श्रीति पांडेय एक प्रोफेशनल महिला हैं, जो अपना स्टार्टअप शुरू करने के लिए पुआल से घर बनाने के प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं. सरकारी स्टार्ट अप इंडिया प्रोग्राम समेत कई बड़े फंड प्रोवाइडर को अप्लाई कर चुकी हैं लेकिन फंड नहीं मिला. उनके मुताबिक़ पूरे देश में इस प्रोजेक्ट पर मैं ही काम कर रही हूं. बावजूद इसके स्टार्टअप के तहत सहयोग नहीं मिला सो प्रोजेक्ट को भी रफ्तार नहीं मिल रही.

श्रीति पांडेय के जैसा ही हाल निष्ठा अग्रवाल का भी है. ये बच्चों को शुरू से ही टेक्निकल एजुकेशन देने पर काम कर रही हैं. इस प्रोजेक्ट को लेकर मार्केट से अच्छा रिस्पौन्स भी मिला है लेकिन स्टार्टअप का प्रासेस इतना पेंचीदा है कि उन्हें अभी तक समझ ही नहीं आया कि किसके सामने प्रोजेक्ट प्रजेंट किया जाए.

फंड बढ़ा लेकिन गया कहा
ऐसा नहीं है की भारत में स्टार्ट अप सफल नहीं हैं. 25 अक्टूबर 2018 को नेशनल एसोसिएशन औफ सौफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज यानी नासकौम द्वारा ‘इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम: अप्रोचिंग इस्केप वेलोसिटी’ रिपोर्ट पेश की गयी. रिपोर्ट में नासकौम ने साफ़ किया है कि देश में स्टार्टअप के वित्त पोषण में इस साल 108 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी. यह 2017 के दो अरब डौलर से बढ़कर इस साल 4.2 अरब डौलर पर पहुंच गया. इतना हे इनहीं उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी वाले स्टार्टअप की संख्या में 2017 की तुलना में इस साल 50 प्रतिशत वृद्धि हुई है. बावजूद इसके महिलाओं के साथ यह भेदभाव समझ से परे है.

इन्वेस्टमेंट का जेंडर गैप
दरअसल अन्य क्षेत्रों की तर्ज पर स्टार्टअप के मामले भी महिलाओं के साथ भेदभाव का रुख अख्तियार किया जाता है. इस बात को लेकर कई सर्वे भी हुए हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि अप्लाई करने वाले ज्यादातर महिला अप्लीकेंट्स को स्टार्ट अप के कई टेक्नीकल पहलुओं में उलझाकर फंड से दूर रखा जाता है. एक स्टडी के मुताबिक महिला प्रोफेशनल को मेल प्रोफेशनल की तुलना में कम इन्वेस्टमेंट मिलता है. लिहाजा आधे से अधिक महिलाएं अपने स्टार्टअप्स आइडिया को चाहकर भी स्टार्ट नहीं कर पाती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इन्वेस्टमेंट गैप इतना बड़ा है कि महिलाओं से जुड़े स्टार्टअप को 9.35 लाख डौलर जबकि पुरुषों के स्टार्टअप को 21 लाख डौलर का फंड मिला है. मजेदार पहलू तो यह है कि महिलाओं के स्टार्टअप्स को कम फंडिंग मिलने के बावजूद उनकी कंपनियों का रेवेन्यू पुरुष स्टार्टअप कंपनियों से ज्यादा होता है. स्टडी के मुताबिक इन्वेस्टमेंट कम मिलने के बावजूद पिछले पांच सालों में महिलाओं के स्टार्टअप ने पुरुषों के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा रेवेन्यू कमाया है. महिलाओं के स्टार्टअप ने हर एक डौलर पर 78 सेंट्स कमाया है जबकि पुरुषों के स्टार्टअप 31 सेंट्स कमाया है. महिलाओं के स्टार्टअप ने ज्यादा पैसा कमाया है. गौरतलब है कि यह स्टडी करीब 18,000 स्टार्टअप के बीच की गयी है.

स्टार्टअप इंडिया पर सवाल
नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में ‘स्टार्टअप इंडिया’ को लौन्च करते समय बड़े बड़े दावे करते हुए इसे महिलाओं की आत्मनिर्भर से जोड़ा था. एक आंकड़ा भी पेश किया लेकिन सच तो यह है कि ज्यादातर महिला अप्लीकेंट्स के अनुभव बेहद कड़वे रहे हैं. इनका कहना है कि स्टार्टअप योजना जो पेपर में है वह अभी तक जमीन पर उतर ही नहीं पाई है. इस योजना में अक्सर उन्हें लाभ मिलता है जो पहले से ही किसी इंडस्ट्री में हैं, पहली दफा नए स्टार्ट अप आइडियाज वालों के लिए रास्ते लगभग बंद हैं.

मेल डोमिनेटिंग थ्योरी
अमेरिका के सैन डिएगो स्थित यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया के शोधार्थियों के अनुसार 90% वेंचर कैपटिलिस्ट, जो स्टार्टअप्स में पैसा लगाते हैं, पुरुष हैं. जाहिर है ये कैपटिलिस्ट महिलाओं को फंड नहीं देते. इस लिहाज से साबित हो जाता है कि महिलाओं को स्टार्टअप की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में रुकावट पैदा करती है वही सदियों पुरानी मेल डोमिनेटिंग थ्योरी.

महिलाओं के साथ पक्षपात का यह सिलसिला पुराना है फिर चाहे वह आर्थिक स्तर पर हो या लैंगिक व फंडिंग लेवल पर. धर्म और रिवाज के नाम पर इस फैक्ट को सालों से एस्टेब्लिश किया गया है कि महिलाएं सिर्फ चूल्हा फूंकने के लिए बनी हैं बिजनेस तो पुरुषों का दंगल है. इसमें महिलाओं का भला क्या काम. हम यह भूल जाते हैं कि जिस देश में महिलाओं को भेदभाव, प्रतिबंध और कामकाज में नीचे रखा जाता है वहां का सामाजिक और आर्थिक विकास भी आधा अधूरा रहता है. आज इन्हें साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने से रोकना सिर्फ उनके विकास में बाधक नहीं बनता बल्कि देश का विकास भी अवरुद्ध करता है.

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