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उधार की बीवी बनी चेयरमैन : रहमत ने नसीम को ठगा

5 अगस्त, 2018 को एक डेली न्यूजपेपर में एक खबर प्रमुखता से छपी, जिस की हैडलाइन ऐसी थी जिस पर जिस की भी नजर गई, उस ने जरूर पढ़ी. न्यूज कुछ इस तरह से थी— ‘भरोसे पर दोस्त ने दोस्त को पत्नी उधार दी थी, चेयरमैन बन गई तो वापस नहीं किया.’

इस न्यूज में उधार में दी गई बीवी वाली बात पढ़ने वाला हर आदमी हैरत में था. इस हैडलाइन की न्यूज में यह भी शामिल था कि महिला के पति की ओर से बीवी को वापस दिलाने के लिए अदालत में अर्जी लगाई गई है.

इस न्यूज के हिसाब से एक शादीशुदा व्यक्ति को अपनी बीवी को नेता बनाने का ऐसा खुमार चढ़ा कि उस ने पत्नी को सियासी गलियारों में उतारने के लिए यह सोच कर बीवी अपने दोस्त को उधार दे दी कि वह उसे चुनाव लड़ाएगा.

यह संयोग ही था कि उस की बीवी चुनाव जीतने के बाद चेयरमैन बन गई. लेकिन चेयरमैन बनने के बाद पत्नी ने पति को भुला दिया. शर्त के मुताबिक चुनाव जीतने के बाद महिला के पति ने दोस्त से बीवी लौटाने को कहा तो दोनों की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई. यहां तक कि दोस्त ने महिला के पति को पहचानने तक से इनकार कर दिया. इस पर मामला गरमा गया. नतीजा यह हुआ कि जो बात अभी तक 3 लोगों के बीच थी, वह सार्वजनिक हो गई.

उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर के थाना कुंडा, जसपुर के थाना क्षेत्र में एक गांव है बावरखेड़ा. नसीम अंसारी का परिवार इसी गांव में रहता है. नसीम के अनुसार, मुरादाबाद जिले के भोजपुर निवासी पूर्व नगर अध्यक्ष शफी अहमद के साथ उस की काफी समय से अच्छी दोस्ती थी. उसी दोस्ती के नाते शफी अहमद का उस के घर आनाजाना था. कुछ महीने पहले शफी ने उसे विश्वास में ले कर उस की पत्नी रहमत जहां को भोजपुर से चेयरमैन का चनुव लड़ाने की बात कही.

शफी अहमद ने नसीम को बताया कि इस बार चेयरमैन की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित है. जबकि वह सामान्य जाति के अंतर्गत आने के कारण अपनी बीवी को चुनाव नहीं लड़ा सकता. नसीम अपने दोस्त के झांसे में आ गया और उस ने दोस्त की मजबूरी समझते हुए चुनाव लड़ाने के लिए अपनी बीवी उस के हवाले कर दी.

लेकिन दूसरे की बीवी को चुनाव लड़ाना इतना आसान काम नहीं था. यह बात नसीम ही नहीं, नसीम की बीवी रहमत जहां भी जानती थी. इस के लिए सब से पहले रहमत जहां का कानूनन शफी अहमद की बीवी बनना जरूरी था. शफी की बीवी का दरजा मिलने के बाद ही वह चुनाव लड़ने की हकदार होती.

चुनाव के लिए इशरत बनी शमी की पत्नी

चुनाव लड़ने में आ रही अड़चन को दूर करने के लिए दोनों दोस्तों और रहमत जहां ने साथ बैठ कर गुप्त रूप से समझौता किया. उसी समझौते के तहत शफी अहमद ने रहमत जहां से कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज के बाद शफी अहमद ने अपने पद और रसूख के बल पर जल्दी ही सरकारी कागजातों में रहमत जहां को अपनी बीवी दर्शा कर उस का आईडी कार्ड और आधार कार्ड बनवा दिया. रहमत जहां का आधार कार्ड बनते ही उस ने चुनाव की अगली प्रक्रिया शुरू कर दी.

इस से पहले सन 2012 से 2017 तक भोजपुर के चेयरमैन की कुरसी पर शफी अहमद का ही कब्जा रहा था. शफी को पूरा विश्वास था कि इस बार भी जनता उन्हीं का साथ देगी. लेकिन इस बार आरक्षण के कारण शफी को सपा से टिकट नहीं मिल पाया. वजह यह थी कि इस बार भोजपुर चेयरमैन की सीट पिछड़े वर्ग की महिला के लिए आरक्षित कर दी गई थी.

शफी अहमद सामान्य वर्ग में आते थे. इस समस्या से निपटने के लिए शफी अहमद ने रहमत जहां से कोर्टमैरिज कर के उसे कानूनन अपनी बीवी बना कर निर्दलीय चुनाव लड़वाया. शफी के पुराने रिकौर्ड और रसूख की वजह से रहमत जहां चुनाव जीत गई. उस ने अपनी प्रतिद्वंदी परवेज जहां को 117 वोटों से हरा कर जीत हासिल की थी.

रहमत जहां को चेयरमैन बने हुए अभी 8 महीने ही हुए थे कि नसीम अंसारी ने अपनी बीवी रहमत जहां को वापस ले जाने के लिए शफी अहमद से बात की तो बात बढ़ गई. शफी ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ते हुए नसीम से कहा कि वह स्वयं ही रहमत जहां से बात करे.

नसीम ने जब इस बारे में रहमत जहां से बात की तो उस ने साफ कह दिया कि तुम से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. मैं ने शफी अहमद से कोर्टमैरिज की है. वही मेरे कानूनन पति हैं. मैं तुम्हें नहीं जानती.

रहमत जहां की बात सुन कर नसीम स्तब्ध रह गया. उस ने बच्चों का वास्ता दे कर रहमत से ऐसा न करने को कहा, लेकिन उस ने उस के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया.

नसीम ने वापस मांगी बीवी

इस पर नसीम ने फिर से शफी अहमद से बात की और अपनी बीवी वापस मांगी, लेकिन उस ने रहमत जहां को देने से साफ मना कर दिया. शफी अहमद का कहना था कि उस ने रहमत के साथ निकाह किया है और वह कानूनन उस की बीवी है. उसे जो करना है करे, वह रहमत को वापस नहीं देगा.

उस के बाद नसीम के पास एक ही रास्ता था कि वह अदालत की शरण में जाए. उस ने जसपुर के अधिवक्ता मनुज चौधरी के माध्यम से जसपुर के न्यायिक मजिस्ट्रैट की अदालत में धारा 156(3) के तहत प्रार्थनापत्र दिया, जिस में कहा गया कि शफी अहमद ने उस की बीवी से जबरन निकाह कर लिया.

नसीम अंसारी ने अदालत में जो प्रार्थनापत्र दिया, उस में कहा कि वर्ष 2006 में उस का निकाह सरबरखेड़ा निवासी दादू की बेटी रहमत जहां के साथ हुआ था, जिस से उस का एक बेटा और एक बेटी हैं.

17 नवंबर, 2017 की रात 10 बजे शफी अहमद, नईम चौधरी, मतलूब, जिले हसन निवासी भोजपुर, उस के घर आए. उन लोग ने मेरी कनपटी पर तमंचा रखा और मेरी पत्नी को कार में डाल कर ले गए. बाद में शफी अहमद ने उस की बीवी के साथ जबरन निकाह कर लिया. उस के कुछ समय बाद कुछ लोग कार से फिर उस के घर आए और उस के दोनों बच्चों को उठा ले गए.

13 अगस्त, 2018 को इस मामले में अदालत ने पीडि़त नसीम अंसारी के अधिवक्ता मनुज चौधरी की दलील सुनने के बाद थाना कुंडा की पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए. नसीम अंसारी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि रहमत जहां ने उसे बिना तलाक दिए ही उस के साथ निकाह किया है, जो शरीयत के हिसाब से गलत है.

बदल गई रहमत जहां

दूसरी ओर रहमत जहां का कहना था कि उस ने नसीम की रजामंदी से ही शफी के साथ निकाह किया था. आर्थिक तंगी के चलते नसीम ने शफी अहमद से इस के बदले हर माह घर खर्च के लिए 12 हजार रुपए देने का समझौता किया था, जो शफी अहमद उसे हर माह दे रहे हैं. इस में उस का कोई कसूर नहीं. इस वक्त वह कानूनन शफी की पत्नी है और रहेगी. उस के दोनों बच्चे भी उसी के साथ रह रहे हैं, जिन्हें शफी के साथ रहने में कोई ऐतराज नहीं.

बहरहाल, नसीम अहमद की ओर से यह मामला थाना कुंडा में दर्ज हो गया. कुंडा थाने के थानाप्रभारी सुधीर ने सच्चाई सामने लाने के लिए जांच शुरू कर दी. इस मामले पर शुरू से प्रकाश डालें तो कहानी कुछ और ही कहती है.

उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर का गांव सरबरखेड़ा थाना कुंडा क्षेत्र में आता है. सरबरखेड़ा मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला गांव है. अब से कुछ साल पहले यह गांव बहुत पिछड़ा हुआ था. गांव में गिनेचुने लोगों को छोड़ कर अधिकांश लोग मजदूरी करते थे. लेकिन गांव के पास में नवीन अनाज मंडी बनते ही गांव के लोगों के दिन बहुरने लगे.

अनाज मंडी बनने के बाद मजदूर किस्म के लोगों को घर बैठे ही मजदूरी मिलने लगी तो यहां के लोगों के रहनसहन में काफी बदलाव आ गया. बाद में गांव के पास हाईवे बनते ही जमीनों की कीमतें कई गुना बढ़ गईं. यहां के कम जमीन वाले काश्तकारों ने अपनी जमीन बेच कर अपनेअपने कारोबार बढ़ा लिए.

इसी गांव में दादू का परिवार रहता था. दादू के पास जुतासे की नाममात्र की जमीन थी जबकि परिवार बड़ा था, जिस में 5 लड़के थे और 2 लड़कियां. जमीन से दादू को इतनी आमदनी नहीं होती थी कि अपने परिवार की रोजीरोटी चला सके. इस समस्या से निपटने के लिए दादू ने अनाज मंडी में अनाज खरीदने बेचने का काम शुरू कर दिया.

दादू गांवगांव जा कर धान, गेहूं खरीदता और उसे एकत्र कर के अनाज मंडी में ला कर बेच देता था. इस से उस के परिवार का पालनपोषण ठीक से होने लगा. दादू का काम मेहनत वाला था. इस काम से आमदनी बढ़ी तो उस के खर्च भी बढ़ते गए. पैसा आया तो दादू को शराब पीने की लत गई.

धीरेधीरे वह शराब का आदी हो गया, जिस की वजह से वह फिर आर्थिक तंगी में आ गया. जब घर के खर्च के लिए लाले पड़ने लगे तो वह जुआ खेलने लगा. दरअसल, उस की सोच थी कि वह जुए में इतनी रकम जीत लेगा कि घर के हलात सुधर जाएंगे. लेकिन हुआ उलटा. वह मेहनत से जो कमाता जुए की भेंट चढ़ जाता.

उसी दौरान उस की मुलाकात नसीम से हुई. नसीम में जुआ खेलने की लत तो नहीं थी, लेकिन शराब पीने का वह भी आदी था. नसीम सरबरखेड़ा गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर गांव बाबरखेड़ा का रहने वाला था. नसीम अपने 3 भाइयों में दूसरे नंबर का था. तीनों भाइयों पर जुतासे की थोड़ीथोड़ी जमीनें थीं. तीनों ही अलगअलग रहते थे.

कई साल पहले नसीम का निकाह थाना ठाकुरद्वारा, जिला मुरादाबाद में आने वाले गांव राजपुरा नंगला टाह निवासी सुगरा के साथ हुआ था.

समय के साथ सुगरा 6 बच्चों की मां बनी, जिन में 2 लड़के और 4 लड़कियां थीं. थोड़ी सी जुतासे की जमीन से नसीम के बड़े परिवार का खर्च मुश्किल से चलता था. इस के बावजूद नसीम को शराब पीने की गंदी आदत पड़ गई थी. वह शराब पीने के चक्कर में इधरउधर चक्कर लगाता रहता था.

उसी दौरान उस की मुलाकात दादू से हो गई. शराब पीनेपिलाने के चलते दोनों एकदूसरे के संपर्क में आए. जल्दी ही दोनों की दोस्ती हो गई. दोस्ती के चलते दोनों एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगे. उस वक्त तकदादू की बेटी रहमत जहां जवानी के दौर से गुजर रही थी. रहमत जहां देखनेभालने में बहुत सुंदर थी.

नसीम ने चलाया चक्कर

हालांकि नसीम का दादू के साथ दोस्ती का रिश्ता था, लेकिन जब नसीम ने रहमत जहां को देखा तो उस की नीयत में खोट आ गया. वह उसे गंदी नजरों से देखने लगा. रहमत जहां भी नसीम की निगाहों को परखने लगी थी. रहमत जहां को यह मालूम नहीं था कि नसीम शादीशुदा है.

लेकिन जब वह उस की नजरों में प्रेमी बन कर उभरा तो उस ने अपने दिल में उस के लिए गहरी जगह बना ली. प्रेम का चक्कर शुरू हुआ तो दोनों घर से बाहर भी मिलने लगे.

दादू की बेटी क्या खिचड़ी पका रही है, उस के घर वालों को इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी. उन्हीं दिनों दादू का बड़ा लड़का बीमार पड़ गया. बीमारी की वजह से उसे कई दिन तक अस्पताल में भरती रहना पड़ा. उस के इलाज के लिए काफी रुपयों की जरूरत थी जबकि उस वक्त दादू आर्थिक तंगी से गुजर रहा था.

कुछ दिन पहले ही नसीम ने अपनी जुतासे की थोड़ी सी जमीन बेची थी. उस के पास जमीन का कुछ पैसा बचा हुआ था. यह बात दादू को भी पता थी. दादू ने अपनी मजबूरी नसीम के सामने रखते हुए मदद करने को कहा तो नसीम ने उस के लड़के के इलाज के लिए कुछ रुपए उधार दे दिए. उन्हीं रुपयों से दादू ने अपने बेटे का इलाज कराया. उस का बेटा ठीक हो गया.

इस के कुछ दिन बाद नसीम ने दादू से अपने पैसे मांगे तो उस ने मजबूरी बताते हुए फिलवक्त पैसे न देने की बात कही. नसीम दादू की मजबूरी सुन कर शांत हो गया. नसीम के सामने दादू से बड़ी मजबूरी आ गई थी. लेकिन दादू की बेटी रहमत जहां को चाहने की वजह से वह दादू से कुछ कह भी नहीं सकता था.

यह बात दादू भी समझता था कि नसीम उस की बेटी के पीछे हाथ धो कर पड़ा है लेकिन वह नसीम के अहसानों तले दबा हुआ था, इसलिए उस के सामने मुंह खोल कर कुछ भी नहीं कह सकता था. अपनी मजबूरी के आगे दादू ने नसीम और अपनी बेटी रहमत जहां को अनदेखा कर दिया.

दादू की हालत देख कर नसीम भी समझ गया था कि उस के पैसे किसी भी कीमत पर नहीं मिलने वाले. वह बीच मंझधार में खड़ा था. एक तरफ उस का पैसा था, जो दादू के बेटे की बीमारी पर खर्च हो चुका था. जबकि दूसरी ओर उस की मोहब्बत रहमत जहां थी, जिसे वह दिलोजान से चाहने लगा था. रहमत जहां भी नसीम को दिल से चाहती थी. उसे नसीम के साथ कभी भी कहीं भी जाने से ऐतराज नहीं था.

उस वक्त दादू आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस के पास नवीन अनाज मंडी के सामने हाईवे के किनारे जुतासे की कुछ जमीन थी, जो आर्थिक तंगी के चलते उस ने पहले ही बेच दी. अब उस के पास केवल जुआ खेलने और शराब पीने के अलावा कोई काम नहीं था. ऐसी स्थिति में नसीम ने दादू से अपने पैसों के बदले उस की बेटी का हाथ मांगा तो वह राजी हो गया.

रहमत जहां हो गई नसीम की

दादू जानता था कि नसीम और उस की बेटी एकदूसरे को चाहते हैं. अगर उस ने बेटी की शादी उस की रजामंदी के खिलाफ की तो उस का अंजाम ठीक नहीं होगा. यही सोचते हुए उस ने नसीम से अपनी बेटी रहमत जहां का निकाह कर दिया.

रहमत जहां से निकाह के बाद नसीम उसे अपनी दूसरी बीवी बना कर अपने घर ले आया. इस में रहमत जहां ने ऐतराज नहीं किया. वह उस के घर में दूसरी बीवी की तरह रहने लगी. नसीम अहमद भी काफी दिनों से शराब का आदी था.

शराब और शबाब के चक्कर में उस ने अपनी जुतासे की सारी जमीन दांव पर लगा दी थी. रहमत जहां के प्यार में पड़ कर उस ने उस से निकाह तो कर लिया था, लेकिन जब 2 बीवियां होने से खर्च बढ़ा तो उस का दिमाग घूमने लगा. वह बहुत परेशान रहने लगा.

शफी उर्फ बाबू का पहले से ही बाबरखेड़ा आनाजाना था. वजह यह कि शफी अहमद की एक बुआ का निकाह बाबरखेड़ा में हुआ था. वह अपनी बुआ के घर आताजाता था. शफी अहमद की बुआ का एक लड़का था याकूब, जो नसीम का अच्छा दोस्त था. याकूब के घर पर ही शफी अहमद की जानपहचान नसीम से हुई.

नसीम शफी अहमद के बारे में सब कुछ जान चुका था. जब उसे यह पता चला कि शफी भोजपुर कस्बे का नगर पंचायत चेयरमैन है तो वह खुश हुआ. वैसे भी शफी उस के दोस्त याकूब का ममेरा भाई था. गांव में अपना रुतबा बढ़ाने के लिए नसीम कई बार उसे अपने घर भी ले गया था. घर आनेजाने के चक्कर में शफी की नजर नसीम की बीवी रहमत जहां पर पड़ी तो वह उस की खूबसूरती पर फिदा हो बैठा.

हालांकि उस वक्त चेयरमैन शफी के घर में पहले से ही एक से बढ़ कर एक 2 खूबसूरत बीवियां थीं. लेकिन रहमत जहां पर उन की नजर पड़ी तो वह अपने पर काबू नहीं रख सके. इसी चक्कर में उन का नसीम के घर आनाजाना और भी बढ़ गया.

कुछ ही दिनों में शफी अहमद के स्वार्थ की नींव पर नसीम से पक्की दोस्ती हो गई. जब कभी शफी अहमद अपने यहां पर कोई प्रोग्राम कराते तो नसीम और उस की बीवी को बुलाना नहीं भूलते थे. इसी आनेजाने के दौरान शफी अहमद और रहमत जहां के बीच प्यार का रिश्ता बन गया.

मोबाइल ने जल्दी ही शफी अहमद और रहमत जहां के बीच की दूरी खत्म कर दी. रहमत जहां शफी अहमद के बारे में सब कुछ जान चुकी थी. चेयरमैन के घर में पहले से ही 2 बीवियां मौजूद हैं, यह बात रहमत जहां जानती थी, लेकिन शफी अहमद की ओर से इशारा मिलने पर उस का दिल भी मजबूर हो गया.

शफी अहमद के पास धनदौलत, ऐशोआराम, इज्जत सभी कुछ था. रहमत जहां ने कई बार शफी अहमद से निकाह करने को कहा. लेकिन समाज में अपनी साख खत्म होने की बात कह कर शफी ने मना कर दिया था. इस के बावजूद रहमत जहां अपने दिल को समझा नहीं पा रही थी. नसीम के 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद रहमत जहां शफी के प्यार में पड़ गई थी.

रहमत को शफी अहमद में दिखा भविष्य

इत्तफाक से उसी समय भोजपुर नगर पंचायत का चुनाव आ गया. अब तक नगर पंचायत अध्यक्ष की सीट शफी अहमद के पास थी, लेकिन चुनाव करीब आने पर पता चला कि इस बार सीट ओबीसी के लिए आरक्षित है. शफी अहमद चूंकि सामान्य जाति में आते थे, इसलिए चेयरमैन की सीट उन के हाथ से निकलने का डर था.

शफी अहमद जानते थे कि नसीम की जाति ओबीसी के तहत आती है. बीवी होने के नाते रहमत जहां भी उसी जाति में आती थी. यह बात मन में आते ही शफी अहमद ने तिकड़मबाजी लगानी शुरू की. उन्हें पता था कि अगर नसीम से इस बारे में बात की जाए तो वह उन की बात नहीं टालेगा.

हालांकि बात बहुत असंभव सी थी, फिर भी शफी अहमद ने बाबरखेड़ा जा कर नसीम और उस की बीवी रहमत जहां के सामने अपनी परेशानी रखते हुए इस बारे में बात की. पर नसीम ने इस मामले में उन का साथ देने से साफ इनकार कर दिया. नसीम अंसारी जानता था कि रहमत जहां को चुनाव लड़ने के लिए शफी की बीवी बन कर भोजपुर में रहना होगा.

भला वह अपनी बीवी को शफी के पास कैसे छोड़ सकता था. नसीम के दो टूक फैसले के बाद शफी अहमद के सपनों पर पानी फिर गया. फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन की रहमत जहां से मोबाइल पर बात होती रहती थी.

शफी ने इस मामले में सीधे रहमत जहां से बात की तो उस के मन में लड्डू फूटने लगे. वह पहले से ही शफी के प्यार में पागल थी. यह बात सुन कर तो उस के दिल में खुशियों के फूल महकने लगे. वह जानती थी कि अगर वह भोजपुर की चेयरमैन बन गई तो उस की किस्मत सुधर जाएगी.

शफी अहमद के दिल की बात जान कर उस ने नसीम को प्यार से समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं चाहता था कि उस की बीवी किसी और की बन कर रहे. नसीम को यह भी मालूम था कि ऐसे काम इतनी आसानी से नहीं होते. इस के लिए कानूनी काररवाई पूरी करना जरूरी है. फिर भी उस ने अपनी आर्थिक तंगी के चलते शफी अहमद से समझौता कर के अपनी बीवी चुनाव लड़ने के लिए उन्हें दे दी.

नसीम अंसारी के अनुसार आपसी समझौते के तहत शफी अहमद ने कहा था कि चुनाव जीतने के बाद वह उस की बीवी उसे वापस कर देगा. उस के बाद जो भी हुआ करेगा, रहमत जहां भोजपुर जा कर काम निपटा लिया करेगी. यह बात नसीम को भी अच्छी लगी.

समझौते के बाद नसीम ने अपनी बीवी रहमत जहां को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी. शफी अहमद ने रहमत जहां को अपनी बीवी दर्शाने के लिए उस के साथ कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज के बाद रहमत जहां कानूनन शफी अहमद की बीवी बन गई.

रहमत जहां को बीवी का दरजा मिलते ही शफी अहमद ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दीं. सन 2017 में जब नामांकन किया जा रहा था, शफी अहमद अपनी नई पत्नी रहमत जहां को पिछड़ी जाति की महिला के रूप में सामने ले आए. यह देख विरोधी उम्मीदवार हैरान रह गए. लेकिन लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह उन की बीवी है.

रहमत जहां बन गई चेयरमैन

शफी अहमद रहमत जहां को अपनी बीवी बता कर नामांकन कराने कलेक्टरेट पहुंचे तो विपक्षियों में खलबली मच गई. लेकिन शफी ने रहमत जहां के पिछड़ी जाति के प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर के विपक्षियों की नींद उड़ा दी. निकाह के बावजूद लोगों को भरोसा नहीं था कि पिछड़ी की रहमत जहां जीत पाएगी. फिर भी शफी अहमद ने हार नहीं मानी. किसी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो उन्होंने रहमत जहां को निर्दलीय चुनाव लड़ाने का फैसला किया. इस सीट पर वह पिछले 5 सालों से काबिज थे. उन्हें पूरा यकीन था किजनता उन का साथ देगी.

शफी अहमद ने फिर से चेयरमैन की कुरसी पर कब्जा जमाने के लिए दिनरात मेहनत की. फलस्वरूप वह रहमत जहां के नाम पर चुनाव जीत गए. सन 2017 के लिए नगर पंचायत भोजपुर की चेयरमैन का सेहरा रहमत जहां के सिर पर बंध गया.

अभी इस चुनाव को जीते हुए 8 महीने भी नहीं हो पाए थे कि नसीम अहमद ने अपनी बीवी रहमत जहां को पाने के लिए कोर्ट में दावेदारी ठोक दी. इस से पहले नसीम अंसारीने अपनी बीवी वापस करने के लिए शफी अहमद से दोस्ती के नाते प्यार से बात की थी, लेकिन जब मामला ज्यादा उलझ गया तो उसे अदालत की शरण लेनी पड़ी.

नसीम के प्रार्थनापत्र पर जसपुर के न्यायिक मजिस्ट्रैट प्रकाश चंद ने थाना कुंडा पुलिस को भोजपुर के पूर्व चेयरमैन शफी अहमद, उन के बहनोई नईम चौधरी, भाई जिले हसन और साथी मतलूब के खिलाफ रहमत जहां और उस के 2 बच्चों का अपहरण करने और बंधक बना कर जबरन निकाह करने के आरोप में केस दर्ज कर के जांच करने के आदेश दे दिए.

कुंडा पुलिस दर्ज केस के आधार पर जांच में जुट गई. इस मामले में नसीम अंसारी का कहना था कि शफी अहमद ने उस की आर्थिक तंगी का लाभ उठा कर उस से उस के बीवीबच्चों को छीन लिया. वह अपने बीवीबच्चों को हासिल करने के लिए अंतिम सांस तक लड़ेगा.

कई पेंच हैं मामले में

वहीं दूसरी ओर नसीम अहमद की बीवी रहमत जहां का कहना था कि उस के निकाह के कुछ समय बाद ही नसीम को शराब पीने की लत पड़ गई थी. जिस के चलते उस ने अपनी जुतासे की पुश्तैनी जमीन भी बेच दी थी. उस के बाद उसे अपने 2 बच्चे पालने के लिए भी भुखमरी के दिन देखने पड़े.

रहमत जहां के अनुसार उस ने नसीम को कई बार समझाने की कोशिश की लेकिन उस ने उस की एक नहीं सुनी. उस ने नसीम के शराब पीने का विरोध किया तो उस ने सन 2010 में उसे तलाक दे दिया था. नसीम के तलाक देने के बाद उस ने अपने दोनों बच्चों को साथ ले कर अपने पिता दादू के गांव सरबरखेड़ा में जा कर दिन गुजारे.

रहमत जहां का कहना था कि नसीम के तलाक देने के बाद उस ने 2011 में भोजपुर निवासी शफी अहमद से निकाह कर लिया. उस के बाद भी वह काफी दिनों तक अपने मायके में ही रही. बाद में वह चुनाव लड़ कर चेयरमैन बन गई तो नसीम के मन में लालच आ गया.

नसीम अंसारी ने शफी अहमद से अपने खर्च के लिए कुछ रुपयों की मांग की, जिस के न मिलने पर उस ने यह विवाद खड़ा कर दिया. रहमत जहां का कहना था कि उस ने शफी अहमद के साथ निकाह किया है. नसीम उसे पहले ही तलाक दे चुका था. जिस के बाद उस का नसीम के साथ कोई भी संबंध नहीं रह गया था. फिलहाल कुंडा पुलिस मामले की जांच कर रही है. रहमत किस की होगी, यह अभी भविष्य के गर्त में है.

डेट पर हट कर दिखना चाहती हैं तो तरीका हम आप को बताते हैं

एक फैशन दिवा के तौर पर औफिस वियर में आप को तमाम तरह की रिस्ट्रिक्शंस फौलो करनी पड़ती हैं. ऐसे में कैजुअल वियर बदलाव का एक बेहतरीन मौका होता है. प्रिंट, फैब्रिक, कलर्स और ऐक्सैसरीज अपना कर वाइल्ड और बोल्ड लुक अपनाएं ताकि फ्रैंड्स मीट, पार्टी अथवा मूवी नाइट में आप का स्टाइल सब से अलग दिखाई दे.

फैशन

ब्रीजी सफेद ड्रैस, स्ट्रैप वाले सैंडल, सिल्की मिडी स्कर्ट, स्मोक्ड टौप, चैक वाली पैंट, फैशन में हैं. पोल्का डौट्स और फैदर एक बार फिर कम बैक कर रहे हैं. लिलैक इस मौसम के लिए एक नया मिलेनियल पिंक है.

पफ शोल्डर

विंटेज पफ शोल्डर इस मौसम में फिर से चलन में आ गए हैं. टौप ड्रैसेज और ब्लाउज में पफ स्लीव्ज ट्राई करें. पफ स्लीव वाली ब्लैक पैंसिल ड्रैस पहनें. पार्टी में सब आप को मुड़मुड़ कर देखेंगे. लंबी शर्ट जिस के शोल्डर्स और स्लीव्ज बहुत बड़ी होती हैं, को ऐंकल लैंथ बूटों के साथ ट्राई कर आप को मिलेगा एक परफैक्ट कूल गर्ल का लुक जो इस मौसम के लिए बैस्ट भी है.

ऐंकल लैंथ बूट

इस मौसम में एक जोड़ी ऐंकल लैंथ वाले बूट जरूर खरीदें और इन्हें बिना मोजों के मिडी स्कर्ट के साथ पहनें. इस से आप को परफैक्ट टै्रडिशनल लुक मिलेगा. इन्हें बोहो मैक्सी ड्रैस अथवा टोटो डैनिस के साथ पहन कर आप स्पोर्टी और फैशनेबल लुक पा सकती हैं.

व्हाइट टैंक

गरमी के मौसम में अच्छी फिटिंग वाली एक टैंक ड्रैस जरूर रखें. इसे पलाजो अथवा चौड़ी मुहरी वाली पैंट, जींस, सेलर पैंट अथवा जोधपुरी पैंट के साथ पहनें. इसे एक प्रिंटेड स्कार्फ के साथ कैरी कर के परफैक्ट लेडी का लुक पाएं.

रंगरीति के सिद्धार्थ बिंद्रा कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी अपने परिधानों के साथ नए प्रयोग करने या नया लुक अपनाने से नहीं घबराती है, नए लुक के साथ हमेशा अपनी पर्सनैलिटी में नया निखार लाने की कोशिश करती है. हर बदलते मौसम के साथ नए फैशन चलन में आते हैं, जो आप को नया लुक देते हैं.

इंडी टौप के जलवे: इंडी टौप आप को परफैक्ट चिक लुक देते हैं. ये कई रंगों और डिजाइनों में उपलब्ध हैं. ये बेहद आरामदायक होते हैं. इन्हें आप किसी भी डैनिम, डार्क कलर की पैंट या लूज बैलबौटम के साथ मैच कर सकती हैं.

स्लिम पैंट्स: स्लिम पैंट्स कभी फैशन से आउट नहीं होतीं और हर तरह के टौप के साथ जंचती हैं. आप इन्हें पहन कर कोई भी ऐक्टिविटी कर सकती हैं. इन्हें अपनी पसंदीदा शर्ट के साथ मिलाएं और औफिस चली जाएं. कुरते के साथ आप इन्हें कैजुअल लुक भी दे सकती हैं. ये आप के वार्डरोब के लिए बेहतरीन विकल्प हैं. खूबसूरत मैचिंग स्कार्फ के साथ ये आप को स्टाइलिश दिवा बना देगी.

वैजेस: वैज हील के सैंडल जहां आप की हाइट बढ़ा कर आप को स्टाइलिश बनाते हैं, वहीं आरामदायक भी होते हैं. आप इन्हें पहन कर आराम से चल सकती हैं. पैंसिल या किटन हील के बजाए या इन के साथ बेहतर अनुभव कर सकती हैं.

श्रग: आप बेसिक टीशर्ट या टैंक टौप या फिर लिटल ब्लैक ड्रैस के साथ श्रग पहन सकती हैं. श्रग आप की नौर्मल बोरिंग ड्रैस को भी आकर्षक बना देता है या यों कहें कि स्टाइल का तड़का लगा देता है.

कैजुअल शूज: कैजुअल शूज आप के पैरों को कवर रखते हैं और साथ ही आरामदायक भी होते हैं. अपने कैजुअल टौप, जींस, बेसिक टी शर्ट या शौर्ट्स के साथ इन्हें मैच करिए और आकर्षक, स्टाइलिश लुक पाइए.

फ्यूजन पैंट्स: फैशन की दुनिया की सब से बेहतरीन खोज हैं फ्यूजन पैंट्स. ये हर तरह के परिधानों के साथ जंचती हैं जैसे इंडी टौप या टैंक टौप के साथ आप इन्हें शौर्ट कुरती और सिल्वर ज्वैलरी के साथ मैच कर खुद को स्टाइलिश लुक दे सकती हैं.

लिबर्टी के अनुपम बंसल के अनुसार आप के पास स्टाइलिश, टै्रंडी और लेटैस्ट फुटविअर रेंज हमेशा होनी चाहिए:

फ्लैट्स: फ्लैट्स बेसिक और आरामदायक कैजुअल फुटवियर हैं. बेहतरीन कलर्स में उपलब्ध ये फुटवियर स्टाइलिश एहसास देते हैं. अपने किसी भी आउटफिट के साथ इन्हें मैच करिए और फिर बीच पर जा कर मौसम का लुत्फ उठाइए या अपने दोस्तों के साथ लंच का आनंद लीजिए. ये आप के कैजुअल आउटफिट के लिए एकदम अनुकूल हैं.

बैलेरिना: आराम और चिक स्टाइल का बेहतरीन मिश्रण बैलेरिना फैंसी शाम के लिए शानदार है. कौपर शाइनी शेड्स में उपलब्ध ये फुटवियर आप की शाम को स्टाइलिश बना देते हैं. इन्हें आप डैनिम और चिक बैग के साथ कैरी कर सकती हैं.

लुप्त : घटिया हौरर फिल्म, समय और पैसा बर्बाद न करें

अमूमन हौरर फिल्में दर्शकों को अपने डरावने घटनाक्रमों के कारण बांधकर रखती हैं. मगर हौरर फिल्म ‘‘लुप्त’’ में बेसिर पैर के दृश्य दर्शकों को सिनेमाघर से बाहर निकल जाने के लिए ही उकसाते हैं.

फिल्म की कहानी के केंद्र में लखनऊ के उद्योगपति हर्ष टंडन (जावेद जाफरी) व उनका परिवार है. उद्योगपति हर्ष टंडन (जावेद जाफरी) के परिवार में उनकी पत्नी (निक्की अनेजा), उनका बेटा सैम (ऋषभ चड्ढा) व बेटी तनु (मीनाक्षी दीक्षित) है. तनु का प्रेमी एक फोटोग्राफर राहुल (करण आनंद) है. हर्ष टंडन की तमन्ना व्यापार में एक बहुत बड़ा मुकाम पाना है. जबकि उनके बेटे सैम को हर किसी के साथ मजाक व प्रैंक करते रहने की आदत है.

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हर्ष टंडन को नींद न आने की बीमारी है, उन्हे हमेशा कुछ अजीबोगरीब चीजें दिखायी देती हैं. जिसके चलते उनका इलाज कर रही मनोवैज्ञानिक डाक्टर उन्हे कुछ दिन किसी खूबसूरत स्थान पर छुट्टी मनाने के लिए जाने की सलाह देती है. हर्ष अपने पूरे परिवार के साथ कार में बैठकर लखनऊ से नैनीताल के लिए रवाना होते हैं. रास्ते में उनकी कार खराब हो जाती है. तो उन्हे एक अजनबी (विजय राज) के घर पर रुकना पड़ता है. जहां कुछ डरावनी घटनाएं घटती हैं.

फिल्म की कहानी अच्छी है, मगर पटकथा लेखक ने पूरी फिल्म का सत्यानाश कर डाला. फिल्म के दृश्यों का सिर पैर सब कुछ समझ से परे है. इंटरवल से पहले कुछ रोचकदृश्यों के चलते दर्शक सब्र कर जाता है. मगर इंटरवल के बाद दर्शकों के सब्र का बांध टूट जाता है और उसके दिमाग में सिर्फ यही चलता रहता है कि उसे इस कष्ट से कितनी देर में छुटकारा मिलेगा.

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जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक भी कलाकार प्रभावित नहीं करता. हर किसी का अभिनय बहुत ही ज्यादा घटिया है और इसके लिए पूर्णरूपेण निर्देशक ही जिम्मेदार हैं. वह जावेद जाफरी व विजय राज जैसे मंजे हुए कलाकार की प्रतिभा का भी सही उपयोग नहीं कर पाए. फिल्म किसी भी स्तर पर दर्शकों को बांध नहीं पाती है. विजय राज व जावेद जाफरी इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए क्यों तैयार हुए, यह समझ से परे है. इस फिल्म के कैमरामैन भी ठीक से काम नहीं कर पाए.

एक घंटा 57 मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण हनावत खत्री व ललित किरी ने किया है. फिल्म के निर्देशक प्रभु राज, संगीतकार अमर मोहिले व सिद्धार्थ पाराशर तथा कलाकार हैं – जावेद जाफरी, विजय राज, निकी अनेजा, ऋषभ चड्ढा, मीनाक्षी दीक्षित, करण आनंद व अन्य.

जैक एंड दिल : कमजोर पटकथा और कमजोर निर्देशन

प्रेम विवाह करने वाले दंपतियों के बीच प्यार कहां व क्यों खो जाता है? इसके अलावा पति पत्नी के बीच रिश्तों में बढ़ती दूरियों को तलाशने जैसे मुद्दे पर एक स्तरहीन फिल्म का नाम है – ‘‘जैक एंड दिल’’. यदि लेखक व निर्देशक ने थोड़ी भी सूझबूझ दिखायी होती, तो इस विषय पर गुणवत्ता प्रधान मनोरंजक फिल्म बन सकती थी.

रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘‘जैक एंड दिल’’ की कहानी गोवा में रह रहे जासूसी उपन्यास लेखक व प्राइवेट जासूस जैक (अमित साध) से शुरू होती है. जैक आवारा किस्म का युवक है, जिसे किसी की परवाह नहीं. वह महत्वाकांक्षी नहीं है. बहुत धन कमाने की भी लालसा नहीं है. जो मिल जाए, उसी में खुश रहता है. उनकी प्रेमिका लारा (ईवलीन शर्मा) उन्हे छोड़ चुकी है.

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उधर गोवा में ही प्रेशर कूकर बनाने वाली फैक्टरी के मालिक यानी कि उद्योगपति वालिया (अरबाज खान) अपनी पत्नी शिल्पा (सोनल चौहान) के साथ रहते हैं. दोनों ने प्रेम विवाह किया था. मगर विवाह के बाद वालिया अपने व्यवसाय में इस कदर व्यस्त हुए कि उनकी पत्नी शिल्पा को अहसास होने लगा जैसे कि उनका प्यार कहीं खो गया है. और घर बिना प्यार व इंसानों का बनकर रह गया है. इसलिए वह कुछ इस तरह की गतिविधियां करती हैं, जिससे वालिया को लगता है कि उनकी पत्नी शिल्पा का किसी पर पुरूष के संग अवैध संबंध पनपा हुआ है.

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जैक को एक कुत्ता खरीदना है. पर जेब में फूटी कौड़ी न होते हुए भी वह वालिया के कुत्ते को खरीदने के लिए वालिया के घर पहुंच जाता है. पर वालिया अपनी पत्नी का सच जानने के लिए जैक की सेवाएं लेता है. जैक को दस दिन के अंदर सबूत के साथ वालिया को बताना है कि किस पुरुष के संग उनकी पत्नी का अवैध रिश्ता है. इसके लिए जैक को पारिश्रमिक राशि के तौर पर एक लाख रूपए व कुत्ता मिलना है.

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जैक, शिल्पा का पीछा करना शुरू करता है. ऐसा करते करते वह वालिया व शिल्पा के बीच बिगड़ रहे रिश्तों की तह तक पहुंच जाता है. उसे पता चलता है शिल्पा का किसी से भी अवैध संबंध नहीं है. वह तो सिर्फ वालिया से ही प्यार करती है, पर शिल्पा को लगता है कि उनका पति उन्हे तवज्जो नहीं देता. उनके पति के लिए सिर्फ धन ही मायने रखता है.

पर इसी दौरान जैक खुद शिल्पा से प्यार करने लगता है. शिल्पा भी जैक को पसंद करती है. दोनों साथ में घूमते हैं. पर दसवें दिन जैक, वालिया को बताता है कि उनकी पत्नी शिल्पा का किसी भी पर पुरूष के साथ अफेयर/अवैध रिश्ता नहीं है. मगर अब खुद जैक, शिल्पा से प्यार करने लगा है.

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वालिया को यकीन नहीं होता कि शिल्पा जैक जैसे लीचड़ युवक से प्यार करेगी. मगर वालिया को दुःखी देखकर जैक उन्हें समझाता है कि शिल्पा उनसे दूर गयी, जिसकी वजहें क्या रहीं. और वालिया से कहता है कि वह उन्हे एक मौका दे रहा है, वालिया पुनः अपनी पत्नी का प्यार हासिल कर ले. वालिया कोशिश शुरू करता है, पुनः शिल्पा को वक्त देना शुरू करता है. शिल्पा के साथ स्कूटर पर घूमना शुरू करता है. सब कुछ पटरी पर आना शुरू होता है, तभी लारा (ईवलीन शर्मा) की वजह से शिल्पा, वालिया का घर छोड़कर चली जाती है. तब वालिया व जैक एक साथ शिल्पा की तलाश शुरू करते हैं. अंत में वालिया अपने प्यार को पा जाते हैं.

एक बेहतरीन कहानी को पटकथा लेखक की कमजोरी के चलते अच्छा मुकाम नही मिल पाया. अनुराग बसु के साथ फिल्म ‘‘लाइफ इन ए मेट्रो’ और ‘बर्फी’ के लेखन से जुडे़ रहे संजीव दत्ता से इतनी लचर पटकथा व कहानी की उम्मीद नहीं थी. फिल्म के संवाद भी बहुत ही लचर हैं. पटकथा लेखक और निर्देशक दोनों की इस फिल्म पर कहीं कोई पकड़ नहीं रही. फिल्म में लारा (ईवलीन शर्मा) व कुत्ते से जुड़ा प्रकरण बेवजह ठूंसा हुआ लगता है. यह प्रकरण कहानी में रोचकता नहीं, बल्कि ठहराव ला देता है.

वालिया की कंपनी के प्रेशर कूकर का एक जापानी कंपनी के साथ व्यापारिक समझौता वाला सीन भी अति बनावटी है. निर्देशक अपनी कमियों के चलते अरबाज खान व अमित साध जैसे बेहतरीन कलाकारों का सही उपयोग नहीं कर पाए. किसी भी किरदार का सही ढंग से चित्रण ही नहीं हुआ. फिल्म के अंत का अंदाजा दर्शकों को इंटरवल से पहले ही पता चल जाता है. यह भी फिल्म के लिए सही नहीं कहा जा सकता.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो कमजोर पटकथा व सही चरित्र चित्रण के अभाव में अरबाज खान व अमित साध की प्रतिभा उभर नहीं पायी. सोनल चौहान ठीक ठाक लगी हैं. हर कलाकार अपने किरदार के साथ न्याय करने में पूर्णरूपेण असफल रहा. कैमरामैन दुलीप रेगमी बधाई के पात्र हैं, उन्होंने कुछ दृश्यों को जरुर सुंदर बना दिया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘जैक एंड दिल’’ का निर्माण सागर एस सिंगारे, संदेश जाधव व योगेश सिंह ने किया है. फिल्म के निर्देशक सचिन पी करांडे, लेखक संजीव दत्ता, कैमरामैन दुलीप रेगमी, संगीतकार रामजी गुलाटी, अरको पार्वो मुखर्जी तथा कलाकार हैं – अमित साध, अरबाज खान, सोनल चौहान, ईवलीन शर्मा व अन्य.

मौसम इकरार के, दो पल प्यार के : बेसिर पैर की कहानी

‘‘हंड्रेड डेज’’, ‘‘सितम’’,  ‘‘दलाल’’, ‘‘अग्निसाक्षी’’, ‘‘खोटे सिक्के’’ जैसी 15 से 20 फिल्मों के निर्देशक पार्थो घोष पूरे आठ वर्ष की खामोशी के बाद वह बतौर निर्देशक फिल्म‘‘मौसम इकरार के, दो पल प्यार के’’ लेकर आए हैं. अफसोस इस फिल्म को देखकर इस बात का अहसास ही नहीं होता कि इसका निर्देशन किसी अनुभवी निर्देशक ने किया हो.

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संगीतमय प्रेम कहानी प्रधान फिल्म की कहानी के केंद्र में अमर सक्सेना (मुकेश जे भारती) और अंजली (मदालसा शर्मा) की प्रेम कहानी है. अमर अपनी मां दिव्या (उषा बच्छानी) के साथ पेरिस में रहता है, मगर पीएचडी करने के लिए वह मुरादाबाद आता है, जहां कभी उसके माता पिता रहा करते थे. कौलेज जाते समय अंजली की ही कार से उसे टक्कर लगती है और उसके हाथ में फ्रैक्चर हो जाता है, तब अंजली उसे अस्पताल ले जाती है. फिर अंजली, अमर को अपने घर ले जाती है, जहां अमर की मुलाकात अंजली की मां मधु (नीलू कोहली) और पिता राजेश मल्होत्रा (अविनाश वधावन) से होती है. अमर जब तक पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं हो जाता, तब तक अंजली के ही घर में रहता है.

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अमर वापस मुरादाबाद चला जाता है. इधर अंजली को अहसास होता है कि वह तो अमर से प्यार करने लगी है. पर अमर उसके प्यार को ठुकरा देता है. इससे अंजली का दिल टूट जाता है. जब यह बात अंजली के पिता राजेश मल्होत्रा को पता चलती है, तो वह अपनी बेटी की खुशियों के लिए अमर को राजी करने का निर्णय लेते हैं. अमर,अंजली से शादी के लिए तैयार हो जाता है.

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पर फिर राजेश मल्होत्रा को पता चलता है कि अमर तो उनके दुश्मन सुनील सक्सेना का बेटा है. पता चलता है कि कौलेज में पढ़ाई के दौरान सुनील सक्सेना का मुराबाद की ही लड़की सोनाली से प्रेम था. एक दिन सोनाली अपने घर वालों की मर्जी के खिलाफ कदम उठाते हुए घर से सुनील के साथ शादी करने के लिए भागती है, मगर कुछ वजहों से सुनील अचानक पेरिस चला जाता है और नियत स्थान पर नहीं पहुंचता, तो सोनाली आत्महत्या कर लेती है.

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सोनाली, अंजली के पिता राजेश मल्होत्रा की बहन थी. इसलिए राजेश निर्णय सुना देता है कि उनकी बेटी अंजली का विवाह अमर से नहीं हो सकता. अब राजेश, अंजली का विवाह अपने दोस्त व शहर के एस पी विक्रम (एहसान खान) के बेटे विजय के साथ तय कर देते हैं. तमाम घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः अंजली व अमर का विवाह हो जाता है.

बंदर के हाथ में उस्तरा देने पर किस तरह की दाढ़ी बनेगी, इसका ताजा तरीन उदारण है फिल्म ‘‘मौसम इकरार के, दो पल प्यार के’’, जिसे फिल्म के लेखकद्वय व निर्देशक ने बर्बाद करके रख दिया. लेखक द्वय एक बेहतरीन कहानी भी नहीं लिख पाए.

 

बेसिर पैर की कहानी, अति बचकानी पटकथा व अति घटिया संवादों के चलते फिल्म दस मिनट बाद ही असहनीय हो जाती है. फिल्म को तहस नहस करने में पटकथा व संवाद लेखक तरूण माथुर व रिषि आजाद अपनी तरफ से जितना योगदान दे सकते थे, वह उन्होंने भरपूर दिया है. फिल्म में हिंदी के तमाम मुहावरों को गलत ढंग से व गलत जगह पर रखा गया है. इंटरवल के बाद तो दर्शक अपना सिर पीटने लगता है.

फिल्म देखकर यह कल्पना करना कठिन हो सकता है कि इस फिल्म का निर्देशन बौलीवुड के दिग्गज फिल्म निर्देशक पार्थो घोष ने किया है, जो कि अतीत में तमाम सफलतम व बेहतरीन फिल्में दे चुके हैं. खैर, इस फिल्म को देखकर एक बात साफ हो जाती है कि पार्थो घोष ने बहुत ही घटिया निर्देशन दिया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो किसी भी कलाकार का अभिनय प्रभावित नहीं करता. अमर सक्सेना के किरदार में मुकेश जे भारती उपयुक्त नहीं बैठते. उनके चेहरे पर कहीं कोई भाव नहीं आता. हर सीन में सपाट चेहरे के साथ मौजूद रहते हैं. फिल्म देखकर अहसास होता है कि वह बिना किसी निर्देशक के आदेश का पालन किए अपनी मर्जी से सब कुछ कर रहे हैं.

अंजली के किरदार में मदालसा शर्मा केवल खूबसरत लगी हैं, अन्यथा एक भी सीन में इस बात का अहसास नहीं दिलाती कि वह एक अदाकारा हैं. अविनाश बधावन व हेमंत पांडे की प्रतिभा को जाया किया गया. इस तरह की फिल्मों का हिस्सा बनकर हेमंत पांडे स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं. गीत संगीत व नृत्य भी स्तरहीन है.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मौसम इकरार के, दो पल प्यार के’’ का निर्माण ‘‘विवेक फिल्म प्रोडक्शन हाउस’’ के बैनर तले मंजू भारती ने किया है. फिल्म के निर्देशक पार्थो घोष, कहानी, पटकथा व संवाद लेखक रिषि आजाद और तरूण माथुर, कैमरामैन अकरम खान व दामोदर नायडू, संगीतकार बप्पी लाहरी तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – मुकेश जे भारती, मदालसा शर्मा, मंजू भारती, नीलू कोहली, अविनाश वधावन, उषा बच्छानी, एहसान खान, हेमंत पांडे, वी जे एंडी, दीपू श्रीवास्तव व अन्य.

अब क्या करेंगे दिग्विजय सिंह

लगातार दुर्दिनों से जूझ रहे मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और गुजरे कल के दिग्गज कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह लगता है अपनी अनदेखी से व्यथित होकर अब आर पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के हालिया इंदौर उज्जैन दौरों से नदारद रहे दिग्विजय कथित तौर पर केरल चले गए थे. हालांकि राहुल गांधी मुद्दत से उनकी अनदेखी जानबूझ कर करते रहे हैं क्योंकि वे हर हाल में मध्यप्रदेश का चुनाव जीतना चाहते हैं यह जीत ही उनका दिल्ली का रास्ता प्रशस्त करेगी.

अपनी अनदेखी को हाजमे के चूरन की तरह तो दिग्विजय ने फांक लिया था लेकिन इसके ओवर डोज़ से उनके पेट में मरोड़ें उठ रही है. जो वे टिकट वितरण मीटिंग में ज्योतिरादित्य सिंधिया से उलझ बैठे. दिल्ली में राहुल गांधी के सामने जब सिंधिया–दिग्विजय झगड़े तो मध्यप्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई कि अब आएगा मजा. राजा महाराजा खुलकर आमने सामने आ गए हैं और ये हालत आज नहीं तो कल बनना ही थे. दरअसल में दिग्विजय सिंह चाहते हैं कि उनके समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट मिलें जिससे अगर कांग्रेस सत्ता में आए तो उनकी भूमिका मेकर की रहे.

उलट इसके ज्योतिरादित्य सिंधिया जानते हैं कि दिग्विजय सिंह भले ही कहीं सीधे पिक्चर में न हों लेकिन वे अपनी खुराफात से बाज नहीं आएंगे इसलिए उनकी मंशा यह है कि ज्यादा से ज्यादा टिकिट उनके समर्थकों को मिलें जिससे उनकी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी और मजबूत हो. इस खेल में प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ किसके साथ हैं यह सस्पेंस कांग्रेसी खेमे और राजनीति में दिलचस्पी रखने बालों को मथे डाल रहा है.एक वर्ग का सोचना यह है कि कमलनाथ अंदरूनी तौर पर  दिग्विजय के साथ हैं जबकि दूसरे वर्ग की राय जुदा है कि अब वे राहुल सोनिया के कहने पर सिर्फ कांग्रेस को जिताने जी जान से जुटे हैं जिसमें अगर दिग्विजय सिंह आड़े आते हैं तो वे उनसे न तो याराना निभाएगे और न ही किसी तरह की सहानुभूति रखेंगे.

अर्जुन सिंह की सियासी विरासत संभाल रहे दिग्विजय की सिंधियाओ से पुरानी दुश्मनी है एक वक्त में जब ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव का मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनना तय था तब अर्जुन – दिग्विजय की जोड़ी ने ही टँगड़ी मारी थी.ज्योतिरादित्य भी राहुल के कहने पर ही सक्रिय हुये हैं उनका मकसद भी कमलनाथ की तरह अपने सखा राहुल का दिल्ली मिशन पूरा करना है.

पर इस जोड़ तोड़ में दिग्विजय कहीं नहीं हैं जो चुनावी राजनीति से दूर रहने की बात अक्सर कहते रहते हैं यहां यह तथ्य काबिलेगौर है कि दिग्विजय सिंह यह तो कहते रहते हैं कि वे भी  प्रदेश में कांग्रेस की जीत चाहते हैं लेकिन वे कहीं भी यह नहीं कहते कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने भी वे कृतसंकल्प हैं. दिग्विजय सिंह की इमेज प्रदेश में कतई अच्छी नहीं है वे वोटर द्वारा नकारे जा चुके हैं और खुद भी एक बयान में मान चुके हैं कि उनके भाषण देने से कांग्रेस के वोट कटते हैं इसलिए वे चुनाव प्रचार नहीं करेंगे. इस बयान के बाद उन्होने केरल का रुख किया था तो कांग्रेसियों ने राहत की सांस ली थी कि चलो अब वो कलह और भितरघात तो नहीं होगी जिसके चलते मुन्नी की तरह बदनाम हुई कांग्रेस 2003 के बाद से सत्ता की मुंह दिखाई के लिए तरस रही है.

हैरत और दिलचस्पी की बात यह भी है कि टिकिट बटबारे को लेकर कमलनाथ और सिंधिया के बीच कोई मनमुटाव नहीं है लेकिन अब दिग्विजय एतराज जता रहे हैं तो घमासान होना तो तय है अब वह कैसा होगा इसके आकार प्रकार का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा. 15 साल में दिग्विजय का गुट उतना तितर बितर नहीं हुआ था जितना कमलनाथ-सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने के बाद से पिछले 6 महीनों में हुआ.अब हालत तो यह है कि खुद उनके समर्थक उनसे कन्नी काटने लगे हैं जिन्हें टिकिट चाहिए या जिन्हें  संभावित जीत के बाद मंत्री बनना है.

कांग्रेस का मतलब ही आजकल राहुल गांधी होता है ऐसे में जिस पर उनकी नजर तिरछी हो जाती है उसकी कोई कीमत कांग्रेस में नहीं रह जाती पर दिग्विजय की अगर थोड़ी बहुत है तो उसकी वजह उनकी पुरानी निष्ठा और अजीत जोगी की तरह नई बगाबत न करना है.चतुर सुजान दिग्विजय सिंह भी जानते समझते हैं कि उनकी बची खुची कीमत कांग्रेस में बने रहने पर ही है.

लेकिन ज्योतिरादित्य का कांग्रेस में बढ़ता कद और दबदबा उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है तो इसके दूरगामी नतीजे तो निकालना तय है जिसमें कांग्रेस से ज्यादा खुद दिग्विजय का नुकसान है.ताजे विवाद पर कांग्रेसी रिवाज के मुताबिक राहुल गांधी ने एक कमेटी बना दी है जिसमें अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली और अहमद पटेल को ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे दिग्विजय–सिंधिया विवाद सुलझाएं. लगता नहीं कि यह कमेटी राहुल गांधी की मंशा के खिलाफ जाएगी खुद दिग्विजय भी जानते हैं कि ऐसी कमेटियां क्यों बनाई जाती हैं.

अब अगर राहुल गांधी अपने सखा ज्योतिरादित्य का ही पक्ष लेंगे तो दिग्विजय सिंह क्या करेंगे इसमें सभी की दिलचस्पी है. दिग्विजय सिंह के पास तब ये तीन रास्ते बचेंगे पहला यह कि वे सर झुकाकर काम करें दूसरा यह कि वे चुनाव में कांग्रेस को हरवाने काम करें हालांकि अब उनकी हैसियत पहले सी जिताऊ या हराऊ नेता की नहीं रही है 2-4 सीटों पर ही वे कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं वो भी उसी सूरत में जब उनका समर्थित कोई उम्मीदवार राजी हो. तीसरा रास्ता खुली बगावत और दुखी मन से पार्टी छोड़ देने का है जिसका जोखिम भरा फैसला अगर वे लेते हैं तो जरूर कहीं के इस पकी उम्र में नहीं रह जाएंगे.

प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के गहमागहमी भरे माहौल में इस प्रतिनिधि ने जब कुछ कार्यकर्तों से बात की तो सभी ने एक सुर में स्वीकारा कि कांग्रेस सालों बाद बढ़त पर है लोग भाजपा शासन से आजिज़ आ चुके हैं और कमलनाथ और सिंधिया के नेतृत्व में अच्छा काम व प्रचार सभी एकजुट होकर कर रहे हैं. ऐसे में जमीनी पकड़ खो चुके दिग्विजय सिंह अगर अड़ंगा डालते हैं तो राहुल गांधी को चाहिए कि उन्हें तुरंत बाहर का रास्ता दिखाएँ.इससे उतना ही मामूली नुकसान इन कार्यकर्ताओं की निगाह में होगा जितना दिग्विजय सिंह के कांग्रेस में रहते हो रहा है.

प्रदूषण : दिल्ली ही नहीं एनसीआर की भी सांसें थमीं

प्रदूषण की मार झेल रही हवा जैसेजैसे सर्दी बढ़ रही है और जहरीली होती जा रही है. आशंका जताई जा रही है कि दीवाली के बाद इस के स्तर में और इजाफा हो सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण प्राधिकरण ने चेतावनी देते हुए कहा है कि हरियाणा और पंजाब में किसानों द्वारा जलाई जाने वाली पराली और हवा का रुख दिल्ली की तरफ होने से दिल्ली और एनसीआर के निवासियों को इस के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.

दिल्ली से ज्यादा प्रदूषण की मार एनसीआर के शहरों को झेलनी पड़ रही है. अभी हाल ही में गाजियाबाद और गुरुग्राम की हवा दिल्ली से ज्यादा जहरीले स्तर पर पहुंच गई थी. दोनों शहरों का गुणवत्ता सूचकांक खतरनाक श्रेणी में पहुंच गया है. ऐसी हवा में सांस लेने से स्वास्थ्य संबंधी कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक राजधानी में प्रदूषण भरे खतरनाक दिनों की शुरुआत हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि नवंबर मध्य तक दिल्ली गैस के चैंबर में तबदील हो सकती है.

प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर रोक

दिल्ली प्रदूषण कंट्रोल कमेटी की ओर से 417 ऐसी इकाइयों को बंद करने का नोटिस जारी किया गया है, जो चेतावनी देने पर भी प्रदूषण का स्तर कम नहीं कर रहे हैं. साथ ही 113 ऐसी औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का निर्देश दिया है जो इन्हें सीएनजी में तबदील नहीं की गई हैं. पूरी दिल्ली में 1,368 इकाइयों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए हैं.

दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में लगातार खराब होती हवा की गुणवत्ता को ठीक करने के लिए सरकार अब सख्त कदम उठाते हुए वायु प्रदूषण मानको का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर कार्रवाई करेगी. केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री ने हाल ही में एनसीआर में वायु प्रदूषण की स्थिति बैठक की समीक्षा के बाद यह जानकारी दी.

हवा को जहरीला बनाता धुंआ

दिल्ली को प्रदूषण से बचाने के लिए हो रही तमाम कोशिशें नाकाफी साबित होती दिख रही हैं. हरियाणा और पंजाब में पराली जलाए जाने व हवा की रफ्तार कम होने से यह धुंआ वातावरण में फैल कर उसे दूषित कर रहा है. इस का स्वास्थ्य पर तो हानिकारक असर हो ही रहा है साथ ही दृश्यता कम होने से आवागमन भी बाधित हो रहा है. हवा में प्रदूषण फैलाने वाले पार्टिकुलेट मैटर को आमतौर पर उन के आकार के हिसाब से 2 श्रेणियों पीएम 10 व पीएम 2.5 में बांटा जाता है. पीएम 10 आकार के कण बड़े होते हैं और आमतौर पर हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इन को शरीर में घुसने से रोकती है या फिर ये कफ द्वारा बाहार निकल जाते हैं, लेकिन पीएम 2.5 आकार के प्रदूषण कण बेहद महीन होते हैं और सांस के जरिए सीधे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, इस से तमाम किस्म की बीमारियों और हार्टअटैक का खतरा होता है. दिल्ली की हवा में इस की मात्रा काफी ज्यादा पाई गई जोकि चिंतनीय है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस के लिए मुख्य तौर पर पर्यावरण में फैला धुंआ ही जिम्मेदार है चाहे वह पराली जलाने से फैला हो या फिर उद्योगों या पटाखों से निकला धुंआ हो.

प्रदूषण के प्रकोप से बच्चों का आईक्यू हो रहा है कम

प्रदूषण के प्रकोप से न केवल दिल्ली बल्कि दुनियाभर के ज्यादातर विकसित और विकासशील देश भी जूझ रहे हैं. वायु प्रदूषण न सिर्फ आप के कपड़े खराब करता है बल्कि नौनिहालों के दिमाग पर भी यह बुरा असर डालता है. वायु प्रदूषण आईक्यू को कम करने के साथ ही याददाश्त भी कम करता है साथ ही कई तरह के तंत्रिका संबंधी बीमारियों को पैदा करता है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह बच्चों में चिंता, विकास संबंधी बीमारियों को भी जन्म देता है. दुनियाभर में तकरीबन एक करोड़ 70 लाख बच्चे वायु प्रदूषण से प्रभावित हैं. इस के प्रकोप से बच्चे अलजाइमर और पर्किसन जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि वायु प्रदूषण का सीधा संबंध निमोनिया जैसी बीमारियों से है जो देश में हर साल 18 लाख बच्चों की जान लेता है. इस के अलावा यह दूसरे श्वास और दमा जैसे रोगों को भी जन्म देता है.

अंतरकलह में फंसी सरकारें

देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रवैया अपनाया है. सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में बाहर से आने वाले 10 और 15 साल पुराने पैट्रोल और डीजल के वाहनों पर तत्काल प्रभाव से रोकने के आदेश दिए हैं. कोर्ट ने ट्रांसपोर्ट विभाग को ऐसे वाहनों का सड़कों पर पाए जाने से उन्हें जब्त करने के निर्देश दिए हैं.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भी ऐसे वाहनों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चलाने पर प्रतिबंध लगाया है.

इधर, केंद्र और दिल्ली सरकार एकदूसरे पर कीचड़ उछाल रही है, बजाय इस जानलेवा समस्या को हल करने के. वैसे भी सरकारों का काम, समस्या हल करना थोड़े होता है वे तो इस पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकती हैं. लेकिन इस गंभीर समस्या पर केंद्र और राज्य सरकारों को गंभीरता से विचार करना होगा अन्यथा हालात भयंकर होंगे.

 

खाड़ी देश : पैसे के बल पर होता नशे और सैक्स का खेल

मुंबई पुलिस के क्राइम ब्रांच ने 4 ऐसे आरोपियों को अरेस्ट किया है जो मुंबई व देश के कई जगहों पर घूमते रहते थे साथ ही विदेशों में देह व्यापार के धंधे में लिप्त थे. पुलिस पूछताछ में इन आरोपियों ने कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं.

दरअसल, जब से मुंबई में डांस बार बंद हुए, बेरोजगार हो गईं बार डांसर को होटल मालिक और्कैस्ट्रा के बहाने बुलाते रहते हैं.

कोर्ट के आदेश के बाद बंद डांस बार पहले शाम होते ही गुलजार हो जाते थे और अमीर ग्राहकों को नशे के साथसाथ सैक्स भी परोसा जाता था.

पर जब से डांस बार बंद हुए यहां काम कर रही लड़कियों के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई. कईयों ने या तो घर वापसी कर ली या फिर कहीं और ठिकाना ढूंढ लिया. आमतौर पर ये बार डांसर पश्चिम बंगाल, राजस्थान, यूपी आदि राज्यों की होती हैं.

सैक्स का नया कारोबार

मुंबई के होटलों में नौकरी के बहाने कई लड़कियों के फोटो खींच लिए गए थे, जिन्हें गिरफ्तार आरोपियों को फौरवर्ड किया गया था. यहीं से शुरू हुआ सैक्स का नया कारोबार जिस की गिरफ्त में लडकियां फंसती चली गयीं.

गिरफ्तार आरोपियों ने इन फोटो को खाड़ी देशों के कई शहरों के होटल मालिकों को भेज दिया. वहां से चुनी गईं लड़कियों की लिस्ट आई जिन से मुंबई में बात की गई. जिन लड़कियों ने खाड़ी देश जाने के लिए सहमति दे दी उन्हें बतौर ऐडवांस में 20 हजार रुपए दिए गए.

ऐडवांस देने के बाद दलालों के पास समस्या खड़ी हो गई. पैसे तो लड़कियों को दिए जा चुके थे पर इन में से कई लड़कियों के पास पासपोर्ट नहीं थे. जिन के पास पहले से ही थे उन की डिमांड भी ज्यादा थी. फिर इन के लिए पासपोर्ट बनवाया गया.

पुलिस ने बिछाया जाल

इस गंदे व्यापार के खेल का परदाफाश करने वाले क्राइम ब्रांच के सीनियर इंस्पेक्टर अजय सावंत, सुशील बंजारी, राजू सुर्वे, सुनील पवार की जांच टीम ने मीडिया को बताया कि इन लड़कियों से उन के परिवार या परिवार के किसी करीबी आदमी के बैंक अकाउंट नंबर भी मांगे गए. कई खातों में ऐडवांस में 3 महीने की डेढ लाख सैलरी भी दी गई.

पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के लिए मुखबिरों का जाल बिछा दिया. पकड़ में आने के बाद सख्ती से पूछताछ की गई तो कई सनसनीखेज खुलासे हुए.

खाड़ी देशों का डांस बार

मुंबई के डांस बारों में आमतौर पर ग्राहक नोट बरसाते थे और नशे के साथसाथ सैक्स की डिमांड करते थे. जिन से सौदा पट जाता था ग्राहक उसे या तो अपने साथ ले जाते थे या फिर होटल में ही व्यवस्था होती थी. पर खाड़ी देश के शहरों के डांस बारों में ग्राहकों को डांस बार में जाने से पहले काउंटर पर एक कार्ड दिया जाता है. इस कार्ड की कीमत एक बार में 50-60 दिरहम होती है.

सैक्स का खुला खेल

डांस बार में आए ग्राहकों को जो लड़की पसंद होती है उस के नाम से मशीन में कार्ड स्वाइप करना होता है. वह जितनी बार कार्ड को स्वाइप करता है उस की पूरी डिटेल कंप्यूटर में सेव हो जाती है. फिर काउंटर छोड़ने से पहले उसे पूरी पेमेंट करनी होती है.

अजीबोगरीब शर्त

वहां के होटलों में एक लड़की को 3 महीने के अंदर कम से कम 400 बार कार्ड स्वाइप कराना अनिवार्य होता है वरना लड़कियों को पासपोर्ट नहीं लौटाए जाते हैं.

कोई भी लड़की सिर्फ डांस से ग्राहकों को कार्ड स्वाइप कराने के लिए राजी नहीं कर पाती थी. लिहाजा उसे कईकई ग्राहकों के साथ सैक्स करना होता था.

ग्राहक उसे फिर अपने साथ होटल ले जाते थे और वहां उस के साथ शुरू होता था सैक्स का खेल. इस खेल में भी किसी लड़की को ग्राहक को पूरी तरह संतुष्टी देनी होती थी यानी ग्राहक का सैक्स के दौरान जो भी डिमांड होता उसे लड़की को पूरा करना होता यहां तक कि अप्राकृतिक सैक्स भी.

तारतार इंसानियत

दरअसल, खाड़ी देश में पैसे कमाने को ले कर जितने सब्जबाग दिखाए जाते हैं, वहां होता इस के उलट ही है. कबूतरबाजी से या फिर वैध तरीके से भी गई युवतियों का जीवन वहां इतना नरकीय हो जाता है जो एक भुक्तभोगी युवती ही समझ सकती है.

आएदिन खाड़ी देशों में काम करने गई महिलाओं के साथ की गई बर्बरता की खबरों से इंसानियत कांप उठती है. हाल के वर्षों में कई नर्सों ने भी वहां काम छोड़ कर भारत लौटना ज्यादा मुनासिब समझा है.

देश के कई हिस्सों में समाजिक संस्थाओं ने खाड़ी देशों में महिलाओं पर हो रही जुल्म के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया है बावजूद इसके अभी भी बड़ी संख्या में भारतीय महिलाओं को वहां अवैध तरीके से पहुंचाया जाता है.

सख्त हो कानून

बार डांसरों को पहले डांस से दिल जीतने की बात कह कर भेजा जाता है पर वहां शुरू होता है सैक्स का खेल. वह भी ऐसा कि 24 घंटे में एक युवती को कई ग्राहकों के साथ सैक्स करने पर मजबूर किया जाता है.

सैक्स वर्करों के लिए खाङी देश उस नरक के समान है जहां पलपल जिंदगी बदतर होती जाती है. ऐसे में मुंबई पुलिस ने जिन आरोपियों को पकड़ा और जो खुलासे हुए किए उस की प्रशंसा तो की जानी चाहिए पर साथ ही सरकार को भी चाहिए कि वह इस मामले को गंभीरता से ले और कानून सख्त बनाए ताकि दरिंदगी की इंतहा पर लगाम लगायी जा सके.

बदलते मौसम के साथ बदलें खानपान

मौसम बदलता है तब अपने साथ कुछ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लाता है. लेकिन तब अपने आहार को में कुछ बदलाव आप को कई समस्याओं से निजात दिला सकता है.

फल व हरी सब्जियां : बदलते मौसम में शारीरिक सक्रियता बनाए रखने के लिए हरी सब्जियों, फलों का भरपूर सेवन करें. अंगूर, संतरे, अमरूद, आंवले का नियमित सेवन करें. इस से शरीर को विटामिन सी मिलेगा और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी.

दूध : फैट फ्री दूध के साथ अनाज का सेवन शरीर को ऊर्जा देता है.

ब्रोकली : मूड पर भी असर डालता है बदलता मौसम, जिससे आप तनाव का शिकार हो सकते हैं, जिस के लिए ‘विटामिन सी’ और बीटा केरोटिन का सेवन जरूरी है और इस का अच्छा स्रोत है ब्रोकली.

केला : फ्लू की समस्या बदलते मौसम में काफी होती है. फ्लू में कफ, नाक बहने की परेशानी में केले का सेवन फायदेमंद है और केले से शरीर को पोषण भी मिलता है.

ओटमील : त्वचा संबंधी समस्या जैसे स्किन रैशेज से बचने के लिए नहाने के पानी में ओटमील को मिला लें. स्किन के रैशेज ठीक हो जाएंगे.

अदरक : गले में खराश, दर्द और खानेपीने में समस्या बदलते मौसम में होती है. अदरक अच्छा घरेलू नुक्सा है. अदरक वाली चाय या अदरक वाला उबला पानी या अदरक का रस शहद के साथ ले सकते हैं.

गाजर : बदलते मौसम में आंखों की समस्याओं जैसे आंखों में जलन, आंखों का लाल होना, से निजात पाने के लिए विटामिन ए युक्त आहार जैसे पालक, गाजर खाएं.

लहसुन : लहसुन जरूर खाएं. इस में एलिन नामक फ्लेवरिंग एजेंट होता है, जो कफ के जमाव को दूर करता है.

इन सब के अलावा शरीर में पानी की कमी न हो, इस के लिए अधिक से अधिक मात्रा में पानी पिएं. हर्बल टी पिएं. सुबह एक गिलास कुनकुना पानी पिएं.

बस खानपान का यह बदलाव आप को तैयार रखेगा बदलते मौसम के हानिकारक प्रभाव से और शरीर को बाहर के वातावरण से तालमेल बिठाने के लिए, जो कि बहुत जरूरी है.

 

सरकार और रिजर्व बैंक में टकराव : किसकी कितनी जवाबदेही

सरकार, न्यायपालिका और स्वायत्त संस्थानों के बीच पिछले समय से लगातार टकराव बढ रहा है. एकदूसरे के कामों में हस्तक्षेप करने और अपना काम ठीक से न करने के आरोपप्रत्यारोप लग रहे हैं.

पिछले कुछ समय से केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केंद्र सरकार के बेजा हस्तक्षेप का विवाद सुर्खियों में रहा है. पिछले दिनों जजों की नियुक्ति को ले कर सरकार और सुप्रीम कोर्ट का टकराव सामने आया था.

कौलेजियम की सिफारिश को सरकार ने मानने से इनकार कर दिया था. सीबीआई में भ्रष्टाचार को ले कर सरकार, सीबीआई और सीवीसी के बीच परस्पर दोषारोपण का खेल चल ही रहा है.

अब ताजा मामला सरकार और रिजर्व बैंक के टकराव का सामने आया है. दोनों के बीच अलगअलग मुद्दों पर तकरार चल रही है.

एनपीए, नकदी संकट और बिजली कंपनियों को छूट जैसे मामलों पर विचार के लिए सरकार ने आरबीआई को पत्र भेजे थे. इस के बाद रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का मुद्दा उठाया था. इस पर वित्त मंत्रालय ने स्पष्टीकरण भी दिया. इस में कहा गया कि सरकार आरबीआई की स्वायत्तता का सम्मान करती है लेकिन सरकार और रिजर्व बैंक दोनों का काम जनहित और अर्थव्यवस्था की जरूरत के मुताबिक होना चाहिए.

विरल आचार्य ने सरकार के दखल की बात सार्वजनिक रूप से कहने पर जिस तरह से विवाद की शुरुआत हुई वह और आगे बढी जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दस लाख करोड़ रुपए के बट्टेखाते के कर्ज के लिए रिजर्व बैंक को जिम्मेदार ठहराया.

वित्तमंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि पिछली सरकार द्वारा आंख बंद कर कौरपोरेट कंपनियों को कर्ज बांटा. उस समय रिजर्व बैंक ने निगरानी क्यों नहीं रखी? तब रिजर्व बैंक ने नियामक के तौर पर अपनी भूमिका क्यों नहीं निभाई. बैंक चुप क्यों रहा. उस दौरान बांटे गए कर्ज के बावजूद खनन और स्टील उद्योग की हालत बदतर हो गई.

असल में रिजर्व बैंक उतना जवाबदेह नहीं है जितना राजनीतिक तौर पर वित्तमंत्री और उन का मंत्रालय. राजनीतिक तौर पर वित्तमंत्रालय अपनी नीतियों का इस्तेमाल अक्सर चुनावों में भुनाने के लिए करता है.

सरकार नोटबंदी और जीएसटी को ले कर घिरी हुई है. इन दोनों निर्णयों की जम कर छिछालेदर हो रही है. अभी तक सरकार बता नहीं पाई है कि दोनों फैसलों से देश की जनता को क्या, कितना फायदा हुआ.

एनपीए बढता जा रहा है. सरकार पिछली यूपीए सरकार पर इस के लिए दोषारोपण कर रही है. सरकार और रिजर्व बैंक दोनों एकदूसरे की पूरक भूमिका में हैं. सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक बैंक ब्याज दरों को घटा कर बाजार को राहत दे जबकि रिजर्व बैंक को लगता है कि सरकार उस का इस्तेमाल राजनीतिक मकसद से करना चाहती है.

यह सही है कि अर्थव्यवस्था कठिन दौर से गुजर रही है. किसी भी संस्थान की स्वायत्तता के लिए टकराव घातक साबित होता है.

सरकार स्वतंत्र संस्थाओं पर अपना नियंत्रण चाहती है. ऐसा करने के पीछे उस की अपने मन मुताबिक संस्थाओं में नियुक्तियां, नीतियां और विचारधारा थोपने की मंशा छिपी हुई है.

हालांकि संविधान ने हर संस्था को अपनेअपने अधिकार क्षेत्र में काम करने की आजादी दी है. हर संस्था की अपनीअपनी सीमाएं तय हैं लेकिन सरकारें उन में घुसपैठ करना चाहती हैं. इस से होगा यह कि धीरेधीरे संवैधानिक संस्थाएं अपना रुतबा खोने लगेंगी. जनता का उन पर भरोसा खत्म होता जाएगा. यह देश के लिए ही नुकसानदायक सिद्ध होगा.

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