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क्या करें जब शादी के बाद पता चले कि पति नशे का गुलाम है

फरवरी के पहले हफ्ते में राज्य महिला आयोग के भोपाल के दफ्तर में सुमन की दास्तां सुन कर न केवल आयोग की मुखिया लता वानखेड़े, बल्कि मौजूद दूसरी मैंबर्स भी सकते में आ गई थीं.

सुमन की शादी पिछले साल 22 जनवरी को रेलवे कालोनी के वाशिंदे अमित गौतम के साथ हुई थी.

शादी के वक्त सुमन बहुत खुश थी क्योंकि पति फिल्में बनाने का काम करता था और रेलवे में अफसर भी था. सुमन को उम्मीद थी कि उसे ससुराल में किसी चीज की कमी नहीं होगी. जिंदगी खुशनुमा गुजरेगी क्योंकि रेलवे अफसर की पगार अच्छीखासी होती है और फिर फिल्में बनाने से भी बेशुमार पैसा मिलता है.

शादी के बाद कुछ दिन तो ठीकठाक गुजरे और सुमन ससुराल वालों की तिमीरदारी में लग गई. वह अपनी तरफ से किसी को शिकायत का मौका नहीं देना चाहती थी. यह बात उसे उस के मांबाप ने सिखाई भी थी कि ससुराल में सब से हिलमिल कर रहना, घर के काम करना और छोटीमोटी परेशानियां पेश आएं तो उन से घबराना नहीं बल्कि उन का मुकाबला करना और अपनी तरफ से समझौता करने से हिचकिचाना नहीं.

कुछ महीनों बाद ही सुमन को पता चल गया कि अमित न तो रेलवे में अफसर है और न ही फिल्में बनाता है, उस से झूठ बोल कर शादी की गई थी. बात गाज गिरने जैसी ही थी, लेकिन सुमन ने यह सोचते हुए खुद को तसल्ली दे ली कि इस झूठ की अनदेखी करना ही भविष्य के लिहाज से बेहतर होगा. हल्ला मचाने से कोई फायदा नहीं होने वाला. जो है उस से समझौता कर जिंदगी गुजारी जाए.

नशैला निकला पति

यहां तक तो बात बरदाश्त थी, लेकिन जल्द ही पति का दूसरा रूप भी सामने आया तो सुमन की सब्र जवाब दे गई. अमित तरहतरह के नशे का आदी था और इतना ही नहीं, नशा कर के ऐसी ऊटपटांग हरकतें करता था कि किसी भी बीवी की जिंदगी नर्क बन जाए.

पति के नशैले होने की शिकायतें ले कर आने वाली औरतों की तादाद कम नहीं होती, इसलिए महिला आयोग की अध्यक्ष को कोई खास हैरानी नहीं हुई थी पर जब उन्होंने सुबकती सुमन के मुंह से यह सुना कि पति रूमफ्रैशनर तक सूंघ कर नशा करता है और फिर नशे में नागिन डांस करता है तो उन्हें समझ आ गया कि सुमन की परेशानी वाकई बड़ी है.

सुनने वालों की आंखें उस वक्त और फटी की फटी रह गईं जब सुमन ने यह खुलासा भी किया कि पति की नशे की लत का बेजा फायदा ससुर भी उठाता है. वह अकसर उसे इधरउधर छूने की कोशिश करता है. इतना ही नहीं शायरमिजाज ससुर उस की आंखों और बालों पर गजलें भी लिखता है.

हालांकि सफाई मांगे जाने पर अमित और उस के पिता ने सुमन के आरोपों को झूठा बताया, लेकिन सुमन की बात में दम इसलिए भी था कि आमतौर पर ऐसे मामलों में बीवियां परेशान करने और दहेज का इलजाम लगाती हैं पर सुमन ने सीधे नशे की बात कही थी.

जब पति नशे की आदी हो तो बीवी को किन और कैसी दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ता है यह सुमन की हालत से समझ आता है कि वे कहीं की नहीं रह जाती. मायके वालों से शिकायत करो तो वे समझाते हैं कि पति से निभाने की कोशिश करो. आजकल तो हर कोई नशा करता है.

मगर बीवी पर क्या गुजरती है यह तो नशैले पति के गले बंध गई या बांध दी गई बीवी ही बेहतर जानती है. पति की इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए उस पर हर नीयत बिगाड़ लेता है और हैरत की बात तो यह है कि इस में घर के मर्द ससुर, जेठ और देवर अव्वल रहते हैं.

बीवी की परेशानियां उस वक्त और बढ़ जाती हैं जब नशे का गुलाम पति उस की न सुन कर घर वालों की ही तरफदारी करता है. ससुर, जेठ या देवर बुरी निगाह रखते हैं यह बात बीवी किसी से कहे तो खोट उस के ही चालचलन में लोग निकालना शुरू कर देते हैं.

कैसीकैसी परेशानियां

नशे के आदी मर्दों की बीवियों की जिंदगी आम बीवियों जैसी आसान नहीं रह जाती क्योंकि नशैला पति न केवल मारपीट करता है, बल्कि उसे तरहतरह से तंग कर अपनी कमजोरी को छिपाने की भी कोशिश करता है ताकि बीवी मुंह न खोले. इस मर्दानगी से परेशान बीवियों को सैक्स सुख भी ढंग से नहीं मिल पाता क्योंकि नशे के आदी पति सैक्स में फिसड्डी होते हैं.

बात सिर्फ सैक्स की नहीं रह जाती. इस से जुड़ी दूसरी ज्यादतियों का शिकार भी बीवी को होना पड़ता है तो उस का ससुराल में दम घुटने लगता है. पर कोई सहारा या ठिकाना न होने के चलते वह ज्यादतियां बरदाश्त करती जाती है, जिस से पति का हौसला बुलंद होने लगता है. इसी दौरान अगर एकाध बच्चा भी हो जाए तो नशैले पति से छुटकारा पाना और भी मुश्किल काम हो जाता है.

पैसों की बाबत भी बीवी कुछ नहीं बोल सकती क्योंकि कमाईका बड़ा हिस्सा तो पति नशे में ही उड़ा देता है और जब शरीर कमजोर पड़ने लगता है तो वह बेशर्मों, निकम्मों की तरह घर पर पड़ा रहता है. नशीले पति का उठनाबैठना भी नशैलों में रहता है. दिक्कत उस वक्त भी पेश आती है जब पति की ली गई उधारी का तकाजा करने देनदार घर आना शुरू कर देते हैं.

भोपाल के एक प्राइवेट दफ्तर में काम करने वाली सुधा 2 बच्चों की मां है. 5 साल पहले उस की शादी सुधीर से हुई थी. सुधीर को शराब की ऐसी लत थी कि जिस दिन शराब न मिले वह छटपटाने लगता था और खुदकुशी तक करने की धौंस देने लगता था. एक कंपनी में दिहाड़ी पर काम करने वाले सुधीर की नशे की लत से आजिज आ गई सुधा ने क्व6 हजार महीने की नौकरी कर ली तो सुधीर और भी मनमानी करने लगा.

शराब के लिए पैसे देने से सुधा मना करती तो वह चिल्लाचिल्ला कर उस के चालचलन पर उंगली उठाता था और जबरदस्ती पैसे छीन कर ठेके पहुंच जाता था. छोटेछोटे बेटों का मुंह देखती सुधा अब पछताती है कि फालतू इन्हें पैदा कर लिया जिन के हिस्से में बाप का सुख और हिफाजत नहीं.

सुधा को अब कुछ नहीं सूझ रहा है कि क्या करे. पति को छोड़ने पर उसे अंदाजा है कि जिंदगी और दुश्वार हो जाएगी. बाहर दूसरे मर्द भूखे भेडि़यों की तरह उस के जिस्म पर नजरें गड़ाए बैठे हैं जो अभी सुधीर की वजह से पूरी तरह अपनी बदनीयती जाहिर नहीं कर रहे पर इशारोंइशारों में दिल और दिमाग की गंदगी उस पर फेंकने से कतई नहीं चूकते.

क्या करें

धोखे या इत्तफाक से ही सही जब नशैला पति गले पड़ जाए तो बीवियां क्या करें, इस बात का सटीक जवाब या परेशानी का हल किसी के पास नहीं. यह फैसला तो खुद बीवियों को ही करना पड़ता है कि वे नशैले पति की ज्यादतियों को बरदाश्त करते हुए उस के गले से बंधी रहें या फिर छोड़ कर अलग जिंदगी जीएं.

खतरे घर में भी हैं और बाहर भी, इसलिए बीवियां फैसला लेने में देर कर देती हैं और बाद में पछताती ही हैं, क्योंकि बाहर के खतरे पति की नशे की लत के चलते धीरेधीरे घर में दाखिल हो कर उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. पति की रजामंदी भी इस में होती है जिसे बीवी से ज्यादा नशे की जरूरत होती है.

सुमन ने ठीक किया जो वक्त रहते महिला आयोग पहुंच गई जहां से उस की परेशानी दूर न हुई तो तय है वह तलाक के लिए अदालत जाएगी और मुमकिन है तलाक के बाद कोई दूसरा अच्छा हमसफर मिल जाए और न भी मिले तो इस बदतर जिंदगी और घुटन से तो वह छुटकारा पा ही जाएगी.

जगमगाती रात

दीपकों की
देह से फूटी
फिर सुनहरी
रश्मियों की गंध.
रात ने सोलह किए शृंगार
बह रही है रोशनी की धार
तोड़ कर तम के
सभी तटबंध.
फुलझड़ी सी जगमगाती रात,
साथ दीयों की चले बरात.
कुछ अनारों ने
किए अनुबंध.
दपदपाता सा तुम्हारा रूप
रात में आए उतर ज्यों धूप
और दे
आलोक की सौगंध.

– रत्नदीप खरे

देश के गांवों में बच्चों की दुर्गति

देश के गांवों में बच्चों की क्या दुर्गति है यह इस छोटी बात से जाहिर है कि दिल्ली के एक बहुत घने गरीब इलाके में 2 कमरे के मकान में असम, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल से लाए गए 27 बच्चे एक छापे में पकड़े गए. इन बच्चों को गांवों से लाया गया था और दिल्ली में या तो घरेलू नौकरी पर लगाया जाता था या देह बेचने में. इन बच्चों के मांबाप गांवों में बच्चों के खो जाने के बाद कुछ दिन तक रोतेकलपते रहते होंगे और फिर अपना नसीब मान कर हार कर चुप बैठ जाते होंगे. जाहिर है कि ये बच्चे बेहद गरीब घरों के हैं जहां हर रोज खाने के लाले पड़े रहते हैं. तभी कुछ के मातापिता को नौकरी का लालच दे कर तो कुछ को रिश्तेदारों से और कुछ को उठा कर लाया जाता होगा.

बच्चों का यह धंधा बड़े जोरशोर से सारे देश में चल रहा है और हमारी सारी चकाचौंध की पोल खोलता है. हम चाहे ऊंचे मकान बना रहे हों, सुंदर हवाईअड्डे बना रहे हों, बुलेट ट्रेन ला रहे हों, यह पक्का?है कि इन के नीचे बड़ा काला धब्बा छिपा है जिसे देखना नहीं चाहते. बच्चों के खोने की बात ऐसी नहीं कि इस का हल्ला न मचे. आज सरकार के पंजे कोनेकोने में फैले हुए हैं. पुलिस, आढ़ती, ठेकेदार, नेता, मंदिर, मसजिद हर जगह हैं जहां से किसी भी बच्चे के खोने पर बड़ा शोर मच सकता है. पर मगर सब चुप रहते हैं तो शायद इसलिए कि मातापिता जानते हैं कि उन के पास घरों में बच्चों को खिलाने तक के पैसे नहीं हैं और अगर वे खो गए, भाग गए या जानबूझ कर दे दिए गए तो शायद दो जून की रोटी का तो इंतजाम हो जाए.

दिल्ली में भी ये बच्चे पड़ोसियों की शिकायत पर नहीं पकड़े गए. 21 बच्चे 2 कमरों में रह रहे हों और किसी को शक न हो, ऐसा नहीं हो सकता. यह हमारी गैरजिम्मेदारी की

निशानी है कि लोग बच्चों का नसीब मान कर और गुंडों से न उलझने की सोच कर चुप रह जाते हैं. दिल्ली में चप्पेचप्पे पर बच्चे दिख जाते हैं और ये गांवों से खुद ब खुद तो भाग कर नहीं आ सकते. इन्हें तो गैंग लाएंगे और ये गैंग पुलिस की आंख से बचे रह जाते हों, हो नहीं सकता.

देश न जाने किन मंदिरों और मसजिदों के झगड़ों में उलझा हुआ है जबकि देश के लाखों बच्चे हर साल गायब हो जाते हैं और उन की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

ऐक्सरसाइज से पहले यह काम करना भी जरूरी है

विश्वभर में जनवरी में जिम और फिटनैस सैंटर में सदस्यों की वृद्धि देखने को मिलती है. ‘हैल्दी खाना और वेट कम करना’ नए साल का सब से लोकप्रिय संकल्प होता है. मगर फरवरी के अंत तक यह उत्साह अकसर ठंडा पड़ चुका होता है और जिम व फिटनैस केंद्रों का बिजनैस पहले जैसा हो जाता है. कुछ के पास समय की कमी होती चली जाती है, कुछ को जब मनचाहा परिणाम नहीं मिलता है, तो उन का उत्साह धीरेधीरे कम होता चला जाता है.

ऐसे में अपने दृष्टिकोण और फिटनैस प्लान में कुछ बदलाव ला कर आप पूरा साल फ्रैश और फिट रह सकते हैं.

कैसे रहें फिट

फिटनैस ट्रेनर गौरव गुप्ता सलाह देते हैं कि वेट उठाने से पीछे न हटें. कई लोग दौड़ना या ट्रेडमिल पर चलना फिटनैस समझ लेते हैं. ऐसे ब्रिक्स और जौगिंग को काफी समझ लिया जाता है. वेट ट्रेनिंग से आप का मैटाबोलिक रेट बढ़ता है, जिस से आप का शरीर आराम करते हुए भी फैट बर्न करता है.

जुंबा स्पैशलिस्ट और मास्टर ट्रेनर सविता पाल कहती हैं कि आप का शरीर समय के अनुसार बदलता रहता है, आप की ऐक्सरसाइज के स्ट्रैस के अनुसार एडजस्ट और मजबूत होता रहता है. कभीकभी बौडीवेट बूटकैंप में जाएं. यदि आप के पास समय की कमी है तो छोटेछोटे वर्कआउट करें.

होलिस्टिक लिविंग कौन्सैप्ट की डाक्टर दीपा का कहना है कि कहीं भी 10 से 30 मिनट हाई इन्टैंसिटी का वर्कआउट कर लें. इस से कम समय में ज्यादा कैलोरी बर्न होगी और वर्कआउट के बाद कुछ घंटों के लिए मैटाबोलिक रेट भी बढ़ेगा.

यूट्यूब पर फिटनैस ब्लौग और फूड चैनल के रनवीर कहते हैं कि अपने शैड्यूल में ऐक्सरसाइज रूटीन का समय तय कर लें और इस से हटें नहीं. कोई भी समय जो आप को सूट करता हो, तय कर लें और इसे जरूरी काम समझें, इग्नोर न करें.

सविता पाल सलाह देती हैं, ‘‘एक फिटनैस साथी ढूंढ़ लेना चाहिए. उस से आप को प्रेरणा मिलती रहेगी. जब आप को लगेगा कि आप काफी ऐक्सरसाइज कर चुकी हैं, तब वही साथी आप को एक सैट और करने के लिए आगे बढ़ा सकता है. यह जरा सा और ही आप को साफसाफ फर्क दिखा देगा. आप स्वयं को ज्यादा स्ट्रौंग महसूस करेंगी.’’

खुद को करें मोटीवेट

एडिडास की मुंबई कैप्टेन के अनुसार थोड़ी सी प्रेरणा से ही बहुत उत्साह मिलता है. खिलाडि़यों की जीवनियां पढ़ें.

पाल भी कहती हैं कि आप सोशल मीडिया पर फिटनैस के वीडियो देख फिटनैस के अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए बहुत प्रेरणा प्राप्त कर सकती हैं.

लेलिस्टिक न्यूट्रिशन के ल्यूक का कहना है कि यदि आप को सुबह उठते ही चाय की जरूरत हो तो अपने स्लीप पैटर्न और रूटीन पर भी ध्यान दें. आप का शरीर सोते हुए कई अवस्थाओं से गुजरता है जैसे सैलग्रोथ, डिटौक्सिफिकेशन, सैल्युलर रिपेयर, हीलिंग और रिजूविनेशन. ज्यादातर स्वस्थ वयस्कों को हर रात 7 से 9 घंटे की नींद की जरूरत होती है. यदि आप को सोने में परेशानी है, तो फोन या लैपटौप से रात को दूर रहें. अलकोहल, कैफीन या मीठी वस्तुएं सोने से 2 घंटे पहले न लें.

कम पानी पीने से थकान महसूस हो सकती है. अत: खूब पानी पीएं.

ल्यूक कहते हैं कि हर पोषक तत्त्व कई मैटाबोलिक प्रोसैस से जुड़ा होता है. 1% भी कम होता है, तो ऐनर्जी पर प्रभाव डालता है. विटामिन डी, बी12, के, आयरन, मैग्नीशियम, सिलेनियम, पोटैशियम और क्यू10 की अकसर अनदेखी की जाती है पर इन की कमी मांसपेशियों की थकान और मानसिक दबाव का कारण बन सकती है.

आप के खाने में मौजूद पोषक तत्त्वों को ग्रहण करने के लिए मैटाबोलिज्म बढ़ाने के लिए प्रोटीन आवश्यक है. इसे अपने आहार में जरूर लें.

चीनी, मैदे से बनी वस्तुओं से मैटाबोलिक रेट कम हो सकता है, इसलिए केक, बिस्कुट, पेस्ट्री से दूर रहें.

फिटनैस ट्रेनर सनी पाल का कहना है कि आजकल लोग शारीरिक रूप से सुविधापूर्ण जीवन बिता रहे हैं. प्रतिदिन 10 हजार कदम जरूर चलें. इस से 150 कैलोरी बर्न होगी, चलने का कोई मौका न छोड़ें. कार कुछ दूर पार्क करें ताकि आप का पैदल चलना हो जाए. औफिस ब्रेक में भी चलने की कोशिश करें. सीढि़यां चढ़ें, हर 5 कदम में एक कैलोरी बर्न होती है. अकसर सीडि़यों के एक पैटर्न में 14 स्टैप होते हैं, तो हमेशा लिफ्ट की जगह सीडि़यां चढ़ें. यदि रूटीन वर्कआउट से बोर हो रही हैं, तो जिन्हें डांस करना अच्छा लगता है, वे जुंबा जौइन कर लें. ट्रैनिंग या हाइकिंग जैसी ऐक्टिविटीज वर्कआउट के साथसाथ सोशल अफेयर भी हो सकती हैं.

फिट रहने के लिए थोड़ी सी मेहनत कर के देखें, आप को अच्छा लगेगा. फिर कहा भी तो जाता है कि स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का निवास होता है तो आज से ही शुरुआत करें और स्वस्थ रहें.

भगवा भीड़ का अंधा कानून सुप्रीम कोर्ट की नहीं सुनेगा

सुप्रीम कोर्ट ने मौब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा पीटपीट कर मार डालने की वारदातों की बुराई करते हुए कहा कि भीड़तंत्र को कानून की अनदेखी कर भयानक करतूत करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. सरकार लोगों की चीखपुकार की अनसुनी नहीं कर सकती.

सुप्रीम कोर्ट ने हालात की गंभीरता को देखते हुए सरकार से तुरंत सख्त कदम उठाने की बात कही ताकि सब को साथ ले कर चलने की सामाजिक और संवैधानिक व्यवस्था पर भरोसा रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने संसद से कहा कि वह मौब लिंचिंग को अपराध की श्रेणी में लाए और उचित सजा का इंतजाम करे. गौरक्षा और दूसरी वजहों से भीड़ द्वारा लोगों की जान लिए जाने पर कोर्ट ने तीखी बात कही. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ का यह फैसला ऐतिहासिक  माना जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से दिशानिर्देश पर अमल करने को कहा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तय कराना राज्य की जिम्मेदारी है कि कानून व्यवस्था असरदार ढंग से लागू रहे जिस से लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के राज में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक तानाबाना महफूज रहे. गड़बड़ी के समय राज्य को लोगों के संवैधानिक अधिकारों की हिफाजत करने के लिए जिम्मेदारी से कार्यवाही करनी चाहिए. भीड़ का किसी को भी पीटपीट कर मार डालना कानून और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है. पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गई बात का पालन केंद्र और प्रदेश सरकारें कितना करती हैं, यह देखने वाली बात है.

जिस दिन बड़ी अदालत अपना आदेश दे रही थी ठीक उसी दिन भारतीय जनता युवा मोरचा के भगवा लोगों ने झारखंड के पाकुड़ इलाके में स्वामी अग्निवेश को जम कर पीटा.

सुप्रीम कोर्ट ने मौब लिंचिंग में उन घटनाओं को शामिल किया है जिन में पीटपीट कर मार दिया जाता है. जिन घटनाओं में भीड़ द्वारा बुरे तरीके से पीटा जाता है वह भी बेहद गंभीर है. उन को भी मौब लिंचिंग की श्रेणी मेें रखना चाहिए.

जब भीड़ सत्ताधारी दल से जुड़ी होती है तो उस का हौसला बढ़ा हुआ होता है. कट्टरधारी संगठन किसी भी विचारधारा के हों, उन की सोच एक सी होती है. भीड़तंत्र द्वारा ही वे कानून को अपने तरीके से चलाना चाहते हैं. समय के साथसाथ इस तरह की घटनाओं में तेजी आ रही है.

हर धर्म यही सिखाता है कि अपने विरोधियों का मुंह बंद करो. कोई धर्म तर्क व तथ्य की बात नहीं सुनना चाहता. सरकारी कानूनों के बजाय धर्म अपने समर्थकों की मदद से मुंह बंद कराना चाहता है.

हिंदू धर्म में ऐसे कई नियम बने हैं जिन में भीड़ की तरह के फैसले बिना सुनवाई के तुरंत किए गए. एकलव्य का अंगूठा कटवाना और बातबात पर शाप देना एक तरह से बिना सुनवाई के फैसला सुनाना है. भीड़ यही करती है.

भीड़ धर्म और सरकार के साए में काम करती है. भीड़ ऐसे काम खुद नहीं करती, धर्म के ठेकेदार और सत्ताधारी दल के कर्ताधर्ता भीड़ को काम करने के लिए उकसाते हैं इसलिए ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से बहुत बदलाव नहीं होगा.

सत्ता पर कब्जा करने के लिए भीड़तंत्र को बढ़ावा दिया जाता है. धर्म कानून के राज के बजाय अपने धार्मिक कानून को चलाना चाहता है. सरकार इस के सहारे वोट बैंक की राजनीति करती है. ऐसे में हर नई घटना के बाद तेजी आती दिखेगी और फिर ऐसी घटनाएं होंगी. हर सरकार पुरानी सरकार का उदाहरण दे कर अपना बचाव करेगी.

मौब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट की कठोर लताड़ के बाद सत्ताधारी पार्टी के लोग बेतुकी सफाई दे रहे हैं कि कांग्रेस के समय में सिखों की हत्या भी मौब लिंचिंग ही तो थी, जबकि यह तर्क बाबरी मसजिद को गिराने में खारिज कर दिया जाता है.

ऐसे घटेगा हौसला

इतिहास गवाह है कि भीड़तंत्र के आगे सरकारें झुकती रही हैं. वे अपने वादों से मुकर जाती हैं. कानून अपना राज स्थापित नहीं कर पाता और प्रशासन लाचार हो जाता है. इस तरह की घटनाओं में इंसाफ नहीं मिलता. अगर मिलता भी है तो आधाअधूरा.

साल 1992 के बाद राम मंदिर का आंदोलन इस तरह के भीड़तंत्र का एक उदाहरण है. उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा था कि अयोध्या में कुछ नहीं होने पाएगा. भीड़तंत्र ने ढांचा ढहा दिया. 26 सालों के बाद भी इस का फैसला नहीं आ पाया है.

ऐसी घटनाओं से भीड़तंत्र को बढ़ावा मिलता है. गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा इस का बड़ा उदाहरण है. इस में महीनों तक गुजरात के शहरों में हिंदुओं की भीड़ों ने नरेंद्र मोदी की सरकार के तले निहत्थे बेकुसूर मुसलमानों को मारा था और 2000 से ज्यादा मौतों पर कोई गुनाहगार नहीं साबित हुआ.

उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के मुख्यमंत्री को ‘राजधर्म’ का पालन करने की सीख दे कर पल्ला झाड़ लिया था. यह बयान एक प्रधानमंत्री का नहीं, एक साजिश थी कि विरोधियों को चुप कर दो और जो हो रहा है उसे होने दो.

धीरेधीरे इस तरह की घटनाओं ने तेजी पकड़नी शुरू की. इन का दायरा बढ़ने लगा. लोग एकजुट हो कर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने लगे.

भीड़तंत्र में जिस की लाठी उस की भैंस वाली कहावत खरी उतरती है. ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी घटनाएं नहीं घटती थीं. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में एक समुदाय को मारने की घटनाएं भीड़तंत्र का ही उदाहरण हैं. तब एक समुदाय के खिलाफ हिंसा होती रही और बाकी समाज चुप्पी साधे रहा. पहले इस तरह की गिनीचुनी घटनाएं घटती थीं, पर अब इन की तादाद बढ़ती जा रही है.

गौरक्षा के नाम पर ऐसी तमाम घटनाएं घटीं जिन में भीड़तंत्र का गलत असर देखने को मिला. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखलाक की हत्या इस का सब से खास उदाहरण है.

उत्तर प्रदेश की ही तरह राजस्थान, हरियाणा और दूसरे प्रदेशों में भी घटनाएं घटीं. इन में सरेआम लोगों की पिटाई और हत्या की गई.

जिस देश में लोकतंत्र हो वहां भीड़तंत्र के नाम पर मनमानी हो, यह देश के संविधान की बेइज्जती है. जब प्रशासन और सरकार इस का अंग बन जाते हैं तो बात और भी बिगड़ जाती है.

बढ़ती घटनाएं घटता असर

देश में जातिधर्म अब संविधान से ऊपर उठता नजर आ रहा है. संविधान की मूलभावना को दरकिनार कर भीड़तंत्र के सहारे जातिधर्म को बढ़ावा मिल रहा है.

साल 2008 में गुर्जर समाज ने पिछड़े तबके के बजाय खुद को दलित जाति में शामिल किए जाने को ले कर आंदोलन किया. पुलिस और आंदोलन करने वालों के बीच हिंसक झड़पों में 37 लोगों की मौतें हुईं.

साल 2015 में गुजरात में पाटीदार समाज ने आरक्षण पाने के लिए आंदोलन किया. 25 अगस्त को अहमदाबाद में हुए प्रदर्शन में जनजीवन ठप हो गया.

अगस्त से सितंबर तक की घटनाओं में 14 लोगों की मौतें हो गईं. 200 से ज्यादा लोग घायल हुए. तमाम बसें जलाई गईं. केवल अहमदाबाद में ही 12 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ.

आरक्षण पाने के लिए जाट समुदाय ने साल 2016 में आंदोलन किया. हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में 340 अरब रुपए का नुकसान हुआ. रेलवे को 60 करोड़ रुपए का घाटा हुआ. ढाई दर्जन लोग मारे गए.

देश के अंदर इस तरह की हिंसक घटनाओं को कोर्ट से ले कर सरकार तक ने गंभीरता से लेने की बात कही. मुकदमे दर्ज हुए, पर असर कुछ नहीं पड़ा. एक घटना के बाद दूसरी घटना का सिलसिला जारी रहा.

आंध्र प्रदेश में कापू आंदोलन हुआ. कापू समुदाय ने खुद को पिछड़ी जाति में शामिल किए जाने की मांग को ले कर आंदोलन छेड़ा और रेलवे लाइन व नैशनल हाईवे को बंद कर दिया. ‘रत्नांचल ऐक्सप्रैस’ की कई बोगियों में आग लगा दी गई. यही नहीं, आरपीएफ के जवानों पर भी हमला किया गया.

अगस्त, 2017 में हरियाणा के पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद उपजी हिंसा में 29 लोगों की मौत और 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए.

इसी तरह फिल्म ‘पद्मावत’ के विरोध में राजस्थान में करणी सेना ने फिल्म के सैट पर तोड़फोड़ की. जनवरी, 2018 में जब यह फिल्म रिलीज हुई तो विरोध में हिंसक घटनाएं हुईं. अप्रैल, 2018 में ‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन के विरोध में हिंसा हुई. वह भी भीड़तंत्र का ही उदाहरण है.

इन का है संरक्षण

देश की आजादी के बाद भारत को एक लोकतांत्रिक देश का दर्जा मिला. आजादी की लड़ाई के समय महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा ले कर अंगरेजों को देश छोड़ने पर मजबूर किया था. उन्होंने कई ऐसे आंदोलनों को वापस लिया जिन में हिंसा होने लगी थी.

आजादी के समय अहिंसा ने अपना काम किया. आजादी के बाद जब देश को ज्यादा संविधान का पालन करना चाहिए था तब हिंसक घटनाएं घटने लगीं.

हिंसक घटनाएं भीड़तंत्र को बढ़ावा देती हैं. देश में होने वाले चुनावों के दौरान भी हिंसक घटनाएं घटती हैं. अगर 1977 और 1984 के चुनावों को छोड़ दें तो हर चुनाव में जातिधर्म का ही बोलबाला रहा है.

राजनीति धर्म और जाति पर केंद्रित हो गई है. जीत के लिए जाति और धर्म का सहारा लिया जाता है. इस वजह से खेमेबंदी शुरू हो गई और भीड़तंत्र के खिलाफ कदम उठाना मुश्किल हो गया.

\धर्म की कहानियों से सीख लेने वाले समाज को दिखता है कि धर्ममें ऐसी बहुत सी घटनाएं घटी हैं जहां पर अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया. देश में सब से लोकप्रिय पौराणिक ग्रंथ महाभारत और रामायण इस से भरे पड़े हैं.

रामायण में राजा बाली का उदाहरण देखें तो पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए राम ने उस से युद्ध किया और उस को मार कर वहां का राज उस के भाई सुग्रीव को दे दिया. शूर्पणखा ने जब लक्ष्मण के सामने शादी करने का न्योता दिया तो लक्ष्मण ने सबक सिखाने के लिए उस की नाक काट ली.

धार्मिक ग्रंथों में ऐसी कई कहानियां हैं जिन में यह पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है. इन कहानियों को पढ़ कर बढ़ रहे लोगों ने अब हिंसा का ही सहारा ले लिया है. राज्य से उन को जब भी शिकायत होती है, वे हिंसा का सहारा लेते हैं. यही वजह है कि सरकारी बसों, इमारतों, रेलवे लाइनों को नुकसान पहुंचा कर आंदोलन होता है.

यह बात और है कि हिंसा का सहारा ले कर चले आंदोलन कभी कामयाब नहीं होते. साल 2012 का अन्ना आंदोलन वर्तमान समय में इस का उदाहरण है.

कांग्रेस की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय में लोकपाल बिल को ले कर यह आंदोलन इतना असरदार हुआ कि कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में सरकार बनाने में कामयाब हो गई.

सत्ता में पहुंचने के बाद भाजपा इस बात से अनजान है. उस के शासनकाल में कई ऐसी घटनाएं पूरे देश में घटी हैं जिन में हिंसा का सहारा लिया गया था. भाजपा चाहती तो उन को रोक सकती थी पर उस ने वोट बैंक का फायदा लेने के लिए ऐसा नहीं किया.

आज सोशल मीडिया का दौर है जिस में किसी भी घटना की प्रतिक्रिया बड़ी तेजी से सामने आती है. इस से हिंसा और भड़क जाती है. सोशल मीडिया से भी भीड़तंत्र को बढ़ावा मिलता है.

देश के किसी भी हिस्से में भीड़ जुटा कर कुछ भी किया जा सकता है. इससे लोगों को कितना नुकसान होता है, इस बात की परवाह किसी को नहीं होती है. सड़क पर जाम लगने से कई मरीजों की जानें जा चुकी हैं. स्कूली बच्चे धूप में सड़क पर खड़े रहते हैं क्योंकि सड़क पर कोई धार्मिक यात्रा निकल रही होती है. कहीं सड़क पर नमाज पढ़ी जा रही होती है. वोट बैंक बढ़ाने के लिए सरकारें भीड़तंत्र को खुश करने में लगी रहती हैं. नतीजतन, लोकतंत्र में भीड़तंत्र का असर बढ़ता जा रहा है. केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निर्देश देने से भीड़तंत्र काबू में नहीं आने वाला है.

बढ़ते अपराध : क्या है वजह, किस का है हाथ

गुड़गांव, दिल्ली, यमुनानगर व लखनऊ के स्कूलों में बच्चों ने ताबड़तोड़ दिल दहला देने वाली वारदातें कर दीं. बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं. वे वही बोलते हैं, वही करते हैं जो वे अपने आसपास बड़ों से सीखते हैं या समाज में होता हुआ देखते हैं.

लगातार बढ़ रहे अपराधों की रफ्तार देख कर सोचने पर मजबूर होना पड़ता है. मोटेतौर पर समाज व नियमों के खिलाफ कोई काम या गलती करना या कराना कानून की नजर में अपराध माना गया है. खराब माहौल व गलत सोहबत से अपराध बढ़ते हैं. हमारे समाज में अपराध की समस्या नई नहीं है. हमेशा से ऐसा होता रहा है.

पहले ऊंची जातियों के लोग नीची जाति वालों के साथ अपराध करते थे. सामूहिक अपराध होते थे, लेकिन उन जुल्मों के खिलाफ कोई चूं तक नहीं कर पाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब खिलाफत व मुकाबला करने का दौर है. सदियों से शोषित रहे पिछड़े व दलित भी उलटा दांव चलने लगे हैं.

अपराध होने की एक वजह सदियों से चल रही जाति व्यवस्था का जहर भी है. वर्ण व्यवस्था के तहत पिछड़ों को शूद्र व दलितों को अछूत कहा जाता था. मनमाने नियम बना कर नीची जाति वालों को इतना सताया जाता था कि उन का रहना, खानापीना व जीना सब मुहाल था. उन की जिंदगी जानवरों से भी बदतर होती थी. दलितों व पिछड़ों के नहाने, साफ रहने, कुएं पर चढ़ने, बरात निकालने, मंदिरों में घुसने व पढ़नेलिखने तक पर कड़ी पाबंदियों की बेडि़यां डाली गई थीं. इस से शोषितों का खुद पर से यकीन चला गया.

पहले शूद्रों को धनदौलत रखने का हक नहीं था. जानबूझ कर उन्हें गरीब व कमजोर रहने के लिए मजबूर किया जाता था. इस से निचले तबके के लोग नाराज रहते थे.

मसलन, शूद्र का पहला बेटा गंगा में डाल कर दान करा दिया जाता था ताकि वह बड़ा हो कर अगड़ों का मुकाबला न करे. लेकिन अगर किसी को उस के बुनियादी हक से बेदखल किया जाएगा तो वह आखिर कब तक सहेगा?

धीरेधीरे वक्त बदला. शोषित तबका एकजुट होने लगा. अपने ऊपर होने वाले जोरजुल्म से तंग आ कर वह दबंगों को सबक सिखाने लगा.

खून का घूंट पी कर चुप रहने वालों ने जब सारी हदें टूटती देखीं तो उन का सब्र जवाब दे गया. उन के सीने में दबी चिनगारी आग बन कर भड़कने लगी. बस, यही बात अगड़ों को अब नागवार लगती है. समाज में सारे सुखों पर सिर्फ अपना हक जमाने वालों के सारे भरम अब कांच की तरह टूट रहे हैं.

मजबूरी की हद

जुल्म सह कर भी गरीबगुरबे भूखेप्यासे रह कर पंडेपुजारियों व अमीरअगड़ों की खिदमत व बेगारी करते रहते थे. उन की बेटियों को देवदासी बना कर भगवान की सेवा करने के नाम पर मंदिरों के सुपुर्द कर दिया जाता था.

हालात से तंग आ कर पेट भरने के लिए गरीब लोग मजबूरी में छोटीमोटी चोरीचकारी कर के अपना पेट भर लेते थे. मुसहर लोग खेतों से चूहे मार कर खा जाते थे. कुछ मजबूर लोग मुरगी वगैरह चुरा कर अपने पेट की आग ठंडी कर लेते थे.

चारों ओर से मजबूर भूखाप्यासा इनसान जुर्म करने से परहेज नहीं करता. सब जानते हैं कि चंबल के बीहड़ों में ज्यादातर लोग सामंतों द्वारा उन्हें सताने, जबरदस्ती उन की जमीन कब्जाने या मौत का बदला लेने के लिए डाकू बने थे.

सामंतों ने सदियों तक गरीबों के साथ बेजा बरताव किया. बातबात पर उन की बेइज्जती की. उन से पैसों की वसूली की. उन की औरतों की आबरू लूटी. इस वजह से शोषितों के मन में हीनभावना भर गई. जब वे खफा रहने लगे तो पंडेपुजारियों ने उन्हें यह समझाया कि यह सब उन के पिछले कर्मों का फल है, जो उन्हें हर हाल में भोगना ही होगा.

नतीजतन, ज्यादातर दलितों और पिछड़ों ने शोषण व बदहाली को अपनी किस्मत मान कर होंठ सिल लिए, लेकिन जब उन पर लगातार होने वाले जुल्मों का सिलसिला नहीं रुका तो उन में विद्रोह उपजा व बदले की भावना पैदा होने लगी.

अपराधों में हो रही बढ़त वक्त का बदलाव है. सूरज उगते वक्त परछाईं पीछे होती है, लेकिन सूरज के छिपते वक्त परछाईं दूसरी ओर चली जाती है. यही बात अपराधों की है. पहले ताकतवर अपराध करते थे, अब उन के सताए हुए करते हैं. बेशक हालात बदले हैं, लेकिन पूरी तरह नहीं बदले हैं. समाज में बहुत से संसाधनों पर अगड़े ही काबिज हैं.

समाज की धनदौलत का एक बड़ा हिस्सा मुट्ठीभर लोगों के पास है. जिन की माली हालत कमजोर है, उन्हें अमीरों के रहमोकरम पर ही रहना पड़ता है, इसलिए आज भी ज्यादातर गरीब किसान व मजबूर बेघर, बेरोजगार व लाचार हैं. उन के हक, उन का हिस्सा असरदार, दबंग व अगड़े हड़प जाते हैं और वे टुकुरटुकुर देखते रह जाते हैं.

शहरी इलाकों की बात अलग है. बहुत से पिछड़े हुए गंवई इलाकों में रहने वाले दलितों व पिछड़ों के साथ ज्यादातर मामलों में भेदभाव होता है.

सोच है पुरानी

सदियां बदल गईं, जमाना बदल गया, लेकिन गरीबों को सताने वालों की सोच नहीं बदली. पंजाब के खन्ना इलाके में सरेआम एक नेता की हत्या के वक्त बहुत से लोग मौके पर थे, लेकिन जांच एजेंसी ने जूता गांठने वाले एक गरीब रामपाल को गवाह बनाया.

पूछताछ के नाम पर रामपाल को इतना तंग किया गया कि उस ने खुदकुशी कर ली. ऐसे बहुत से लोग हैं जिन की माली हालत कमजोर है, इसलिए उन्हें जोरजुल्म सहना पड़ता है.

एक ओर विजय माल्या जैसे चालाक लोग बैंकों के अरबोंखरबों रुपए ले कर चंपत हो जाते हैं जबकि दूसरी ओर गरीबों के छोटे से कर्ज पर वे हवालात में डाल दिए जाते हैं. उन के घर की कुर्की हो जाती है. उन के हलबैल बिक जाते हैं. वे सड़क पर आ जाते हैं, इसीलिए व्यवस्था की मार के शिकार हुए लोग आखिर में हथियार उठा लेते हैं.

बिहार जैसे राज्यों में सताए हुए तबकों के लोग एकजुट हो कर हुकूमत के खिलाफ बागी, नक्सली हो जाते हैं. उपद्रवी कहलाते हैं.

ये हालात सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हैं. अमेरिका में पहले गोरे शासकों ने सत्ता के नशे में जिन कालों पर खूब मनमाने जुल्म किए, अब वही काले लोग गोरों को खूब नाकों चने चबवा रहे हैं.

इस वक्त नौजवानों के सामने सब से बड़ा मसला बेरोजगारी का है. पहले प्री, फिर मेन, इंटरव्यू, धरना, लाठीचार्ज, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई जांच के बाद तैनाती उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में लोकसेवा आयोग के चेयरमैनों की करतूतें सुर्खियों में रही हैं.

नतीजतन, हताश नौजवान अपराध करने लगते हैं. देश के एक फीसदी लोगों के पास 73 फीसदी दौलत है. गैरबराबरी से उपजा पैसों का लालच भी अपराध होने की वजह है.

अंगरेजों ने साल 1871 में आपराधिक जनजाति कानून बनाया था. जिस में कई बार बदलाव हुए. इस के तहत साल 1947 में देश आजाद होने के समय 128 जातियां जरायमपेशा लिस्ट में शामिल थीं. साल 1952 में इन्हें विमुक्त जनजाति का नाम दिया गया. इन जातियों का सिर्फ लेबल बदला, लेकिन सामाजिक दर्जा व लोगों का नजरिया नहीं बदला. पुलिस वालों के शक की सूई अकसर गरीब नट, बावरिया, कंजर, बंजारा व भांतु वगैरह जातियों पर टिकी रहती है.

शोषण का अंजाम

शोषितों की जायज मांगों को अनसुना किया गया. इस से पैदा उन की मुखालफत को दबाने के लिए कहा गया कि कुछ जातियों के लोग जन्म से ही अपराधी फितरत के होते हैं. इस बात को पुख्ता करने के लिए असरदार लोग उन की गिरफ्तारियां कराने लगे.

कभी यह नहीं देखा गया कि अगड़ों ने उन्हें पढ़ने व बढ़ने नहीं दिया. उन्हें समाज निकाला दे कर बस्तियों से बाहर कर दिया जाता था इसलिए मजबूरी में वे घुमंतू बन गए.

तालीम की कमी से नीची जातियों के लोग सदियों तक ऊंचे ओहदों पर नहीं बैठ सके, इसलिए उन पर जुल्म होते रहे, उन के साथ नाइंसाफी होती रही. फर्क इतना है कि पहले अपराध करने पर भी बगलाभक्तों को सजा देने का नियम नहीं था, लेकिन अब आसाराम, रामपाल, रामरहीम व फलाहारी जैसे कई गुरुघंटाल सींखचों के अंदर हैं.

काम की नसीहत

समाज में अपराध तभी कम होंगे जब केवल दलितों व पिछड़ों को ही नहीं बल्कि अगड़ों को भी कड़ी सजा मिलेगी. समाज में ऊंचनीच का कोई भेदभाव नहीं होगा. कोई ताकतवर किसी कमजोर पर शोषण नहीं करेगा. सब रहनुमाओं के सिर्फ खास हक ही नहीं फर्ज भी आम जनता से ज्यादा व जरूरी होंगे. नेताओं व अपराधियों की जुगलबंदी नहीं होगी.

सदियों से दबेकुचले दलितों व पिछड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें जारी हैं. सरकारी स्कीमों के जरीए उन की जिंदगी बेहतर बना कर उन्हें ऊंचा उठाने के लिए समाज कल्याण महकमे के जरीए बहुत सी सहूलियतें दी जा रही हैं, लेकिन कहीं किसी दफ्तर के बाहर चल रही योजनाओं व कर्ज, छूट जैसी सहूलियतें लिखी नहीं दिखतीं.

भ्रष्ट व निकम्मे मुलाजिम ही ऐसी सारी बातें छिपा कर रखते हैं और कोई प्रचारप्रसार कारगर तरीके से लागू नहीं करते, ताकि खुद हिस्साबांट कर सकें, इसलिए जरूरतमंदों को कानोंकान खबर तक नहीं होती. मेरठ की दलित महिला अनीता देवी की विधवा पैंशन की अर्जी घूस न देने के चलते प्रोबेशनरी औफिस में पूरे 2 साल तक दबी रही.

ऐसे बहुत से मामले हैं जिन में लगने वाले वक्त की कोई सीमा या जवाबदेही तय नहीं है, इसलिए जरूरतमंद धक्के खाते रहते हैं. फिर भी गरीबी, गंदगी व पिछड़ेपन से छुटकारा नामुमकिन नहीं है. बहुत से मसले खुद हल किए जा सकते हैं. बस, खुद पर यकीन होना चाहिए. साथ ही, अंधविश्वासों के दलदल से बाहर निकल कर अपनी सूझबूझ, जानकारी, जागरूकता व तालीम बढ़ाने पर पूरा जोर देना चाहिए ताकि चालाक लोग उन्हें किसी भी तरीके से बेवकूफ न बना सकें.

दुर्लभ जीवों पर मंडराता संकट

मुंबई के लोखंडवाला में एक रेस्तरां ने अपनी ऐंट्रैंस पर 2 बड़े पिंजरों में बौने बंदर रख रखे हैं. ग्राहकों को वे सब से ज्यादा आकर्षित करते हैं. मैं ने राज्य के पशु कल्याण विभाग को मालिक को गिरफ्तार करने को कहा. वन विभाग ने कार्यवाही करने से यह कह कर इनकार कर दिया कि विदेशी जानवरों को रखने पर कोई जुर्म नहीं बनता. लगता है जब तक मुझे कुछ उपाय नहीं मालूम पड़ता, ये तस्कर लुप्तप्राय जानवरों को दर्शाते रहेंगे.

कुछ महीने पहले पुणे में एक पैट फेयर लगा. यहां सुंदर विदेशी पक्षी, मछलियां और खास नस्ल के कुत्ते को प्रदर्शित करने की किसी तरह की कोई अनुमति नहीं थी पर पुलिस और वन विभाग ने कोई कदम नहीं उठाया, क्यों? क्योंकि उन का कहना था कि विदेशी प्रजातियों पर कोई भारतीय कानून लागू नहीं होता. उन्हें नए पशु कल्याण बोर्ड के चेयरमैन ने अनुमति भी दे रखी थी. पशुओं को खुले में नहीं चोरीछिपे बेच भी डाला गया.

खुल कर चलता कारोबार

पिछले दिनों बैंगलुरु में एक घर से 3 खास विदेशी प्रजाति के अजगर मिले. वन विभाग ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि ये विदेशी जातियां हैं और इन्हें रखने पर कोई जुर्म नहीं बनता. बाद में मालिक ने आंख बचा कर इन अजगरों को जंगल में छोड़ दिया.

उत्तर प्रदेश में एक आदमी अफ्रीकी पिट वाइपर सांप के काटने से मर गया. शायद यह सांप बाहर से चोरीछिपे लाया गया था.

किसी भी पशु बेचने वाले के यहां चले जाएं, ऐग्जोटिक दुर्लभ जीवों के कई नमूने मिल जाएंगे. नैट पर हजारों किस्म के रंगबिरंगे, अनूठे जीव बिकने को तैयार मिलेंगे. मैक्सिको, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका से दुर्लभ जीव भारत कस्टम पार कर पहुंच रहे हैं. इन की तस्करी जोरों पर है. इन्हें आमतौर पर दूसरे सामान से भरे कंटेनरों में लाया जाता है, जिन्हें खोल कर देखना कस्टम विभाग के लिए असंभव होता है.

कस्टम वालों की मिलीभगत

एक महिला कस्टम अफसर तो खुद ही तस्करी में शामिल थी. उस का पार्टनर थाईलैंड में था. मेरे शिकायत करने पर उस का तबादला कर दिया गया. पर अब भी वह किसी और पोर्ट पर तैनात है और वहां पार्टनर से मिल कर तस्करी करने को आजाद है.

वाइल्डलाइफ क्राइम ब्यूरो तो सिर्फ कानून बदलने की दुहाई देता रहता है व वाइल्डलाइफ प्रोटैक्शन ऐक्ट 1972 के बदलने के लिए जयराम रमेश, सुनीता नारायण और अब डा. राजेश गोपाल कुछ नहीं कर पाए.

इस तरह से सौफ्ट शैल्ड कछुए, विशेष प्रजाति की छिपकलियां, गिरगिट, लम्बर्ड्स, सांप, मकौड़े भारत में आ कर बिकते रहते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता.

दिल्ली में सरकार की नाक के नीचे हर तरह के दुर्लभ जीव मिल सकते हैं. इगुआना क्व18 हजार में मिलती है और टारैंट्युला क्व16 हजार में. गिरगिट क्व12 हजार में मिलते हैं. दिल्ली में मुख्य वनजीवी वार्डन का कार्यालय है, 2 इंस्पैक्टरों के साथ, पर वे कभी दफ्तर से बाहर नहीं निकलते. मैं जब चाहूं जहां मरजी कुछ भी खरीद सकती हूं.

महरौली में एक जने के राजनीतिबाजों से अच्छे संबंध हैं पर कानून की कमी के कारण हमेशा बच निकलता है. हमारे सरकारी अफसरों का आलम यह है कि वे सोचते हैं कि देश अंतर्राष्ट्रीय समझौतों पर दुर्लभ जीवों को बचाने के लिए हस्ताक्षर करता है ताकि छवि अच्छी बनी रहे. उन पर अमल करना बेमतलब की बात है. दुनियाभर के दुर्लभ जीवों को नष्ट करने में अमेरिका व चीन के बाद भारत का ही नंबर है.

अमीर गरीब के बीच बढ़ता फासला

देश में अमीर और गरीब के बीच अंतर बढता जा रहा है. आर्थिक नीतियों का गरीबों की आर्थिक दशा पर बुरा असर पड़ रहा है. क्रेडिट स्विस की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2018 के अनुसार देश के 10 प्रतिशत सब से अमीर लोगों के पास तीन चौथाई से ज्यादा संपत्ति है. यह संपत्ति लगभग 77.4 प्रतिशत है.

इस के विपरीत सब से गरीब 60 प्रतिशत आबादी के पास सिर्फ 4.7 प्रतिशत संपत्ति है. जानकारों के अनुसार प्रतिदिन दो डौलर से कम आय को पैमाना माना जाए तो देश में गरीबी पिछले 10-12 सालों में 55 प्रतिशत से 28 प्रतिशत रह गई है. देश में मध्य वर्ग भी तेजी से उभर रहा है पर संपत्ति में गरीबों को पर्याप्त हिस्सा नहीं मिल पा रहा है.

इसी कारण सब से अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास जितनी दौलत है, उस का दस प्रतिशत हिस्सा भी सब से गरीब 60 प्रतिशत आबादी के पास नहीं है.

देश में 91 प्रतिशत वयस्क आबादी के पास 10 हजार डौलर यानी करीब 74.4 लाख रुपए से कम संपत्ति है जबकि 0.6 प्रतिशत वयस्कों की संपत्ति 7.5 करोड़ रुपए से अधिक है.

औसत आय में अंतर के मामले में अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देश भारत, चीन और ब्राजील जैसे विकासशील देशों से कहीं आगे हैं. भारत में प्रति वयस्क औसत आय 1289 डौलर, चीन में 16,133 डौलर, ब्राजील में 4263 डौलर, अमेरिका में 61,667 डौलर है. भारत प्रति व्यक्ति औसत संपत्ति के मामले में 128वें स्थान पर है.

आर्थिक गैरबराबरी को आंकने वाले गिनी वेल्थ कोफिसिएंट के अनुसार 2013 में भारत में असमानता का स्तर 81. 3 प्रतिशत था जो 2018 में 85.4 प्रतिशत पहुंच गया. इस का अर्थ अमीरों और गरीबों के बीच खाई और चौड़ी हो रही है.

सरकार की विभिन्न विकास योजनाओं के चलते लाखों गरीब विस्थापित हो गए और लाखों विस्थापन के कगार पर है. इस का असर इन लोगों के रोजगार पर पड़ा है. सरकार की नोटबंदी की वजह से पिछले समय से लाखों छोटे कारोबारी, रेहड़ी, पटरी, खोमचे वालों को रोजगार छिन गया. शहरों में रोजगार के लिए आए इन लोगों को वापस गांव जाना पड़ा या दूसरे शहर में पलायन करना पड़ा.

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा रोजगार और विकास के बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं लेकिन उन की पोल रोजगार की तलाश में बड़ी तादाद में इधर से उधर आजा रहे लोग खोल रहे हैं. यही वजह है कि कभी उत्तरप्रदेश, बिहार के लोगों को महाराष्ट्र से खदेड़ा जाता है तो कभी गुजरात से.

असल में यह कमजोरी उन राज्य सरकारों की है जो अपने लोगों को उचित रोजगार मुहैया कराने में नाकाम रही हैं. उन की इस नाकामी की वजह से ही लोगों को अपना घर, अपना परिवार, अपना प्रदेश छोड़ कर मजबूरन दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ रहा है.

लिहाजा सरकारों की नीतियों का दंश गरीब लोग भुगत रहे हैं. सरकारों की योजनाएं और नीतियां अमीरों को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं जिन में गरीबों को रोजीरोटी से हाथ धोना पड़ता है.

किसी भी कल्याणकारी सरकार का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य के नागरिकों को रोजगार के पर्याप्त साधन, सुविधाएं और माहौल उपलब्ध कराए पर यह नहीं हो पा रहा है. अमीरी और गरीबी के बीच सरकारी नीतियों और मंशाओं की वजह से फासला बढ़ रहा है.

…तो ईपीएफओ और ईएसआईसी क्या करेंगे?

देश के 2 केन्द्रीय सामाजिक संगठनों यानी एम्प्लाइज प्रोविडेंट फण्ड ओर्गनाइजेशन (ईपीएफओ) और एम्प्लाइज स्टेट इन्श्योरेन्स कार्पोरेशन (ईएसआईसी) से तकरीबन 10 करोड़ सदस्यों की सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी ले ली जाएगी.  केंद्र सरकार यह जिम्मेदारी राज्यों को दे देगी. वहीं, सरकार सामाजिक सुरक्षा कवरेज को पांच गुना बढ़ाकर 50 करोड़ वर्कर्स को कवर देगी.

सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रस्तावित लेबर कोड के तहत, श्रम मंत्रालय 50 करोड़ वर्कर्स तक पहुंच बनाने के लिए सामाजिक सुरक्षा की बाबत व्यापक बदलाव पर जोर दे रहा है. मंत्रालय का मानना है कि इतनी बड़ी तादाद में वर्कर्स को केवल एक केन्द्रीय संगठन के जरिए सेवा नहीं दी जा सकती.

केंद्र सरकार की सोच यह है कि हर राज्य में सिंगल विंडो सिस्टम की व्यवस्था की जाए, जिसके तहत राज्यों के सामाजिक सुरक्षा बोर्ड्स पेंशन, प्रोविडेंट फण्ड, मेडिकल इंश्योरेंस, मेटरनिटी, डिसेबिलिटी, डेथ आदि सभी तरह के मामलों में सामाजिक सुरक्षा के लिए सिंगल विंडो सिस्टम की तरह काम करेंगे.

सरकार की योजना है कि इस सम्बन्ध में कुछ जिलों में पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाएगा और उस की कामयाबी के मद्देनजर सामाजिक सुरक्षा कोड पर संसद से प्रस्तावित कानून पास हो जाने के बाद इस योजना को कुछ वर्षों में देशभर में लागू किया जाएगा.

कानून के तहत, राज्य अपने सामाजिक सुरक्षा बोर्ड बनाएंगे. ये बोर्ड स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय होंगे, जिन में राज्य सरकार, केंद्र सरकार, नियोक्ताओं (एम्प्लोयर्स) और कर्मचारी संघों के प्रतिनिधि होंगे.

बड़े स्तर पर इस बदलाव की योजना के मद्देनजर, सरकार ईपीएफओ को 50 करोड़ वर्कर्स के फण्ड मैनेजर में बदलने पर विचार कर रही है. चूंकि योजना के तहत ईपीएफओ के मुख्य काम राज्यों के बोर्ड के हवाले किये जायेंगे, ऐसे में ईपीएफओ फण्ड मैनेजर का काम करेगा जो इन्वेस्टमेंट के रिटर्न के हिसाब से प्रोविडेंट फण्ड डिपाजिट के लिए वार्षिक ब्याज दर का एलान भी करेगा.

योजना का मकसद ईपीएफओ के 6 करोड़ सदस्यों की सामाजिक सुरक्षा के कई दशकों के प्रबंधन अनुभव का लाभ उठाना है. सरकार की योजना के मुताबिक, आने वाले समय में ईपीएफओ सभी राज्यों के सामाजिक सुरक्षा फण्ड को मैनेज करने वाला केन्द्रीय बोर्ड बनेगा.

ईपीएफओ के फण्ड को अभी 5 फण्ड मेनेजर – एसबीआई, आईसीआईसीआई, सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप, रिलायंस कैपिटल एचएसबीसी एएमसी और यूटीआई एएमसी मैनज करते हैं जबकि ईपीएफओ का पूरा फोकस पूरी तरह सामाजिक सुरक्षा फण्ड के कलेक्शन और डिस्बर्समेंट पर है.

अभी जो मौजूदा पैटर्न है, उस के मुताबिक, प्रोविडेंट फण्ड का 50 फीसदी तक निवेश सरकारी सिक्योरिटीज जबकि 45 फीसदी तक निवेश डेट इंस्ट्रूमेंट्स और 15  फीसदी तक निवेश इक्विटी में किया जा सकता है.

नए सिस्टम में मेडिकल इंश्योरंस, मैटरनिटी बेनिफिट और डिसएबिलिटी कवर सहित सभी सामाजिक सुरक्षा कवर के लिए राज्यों में सिंगल विंडो सिस्टम बनेगा.

बहरहाल. सामाजिक सुरक्षा फण्ड के लिए इन्वेस्टमेंट पैटर्न का नोटिफिकेशन केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ही जारी करेगा.  ईपीएफओ के फण्ड मैनजेर यह सुनिश्चित करेंगे कि इन्वेस्टमेंट इस पैटर्न में हो कि इन्वेस्टमेंट पर ज्यादा से ज्यादा रिटर्न मिले. इन्वेस्टमेंट पर रेट औन रिटर्न का फैसला और उस का एलान ईपीएफओ करेगा. उसे लागू करने या ज्यादा रिटर्न की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी.

देश में बढ़ता भ्रष्टाचार, जिम्मेदार कौन?

देश में भ्रष्टाचार खत्म करने का जितना शोर किया जा रहा है वह उतना ही तेजी से बढ रहा है. सरकारी विभाग, संस्थाएं भ्रष्टाचार के संगठित अड्डे बन गए हैं. खुद प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन सीबीआई के शीर्ष अधिकारी जांच के नाम पर भ्रष्टाचार का खेल खेल रहे हैं और करोड़ों के लेनदेन के खुलासे हो रहे हैं.

भ्रष्टाचार पिछले साल की तुलना में 11 प्रतिशत बढ़ गया है. इस बात का गैर सरकारी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में दावा किया है.

संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 के सर्वे में 45 प्रतिशत लोगों ने कहा था कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. इस बार पिछली बार से 11 प्रतिशत अधिक 56 प्रतिशत लोगों ने यह बात कही है.

56 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने रोजमर्रा के कामों के लिए रिश्वत देनी पड़ी है. पिछली बार ऐसा कहने वाले 45 प्रतिशत लोग थे. 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि घूस का लेनदेन नकद में किया गया. शेष ने गिफ्ट के रूप में घूस दी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे में 68 प्रतिशत नागरिकों ने कहा कि उन के राज्यों में भ्रष्टाचार निरोधक हेल्पलाइन नहीं है. 33 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें उन के राज्य में ऐसी किसी हेल्पलाइन के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में शामिल 34 प्रतिशत लोगों ने कहा कि राज्य ने भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए हैं पर यह कदम असरदार नहीं हैं.

सर्वे में राजस्थान, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल को शामिल किया गया था. इन राज्यों के 215 शहरों में सर्वे किया गया जिसमें 50 हजार लोग शामिल हुए. इन में 67 प्रतिशत पुरुष और 33 प्रतिशत महिलाएं थीं.

महानगरों से 45 प्रतिशत, द्वितीय श्रेणी के शहरों से 34 प्रतिशत और तृतीय श्रेणी तथा ग्रामीण क्षेत्रों से 21 प्रतिशत ने सर्वे में भाग लिया था.

सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि सब से ज्यादा रिश्वत पुलिस महकमे के अफसरों को मिली. इस के बाद नगर निगम, संपत्ति पंजीकरण और अन्य अधिकारियों को दी गईं.

खास बात यह है कि भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए सरकारी कार्यों का कंप्यूटरीकरण करने के बावजूद घूसखोरी पर कोई अंकुश नहीं लगा है. हालांकि सरकारी दफ्तरों में लगे सीसीटीवी कैमरे रिश्वत के लेनदेन में बाधा बने हैं. ऐसी जगहों पर जहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे वहां सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों ने रिश्वत दी.

भ्रष्टाचार हमारे देशवासियों के लिए सनातन सत्य है. सरकारी विभागों और अफसरों को दोष दे कर जनता अपना पल्लू नहीं झाड़ सकती. स्वयं जनता अपना काम निकालने के लिए अधिकारियों को पैसा, गिफ्ट या अन्य किसी रूप में रिश्वत की पेशकश करने में शामिल है.

बेईमानी, घूसखोरी हमारी हमारी नसनस में समाई हुई है. अपना काम निकालने के लिए व्यक्ति किसी भी हद तक झूठ, अनैतिकता का रास्ता अख्तियार करने से गुरेज नहीं करता. यह सीख हमें हमारी उन पुरानी किताबों के कथा किस्सों से मिलती रही है जिन पर हमें बहुत श्रद्धा, आस्था है

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