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धर्म होते ही हिंसात्मक हैं

धार्मिक हिंसा जोरू और जमीन के लिए की गई हिंसा से कई गुना अधिक होती है. हम जिस सर्वधर्म समभाव या धार्मिक सहिष्णुता की बात करते हैं, वह मिथ्या के अलावा कुछ नहीं. प्रस्तुत है, मोहन वर्मा की विवेचना.

प्रागैतिहासिक मनुष्य ने अस्तित्व के लिए संघर्ष का एक लंबे समय तक सामना बर्बरतापूर्वक लड़ कर अपना बचाव कर किया. उस के  लिए हर तरह के शत्रु को समाप्त करना जरूरी था, वरना शत्रु उसे समाप्त कर देता.

संगठन की ताकत का आभास होने के बाद लोग समूहों, गिरोहों, कबीलों में बंटने लगे. सामूहिक हिंसा शुरू हुई. यह भोजन एवं सुरक्षित घर पाने के लिए तिहरी लड़ाई का हिस्सा थी-प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध, वन्य जंतुओं के विरुद्ध और दूसरे व्यक्ति समूहों के विरुद्ध.

खेतीबाड़ी और पशुपालन की शुरुआत के बाद, संघर्षों के कारणों में जीने के लिए भोजन व रहने की जगह के अलावा नई चीजें भी जुड़ती गईं जिन में खेती के लायक जमीनों पर कब्जा, दूसरे समूहों के व्यक्तियों को गुलाम बनाने के लिए बंदी बनाना और शारीरिक शोषण के लिए औरतों को हथियाना, कुछ खास वजहें थीं. दूसरों की पैदा की या पाई चीजों पर कब्जा कर खुद उन का आनंद लेना भी उन्हीं में से था.

आंधीतूफान, बाढ़, सूखा और दावानल की भीषण मार झेलते मनुष्य को जल, वायु और अग्नि रक्षक की तरह दिखने लगे. विनाशकारी ताकत रखने वाले तत्त्वों के प्रति भय और बेबसी ने रक्षक तत्त्वों को वश में करने की कामना ने पूजापाठ के विधानों को बल दिया. चतुर लोगों ने इस भय का लाभ उठा कर बड़े अनिष्टों को टालने के लिए कर्मकांड शुरू किए. कर्मकांडों की सघनता बढ़ने के साथ ईश्वरीय अवधारणाएं भी नएनए रूपों में विस्तार पाती गईं.

फ्रांसीसी विचारक दुर्खीम ने आस्ट्रेलियाई जनजातियों के अध्ययनों में पाया कि हर कबीले, गोत्र का अपना ‘टोटम’ होता है, जो कोई भी पशु या पौधा हो सकता है, जिसे पवित्र संरक्षक माना जाता है. जिसे नष्ट करना अपराध है.

बर्बर घुमक्कड़ समूहों के बाद जैसे ही स्थायी निवास की आदत बननी शुरू हुई, वैसे ही कबीले को गोत्र या टोटम या देवता को धर्म की प्रारंभिक अवधारणाआें के आधार पर संगठित रखना आसान होता गया. दूसरी तरफ शत्रु का मनोबल गिराने के लिए उस के पवित्र प्रतीकों को नष्ट करना कारगर उपाय दिखने लगा. इसी कारण लड़ाइयां हुईं और ज्यादातर के पीछे वे चतुर लोग रहे जो धार्मिक हिंसा को प्रोत्साहन देते थे.

यह आज भी अनवरत चालू है. धार्मिक हिंसा जर और जमीन के लिए की गई हिंसा से मात्रा में कई गुनी अधिक रही है. हम जिस सर्वधर्म समभाव या धार्मिक सहिष्णुता की बात करते हैं, वह मिथ्या आधारों पर कल्पित दिवास्वप्न के सिवा और कुछ नहीं है. किन्हीं भी 2 धर्मों के प्रबल अलगाववादी तत्त्व लोगों को एकदूसरे के साथ रहने नहीं देना चाहते, सभी धर्मों के लिए सहअस्तित्व की बात बहुत दूर की चीज है. यह तो धर्म का विनाश कर देगी. सामाजिक संगठन में धर्म की जो भूमिका है, उस की बुनियाद में ही अन्य धर्मों के प्रति एक हिंसक अविश्वास होता है. दूसरे सांस्कृतिक व राजनीतिक कारणों से तो धार्मिक सहअस्तित्व की स्थितियां बनती हैं लेकिन फिर भी धर्म की अनूठी अलगाववादी मानसिक धारा अवचेतन में अपना काम करती रहे यह ध्यान रखा जाता है ताकि मौका मिलते ही नासूर की तरह फूट कर हिंसा के तेजाब से समाज को सराबोर कर सके.

गुजरात में जिस तरह संभ्रांत, सुशिक्षित वर्ग के लोगों ने लूटपाट और अन्य नृशंसतापूर्ण काररवाइयों को अंजाम दिया, वह किसी का व्यक्तिगत सनकीपन या मनोविकार नहीं था, बल्कि इस हिंसक मनोवृत्ति के लिए जरूरी पोषक तत्त्व तो धार्मिक संस्कार ही मुहैया कराते हैं, जिन से व्यक्ति को बांधने की तैयारी उस के जन्म लेने से पहले ही अलगअलग कर्मकांडों के जरिए शुरू कर दी जाती है.

मुंबई में राज ठाकरे के विरोध में छठ पूजा ज्यादा केंद्र में है, नौकरियां नहीं. एक ही धर्म के 2 हिस्सों में हिंसा का यह पहला और अकेला उदाहरण नहीं है. इतिहास अपनों से भी धार्मिक हिंसा के उदाहरणों से भरा है.

खून से सराबोर हैं सदियां

धर्म पे्ररित हिंसा के मामले में सब बराबर हैं. इस बारे में दुनिया भर के सभी मानव समूहों में एक आम सहमति बनी हुई है. हर जगह करिश्माई धार्मिक नेता धार्मिक विशेषता के प्रति गर्व और अन्य समुदायों के प्रति प्रतिक्रियावादी अविश्वास के बीज अपने लाखों अनुयायियों के मन में बो रहे हैं और दंगेफसाद, मारकाट, बर्बर आतंकवादी काररवाइयों, तोड़फोड़ और लूटपाट की फसलें काटी जा रही हैं.

जोनाथन फौक्स ने 1950 से 1996 तक के धार्मिक संघर्षों के अपने अध्ययन में कहा है कि इस लगभग आधी सदी में 33 से 47 प्रतिशत लड़ाइयां धर्म के नाम पर हुईं. शीत युद्ध की समाप्ति के बाद गैर धार्मिक हिंसा का ग्राफ गिरा है और धार्मिक हिंसा की घटनाआें में काफी तेजी आई है. जहां हिंसा के प्रमुख स्रोत के रूप में धर्म कार्यरत है, वहीं यह हिंसा के अन्य आर्थिक, आदर्शवादी, आतंकवादी और परंपरागत कारणों से इस तरह गुंथा हुआ है कि इसे अलग कर के देख पाना मुश्किल है.

पवित्र आतंक और ईश्वर के नाम पर हत्याएं, आज हिंसक झगड़ों के प्रमुख तत्त्व हैं. चेचेन्या से अफगानिस्तान तक पनपा हुआ इसलामी अतिवाद और सऊदी अरब तथा इंडोनेशिया के साथ पश्चिमी देशों, जिस में स्पेन व अमेरिका भी शामिल हैं, में आतंकी हमले इस के साक्ष्य हैं. हिंदुआें में जातिगत संघर्ष भी धार्मिक संघर्ष का ही एक रूप है.

ध्यान रहे, राजनीतिक और आर्थिक मामलों में भी धर्म को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है. ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है, जिस को सदा ही उग्र विचारधारा के हिंसक लोगों ने हाईजैक न कर रखा हो. धर्म की सफलता का कारण उस धार्मिक असहिष्णुता में छिपा हुआ है, जो सदियों से लड़ाई का सब से बड़ा कारण और औजार रहा है. बड़े आतंकी संगठनों से ले कर छोटे अलगाववादी संप्रदायों, मठोंमहंतों तक के अपने आर्थिक स्रोत और राजनीतिक दांवपेंच हैं. सरकारें और समाज सबकुछ जानते हैं लेकिन निहित स्वार्थों के कारण चुप्पी साध ली जाती है.

अमेरिकी रूढि़वादी आंदोलन पर लंबे समय से निगाह रखने वाले बिल बर्कोवित्स कहते हैं कि अमेरिका में धर्म को राजनीतिक रंग देने वाले रूढि़वादी समूहों ने बेतहाशा पैसा कूटा है. एलेन सियर्स के एलायंस डिफेंड फंड ने 2006 में 2.61 करोड़ डालर, डान वाइल्डमैन के अमेरिकन फैमिली एसोसिएशन ने 1.69 करोड़ डालर, जेम्स डाबसन के फोकस औन दि फैमिली ने 1.46 करोड़ डालर ऐंठे थे. ये महज चंद उदाहरण हैं, वास्तविकता यह है कि ऐसे संगठनों की भरमार सभी देशों में है.

इसलाम की रक्षा के लिए जिहाद के नाम पर दुनिया भर को अपने आतंक से थर्राने वाला अलकायदा संगठन पैसों के मामले में विश्वव्यापी नेटवर्क बनाए हुए है. भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदूवादी संगठनों के पास भी पैसे की कभी कोई कमी नहीं रही, जैसा कि इन की प्रचारप्रसार और अन्य गतिविधियों में देखा जा सकता है. वैसे भी, अपने यहां लाखोंकरोड़ों भक्त चाहे 2 जून की सहीसलामत रोटी अपने परिवार के लिए न जुटा पाते हों, लेकिन मोटे पेट वाले महंतों को चांदी के सिंहासनों पर सवारी करते देख कर खुश हो कर जयजयकार जरूर कर लेते हैं.

मारकाट के पुण्य

सैमुएल पी. हटिंगटन ने ‘सभ्यताओं का टकराव’ के अपने विश्व प्रसिद्ध सिद्धांत में कहा है कि नए वैश्विक समाजों में धर्म आधारित सोच जिस तरह से आकार ले रही है, उस के चलते सभ्यताआें का टकराव टलने वाला नहीं है. ईरान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी द्वारा सुझाए गए और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा समर्थित एलायंस औफ सिविलाइ- जेशन अभियान की जड़ में इसी सिद्धांत का विरोध रहा.

स्पेन के राष्ट्रपति जपेटेरो और तुर्की के प्रधानमंत्री रेसेप तैयप एर्दोगान की पहल के साथ शुरू हुए इस अभियान को विश्वव्यापी धार्मिक सद्भाव बढ़ाने की दिशा में एक कदम तो माना जा सकता है, लेकिन यह अधिक प्रभावी नहीं हो सकता. सभ्यताओं की टकराव में मूलभूत कारण धार्मिक कट्टरता में ही निहित हैं. जैसा कि पुर्तगाल के पूर्व राष्ट्रपति मारियो सोरेस कहते हैं कि इतिहास को देखें, तो धर्म में हिंसा का ही बोलबाला रहा है. तीनों प्रमुख एकेश्वरवादी धर्मों, ईसाई, इसलाम और यहूदी, अपने पड़ोसियों से प्यारमुहब्बत की बात करते हैं, लेकिन वे आखिर किस पड़ोसी की बात करते हैं, सवाल इस बात का है. क्या वे विधर्मी और नास्तिकों से भी प्यार करते हैं?

न्यूयार्क के वर्ल्ड टे्रड सेंटर पर 9/11 की घटना अगर ईसाई पश्चिमी उन्नत समाज के प्रति हिंसक घृणा का एक पहलू है, तो अमेरिकी सेना के इराकी सैनिक कैसर-सादी-अल-जबूरी द्वारा अपने अमेरिकन सार्जेंट और कैप्टन द्वारा इराकी महिलाआें पर अत्याचार करते देख कर उन की गोली मार कर हत्या कर देने जैसी घटनाओं के निहितार्थ भी वही विधर्मीवाद है.

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जून, 2007 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरीकरण के विस्तार के साथ लोगों में धर्मनिरपेक्षता और तर्क क्षमता के विकास की उम्मीद थी, लेकिन हुआ इस का ठीक उलटा है. दुनिया भर में भारत समेत बहुत सारे देशों में शहरीकरण के साथ धार्मिक कट्टरता का विकास ही हुआ है. यह रिपोर्ट अरब देशों में कट्टर इसलाम के उदय, लैटिन अमेरिकी राज्यों में कट्टर कैथोलिक ईसाइयत के विस्तार और भारत में शिवसेना के आदर्श शिवाजी और गुजरात में हिंदू फासीवाद आदि की चर्चा करते हुए धार्मिक पुनरुत्थान के नए खतरे का वर्णन करती है.

धार्मिक, चरमपंथी को यह विश्वास हो जाता है कि उस का कार्य तो पवित्र और ईश्वर की इच्छानुसार है और तब अकारण की जाने वाली हिंसा का विस्फोट होता है. इस हिंसा को नाटकीय और खासतौर से प्रतीकात्मक बताते हुए समाजशास्त्री मार्क जुएर्गेसमायर अपनी पुस्तक (टेरर इन द माइंड औफ गौड : द ग्लोबल राइज आफ रिलिजियस वायलैंस) में लिखते हैं कि अपने धार्मिक विश्वासों की रक्षा और विस्तार के लिए कास्मिक युद्ध में शरीक होते धर्मयोद्धाआें के लिए हिंसा जीवन से बड़ा कृत्य होता है. पुण्य और पाप के बीच का एक महायुद्ध, यह लगभग सभी धर्मों ने प्रचारित किया है.

वह ईसाई धर्म का उदाहरण देते हुए, ईसा और शैतान के विरोध को रेखांकित करते हैं. पर मानवता को बचाने के लिए शैतान के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करने वाले मरनेमारने की परवा छोड़ कर खुद सब से बड़े शैतान बन बैठते हैं. ये कू्रर जड़बुद्धि, अपने विपरीत किसी भी तर्क को सुनना ही पसंद नहीं करते, विचार करना तो बहुत दूर की बात है.

मार्क जुएर्गेसमायर धर्म पे्ररित हिंसा की पड़ताल करते हुए लिखते हैं कि दुनिया के 3 प्रमुख एकेश्वरवादी धर्म, यहूदी, ईसाई और इसलाम हैं जिन में अच्छाई बनाम बुराई के महायुद्ध के विविध खूनी रंग उकेरे गए हैं. यहूदियों में यह अंतिम न्याय और जन्म लेने के उद्देश्य के रूप में आता है. ईसाइयों में कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंट के आपसी मतभेद कहीं से भी ईसा मसीह के प्रेम संदेशों को व्यवहार में प्रतिबिंबित नहीं करते. इसलाम में यह पवित्र जिहाद के रूप में है, बुराई से बाहर आने और अच्छाई की ओर जाने का ऐसा प्रयास, जहां सबकुछ अल्लाह के नाम पर तय कर दिया गया है.

विधर्मियों और नास्तिकों से अपने धर्म को बचाना पहली प्राथमिकता होती है, इस गैर धर्मअनुयायियों के प्रति विरोध ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा के सहारे दुनिया के शक्ति संतुलनों को प्रबल चुनौती दी है. बहुदेववादी हिंदू धर्म में यह रामरावण की भयानक लड़ाई से कहीं आगे का संघर्ष है, जो राम जन्मभूमि से रामसेतु तक और गुजरात से गंगासागर तक अकसर प्रकट होता है.

एक ही रास्ते के मुसाफिर

चरमपंथियों का यह विश्वास सर्वाधिक खतरनाक है कि वे धार्मिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए लोगों की हत्याएं करने का हक रखते हैं. इस का फ्रेमवर्क मिस्र के सईद कुतुब ने 1950-1960 में तैयार किया था. फिलिस्तीनी चरमपंथी सुन्नी संगठन हरकत-अल-मुकवामा-अल-इसलामिया (हमास) इस का प्रमुख उदाहरण है, जो आस्टे्रलिया, कनाडा, इंगलैंड, यूरोपीय यूनियन और इसराईल तथा अन्य कई देशों के द्वारा आतंकी संगठनों की सूची में शामिल हैं.

हमास के स्त्री आत्मघाती हमलावरों में 6 बच्चों की मांएं तक शामिल होती हैं. हमास के शिक्षक भी कार्यकर्ताओं को आत्मघाती हमलों में मरने के बाद स्वर्ग में 70 कुमारियां और 70 बीवियां दिलाने का वादा करते हैं. फिलहाल उन के परिवारों को 12 से 15 हजार डालर की रकम दी जाती है.

‘तलवार उस स्वर्ग की चाबी है, जो केवल पवित्र योद्धाओं के लिए खुलता है,’ इसलाम कहता है, ‘यकीन न करने वालों को मार दो. तलवार के बिना लोगों को आज्ञाकारी नहीं बनाया जा सकता. अल्लाह के नाम पर उन सब को तलवार के नीचे रख कर उन के टुकड़े कर दो’.

आयातुल्लाह खुमैनी की इस घोषणा को आमिर ताहिरी अपनी किताब ‘द होली टेरर : इन साइड द वर्ल्ड औफ इसलामिक टेरेरिज्म’ में उद्धृत कर के धार्मिक हिंसा की पारलौकिक प्रेरणा को स्पष्ट करते हैं.

धार्मिक मान्यताओं की जटिलता और गूढ़ जड़ता ने धर्मों के बीच ही नहीं, धर्मों के अंदर अलगअलग पंथों के मध्य भी खूनी संघर्षों को बढ़ावा दिया है.

ईसाई पहचान आंदोलन के कुछ लोग बाहर से आने वाली 12 नस्लों को जानवरों से पैदा नीच नस्लें मानते हैं और यह मानते हैं कि बाईबिल के उपदेश और पुण्य केवल सफेद ईसाइयों के लिए ही हैं.

इराक व पाकिस्तान के शिया-सुन्नी संघर्षों ने जानमाल की व्यापक क्षतियां इन 2 देशों के अलावा अन्य देशों में भी की हैं जिन में भारत भी एक है.

हिंदू धर्म में जातिवाद और वर्णव्यवस्था ने लाखों लोगों को नारकीय जीवन और कीड़ेमकोड़ों सी मौत मुहैया कराई.

सिख समुदाय में डेरा सच्चा सौदा और रामरहीम प्रकरण नई चीजें हैं, इस से पहले खालिस्तान की सनक के नाम पर कुछ लोग अपने ही समुदाय का काफी नुकसान कर चुके हैं.

यहूदी, जो विश्व जनसंख्या का मात्र 0.2 प्रतिशत हैं, उन की धार्मिक कट्टरता का उद्घाटन कैरेन आर्मस्ट्रांग (द बैटिल फौर गौड) में करते हैं. रब्बी इसराईल हेस द्वारा 1980 में प्रकाशित जातीय नरसंहार संबंधी आलेख में ‘तोरा’ का हुक्म उद्धृत है कि फिलिस्तीनी यहूदियों के लिए उसी तरह हैं जैसे प्रकाश के लिए अंधकार होता है और वे अमेलकिट्स की तरह घृणित हैं. अमेलकिट्स के लिए 1 सैमुएल: 15 : 3 के अनुसार हिब्रुओं से कहा गया है कि ‘जाओ, और अमेलकिट्स को नष्ट कर दो, और उन के पास जो कुछ भी हो, वह सब नष्ट कर दो. उन के आदमियों, औरतों और बच्चों तथा दूध पीते शिशुओं, बैल, भेड़, ऊंटों, गधों सब को मार डालो.’

आजकल पश्चिमी समाजों में ईसाइयों द्वारा विधर्मियों पर घातक हमले नगण्य हैं. पर हिटलर का नाजी आंदोलन धर्मजनित रेसियल अहंकार पर आधारित था जिस में यहूदियों को उन के धर्म के कारण ही निशाना बना कर चुनचुन कर मारा गया. आज भी घृणा और असहिष्णुता के कारोबार में कमी नहीं है. प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के सब से बड़े संगठन दक्षिणी बैपटिस्ट सभा के अध्यक्ष ने 1980 में कहा था कि ईश्वर यहूदी की प्रार्थना नहीं सुन सकता.

इसी संगठन की 2002 की सालाना बैठक में पैगंबर मुहम्मद को शैतानों के कब्जे में बताया गया था. ब्रिटिश और यूरोपीय पार्लियामेंटों के सदस्य डा. इयान रिचर्ड (एक चर्च संस्था के संस्थापक) ने कैथोलिकों को शैतानी कपट धारण करने वाला कहा. कट्टर ईसाइयों द्वारा यहूदी और अन्य पंथ के अनुयायियों के खिलाफ पथराव, गोलीबारी, बमविस्फोट और म्यूनिसिपल सप्लाई के पानी को जहरीला बनाने जैसी घटनाएं भी होती रही हैं. 1995 में ओक्लाहामा सिटी में टिमोथी मैकवेग ने 19 बच्चों सहित 168 लोगों को बम से मार दिया था.

शांति का आधार ले कर दुनिया में जगह बनाने वाले बौद्ध धर्म के ही एक अनुयायी ने श्रीलंका की प्रधानमंत्री भंडारनायके को मौत के घाट उतारा था. बौद्ध धर्म से प्रबल प्रभावित कोरिया और चीन में इनसानी अत्याचार, मानवाधिकारों के उल्लंघन और मारकाट आम बातें हैं. एअर इंडिया के बोइंग-747 विमान के बम धमाके में 329 लोगों के साथ अटलांटिक महासागर में जलसमाधि की रोंगटे खड़े कर देने वाली  घटना के आरोपी सिख और कश्मीरी दोनों चरमपंथी थे. प्रकट में राजनीतिक कारणों से होने वाले इन कांडों के पीछे धार्मिक अलगाव और विद्वेष के कीटाणु अपना काम करते हैं. जैसा कि बू्रस हाफमैन, (हौली टेरर : द इंप्लीकेशन औफ टेरेरिज्म मोटिवेटेड बाई ए रिलिजिएंस इंपेरेटिव) में लिखते हैं कि हिंसा न केवल स्वीकृत है, बल्कि दैवी पवित्रता के साथ महिमामंडित भी है.

कुछ चरवाहे, बाकी भेड़बकरियां

नए धार्मिक आंदोलनों ने अपनीअपनी क्षमतानुसार दुनिया के ओरछोर तक अपनी हिंसक गतिविधियों की बदौलत आम आदमी का जीना हराम किया हुआ है. रैंड की रिपोर्ट इन की 2 महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का खुलासा करती है. पहली तो इन के समूह की तीखी तनावपूर्ण स्थिति उन समुदायों के प्रति, जो इन के आसपास होते हैं, और दूसरी इन के अगुवाकारों का सभी अनुयायियों पर कठोर नियंत्रण, जिस से पीछे चलने वाली भीड़ बिना सोचेसमझे आंख बंद कर इन का अनुकरण करती रहे.

प्रसिद्ध इटेलियन समाजशास्त्री ली-बौन ने भीड़ की जिस समूह मानसिकता की व्याख्या की है, उस की सब से अच्छी समझ इन संगठनों के ठेकेदारों में पाई जाती है. ऐसे संगठनों के खिलाफ सीधी सैनिक काररवाई प्राय: उलटा असर करती है, जैसा कि इराक में मुक्तदा-अल-सद्र और उन के आंदोलन को पश्चिमी ताकतों द्वारा जबरिया हथियारविहीन करने पर देखा गया.

इस और ऐसी काररवाइयों ने समूचे मुसलिम समाज को पश्चिम के खिलाफ एक पाले में खड़ा कर दिया. पाकिस्तान में लाल मसजिद पर सैन्य काररवाई हो, या स्वात घाटी के मुल्ला रेडियो के खिलाफ अभियान, इन की ताकत तब और बढ़ती है जब ये खुद को ‘शैतान के कब्जे वाली सरकार’ द्वारा पीडि़त बता कर, शहीदी मुद्रा में पेश करने का मौका पा जाते हैं और अपने समुदाय से हर प्रकार का समर्थन जुटाने में फिर इन को देर नहीं लगती.

क्या फिर भी यह कहा जा सकता है कि धर्म, मनुष्य को हिंसा और मारकाट नहीं, बल्कि सभ्यता और शांतिपूर्वक सहअस्तित्व के साथ जीना सिखाता है? क्या किसी के अपने आसपास के किसी संप्रदाय, धार्मिक अनुयायी को इसलिए आदर देना चाहिए, क्योंकि वह सही रास्ते पर जा रहा है? तो फिर विश्वव्यापी हिंसा की ओर जान

आम चुनाव की दस्तक

जैसे जैसे आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस बार बातें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की कम हो रही हैं, विरोधी दलों की चर्चा ज्यादा होने लगी है. सुर्खियों में अब मायावती और अखिलेश का गठबंधन, कांग्रेस, ममता बनर्जी, डीएमके आदि छाने लगे हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री अब सिर्फ उद्घाटनों, शिलान्यासों और सम्मेलनों में भाषण करने की औपचारिकताएं निभाने में लगे हैं. सरकार के कई मंत्रियों और भाजपा अध्यक्ष की बीमारियां जरूर सुर्खियां बनी हैं.

भाजपा ने जो संगठित चेहरा 2014 से 2017 तक दिखाया था, अब बिखरने लगा है. यह अच्छा नहीं है. जनता की पसंद लोकतंत्र में बदलती रहती है पर मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को हर स्थिति में अपना संतुलन और सामर्थ्य बनाए रखना होता है. यह देश के लिए जरूरी होता है. सत्तारूढ़ पार्टी को अंत तक अपनी हिम्मत नहीं खोनी चाहिए चाहे उस के काम सही हों या गलत.

यह ठीक है जब कई पराजयों का सामना एकसाथ करना पड़े तो लोग हताश होने लगते हैं. पर, फिर भी हजारोंलाखों लोग उस नेता से जुड़े होते हैं और वे मैदान छोड़ कर न भाग जाएं, यह देखना नेताओं का ही काम होता है.

नरेंद्र मोदी ने यह गलती की कि उन्होंने पूरी जिम्मेदारी और सत्ता अपनेआप में केंद्रित कर ली क्योंकि भाजपा 2014 का चुनाव केवल उन के बल पर जीती थी. बाकी सब मोहरे बन कर रह गए थे. यह पार्टी या सरकार चलाने का सब से गलत तरीका है, पर दुनियाभर में ऐसा ही होता है.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, ब्रिटेन में टेरेसा मे और जरमनी में एंजेला मर्केल की हालत नरेंद्र मोदी की तरह है. इन को कई फ्रंटों पर लड़ना पड़ रहा है और जीत कम ही मिल रही है. ट्रंप मैक्सिको और अमेरिका के बीच वाल बनाने के पीछे ऐसे पड़े हैं जैसे मोदी मंदिर, गाय और जीएसटी के. टेरेसा मे ब्रैक्सिट को ले कर जिद कर रही हैं, एंजेला मर्केल यूरोप में एकछत्र राज चाहती हैं.

बिना चुनौतियों के राज करने या अनायास सत्ता पाने के अवसर ने इन नेताओं से सब से मिल कर चलने का गुण छीन लिया है और इसी वजह से इन के अपने सहयोगी, संगीसाथी इन के साथ मन मार कर काम कर रहे हैं. जो समस्याएं पहले चुटकियों में हल हो जाती थीं, अब विकराल बनने लगी हैं.

इस सब का नुकसान जनता को सहना पड़ता है क्योंकि सरकार ठप हो जाती है. आजकल भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और जरमनी में कोई खास फैसले नहीं लिए जा रहे क्योंकि नेताओं को अपने बचाव से फुरसत नहीं है. इस का असर एकदम न पड़ेगा, पर 4-5 वर्षों बाद इस तरह हुए बीमार नेतृत्व का खमियाजा पूरा देश भुगतेगा, यह पक्का है.

इन टूल्स की मदद से करें नेल आर्ट

नेल आर्ट का फैशन इन दिनों कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है. इससे नाखून बहुत ज्यादा आकर्षक लगते हैं और आपको ग्‍लैमरस लुक मिलता है. लेकिन कई बार हमें नेलआर्ट करने में समस्या आती है. नेल डिजाइन में नेल आर्ट डाटिंग सबसे ज्यादा ट्रेंड में है और ये बहुत आकर्षक भी लगती है. इस फैंसी नेल डिजाइन को बनाने के लिए आप बोल्‍ड और ब्राइट के अलग-अलग रंग ट्राई कर सकती हैं. नाखून पर डाट्स बनाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. हालांकि, कुछ आसान टूल्‍स की मदद से आप घर पर ही डाटिंग नेल डिजाइन बना सकती हैं. आज हम आपको नेल आर्ट के कुछ ऐसे उपकरणों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप परफेक्‍ट डाट बना सकती हैं और इसे एक नए ही लेवल पर लेकर जा सकती हैं.

बौल पैन

किसी महंगे टूल को खरीदने की बजाय आप बौल पैन से भी नाखूनों पर डाट्स बना सकती हैं. ये भी नेल आर्ट का बहुत आसान तरीका है.

टूथ पिक

फंकी और ट्रेंडी नेल आर्ट के लिए आप टूथ पिक का इस्‍तेमाल कर कई तरह की डाट्स बना सकती हैं. नेल आर्ट डाटिंग में टूथ पिक कई तरह से काम आ सकती है.

सुई

सुई से भी आप नाखूनों पर डिजाइन बना सकती हैं. शुरुआत में नेल आर्ट सीखने वाले लोगों के लिए ये बहुत काम की चीज है. अब इन टूल्‍स से आप अपने नाखूनों को क्‍लासी लुक दे सकती हैं.

हेयर पिंस

हेयर पिंस की मदद से आप कम समय में नेल आर्ट डाटिंग में महारत हासिल कर सकती हैं. हेयर पिंस से नाखूनों पर डाट्स बनाना आसान होता है. पेंट में हेयर पिन को डुबोएं और डाट्स बनाएं.

माचिस की तिल्‍ली

माचिस की तिल्‍ली से भी आप नाखूनों पर अलग-अलग डाट्स बना सकती हैं. माचिस की दोनों तरफ से अलग आकार की डाट्स बन सकती हैं. इसमें आपकी नेल आर्ट भी उभरकर आएगी.

सेफ्टी पिन

हर घर में बड़े ही आराम से सेफ्टी पिन मिल जाएगी. नेल पेंट में पिन को डुबोएं और इससे नाखूनों पर साफ और शेप में डाट बनाएं. ये काफी सस्‍ता और आसान तरीका है जिससे आप अपने नाखूनों को खूबसूरत बना सकती हैं.

पेंट ब्रश

पेंट ब्रश से भी आप बड़ी आसानी से छोटी और बड़ी डाट्स बना सकती हैं. ब्रश को साफ करें और अलग-अलग पेंट का इस्‍तेमाल कर नेल आर्ट करें.

यह सुहागरात इम्पौसिबलः प्रताप सौरभ सिंह का बेहतरीन अभिनय

रेटिंग:ढाई स्टार

किसी कहानी या नाटक को सिनेमा के परदे पर उतरना आसान नही होता. दिग्गज फिल्मकार भी इस तरह की फिल्म बनाते समय असफल हो जाते हैं. ऐसे में एक पन्ने की कहानी ‘‘नमक स्वाद अनुसार’’ पर नवोदित फिल्मकार अभिनव ठाकुर से बहुत ज्यादा उम्मीद लगाना जायज नही है. फिर भी अभिनव ठाकुर कुछ कमियों के बावजूद फिल्म की विषय वस्तु को ‘सुहागरात’ तक सीमित रखते हुए कुछ मुद्दों को उकेरने के साथ ही कुछ संदेश देने की भी कोशिश की हैं.

फिल्म की कहानी समस्तीपुर मे रह रहे सत्यप्रकाश (प्रताप सौरभ सिंह) के भाई पवन (प्रदीप शर्मा ) से शुरू होती है, जो कि अपने दोस्त के मोबाइल पर फिल्म ‘‘कभी कभी’’ देख रहा है. इस फिल्म के एक दृश्य पर पवन अपने दोस्त से कहता है कि उसके भाई के साथ भी ऐसा कुछ हुआ था. फिर वह अपने दोस्त को अपने भाई सत्यप्रकाश की कहानी सुनाता है. सत्यप्रकाश की शादी उसके परिवार की सहमति से उसके फूफा (आलोकनाथ पाठक) दिल्ली में पढ़ी लिखी देविका (प्रीतिका चैहान) से कराते हैं. यह प्रेम विवाह है नहीं, इसलिए सत्यप्रकाश और देविका की मुलाकात सुहागरात की रात्रि में ही होती है. सुहागरात के लिए जाते समय उसके फूफा उसे कुछ पाठ पढ़ाकर व एक तेल देकर भेजते हैं. गांव की पृष्ठभूमि और छोटे शहर में पले बढ़े सत्यप्रकाश औरतों की बड़ी इज्जत करते हैं. सुहागरात की रात्रि में जब देविका को दूध के गिलास के साथ कुछ औरतें सत्यप्रकाश के कमरे में छोड़ जाती है, तो देविका सहमी सी घूंघट निकाल कर पलंग पर बैठ जाती है.

सत्यप्रकाश देविका से प्यार जताते  हुए सुहागरात मनाने की बजाय देविका से बडे़ प्यार से कहता है कि गर्मी बहुत है, आप चाहें तो अपना घूंघट हटा सकती हैं. पर देविका घूंघट नहीं हटाती वह तो चाहती है कि सत्यप्रकाश अपने हाथों से उसका घूंघट हटाए. पर सत्यप्रकाश तो देविका से बात करते हुए कहता है कि उसकी सोच यह है कि शादी हो जाने से देविका उसकी जागीर नही हो गयी. वह एक दूसरे को समझना चाहते हैं इसलिए बातचीत करने का प्रस्ताव रखकर अपनी बात कहना शुरू करता है. वह बात को आगे बढ़ाते हुए अपने कालेज के दिनो की प्रेम कहानियां सुनाता है कि उसके मेघा,रोजी सहित चार लड़कियों से संबंध रहे हैं. हर लड़की की सुंदरता आदि का विस्तार से वर्णन करता है. सत्यप्रकाश बताता है कि किस तरह उसने जब रोजी का हाथ पकड़ा था तो रोजी ने चांटा जड़ते हुए कह दिया था कि वह उस तरह की लड़की नहीं है.

एक लड़की से उसने प्यार किया और बात शादी तक पहुंची पर वह उसे ठुकरा कर चली गयी थी  जिससे उसके पुरूष मन को ठेस लगी थी. उसका ईगो हर्ट हुआ था. इसलिए जब मेघा से उसे प्यार हुआ तो उसने मेघा के संग शारीरिक संबंध बनाकर उसे अपनी जिंदगी से दूर कर दिया था जबकि मेघा तो उसके पैरों पर पड़कर गिड़गिड़ा रही थी. देविका,सत्यप्रकाश की बातें चुपचाप सुनती रहती है. फिर सत्यप्रकाश देविका से सवाल कर बैठता है कि वह तो दिल्ली में पढ़ी है जहां लड़के व लड़कियां एक साथ पढ़ते हैं. तो उसका भी कोई प्रेमी रहा होगा. काफी कुरेदने पर झुंझलाकर देविका कहती है कि ‘मेरा संबंध अपने ड्राइवर के साथ रहा है. तब वह सवाल कर बैठता है कि ड्राइवर के साथ उसका संबंध कितना था? उसने उसे कहां कहां छुआ था.. अंत में वह देविका को ‘टैक्सी’ कह देता है. तब देविका अपना घूंघट हटाने के साथ ही सारे जेवर उतार देती है और सोने का जतन करने लगती है. पर सत्यप्रकाश कहां चुप रहने वाला? तब देविका उठकर रात में ही सड़क पर चली जाती है और सुहागरात नही मनाती. पर सत्यप्रकाश व पवन उसे वापस ले आते हैं. मगर सुबह जब सभी शादी के जश्न के बाद थके हुए सो रहे थे थे तभी देविका अपना बैग उठाकर चली जाती है.

सत्यप्रकाश उसके पैर पकड़कर उसे घर न छोड़ने के लिए कहता है. पर देविका पर इसका असर नहीं पड़ता. छह माह बाद पता चलता है कि देविका की शादी एक मैच्योर युवक देवेश(नयन रूपल) से होती है. सुहागरात के वक्त देवेश देश व समाज की प्रगति की बात करते हुए उसे उपहार देता है. उपहार लेकर जब देविका उसकी प्रशंसा करती है तब देवेश, देविका को ‘किस’ करना चाहता है पर देविका उसे रोक देती है. इस पर देवेश कहता है कि उसके साथ उसकी शादी हुई है और वह उसकी पत्नी है. तब देविका कहती है कि,‘शादी होने से वह उसकी जागीर नहीं हो गयी.’फिर देविका बिना सुहागरात मनाए ही बैग लेकर वहां से भी चली जाती है. दूसरे दिन समुद्र किनारे वह सिगरेट पीते हुए नजर आती है.

एक पन्ने की कहानी ‘‘नमक स्वाद अनुसार’’ पर बने नाटक ‘‘सुहागरात’’ को देखकर अभिनव ठाकुर ने हास्य फिल्म‘ ‘यह सुहाग रात इम्पौसिबल’’ बनाने का निर्णय लिया. उन्होंने इस फिल्म में कई मुद्दे उठाए हैं. मसलन-शादी एक इंसान नही बल्कि समाज तय करता है. शादी व्याह महज गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं. गलत शादी नही करनी चाहिए. जब तक आप शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो शादी न करें. सुहागरात बातें करने के लिए नही होती. इसी तरह के मुद्दों के साथ फिल्मकार ने शादी को लेकर लोगों के मन में जो गलत धारणाएं है उन्हे खत्म कर उनकी सोच बदलने का प्रयास किया है. मगर कमजोर पटकथा के चलते वह इसमें सफल कम हुए हैं. यदि पटकथा पर थोड़ी मेहनत ज्यादा की जाती तो यह एक उम्दा फिल्म बन सकती थी. फिल्म में सुहागरात के समय सत्यप्रकाश ओर देविका के बीच की बातचीत को और अधिक रोचक बनाया जा सकता था.

इसके अलावा हास्य के नाम पर फूहड़ता ही परोसी गयी है. इतना ही नही फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि उत्तर भारत वह भी खास कर बिहार है, जबकि फिल्म को गुजरात में फिल्माया गया है तो निर्देशक व फिल्म के कला निर्देशक की गलती के चलते फिल्म के कुछ दृश्यों में गुजराती भाषा में लिखे हुए विज्ञापन व नाम पट नजर आते हैं. इस गलती की वजह फिल्म का बजट भी हो सकता है. फिल्म बहुत कम बजट में बनायी गयी है. इसके अलावा यदि फिल्म में कुछ नामचीन कलाकार होते तो फिल्मकार का मकसद पूरे होने में मदद मिल जाती.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो फिल्म में सभी नवोदित कलाकार हैं. मगर सत्य प्रकाश के किरदार को जिस तरह से प्रताप सौरभ सिंह ने जीवंतता प्रदान की है उसे देखकर यह अहसास ही नहीं होता कि यह उनकी पहली फिल्म है. पवन के किरदार में प्रदीप शर्मा ने भी ठीक ठाक अभिनय किया है. मगर देविका के किरदार में प्रीतिका चैहाण काफी निराश करती हैं. उनके चेहरे पर कोई भाव ही नही आते. एकदम सपाट चेहरा… उन्हे यदि अभिनय के क्षेत्र मे आगे बढ़ना है तो काफी मेहनत करने की जरुरत है.

भाजपा सांसद-विधायक में जूते-थप्पड़

सांसद और विधायक जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं ने लोकसभा और विधानसभा में कुर्सी मेज और पंखे कई बार तोड़े शोर मचाया. खुलेआम पहली बार गंदी गंदी गालियों के साथ दोनो को पहली बार लड़ते देखा गया. झगड़े की फौरी वजह भले ही शिलान्यास के पत्थर पर नाम न होना रहा हो पर इसकी मुख्य वजह अपसी मनमुटाव और वर्चस्व स्थापित करना ही था. पार्टी में सबकी जिम्मेदारी बराबर होने की बात बेमानी हो चुकी है. भाजपा के अंदर भी जातीय संघर्ष चालू है. सहारनपुर दंगा ने दलित सवर्ण गठजोड़ का पोल खोल चुका है तो संत कबीरनगर में दो ऊंची जातियों का टकराव पार्टी की पोल खोल दी.

सामाजिक समरसता के लिये काम करने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश में सांसद और विधायक के बीच जूते-थप्पड़ चले. संतकबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी और मेंहदावल विधानसभा से विधायक राकेश सिंह बघेल के बीच जिला योजना समिति में चले जूते चप्पलों ने पार्टी के नेताओं के बीच चल रही सामाजिक समरसता की पोल खोल दी. देश की सबसे अनुशासित पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के नेताओं के बीच इस शर्मनाक हरकत से साफ हो गया कि भाजपा में जमीनी स्तर पर हालात कैसे हैं? जूते-थप्पड़ कांड के पीछे कोई बड़ी वजह नहीं थी. एक सड़क के शिलान्यास पत्थर में सांसद का नाम नहीं लिखा था. इस पर सांसद शरद त्रिपाठी ने एतराज किया. विधायक राकेश सिंह बघेल के साथ शुरू हुई कहासुनी जूते-थप्पड़ कांड में बदल गई.

रामायण और महाभारत की कहानियां को अपने व्यवहार में ढालने वाली भाजपा के नेताओं में इस तरह की घटनायें कोई बड़ी बात नहीं है. महाभारत में धर्मसभा के बीच द्रौपद्री को जांघ पर बैठने की बात करने वाली घटना मौजूद है. उस धर्म सभा में भी बड़े बड़े लोग मौन धरणकर चीरहरण को देखते रहे थे. संत कबीरनगर जिले की कलेक्ट्रेट में भी उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्रा आशुतोष टंडन मौजूद थे. जो भाजपा के बड़े नेता और बिहार में राज्यपाल लालजी टंडन के बेटे हैं. जूते-थप्पड़ चलाने वाले विधायक और सांसद के बीच घनघटा के विधायक श्रीराम चौहान और खलीलाबाद के विधायक दिग्विजय चौबे भी मौजूद थे. इसके अलावा बैठक में जिले के तमाम अफसर भी मौजूद थे.

शिलान्यास पत्थर में नाम न होने के बाद आपसी कहासुनी में पहले सांसद शरद त्रिपाठी ने विधायक राकेश सिंह बघेल पर जूता चलाया तो जवाब में विधायक ने सांसद को थप्पड़ मारे. धर्मरूपी इस सभा में जब योगी सरकार का चीरहरण हो रहा था तो कैबिनेट मंत्रा आशुतोष टंडन ने बीचबचाव करने की जगह पर वहां से निकल लेना ही मुनासिब समझा. जिला प्रशासन लाचार हो गया और दूसरे विधायक भी न्याय और अन्याय पर मौन धरण कर गये. जैसे महाभारत और रामायण की धर्म सभा सभी ने मौन धारण कर लिया जब द्रौपदी और सीता के साथ अन्याय हुआ था.

योगी राजमें भी आपसी भेदभाव :

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का राज है. योगी आदित्यनाथ संत है. गोरखपुर की गोरक्षा पीठ के वह मंहत है. भाजपा के लोग कहते है कि उत्तर प्रदेश में योगी की अगुवाई में धर्म का राज है. धर्म के राज की पोल पूरे उत्तर प्रदेश में खुल रही है. पूरे प्रदेश में करीब दो दर्जन से अधिक सांसद और विधायक है जिनके बीच आपस में तनातनी चल रही है. ज्यादातर सांसद और विधायकों के बीच झगड़े की वजह सांसद और विधायक निधि से होने वाले काम और उनमें श्रेय के बंटवारे को लेकर शुरू होता है. जो बाद में लड़ाई झगड़े तक पहुंच जाता है. कई जिलों का यह हाल है कि सांसद और विधायक एक साथ जिले की बैठक में हिस्सा नहीं लेते हैं. संत कबीरनगर की घटना से पहले धैरहरा की सांसद रेखा वर्मा और विधायक शशांक त्रिवेदी के बीच झगड़ा हो चुका है. भाजपा ने उस समय भी दोनो के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात कही पर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया.

संत कबीरनगर की घटना बड़ी हो गई क्योंकि मामला झगड़े से बाहर निकल कर जूते-थप्पड़ तक पहुंच गया. सोशल मीडिया के जमाने में खबरों से पहले वीडियो जनता के बीच वायरल हो गया. इससे भाजपा की पोल खुल गई. चारों तरफ भाजपा के धर्म की पोल खुल गई. धर्म के इस राज में भी आपसी मनमुटाव लड़ाई झगड़े कायम है. सत्ता में मनमुटाव और लड़ाई झगडों की वजह सत्ता की मलाई में हक होता है. सांसद और विधायक निधि में होने वाली बंदरबांट इस धर्म राज में भी कायम है. भाजपा ने इस घटना के बाद अपना बचाव करने के लिये सांसद और विधायक दोनो को ही राज्य मुख्यालय लखनऊ में तलब किया. जानकार लोग कहते है कि सांसद शरद त्रिपाठी भाजपा के पूर्व  प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के बेटे है. ऐसे में उनके खिलाफ कोई कड़े कदम उठाये जायेंगे यह मुमकिन नहीं है.

मोदी लहर में जीते थे चुनाव :

भाजपा के पूर्व  प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के बेटे सांसद शरद त्रिपाठी 2009 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े थे और चुनाव हार गये थे. इसके बाद साल 2014 में मोदी लहर में वह चुनाव जीत कर सांसद बन गये. रमापति राम त्रिपाठी भाजपा के बड़े नेता राजनाथ सिह सहित कई बड़े नेताओं के साथ करीबी संबंध रखते हैं. ऐसे में सांसद शरद त्रिपाठी के खिलाफ कोई कड़े कदम उठाना संभव नहीं है. दूसरी तरफ विधायक राकेश सिह बघेल 2017 में पहली बार विधायक बने और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी हैं. दोनो ही ऊंची जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले है. घटना के वायरल हुये वीडियो के बाद दोनो ही नेताओं के बयान संयमित हो गये.

सांसद शरद त्रिपाठी कहते हैं ‘मेरा स्वभाव यह नहीं है. बैठक में मेरा ऐसा कोई विचार नहीं था. मैने जो भी किया वह अपने बचाव में किया. इस विवाद का मुझे खेद है.’ इसके विपरीत विधायक राकेश सिंह बघेल ने कहा ‘बात विकास से शुरू हुई थी. लेकिन वो उग्र हो गये. उन्होंने हार के डर से उत्तेजना में यह किया’. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डाक्टर महेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने इस मामले में दोनो से बात करके फैसला करने को कहा. जूते-थप्पड़ कांड ने जहां भाजपा की किरकिरी करा दी वहीं विरोधी दल भी बहती गंगा में हाथ धेने में पीछे नहीं रह रहे है. समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा ‘भाजपा सांसदों में हार की अशंका घर कर गई है. इस तरह की घटनाओं से इनकी हताशा झलक रही है. विश्व की सबसे अनुशासित राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा का चेहरा इस घटना से बेनकाब हो चुका है.’

धर्म का धंधा भंडारा

भगवान तो दाता है, भक्तों को दोनों हाथ से देता है. फिर भला क्यों भक्तों से दानदक्षिणा मांगी जाती है. भगवान के नाम पर धर्म के धंधेबाज आखिर अपनी जेब कब तक भरते रहेंगे? प्रस्तुत है, कुसुमलता?का लेख.

धर्म मुक्ति दिलाता है, भगवान का भजन करने से भूख मिटती है, भगवान को याद करो तो समृद्धि मिलती है. इस तरह की बातें प्रवचनों में खूब कही जाती हैं. सवाल है कि अगर भगवान ही देता है तो भक्तों से क्यों मांगा जाता है. यही नहीं, भक्तों का दिया दान भगवान के बिचौलिए अपने ऊपर क्यों खर्च करते हैं. क्यों नहीं भगवान सारा अन्न अपनेआप भिखारियों में बांट देते. आइए, इस यक्ष प्रश्न की कुछ गहरी जांच करें :

हरिद्वार, गयाजी या अन्य तीर्थस्थलों पर जा कर आप पाएंगे कि वहां हजारों की संख्या में अंधे,  लूलेलंगड़े बैसाखियों के सहारे या छोटेछोटे लकड़ी के फट्टों की गाडि़यों पर घूमते नजर आएंगे. ये इतने सारे बेकार, नाकारा लोग समाज के भोलेभाले, लोगों को धर्म के नाम पर बेवकूफ बना कर उन का शोषण कर रहे हैं.

इतने लोगों को हर रोज खाना सदावर्त या भंडारों से मुफ्त में मिलता है. जो लोग अपने पूर्वजों, पितरों या पे्रतात्माओं को स्वर्ग या मोक्ष दिलवाने के लिए, अस्थि विसर्जन या पिंडदान करने आते हैं वे भी 1, 5, 7 या कितनी ही संख्या में इन लोगों को भोजन करवाते हैं.

इन की संख्या इतनी बढ़ गई है कि अब इन्होंने भी अपनी यूनियन बना कर तय कर लिया है कि भोजन करने के बजाय भोजन का अमुक होटल का कूपन या वाउचर लेंगे. उस की राशि, आनेजाने का रिकशा भाड़ा, दांतघिसाई चार्जिज तथा दक्षिणा यूनियन रेट पर या अधिक देनी होगी. आजादी के बाद जैसेजैसे वैज्ञानिक सोच घटता जा रहा है भंडारा व्यवसाय बढ़ता जा रहा है.

वेदोंपुराणों और दूसरे धार्मिक ग्रंथों में अन्नदान को सर्वश्रेष्ठ दानों में से एक बताया गया है. भूखे व जरूरतमंद इनसानों की भूख शांत करना तो महान सहायता कर्म है और सच्ची मानवता भी है, लेकिन यही अन्नदान जब पापों का नाश करने, धर्म कमाने, स्वर्ग पाने के उद्देश्य से करते हैं तब यह सत्कर्म प्रदूषित हो जाता है. भंडारा प्रणाली मुनाफाखोर व्यवसाय है और यह समाज को घुन की तरह खोखला बना देती है.

छोटे शहरों, बड़े कसबों और जागरूक पुजारियों का यह पूजास्थल सेवा के बाद दूसरा बड़ा व्यवसाय बना हुआ है जो स्वरोजगार का साधन है.

माह में एक बार भंडारा करने वाले अमावस्या या पूर्णिमा में से एक दिन  करते हैं. माह में 2 बार भंडारा करने वाले अमावस्या व पूर्णिमा दोनों पर करते हैं. कुछ एकादशी व द्वादशी पर भी भंडारा करते हैं. लोक देवता रामदेवजी वाले दसवीं तथा गोगाजी के भक्त नवमी पर भी भंडारा करने लगे हैं. साप्ताहिक भंडारा करने वाले देवदिवस यानी शिवजी सोमवार, महावीरजी मंगलवार, बुद्धिप्रदाता गणेश बुधवार, विष्णुभक्त गुरुवार, संतोषी माता शुक्रवार, कोप के देवता शनि के लिए शनिवार, शेष सभी रविवार को करते हैं. इस का कैलेंडर भिखारी जन जबानी याद रखते हैं.

अब तक तो भंडारा सिखों व हिंदुओं में ही होता था, लेकिन नाम बदल कर इसे मुसलमानों ने भी अपना लिया है. ईद, मोहर्रम, शुक्रवार और फातिहा इस के लिए आमतौर पर मुकर्रर है. यह पहले केवल खास मसजिद में ही होता था लेकिन आजकल लगभग हर मसजिद, दरगाह, खानगाह तथा तकिए पर होने लगा है.

मार्केटिंग से धर्म नजदीक आते हैं

इस दानधर्म का अर्थतंत्र बड़ा ही सीधा है. अधिक से अधिक दान वसूलो, कम से कम खर्च करो, शेष तुम्हारा मुनाफा है. इस में प्राय: 50 प्रतिशत मुनाफा रहता है. चूंकि कोई भी दानदाता हिसाब नहीं मांगता, न ही आडिट करने की जरूरत है. फिर भी खर्च को बढ़ाचढ़ा कर लिखना सुरक्षित समझा जाता है.

आमतौर पर हर दानदाता खुद ही दानपात्र में रकम डाल जाता है या प्रतिमाह दे देता है इसलिए तकादे का भी झंझट नहीं रहता है. वेतन या पेंशन पाने वाले लोन की किस्त भले ही न भरें किंतु भंडारे का मासिक शुल्क देने में ‘डिफाल्टर’ नहीं बनते हैं. व्यापारी लोग नकद न दे कर भंडारे के लिए सामग्री देते हैं. किसी के यहां खुशी का दिन हो तो वह मिठाई, फल आदि भी दे जाता है.

भंडारा प्रणाली से मंदिर व्यवसाय का एक सहायक व्यवसाय पनपा है. इस से पुजारी परिवारों में रोजगार व समृद्धि बढ़ी है. भोजन निर्माताओं को रोजगार मिला है. देवता, मंदिर तथा पुजारी का विज्ञापन हुआ है. दानदाता मात्र पैसे दे कर मुक्त हो जाता है.

समाचार है कि सरकार और पूंजीपतियों का भी भंडारा व्यवसाय में अप्रत्यक्ष हाथ होता है. इन मुफ्तखोरों को नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी बनने से ये भंडारे रोकते हैं. इतने लोग यदि सशस्त्र क्रांति पर उतर आएं तो सत्ता बदल सकते हैं. अत: यदि देश की प्रगति को रोकना है, विकास को बाधित करना है, इन की आंखों पर धर्म की पट्टी बांधनी है तो भंडारा व्यवसाय को बढ़ाओ. मानव संसाधनों का स्तर गिरा कर भारत को यदि अविकसित देश रखना है तो इन्हें कमाना मत सिखाओ, मुफ्त का खाने की आदत डालो. भारत स्वत: गुलामी की जंजीर गले में डाल लेगा. देश को गुलाम बनाने का अमोघ शस्त्र है ‘भंडारा’

मजबूत देश बनाएं

यदि अमेरिका चाहता तो उत्तरी कोरिया द्वारा पहले परमाणु बम बनाने पर ही उस पर हमला कर देता पर एक के बाद एक राष्ट्रपतियों ने उत्तरी कोरिया पर केवल आर्थिक प्रतिबंध लगाए. इस बार अमेरिका के खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कोरिया के नेता किम जोंग उन को सिंगापुर के होटल में फेसटूफेस मीटिंग के लिए आने पर मजबूर किया.

इसी तरह कश्मीर समस्या का हल आर्थिक है, सैनिक नहीं. जो लोग गुर्रा रहे हैं कि मार दो, चीर दो, हमला कर दो, युद्ध कर दो वे इतिहास, वास्तविकता और व्यावहारिकता से परे हैं. देश ने हत्या करने वालों की फौज खड़ी कर ली है जिन्होंने 2014 में कांग्रेस को पप्पू की पार्टी साबित कर के भाषणचतुर नरेंद्र मोदी को जितवा दिया था. यह फौज सोचती है कि ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सऐप के जरिए वह पाकिस्तान को डरा देगी. यह यह भी सोचती है कि जैसे तार्किक, समझदार लोगों को अरबन नक्सलाइट कह कर उन का मुंह बंद कर दिया वैसे ही सभी कश्मीरियों को गौहत्यारों जैसा अपराधी बना देगी.

कश्मीर को और पाकिस्तान को कड़ी मेहनत व आर्थिक विकास से जीता जा सकता है. आज पाकिस्तान और भारत के कट्टर एकजैसा व्यवहार कर रहे हैं और दोनों ही तरफ ऐसे लोग भी सत्ता में हैं जिन के लिए आर्थिक विकास नहीं, धम की भरे बयान सही हैं.

1920 और 1940 के बीच जरमनी ने हार के बावजूद सैकड़ों हवाई जहाज, हजारों टैंक, लाखों बंदूकें बना ली थीं क्योंकि उस के उद्यमियों ने रातदिन मेहनत कर के एक मजबूत आर्थिक देश को जन्म दिया था. हिटलर बकबक करता रह जाता अगर उस के पास वे जहाज, वे लड़ाकू विमान, वे फौजी सामान नहीं होते जिन से उस ने चारों ओर एकसाथ फैलना शुरू कर दिया था.

कई देश, जिन में इंग्लैंड तक शामिल था, हिटलर के जरमनी की आर्थिक शक्ति से डरे हुए थे. उस इंग्लैंड ने चेकोस्लोवाकिया को हिटलर को भेंट में दे डाला था जिस का साम्राज्य दुनियाभर में था.

आज भारत के पास ऐसा कुछ नहीं है कि वह सिर उठा कर पाकिस्तान से या पाकिस्तान से हमदर्दी रखने वाले थोड़े से कश्मीरियों से कह सके कि भारत उन्हें सुख, समृद्धि व सुरक्षा सब देगा. मुख्य भारत अपनेआप में कराह रहा है. कश्मीरियों के साथ भेदभाव तो छोडि़ए, हम तो अपने उस वर्ग को भी जो

85 फीसदी है, खुश नहीं रख पा रहे. हमारे किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, युवा बेरोजगारी से त्रस्त हैं.

पाकिस्तान को करारा जवाब देना है तो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनना होगा, केवल ज्यादा जनसंख्या के बल पर नहीं, प्रतिव्यक्ति ज्यादा उत्पादन के बल पर. सेना भी तभी मजबूत होगी जब उस के लायक भरपूर पैसा होगा. आज हम विदेशों द्वारा कबाड़ में पड़े हवाई जहाज, एयरक्राफ्ट कैरियर, सबमैरीन खरीद रहे हैं, अपने नहीं बना पा रहे. यह ट्विटर वाली फौज लोहे को पीट कर टैंक बनाना नहीं जानती.

आज इस तरह का माहौल बना दिया गया है कि जो थोथे नारे न लगाए उसे देशद्रोही मानना शुरू कर दिया जाता है. व्यावहारिक बात करने वाले को लिबटार्ड कह कर गाली दी जाती है, उस के खिलाफ बेमतलब की एफआईआर दर्ज करा दी जाती है ताकि वह जेलों या अदालतों में सड़े.

पुलवामा का बदला मजबूत देश बना कर लेना होगा, एक मजबूर सरकार को युद्ध में बलि चढ़ाने से नहीं. गरीब देश के गरीब सैनिक कितना लड़ सकते हैं. उन्हें आर्थिक व तकनीकी ताकत दो.

बदलाः बेहतरीन पटकथा व अभिनय से सजी फिल्म

2017 की स्पैनिश फिल्म ‘‘द इनविजिबल गेस्ट’’ की हिंदी रीमेक फिल्म ‘‘बदला’’ एक बेहतरीन पटकथा पर बनी फिल्म होते हुए भी आम दर्शकों के लिए नहीं है. इस फिल्म में 2016 की सफल फिल्म ‘पिंक’ की जोड़ी अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में हैं. अपराध, रहस्य व रोमांचक फिल्म का निर्माण करना सदैव बहुत कठिन होता है, मगर फिल्मकार सुजाय घोष एक बेहतरीन फिल्म बनाने में कामाब रहे हैं.

फिल्म की कहानी फ्रांस की है, जहां नैना सेठी(तापसी पन्नू) एक सफल बिजनेस वूमेन है.परिवार में उसके पति सुनिल व बेटी है. पर फोटोग्राफर अर्जुन(टोनी लुक) के साथ उसके अवैध संबंध है. कहानी शुरू होती है नैना पर अर्जुन की हत्या का आरोप लगने से. नैना की गिरफ्तारी हो जाती है. पर वकील जिम्मी(मानव कौल) किसी तरह नैना को जमानत पर छुड़ा लेता है. मगर अदालत में वे बाइज्जत बरी हो जाए, इसके लिए जिम्मी की सलाह पर नैना एडवोकेट बादल गुप्ता(अमिताभ बच्चन) की मदद लेती हैं और बादल गुप्ता, नैना से मिलने तय समय से पहले ही पहुंच जाते हैं. फिर बादल गुप्ता, नैना से कहते हैं कि वे सब कुछ उन्हें सच सच बताएं. नैना कहानी बताना शुरू करती हैं. नैना की कहानी के दो रूप सामने आते हैं. बहरहाल नैना की कहानी शुरू होती है अर्जुन के साथ एक शहर में कुछ दिन बिताने के बाद वापसी से.

जब नैना सेठी व अर्जुन वापस आ रहे होते हैं,तो रास्ते में एक कार से उनकी कार की टक्कर हो जाती है. पता चलता है कि उस कार को चला रहे युवक सनी सिंह की मौत हो गयी है. पर वह इसकी सूचना पुलिस को नहीं देते. नैना,सनी को उसी की कार की डिक्की में डालने के बाद उसकी कार को ले जाकर नदी में डुबा देती है. जबकि नैना की कार को अर्जुन लेकर आगे बढ़ना चाहता है, पर कार बंद हो चुकी है. पीछे से आ रही एक कार रूकती है, जिसमें निर्मल सिंह और उनकी पत्नी रानी कौर(अमृता सिंह) हैं. यूं तो दोनो बहुत अच्छे अभिनेता हैं. मगर निर्मल सिंह एक होटल में नौकरी करते हैं और वह बहुत अच्छे मैकेनिक हैं. रानी कौर के कहने पर निर्मल,नैना की कार को अपनी गाड़ी के साथ अपने घर ले जाते हैं. जहां पर वह उनकी कार को ठीक कर देते हैं.रानी कौर के घर से विदा लेने से पहले अर्जुन को सनी का मोबाइल रानी को देना पड़ता है. फिर नैना व अर्जुन मिलते हैं और अपने अपने घर चले जाते हैं. नैना अपने बिजनेस में मग्न हो जाती है. पर सनी के न मिलने से सनी की मां रानी कौर उसकी तलाश शुरू करती हैं. रानी कौर पुलिस की मदद लेती हैं. और शक अर्जुन से होते हुए नैना पर जाता है. रानी कौर ने जो हुलिया बताया उससे पुलिस ने अर्जुन का स्केच बनवा लिया है. पर पूछताछ में नैना व उनके वकील जिम्मी यह साबित कर देते हैं कि नैना उस दिन पेरिस में थी. उसकी कार किसी ने चुरा ली थी. कार में मौजूद इंसान अर्जुन को वह नही पहचानती. उसके बाद नैना अपने बिजनेस व परिवार में मग्न हो जाती है. नैना की कंपनी जापान की एक कंपनी के साथ समझौता करके एशिया की सबसे बड़ी कंपनी बन जाती है. इधर रानी कौर को पुलिस पर यकीन नहीं होता और वह नैना का पीछा करना शुरू कर देती हैं.

इधर नैना को पुरस्कार मिलता है. जिस दिन नैना को पुरस्कार मिलता है, उसी दिन पुरस्कार वितरण के बाद चल रही पार्टी में रानी कौर,नैना से मिलती है और उससे कहती है कि वह बताए कि उसका बेटा सनी कहां है? रानी कौर बहाने से नैना से लाइटर मांगती है, यह वही लाइटर होता है जिसे रानी कौर को अर्जुन ने अपनी बहन का लाइटर बताया था. रानी कौर उस लाइटर को पानी में  फेक देती है और नैना से कहती है कि उसे पता है कि तुम बहुत ताकतवर हो पर ताकतवर लोग भूल जाते हैं कि सच छिप नहीं सकता.रानी कौर उसे चुनौती देकर चली जाती है.

उसके बाद कहानी में कई मोड़ आते हैं. एक तरफ रानी कौर अपने बेटे सनी का सच जानने के लिए चालें चल रही है तो दूसरी तरफ नैना अपने आपको बचाने के लिए चालें चलती है. इतना ही नही खुद को बचाने के लिए नैना अर्जुन का कत्ल कर सारा आरोप रानी कौर व उनके पति निर्मल पर लगाने की भूमिका बना चुकी होती हैं पर वह बादल गुप्ता के सामने सच स्वीकार कर चुकी होती है. इस आस में कि बादल गुप्ता तो उसे बाइज्जत बरी करा ही देंगे.पर सारा सच जानने के बाद बादल गुप्ता चले जाते हैं और फिर जब दुबारा दरवाजे की घंटी बजती है तो पता चलता है कि एडवोकेट बादल तो अब आए हैं इससे पहले एडवोकेट बादल का रूप धर कर खुद निर्मल आए थे और वह जिस पेन से लिखने का नाटक कर रहे थे उस पेन से सारा सबूत नैना की आवाज में रानी कौर के पास रिकार्ड हो रहा था.रानी कौर ने पुलिस को फोन भी कर दिया.

फिल्म ‘‘बादल’ ’की सबसे बड़ी खासियत इसकी कसी हुई पटकथा है. लेखक ने बहुत ही चतुराई से इसके दृष्यों को रचा है.बतौर निर्देषक सुजाय घोष अपनी छाप छोड़ जाते हैं. मगर सत्तर प्रतिशत फिल्म अपराध को छिपाने के लिए र्सिफ देा पात्रों के बीच बातचीत पर है जिसके चलते फिल्म काफी शुष्क हो जाती है.‘‘बादल’’ उन दर्शकों के सिर के उपर से गुजरती है, जो अपना दिमाग घर पर रखकर महज मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो ‘पिंक’, ‘मुल्क’ व ‘मनमर्जियां’ के बाद एक बार फिर तापसी पन्नू ने नैना के किरदार में जानदार अभिनय किया है. अमिताभ बच्चन तो महान कलाकार हैं. उनके अभिनय का करिश्मा अपना जादू जगा ही जाता है. छोटी सी भूमिका में मानव कौल भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अर्जुन के किरदार में टोनी लुक के पास करने को कुछ खास है ही नहीं. वैसे यह पूरी फिल्म नैना यानी कि तापसी पन्नू और अमिताभ बच्चन यानी कि बादल गुप्ता पर ही केंद्रित है. लेकिन अमृता सिंह अपने अभिनय से लोगों के दिलो दिमाग में अपनी छाप अंकित कर जाती हैं.

स्कौटलैंड में फिल्मायी गयी इस फिल्म के कैमरामैन अनिक मुखोपाध्याय की भी तारीफ की ही जानी चाहिए उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य को भी अपने कैमरे में कैद किया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘बदला’’ का निर्माण गौरी खान, सुनीर खेत्रपाल, अक्षय पुरी व गौरव वर्मा ने किया है. फिल्म के निर्देशक व लेखक सुजाय घोष और राज वसंत, कहानीकार ओरीओल पौलो, संगीतकार अनुपम रौय, अमाल मलिक, क्लिंटन सिरीजो,  कैमरामैन अनिक मुखोपाध्याय व कलाकार हैं- अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, अमृता सिंह, टोनी लुक व अन्य.

रेटिंग: तीन स्टार

बौलीवुड एक्ट्रेस नीना गुप्ता ने पुरुषों को दी चेतावनी

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बौलीवुड एक्ट्रेस नीना गुप्ता ने अपने ट्विटर अकाउंट से खास अंदाज में महिला दिवस को लेकर अपनी राय जाहिर की है. उन्होंने लिखा हैं कि आमतौर पर भारत में यह कम ही देखा जाता है कि महिलाओं के लिए कोई दिन खुशी भरा हो.

इस महिला दिवस पर, मैं अपने देश के पुरुषों से अनुरोध करती हूं कि वे महिलाओं के प्रति विनम्र, स्नहे, प्यार और संवेदना दिखाएं. अपनी ताकत को उन पर न थोपें और उन्हें सिर्फ इसलिए नीचा नहीं दिखाएं क्योंकि वे आदमी को बदल रही हैं या वे बदल रही हैं.’

आपको बता दें, नीना गुप्ता ने 2018 में ‘बधाई हो’ जैसी सुपरहिट फिल्म दी थी और अब उन्होंने  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भी आंखें खोल देने वाली बात कही हैं.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : पढ़ें इससे जुड़ी खास बातें

आज यानि 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है. आपको बता दें इस बार वुमन्स डे की थीम है- बैलेंस फौर बेटर. इसका थीम का मतलब ये  है कि जेंडर बैलेंस को बनाने के लिए ये थीम को चुना गया है. वहीं, हर साल महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए इसी तरह की थीम को चुना जाता है. दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्यार प्रकट करते हुए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उत्सव के तौर पर मनाया जाता है.

कहां मनाया जाता है महिला दिवस?

भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. सबसे पहला महिला दिवस न्यूयार्क शहर में 1909 में एक समाजवादी राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर मनाया गया. बाद में इसे सन् 1917 में सोवियत संघ ने 8 मार्च को राष्ट्रीय छुट्टी घोषित की. अब पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को पूरे जोश के साथ मनाया जाता है.

कब से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस?

सबसे पहली बार 1909 में अंतरराष्ट्रिय महिला दिवस मनाया गया था. 28 फरवरी, 1909 को पहली बार अमेरिका में महिला दिवस सेलिब्रेट किया गया. सोशलिस्ट पार्टी औफ अमेरिका ने न्यूयार्क में 1908 में गारमेंट वर्कर्स की हड़ताल को सम्मान देने के लिए इस दिन का चयन किया ताकि इस दिन महिलाएं काम के कम घंटे और बेहतर वेतनमान के लिए अपना विरोध और मांग दर्ज करवा सकें. यूरोप में महिलाओं ने 8 मार्च को पीस ऐक्टिविस्ट्स को सपोर्ट करने के लिए रैलियां कीं थीं. वहीं, आधिकारिक तौर पर यूनाइटेड नेशन्स ने 8 मार्च, 1975 को पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था.

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