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अमृतसर रेल हादसा : मौत ने दी पटरी पर अनुशासनहीनता की सजा

32 सैकंड और 61 मौतें…दशहरा की शाम को अमृतसर के जोड़ा फाटक पर हुए भयानक रेल हादसे ने सब का दिल दहला दिया. रेलवे लाइन के दोनों तरफ फैला खून और इधरउधर छितरे पड़े कटे इंसानी अंगों को देख कर तो शायद रावण भी दहल उठा होगा, जिस को जलता देखने के उत्साह में जमा उन्मादी भीड़ को इस बात का भी भान नहीं था कि वह किस जगह खड़ी है.

91 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आती जालंधरअमृतसर डीएमयू ऐक्सप्रैस के हौर्न की आवाज किसी के कानों में नहीं पड़ी और तेज रफ्तार से आ रही ट्रेन ने पटरी पर जमा भीड़ को गाजरमूली की तरह रौंद दिया.

इस में गलती किस की है? क्या उस ट्रेन ड्राइवर की, जिस का कहना है कि रेलवे फाटक पर 2 पीली लाइटें जलती देख, ट्रेन की रफ्तार धीमी करने के संकेत को समझते हुए उस ने गाड़ी की स्पीड 91 से घटा कर 65 किलोमीटर प्रतिघंटा कर दी थी, मगर ऐसा करने के बाद भी ट्रेन ने लंबी दूरी तय कर ली. तेज रफ्तार ट्रेन को अचानक ब्रैक लगा कर रोका नहीं जा सकता था. अंधेरे के कारण दूर तक दिखाई देना भी संभव नहीं था. बावजूद इस के, ड्राइवर ने जब पटरी पर जमा लोगों को देखा तो काफी देर तक हौर्न बजाया, मगर कोई भी व्यक्ति पटरी से नहीं हटा.

पटाखों के शोर में ट्रेन के हौर्न की आवाज उस खड़ी भीड़ को सुनाई ही नहीं दी. ड्राइवर ने इमरजैंसी ब्रैक भी लगाए, लेकिन ट्रेन की रफ्तार हलकी सी कम हुई मगर तब तक 61 लोग उस की चपेट में आ कर अपनी जान गंवा चुके थे.

हादसा हो चुका था. ड्राइवर ने आगे टे्रन रोकने की कोशिश की, मगर उन्मादी भीड़ ट्रेन की ओर हाथों में पत्थर उठा कर दौड़ पड़ी. ट्रेन में बैठे यात्रियों की जान पर मंडराते खतरे को भांप कर ड्राइवर ट्रेन ले कर आगे बढ़ गया. आखिर रेल की पटरी पर जमा अनुशासनहीन लोगों की वजह से वह हजारों यात्रियों की जान दांव पर नहीं लगा सकता था. क्या गलती की उस ने?

धर्म की अंधभक्ति

19 अक्तूबर को दशहरे का उल्लास अचानक मातम में बदल गया. रातभर लोग रेलपटरी और अस्पतालों में अपनों की लाशों को ढूंढ़ते रहे. किसी को सिर मिला तो किसी को धड़. कितना भयावह दृश्य था यह. इस दर्दनाक घटना के लिए प्रशासन रेल की पटरी के पास दशहरे के कार्यक्रम का आयोजन करने वालों पर आरोप मढ़ता रहा और आयोजक रेलवे विभाग पर उंगली उठाते रहे. ट्रेन के ड्राइवर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

लेकिन गंभीरता से सोचें तो एहसास हो जाएगा कि गलती किसी और की नहीं, सिर्फ हमारी है. हम खुद ही अपनी जान के दुश्मन हैं. धर्म की अंधी आंखों को दिखाई ही नहीं देता कि हम कहां खड़े हैं? कहां चढ़े हैं? हम खुद गलत करते हुए बुराई पर अच्छाई की जीत का तमाशा देख रहे थे, क्या रेल की पटरियां खड़े हो कर तमाशा देखने की जगह हैं? आखिर हम अपनी अनुशासनहीनता और गलतियों का आरोप दूसरे पर कैसे मढ़ सकते हैं?

जब तक हम अनुशासित होना, व्यवस्थित रहना, नियंत्रित होना नहीं सीखेंगे, तब तक ऐसे हादसे हमें रुलाते रहेंगे. हर दुर्घटना सरकार की लापरवाही से नहीं होती. हमारा गैरजिम्मेदार होना दुर्घटनाओं को आमंत्रित करता है.

किसी भी अफवाह पर अनियंत्रित हो जाना, किसी भी आयोजन में अनुशासनहीन हो जाना, किसी के भी उकसाने पर बिना सोचेसमझे भीड़ का हिस्सा बन जाना हमारी आदत है. अमृतसर रेल हादसा इसी का दुष्परिणाम है. तेज गति से आती ट्रेन का न दिखना, उस की तीव्र आवाज का न सुनाई देना, उस की गति से होने वाले कंपन का आभास न होना साबित करता है कि रावण दहन देख रहे लोग किस हद तक लापरवाह और अनुशासनहीन थे. काश, हम सब यहीं से सीखना शुरू कर दें.

हमारे अंदर अनुशासनहीनता की मनोवृत्ति बहुत पुरानी है. व्यवस्थित रहने की शिक्षा हम ने कभी ग्रहण ही नहीं की. न धर्म ने इस की बाध्यता हमारे सामने रखी, न समाज ने, न मांबाप, गुरु या धर्मगुरु ने.

पाश्चात्य देशों में देखिए, लोग गिरिजाघरों में कितने अनुशासित और व्यवस्थित तरीके से जाते हैं, आराम से बैंचों पर बैठते हैं जबकि हमारे यहां मंदिरों में देखिए, कैसे भीड़ एकदूसरे के ऊपर पिली रहती है. कैसे धक्कामुक्की करते लोग भगवान पर प्रसाद चढ़ाने के लिए गिरेपड़े जाते हैं. कैसे मंदिरों के बाहर चप्पलों की चोरियां होती हैं, अंदर पर्स निकल जाते हैं.

किसी धर्मगुरु, किसी उपदेशक ने अपने समाज को यह समझाने की कोशिश नहीं की कि यह गलत है, ऐसा नहीं करना चाहिए. किसी ने भी लोगों के दिल में यह डर बैठाया नहीं कि अगर आप अनुशासित नहीं रहेंगे तो पूजापाठ का कोई अर्थ नहीं है, आप को सिर्फ दंड भोगना होगा.

मुसलमानों को देखिए, जुमे के दिन कैसे मुख्य सड़कों तक बिछे रहते हैं. इस से ट्रैफिक तक रुक जाता है, जिस से लोगों को असुविधा होती है. किसी को औफिस पहुंचने में देर होती है तो किसी को स्कूल पहुंचने में. कहीं ऐंबुलैंस ट्रैफिक में फंसी रह जाती है, क्योंकि सड़क पर नमाज हो रही है. पूरा पुलिस प्रशासन सारे काम छोड़ कर ट्रैफिक को नियंत्रित करने में लग जाता है. क्या फायदा तुम्हारी ऐसी इबादत से जो दूसरों को तकलीफ पहुंचा कर अदा की जा रही हो?

इंसानियत भूल बैठे

आज अपनेअपने धर्म का पालन करने के चक्कर में हम इंसानियत भूल बैठे हैं. हमें अच्छेबुरे की पहचान ही नहीं रह गई है. धर्म ने इंसान को फायदा कम, नुकसान ज्यादा पहुंचाया है. धर्म ने इंसानों के बीच नफरत के बीज बो दिए हैं. उन्हें अपनेअपने दायरे में बंद कर दिया है. दुनियाभर में धर्म के लिए लड़ाइयां होती रही हैं और आज भी हो रही हैं. धर्म के नाम पर इंसान सिर्फ खून बहा रहा है और इंसानियत मर गई है

धर्म ने आज पृथ्वी को रहने के काबिल नहीं छोड़ा है. हवा, पानी, मिट्टी में जहर घोल दिया है. सिर्फ भारत का उदाहरण देखें तो दशहरादीवाली में पटाखों का जहर हवा में ऐसा घुल जाता है कि सांस लेना दूभर हो जाता है. धर्म के नाम पर लाखों रुपए फूंक कर हम नईनई जानलेवा बीमारियां पैदा कर रहे हैं.

दुर्गापूजा, गणेशपूजा और इसी तरह की तमाम पूजाओं के बाद नदियों की क्या हालत होती है, किसी से छिपा नहीं है. यह गंदगी इंसान को कितने रोग दे रही है, किसी को इस की परवा ही नहीं है. हमें तो सिर्फ अपना धर्म देखना है, वही निभाना है. इस के चलते इंसान मरते हैं तो मरें. धर्म के ठेकेदार न तो लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं, न इंसानियत या नैतिकता की सीख देते हैं. वे सिर्फ कर्मकांड सिखाते हैं. बेतुके कर्मकांड. अतार्किक कर्मकांड.

जापानियों को देखिए, उन के लिए बचपन से ही अनुशासन बाध्यतामूलक है. घर, विद्यालय, धार्मिकस्थलों हर जगह वहां अनुशासन को प्राथमिकता दी जातीहै. अपने घर को, विद्यालय को, धार्मिकस्थल को साफ रखना उन का पहला कर्तव्य है. इंसान के पूर्ण विकास और चरित्र गठन के लिए बचपन से अनुशासन और नैतिकता की घुट्टी पिलाई जाती है. हर छात्र स्कूल में श्रमदान करता है और स्कूल की सफाई करता है. आप को यह बालश्रम लगेगा, मगर जापानियों के लिए सफाई रखना उन का दायित्व है. उन के मांबाप, गुरु और धर्मगुरु उन्हें यह सिखाते हैं.

इस का उदाहरण हमें 2018 के फुटबौल विश्वकप में देखने को मिला, जहां हारने के बाद भी रोते हुए जापानी खिलाडि़यों ने अपना लौकरूम साफ किया तथा जापान की जनता ने रोते हुए उस स्टेडियम को साफ किया, जहां बैठ कर उन्होंने मैच देखा. अनुशासन मनुष्य में तब आएगा जब उसे इस की शिक्षा बचपन से ही दी जाएगी.

अनुशासन जापानी बच्चों में सुचारु रूप से निवेश किया जाता है, शिक्षा के एक अहम अंग जैसा, जबकि हमारा युवा यह भूल बैठा है कि जिस समाज में वह रहता है उस के प्रति उस की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं. जिस सार्वजनिक संपत्ति को वह बिना सोचेसमझे तोड़ता है, गंदा करता है या आग के हवाले कर देता है उस की भरपाई करने कोई बाहर से नहीं आता. उस की भरपाई के लिए सरकार हम पर ही करों का बोझ डालती है और महंगाई के बोझ से झुकी हमारी कमर थोड़ी और झुक जाती है.

हमारे यहां कोई हादसा हो जाए तो लोग पैनिक हो जाते हैं, भगदड़ मच जाती है. जिस तरफ भीड़ दौड़ रही है, उसी तरफ हम दौड़ने लग जाते हैं, क्योंकि हम अनुशासित नहीं हैं. इसीलिए हादसे के वक्त हमारी सोच के दरवाजे बंद हो जाते हैं.

अनुशासित होते तो अमृतसर में रेल की पटरियों पर खड़े न होते. अनुशासन के नाम पर हमें बुखार आ जाता है. हमें हौर्न सुनाई नहीं देता, न रेल की पटरी पर रेल का आना पता चलता है, न सड़कों पर गाडि़यों का. हर प्रकार के वाहन तीव्रगति से दौड़ रहे हैं.

फुटपाथ पर मोटरसाइकिल और स्कूटर वाले चढ़े चले आते हैं. यातायात नियमों की कोई परवा नहीं है. हर आदमी दूसरे से आगे निकलने के लिए भागमभाग कर रहा है. यह नित्यप्रति का घटनाक्रम बन चुका है और इसी के चलते हादसे होते रहते हैं. इसी के चलते मंदिरों में भगदड़ मच जाती है. रेलवे स्टेशनों पर, बाजारों में भगदड़ में सैकड़ों लोग कुचल कर मर जाते हैं.

अनुशासनहीनता की हदें पार

फरवरी 2011 का एक हादसा आज भी याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. भारततिब्बत सुरक्षा बल में भरती के लिए कोई ढाई लाख कैंडिडेट बरेली पहुंचे थे. बरेली में इन कैंडिडेटों ने अनुशासनहीनता की सभी हदें पार कर दी थीं. वे इतना आक्रोशित थे कि लौटते वक्त उन्होंने ट्रेन में बैठे मुसाफिरों के साथ अभद्रता की. वैध टिकट ले कर यात्रा कर रहे यात्रियों को उठा कर खुद बैठ जाना, ट्रेन की छतों पर जा बैठना, स्टेशन में तोड़फोड़ करना सज्जनता की किस श्रेणी में आता है?

उन के आचरण को देख कर तो लगता है कि जैसे वे घर से मूड बना कर चले थे कि उन्हें अपनी युवाशक्ति का प्रदर्शन इसी तरह करना है और इस मूड को उन्होंने आखिर तक बरकरार रखा. यह भीड़ जहांजहां से गुजरी, अपने पीछे बरबादी का आलम छोड़ती चली गई.

आखिर वे चाहते क्या थे? बरेली, बदायूं, फर्रुखाबाद के नागरिकों को वे किस अपराध की सजा दे रहे थे? ट्रेन की छत पर चढ़ने से पहले क्या उन्हें नहीं पता था कि इस तरह की यात्रा में हादसा होना तय है? ट्रेन में आग लगा कर वे क्या सिद्ध करना चाहते थे?

आखिर ऐसी कौन सी आफत आ गई थी कि एक रात वे बरेली शहर में नहीं गुजार सकते थे? अगर वे संयम बरतते तो कोई कारण नहीं था कि सरकार और स्थानीय प्रशासन उन की मदद के लिए आगे नहीं आता. इतना उपद्रव कर के उन्हें आखिरकार हासिल क्या हुआ?

हाईटैंशन तारों से झुलसे 14 साथियों के मृत शरीर और उन के परिवारों को दिया गया ऐसा दर्द जिस की टीस ताउम्र उन्हें सालती रहेगी. क्या वे खुद को माफ कर पाएंगे? और सब से बड़ी बात, वे यह कैसे भूल सकते हैं कि जिस फोर्स में भरती होने के लिए आए थे वह अपने अनुशासन के लिए जानी जाती है, न कि अनुशासनहीनता के लिए. उन्होंने तो अपनी करतूतों से यह सिद्ध कर दिया कि वे उस फोर्स में शामिल होने के योग्य ही नहीं हैं.

अनुशासन की महत्ता

अनुशासन क्या है और उस की अहमियत मुसीबत के वक्त कितनी होती है, इस का पता चलता है उस घटना से जो अमेरिका के न्यूयौर्क में एक प्लेन लैंडिंग के वक्त हुई. 15 जनवरी, 2009 को एक प्लेन न्यूयौर्क के ला गार्डिया एयरपोर्ट से उड़ा. पायलट थे कैप्टन चेस्ली बी सलेनबर्गर और उन के साथी थे फर्स्ट औफिसर जेफ्री बी स्काइल्स. यह प्लेन रास्ते में कुछ चिडि़यों के समूह से टकरा गया, जिस के कारण इस के दोनों इंजन बंद हो गए. पायलट के पास कोई उपाय नहीं था. हवा में 1,500 फुट की ऊंचाई पर प्लेन बंद हो गया. प्लेन में 5 क्रू मैंबर्स और 150 यात्री थे. प्लेन को पास के किसी भी एयरपोर्ट पर उतारने का भी टाइम पायलट के पास नहीं था. ऐसे में पायलट का अनुशासन और उस की वजह से उत्पन्न हुई सूझबूझ ने काम किया और सलेनबर्गर ने अपना जहाज हडसन नदी में उतार दिया.

हालांकि सलेनबर्गर को आपातकालीन लैंडिंग के लिए 2 एयरपोर्ट्स पर उतरने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि ऐसा करना संभव नहीं है. जब सलेनबर्गर ने न्यूयौर्क के ट्रेकौन टर्मिनल राडार अप्रोच कंट्रोल सैंटर वेस्टबरी को जानकारी दी कि उन का विमान डबल बर्ड स्ट्राइक से क्षतिग्रस्त हो गया है तब कंट्रोलर ने उन्हें ला गार्डिया लौटने की सलाह दी और कहा कि रनवे 13 खाली है और वे अपना विमान वहां उतार सकते हैं, लेकिन उन का जवाब था कि वे ऐसा करने में असमर्थ हैं.

इस के बाद सलेनबर्गर को उत्तरी न्यूजर्सी के उपनगर दिखाई दिए और उन्होंने पूछा कि यह क्या है और वे वहां जा सकते हैं? उन्हें जानकारी दी गई कि यह टेटरबरो उपनगर का छोटा हवाई अड्डा है जिस पर यात्री और निजी विमान ही उतरते हैं.

कंट्रोलर ने उन्हें क्लीयरैंस दिया कि वे टेटरबरो के रनवे नंबर 1 पर आपात लैंडिंग कर सकते हैं. इस पर सलेनबर्गर ने फिर से जवाब दिया कि ऐसा करना संभव नहीं है. उन को पता चल गया था कि टेटरबरो के रनवे पर विमान को उतारने के लिए अपने जेट्स को सुरक्षित रूप से रोकने के लिए वे रिवर्स थ्रस्टर्स का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. इस के बाद पायलट सलेनबर्गर ने कंट्रोलर से कहा कि वे हडसन नदी में ही विमान उतार रहे हैं और यात्रियों को सुरक्षित निकालने के लिए वे तुरंत नौकाओं का इंतजाम करें. इस के बाद ट्रेकौन अधिकारियों ने न्यूयौर्क हार्बर अधिकारियों को इस बात की जानकारी दी कि नदी में एक विमान आपात लैंडिंग कर रहा है, इसलिए उस के यात्रियों के बचाव और सुरक्षा के उपाय किए जाएं.

नदी में विमान उतरते ही नौकाएं यात्रियों को सुरक्षित बाहर लाने के लिए पहुंच गईं. इस दौरान पूरे अनुशासन में रहते हुए क्रू मैंबर्स ने एकएक यात्री को बाहर निकाल कर नौका पर सवार किया. कहीं कोई भगदड़ नहीं, कहीं कोई अराजकता नहीं.

एयरहोस्टैस पूरे वक्त यात्रियों का ध्यान रखती रहीं और उन से कहती रहीं कि घबराने की जरूरत नहीं है, सिर्फ अपने हाथों से अगली सीट को पकड़ कर बैठें और अपना सिर दोनों हाथों के बीच झुका लें. सभी यात्रियों और कू्र मैंबर्स के सहीसलामत नौकाओं पर बाहर निकलने के बाद सलेनबर्गर ने डूबते जहाज पर आखिरी चक्कर लगाया और वे सब से आखिर में नौका पर सवार हुए. उन का प्लेन पानी के ऊपर कोई डेढ़ घंटे तक रहा और फिर धीरेधीरे पानी में डूब गया. यह था उन का अनुशासन.

यही घटना कहीं किसी भारतीय प्लेन में होती तो शायद यात्री चलते प्लेन से छलांग लगाने के लिए तैयार हो जाते. किसी धार्मिक स्थल, बाजार या ट्रेन में कोई हादसा हो जाता है तो जितने लोग हादसे से नहीं मरते, उस से ज्यादा भगदड़ में मारे जाते हैं, क्योंकि हमारे धर्म, हमारे स्कूल, हमारे घर और समाज हमें अनुशासित रहने की शिक्षा नहीं देते, अनुशासन को हमारी बाध्यता नहीं बनाते, बल्कि कर्मकांडों, आडंबरों और दिखावों से हमारा पूरा अस्तित्व रचते हैं.

जीवन सरिता : खूबसूरत हो जिंदगी

क्या आप को अपनी जिंदगी से शिकायत है? क्या आप अकसर ऐसा सोचती हैं कि आप ने जैसी जिंदगी चाही वैसी नहीं मिली? हमारे इर्दगिर्द मौजूद लोग, हमारे रिश्तेदार और मित्र आप से बेहतर हैं, वे आप से ज्यादा सुखी और चैन की जिंदगी जी रहे हैं? तो, जान लीजिए अपनी जिंदगी को खूबसूरत बनाने के आसान उपाय : अच्छा दिखें नहीं, बनें आप कैसे दिखते हैं, इस से ज्यादा अहम है कि आप का स्वभाव कैसा है. साधारण दिखने वाले दयालु और हंसमुख लोगों को खूबसूरत दिखने वाले, क्रोधी, अहंकारी और झगड़ालू लोगों से कहीं ज्यादा पसंद किया जाता है.

सुंदर व्यक्ति यदि घमंडी और कड़वे स्वभाव का है, तो उस का अच्छा असर कुछ ही देर टिकता है क्योंकि उस के व्यवहार से लोग जल्दी ही ऊबने लगते हैं. लेकिन सामान्य रूप, रंग का व्यक्ति यदि मिलनसार, सहयोगी है, तो वह हमेशा के लिए लोगों के दिल पर छाप छोड़ सकता है. अपनी क्षमता पर रखें भरोसा बुरे दौर में अगर आप के मित्र, रिश्तेदार और परिजन आप के साथ खड़े न हों तो उन्हें कोसने के बजाय अपनी लड़ाई खुद लड़ें. चाणक्य ने कहा है, ‘मैं उन के प्रति आभारी हूं जिन्होंने मुसीबत में मेरा साथ छोड़ दिया. मुझे पता चला कि मैं अकेला ही वह कर सकता हूं.’

कभी भी अपनी जिंदगी में किसी मुसीबत, दुविधा या प्रतिकूल स्थिति के लिए दूसरे व्यक्ति को दोषी न ठहराएं. अच्छे लोग अगर आप को खुशी देते हैं, तो बुरे लोग आप को जिंदगी का जरूरी पाठ पढ़ा देते हैं, जो आगे चल कर आप के बहुत काम आता है. सुकून और चैन की जिंदगी जीने के लिए सब से ज्यादा जरूरी है सब्र. यह एक ऐसी सवारी है जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती, न किसी के कदमों में और न किसी की नजरों में. अपनों का सदा रखें खयाल अपने प्रियजनों जैसे पतिपत्नी, सगे भाई, मातापिता, बेटेबेटी और परममित्र से चाहे आप कितने ही नाराज क्यों न चल रहे हों, लेकिन मुसीबत के वक्त उन की मदद जरूर करें. आप का यह जेस्चर न सिर्फ उन के मन में आप के प्रति जिंदगीभर रहने वाला असर छोड़ देगा बल्कि उन के साथ आप के रिश्ते और मजबूत होंगे. इस से आप को दिली खुशी भी मिलेगी.

जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए लोगों के साथ आप के रिश्तों का अच्छा होना बेहद जरूरी है. रिश्तों को सही तरह से निभाने के लिए हमेशा ध्यान रखें कि रिश्ते अंकुरित होते हैं प्रेम से, जिंदा रहते हैं परस्पर संवाद से, महसूस किए जाते हैं संवेदनाओं से, जिए जाते हैं दिल से, मुरझा जाते हैं गलतफहमियों से और बिखर जाते हैं अंहकार से. परफैक्ट नहीं, ऐक्टिव हो जिंदगी जिंदगी हमेशा परफैक्ट नहीं हो सकती. इस में कभी भी समस्या आ सकती है और मुसीबतें हमेशा बिना बोले आती हैं. लेकिन कोई भी मुसीबत इतनी बड़ी नहीं होती कि आप उस का सामना ही न कर सकें. और न कोई मुसीबत ऐसी होती है कि कभी दूर ही नहीं होगी. इसलिए मुसीबत में घबराने के बजाय सब्र रखें.

अच्छी जिंदगी वही होती है जिस में आप सिर्फ अपेक्षाओं के बोझ तले न दब कर अपनी अनुशासित दिनचर्या के मुताबिक लगातार सक्रिय रहते हैं, खूब हंसतेमुसकराते हैं और अपनी उपलब्धियों पर खुश होना सीख कर कुदरत को शुक्रिया कहना सीख जाते हैं. समझ लीजिए कि पतझड़ हुए बिना पेड़ों पर नए पत्ते नहीं आते, कठिनाई और संघर्ष सहे बिना अच्छे दिन नहीं आते. जिंदगी फिंगरप्रिंट जैसी अगर आप दूसरों के साथ अपनी तुलना कर के दुखी होते हैं और दूसरों सी जिंदगी जीने की चाहत रखते हैं तो जान लीजिए कि जिंदगी फिंगरपिं्रट की तरह होती है. इस दुनिया में एकजैसी जिंदगी 2 लोगों की नहीं हो सकती. आप को जो जिंदगी मिली है वह अतुलनीय है, फिर इस की तुलना दूसरों से कर के अपना समय व ऊर्जा क्यों बरबाद करनी. इसी को अपनी तरह से निखारिए न.

अपनी जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए हमेशा अपनी सेहत और आय के स्रोत को दुरुस्त रखें. आज की तारीख में एक अच्छी जिंदगी की नींव अच्छी सेहत और मजबूत आर्थिक स्थिति होती है. जड़ें मजबूत होंगी तो आप को हवा के झोंकों यानी मुसीबतों से डर नहीं लगेगा. खुश रहने की आदत डालें मुसकराने और खुश रहने की आदत डालें. मुसकान और खुशमिजाजी संक्रामक होते हैं. जब आप किसी की ओर देख कर मुसकराएंगे, तो वह भी जरूर मुसकराएगा. मुसकराना सीखने के लिए किसी रौकेट साइंस की जरूरत नहीं. दुनिया में चाहे हजार अलगअलग भाषाएं हों, लेकिन मुसकराहट हर भाषा में एकजैसी ही होती है. लोगों को अपने तर्क से जीतने के बजाय मुसकराहट से हराएं.

जिंदगी अगर बैटरी है, तो मुसकराहट ऊर्जा है जिस से बैटरी रिचार्ज होती है. माना कि आप की जिंदगी में दर्जनों मुसीबतें हैं जिन के कारण आप दुखी, हताश और परेशान रहते हैं लेकिन यकीन मानिए खुलेदिल और दिमाग से देखिए आप को अपनी ही जिंदगी में मुसकराने के पचासों कारण मिल जाएंगे. फिर सिर्फ गलत या दुखी करने वाली बातों को ही क्यों याद करना. कभी न हारिए हिम्मत जब भी समस्याओं से घिरे हों, घबराने के बजाय उन से निकलने के उपाय सोचिए क्योंकि रास्ते कभी बंद नहीं होते. अकसर लोग हिम्मत हार जाते हैं. जिंदगी ठीक एक बौक्सिंग रिंग जैसी होती है. आप जब गिर जाते हैं, तब हारे हुए घोषित नहीं किए जाते बल्कि जब आप दोबारा उठने से इनकार कर देते हैं तभी आप को पराजित घोषित किया जाता है. ऐडजस्टमैंट करना सीखें बहुत से लोग अपने पेशे यानी व्यापार, नौकरी या व्यक्तिगत जिंदगी से खुश नहीं रहते. उन्हें अपने प्रोफैशन, जौब या बिजनैस या जीवनसाथी से हमेशा शिकायत रहती है. जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए आप को उस बीज की तरह बनना होगा, जिसे उस की जिंदगी जहां रोप देती है वह वहीं खिल कर खुशबू बिखेरने लगता है. आप को अपनी मौजूदा स्थिति से शिकायत करने के बजाय या तो उस के मुताबिक खुद को ऐडजस्ट करना होगा या फिर उसे बेहतर करने की कोशिश करनी होगी.

ध्यान रखें, दूसरों के सामने अपनी समस्याओं या कमियों का बखान करना ठीक नहीं. इस से आप की पोजिशन हलकी होती है. इस दुनिया में आप की समस्याओं या दुखों को लोग आप के सामने गंभीरता से भले सुनते हों, पर बाद में वे इन बातों को फैला कर मजे लेते हैं. इस से आप का सामाजिक स्टेटस कमजोर होता है. वैसे भी, हमारी समस्या का समाधान केवल हमारे पास है, दूसरों के पास तो केवल सुझाव हैं. जिम्मेदार आप खुद जिस दिन आप इस बात को समझ लेंगे कि अपनी जिंदगी के जिम्मेदार आप खुद ही हैं, उसी दिन से आप की जिंदगी बदलने लगेगी. क्योंकि आप की जिंदगी में जो कुछ है, वह आप की चौइस की छाया मात्र है. अगर आप अलग तरह की जिंदगी चाहते हैं, तो अपनी प्राथमिकताएं, चाहतें, शौक और चौइस बदलिए, जिंदगी अपनेआप बदल जाएगी. यह चौइस पेशे, मित्र, पढ़ाईलिखाई, काम के तरीके और सोचने के अंदाज से जुड़ी है.

बौलीवुड ही नहीं है भारतीय सिनेमा

भारतीय मनोरंजन चाहे वह सिनेमा का हो या टीवी का या फिर वीडियो स्ट्रीमिंग का, दिलचस्प दौर में पहुंचता जा रहा है. एक समय ऐसा था जब बौलीवुड या हिंदी सिनेमा और टीवी के कार्यक्रमों को राष्ट्रीय मनोरंजन माना जाता है. मगर अब सारी क्षेत्रीय भाषाओं का इंद्रधनुष अपने सारे रंगों के साथ आसमान पर छा रहा है. पहली बार क्षेत्रीय भाषाओं का मनोरंजन अपनी भौगोलिक सीमाओं को तोड़ कर राष्ट्रीय पहचान बना रहा है. यह सुखद आश्चर्य की बात है कि वैश्वीकरण के दौर में लोग अपने क्षेत्र से बहुत दूर दुनियाभर में बसते हैं मगर वहां भी वे अपनी जड़ों से जुड़ने को लालायित रहते हैं.

वर्ष 2017 मनोरंजन की दुनिया में भारी उथलपुथल का दौर रहा, क्षेत्रीय सिनेमा के लिए तो यह महत्त्वपूर्ण मोड़ है. कथ्य और विषयवस्तु के लिहाज से दक्षिण भारतीय भाषाएं इतनी लोकप्रिय थीं कि दक्षिण भारत में जितने सिनेमाघर हैं उतने हिंदीभाषी इलाकों में नहीं हैं.

यह भी हकीकत है कि दक्षिण में सिनेमा इतना लोकप्रिय रहा है कि तेलुगू और मलयालम में हिंदी से ज्यादा फिल्में बनती रही हैं. मगर अब सिनेमा के बौक्सऔफिस और टीवी व वीडियो स्ट्रीमिंग की दर्शक संख्या के आंकड़े बताते हैं कि क्षेत्रीय मनोरंजन का अच्छा दौर तो अब आया है.

अब केवल बौलीवुड या केवल हिंदी सिनेमा या टीवी को ही राष्ट्रीय मनोरंजन मानने का जमाना लद गया. आज मनोरंजन की दुनिया में भारतीय भाषाओं के इंद्रधनुष का हर रंग महत्त्वपूर्ण है.

भारतीय भाषाओं का मनोरंजन न केवल अपने पैरों पर खड़ा हो गया है बल्कि फलफूल रहा है. अब तक भले ही फिल्मों का मतलब हिंदी सिनेमा समझा जाता हो, पर पिछले साल की सब से ज्यादा कमाई वाली फिल्म ‘बाहुबली’ थी जो मूल रूप से तेलुगू और तमिल में बनी. फिर उसे हिंदी के अलावा मलयालम तथा फ्रैंच में डब किया गया.

तकनीक के साथ संसाधनों की बात की जाए तो तमिल व तेलुगू के फिल्मकार किसी भी मामले में हिंदी के फिल्मकारों से कम नहीं हैं. हिंदी फिल्मों की तरह इन फिल्मों की शूटिंग भी विदेशी लोकेशंस व बड़े पैमाने पर होती हैं.

फिल्म एक, भाषाएं अनेक

आजकल किसी फिल्म का पूरा आर्थिक दोहन करने के लिए उसे कई भाषाओं में बनाया जा रहा है. यह नया ट्रैंड है. ‘बाहुबली 2’ पहले सिर्फ तेलुगू और तमिल भाषा में बनाई गई थी, लेकिन बाद में हिंदी, मलयालम, जरमन, फ्रैंच, जापानी और फिर अंगरेजी भाषा में भी यह डब की गई. हाल ही में बौलीवुड की कई बड़ी फिल्मों को ले कर जबरदस्त चर्चा चल रही है.

‘बाहुबली’ स्टार प्रभास की एक बड़ी फिल्म ‘साहो’ जबरदस्त सुर्खियों में है. टी सीरीज प्रभास को बेहद खर्चीले थ्रिलर ‘साहो’ में पेश कर रहा है जो तमिल, तेलुगू और हिंदी में एकसाथ शूट की जा रही है. फिलहाल तो ‘साहो’ की शूटिंग चल रही है लेकिन शूटिंग के दौरान ही यह फिल्म जम कर चर्चाएं बटोर रही है. इस की वजह है इस फिल्म के धमाकेदार ऐक्शन सीन्स. ‘साहो’ का कुल बजट 300 करोड़ रुपए है और इस बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा इस के ऐक्शन सीन्स पर खर्च किया गया है. हाल ही में सामने आया है कि ‘साहो’ का एक फाइट सीन 100 दिनों की तैयारी के बाद शूट हो पाया.

इस तरह की बहुभाषी फिल्मों का साथसाथ बनना इस बात का परिचायक है कि हिंदी अब भारतीय मनोरंजन का चेहरा नहीं रही. भाषाई फिल्में और टीवी सीरियल जिन्हें क्षेत्रीय मनोरंजन कहा जाता है, वे अपनी भौगोलिक सीमाओं को तोड़ कर राष्ट्रीय बनने लगी हैं और मनोरंजन के बाजार में अपनी क्षमताओं के कारण सम्मानजनक स्थान पाने लगी हैं. यह बदलाव इसलिए भी आया है कि डबिंग, सबटाइटल और औनलाइन स्ट्रीमिंग के कारण क्षेत्रीय फिल्मों, सीरियल व कार्यक्रमों और दर्शकों के बीच की दूरी कम हुई है. अब इस तरह के कार्यक्रमों को हर राज्य में दर्शक मिल रहे हैं.

अब तक केवल बौलीवुड फिल्मों और हिंदी सीरियलों की पहुंच को विस्तार देने के लिए इस तरीके का सहारा लिया जाता था. अब क्षेत्रीय भाषाओं के दर्शक भी खूब बढ़े हैं, उन की फिल्में और कार्यक्रम भी ये तरीके अपना सकते हैं.

रीमेक भी, डबिंग भी

दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रीमेक का सिलसिला 70-80 के दशक से चलता रहा है. वह अब चलन बन गया है. हरेक साल कई ऐसी हिंदी फिल्में बनती हैं जो क्षेत्रीय फिल्मों पर आधारित होती हैं. लेकिन अब बौलीवुड रीमेक के लिए 4 दक्षिणी राज्यों (तमिल, तेलुगू, कन्नड़ व मलयालम) तक ही सीमित नहीं रह गया है. बांगला और मराठी फिल्मों के भी हिंदी रीमेक आ रहे हैं. यह नए कारोबारी मौडल की शुरुआत का इशारा करता है.

शानदार कहानी व प्रस्तुति के बलबूते क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में खूब फलफूल रही हैं. क्षेत्रीय फिल्मों की कहानियों को हिंदीभाषी दर्शकों के लिहाज से दोबारा बनाया जा रहा है. हाल ही में मराठी की सुपरहिट फिल्म ‘सैराट’ पर हिंदी में ‘धड़क’ फिल्म बनी है.

इन दिनों हर क्षेत्रीय भाषा के दर्शकों की संख्या में बेहताशा इजाफा हो रहा है. फिक्की ईवाय मीडिया और इंटरटेनमैंट इंडस्ट्री की रिपोर्ट के मुताबिक, औनलाइन बुकिंग प्लेटफौर्म बुक माय शो की रपट में कहा गया है कि क्षेत्रीय सिनेमा की औसत औक्यूपैंसी तुलनात्मक रूप से बढ़ी है. 2017 में औसत औक्यूपैंसी 45-46 प्रतिशत रही जो 2016 में 39-40 प्रतिशत थी. ताज्जुब की बात यह है कि तेलुगू और तमिल फिल्में देश में ही नहीं, विदेशों में भी सफलता के झंडे गाड़ रही हैं. इन्होंने अमेरिका और मलयेशिया में भारतीय सिनेमा के चेहरे के रूप में बौलीवुड को पीछे छोड़ दिया था. ऐसा ‘बाहुबली-5 कनक्ल्यूजन’, ‘महानटी,’ और ‘मरसेल’ आदि फिल्मों के कारण हुआ है.

धीरेधीरे हिंदी फिल्मों का तिलिस्म टूट रहा है. अभी तक हिंदी के अलावा दक्षिण भारतीय भाषाओं का बाजार था लेकिन अब मराठी, पंजाबी, भोजपुरी और अन्य भाषाई फिल्मों का नया बाजार बनने लगा है. अब मराठी, भोजपुरी और पंजाबी में न केवल फिल्में बन रही हैं बल्कि वे मोटा बिजनैस भी कर रही हैं.

मराठी की सब से सफल फिल्म ‘सैराट’ को हिंदी में बनाया गया है. हिंदी में बनी फिल्म ‘एम एस धौनी-ऐन अनटोल्ड स्टोरी’ को मराठी में डब किया गया. फिल्म के निर्देशक नीरज पांडे का कहना है कि क्षेत्रीय सिनेमा जिस तरह फलफूल रहा है यह प्रयोग करना जरूरी हो गया है.

कमाई पर बधाई

बुक माय शो के कारोबार के मुताबिक, 2016 में गुजराती फिल्मों की आमदनी 44 प्रतिशत बढ़ी है. बंगाली को उस की सब से कमाऊ फिल्म मिली है. बंगाली फिल्म ‘अभिजन’ ने विश्वभर में 48 करोड़ रुपए कमाए हैं.

एक समाजशास्त्री कहते हैं कि वैश्वीकरण के युग में लोगों का अपनी जड़ों से उखड़ का सुदूर क्षेत्रों में जा कर बसना एक हकीकत है, लेकिन फिर भी लोग अपने समुदायों के बारे में जानना चाहते हैं. लोग पश्चिमी संस्कृति में घुलनेमिलने के बजाय, वे जिस संस्कृति के हैं उन के साथ ज्यादा सुविधाजनक महसूस करते हैं.

जहां तक कहानी और विषय का सवाल है, क्षेत्रीय सिनेमा का कोई जवाब नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में उन की व्यावसायीकरण और पैकेजिंग की क्षमता भी निखर कर आई है. इस का असर बौक्सऔफिस पर दिखाई भी दे रहा है.

मराठी में बनी फिल्म ‘सैराट’ औनर किलिंग की कहानी पर आधारित है और जातिवाद पर कड़ा प्रहार करती है. उसे राज्य में मराठी दर्शकों के अलावा बाकी लोगों ने भी सराहा. दूसरी ‘बाहुबली’ के सभी भाषाओं के संस्करणों ने कुल मिला कर 650 करोड़ रुपए का कलैक्शन किया था. ‘बाहुबली 2’ ने तमिल, तेलुगू और हिंदी में मिला कर 1,700 करोड़ रुपए से ऊपर की कमाई की. यह भारत की दूसरी सब से ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म है.

अपनी कमाई बढ़ाने के लिए बौलीवुड यह रणनीति अपनाता रहा है. संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ कई दूसरी फिल्मों की तरह तमिल और तेलुगू में डब की गई. फिक्की और अर्नेस्ट यंग के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में 31 फिल्में डब की गई थीं. जबकि 2017 में अन्य भाषाओं की हिंदी में कुल डब की गई फिल्मों की संख्या 96 थी.

हिंदी में डब की गईं क्षेत्रीय फिल्में, खासकर दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्में, हिंदी मूवी चैनलों पर काफी दिखाई जाती हैं. 2017 में टीवी की सब से हिट 2 फिल्में डब की हुई तेलुगू फिल्में थीं. ‘बाहुबली-2’ दर्शक संख्या के लिहाज रिकौर्ड बनाने वाली रही जब वह दूसरी बार प्रसारित हुई तब भी उस की दर्शक संख्या ‘दंगल’ से ज्यादा रही जो दूसरी सब से ज्यादा बार देखी गई फिल्म थी.

सब से ज्यादा अचरज हुआ अल्लू अर्जुन की ऐक्शन कौमेडी से. ‘दुवाडाजगनाधम’ जो ‘ट्यूबलाइट’ ‘काबिल’ और ‘रईस’ जैसी हिंदी फिल्मों को पछाड़ने में कामयाब रही. 2009 से हिंदी मूवी चैनलों पर जो बदला व इंसाफ के फार्मूले पर बनी दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्में आती हैं वे दर्शकों का भारी मनोरंजन करती हैं. वे दक्षिण भारतीय भाषाओं की अच्छी फिल्में नहीं है मगर उन्होंने क्षेत्रीय फिल्मों के सितारों को देश के बहुत बड़े समुदाय तक पहुंचाया है. नतीजा यह है कि पिछले

2 वर्षों में हिंदी मूवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली डब की गई दक्षिण भारतीय फिल्मों की संख्या बढ़ी है और उन का सैटेलाइट शुल्क 7 से 8 प्रतिशत बढ़ा है.

हालांकि ये फिल्में डब की हुई होती हैं मगर आसानी से समझी जा सकती हैं. लोग पूरी फिल्म को देखते और पसंद करते हैं. इस तरह की फिल्में आज 15 से 20 करोड़ रुपए के बीच बिकती हैं.

टीवी का भाषाई विस्तार

क्षेत्रीय भाषाओं के टीवी का काफी विस्तार हुआ है. भारतीय टैलीविजन की मौनिटरिंग एजेंसी ब्रौडकास्ट औडियंस रिसर्च काउंसिल के मुताबिक, हिंदी देश की सब से पसंदीदा भाषा है मगर क्षेत्रीय भाषाओं के टीवी का विस्तार महत्त्वूपर्ण बात है. इस में गुजराती, असमी, मराठी और कन्नड़ के विस्तार में 146,123,74 और 63 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है जबकि हिंदी की बढ़ोतरी 27 प्रतिशत ही है.

इसलिए हिंदी के लोकप्रिय कार्यक्रम जैसे ‘बिग बौस,’ ‘कौन बनेगा करोड़पति,’ ‘सारेगामापा’, ‘लिटिल चैंप’ और ‘नागिन’ आजकल कई क्षेत्रीय भाषाओं में बन रहे हैं. यह अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने के  लिए उपलब्ध कथ्य के सांस्कृतिक पहलुओं का दोहन करना है.

इस के अलावा पिछले कुछ समय में टीवी का विस्तार ऐसा हुआ है कि आप केवल उस भाषाई राज्य में ही नहीं, देश के किसी भी हिस्से में क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल देख सकते हैं. इन दिनों टीवी कंपनियां केवल हिंदी और अंगरेजी में चैनल ला कर संतुष्ट नहीं हैं, वे क्षेत्रीय भाषाओं में भी अपने चैनल लाने को मजबूर हैं. तभी उन की राष्ट्रीय या अखिल भारतीय छवि बन पाती है.

विज्ञापन का अर्थशास्त्र

ब्रौडकास्ट इंडिया के सर्वे के मुताबिक, दक्षिण भारत में टीवी की पहुंच बाकी हिस्सों से बहुत ज्यादा है. दक्षिण भारत में टीवी की पहुंच 99.9 प्रतिशत के आसपास है, जबकि बाकी भारत में 66 प्रतिशत. इसलिए विज्ञापन का राजस्व 2 अंकों में बढ़ रहा है. पहले क्षेत्रीय भाषाओं के विज्ञापन प्लान को राष्ट्रीय विज्ञापन अभियान के साथ जोड़ दिया जाता था, अब हर भाषा के लिए अलग प्लान होता है. मेरे एक मित्र जब कोलकाता से मुंबई शिफ्ट हुए तो उन के सामने समस्या थी कि वे बांगला फिल्मों को देखे बिना कैसे रहेंगे.

यहां बांगला फिल्में दिखाने वाले थिएटर नहीं होंगे या जो दिखाते होंगे वे बहुत दूर होंगे, मगर आज के डिजिटल प्लेटफौर्म या वीडियो स्ट्रीमिंग ने उन की सारी समस्याएं हल कर दीं. देश की एक वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विस की विशाल फिल्म लाइब्रेरी है.

इंडस्ट्री के विशेषज्ञ कहते हैं कि क्षेत्रीय कथ्य के साथ जुड़ने में आसानी रहती है. हिंदी और अंगरेजी की तुलना में इस में आधा समय लगता है. वहां विज्ञापनों की भरमार भी होती है. हमारे तीनचौथाई ग्राहक अर्धशहरी या छोटे नगरों से आते हैं. उन में से 70 से 80 प्रतिशत को उन की अपनी क्षेत्रीय भाषा में कार्यक्रम चाहिए होते हैं.

वाइकौम 18 मीडिया की स्ट्रीमिंग सर्विस के अधिकारियों का कहना है कि पिछले 6 महीनों में क्षेत्रीय भाषा के कार्यक्रमों की मांग 200 प्रतिशत बढ़ी है. अभी कुल समय का 17 प्रतिशत क्षेत्रीय कार्यक्रमों पर खर्च होता है.

2 साल पहले टौप 20 में से 70 से 80 प्रतिशत कार्यक्रम हिंदी के होते थे. 15 या 16वें स्थान पर कोई क्षेत्रीय कार्यक्रम होता था. मगर पिछले 6 से 8 महीनों में हम देख रहे हैं कि टौप 20 में 5 से 6 शो क्षेत्रीय भाषाओं के होते हैं. कई बार तो टौप 15 या 10 में भी.

इंटस्ट्री के विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में ऐसे डिजिटल प्लेटफौर्म आ सकते हैं जो एक खास भाषा के लिए काम करते हों. अभी होईची की सेवाएं सिर्फ बांगला भाषा वालों के लिए हैं.

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फिल्मकार शेखर कपूर का कहना है कि अब हिंदी के अलावा अन्य भाषाई फिल्मों के लिए क्षेत्रीय सिनेमा के टैग को हटाने का समय आ गया है. शेखर कपूर असमिया, बांगला, मलयालम और मराठी फिल्मों के विषयों की अच्छी गुणवत्ता व विभिन्नता कोदेख कर हैरान हैं.

डूबतों को मंदिर का सहारा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उन की सरकार का साढ़े 4 साल का काम अगर लोगों को खुश या संतुष्ट कर देने वाला रहा होता तो भगवा खेमे को अयोध्या में राममंदिर निर्माण का जिन्न बोतल से फिर बाहर निकालने की जरूरत न पड़ती. मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में एक भी काम ऐसा नहीं हुआ है जिस पर आम लोग तालियां ठोंक रहे हों. उलट इस के नोटबंदी के चलते और जीएसटी के लागू होने पर अधिकांश देशवासी अभी तक छाती पीट रहे हैं.

चुनाव नजदीक आते ही राममंदिर निर्माण का मंच फिर सज गया है. पात्रों ने अपनी भूमिका के मुताबिक रटेरटाए डायलौग बोलने शुरू कर दिए हैं. हालत यह है कि देशभर के साधुसंत चेतावनी दे रहे हैं, कोई अयोध्या में अनशन पर बैठा है तो कोई सरकार को हड़का रहा है कि जितनी जल्द हो सके मंदिरनिर्माण बाबत संसद में कानून बनाओ. सुप्रीम कोर्ट ने कोई ऐसी राहत भी नहीं दी जैसी कि ट्रिपल तलाक मामले ने दी थी. उलटे, सबरीमाला मामले ने अमित शाह और सुप्रीम कोर्ट को आमनेसामने खड़ा कर दिया.

मंदिरनिर्माण की स्क्रिप्ट

बीती 5 अक्तूबर को दिल्ली में इकट्ठा हुए देशभर के नामीगिरामी संतों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिल कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा था जिस का मसौदा यह था कि महामहिम अपनी सरकार से कहें कि वह अब कानून बना कर रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त करे. राष्ट्रपति के पास मानो कोई जादू की छड़ी है जिस से मंदिर बन जाएगा.

यह आग्रह को कुछ दिनों पहले ही विश्व हिंदू परिषद से जुड़े साधुसंतों की उच्चाधिकार समिति की एक बैठक में किया गया था. 2019 के चुनावों के लिए मंदिरनिर्माण की षड्यंत्रकारी स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है. सभी राज्यों के प्रमुख साधुसंत राज्यपालों, जो सभी भाजपाई कट्टरपंथी हैं, से मिल कर उन्हें इस बाबत ज्ञापन देंगे. वे देश के मठों, मंदिरों, आश्रमों, गुरुद्वारों और घरों तक में मंदिरनिर्माण के लिए नाना प्रकार के अनुष्ठान करेंगे.

भाजपा के पूर्व सांसद रामविलास वेदांती, जोकि राममंदिर जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य भी हैं, ने तो मंदिरनिर्माण की तारीख भी घोषित कर दी कि राममंदिर के निर्माण का काम 6 दिसंबर से शुरू हो सकता है.

साफ है कि वेदांती जैसे सैकड़ों, हजारों नेताओं ने भी साधुसंतों के साथ ताल ठोक ली है. 6 दिसंबर, 1992 को देशभर से एक धुआं उठा था. ‘सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे’ और ‘एक धक्का और दो बाबरी मसजिद तोड़ दो’ के नारों पर पूरा देश बौरा उठा था. उस दौर की हिंसा 1975 के आपातकाल और 1984 में हुए सिखों के खिलाफ दंगों से कई गुना ज्यादा साबित हुई.

आरएसएस का भी मिला साथ

जब रामलीला का मंच सज गया और सभी पात्रों ने मुकुट व रेशमी कपड़े पहन कर स्थान ग्रहण कर लिया तब धमाकेदार एंट्री हुई आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की जो इस दरबार और अभियान के राजर्षि हैं. यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि वे इस दरबार के लिए त्रेतायुग के वशिष्ठ और विश्वामित्र तथा द्वापर के विदुर हैं. दशहरे के दिन आरएसएस मुख्यालय से मोहन भागवत ने उद्घोष किया कि सरकार राममंदिर निर्माण के लिए कानून लाए.

प्राचीन ऋषिमुनियों की तरह उन्होंने हे राजन तो नरेंद्र मोदी को नहीं कहा, लेकिन राजा के कर्तव्य गिना दिए कि देशभर के करोड़ों लोगों की आस्था राममंदिर से जुड़ी है, इसलिए अयोध्या में जमीन के स्वामित्व के संदर्भ में फैसला जल्द से जल्द हो जाना चाहिए.

हर किसी को समझ आ रहा है कि आरएसएस अब अपने वास्तविक रूप और सनातनी एजेंडे पर है. उस का सब्र जवाब दे चुका है, क्योंकि देश के हालात दिनोंदिन बिगड़ते जा रहे हैं. नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिर रहा है और हिंदू समुदाय के सवर्णों में भी अजीब सी बेचैनी है, जिसे 2019 के चुनाव के पहले दूर किया जाना जरूरी है. वरना भाजपा इस तरह औंधेमुंह गिरेगी कि उस का फिर 20-25 साल तक सत्ता में आ पाना मुश्किल हो जाएगा.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में संत समुदाय और आरएसएस का बड़ा योगदान था. उन का राजतिलक ठीक वैसा ही था जैसा दुर्योधन ने अवैध संतान कर्ण का और राम ने बानर यानी आदिवासी सुग्रीव का किया था. छोटी जाति वालों से तयशुदा दूरी बना कर चलने वाले आरएसएस और संत समाज ने राममंदिर निर्माण की शर्त पर ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया था और उन के लिए लालकृष्ण आडवाणी को बड़ी बेरहमी से एक कोने में ढकेल दिया था.

उपकार का बदला मंदिर

वह 7 फरवरी, 2013 का दिन था जब लखनऊ में खासी गहमागहमी थी. लोकसभा चुनाव सिर पर थे और भाजपा को प्रधानमंत्री पद का चेहरा पेश करना था. वरिष्ठता और कदकाठी के लिहाज से लालकृष्ण आडवाणी उपयुक्त थे.

उस महत्त्वपूर्ण दिन विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित धर्मसंसद में एक महासंगम हुआ था और लंबी जद्दोजेहद के बाद अमृतकलश के रूप में नरेंद्र मोदी प्रकट किए गए थे.

साधुसंतों ने फैसला लिया कि भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी होंगे. इतना ही नहीं, जगत्गुरु कहे जाने वाले रामाजुनाचार्य सहित कई साधुसंतों ने प्रतिज्ञा की थी कि वे नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए खुद को झोंक देंगे.

तब महंत योगी आदित्यनाथ जो अब उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री हैं, ने भविष्यवाणी कर डाली थी कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे और तभी राममंदिर का निर्माण हो पाएगा.

अब सबकुछ भाजपा के हाथ में है तो मंदिर क्यों नहीं बनाया जा रहा, इस सवाल का जवाब हर कट्टरपंथी मांग रहा है.

2019 के चुनाव के ठीक पहले मुहूर्त निकाल कर राममंदिर का मुद्दा फिर जिंदा किया गया है तो इस के पीछे और भी कई वजहें हैं जो नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में पैदा हुईं और उन्हें नाकाम करार देती हैं. इन में यह नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के फैसले प्रमुख हैं. पैट्रोल के दामों में वृद्धि, रुपए का रिकौर्ड स्तर तक गिरना और डौलर का मजबूत होना जनता को खल रहा है.

असल बात पंडापुरोहितवाद, सवर्णों के हित और हिंदू राष्ट्र निर्माण की है जिस की बाबत साढ़े 4 साल देशभर में खूब मौब लिंचिंग हुई और गौरक्षा के नाम पर दलितों व मुसलमानों का सरेआम कत्ल किया गया. हां, पहले ब्राह्मणक्षत्रिय लाठी चलाते थे, अब ठेका पिछड़ों के भगवा वर्ग को दे दिया गया है. आने वाले वक्त में उन का रोल नरेंद्र मोदी से कहीं ज्यादा अहम होगा. हिंदूवादी एजेंडे पर चलते मंदिरों और गौशालाओं के अलावा गंगा पर ध्यान दिया जा रहा है. शहरों के नाम भी बदले जा रहे हैं और धार्मिक पर्यटन के नाम पर धार्मिक शहरों को चमकाने में तबीयत से सरकारी पैसा लुटाया जा रहा है.

अब हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी कभी भी साधुसंतों और आरएसएस सहित दूसरे हिंदूवादी संगठनों का एहसान चुकाने के लिए यह घोषणा कर दें कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का सम्मान करते हुए सरकार कानून बना कर राममंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी और इस बाबत अध्यादेश शीतकालीन सत्र में ही लाया जाएगा. इस के बाद चुनाव हैं, इसलिए यह संसद का आखिरी सत्र होगा. यह अध्यादेश तुरंत सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जाएगा और मामला खटाई में पड़ जाएगा, राम को फिर वनवास पर जाना पड़ेगा.

एक तीर से कई निशाने

पौराणिकवादी तीर से कई निशाने साधे जा रहे हैं. चिंता देश की नहीं, बल्कि अपने धार्मिक कारोबार की है जिस का बड़े पैमाने पर नवीनीकरण मुद्दत से नहीं हुआ है.

पहला निशाना भजभज मंडली ने सवर्णों पर साधा है जो उन का सब से बड़ा वोटबैंक है. इसी वर्ग से पूजापाठ, यज्ञहवन चलते हैं और दानदक्षिणा मिलती रहती है. ऊंची जाति वाले अपने पूर्वाग्रहों और नीची जाति वालों पर अत्याचार ढाते रहने के लिए कभी धर्म नहीं छोड़ेंगे. यह ये धंधेबाज भी समझते हैं. इस हथियार की धार वे और कुंद नहीं पड़ने देना चाहते.

एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर यह तबका पूरी तरह जश्न मना भी नहीं पाया था कि एनडीए सरकार को अध्यादेश ला कर कानून की पुनर्स्थापना करनी पड़ी, क्योंकि दलित विद्रोह को दबाना अब साधुसंतों के भी बस का नहीं रह गया. सवर्ण समुदाय सरकार के इस फैसले से कितना तिलमिलाया हुआ है, इस का अंदाजा इन साधुसंतों ने लगाया और उन का ध्यान बंटाने के लिए मंदिरनिर्माण का राग छेड़ दिया.

2 अप्रैल की दलित हिंसा नरेंद्र मोदी अगर बरदाश्त नहीं कर पाए तो इस की वजह दलित वोटों को खो देने का डर था, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें थोक में मिले थे. एट्रोसिटी एक्ट पर सरकार के झुकने से साफ हो गया कि दलितों ने अपने वोट और समर्थन की कीमत नरेंद्र मोदी सरकार से वसूल ली है. अब बारी सवर्णों की है.

इन संतमहंतों की मंशा सवर्णों को यह जताने की है कि दलित आदिवासियों और ईसाई व मुसलमानों को अगर वे दबाए रखना चाहते हैं तो अब इस का इकलौता उपाय मंदिरनिर्माण है. धर्म के इस काम में वे सहयोग देंगे तो ये तीनों वर्ग उन से डरेंगे. हां, यह पक्का है विष्णु के मुख्य अवतार राममंदिर में न दलित जाएंगे न पिछड़े. उन्हें तो दोयम देवीदेवताओं की पूजा का हक ही मिलेगा.

सवर्ण अभी भी गुस्से में हैं और एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की मांग कर रहे हैं. हालांकि यह मुद्दा सरकारी नौकरियों और गांवों के ही मतलब का है, जहां दोनों को साथ काम करना पड़ता है और दोनों जातिवर्ग बिल्ला लगा कर चलते हैं. ये लोग उन्हें उकसा रहे हैं कि जब एट्रोसिटी एक्ट संसद में बदला जा सकता है तो उस की तर्ज पर मंदिरनिर्माण अध्यादेश क्यों नहीं लाया जा सकता.

ऐसा देश में पहली बार हुआ कि साधुसंतों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा का विरोध इस मुद्दे पर साधुसंतों ने ही किया. सब से ज्यादा विरोध मध्य प्रदेश से इसलिए हुआ क्योंकि वहां विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और भाजपा को खुलेआम धौंस दी जा रही है कि यह कानून वापस नहीं लिया गया तो वे पार्टी को वोट नहीं देंगे. अपनी बात में दम लाने के लिए सवर्णों ने सपाक्स नाम की पार्टी भी बना ली जो चुनावी मैदान में भी है.

सपाक्स से ज्यादा ब्राह्मण, कायस्थ और बनिए जुड़े हैं जो भाजपा का परंपरागत वोटर रहे हैं. कहने को भले ही यह रिटायर्ड कर्मचारियों, अधिकारियों और व्यापारियों की पार्टी हो, लेकिन इस से हर कोई सहमत है कि एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो लागू होना ही चाहिए, साथ ही, जातिगत आरक्षण की व्यवस्था भी खत्म होनी चाहिए. सरकारी नौकरियां और मलाई शूद्रों के लिए नहीं, बल्कि उन के लिए हैं.

सवर्णों की दूसरी समस्याएं बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार हैं जो उन के गुस्से की आग में घी डालने का काम कर रही हैं.

सपाक्स भले ही चुनावी मैदान में कुछ न कर पाए लेकिन इस के जरिए भाजपा विरोधी बड़ा सवर्ण वर्ग तैयार हो रहा है जो कांग्रेस का कभी नहीं रहा. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भी इस समस्या का हल मंदिरनिर्माण में दिख रहा है.

असली तीर पुरोहितवाद को थोपे रखने का है. देशभर के लाखों पंडेपुजारी भी हैरानपरेशान हैं कि नरेंद्र मोदी धार्मिक पाखंड तो पूरे मनोयोग से करते हैं, लेकिन इस से उन के धंधे में इजाफा नहीं हो रहा है.

साढ़े 4 सालों में आरएसएस और दूसरे हिंदूवादी संगठनों ने अपना एक बड़ा काम कर लिया है. यह काम सवर्ण, दलित खाई गहरी करना और दलितों के बीच फूट डालना है. उज्जैन के महाकुंभ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सवर्ण संत अवधेशानंद को ले कर एक दलित संत उमेश योगी के साथ नहाए थे. उमेश

नाथ वाल्मीकि समाज के हैं जिन्हें महामंडलेश्वर बनाने का झांसा दे कर साथ नहाने के लिए तैयार किया गया था. इस सहस्नान से वाल्मीकि समुदाय के सदस्यों, जिन्हें भंगी और मेहतर कहा जाता है, के वोट भाजपा के खाते में आ गए थे.

अब ये वोट अलगथलग पड़ गए हैं, लेकिन इस खेल को एट्रोसिटी एक्ट पर सरकार के संसद में झुकने ने बिगाड़ कर फिर एक होने का मौका दे दिया तो सनातनवादियों को फिर बाजी अपने हाथ से जाती लगी.

हालफिलहाल जो शांति दिख रही है, वह 3 हिंदीभाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों की वजह से है. वहां भाजपा हार भी जाए तो भगवा खेमे की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, उलटे, मंदिरनिर्माण की आग वह और तेजी से फैलाएगा, जिस से 2019 हाथ से न फिसले.

देशप्रेम, राष्ट्रगान, गौरक्षा, भगवाध्वज और भारतमाता की बातें करने वाला भगवा खेमा अब देशहित की बात नहीं कर रहा, वह आस्था की दुहाई दे रहा है. पर यह नहीं बता पा रहा, न कभी बता पाएगा कि क्या इस आस्था से महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी कम हो जाएंगी और किसानों की आत्महत्याएं थम जाएंगी. वह तो यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि इन समस्याओं की वजह मोदी सरकार नहीं, बल्कि आम लोगों का धर्म से विमुख होना है और धीरेधीरे लोग उस से सहमत होते भी नजर आ रहे हैं.

यकीन मानें मंदिरनिर्माण के शोर में सारी समस्याएं दब कर रह जाएंगी. अब बारी आम लोगों की अपनी भूमिका तय करने की है कि वे क्या चाहते हैं धर्म के नाम पर हिंसा, वैमनस्य, भेदभाव या फिर शांति.

मंदिर निर्माण पार्ट 2 : ये बनाएंगे माहौल 

राममंदिर निर्माण आंदोलन पार्ट 2 में यों तो सभी साधुसंत शामिल हैं, लेकिन मालदार और रसूखदार साधुसंतों की भूमिका इस में अहम होगी जिन का अपना एक अलग साम्राज्य और विशाल भक्तवर्ग है. भाजपा समर्थित इन साधुसंतों में शामिल कुछ चेहरे इस तरह हैं-

अवधेशानंद : जूना पीठ अखाड़े, हरिद्वार के महामंडलेश्वर अवधेशानंद महाराज के कोई 60 लाख शिष्य देशभर में हैं. इन में भी ब्राह्मणों और वैश्यों की तादाद ज्यादा है. जूना पीठ अखाड़े के पास देशभर में अरबों की जायदाद है और रोजाना लाखों का चढ़ावा भी आता है. अवधेशानंद के शिष्य अपने घरों में रोज सुबहशाम उन की तसवीर की पूजा करते हैं.

अवधेशानंद राममंदिर निर्माण को ले कर अभी खुलेतौर पर सामने नहीं आ रहे हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से उन की गहरी छनती है. कहा तो यह भी जाता है कि वे शीर्ष उद्योगपति घरानों और सरकार के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं.

नरेंद्र गिरि : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुरीद नरेंद्र गिरि अभी दिखावेभर को सरकार का विरोध कर रहे हैं. नरेंद्र गिरि भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष भी हैं. इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करवाने के लिए उन्होंने ही आदित्यनाथ पर दबाव बनाया था.

नरेंद्र गिरि के अनुयायियों की संख्या भी लाखों में है और उन के शिष्यों में छोटेमोटे साधुसंतों की तादाद खासी है. नरेंद्र गिरि असली और नकली संतों की पहचान करते हैं और लगातार विवादों में भी रहते हैं.

नृत्य गोपालदास : रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्य गोपालदास के चरणों में तमाम भाजपा नेता लोट लगाते हैं. इन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल हैं.  जून 2016 में अयोध्या में जब नृत्य गोपालदास का 78वां जन्मदिन मनाया गया था तब देशभर के भाजपा नेता और छोटेबड़े साधुसंत इस भव्य और खर्चीले आयोजन में शिकरत करने पहुंचे थे. शायद कोई सैलिब्रिटी भी अपने जन्मदिन पर इतना पैसा खर्च नहीं करता होगा जितना इस आयोजन पर खर्च हुआ था. राममंदिर मामले में पक्षकार होने के नाते भी वे अहम हैं.

निश्चलानंद सरस्वती : पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के भक्तों और शिष्यों की संख्या 50 लाख से अधिक आंकी जाती है. पुरी पीठ के पास भी अरबों की जमीनजायदाद है. जो शंकराचार्य खुलेतौर पर भाजपा के सहयोगी हैं उन में निश्चलानंद का नाम सब से ऊपर है. पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में गैरहिंदुओं के प्रवेश का विरोध निश्चलानंद करते रहते हैं. इस बाबत वे सुप्रीम कोर्ट का भी लिहाज नहीं करते.

निश्चलानंद के नेतृत्व में होने वाले आयोजन काफी खर्चीले होते हैं. कट्टर सनातनी निश्चलानंद भाजपा को इस लिहाज से भी भाते हैं कि वे देश का विकास धर्म के जरिए करने की बात करते रहते हैं.

देवकीनंदन ठाकुर : 40 वर्षीय कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर तेजी से लोकप्रिय होते युवा संत हैं और वक्त की नब्ज समझते वे सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहते हैं. खुलेतौर पर एट्रोसिटी पर सरकार का विरोध करने वाले इस संत के अनुयायियों की संख्या लगभग 12 लाख है. अपने प्रवचनों में नरेंद्र मोदी से राममंदिर बनाने की अपील करते रहने वाले देवकीनंदन भक्तों से चढ़ावा मांगने में हिचकते नहीं हैं. वे चंद सालों में ही करोड़ों के आसामी हो चुके हैं.

साध्वी प्रज्ञा सिंह : मालेगांव बम ब्लास्ट की आरोपी रही तेजतर्रार व खूबसूरत हिंदूवादी युवा साध्वी प्रज्ञा सिंह ने दोबारा कथावाचन और प्रवचन देना शुरू कर दिया है. मंदिरनिर्माण पार्ट 2 में उन की भूमिका वही आंकी जा रही है जो 90 के दशक में साध्वी उमा भारती और ऋतंभरा की थी. प्रज्ञा भारतीय युवापीढ़ी की धार्मिक भावनाएं भड़काने में माहिर हैं. लंबा वक्त जेल में काटने के बाद वे हिंदुत्व को ले कर और भी मुखर हो गई हैं तो भाजपा खेमा भी उन की पूछपरख व धार्मिक पुनर्स्थापना में जुट गया है. जाहिर है राममंदिर निर्माण में उन की भूमिका भी अहम होगी.

ये चेहरे रहेंगे गायब 

लालकृष्ण आडवाणी : पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी 1992 के नायक थे जिन की रथयात्रा ने देशभर में मंदिर निर्माण को ले कर हिंसा की हद तक उन्माद पैदा कर दिया था. तब वे रथ पर सवार हो कर, देवताओं जैसा मुकुट पहन कर, हाथ में राम जैसा धनुषवाण ले कर निकलते थे तो गांवदेहातों से लोग उन के दर्शन के लिए टूट पड़ते थे. चंदे के नाम पर खूब नकदी के अलावा उन्हें महिलाएं अपने गहने तक उतार कर चढ़ा देती थीं. विवादित बाबरी मसजिद उन्हीं की अगुआई में ढहाई गई थी.

अब लालकृष्ण आडवाणी किस कोने में बुजुर्गावस्था कैसे काट रहे हैं, इस से न तो आरएसएस को सरोकार है और न ही भाजपा की दूसरी पीढ़ी के नेता उन्हें कोई भाव दे रहे हैं.

विनय कटियार : अयोध्या, फैजाबाद से 3 बार लोकसभा सदस्य रहे विनय कटियार राममंदिर निर्माण आंदोलन के वक्त 38 साल के थे. मुसलमानों के खिलाफ जब वे अपने भाषणों में जहर उगलते थे तो माहौल हिंदूमय हो जाता था. 90 के दशक में वे भाजपा का सब से युवा चेहरा थे जिस ने मंदिर निर्माण आंदोलन में बेहद आक्रामक भूमिका निभाई थी. मंदिर के लिए जेल जाना तो दूर की बात है, विनय कटियार मरने तक को भी तैयार रहते थे.

मुद्दत से हाशिए पर पड़े विनय कटियार हालिया घटनाक्रम में अपने लिए जगह तलाश रहे हैं.

कल्याण सिंह : बाबरी मसजिद विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी ले कर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले कल्याण सिंह को रिटायरमैंट देते 2014 में ही राजस्थान का राज्यपाल बना कर उन से छुटकारा नरेंद्र मोदी की टीम ने पा लिया था. बाबरी मसजिद ढहाने के लिए युवाओं की फौज तैयार करने वाले कल्याण सिंह अब 86 साल के हो चुके हैं और उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति से भी कट चुके हैं, इसलिए इस दफा मंदिरनिर्माण टीम से वे गायब हैं.

डा. मुरली मनोहर जोशी : 80 के दशक में पहली पंक्ति के जिन भाजपा नेताओं ने मंदिर के नाम पर कट्टर हिंदुत्व का माहौल बनाया था उन में मुरली मनोहर जोशी इसलिए भी खास हैं कि वे शिक्षित और तार्किक हिंदुओं को मंदिर बनाए जाने की जरूरत बताते थे. अब चूंकि वे संघ और संत दोनों की निगाह से उतर चुके हैं और उन की उम्र व सेहत भी ऐसी नहीं कि ढांचा ढहाना तो दूर की बात है, एक ईंट भी वे उठा पाएं, लिहाजा, मंदिर निर्माण पार्ट 2 में उन्हें कोई रोल दिए जाने की संभावना न के बराबर है.

उमा भारती : फायरब्रैंड नेत्री और साध्वी उमा भारती हिंदुत्व का चलताफिरता इश्तिहार हैं, जिन के बारे में कहा जा सकता है कि नाम ही काफी है. मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के एक निर्धन लोधी परिवार में जन्मीं उमा बचपन से ही भागवत और रामकथा बांचती रही हैं. राममंदिर निर्माण अभियान के वक्त उन के भाषण बेहद उत्तेजक और भड़काऊ होते थे. तब भाजपा को ऐसी साध्वी की सख्त जरूरत थी जो भगवा धारण कर देहाती जनता को उकसा सके. एक तरफ पेशेवर नेता भाषणों से जनता को उकसाते थे तो उमा यही काम रामकथा के जरिए करती थीं. सत्ता में आने के बाद उन्हें इस का इनाम भी भाजपा ने दिया.

मंदिर मसले पर वे एक ऐसी काठ की हांडी हैं जो दूसरी बार भी चढ़ सकती हैं. यह अलग बात है कि चूल्हे में पहले सी आंच नहीं रह गई है.

साध्वी ऋतंभरा : मानव सेवा और वात्सल्य के नाम पर वृंदावन में दर्जनभर संस्थान चलाने वाली साध्वी ऋतंभरा अपने अनुयायियों में दीदी के संबोधन से पुकारी जाती हैं. इस दीदी का रौद्र रूप 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में वात्सल्य का नहीं, बल्कि घृणा का था जो शुरू से ही मंदिरनिर्माण आंदोलन से जुड़ी रही थीं. पूरा देश घूम कर वे अपने आयोजनों में ‘मंदिर बनाएंगे धूम से’ का नारा दे कर माहौल बनाती रही थीं. मसजिद ढहाए जाने के बाद उन्होंने अघोषित रूप से इस अभियान से कन्नी काट ली थी. ऋतंभरा अभी भी मंदिर चाहती हैं, लेकिन इस बार वे अयोध्या शायद ही जाएं. जाहिर है मंदिर निर्माण पार्ट 2 में ऐसे कई छोटेबड़े अहम किरदार गायब रहेंगे, लेकिन कई नए चेहरे उन की जगह दिखेंगे.

बहक जाने दे

होंठ के जाम मुझे पी के

बहक जाने दे,

सांस में सांस घुले,

उन्हें महक जाने दे.

होश की चाह नहीं

मुझ को मेरे यार सनम,

आज जज्बात का

हर बांध छलक जाने दे.

बारिशें कैद सी खड़ी हैं

देख मोहब्बत की,

रोक मत आज इन्हें

खुल के बरस जाने दे.

चांदनी रश्क कर रही है

आज अपनी रोशनी पे,

चांद के नूर से

जिस्मों को दहक जाने दे.

तू हिमाकत कहे,

कह ले चाहे गुस्ताखी,

ये हसीं शाम गुनाहों में

बदल जाने दे.

एक ही रात मिली है

मुझे जीने की खातिर,

आज अरमान सभी,

दिल के निकल जाने दे.

आज तू शाह बने

और मैं मुमताज महल,

इश्क फिर प्रेम निशानी में

बदल जाने दे.

  • आशा शर्मा

मार्क्स ने धर्म को यों ही अफीम नहीं बताया था

दिनोंदिन मजबूत होता धर्म का जाल हर संप्रदाय में ऐसे आत्मघाती हमलावरों सरीखी फ़ौज तैयार कर रहा है जो अपनी कमर में बम लगाकर खुद को यह सोचकर उड़ा लेते हैं, कि जन्नत में हूरें इन्तेजार कर रही हैं. ठीक वैसे हम भी मदिरों की सीढ़ियों, नदियों के घाटों और ट्रेन की पटरियों पर आती-जाती रेलों से कुचलने से नहीं घबराते. बठिंडा में छठ पूजा के दौरान रेलवे ट्रैक पर जमा सैकड़ों लोगों को देखकर तो यही लग रहा था.

जिस तरह अफीम का नशा कुछ ऐसा होता है कि नशे में डूबा शख्स खुद को ही चोट पहुंचाकर आनंदित होता है. और उसे ऐसा करने से रोकने वाला दुश्मन लगता है. उसी तरह आज धर्म की अफीम चाटे हुए लोग मरने को तैयार हैं लेकिन सबक लेने को नहीं. गुजरे दशहरे को अमृतसर में रेलवे ट्रैक के बीचोंबीच रावण दहन का जश्न मन रही भीड़ को जब ट्रेन ने कुचला तो सरकार, रेलवे से लेकर पुलिस-प्रशासन तक सबको कोसा गया. कम लोगों ने ही उस भीड़ को कोसा जो धर्म के नशे में अंधी होकर रेल की पटरियों पर बहरी होकर मौत का इन्तेजार कर रही थी. लेकिन अमृतसर हादसे से बिना कोई सबक लिए हुए फिर वही सैकड़ों की भीड़ जब रेल ट्रैक पर खड़े होकर छठ पूजा पूजा कर रही थी तो यह साफ़ हो गया कि यह नशा इतनी जल्दी नहीं उतरेगा.

अमृतसर हो या बठिंडा..
अमृतसर और बठिंडा के बीच करीब 189 किलोमीटर का फासला है लेकिन सोच में इंचों का भी नहीं. शायद इसीलिए अमृतसर में 19 अक्टूबर को हुए दर्दनाक हादसे, जिसमें 61 लोगों की जान चली गई थी से बिना कोई सबक लेते हुए बठिंडा में छठ पूजा के दौरान सैकड़ों लोग फिर रेलवे ट्रैक पर जमा होकर पूजा करते नजर आए. बठिंडा में सरहिंद नहर के किनारे रेलवे ट्रैक पर रोजाना दर्जनों ट्रेन गुजरती हैं. और इसी ट्रैक पर छठ पूजा के नाम पर सैकड़ों महिलाएं, बच्चे और पुरुष जमा थे सूर्या को अर्घ्य देने के लिए.

धर्म की बहरी नगरी
विडंबना यह है कि इस बार भी न तो कोई परमिशन ली गयी थी और न ही किसी तरह की चेतावनी पर गौर किया जा रहा था. रेलवे और पुलिस वाले लोगों को वहां से हटने का अनाउंसमेंट कर रहे थे. लेकिन धर्म की बाहरी नगरी में कोई सुनने को तैयार कहाँ था. सबको लग रहा था कि सूर्या भगवान् को अर्घ्य देने से जीवन सफल होगा. ट्रेन भला हमारा क्या बाल बांका करेंगी.

बठिंडा जीआरपी एसएचओ हरजिंदर सिंह के मुताबिक़ हम लोगों ने लोगों को रेलवे ट्रैक से हटाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं हटे. पुलिस खुद इस बात को लेकर परेशान थी कि इस ट्रैक पर कभी भी ट्रेन आ सकती थी. लेकिन सब कोई भी उनकी चेतावनी को सुनता नहीं दिखा तो लाचार होकर पुलिस और रेलवे ने वहां सुरक्षा के इंतजाम बढ़ाए.

धर्म ही असल संकट है
मक्सिम गोर्की ने कहा था कि हम धर्म से सिर्फ इसलिए चिपके रहते हैं, ताकि संकट से बचे रहें. लेकिन कमाल देखिए धर्म ही हमें संकट में डालता है. कभी धर्म के नाम पर दंगों में सैंकड़ों लोग मारे जाते हैं तो कभी इसके तमाशे में रेल के तले कुचले जाते हैं.

21वीं सदी में भी हम धर्म को पालने के लिए मरने कटने को तैयार दिखते हैं. भगवान् नाराज न हो इसके लिए तीर्थ यात्राएं करने से नहीं कतराते भले ही मांबाप किसी कोठरी में भूखे तड़फ रहे हों.

धर्म से दूर हुए तो अनर्थ हो जाएगा, की घुट्टी पिलाने वाले पंडेपुरोहित इस से खूब ‘अर्थ’बटोर रहे हैं. खुद सोने के अम्बार से ढके मंदिरों और गाड़ियों में घूमते हैं और भक्तों की भीड़ लम्बी कतारों और भगदड़ों में मरती खपती है. इसे जबरन प्राइवेट मामला बताकर इसकी तर्कहीनता पर पर्दा डालने से इसके नुकसान कम नहीं होंगे. अपनी धर्मांधता दूसरों पर थोपते रहने से एक दिन सब अंधे हो जायेंगे.

समंदर पार जाती हूं…

मैं खुद में जिस घड़ी गमेतनहाई पाती हूं,

उम्मीदोआस की हर पल नई शम्मा जलाती हूं.

अता तुम ने किए जो भी खुलूसोप्यार के नगमे,

उन्हें जबजब भी सुनती हूं, मैं खुद ही मुसकराती हूं.

कभी खुद की खबर भी रह नहीं पाती है जानेमन,

तुम्हें पाने की हसरत में मैं ऐसे डूब जाती हूं.

कभी बातें पुरानी सी, कभी सपने सुहाने से,

जतन से रोज गुलदस्ता मोहब्बत का सजाती हूं.

तुम्हारे चेहरे में इतनी कशिश है कि ढूंढ़ने तुम को,

मैं दश्तोसहरा से आगे समंदर पार जाती हूं.

महेंद्र सिंह धौनी : आराम या विराम

एक तरफ भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली नया कीर्तिमान रच रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी को चयनकर्ता बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं. शायद इसलिए क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल माना जाता है. आज समय विराट कोहली का है, एम एस धौनी का नहीं.

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी को भारतीय टी 20 टीम से चयनकर्ताओं ने बाहर कर दिया है यानी 2 शृंखलाओं वैस्टइंडीज और आस्ट्रेलिया के खिलाफ धौनी नहीं खेल पाएंगे.

चयनकर्ताओं के इस फैसले से इस प्रारूप में एक तरह से माना जा रहा है कि धौनी के कैरियर का अंत है. चयनकर्ताओं का कहना है कि धौनी को आराम दिया गया है, क्योंकि टीम दूसरे विकेटकीपरों को मौका देना चाहती है. दूसरे विकेटकीपरों यानी दिनेश कार्तिक और ऋषभ पंत को यह मौका दिया गया है.

धौनी के दिन इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं. टी 20 मैचों में अपनी 5 पारियों में उन्होंने 32,11,12,52 और 16 रन बनाए हैं. आखिरी 5 एकदिवसीय मैचों की बात करें तो धौनी 20, 36, 8, 33 और जीरो रन ही बना पाए.

धौनी पिछले कुछ महीनों से खराब फौर्म में चल रहे थे. न तो उन के बल्ले से रनों की बौछार हो रही थी और न ही धौनी फुरती से स्टंपिंग कर पा रहे थे. चयनकर्ताओं का निर्णय अच्छा इसलिए माना जा सकता है कि जब तक धौनी इस प्रारूप में खेलते तो तय था कि दूसरे विकेटकीपरों को यह मौका नहीं मिलता.

धौनी की उम्र हो चुकी है. यदि भविष्य में ऐसा नहीं किया गया तो भारतीय टीम में विकेटकीपर का अकाल पड़ जाएगा. दिनेश कार्तिक इन दिनों अच्छे फौर्म में चल रहे हैं. ऋषभ पंत युवा खिलाड़ी हैं. ऐसे में उन्हें यह मौका मिला है तो उन्हें अपने को धौनी जैसा साबित करना होगा, नहीं तो चयनकर्ताओं को यह मलाल रहेगा कि धौनी को आराम या यों कह लें कि विराम नहीं देना चाहिए था.

भारत के प्रतिभाशाली युवा

कहने को हम दुनिया की सब से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, कहने को जगद्गुरु हैं, कहने को यहीं ज्ञान का उदय हुआ था, कहने को यहीं संस्कार, संस्कृति, स्थिरता, सभ्यता है और कहने को यहीं दुनिया का नेतृत्व करने वाला. बस, आज के शासकों को 30-40 साल और राज करने दो. पर असल में, हम दुनिया के मजदूर सप्लायरों में अव्वल हैं. हमारे मजदूर खाड़ी देशों में बड़ा काम कर रहे हैं. जब भी वहां विवाद होता है, हमें वहां से अपने लोगों को लाने के लिए जहाज के जहाज भेजने पड़ते हैं.

कम पढ़ेलिखे भारतीय मजदूर ही नहीं, पढ़ेलिखे एमबीए, इंजीनियर, डाक्टर भी दुनियाभर में नौकरी की भीख मांगतेफिरते हैं. अमेरिका ने अब अपने दरवाजे थोड़े बंद करने शुरू किए हैं तो हमारे युवा आस्ट्रेलिया व कनाडा का रुख कर रहे हैं.

अमेरिका के आंकड़े कहते हैं कि वहां टैक कंपनियों में काम करने वालों में सस्ते भारतीयों की बहुत मांग है. अमेरिका की इमीग्रेशन सर्विस के अनुसार, एच-1बी वीजा लिए विदेशियों की संख्या 5 अक्तूबर, 2018 को वहां 4,19,637 थी. उस में से 3,09,986 तो भारतीय ही थे. ये वे भारतीय युवा हैं जो भारत की महानता को छोड़ कर अमेरिकी कंपनियों में काम करने को तैयार हैं ताकि भारत की गंदगी, गंदी राजनीति, अंधविश्वासभरे नियमकानूनों, सरकारी लापरवाही, अव्यवस्था से छुटकारा पा सकें. अपने मातापिता, भाईबहनों, दोस्तों, संस्कृति, समाज को छोड़ कर ये युवा दूर अमेरिका में जा बसे हैं. वे कभी वहां के नागरिक बन पाएंगे, अब पक्का नहीं है पर चूंकि नौकरी जब तक रहेगी, अच्छा पैसा मिलेगा, तब तक तो ये वहां रहेंगे ही. ये प्रतिभाशाली युवा भारत के विकास में योगदान देने के बजाय अमेरिका चले गए हैं. भारत के मौजूदा शासक का ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा इन को भाया नहीं.

अमेरिका में जहां भारतीय कुल विदेशियों के 74 फीसदी हैं, वहीं हम से ज्यादा आबादी वाले चीन के कुल 11 फीसदी नागरिक ही इस वीजा पर वहां हैं. यह तब है जब 19वीं व 20वीं सदी में हजारों की संख्या में चीनी अमेरिका गए थे और हर बड़े शहर में चाइना टाउन मौजूद हैं जहां चीनी मूल के अमेरिकी बराबरी की हैसियत से रह रहे हैं.

यह हमारी तथाकथित प्रगति की पोल खोलता है जिस में हमारे युवाओं का न योगदान है और न उस में वे अपना भविष्य देखते हैं. हमारी प्रगति आज भी कृषि की प्रगति पर निर्भर है, जिस में अधपढ़े लोग, सरकारी जुल्मों के बावजूद, ज्यादा मेहनत कर भारत को थोड़ाबहुत नाम दिला रहे हैं. हमारे शिक्षा संस्थान या तो बेरोजगार युवा पैदा कर रहे हैं या फिर विदेशों की ओर टकटकी लगाए ऐसे होशियार व समझदार पैदा कर रहे हैं जिन्हें अपने देश पर भरोसा ही नहीं है.

ये हैं चांदी चमकाने के 6 बेहतरीन नुस्खे

चांदी के बर्तन और गहने इस्तेमाल करना सबको पसंद होता है. पर इसे पसंद करने के साथ इसका ख्याल रखना भी जरूरी है. अगर आप चांदी की वस्तुओं का ख्याल न रखें तो ये अपनी चमक को खो देते है और समय से पहले पुराने लगते है.

आप चांदी को अपने घर पर भी चमका सकते हैं. आपके घर में कई ऐसे चीजें रखी होती है,जिसका उपयोग कर इसकी चमक को वापस ला सकते हैं.

आपको बताते है, कुछ ऐसे नुस्खे जिसे आप आजमा कर पुराने दिखने वाले चांदी को नया बना सकते हैं.

डिटर्जेंट

एक गहरे बर्तन में गर्म पानी डिटर्जेंट लें. चांदी की चीजों को कुछ देर के लिए उसमें डुबा दें. कुछ देर डुबोए रखने के बाद उन्हें बाहर निकालकर ब्रश से हल्के हाथ से रगड़ लें. उसके बाद साफ पानी से धोकर, पोंछ लें.

 एल्युमिनियम फौयल

एक लीटर पानी में एक चम्मच बेकिंग सोडा डालें. उसके बाद चांदी के जिन बर्तनों और गहनों को साफ करना हैं, उन्हें इस पानी में डाल दें. उसके बाद फौयल पेपर से इन्हें रगड़े. आप देखेंगे कि आपके चांदी के बर्तन और गहने चमक उठे हैं.

 टोमैटो सौस

टोमैटो सौस को एक प्लेट पर निकाल लें. बर्तन या गहने का जो हिस्सा गंदा है, उस पर सौस को रगड़ें. अगर आपको ज्यादा चमक चाहिए तो आप चांदी की चीजों को कुछ देर तक सौस में ही छोड़ दें. उसके बाद साफ कपड़े से पोछ लें

नींबू-सोडा

अगर आपके चांदी के बर्तनों और गहनों की चमक खो गई है तो कुछ घंटों के लिए इन्हें नींबू-सोडा के घोल में छोड़ दें. बाद में इन्हें बाहर निकालकर पोछ लें.

हैंड सेनेटाइजर

हैंड सेनेटाइजर न केवल हाथों के कीटाणुओं को मारने का काम करता है बल्क‍ि सिल्वर की चीजों के लिए किसी पौलिश से कम नहीं है.

टूथपेस्ट

टूथपेस्ट न केवल दांतों को चमकाने के काम आता है बल्क‍ि इससे फीके पड़ चुके चांदी के बर्तनों को भी नई चमक दी जा सकती है.

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