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बिग बौस के घर में श्रीसंथ ने खोला मैच फिक्सिंग से जुड़ा राज

मैच फिक्सिंग में निलंबित होने के बाद कानूनी लड़ाई लड़ रहे टीम इंडिया के पूर्व खिलाड़ी एस श्रीसंथ इन दिनों सलमान खान के बहुचर्चित सीरियल बिग बौस के 12वें संस्करण में कंटेस्टेंट हैं. श्रीसंथ का एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से बचपन से नाता है. हाल ही में बिग बौस में अपने मैच फिक्सिंग मामले के समय हुए कुछ खास वाकयों का खुलासा किया. यह एपिसोड सोमवार रात को प्रसारित किया जाएगा.

श्रीसंथ ने बिग बौस में अपने साथियों को बताया कि जब उन पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगा था, तब वे घोर अवसाद, यानि डिप्रेशन में चले गए थे, यहां तक कि एक समय उनके मन में आत्महत्या तक का विचार आया था. श्रीसंथ ने यह भी बताया कि उन्हें इस विवाद के दौरान करीब 10 लाख रुपये का नुकसान हुआ था.

फूट-फूट कर रोए श्रीसंथ

श्रीसंथ ने रोते हुए खुलासा किया कि उन्होंने कुछ नहीं किया और वे मैच फिक्सिंग में कभी शामिल नहीं रहे. उनके साथियों ने उन्हें शांत कराने की कोशिश की जब वे फफक-फफक कर रो रहे थे. श्रीसंथ ने उस स्लैपगेट कांड के बारे में भी बात की जब आईपीएल मैच के दौरान हरभजन सिंह ने मैदान पर ही उन्हें थप्पड़ रसीद कर दिया था. श्रीसंथ ने ये बातें सीरियल में दिए गए एक टास्क के दौरान बताईं.

श्रीसंथ ने मैच फिक्सिंग के दौरान अपनी पत्नी के सपोर्ट के बारे में भी बात की. उन्होंने बताया कि किस तरह से उनकी पत्नी ने मैच फिक्सिंग मामले के दौरान उन्हें सहारा दिया और उस कठिन दौर में उबरने में मदद की. मैच फिक्सिंग में नाम आने के बाद श्रीसंथ के क्रिकेट खेलने से पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसके मुतबाकि वे क्रिकेट मैदान के पास भी नहीं जा सकते. 2011 के भारत के वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम में भी श्रीसंथ शामिल थे.

सचिन का किस्सा भी बता चुके हैं श्रीसंथ

श्रीसंथ इससे पहले भी अपने क्रिकेटीय जीवन के बारे में कुछ किस्से शेयर कर चुके हैं, लेकिन मैच फिक्सिंग से संबंधित उन्होंने पहली पारी बात की. इससे पहले श्रीसंथ ने बिग बौस में उस इंटरव्यू का जिक्र कर चुके हैं जिसमें सचिन तेंदुलकर ने उनकी वकालत की थी. शो में श्रीसंथ ने तब कहा था, ‘वर्ल्ड कप (2011) जीतने के एक दो साल बाद सचिन का एक इंटरव्यू चल रहा था. इसमें सचिन ने मेरा नाम लिया था और कहा था कि वर्ल्ड कप जिताने में श्रीसंथ की अहम भूमिका थी. उस समय मैं खुशी से पागल हो गया था.’

श्रीसंथ का नाम आईपीएल 2013 में स्पौट फिक्सिंग में आया था और उन पर किसी पर तरह के क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया था. दिल्ली पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी भी की थी. जुलाई 2015 में वह स्पौट फिक्सिंग मामले में बरी हो गए थे, लेकिन बीसीसीआई ने उन पर लगा आजीवन प्रतिबंध नहीं हटाया. श्रीसंथ बचपन में एक मशहूर डांस शो बुगी-वुगी के विजेता भी रह चुके हैं और कई बार मैदान पर अपनी ब्रेक डांस स्किल्स भी दिखा चुके हैं. श्रीसंथ ने बिग बौस में अपने डांस का जलवा दिखाया है.

अक्टूबर 2017 में केरल हाईकोर्ट ने श्रीसंथ पर दोबारा आजीवन प्रतिबंध लगा दिया. श्रीसंथ फिलहाल इस मामले पर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. शो में उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि उन पर से प्रतिबंध हट जाएगा और वह दोबारा क्रिकेट में लौट सकेंगे.

‘मां को गाली’ वाले बयान पर सामने आया नरेंद्र मोदी का झूठ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानें तो कांग्रेसी अब उनकी मां को गाली देने पर उतारू हो आए हैं क्योंकि उनमें, उनसे मुकाबले की ताकत नहीं रही है. मध्यप्रदेश के छतरपुर और मंदसौर की चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी ने जब कांग्रेस की उन्हें दी गई मां की गाली का रहस्यमय शैली में जिक्र या खुलासा कुछ भी कह लें किया तो लोग हैरानी से एक दूसरे का मुंह ताकते नजर आए कि गाली गुफ्तार का यह आयोजन कब, कैसे और कहां सम्पन्न हो गया इसका तो उन्हें अता पता ही नहीं. किस कांग्रेसी ने पीएम को मां की गाली बकी, यह बात लोग समझ पाते इसके पहले ही नरेंद्र मोदी गाली का बदला लेने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर डालकर छू हो चुके थे.

सभा विसर्जन के बाद कुछ जानकारों ने बाकी लोगों को बताया कि मां की यह गाली वैसी शुद्ध  गाली नहीं है जैसी कि आमतौर पर कानों का आहार बन ही जाती है. एक दिन पहले फिल्म अभिनेता और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर ने जरूर इंदौर की एक ऐसी ही पब्लिक मीटिंग में नरेंद्र मोदी की मां का जिक्र किया था लेकिन वह गाली गलोच वाला नहीं था, बात कुछ और थी.

अब तक मीडिया और दोनों दलों के नेता राज बब्बर के उस भाषण की वीडियो क्लिप हजारों बार बारीकी से देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि उन्होंने अमर्यादित कुछ नहीं कहा था बल्कि नरेंद्र मोदी के ही एक बयान को आधार बनाते एक सियासी तंज भर कसा था जिसका इस्तेमाल नरेंद्र मोदी लोगों को जज्बाती तौर पर भड़काने के लिए कर रहे हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा वोट बटोरे जा सकें.

दरअसल में राज बब्बर ने कहा था कि, मोदी कहते थे कि डौलर के सामने रुपया इतना गिर गया है कि इसका मूल्य उस वक्त के प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) की उम्र के करीब जा रहा है. हम तो यह कहना चाहेंगे कि आज रुपया गिरकर आपकी पूज्यनीय माता जी की उम्र के करीब पहुंचना शुरू हो गया है. यानि बात देश की अर्थव्यवस्था और रुपए के अवमूल्यन से ताल्लुक रखती हुई थी जिसे नरेंद्र मोदी ने मां की गाली दी … कहते भुनाने की कोशिश की तो उन पर तरस आना स्वभाविक बात थी कि उन्हें हक है कि वे मनमोहन सिंह की उम्र की तुलना रुपये की गिरावट से करें लेकिन किसी कांग्रेसी को यह हक नहीं कि वह उनकी मां की उम्र से यही तुलना करे.

लगता यही है कि राज बब्बर के जेहन में भाषण देते वक्त किसी और उम्रदराज व्यक्ति का खयाल नहीं आया होगा इसलिए उन्होने नरेंद्र मोदी की मां हीरा बेन का नाम ले दिया जो 97 साल की हो चुकी हैं और अपने सबसे छोटे बेटे पंकज मोदी के साथ गांधी नगर में रहती हैं. क्या यह तुलना गाली थी और क्या इसे प्रधानमंत्री द्वारा गाली कहकर प्रचारित करना उचित था, इन दोनों ही सवालों का जबाब न में ही मिलता है.

दिक्कत तो यह है कि तीनों राज्यों में भाजपा की हालत ठीक नहीं है जिसे देख बौखलाए नरेंद्र मोदी बेहद घटिया हथकंडे अपना रहे हैं जो प्रधानमंत्री पद की गरिमा के तो अनुकूल कतई नहीं कहे जा सकते. दूसरी दिक्कत नरेंद्र मोदी का उतरता जादू है अब उनकी सभाओं में पहले सी भीड़ नहीं उमड़ती और न ही लोग खुद अपने मन से मोदी मोदी चिल्लाते. मुमकिन है यह हकीकत उन्हें हजम न हो रही हो और अब वे खुद को हीरो बताने इस तरह का मिथ्या प्रचार करने में यकीन करने लगे हों.

राहुल गांधी पड़ रहे भारी

साल 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार में कोई शक नहीं लोग नरेंद्र मोदी को सुनने और देखने टूटे पड़ते थे तो इसकी वजह भी थी कि लोग बदलाव का मन बना चुके थे और अपने भावी प्रधानमंत्री को नजदीक से देखना चाहते थे. अब हालत उलट है कि तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी उत्सुकता और आकर्षण का केंद्र बन गए हैं. दिलचस्प बात यह है कि जिन राहुल गांधी को पप्पू के खिताब से नवाजते भाजपा उनका मजाक उड़ाती रहती थी वही राहुल गांधी अब उसके और नरेंद्र मोदी के लिए खतरा नहीं तो बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं, जो अपने भाषणों में आमतौर पर भाजपाइयों के मुकाबले संयमित भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

ऐसा भी नहीं है कि राहुल गांधी का जादू सर चढ़कर बोलने लगा हो पर इतना जरूर है कि लोग उन्हें गंभीरता से लेने लगे हैं तो इसका बड़ा श्रेय भी भाजपा को ही जाता है. नरेंद्र मोदी अपनी हर मीटिंग में उन्हें और नेहरू गांधी खानदान को जरूर कोसते हैं लेकिन राहुल गांधी कभी उनके परिवार का जिक्र नहीं करते, नहीं तो बेलगाम और बदजुबान होती राजनीति के इस दौर में वे भी नरेंद्र मोदी की पत्नी के बाबत कुछ भी कहने आजाद हैं. राहुल गांधी अब वक्त की नजाकत भांपते मुद्दों पर बोलते हैं जिनमें राफेल डील प्रमुख है. इस डील का जिक्र करते जब वे एक खास अंदाज से चौकीदार …. कहकर चुप हो जाते हैं तो जनता खुद चिल्लाती है कि चोर है. नरेंद्र मोदी को जुमलेबाज भी वे कहते हैं.

नरेंद्र मोदी के भाषणों का राहुल गांधी और उनके परिवार तक सिमटते जाना भाजपा के लिहाज से चिंताजनक बात हो चली है, वजह लोग अपने प्रधानमंत्री से इतने हल्केपन की उम्मीद नहीं रखते कि वह साढ़े चार साल बाद भी अपने भाषण के मुद्दे और विषय न बदले, दूसरे तीनों राज्यों में कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है. इस चुनाव का राहुल बनाम मोदी होते जाना भाजपा को नुकसानदेह ही साबित होगा और 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी का कद बढ़ाने वाला भी होगा.

जितना घटिया प्रचार हो रहा है उसे देख लोगों का मन ही राजनीति से उचटने लगा है. नरेंद्र मोदी की मां को गाली वाले मामले से कुछ या कोई फायदा भाजपा को नहीं हुआ है क्योंकि सच अब कोई छिपा नहीं सकता और लोग बात बात पर पहले की तरह उत्तेजित नहीं होते. छिछोरेपन से आजिज आए लोगों को उस वक्त भी गुस्सा आता है जब भाजपाई नेता कैलाश विजयवर्गीय सोनिया गांधी को इटली वाली मम्मी और कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा नरेंद्र मोदी को नालायक कह देते हैं. राजनीति का यह वह दौर है जिसमें कुत्ता, सूअर, सांप, बिच्छू और सांड जैसे शब्द हर कोई हर कभी इस्तेमाल कर लेता है. लगता ऐसा है जैसे यह चुनाव प्रचार नहीं बल्कि कोई गाली गलोच प्रतियोगिता चल रही है जिसमें जो ज्यादा घटियापन दिखाएगा कुर्सी उसी को मिलने वाली है.

जबकि ऐसा है नहीं, मतदाता की चुप्पी ने क्या मोदी, क्या राहुल और क्या भाजपा, क्या कांग्रेस सभी को सूली पर टांग कर रखा है. कुछ घंटों बाद चुनाव प्रचार थमेगा और अधिसंख्य लोग वोट किसे दें का फैसला करेंगे, तब वे इस बात को भी ध्यान में रखेंगे कि किसने अशिष्ट शब्दों और भाषा शैली का कम से कम प्रयोग किया था और किसने हीरो बनने लोगों को झूठ बोलकर बहकाने की कोशिश की थी.

2.0 : आमिर और अर्नोल्ड करने वाले थे रजनीकांत और अक्षय वाला रोल

दक्षिण भारत के मशहूर फिल्मकार शंकर ने रजनीकांत को लेकर साइंस फिक्शन फिल्म ‘‘रोबोट’’ बनायी थी. इस फिल्म को मिली सफलता के बाद उन्होंने 2014 में इसका सिक्वल बनाने का निर्णय लिया. उस वक्त इस फिल्म में मुख्य प्रोटोगानिस्ट यानी कि नायक के तौर पर अभिनय करने के लिए आमिर खान और विलेन यानी कि खलनायक के किरदार में अभिनय करने के लिए हौलीवुड कलाकार अर्नोल्ड श्वार्जनेगर थे.

मगर बाद में बहुत कुछ बदला. अब 29 नवंबर को यह फिल्म ‘‘2.0’’ के नाम से सिनेमाघरों में पहुंच रही है, तो इसमें आमिर खान की जगह रजनीकांत और अर्नोल्ड श्वार्जनेगर की जगह पर अक्षय कुमार हैं. इस बदलाव पर फिल्म के निर्देशक शंकर कहते हैं-‘‘यह सच है कि जब हमने ‘रोबोट’ का सिक्वअल बनाना शुरू किया था, तो फिल्म में हीरो के तौर पर आमिर खान और खलनायक के तौर पर अर्नोल्ड श्वार्जनेगर से बात की थी. 2014 में इस फिल्म के लिए आमिर खान से बात करने की मुख्य वजह यह थी कि रजनीकांत सर का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था. इसलिए इस कठिन फिल्म को नहीं करना चाहते थे. लेकिन फिल्म ‘लिंगा’ की सफलता ने रजनीकांत सर के अंदर आत्मविश्वास जगा दिया. रजनीकांत सर ने इस फिल्म में वासीगरन चिट्टी का किरदार निभाया है. यह उनके लिए काफी कठिन फिल्म है. इसमें प्रोस्थैटिक मेकअप और काफी कठिन एक्शन सीन है. अब तीन साल बाद मुझे दर्शकों की प्रतिक्रिया का  बेसब्री से इंतजार है. वैसे मेरे साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ. ऐसा मेरे साथ हर फिल्म में होता रहा है. मैं फिल्म की शुरुआत में जिन कलाकारों से बात करता था, अंत में फिल्म दूसरे कलाकारों के साथ ही बनती रही हैं.’’

शंकर आगे कहते हैं- ‘‘जहां तक हौलीवुड फिल्म ‘द टरमिनेटर’ के अभिनेता अर्नोल्ड श्वार्जनेगर की जगह अक्षय कुमार को शामिल करने की बात है, तो सच यही है कि मैंने अर्नोल्ड श्वार्जनेगर से बात की थी. मगर उनके साथ हमारी बातचीत सही मुकाम तक नहीं पहुंच पायी, तब हमने अक्षय कुमार को जोड़ा. वास्तव में हमने बातचीत की. अर्नोल्ड श्वार्जनेगर ने शूटिंग के लिए हमारी मांग के अनुरूप तारीखें भी दे दी थी. लेकिन उनके यहां निर्माता व कलाकार के बीच जो अनुबंध होता है, वह हमारे भारतीय अनुबंध से काफी अलग है. इसलिए बात नहीं बनी.’’

वह आगे कहते हैं-‘‘वास्तव में हमारी फिल्म ‘2.0’ के निर्माता  लायका ‘काथी’ की रीमेक फिल्म के लिए अक्षय कुमार से बात कर रहे थे. तो जब अर्नोल्ड श्वार्जनेगर के साथ बात नहीं बनी, तो निर्माता ने ही अक्षय कुमार का नाम सुझाया. मुझे यह सुझाव सही लगा. मैंने अक्षय कुमार को कहानी सुनायी, तो वह तैयार हो गए. इसमें अक्षय कुमार को भी अपने किरदार के साथ न्याय करने के लिए हर दिन प्रोस्थैटिक मेकअप के लिए चार घंटे देने पड़ते थे. फिर 12 किलो वजन की पोशाक पहन कर गर्मी में शूटिंग करनी पड़ी. उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है.’’

मिनटों में खोए हुए मोबाइल को ढूंढ निकालेगा यह टूल

अमेरिका के मोबाइल इंडस्ट्री ट्रेड ग्रुप सीटीआईए ने ‘स्टोलन फोन चेकर’ (चोरी या गुम हुए फोनसेट खोजने वाली डिवाइस) की शुरुआत की है. इसमें जीएसएमए डिवाइस चेक नाम का टेक्निकल टूल लगा हुआ है, जो यूजर्स को अमेरिका में स्मार्टफोन के गुम होने या चोरी होने की स्थिति में मदद करेगा. यूजर्स इस डिवाइस को एक दिन में पांच बार इस्तेमाल कर सकते हैं.

रिपोर्ट्स की मानें तो यह सर्विस वायरलेस इंडस्ट्री के साथ मोबाइल के खोने या चोरी होने के वास्तविक समय का पता लगाती है. ‘स्टोलन फोन चेकर’, इंटरनैशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिफायर (आईएमइआई) डिवाइस को देखने का काम करता है. आईएमइआई एक अनोखा कोड होता है जो प्रत्येक मोबाइल फोन में पाया जाता है.

आईफोन डिवाइस में यह कोड पीछे की तरफ प्रिंटेड होता है लेकिन दूसरी डिवाइसेज में यह मेन्यू सेटिंग में पाया जाता है. इस सर्विस के तहत एक स्मार्टफोन के 10 साल से ज्यादा के रिकॉर्ड को रखा जाता है, जिसमें फोन की हिस्ट्री, डिवाइस मॉडल इन्फर्मेशन और कैपेबलिटी की जानकारी शामिल है.

शादी से पहले हर लड़की की होती हैं ये 5 इच्छाएं

लड़का हो या लड़की शादी से पहले उनकी जिंदगी अलग होती हैं जो शादी के बाद पूरी तरह से बदल जाती हैं. शादी के साथ ही बदल जाते हैं उनके सपने और इच्छाएं, खासतौर पर लड़कियों को अपनी इच्छाओं को दफन करना पड़ जाता हैं.

आज हम आपको लड़कियों की उन इच्छाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो शादी से पहले वे अपने लिए संजोकर रखती हैं और उनको पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश करती हैं. तो आइये जानते हैं लड़कियों की इन इच्छाओं के बारे में.

पार्टनर से प्यार की उम्मीद

शादी से पहले हर लड़की यही सोचती है कि उसका जीवनसाथी उससे बेहद प्यार करें. वह केयरिंग, ईमानदार और बेहद रोमांटिक स्वभाव का हो.

चाहती है सम्मान

लड़कियां भले ही ये बात न कहे लेकिन वह हमेशा चाहती हैं कि उनका होने वाला पार्टनर उन्हें उतनी ही रिस्पेक्ट दे जितनी वो खुद उससे चाहता है. सिर्फ पार्टनर ही नहीं, वह चाहती हैं कि हर व्यक्ति उसे सम्मान की नजर से देखें.

कुछ कर दिखाने की इच्छा

हर लड़की अपने माता पिता के लिए कुछ करना चाहती है. वह चाहती है कि शादी से पहले अपने माता-पिता के सम्मान को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश करें. इसके लिए वह हर मुमकिन से मुमकिन कोशिश भी करती है.

आत्मनिर्भर बनना

बेशक लड़कियां छोटी-छोटी बात को लेकर डर जाती हो लेकिन अपने लिए स्टैंड लेने से वह कभी पीछे नहीं हटती. हर लड़की चाहती है कि वह खुद के साथ-साथ दूसरों के लिए भी स्टैंड ले सके और आत्मनिर्भर बनें.

ढेर सारी शौपिंग करना

शौपिंग करना तो हर लड़की का शौक होता है लेकिन कुछ लड़कियां अपने ब्वॉयफ्रैंड के पैसों पर शौपिंग करने की इच्छा रखती है.

‘स्पाइसी कोर्न’ का ये स्वाद आप को हमेशा रहेगा याद

सामग्री

1 1/4 कप उबले हुए मीठी मकई के दाने
3/4 कप उबले हुए हरे मटर
1 कप कटे हुए टमाटर
2 टेबलस्पून घी
1/2 कप दुध
1/2 टी-स्पून शक्कर
नमक स्वाद अनुसार

पीसकर मुलायम पेस्ट बनाने के लिये

5 लहसुन की कलियां
1 कप कटे हुए प्याज़
7 सूखी कश्मीरी लाल मिर्च , तोड़ी हुई
2 टी-स्पून खड़ा धनिया
1 टी-स्पून ज़ीरा
छोटा दालचीनी का टुकड़ा
2 लौंग

विधि

टमाटर को मिक्सर में पीसकर मुलायम प्युरी बना लें. एक तरफ रख दें.

कढ़ाई मे घी गरम करें और तैयार पेस्ट डालकर मध्यम आंच पर 2-3 मिनट भुनें.

टमाटर का पल्प डालकर मध्यम आंच पर 2-3 मिनट के लिये पकाएं.

हरे मटर, मीठी मकइ के दाने और 3/4 कप पानी डालकर अच्छी तरह मिलायें और बीच-बीच में हिलाते हुए मध्यम आंच पर 1-2 मिनट के लिये पकाएं.

दूध डालकर अच्छी तरह मिलायें और बीच-बीच में हिलाते हुए मध्यम आंच पर 2-3 मिनट के लिये पकाएं.

अब शक्कर और नमक डालकर अच्छी तरह मिलायें और मध्यम आंच पर 1 मिनट के लिये पकाएं.

गरमा गरम सर्व करें.

 

घर में बनाएं आटे का स्वादिष्ट ‘मालपुआ’

सामग्री
1 कप गेहूं का आटा
1/2 कप शक्कर
1/2 टीस्पून दरदरी पीसी हुई कालीमिर्च
1 टेबलस्पून सौंफ
घी – तलने के लिए
विधि
  1. एक गहरे नौन-स्टिक पैन में शक्कर और 1 कप पानी को मिलाकर, मध्यम आंच पर, लगातार हिलाते हुए 3 मिनट के तक पका लें.
  2. मिश्रण को गहरे बाउल में डालें और पूरी तरह ठंडा करने के लिए रख दें.
  3. ठंडा करने के बाद, क्रश की हुई कालीमिर्च, सौंफ, गेहूं का आटा और 1/4 कप पानी डालकर अच्छी तरह मिलाकर फेंट लें और एक तरफ रख दें.
  4. एक चौड़े नौन-स्टिक पैन मे घी गरम करें, चम्मच भर घोल गरमा गरम घी में डालकर, तेज़ आंच पर उसके दोनों तरफ से सुनहरा होने तक तल लें.
  5. अब गर्मागर्म सर्व करें.

प्रतीक्षा में

मैं देखती रही बाट उस पल की,

कि तुम आओगे और दो पल ही सही

मेरे साथ बिताओगे.

कुछ मेरी सुनोगे कुछ अपनी सुनाओगे,

मेरे बिना कहे ही भांप लोगे,

मेरी आंखों के गिर्द स्याह घेरों को, और

मेरे बालों पर उभर आई श्वेत रेखाओं को.

मैं देखती रही बाट उस पल की

कि तुम आओगे पवन रथ पर सवार,

सुगंध का एक झोंका बन

हाथों में मोतिया की वेणियां लिए,

सजाने मेरे बालों में.

मैं देखती रही बाट

कि तुम आओगे बूंदों से भरे मेघ बन

और भिगो जाओगे मुझे अंतर्मन तक,

मैं सराबोर हो उमंगों से

खिल उठूंगी धरती पर पीली सरसों बन.

मैं देखती ही रही बाट मगर,

न तुम आए, न पवनरथ आया.

आया तो बस, एक संदेश

‘अब तुम मेरी बाट न देखना

मुझ से कोई प्रश्न न करना,

पीछे छूट गए जो रिश्ते

उन को फिर आवाज न देना.’

            -मृगनयनी पांडे

मूर्तियों की गुलामी आखिर कब तक

जो लोग बड़े खुश हो रहे थे कि औरतों की हमदर्दी की आड़ में उन्होंने मुसलमानों का तीन तलाक का हक सुप्रीम कोर्ट से छिनवा कर किला फतह कर लिया, उन्हें अब गहरा सदमा हो रहा है कि उन की चहेती उसी सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर में औरतों के प्रवेश को खुली छूट दिलवा दी. औरतों का सबरीमाला मंदिर में प्रवेश इसलिए वर्जित था कि वहां का देवता अविवाहित था और उस को रजस्वला औरतों को देख कर कुछकुछ होने न लगे इसलिए औरतों को जाने ही न दो.

कहानी जो भी हो पर सच तो यह है कि इस तरह के रीतिरिवाज औरतों को यह जताने को लागू किए जाते रहे हैं कि वे कमजोर हैं, कोमल हैं, पुरुषों पर आश्रित हैं और एक तरह से गुलाम हैं.

कभी इसी केरल में दलित औरतों को वक्ष दिखाने पर मजबूर किया जाता था, क्योंकि यह बताना था कि औरत, खासतौर पर दलित कमजोरों में कमजोर है और उस का अपना बदन अपना नहीं है दूसरों की कृपा पर है.

अब सबरीमाला में प्रवेश को ले कर कट्टरपंथी और उदारपंथी आमनेसामने हैं. सुप्रीम कोर्ट ने चूंकि अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की सहमति दे दी है, लिहाजा राज्य सरकार किसी भी कीमत पर यह फैसला लागू करने को तैयार नहीं.

वैसे सुप्रीम कोर्ट कई देशों में कई मामलों में धर्म की हठ के आगे नहीं झुकी है. पिछला फैसला बिलकुल सही है. इसे लागू करना कठिन होगा पर यदि कट्टरपंथी औरतों को रोकें तो राज्य सरकार को कानून व्यवस्था का हवाला दे कर हरेक की, पुरुषों की भी ऐंट्री बंद कर देनी चाहिए.

असल में तो धर्म का धंधा इस देश की जड़ में लगा घुन है. यह देश को बुरी तरह खा रहा है. लगता है कि हम जी ही रहे हैं धर्म की खातिर. धर्म हमें सही मार्ग नहीं दिखाता, सही नियंत्रित नहीं करता, हमें गुलाम बना कर रखता है.

सबरीमाला में जाने के नाम पर जिस तरह के कपड़े पहनने पड़ते हैं, जिस तरह के अनुष्ठान करने पड़ते हैं, जिस तरह पैदल चलना पड़ता है, जिस तरह की गंद फैलाई जाती है, सब साफ  करता है कि धर्म जिंदा रहे इसलिए भक्त जिंदा है.

इस तरह के मंदिर जो भेदभाव और आम भक्त को कंट्रोल करते हैं, असल में बंद ही रहने चाहिए. वैसे सभी धर्म एक जैसे हैं, जो भक्तों

को लूटते हैं, मरवाते हैं पर हिंदू धर्म तो सैकड़ोंहजारों देवीदेवताओं की फौज के साथ पूरे देश पर शासन करता है.

हमें 1947 में कोई आजादी नहीं मिली. हम गोरे राजाओं के चंगुल से निकल कर मूर्ति राजाओं के हाथों में फंस गए हैं.

हथियारों के लाइसेंस का बड़ा फर्जीवाड़ा

राजस्थान के आतंकवाद निरोधक दस्ते ‘एटीएस’ के एडीजी उमेश मिश्रा जयपुर स्थित अपने औफिस में बैठे थे, तभी उन्हें सूचना मिली कि राज्य में बड़े पैमाने पर अवैध हथियार खरीदनेबेचने और फर्जी आर्म्स लाइसेंस बनाने का कारोबार चल रहा है. यह गिरोह 10 साल पुराने लाइसेंस को नया करा कर पुलिस से भी सत्यापित करा लेता है. लेकिन संबंधित थाने में हथियारों को दर्ज नहीं कराया जाता.

ये लाइसेंस जम्मूकश्मीर और नागालैंड से बनवाए जाते हैं. सैकड़ों लोग ऐसे भी हैं, जो लाइसेंस लेने के लिए फर्जी तरीके से सेना और बीएसएफ के जवान बन गए हैं.

यह बात मई, 2017 महीने की है. सूचना महत्त्वपूर्ण थी. उमेश मिश्रा ने एटीएस के मातहत अधिकारियों को बुला कर विचारविमर्श किया और एटीएस के आईजी बीजू जौर्ज जोसफ व एसपी विकास कुमार के निर्देशन और एडिशनल एसपी बरजंग सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर श्याम सिंह रत्नू, मनीष शर्मा, राजेश दुरेजा, कामरान खान और प्रदीप सिंह को शामिल किया गया.

एटीएस की उदयपुर इकाई के इंसपेक्टर श्याम सिंह रत्नू लाइसेंस बनाने वाले गिरोह के बारे में सूचनाएं जुटाने लगे. उमेश मिश्रा ने इस औपरेशन का नाम रखा था- ‘जुबैदा.’ गोपनीय तरीके से ‘औपरेशन जुबैदा’ की शुरुआत कर दी गई. पुलिस टीमें जम्मू और पंजाब के अबोहर में भेजी गईं.

पुलिस जांच में जुटी थी, तभी उदयपुर के एक आदमी ने एटीएस मुख्यालय को सूचना दी कि अजमेर के जुबेर ने लाइसेंस बनाने और हथियार मुहैया कराने के लिए उस से 12 लाख रुपए लिए हैं. जबकि हथियार और लाइसेंस संदिग्ध नजर आ रहे हैं.

उस बीच एटीएस की टीम को इसी जुबेर द्वारा मध्य प्रदेश के देवास शहर में भी हथियारों की खरीदफरोख्त की जानकारी मिली. एटीएस की टीम ने फर्जी लाइसेंस और अवैध हथियार करोबारियों को रंगेहाथ पकड़ने के लिए जुबेर का मोबाइल नंबर हासिल कर के फर्जी ग्राहक के माध्यम से अवैध हथियार और लाइसेंस दिलवाने का सौदा कराया. जुबेर ने इस के लिए सिरोही बुलाया.

जुबेर के बुलाने पर पुलिस टीम सिरोही पहुंच गई. जहां जुबेर उन्हें मिला. उस ने 2 लाख रुपए का चैक और 30 हजार रुपए नकद ले कर 6 हथियार उन्हें सौंप दिए. इसी बीच टीम ने उसे पकड़ लिया. उसे जयपुर ले जा कर पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस के अजमेर स्थित मकान पर बड़ी संख्या में फर्जी आर्म्स लाइसेंस और अवैध हथियार रखे हुए हैं.

जुबेर से मिली जानकारियों के आधार पर एटीएस की टीमों ने अबोहर के विशाल आहूजा और अजमेर के रहने वाले गणपत सिंह रावत को गिरफ्तार किया. अगले दिन एटीएस टीम ने जम्मू के रहने वाले राहुल ग्रोवर और पाली निवासी भारत सिंह को गिरफ्तार किया. पुलिस ने इन से करीब 700 आर्म्स लाइसेंस बरामद किए. राहुल ग्रोवर ने अवैध लाइसेंसों की बदौलत करोडों रुपए कमाए थे. जम्मू में उस का आलीशान फ्लैट और कई गाडि़यां थीं.

इस के बाद एडीजी उमेश मिश्रा ने अजमेर के जिला कलेक्टर और एसपी को वहां के हथियार डीलर वली मोहम्मद का रिकौर्ड चैक करने, स्टौक की जानकारी लेने और प्रविष्टियों की जांच करने के लिए पत्र लिखा.

राजस्थान एटीएस ने जम्मूकश्मीर के होमकमिश्नर को पत्र लिख कर गृह विभाग में सन 2001 के बाद तैनात अधिकारियों की सूची और उन की हैंडराइटिंग के नमूने मांगे.

जम्मूकश्मीर के गृह विभाग ने सभी जिला कलेक्टरों से उन लोगों का पूरा ब्यौरा मुहैया कराने और तस्दीक कराने को कहा, जिन्होंने अपने हथियार लाइसेंस आल इंडिया लाइसेंस में परिवर्तित कराने के लिए अनुरोध पत्र दिया था.

यह बात भी सामने आई कि दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल ने सन 2013 में जम्मूकश्मीर पुलिस को हथियार लाइसेंसों के फर्जीवाडे़ की आशंका जता कर चेताया था. दिल्ली पुलिस ने बताया था कि डोडा व रामबन जिले में सुरक्षाबलों के जवानों के नाम पर फर्जी लाइसेंस बनवाए गए हैं.

दूसरी ओर एटीएस ने 21 सितंबर को मध्य प्रदेश के देवास शहर में मालवा गन हाउस के मालिक जाफर को गिरफ्तार किया. जयपुर से गई टीम ने जाफर की गिरफ्तारी से पहले कई दिनों तक उस की दुकान का सारा रिकौर्ड खंगाला तो पता चला कि जम्मूकश्मीर से बने अवैध हथियार लाइसेंसों पर उस ने 50 से ज्यादा हथियार बेचे थे.

इस मामले में एटीएस जाफर के पिता प्यारे मोहम्मद की भूमिका की भी जांच कर रही है. उस से पूछताछ में पता चला कि जुबेर उस का रिश्तेदार है. जाफर ने फर्जी लाइसेंसों पर जुबेर को हथियार सप्लाई किए थे. जुबेर ने ये हथियार जम्मूकश्मीर से फर्जी लाइसेंस बनवाने वाले व्यापारियों, प्रौपर्टी कारोबारियों और बदमाशों को बेचे थे.

आगे की जांच में पता चला कि जम्मूकश्मीर की तरह नागालैंड के दीमापुर से भी हथियारों के फर्जी लाइसेंस बनवाए गए हैं.

इस पर उदयपुर के एसपी राजेंद्र प्रसाद गोयल ने एएसपी सुधीर जोशी के नेतृत्व में एक टीम बनाई. जिस ने शराब कारोबारी डूंगरपुर निवासी विजय चौबीसा, शराब और होटल व्यवसाई बांसवाडा निवासी सुरेंद्र खत्री व टैक्टर पार्ट्स व्यवसाई बांसवाड़ा निवासी हरसी खन्ना से 3 पिस्तौलें एवं 44 कारतूस बरामद किए.

इन लोगों ने पुलिस को बताया था कि सीकर निवासी धर्मवीर सिंह शेखावत का बांसबाड़ा में रौयल्टी व शराब का कारोबार था. कारोबार के दौरान ही वे धर्मवीर के संपर्क में आए थे. धर्मवीर ने ही मोटी रकम ले कर उन्हें नागालैंड के दीमापुर से लाइसेंस बनवा कर दिए थे. डूंगरपुर के शराब कारोबारी विजय चौबीसा से पूछताछ में पता चला कि धर्मवीर सिंह ने कई अन्य लोगों से मोटी रकम ले कर नागालैंड से लाइसेंस बनवाए थे.

इस के बाद पुलिस ने बांसवाड़ा निवासी धर्मेंद्र तेली, बांसवाडा के ही राजेंद्र कुमार बसेर, सीकर निवासी चुन्नीलाल कलाल, जयपुर के मुहाना निवासी विक्रम सिंह शेखावत, सीकर के अमरजीत सिंह शेखावत व सीकर के धर्मवीर सिंह शेखावत से अलगअलग पूछताछ की.

इन से 7 पिस्तौलें, 3 रिवाल्वर और 12 बोर की एक बंदूक मय लाइसेंस तथा बड़ी मात्रा में कारतूस बरामद की.

पुलिस ने धर्मवीर सिंह शेखावत को गिरफ्तार कर लिया. उस ने पुलिस को बताया कि खुद का लाइसेंस सीकर के श्रीमाधोपुर तहसील के गांव पृथ्वीपुरा निवासी केसर सिंह के जरिए बनवाया था. जबकि दूसरे लोगों के लाइसेंस भंवरलाल ओझा के मार्फत बनवाए थे.

उदयपुर पुलिस ने भंवरलाल ओझा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सन 1977 से नागालैंड में रहता था. सन 2014 में जब वह नागालैंड के दीमापुर में ठेकेदारी करता था, तब वहां कलेक्टर औफिस में जाने के दौरान क्लर्क संजय पांडे और मौखिय अंकल और उन के एजेंट उत्तम छेत्री, मोहम्मद सिराज आदि से जानपहचान हो गई.

वह इन्हीं लोगों के माध्यम से पैसे दे कर पता नागालैंड का बता कर संबंधित व्यक्ति का स्थाई या अस्थाई लाइसेंस बनवा कर दे देता था. लाइसेंस बनवाने के लिए वह दीमापुर कलेक्टरेट के बाबू व एजेंट को 70-80 हजार रुपए देता था. जबकि लाइसेंस बनवाने वाले से 3-4 लाख रुपए लिए जाते थे. उस ने नागालैंड से सवा सौ से ज्यादा लाइसेंस बनवाए थे.

पूछताछ में मिली जानकारियों के आधार पर उदयपुर से इंसपेक्टर शैतान सिंह और हनवंत सिंह की टीम ने जयपुर और सीकर जा कर हथियारों की दुकान पर छापे मारे और नागालैंड के बने लाइसेंसों पर हथियार खरीदने वाले लोगों की जांच कर सूची तैयार की.

वहीं इंसपेक्टर चांदमल के नेतृत्व में एक टीम नागालैंड गई, जहां अवैध रूप से बनवाए गए लाइसेंसों के रिकौर्ड की जांच की.

जांच में पता चला कि डूंगरपुर निवासी विजय चौबीसा, उदयपुर के खैरवाडा निवासी चुन्नीलाल कलाल व उदयपुर के ऋषभदेव निवासी अनंत कुमार कोठारी के नाम से नागालैंड से कोई हथियार लाइसेंस जारी नहीं हुआ था.

पूछताछ में तीनों ने बताया कि नागालैंड में कभी नहीं रहे थे. इस का मतलब तीनों के नाम से जारी हथियार लाइसेंस पूरी तरह फर्जी थे. भंवरलाल ओझा और फर्जी हथियार लाइसेंस धारक अनंत कुमार कोठारी को गिरफ्तार कर लिया गया.

यह भी पता चला कि हथियार विक्रेता फर्म जयपुर में बड़ी चौपड़ स्थित शिकार गन स्टोर एवं कोलकाता में चौरंगी रोड नेहरू बाजार स्थित जे. विश्वास कंपनी ने भी मिलीभगत कर के इन फर्जी लाइसेंसों पर हथियार बेचे.

इन में जयपुर के शिकार गन स्टोर ने 309 लोगों, जयपुर में ही चांदपोल स्थित राजस्थान गन हाउस ने 41 लोगों व सीकर के सीकर गन स्टोर ने 168 लोगों को नागालैंड के विभिन्न स्थानों से बने लाइसेंसों के आधार पर हथियार एवं कारतूस बेचे. पुलिस ने इन सभी के रिकौर्ड जब्त किए हैं.

धर्मवीर ने अपने रिश्तेदार जयपुर में एक निजी बैंक के मैनेजर विक्रम सिंह शेखावत के खिलाफ पुलिस में प्रकरण दर्ज होने के बावजूद भंवरलाल ओझा के माध्यम से नागालैंड से उस का लाइसेंस बनवा दिया था.

धर्मवीर सिंह और भंवरलाल ने कई लोगों के रिटेनर लाइसेंस भी बनवाए हैं. नागालैंड से लाइसेंस बनवाने वाले अधिकांश लोग शराब, मार्बल और प्रौपर्टी के कारोबार से जुड़े हुए हैं. इन में कई लोगों का आपराधिक रिकौर्ड भी है.

इस बीच एक नया खेल हो गया. उदयपुर पुलिस द्वारा गिरफ्तार भंवरलाल ओझा को छुड़वाने के नाम पर उस के घर वालों से 4 लोगों ने 32 लाख रुपए ठग लिए. रुपए देने के कई दिनों बाद भी जब भंवरलाल नहीं छूटा तो उस के भाई इंदरलाल ओझा ने उदयपुर के थाना प्रतापनगर में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के बाद पुलिस ने गुजरात के सूरत निवासी संपत, धरियावद निवासी राजकुमार आचार्य व उदयपुर निवासी अनिल आचार्य को गिरफ्तार किया. इन से 20 लाख रुपए भी बरामद किए गए. इस मामले में एक आरोपी लोकेश आचार्य फरार हो गया. उस के पास से 12 लाख रुपए बताए जाते हैं. पुलिस उस की तलाश कर रही है.

इन चारों ने इंदर से लिए 32 लाख रुपए आपस में बांट लिए थे. लोकेश मंत्रियों के नाम पर पहले भी ठगी कर चुका है. एक बार वह पकड़ा भी जा चुका है. इन चारों ने इंदर को झांसा दिया था कि उन के पुलिस के बड़े अफसरों से संबंध हैं. वे भंवरलाल का नाम लाइसेंस के मामले से निकलवा देंगे.

एटीएस ने जम्मू निवासी राहुल ग्रोवर के सहयोगी दीपक गुलाटी को भी गिरफ्तार किया था. राहुल के अधिकांश फर्जी लाइसेंस बनाने में दीपक की भूमिका थी. राहुल उसे प्रति लाइसेंस कमीशन देता था.

जम्मूकश्मीर से फर्जी लाइसेंस बनवाने में एटीएस ने अजमेर के प्रौपर्टी व्यवसाई विजय कृष्ण सराधना को भी गिरफ्तार किया है.

एटीएस ने जम्मूकश्मीर के फर्जी लाइसेंस बनवा कर हथियार खरीदने के मामले में श्रीगंगानगर के कपड़ा व्यवसाई नरेंद्र कुमार, डिस्ट्रीब्यूटर सुमित, राजसमंद के प्रौपर्टी व्यवसाई राजेश कोठारी और डूंगरपुर के मार्बल व्यापारी का बेटा हेमंद्र कलाल शामिल थे.

पुलिस ने इन से हथियार भी बरामद किए. हेमेंद्र कलाल के पास कई लग्जरी गाडि़यां भी मिलीं. इस में खास बात यह रही कि गिरोह ने हेमेंद्र का हथियार लाइसेंस तभी बनवा दिया था, जब वह नाबालिग था.

एटीएस ने जम्मूकश्मीर से फर्जी हथियार लाइसेंस बनवाने के मामले में उदयपुर के होटल संचालक अजमल खान को गिरफ्तार किया है. उस से एक पिस्टल बरामद की गई है. अजमल ने ढाई लाख रुपए में लाइसेंस बनवाया था.

इस के बाद एटीएस ने 6 नवंबर को अजमेर के प्रौपर्टी व्यवसाई सांवरलाल गुर्जर, उदयपुर के ट्रैवल एजेंसी संचालक अब्दुल सलाम खान एवं राजसमंद के मार्बल व्यवसाई असलम मोहम्मद सिलावट को गिरफ्तार किया. इन तीनों ने भी जुबेर से 2-3 लाख रुपए में जम्मूकश्मीर से लाइसेंस बनवाए थे.

एटीएस की जांच में सिरोही के मुकेश मोदी और रोहित मोदी द्वारा भी इसी गिरोह से हथियार लाइसेंस बनवाने की बात सामने आई थी. एटीएस ने दोनों को नोटिस दे कर पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन उन्होंने हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली.

8 नवंबर को एटीएस ने अहमदाबाद के एक अरबपति व्यवसाई अनस खान को भी इसी मामले में गिरफ्तार किया है. उस ने खुद को बीएसएफ का जवान बता कर फर्जी लाइसेंस बनवाया था. उस ने मध्य प्रदेश के देवास निवासी जफर और उस के पिता प्यारे मोहम्मद के मार्फत अजमेर निवासी जुबेर से 4 लाख रुपए में जम्मूकश्मीर के कुपवाड़ा से लाइसेंस बनवाया था.

उदयपुर के नामी बिल्डर और प्रौपर्टी व्यवसाई निर्मल नट्टा ने खुद को आर्मी में राइफलमैन बता कर लाइसेंस बनवाया था. उस के लाइसेंस पर निर्मल की सेना की वर्दी पहने फोटो भी लगी थी. एटीएस निर्मल को गिरफ्तार कर चुकी है.

अजमेर के नामी ज्वैलर संजय शर्मा ने भी खुद को बीएसएफ का सिपाही बता कर फर्जी लाइसेंस बनवा कर उस के आधार पर रिवाल्वर खरीदी थी.

उदयपुर के प्रौपर्टी व्यवसाई अरुण नागदा ने खुद को बीएसएफ का सिपाही और आर्मी पोस्टऔफिस का पता बता कर लाइसेंस बनवाया था. राजसमंद के व्यापारी दीपेश ने भी खुद को बीएसएफ का सिपाही बता कर जम्मूकश्मीर में तैनाती और एपीओ 56 के पते पर लाइसेंस बनवाया था.

निंबाहेड़ा के लोकेश ने खुद को जम्मूकश्मीर में बीएसएफ पोस्ट पर तैनात सिपाही व आर्मी डाकघर का पता बता कर लाइसेंस बनवाया था. पाली के मोस्टवांटेड हिस्ट्रीशीटर जब्बर सिंह ने खुद को बीएसएफ में हैडकांस्टेबल और आर्मी पोस्ट औफिस का बता कर लाइसेंस बनवा लिया था.

खुद को बीएसएफ का जवान बता कर लाइसेंस बनवाने वाले इन लोगों ने 100 रुपए के स्टांप पेपर पर झूठे शपथपत्र पेश किए थे. इन्होंने लाइसेंस लेने की वजह खुद की सुरक्षा बताई थी.

जांच में पता चला है कि जम्मूकश्मीर के 3 जिलों में राजस्थान के करीब 5 हजार लोगों के हथियार लाइसेंस सैनिकों के नाम से बनवाए गए थे. लाइसेंस बनवाने वालों ने खुद को सेना का जवान बताया था.

एटीएस ने इन की रिपोर्ट बना कर दिल्ली सेना मुख्यालय को भेजी है. इस सूची के साथ यह जानकारी मांगी गई है कि ये लोग वास्तव में सेना में हैं या नहींऔर क्या कभी इन की जम्मूकश्मीर में तैनाती रही है.

जम्मूकश्मीर में तैनात सैनिकों को यह विशेषाधिकार है कि वे सेना में रहते हुए वहां से लाइसेंस बनवा सकते हैं. गिरोह ने इसी बात का फायदा उठा कर राजस्थान के हजारों लोगों को वहां तैनात बता कर फर्जी लाइसेंस बनवा दिए हैं.

अधिकांश लाइसेंसों में आर्मी पोस्टऔफिस एपीओ 56 का पता दिया गया है. आर्मी पोस्टऔफिस की सुरक्षा कारणों से सिविल पुलिस जांच नहीं कर सकती.

जम्मूकश्मीर में 3 साल तक तैनात रहने वाले जवान रिटायर होने के बाद भी जम्मूकश्मीर से लाइसेंस बनवा सकते हैं. गिरोह ने जम्मू के जिला कलेक्टरों, गृहसचिव, एडिशनल गृहसचिव व कमांडेंट की फर्जी मोहरें बनवा रखी थीं.?

कैसे बनते थे फर्जी हथियार लाइसेंस

हथियारों के फर्जी लाइसेंस बनवाने एवं उन लाइसेंसों पर अवैध रूप से हथियार बेचने की इस पूरी कहानी में मुख्य तौर पर 3 किरदार सामने आए हैं. इन में एक है अजमेर का रहने वाला मोहम्मद जुबेर, दूसरा भंवरलाल ओझा और तीसरा जम्मू का रहने वाला राहुल ग्रोवर.

भंवरलाल ओझा नागालैंड के हथियार लाइसेंस बनवाता था जबकि जुबेर व राहुल ग्रोवर जम्मूकश्मीर से लाइसेंस बनवाते थे. इस काम से राहुल ग्रोवर ने करोड़ों रुपए कमाए.

आजकल सरकारी कानून इतने कठोर हैं कि राजस्थान सहित उत्तरी भारत के राज्यों में लाइसेंस बनवाना आसान नहीं है. जुबेर जैसे लोग इसी बात का फायदा उठाते थे. वे 2 से 5 लाख रुपए के बीच बात तय कर के लोगों को हथियार लाइसेंस मुहैया करवा देते थे. इस के लिए यह गिरोह कई तरह के फर्जीवाड़े करता था.

जांच में सामने आया है कि जम्मूकश्मीर के 3 जिलों से ही राजस्थान के करीब 5 हजार लोगों के हथियार लाइसेंस सैनिकों के नाम से बनाए गए.

फर्जी लाइसेंस बनवाने वाले इस गिरोह से जम्मू के जिला कलेक्टरों, गृह सचिव, एडिशनल गृह सचिव आदि के पदनाम की फर्जी मोहरें व लेटरहैड भी बरामद हुए.

भंवरलाल ओझा ने 40 साल से नागालैंड में अपनी रिहायश बना रखी है. वहां पर वह ठेकेदारी समेत कई दूसरे तरह के धंधे करता है. ठेकेदारी की वजह से उस का दीमापुर जिला कलेक्टर के कार्यालय में आनाजाना लगा रहता था. करीब 4-5 साल पहले उस के वहां के क्लर्क संजय पांडेय और गौखिय अंकल आदि से संपर्क हो गए थे.

उसी दौरान ओझा को पता चला कि कुछ पैसे खर्च कर के फर्जीवाड़े से हथियारों के लाइसेंस बन सकते हैं. वह इस बात से वाकिफ था कि राजस्थान में हथियार लाइसेंस हजारों आवेदकों में से किसी एक को ही मिल पाता है.

ओझा दीमापुर और जुन्हेबोटो कलेक्टर कार्यालय के क्लर्कों व उन के एजेंटों को करीब 70-80 हजार रुपए देता था.

यह एजेंट कलेक्टर कार्यालय के क्लर्क, डिप्टी कमिश्नर के हस्ताक्षर कर के ओझा को फर्जी लाइसेंस बनवा कर दे देते थे.

 -कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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