प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उन की सरकार का साढ़े 4 साल का काम अगर लोगों को खुश या संतुष्ट कर देने वाला रहा होता तो भगवा खेमे को अयोध्या में राममंदिर निर्माण का जिन्न बोतल से फिर बाहर निकालने की जरूरत न पड़ती. मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में एक भी काम ऐसा नहीं हुआ है जिस पर आम लोग तालियां ठोंक रहे हों. उलट इस के नोटबंदी के चलते और जीएसटी के लागू होने पर अधिकांश देशवासी अभी तक छाती पीट रहे हैं.

चुनाव नजदीक आते ही राममंदिर निर्माण का मंच फिर सज गया है. पात्रों ने अपनी भूमिका के मुताबिक रटेरटाए डायलौग बोलने शुरू कर दिए हैं. हालत यह है कि देशभर के साधुसंत चेतावनी दे रहे हैं, कोई अयोध्या में अनशन पर बैठा है तो कोई सरकार को हड़का रहा है कि जितनी जल्द हो सके मंदिरनिर्माण बाबत संसद में कानून बनाओ. सुप्रीम कोर्ट ने कोई ऐसी राहत भी नहीं दी जैसी कि ट्रिपल तलाक मामले ने दी थी. उलटे, सबरीमाला मामले ने अमित शाह और सुप्रीम कोर्ट को आमनेसामने खड़ा कर दिया.

मंदिरनिर्माण की स्क्रिप्ट

बीती 5 अक्तूबर को दिल्ली में इकट्ठा हुए देशभर के नामीगिरामी संतों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिल कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा था जिस का मसौदा यह था कि महामहिम अपनी सरकार से कहें कि वह अब कानून बना कर रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त करे. राष्ट्रपति के पास मानो कोई जादू की छड़ी है जिस से मंदिर बन जाएगा.

यह आग्रह को कुछ दिनों पहले ही विश्व हिंदू परिषद से जुड़े साधुसंतों की उच्चाधिकार समिति की एक बैठक में किया गया था. 2019 के चुनावों के लिए मंदिरनिर्माण की षड्यंत्रकारी स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है. सभी राज्यों के प्रमुख साधुसंत राज्यपालों, जो सभी भाजपाई कट्टरपंथी हैं, से मिल कर उन्हें इस बाबत ज्ञापन देंगे. वे देश के मठों, मंदिरों, आश्रमों, गुरुद्वारों और घरों तक में मंदिरनिर्माण के लिए नाना प्रकार के अनुष्ठान करेंगे.

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