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सुबह का नाश्ता ना भूलें, हो सकती है पथरी की समस्या

दिन का सबसे जरूरी आहार होता है सुबह का नाश्ता. नाश्ते पर निर्भर होता है कि आप पूरे दिन कितने एक्टिव रहते हैं. आपके सेहत पर सुबह के नाश्ते का बड़ा रोल होता है. आजकल की भागदौड़ भरी जीवनशैली में अक्सर लोगों से नाश्ता छूट जाता है. पर आपकी ये लापरवाही आप पर भारी  पड़ सकती है.

avoid breakfast may cause stone

हाल ही में चीन में हुए क शोध में ये बात सामने आई है कि नाश्ता ना करने से लोगों में पथरी होने की संभावना बढ़ जाती है.

चीन में डौक्टरों ने 45 साल की चेन नाम की महिला के पेट से करीब 200 पथरियां निकाली हैं. इनमें से कुछ पथरियां अंडे के आकार जितनी बड़ी थीं. जनरल सर्जन डौक्टर कुआन वेई का कहना है कि चेन के नाश्ता न करने की आदत की वजह से ही उनको पथरी की समस्या शुरू हुई होगी.

चेन ने बताया कि पिछले 8 सालों में उन्होंने कभी नाश्ता नहीं किया. डौक्टरों ने बताया कि चेन के बाइल डक्ट और गौल ब्लैडर में ढंग से खाना न खाने की वजह से ही ये पथरियां बन गई होंगी.

औयली स्किन से हैं परेशान? लगाएं ये स्क्रब

औयली स्‍किन वालों को पिंपल की ज्यादा होती है. इन्‍हें दूर करने के लिए आपको अपनी स्‍किन को हमेशा साफ सुथरा रखना होता है. बाजार में कई तरह के फेस वाश उपलब्‍ध हैं, पर वो आपकी त्वचा बेअसर होते हैं.

नींबू स्‍क्रब

एक कटोरे में कुछ बूंद नींबू की और सेधा नमक मिलाएं. इसके अलावा आप चाहें तो उसमें दही भी मिला सकती हैं. अब इस तैयार स्‍क्रब से मुंह और गरदन को अच्‍छे से रगड़े और फिर ठंडे पानी से धो लें.

संतरा स्‍क्रब

औयली स्‍किन और डेड सेल से छुटकारा पाने के लिए इस होममेड फेशियल का प्रयोग करें. संतरे के छिलके को धूप में सुखा कर पाउडर बनाएं और फिर इसमें दही या दूध, नींबू का रस मिला कर पेस्‍ट बनाएं. इस पेस्‍ट को चेहरे और गर्दन पर लगाएं और धीरे धीरे मलें और डेड सेल तथा औयल को निकालें.

कुकुंबर फेशियल

तेल रहित त्‍वचा के लिए खीरे को पीस लें और चेहरे पर लगा लें. लगा कर अपनी त्‍वचा से डेड सेल और तेल हटाएं. इस स्‍क्रब को रोजाना प्रयोग करने से चेहरे पर से तेल मिट जाता है और चेहरा साफ हो जाता है.

कैरेट फेशियल

एक कटोरे में गाजर का रस लें और उसमें दही, नींबू का रस और गुलाब जल मिलएं. अपना चेहरा धोएं और फिर यह स्‍क्रब लगाएं और 10 मिनट तक ऐसे ही रहने दें. मुंह ठंडे पानी से धो लें.

वजन कम करना है तो रोज सुबह जरूर पीएं ये ड्रिंक

आपकी सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि आप सुबह क्या खाते पीते हैं. आम तौर पर लोग सुबह जागते ही कौफी या चाय पीते हैं. ये काफी नुकसानदायक होता है. चाय या कौफी में पाए जाने वाले तत्व सेहत के लिए काफी हानिकारक होते हैं.

सुबह जागते ही पानी पीना पेट के लिए काफी लाभकारी होता है. पर अगर आप अपना वजन कम करना चाहते हैं तो हम आपको बताएंगे एक ऐसा ड्रिंक जो आपके लिए काफी फायदेमंद साबित होगी.

रात में सोने के बाद शरीर में पानी की कमी हो जाती है. ये भी एक कारण है कि सुबह उठते ही पानी पीने की सलाह दी जाती है. पर अगर आप पानी के साथ उसमें नींबू और अदरक जैसी चीजें मिला देते हैं तो उसकी पौष्टिकता कई गुना बढ़ जाती है.

इसके सेवन से कब्ज़, अपच जैसी समस्याएं खत्म हो जाती है. इसके अलावा इसे पीने से इम्युनिटी सिस्टम मजबूत होता है और लीवर की कार्यक्षमता बढ़ जाती है. आप इस ड्रिंक को घर पर भी बना सकते हैं.

इसको बनाने के लिए एक ग्लास पानी में 2 चम्मच नींबू का रस  डालें. अब इसमें कूटी हुई अदरक मिलाएं और मिश्रण को अच्छे से हिलाकर मिलाएं. इस ड्रिंक को रोजाना सुबह उठते ही पिएं. इससे शरीर की बहुत सी परेशानियां खत्म होंगी और आपका वजन कम होगा और आप हेल्दी रहेंगे.

कामुकता का राज और स्त्री की संतुष्टि को कुछ इस तरह समझिए

मेरठ का 30 वर्षीय मनोहर अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं था, कारण शारीरिक अस्वस्थता उस के यौन संबंध में आड़े आ रही थी. एक वर्ष पहले ही उस की शादी हुई थी. वह पीठ और पैर के जोड़ों के दर्द की वजह से संसर्ग के समय पत्नी के साथ सुखद संबंध बनाने में असहज हो जाता था. सैक्स को ले कर उस के मन में कई तरह की भ्रांतियां थीं.

दूसरी तरफ उस की 24 वर्षीय पत्नी उसे सैक्स के मामले में कमजोर समझ रही थी, क्योंकि वह उस सुखद एहसास को महसूस नहीं कर पाती थी जिस की उस ने कल्पना की थी. उन दोनों ने अलगअलग तरीके से अपनी समस्याएं सुलझाने की कोशिश की. वे दोस्तों की सलाह पर सैक्सोलौजिस्ट के पास गए. उस ने उन से तमाम तरह की पूछताछ के बाद समुचित सलाह दी.

क्या आप जानते हैं कि सैक्स का संबंध जितना दैहिक आकर्षण, दिली तमन्ना, परिवेश और भावनात्मक प्रवाह से है, उतना ही यह विज्ञान से भी जुड़ा हुआ है. हर किसी के मन में उठने वाले कुछ सामान्य सवाल हैं कि किसी पुरुष को पहली नजर में अपने जीवनसाथी के सुंदर चेहरे के अलावा और क्या अच्छा लगता है? रिश्ते को तरोताजा और एकदूसरे के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए क्या तौरतरीके अपनाने चाहिए?

सैक्स जीवन को बेहतर बनाने और रिश्ते में प्यार कायम रखने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है? रिश्ते में प्रगाढ़ता कैसे आएगी? हमें कोई बहुत अच्छा क्यों लगने लगता है? किसी की धूर्तता या दीवानगी के पीछे सैक्स की कामुकता के बदलाव का राज क्या है? खुश रहने के लिए कितना सैक्स जरूरी है? सैक्स में फ्लर्ट किस हद तक किया जाना चाहिए?

इन सवालों के अलावा सब से चिंताजनक सवाल अंग के साइज और शीघ्र स्खलन की समस्या को ले कर भी होता है. इन सारे सवालों के पीछे वैज्ञानिक तथ्य छिपा है, जबकि सामान्य पुरुष उन से अनजान बने रह कर भावनात्मक स्तर पर कमजोर बन जाता है या फिर आत्मविश्वास खो बैठता है.

वैज्ञानिक शोध : संसर्ग का संघर्ष

हाल में किए गए वैज्ञानिक शोध के अनुसार, यौन सुख का चरमोत्कर्ष पुरुषों के दिमाग में तय होता है, जबकि महिलाओं के लिए सैक्स के दौरान विविध तरीके माने रखते हैं. चिकित्सा जगत के वैज्ञानिक बताते हैं कि पुरुष गलत तरीके के यौन संबंध को खुद नियंत्रित कर सकता है, जो उस की शारीरिक संरचना पर निर्भर है.

पुरुषों के लिए बेहतर यौनानंद और सहज यौन संबंध उस के यौनांग, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी पर निर्भर करता है. पुरुषों में यदि रीढ़ की हड्डी की चोट या न्यूरोट्रांसमीटर सुखद यौन प्रक्रिया में बाधक बन सकता है, तो महिलाओं के लिए जननांग की दीवारें इस के लिए काफी हद तक जिम्मेदार होती हैं और कामोत्तेजना में बाधक बन सकती हैं.

शोध में वैज्ञानिकों ने पाया है कि एक पुरुष में संसर्ग सुख तक पहुंचने की क्षमता काफी हद तक उस के अपने शरीर की संरचना पर निर्भर है, जिस का नियंत्रण आसानी से नहीं हो पाता है. इस के लिए पुरुषों में मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और शिश्न जिम्मेदार होते हैं.

मैडिसन के इंडियाना यूनिवर्सिटी स्कूल और मायो क्सीविक स्थित वैज्ञानिकों ने सैक्सुअल और न्यूरो एनाटोमी से संबंधित संसर्ग के प्रचलित तथ्यों का अध्ययन कर विश्लेषण किया. विश्लेषण के अनुसार,

डा. सीगल बताते हैं, ‘‘पुरुष के अंग के आकार के विपरीत किसी भी स्वस्थ पुरुष में संसर्ग करने की क्षमता काफी हद तक उस के तंत्रिकातंत्र पर निर्भर है. शरीर को नियंत्रित करने वाले तंत्रिकातंत्र और सहानुभूतिक तंत्रिकातंत्र के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए, जो शरीर के भीतर जूझने या स्वच्छंद होने की स्थिति को नियंत्रित करता है.’’

डा. सीगल अपने शोध के आधार पर बताते हैं कि शारीरिक संबंध के दौरान संवेदना मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी द्वारा पहुंचती है और फिर इस के दूसरे छोर को संकेत मिलता है कि आगे क्या करना है. इस आधार पर वैज्ञानिकों ने पाया कि उत्तेजना 2 तथ्यों पर निर्भर है.

एक मनोवैज्ञानिक और दूसरी शारीरिक, जिस में शिश्न की उत्तेजना प्रत्यक्ष तौर पर बनती है.

इन 2 कारणों में से सामान्य मनोवैज्ञानिक तर्क की मान्यता में पूरी सचाई नहीं है. डा. सीगल का कहना है कि रीढ़ की हड्डी की चोट से शिश्न की उत्तेजना में कमी आने से संसर्ग सुख की प्राप्ति प्रभावित हो जाती है. इसी तरह से मस्तिष्क में मनोवैज्ञानिक समस्याओं में अवसाद आदि से तंत्रिका रसायन में बदलाव आने से संसर्ग और अधिक असहज या कष्टप्रद बन जाता है.

स्त्री की यौन तृप्ति

कोई युवती कितनी कामुक या सैक्स के प्रति उन्मादी हो सकती है? इस के लिए बड़ा सवाल यह है कि उसे यौन तृप्ति किस हद तक कितने समय में मिल पाती है? विश्लेषणों के अनुसार, शोधकर्ता वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि ऐसे लोगों को चिकित्सकीय सहायता मिल सकती है और वे सुखद यौन संबंध में बाधक बनने वाली बहुचर्चित भ्रांतियों से बच सकते हैं.

इस शोध में यह भी पाया गया है कि युवतियों के लिए यौन तृप्ति का अनुभव कहीं अधिक जटिल समस्या है. इस बारे में पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रोस्कोप के जरिए युवतियों के अंग की दीवारों में होने वाले बदलावों और असंगत प्रभाव बनने वाली स्थिति का पता लगाया है.

वैज्ञानिकों ने एमआरआई स्कैन के जरिए महिला के दिमाग में संसर्ग के दौरान की  सक्रियता मालूम कर उत्तेजना की समस्या से जूझने वाले पुरुषों को सुझाव दिया है कि वे अपनी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं. उन्हें सैक्सुअल समस्याओं के निबटारे के लिए डाक्टरी सलाह लेनी चाहिए, न कि नीम हकीम की सलाह या सुनीसुनाई बातों को महत्त्व देना चाहिए. इस अध्ययन को जर्नल औफ क्लीनिकल एनाटौमी में प्रकाशित किया गया है.

महत्त्वपूर्ण है संसर्ग की शैली

डा. सीगल के अनुसार, महिलाओं के लिए संसर्ग के सिलसिले में अपनाई गई पोजिशन महत्त्वपूर्ण है. विभिन्न सैक्सुअल पोजिशंस के संदर्भ में शोधकर्ताओं द्वारा किए गए सर्वेक्षणों में भी पाया गया है कि स्त्री के यौनांग की दीवारों को विभिन्न तरीके से उत्तेजित किया जा सकता है.

आज की भागदौड़भरी जीवनशैली में मानसिक तनाव के साथसाथ शारीरिक अस्वस्थता भी सैक्स जीवन को प्रभावित कर देती है. ऐसे में कोई पुरुष चाहे तो अपनी सैक्स संबंधी समस्याओं को डाक्टरी सलाह के जरिए दूर कर सकता है.

कठिनाई यह है कि ऐसे डाक्टर कम होते हैं और जो प्रचार करते हैं वे दवाएं बेचने के इच्छुक होते हैं, सलाह देने में कम. वैसे, बड़े अस्पतालों में स्किन व वीडी रोग (वैस्कुलर डिजीज) विभाग होता है. अगर कोई युगल किसी सैक्स समस्या से जूझ रहा है तो वह इस विभाग में डाक्टर को दिखा कर सलाह ले सकता है.

चैन न छीन ले यह दोस्ताना, पतियों की दोस्ती बन सकती है मुसीबत

दोस्ती की जरूरत जीवन के हर पड़ाव पर होती है. फिर चाहे वह बचपन में स्कूल या पड़ोस की दोस्ती हो, किशोरावस्था या युवावस्था में अपने हमउम्र कालेज, औफिस की दोस्ती हो. लेकिन जब एक लड़का और लड़की वैवाहिक बंधन में बंध कर पतिपत्नी बन जाते हैं तो दोस्ती के माने बदल जाते हैं.

अधिकांश मामलों में विवाह के बाद लड़कियों का अपनी सहेलियों से साथ छूट जाता है और उन्हें पति के दोस्तों की पत्नियों से ही दोस्ती निभानी पड़ती है. लेकिन कुछ केसेज अपवाद भी होते हैं जहां लड़की की विवाह के बाद भी अपनी सहेली से दोस्ती बरकरार रहती है. विवाह के बाद भी उन का एकदूसरे से मिलनाजुलना, एकदूसरे के घर आनाजाना जारी रहता है और आप की सहेली के पति की दोस्ती आप के पति से हो जाती है.

शुरूशुरू में तो दोनों सहेलियों को अपने पतियों की यह दोस्ती खूब भाती है. उन्हें लगता है कि कितना अच्छा है कि दोनों के पति भी आपस में दोस्त बन गए हैं. अब इन की दोस्ती भी ताउम्र बरकरार रहेगी, लेकिन पतियों की दोस्ती का शुरुआत में अच्छा लगना बाद में किस कदर मुसीबतों व परेशानियों का सबब बन सकता है आइए एक नजर डालें:

मेरा पति मेरा न रहा: सहेली के पति के साथ आप के पति की दोस्ती कभीकभार साथ में चाय पीने, महीने में एकाध बार आउटिंग तक सीमित हो तो ठीक, लेकिन जब यह दोस्ती 24×7 की हो जाए यानी आप का पति आप का टाइम चुरा कर सहेली के पति को देने लगे तो आप के मन में यही खयाल आएगा न कि मेरा पति मेरा न रहा.

सुबह की व्हाट्सऐप गुडमौर्निंग से ले कर दिन भर एकदूसरे के साथ जोक्स शेयर करना, औफिस से इकट्ठे लौटना, लौटने के बाद बाहर घूमने निकल जाना और तो और आप डिनर टेबल पर उन की मनपसंद डिश बना कर उन का इंतजार कर रही हैं और वे आप की सहेली के पति के साथ बाहर से खाना खा कर आएं तो आप के पास अपना सिर पीटने और उस दिन को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा, जिस दिन आप ने अपने पति की दोस्ती सहेली के पति से कराई थी.

सहेली का पति बनाम सौतन: पहला उदाहरण, आप ने पति के साथ शाम में रोमांटिक मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया, लेकिन पति भूल कर सहेली के दोस्त के साथ हौरर मूवी देखने चले गए.

दूसरा उदाहरण, आप की शादी की सालगिरह का खास दिन है. आप पति से कुछ अपनी पसंद का सरप्राइज गिफ्ट, कैंडल लाइट डिनर की उम्मीद कर रही हैं, लेकिन पहले तो पति लेट आते हैं और फिर आते हैं, तो सहेली की पसंद का गिफ्ट उस के पति के साथ ले कर आ धमकते हैं. गिफ्ट और सहेली के पति को देख कर आप को उस में अपनी सौतन दिखने लगती है.

तीसरा उदाहरण, आप को अपनी सहेली से अपने बैडरूम की वे बातें पता चलती हैं, जो केवल आप और आप के पति के बीच थीं, तब आप को समझते देर नहीं लगती कि ये बातें सहेली तक आप के पति द्वारा इन के खास दोस्त यानी सहेली के पति द्वारा ही पहुंची हैं. अपने प्राइवेट पलों के बारे में अपनी सखी के मुंह से सुन कर आप के पास झेंपने के अलावा कोई चारा नहीं रहता.

आर्थिक मामलों में दखलंदाजी: सहेली के पति से आप के पति की दोस्ती ने आप का पर्सनल टाइम तो चुराया ही, लेकिन जब वह आप के फाइनैंशियल मैटर्स में भी दखल देने लगे तो आप पर क्या गुजरेगी. सहेली के पति से दोस्ती से पहले आप के पति घर के आर्थिक मामलों पर आप की राय लेते थे. कौन सी पौलिसी लेनी है, निवेश कितना और कहां करना है. इन सभी मसलों पर आप को साझीदार बनाते थे, लेकिन जब से उन का यह दोस्ताना हुआ उन्होंने आप की राय लेनी बंद कर दी.

ऐसे में आप को सहेली के पति को देख कर कुढ़न ही होगी और ऐसा होना वाजिब भी है, क्योंकि आर्थिक मसलों पर आप के परिवार का भविष्य जो निर्भर करता है. वैसे भी यह भला किस पत्नी को सुहाएगा कि उस का पति घर के महत्त्वपूर्ण मामलों में उस की राय लेने, उसे महत्त्व देने के बजाय दोस्त को महत्त्व देने लगे.

हाथ से न निकल जाए पति: आप ने तो अपने पति की दोस्ती सहेली के पति से यह सोच कर कराई थी कि आप दोनों सहेलियों का दोस्ताना बना रहेगा, लेकिन कहीं भविष्य में इस की आप को बड़ी कीमत न चुकानी पड़े, क्योंकि हो सकता है आप का पति सीधासादा, बिना कोई ऐब वाला फैमिली पर्सन हो, लेकिन सहेली का पति ऐब वाला हो यानी वह शराब, शबाब सब का सेवन करता हो. ऐसे में सहेली के पति की संगत आप के पति को भी बिगाड़ सकती है और वह गलत आदतों का शिकार हो कर हो सकता है आप के हाथ से भी निकल जाए.

सहेलियों की दोस्ती में दरार: सहेलियों के पतियों की दोस्ती आप दोनों सहेलियों की दोस्ती में दरार डालने का भी सबब बन सकती है, क्योंकि हो सकता है आप को लगे आप के पति को सहेली का पति बिगाड़ रहा है. उधर आप की सहेली को लगे कि आप का पति उस के पति को बिगाड़ रहा है. तो इस आरोपप्रत्यारोप के चलते आप दोनों की दोस्ती में दरार आ सकती है.

पति हो सकता है गैरजिम्मेदार: एक स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि आप के पति को आप की सहेली के पति यानी आप के इस नए दोस्त पर कुछ ज्यादा ही विश्वास हो और वह अपनी गैरमौजूदगी में हर काम के लिए दोस्त पर निर्भर रहने लगे. मसलन, आप के पति कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जा रहे हैं पीछे से वे आप के घरपरिवार की जिम्मेदारी बेफिक्र हो कर दोस्त को सौंप जाए.

ऐसी स्थिति में कोई भी पत्नी नहीं चाहेगी जहां उस का पति अपने परिवार की हर जिम्मेदारी अपने दोस्त को सौंपने लगे, क्योंकि आप के परिवार की जिम्मेदारी आप के पति की है और आप चाहेंगी उसे आप का पति ही निभाए.

जब कोई पीठ पीछे बुराई करे तो हमेशा ध्यान रखें ये बातें

वैसे तो वह हमेशा मेरी सच्ची दोस्त बनती है, लेकिन पीठ पीछे लोगों से मेरी बुराईर् करती है. समझ नहीं आता उस की बातों पर विश्वास करूं या नहीं. सच बहुत ही अटपटा सा महसूस होता है जब आप किसी दूसरे से अपने बारे में बुराई सुनते हैं और यह बुराई आप के किसी खास दोस्त या सहकर्मी अथवा परिजन ने की हो. मनमस्तिष्क दोनों को ही काफी ठेस पहुंचती है. लेकिन ऐसे में जरूरी है कि आप कुछ बातें ध्यान में रखें ताकि इन सब से निबट सकें:

सचाई को जानें: सब से अहम बात यह है कि सुनीसुनाई बातों पर विश्वास न करें. सब से पहले यह जान लें कि उस बात में कितनी सचाई है. कई बार लोग अफवाह फैला देते हैं या फिर छोटी सी बात का बतंगड़ बना देते हैं. इसलिए जरूरी है कि बातों की सचाई को जाने बिना प्रतिक्रिया व्यक्त न करें, क्योंकि कई बार हमारी छोटी सी गलती हमें अपने नजदीकी लोगों से अलग कर देती है.

धोखे के संकेतों से बचें: कई बार ऐसा होता है कि हमें कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं, जिन से पता चलता है कि सामने वाला हमें धोखा दे रहा है, लेकिन हम उन्हें अनदेखा कर देते हैं. लेकिन जितना अधिक अवसर पीठ पीछे बुराई करने वालों को मिलेगा आप के संबंध में उतनी ही अफवाहें फैलेंगी. इस से आप की छवि और आप के कामकाज पर भी असर पड़ेगा. अत: जरूरी है कि इन संकेतों पर ध्यान दें और इन से निबटें.

अच्छे संबंध बनाएं: ध्यान दें यदि आप के संबंध अच्छे होंगे तो लोग आप के बारे में गलत सोचने में 10 बार सोचेंगे. महत्त्वपूर्ण है कि अपनी छवि को अच्छा बनाए रखने के लिए अपने आसपास के लोगों से व्यवहार में मित्रता और सकारात्मक रुख अपनाएं. सभी को सम्मान दें. यदि आप का व्यवहार रूखा है, तो पक्का है आप बुराई के पात्र बनेंगे ही. अत: जरूरी है कि आप का व्यवहार लोगों के बीच अच्छा हो ताकि उन्हें पीठ पीछे आप की बुराई करने का मौका न मिल सके.

नोट करें: जब भी आप को लगे कि कोई आप की पीठ पीछे बुराई कर के औरों के बीच आप के लिए अफवाह फैला रहा है, तो आप नोट करें कि कब, कैसे और कहां आप के बारे में गलत अफवाह उस व्यक्ति ने फैलाई. जो भी हुआ उसे लिख डालिए, साथ ही उन कारणों को भी जिन की वजह से आप सोचते हों कि किसी ने आप को जानबूझ कर चोट पहुंचाई है. इस से आप के अनुभवों का विवेचन आसान हो जाता है और आप को पता चल जाता है कि वह घटना मात्र एक गलतफहमी थी अथवा किसी बड़े षड्यंत्र का एक हिस्सा.

इन बातों पर भी दें ध्यान

जब आप को किसी व्यक्ति विशेष पर शक हो तो आप उस से जुड़े किसी ऐसे व्यक्ति से बात करें, जो उस का मित्र न हो कर केवल उसे जानता हो. उस व्यक्ति को उस के चरित्र के बारे में, उस के कारनामे और व्यवहार के बारे में बताएं.

आप को लगता है कि बात आप के व्यक्तित्व पर आ रही है, साथ ही बढ़ती भी जा रही है, तो पीठ पीछे बुराई करने वाले से स्वयं मिलें. यदि व्यक्तिगत रूप से बात नहीं कर पा रहे हों तो टैक्स्ट या ई मेल का प्रयोग करें.

अकसर देखने में आता है कि कुछ ऐसे लोग भी हमारे घर, औफिस और महल्ले में मौजूद होते हैं, जो मानसिक तौर से मनोरोगी तो नहीं होते, लेकिन दूसरे का मजाक या पीठ पीछे बुराई करने में उन्हें बेहद मजा आता है, लेकिन जरूरी है कि आप अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए ऐसे लोगों से दूर ही रहें.

यदि बात किसी कार्यालय की की जाए तो बहुत से सहकर्मी ऐसे होते हैं, जो दूसरों को आगे न बढ़ने देने के लिए चालाकियां करते हैं. उन्हें नीचा दिखाने के लिए गलत बातों का षड्यंत्र रचते हैं. ऐसे में आप को चाहिए कि बातों को जानने की कोशिश करें, उन का समाधान निकालें.

उन घटनाओं की व्यक्तिगत रूप से अथवा ई मेल द्वारा चर्चा करें, जिन की वजह से आप परेशान हैं. समस्या को सामने लाएं और देखें कि क्या दूसरे व्यक्ति में उस पर बात करने योग्य परिपक्वता है.

यदि सामने वाला व्यक्ति अपनी गलती मानने से इनकार कर देता है, तो आप के द्वारा नोट की गई सभी बातों को सभी के सामने रखें, जिन के बीच वह आप की बुराई करता था या अफवाहें फैलाता था.

कई बार कुछ लोग आप के मित्र या परिजनों के बारे में उलटासीधा बोल कर कि फलां तेरे बारे में ऐसा कहता है, अफवाहें फैलाते हैं. अत: आप विश्वास न करें. क्या पता वह व्यक्ति आप के बीच कड़वाहट लाना चाहता हो. इसीलिए तो कहते हैं कि सुनो सब की करो अपने मन की.

इस में अबराम की गलती नहीं

अगर फिल्म स्टार किड्स की बात की जाए तो मीडिया में करीना कपूर खान और सैफ अली खान के गुलाबी रंग के बेटे तैमूर का नाम अव्वल रहेगा पर मासूमियत में शाहरुख खान और गौरी खान के तीसरे बच्चे सिल्की बालों वाले अबराम का जवाब नहीं.

शाहरुख खान अपने इस लाडले बेटे की छोटी से छोटी बात अपने फैंस से शेयर करते हैं. अपने जन्मदिन पर बंगले की एक खास जगह से जब ‘किंग खान’ अपने चहेतों को फ्लाइंग किस देते हैं तो उन के साथ अबराम भी होता है.

पिछले साल शाहरुख ने यह माना था कि उन का नन्हा अबराम मैगास्टार अमिताभ बच्चन को अपना दादा समझता है. किसी बच्चे का ऐसा सोचना लोगों को हैप्पी फील कराता है और जब ‘बिग बी’ खुद ऐसा ही बयान दें तो मजा दोगुना हो जाता है.

हाल ही में बच्चन फैमिली ने अपने घर की नन्ही परी आराध्या बच्चन के 7वें जन्मदिन की शानदार पार्टी करी थी जिसमें बौलीवुड की कई बड़ी हस्तियां शामिल हुई थीं. जाहिर है कि इस पार्टी में शाहरुख खान और गौरी खान भी अबराम के साथ पहुंचे थे और उन्होंने भी खूब मस्ती की थी.

बाद में अमिताभ बच्चन ने इंस्टाग्राम पर अपना और अबराम का एक फोटो शेयर किया था और लिखा था, ‘…और कुछ ऐसा है शाहरुख का सब से छोटा बेटा अबराम… जिसे बिना किसी शक के ऐसा लगता है कि मैं उस के पिता का पिता हूं… अबराम को इस बात पर भी ताज्जुब होता है कि शाहरुख के पिता उन के साथ क्यों नहीं रहते हैं.’

 

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कैसे शुरू हुआ यह सब

बीते साल आराध्या बच्चन के छठे जन्मदिन पर उस के दादा अमिताभ बच्चन ने अबराम की सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर की थीं. तब शाहरुख खान ने सोशल मीडिया पर ही लिखा था, ‘थैंक्यू सर, यह एक ऐसा लम्हा है जिसे अबराम हमेशा सहेज कर रखेगा. वैसे, आप को बता दूं कि जब भी अबराम आप को टीवी पर देखता है तो उसे लगता है कि आप मेरे पापा हैं. सच कहें तो इस में अबराम की कोई गलती नहीं है. उस ने तो आपको अपना दादा समझा है, मैं अपने बचपन में अमिताभ बच्चन को इस दुनिया का ही नहीं समझता था. किसी और ग्रह का ऐसा हैंडसम शख्स जो कभी बूढ़ा नहीं होगा और मायानगरी मुंबई में ऐसी जगह रहता होगा जहां कोई नहीं जा सकता.”

साल 1969 में आई अपनी पहली फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से आज 2018 में आई फिल्म ‘ठग्स औफ़ हिंदोस्तान’ तक अमिताभ बच्चन ने बड़े परदे के साथसाथ छोटे परदे पर भी अपनी अदाकारी से न जाने कितने दिल जीते हैं.

हिंदी की सब से ज्यादा मनोरंजक फिल्मों में से एक ‘डॉन’ में जब हमारा हीरो अमिताभ बच्चन कहता है कि ‘डॉन का इंतजार तो 11 मुल्कों की पुलिस कर रही है… लेकिन डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है’ तो फैन सोच लेते थे कि यह बंदा सच में किसी के हाथ नहीं आएगा. और ऐसा होता भी था.
अमिताभ बच्चन फिल्म ‘शोले’ का ऐसा पक्का वाला दोस्त था जिस के बिना ‘हीमैन’ धर्मेंद्र भी अधूरा था.

रमेश सिप्पी ने भले ही अपनी और भारत की सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली फिल्म ‘शोले’ के क्लाइमैक्स में अमिताभ को मरवा दिया था पर सिनेमाघर से बाहर निकलते तकरीबन सभी लोगों ने उसे जी भर कर कोसा था. अगर फिल्म में विधवा जया भादुड़ी की शादी अमिताभ से हो जाती तो रमेश सिप्पी का क्या जाता. अरे, थोड़े पैसे ही तो कम कमाता, फिल्म का दि एंड तो हैप्पी बन जाता. गब्बर से भी जालिम निकला डायरेक्टर तो.

अमिताभ बच्चन ने कभी तथाकथित बाल फ़िल्में नहीं की थीं पर उन की फिल्मों में बच्चों को पसंद आने वाले सारे मसाले होते थे. हिंदी फिल्म ‘मिस्टर नटवरलाल’ में उन की आवाज में गाया गाना ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तों इक किस्सा सुनो…’ बच्चों में खासा हिट रहा था. हिंदी फिल्म ‘कालिया’ में बच्चों के साथ कंचे खेलने वाले मासूम कल्लू को कौन भूल सकता है.

जनता ने अमिताभ बच्चन को इतना ज्यादा पसंद किया कि बहुत सी फिल्मों में उन के डबल रोल देखने को मिलते थे. हिंदी फिल्म ‘महान’ में तो उन्होंने ट्रिपल रोल निभा दिया था

लाजवाब अदाकारी का ही असर था कि उन्होंने इस सदी का महानायक होने का खिताब हासिल किया. वे ऋषि कपूर और मिथुन चक्रवर्ती की तरह डांसिंग स्टार तो नहीं कहलाए पर उन के किए गए डांस स्टैप्स को आने वाली पीढ़ी ने अपनी फिल्मों में खूब अपनाया. लड़कों के साथसाथ लड़कियां भी उन की तरह एक हाथ उठा कर ठुमके लगाती देखी जा सकती थीं. हीरोइन रेखा के लटकेझटके तो अमिताभ की पूरी नकल लगते थे.

जवानी तो जवानी अमिताभ बच्चन ने बुढ़ापे में भी गजब ढाया. उन की फिल्म ‘सूर्यवंशम’ भले ही बड़े परदे पर कोई खास कमाल नहीं दिखा सकी थी पर इस बात में कोई शक नहीं कि टेलीविजन पर वह बहुत ज्यादा बार दिखाई जाने वाली फिल्मों में शुमार हो चुकी है.

न जाने कितनी ही फिल्मों में अपनी मर्दाना आवाज और लाजवाब ऐक्टिंग से देशविदेश के करोड़ों लोगों का दिल जीतने वाले अमिताभ बच्चन उम्र के इस ढलते पड़ाव पर भी थक कर नहीं बैठे हैं. इस साल की सब से बड़े बजट की फिल्म ‘ठग्स औफ़ हिंदोस्तान’ में भी उन की अदाकारी और लड़ाई के सीन ने लोगों को निराश नहीं किया. टेलीविजन पर जब वे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो की एंकरिंग करते हैं तो अपनी दिलकश आवाज और भाषाई ज्ञान से बड़े और बच्चों को लुभा जाते हैं.

अबराम ने अमिताभ बच्चन को अपना दादा समझ कर कोई गलती नहीं की है एक महान इन्सान के रूप में उन जैसा दादा तो कोई भी बच्चा चाहेगा.

सास बहू का रिश्ता है नदी के दो किनारे

सासबहू का रिश्ता यानी 36 का आंकड़ा. अमूमन इस रिश्ते में हम बहू को ‘बेचारी’ और सास को ‘गले की फांस’ की संज्ञा देते हैं. मगर स्त्री सशक्तीकरण के दौर में आज यह सोच एक मुगालता भर है. आज ऐसी सासों की भी कमी नहीं है जिन की बहुओं ने उन का जीना दूभर कर रखा है.
बेंगलुरु की 60 वर्षीया नीना धूलिया ऐसी ही एक सास हैं जो अपनी बहू की करतूतों से इतनी आजिज आ गईं कि उन्होंने सासों के हित में एक फोरम बना डाला. 6 सितंबर, 2009 को 2 अन्य महिला मित्रों, ममता नायक और साहिरा शिग्गन के साथ मिल कर उन्होंने ‘औल इंडिया मदर इन ला प्रोटैक्शन फोरम’ यानी एआईएमपीएफ की शुरुआत की ताकि सताई हुई सासों को राहत पहुंचाई जा सके.
दोषी बहुओं को सजा दिलाने के प्रयास और सताई हुई सासों के हित में आवाज उठाने के मकसद से 3 महिलाओं द्वारा शुरू किए गए इस फोरम की सदस्य संख्या आज 3 हजार से भी ज्यादा है और बेंगलुरु के अलावा दूसरे शहरों में भी इस की शाखाएं हैं.
यह पहला ऐसा सोशल फोरम है जो मदर इन ला के अधिकारों और हितों की रक्षा करता है. यह नौन फंडेड, नौन प्रोफिटेबल और्गेनाइजेशन है. यह उन कानूनों में सुधार चाहता है जिन की वजह से बहुओं को अपने ससुराल वालों को प्रताडि़त करने और बेवजह संपत्ति हथियाने का मौका मिलता है.
औल इंडिया मदर इन ला प्रोटैक्शन फोरम द्वारा उठाई गई कुछ मांगें ये हैं :
  1. सास के कैरेक्टर को पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर देखना छोड़ें.
  2. अदालतों, महिला आयोग और दूसरे महिला संगठनों की धारणाओं में परिवर्तन जरूरी है ताकि वे मदर इन ला की शिकायतों पर भी उतना ही
  3. गौर करें, जितना कि वे बहुओं की शिकायतों पर ध्यान देते हैं.
  4.   सासों को बेवजह बदनाम करना बंद करें. उन्हें एक शांतिपूर्ण और गरिमामय जिंदगी जीने का हक दें.
  5. पुलिस और अदालतों द्वारा बुजुर्ग महिलाओं के प्रति गलत व्यवहार पर रोक लगे.
  6. सासों के अधिकारों और जरूरतों की सुरक्षा हो, खासतौर पर जब बात संपत्ति की हो. सास की संपत्ति पर बहुओं को जबरन हक नहीं मिलना चाहिए.
60 वर्षीया, शक्ल से सामान्य, सीधीसादी सी दिखने वाली नीना का बेंगलुरु में अपना घर है. वे अपने बेटे व पति के साथ खुशहाल जिंदगी जी रही थीं. 7 साल पहले बेटे की शादी के साथ उन के जीवन में जैसे भूचाल सा आ गया. बकौल नीना, ‘‘मेरी बहू ने हमारा और हमारे बेटे का जीना मुहाल कर दिया है. उस ने हमें 498ए और घरेलू हिंसा आदि झूठे केसों में फंसा कर इस उम्र में कोर्टकचहरी और थानों के चक्कर लगाने पर मजबूर किया है. कितने अरमानों से हम ने बेटे की शादी की थी पर अफसोस, घर बसने के बजाय उजड़ कर रह गया है. इकलौते बेटे के तलाक के झमेलों की वजह से डिप्रैशन में आ कर पति की पिछले माह मौत हो गई.’’
एआईएमपीएफ की फाउंडर मैंबर, ममता नायक कहती हैं, ‘‘हम ओडिशा के रहने वाले हैं. हम ने अपने बेटे की शादी 2007 में की. शादी के 6 माह बाद ही बहू ने झगड़ा करना शुरू कर दिया. वह हमारे साथ रहना नहीं चाहती थी. उस के घर वाले उसे गलत पाठ पढ़ा रहे थे. एक दिन अचानक वह घर छोड़ कर चली गई और हमारे खिलाफ झूठा केस दर्ज कर दिया.’’ हैल्प एज इंडिया द्वारा हाल में किए गए एक अध्ययन, ‘ऐल्डर एब्यूज ऐंड क्राइम इन इंडिया’ के मुताबिक बुजुर्गों के शोषण में बहुओं का हाथ 63 प्रतिशत तक होता है जबकि 44 से 53 प्रतिशत बेटे इस के लिए जिम्मेदार होते हैं.

महिला कानूनों की विसंगतियां
नीना धूलिया कहती हैं, ‘‘महिला हित में बने कानूनों की विसंगति यह है कि बहुओं के पक्ष में तो बहुत से कानून हैं मगर महिला होते हुए भी सास या ननद इन के दायरे में नहीं आतीं. आज एक लड़की जब चाहे इन कानूनों का इस्तेमाल कर सिर्फ बयान दर्ज करा कर अपने ससुराल के किसी सदस्य या सभी सदस्यों को जेल की हवा खिला सकती है. उस की बात पर तुरंत यकीन भी किया जाता है और जांचपड़ताल किए बगैर ससुराल वालों को हिरासत में ले लिया जाता है. भले ही शिकायत 90 साल की बुजुर्ग महिला के खिलाफ हो या 4 माह के दूध पीते बच्चे के. सचाई का पता लगाए बगैर कार्यवाही शुरू कर दी जाती है.
‘‘वहीं, बहुओं को संपत्ति में भी हिस्सेदारी मिल जाती है. वे पैतृक संपत्ति में भी क्लेम कर सकती हैं और गुजारेभत्ते के लिए भी दावा ठोक सकती हैं. भले ही वे जौब कर रही हों, पर इस बात को छिपा कर वे पति और ससुराल वालों को हर माह हजारों की चपत लगा सकती हैं. बहुत सी लड़कियां ससुराल वालों को ब्लैकमेल भी करने लगी हैं. इर्रिट्रीवेबल ब्रेकडाउन औफ मैरिज के नाम पर अब धोखे से की गई 1 दिन या 2 घंटे की शादी में भी बहुएं 50 प्रतिशत तक की संपत्ति पर अपना दावा ठोक सकती हैं. सास की संपत्ति पर भी बहू को हक मिल सकता है, मगर कभी बहू की संपत्ति पर सास को हक नहीं दिया जाता. सोचने वाली बात है कि बहुएं तो अपेक्षाकृत जवान होती हैं, वे कमा सकती हैं जबकि सास की उम्र गुजर चुकी होती है.’’
ममता नायक कहती हैं, ‘‘मुझे तो लगता है जैसे झूठे केसों के माध्यम से इस तरह रुपए ऐंठना एक तरह का व्यापार बनता जा रहा है. महिला सशक्तीकरण के नाम पर इस तरह के कानून औरतों को मजबूत बनाने के बजाय उन्हें कमजोर कर रहे हैं.’’
परिवार होते हैं बरबाद
बहू की करतूतों का सब से पहला कुप्रभाव यह पड़ता है कि परिवार बिखर जाते हैं. बहुत से वृद्ध सासससुर हार्टअटैक के शिकार हो जाते हैं तो बहुत से आत्महत्या कर लेते हैं. समाज में उन की इतनी बेइज्जती होती है कि वे लोगों से कट जाते हैं. सालोंसाल कचहरी का चक्कर और लाखों रुपयों की बरबादी व्यक्ति को अंदर तक तोड़ देती है.
सैकड़ों परिवारों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 60 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं ने यह स्वीकार किया कि ससुराल वालों के साथ उन के खराब रिश्ते ने उन के जीवन में गहरा संताप और दबाव पैदा किया है. बेंगलुरु के फैमिली कोर्ट में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 65 प्रतिशत तलाक के मुकदमे पति द्वारा दर्ज किए गए, क्योंकि पत्नी ने 498 ए भारतीय दंड संहिता की धारा के अंतर्गत केस फाइल करा रखा था.
सास होती हैं बदनाम
शुरू से समाज की फितरत यानी सोच रही है कि पारिवारिक झगड़ों की मुख्य वजह सास का अक्खड़ रवैया होता है. माना जाता है कि सास ही गुस्सैल या दखलंदाजी करने वाली होती है, जबकि हमेशा ऐसा हो, यह सच नहीं है. नीना कहती हैं, ‘‘आज की बहुएं शिक्षित आत्मनिर्भर होने के साथ ही असहनशील भी होती हैं. वे ससुराल में ऐडजस्ट नहीं कर पातीं तो घर वालों पर दोषारोपण करना शुरू कर देती हैं. आज के कानून वैसे भी उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा देते हैं. नतीजा, ज्यादातर मामलों में सामंजस्य में थोड़ी सी भी कठिनाई आने पर बहुएं झूठा केस फाइल करा देती हैं, या फिर इस की धमकी देने लगती हैं. 30-35 सालों से जो सास घर को बेहतर ढंग से चला रही थी, बहू आते ही उसे डायन करार देती है. अकसर बहुओं की मेन टारगेट सास ही होती हैं.’’
सच तो यह भी है कि ज्यादातर बहुएं हक तो मांगती हैं पर फर्ज नहीं निभातीं. सास को सम्मान देना उन्हें आता नहीं. छोटी सी बात पर बवाल मचाने को तैयार रहती हैं. वे पति से भी झगड़ने लगती हैं. जाहिर है ऐसे में सास का दिल तो दुखेगा ही. सास ऐसा करने से रोकती है तो हमला सास पर ही हो जाता है.
सितम कैसे कैसे
  1. शारीरिक प्रताड़ना, जैसे सास पर हाथ उठाना, धक्का देना या किसी वस्तु से चोट पहुंचाना.
  2. मानसिक प्रताड़ना, जैसे व्यंग्य कसना, कमैंट करना या उलाहने देना.
  3. सास को नाम ले कर पुकारना या गाली देना. बातचीत के क्रम में गलत भाषा का प्रयोग.
  4. सास को उसी के घर से बाहर निकालना.
  5. सास को अपने बेटे से मिलने न देना.
  6. बेवजह अपमानित करना, दुर्व्यवहार करना या पुलिस की धमकी देना.
  7. दूसरों के आगे सास की इज्जत उछालना.
  8. सास को मानसिक रूप से टौर्चर करना.
  9. आत्महत्या करने को उत्तेजित करना.

गलती किस की
यूनिवर्सिटी औफ कैंब्रिज के सीनियर ट्यूटर, राइटर और मनोचिकित्सक, डा. टेरी आप्टर ने अपनी किताब ‘व्हाट डू यू वौंट फ्रौम मी’ के लिए की गई अपनी एक रिसर्च में पाया कि 50 प्रतिशत मामलों में सासबहू का रिश्ता दुरूह और कलहपूर्ण होता है. 55 प्रतिशत बुजुर्ग महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे खुद को बहू के साथ असहज और तनावग्रस्त पाती हैं जबकि करीब दोतिहाई महिलाओं ने महसूस किया कि उन्हें उन की बहू ने अपने ही घर में अलगथलग कर दिया है.
इन बातों से यह साबित नहीं होता कि गलती सिर्फ बहू की है. दरअसल, लड़कियों के दिमाग में बचपन से ही यह बात डाली जाती है कि सास तुम्हारी सब से बड़ी दुश्मन है. ससुराल आने से पहले से ही सास का हौवा उन के दिलोदिमाग पर हावी रहता है.
अकसर सासों की शिकायत होती है कि बहू पलट कर जवाब दे देती है. ऐसे में झगड़े बढ़ते हैं. समस्या तब होती है जब बहू के घर वाले भी उस के कान भरने लगते हैं, उसे भड़काने लगते हैं. नीना कहती हैं, ‘‘सच तो यह है कि ज्यादातर वे घर, जिन में जहां भी लड़की के मायके वालों की दखलंदाजी हुई है, बरबाद हुए हैं. जब तक लड़की के घर वाले उस के सपोर्ट में खड़े रहेंगे, लड़की ससुराल में थोड़ा भी ऐडजस्ट करने को तैयार नहीं होगी. इस के विपरीत यदि लड़की को ससुराल में सब का खयाल रखने, अपने फर्ज को निभाने और सास को सम्मान देने की सीख दी जाए तो अधिकार उसे खुदबखुद मिल जाएंगे.’’
यही नहीं, आजकल के बहुत से कानून, जैसे 498ए, डोमैस्टिक वायलैंस, धारा 125 आदि लड़कियों को जरूरत से ज्यादा हक दे रहे हैं, जो उचित नहीं. महिला आयोग हो, महिला संगठन हों या सरकारी महकमे, हर जगह बहुओं की शिकायत ही सुनी जाती है, सासों की नहीं.
नीना धूलिया कहती हैं, ‘‘कभी आप ने देखा है कि किसी लड़की ने अपने मांबाप पर संपत्ति के लिए क्लेम किया या किसी लड़की ने मां के खिलाफ हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराई? क्या मांबाप अपनी बेटी को डांटतेडपटते नहीं? या क्या कभी घर की संपत्ति में हक मांगने की स्थिति नहीं आती?’’
वैस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के डा. क्रिस्टी ने बहुओं के नजरिए का अध्ययन किया. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि बहू को अच्छा लगता है जब सास उसे बेटी कह कर पुकारती है या प्यार से बरताव करती है. उस के बच्चे को बेहतर ढंग से संभालती है, बहू को अपने घर का हिस्सा समझती है और पति के साथ उस के रिश्ते को मजबूत बनाने में सहयोग देती है. वहीं, बहू को सास की अनचाही सलाह देने की आदत, असंवेदनशील और स्वार्थी व्यवहार बुरा लगता है. सास द्वारा उसे अच्छी मां/पत्नी बनने के गुर सिखाना या उस के बच्चे के साथ बुरा व्यवहार भी वह सह नहीं पाती.
ज्यादातर बहुएं तब बुरा महसूस करती हैं जब सासबहू के झगड़ों में पति अपनी मां का पक्ष ले. ऐसा नहीं कि सभी बहुएं या सभी सास एक सी होती हैं और उन का रिश्ता भी एक सा होता है.
रेड एफ एम की सीओओ निशा नारायणन कहती हैं, ‘‘औरत यदि अपनी व्यथा दुनिया के सामने लाती है या घर छोड़ती है तो इस के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत होती है. जहां तक बात मेरे मामले की है, मेरी सास मेरी प्रेरणा हैं. वे ब्रिटिश शासनकाल के वक्त की पहली रेडियो अनाउंसर हैं. उन की सोच प्रोग्रैसिव है और वे काफी ओपनमाइंडैड हैं.’’ जर्नलिस्ट मंजू कहती हैं, ‘‘मेरी सास बेहतर ढंग से मेरी पौने 2 साल की बच्ची को संभालती हैं. वे हैं तभी मैं जौब कर पा रही हूं. यही वजह है कि औफिस के साथ घर के सारे काम भी खुशीखुशी निबटाती हूं. सासू मां कुछ कह भी देती हैं तो मैं बहस नहीं करती. क्योंकि वे हैं, तभी मैं बच्ची की तरफ से निश्ंिचत हूं.’’
मदर इन ला की तरफ से सुझाव
  1. सास की छवि को मीडिया और पुराने लोगों द्वारा हमेशा धूमिल किया जाता रहा है और उसे बहू के खून की प्यासी के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है, जोकि एक औरत के अधिकारों के साथ नाइंसाफी है.
  2. एक सास अपनी बहू को उस का पति देती है, सुव्यवस्थित घरसंसार देती है और सब से बढ़ कर उसे घर के उत्तरदायित्व व हक सौंपती है जो कल तक उस के थे, तो फिर उसी सास को उपेक्षित क्यों किया जाता है?
  3. दूसरे रिश्तों को सम्मानित करने के लिए हम उन के नाम से खास दिन सैलिब्रेट करते हैं, पर कभी भी हम ने सासबहू के रिश्ते को सैलिबे्रट नहीं किया. कभी हम ने मदर इन ला यानी एमआईएल डे नहीं मनाया.
  4. भारत में सास के अधिकारों की विवेचना करने वाला कोई कानून क्यों नहीं है?
  5. एक नई स्टडी के मुताबिक महिलाएं खुद की मां द्वारा भी हिंसा की शिकार होती हैं, पर इस पर वे ध्यान नहीं देतीं. मगर चूंकि बचपन से लड़की को सास से घृणा करना सिखाया जाता है, इसलिए ससुराल पहुंच कर वह सास को ही अपना मुख्य दुश्मन समझने लगती है.
  6. बहू को मेंटेनेंस देने की क्या जरूरत है? जबकि वह कमा सकती है, कम उम्र की है. वास्तव में सास को बहू की कमाई से हिस्सा मिलना चाहिए क्योंकि वृद्ध महिला के पास कमाई का कोई जरिया नहीं होता.
  7. सारी शादियां डाउरी प्रोहिबिशन ऐक्ट के अंतर्गत रजिस्टर होनी चाहिए, ताकि इस कानून का दुरुपयोग न हो.
  8.  अदालतों को भी सासबहू के मामलों में मौजूदा समाज के बदलते स्वरूप को समझना चाहिए.
  9. बुजुर्ग महिलाओं के प्रति संवेदनशील नजरिए की आवश्यकता है.
  10. जब एक बहू पुलिस स्टेशन जाती है और गलत शिकायत दर्ज कराती है या दहेज की शिकायत करती है, तो आननफानन उस के ससुराल वाले गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, जोकि गलत है. यदि दहेज लेने का आरोपी गिरफ्तार किया जाना चाहिए तो भला दहेज देने वाले को क्यों छोड़ा जाता है? कानून के मुताबिक तो दोषी दोनों ही हैं.

कांटे बोते हैं नकारात्मक व्यवहार

वे उच्चशिक्षित, धनी, आकर्षक और गुणी मैनेजर हैं पर खुद के बेढंगे स्वभाव के कारण अपने परिवार व कंपनी में बहुत ही नापसंद की जाने वाली महिला हैं. दरअसल, जैसा व्यवहार हम घर में अपनाते हैं वह न चाहते हुए भी दूसरों के सामने व्यक्त हो जाता है. हमारे बोलने के तरीके व व्यवहार का असर दूसरों पर पड़ता है. अपने व्यवहार से हम चाहें तो रिश्ता बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी. एक मैनेजमैंट रिसर्च ने प्रमाणित किया है कि कंपनियां योग्यता के अलावा उन्हीं अधिकारियों व कर्मचारियों (महिला, पुरुष) को वरीयता देती हैं जिन में साथियों के साथ सामंजस्य, भाईचारा बना कर काम करने के गुण हों. यही काबिलीयत घर पर भी फायदेमंद साबित होती है.

एंथ्रोपोलौजी यानी मानव शरीर रचना शास्त्र के अनुसार, हमारा व्यवहार ही समाज, कार्यस्थल, परिवार के सदस्यों के साथ अच्छे या बुरे संबंध स्थापित करने का माध्यम होता है. हमारा व्यवहार ही व्यक्तित्व का आईना होता है. व्यावसायिक और गैर व्यावसायिक संबंधों में लक्ष्यों व हितों को हासिल करने के लिए समय और स्थिति के अनुरूप व्यवहार मुख्य भूमिका निभाता है.

एक शोध में पाया गया है कि सफलतम अधिकारी परिचित व अपरिचित के साथ जल्द ही संबंध बनाने में सिद्धहस्त होते हैं, उस के पीछे उन का व्यवहार व मौखिक भाव होता है जो दूसरों को प्रभावित करता है. असंवेदनशील हो कर स्थिति के अनुरूप व्यवहार न करना पारिवारिक बिखराव का मुख्य कारण बन सकता है, विशेषकर संयुक्त परिवार में बहुत सोचविचार कर के व्यवहार करने की जरूरत होती है. यह समझ कर कि किन आचरणों से दूसरों पर अनचाहा प्रभाव पड़ता है, उन्हें बुद्धिमत्ता से दूर कर कई व्यक्तिगत व सामाजिक समस्याओं को हल किया जा सकता है.

कुछ नकारात्मक व्यवहार, जो मानसिक समस्याओं, मतभेद, बिखराव, आपसी कटुता पैदा करते हैं, उन से दूर रह कर अच्छी जिंदगी गुजारी जा सकती है.

प्रतिक्रियात्मक उत्तर

स्वयं को अच्छा दिखाने के चक्कर में दूसरे को गलत साबित करना, उस के प्रति जहर उगलना, गलत बातों का प्रचार करना कदापि उचित नहीं होता. यह प्रवृत्ति घरेलू शांति और सभी प्रकार के संबंधों में आग में घी का काम करती है. मेरे एक मित्र की पत्नी का रात में खाने के बाद कोयल जैसी मीठीमीठी आवाज में केवल एक काम था, दिनभर की पारिवारिक समस्याओं व छोटीछोटी बातों को बढ़ाचढ़ा कर कहने के साथ पति के कान भरना और अपनी गलतियों को छिपा कर सभी दोष देवर, देवरानी पर मढ़ना. उन के इसी व्यवहार के कारण सुखी घर में कलह का बीज अंकुरित हुआ और इन सब का हश्र यह हुआ कि हंसतेखेलते परिवार का विभाजन हो गया, फलतेफूलते बिजनैस में ताला लग गया. आज हालत यह है कि दोनों ही भाई आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं.

कुटिलता व द्वेष के आचरण के साथ इधर की बात उधर करने का नतीजा कभी मीठा नहीं होता, देरसवेर सचाई प्रकट हो जाने से ऐसा करने वाले का सब की नजर में अविश्वसनीय बन जाना तय है. समाज में, नातेरिश्तेदारी में उस व्यक्ति से लोग दूर रहने में भलाई समझते हैं.

विक्षिप्त व्यवहार

शीघ्र या बिना किसी उचित कारण भावावेश में आ कर उत्तेजित, अनियंत्रित या क्रोधित होना ‘न्यूरोटिक यानी मनोविक्षिप्त स्वभाव’ है. ऐसे स्वभाव की स्त्री से लोग दूर रहने में भलाई समझते हैं, भले ही वह बहुत अधिक प्रतिभाशाली या सुंदरता की सजीव मूर्ति हो.

अबुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार

किसी की कमी को उस के मुंह पर बोल कर मजाक उड़ाना अशिष्टता है. याद कीजिए द्रौपदी ने दुर्योधन को ‘अंधे का पुत्र अंधा’ कह अनावश्यक अपमानित कर विवेकहीनता की पराकाष्ठा पार कर दी थी उस की वजह से द्यूत के पश्चात भरे दरबार में अपने ही खानदान के सामने अपने अपमान का स्वयं बहुत बड़ा कारण बन बैठीं. उस के ये वचन विनाशकारी युद्ध ‘महाभारत’ का कारण बने.

मेरे एक विदेशी मित्र, जो खुद भी बेरोजगार थे, की पत्नी को सुपरवाइजर ने इसलिए नौकरी से निकाल दिया क्योंकि वह काम करते समय अपने साथियों से हंसीमजाक करती थी, जैसे वह जगह वर्कप्लेस नहीं, बाजार हो. एक मैनेजमैंट स्टडी ने सिद्ध किया है, ‘अत्यधिक खुशदिल दिखने व हंसने वाली महिला कर्मचारी को बौस काम के प्रति गंभीर नहीं मानते.’

अनुचित हावभाव व बोल

मानव व्यवहार विशेषज्ञ रौबर्ट डिल्टस ‘चेंजिंग बिलीफ सिस्टम विद एनएलपी’ में लिखते हैं, ‘‘दूसरों के साथ हमारा व्यवहार बदले में उस के द्वारा हमारी ओर उसी के अनुरूप व्यवहार निर्धारित कर सकता है.’’ रूखा चेहरा और तिरस्कृत करने वाली बौडी लैंग्वेज दूसरों को अपरोक्ष रूप से अपमानित करने का भाव प्रकट करती है. कर्कशवाणी वाली हसीन औरत जैसे ही मुंह खोलती है, अपना आकर्षण व दूसरों से संबंध खो बैठती है.

मनोविज्ञानी अल्बर्ट मेहराबियन ने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्टडी द्वारा नौनवर्बल अभिव्यक्ति पर ऐतिहासिक परिणाम व्यक्त किए: ‘व्यक्ति का 93 प्रतिशत कम्यूनिकेशन नौनवर्बल होता है, इस में सम्मिलित है बौडी लैंग्वेज के अतिरिक्त बोलने का रिद्म, तीव्रता आदि. नौनवर्बल कम्यूनिकेशन बहुत बड़ा कारण है बिन जबान खोले 2 परिचित या अनजानों के बीच मित्रता या बैर भाव आने का. अनुचित भावभंगिमा भले ही बोलने के द्वारा व्यक्त न हो पर चेहरे के हावभाव उसे प्रकट कर ही देते हैं.

संतुलित व्यवहार

हम अपना व्यवहार शतप्रतिशत नियंत्रित कर उसे सही दिशा दे सकते हैं. स्थिति के अनुरूप समझदारी, विवेक और मूल्य आधारित बरताव करना ‘प्रोऐक्टिव’ कहलाता है. प्रतिक्रिया करने का विचार मन में आते ही और प्रतिक्रिया करने से पहले के बीच आए कुछ सैकंडों के अंतराल में मन ही मन स्थिति के अनुरूप ‘प्रोऐक्टिव’ निर्णय ले कर कदम उठाना ‘प्रोऐक्टिव’ होने की उत्तम तकनीक है. इस से घर में शांति और उन्नति निवास करेगी. परिवार के सदस्यों में मानसिक रोगों और आत्महत्या की प्रवृत्ति को जन्म देने में घरेलू समस्या व उलझन प्रमुख भूमिका निभाते हैं.

एक मैनेजमैंट अनुसंधान के अनुसार भी, ‘कर्मचारियों की गैरहाजिरी व कार्यकुशल न होने की जड़ में मुख्य कारण रहता है पारिवारिक परेशानी.’ अपनी झगड़ालू प्रवृत्ति के कारण तलाक व आर्थिक बोझ सह रही इंगलैंड के प्रिंस एन्ड्र्यू की पत्नी साराह फर्ग्यूसन अब पुराने सुखद क्षणों को याद कर प्रायश्चित्त कर रही हैं, ‘‘मैं ने बहुत सी बेढंगी गलतियां कर अपना ही पैर काट लिया. अब हर समय पछताती हूं कि आखिर, मैं ने इतनी मूर्खताएं कैसे कर डालीं.’’ पर अब पछताए होत क्या, जब चिडि़यां चुग गईं खेत. और ‘क्या बीता पल वापस आ सकता है?’, क्या पारिवारिक सुख का कोई मेल है?’ अमर दार्शनिक प्लूटो भी आखिरी समय जीवनभर के अपने अनचाहे व अनुचित व्यवहार पर निराश व दुखी होते रहे. अत: नकारात्मक व्यवहार जिंदगी में कांटे ही बोता है?

लेटैस्ट ट्रैंड्स का रखें खयाल, शादी में दिखें बेमिसाल

शादी की तारीख तय होते ही युवकयुवती की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. ये तैयारियां होती हैं एकदूसरे के साथ जिंदगी की नईर् शुरुआत करने की. वैसे तो शादी की तैयारी में बहुत सी बातें हैं, मगर युवती और युवक को सब से ज्यादा उत्साह जिस चीज का होता है वह है, एकदूसरे के लिए सजनेसंवरने का, जिस के लिए वे काफी सारी शौपिंग करते हैं. दिलचस्प बात यह है कि अब पहले की तरह शौपिंग में न तो युवती के मातापिता का दखल होता है और न ही युवक को अपने यारदोस्तों और मामाचाचा का सहारा लेना पड़ता है. अब तो विवाह सूत्र में बंधने वाला जोड़ा एकसाथ एकदूसरे की शौपिंग में मदद करता है.

देखा जाए तो यह सही भी है, क्योंकि शौपिंग में एकदूसरे का साथ व पसंदनापसंद जानने का भी मौका मिलता है. मगर शौपिंग के दौरान नए ट्रैंड और फैशन को ध्यान में रखना भी बहुत जरूरी है. कहीं ऐसा न हो कि छोटी सी भूल सारी तैयारियों पर पानी फेर दे.

लेटैस्ट पहनावा

इस में सब से पहले आते हैं युवकयुवती द्वारा पहने जाने वाले आउटफिट्स. जाहिर है इस विशेष अवसर पर उन का खास दिखना भी जरूरी है. इस के लिए हर कार्यक्रम में लेटैस्ट ट्रैंड्स को ध्यान में रखते हुए दोनों को ही अलगअलग परिधानों का चुनाव करना चाहिए. इस बाबत फैशन डिजाइनर श्रुति संचिति कहती हैं, ‘‘शादी का अवसर अब पहले की तरह पारंपरिक नहीं बल्कि फैंसी हो गया है, जिन कार्यक्रमों का स्वरूप पहले छोटा हुआ करता था अब वे बड़े स्तर पर होते हैं. रोका, सगाई, गोदभराई, मेहंदी व हलदी कुछ ऐसे कार्यक्रम हैं जिन में दूल्हा और दुलहन पक्ष के सभी लोग उपस्थित रहते हैं. ऐसे में होने वाले दूल्हादुलहन को इन सभी कार्यक्रमों के लिए पहले से तैयारी करनी पड़ती है.’’

खासतौर पर आउटफिट्स की खरीदारी दूल्हादुलहन को एकसाथ करनी चाहिए, क्योंकि आजकल मैचिंग का ट्रैंड है और लोगों का दूल्हादुलहन के कपड़ों की मैचिंग पर ही सब से अधिक फोकस रहता है. इसलिए जब शादी के कार्यक्रमों के लिए आउटफिट्स खरीदने जाएं, तो निम्न बातों का ध्यान जरूर रखें :

साड़ी और लहंगे का क्रेज अब भी युवतियों में कम नहीं हुआ है. डिजाइनर्स ने भी इन दोनों ही परिधानों के साथ नएनए प्रयोग किए हैं, जिस से ये और भी ट्रैंडी लुक में बाजार में उपलब्ध हैं. रोका और सगाई जैसे कार्यक्रमों के लिए डिजाइनर लहंगों या प्रीड्रैप साड़ी, ऐंब्रौयडरी वाले गाउंस या डिजाइनर क्रौप टौप के साथ लाचा स्टाइल स्कर्ट को चुना जा सकता है. वहीं मेहंदी, संगीत और हलदी के कार्यक्रम के लिए इंडो वैस्टर्न अनारकली सूट्स, फ्लोर लैंथ रौ सिल्क स्कर्ट या गाउंस काफी अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं.

अपनी शादी में दुलहन भी अब सभी अवसरों को ऐंजौय करना चाहती है, ऐसे में उन आउटफिट्स को प्रमुखता दें जो स्टाइलिश भी हों और आरामदायक भी. नैनोट्रैडिशनल कौंसैप्ट पर तैयार लहंगे दुलहन की दोनों जरूरतों को पूरा करते हैं. पहली बात यह कि ये वजन में भारी और ज्यादा कीमती नहीं होते. दूसरा, इन्हें बाद में कस्टमाइज कर के समय के ट्रैंड के  अनुसार ढाला जा सकता है, जिस से पैसों की बरबादी भी नहीं होती.

युवकों के लिए अब न केवल कोटपैंट, धोतीकुरता और शेरवानी बल्कि बाजार में वैडिंग आउटफिट्स के ढेरों विकल्प उपलब्ध हैं. इन विकल्पों में सब से अधिक लोकप्रिय ऐंब्रौयडरी, जरदोजी और सीक्वैंस वर्क वाला बंद गले का कुरता और चूड़ीदारपाजामा, चिकन, लेनिन या जामवार जैसे फैब्रिक से बनी अचकन, कुरता और लौंग कोट मौजूद हैं, जिन्हें मोजरी और जूती के साथ पहनने में क्लासी लुक आता है. चाहें तो एक हलका सा स्टौल या पगड़ी भी इस के साथ क्लब की जा सकती है, यह आउटफिट के लुक को और भी इनहैंस करता है. सब से अच्छी बात यह है कि इन आउटफिट्स को किसी भी कार्यक्रम में पहना जा सकता है, बस, इन के पैटर्न और डिजाइन का थोड़ा खयाल रखना पड़ता है.

आप को यह जान कर हैरानी होगी कि धोतीकुरते का फैशन आज भी पूरी तरह आउट नहीं हुआ है बल्कि इस के स्वरूप को और भी डिजाइनर अंदाज में पेश किया जा चुका है. खासतौर से यदि अपनी शादी के दिन आप भारीभरकम शेरवानी न पहनना चाहें तो रौ सिल्क का कुरता और कौटन सिल्क की धोती चुन सकते हैं. वैसे इसे और भी स्टाइलिश लुक देने के लिए कुरते के ऊपर डिजाइनर कोट भी पहना जा सकता है. वैसे सही कलर कौंबिनेशन, फैब्रिक और पैटर्न का खयाल रख कर दूल्हादुलहन अपने आउटफिट्स को एकदूसरे के मैच का भी बना सकते हैं :

–  दुलहन के लहंगे में जिस रंग का सब से कम इस्तेमाल हुआ हो दूल्हे को उसी रंग का आउटफिट चुनना चाहिए.

–  दूल्हादुलहन एकदूसरे के आउटफिट को कौंप्लिमैंट करते हुए रंग का आउटफिट भी ले सकते हैं.

–  इस बात का भी खयाल रखें कि यदि दूल्हा वैस्टर्न आउटफिट पहन रहा है,

तो दुलहन को भी वैस्टर्न आउटफिट ही पहनना चाहिए.

मेकअप में रखें ट्रैंड का खयाल

पहनावे के बाद सजनेसंवरने की कड़ी में सब से महत्त्वपूर्ण मेकअप होता है. चाहे दुलहन हो या दूल्हा शादी के लगभग सभी कार्यक्रमों में मेकअप के अनुभव से सभी को गुजरना पड़ता है. मगर इस की तैयारी भी पहले से करनी पड़ती है. जहां दुलहन को यह तय करना पड़ता है कि उसे कैसा लुक चाहिए वहीं युवक को भी अपने आउटफिट के अनुसार बाल और दाढ़ी सैट करनी पड़ती है. इस बारे में मेकअप आर्टिस्ट अतुल चौहान कहते हैं, ‘‘दुलहन के मेकअप में ड्रामैटिक लुक, रौयल लुक, अरैबिक स्टाइल जैसी कई वैराइटी होती हैं, मगर मेकअप का कोई भी स्टाइल दुलहन के आउटफिट और ज्वैलरी पर ही तय करता है. हम होने वाली दुलहन को यही सलाह देते हैं कि पहले आउटफिट तय कर लें ताकि उस के हिसाब से मेकअप और ज्वैलरी तय की जा सके.’’ कुछ ऐसा ही दूल्हे को भी करना पड़ता है.

वैसे तो दूल्हे को दुलहन की तरह मेकअप लुक्स की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती मगर चेहरे पर पिंपल, टैनिंग या फिर किसी तरह के दागधब्बे हों, तो उन्हें शादी के कुछ दिन पहले ही फैशियल, ब्लीच और क्लीनअप करवाने की जरूरत होती है. वैसे यह काम दुलहन को भी करवाना पड़ता है. आजकल बहुत से ऐसे यूवी सैक्स सैलू हैं, जो दूल्हादुलहन के लिए कंबाइंड पैकेज देते हैं. इन पैकेजेस को पहले से बुक कराया जा सकता है. इस के साथ ही युवकों को भी अपनी मेकअप किट में कुछ खास कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स रखने चाहिए, जिन के बारे में अतुल बताते हैं, ‘‘स्किन टोन से मैच करता फाउंडेशन, कौंपैक्ट पाउडर, होंठों की स्किन टोन से मैच करती न्यूड शेड की लिपस्टिक युवकों को भी अपनी किट में जरूर रखनी चाहिए. यह उत्पाद उन के फीचर्स को इनहैंस करते हैं.’’

गहने भी हों खास

ट्रैंड के साथ युवतियों का गहनों को ले कर पसंद में भी काफी बदलाव आया है. वे अब भरीभरकम ज्वैलरी के बजाय कम वजनी और वनपीस ज्वैलरी ही पसंद करती हैं. वैसे आजकल मल्टीलेयर्ड और चोकर डिजाइन वाले नैकलैस फैशन में हैं. इन के साथ चौड़े हैंडकफ्स को क्लब किया जा सकता है. इस से दुलहन का लुक बैलेंस हो जाता है.

युवकों की बात की जाए तो वे भी अपनी वैडिंग ऐक्सैसरीज को ले कर काफी चूजी हो गए हैं. खासतौर पर पगड़ी पर लगने वाली कलगी और कोट के लिए ब्रोचेस की खरीदारी में वे काफी ट्रैंड कौंशियस हो गए हैं. इसी तरह युवकों के लिए लेयर्ड नैकलैस में भी काफी वैराइटी बाजार में उपलब्ध हैं. इन का चुनाव आउटफिट के रंग और पैटर्न के आधार पर ही होना चाहिए.

अत: यदि उपरोक्त सभी बातों का ध्यान रखा जाए तो युवकयुवतियों को अपनी शादी की शौपिंग के दौरान न तो ज्यादा मुश्किलें आएंगी और न ही उन का अधिक समय बरबाद होगा.

दुलहन की मेकअप किट

–       दुलहन की मेकअप किट में प्राइमर अवश्य होना चाहिए. किसी भी कौस्मैटिक प्रोडक्ट के इस्तेमाल से पहले इसे जरूर लगाना चाहिए, क्योंकि यह त्वचा पर सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और मेकअप को लंबे समय तक सैट रखता है.

–       यदि फाउंडेशन लगाना पसंद नहीं है तो दुलहन अपनी मेकअप किट में बीबी और सीसी क्रीम रख सकती है. यह फाउंडेशन की तरह ही कार्य करता है और इसे लगाना भी बेहद आसान होता है.

–       आजकल बाजार में कई शेड्स के आईलाइनर उपलब्ध हैं और यह काफी ट्रैंडी भी लगते हैं. अपने आउटफिट्स के हिसाब से इन्हें भी मेकअप किट में जगह देनी चाहिए. साथ ही जैल काजल भी मेकअप किट में जरूर रखें.

–       अपनी ड्रैस से मैच करते हुए नेलपेंट्स के 3-4 शेड्स जरूर रखें.

–       अपनी किट में लाइट शेड्स के साथ ही डार्क शेड्स की लिपस्टिक भी शामिल करें. खासतौर पर ब्लड रैड और मैरून कलर आजकल ट्रैंड में हैं, तो इन शेड्स को किट में जरूर रखें.

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