सांसद और विधायक जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं ने लोकसभा और विधानसभा में कुर्सी मेज और पंखे कई बार तोड़े शोर मचाया. खुलेआम पहली बार गंदी गंदी गालियों के साथ दोनो को पहली बार लड़ते देखा गया. झगड़े की फौरी वजह भले ही शिलान्यास के पत्थर पर नाम न होना रहा हो पर इसकी मुख्य वजह अपसी मनमुटाव और वर्चस्व स्थापित करना ही था. पार्टी में सबकी जिम्मेदारी बराबर होने की बात बेमानी हो चुकी है. भाजपा के अंदर भी जातीय संघर्ष चालू है. सहारनपुर दंगा ने दलित सवर्ण गठजोड़ का पोल खोल चुका है तो संत कबीरनगर में दो ऊंची जातियों का टकराव पार्टी की पोल खोल दी.

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