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2.0 : प्रिय उपभोक्ता, आपका रचनात्मक बैलेंस शून्य क्यों है

स्लीपिंग विद एनेमी. यानी जो आपका दुश्मन है, उसी के साथ मजबूरन सोने-रहने या सफर करने की दुविधा ही स्लीपिंग विद एनेमी कहलाती हैं. शंकर की मेगा-टेक अफेयर फिल्म 2.0 देखकर सबसे पहले इसी दुविधा से जूझना पड़ता है. एक तरफ यह फिल्म तकनीक/स्मार्टफोन के अतिप्रयोग के खिलाफ खड़ी है लेकिन वहीं दूसरी और इस फिल्म के निर्माण पक्ष के सारे स्तंभ तकनीकी दक्षता (vfx) पर टिके हैं.

एक और विरोधाभास है. आप सिनेमाहौल में घुसते ही जब तक शो-रील पर सरकारी विज्ञापन (यहां भी अक्षय कुमार पैडमैन के अवतार में दिखते हैं) चलते हैं, आप अपने मोबाइल के कीपैड पर उंगलियां दौड़ा रहे होते हैं, दुनिया जहां को बता रहे होते हैं कि…Hey guys.. I m watching 2.0 @ फलां थियेटर. फिर शो रील खत्म होती है और फिल्म के सेंसर सर्टिफिकेट के तुरंत बाद डौल्बी एटमोज के सुपर टेक्निकल साउंड पर ओपनिंग क्रेडिट 3D/4XD चश्मों के साथ देखने लगते हैं.

यानी फिल्म के स्टार्ट होने से खत्म होने तक आप 3-4 गैजेट्स से करीब 150 मिनट तक घिरे रहने के बाद फिल्म से यह संदेश लेकर जाते हैं कि तकनीक मनुष्यों को गुलाम बनाकर उनकी रचनात्मकता, सामजिक रिश्ते खत्म कर रही है और पक्षियों (मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडियेशन) को भी बेमौत मार रही है.

लोहे से लोहे की काट

खैर, फिल्म की ख़ूबसूरती भी यही कि लोहे को लोहे से ही काटा जाए. फिल्म के सीन में (जब चेन्नई से सारे मोबाइल गायब हो चुके हैं) एक बुजुर्ग कह रहा है कि अच्छा ही है कि स्मार्टफोन नहीं है. इन कुछ दिनों में मोबाइल के न होने से मैं अपने बच्चों के साथ खेल पाया हूं, बीवी से दो बातें कर पाया और दिनरात बजते रिंगटोंस के शोर से भी बचा रहा, लेकिन अब क्या करें फोन उस बीवी की तरह हो गए हैं जो न हों तो दिक्कत और हों तो खिचखिच.

हालांकि फिल्म का मैसेज बहुत साफ था, लेकिन तकनीकी दक्षता ही कई बार इस विषय से भटकाकर आपको फैंटेसी के संसार में ले जाती है. रजनीकांत का अतार्किक औरा, सीटीमार संवाद और हर फ्रेम में वर्चुअली मौजूद रहने की जिद जहां उनके फैन्स कम श्रद्धालुओं के लिए लौटरी सरीखी है, वहीं कुछ गंभीर दर्शकों को खीझ भी देती है.

जरा सोचिये दुनिया के किसी भी सिनेमैटिक हिस्ट्री में ऐसा नहीं होता होगा जहां एक कलाकार के एंट्री सीन को 5 मिनट के लाइट फ्रीज/पोज कर दिया जाए ताकि सिनेमहौल में बैठे दर्शक कुछ समय तक नाच गा सकें. एक्टर के कटबोर्ड/पोस्टर्स पर दूध, घी और फूल बरसा सकें. लेकिन 2.0 के साथ ऐसा हुआ. और यही सिनारियों बताता है कि हम इस देश में इतनी जल्दी मूर्ति पूजक या अंधभक्त क्यों बन जाते हैं.

रोबोट बनाम इंसान

खैर, फिल्म मोबाइल कंपनियों के बढ़ते लालच के खिलाफ एक ट्रांसफार्मर सरीखा संसार रचती है. जहां मशीनें ही मशीनों से लड़ रही हैं. इंसान सिर्फ तमाशबीन है. उपभोक्ता है. जिसका काम जेब में पैसे लेकर दुकानों की कतार पर हर वो सामान खरीदना है, जिसकी जरूरत शायद उसे है नहीं. मोबाइल में हजारों का बैलेंस भले हो लेकिन किताबों, पत्रिकाओं से दूर रहने, पढ़ने की आदत घटने और मानवीय संवाद घटने से हमारी रचनात्मकता का बैलेंस शून्य हो चुका है. मोबाइल के चलते फिजिकल कन्वर्सेशन बंद हो जाएगा तो रचनात्मकता खत्म हो जायेगी और फिर रचनात्मक की कमी से उत्पादकता प्रभावित होगी.

मजे की बात यह है कि इस फिल्म में इंसान वैचारिक तौर शून्य दिखते हैं और रोबोट (चिट्टी 2.0+3.0) अपने विकेड सेन्स औफ ह्यूमर और इंसानियत के साथ मौजूद है. यह सूक्ष्म चेतावनी है कि किस तरह हम ह्यूमन इंटरेक्शन खत्म कर किसी मशीन या कहें रोबोट की तरह बिहैव कर रहे हैं. न कोई फिजिकल स्पर्श और न कोई आत्मीय बातचीत. बस मोबाइल या मैक पर झुकी गर्दनें और स्क्रीन पर ताबड़तोड़ चलती उंगलियां. हम फिर भी चेंतेंगे, कहना मुश्किल है. पर इतना तय है कि नहीं चेते तो एक अकेली और दिमागी तौर पर बीमार जनरेशन छोड़ कर जाएंगे.

शंकर का Déjà vu

फिल्म पर्यावरण खासकर पक्षियों की घटते अस्तित्व की तरफ भी ध्यान देने पर जोर देती है. शंकर की फिल्मों का खास और आलोचनात्मक पक्ष यही है की उनकी हर फिल्म उन्हीं की निर्देशित पुरानी फिल्मों का Déjà vu (पूर्वाभास) देती है. जैसे विक्रम अभीनीत आई (I) की तरह  यहां भी फर्स्ट हाफ में 3-4  ग्रूसम मर्डर होते हैं, फिर बाद में यानी सेकेंड हाफ में उन किरदारों के ग्रे शेड्स उजागर होते हैं. क्लाइमेक्स में फिल्म अपिरिचत की तरह पर भारीभीड़ से भरे स्टेडियम में प्रोटेग्निस्ट का लम्बा मोनोलौग याद दिलाती है.

वहीं पक्षी राजन (अक्षय कुमार) का किरदार शंकर की पुरानी हिट फिल्म हिन्दुस्तानी के प्रोटेग्निस्ट (कमल हासन) का प्रतिबिम्ब लगता है जो समाज में फैली बुराई और उसके बहरेपन से तंग आकर हीरोइक इमेज से बाहर आकर विलेनियस विकल्प चुन रहा है. और फिल्म शिवाजी की तरह रजनीकांत (डा. वसीकरण/चिट्टी) का बार-बार मरना और जिंदा होना भी यहां रेफ्लेक्ट होता रहता है. फीमेल कैरेक्टर सर्फ ग्लैमरस फिलर्स होती हैं, उनकी हर फिल्म में, सो यहां भी हैं. हालांकि ये सब फार्मूले बुरे नहीं हैं और इस बार टेक्नीकल शील्ड में और ज्यादा उभर कर आते हैं.

फिल्म डब्ड वर्जन में है, लेकिन कुछ किरदार ‘हिन्दुस्तानी’ फिल्म की तरह तमिल के साथ हिन्दी में सिंक्ड्स संवाद बोलते हैं जिसे किरदारों की बनावटी बोलचाल से निजात मिलती है.

व्हेन ट्रांसफोर्मर्स लैंड्स चेन्नई

फिल्म के ग्रैड विजुल्स और vfx की बात सालों से हो रही थी और यह ओवरएस्टीमेट डिस्कशन को आप तभी समझ पाएंगे जब इसे सिनेमहौल में 3D/4XD या IMAX फोर्मेर्ट में देखेंगे. अगर लीक्ड या पाइरेटेड वर्जन है तो फिल्म देखने से बेहतर है कि PUBG या GTA खेल लें. समझदारी और ईमानदारी वाली बात यही है कि शंकर ने कभी यह दावा नहीं किया कि उनकी यह फिल्म हौलीवुड की साइंस फिक्शन या VFX लेवल को टक्कर देगी. क्योंकि यह नहीं देती है.

हां, इंडियन फिल्मों के संसार में यह अव्वल दर्जे की टेक्नीकल रिच फिल्म है और काफी समय तक रहनी चाहिए. लेकिन चूंकि भारत के दर्शकों को हौलीवुड की मार्वल्स और डीसी की अवेंजर्स, ट्रांसफोर्मर्स और अवतार सरीखे अनुभव एक्सप्लोर करने का मौका मिल चुका, सो यहां थोड़ा कमी खटकेगी. खासतौर से क्लाइमैक्स में फिल्म ट्रांसफोर्मर्स का सस्ता वर्जन सी लगने लगती है. लेकिन 3D/4XD  के चलते मजा पूरा आता है, इसलिए बेफिक्र रहें. क्योंकि चेन्नई और कैलिफोर्निया का अंतर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

अनाड़ी VS खिलाड़ी

फिल्म में गाने नहीं हैं, आधा गाना है जो जरूरी भी है. लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक आपकी हार्ट बीट को स्लीपिंग मोड पर एक सेकेण्ड के लिए भी नहीं जाने देता. ऐसे एक बैकग्राउंड रैप में खिलाड़ी और अनाड़ी शब्द सुनाई पड़ते हैं. यहां यों तो खिलाडी रजनी हैं लेकिन असली खिलाड़ियों के खिलाड़ी अक्षय कुमार थे, हैं और रहेंगे. सिर्फ उन्हीं का एक किरदार है जो फिल्म में भला किरदार लगता है. जिसका कोई उद्देश्य है. जो अपने फ्लैशबैक सीक्वेंस के जरिये नीरस एक्शनगेम बनती फिल्म में ह्यूमन और इमोशनल फील पैदा करता है.

रजनी हर फ्रेम में हैं तो अक्षय हर सीन को चुराते हैं. चूंकि फिल्म साऊथ इंडियन दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, लिहाजा थलाइवा रजनी हैं, लेकिन आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो पक्षी राजन की नेकनीयत के साथ. बाकि साथी कलाकारों में टेलीकौम मिनिस्टर Kalabhavan Shajohn  (जिन्हें दृश्यम में खुन्दकी पुलिस वाले के किरदार के लिए सराहना मिली थी) ही कौमिक रिलीफ लेकर आते हैं. बाकी तो खानापूर्ति के लिए हैं.

क्या आइरनी है!

हालांकि आइरनी देखिए कि जिस तकनीक के बेजा इस्तेमाल को फिल्म में विलेन बताया गया है वो हर साल दुनिया में फिल्म मेकर्स को चूना लगा रही है. गौरतलब है कि एक्टिव पायरेसी वेबसाइट तमिल रौकर्स ने रिलीज के बाद पूरी HD फिल्म साइट पर अपलोड कर दी. बावजूद इसके कि लीक को रोकने के लिए निर्माताओं की ओर से काफी तैयारी की गई थी. मेकर्स इस तरह की पायरेसी वेबसाइट की एक लिस्ट लेकर मद्रास हाई कोर्ट भी गए. यह खबर भी आई कि मद्रास हाईकोर्ट ने 37 इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (ISPs) को 12,000 वेबासाइट को ब्लौक करने के आदेश दे दिए हैं.

आखिर में फिल्म का महाबजट, महावीएफएक्स और रजनीमेनिया भूल जाइये और याद रखिए कि घोर मसाला फिल्म होने के बावजूद यह फिल्म आज हमें हमारे सबसे बड़े दुश्मन स्मार्टफोन की लत से आगाह करती है. यह एक वैश्विक मुद्दा है. फेसबुक, इन्स्टा, व्हाट्सएप, स्नैपचैट, ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्कींग साइट्स से अजनबी तो जुड़ रहे हैं लेकिन अपने पराये हो रहे हैं. रिश्तों मे दरार पड़ने लगी है.

इंटरनेट पर्सनलाइज्ड होने से हर हाथ में फोन है लेकिन कोई हाथ नहीं मिलाता. सब इमोजीज में हैंडशेक करते हैं. एक सर्वे के मुताबिक दुनिया भर में एक तिहाई रिश्ते सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से टूट रहे हैं. ऐसे में इस फिल्म की प्रासंगिकता काफी समय तक बरकरार रहेगी और सवाल भी कि हम आखिर कब मोबाइल के जाल से बाहर निकलकर फिर से किताबों, पत्रिकाओं की तरफ सजग, गंभीर और सटीक जानकारियों के लिए मुड़ेंगे और डिजिटल गलियों में फैली अफवाहों, चुटकुलों और अंधविश्वास के कचरे से निजात पाएंगे?

पावर बैंक लेने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

स्मार्टफोन हो या टैबलेट या अन्य गैजेट्स सभी की स्पेसिफिकेशन्स हर नए लौन्च के  साथ और पावरफुल नजर आती हैं. लेकिन इसके बाद भी इन सभी गैजेट्स का इस्तेमाल इतना बढ़ गया है की बैटरी के मामले में ये पीछे रह जाते हैं. इनका सही तरीके और सही समय पर इस्तेमाल किया जा सके इसके लिए पावर बैंक की जरुरत जरूर पड़ती है.

पावर बैंक्स यह सुनिश्चित करते हैं की आपके फोन की बैटरी ड्रेन न हो. इसकी वजह से आप जुड़े रह पाते हैं. इसी कारण पावर बैंक का बाजार भी दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है. इसलिए पावर बैंक बनाने वाली कंपनियां भी इसके डिजाइन से लेकर कलर, साइज, क्वालिटी सभी पर ध्यान दे रही हैं. हालांकि, इतनी बड़ी रेंज में उपलब्ध पावर बैंक्स में से सही का चयन करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में आपकी मदद करने के लिए हम आपको कुछ टिप्स देने जा रहे हैं. पावर बैंक खरीदने से पहले इन बातों का ख्याल रखने पर आप अपने लिए बेहतर पावर बैंक का चयन कर पाएंगे.

कैपेसिटी: ऐसे पावर बैंक का चयन करें जो आपके फोन की बैटरी से दोगुनी बैटरी का हो. यह कुछ सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है. इसी के साथ इस बात का भी ध्यान रखें की आपके पावर बैंक का आउटपुट वोल्टेज आपकी डिवाइस से मैच करता हो. अगर चार्जर का आउटपुट वोल्टेज कम है तो वो आपकी डिवाइस के साथ काम नहीं करेगा.

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क्वालिटी और सेफ्टी विकल्प: पावर बैंक लेने से पहले उसकी बिल्ड क्वालिटी का भी ध्यान रखें. पावर बैंक की ओवरऔल क्वालिटी उसकी परफौरमेंस के साथ-साथ उसकी स्पीड और एनर्जी ट्रांसफर भी निर्धारित करती है. लो क्वालिटी का पावर बैंक आपके डिवाइस का गलत तरीके से चार्ज करने के साथ-साथ उसको खराब भी कर सकता है.

कनेक्टिविटी विकल्प और यूएसबी चार्जिंग: किसी भी पावर बैंक का मुख्य फीचर उसकी फ्लेक्सिबिलिटी है. फ्लेक्सिबिलिटी से यहां मतलब है की आपका पावर बैंक एक समय में कितनी डिवाइसेज चार्ज कर सकता है. बाजार में ऐसे कई पावर बैंक उपलब्ध हैं जो अलग-अलग तरह के कनेक्टर्स के साथ आते हैं. ये पावर बैंक को मल्टीपल मोबाइल गैजेट्स से कनेक्ट करने का काम करते हैं, जैसे की स्मार्टफोन्स, टैबलेट्स और कैमरा आदि.

कनेक्टमल्टीपलर होने से आप एक समय में एक से ज्यादा गैजेट को चार्ज कर सकते हैं. मल्टीपल प्लग्स के अलावा कुछ पावर बैंक्स में बिल्ट-इन यूएसबी चार्जिंग केबल्स भी आती हैं. इन्हें पावर बैंक में ही फोल्ड कर के स्टोर किया जा सकता है. इससे आपको चार्जिंग केबल भूल जाने या गुम हो जाने की भी चिंता नहीं रहेगी.

एलईडी इंडीकेटर्स: पावर बैंक में एलईडी इंडिकेटर लाइट्स काफी चीजों के काम आ सकती हैं, जैसे की बैटरी लेवल चेक करने के लिए और चार्जिंग स्टेटस का पता लगाने के लिए आदि. इसलिए संभव हो तो आपको एलईडी इंडिकेटर लाइट्स वाला पावरबैंक लेना चाहिए.

सुरक्षा: हाई ग्रेड लिथियम पौलीमर बैटरी वाला पावर बन ही लें, सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है. कई यूजर्स अपने फोन को रात को सोते समय चार्ज करते हैं. इससे कई परेशानियां जुडी होती हैं. पावर बैंक में लगे लो क्वालिटी के पावर सेल्स ओवरचार्जिंग के कारण फट भी सकते हैं. इससे आपकी डिवाइस डैमेज होने के साथ-साथ कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.

इसलिए यही सुझाव दिया जाता है की ऐसा पावर बैंक लें, जिसमें हाई ग्रेड लिथियम पौलीमर बैटरी हो. एक अच्छा पावर बैंक डिवाइस को हमेशा सुरक्षित रखता है. कई पावर बैंक्स शार्ट सर्किट के विरुद्ध बिल्ट-इन प्रोटेक्शन के साथ आते हैं. ऐसे पावर बैंक्स थोड़े महंगे जरूर हो सकते हैं, लेकिन यह इन्वेस्टमेंट आपके अच्छे के लिए ही होगी.

मेरा स्वास्थ्य मेरे लिए काफी जरूरी है : अक्षय कुमार

फिल्म ‘सौगंध’ में मुख्य किरदार निभाकर फिल्म इंडस्ट्री में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता अक्षय कुमार का शुरुआती दौर अधिक सफल नहीं था. उन्होंने ताईक्वान्ड़ो में ब्लैक बेल्ट हासिल करने के बाद थाईलैंड में मार्शल आर्ट की पढ़ाई की है. इसलिए कई फिल्मों में उन्हें पहले मार्शल आर्ट के प्रशिक्षक के रूप में काम मिला. बाद में खिलाड़ी सीरीज ने उन्हें बौलीवुड का ‘खिलाडी कुमार’ बना दिया और उन्होंने सफलता की सीढ़ी चढ़नी शुरू की और तबसे लेकर आजतक उन्हें कभी मुडकर पीछे देखना नहीं पड़ा.

आज वे एक्टर के अलावा निर्माता भी बन चुके हैं और कई सफल फिल्में भी की हैं. उनके इस सफर में साथ दिया अभिनेत्री ट्विंकल खन्ना ने जिनसे उनके दो बच्चे आरव और नितारा हैं. वे अपनी इस यात्रा से बहुत खुश हैं और इसे अपने परिवार के साथ सेलिब्रेट करते हैं. अलग-अलग फिल्मों को करना वे पसंद करते हैं और इसी कड़ी में उन्होंने फिल्म ‘2.0’ की है. उनसे मिलकर बात करना रोचक था, पेश है अंश.

प्र. इस फिल्म को करने की खास वजह क्या है?

ये एक अलग तरह की फिल्म है जिसमें तकनीक के साथ एक सामाजिक संदेश भी है, जो मुझे अच्छा लगा.

प्र. रजनीकांत के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

वे एक ऐसे कलाकार हैं, जो एक छोटी सी लाइन को भी अपने तरीके से अभिनय कर बता सकते हैं और वह स्टाइल सबसे अलग ही होती है. उसी को मैंने पूरी फिल्म के दौरान देखा और समझा है कि कैसे एक साधारण संवाद को अपने उम्दा अभिनय कला से अलग बनाया जाता है.

प्र.आपके मेकअप के बारें में बताएं कि कैसे क्या किया गया?

पूरे मेकअप को करने में साढ़े तीन घंटे लगते थे. मेरे ऊपर जो रबड़ का यूनिफार्म डाला जाता था वह बहुत मोटा होता था और उसके ऊपर पंख लगाये जाते थे. इसके लिए तीन लोग साढ़े तीन घंटे काम करते थे. इसे थर्ड डिग्री मेकअप कहा जाता है. इसमें शूटिंग के वक्त जो पसीना आता था, वह बाहर नहीं निकल पाता था.

शूटिंग के बाद जब उसे उतारा जाता था, तो पूरा शरीर स्मेल से भर जाता था. उस दौरान खाना-पीना मना था, ताकि आपका पेट न फूले. मुझे लिक्विड डाइट पर रखा जाता था और एक छोटे से ‘एसी केज’ में रखा गया था . मुझे धक्का मारकर वे शूटिंग स्पॉट तक ले जाते थे मैं चलकर नहीं जा पाता था. मैं वाकई एक पंछी बन चुका था.

मुझे बहुत स्ट्रेस होता था मैंने 38 दिन उस मेकअप को लेकर काम किया है. इस काम के दौरान मुझे बहुत धैर्य रखना पड़ा. इसकी शूटिंग एक साथ नहीं हुआ, बीच-बीच में ब्रेक था, ताकि मेरा शरीर ऐसे मेकअप को ले सकें. आंखों के लेन्सेस हमारे आईबौल से काफी मोटे और बड़े थे. इसके लिए मेरे साथ आंखों के डॉक्टर 24 घंटे रहते थे. बीच में एक बार मेरी आंखे लाल भी हो गयी थी.

प्र. क्या फिटनेस में कोई परेशानी हुई?

नहीं, किसी प्रकार की समस्या नहीं आई. मैंने अपने शरीर के साथ कभी किसी प्रकार का प्रयोग नहीं किया. मैं अपने शरीर को जैसा है वैसा ही रखना चाहता हूं. स्वास्थ्य मेरे लिए काफी जरुरी है, अगर हेल्थ है, तो प्रोफेशन है.

प्र.आप अभी सामजिक मुद्दों को लेकर फिल्में कर रहे है ,ऐसे में निगेटिव  रोल में दर्शक आपको क्या स्वीकार कर पाएंगे?

ये यहीं पर होता है, विदेश में नहीं. मेरे हिसाब से मैं एक कलाकार हूं और अपनी भूमिका निभाता हूं. उसमें जो भी भूमिका मैं करूं, मैं वैसा नहीं बनूंगा. दर्शक अवश्य स्वीकार करेंगे. अमरीश पुरी हमेशा विलेन की भूमिका निभाने के बावजूद लोग रियल लाइफ में उन्हें बहुत पसंद करते थे.

प्र. क्या फिल्मों में टाइपकास्ट होने का खतरा अब किसी को नहीं है?

आजकल निगेटिव किरदार बहुत कम रह गए हैं, हीरो ही विलेन बन जाता है. मेरे हिसाब से ऐसा विदेश में भी नहीं है. मुझे अगर करैक्टर आर्टिस्ट की भी भूमिका मिले और अगर वह अच्छी हो, तो मैं करना चाहूंगा. मेरी एक फिल्म ‘मिशन मंगल’ में हीरोइनें है और किसी ने अपनी भूमिका के बारें में नहीं पूछा. हर कोई एक अच्छी और बड़ी फिल्म का भागीदार बनना चाहता है.

प्र. आप कितने ‘टेक्नोसेवी’ हैं?

मैं अपने मोबाइल को अधिक हाथ नहीं लगाता. किसी निर्माता, निर्देशक से बात करने के लिए कभी-कभी फोन करता हूं. मैं टेक्नोसेवी नहीं. बच्चों को प्यार से समझाकर मोबाइल से दूर रखने की कोशिश करता हूं.

प्र. आप किस तरह की फिल्में बनाना पसंद करते हैं?

मेरी होम प्रोडक्शन में मैं हमेशा कंटेंट युक्त फिल्में बनाऊंगा. मेरी पसंद हमेशा कंटेंट पर खासतौर से रहा है. अगर मुझे कोई ऐसी फिल्म है जिसमें पैसे डालने हैं तो मैं वैसा भी करूंगा, जैसा कि मैं फिल्म ‘केसरी’ एक वौर फिल्म कर रहा हूं.

प्र. साउथ की फिल्मों की किस बात से आप प्रभावित हैं, जिसे आप हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी हो, ऐसा सोचते हैं?

वहां काम करने का तरीका बहुत फास्ट है, वे दूसरों के समय की कद्र करते हैं, इसलिए समय खराब नहीं होता. तकनीक हमसे अधिक अच्छी है. उनके टेक्नीशियन अपने आप को हौलीवुड के करीब रखने की कोशिश करते है.

प्र. आपका टाइम मेनेजमेंट बहुत अच्छा रहता है, इसे कैसे करते हैं?

बचपन से हमारी आदत समय से काम करने की है, इससे हर काम पूरा हो जाता है. अभी मैं कोई अलग नहीं कर रहा हूं. समय को समझना बहुत जरुरी है. अगर हम इसे नहीं समझते हैं तो अपने साथ-साथ दूसरों के समय को भी नजरंदाज करते हैं, जो ठीक नहीं. हमें किसी को भी ग्रांटेड नहीं लेना चाहिए. मैं 4 फिल्में साल में कर पा रहा हूं, क्योंकि मैं किसी काम को ग्रांटेड नहीं लेता.

इसके अलावा आज कलाकार वैनिटी वेन में बैठा होता है और निर्माता, निर्देशक बाहर खड़े होकर उस कलाकार के निकलने का इंतजार करते है. जबकि जिसने वैनिटी वेन दी है, उसे ही अंदर होना चाहिए और कलाकार को बाहर. इस प्रकार ये गलत हो रहा है, ये जिस दिन बदल जायेगा इंडस्ट्री में और अधिक उन्नति होगी. ऐसा वर्ताव और किसी क्षेत्र में नहीं होता. जहां बौस बाहर हो और कर्मचारी वैन के अंदर.

प्र. हौलीवुड की तुलना में हमारे देश में ऐसी तकनीक वाली फिल्में अधिक नहीं चल पाती, ऐसे में इस फिल्म वीएफएक्स को अच्छा करने के लिए क्या हौलीवुड से किसी की मदद ली गई?

कहानी, स्क्रीनप्ले, स्क्रिप्ट और वीएफएक्स अच्छी होने पर फिल्म चलती है. बाहुबली जब रिलीज हुई तो किसी को पता नहीं था कि ये फिल्म इतनी अच्छी चलेगी. हिंदी फिल्म भी वैसी कोई नहीं बना पाया. उस फिल्म में एक कहानी थी, जिससे लोग जुड़े, उन्हें फिल्म देखने में मजा आया और फिल्म चली. मैं बिल्कुल भी ये नहीं मानता कि तकनीक वाली हमारी फिल्में नहीं चलती. अगर उसमें आत्मा हो तो अवश्य चलेगी.

सबरीमाला मंदिर : ब्राह्मण प्रभुत्व को एझावा पुजारी की चुनौती

28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे 63 साल पुराने प्रतिबंध को हटा दिया. केरल के पत्तनमतिट्टा जिले के पेरियार टाइगर रिजर्व में स्थित यह मंदिर अय्यप्पन देवता का है. मंदिर की देखरेख धार्मिक और सामाजिक ट्रस्ट त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड (टीडीबी) करता है. सितंबर के इस फैसले का व्यापक विरोध हुआ. आंदोलनकारियों का कहना है कि यह फैसला मंदिर की पवित्रता को भंग करने वाला है. जिन महिलाओं ने पर्वत की चोटी पर स्थित इस मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास किया उन पर हमला हुआ. सर्वोच्च अदालत ने अब मामले पर पुनर्विचार याचिका स्वीकार कर ली है जिसकी सुनवाई खुली अदालत में 22 जनवरी 2019 को होगी. टीडीबी ने अदालत के इस फैसले पर पहले आपत्ति की थी लेकिन याचिका उसने दायर नहीं की.

सबरीमाला के संदर्भ में टीडीबी ने जो किया उससे एक अन्य मंदिर में पुजारी की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की दी हुई संस्थापनाओं की अवहेलना हुई है. 1993 में टीडीबी ने केरल के एर्नाकुलम जिले के कोंगोरपिल्ली नीरिकोडे शिव मंदिर में गैर ब्राह्मण पुजारी को शंतिकरण- मुख्य पुजारी से नीचे का पद- नियुक्त किया था. इसके बाद टीडीबी पर यह आरोप लगाते हुए एक याचिका दायर की गई कि गैर ब्राह्मण पुजारी की नियुक्ति के कारण धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के साथ समझौता हुआ है. 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को यह कह कर खारिज कर दिया कि “संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत अधिकार और स्वतंत्रता के अंतर्गत ऐसा कहने का कोई आधार नहीं है कि इस मामले में केवल ब्राह्मण या मलयाली ब्राह्मण ही मंदिर में अनुष्ठान या पूजा करा सकता है.” इसके बावजूद 1902 से ही थंत्री का पद ताणमोन माडोम ब्राह्मण परिवार के सदस्य को ही दिया जाता रहा है. इसके अतिरिक्त शंतिकरण के रूप में भी मात्र पुरुष मलयाली ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता रहा है. शंतिकरण दो प्रकार के होते है: मेलशंति अथवा मुख्य पुजारी और किणाशंति अथवा सहायक पुजारी.

एझावा से आने वाले पिछड़ी जाति के पुजारी सीवी विष्णु नारायणन ने सबरीमाला में मेलशंति के पद के लिए दो बार आवेदन किया. एझावा केरल का सबसे बड़ा हिंदू समुदाय है जो केन्द्र द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग अधिसूचित है. नारायणन ने जब इस साल मेलशंति के पद के लिए आवेदन किया तो उनका आवेदन टीडीबी ने यह कह कर खारिज कर दिया कि “आप मलयाली ब्राह्मण नहीं हैं”.

दी करवां की रिपोर्टिंग फेलो आतिरा कोणिकर के साथ अपनी बातचीत में नारायणन ने मेलशंति के पद में नियुक्ति प्रक्रिया में अपारदर्शिता और सबरीमाला में मेलशंति की नियुक्ति के विषय में 2002 के फैसले के बारे में बताया.

आतिरा कोणिकरः आप कब से पुजारी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं?

सीवी विष्णु नारायणनः मैंने 26 साल पहले सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर, केरल के कोट्टायम जिले में, पुजारी का काम शुरू किया था. मैं वहां छह साल तक था. बाद में 19 साल की उम्र में मैं कोट्टायम के कुट्टिकट्टु देवी मंदिर में मेलशंति बन गया और साढ़े चार सालों तक वहीं रहा. आज मैं कोट्टायम में पल्लोम सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर में मेलशंति हूं.

आतिरा: क्या इनमें से कोई भी मंदिर टीडीबी के तहत है?

सीवीवीएनः नहीं, ये सभी निजी मंदिर हैं.

आतिरा: क्या आपने अन्य मंदिरों में भेदभाव का सामना किया था?

सीवीवीएनः नहीं, यह उन मंदिरों में नहीं हुआ है जहां मैंने अब तक सेवा की हैं. लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं एक एसएनडीपी ( श्री नारायण धर्म परिपालाना योग) सदस्य हूं जो एझावा समुदाय के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था है. मैं अधिकतर इसके साथ जुड़े मंदिरों में ही रहा हूं.

आतिरा: जिस वक्त आपने शुरुआत की थी उस वक्त क्या पिछड़ी जातियों के पुजारी होते थे?

सीवीवीएनः निश्चित रूप से होते थे. पिछड़ी जातियों के लोगों की एक बड़ी संख्या थी जो पुजारी बन गई थी. मेरे गुरु मथानम विजयन थंत्री 1979 में सबरीमाला में मेलशंति बनने के लिए होने वाले एक इंटरव्यू में गए थे. उस साक्षात्कार में पास होने के बाद उनकी जाति का पता चला. उनसे कहा गया, “आपके पास पहले से ही नौकरी है. क्या आप उस नौकरी में संतुष्ट नहीं रह सकते?” वे ब्राह्मण नहीं थे इसलिए उन्हें जाति के कारण खारिज कर दिया गया. यही वह समय है जब टीडीबी को एहसास हुआ कि अन्य गैर ब्राह्मण भी इस पद पर नियुक्त होंगे. चूंकि यह वाकया 1979 का है इस कारण मुझे इसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है. मैंने सुना है कि उन्हें इसके बारे में दस्तावेजों से पता चला था जिसे मेरे गुरु ने अन्य लोगों से साझा किया था.

इससे हमें यह समझने की जरूरत है कि 1979 के बाद मलयाली ब्राह्मण (मापदंड) को सबरीमाला में मेलशंति की नियुक्ति के लिए जोड़ा गया था- (अगर) यह अधिसूचना में निर्धारित किया गया होता तो साक्षात्कार के लिए आवेदन करना या उपस्थित होना संभव नहीं होता.

आतिरा: सबरीमाला में मेलशंति बनने के लिए आवेदन करने के लिए आवश्यक योग्यता क्या हैं?

सीवीवीएनः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है वे लोग आवेदक की पहली योग्यता उसके मलयाली ब्राह्मण होने को मानते हैं.

आवेदनकर्ता को 10वीं पास होना चाहिए. कुल मिलाकर मेलशंति के रूप में उनके पास 12 साल का अनुभव होना चाहिए. किसी ऐसे मंदिर में लगातार 10 वर्षों के लिए मेलशंति होना चाहिए जिसमें दिन में पांच बार पूजा होती है. यदि कोई एक मंदिर से दूसरे में स्थानांतरित हो जाता है और एक सप्ताह तक मंदिर नहीं जाता, तो उसे गैप माना जाएगा- यह गेप दस वर्ष की अवधि में नहीं होना चाहिए. उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं होनी चाहिए, इसके लिए साक्ष्य के रूप में एक पुलिस प्रमाण पत्र देना होता है. अन्य आवश्यकताओं में संगठन का प्रमाणपत्र शामिल है जहां उन्होंने काम किया, थंत्री से प्रमाणपत्र, एक मेडिकल सर्टिफिकेट, जाति प्रमाणपत्र, एसएसएलसी (माध्यमिक स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र).

आतिरा: क्या वर्तमान में टीडीबी में पिछड़ी जातियों के पुजारी काम कर रहे हैं?

सीवीवीएनः हां. यदि आप त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड द्वारा नियुक्त पुजारी की हाल की सूची देखें तो आप पाएंगे कि उनमें से अधिकांश गैर-ब्राह्मण- एझावा, एनएसएस (नायर सेवा सोसाइटी, नायर जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली) विश्वकर्मा, हरिजन- हैं.

आज बहुत कम ब्राह्मण इस कार्य में आ रहे हैं. वे स्वयं कहते हैं कि उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं मिलती है क्योंकि इस नौकरी में समय एक बड़ा मुद्दा है- उन्हें सुबह और शाम को भी वहां रहना होता है. यह उनके पारिवारिक जीवन पर असर डालता है. नई पीढ़ी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है.

इस अर्थ में भेदभाव है कि गैर-ब्राह्मण पुजारियों को आम मंदिरों में भेजा जाता है. मुख्य मंदिरों में- एट्टुमानूर, वैकोम, चोट्टानिकारा और अन्य में- अभी भी ब्राह्मण हैं. सबरीमाला के मामले में, उन्होंने अपनी अधिसूचना में कहा है कि वे एक मलयाली ब्राह्मण चाहते हैं.

आतिरा: पिछले साल टीडीबी द्वारा की गई नियुक्तियों में 62 पुजारियों में से 36 गैर-ब्राह्मण थे. क्या उनमें से कोई भी मेलशंति के रूप में नियुक्त किया गया है?

सीवीवीएनः उन्हें शुरुआत में मेलशंति के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा. तीन साल की प्रोबेशन अवधि है. यह अंशकालिक है. तो वे छोटे मंदिरों में जाते हैं. बाद में उन्हें बड़े मंदिरों में भेजा जाता है. फिर भी गैर-ब्राह्मण बड़े मंदिरों में नहीं भेजे जाते. उदाहरण के लिए चेट्टीकुलंगारा में गैर ब्राह्मण पुजारी की नियुक्ति का भी कड़ा विरोध किया गया.

आतिरा: प्रमुख मंदिरों से गैर ब्राह्मणों को दूर करने के पीछे क्या कारण हो सकता है?

सीवीवीएनः आमतौर पर प्रमुख मंदिरों में सवर्णों का प्रभुत्व है. यह एक सच्चाई है कि देवस्वाम बोर्ड में 90 प्रतिशत कर्मचारी सवर्ण हैं.

आतिरा: आपने उच्च न्यायालय में याचिका कब दायर की?

सीवीवीएनः इस बात को अब एक साल हो रहा है. मैंने पिछले साल पहली बार सबरीमाला में मेलशंति बनने के लिए आवेदन किया था. मैंने आवेदन करने के एक दिन बाद याचिका दायर की थी. मुझे पता था कि मुझे नहीं बुलाया जाएगा- अधिसूचना के अनुसार आवेदक को मलयाली ब्राह्मण होना चाहिए. लेकिन मैंने मामले को दर्ज करने के लिए आवेदन किया. उन्होंने जवाब नहीं दिया.

मैंने इस साल भी आवेदन किया. इस बार, मुझे एक अस्वीकृति ज्ञापन मिला जिसमें कहा गया है कि मेरा आवेदन अस्वीकार कर दिया गया है क्योंकि मैं मलयाली ब्राह्मण नहीं हूं. मैंने देवास्वम बोर्ड को एक पत्र प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया है कि गैर ब्राह्मण को नियुक्त न करना सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और संविधान के खिलाफ है और मौलिक अधिकारों का हनन है. मुझे अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

आतिरा: क्या आप दूसरी बार मेलशंति बनने के लिए आवेदन करते समय सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहे थे?

सीवीवीएनः वे मुझे बुलाएंगे ऐसा मान कर मैंने दूसरी बार आवेदन नहीं किया था. मुझे पता था कि अदालत में मामला लंबित होने पर वे मुझे इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाएंगे. मैंने जानबूझकर आवेदन किया- मुझे खारिजी का ज्ञापन मिला जो इस बात का सबूत है कि वे लोग कैसे काम करते हैं.

आतिरा: क्या उन्होंने अगली सुनवाई की तारीख दी थी?

सीवीवीएनः नहीं, उन्होंने तारीख नहीं दी. हाई कोर्ट ने एक अमीकस क्यूरी (न्यायमित्र) नियुक्त किया है. आखिरी सुनवाई मंडलकालम से पहले हुई थी (पिछले साल नवंबर में, सबरीमाला की तीर्थयात्रा से पहले).

मैं नहीं बता सकता कि ऐसा कब तक चलेगा. क्या यह फैसला इस साल मंडलकालम से पहले नहीं आना चाहिए जब नई नियुक्ति की जाती है? अमीकस क्यूरी की क्या जरूरत है जबकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पहले से ही आया हुआ है? क्या सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू नहीं किया जाना चाहिए? मुझे अदालत से सवाल नहीं करना चाहिए. लेकिन मेरी भावना यह सवाल उठाने के लिए मजबूर कर रही हैं.

आतिरा: क्या आपको किसी राजनीतिक दल या संगठन का समर्थन है? एसएनडीपी क्या कर रही है?

सीवीवीएनः राजनीतिक दलों ने समर्थन नहीं दिया है. मैंने समर्थन मांगा भी नहीं है. लेकिन सवर्ण प्रभुत्व का विरोध करने वाले कई संगठन और लोग समर्थन में आगे आए हैं. हम 30 नवंबर से पहले सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए पैसे जुटा रहे हैं. हम लोग जल्द ही चेरथला (केरल के आलप्पुषा जिले में) में एक मीटिंग करने वाले हैं. एसएनडीपी योगम् के महासचिव भी इसमें भाग लेंगे. हम तय करेंगे कि इसे आगे कैसे ले जाना है.

हम एझावाओं का मानना है कि अलग अलग धर्म होने के बावजूद भी सभी मनुष्य बराबर हैं और अलग अलग दिखने वाले जाति, धर्म और देवता भी एक हैं. इसलिए हम इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं.

आतिरा: क्या पिछड़ी जातियों के अन्य पुजारियों ने भी सबरीमाला में आवेदन किया है?

सीवीवीएनः मेरी जानकारी के मुताबिक फिलहाल तो किसी ने भी आवेदन नहीं दिया है. लेकिन मेरा समर्थन बहुत लोग कर रहे हैं. सभी की यह राय यह है कि केवल पात्रता को ही मानदंड माना जाना चाहिए- किसी परिवार में जन्म के आधार को पैमाना नहीं माना जाना चाहिए. सभी इंसान बराबर हैं.

यहां तक कि सबरीमाला में भी कहा जाता है कि कोई जाति नहीं है, कोई धर्म नहीं है. वावर स्वामी (जिनका मंदिर सबरीमाला में है) अय्यप्पन के मित्र थे जो एक मुसलमान थे. इसलिए मुझे नहीं लगता कि अय्यप्पन की कोई जाति है. सबसे महत्वपूर्ण बात है अय्यप्पन की पूजा करना. पूजा में जाति को मनुष्यों ने शामिल किया है, भगवान ने नहीं.

ऐसी अनैतिकता को खत्म हो जाना चाहिए. यदि मलयाली ब्राह्मण नौकरी के लिए उपयुक्त हैं, तो उन्हें शामिल होने दिया जाना चाहिए. इसमें क्या समस्या है? लेकिन पात्रता ही मानदंड होना चाहिए. ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए जहां योग्यता वाले लोग बाहर रह जाएं और परिवार की विरासत या जन्म के आधार पर लोगों को मौका मिले. हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है. हम सभी के बराबर अधिकार हैं, हैं कि नहीं? हम में से कोई भी आज जाति आधारित भेदभाव पर विश्वास नहीं करता.

आतिरा: सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में आप क्या सोचते हैं?

सीवीवीएनः राज्य में कई मंदिर हैं. आप देख ही सकते हैं कि इन मंदिरों में महिलाएं जाती हैं. क्या यह पर्याप्त नहीं है कि महिलाएं राज्य के इन मंदिरों में जाती हैं? (सबरीमाला) एक मात्र मंदिर है जहां मात्र पुरुष जाते हैं. इस प्रथा को खत्म करने की क्या पड़ी है?

ज्यादातर हिंदू पुरुष सबरीमाला जाने से पहले प्रार्थना करते हैं या किसी मंदिर में जाते हैं जब वे सबरीमाला जाने से पहले मंडलम मास में उपवास करते है (वार्षिक तीर्थयात्रा से पहले 41 दिन का उपवास). एक बार वहां महिलाएं जाने लगेंगी तो वे लोग जाना बंद करने लगेंगे. तो ऐसी संभावना है कि वे लोग अध्यात्म से दूर होने लगेंगे. सबरीमाला महिला विरोधी नहीं है- वहां सिर्फ उम्र का ही मामला है. महिला भक्तों को मालिकापुरतम्मा (वह देवी जिसे सबरीमाला में एक सहायक मंदिर में पूजा जाता है) के रूप में संबोधित किया जाता है- महिलाओं को इस हद तक सम्मान दिया जाता है.

महिलाओं को बाहर कर दिया गया है, ये बात नहीं है. ऐसा उम्र के लिहाज से है. उन्हें भीड़ में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. वहां पवित्रता खत्म हो जाएगी और पवित्रता सर्वोपरि है. सबरीमाला तीर्थयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उपवास है.

आतिरा: इस आधार पर कि “सभी इंसान बराबर हैं”, क्या सभी को, बिना भेदभाव, सबरीमाला में प्रार्थना करने का अधिकार नहीं है?

सीवीवीएनः हां है, निश्चित रूप से है. सभी इंसान बराबर हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है.

आतिरा: तब भी क्या उम्र के आधार पर महिलाओं को मंदिर से बाहर रखना ठीक है?

सीवीवीएनः पवित्रता हिंदू अनुष्ठानों का एक हिस्सा है. यही मुद्दा है. अन्यथा, मनुष्यों के बीच कोई अंतर नहीं है. भगवान हर किसी के भीतर है. अब एक चर्च में, जब कोई मर जाता है, मृत शरीर को चर्च के अंदर लाया जाता है. हम मंदिरों में ऐसा नहीं करते हैं. जब हम किसी ऐसे घर में जाते हैं जहां कोई मरा है तो अपने घर में बिना स्नान प्रवेश नहीं करते. इसलिए मंदिरों की पवित्रता का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है. महिलाओं को एक महीने में एक बार समस्या होती है जिसे पवित्रता के संदर्भ में एक निश्चित तरीके से देखा जाता है. यही एकमात्र मुद्दा है.

EXCLUSIVE : जतिन दास के यौन दुर्व्यवहार की कहानी, 11 पीड़ित महिलाओं की जुबानी

साल 2004 में गर्मियों की एक शाम, निशा बोरा अपने ससुर द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक रात्रिभोज में गई थीं. इस कार्यक्रम में प्रतिष्ठित चित्रकार और मूर्तिकार जतिन दास भी मौजूद थे. बोरा के परिवार ने उनका परिचय दास से करवा दिया और बातचीत के दौरान दास ने उनसे पूछा कि क्या वो अगले कुछ दिन उनके सामान को ठीक करवाने में मदद करना चाहेंगी. 28 साल की इस महिला के पास कुछ दिनों का समय था और उसने सोचा कि “एक शानदार कलाकार के साथ काम करना किसी सम्मान” सा होगा और उन्होंने खुशी खुशी हां कर दी. उनके उत्साह का कारण ये भी था कि वो दिग्गज अदाकारा नंदिता दास के पिता भी थे.

दास के घर काम पर गईं बोरा का पहला दिन बिना किसी घटना के गुजर गया. एक ओर दास का बच्चा रो रहा था और निशा चीजों को व्यवस्थित करने में लगी थीं और दास “ओडिशा में अपने आर्ट स्कूल के लिए अपने बड़े सपनों” के बारे में बता रहे थे. जब वो जा रही थीं तो दास ने उन्हें विदेश में अपने सोलो (अकेले का) शो का एक पोस्टर और पंख परियोजना पर लिखी अपनी दस्तखत की हुई किताब गिफ्ट की- हाथ के पंखों का उनका कलेक्शन. बोरा ने अगले दिन दक्षिण दिल्ली में स्थित दास के स्टूडियो का दौरा किया, जिसे उन्होंने “रचनात्मक ऊर्जा से घिरा हुआ एक अद्भुत स्थान” बताया था. वो शराब पी रहे थे. बोरा ने साथ शराब पीने के दास के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया.

अचानक से दास ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की. पहले तो वो उनसे बच के निकल गईं, लेकिन दूसरी बार दास ने उन्हें पकड़ लिया और उनके होठों को चूम लिया. बोरा ने उन्हें धक्का दिया. उन्होंने कहा, “मान भी जाओ, बहुत मजा आएगा.” बोरा के प्रतिरोध से दास व्यग्र हो गए. बोरा ने अपना बैग उठाया ओर तेजी से घर की ओर निकल गईं. कुछ दिनों बाद बोरा के पास नंदिता दास का फोन आया. नंदिता ने कहा कि उनका नंबर उनके पिता ने उन्हें दिया है. दास के पिता ने कहा था कि बोरा उन्हें एक “युवा, महिला सहायक” ढूंढने में मदद कर पाएंगी. याद करते हुए बोरा कहती हैं कि उन्होंने बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाते हुए नंदित से कहा कि वो ये काम नहीं कर पाएंगी.

बोरा ने शायद ही इस घटना के बार में अगले 14 सालों तक किसी से कोई बात की.

हालांकि, 16 अक्टूबर 2018 को मीडिया उद्योग में कई ऐसी महिलाओं से उत्साहित होकर, जो उत्पीड़न करने वालों का नाम ऑनलाइन बता रही थीं, बोरा ने अपनी चुप्पी तोड़ दी. ट्विटर पर उनके द्वारा पोस्ट की गई बात ने कई और महिलाओं को प्रेरित किया और ऐसे आरोपों की एक श्रृंखला सामने आई. उन्होंने लिखा, “आज उस आदमी की बेशर्मी की वजह से मुझे घुटन हो रही है.” दास का नाम लेकर वो अपने बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहती थीं कि “उन्हें दूसरों की हिंसा से डरने की जरूरत नहीं है.”

इसके बाद ऐसे और आरोप सामने आए. 2013 में जतिन दास सेंटर ऑफ आर्ट में अपनी इंटर्नशिप शुरू करने के दौरान गरुषा कटोच 20 साल की थी, उन्होंने आरोप लगाया कि काम के तीसरे दिन दास ने उन्हें गले लगाया चूमने का प्रयास किया. कटोच ने मुझे बताया, “मैं जो महसूस कर रही थी उसे बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे, मेरे पास अभी भी उसके लिए कोई शब्द नहीं है.” 1990 के दशक के मध्य में दास का साक्षात्कार करने वाले इंडो-कनाडाई मूल की पत्रकार श्री पराडकर की मुझसे फोन पर बता हुई और उन्होंने मुझे बताया, “जो चीज मुझे जतिन दास के मामले में परेशान करती है वो ये है कि ये कोई रहस्य नहीं है, ऐसे भी नहीं है को कोई अफवाह फैलाने वाला समूह उनके साथ ऐसा कर रहा था, ये पागलपन की हद तक सामान्य था. सबको पता था.” उनकी बात सबसे पहले न्यूज वेबसाइट द वायर पर छपी थी.

कई महिलाओं का बोलना अभी भी बाकी था. कुछ तो बोरा के पास निजी तौर पर पहुंचकर अपना समर्थन जता रही थीं; अभी भी बाकी की ऐसी महिलाएं जिन्हें दास के किए से आघात हुआ था अपने अनुभव को सार्वजनिक करने के फैसले पर विचार कर रही थीं; और कुछ ने या तो मीडिया संस्थानों को अपने कहानी बता दी थी या बताने के प्रयास में लगी थीं. उनमें से एक दी कारवां की क्रिएटिव डायरेक्टर तन्वी मिश्रा भी हैं.

दास के साथ मिश्रा के अनुभव के बारे में मुझे पहली बार 2017 में एक बातचीत के दौरान तब जानकारी मिली जब हम साथ अपने अपने घर जा रहे थे. पत्रिका ने अपने शोकेस सेक्शन में दास द्वारा एक प्रदर्शनी पर एक छोटा सा फीचर छापा था. मिश्रा ऐसा होने से नाराज थीं, लेकिन उन्हें पता था कि यह दास की प्रतिष्ठा के चारों ओर छाई गोपनीयता का संभावित परिणाम था. वो इस बात से संघर्ष कर रही थी कि क्या उन्हें औपचारिक रूप से इस मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए था. उस समय पत्रिका के भीतर ज्यादातर लोगों को उनकी असहजता के बारे में पता नहीं था, लेकिन दास के साथ उनका खुद का अनुभव इसकी वजह थी. जुलाई 2018 में मिश्रा के साथ मेरे पहले साक्षात्कार के बाद मैंने ऐसी 10 और महिलाओं से बात की जो पेशेवरों रूप से दास के साथ जुड़ी थीं. इनमें बोरा, पराडकर और कटोच शामिल हैं. इनमें से छह महिलाओं ने अपना नाम सार्वजनिक नहीं किया. यहां तक कि जब मैं ये स्टोरी फाइल कर रही थी तब भी जैसा कि बोरा ने अपने ट्वीट में इसे “ऐसी वारदातों का पिटारा” करार दिया था, कई और कहानियां निकलकर सामने आ रही थीं.

बोरा के खुलासे से एक महीने पहले द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल छपा था जिसमें जतिन दास के बारे में कहा गया था कि “पेटिंग करने वालों को कैसा होना चाहिए: विलक्षण, उल्लेखनीय और उत्साही अजनबी.” उनके बारे अब तक की पसंदीदा सार्वजनिक कहानी यही रही है. कला की दुनिया में उनका कद निर्विवाद रहा है. दास ने 50 से अधिक वर्षों के करियर में देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 60 से अधिक एकल कार्यक्रम आयोजित किए हैं. वो देश में सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्म भूषण समेत कई पुरस्कार हासिल कर चुके हैं. संसद भवन में एक बड़ा भित्तिचित्र है जिसे उन्होंने बनाया है. उन्हें कई विश्वविद्यालयों में लेक्चर के लिए बुलाया जाता है और उनके बायोडेटा के मुताबिक वो “कई सरकारी और प्राइवेट आर्ट और सांस्कृतिक निकायों के सलाहकार के रूप में काम करते हैं.”

और फिर भी, दास ने अक्सर सांसारिक पुरस्कारों और वाणिज्यिक हितों के लिए अपनी उपेक्षा व्यक्त की है. उन्होंने पिछले साल एक समाचार एजेंसी के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “कला की दुनिया में व्यापक बदलाव हुए हैं. लोग कल के बाजार और व्यापार के बारे में बात करते हैं.” दास ने उनके जमाने में कलाकारों में जो आदर्श होते थे और आज के दौर के युवाओं ने इसे जो “रोजी रोटी” का माध्यम बना दिया है उसके बीच अंतर साफ किया. उन्होंने कहा, “अब सब प्रचार और हाई सोसइटी से जुड़ा है और अब ये एक ग्लैमरस दुनिया बन गई है.”

हालांकि, ये वही कला समाज है जिसने लंबे समय तक दास की सार्वजनिक प्रतिष्ठा को बचाए रखा है. एक ढीले और अनौपचारिक नेटवर्क वाली भारतीय कला की दुनिया व्यक्तिगत कनेक्शन और संरक्षण पर भारी तौर पर निर्भर है. दास प्रभाव और शक्ति के इन माध्यमों के भीतर सहजता से विराजमान हैं. इस उद्योग में एक दशक से अधिक का समय बिताने वाली एक कलाकार विदिशा ने मुझे बताया, “जतिन दास जैसे लोग इस बात को नियंत्रित करते हैं कि किसे कमीशन मिले.” कई सालों से प्रतिष्ठित गैलरियों ने दास के काम को दिखाना अपने लिए सम्मान की बात समझी है और साथी कलाकारों ने उन पर प्रशंसा की बारिश की है. विदिशा ने कहा, “कला उद्योग में सवर्णों का प्रभुत्व है और वो हमेशा इस तरह के विशेषाधिकार के बीच रहते हैं.”

इन्होंने एक विलक्षण आदमी की पौराणिक कथाओं को बल दिया है, जिसके ऊपर दुनिया के उसूल लागू नहीं होते. हमारा विश्वास है कि कलाकार महानता में सिर्फ तभी सक्षम है जब हम उसके कलात्मक स्वभाव को स्वीकार करने में सक्षम हैं. इस स्वभाव की पूजा कई दशकों से हुई है, अगर इससे अधिक नहीं, और इसने कई लोगों को सरंक्षण दिया है, जो कला के क्षेत्र में कई ताकतवर पदों पर थे: इनमें चित्रकार, रंगमंच कलाकार, संगीतकार, फिल्म निर्माता, लेखक, विज्ञापन से जुड़े लोग शामिल हैं. इस सांस्कृतिक प्रतिरक्षा का बोझ आमतौर पर महिलाओं को अपने जीवन में ढोना पड़ता है- जिन्हें अक्सर अपनी रचनात्मक महत्वाकांक्षाओं और पेशेवर सपने को पीछे छोड़ना पड़ता है.

जिन 11 महिलाओं से मैंने बात की उनका अलग-अलग समय में 1990 से 2015 के बीच दास से सामना हुआ. इनके आरोपों में अवांछित यौन हमला, छेड़खानी भरी टिप्पणी और ताने से लेकर भावनात्मक उत्पीड़न और अनुचित कार्यस्थल व्यवहार शामिल है. फिर भी उनकी बातों में कुछ पहलू इतने समान थे कि अलग-अलग रिकॉर्ड किए गए उनके बयानों में एक जैसे विवरण को खोजना मेरे लिए मुश्किल नहीं था. ऐसी हर बात की परिवार के उन सदस्यों या दोस्तों द्वारा पुष्टि की गई है जिनसे इन महिलाओं ने बात साझा की थी.

लगभग उन सभी महिलाओं से जिनसे मैंने बात की उन्हें निजी परिचय, किसी के कहने पर या दास के सीधे प्रस्तावों से इंटर्नशिप या शोध का पद मिला था. जब वो दास से मिली थीं तो इन सभी की उम्र उनसे आधी से कम थी- इनमें जो सबसे उम्रदराज थीं वो 30 साल से कम उम्र की थीं. जब वो ये काम शुरू कर रही थीं तब दास से उनका सामना ऐसी स्थिति में हुआ था जब वो बहुत प्रभावशाली थे. ज्यादातर मामलों में दास ने एक बैठक या मुलाकात के आधार पर उनकी व्यावसायिक विशेषज्ञता और टैलेंट के बारे में व्यापक पूछताछ के बिना उन्हें काम पर रख लिया.

लगभग उनमें से सभी ने दास के तरीके में एक अतिसंवेदनशील बात को नोट किया- जब उनकी मांग पूरी नहीं होती थीं तो पितृत्ववाद की जगह ढिठपन का रास्ता अपना लेते थे. महिलाओं को अगर असहजता होती तो दास उनकी रुढ़िवादी परवरिश को दोष देने लगते. उन दृष्टिकोणों के आधार पर जो उनके लिए सबसे सुविधाजनक थे, जिन महिलाओं को कथित तौर पर उत्पीड़ित किया गया उन्हें दास के साथ एक खेल खेलना पड़ता जिसमें या तो उन्हें दास के प्रगतिशील आदर्शों या पारंपरिक संरचनाओं के प्रति उनके झुकाव के साथ मेल बिठाना पड़ता. अगर यह जानबूझकर नहीं भी हो तो भी एक चालक रणनीति थी: ये महिलाओं को आत्म-संदेह में फंसा देता और दास को सभी अपराधों से मुक्त कर देता.

लगभग ऐसी हर बात में एक भावना समान है कि वो युवा महिलाओं को विकसित करने की कोशिश कर रहा थे और उन्हें अपनी प्रेरणा के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, भले ही उन्होंने इन महिलाओं से बाकी सभी तरह की मेहनत करवाई हो. दास ने इनमें से कम से कम दो के मामले में ये स्वतंत्रता ली कि वो उन्हें ये बता सकें कि वो कैसे सफर करें, कहां रहें और कैसे कपड़े पहनें. बोरा, कटोच और पराडकर के अलावा तीन और महिलाओं ने कहा कि दास ने उन्हें बिना सहमति के किस किया और गले लगाया.

महिलाएं उनसे उनके मार्गदर्शन और परामर्श की उम्मीद कर रही थीं, ना कि इस बात का आंकलन कि वो एक छेड़खानी करने वाले हो सकते हैं. कईयों को ऐसा लगा कि ऐसी स्थिति में दास की जगह कोई और होता तो उन्होंने करारा जवाब दिया होता लेकिन इनके मामले में महिलाओं के पास कोई ताकत नहीं, ये सिर्फ दास की सामाजिक स्थित की वजह से नहीं था, बल्कि उनकी 76 साल उम्र भी एक वजह थी.

जब महिलाओं को पहली बार दास की इन हरकतों का सामना करना पड़ा, तो उन्हें इसका अंदाजा ही नहीं था. हालांकि, अच्छे करियर के अवसर के रूप में उन्हें मिले इस मौके को वो बर्बाद नहीं करना चाहती थीं. इसके अलावा अगर महिला पेशेवरों हर व्यक्ति को नौकरी के लिए इसलिए मना कर दें कि उन्हें सामने वाले से थोड़ी असहजता हुआ है, तो शायद उनके लिए कोई विकल्प ही नहीं रह जाएगा. अंत में, इनमें से कई महिलाओं ने सोचा कि क्या उन्हें चीजों को उसी तरह से समझना चाहिए था जैसी वो थीं: जो होने वाला था उसके लिए सर्तक रहना चाहिए था.

एक साथ ये साक्ष्य दसा की एक नग्न तस्वीर पेश करते हैं, ऐक ऐसे आदमी की तस्वीर जो खुद को अपने सेलिब्रिटी स्टेटस से इतना संरक्षित मानते थे कि उन्होंने उन परिणामों के बारे में सोचना बंद कर दिया था जो उनके करने के बाद महिलाओं के ऊपर पड़ेगा, उनके खुद पर इसका क्या असर पड़ेगा इसकी तो उन्हें परवाह ही नहीं थी.

1990 के दशक के मध्य में श्री पराडकर पहली बार तब दास से मिली जब वो बेंगलुरु में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक युवा संवाददाता थीं. उनके एक वरिष्ठ सहयोगी ने एक कार्यक्रम के दौरान दास से उनका परिचय करवाया और कहा कि दास “एमएफ हुसैन के कद के कलाकार” हैं.

पराडकर को याद है कि इस दौरान दास ने उनका नंबर लिया था. बाद के दिनों में दास ने उन्हें बार बार फोन किया. वो कहती हैं, “वो सुबह 11.30 बजे या रात 12 बजे फोन कर देते और मैं इसे एक कलाकार की विलक्षणता के रूप में देखती.” वो इनमें से किसी भी बातचीत में अनुचित नहीं थे. इसके विपरीत दास उन चंद लोगों में से एक थे जो बुद्धि में रूचि रखते थे. दास ने उन्हें डायरी लिखने की आदत डालने की सलाह दी जिसमें अपने दिन के बारे में चार पंक्तियां लिखनी थी, दास ने आश्वस्त करते हुए कहा कि इससे उनकी “कविता का जन्म” होगा. पारडकर ने कहा, “वो मुझसे कहते की मेरे अंदर काफी क्षमता है और मैं बेहद प्रतिभाशाली हूं. वो हमेशा प्रतिभाशाली शब्द का इस्तेमाल करते.”

दास का व्यवहार विशेष रूप से उस विद्रोही यौनवादी पृष्ठभूमि के खिलाफ उत्थान सा लग रहा था जिसका सामना पराडकर उस समय अपने कार्यालय में कर रही थीं. अखबार में उनके पहले कुछ हफ्तों के भीतर एक पुरुष सहयोगी ने उन्हें एक नोट भेजा था, जिसमें कहा था, “यह आपके टैलेंट नहीं बल्कि आपका आकर्षण है जिसने आपको आपकी वर्तमान स्थिति में पहुंचाया है.” पराडकर ने इसे हंस कर टाल दिया. वो कहती हैं, “आपको कई बार ऐसी बातें बताई जाती हैं कि कैसे आप पार्यप्त रूप से टैलेंटेड नहीं हैं. फिर आप अपनी स्थिति समझने लगती हैं और कोशिश करती हैं कि आप बहुत प्रतिभाशाली या दूसरे के लिए ख़तरे के तौर पर ना नजर आएं. और यह इतना गहरा था कि मैं एक ऐसे व्यक्ति के लिए आभारी थी जो मुझे मेरे दिमाग और मेरे टैलेंट को विकसित करने के लिए कह रहा था.”

बाद में दास दिल्ली से बेंगलुरु पहुंचे. पराडकर ने पेपर के लिए उनका साक्षात्कार करने का फैसला किया. वो इस बात पर सहमत हुए कि मुलाकात विंडसर मनोर होटल की लॉबी में होगी जहां दास ठहरे थे. लेकिन जब वो पहुंची तो दास ने उनसे अपने कमरे में आने का अनुरोध किया. इसे याद करते हुए पराडकर कहती हैं कि कमरे में बुलावे से उनके “दिमाग में घंटी बजी” लेकिन उन्होंने इसे तुरंत खारिज कर दिया. उन्होंने खुद से कहा कि इस आदमी का कद बहुत बड़ा है और उन्हें इस किसी असहज स्थिति के बारे में चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

वो उनके कमरे में गईं और दास ने गले लगाकर उनका स्वागत किया. दास ने उनके कंधे पर लाल बॉर्डर वाली एक क्रीम साड़ी रखी दी-ये एक तोहफा था जिसके बारे में दास ने कहा कि ये पराडकर के रंग के साथ सुंदर लगेगा. दास ने उन्हें अपनी एक पेंटिंग भी दी जिस पर दास ने एक संदेश लिखा था. इस संदेश का एक हिस्सा कुछ इस तरह से था, “ये मुस्कुराहट बसंत से भी सुंदर है.”

साक्षात्कार के दौरान पराडकर ने उनसे एक प्रश्न पूछा जिसके बाद दास अचानक से टॉयलेट में चले गए. पराडकर को फ्लश की कोई आवाज़ नहीं आई और उन्हें लगा कि दास इतने अचानक से टॉयलेट में क्यों चले गए. जब वो बाहर आए तो पराडकर उनसे जवाब देने की उम्मीद लगाए बैठी थीं. लेकिन दास झुके और पराडकर को चुमने की कोशिश की. सदमे में पराडकर अचानक से मुड़ गईं. दास ने उनके मुंह के बेहद करीब उनके गालों, जॉ लाइन और गर्दन के हिस्से को चूम लिया. पराडकर ने इसके लिए मना किया. दास ने पूछा, “क्यों नहीं? आओ भी, बस एक छोटा सा.” उन्होंने इसके लिए फिर से मना किया लेकिन दास नहीं माने. पराडकर ने दास को धक्का दे दिया. उन्होंने कहा, “मैं कसरत करती थी और फिट थी और जब मैंने उन्हें धक्का दिया, उन्होंने बेहद कमजोर महसूस किया और अपनी कुर्सी में जा गिरे. मुझे तुरंत बेहद बुरा लगा क्योंकि मैंने सोचा, ‘हे भगवान, मैंने एक बुज़ुर्ग को धक्का दे दिया.’”

पराडकर याद करती हैं कि ये पूरी घटना एक बेहद असहज अनुभव थी, “जैसे कि मैं खुद का निरीक्षण कर रही हूं.” वो बिना स्टोरी के वापस इसलिए नहीं जाना चाहती थीं क्योंकि उन्हें बताना पड़ेगा कि आखिर वो स्टोरी क्यों नहीं ला पाईं. पराडकर ने इंटरव्यू पूरा किया. इसके बावजूद कि “मुझे लगा, सब कहेंगे, ‘तुमने ही ऐसा कुछ किया होगा.’” जब वो जा रही थीं तो दास ने उन्हें तोहफा पकड़ा दिया.

वो होटल से निकल गईं और ऑफिस जाने के बजाए वो किसी अंजान जगह पर पहुंच गईं. उन्होंने कहा, “मैं रुक गई और हांफने लगी, मेरी सांस रुक रही थी. हे भगवान, मैं ऐसी अंजान जगह पर अपने आपको कोई ऐसी स्थिति में नहीं डाल सकती.” उन्होंने खुद को संभाला और एक दोस्त के घर पहुंचीं. वो कहती हैं, “मैं खूब रोई और चीखी. मैंने दोस्तो को सब बता दिया और उसने मुझे दिलासा दिया.” पराडकर ने इंटरव्यू फाइल किया. इसे कुछ ही दिनों के भीतर छाप दिया गया.

लगभग एक दशक बाद पराडकर की तरह एक और युवा महिला जो दास से मिलने जा रही थी, उसने भी यही कल्पना की कि उसके पास दास की उम्र और प्रमुखता की वजह से उनके बारे में चिंता करने का कोई कारण नहीं है. वो अपनी स्नातक पाठ्यक्रम की आवश्यकता के हिसाब से एक प्रोजेक्ट पर काम करने की तलाश में थी. उसने सुना कि दास किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में हैं जो उनके पंखा प्रोजेक्ट पर एक पुस्तक तैयार करे. शाहपुर जाट में उनके स्टूडियो में दास से मिलने से पहले कॉलेज के छात्र एक और साक्षात्कार के लिए गई जो ग्राफिक डिजाइन उद्योग के एक दिग्गज के साथ था. जैसे ही वो मुलाकात करके बाहर आई, डिजाइनर ने उसे कई अश्लील संदेश भेज दिए. वो बेहद गुस्स में थी और दास से मिलने से पहले उसके अवसर को ठुकरा दिया था. उसे लगा था कि दास के साथ काम करना ज्यादा सुरक्षित होगा.

दास के साथ कई घंटों तक मुलाकात चली. उन्हें याद है कि इस दौरान काम की बातें बिल्कुल नहीं हुईं. दोनों की बातचीत के दौरान दास संगीत, संस्कृति, सिनेमा जैसे कई विषयों पर अपने विचार दिए. उन्होंने लड़की से कहा कि ये दोनों के “खास रिश्ते” की शुरुआत है जिसमें वो उसे भावनात्मक और आध्यात्मकि रूप से उभरने में मदद करेंगे. ठीक उसी तरह से जैसा कि उन्होंने पराडकर को डायरी मेंटेन करने को कहा था, उन्होंने कॉलेज की इस छात्रा से हर दिन एक कविता लिखने को कहा. पराडकर की तरह ही उसे भी शुरू में बेहद अच्छा लगा. छात्रा कहती है, “ऐसा लगा कि वो मेरे लिए गाइड या सलाहकार की भूमिका निभाने वाले हैं और ये अच्छा लगा. अब मुझे लगता है कि यह एक तरह से संवारे जाने की प्रक्रिया का हिस्सा था”

पूरी मुलाकात के दौरान कॉलेज की छात्रा ने दास को अपना काम दिखाना चाहा लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. वो कहती है, “मेरे काम में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने इसे देखा तक नहीं. मैं एक बेवकूफ की तरह लगातार उन्हें अपने काम के बारे में बताती रही.”

शाम होने पर दास के ऑफिस के लोगों ने जाना शुरू कर दिया. उन्होंने छात्रा को कुछ चित्रों को देखने के लिए आमंत्रित किया जो वह एक प्रदर्शनी के लिए भेज रहे थे और छात्रा से उन्हें नाम देने में मदद करने के लिए कहा. इस अभ्यास के तुरंत बाद दास के ऑफिस में किसी का फोन आया जिससे वो बेहद दुखी हो गए. जब उन्होंने फोन रखा तो छात्रा इसे देखकर दंग रह गई कि उनकी आंखों में आंसू थे.

दास लड़की के पास पहुंचे और “बेहद ताकत के साथ” उसे गले लगा लिया. उन्होंने लड़की के गाल चूम लिए. यहां तक ​​कि जब वो अभी ये सब समझने की कोशिश कर रही थी और इस बीच दास ने दोनों हाथों में उसकी गर्दन जकड़ ली और उसके होंठों पर चूमने की कोशिश की. लड़की ने खुद को पीछे खींच लिया. वो कहती है, “ये बेहद तेजी से हुआ. मैंने पूछा, ‘आप क्या कर रहे हैं.’ दास ने जवाब दिया, ‘मैं बस स्नेह बांटने की कोशिश कर रहा हूं.’”

वो गुस्से से कांप रही थी और वहां से सीधे अपने घर चली गई.

दास ने उसे कई नंबरों से कई दिनों तक फोन किया. वो जैसे ही दास की आवाज़ सुनती फोन काट देती. जब उसने अपने प्रोजेक्ट के लिए एक और कंपनी ज्वाइन की तो दास को ये पता चला गया और उन्होंने वहां लैंडलाइन पर फोन कर दिया. कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में लड़की ने फोन पर बात की. याद करते हुए वो बताती हैं कि दास ने उनसे कहा, “उस मुलाकात के बाद से गायब होने की वजह से मैं तुमसे बहुत नाराज हूं और तुमने मुझे कभी वापस फोन भी नहीं किया.” लड़की ने दास से कहा कि वो फिर कभी उसे फोन न करें.

2015 में एक 26 साल की उभरती कलाकार विदेश में पढ़ाई करने के बाद भारत लौटी थी और अपनी मां के साथ एक कार्यक्रम में भाग ले रही थी. दास भी वहां मौजूद थे. उनके काम के बारे में जानने और अध्ययन करने की वजह से महिला दास के पास गई और अपना परिचय दिया. (वहां मौजूद एक उम्रदराज महिला ने दोनों को बातचीत करते देखा और बाद में युवा महिला को सावधान रहने की चेतावनी दी, एक चेतावनी जो दास से मिलने के पहले भी कई और लोगों ने उसे दी.)

अगले दिन महिला के कई परिचितों और दोस्तों ने यह कहने के लिए फोन किया कि दास उससे संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. महिला चिंतित थी और अगले दिन महरौली में दास के ऑफिस जाने का फैसला किया. उसने सोचा कि जब वो बात करेंगे तो वो दास को अपने कला के कुछ कार्यों को दिखा सकती है और पेशे पर चर्चा कर सकती है.

साक्षात्कार उसके जीवन के “सबसे विचित्र चार घंटे” साबित हुए. पहले घंटे के दौरान दास ने उसे अपनी कलाकृति को देखने बार-बार वापस भेजा और इस दौरान खुद दो अन्य महिलाओं से बात कर रहे थे.

जब मुलाकात शुरू हुआ, दास ने महिला से कहा कि जब वो पहली बार उससे मिले थे- इस बातचीत से एक दिन पहले- उन्होंने “उसकी आत्मा में झांका था” और देखा था कि वो उनके लिए काम करेगी.

फिर वो महिला से उसके नाम का अर्थ पूछने लगे लेकिन जैसे ही उसने बताया तो दास ने उसे बीच में ही तुरंत रोक दिया. लड़की कहती है, “ईमानदारी से कहूं तो उन दो घंटों में मैं मुश्किल से 20 शब्द बोल पाई. मैं जो भी कह रही थी उसके बारे में दास कहते, ‘नहीं, ये ग़लत है. मैं तुम्हें बताता हूं.’”

बातचीत में जल्द ही दास ने एक खास युवा महिला की अनुपस्थिति का जिक्र किया जो उनके ऑफिस में उनके साथ काम करती थी. उसने आना बंद कर दिया था क्योंकि दास के साथ उसके काम का तरीका उसके भाई को पसंद नहीं था. दास ने लड़की से कहा, “मुझे नहीं पता क्यों लेकिन ये हमेशा होता है.”

दास ने ये जाने बिना कि वो इस अवसर के तैयार थी या नहीं आपना फैसला सुनाया कि कि वो उनके लिए काम करेगी. उन्होंने कुछ बातें फतवे की तरह जारी करते हुए कहा- उस दिन दास के यहां आने के लिए उसने जिस कार का इस्तेमाल किया था उसकी जगह वो बस में सफर करेगी. वो उसे अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही उनकी सहायता करने की अनुमति नहीं देंगे. उल्टे उन्होंने उसे बताया कि पहले कुछ महीनों वो उनके कार्यालय में झाडू और पोछा लगाने का काम करेगी.

उसने बताया कि दास ने उससे कहा, “हर दिन तुम अलग तरह से तैयार होगी. जैसे कि आज तुमने पैंट-शर्ट पहना है तो कल तुम कुर्ता पायजामा पहनोगी और फिर लहंगा चोली और फिर ये ऐसे ही जारी रहेगा.” लड़की ने मुझसे कहा, “मैं ठीक और इन सबके लिए आपका शुक्रिया जैसी बातें कहती रही क्योंकि जो हो रहा था वो बेहद अजीब था. एक समय के बाद मुझे लगा, ‘ये व्यक्ति बिल्कुल सनकी है.’ लड़की के दिमाग में ऐसे सवाल चर रहे थे, ‘वो ऐसा क्यों करना चाहेगा’ और ‘मैं यहां से कैसे निकलूं?’”

दास ने फिर लड़की से उसका, उसकी मां का और घर का लैंडलाइन नंबर मांगा. इसके तुरंत बाद वो लड़की की तस्वीरें लेने लग गए. जब भी दास एक तस्वीर खींचते तो “म्याउं-म्याउं” की आवाज़ निकालते.

लड़की को याद है कि वहां से निकलने के लिए उसने “कई बहाने” बनाए, दास ने सारे खारिज कर दिए. अंतत: जब उसे घरवालों के कई कॉल आ चुके थे, उसने दास से कहा कि उसे अपने कुत्ते को बाहर ले जाना है, दास ने उसे जाने दिया. दास ने उससे कहा, “ये बढ़िया है, तुम्हें अपने कुत्ते को घुमाना है, मुझे ये बहाना पसंद आया.”

बाद में उसने अपनी मां से सब बता दिया. मां को इस बात पर गुस्सा आया कि बेटी खुद के लिए खड़ी नहीं हो पाई.

लड़की ने कहा, “मैंने उस दिन अपनी मां को सिर्फ तस्वीरों के बारे में नहीं बताया क्योंकि मुझे वो बेहद अजीब लग रहा था. मैंने उसे कई हफ्तों बाद बताया. आपको पता है ये मेरे सबसे अजीब और दखल देने जैसा था.” उसकी मां ने मुझे बताया कि इसके कुछ दिनों बाद तक लड़की का ये हाल था कि दास की वजह से उसने किसी भी फोन पर किसी भी अंजान नंबर का फोन उठाना बंद कर दिया था. महिला ने दास को ये बताने के लिए ईमेल भेजा था कि वो उनके साथ काम नहीं कर पाएगी.

दास के साथ काम करने का फैसला करने वालों ने उनमें एक अनियमित, मूडी, अप्रत्याशित बॉस पाया.

एक 24 साल की महिला एक गैलरी में काम कर रही थी जब 2011 में पहली बार दास से उसकी मुलाकात हुई. दास ने उसे अपना बिजनेस कार्ड दिया और कहा कि जब उसे बड़ी चीजों से जुड़ने हो तो वो दास को ज्वाइन कर ले. एक पेशेवर के तौर पर उसे अपने कार्यस्थल में “काफी कम इस्तेमाल” महसूस होता था. उसने कुछ महीनों में गैलरी में अपनी नौकरी छोड़ दी और दास के लिए एक शोधकर्ता और पुरातात्विक के रूप में काम करने पर सहमत हो गई. महिला को जल्द ही एहसास हुआ कि उसका काम वह नहीं होगा जो उसने सोचा था. जब करने के लिए बहुत कुछ नहीं होता था, तो वह महिला से बार-बार अपना रेज़्युमे ठीक करवाते थे.

उनके अनुसार दास बार-बार पेशेवर और व्यक्तिगत सीमाओं को धुंधला कर देते थे. उसने एक घटना याद की जब एक युवा लड़की ऑफिस का हिस्सा बनी थी. ऑफिस में उसने सलवार-कुर्ता में प्लेट वाला दुपट्टा पहन रखा था जिससे उसका पूरा शरीर ढंका हुआ था. दास ने तुरंत युवा महिला को डांटा और कहा कि वो दुपट्टा हटा दे-“ये निकालो”-उन्होंने ये पितृसत्ता से जोड़ते हुए महिलाओं के पिछड़ने का कारण बताया. महिला ने मुझसे कहा, “वो बहुत डरी गई और अगले दिन से ऑफिस आना बंद कर दिया.”

बाद में दास महिला ने बाकी के काम करवाने लगे. उसने बताया, “मैंने स्टूडियों में उनके बच्चे का ख्याल रखने का काम शुरू कर दिया था और मुझे इसका एहसास भी नहीं हुआ. सिर्फ मैं नहीं, बल्कि सब ये काम कर रहे थे. मैं उनके घर से उनका खाना लाती और कुक से इस पर बात करती की खाने में क्या बनेगा.” महिला ने सोचा, “मैं उनकी साथी नहीं हूं, उनकी बेटी या उसके घर की रखवाली नहीं हूं, मैं ये सब क्यों कर रहा हूं, मैं अभी यहां क्या कर रहा हूं?” उसकी दोस्त ने मुझसे कहा कि महिला ने उसे बताया था कि दास ने कहा, “ख़ुद को एक गृहणी समझो.”

दो से तीन मौकों पर दास ने महिला को अपने घर पीने या रात के खाने के लिए बुलाया. जैसा कि महिला बताती है कि इस दौरान उनकी आवाज़ को “नरम” हो जाती और वो अपने जीवन और साथी के बारे में अधिक घनिष्ठता से बातचीत करने लगते. एक बार उसकी आवाज की तारीफ करने वाले दास ने उसे गाने को कहा. उसने गाया. दास ने महिला पर अपना हाथ रख दिया और उसे लगा कि उसे हाथ हटा देना चाहिए या वो अपने से बेहद वरिष्ठ व्यक्ति के बारे कुछ ज़्यादा ही सोच रही है.

महिला को याद है कि ऐसी ही एक और शाम के दौरान दास ने उससे कहा कि वो एक बूढ़ा आदमी हैं जिनकी देखभाल किए जाने की ज़रूरत है. इस बात में काफी अंतरंगता थी जिसे उसने तब तो खारिज कर दिया, लेकिन समय के साथ उसे ये बेहद अजीब लगा. इसी तरह काटोच ने मुझे बताया कि जब दास ने उनके जुड़ने के दूसरे दिन उनसे जो कहा था उससे वो कितनी अजीब महसूस कर रही थी: “मैं बहुत सिगरेट पीता हूँ, नहीं? अगली बार तुम्हे मुझे रोकना चाहिए.” कटोच को याद है कि उस समय वो ये सोच रही थीं “मैं आपकी पत्नी, आपकी सचिव या कोई ऐसी नहीं जो आपको सिगरेट पीने से रोके. मुझे बहुत बुरा लगा.” अगले दिन दास ने सुझाव दिया के वो उनके साथ रहने चली आए ताकि उनका किराया बचे.

एक और महिला ने 2014 में एक साक्षात्कार के दौरान दास के “आंशिक रूप से मिठी बातें, आंशिक रूप से हकदार और आंशिक रूप अनरोधपूर्ण” तरीके को याद करते हुए एक समान भावना को प्रतिबिंबित किया. उन्होंने कहा, “सैद्धांतिक रूप से मुझे पता है कि क्या हो रहा है, लेकिन व्यावसायिक रूप से मैं ना नहीं कह सकती थी, क्योंकि मुझे नहीं कहने के लिए प्रशिक्षित ही नहीं किया गया था.” उसने देखा कि दास ने बार-बार एक युवा इंटर्न को “बेबी” कह रहे हैं. बातचीत के दौरान उन्हें भी संबोधित करने के लिए दास यही शब्द इस्तेमाल करने लगे.

एक समय दास ने उससे पूछा कि क्या वो अपनी आंखें बंद करे ताकि वो उस तक पहुंच सकें. जब उसने इसे हंस कर टाल दिया तो दास ने जोर देकर कहा कि उसकी ये प्रतिक्रिया आधुनिक महिलाओं का वो लक्षण है जिसकी वजह से वो किसी पर भरोसा नहीं करती हैं. लड़की ने कहा, “मैं इस व्यक्ति के आस-पास होना ही नहीं चाहती. आप सिर्फ मुझे संग्रह करने के काम में नहीं लगाने जा रहे बल्कि तरह तरह की चीज़ें करवाने के अलावा अपने जीवन में ऐसे शामिल करना चाह रहें हैं जिसमें मुझे कोई रूचि नहीं है”

कार्यक्षेत्र के भीतर वो आक्रामक होने के स्तर पर सतर्क रहते थे. गैलरी की महिला ने याद किया कि जो कर्मचारी बहुत अधिक समय बिताते थे-कुछ मिनटों से ज़्यादा-ऑफिस की बालकनी में फोन पर बात कर हुए तो उन्हें तुरंत डांट पड़ती थी. दरअसल यहां कोई भी आ सकता था जिसकी वजह से दास सबकी निजी बातें सुन लिया करते थे और अगर किचन जैसे किसी ऐसे एरिया में जो उनकी नज़रों से दूर थे कोई बातचीत लंबी खिंचती थी तो तुरंत आवाज़ लगाकर उन्हें बुला लेते.

गैलरी में काम करने वाली महिला के मुताबिक दास को बहुत गुस्सा आता था और जिनके ऊपर उन्हें गुस्सा आता था उन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था. अंततः उसने इस तरह के एक प्रकरण के दौरान, जिस तरह से दास बात करते हैं, उनके साथ इस मुद्दे को हल करने का साहस जुटाया. उन्होंने कुछ सोचा, अपनी चीजें समेटी और चल दिए. महिला ने कहा, “मैं उनसे लड़ नहीं सकी- क्योंकि मेरे पास एक बेहतर नौकरी, बेहतर अवसर बेहतर सैलरी नहीं थी.”

2011 में एक प्रमुख अखबार के साथ काम कर रही 22 साल की फ्रीलांस पत्रकार को एक पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता ने दास से मिलवाया. दूसरों की तरह उसे भी सैलरी या कौशल जैसी बातें, जो उसकी भूमिका तय करेंगी, के बिना तत्काल नौकरी पर रख लिया गया. मौक़े को खतरे में डाले बिना उसने बाद में सैलरी पर बात करने का फैसला किया. उसने कहा कि उसने सब सोचा, “जैसा कि मैं बस शुरू कर रही हूं, मुझे किसी अच्छी जगह शुरू करना चाहिए. आपको पता है कि आपसे हमेशा कहा जाता है कि आपको बस एक सही मौके की दरकार होती है.”

पत्रकार ने याद किया कि दास उसकी निजता का उल्लंघन करते रहते थे. जब वो कंप्यूटर पर काम कर रही थी तो उसने याद किया कि “वो मेरे करीब बैठे थे, ये इतना करीब था कि मुझे यकीन था कि वो मेरी सांस सूंघ सकता हैं और मुझे पता था कि मैं उनकी सांस.” महिला ने इस पर बात नहीं की क्योंकि ये उसका पहली या दूसरी नौकरी का अनुभव था और उसे इसकी चिंता थी कि उसके बारे में ये राय बना ली जाएगी कि वो “किसी द्वारा छुए जाने” से भी परहेज करती है, एक ऐसा लड़की जो इतनी रूढ़िवादी है और ऑफिस के माहौल में सही नहीं क्योंकि वो किसी के देखने मात्र से संभल जाती है. उसे याद आया कि दास की उपस्थिति में असहज महसूस करने लगी. दास ने जवानी में अपने शरीर के साथ प्रयोग करने के महत्व के बारे में उससे बात की- इस बातचीत ने उसे साफ तौर से सचेत कर दिया.

एक बार जब पत्रकार ने कंप्युटर से संबंधित दास के एक काम को पूरा कर लिया तो दास ने उसके गालों पर अपने हाथ फेर दिया. वो हिल गई. वो कहती है, “मैं अदर से जल उठी, मैं बेहद गुस्से में थी.”

उसके आखिरी जब वो जाने को तैयार हो रही थी तो दास ने इस बात पर जोर दिया कि वो उसे मेन रोड तक छोड़कर आएंगे. महिला ने कार में अपने मेहनताने की बात की. उसे काम करते हुए थोड़ा वक्त हो गया था. जब उसने दास से कहा कि मिल रहे वेतन से- तब उसे 10,000 मिल रहे थे- खर्चों को मैनेज करना मुश्किल है तो दास बौखला गए.

वो उस पर चिल्लाने लगे, उसे और उस जैसे युवाओं को उनके साथ काम करने से प्राप्त हो रहे कौशल की जगह पैसों को तरजीह देने पर फटकार लगाई. लड़की कहती है, “मुझे समझ नहीं आया कि वो क्या बोल गए. जिस तरह वो चिल्ला रहे थे मुझे लगा कि वो मुझे अपने क्रोध के प्रभाव से कार से बाहर लात मार कर फेंक रहे हैं.” उस रात वो एक दोस्त के घर गई और उसे और उसकी मां को सब बता दिया. दोस्त की मां ने उसे बताया कि सालों पहले उन्होंने भी दास के साथ काम किया था. उन्होंने अपने अनुभव के बारे में जानकारी नहीं दी लेकिन कहा कि असहजता उनके अचानक से चले जाने के लिए काफी थी.

उसकी तरह जितनी महिलाओं से मैंने बात की-उनके लिए अभद्र टिप्पणियों से गलत शारीरिक पहुंच तक- ऐसा समय आया कि अगले दिन वहां जाना सही विकल्प नहीं था.

2004 में एक महिला एक प्रदर्शनी के लिए दास की सहायता कर रही थी. उन्होंने याद किया कि वो महिलाओं के एक समूह के साथ काम कर रही थीं, जिनमें एक को छोड़ सभी अपने 20वें साल की शुरुआत में थीं. शुरुआत में वो दास के घर से काम कर रही थीं फिर वो प्रदर्शनी स्थल पर चली गईं. महिला ने कहा कि दास की पत्नी अक्सर इस दौरान आसपास ही रहती थीं, लेकिन उसने गौर किया कि जब वो नहीं रहती थीं, दास उनसे ऐसे निजी सवाल करते थे जो पत्नी की मौजूदगी में नहीं करते थे.

जब दास ने महिलाओं से कहा कि उन्हें काम करने के लिए उनके शाहपुर जाट के स्टूडियो में जाना होगा, तो उसे इसमें कुछ अजीब नहीं लगा.

स्टूडियो में दास उस महिला की तस्वीरें लेने लगे. वो असंयत तरीके डीलडौल की तारीफ कर रहे थे. महिला ने मुझे बताया, “आप ऐसी चीजों का बुरा नहीं मानते, आपको लगता है कि एक कलाकार, जो किसी के सौंदर्य को जानता है, सोचता है कि आप सुंदर हैं. आप इसे तारीफ समझती हैं.” दास ने उन्हें निर्देश देते हुए कहा, “यहां देखो, वहां देखो. तुम्हारी आंखों में आसमान सी ख़ूबसूरती है.” और तस्वीरें लेते रहे.

तस्वीर लेने के बाद, दास स्टूडियो में महिला के साथ बैठ गए. उसने उससे कहा, “तुम जानती हो, मुझे तुम्हारे साथ आत्मीय संबंध महसूस हो रहा है.” बिल्कुल ऐसी ही टिप्पणी उन्होंने 10 साल बाद एक उभरती हुई कलाकार पर की. जो होने वाला था उसे लेकर महिला सावधान हो गई. वो डरी नहीं थी. उन्होंने याद करते हुए कहा कि वो सोच रही थी, “तुम तब तक जैसी चाहे बातें कर सकते हो जब तक मुझे गाली नहीं दे रहे. जो बोलना है बोल लो.” फिर भी उनकी बेकार की बातों से नाराज होकर महिला ने दास से पूछा कि क्या उन्होंने अपनी पत्नी को उस संबंध के बारे में बताया था जिसे वो महसूस करते हैं. उन्होंने कहा, “नहीं, नहीं, नहीं. ये हमारे बीच का छोटा सा सीक्रेट है.”

दास ने महिला को गले लगा लिया और अपने आगोश में खींचने की कोशिश की. महिला याद करते हुए कहती हैं, “उन्होंने मेरे गाल चूम लिए, उन्होंने लगभग मेरे होंठ भी चूम लिए और तभी मैंने हिम्मत जुटाकर उन्हे दूर धकेल दिया.” हालांकि, महिला ने विरोध में आवाज नहीं उठाई या मदद के लिए शोर नहीं मचाया लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज से दास को लग गया था कि वो महिला के साथ दूसरी बार ऐसा नहीं कर सकते. वो पीछे हट गए. महिला को नहीं याद कि इसके पहले या बाद में क्या हुआ. महिला ने मुझसे कहा, “कोई आपको वैसे चूमने या गले लगाने लग जाता है तो कुछ देर बाद आपके शरीर को सदमा सा लग जाता है.”

तन्वी मिश्रा ने सदमे के ऐसे ही एक अनुभव को याद किया. 2006 में जब आर्काइव को ठीक करने में मदद करने के लिए दास के स्टूडियो में इंटर्नशिप शुरू की तब वो 19 साल की थी. दूसरे या तीसरे दिन जब वो बाहर जा रही थी तो दास उनसे हल्की-फुल्की बातचीत करने लगे. पास में एक लड़का खेल रहा था. बिना जाने-पूछे बगैर दास ने लड़की को गले लगा लिया. लड़की कहती है, “मुझे ये पल याद है.” मिश्रा ने एक आदमी के रूप में दास की विशालकाय को याद किया और अपने पेट पर उनके बदन के छूने से पैदा हुई सनसनी से असहजता महसूस की. वो कहती हैं, “उनके दोनों हाथों ने मुझे घेर लिया था. ये बहुत तेज़ी से हुआ. मुझे अभी भी पता है कि कोई मेरे साथ ये करता है तो ये ग़लत है. ये एक खराब छुअन का एहसास था.”

गले लगने के अलावा दास ने मिश्रा से जो कहा वो भी उनके शरीर के साथ हुए गलत अनुभव की तरह उनके जीवन में ठहर सा गया. दास ने कहा, “तुम्हें ये पसंद है, है ना?” मैं उनके करीब वैसे भी नर्वस हो जाती थी. उस समय मेरे पास इसका विरोध करने की ताकत नहीं थी.” वो तुरंत स्टूडियो से बाहर चली गई, लेकिन जैसे ही वो कमरे से बाहर निकलीं वो तेजी से दौड़ने लगीं. वो तब तक नहीं रुकीं जब तक सड़क के कोने पर एक छोटी सी दुकान नहीं मिली, जिसमें फोन था. उन्होंने रोते हुए एक करीबी दोस्त को फोन किया.

दोनों महिलाओं ने जिस तरह का लकवा महसूस किया वह केवल गैर-सहमति वाले यौन उत्पीड़न का नतीजा नहीं था, बल्कि इसलिए भी दास ने ऐसा किया था. प्रदर्शनी के लिए काम करने वाली महिला ने कहा, “क्योंकि मेरे भीतर इस व्यक्ति के लिए आदर था, ऐसे में आपको लगता है, ‘इस पर मैं कैसी प्रतिक्रिया दूं?’ वो भी तब जब ये ठीक उसी समय हो रहा है … वो मेरे ऊपर हावी हो रहे हैं, मेरे शरीर को छू रहे हैं और मुझे गले लगा रहे हैं और वो मेरे गालों को चूम रहे हैं और मेरे होठों को तलाश रहे हैं और मैं अभी भी सोच रही हूं, ‘ऐसे में कुछ भी करने का सही तरीका क्या होगा?’”

मिश्रा ने उस “शक्ति की भावना” के बारे में बातया जो दास के भीतर इस तरह के काम करने के लिए थी. “आप एक बड़े कलाकार हैं और मैं एक कॉलेज की छात्रा. ये वो दंभ की भावना है जो उनके भीतर मौजूद थी” जिसकी वजह से मिश्रा को सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा आता था. उन्हें शब्दों से भी वही भाव महसूस हुआ था जैसा छुअन से. इसने उन्हें एक ऐसे मामले में अपनी भूमिका के बारे में सोचने को मजबूर किया जिसमें वो कुछ नहीं कर सकती थी. मिश्रा ने कहा, “मैं वहां खड़ी थी. मैं वहां शारीरिक रूप से मौजूद थी. तो … क्या इससे उन्हें लगा कि मैं इसके लिए सहमत हूं? क्या यह केवल तभी होता है जब आप चिल्लाते और शोर मचाते हैं, किसी को धक्का देते हैं और कहते हैं, ‘नहीं, नहीं, नहीं’-क्या ना कहना इसे कहते हैं?” अपनी मां को इस बारे में बताने के बाद मिश्रा ने स्टूडियो में वापस नहीं जाने का फैसला किया. उन्होंने इस तरह इंटर्नशिप छोड़ने की निराशा को याद किया. मिश्रा कहती हैं, “मौके के हाथ से चले जाने की वजह से एक उदासी की भावना भी है क्योंकि पहले ये बहुत बड़ा लगा था, मुझे लगा मैं अच्छा कर रही हूं.”

प्रदर्शनी पर दास के साथ काम करने वाली महिला ने मुझे बताया, “मैं अब उस आदमी का सम्मान नहीं करती. वो जो भी पुरस्कार हासिल कर रहा है करता रहे, लेकिन वो उनके लायक नहीं है. मेरी आंखों में वो उनके लायक नहीं है.” उसने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं बताया. एक युवा महिला के रूप में जो दुनिया में बस कदम उठा रही थी, वह नहीं चाहती थी कि यह घटना उसकी आजादी की सीमा को परिभाषित करे. इस घटना के कुछ पहलुओं को कुछ लोगों से बातने के अलावा, यह पहली बार था जब उन्होंने किसी से इस बारे में विस्तार से अपना अनुभव साझा किया था.

अगस्त 2015 में 25 साल की एक महिला दास के ऑफिस साथ कई और ऑफिस वाली एक इमारत की सीढ़ियों पर अपने सहयोगियों के साथ काम से ब्रेक ले रही थी. दास एक प्रसिद्ध वास्तुकार पर अपनी पुस्तक के लिए एक सहायक की अपनी खोज के बारे में उनसे बात करने के लिए आए थे. ये एक ऐसे समूह जिसे वो जानते भी नहीं थे के लिए एक अजीब अनुरोध था लेकिन लड़की मदद करने को खुश से तैयार थीं.

लड़की ने दास को बताया कि उसकी एक दोस्त इस प्रोफाइल के लिए फिट होगी और दास से संक्षिप्त जानकारी देने के लिए कहा. दास ने उसे बताया कि उन्होंने इसे टाइप करा लिया है लेकिन प्रिंट-आउट नहीं लाए हैं. उन्होंने उसे काम पूरा करने के बाद उनके ऑफिस आने को कहा ताकि उसे एक कॉपी दे सकें.

फोन पर हमारी बातचीत के पांच मिनट के भीतर दास के स्टूडियो जाने के लिए महिला ने खुद को “बेहद बेवकूफ” करार दिया. कॉपी देने के बाद दास ने उसे काम से जुड़ने के लिए मनाने की कोशिश की. वो उनके प्रस्ताव से संतुष्ट थी लेकिन इसे अस्वीकार कर दिया. फिर भी वो अपने दोस्त और दास में एक आशाजनक मेंटर मिलने की बात से उत्साहित थी.

दास ने उससे कहा, “अपने आप को मुझे समर्पित कर दो और मैं तुम्हें असाधारण बना दूंगा.” महिला बंगाली है और उसने याद किया कि दास ने उसे इसी भाषा में यह कहा था. उसने कहा, “क्योंकि वो बहुत स्थानीय भाषा का उपयोग कर रहे थे इसलिए मैंने वास्तव में बेहद असहज महसूस करना शुरू कर दिया.”

दास ने महिला से उन तस्वीरों के लिए तैयार होने के लिए कहा जो वो पोर्ट्रेट के लिए इस्तेमला करना चाहते थे. जब वो तस्वीरें ले रहे थे तो उन्होंने लड़की से कहा कि उसे अपने बालों को बांधना चाहिए क्योंकि उसकी गर्दन सुंदर है. उभरते कलाकार के मामले में उन्होंने उसे हर रोज एक ड्रेस पहनने के लिए कहा, हालांकि उन्होंने यह नहीं कहा कि ड्रेस कैसी हो.

महिला साफ तौर पर असहज थी. उसे लगा था कि ये उसे सहज करने के लिए है जब दास ने उससे पूछा कि क्या वो उनकी पेंटिंग देखना चाहेगी जो कमरे के पीछले हिस्से में थीं. जब वो उनकी कला का काम देख रही थी, दास सरक कर उसके पीछे चले आए. वो कहती है, “मैं वहां खड़ी थी और वो पीछे से आए और फिर उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मेरी गर्दन चूमने लगे.” लड़की घबरा गई. वो मुड़ी और कहा कि उसे जाना होगा क्योंकि उसके सहयोगी ऑफिस में इतंजार कर रहे होंगे, कमरे के केंद्र में टेबल से अपना फोन उठाया और जल्दी से वहां से चली गई.

बाहर आकर लड़की ऐसे जगह की तलाश करने लगी जहां खुद को संभाल सके. वो अपने ऑफिस वापस नहीं जा सकी क्योंकि उसे पता था कि वो जगह खाली नहीं होगी. अंत में वो एक एटीएम में चली गई. उसनें मुझे बताया, “मुझे एटीएम बिल्कुल याद है, क्योंकि ये बहुत अजीब था, ये सोच कि आपके पास जाने की कोई जगह नहीं थी, यह बहुत निराशाजनक था.” एक सहयोगी ने उसे वहां पाया और उसे ये कहते हुए सांत्वना दी कि ये उसकी गलती नहीं थी.

या तो उसके ऑफिस जाकर या टेलिफोन पर करीब अगले कुछ हफ्ते तक दास ने उससे संपर्क करने की कोशिश की. कुछ महीने बाद एक ब्रेक के दौरान दास की मुलाकात उससे और उसके दोस्त से हो गई. उन्होंने उनसे कहा कि पास के रेस्तरां में एक कविता पाठ हो रहा है और उन्हें आमंत्रित किया. महिला के किसी भी दोस्तों ने जवाब नहीं दिया, वो सभी जानती थीं कि क्या हुआ था. उसने दास को बताया, “मुझे नहीं लगता कि हममें से कोई जा पाएगा, हम सभी व्यस्त हैं.” दास ने उसकी आंखों में देखा. उन्होंने कहा, “जीवन में आपके पास कुछ अवसर केवल एक बार आते हैं, आपको सीखना चाहिए कि इसे कब पकड़ना है.” वो फिर कभी नहीं मिले.

इनमें से किसी भी मामले में कोई क्लोजर या स्वीकारोक्ति नहीं हुई है. एक व्यक्ति द्वारा संचालित इस संस्थान के भीतर कोई आंतरिक शिकायत समिति नहीं थी जहां महिलाएं संपर्क कर सकती थीं. पुलिस में शिकायत तो बिकल्प ही नहीं था इसकी वजह न्याय व्यवस्था में वो कमजोर विश्वास था जो इसने ऐसे मामलों से निपटने के मामले में बनाया है. अब तक, जहां तक ​​दास का मामला है, महिलाओं के साथ उनका नियमित उत्पीड़न ऐसा ही रहा: जैसे दिनचर्या का एक हिस्सा हो जिसने उनकी प्रतिष्ठा को खराब नहीं किया या बहुत बड़ा व्यक्ति होने की उनकी छवि को नुकसान नहीं पहुंचाया.

फिर भी, इनमें से कई महिलाओं के ऊपर दास की करनी ने प्रभाव को छोड़ दिया था. अपने करियर के एक बड़े हिस्से में एक फ्रीलांसर होने के बावजूद, मिश्रा अधिकांश मौकों पर, लोगों के व्यक्तिगत स्थानों में काम करने वाले किसी भी अवसर से दूर रहीं. इसी तरह, जिस पत्रकार ने 2011 में दास के साथ काम किया था, उसने पाया कि समय के साथ, कई अनुभव, जिनमें दास वाला अनुभव भी शामिल था ने उन्हें ऐसा बना दिया था जिससे वो कमज़ोर प्रतीत होती थीं, फिर उनके कमज़ोर होने के बारे में एक राय बन गई.

उन महिलाओं में से आधे से ज्यादा ने जिन्होंने मुझसे बात की अपना अनुभव बताने के बाद उन्हें खीझ महसूस हुई. पत्रकार की मानसिक स्थिति- चिंता और अवसाद-इसके बाद बढ़ गए जब उसने अपने अनुभव को एक और रिपोर्टर के साथ साझा किया. पराडकर ने मुझे ट्विटर पर एक मैसेज में लिखा, “शुरुआती दिनों के सदमे के बाद ये शारीरिक क्रूरता के आघात का मामला नहीं था. यह एक धीमी जलन थी.”

इसे ये बात और बदतर बना देती थी कि दास के बारे में ये सबको पता था लेकिन एक महिला जब इस बारे में बात करना शुरू करती थी तो उसे पता चलता था कि दूसरों के साथ भी ऐसा ही हुआ है. मिश्रा ने घटना के तुरंत बाद दास के साथ इंटर्नशिप के बारे में एक दोस्त की मां को बताया. दोस्त की मां ने कहा, “यह कला दुनिया में एक खुला रहस्य है, मैं आश्चर्यचकित नहीं हूं.” “मुझे पता है कि मैंने और लोगों को बताया है और लोगों ने प्रतिक्रिया दी है कि जो वो सुन रहे हैं उसमें कुछ नया नहीं है, आम तौर पर मर्दों के बारे में नहीं, बल्कि दास के बारे में. ये मेरे साथ ठहर सा गया है … लोग आसानी से कह देते हैं कि ये एक खुला रहस्य है लेकिन वो अभी भी बेहद ताकतवर इंसान है.”

जिस महिला ने गैलरी वाला काम किया था उसने कहा कि वो ऐसे कलाकारों और गैलरी मालिकों को जानती हैं जो कहते हैं कि उन्हें पता है कि दास कैसे हैं लेकिन कोई उनके ख़िलाफ़ नहीं बोलना चाहता है. वो कहती हैं, “मैंने इसका सामान्यीकरण देखा और भारतीय कला उद्योग के साथ मेरी यही शिकायत है क्योंकि सामान्यीकरण की जड़ इस कारण है कि कलाकारों को विचित्र कहा जाता है.”

कई महिलाओं ने आत्म निंदा व्यक्त की. पराडकर ने कहा, “मैंने बेहद बेवकुफ की तरह महसूस किया, एक बेवकूफ. मैं पहले से ही सिर्फ पत्रकारिता में स्मार्ट नहीं थी- जो मुझे उन सभी इशारों में बताया जा रहा था जो मुझे पास किए जा रहे थे- मैं मर्दों को पढ़ने में भी स्मार्ट नहीं थी. इसकी वजह से मैंने बहुत बेवकूफ महसूस किया.”

जो अपने दोस्त की नौकरी का विवरण लेने गई थी उस महिला ने कहा, “ये पछतावा हमेशा रहेगा कि मुझे समझ जाना चाहिए था और नहीं जाना चाहिए था.” दास की प्रदर्शनी के लिए काम करने वाली महिला ने कहा कि घटना ने उसे इस सोच के साथ छोड़ दिया  “क्या मैं कहीं गलत थी? क्या मैंने ऐसा आइडिया दिया कि वो मेरे साथ ये कर सकते हैं?” उनकी अब शादी हो गई है और दो बेटियां हैं. उसने मुझे अपने बच्चों के भविष्य के लिए सपनों की बात करते हुए बताया, “मैं उनको किसी भी ऐसी बात के लिए खुद को दोष नहीं देने दूंगी जिसमें उनकी गलती नहीं है.” यहां वो रुक गईं. उन्होंने पूछा, “फिर आप खुद को क्यों दोष देती आई हैं? आपको पता है, जैसा अपने कई मामलों में देखा है, आपको पता है कि आप गलत समय में गलत जगह पर नहीं थीं. आप सिर्फ गलत आदमी के साथ थी.”

लेकिन जब महिलाएं उस कंट्रोल को याद करते हुए कष्ट महसूस कर रही थीं जो वो ऐसी स्थिति में बेहतर तरीके से दिखा सकती थीं, ऐसी कोई बात दास की तरफ से सामने नहीं आई. उन्होंने बोरा के आरोपों को “भद्दा” कहते हुए खारिज कर दिया और दावा किया कि वो कभी उससे मिले नहीं थे और “एक खेल खेला जा रहा है” जिसके तहत आरोप इसलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि इसमें लोगों को मजा आ रहा है. द वायर में पराडकर के आरोपों के जवाब में उन्होंने कहा कि वो आरोपों से “बहुत पीड़ित” हैं और माफी मांगते हुए कहा “अगर किसी औरत ने मेरे कारण किसी तरह की असहजता महसूस की है … तो यह मेरा इरादा कभी नहीं था.” दास ने उन सवालों के जवाब नहीं दिए जो दी कारवां ने उन्हें भेजे थे.

कई महिलाओं द्वारा लगाए गए इन आरोपों के मामले में दास को किन परिणामों का सामना करना पड़ सकता है ये तो अभी तक साफ नहीं है. हमारे साक्षात्कार के तुरंत बाद बोरा ने मुझे लिखा: “अगला कदम कौन उठाएगा? क्या इस व्यक्ति को देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार रखने की अनुमति दी जानी चाहिए? अगर हां, तो ये हमारे देश के बारे में क्या बताता है?”

जैसा कि पराडकर ने कहा कि सिर्फ कला जगत को आत्मनिरीक्षण की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने कहा, “मैं अब उम्मीद कर रहा हूं कि कला जगत, पत्रकारिता जगत, बाकी के उद्योग इसे पीआर अभ्यास के रूप में नहीं लेंगे. लेकिन उनकी प्रतिभा, उनकी रचनात्मकता, उनकी उत्पादकता को पोषित करने के संदर्भ में वे क्या सोचते हैं, इस पर एक अच्छी और गहरी नजर डालेंगे.”

दी कारवां के उस फीचर को याद करते हुए जिसने दास के बार में हमारी पहली बातचीत को शुरू किया था, मिश्रा ने कहा, “मैंने महसूस किया कि अंदर के पन्नों में आकर मैंने उनके साथ शांति स्थापित कर ली है और अब उनसे कभी मुलाकात नहीं होगी. लेकिन मेरी संस्था ने उसे झुका दिया था, है ना? और इस तरह इसे प्रचारित किया जाता है. और मैं उस प्रक्रिया का हिस्सा थी. और अगर मैं इस बारे में फैसला नहीं लेती तो बाकी कैसे लेंगे?” उन्होंने आगे कहा, “मुझे उम्मीद है कि ये अब छिपा नहीं रहेगा, ऐसा तथ्य की ऐसी बातें छिपी रहती हैं, ऐसा करने वालों को बल देती हैं और ये समाज में उनकी स्थिति को बरकरार रखती हैं … किसी ने पहली आवाज उठाई. और हम इसके बारे में बात कर रहे हैं और हम इसका जश्न मना रहे हैं- हम खुद ऐसा करने के बारे में कभी नहीं सोचते. लेकिन अकेली लड़की या अकेला व्यक्ति बदलाव लाने में कभी भी सक्षम नहीं होगा.”

ऐप्पल सैफरौन : अपसाइड डाउन केक

सामग्री सैफरौन ऐप्पल की

– 1/2 कप कैस्टर शुगर

– चुटकी भर केसर

– 1/2 कप ऐप्पल जूस

– 2 सेब टुकड़ों में कटे

– 1/4 कप क्रीम

सामग्री केक की

– 1 कप सूजी

– 1/2 कप औलपर्पस फ्लोर

– 1 कप सेब कट्दूकस किया

– 1/2 कप बटर या घी

– 3/4 कप फुलक्रीम दूध

– 1/2 कप शुगर

– 1 कप योगर्ट

– 1/2 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर

– केक टिन.

विधि

– सैफरौन ऐप्पल बनाने के लिए गहरे पेंदे के बरतन में सब से पहले कैस्टर शुगर, केसर और ऐप्पल जूस को डाल कर उबालें.

– फिर इस में सेब के टुकड़ों को डाल कर तब तक पकाएं जब तक टुकड़े नर्म न हो जाएं. अब इस में से ध्यान से ऐप्पल के टुकड़ों को निकाल कर एक प्लेट में रखें.

– एक पैन में क्रीम डालें और फिर ऐप्पल जूस डाल कर अच्छी तरह फेंटें और फिर तब तक पकाएं जब तक ऐप्पल जूस क्रीम में मिक्स न हो जाए. फिर आंच से उतार कर एक तरफ रख दें.

– अब धीमी आंच पर सूजी को हलका भून कर एक बाउल में निकाल कर ठंडा होने दें.

– फिर इस में औलपर्पस फ्लोर, कद्दूकस ऐप्पल, बटर, दूध व कैस्टर शुगर मिला कर तब तक चलाएं जब तक चीनी घुल न जाए.

– फिर इस में योगर्ट, बेकिंग पाउडर, बेकिंग सोडा मिला कर बैटर को केक टिन पर रखें.

– पहले से गरम ओवन में 20-25 मिनट तक केक को सुनहरा होने तक बेक करें.

– ओवन से निकाल कर सेब के टुकड़ों से सजा कर पहले से तैयार क्रीम स्प्रैड कर सर्व करें.

ऐप्रिकोट : पोमेग्रैनेट परफैक्ट

सामग्री

– 20 ड्राई ऐप्रिकोट 6 घंटे 3 कप पानी में भिगोए हुए

– 1/4 छोटा चम्मच इलायची दाना

– थोड़ा सा अनारदाना

– 1 कप क्रीम चीज

– 2 बड़े चम्मच पैशन फू्रट सिरप

– गार्निशिंग के लिए नीबू और संतरे के पतलेपतले टुकड़े.

विधि

– ऐप्रिकोट को 2 टुकड़ों में काट कर पेस्ट तैयार करें.

– एक गहरे पेंदे के पैन में ऐप्रिकोट पेस्ट व इलायची डाल कर धीमी आंच पर गाढ़ा होने तक पकाएं और फिर ठंडा होने दें.

– अब इस में अनारदाना, क्रीम चीज, पैशन फ्रूट सिरप मिला कर अच्छी तरह मिक्स करें.

– तैयार मिक्सचर को 6 बराबर भागों में बांट कर सर्विंग बाउल में डालें.

– ऊपर से चीज क्रीम डाल कर नीबू और संतरे के टुकड़ों से गार्निश करें. ठंडा कर सर्व करें.

कहर

डोल गया शहर

बोल गया कहर,

कल एक शहर था जहां

आज खंडहर है वहां.

कल थी ऊंची मंजिलें जहां

आज है तबाही की दास्तां वहां,

डोलती थी जिंदगियां जहां

अब खामोश हैं लाशें वहां.

दर्द है, कराह है

खौफ है, डर है,

बिलखता हर इनसान.

जो जिंदा है

वो भी खौफ का मारा है,

अब वो न जीता है न मरता है

बस दिन गिनते रहता है.

बसा था बरसों में

उजड़ गया पलों में,

हार गया शहर

जीत गया कहर.

-शोभा ज. चुलेट

हद है ऐसी मूर्खता की

सबरीमाला विवाद पर स्मृति ईरानी का यह कहना कि क्या मैं माहवारी से सना खून का सैनिटरी पैड किसी दोस्त के घर ले जा सकती हूं, उन की मूर्खता और दकियानूसीपन की निशानी है. सबरीमाला मंदिर में औरतों का प्रवेश किसी भी वजह से बंद हो पर यह माहवारी के खून से दूषित हो जाने के कारण तो नहीं है.

जहां तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बात है, तो वह बिलकुल सही है क्योंकि औरतों का कहीं भी प्रवेश बंद होना अपनेआप में गलत है. स्मृति ईरानी के यह कहने का कि दोस्त के घर खून का पैड ले कर नहीं जा सकते सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई मतलब नहीं है. इस मूर्खतापूर्ण बयान का तो मतलब है कि खून के पैड के साथ कोई भी औरत कहीं भी नहीं जा सकती, मंत्री की कुरसी पर भी नहीं बैठ सकती.

अगर बात केवल खून से सने पैड की होती तो सबरीमाला में औरतों का प्रवेश तभी बंद होना चाहिए था जब वे माहवारी से हों. गर्भवती औरतों को तो शायद प्रवेश मिल जाना चाहिए था.

स्मृति ईरानी का बयान असल में उस मानसिकता की देन है जो ‘घरघर की कहानी’ में जम कर बेची गई थी जिस के हर दूसरे सीन में पूजापाठ थी, जगहजगह मंदिर थे, हर जगह संतोंमहंतों की जयजयकार थी. स्मृति ईरानी को वहीं से संघ ने पकड़ा और इसी कारण जम कर बोलने का मौका दिया. ‘घरघर की कहानी’ में औरतों को आजाद नहीं रस्मों का गुलाम ही दिखाया गया था और आज भी स्मृति ईरानी उस सोच की गुलाम हैं. वैसे तो उन की पूरी पार्टी ही ऐसी है. यहां तक कि कांग्रेस या समाजवादी भी पीछे नहीं हैं.

सबरीमाला में पुजारियों की जिद कि वे मंदिर बंद कर देंगे पर औरतों को घुसने न देंगे असल में सुखद समाचार है. मंदिर तो हर जगह बंद होने चाहिए क्योंकि पिछले 2000 सालों में औरतों ने मंदिरों, मसजिदों और चर्चों में ज्यादा यातनाएं सही हैं, बजाय आम पुरुषों के हाथों. पुरुष उन्हें भोगते हैं तो साथ ही खुश भी रखते हैं. धर्मस्थल उन से लेते हैं देते नहीं.

स्मृति ईरानी का तर्क कुछ ज्यादा ले जाएं तो पुरुष भक्त के शरीर में भी कोई मलमूत्र नहीं रहना चाहिए ताकि देवता दूषित न हो. आजकल पुरुष जो मंदिर में चले जाते हैं वे उस मलमूत्र का क्या करते हैं, यह क्या स्मृति ईरानी बताएंगी?

बौयफ्रेंड के इन 5 सवालों से कतराती हैं लड़कियां

कहा जाता है कि लड़कियों को समझ पाना बहुत मुश्किल काम होता हैं, जो कि एक हद तक सही बात हैं. क्योंकि लड़कियों के मन में कब क्या चल रहा होता है, कोई नहीं जान पाता है. लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हर लड़की के मन में छिपी हुई होती हैं और लड़कियां कतराती है कि कहीं उनका बौयफ्रेंड उनसे ये सवाल ना पूछ ले.

जी हां,आज हम आपको उन्हीं कुछ सवालों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका जवाब देने से लड़कियां कतराती हैं और चाहती हैं की उनका बौयफ्रेंड उनसे कभी भी ये सवाल ना पूछे. तो आइये जानते हैं इन सवालों के बारे में.

क्या मैं तुम्हारा पहला प्यार हूं?

हर लड़का अपनी गर्लफ्रैंड से यह सवाल तो जरूर पूछना चाहता है कि क्या वह उसका पहला प्यार है. मगर लड़कियों को अपने बौयफ्रैंड से पहले कोई और जरूर पसंद होता है, चाहे वह उसका क्रश ही क्यों न हो.

क्या तुम मेरी मौम के साथ शौपिंग पर जाओगी?

हर लड़का चाहता है कि उसकी गर्लफ्रैंड उसकी मौम के साथ शौपिंग पर जरूर जाए, ताकि वह इसी बहाने उन्हें अच्छे से जान लें. मगर लड़कियां अपने बौफ्रैंड की मौम के साथ शौपिंग पर जाने से बहुत डरती है.

तुम्हारे पैरेंट्स मुझे पसंद करेंगे या नहीं?

अपनी गर्लफ्रैंड के पेरेंट्स से मिलना लड़कों के लिए सबसे मुश्किल काम होता है और वह पहले ही अपने पार्टनर से यह सवाल करने लगते हैं. मगर लड़कियां इस बात को लेकर खुद इतनी टेंशन में होती है कि वह सवाल से बचना चाहती हैं.

मेरी फ्रैंड या बहन कितनी क्यूट है न!

हर लड़का अपनी गर्लफ्रैंड से यह जरूर पूछता है कि उसकी बहन या दोस्त उसे कैसे लगती है. मगर लड़कियां ऐसी बातों से दूर रहना ही पसंद करती हैं.

तुम अब किसी दूसरे लड़के को डेट तो नहीं करोगी?

लड़कों के मन में हमेशा यह डर रहता है कि उसकी पार्टनर किसी बात को लेकर गुस्सा न हो जाए. ऐसे में अपनी इस इनसिक्योरटी के चलते अपनी गर्लफ्रैंड से यह सवाल पूछ बैठते हैं.

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