पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास की बहन श्वेता को देखने लड़के वाले आते हैं. इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. घर पर बीमार सहाय साहब का हालचाल पूछने उन के मित्र आए होते हैं. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए सब को बताते हैं कि वह उसे मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं. सुहास अपनी तारीफ सुन कर खुश होता है.

अब आगे...

पुरवा अंदर से सारी बातें सुन रही थी. उसे देखते ही बोली, ‘‘मैदान मारने में बहुत होशियार हो.’’

‘‘यह तो भूमिका है सब से बड़ा मैदान मारने की,’’ सुहास ने धीरे से कहा और एक आंख दबा दी, फिर बोला, ‘‘आंटी कहां हैं?’’

‘‘मम्मा रसोई में हैं.’’

‘‘यह मिठाई किस के लिए?’’ पुरवा ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘अंकलआंटी के लिए.’’

पुरवा तुनक कर बोली, ‘‘और मैं?’’

‘‘तुम्हारे लिए तो स्वयं मैं ही खड़ा हूं.’’

‘‘अच्छा चलो, बातें न बनाओ, शरारती कहीं के.’’

पुरवा की मम्मी को देखते ही सुहास अभिवादन में झुक गया. डब्बा उन की तरफ बढ़ा कर बोला, ‘‘आंटी, मेरी बहन का विवाह तय हो गया है. अगले सोमवार को सगाई है और आप सब को आना है. पुरवा, तुम्हें भी.’’

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