इतने कमजोर व्यक्ति हैं इसका अंदाजा अब जाकर लोगों को हो रहा है कि उनके रूआबदार चेहरे पर जो लाली दिखती है वह पुराने सामाजिक उपन्यासों के उधर के सिंदूर की तरह है.

रही बात आदित्यनाथ की तो उनका तो मकसद ही पंडा पुरोहितवाद फैलाना और हिन्दुत्व थोपना है इसलिए वे शहरों के नाम बादल रहे हैं, तीर्थयात्रियों पर खजाना लुटा रहे हैं, राम मंदिर निर्माण का जिन्न बाहर निकाल रहे हैं. ऐसी कई और बातों के चलते उत्तरप्रदेश फिर सत्तर के दशक में जाता दिख रहा है जहां धर्म और जाति के नाम पर दबंगाई और गुंडयाई होती है और दबे कुचले छोटी जाति बाले वहाँ से मुंबई या अहमदाबाद जैसी जगहों में भागकर जैसे तैसे चार दिन की ज़िंदगी गुजारने की बात सोचने लगते हैं. अफसोस की बात तो यह है कि प्रदेश और देश की तरक्की की इबारत अपनी मेहनत से लिखने बाले इन गरीब गुरबों को वहां से भी खदेड़ा जाने लगा है.

अब, सबसे बढ़िया छतीसगढ़िया का नारा देने बाले रमन सिंह को सोचना चाहिए कि संतों महंतों के पैर पड़ने से जनता बढ़िया नहीं साबित होने बाली और न ही इन सनातनी टोटकों से उसका भला होने बाला इसलिए गरीब आदिवासियों को तो उनके राज्य में गैरत से रहने दिया जाये और इस धार्मिक नक्सलवाद से छतीसगढ़ की जनता की किस्मत न लिखी जाये.

क्रिकेट ने बदल दी इन खिलाड़ियों की जिंदगी

दुनिया के हर क्षेत्र की तरह ही क्रिकेट में भी कई हरफनमौला खिलाड़ी हैं जो न केवल शानदार क्रिकेट खेलते हैं बल्कि दुनिया की बाकी शैलियों में भी माहिर हैं. जानिए ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों के बारे में जिनकी जिंदगी क्रिकेट खेलने के बाद पूरी तरह बदल गई.

नेथन एस्टल

90 के दशक में नेथन एस्टल को न्यूजीलैंड का सबसे आक्रामक और भरोसेमंद बल्लेबाज माना जाता था. वनडे और टेस्ट क्रिकेट दोनों में ही न्यूजीलैंड को अच्छी शुरूआत देने के लिए मशहूर एस्टल ने सबसे कम गेंदों में दोहरा शतक जड़ने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है लेकिन गिरती फॉर्म ने उन्हें टीम से बाहर कर दिया.

हालांकि 2012 में क्रिकेट से संन्यास के बाद उन्होंने रेसर बनने का फैसला किया. वे कई कार चैंपियनशिप में भी हिस्सा ले चुके हैं और 2012 में साउथ आइलैंड चैंपियनशिप में तीसरा स्थान हासिल कर चुके हैं.

सलिल अंकोला

सलिल अंकोला ने सचिन तेंदुलकर और वकार यूनिस के साथ ही अपने क्रिकेट करियर की शुरूआत की थी. 1989 में अपने टेस्ट करियर का पर्दापण करने वाले सलिल चोट और खराब गेंदबाजी की वजह से जल्द ही भारतीय टीम से बाहर हो गए थें.

क्रिकेट से निकलने के बाद उन्होंने टीवी और फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने की ठानी. संजय दत्त के साथ कुरूक्षेत्र फिल्म में काम कर चुके सलिल ने 2006 में बिग बॉस में भी हिस्सा लिया था. 2008 में उन्हें शराब और तनाव के चलते नशा मुक्ति केंद्र भेजा गया था. उनकी लत के चलते 2010 में अंकोला की पत्नी ने उन्हें तलाक दे दिया और वे एक बार फिर रिहाब का चक्कर लगाकर आए. 2013 में सलिल ने एक बार फिर शादी कर ली थी.

एडम हौलेयोके

14 साल पहले इंग्लैंड वन डे टीम के कप्तान रहे एडम हौलेयोके ने 2012 में अर्श से फर्श तक का सफर तय किया था. 2012 में एडम कोर्ट के सामने पेश हुए थे. उन पर करोड़ो का कर्ज था क्योंकि उन्होंने प्रॉपर्टी के बिजनेस में गंवा दिया था. पूरी तरह से आर्थिक खात्मे की ओर बढ़ रहे हौलेयोके ने स्ट्रीट फाइटिंग में किस्मत आजमाने का फैसला किया है ताकि जबरदस्त कर्जे में डूबे एडम कुछ पैसा बना सकें.

अजीत अगरकर

भारत के सबसे सफल तेज गेंदबाजों में शुमार अजीत अगरकर ने अपनी विकेट लेने की क्षमता की वजह से जवागल श्रीनाथ और वेकंटेश प्रसाद जैसे गेंदबाजों की मौजूदगी में भारतीय गेंदबाजी को धार देने का काम किया था. 2003 में एडिलेड में हुए ऐतिहासिक मैच में अगरकर ने राहुल द्रविड़ के साथ मिलकर भारत को जीत दिलाई थी.

हालांकि अगरकर हमेशा विवादों से दूर ही रहे और जहीर खान और आशीष नेहरा के आगमन के साथ ही उन्हें धीरे धीरे भुलाया जाने लगा. अगरकर हालांकि एक्सपर्ट के तौर पर टीवी पर गाहे बगाहे दिखाई दे जाते हैं लेकिन अब उन्होंने फुल टाइम गोल्फर बनने का निर्णय कर लिया है.

एंड्रयू फ्लिंटॉफ

इंग्लैंड टीम के महान ऑलराउंडर में शुमार एंड्रयू फ्लिंटॉफ का एक सफल क्रिकेट करियर के बाद भी खेलों के प्रति रुझान कम नहीं हुआ और क्रिकेट के बाद वे बॉक्सिंग में हाथ आजमाने लगें. उन्होंने बॉक्सिंग के क्षेत्र में भी प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए अमेरिका के रिचर्ड डॉसन को मात दी थी.

यही नहीं मशहूर स्काई टीवी ने भी फ्लिंटॉफ के क्रिकेट से लेकर बॉक्सिंग की इस पूरी यात्रा को एक स्काई टीवी डॉक्यूमेंट्री के तौर पर रिलीज किया है. फ्लिंटॉफ केवल क्रिकेट के मैदान पर ही नहीं बल्कि रियल लाइफ में भी आलराउंडर है और बॉक्सिंग के अलावा वे चार किताबें भी लिख चुके हैं.

कर्टली एंब्रोस

90 के दशक में बल्लेबाजों के लिए आतंक का पर्याय बने वेस्टइंडीज के महान गेंदबाज कर्टली एंब्रोस से उनके प्रशंसकों को उम्मीद थी कि वे संन्यास के बाद वे क्रिकेट से कमेंटरी या एक्सपर्ट के तौर पर जुड़ें रहेंगे लेकिन एंब्रोस ने कुछ हटकर फैसला लेते हुए संगीत की दुनिया में जाने का फैसला किया और अपने म्यूजिक बैंड ‘ड्रेड एंड द बॉलहेड’ की शुरूआत की. वे एंटीगा और बारबुडा में अपने बैंड के साथ अक्सर परफॉर्म करते हैं.

क्रिस लेविस

इंग्लैंड के पूर्व प्रतिभाशाली खिलाड़ी क्रिस लेविस (जिन्हें भविष्य का इयान बॉथम माना जा रहा था) ने 53 वन डे और 32 टेस्ट में इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व किया था. लेकिन लेविस की जिंदगी ने जबरदस्त मोड़ लेते हुए उन्हें एक ड्रग स्मग्लर बना दिया. 2009 में उन्हें कोकेन की तस्करी करने पर 13 साल की सजा सुनाई गई. कोकेन का यह पैकेट लेविस अपने फ्रूट जूस के टिन में छुपाकर इसे अपने क्रिकेट बैग में डाले हुए थें.

ब्रायन स्ट्रैंग

ओलोंगा की तरह ही ब्रायन स्ट्रैंग भी जिंबाब्वे के प्रमुख गेंदबाजों में शुमार थे. हालांकि जिंबाब्वे के बिगड़ते हालातों को देखते हुए वे क्रिकेट से कुछ साल दूर चले गए और फिर 2003 में उन्होंने एक बार क्रिकेट में वापसी करने की कोशिश की थी. हालांकि उनका करियर परवान नहीं चढ़ पाया और उन्होंने अपनी जिंदगी को एक योगी बनकर बिताने का फैसला किया. स्ट्रैंग अब भारत समेत कई देशों में घूम घूमकर लोगों को योगा सीखा रहे हैं और स्ट्रैंग अब फुल साइकेडेल्कि ट्रिप में चले गए हैँ.

क्रिस केंयर्स

क्रिस केंयर्सन्यूजीलैंड के महान ऑलराउंडरों में शुमार क्रिस केंयर्स की जिंदगी अपने करियर के ढलान तक आते आते पूरी तरह से बदल चुकी थी. साथी खिलाड़ी ब्रैंडन मैक्कलम, मैच फिक्सिंग में अपनी भूमिका मान चुके लू विसेंट और ललित मोदी यह मान चुके थे कि केंयर्स ने 2008 में मैच फिक्स करने की कोशिश की थी. क्रिस की आर्थिक हालत ज्यादा बेहतर नहीं है और वे अक्सर ट्रक चलाकर अपना पेट पाल रहे हैं.

हेनरी ओलोंगा

90 के दशक में हेनरी ओलोंगा जिंबाब्वे के पहले अश्वेत क्रिकेटर थें और अपनी शानदार गेंदबाजी से वे जल्दी ही टीम के सबसे मुख्य गेंदबाज बन गए थें. सचिन तेंदुलकर को एक बार आउट कर ओलोंगा रातों रात सुर्खियों में आ गए थें. 2003 विश्व कप के दौरान उन्होंने और एंडी फ्लावर ने अपने देश में हो रही लोकतंत्र की हत्या को देखते हुए काला पट्टा बांधकर मैच खेला था. उनके इन बागी तेवरों को देखते हुए उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिलती रही. संन्यास के बाद ओलोंगा इंग्लैंड आ गए और यहां आकर उन्होंने गाना गाने की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी. उन्होंने अपना पॉप एल्बम भी जारी किया है.

हमसफर (अंतिम भाग) : पूजा के लिए क्या थे विवाह के मायने

अब तक आपने पढ़ा
शादी में बस चंद दिन ही बचे थे तब राहुल ने पूजा को बताया कि वह एच.आई.वी. पोजिटिव है. एड्स से ग्रसित वह धीरेधीरे मौत के करीब जा रहा है. 2 वर्ष पहले एक एक्सीडेंट के बाद इलाज के दौरान डाक्टरों की लापरवाही से उसे संक्रमित खून चढ़ा दिया गया था.

पूजा राहुल को आश्वासन देती है कि वह सब असलियत जान कर भी शादी कर उस की हमसफर जरूर बनेगी और साथ ही राहुल से वचन लेती है कि अपनी बीमारी को घरवालों से राज रखेगा. राहुल के यह कहने पर कि बीमारी को लोगों से छिपाना आसान नहीं होगा, तो पूजा का जवाब था कि ‘शादी के बाद वह सब देखना मेरा काम होगा. लोगों को क्या जवाब देना है, यह भी मैं ही देखूंगी.’

एक सप्ताह बाद दोनों की शादी हो जाती है. इस शादी के पीछे का भयानक सच उन दोनों के अलावा शादी में शामिल कोई भी तीसरा नहीं जानता था. अग्नि के फेरे लेते हुए दोनों के मस्तिष्क में बहुत कुछ चल रहा था लेकिन वे चेहरे से एकदम सामान्य दिख रहे थे.
अब आगे…

पूजा की डोली ससुराल आई.

ससुराल में आते ही पूजा औरतों में घिर गई थी. शादी के बाद की रस्में जो पूरी की जानी थीं.

शादी के बाद राहुल और पूजा के पहले इम्तिहान की घड़ी सुहागरात थी. रस्मों के पूरा होने के बाद हंसी- ठिठोली करती पूजा की ननद रेखा और उस की कुछ सहेलियों ने उन दोनों को सुहागरात वाले कमरे के अंदर धकेल दिया था.

अकेले पड़ते ही दोनों ने एकदूसरे को देखा. सुहागरात का अर्थ दोनों ही समझते थे मगर उन दोनों को इस बात का भी एहसास था कि वह आम पतिपत्नियों जैसे नहीं थे.

सुहाग सेज पर गुलाब के फूलों की पंखडि़यां बिखरी हुई थीं. इन पंखडि़यों को सुबह तक वैसा ही रहना था, क्योंकि जिस उद्देश्य से उन को सेज पर बिखेरा गया था उस उद्देश्य की पूर्ति उन के लिए वर्जित थी. ‘‘तुम ने मेरे साथ शादी कर के अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है,’’ अपनी कशमकश के बीच खालीखाली उदास नजरों से पूजा को देखते हुए राहुल ने कहा.

‘‘लेकिन मुझ को अपने फैसले पर कोई अफसोस नहीं,’’ पूजा ने कहा. ‘‘क्या इस सुहागरात का हमारे लिए कोई मतलब है?’’

‘‘क्यों नहीं है? क्या एक दंपती के संपूर्ण जीवन का आधार केवल सेक्स ही है? क्या सेक्स के बगैर स्त्रीपुरुष के विवाहित संबंधों का कोई अर्थ नहीं रह जाता? मैं इस को नहीं मानती. सेक्स पतिपत्नी के रिश्ते का एक हिस्सा है. इस के बिना भी रिश्ते को निभाया जा सकता है, क्योंकि सेक्स से ही संपूर्ण रिश्ता नहीं बनता. जैसे शरीर के किसी एक अंग को अलग कर देने से इनसान मर नहीं जाता, उसी तरह पतिपत्नी के रिश्ते में से सेक्स को अलग करने से रिश्ते की मौत भी नहीं होती. हम दोनों तो सच को जानते हुए ही इस रिश्ते में बंधे हैं. सेक्स संपर्क के बगैर भी हम इस रात को आनंदमय बनाएंगे. यह हम दोनों के लिए ही पहली परीक्षा है और हमें बिना किसी भय और निराशा के इस परीक्षा की अग्नि में से तप कर बाहर निकलना ही होगा.’’

यह कहते हुए शादी के लाल जोड़े में लिपटी हुई पूजा ने एड्स से पीडि़त अपने पति का सिर अपने सीने पर रख लिया. ऐसा करते हुए उस के चेहरे पर जरा सा भी डर और घबराहट न थी. मन को जिस आनंद की अनुभूति हो रही थी वह शरीर के आनंद से कम नहीं थी. सुहागरात उन दोनों ने एकदूसरे से बहुत सी बातें करते हुए बिता दी. पतिपत्नी के बजाय एक दोस्त की तरह उन को एकदूसरे को अधिक जानने का मौका मिला.

पूजा राहुल के मस्तिष्क को मृत्युभय से मुक्त कर के उस के भीतर एक नया विश्वास जगाने में सफल रही. सुबह की किरण फूटने से कुछ देर पहले ही दोनों की आंख लग गई.

पूजा की आंख खुली तो सुबह के 8 बज रहे थे. रोशनी काफी फैल चुकी थी. राहुल अभी भी सो रहा था.

पूजा दर्पण के सामने खड़ी हो खुद को निहारने लगी. उस का दुलहन वाला मेकअप वैसे का वैसा ही था. वस्त्रों पर सलवटें भी नहीं आई थीं. कलाइयों में पड़ी कांच की चूडि़यां भी वैसी की वैसी ही थीं. कमरे के अंदर क्या हुआ था वह उन दोनों के बीच का राज था. मगर सब को ऐसा लगना तो चाहिए कि उन्होंने सुहागरात मनाई थी.

यह सोच कर पूजा ने पहले अपने बंधे हुए जूड़े को खोला और फिर उस को बेतरतीब से दोबारा बांधा. होंठों की लिपस्टिक की गाढ़ी लाल रंगत को फीका करने के लिए इस तरह से उस को साफ किया कि वह थोड़ी सी होंठों के इर्दगिर्द बिखर जाए. अपनी दोनों कलाइयों में पड़ी कांच की कुछ चूडि़यों को अपनी उंगलियों के दबाव से चटख कर तोड़ डाला. ऐसा करते वक्त एक चूड़ी का तीखा कांच उस की कलाई में चुभ भी गया. पूजा ने टूटी कांच की चूडि़यों के टुकड़ों को बिस्तर पर बिखेर दिया, इतना ही नहीं, बिस्तर पर बिखरी फूलों की पत्तियों को भी उस ने हथेली से मसल डाला.

सब तरह से संतुष्ट होने के बाद पूजा कमरे का बंद दरवाजा खोल कर बाहर निकल आई. कमरे से बाहर पूजा का सब से पहले सामना अपनी ननद रश्मि से हुआ. रश्मि की आंखों में अर्थभरी शरारत थी जोकि रिश्ते के हिसाब से स्वाभाविक थी.

‘‘गुडमार्निंग, भाभी,’’ रश्मि ने कहा, ‘‘आप की आंखें गुलाबी हो रही हैं, लगता है भैया ने काफी परेशान किया है रात को?’’ ननद रश्मि के ऐसा कहने पर पूजा ने पहले तो लजाने का नाटक किया फिर प्यार से उस के गाल पर हलकी सी चपत लगाती हुई बोली, ‘‘चुप, बच्चे इस तरह के सवाल नहीं पूछते.’’

ननद रश्मि के साथ ही पूजा अपने सासससुर के कमरे में पहुंची और अपने सिर को साड़ी के पल्लू से ढकते हुए बारीबारी से उन दोनों के पांव छुए. पांव छूने पर आशीर्वाद देती हुई पूजा की सास शकुंतला ने उस को अपने सीने से लगा लिया और बोलीं, ‘‘सुहागवती रहो, बहू. जल्दी ही तुम्हारी गोद भरे और मैं पोते की खुशी देखूं.’’

शादी के बाद दिन आगे को सरकने लगे. बीतने वाला हर लम्हा जैसे कीमती था. राहुल के जीवन की डोर हर बीतते हुए लम्हे के साथ छोटी हो रही थी.

पूजा बीतते हर लम्हे को इतने सुख और खुशियों से भर देना चाहती थी कि आने वाली मौत की आहट राहुल को सुनाई न दे. शारीरिक सुख के अलावा एक अच्छी पत्नी के रूप में जीवन के सारे सुख पूजा राहुल को देना चाहती थी. वह उस की इतनी सेवा करना चाहती थी कि बाद में किसी बात पर पछताना न पड़े.

पूजा की सेवा और समर्पण के भाव को राहुल खामोशी से देखता और कहता, ‘‘मेरी जिंदगी का सफर ज्यादा लंबा नहीं. इस में हमसफर बनते हुए गलती से भी मुझ से मोह मत कर बैठना, वरना बाद में बड़ी तकलीफ होगी.’’ ‘‘मैं जानती हूं कि मैं क्या कर रही हूं और आगे क्या होने वाला है. किंतु इस तरह की बातें कर के मुझ को कमजोर मत बनाओ, राहुल.’’

शादी के 5 माह बाद अचानक ही राहुल की सेहत तेजी से गिरनी शुरू हो गई. राहुल का वजन कम हो रहा था. उस के चेहरे की जर्दी बढ़ रही थी और यह देख कर घर के लोग परेशान थे. ‘‘राहुल की सेहत लगातार खराब हो रही है बहू, पता नहीं क्या बात है. वह काफी लापरवाह किस्म का इनसान है. तुम ही उसे किसी अच्छे डाक्टर को दिखलाओ,’’ आखिर एक दिन सास शकुंतला ने पूजा को कह ही दिया. उस के कहने के अंदाज से पता चलता था कि वह बेटे की गिरती सेहत को स्त्रीपुरुष के सेक्स संबंधों से जोड़ कर देख रही थीं.

पूजा को इस से हैरानी नहीं हुई थी. वह जानती थी कि राहुल की गिरती सेहत को देख कर लोग ऐसा ही सोच सकते थे. अब किसी को क्या मालूम अधिक सेक्स तो एक तरफ, उन में तो सेक्स संबंध बना भी नहीं था.

अपने सारे मनोभावों को छिपाते हुए पूजा ने सास से कहा, ‘‘आप ठीक कह रही हैं मांजी, मैं कल ही इन्हें किसी अच्छे डाक्टर को दिखलाने ले जाऊंगी.’’ अगले दिन राहुल को साथ ले कर किसी डाक्टर के पास जाने का दिखावा करती हुई पूजा घर से बाहर निकली. किंतु किसी डाक्टर के यहां जाने के बजाय उन्होंने 2-3 घंटे एक मौल में बिताए.

थकावट होने पर उन दोनों ने मौल के रेस्तरां में बैठ कर कोल्ड डिं्रक पी और साथ में हलका सा फास्ट फूड भी लिया. रेस्तरां में बैठे थकीथकी आंखों से पूजा को देखते हुए राहुल ने कहा, ‘‘हम जो कर रहे हैं क्या वह अपनों के साथ धोखा नहीं?’’

‘‘नहीं, मैं नहीं मानती कि हम किसी को कोई धोखा दे रहे हैं,’’ पूजा ने जवाब दिया. ‘‘एड्स से रोजाना दुनिया में सैकड़ों लोग मरते हैं. अगर मैं भी मर जाऊंगा तो कौन सी अनोखी बात होगी? मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम मेरी बीमारी को छिपा कर क्यों रखना चाहती हो? एकदम से मेरी मौत के सदमे को झेलने से बेहतर होगा कि हकीकत को जान कर मां, बाबूजी, रश्मि और दूसरे लोग मेरी मौत के सदमे को झेलने के लिए खुद को पहले से ही तैयार कर लें.’’ राहुल ने भारी आवाज में कहा.

‘‘मैं भी ऐसा ही चाहूंगी. मगर तुम को एड्स है, मैं ऐसा कभी जाहिर नहीं होने दूंगी. ऐसी दूसरी लाइलाज बीमारियां भी तो हैं जिन से इनसान की मौत यकीनी होती है, जैसे कैंसर. किंतु कैंसर की मौत एड्स से होने वाली मौत से कहीं अधिक सम्मानजनक है. कैंसर डरावना है और एड्स बदनाम. एड्स के बारे में लोगों में अनेक गलतफहमियां हैं. इसलिए कैंसर से तो केवल इनसान मरता है लेकिन एड्स से मरने वाले इनसान के परिवार की उस के साथ ही सामाजिक मौत हो जाती है. एड्स से मरने वाले इनसान के परिवार को लोग शक और घृणा की नजरों से देखते हुए एक तरह से उस का सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं. मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे बाद तुम्हारे अपनों के साथ कुछ ऐसा हो. एक एड्स संक्रामक व्यक्ति की पत्नी होने के कारण समाज में मेरी क्या स्थिति होगी इस की शायद तुम ठीक से कल्पना भी नहीं कर सकते. हमारे विवाहित जीवन के अंदरूनी सच को दुनिया तो नहीं जानती. मैं एक शापित जीवन बिताऊं, ऐसा तो तुम भी नहीं चाहोगे,’’ राहुल का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूजा ने कहा.

राहुल की समझ में आने लगा था कि पूजा उस की बीमारी को किन कारणों से छिपा कर रखना चाहती थी. उस की सोच में केवल आज नहीं, आने वाला कल भी था.

जैसेजैसे वक्त करीब आ रहा था राहुल अंदर से टूट रहा था. अपने प्यार से पूजा टूट रहे राहुल को सहारा देने की कोशिश करती. डाक्टर को दिखलाने की बात कह कर पूजा राहुल को साथ ले कर घर से बाहर जाती. किसी पार्क या रेस्तरां में 2-3 घंटे बिता कर दोनों वापस आ जाते. राहुल एड्स की दवाएं ले रहा था, मगर वे बेअसर हो रही थीं.

ऐसी स्थिति बन रही थी कि पूजा को लग रहा था कि उस को राहुल की बीमारी को ले कर एक और झूठ बोलना ही होगा. एक रोज मांजी ने पूजा को हाथ से पकड़ अपने पास बिठा लिया और बोलीं, ‘‘राहुल की यह कैसी बीमारी है बहू जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही? तुम जरूर मुझ से कुछ छिपा रही हो. मुझ को किसी धोखे में मत रखो. मैं राहुल की बीमारी का सच जानना चाहती हूं.’’

‘‘मैं आप से कुछ भी छिपाना नहीं चाहती, मांजी, लेकिन सच बड़ा ही निर्मम और कठोर है. आप सुन नहीं सकेंगी. आप के बेटे को कैंसर है,’’ हिम्मत कर के पूजा को जो कहना था उस ने कह दिया. उस के शब्द जैसे बम बन कर मांजी के सिर पर फूटे. सदमे में अपना माथा पकड़ते हुए वह सोफे पर लुढ़क सी गईं.

उधर सच को छिपाने के लिए पूजा ने जो झूठ बोला उस का चेहरा छिपाए गए सच से कम डरावना नहीं था. पूजा के द्वारा राहुल की बीमारी को कैंसर बतलाने के बाद घर का सारा माहौल ही गमगीन और मातमी हो गया था.

मांजी, बाबूजी और रश्मि की आंखों में से बहने वाले आंसू जैसे थम नहीं रहे थे. कोई ठीक से खा नहीं रहा था. कैंसर का भी दूसरा नाम मौत ही तो था. जब मौत का पहरा बैठ गया हो तो किसी को चैन कैसे आ सकता था? अंत शायद बहुत करीब था. राहुल का शरीर इतना कमजोर हो गया था कि कई बार बाथरूम तक जाने के लिए उसे पूजा के सहारे की जरूरत पड़ती.

पूजा किसी तरह भी कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी. हालांकि राहुल की बातें कभीकभी उस को कमजोर करने की कोशिश जरूर करती थीं. मांजी और बाबूजी बेटे की हालत देख उस को किसी अस्पताल में दाखिल कराने की बातें करते.

लेकिन पूजा इस से मना कर देती. ‘‘इस से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि कैंसर अपने अंतिम स्टेज में है. अस्पताल में रेडियो थेरैपी से इन की जिंदगी और ज्यादा कष्टपूर्ण हो जाएगी. मैं ऐसा नहीं चाहती,’’ पूजा उन से कहती.

राहुल की अंदर को धंसती निस्तेज आंखें और पीला चेहरा खामोश जबान में बतलाने लगे थे कि उस के जीवन की टिमटिमाती लौ किसी भी घड़ी बुझ सकती थी. एक रात अचानक राहुल ने पूजा के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए वे शब्द कहे तो पूजा को लगा वह घड़ी कुछ फासले पर ही है.

‘‘शायद मेरा वक्त आ गया है मेरे हमसफर. मेरी जिंदगी के उदास सफर में हमसफर बनने के लिए शुक्रिया. दुनिया और समाज कुछ भी समझे, मगर हम दोनों जानते हैं कि हमारे बीच में पतिपत्नी नहीं, दो इनसानों का रिश्ता है. इसलिए मेरे मरने के बाद कभी अपनेआप को विधवा मत मानना. अपने लिए जो भी विकल्प ठीक लगे उसी को चुनना.’’ राहुल के उक्त शब्द पूजा के मर्म को चीर गए.

बड़ी मुश्किल से उस ने खुद को संभाला था. राहुल ने पूजा से कमरे की खिड़की खोलने का अनुरोध किया और यह भी कहा कि वह उस के पास बैठी रहे. खिड़की के बाहर चांद चमक रहा था. रात ढल रही थी.

राहुल की बेचैनी भी लगातार बढ़ रही थी. पूजा हौसला देने वाले अंदाज से बीचबीच में उस के ललाट पर अपना हाथ फेर देती थी. डाक्टर के बताए अनुसार उस ने राहुल को दवा दी तो उस ने आंखें बंद कर लीं.

बैठेबैठे ही न जाने कब पूजा को कुछ मिनटों के लिए नींद की झपकी आ गई. झपकी जब टूटी तो सब खत्म हो चुका था. राहुल की खुली आंखें पथरा चुकी थीं.

सवाल : ‘नव हिंदुत्व’ से आखिर कैसे निबटेंगे

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने ‘दलितब्राह्मण’ समीकरण को सामने रख कर चुनाव लड़ा था. तब उसे मनचाही कामयाबी नहीं मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा अपने पुराने मुद्दों पर वापस जाती दिख रही है. लखनऊ के कार्यकर्ता सम्मेलन में बसपा नेताओं ने कहा, ‘मंदिरों में ताकत होती तो लोग मंदिर छोड़ कर मुख्यमंत्री नहीं बनते. ताकत केवल राजनीति में होती है, इसलिए अपनी ताकत पहचानो और उस का इस्तेमाल करो. उमा भारती और दूसरी साध्वी राजनीति कर रही हैं और हम को कहा जा रहा है कि मंदिर जाओ. हमारी पार्टी की मुखिया मायावती ही जीवित देवी हैं. हमारा रिजर्वेशन कांशीराम और मायावती के चलते ही सुरक्षित है.’ ये मुद्दे 2007 से पहले बसपा उठाती रही है.

दलित चिंतक चौधरी जगदीश पटेल कहते हैं, ‘‘बसपा ने दलित मुद्दों से पार्टी को अलग कर दिया था. वह ब्राह्मणों के दबाव में आ गई थी. पार्टी ने रूढि़वादी विचारधारा की आलोचना बंद कर दी थी. इस का फायदा उठा कर भाजपा ने दलितों को नवहिंदुत्व का पाठ पढ़ाना शुरू किया, जिस से पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ी तादाद में दलितों के वोट मिले थे. ‘‘सपा की मुश्किल यह है कि एक तरफ हिंदुत्व की आलोचना खुल कर नहीं कर पा रही है, वहीं दूसरी तरफ दलितों को मंदिर और पूजापाठ से दूर भी रखना चाहती है. ये दोनों काम एकसाथ मुमकिन नहीं हैं. धार्मिक कट्टरपन पहले से ज्यादा बढ़ गया है. ऐसे में बसपा दोराहे पर खड़ी है. वह पहले की तरह मनुवाद की आलोचना नहीं कर पा रही है.

‘‘अगर दलित हिंदुत्व की राह पर रहे हैं तो वे भाजपा से दूर नहीं हो पाएंगे. जब तक दलित हिंदुत्व से दूर नहीं होंगे तब तक धर्म के नाम पर उन को भाजपा से अलग करना मुमकिन नहीं है. ‘‘बसपा मनुवाद की बुराई कर के हिंदुत्व को नाराज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.’’

रिटायर्ड आईपीएस और उत्तर प्रदेश स्वराज समिति के सदस्य आरएस दारापुरी कहते हैं, ‘‘बसपा के समय में ही दलित आंदोलन कमजोर हो गया था. बाबा साहब हमेशा कहते थे कि हिंदू राष्ट्र समाज के लिए घातक होगा. यहां पर शंबूक और बाली की तरह लोगों के वध होंगे. सीता की तरह औरत के साथ नाइंसाफी होगी. ‘‘बाबा साहब हमेशा देश में हिंदू राष्ट्र की स्थापना का विरोध करते थे. कांशीराम आंदोलन की जगह पर उस तरह काम करते थे जिस में दलित कमजोर बन कर उन के पीछेपीछे चलता रहे. इस वजह से आज भी दलित मुखर हो कर अपनी बात नहीं कह पा रहा है.

‘‘आज वह फिर से बसपा का साथ छोड़ ऊंची जातियों की अगुआई करने वालों के पीछे खड़ा हो गया है. इस के साथ भाजपा ने दलित नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया इसलिए दलित चुप है. उस को समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे?’’ बसपा ‘दलितमुसलिम’ गठजोड़ का भी इस्तेमाल करना चाहती है. यहां भी उस की मजबूरी यह है कि मुसलिम के साथ नवहिंदुत्व का शिकार दलित खड़ा होगा या नहीं.

2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने ‘दलितमुसलिम’ गठजोड़ का जो प्रयोग किया वह बैकफायर कर गया था. ऐसे में बसपा लोकसभा चुनाव में इसे आजमाने का खतरा उठाने से डर रही है. उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस व उत्तर प्रदेश के बाहर कांग्रेस से बसपा समझौता कर सकती है, जिस तरह से कर्नाटक चुनाव के बाद सरकार बनाने में मायावती ने अहम भूमिका निभाई और कांग्रेस के करीब आई. इस से यह बात मजबूत होती है कि लोकसभा चुनाव में मायावती की अहमियत बढे़गी.

भोजपुरी फिल्मों में चमकी सादा हीरोइनें

भोजपुरी फिल्मों का मुकाबला सीधे हिंदी फिल्मों से है. ऐसे में इन की लोकप्रियता दूसरी क्षेत्रीय बोली की फिल्मों से ज्यादा है. पहले हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए ज्यादातर कलाकार लड़केलड़कियां हिंदी बोली वाले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश से आते थे. हीरोहीरोइन बनने के सपने देखने वाले सभी कलाकार हिंदी फिल्मों में काम नहीं पाते. लड़के हीरो की जगह पर दूसरे काम करने लगते थे. लड़कियां भी वापस घर आ जाती थीं. पर जब से भोजपुरी फिल्में बनने लगी हैं, छोटे शहरों की वे लड़कियां जो हीरोइन बनने के सपने देखती थीं, अब फिल्मी परदे पर चमकने लगी हैं. इन में से कई आज भोजपुरी फिल्मों की स्टार बन गई हैं.

पटना से अक्षरा सिंह, इलाहाबाद से पूनम दुबे, चंडीगढ़ से कल्पना शाह, हरदोई से अंजना सिंह, भोपाल से गुंजन पंत, आजमगढ़ से सनी सिंह जैसे कई नाम इस लिस्ट में शामिल हैं. छोटे शहरों से आने वाली लड़कियों में से ज्यादातर ने ऐक्टिंग की कोई क्लास नहीं की होती है. हां, बहुतों ने स्कूल में होने वाले नाटकों में हिस्सा लिया होता है. वहीं से वे ऐक्टिंग की दुनिया में कदम रखने आ जाती हैं.

आजमगढ़ की सनी सिंह ने बताया, ‘‘मुझे कई दोस्त कहते थे कि मेरी शक्ल अच्छी है, मैं हीरोइन बन सकती हूं. ऐसे में मैं ने घर वालों से बात कर के फिल्मों में कदम रखा. धीरेधीरे मुझे काम मिलना शुरू हुआ और मेरी एक पहचान बन गई. ‘‘आज भोजपुरी फिल्मों के दर्शक मुझे बहुत पसंद करते हैं. अगर भोजपुरी फिल्में नहीं होतीं तो शायद मुझे इतना जल्दीकाम मिलना शुरू नहीं होता.’’

हरदोई उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा पिछड़ा जिला है. यहां की रहने वाली अंजना सिंह ने पहले लखनऊ में एक सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. वहां से वे ऐक्टिंग की दुनिया में आईं. आज वे भोजपुरी फिल्मों की बड़ी कलाकार हैं. उन को भोजपुरी फिल्मों का ‘हौट केक’ कहा जाता है. बदल रहे हैं परिवार

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन प्रियंका महाराज पटना जिले की रहने वाली हैं. हीरोइन बनने के लिए उन्होंने बड़ा संघर्ष किया है. पहले वे पटना से कुछ दिन दिल्ली में रहीं, फिर वहां से मुंबई गईं. प्रियंका महाराज कहती हैं, ‘‘मेरे पिताजी शुरुआत में राजी नहीं थे. मेरी मां तैयार थीं. ऐसे में वे मेरे साथ मुंबई आईं और यहां मेरे साथ रहीं. कुछ दिनों के बाद मेरे पिताजी भी तैयार हो गए. अब भी मैं मां के साथ मुंबई में रहती हूं.’’

पहले के समय में छोटे शहरों में रहने वाले परिवार अपने घर के बच्चों खासकर लड़कियों को फिल्मों में भेजने से बचते थे. यही वजह होती थी कि कई बार लड़केलड़कियां घर वालों को बिना बताए मुंबई चले आते थे. पर अब समय बदल गया है. बच्चे पहले अपने मांबाप को विश्वास में लेते हैं और मांबाप भी बच्चों पर भरोसा करते हैं. पहले लड़कियों को ले कर एक आम सोच होती थी कि फिल्मों में उन का शोषण होता है. अब शोषण की बात कोई मुद्दा नहीं रह गई है. लोगों में यह समझ आ गई है कि ऐसे हालात केवल फिल्मों में नहीं हैं, शोषण का शिकार तो हर जगह हुआ जा सकता है. ऐसे में छोटे शहरों की लड़कियों को पहले से ज्यादा मौके मिल रहे हैं.

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मेहनत से मिली कामयाबी भोजपुरी फिल्मों में छोटे शहरों की लड़कियां ज्यादा कामयाब हैं. इन में भी आमतौर पर

वे गरीब और साधारण परिवारों से होती हैं. इस की वजह पर बात करते हुए सुधाकर मिश्र कहते हैं, ‘‘छोटे शहरों की लड़कियां आमतौर पर मेहनती होती हैं. उन की बौडी फिट होती है. वे लुक के हिसाब से भी भोजपुरी फिल्मों के लायक होती हैं. वे कम पैसों में ज्यादा और अच्छा काम कर लेती हैं.

‘‘शूटिंग पर रहने की बात हो या वहां तक आनेजाने की, वे किसी तरह की कोई परेशानी खड़ी नहीं करती हैं. ऐसे में वे भोजपुरी फिल्मों के डायरैक्टर और प्रोड्यूसर के बजट को सूट करती हैं. ‘‘हिंदी भाषी होने के चलते वे दर्शकों को पसंद आती हैं. कई भोजपुरी फिल्मों में गुजरात और महाराष्ट्र की लड़कियों ने काम किया, पर वे दर्शकों को पसंद नहीं आईं. ऐसे में हिंदी भाषा वाले इलाकों में रहने वाली लड़कियां भोजपुरी फिल्मों में ज्यादा कामयाब होती हैं.’’

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भोजपुरी फिल्मों के एक डायरैक्टर कहते हैं, ‘‘भोजपुरी फिल्मों की कहानी गांव और छोटे शहरों के आधार पर बनती हैं. ऐसे में छोटे शहरों की लड़कियां भोजपुरी फिल्मों में ज्यादा कामयाब हो जाती हैं. ‘‘भोजपुरी फिल्मों में हर साल तकरीबन 100 फिल्में बनती हैं. ऐसे में हर साल नई लड़कियों के लिए मौके भी सामने आते हैं. एकदूसरे को देख कर छोटे शहरों की लड़कियां खुद आगे बढ़ रही हैं. इन के मातापिता भी मदद कर रहे है.’’

भोजपुरी फिल्मों की नायिका अंजना कहती हैं, ‘‘अब गांव की लड़कियां पहले जैसी नहीं रही हैं. वे भी मौका मिलने पर अपने हुनर का कमाल दिखा सकती हैं. भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियां छोटे शहरों से ही आती हैं. यहां वे अपनी चमक बिखेरती हैं.’’ भोजपुरी फिल्मों की डांसर सीमा सिंह कहती हैं, ‘‘पहले हमारे घर वाले यह सोचते थे कि गांवघर और परिवार के लोग क्या कहेंगे? पर अब वे यह नहीं सोचते हैं और अपनी लड़की का साथ देते हैं.’’

सीमा सिंह को खुद फिल्मों में आने के लिए सघर्ष करना पड़ा था. आज उन के घर के लोग ही नहीं गांव और शहर के लोग भी हम पर नाज करते हैं.

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