राम मंदिर मसले पर राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिये भारतीय जनता पार्टी अब प्राइवेट बिल लाने की योजना में है. प्राइवेट बिल पर गैर भाजपाई दल अगर राममंदिर के समर्थन में वोट करते है तो इसे भाजपा की जीत कही जायेगी और अगर वह राम मंदिर बिल के विरोध् में जाते हैं तो इन दलों को ही आम चुनाव में हिन्दुत्व के नाम पर हाशिये पर रखा जायेगा. भाजपा के सासंद राकेश सिन्हा ने इस बात के संकेत देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिये. असल में भाजपा की केन्द्र सरकार पर हिन्दुत्व का भारी दबाव है.

2014 के आम चुनाव में विकास की बात करने वाली भाजपा ने 5 साल में कोई ऐसा काम नहीं किया है जिसके बल पर वह 2019 के आम चुनाव में जा सके. ऐसे में केवल राममंदिर ही ऐसा मुददा है जिसके बल पर वह एक बार फिर से लोगो को भावनात्मक रूप से उलझा सकती है. ऐसे में जरूरी है कि चुनाव के पहले होने वाले संसद सत्र के दौरान कुछ करती दिखे. केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इस मसले पर कोई ठोस कदम उठाने के लिये तैयार नहीं है. ऐसे में बीच का रास्ता यही बनता है कि संसद के सत्र में एक प्राइवेट बिल आये. राम मंदिर पर हंगामा हो और मामला चुनाव का मुददा बन सके.

जिस तरह से नर्म हिन्दुत्व का समर्थन सभी दल कर रहे हैं ऐसे में भाजपा को उम्मीद है कि प्राइवेट बिल के विरोध करने पर उनको राम का विरोधी साबित किया जा सकेगा. लखनऊ में हुई संघ और भाजपा की बैठक में सभी नेताओं की एकजुट राय थी कि अगर राम मंदिर पर कुछ नहीं हुआ तो चुनाव प्रचार मुश्किल हो जायेगा. इसके बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान भी आया. मुम्बई में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और संघ प्रमुख की बैठक में यह मुददे सामने आयेंगे.

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