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आस्ट्रेलिया दौरे से पहले भारतीय टीम को लेकर सचिन ने की ये भविष्यवाणी

जैसा कि आप सभी जानते हैं भारत के लिए आस्ट्रेलिया का दौरा हमेशा से ही मुश्किलों से भरा रहा है, लेकिन पूर्व बल्लेबाज और क्रिकेट खे भगवान ने हाल ही में इस दौरे को लेकर एक भविष्यवाणी की है. सचिन का कहना है कि मौजूदा भारतीय टीम में आस्ट्रेलिया में जीत हासिल करने की शक्ति है. सचिन के मुताबिक मौजूदा आस्ट्रेलियाई टीम में योग्यता और अनुभव की कमी है, बावजूद इसके विराट कोहली की कप्तानी वाली टीम को मेजबानों को मात देने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना होगा.

सचिन ने एक हिन्दी समाचार चैनल से बात करते हुए कहा, ‘हमारे वहां जीतने की काफी संभावना है. अगर आप अतीत की आस्ट्रेलियाई टीम को देखें और उसकी तुलना मौजूदा टीम से करें तो हमारा पलड़ा औपको काफी भारी नजर आएगा. इसलिए शायद हमारे लिए वहां जा कर जीतने का यह सर्वश्रेष्ठ मौका है. मेरा कहना है कि वह टीम इस समय उच्च स्तर की क्रिकेट नहीं खेल रही है. मुझे लगता है कि अतीत में उनकी टीमें काफी अच्छी थीं.’

उन्होंने आगे कहा, उनके पास पहले अच्छे अनुभवी खिलाड़ी थे और आज की टीम गैरअनुभवी है. यह टीम अपने आप को एकजुट करने की कोशिश कर रही है और एक अच्छी टीम बनने के लिए प्रयासरत है. लेकिन, आस्ट्रेलियाई टीम अपनी प्रतिद्वंद्विता के लिए जानी जाती है. अगर वह अच्छा मुकाबला करें तो मुझे हैरानी नहीं होगी. वहां जाना और उन्हें चुनौती देना आसान नहीं है. वहां जा कर उन्हें चुनौती देने के लिए हमारे अंदर आग होनी चाहिए. हमारे पास अच्छे तेज गेंदबाज और स्पिनर हैं. हमारे पास अच्छे बल्लेबाज भी हैं. आप टेस्ट मैच तब जीतते हैं जब आप काफी सारे रन बनाते हैं. विराट कोहली की कप्तानी शैली और उनकी मौजूदा फौर्म टीम को मजबूती देगी. मुझे लगता है कि यह उनकी भूख है, उनमें मानसिक मजबूती है. उनमें स्थिति को परखने की अच्छी काबिलियत है.

इसके अलावा सचिन ने हाल ही में टी-20 टीम से बाहर किए गए पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के भविष्य के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा, मैं कभी कोई फैसला नहीं सुनाता. पहले भी मैंने कभी इस तरह की बातें नहीं की कि चयनकर्ताओं को क्या करना चाहिए. धोनी क्रिकेट के सभी प्रारूप में हमेशा से खतरनाक खिलाड़ी रहे हैं. उन्होंने इतने वर्षों में इसकी जिम्मेदारी भी ली है. मुझे हमेशा से लगता है कि जो खिलाड़ी इतने लंबे समय तक खेलता है, उसे पता होता है कि उसे क्या करने की जरूरत है और क्या करना चाहिए. मेरा मानना है कि धोनी बहुत अच्छे से जानते हैं कि क्या चल रहा है और उतने ही ठोस तरीके से जानते हैं कि क्या करने की जरूरत है. मैं भी उस स्थिति से गुजरा हूं. मैं जानता था कि मुझे क्या करने की जरूरत है.

राम मंदिर पर प्राइवेट बिल की ढाल

राम मंदिर मसले पर राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिये भारतीय जनता पार्टी अब प्राइवेट बिल लाने की योजना में है. प्राइवेट बिल पर गैर भाजपाई दल अगर राममंदिर के समर्थन में वोट करते है तो इसे भाजपा की जीत कही जायेगी और अगर वह राम मंदिर बिल के विरोध् में जाते हैं तो इन दलों को ही आम चुनाव में हिन्दुत्व के नाम पर हाशिये पर रखा जायेगा. भाजपा के सासंद राकेश सिन्हा ने इस बात के संकेत देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिये. असल में भाजपा की केन्द्र सरकार पर हिन्दुत्व का भारी दबाव है.

2014 के आम चुनाव में विकास की बात करने वाली भाजपा ने 5 साल में कोई ऐसा काम नहीं किया है जिसके बल पर वह 2019 के आम चुनाव में जा सके. ऐसे में केवल राममंदिर ही ऐसा मुददा है जिसके बल पर वह एक बार फिर से लोगो को भावनात्मक रूप से उलझा सकती है. ऐसे में जरूरी है कि चुनाव के पहले होने वाले संसद सत्र के दौरान कुछ करती दिखे. केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इस मसले पर कोई ठोस कदम उठाने के लिये तैयार नहीं है. ऐसे में बीच का रास्ता यही बनता है कि संसद के सत्र में एक प्राइवेट बिल आये. राम मंदिर पर हंगामा हो और मामला चुनाव का मुददा बन सके.

जिस तरह से नर्म हिन्दुत्व का समर्थन सभी दल कर रहे हैं ऐसे में भाजपा को उम्मीद है कि प्राइवेट बिल के विरोध करने पर उनको राम का विरोधी साबित किया जा सकेगा. लखनऊ में हुई संघ और भाजपा की बैठक में सभी नेताओं की एकजुट राय थी कि अगर राम मंदिर पर कुछ नहीं हुआ तो चुनाव प्रचार मुश्किल हो जायेगा. इसके बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान भी आया. मुम्बई में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और संघ प्रमुख की बैठक में यह मुददे सामने आयेंगे.

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीपावली के अवसर पर अयोध्या में भव्य दीपोत्सव कर रहे हैं. योगी आदित्यनाथ ने कहा कि दीपोत्सव का इंतजार कीजिये शुभ समाचार आयेगा. ऐसे में इस बात की योजना साफ हो जाती है कि भाजपा दीपावली में राम मंदिर की अपनी अगली रणनीति की घोषणा कर सकती है. इससे साफ लग रहा है की देश की राजनीति 1992 के पहले वाली मंदिर की राजनीति पर वापस लौट सकती है.

स्टार्टअप्स के मोर्चे पर महिलाएं क्यों हैं फिसड्डी!

श्रीति पांडेय एक प्रोफेशनल महिला हैं, जो अपना स्टार्टअप शुरू करने के लिए पुआल से घर बनाने के प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं. सरकारी स्टार्ट अप इंडिया प्रोग्राम समेत कई बड़े फंड प्रोवाइडर को अप्लाई कर चुकी हैं लेकिन फंड नहीं मिला. उनके मुताबिक़ पूरे देश में इस प्रोजेक्ट पर मैं ही काम कर रही हूं. बावजूद इसके स्टार्टअप के तहत सहयोग नहीं मिला सो प्रोजेक्ट को भी रफ्तार नहीं मिल रही.

श्रीति पांडेय के जैसा ही हाल निष्ठा अग्रवाल का भी है. ये बच्चों को शुरू से ही टेक्निकल एजुकेशन देने पर काम कर रही हैं. इस प्रोजेक्ट को लेकर मार्केट से अच्छा रिस्पौन्स भी मिला है लेकिन स्टार्टअप का प्रासेस इतना पेंचीदा है कि उन्हें अभी तक समझ ही नहीं आया कि किसके सामने प्रोजेक्ट प्रजेंट किया जाए.

फंड बढ़ा लेकिन गया कहा
ऐसा नहीं है की भारत में स्टार्ट अप सफल नहीं हैं. 25 अक्टूबर 2018 को नेशनल एसोसिएशन औफ सौफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज यानी नासकौम द्वारा ‘इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम: अप्रोचिंग इस्केप वेलोसिटी’ रिपोर्ट पेश की गयी. रिपोर्ट में नासकौम ने साफ़ किया है कि देश में स्टार्टअप के वित्त पोषण में इस साल 108 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी. यह 2017 के दो अरब डौलर से बढ़कर इस साल 4.2 अरब डौलर पर पहुंच गया. इतना हे इनहीं उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी वाले स्टार्टअप की संख्या में 2017 की तुलना में इस साल 50 प्रतिशत वृद्धि हुई है. बावजूद इसके महिलाओं के साथ यह भेदभाव समझ से परे है.

इन्वेस्टमेंट का जेंडर गैप
दरअसल अन्य क्षेत्रों की तर्ज पर स्टार्टअप के मामले भी महिलाओं के साथ भेदभाव का रुख अख्तियार किया जाता है. इस बात को लेकर कई सर्वे भी हुए हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि अप्लाई करने वाले ज्यादातर महिला अप्लीकेंट्स को स्टार्ट अप के कई टेक्नीकल पहलुओं में उलझाकर फंड से दूर रखा जाता है. एक स्टडी के मुताबिक महिला प्रोफेशनल को मेल प्रोफेशनल की तुलना में कम इन्वेस्टमेंट मिलता है. लिहाजा आधे से अधिक महिलाएं अपने स्टार्टअप्स आइडिया को चाहकर भी स्टार्ट नहीं कर पाती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इन्वेस्टमेंट गैप इतना बड़ा है कि महिलाओं से जुड़े स्टार्टअप को 9.35 लाख डौलर जबकि पुरुषों के स्टार्टअप को 21 लाख डौलर का फंड मिला है. मजेदार पहलू तो यह है कि महिलाओं के स्टार्टअप्स को कम फंडिंग मिलने के बावजूद उनकी कंपनियों का रेवेन्यू पुरुष स्टार्टअप कंपनियों से ज्यादा होता है. स्टडी के मुताबिक इन्वेस्टमेंट कम मिलने के बावजूद पिछले पांच सालों में महिलाओं के स्टार्टअप ने पुरुषों के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा रेवेन्यू कमाया है. महिलाओं के स्टार्टअप ने हर एक डौलर पर 78 सेंट्स कमाया है जबकि पुरुषों के स्टार्टअप 31 सेंट्स कमाया है. महिलाओं के स्टार्टअप ने ज्यादा पैसा कमाया है. गौरतलब है कि यह स्टडी करीब 18,000 स्टार्टअप के बीच की गयी है.

स्टार्टअप इंडिया पर सवाल
नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में ‘स्टार्टअप इंडिया’ को लौन्च करते समय बड़े बड़े दावे करते हुए इसे महिलाओं की आत्मनिर्भर से जोड़ा था. एक आंकड़ा भी पेश किया लेकिन सच तो यह है कि ज्यादातर महिला अप्लीकेंट्स के अनुभव बेहद कड़वे रहे हैं. इनका कहना है कि स्टार्टअप योजना जो पेपर में है वह अभी तक जमीन पर उतर ही नहीं पाई है. इस योजना में अक्सर उन्हें लाभ मिलता है जो पहले से ही किसी इंडस्ट्री में हैं, पहली दफा नए स्टार्ट अप आइडियाज वालों के लिए रास्ते लगभग बंद हैं.

मेल डोमिनेटिंग थ्योरी
अमेरिका के सैन डिएगो स्थित यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया के शोधार्थियों के अनुसार 90% वेंचर कैपटिलिस्ट, जो स्टार्टअप्स में पैसा लगाते हैं, पुरुष हैं. जाहिर है ये कैपटिलिस्ट महिलाओं को फंड नहीं देते. इस लिहाज से साबित हो जाता है कि महिलाओं को स्टार्टअप की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में रुकावट पैदा करती है वही सदियों पुरानी मेल डोमिनेटिंग थ्योरी.

महिलाओं के साथ पक्षपात का यह सिलसिला पुराना है फिर चाहे वह आर्थिक स्तर पर हो या लैंगिक व फंडिंग लेवल पर. धर्म और रिवाज के नाम पर इस फैक्ट को सालों से एस्टेब्लिश किया गया है कि महिलाएं सिर्फ चूल्हा फूंकने के लिए बनी हैं बिजनेस तो पुरुषों का दंगल है. इसमें महिलाओं का भला क्या काम. हम यह भूल जाते हैं कि जिस देश में महिलाओं को भेदभाव, प्रतिबंध और कामकाज में नीचे रखा जाता है वहां का सामाजिक और आर्थिक विकास भी आधा अधूरा रहता है. आज इन्हें साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने से रोकना सिर्फ उनके विकास में बाधक नहीं बनता बल्कि देश का विकास भी अवरुद्ध करता है.

आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति को ‘डाउन टू अर्थ’ होना पड़ता है : जैकी श्रौफ

फिल्म ‘हीरो’ से हिंदी सिनेमा जगत में चर्चित होने वाले अभिनेता जैकी श्रौफ किसी परिचय के मोहताज नहीं. हालांकि उनकी पहली फिल्म ‘स्वामी दादा’ थी, पर फिल्म ‘हीरो’ ने उन्हें रियल हीरो बना दिया, जिसके बाद से उन्हें पीछे मुडकर देखना नहीं पड़ा. उन्हें लोग प्यार से ‘जग्गू दादा’ भी कहते हैं. उन्होंने हर तरह की फिल्में की और अपनी एक अलग पहचान बनायीं. उन्होंने आज तक करीब 9 भाषाओँ में 175 से अधिक फिल्में की हैं. मिलनसार और हंसमुख स्वभाव के लिए वे आज भी सभी निर्देशकों के प्रिय पात्र रहे हैं और करीब सभी बड़े निर्देशकों और कलाकारों के साथ उन्होंने काम किया है.

हीरो, कर्मा, रामलखन, परिंदा, सौदागर, किंग अंकल, अग्निसाक्षी, भूत अंकल, देवदास, लज्जा आदि ऐसी कई फिल्में हैं, जो बौक्स औफिस पर हिट रहीं और उन्हें कई पुरस्कार भी मिले. वे फिल्मों को दिल से करते हैं और जो भी चरित्र उन्हें मिलता है, उसे सजीव कर देते हैं. उन्हें आज भी हर कहानी और हर किरदार नया और चुनौतीपूर्ण लगता है. वे फिल्मों की कहानी और चरित्र पर हमेशा ध्यान देते हैं और कोशिश ये करते हैं कि दर्शकों को कुछ नया दे सकें. उनका बेटा अभिनेता टाइगर श्रौफ है, जबकि उनकी बेटी कृष्णा श्रौफ एक टीचर, प्रोड्यूसर और सहायक निर्देशक भी है. अभी जैकी ने एक बड़ी शार्ट फिल्म ‘द प्लेबौय मि. शाहनी’ में प्ले बौय की मुख्य भूमिका निभाई है. उनसे मिलकर बात करना रोचक था पेश है कुछ अंश.

इस फिल्म को करने की खास वजह क्या है?

इस फिल्म में एक पुरुष और महिला के बीच के संबंधो को दिखाने की कोशिश की गयी है. जिसमें यह बताया गया है कि कैसे वे एक दूसरे को समझने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. प्यार, पैसा और शोहरत  कैसे किसी की जिंदगी को बना और बिगाड़ सकती है और इसकी जरुरत कहां तक है. इसके अलावा एक छोटी सी बात प्यार की परिभाषा को इस फिल्म में बहुत चंद समय में कही गयी है. ये अवधारणा मेरे लिए नयी थी और मैंने इसे स्वीकार किया. शोर्ट फिल्म मुझे इसलिए भी पसंद है कि कम समय में एक बड़ी बात कहने का मौका मिलता है.

आपने इस फिल्म में प्ले बौय की भूमिका निभाई है, क्या रियल लाइफ में भी इस तरीके के प्रसंग आपकी जिंदगी में आए?

मेरी पत्नी आयशा पहले मेरी प्रेमिका हुआ करती थी. वह बहुत छोटी थी जब मैं उनसे मिला और बातचीत शुरू की. इससे पहले जब मैं स्कूल में था तब एक लड़की से मुझे प्यार हुआ था, लेकिन तब जेब में पैसे नहीं थे. इसलिए रिश्ता टूट गया. दूसरी ऐसी थी, जिसे मैं बहुत प्यार करता था, उसने कहा था कि मैं कमाकर तुम्हें सम्भालुंगी, मुझे लगा यह ठीक है, पर पता चला कि वह 11 वीं पास है. फिर भी मैं शादी के लिए तैयार था और सोचा था कि मैं कुछ पोस्टर या काम कर परिवार चला लूंगा, लेकिन संभव न हुआ. तीसरी ऐसी मिली थी, जो मुझे अमेरिका ले जाकर पिता का व्यवसाय सम्हालने को कह रही थी. पर उस समय मेरे माता-पिता की उम्र हो चुकी थी और मैं उन्हें अपने साथ नहीं ले जाना चाहता था और वह भी रिश्ता टूट गया. इसके बाद मुझे एक दिन आयशा बस में लटकती हुई दिखी. पहले तो देखकर ‘उफ’, फिर प्यार हुआ और वहीं से हमारी कहानी शुरू हुई. पहले तो मैं उनके घर में रहा और उनका साथ दिया. फिर आयशा की मां ने मुझे अलग घर लेकर दिया और मेरी शादी आयशा से करायी और आज मेरी जिंदगी यहां तक पहुंची है. आयशा ने मुझे हमेशा सहयोग दिया है, क्योंकि शादी के बाद सबकुछ बदल जाता है. बच्चे होने के बाद और भी बदलाव आता है. आयशा ने हमेशा मुझपर विश्वास रखा, दोनों बच्चो को अच्छी परवरिश दी. तभी मैं महीनो दूर रहकर काम कर सका. मैंने माधुरी दीक्षित से लेकर सभी बड़ी हीरोइनों के साथ काम किया, लेकिन उसने कभी मुझे कुछ भला-बुरा नहीं कहा. आज भी मैं उसे बहुत प्यार और मान देता हूं.

अपनी लम्बी जर्नी से आप कितने खुश हैं और आप अभी भी किसी फिल्म में आने पर अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं, ये कैसे संभव होता है?

मैंने पहले बहुत संघर्ष किया एक अच्छी फिल्म के लिए, लेकिन फिल्म ‘हीरो’ के हिट होने के बाद मेरी जिंदगी बदल गयी. इसके बाद इंडस्ट्री में अपने आप को बनाये रखने के लिए बहुत डाउन टू अर्थ होना पड़ता है. टेक्निशियन से लेकर निर्माता निर्देशक सभी के साथ एक अच्छी बोन्डिंग रखनी पड़ती है. इसके लिए आपकी बौडी लेंग्वेज से लेकर बातचीत, आवाज आदि सारी बातों पर ध्यान देना पड़ता है. ये हर क्षेत्र में लागू होता है चाहे आप लेखक हो या कहानीकार, आगे वही बढ़ता है, जिसे किसी दूसरे व्यक्ति को समझने की समझ हो.

क्या कुछ मलाल रह गया है?

मैं अधिक नहीं सोचता, जो कहानी मेरे दिल को छूए उसे कर लेता हूं. इसके अलावा कोई ऐसा व्यक्ति जिसे मेरी मदद की जरुरत है, उसे अवश्य करता हूं. कई बार तो मैंने किसी दोस्त के फिल्म में भी काम किया है, ताकि वह आगे बढ़ सके. इसके अलावा मैं अपनी भावनाओं, पैसे, बैनर और अच्छी स्क्रिप्ट के लिए काम करता हूं.

अबतक की फिल्मों में कौन सी फिल्म आपके दिल के करीब है और क्यों?

फिल्म ‘किंग अंकल’ मेरे दिल के बहुत करीब है, इसमें ‘गर्ल चाइल्ड एडाप्शन’ पर कहानी थी. जिसे करने में मुझे बहुत अच्छा लगा था.

आपके बच्चे आपके काम से कितने प्रभावित हैं?

मेरे बच्चे मेरे काम से बहुत प्रभावित हैं और इसका श्रेय मेरी पत्नी और मेरी मां को जाता है, क्योंकि मैं तो काम पर था और इस दौरान उन दोनों ने बच्चो की पूरी देखभाल की है.

आपकी फिटनेस का राज क्या है?

मैं रोज 12 घंटा काम करता हूं, जिसमें 5 घंटा खड़े रहना पड़ता है. इससे मेरी फिटनेस बनी रहती है.

क्या कुछ सामाजिक काम करना चाहते हैं?

मैं ‘थैलेसेमिया’ नामक बीमारी के बारें में लोगों की जागरूकता को बढ़ाना चाहता हूं. इस बीमारी में हर 15 दिन बाद खून बदलना पड़ता है. ये बहुत कठिन है. इतनी छोटी उम्र में बच्चे का नस नहीं मिलता. इसके लिए शादी से पहले पति-पत्नी को अपने खून की जांच अवश्य करवा लेनी चाहिए, ताकि इस रोग से बच्चा मुक्ति पा सकें. इसके अलावा कोई भी सामाजिक काम के लिए मैं हमेशा तैयार रहता हूं.

आगे अभी कौन सी फिल्म है?

मेरी अगली फिल्म ‘प्रस्थानम’ और ‘भारत’ है. इसके अलावा वेब सीरीज और तमिल फिल्म भी कर रहा हूं.

इंडस्ट्री में आये बदलाव को कैसे देखते हैं?

बदला बहुत कुछ है, पर भावनाएं नहीं बदली हैं. लोग जज्बाती हैं और जज्बाती ही रहेंगे. इसके अलावा थिएटर भी अधिक खुल गए हैं और फिल्मों को बनाने की तकनीक बहुत बदली है. आजकल लोग किसी दूसरे के बारें में बहुत सोचते हैं. मेरी सलाह है कि वे किसी के बारें में सोचना बंद करें और अपने बारें में अधिक सोचे. हर रोज ब्रश करते हुए व्यक्ति अगर अपने आपको आईने में देख लें, तो समझ आयेगा कि हम कितने पानी में है.

तेरी ही खुशबू

तुम पास नहीं हो मेरे, मगर

हर सू है तेरी ही खुशबू.

मैं ने खुशबू में किया स्नान.

इक महक लिपट गई देही से

जब मन में तेरा किया ध्यान.

ये पवन कहां से आई है

चंदन सी खुशबू लाई है

मनमृग की मद कस्तूरी ने

अनुलोम विलोम महकाई है.

पंकज स्मृतियों के जवां हुए

कुछ दृश्य पटल पर उग आए

जब झीने परदों के भीतर

जो कुछ हम ने तुम ने मिल कर

किया उन लमहों के दरम्यान

मैं ने खुशबू में किया स्नान.

है बूंद बड़ी, समंदर कमतर

है प्रेम रसायन बड़ा विचित्तर

ढूंढ़ रहे सब भोट भिड़ाते

इस खुशबू के जंतरमंतर

सदियों से सारे धन्वन्तर

इस कतरे में डूबा उस के

तैर गए दोनों जहान

मैं ने खुशबू में किया स्नान.

  • कन्हैयालाल वक्र

मेरी देह मेरा अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक नए फैसले में 158 साल पुराने कानून, जिस में किसी अन्य की पत्नी के साथ सहमति से यौन संबंध बनाने पर भी दंड दिया जा सकता है, असंवैधानिक करार दिया है. यह कानून अपनेआप में अनैतिक था और हमेशा इस पर आपत्तियां उठती रही हैं पर पहले हिंदू कानून और फिर अंगरेजी कानून बदला नहीं गया. रोचक बात यह है कि यदि पति किसी के साथ संबंध बनाए तो पत्नी को यह हक नहीं था कि वह शिकायत कर सके. एक और रोचक बात इस कानून में यह थी कि गुनहगार पत्नी नहीं परपुरुष ही होता था.

इस कानून का आधार यह था कि पत्नियां पतियों की जायदाद हैं और परपुरुष उन से संबंध बना कर संपत्ति का दुरुपयोग न करें. यदि पति इजाजत दे दे तो यह कार्य दंडनीय न था. यानी मामला नैतिकता या विवाह की शुद्धता का नहीं, मिल्कीयत का था.

पहले भी 2-3 बार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका या और एकतरफा होने के कारण इसे असंवैधानिक करने की मांग की जा चुकी थी पर अदालतों ने हस्तक्षेप नहीं किया और न ही संसद ने यह कानून बदला. अंगरेजों को दोष देने की जगह असल में भारतीय संसद इस कानून के लिए जिम्मेदार है जिस ने 70-75 साल इसे थोपे रखा.

वैसे यह कानून निष्क्रिय सा ही था और बहुत कम मामले ही दर्ज होते थे, पर फिर भी विवाहित औरत और उस के प्रेमी पर तलवार तो लटकी ही रहती थी कि न जाने कब पति शिकायत कर दे और प्रेमी जेल में बंद हो जाए और पत्नी की जगहंसाई हो जाए.

बहुत सी विवाहिताएं अपने पति का घर छोड़ कर प्रेमी के साथ रहने से कतराती थीं कि कहीं पुलिस मामला न बन जाए पर पत्नी के पास यह अधिकार न था कि वह किसी और विवाहिता या अविवाहिता के साथ रहने वाले पति पर मुकदमा दायर कर सके.

हां, वैवाहिक कानून में इस मामले में दोनों को तलाक लेने का हक पहले से ही बराबर का है पर प्रक्रिया लंबी है और थाने के चक्कर वकीलों के चक्करों से ज्यादा दुखदाई होते हैं.

पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अनैतिक कार्य व्यभिचार है और परपुरुष को ही अपराधी बनाना गलत नहीं, क्योंकि इस से गैरपुरुष के साथ यौन संबंध बनाने वाली औरत को सुरक्षा व संरक्षण मिलता है. सुप्रीम कोर्ट बराबर का मतलब यह मान रहा था कि पत्नी पर भी मुकदमा चले.

अब के फैसले में यह कहा गया है कि पत्नी पर भी आपराधिक मामला नहीं बनेगा और उस के प्रेमी पर भी नहीं. इस फैसले का मतलब अब यह भी है कि लोकसभा भी कानून नहीं बना सकती क्योंकि यह गैरसंवैधानिक घोषित कर दिया गया है. यदि संसद पहले से कानून बना कर कुछ करती तो गुंजाइश थी कि सांसद मनचाहा बीच का रास्ता अपना लेते.

यह सैक्स संबंधों में उदारता का लाइसैंस नहीं है, यह स्त्रीपुरुष के संबंधों को थानेदारों से बचाने का कवच है. पतिपत्नी संबंध आपसी सहमति का संबंध है, इस में कानून की सहायता से जोरजबरदस्ती नहीं चलनी चाहिए. नैतिकता का पाठ पढ़ाने और हिंदू संस्कृति की दुहाई देने वाले अगर अपने धर्म ग्रंथों के पृष्ठ खंगालेंगे तो पाएंगे कि जिन देवीदेवताओं को वे पूजते हैं उन में से लगभग हर देवीदेवताओं के विवाहेतर संबंध रहे हैं.

भारतीय समाज में घरों में भी और बाजारों में भी सैक्स का खुलापन आज भी है और हम जो शराफत का ढोल पीटते हैं वह केवल इसलिए कि हम सब अपनी खामियों को छिपा कर रखने में सफल रहे हैं. हम हर उस व्यक्ति का मुंह तोड़ सकते हैं जो सच कहने की हिम्मत करता है और महान भारतीय हिंदू संस्कृति का राज केवल यहीं तक सीमित है. आज जो बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं, इसलिए कि औरतों को संपत्ति मानने की तो सामाजिक, सांस्कारिक सहमति पहले से ही है. अगर औरत सड़क पर दिखे तो उसे उठा कर वैसे ही इस्तेमाल करा जा सकता है जैसे सड़क पर पड़े 2 हजार रुपए के नोट को.

पतिपत्नी संबंध बराबर के हों, मधुर हों, सुखी हों, यह जिम्मेदारी पतिपत्नी दोनों की है, बराबर की है. कानून की धौंस दे कर अब पति अपनी पत्नी को किसी और से बात करने पर धमका नहीं सकता. यह नैतिक, प्राकृतिक और मौलिक अधिकार है.

 

भाई नहीं महबूबा चाहिए : आरिस ने आखिर ऐसा क्या किया

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद की विश्वपटल पर पीतल नगरी के नाम से पहचान बनी हुई है. मुरादाबाद के थाना  कटघर क्षेत्र में आने वाली वरबला खास मियां कालोनी में मुनव्वर अली अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी नूरजहां और 6 बच्चे थे, जिन में 2 बेटे आरिस व अरबाज के अलावा 4 बेटियां थीं.

मुनव्वर एक मैटल फर्म में काम करता था. उस ने अपने बड़े बेटे आरिस को एक टैंपो खरीद कर दे दिया था. उसी से वह बिल्डिंग मैटीरियल सप्लाई कर के अच्छीखासी कमाई कर लेता था. छोटे बेटे अरबाज को मुनव्वर ने एक मोटरसाइकिल मैकेनिक के पास काम सीखने के लिए लगा दिया था.

4 जुलाई, 2018 को अरबाज मोटरसाइकिल मैकेनिक की दुकान से रात 8 बजे घर पहुंचा. भाई को आया देख बड़ी बहन ने उसे पैसे दे कर पास की दुकान से दूध की थैली लाने के लिए भेज दिया.

उस ने दूध ला कर बहन को दे दिया. दूध दे कर वह बाहर जाने लगा, तो बहन ने टोका, ‘‘अब कहां जा रहा है, खाने का टाइम हो गया है. खाना तो खाता जा.’’

‘‘थोड़ी देर में आऊंगा, तभी खा लूंगा.’’ कह कर अरबाज घर से निकल गया.

अरबाज को गए हुए काफी देर हो गई लेकिन वह घर नहीं लौटा तो घर वाले परेशान हो गए. यह स्वाभाविक ही था, क्योंकि इस से पहले वह कभी घर से इतनी देर के लिए गायब नहीं हुआ था. घर वाले उसे ढूंढने के लिए निकल गए. उन्होंने पूरी कालोनी छान मारी लेकिन अरबाज नहीं मिला. उन्होंने उस के साथियों, दोस्तों से भी पूछा पर कोई जानकारी नहीं मिली. थकहार कर घर वाले रात 12 बजे घर लौट आए.

मुनव्वर का बड़ा बेटा आरिस बजरी ले कर कहीं गया हुआ था. वह भी घर नहीं लौटा था. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. घर वालों ने समझा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अरबाज भी आरिस के साथ चला गया हो. यही सोच कर वे आरिस के लौटने का इंतजार करने लगे.

आरिस रात करीब डेढ़ बजे घर पहुंचा. अरबाज उस के साथ नहीं था. घर वालों ने आरिस से पूछा कि अरबाज तुम्हारे साथ तो नहीं गया था. इस पर आरिस ने कहा, ‘‘नहीं, वह मेरे साथ नहीं था. मैं तो अकेला ही गया था. उस की बात सुन कर सभी आश्चर्यभरी निराशा में डूब गए.’’

मुनव्वर ने बेटे से कहा, ‘‘बेटा, रात करीब साढ़े 8 बजे से अरबाज गायब है. पता नहीं कहां चला गया. हम ने सब जगह ढूंढ लिया.’’

अब्बू की बात सुन कर आरिस भी परेशान होते हुए बोला, ‘‘कहां गया होगा वह?’’ इस के बाद वह घर वालों के साथ 15 वर्षीय अरबाज को ढूंढने के लिए निकल पड़ा.

करीब एक घंटे बाद आरिस भी निराश हो कर घर लौट आया. घर वाले अरबाज की चिंता में रात भर ऐसे ही बैठे रहे. यह बात 3-4 जुलाई, 2018 की है.

अगले दिन सुबह करीब 6 बजे कालोनी के लोगों ने रेलवे क्रौसिंग के पास नवनिर्मित दुकान के अंदर अरबाज का शव पड़ा देखा तो इस की सूचना मुनव्वर अली को दी.

पूरा परिवार घटनास्थल पर पहुंच गया. अरबाज की लाश देख कर सब लोग बिलखबिलख कर रोने लगे. कुछ ही देर में वहां तमाम लोग जमा हो गए. इसी बीच किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. खबर मिलते ही थाना कटघर पुलिस मौके पर पहुंच गई. थानाप्रभारी संजय गर्ग ने घटनास्थल का निरीक्षण किया.

अरबाज की लाश औंधे मुंह पड़ी थी. उस के सिर व हाथपैरों पर गहरी चोटों के निशान थे. गले पर लगे निशानों से लग रहा था कि उस की गला दबा कर हत्या की गई थी और उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. सीओ सुदेश कुमार भी वहां आ गए थे. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया.

खोजी कुत्ता निर्माणाधीन दुकान के अंदर गया और वहां से टूटी दीवार से निकल कर खाली प्लौट से होता हुआ सिद्दीकी कालोनी में पहुंच गया. करीब 200 मीटर चलने के बाद वह वापस आ गया.

मामला शहर की घनी आबादी के बीच का था, इसलिए वहां सैकड़ों की संख्या में लोग जमा हो गए. अरबाज की लहूलुहान लाश देख कर लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. खबर मिलते ही एसपी (सिटी) अंकित मित्तल भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

गुस्साए लोगों ने अरबाज की लाश अपने कब्जे में ले कर सड़क पर रख दी और वहीं बैठ गए. इस से मुरादाबाद लखनऊ राजमार्ग व मुरादाबाद रामनगर मार्ग पर लंबा जाम लग गया. भीड़ हत्यारों को शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग कर रही थी.

जाम की सूचना पर मुरादाबाद के एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों के समझाने पर करीब डेढ़ घंटे बाद लोगों ने जाम खोला. पुलिस ने फटाफट मौके की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिएभेज दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि अरबाज की हत्या गला घोंट कर की गई थी. उस के एक हाथ की हड्डी भी टूटी पाई गई. कातिलों ने अरबाज के सिर पर भारी डंडे या धातु की रौड से वार किए थे, जिस से सिर की हड्डियां भी टूट गई थीं.

डाक्टरी रिपोर्ट से यह बात साफ हो गई थी कि हत्यारे किसी भी सूरत में अरबाज की जान लेना चाहते थे.

मामले का जल्द खुलासा करने के लिए एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ ने 3 टीमों का गठन किया, जिन का नेतृत्व सीओ सुदेश कुमार, थानाप्रभारी संजय गर्ग और एसएसआई दिनेश शर्मा को करना था. निर्देशन का काम एसपी (सिटी) अंकित मित्तल को सौंपा गया.

पुलिस ने इस बारे में अरबाज के घर वालों से पूछताछ की, तो मृतक के बड़े भाई आरिस ने शहर के ही 7 लोगों सफदर, अशरफ, मुर्सलीम, सद्दाम, आसिफ, वाजिद व बड़े मियां (रामपुर वाले) पर शक जताया.

तीनों टीमें अपनेअपने तरीके से केस की जांच में जुट गईं. कुछ पुलिसकर्मियों को घटनास्थल के आसपास सादे कपड़ों में तैनात कर दिया गया, जो पलपल की रिपोर्ट अधिकारियों को दे रहे थे.

आरिस ने जिन 7 लोगों पर शक जताया था. पुलिस टीम से उन के घर दबिश दी, तो वे सभी लोग अपनेअपने घरों से फरार मिले. पुलिस ने वरबला खास के संभ्रांत लोगों से नामजद आरोपियों के बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि नामजद लोग बेहद गरीब हैं. उन का कोई आपराधिक रिकौर्ड भी नहीं है. उन्हें इस मामले में रंजिशन फंसाया जा रहा है.

इसी दौरान पुलिस को एक खास बात यह पता चली कि आरोपी मुर्सलीम की पत्नी अजरा से अरबाज के बड़े भाई आरिस के साथ अवैध संबंध थे. इस बात को ले कर दोनों पक्षों में आए दिन झगड़ा होता रहता था.

थानाप्रभारी संजय गर्ग ने महिला पुलिस को साथ ले कर नामजद अभियुक्त मुर्सलीम की पत्नी अजरा से भी पूछताछ की. अजरा ने स्वीकार किया कि उस के आरिस के साथ संबंध हैं. आरिस उसे इतना चाहता है कि उस से शादी करने को तैयार है. इतना ही नहीं, वह उसे भगा कर ले जाने की बात करता है.

कुल मिला कर आरिस उसे ले कर पागल बना हुआ था. अजरा ने बताया कि यह बात उस के पति मुर्सलीन को भी पता चल चुकी थी, जिस की वजह से मुर्सलीन और आरिस के बीच कई बार झगड़ा भी हुआ. अजरा ने बताया कि लड़ाई होना अलग बात है, लेकिन उस का पति और ससुराल वाले हत्या जैसा काम नहीं कर सकते.

यह बात थानाप्रभारी की भी समझ में आ गई. लेकिन यह उन की समझ में नहीं आ रही थी कि अजरा के पति मुर्सलीन और उस के घर वालों की दुश्मनी आरिस से थी तो उन्हें आरिस को मारना चाहिए था न कि अरबाज को.

अजरा से पूछताछ कर के थानाप्रभारी लौट आए. उधर आरिस पुलिस पर नामजद अभियुक्तों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने का दबाव बना रहा था. पुलिस जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी, इसलिए वह आरिस को यह समझाबुझा कर घर भेज देती थी कि आरोपियों की तलाश में जगहजगह दबिश दी जा रही हैं.

थानाप्रभारी संजय गर्ग ने एसएसआई दिनेश शर्मा, एसआई मुकेश शुक्ला, कांस्टेबल गौरव कुमार और सत्यवीर पहलवान को आरिस की गतिविधियां चैक करने पर लगा दिया. इस पुलिस टीम को आरिस की गतिविधियां संदिग्ध लगीं.

इस के बाद पुलिस ने आरिस के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उन्हें 2 फोन नंबर ऐसे मिले, जिन पर आरिस ने वारदात वाले दिन कई बार बात की थी. जिन नंबरों पर उस की बात हुई थी, उन की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई तो उन नंबरों की लोकेशन घटनास्थल के पास पाई गई.

अब पुलिस के शक की सुई आरिस की तरफ घूम गई. जिन 2 नंबरों पर आरिस ने बात की थी, वह नंबर रामपुर दोराहा, बरवाला मझला निवासी सुलतान व जामा मसजिद निवासी जुनैद के निकले.

पुलिस ने उन दोनों को पूछताछ के लिए उठा लिया. उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने सब कुछ बता दिया है. उन्होंने बताया कि अरबाज की हत्या में उस का बड़ा भाई आरिस भी शामिल था.

यह सुन कर एसपी अंकित मित्तल सहित सभी यह सोच कर सन्न रह गए कि प्रेमिका को पाने के लिए सगा भाई इस हद तक जा सकता है कि प्रेमिका के पति और उस के परिवार को हत्या में फंसाने के लिए षडयंत्र रच कर अपने सगे भाई की हत्या करवा दे.

अभियुक्त सुलतान व जुनैद द्वारा अपना अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने आरिस को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जब आरिस को गिरफ्तार कर थाने ला रही थी तो आरिस ने पुलिस से पूछा कि मुझे थाने क्यों ले जाया जा रहा है. इस पर थानाप्रभारी संजय गर्ग ने कहा कि तुम्हारे भाई के हत्यारे पकड़े जा चुके हैं. थाने चल कर देख लो, वह कौन है.

थाने पहुंच कर पुलिस ने आरिस का सामना अभियुक्त सुलतान व जुनैद से करवाया तो उस के होश उड़ गए. थानाप्रभारी को गुस्सा आया तो उन्होंने आरिस के गाल पर एक तमाचा जड़ते हुए कहा कि इतने दिनों से नाटक कर हमें बेवकूफ बना रहा था. उन्होंने आरिस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गांव के मुर्सलीन की पत्नी अजरा से उस के नाजायज संबंध हैं.

प्रेमिका के पति और उस के घर वालों ने उस के साथ कई बार मारपीट की थी. उन्हें सबक सिखाने के लिए ही उस ने अपने छोटे भाई अरबाज की हत्या कर के मुर्सलीन और उस के घर वालों को फंसाने की योजना बनाई थी.

यह काम करने के लिए उस ने अपने दोस्त सुलतान और जुनैद से बात की तो वे उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. 3 जुलाई, 2018 को अरबाज जब दूध की थैली लेने गया था तो बाहर उसे आरिस मिल गया. उस ने अरबाज से कहा कि दूध की थैली घर रख कर आ जाना. मुझे पार्टी से पैसे लेने के लिए जाना है. पैसे मिलेंगे तो तुझे भी दूंगा. और हां, घर पर कुछ मत बताना. भाई की बात मान कर अरबाज दूध की थैली घर रख कर तुरंत बड़े भाई के पास आ गया.

उस समय बिजली गुल थी. आरिस अरबाज को अपने साथ ले गया. घर से करीब 100 मीटर दूर ताजपुर रेलवे क्रौसिंग के पास उसे जुनैद और सुलतान मिल गए. वे तीनों 15 वर्षीय अरबाज को वहीं पास में एक निर्माणाधीन दुकान के अंदर ले गए. फिर तीनों ने अरबाज का गला घोंट कर हत्या कर दी. बाद में रौड से उस के सिर पर कई वार भी किए. इस से पहले अरबाज ने कहा भी था कि भाई मुझे क्यों मार रहे हो, मैं ने क्या बिगाड़ा है. उस ने भागने की कोशिश भी की थी. लेकिन सुलतान ने उसे नीचे गिरा दिया था. जुनैद ने पैर पकडे़ और आरिस ने खुद ही अपने छोटे भाई का गला घोंटा था.

तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद एसपी (सिटी) ने आरिस के मामा व मां नूरजहां को भी थाने बुलवा लिया. उन के सामने आरिस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. आरिस ने बताया कि उस ने यह सब इसलिए किया था कि अरबाज की हत्या के आरोप में मुर्सलीन व उस के घर वाले जेल चले जाएं. उन के जेल जाने के बाद वह अपनी प्रेमिका अजरा से बिना किसी डर के मिलता रहता और उस से निकाह कर लेता.

लेकिन एक तीर से दो शिकार करने का उस का मकसद सफल नहीं हो सका. इस में उस ने अपने भाई को तो खो ही दिया साथ ही उसे खुद भी जेल जाना पड़ा.

तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें मुरादाबाद जिला जेल भेज दिया गया.  ?

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इंटीरियर को रौयल टच देना हो तो इन परदों का जवाब नहीं

मकान को घर बनाती है सजावट और सजावट में चार चांद लगाते हैं रंगबिरंगे और स्टाइलिश परदे जिन की हर थीम से घर का माहौल और मिजाज बदल जाता है. तो आप भी बदल डालिए परदों से अपने घर का लुक.

परदों के क्रिएटिव आइडियाज

ग्रोमेट कर्टेन्स: इस तरह के परदे भले ही दिखने में सिंपल हों, लेकिन कमरे की रौनक बढ़ा देते हैं. इन की खासीयत यह है कि इन में हर तरह का फैब्रिक यूज कर सकते हैं. आप इन के गैटअप को और बढ़ाने के लिए हैडर में सिल्वर रिंग्स का इस्तेमाल करें.

शीर कर्टेन्स: इन परदों को जो एक बार देख लेती है वह इन्हें खरीदे बिना नहीं रह पाती, क्योंकि ये मनभावन कलर्स, डिजाइनों व पैटर्न में जो मिलते हैं. ये पारदर्शी होते हैं जिस से आप रूम में बैठ कर ही बाहर का आनंद ले सकती हैं. ऐसे कर्टेन्स आमतौर पर ड्राइंगरूम बगैरा में लगाए जाते हैं.

रौड पौकेट कर्टेन्स: रौड पौकेट कर्टेन्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि कर्टेन पैनल में से रौड निकलती है, जिस से परदे की पूरी डिजाइन दिखती है. ये खासकर लाइटवेट फैब्रिक के बनते हैं.

टैब टौप कर्टेन्स: लूप्स फैब्रिक के बने होने के साथ या तो उन्हें पीछे की साइड से सिला जाता है या फिर फ्रंट  पर बटन बगैरा से स्टाइल दे कर जोड़ा जाता है और फिर रौड से कनैक्ट किया जाता है. इस तरह के परदे आमतौर पर विंडो बगैरा पर यूज होते हैं.

प्लीटिड कर्टेन्स: इस तरह के कर्टेन्स आउट औफ फैशन नहीं होते और ये बहुत ही फौर्मल लुक देते हैं. इन में हैडर टैप की मदद से प्लीट्स बना कर उन्हें पीछे की तरफ सिला जाता है और फिर टैप में हैंगिंग हुक्स लगाए जाते हैं, जो काफी अच्छा लुक देते हैं.

विंडो स्कार्फ: अगर आप खिड़कियों पर सिर्फ डैकोरेशन के मकसद से कर्टेन्स डालना चाहती हैं, तो विंडो स्कार्फ बैस्ट हैं. इन से रूम को बहुत ही सौफ्ट टच मिलता है और स्टफ में हलके होने के कारण इन्हें धोना भी बहुत आसान होता है.

कैफ कर्टेन्स: अकसर 2 पार्ट्स में बंटी विंडोज में इस तरह के परदे लगाए जाते हैं और ये कितने लंबे होंगे यह आप की विंडो की लंबाई पर निर्भर करता है. इन्हें आप बनवा भी सकती हैं या फिर रैडीमेड भी खरीद सकती हैं. ये अकसर किचन, बाथरूम बगैरा में ज्यादा प्रयोग किए जाते हैं, क्योंकि ये प्राइवेसी को मैंटेन करने के साथसाथ विंडों के ऊपर की लाइट को भी ब्लौक नहीं होने देते.

पैलमेट्स: अगर आप ने मैचिंग कर्टेन्स लिए हैं, तो ध्यान रखें कि पैलमेट्स भी अट्रैक्टिव होने चाहिए. तभी परदों में ग्रेस आ पाती है. यह परदों को हैंग करने वाला ढांचा होता है, जिसे आप अपने हिसाब से यूज कर सकती हैं.

कर्टेन्स खरीदते समय रखें यह ध्यान

सही फैब्रिक का चुनाव: वैसे तो आप को मार्केट में सिल्क फैब्रिक से बने सुंदरसुंदर कर्टेन्स मिल जाएंगे, लेकिन इन्हें हैंडल करना मुश्किल होता है, क्योंकि आप को इन्हें हर बार ड्राईक्लीन करवाने की जरूरत होगी. इसलिए ईजी हैंडल के लिए आप कौटन, पौलिएस्टर और सिंथैटिक फाइबर से बने परदे खरीदें. सस्ते होने के साथसाथ आप इन्हें जैसा चाहें वैसे धो सकती हैं.

कलर व पैटर्न करें रूम को सूट: अपने रूम से मैच करते कलर व पैटर्न का चुनाव करें. अगर दीवारों पर डार्क शेड है तो परदे लाइट या मिक्स मैच कर के लगाएं. पेस्टल शेड यूज करने पर रूम काफी बड़ा दिखाई देता है. साथ ही पैटर्न चूज करते समय यह ध्यान रखें कि अगर दीवारों पर डिजाइनिंग हुई है, तो प्लेन कर्टेन्स और अगर दीवारें प्लेन हैं, तो प्रिंटेड कर्टेन्स यूज करें.

ईजी टू हैंडल: अगर सिर्फ ब्यूटी ही फोकस में है तो ट्रांसपैरेंट कर्टेन्स खरीदें वरना डबल शैड, सिंगल शैड के परदे भी अच्छे रहते हैं, क्योंकि ये ईजी टू हैंडल हैं और साथ ही जल्दी खराब भी नहीं होते.

समाजसेवी की हैवानियत : मूकबधिर लड़कियों के साथ क्या हुआ

मोनिका पुरोहित इंदौर के तुकोगंज थाना क्षेत्र मूकबधिर पुलिस सहायता केंद्र की समन्वयक हैं. थाने में यह  सहायता केंद्र उन के पति ज्ञानेंद्र पुरोहित की पहल पर खुला था. जानने वाले ही जानते हैं कि पुरोहित दंपति ने अपना जीवन मूकबधिरों के नाम कर रखा है. उन के कानूनी हकों के लिए ज्ञानेंद्र ने लंबी लड़ाई लड़ी है और वे आज भी उन की किसी भी तरह की सहायता के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहते हैं.

मूकबधिरों के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले पुरोहित दंपति के पास हजारों अहम और दिलचस्प अनुभव हैं. लेकिन 2 अगस्त, 2018 को अपने कार्यालय में बैठी मोनिका को जो अनुभव हुआ, वह शर्मसार कर देने वाला था.

हुआ यूं था कि उस दिन आदिवासी बाहुल्य जिले धार के एक गांव की 2 मूकबधिर लड़कियां उन के पास आई थीं. अपने पति की ही तरह मोनिका भी मूकबधिरों की भाषा यानी साइन लैंग्वेज की अच्छी जानकार हैं, इसलिए मूकबधिरों को उन की किसी भी समस्या के समाधान के लिए उन के पास भेज दिया जाता है.

ये दोनों लड़कियां यह जानने उन के पास आई थीं कि पढ़ाई के लिए वे कहां जाएं और इस के बाद उन का भविष्य क्या है. मोनिका के लिए यह कोई नई बात नहीं थी, लिहाजा उन्होंने तुरंत साइन लैंग्वेज में इन लड़कियों को उन के सारे सवालों के जवाब दिए और यह कह कर उन का उत्साह बढ़ाया कि मूकबधिर होना एक कमी जरूर है लेकिन यह कमी कोई अभिशाप नहीं है.

साथ ही उन्होंने दोनों लड़कियों को उन सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी भी दी, जिन के तहत सरकार दिव्यांग बच्चों को अपने खर्चे पर न केवल पढ़ातीलिखाती है, बल्कि हौस्टल और खानेपीने का भी सारा खर्च उठाती है.

लड़कियों से बात करतेकरते मोनिका को कुछ साल पहले उन्हीं लड़कियों के गांव से आई एक और मूकबधिर लड़की पार्वती (बदला नाम) की याद आई जो इन्हीं की तरह उन के पास जानकारियां लेने आई थी. पार्वती की तरफ उन का ध्यान इसलिए भी गया था कि वह बेहद मासूम और खूबसूरत थी.

उस ने इंदौर में उन्हीं के पास रह कर 8वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, इसलिए उन्हें उस से कुछ ज्यादा ही लगाव था. उन्होंने जिज्ञासावश पार्वती के बारे में पूछा कि इन दिनों वह कहां है और कैसी है.

पार्वती के बारे में सुनते ही दोनों लड़कियों के चेहरे सकपकाए और उन का रंग उड़ गया. दोनों की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया देख कर मोनिका चौंकीं. वह समझ गईं कि कुछ गड़बड़ है. यह अंदेशा होते ही मोनिका ने दोनों को प्यार से पुचकारा तो उन्होंने जो सच बताया उसे सुन कर मोनिका सिर से ले कर पांव तक सिहर उठीं.

उन्होंने इन दोनों से उस के बारे में जो सुना, उसे जान कर एक क्षण को उन के जेहन में यह खयाल भी आया कि दुनिया में ऐसेऐसे लोग भी हैं, जो विकलांगों तक को नहीं छोड़ते.

वह कुछ देर सकते की हालत में रहीं लेकिन जल्द ही उन्होंने सख्ती से यह सख्त फैसला ले लिया कि वह उस हैवान को उस के किए की सजा दिलाने में अपनी भूमिका जरूर निभाएंगी, जिस ने एक ऐसी लड़की की जिंदगी नर्क बना दी, जो बेचारी न बोल सकती है और न ही सुन सकती है. उन्होंने सोचा कि ऐसे हैवान को अगर सजा नहीं मिली तो उस के जैसे न जाने कितने हैवान भोलीभाली मासूम मूकबधिरों को अपनी हवस और वासना का शिकार बनाते रहेंगे और उन के वहशीपन पर शराफत और समाजसेवा का चोला पड़ा रहेगा.

पार्वती की कड़वी हकीकत आई सामने

दोनों लड़कियों ने मोनिका को बताया कि पार्वती का हाल बुरा है. वह भोपाल के जिस हौस्टल में रह रही है, उस का संचालक अश्विन शर्मा उसे घर नहीं जाने दे रहा. जबकि पार्वती की पढ़ाई पूरी हो चुकी है. मूकबधिर पार्वती मध्य प्रदेश में धार जिले के एक गांव की रहने वाली थी.

यह इशारा ही मोनिका के दिमाग की घंटियां बजा देने के लिए काफी था. कुछ सोचने के बाद मोनिका ने पार्वती के घर फोन किया और सारी बात बताई. इस के अगले दिन ही पार्वती का भाई उसे लेने के लिए भोपाल रवाना हो गया. 4 अगस्त को वह भोपाल पहुंच कर हौस्टल के संचालक अश्विन से मिला और समझदारी दिखाते हुए यह बहाना बनाया कि घर में जरूरी काम आ गया है, इसलिए पार्वती को तुरंत ले जाना है.

अश्विन उस की मंशा समझ नहीं पाया और उस ने पार्वती को यह सोचते हुए जाने दिया कि चिडि़या जाएगी कहां, 2-4 दिनों में अपने पिंजरे में वापस आ जाएगी. सधी ऐक्टिंग करते हुए पार्वती का भाई अपनी बहन को वहां से धार होते हुए इंदौर में मोनिका के पास ले गया.

मोनिका को देखते ही पार्वती उन के सीने से लग कर फफकफफक कर रो पड़ी. अपने ऊपर हुए अत्याचारों की कहानी कहने के लिए उस के आंसू ही काफी थे, जिन्हें किसी जुबान की जरूरत नहीं थी लेकिन अश्विन को उस के कुकर्मों की सजा दिलवाने के लिए महज आंसू ही काफी नहीं थे, इसलिए उन्हें शब्द देना जरूरी हो गया था. लिहाजा पार्वती ने अपनी आपबीती मोनिका को विस्तार से सुना दी.

पार्वती की आपबीती सुन कर मोनिका ने धार के पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र सिंह से संपर्क किया और उन्हें सारी बात बताई. चूंकि मामला गंभीर था, इसलिए उन्होंने डीआईजी और आईजी को भी सूचना दे दी. नतीजतन 8 अगस्त, 2018 को धार थाने में पार्वती की रिपोर्ट दर्ज की गई. अश्विन शर्मा के खिलाफ एफआईआर नंबर शून्य पर मामला दर्ज करते हुए डायरी भोपाल के अवधपुरी थाने भेज दी गई.

इंसान नहीं शैतान था अश्विन शर्मा

अवधपुरी भोपाल के रायसेन रोड पर स्थित एक विकसित रिहायशी इलाका है. यहां की एक कालोनी क्रिस्टल आइडल सिटी में दिव्यांगों के लिए एक हौस्टल संचालित होता है, जिस का संचालक 35 वर्षीय अश्विन शर्मा है. उसी के हौस्टल में पार्वती कैद थी. यहीं पर अश्विन ने 3 डुप्लेक्स फ्लैट किराए पर ले रखे थे.

संस्था के साथसाथ यहीं उस का ‘कृतार्थ’ नाम से हौस्टल भी है. अब तक क्रिस्टल आइडल सिटी और अवधपुरी के लोग यही जानते थे कि अश्विन समाजसेवी है और दिव्यांग बच्चियों की मदद करता है. इस बाबत अकसर वह बड़ी बेचारगी से कहता भी था कि उस का बेटा भी दिव्यांग है, इसलिए वह समाजसेवा का यह काम करता है.

आजकल तमाम जगहों पर ऐसी संस्थाएं और हौस्टल हैं, इसलिए लोगों को हैरानी नहीं होती. अश्विन को मूकबधिर लड़कियों के आवास और खानेपीने के लिए प्रदेश के सामाजिक न्याय विभाग से आर्थिक सहायता मिलती थी.

जैसे ही पुलिस ने अश्विन को गिरफ्तार किया, मामले ने राजनैतिक तूल पकड़ लिया. क्योंकि मामला एक मूकबधिर आदिवासी लड़की से हौस्टल के संचालक द्वारा बलात्कार का था. अश्विन की गिरफ्तारी की खबर देश भर में आग की तरह फैली क्योंकि इन्हीं दिनों बिहार और उत्तर प्रदेश के इसी तरह के दुराचारों को ले कर सड़क से संसद तक हल्ला मचा हुआ था और लोग सरकार को पानी पीपी कर कोस रहे थे कि आखिर ये हो क्या रहा है, जो मासूम दिव्यांग लड़कियों को हवस का शिकार बनाया जा रहा है.

लोगों ने किया प्रदर्शन

अभी पार्वती के साथ हुई ज्यादती पूरी तरह लोगों के सामने नहीं आई थी लेकिन अश्विन की गिरफ्तारी के दूसरे दिन इंदौर के हीरानगर थाने में 2 और सगी मूकबधिर बहनों ने उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. उन्होंने कहा कि अश्विन अपने हौस्टल में उन के साथ शारीरिक छेड़छाड़ करता था.

अश्विन की हैवानियत पूरी तरह 11 अगस्त, 2018 को उजागर हुई, जब होहल्ला मचने के बाद धार थाने में एक और लड़की सुनीता (बदला हुआ नाम) ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई कि अश्विन ने उस के साथ बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य किया था.

अश्विन के पापों का घड़ा फूटा तो लोग उबल पड़े लेकिन इस घड़े में पहला पत्थर मारने वाली 20 वर्षीय पार्वती ही थी. वह किस तरह उस के चंगुल में आ फंसी थी, यह जानना इस लिहाज से जरूरी है कि आखिर कैसे एनजीओ और हौस्टल के नाम पर लड़कियों के शारीरिक और मानसिक शोषण का कुचक्र चलता है और इस में कुछ सरकारी विभाग भी परोक्ष रूप से शामिल होते हैं.

पार्वती लगभग 3 साल पहले अश्विन के संपर्क में आई थी. 10वीं का इम्तिहान पार्वती ने सन 2015-16 में पास किया था. सामाजिक न्याय विभाग ने उसे आगे पढ़ने के लिए भोपाल भेजा था. भोपाल में उसे गैस राहत विभाग के गोविंदपुरा स्थित आईटीआई में एडमिशन मिला था. यहां ट्रेनिंग के दौरान दिव्यांग छात्रछात्राओं की जिम्मेदारी उठाने वाले सामाजिक न्याय विभाग ने ही उसे अश्विन शर्मा के अवधपुरी स्थित हौस्टल भेजा था.

पार्वती जब हौस्टल रहने आई, तब वहां कई लड़कियां रहती थीं. पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद जब लड़कियां घर जाने लगीं तो अश्विन ने 4 लड़कियों को ट्रेनिंग के बहाने रोक लिया. उसी वक्त उस ने इन लड़कियों को यह भी बताया कि अब उन्हें बजाय हौस्टल के उस के घर पर रहना पड़ेगा.

अभी तक सरकारी और अश्विन के अहसान तले दबी ये लड़कियां उस की कुत्सित मंशा नहीं समझ पाई थीं. 2016 की दीवाली के दिनों में अश्विन ने राक्षसी तरीके से पार्वती के जिस्म से छेड़छाड़ की थी, जिस से उसे कई दिनों तक दर्द सहना पड़ा. उस रात अश्विन जबरन उस के बिस्तर में घुस गया था.

पार्वती फंसी अमानुष के चंगुल में

24 दिसंबर, 2016 को अश्विन ने पार्वती का बलात्कार किया था. उस रात उस की मंशा देख पार्वती ने उस के हाथपांव जोड़ते हुए बख्शने की मिन्नतें की थीं. लेकिन इस हैवान का दिल नहीं पसीजा. अश्विन जब बिस्तर से बाहर निकला, तब लुटीपिटी पार्वती के कपड़े खून से सन गए थे. उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे और उस के साथ ऐसा क्यों हो रहा है.

बोलने और सुनने की ताकत तो कुदरत ने उसे दी नहीं थी. अश्विन की ज्यादती से उस पर क्या गुजरी होगी, इस का सहज अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता. किसी तरह वह इसे भुलाने की कोशिश कर रही थी कि कुछ दिन बाद अश्विन ने उस के साथ फिर जबरदस्ती कर डाली.

इंदौर के हीरानगर थाने में जिन 2 बहनों ने रिपोर्ट लिखाई थी, उन्होंने पुलिस को बताया था कि अश्विन ने उन के साथ भी बलात्कार की कोशिश की थी, पर दोनों बहनें उस की पिटाई कर इंदौर भाग आई थीं. लेकिन उन्होंने अश्विन के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखाई थी. जब वह गिरफ्तार हुआ तो उन्हें हिम्मत बंधी. यह मामला इंदौर में एफआईआर संख्या शून्य पर दर्ज किया गया.

धार की सुनीता ने बताया था कि अश्विन जबरन उसे अश्लील वीडियो दिखाता था. इस पर उस ने मना किया तो अश्विन ने उस की पिटाई भी की. सुनीता के मुताबिक हौस्टल में लड़कियों से नौकरानियों की तरह काम करवाया जाता था और अश्विन कम उम्र लड़कियों के साथ अप्राकृतिक तरीके से यौन क्रियाएं करता था.

इन चारों लड़कियों ने अलगअलग दिन साइन लैंग्वेज में जो आपबीती सुनाई, वह वाकई दिल दहला देने वाली निकली. पता चला कि गरीब घरों की मूकबधिर लड़कियों की इमदाद के नाम पर कैसेकैसे शोषण किया जाता है. इन मामलों के उजागर होने पर भोपाल की सड़कों पर प्रदर्शन हुए, हायहाय के नारे लगे और खूब राजनीति भी हुई. इस में सामाजिक न्यायविभाग की संदिग्ध भूमिका भी सामने आई.

अश्विन के बारे में पुलिस कोई खास जानकारी नहीं दे पाई, सिवाय इस के कि उस के पिता 65 वर्षीय राजेंद्र शर्मा रेलवे से रिटायर्ड सीनियर सेक्शन इंजीनियर हैं. राजेंद्र शर्मा चाहते थे कि अश्विन भी पढ़लिख कर अफसर बने, पर ऐसा नहीं हो पाया तो पैसा कमाने के लिए वह कैटरिंग का काम करने लगा.

कैटरिंग का धंधा साल भर नहीं चलता, इसलिए अश्विन ने मेस चलाना शुरू कर दिया. हौस्टल और मेस वह भी सरकारी मदद से चलाना खासे मुनाफे का धंधा है, इसलिए अश्विन की महत्त्वाकांक्षाओं को पर लग गए.

बनने लगी भूमिका पाप की इमारत खड़ी करने की

जल्द ही इस चलतेपुर्जे ने कई नेताओं और अधिकारियों की नजदीकियां और कृपा हासिल कर ली और हौस्टल खोल लिया. आदिवासी कल्याण विभाग में अश्विन का दखल बढ़ा तो उसे पता चला कि आदिवासी बच्चों का सारा खर्च सरकार उठाती है. लिहाजा उस ने अपनी जानपहचान का फायदा उठाते हुए आदिवासी लड़कियों का हौस्टल खोल लिया. देखते ही देखते उस के हौस्टल में 21 लड़कियां हो गईं. इन में से एक पार्वती भी थी.

अश्विन ने देखा कि जेब में घूस का पैसा और मुंह में खुशामद की मिठास हो तो सब चलता है और वाकई सब चलने लगा. विभाग से उसे प्रति छात्र लगभग 4 हजार रुपए महीने की आर्थिक सहायता मिलने लगी तो वह मालामाल हो गया. हौस्टल में 21 लड़कियां रह रही थीं, लेकिन उसे पैसा 74 लड़कियों के हिसाब से मिल रहा था.

यहां तक बात हर्ज की नहीं थी, लेकिन जब उस की कुत्सित नजर इन जवान होती लड़कियों पर पड़ी जो न बोल पातीं और न सुन पातीं तो उस के भीतर बैठा राक्षस अंगड़ाइयां लेने लगा. इस बात का भी पुलिस पूरी तरह खुलासा नहीं कर पाई कि अश्विन की पत्नी भी हौस्टल में देखभाल करती थी तो उसे भी सहअभियुक्त क्यों नहीं बनाया गया. हालांकि अश्विन के पिता का कहना है कि बहू भोपाल में ही रहती है और एक साल से अलग रह रही है.

इस बयान में दम इस लिहाज से नहीं है, क्योंकि जिन दिनों पार्वती सुनीता और दूसरी 2 बहनों के साथ अश्विन ने ज्यादती की थी, उन दिनों उस की पत्नी साथ ही रहती थी. अश्विन अब जेल में है लेकिन इस घृणित मामले के कई पेंच या गुत्थियां किसी को समझ नहीं आ रही हैं.

इस घृणित मामले के उजागर होते ही लोगों में गुस्सा तो था ही, साथ ही यह भी शक था कि बिना सरकारी विभागों की मिलीभगत के ऐसा होना मुमकिन नहीं. अश्विन के ठाठबाट और सामाजिक न्याय विभाग से नजदीकियों की वजह से अवधपुरी के अधिकतर लोग अश्विन के हौस्टल को सरकारी ही समझते थे.

जैसे ही यह हैवान पकड़ा गया तो हड़कंप भी खूब मचा. सब से पहले सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियों ने ही कहना शुरू किया कि अश्विन से उन का कोई किसी तरह का सरकारी संबंध नहीं है. विभाग से तो उसे बस सरकारी इमदाद भर मुहैया कराई जा रही थी. बाकी उस ने जो अपराध किया, उस के लिए वह खुद जिम्मेदार है.

लेकिन लोगों का शक बजाय कम होने के और गहराता जा रहा था क्योंकि पुलिस जिस तरह से अश्विन के मामले में ढिलाई बरत रही थी, वह सहज किसी के गले नहीं उतर रही थी. इस ढिलाई के अपने अलग मायने थे. यह एक तरह से सामाजिक न्याय विभाग और आदिवासी कल्याण विभाग के अधिकारियों को दिया गया मौका था कि वे अपनी कागजी करतूतों पर लीपापोती कर लें.

पेंच ही पेंच इस मामले में

ऐसा हुआ भी लेकिन पूरी तरह नहीं हो पाया. पुलिस 12 अगस्त को पीडि़ताओं को मोनिका पुरोहित और उन के पति ज्ञानेंद्र पुरोहित के साथ शिनाख्त के लिए घटनास्थल पर ले गई, जहां लड़कियों ने बताया कि किस तरह उन के साथ यह हैवान दुष्कर्म करता था.

31 अगस्त को आखिरकार आधिकारिक तौर पर यह उजागर हुआ कि सामाजिक न्याय विभाग ने पीडि़ताओं को शासन की योजना के तहत साल 2015 में दाखिला दिया था. उन्हें कृतार्थ हौस्टल में भेजा गया था, जिस का मालिक अश्विन शर्मा था.

ताज्जुब की बात यह सामने आई कि अश्विन जिस एनजीओ के माध्यम से हौस्टल चला कर सरकारी सहायता ले रहा था, वह एनजीओ रजिस्टर्ड नहीं था. यह बात बहुत बड़े घपले की तरफ इशारा कर रही थी. उसे दिए गए पैसे का कभी उपयोगिता प्रमाणपत्र भी नहीं मांगा गया था, जोकि एक अनिवार्य सरकारी प्रक्रिया है.

यह कम हैरानी की बात नहीं कि सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियों ने इस बाबत कोई लिखित अनुबंध न कर के मौखिक अनुबंध को महत्त्व दिया था, जिस का कानूनन कोई खास महत्त्व नहीं होता. यह बात भी शायद मजबूरियों के चलते इस विभाग ने मानी क्योंकि लाखों रुपए का भुगतान अश्विन के बैंक खाते में किया गया था, जिसे छिपाना मुश्किल था. इतना ही नहीं, इस मौखिक अनुबंध के पहले अश्विन का हौस्टल केवल लड़कों का था, जिस में जाने क्यों लड़कियों को रहने दिया गया.

नियमों के मुताबिक अश्विन के हौस्टल में रह रही छात्राओं को हाजिरी भी नहीं ली जाती थी और न ही सामाजिक न्याय कल्याण विभाग के अधिकारियों ने छात्रावासों का भौतिक सत्यापन किया.

सरकारी विभाग भी दोषी था

पुलिस ने मामले की जांच के लिए 10 अगस्त, 2018 को एसआईटी गठित की, जिस की रिपोर्ट उस के मुखिया राहुल लोढ़ा ने भोपाल कलेक्टर को 31 अगस्त को सौंपी. तब यह अनियमितताएं आधिककारिक तौर पर उजागर हुईं. उस दिन एसआईटी ने विशेष न्यायाधीश पंकज गौड़ की अदालत में दूसरा चालान पेश किया था.

करीब साढ़े 8 सौ पृष्ठों के इस चालान में किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध नहीं बताई गई. खुद पुलिस वालों की संदिग्ध भूमिका इसी बात से उजागर होती है कि उस ने एफआईआर में अश्विन की उम्र, पिता का नाम और पता तक नहीं लिखा था.

इस का नतीजा यह निकला कि पार्वती और दूसरी लड़कियों के शोषण की बड़ी वजह भ्रष्टाचार और घूसखोरी थी, जिस का कोई जिक्र जानबूझ कर नहीं किया जा रहा था. सरकार किसी को एक पैसा भी देती है तो उस की पूरी लिखापढ़ी करती है और यह पैसा इमदाद की शक्ल में हो तो तबियत से पैसों की छीनाझपटी चलती है. जाहिर है अश्विन विभाग को तगड़ी रिश्वत दे रहा था, तभी तो राजामहाराजाओं की तरह उसे मौखिक अनुबंध पर मदद दी जा रही थी.

20 दिनों तक पुलिस गिरफ्तारी, चालान और रिमांड का खेल खेलती रही जिस से सामाजिक न्याय विभाग ने अपने कितने पाप ढक लिए, इस का अंदाजा लगा पाना अब मुश्किल है. चारों पीडि़ताएं अब सदमे से उबरने के बाद संतुष्ट हैं कि अश्विन को जेल हो गई और अब उसे सजा भी मिलेगी.

सजा मिलनी तो तय है पर वह उस के अपराध के अनुपात में होगी, इस में जरूर शक है क्योंकि मामले में 87 गवाह पेश होंगे, जिन में विरोधाभास आना स्वाभाविक बात है. इस का फायदा शातिर अश्विन को मिल सकता है, जो जेल में बैठा पुलिस से कागज, पेन और कानून की किताबों की मांग करता है. यह हैवान अपना अपराध स्वीकार नहीं कर रहा और अपने लिए वकील भी नहीं कर रहा है, इस से तय है कि उस के दिमाग में अलग कोई खिचड़ी पक रही है.

एसआईटी ने यह जरूर माना कि अश्विन ने फरवरी 2016 में 132 नंबर के डुप्लेक्स यानी हौस्टल में पीडि़ता से उस वक्त ज्यादती की थी, जब वह बाथरूम से नहा कर निकल रही थी. अश्विन ने पीडि़ता का अश्लील वीडियो बना कर उसे सोशल मीडिया पर वायरल भी किया था.

गरमाई सियासत के मायने

उम्मीद के मुताबिक इस मामले पर भी खूब सियासत गरमाई. कांग्रेस की मीडिया प्रभारी तेजतर्रार नेत्री शोभा ओझा ने एक पत्रकार वार्ता में एक वीडियो जारी करते हुए भाजपा और आरएसएस को कटघरे में खड़ा किया.

इस बाबत उन्होंने जो वीडियो पत्रकारों को दिखाया, उस में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अश्विन शर्मा के सिर पर हाथ रख कर उसे आशीर्वाद देते दिखाई दे रहे हैं.

उन्होंने स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया कि अश्विन शर्मा को मुख्यमंत्री और आरएसएस का संरक्षण मिला हुआ है. धरनेप्रदर्शनों के जरिए भी कांग्रेस ने भाजपा को घेरने में चूक नहीं की क्योंकि राज्य में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाएगी. भाजपा के पास शोभा ओझा के आरोपों का कोई ठोस जवाब नहीं है, सिवाय इस के कि वे बलात्कार पर राजनीति कर रही हैं.

अपनी दूसरी प्रैस कौन्फ्रैंस में शोभा ओझा ने सामाजिक न्याय मंत्री गोपाल भार्गव को घेरते हुए कहा कि उन की भूमिका इस मामले में संदिग्ध है. इसलिए मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए. शोभा ओझा के मुताबिक अश्विन शर्मा के हौस्टल को 74 बच्चों का अनुदान मिल रहा था. उन्होंने अश्विन के एनजीओ के पंजीयन पर भी सवाल उठाया.

राजनीति करना कहीं से गलत नहीं कहा जा सकता. इस मामले में भी राजनीति नहीं होती तो पुलिस और ढिलाई बरत सकती थी तब सामाजिक न्याय विभाग की कारगुजारियां भी सामने नहीं आ पातीं.

अब देखना दिलचस्प होगा कि अश्विन को कब और कितनी सजा मिलती है. साफ दिख रहा है कि इस पूरे मामले को सामने लाने वाली मोनिका पुरोहित की गवाही काफी अहम होगी.

हैवानियत की हद

मूकबधिर लड़कियों के बलात्कार के अलावा अश्विन जो उन के साथ हैवानियत करता था, उसे सुन कर लगता है कि वह निरंकुश और विक्षिप्त हो चला था. एक पीडि़ता के मुताबिक अश्विन उस के नाजुक अंगों को मसलता रहता था और मना करने पर पिटाई करता था. ज्यादा विरोध करने पर उसे और उस के घर वालों को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता था.

लड़कियों के कई अश्लील वीडियो उस ने बना रखे थे. इतना ही नहीं, वह उन्हें अश्लील और उत्तेजक वीडियो दिखाता भी था. एक पीडि़ता की मानें तो लड़कियों का विरोध रोकने के लिए वह स्प्रे का इस्तेमाल करता था, जिस से उन्हें नशा सा हो जाता था और वे उत्तेजित हो जाती थीं. इसी दौरान वह उन की एकएक हरकत का वीडियो बनाता था और लड़कियों को दिखा कर उन्हें ब्लैकमेल करता था.

लाचार और बेबस लड़कियां 12 अगस्त, 2016 को शिनाख्त के दौरान उसे सामने देख सहम गई थीं. सहज होने के बाद उन्होंने बताया कि अश्विन ने उन के सभी मूल दस्तावेज अपने पास रख लिए थे. उस की सच्चाई या बुराई सामने न आए, इसलिए वह लड़कियों को खुद बसस्टैंड तक छोड़ने और लेने जाता था, जिस से घर वाले सोचते थे कि देखो कितना भला आदमी है.

अश्विन के पड़ोसियों की मानें तो अकसर काले रंग की एक एसयूवी कार देर रात गए आती थी, जिस में 5-6 लोग सवार होते थे. उस की एक पड़ोसन के मुताबिक वह कालोनी में टहलती हुई महिलाओं को बुरी नजर से देखता था, लेकिन कोई हरकत करने की उस की हिम्मत नहीं हुई थी.

वजह यह कि वे मूकबधिर नहीं थीं. अश्विन ने 3 मकानों में हौस्टल खोल रखे थे, जिन के नाम पटेल हौस्टल, आरती हौस्टल और कृतार्थ हौस्टल थे. मुमकिन है कि इन हौस्टलों के नाम पर भी वह फरजीवाड़ा सामाजिक कल्याण विभाग की मिलीभगत से कर रहा हो.

बेकार की तकरार है गंदी बात

डिनर करते हुए न्यूज देख कर कपिल का चेहरा अचानक गुस्से से लाल हो गया. सीमा ने एक नजर कपिल के चेहरे पर डाली और फिर पूछा, ‘‘क्या हुआ? टैंशन में लग रहे हो?’’

‘‘बात ही टैंशन की है. सरकार कितने भी अच्छे काम कर ले, विपक्ष का तो काम ही है निंदा करना. ये जो नोटबंदी को बुरा कह रहे हैं न, ये सब ही भ्रष्टाचार की जड़ हैं.’’

सीमा ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहा, ‘‘अच्छा, कैसे? मुझे समझाओगे? क्या फायदा हो गया नोटबंदी का? महंगाई का हाल पता है न? हमारा दूधसब्जी में बजट बिगड़ जाता है, गरीबों की तो बात ही छोड़ दो, पता नहीं बेचारे क्या खाते होंगे. इस सरकार ने तो…’’

कपिल ने हाथ का निवाला प्लेट में ही पटक दिया, ‘‘क्यों कुछ भी कहे जा रही हो? तुम्हें राजनीति की कुछ समझ ही नहीं है. 60 सालों से फैली गंदगी को साफ करने में समय लगेगा ही न? तुम भी मूर्खों की तरह सरकार की बेवजह बुराई किए जा रही हो.’’

सीमा को तेज गुस्सा आ गया था. उस ने खाना वहीं छोड़ दिया. अपनी प्लेट उठा कर किचन में ले जा कर पटकी.

कपिल भी भुनभुनाता हुआ पैर पटकते हुए घर के बाहर चला गया. यह दृश्य उन के घर आम था. दोनों में राजनीतिक मुद्दों पर बहुत मतभेद थे.

घर में कलह

रोहित और शिखा का वैवाहिक जीवन सुखी व संतोषपूर्ण है. दोनों का एक 4 वर्षीय बेटा भी है. अर्जुन रामपाल और उस की पत्नी ने जब अपने रिश्ते के खत्म होने का ऐलान किया, तो शिखा के मुंह से निकला, ‘‘पुरुष होते ही ऐसे हैं.’’

रोहित को बुरा लगा. कहा, ‘‘सब नहीं.’’

‘‘क्यों, अभी रितिकसुजैन, फरहानअधुना का भी तो सुना है.’’

‘‘शिखा, ये फिल्मी लोग हैं. आम आदमी का जीवन इन से अलग है.’’

‘‘आम आदमी? पड़ोस के राजीव को भूल गए? बीमार मां को देखने पत्नी मायके क्या गई, पड़ोसिन से इश्क फरमाना शुरू कर दिया. मेरा तो पुरुषों से विश्वास ही उठता जा रहा है.’’

रोहित ने प्यार से कहा, ‘‘तुम दूसरों की बात पर इतना सीरियस क्यों हो रही हो? तुम्हारा पति तो तुम्हें बहुत प्यार करता है, तुम्हारे लिए इतना ही बहुत होना चाहिए न?’’

‘‘पर ये सब किस्से यही तो बताते हैं न कि पुरुषों पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं करना चाहिए.’’

अब रोहित चिढ़ गया, ‘‘हमेशा क्या पुरुष ही दोषी होते हैं? क्या स्त्रियों की कभी कोई गलती नहीं होती? मुझे इस तरह की बातें पसंद नहीं.’’

‘‘हां, क्यों पसंद होंगी? पुरुष हो न.’’

जरा सी बात पर दोनों की बहस शुरू हो गई और फिर दोनों का मूड खराब हो गया.

सुषमा जब शाम की सैर से लौटी तो उस का मूड बहुत खराब था. युवा बच्चे रिंकी और मयंक कालेज के प्रोजैक्ट पर काम कर रहे थे. मां का मूड खराब देख कर बच्चों ने पूछ लिया, ‘‘क्या हुआ, मम्मी? मूड क्यों खराब है?’’

‘‘आजकल के बच्चों को देख कर सिर घूम जाता है. रोड के किनारे खड़े हो कर सिगरेट पीते हैं, लड़कियां छोटेछोटे कपड़ों में उन के साथ कश लगा रही हैं, हाहा, हीही किए जा रहे हैं, आवारा बच्चे. आजकल के बच्चे कितने बदतमीज हो गए हैं.’’

मयंक ने कहा, ‘‘मम्मी, आप को उन से क्या लेनादेना? उन पर अपना मूड क्यों खराब कर रहीं? आप के बच्चे तो घर में अपना काम कर रहे हैं न? बाकी बच्चों से आप को क्या काम?’’

यह न करें

सुषमा देर तक चिढ़ती रही. अपने बच्चों के सामने ही युवा पीढ़ी को जम कर कोसा. बच्चों को अपना काम करना मुश्किल हो गया.

बाहर की बातों पर घर में विवाद निरर्थक है. बाहर के लोगों के जीवन में क्या चल रहा है, उन की क्या स्थितियां हैं, क्या सोच है, इस पर अपनी राय देने में समय नष्ट करना समझदारी नहीं है. अपने काम से काम रखें. अपने घर में किसी और की बात पर बहस करना, मूड खराब कर लेना मूर्खता है. अपने काम, अपने जीवन पर ध्यान दें. आजकल पतिपत्नी, बच्चे अपने जीवन में बहुत व्यस्त हैं. इन बातों में अपना समय बिलकुल नष्ट न करें. जो भी समय साथ बिताने के लिए मिले उस का सदुपयोग करें, उसे शांति से, प्यार से बिताएं, घर में बाहर की बातों पर निरर्थक विवाद करने में नहीं.

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