साल 2004 में गर्मियों की एक शाम, निशा बोरा अपने ससुर द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक रात्रिभोज में गई थीं. इस कार्यक्रम में प्रतिष्ठित चित्रकार और मूर्तिकार जतिन दास भी मौजूद थे. बोरा के परिवार ने उनका परिचय दास से करवा दिया और बातचीत के दौरान दास ने उनसे पूछा कि क्या वो अगले कुछ दिन उनके सामान को ठीक करवाने में मदद करना चाहेंगी. 28 साल की इस महिला के पास कुछ दिनों का समय था और उसने सोचा कि “एक शानदार कलाकार के साथ काम करना किसी सम्मान” सा होगा और उन्होंने खुशी खुशी हां कर दी. उनके उत्साह का कारण ये भी था कि वो दिग्गज अदाकारा नंदिता दास के पिता भी थे.

दास के घर काम पर गईं बोरा का पहला दिन बिना किसी घटना के गुजर गया. एक ओर दास का बच्चा रो रहा था और निशा चीजों को व्यवस्थित करने में लगी थीं और दास “ओडिशा में अपने आर्ट स्कूल के लिए अपने बड़े सपनों” के बारे में बता रहे थे. जब वो जा रही थीं तो दास ने उन्हें विदेश में अपने सोलो (अकेले का) शो का एक पोस्टर और पंख परियोजना पर लिखी अपनी दस्तखत की हुई किताब गिफ्ट की- हाथ के पंखों का उनका कलेक्शन. बोरा ने अगले दिन दक्षिण दिल्ली में स्थित दास के स्टूडियो का दौरा किया, जिसे उन्होंने “रचनात्मक ऊर्जा से घिरा हुआ एक अद्भुत स्थान” बताया था. वो शराब पी रहे थे. बोरा ने साथ शराब पीने के दास के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया.

अचानक से दास ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की. पहले तो वो उनसे बच के निकल गईं, लेकिन दूसरी बार दास ने उन्हें पकड़ लिया और उनके होठों को चूम लिया. बोरा ने उन्हें धक्का दिया. उन्होंने कहा, “मान भी जाओ, बहुत मजा आएगा.” बोरा के प्रतिरोध से दास व्यग्र हो गए. बोरा ने अपना बैग उठाया ओर तेजी से घर की ओर निकल गईं. कुछ दिनों बाद बोरा के पास नंदिता दास का फोन आया. नंदिता ने कहा कि उनका नंबर उनके पिता ने उन्हें दिया है. दास के पिता ने कहा था कि बोरा उन्हें एक “युवा, महिला सहायक” ढूंढने में मदद कर पाएंगी. याद करते हुए बोरा कहती हैं कि उन्होंने बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाते हुए नंदित से कहा कि वो ये काम नहीं कर पाएंगी.

बोरा ने शायद ही इस घटना के बार में अगले 14 सालों तक किसी से कोई बात की.

हालांकि, 16 अक्टूबर 2018 को मीडिया उद्योग में कई ऐसी महिलाओं से उत्साहित होकर, जो उत्पीड़न करने वालों का नाम ऑनलाइन बता रही थीं, बोरा ने अपनी चुप्पी तोड़ दी. ट्विटर पर उनके द्वारा पोस्ट की गई बात ने कई और महिलाओं को प्रेरित किया और ऐसे आरोपों की एक श्रृंखला सामने आई. उन्होंने लिखा, “आज उस आदमी की बेशर्मी की वजह से मुझे घुटन हो रही है.” दास का नाम लेकर वो अपने बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहती थीं कि “उन्हें दूसरों की हिंसा से डरने की जरूरत नहीं है.”

इसके बाद ऐसे और आरोप सामने आए. 2013 में जतिन दास सेंटर ऑफ आर्ट में अपनी इंटर्नशिप शुरू करने के दौरान गरुषा कटोच 20 साल की थी, उन्होंने आरोप लगाया कि काम के तीसरे दिन दास ने उन्हें गले लगाया चूमने का प्रयास किया. कटोच ने मुझे बताया, “मैं जो महसूस कर रही थी उसे बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे, मेरे पास अभी भी उसके लिए कोई शब्द नहीं है.” 1990 के दशक के मध्य में दास का साक्षात्कार करने वाले इंडो-कनाडाई मूल की पत्रकार श्री पराडकर की मुझसे फोन पर बता हुई और उन्होंने मुझे बताया, “जो चीज मुझे जतिन दास के मामले में परेशान करती है वो ये है कि ये कोई रहस्य नहीं है, ऐसे भी नहीं है को कोई अफवाह फैलाने वाला समूह उनके साथ ऐसा कर रहा था, ये पागलपन की हद तक सामान्य था. सबको पता था.” उनकी बात सबसे पहले न्यूज वेबसाइट द वायर पर छपी थी.

कई महिलाओं का बोलना अभी भी बाकी था. कुछ तो बोरा के पास निजी तौर पर पहुंचकर अपना समर्थन जता रही थीं; अभी भी बाकी की ऐसी महिलाएं जिन्हें दास के किए से आघात हुआ था अपने अनुभव को सार्वजनिक करने के फैसले पर विचार कर रही थीं; और कुछ ने या तो मीडिया संस्थानों को अपने कहानी बता दी थी या बताने के प्रयास में लगी थीं. उनमें से एक दी कारवां की क्रिएटिव डायरेक्टर तन्वी मिश्रा भी हैं.

दास के साथ मिश्रा के अनुभव के बारे में मुझे पहली बार 2017 में एक बातचीत के दौरान तब जानकारी मिली जब हम साथ अपने अपने घर जा रहे थे. पत्रिका ने अपने शोकेस सेक्शन में दास द्वारा एक प्रदर्शनी पर एक छोटा सा फीचर छापा था. मिश्रा ऐसा होने से नाराज थीं, लेकिन उन्हें पता था कि यह दास की प्रतिष्ठा के चारों ओर छाई गोपनीयता का संभावित परिणाम था. वो इस बात से संघर्ष कर रही थी कि क्या उन्हें औपचारिक रूप से इस मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए था. उस समय पत्रिका के भीतर ज्यादातर लोगों को उनकी असहजता के बारे में पता नहीं था, लेकिन दास के साथ उनका खुद का अनुभव इसकी वजह थी. जुलाई 2018 में मिश्रा के साथ मेरे पहले साक्षात्कार के बाद मैंने ऐसी 10 और महिलाओं से बात की जो पेशेवरों रूप से दास के साथ जुड़ी थीं. इनमें बोरा, पराडकर और कटोच शामिल हैं. इनमें से छह महिलाओं ने अपना नाम सार्वजनिक नहीं किया. यहां तक कि जब मैं ये स्टोरी फाइल कर रही थी तब भी जैसा कि बोरा ने अपने ट्वीट में इसे “ऐसी वारदातों का पिटारा” करार दिया था, कई और कहानियां निकलकर सामने आ रही थीं.

बोरा के खुलासे से एक महीने पहले द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल छपा था जिसमें जतिन दास के बारे में कहा गया था कि “पेटिंग करने वालों को कैसा होना चाहिए: विलक्षण, उल्लेखनीय और उत्साही अजनबी.” उनके बारे अब तक की पसंदीदा सार्वजनिक कहानी यही रही है. कला की दुनिया में उनका कद निर्विवाद रहा है. दास ने 50 से अधिक वर्षों के करियर में देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 60 से अधिक एकल कार्यक्रम आयोजित किए हैं. वो देश में सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्म भूषण समेत कई पुरस्कार हासिल कर चुके हैं. संसद भवन में एक बड़ा भित्तिचित्र है जिसे उन्होंने बनाया है. उन्हें कई विश्वविद्यालयों में लेक्चर के लिए बुलाया जाता है और उनके बायोडेटा के मुताबिक वो “कई सरकारी और प्राइवेट आर्ट और सांस्कृतिक निकायों के सलाहकार के रूप में काम करते हैं.”

और फिर भी, दास ने अक्सर सांसारिक पुरस्कारों और वाणिज्यिक हितों के लिए अपनी उपेक्षा व्यक्त की है. उन्होंने पिछले साल एक समाचार एजेंसी के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “कला की दुनिया में व्यापक बदलाव हुए हैं. लोग कल के बाजार और व्यापार के बारे में बात करते हैं.” दास ने उनके जमाने में कलाकारों में जो आदर्श होते थे और आज के दौर के युवाओं ने इसे जो “रोजी रोटी” का माध्यम बना दिया है उसके बीच अंतर साफ किया. उन्होंने कहा, “अब सब प्रचार और हाई सोसइटी से जुड़ा है और अब ये एक ग्लैमरस दुनिया बन गई है.”

हालांकि, ये वही कला समाज है जिसने लंबे समय तक दास की सार्वजनिक प्रतिष्ठा को बचाए रखा है. एक ढीले और अनौपचारिक नेटवर्क वाली भारतीय कला की दुनिया व्यक्तिगत कनेक्शन और संरक्षण पर भारी तौर पर निर्भर है. दास प्रभाव और शक्ति के इन माध्यमों के भीतर सहजता से विराजमान हैं. इस उद्योग में एक दशक से अधिक का समय बिताने वाली एक कलाकार विदिशा ने मुझे बताया, “जतिन दास जैसे लोग इस बात को नियंत्रित करते हैं कि किसे कमीशन मिले.” कई सालों से प्रतिष्ठित गैलरियों ने दास के काम को दिखाना अपने लिए सम्मान की बात समझी है और साथी कलाकारों ने उन पर प्रशंसा की बारिश की है. विदिशा ने कहा, “कला उद्योग में सवर्णों का प्रभुत्व है और वो हमेशा इस तरह के विशेषाधिकार के बीच रहते हैं.”

इन्होंने एक विलक्षण आदमी की पौराणिक कथाओं को बल दिया है, जिसके ऊपर दुनिया के उसूल लागू नहीं होते. हमारा विश्वास है कि कलाकार महानता में सिर्फ तभी सक्षम है जब हम उसके कलात्मक स्वभाव को स्वीकार करने में सक्षम हैं. इस स्वभाव की पूजा कई दशकों से हुई है, अगर इससे अधिक नहीं, और इसने कई लोगों को सरंक्षण दिया है, जो कला के क्षेत्र में कई ताकतवर पदों पर थे: इनमें चित्रकार, रंगमंच कलाकार, संगीतकार, फिल्म निर्माता, लेखक, विज्ञापन से जुड़े लोग शामिल हैं. इस सांस्कृतिक प्रतिरक्षा का बोझ आमतौर पर महिलाओं को अपने जीवन में ढोना पड़ता है- जिन्हें अक्सर अपनी रचनात्मक महत्वाकांक्षाओं और पेशेवर सपने को पीछे छोड़ना पड़ता है.

जिन 11 महिलाओं से मैंने बात की उनका अलग-अलग समय में 1990 से 2015 के बीच दास से सामना हुआ. इनके आरोपों में अवांछित यौन हमला, छेड़खानी भरी टिप्पणी और ताने से लेकर भावनात्मक उत्पीड़न और अनुचित कार्यस्थल व्यवहार शामिल है. फिर भी उनकी बातों में कुछ पहलू इतने समान थे कि अलग-अलग रिकॉर्ड किए गए उनके बयानों में एक जैसे विवरण को खोजना मेरे लिए मुश्किल नहीं था. ऐसी हर बात की परिवार के उन सदस्यों या दोस्तों द्वारा पुष्टि की गई है जिनसे इन महिलाओं ने बात साझा की थी.

लगभग उन सभी महिलाओं से जिनसे मैंने बात की उन्हें निजी परिचय, किसी के कहने पर या दास के सीधे प्रस्तावों से इंटर्नशिप या शोध का पद मिला था. जब वो दास से मिली थीं तो इन सभी की उम्र उनसे आधी से कम थी- इनमें जो सबसे उम्रदराज थीं वो 30 साल से कम उम्र की थीं. जब वो ये काम शुरू कर रही थीं तब दास से उनका सामना ऐसी स्थिति में हुआ था जब वो बहुत प्रभावशाली थे. ज्यादातर मामलों में दास ने एक बैठक या मुलाकात के आधार पर उनकी व्यावसायिक विशेषज्ञता और टैलेंट के बारे में व्यापक पूछताछ के बिना उन्हें काम पर रख लिया.

लगभग उनमें से सभी ने दास के तरीके में एक अतिसंवेदनशील बात को नोट किया- जब उनकी मांग पूरी नहीं होती थीं तो पितृत्ववाद की जगह ढिठपन का रास्ता अपना लेते थे. महिलाओं को अगर असहजता होती तो दास उनकी रुढ़िवादी परवरिश को दोष देने लगते. उन दृष्टिकोणों के आधार पर जो उनके लिए सबसे सुविधाजनक थे, जिन महिलाओं को कथित तौर पर उत्पीड़ित किया गया उन्हें दास के साथ एक खेल खेलना पड़ता जिसमें या तो उन्हें दास के प्रगतिशील आदर्शों या पारंपरिक संरचनाओं के प्रति उनके झुकाव के साथ मेल बिठाना पड़ता. अगर यह जानबूझकर नहीं भी हो तो भी एक चालक रणनीति थी: ये महिलाओं को आत्म-संदेह में फंसा देता और दास को सभी अपराधों से मुक्त कर देता.

लगभग ऐसी हर बात में एक भावना समान है कि वो युवा महिलाओं को विकसित करने की कोशिश कर रहा थे और उन्हें अपनी प्रेरणा के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, भले ही उन्होंने इन महिलाओं से बाकी सभी तरह की मेहनत करवाई हो. दास ने इनमें से कम से कम दो के मामले में ये स्वतंत्रता ली कि वो उन्हें ये बता सकें कि वो कैसे सफर करें, कहां रहें और कैसे कपड़े पहनें. बोरा, कटोच और पराडकर के अलावा तीन और महिलाओं ने कहा कि दास ने उन्हें बिना सहमति के किस किया और गले लगाया.

महिलाएं उनसे उनके मार्गदर्शन और परामर्श की उम्मीद कर रही थीं, ना कि इस बात का आंकलन कि वो एक छेड़खानी करने वाले हो सकते हैं. कईयों को ऐसा लगा कि ऐसी स्थिति में दास की जगह कोई और होता तो उन्होंने करारा जवाब दिया होता लेकिन इनके मामले में महिलाओं के पास कोई ताकत नहीं, ये सिर्फ दास की सामाजिक स्थित की वजह से नहीं था, बल्कि उनकी 76 साल उम्र भी एक वजह थी.

जब महिलाओं को पहली बार दास की इन हरकतों का सामना करना पड़ा, तो उन्हें इसका अंदाजा ही नहीं था. हालांकि, अच्छे करियर के अवसर के रूप में उन्हें मिले इस मौके को वो बर्बाद नहीं करना चाहती थीं. इसके अलावा अगर महिला पेशेवरों हर व्यक्ति को नौकरी के लिए इसलिए मना कर दें कि उन्हें सामने वाले से थोड़ी असहजता हुआ है, तो शायद उनके लिए कोई विकल्प ही नहीं रह जाएगा. अंत में, इनमें से कई महिलाओं ने सोचा कि क्या उन्हें चीजों को उसी तरह से समझना चाहिए था जैसी वो थीं: जो होने वाला था उसके लिए सर्तक रहना चाहिए था.

एक साथ ये साक्ष्य दसा की एक नग्न तस्वीर पेश करते हैं, ऐक ऐसे आदमी की तस्वीर जो खुद को अपने सेलिब्रिटी स्टेटस से इतना संरक्षित मानते थे कि उन्होंने उन परिणामों के बारे में सोचना बंद कर दिया था जो उनके करने के बाद महिलाओं के ऊपर पड़ेगा, उनके खुद पर इसका क्या असर पड़ेगा इसकी तो उन्हें परवाह ही नहीं थी.

1990 के दशक के मध्य में श्री पराडकर पहली बार तब दास से मिली जब वो बेंगलुरु में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक युवा संवाददाता थीं. उनके एक वरिष्ठ सहयोगी ने एक कार्यक्रम के दौरान दास से उनका परिचय करवाया और कहा कि दास “एमएफ हुसैन के कद के कलाकार” हैं.

पराडकर को याद है कि इस दौरान दास ने उनका नंबर लिया था. बाद के दिनों में दास ने उन्हें बार बार फोन किया. वो कहती हैं, “वो सुबह 11.30 बजे या रात 12 बजे फोन कर देते और मैं इसे एक कलाकार की विलक्षणता के रूप में देखती.” वो इनमें से किसी भी बातचीत में अनुचित नहीं थे. इसके विपरीत दास उन चंद लोगों में से एक थे जो बुद्धि में रूचि रखते थे. दास ने उन्हें डायरी लिखने की आदत डालने की सलाह दी जिसमें अपने दिन के बारे में चार पंक्तियां लिखनी थी, दास ने आश्वस्त करते हुए कहा कि इससे उनकी “कविता का जन्म” होगा. पारडकर ने कहा, “वो मुझसे कहते की मेरे अंदर काफी क्षमता है और मैं बेहद प्रतिभाशाली हूं. वो हमेशा प्रतिभाशाली शब्द का इस्तेमाल करते.”

दास का व्यवहार विशेष रूप से उस विद्रोही यौनवादी पृष्ठभूमि के खिलाफ उत्थान सा लग रहा था जिसका सामना पराडकर उस समय अपने कार्यालय में कर रही थीं. अखबार में उनके पहले कुछ हफ्तों के भीतर एक पुरुष सहयोगी ने उन्हें एक नोट भेजा था, जिसमें कहा था, “यह आपके टैलेंट नहीं बल्कि आपका आकर्षण है जिसने आपको आपकी वर्तमान स्थिति में पहुंचाया है.” पराडकर ने इसे हंस कर टाल दिया. वो कहती हैं, “आपको कई बार ऐसी बातें बताई जाती हैं कि कैसे आप पार्यप्त रूप से टैलेंटेड नहीं हैं. फिर आप अपनी स्थिति समझने लगती हैं और कोशिश करती हैं कि आप बहुत प्रतिभाशाली या दूसरे के लिए ख़तरे के तौर पर ना नजर आएं. और यह इतना गहरा था कि मैं एक ऐसे व्यक्ति के लिए आभारी थी जो मुझे मेरे दिमाग और मेरे टैलेंट को विकसित करने के लिए कह रहा था.”

बाद में दास दिल्ली से बेंगलुरु पहुंचे. पराडकर ने पेपर के लिए उनका साक्षात्कार करने का फैसला किया. वो इस बात पर सहमत हुए कि मुलाकात विंडसर मनोर होटल की लॉबी में होगी जहां दास ठहरे थे. लेकिन जब वो पहुंची तो दास ने उनसे अपने कमरे में आने का अनुरोध किया. इसे याद करते हुए पराडकर कहती हैं कि कमरे में बुलावे से उनके “दिमाग में घंटी बजी” लेकिन उन्होंने इसे तुरंत खारिज कर दिया. उन्होंने खुद से कहा कि इस आदमी का कद बहुत बड़ा है और उन्हें इस किसी असहज स्थिति के बारे में चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

वो उनके कमरे में गईं और दास ने गले लगाकर उनका स्वागत किया. दास ने उनके कंधे पर लाल बॉर्डर वाली एक क्रीम साड़ी रखी दी-ये एक तोहफा था जिसके बारे में दास ने कहा कि ये पराडकर के रंग के साथ सुंदर लगेगा. दास ने उन्हें अपनी एक पेंटिंग भी दी जिस पर दास ने एक संदेश लिखा था. इस संदेश का एक हिस्सा कुछ इस तरह से था, “ये मुस्कुराहट बसंत से भी सुंदर है.”

साक्षात्कार के दौरान पराडकर ने उनसे एक प्रश्न पूछा जिसके बाद दास अचानक से टॉयलेट में चले गए. पराडकर को फ्लश की कोई आवाज़ नहीं आई और उन्हें लगा कि दास इतने अचानक से टॉयलेट में क्यों चले गए. जब वो बाहर आए तो पराडकर उनसे जवाब देने की उम्मीद लगाए बैठी थीं. लेकिन दास झुके और पराडकर को चुमने की कोशिश की. सदमे में पराडकर अचानक से मुड़ गईं. दास ने उनके मुंह के बेहद करीब उनके गालों, जॉ लाइन और गर्दन के हिस्से को चूम लिया. पराडकर ने इसके लिए मना किया. दास ने पूछा, “क्यों नहीं? आओ भी, बस एक छोटा सा.” उन्होंने इसके लिए फिर से मना किया लेकिन दास नहीं माने. पराडकर ने दास को धक्का दे दिया. उन्होंने कहा, “मैं कसरत करती थी और फिट थी और जब मैंने उन्हें धक्का दिया, उन्होंने बेहद कमजोर महसूस किया और अपनी कुर्सी में जा गिरे. मुझे तुरंत बेहद बुरा लगा क्योंकि मैंने सोचा, ‘हे भगवान, मैंने एक बुज़ुर्ग को धक्का दे दिया.’”

पराडकर याद करती हैं कि ये पूरी घटना एक बेहद असहज अनुभव थी, “जैसे कि मैं खुद का निरीक्षण कर रही हूं.” वो बिना स्टोरी के वापस इसलिए नहीं जाना चाहती थीं क्योंकि उन्हें बताना पड़ेगा कि आखिर वो स्टोरी क्यों नहीं ला पाईं. पराडकर ने इंटरव्यू पूरा किया. इसके बावजूद कि “मुझे लगा, सब कहेंगे, ‘तुमने ही ऐसा कुछ किया होगा.’” जब वो जा रही थीं तो दास ने उन्हें तोहफा पकड़ा दिया.

वो होटल से निकल गईं और ऑफिस जाने के बजाए वो किसी अंजान जगह पर पहुंच गईं. उन्होंने कहा, “मैं रुक गई और हांफने लगी, मेरी सांस रुक रही थी. हे भगवान, मैं ऐसी अंजान जगह पर अपने आपको कोई ऐसी स्थिति में नहीं डाल सकती.” उन्होंने खुद को संभाला और एक दोस्त के घर पहुंचीं. वो कहती हैं, “मैं खूब रोई और चीखी. मैंने दोस्तो को सब बता दिया और उसने मुझे दिलासा दिया.” पराडकर ने इंटरव्यू फाइल किया. इसे कुछ ही दिनों के भीतर छाप दिया गया.

लगभग एक दशक बाद पराडकर की तरह एक और युवा महिला जो दास से मिलने जा रही थी, उसने भी यही कल्पना की कि उसके पास दास की उम्र और प्रमुखता की वजह से उनके बारे में चिंता करने का कोई कारण नहीं है. वो अपनी स्नातक पाठ्यक्रम की आवश्यकता के हिसाब से एक प्रोजेक्ट पर काम करने की तलाश में थी. उसने सुना कि दास किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में हैं जो उनके पंखा प्रोजेक्ट पर एक पुस्तक तैयार करे. शाहपुर जाट में उनके स्टूडियो में दास से मिलने से पहले कॉलेज के छात्र एक और साक्षात्कार के लिए गई जो ग्राफिक डिजाइन उद्योग के एक दिग्गज के साथ था. जैसे ही वो मुलाकात करके बाहर आई, डिजाइनर ने उसे कई अश्लील संदेश भेज दिए. वो बेहद गुस्स में थी और दास से मिलने से पहले उसके अवसर को ठुकरा दिया था. उसे लगा था कि दास के साथ काम करना ज्यादा सुरक्षित होगा.

दास के साथ कई घंटों तक मुलाकात चली. उन्हें याद है कि इस दौरान काम की बातें बिल्कुल नहीं हुईं. दोनों की बातचीत के दौरान दास संगीत, संस्कृति, सिनेमा जैसे कई विषयों पर अपने विचार दिए. उन्होंने लड़की से कहा कि ये दोनों के “खास रिश्ते” की शुरुआत है जिसमें वो उसे भावनात्मक और आध्यात्मकि रूप से उभरने में मदद करेंगे. ठीक उसी तरह से जैसा कि उन्होंने पराडकर को डायरी मेंटेन करने को कहा था, उन्होंने कॉलेज की इस छात्रा से हर दिन एक कविता लिखने को कहा. पराडकर की तरह ही उसे भी शुरू में बेहद अच्छा लगा. छात्रा कहती है, “ऐसा लगा कि वो मेरे लिए गाइड या सलाहकार की भूमिका निभाने वाले हैं और ये अच्छा लगा. अब मुझे लगता है कि यह एक तरह से संवारे जाने की प्रक्रिया का हिस्सा था”

पूरी मुलाकात के दौरान कॉलेज की छात्रा ने दास को अपना काम दिखाना चाहा लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. वो कहती है, “मेरे काम में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने इसे देखा तक नहीं. मैं एक बेवकूफ की तरह लगातार उन्हें अपने काम के बारे में बताती रही.”

शाम होने पर दास के ऑफिस के लोगों ने जाना शुरू कर दिया. उन्होंने छात्रा को कुछ चित्रों को देखने के लिए आमंत्रित किया जो वह एक प्रदर्शनी के लिए भेज रहे थे और छात्रा से उन्हें नाम देने में मदद करने के लिए कहा. इस अभ्यास के तुरंत बाद दास के ऑफिस में किसी का फोन आया जिससे वो बेहद दुखी हो गए. जब उन्होंने फोन रखा तो छात्रा इसे देखकर दंग रह गई कि उनकी आंखों में आंसू थे.

दास लड़की के पास पहुंचे और “बेहद ताकत के साथ” उसे गले लगा लिया. उन्होंने लड़की के गाल चूम लिए. यहां तक ​​कि जब वो अभी ये सब समझने की कोशिश कर रही थी और इस बीच दास ने दोनों हाथों में उसकी गर्दन जकड़ ली और उसके होंठों पर चूमने की कोशिश की. लड़की ने खुद को पीछे खींच लिया. वो कहती है, “ये बेहद तेजी से हुआ. मैंने पूछा, ‘आप क्या कर रहे हैं.’ दास ने जवाब दिया, ‘मैं बस स्नेह बांटने की कोशिश कर रहा हूं.’”

वो गुस्से से कांप रही थी और वहां से सीधे अपने घर चली गई.

दास ने उसे कई नंबरों से कई दिनों तक फोन किया. वो जैसे ही दास की आवाज़ सुनती फोन काट देती. जब उसने अपने प्रोजेक्ट के लिए एक और कंपनी ज्वाइन की तो दास को ये पता चला गया और उन्होंने वहां लैंडलाइन पर फोन कर दिया. कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में लड़की ने फोन पर बात की. याद करते हुए वो बताती हैं कि दास ने उनसे कहा, “उस मुलाकात के बाद से गायब होने की वजह से मैं तुमसे बहुत नाराज हूं और तुमने मुझे कभी वापस फोन भी नहीं किया.” लड़की ने दास से कहा कि वो फिर कभी उसे फोन न करें.

2015 में एक 26 साल की उभरती कलाकार विदेश में पढ़ाई करने के बाद भारत लौटी थी और अपनी मां के साथ एक कार्यक्रम में भाग ले रही थी. दास भी वहां मौजूद थे. उनके काम के बारे में जानने और अध्ययन करने की वजह से महिला दास के पास गई और अपना परिचय दिया. (वहां मौजूद एक उम्रदराज महिला ने दोनों को बातचीत करते देखा और बाद में युवा महिला को सावधान रहने की चेतावनी दी, एक चेतावनी जो दास से मिलने के पहले भी कई और लोगों ने उसे दी.)

अगले दिन महिला के कई परिचितों और दोस्तों ने यह कहने के लिए फोन किया कि दास उससे संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. महिला चिंतित थी और अगले दिन महरौली में दास के ऑफिस जाने का फैसला किया. उसने सोचा कि जब वो बात करेंगे तो वो दास को अपने कला के कुछ कार्यों को दिखा सकती है और पेशे पर चर्चा कर सकती है.

साक्षात्कार उसके जीवन के “सबसे विचित्र चार घंटे” साबित हुए. पहले घंटे के दौरान दास ने उसे अपनी कलाकृति को देखने बार-बार वापस भेजा और इस दौरान खुद दो अन्य महिलाओं से बात कर रहे थे.

जब मुलाकात शुरू हुआ, दास ने महिला से कहा कि जब वो पहली बार उससे मिले थे- इस बातचीत से एक दिन पहले- उन्होंने “उसकी आत्मा में झांका था” और देखा था कि वो उनके लिए काम करेगी.

फिर वो महिला से उसके नाम का अर्थ पूछने लगे लेकिन जैसे ही उसने बताया तो दास ने उसे बीच में ही तुरंत रोक दिया. लड़की कहती है, “ईमानदारी से कहूं तो उन दो घंटों में मैं मुश्किल से 20 शब्द बोल पाई. मैं जो भी कह रही थी उसके बारे में दास कहते, ‘नहीं, ये ग़लत है. मैं तुम्हें बताता हूं.’”

बातचीत में जल्द ही दास ने एक खास युवा महिला की अनुपस्थिति का जिक्र किया जो उनके ऑफिस में उनके साथ काम करती थी. उसने आना बंद कर दिया था क्योंकि दास के साथ उसके काम का तरीका उसके भाई को पसंद नहीं था. दास ने लड़की से कहा, “मुझे नहीं पता क्यों लेकिन ये हमेशा होता है.”

दास ने ये जाने बिना कि वो इस अवसर के तैयार थी या नहीं आपना फैसला सुनाया कि कि वो उनके लिए काम करेगी. उन्होंने कुछ बातें फतवे की तरह जारी करते हुए कहा- उस दिन दास के यहां आने के लिए उसने जिस कार का इस्तेमाल किया था उसकी जगह वो बस में सफर करेगी. वो उसे अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही उनकी सहायता करने की अनुमति नहीं देंगे. उल्टे उन्होंने उसे बताया कि पहले कुछ महीनों वो उनके कार्यालय में झाडू और पोछा लगाने का काम करेगी.

उसने बताया कि दास ने उससे कहा, “हर दिन तुम अलग तरह से तैयार होगी. जैसे कि आज तुमने पैंट-शर्ट पहना है तो कल तुम कुर्ता पायजामा पहनोगी और फिर लहंगा चोली और फिर ये ऐसे ही जारी रहेगा.” लड़की ने मुझसे कहा, “मैं ठीक और इन सबके लिए आपका शुक्रिया जैसी बातें कहती रही क्योंकि जो हो रहा था वो बेहद अजीब था. एक समय के बाद मुझे लगा, ‘ये व्यक्ति बिल्कुल सनकी है.’ लड़की के दिमाग में ऐसे सवाल चर रहे थे, ‘वो ऐसा क्यों करना चाहेगा’ और ‘मैं यहां से कैसे निकलूं?’”

दास ने फिर लड़की से उसका, उसकी मां का और घर का लैंडलाइन नंबर मांगा. इसके तुरंत बाद वो लड़की की तस्वीरें लेने लग गए. जब भी दास एक तस्वीर खींचते तो “म्याउं-म्याउं” की आवाज़ निकालते.

लड़की को याद है कि वहां से निकलने के लिए उसने “कई बहाने” बनाए, दास ने सारे खारिज कर दिए. अंतत: जब उसे घरवालों के कई कॉल आ चुके थे, उसने दास से कहा कि उसे अपने कुत्ते को बाहर ले जाना है, दास ने उसे जाने दिया. दास ने उससे कहा, “ये बढ़िया है, तुम्हें अपने कुत्ते को घुमाना है, मुझे ये बहाना पसंद आया.”

बाद में उसने अपनी मां से सब बता दिया. मां को इस बात पर गुस्सा आया कि बेटी खुद के लिए खड़ी नहीं हो पाई.

लड़की ने कहा, “मैंने उस दिन अपनी मां को सिर्फ तस्वीरों के बारे में नहीं बताया क्योंकि मुझे वो बेहद अजीब लग रहा था. मैंने उसे कई हफ्तों बाद बताया. आपको पता है ये मेरे सबसे अजीब और दखल देने जैसा था.” उसकी मां ने मुझे बताया कि इसके कुछ दिनों बाद तक लड़की का ये हाल था कि दास की वजह से उसने किसी भी फोन पर किसी भी अंजान नंबर का फोन उठाना बंद कर दिया था. महिला ने दास को ये बताने के लिए ईमेल भेजा था कि वो उनके साथ काम नहीं कर पाएगी.

दास के साथ काम करने का फैसला करने वालों ने उनमें एक अनियमित, मूडी, अप्रत्याशित बॉस पाया.

एक 24 साल की महिला एक गैलरी में काम कर रही थी जब 2011 में पहली बार दास से उसकी मुलाकात हुई. दास ने उसे अपना बिजनेस कार्ड दिया और कहा कि जब उसे बड़ी चीजों से जुड़ने हो तो वो दास को ज्वाइन कर ले. एक पेशेवर के तौर पर उसे अपने कार्यस्थल में “काफी कम इस्तेमाल” महसूस होता था. उसने कुछ महीनों में गैलरी में अपनी नौकरी छोड़ दी और दास के लिए एक शोधकर्ता और पुरातात्विक के रूप में काम करने पर सहमत हो गई. महिला को जल्द ही एहसास हुआ कि उसका काम वह नहीं होगा जो उसने सोचा था. जब करने के लिए बहुत कुछ नहीं होता था, तो वह महिला से बार-बार अपना रेज़्युमे ठीक करवाते थे.

उनके अनुसार दास बार-बार पेशेवर और व्यक्तिगत सीमाओं को धुंधला कर देते थे. उसने एक घटना याद की जब एक युवा लड़की ऑफिस का हिस्सा बनी थी. ऑफिस में उसने सलवार-कुर्ता में प्लेट वाला दुपट्टा पहन रखा था जिससे उसका पूरा शरीर ढंका हुआ था. दास ने तुरंत युवा महिला को डांटा और कहा कि वो दुपट्टा हटा दे-“ये निकालो”-उन्होंने ये पितृसत्ता से जोड़ते हुए महिलाओं के पिछड़ने का कारण बताया. महिला ने मुझसे कहा, “वो बहुत डरी गई और अगले दिन से ऑफिस आना बंद कर दिया.”

बाद में दास महिला ने बाकी के काम करवाने लगे. उसने बताया, “मैंने स्टूडियों में उनके बच्चे का ख्याल रखने का काम शुरू कर दिया था और मुझे इसका एहसास भी नहीं हुआ. सिर्फ मैं नहीं, बल्कि सब ये काम कर रहे थे. मैं उनके घर से उनका खाना लाती और कुक से इस पर बात करती की खाने में क्या बनेगा.” महिला ने सोचा, “मैं उनकी साथी नहीं हूं, उनकी बेटी या उसके घर की रखवाली नहीं हूं, मैं ये सब क्यों कर रहा हूं, मैं अभी यहां क्या कर रहा हूं?” उसकी दोस्त ने मुझसे कहा कि महिला ने उसे बताया था कि दास ने कहा, “ख़ुद को एक गृहणी समझो.”

दो से तीन मौकों पर दास ने महिला को अपने घर पीने या रात के खाने के लिए बुलाया. जैसा कि महिला बताती है कि इस दौरान उनकी आवाज़ को “नरम” हो जाती और वो अपने जीवन और साथी के बारे में अधिक घनिष्ठता से बातचीत करने लगते. एक बार उसकी आवाज की तारीफ करने वाले दास ने उसे गाने को कहा. उसने गाया. दास ने महिला पर अपना हाथ रख दिया और उसे लगा कि उसे हाथ हटा देना चाहिए या वो अपने से बेहद वरिष्ठ व्यक्ति के बारे कुछ ज़्यादा ही सोच रही है.

महिला को याद है कि ऐसी ही एक और शाम के दौरान दास ने उससे कहा कि वो एक बूढ़ा आदमी हैं जिनकी देखभाल किए जाने की ज़रूरत है. इस बात में काफी अंतरंगता थी जिसे उसने तब तो खारिज कर दिया, लेकिन समय के साथ उसे ये बेहद अजीब लगा. इसी तरह काटोच ने मुझे बताया कि जब दास ने उनके जुड़ने के दूसरे दिन उनसे जो कहा था उससे वो कितनी अजीब महसूस कर रही थी: “मैं बहुत सिगरेट पीता हूँ, नहीं? अगली बार तुम्हे मुझे रोकना चाहिए.” कटोच को याद है कि उस समय वो ये सोच रही थीं “मैं आपकी पत्नी, आपकी सचिव या कोई ऐसी नहीं जो आपको सिगरेट पीने से रोके. मुझे बहुत बुरा लगा.” अगले दिन दास ने सुझाव दिया के वो उनके साथ रहने चली आए ताकि उनका किराया बचे.

एक और महिला ने 2014 में एक साक्षात्कार के दौरान दास के “आंशिक रूप से मिठी बातें, आंशिक रूप से हकदार और आंशिक रूप अनरोधपूर्ण” तरीके को याद करते हुए एक समान भावना को प्रतिबिंबित किया. उन्होंने कहा, “सैद्धांतिक रूप से मुझे पता है कि क्या हो रहा है, लेकिन व्यावसायिक रूप से मैं ना नहीं कह सकती थी, क्योंकि मुझे नहीं कहने के लिए प्रशिक्षित ही नहीं किया गया था.” उसने देखा कि दास ने बार-बार एक युवा इंटर्न को “बेबी” कह रहे हैं. बातचीत के दौरान उन्हें भी संबोधित करने के लिए दास यही शब्द इस्तेमाल करने लगे.

एक समय दास ने उससे पूछा कि क्या वो अपनी आंखें बंद करे ताकि वो उस तक पहुंच सकें. जब उसने इसे हंस कर टाल दिया तो दास ने जोर देकर कहा कि उसकी ये प्रतिक्रिया आधुनिक महिलाओं का वो लक्षण है जिसकी वजह से वो किसी पर भरोसा नहीं करती हैं. लड़की ने कहा, “मैं इस व्यक्ति के आस-पास होना ही नहीं चाहती. आप सिर्फ मुझे संग्रह करने के काम में नहीं लगाने जा रहे बल्कि तरह तरह की चीज़ें करवाने के अलावा अपने जीवन में ऐसे शामिल करना चाह रहें हैं जिसमें मुझे कोई रूचि नहीं है”

कार्यक्षेत्र के भीतर वो आक्रामक होने के स्तर पर सतर्क रहते थे. गैलरी की महिला ने याद किया कि जो कर्मचारी बहुत अधिक समय बिताते थे-कुछ मिनटों से ज़्यादा-ऑफिस की बालकनी में फोन पर बात कर हुए तो उन्हें तुरंत डांट पड़ती थी. दरअसल यहां कोई भी आ सकता था जिसकी वजह से दास सबकी निजी बातें सुन लिया करते थे और अगर किचन जैसे किसी ऐसे एरिया में जो उनकी नज़रों से दूर थे कोई बातचीत लंबी खिंचती थी तो तुरंत आवाज़ लगाकर उन्हें बुला लेते.

गैलरी में काम करने वाली महिला के मुताबिक दास को बहुत गुस्सा आता था और जिनके ऊपर उन्हें गुस्सा आता था उन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था. अंततः उसने इस तरह के एक प्रकरण के दौरान, जिस तरह से दास बात करते हैं, उनके साथ इस मुद्दे को हल करने का साहस जुटाया. उन्होंने कुछ सोचा, अपनी चीजें समेटी और चल दिए. महिला ने कहा, “मैं उनसे लड़ नहीं सकी- क्योंकि मेरे पास एक बेहतर नौकरी, बेहतर अवसर बेहतर सैलरी नहीं थी.”

2011 में एक प्रमुख अखबार के साथ काम कर रही 22 साल की फ्रीलांस पत्रकार को एक पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता ने दास से मिलवाया. दूसरों की तरह उसे भी सैलरी या कौशल जैसी बातें, जो उसकी भूमिका तय करेंगी, के बिना तत्काल नौकरी पर रख लिया गया. मौक़े को खतरे में डाले बिना उसने बाद में सैलरी पर बात करने का फैसला किया. उसने कहा कि उसने सब सोचा, “जैसा कि मैं बस शुरू कर रही हूं, मुझे किसी अच्छी जगह शुरू करना चाहिए. आपको पता है कि आपसे हमेशा कहा जाता है कि आपको बस एक सही मौके की दरकार होती है.”

पत्रकार ने याद किया कि दास उसकी निजता का उल्लंघन करते रहते थे. जब वो कंप्यूटर पर काम कर रही थी तो उसने याद किया कि “वो मेरे करीब बैठे थे, ये इतना करीब था कि मुझे यकीन था कि वो मेरी सांस सूंघ सकता हैं और मुझे पता था कि मैं उनकी सांस.” महिला ने इस पर बात नहीं की क्योंकि ये उसका पहली या दूसरी नौकरी का अनुभव था और उसे इसकी चिंता थी कि उसके बारे में ये राय बना ली जाएगी कि वो “किसी द्वारा छुए जाने” से भी परहेज करती है, एक ऐसा लड़की जो इतनी रूढ़िवादी है और ऑफिस के माहौल में सही नहीं क्योंकि वो किसी के देखने मात्र से संभल जाती है. उसे याद आया कि दास की उपस्थिति में असहज महसूस करने लगी. दास ने जवानी में अपने शरीर के साथ प्रयोग करने के महत्व के बारे में उससे बात की- इस बातचीत ने उसे साफ तौर से सचेत कर दिया.

एक बार जब पत्रकार ने कंप्युटर से संबंधित दास के एक काम को पूरा कर लिया तो दास ने उसके गालों पर अपने हाथ फेर दिया. वो हिल गई. वो कहती है, “मैं अदर से जल उठी, मैं बेहद गुस्से में थी.”

उसके आखिरी जब वो जाने को तैयार हो रही थी तो दास ने इस बात पर जोर दिया कि वो उसे मेन रोड तक छोड़कर आएंगे. महिला ने कार में अपने मेहनताने की बात की. उसे काम करते हुए थोड़ा वक्त हो गया था. जब उसने दास से कहा कि मिल रहे वेतन से- तब उसे 10,000 मिल रहे थे- खर्चों को मैनेज करना मुश्किल है तो दास बौखला गए.

वो उस पर चिल्लाने लगे, उसे और उस जैसे युवाओं को उनके साथ काम करने से प्राप्त हो रहे कौशल की जगह पैसों को तरजीह देने पर फटकार लगाई. लड़की कहती है, “मुझे समझ नहीं आया कि वो क्या बोल गए. जिस तरह वो चिल्ला रहे थे मुझे लगा कि वो मुझे अपने क्रोध के प्रभाव से कार से बाहर लात मार कर फेंक रहे हैं.” उस रात वो एक दोस्त के घर गई और उसे और उसकी मां को सब बता दिया. दोस्त की मां ने उसे बताया कि सालों पहले उन्होंने भी दास के साथ काम किया था. उन्होंने अपने अनुभव के बारे में जानकारी नहीं दी लेकिन कहा कि असहजता उनके अचानक से चले जाने के लिए काफी थी.

उसकी तरह जितनी महिलाओं से मैंने बात की-उनके लिए अभद्र टिप्पणियों से गलत शारीरिक पहुंच तक- ऐसा समय आया कि अगले दिन वहां जाना सही विकल्प नहीं था.

2004 में एक महिला एक प्रदर्शनी के लिए दास की सहायता कर रही थी. उन्होंने याद किया कि वो महिलाओं के एक समूह के साथ काम कर रही थीं, जिनमें एक को छोड़ सभी अपने 20वें साल की शुरुआत में थीं. शुरुआत में वो दास के घर से काम कर रही थीं फिर वो प्रदर्शनी स्थल पर चली गईं. महिला ने कहा कि दास की पत्नी अक्सर इस दौरान आसपास ही रहती थीं, लेकिन उसने गौर किया कि जब वो नहीं रहती थीं, दास उनसे ऐसे निजी सवाल करते थे जो पत्नी की मौजूदगी में नहीं करते थे.

जब दास ने महिलाओं से कहा कि उन्हें काम करने के लिए उनके शाहपुर जाट के स्टूडियो में जाना होगा, तो उसे इसमें कुछ अजीब नहीं लगा.

स्टूडियो में दास उस महिला की तस्वीरें लेने लगे. वो असंयत तरीके डीलडौल की तारीफ कर रहे थे. महिला ने मुझे बताया, “आप ऐसी चीजों का बुरा नहीं मानते, आपको लगता है कि एक कलाकार, जो किसी के सौंदर्य को जानता है, सोचता है कि आप सुंदर हैं. आप इसे तारीफ समझती हैं.” दास ने उन्हें निर्देश देते हुए कहा, “यहां देखो, वहां देखो. तुम्हारी आंखों में आसमान सी ख़ूबसूरती है.” और तस्वीरें लेते रहे.

तस्वीर लेने के बाद, दास स्टूडियो में महिला के साथ बैठ गए. उसने उससे कहा, “तुम जानती हो, मुझे तुम्हारे साथ आत्मीय संबंध महसूस हो रहा है.” बिल्कुल ऐसी ही टिप्पणी उन्होंने 10 साल बाद एक उभरती हुई कलाकार पर की. जो होने वाला था उसे लेकर महिला सावधान हो गई. वो डरी नहीं थी. उन्होंने याद करते हुए कहा कि वो सोच रही थी, “तुम तब तक जैसी चाहे बातें कर सकते हो जब तक मुझे गाली नहीं दे रहे. जो बोलना है बोल लो.” फिर भी उनकी बेकार की बातों से नाराज होकर महिला ने दास से पूछा कि क्या उन्होंने अपनी पत्नी को उस संबंध के बारे में बताया था जिसे वो महसूस करते हैं. उन्होंने कहा, “नहीं, नहीं, नहीं. ये हमारे बीच का छोटा सा सीक्रेट है.”

दास ने महिला को गले लगा लिया और अपने आगोश में खींचने की कोशिश की. महिला याद करते हुए कहती हैं, “उन्होंने मेरे गाल चूम लिए, उन्होंने लगभग मेरे होंठ भी चूम लिए और तभी मैंने हिम्मत जुटाकर उन्हे दूर धकेल दिया.” हालांकि, महिला ने विरोध में आवाज नहीं उठाई या मदद के लिए शोर नहीं मचाया लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज से दास को लग गया था कि वो महिला के साथ दूसरी बार ऐसा नहीं कर सकते. वो पीछे हट गए. महिला को नहीं याद कि इसके पहले या बाद में क्या हुआ. महिला ने मुझसे कहा, “कोई आपको वैसे चूमने या गले लगाने लग जाता है तो कुछ देर बाद आपके शरीर को सदमा सा लग जाता है.”

तन्वी मिश्रा ने सदमे के ऐसे ही एक अनुभव को याद किया. 2006 में जब आर्काइव को ठीक करने में मदद करने के लिए दास के स्टूडियो में इंटर्नशिप शुरू की तब वो 19 साल की थी. दूसरे या तीसरे दिन जब वो बाहर जा रही थी तो दास उनसे हल्की-फुल्की बातचीत करने लगे. पास में एक लड़का खेल रहा था. बिना जाने-पूछे बगैर दास ने लड़की को गले लगा लिया. लड़की कहती है, “मुझे ये पल याद है.” मिश्रा ने एक आदमी के रूप में दास की विशालकाय को याद किया और अपने पेट पर उनके बदन के छूने से पैदा हुई सनसनी से असहजता महसूस की. वो कहती हैं, “उनके दोनों हाथों ने मुझे घेर लिया था. ये बहुत तेज़ी से हुआ. मुझे अभी भी पता है कि कोई मेरे साथ ये करता है तो ये ग़लत है. ये एक खराब छुअन का एहसास था.”

गले लगने के अलावा दास ने मिश्रा से जो कहा वो भी उनके शरीर के साथ हुए गलत अनुभव की तरह उनके जीवन में ठहर सा गया. दास ने कहा, “तुम्हें ये पसंद है, है ना?” मैं उनके करीब वैसे भी नर्वस हो जाती थी. उस समय मेरे पास इसका विरोध करने की ताकत नहीं थी.” वो तुरंत स्टूडियो से बाहर चली गई, लेकिन जैसे ही वो कमरे से बाहर निकलीं वो तेजी से दौड़ने लगीं. वो तब तक नहीं रुकीं जब तक सड़क के कोने पर एक छोटी सी दुकान नहीं मिली, जिसमें फोन था. उन्होंने रोते हुए एक करीबी दोस्त को फोन किया.

दोनों महिलाओं ने जिस तरह का लकवा महसूस किया वह केवल गैर-सहमति वाले यौन उत्पीड़न का नतीजा नहीं था, बल्कि इसलिए भी दास ने ऐसा किया था. प्रदर्शनी के लिए काम करने वाली महिला ने कहा, “क्योंकि मेरे भीतर इस व्यक्ति के लिए आदर था, ऐसे में आपको लगता है, ‘इस पर मैं कैसी प्रतिक्रिया दूं?’ वो भी तब जब ये ठीक उसी समय हो रहा है … वो मेरे ऊपर हावी हो रहे हैं, मेरे शरीर को छू रहे हैं और मुझे गले लगा रहे हैं और वो मेरे गालों को चूम रहे हैं और मेरे होठों को तलाश रहे हैं और मैं अभी भी सोच रही हूं, ‘ऐसे में कुछ भी करने का सही तरीका क्या होगा?’”

मिश्रा ने उस “शक्ति की भावना” के बारे में बातया जो दास के भीतर इस तरह के काम करने के लिए थी. “आप एक बड़े कलाकार हैं और मैं एक कॉलेज की छात्रा. ये वो दंभ की भावना है जो उनके भीतर मौजूद थी” जिसकी वजह से मिश्रा को सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा आता था. उन्हें शब्दों से भी वही भाव महसूस हुआ था जैसा छुअन से. इसने उन्हें एक ऐसे मामले में अपनी भूमिका के बारे में सोचने को मजबूर किया जिसमें वो कुछ नहीं कर सकती थी. मिश्रा ने कहा, “मैं वहां खड़ी थी. मैं वहां शारीरिक रूप से मौजूद थी. तो … क्या इससे उन्हें लगा कि मैं इसके लिए सहमत हूं? क्या यह केवल तभी होता है जब आप चिल्लाते और शोर मचाते हैं, किसी को धक्का देते हैं और कहते हैं, ‘नहीं, नहीं, नहीं’-क्या ना कहना इसे कहते हैं?” अपनी मां को इस बारे में बताने के बाद मिश्रा ने स्टूडियो में वापस नहीं जाने का फैसला किया. उन्होंने इस तरह इंटर्नशिप छोड़ने की निराशा को याद किया. मिश्रा कहती हैं, “मौके के हाथ से चले जाने की वजह से एक उदासी की भावना भी है क्योंकि पहले ये बहुत बड़ा लगा था, मुझे लगा मैं अच्छा कर रही हूं.”

प्रदर्शनी पर दास के साथ काम करने वाली महिला ने मुझे बताया, “मैं अब उस आदमी का सम्मान नहीं करती. वो जो भी पुरस्कार हासिल कर रहा है करता रहे, लेकिन वो उनके लायक नहीं है. मेरी आंखों में वो उनके लायक नहीं है.” उसने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं बताया. एक युवा महिला के रूप में जो दुनिया में बस कदम उठा रही थी, वह नहीं चाहती थी कि यह घटना उसकी आजादी की सीमा को परिभाषित करे. इस घटना के कुछ पहलुओं को कुछ लोगों से बातने के अलावा, यह पहली बार था जब उन्होंने किसी से इस बारे में विस्तार से अपना अनुभव साझा किया था.

अगस्त 2015 में 25 साल की एक महिला दास के ऑफिस साथ कई और ऑफिस वाली एक इमारत की सीढ़ियों पर अपने सहयोगियों के साथ काम से ब्रेक ले रही थी. दास एक प्रसिद्ध वास्तुकार पर अपनी पुस्तक के लिए एक सहायक की अपनी खोज के बारे में उनसे बात करने के लिए आए थे. ये एक ऐसे समूह जिसे वो जानते भी नहीं थे के लिए एक अजीब अनुरोध था लेकिन लड़की मदद करने को खुश से तैयार थीं.

लड़की ने दास को बताया कि उसकी एक दोस्त इस प्रोफाइल के लिए फिट होगी और दास से संक्षिप्त जानकारी देने के लिए कहा. दास ने उसे बताया कि उन्होंने इसे टाइप करा लिया है लेकिन प्रिंट-आउट नहीं लाए हैं. उन्होंने उसे काम पूरा करने के बाद उनके ऑफिस आने को कहा ताकि उसे एक कॉपी दे सकें.

फोन पर हमारी बातचीत के पांच मिनट के भीतर दास के स्टूडियो जाने के लिए महिला ने खुद को “बेहद बेवकूफ” करार दिया. कॉपी देने के बाद दास ने उसे काम से जुड़ने के लिए मनाने की कोशिश की. वो उनके प्रस्ताव से संतुष्ट थी लेकिन इसे अस्वीकार कर दिया. फिर भी वो अपने दोस्त और दास में एक आशाजनक मेंटर मिलने की बात से उत्साहित थी.

दास ने उससे कहा, “अपने आप को मुझे समर्पित कर दो और मैं तुम्हें असाधारण बना दूंगा.” महिला बंगाली है और उसने याद किया कि दास ने उसे इसी भाषा में यह कहा था. उसने कहा, “क्योंकि वो बहुत स्थानीय भाषा का उपयोग कर रहे थे इसलिए मैंने वास्तव में बेहद असहज महसूस करना शुरू कर दिया.”

दास ने महिला से उन तस्वीरों के लिए तैयार होने के लिए कहा जो वो पोर्ट्रेट के लिए इस्तेमला करना चाहते थे. जब वो तस्वीरें ले रहे थे तो उन्होंने लड़की से कहा कि उसे अपने बालों को बांधना चाहिए क्योंकि उसकी गर्दन सुंदर है. उभरते कलाकार के मामले में उन्होंने उसे हर रोज एक ड्रेस पहनने के लिए कहा, हालांकि उन्होंने यह नहीं कहा कि ड्रेस कैसी हो.

महिला साफ तौर पर असहज थी. उसे लगा था कि ये उसे सहज करने के लिए है जब दास ने उससे पूछा कि क्या वो उनकी पेंटिंग देखना चाहेगी जो कमरे के पीछले हिस्से में थीं. जब वो उनकी कला का काम देख रही थी, दास सरक कर उसके पीछे चले आए. वो कहती है, “मैं वहां खड़ी थी और वो पीछे से आए और फिर उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मेरी गर्दन चूमने लगे.” लड़की घबरा गई. वो मुड़ी और कहा कि उसे जाना होगा क्योंकि उसके सहयोगी ऑफिस में इतंजार कर रहे होंगे, कमरे के केंद्र में टेबल से अपना फोन उठाया और जल्दी से वहां से चली गई.

बाहर आकर लड़की ऐसे जगह की तलाश करने लगी जहां खुद को संभाल सके. वो अपने ऑफिस वापस नहीं जा सकी क्योंकि उसे पता था कि वो जगह खाली नहीं होगी. अंत में वो एक एटीएम में चली गई. उसनें मुझे बताया, “मुझे एटीएम बिल्कुल याद है, क्योंकि ये बहुत अजीब था, ये सोच कि आपके पास जाने की कोई जगह नहीं थी, यह बहुत निराशाजनक था.” एक सहयोगी ने उसे वहां पाया और उसे ये कहते हुए सांत्वना दी कि ये उसकी गलती नहीं थी.

या तो उसके ऑफिस जाकर या टेलिफोन पर करीब अगले कुछ हफ्ते तक दास ने उससे संपर्क करने की कोशिश की. कुछ महीने बाद एक ब्रेक के दौरान दास की मुलाकात उससे और उसके दोस्त से हो गई. उन्होंने उनसे कहा कि पास के रेस्तरां में एक कविता पाठ हो रहा है और उन्हें आमंत्रित किया. महिला के किसी भी दोस्तों ने जवाब नहीं दिया, वो सभी जानती थीं कि क्या हुआ था. उसने दास को बताया, “मुझे नहीं लगता कि हममें से कोई जा पाएगा, हम सभी व्यस्त हैं.” दास ने उसकी आंखों में देखा. उन्होंने कहा, “जीवन में आपके पास कुछ अवसर केवल एक बार आते हैं, आपको सीखना चाहिए कि इसे कब पकड़ना है.” वो फिर कभी नहीं मिले.

इनमें से किसी भी मामले में कोई क्लोजर या स्वीकारोक्ति नहीं हुई है. एक व्यक्ति द्वारा संचालित इस संस्थान के भीतर कोई आंतरिक शिकायत समिति नहीं थी जहां महिलाएं संपर्क कर सकती थीं. पुलिस में शिकायत तो बिकल्प ही नहीं था इसकी वजह न्याय व्यवस्था में वो कमजोर विश्वास था जो इसने ऐसे मामलों से निपटने के मामले में बनाया है. अब तक, जहां तक ​​दास का मामला है, महिलाओं के साथ उनका नियमित उत्पीड़न ऐसा ही रहा: जैसे दिनचर्या का एक हिस्सा हो जिसने उनकी प्रतिष्ठा को खराब नहीं किया या बहुत बड़ा व्यक्ति होने की उनकी छवि को नुकसान नहीं पहुंचाया.

फिर भी, इनमें से कई महिलाओं के ऊपर दास की करनी ने प्रभाव को छोड़ दिया था. अपने करियर के एक बड़े हिस्से में एक फ्रीलांसर होने के बावजूद, मिश्रा अधिकांश मौकों पर, लोगों के व्यक्तिगत स्थानों में काम करने वाले किसी भी अवसर से दूर रहीं. इसी तरह, जिस पत्रकार ने 2011 में दास के साथ काम किया था, उसने पाया कि समय के साथ, कई अनुभव, जिनमें दास वाला अनुभव भी शामिल था ने उन्हें ऐसा बना दिया था जिससे वो कमज़ोर प्रतीत होती थीं, फिर उनके कमज़ोर होने के बारे में एक राय बन गई.

उन महिलाओं में से आधे से ज्यादा ने जिन्होंने मुझसे बात की अपना अनुभव बताने के बाद उन्हें खीझ महसूस हुई. पत्रकार की मानसिक स्थिति- चिंता और अवसाद-इसके बाद बढ़ गए जब उसने अपने अनुभव को एक और रिपोर्टर के साथ साझा किया. पराडकर ने मुझे ट्विटर पर एक मैसेज में लिखा, “शुरुआती दिनों के सदमे के बाद ये शारीरिक क्रूरता के आघात का मामला नहीं था. यह एक धीमी जलन थी.”

इसे ये बात और बदतर बना देती थी कि दास के बारे में ये सबको पता था लेकिन एक महिला जब इस बारे में बात करना शुरू करती थी तो उसे पता चलता था कि दूसरों के साथ भी ऐसा ही हुआ है. मिश्रा ने घटना के तुरंत बाद दास के साथ इंटर्नशिप के बारे में एक दोस्त की मां को बताया. दोस्त की मां ने कहा, “यह कला दुनिया में एक खुला रहस्य है, मैं आश्चर्यचकित नहीं हूं.” “मुझे पता है कि मैंने और लोगों को बताया है और लोगों ने प्रतिक्रिया दी है कि जो वो सुन रहे हैं उसमें कुछ नया नहीं है, आम तौर पर मर्दों के बारे में नहीं, बल्कि दास के बारे में. ये मेरे साथ ठहर सा गया है … लोग आसानी से कह देते हैं कि ये एक खुला रहस्य है लेकिन वो अभी भी बेहद ताकतवर इंसान है.”

जिस महिला ने गैलरी वाला काम किया था उसने कहा कि वो ऐसे कलाकारों और गैलरी मालिकों को जानती हैं जो कहते हैं कि उन्हें पता है कि दास कैसे हैं लेकिन कोई उनके ख़िलाफ़ नहीं बोलना चाहता है. वो कहती हैं, “मैंने इसका सामान्यीकरण देखा और भारतीय कला उद्योग के साथ मेरी यही शिकायत है क्योंकि सामान्यीकरण की जड़ इस कारण है कि कलाकारों को विचित्र कहा जाता है.”

कई महिलाओं ने आत्म निंदा व्यक्त की. पराडकर ने कहा, “मैंने बेहद बेवकुफ की तरह महसूस किया, एक बेवकूफ. मैं पहले से ही सिर्फ पत्रकारिता में स्मार्ट नहीं थी- जो मुझे उन सभी इशारों में बताया जा रहा था जो मुझे पास किए जा रहे थे- मैं मर्दों को पढ़ने में भी स्मार्ट नहीं थी. इसकी वजह से मैंने बहुत बेवकूफ महसूस किया.”

जो अपने दोस्त की नौकरी का विवरण लेने गई थी उस महिला ने कहा, “ये पछतावा हमेशा रहेगा कि मुझे समझ जाना चाहिए था और नहीं जाना चाहिए था.” दास की प्रदर्शनी के लिए काम करने वाली महिला ने कहा कि घटना ने उसे इस सोच के साथ छोड़ दिया  “क्या मैं कहीं गलत थी? क्या मैंने ऐसा आइडिया दिया कि वो मेरे साथ ये कर सकते हैं?” उनकी अब शादी हो गई है और दो बेटियां हैं. उसने मुझे अपने बच्चों के भविष्य के लिए सपनों की बात करते हुए बताया, “मैं उनको किसी भी ऐसी बात के लिए खुद को दोष नहीं देने दूंगी जिसमें उनकी गलती नहीं है.” यहां वो रुक गईं. उन्होंने पूछा, “फिर आप खुद को क्यों दोष देती आई हैं? आपको पता है, जैसा अपने कई मामलों में देखा है, आपको पता है कि आप गलत समय में गलत जगह पर नहीं थीं. आप सिर्फ गलत आदमी के साथ थी.”

लेकिन जब महिलाएं उस कंट्रोल को याद करते हुए कष्ट महसूस कर रही थीं जो वो ऐसी स्थिति में बेहतर तरीके से दिखा सकती थीं, ऐसी कोई बात दास की तरफ से सामने नहीं आई. उन्होंने बोरा के आरोपों को “भद्दा” कहते हुए खारिज कर दिया और दावा किया कि वो कभी उससे मिले नहीं थे और “एक खेल खेला जा रहा है” जिसके तहत आरोप इसलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि इसमें लोगों को मजा आ रहा है. द वायर में पराडकर के आरोपों के जवाब में उन्होंने कहा कि वो आरोपों से “बहुत पीड़ित” हैं और माफी मांगते हुए कहा “अगर किसी औरत ने मेरे कारण किसी तरह की असहजता महसूस की है … तो यह मेरा इरादा कभी नहीं था.” दास ने उन सवालों के जवाब नहीं दिए जो दी कारवां ने उन्हें भेजे थे.

कई महिलाओं द्वारा लगाए गए इन आरोपों के मामले में दास को किन परिणामों का सामना करना पड़ सकता है ये तो अभी तक साफ नहीं है. हमारे साक्षात्कार के तुरंत बाद बोरा ने मुझे लिखा: “अगला कदम कौन उठाएगा? क्या इस व्यक्ति को देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार रखने की अनुमति दी जानी चाहिए? अगर हां, तो ये हमारे देश के बारे में क्या बताता है?”

जैसा कि पराडकर ने कहा कि सिर्फ कला जगत को आत्मनिरीक्षण की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने कहा, “मैं अब उम्मीद कर रहा हूं कि कला जगत, पत्रकारिता जगत, बाकी के उद्योग इसे पीआर अभ्यास के रूप में नहीं लेंगे. लेकिन उनकी प्रतिभा, उनकी रचनात्मकता, उनकी उत्पादकता को पोषित करने के संदर्भ में वे क्या सोचते हैं, इस पर एक अच्छी और गहरी नजर डालेंगे.”

दी कारवां के उस फीचर को याद करते हुए जिसने दास के बार में हमारी पहली बातचीत को शुरू किया था, मिश्रा ने कहा, “मैंने महसूस किया कि अंदर के पन्नों में आकर मैंने उनके साथ शांति स्थापित कर ली है और अब उनसे कभी मुलाकात नहीं होगी. लेकिन मेरी संस्था ने उसे झुका दिया था, है ना? और इस तरह इसे प्रचारित किया जाता है. और मैं उस प्रक्रिया का हिस्सा थी. और अगर मैं इस बारे में फैसला नहीं लेती तो बाकी कैसे लेंगे?” उन्होंने आगे कहा, “मुझे उम्मीद है कि ये अब छिपा नहीं रहेगा, ऐसा तथ्य की ऐसी बातें छिपी रहती हैं, ऐसा करने वालों को बल देती हैं और ये समाज में उनकी स्थिति को बरकरार रखती हैं … किसी ने पहली आवाज उठाई. और हम इसके बारे में बात कर रहे हैं और हम इसका जश्न मना रहे हैं- हम खुद ऐसा करने के बारे में कभी नहीं सोचते. लेकिन अकेली लड़की या अकेला व्यक्ति बदलाव लाने में कभी भी सक्षम नहीं होगा.”

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