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कही आप भी तो नहीं लगा रहे गलत तरीके से फेस मास्क? जाने यहां

सुंदर और बेदाग चेहरे की चाहत भला किसे नहीं होती. अक्सर हम अपने चेहरे पर निखार पाने के लिए चेहरे पर फेस मास्क या फेस पैक लगाते हैं. वैसे तो यह त्वचा को सुन्दर बनाने का आसान और असरदार तरीका है. पर कई बार इसे लगाने के बावजूद हम संतुष्ट नहीं होते. इसकी वजह है फेस मास्क को सही तरीके से न लगाना. अपने मास्क से सर्वोत्तम निखार पाने के लिये आप नीचे दिये गये उपायों को अपना सकती हैं.

– सबसे जरूरी बात ये है कि यदि आप घर में बने हुए फेस पैक का इस्तेमाल कर रहीं हैं तो हर बार ताजा बना कर ही प्रयोग करें. लंबे समय से रखा फेस मास्क लगाने से आपके चेहरे पर एलर्जी हो सकती है.

– फेसमास्क लगाने से पहले आंखों को आराम पहुंचाने वाले खीरे अथवा आलू के पतले दो चिप्स काट लें.

– अब इन सभी वस्तुओं को तब तक के लिये फ्रिज में ठंडा होने के लिये रख दें जब तक कि आप इन्हें प्रयोग करने के लिये तैयार न हों. इस दैरान अपने चेहरे को अच्छी तरह से धुल कर साफ कर लें.

– अपनी त्वचा को स्क्रब की मदद से साफ करें इससे त्वचा की मृत कोशिकायें हट जाती हैं और मास्क को बेहतर तरीके से अवशोषित होने में मदद मिलती है.

– अब चेहरे को 2 मिनट के लिये भाप दें जिससे रोम छिद्र खुल जायें. इसके विकल्प के रूप में आप एक साफ-सुथरे कपड़े को गर्म पानी में भिगो कर चहरे को तब तक के लिए ढकें जब तक कि वह ठंडा न हो जाये. ध्यान रहे पानी उतना ही गर्म हो जितना कि आप चेहरे पर बर्दाश्त कर सकें.

– फेस मास्क लगाने वाले ब्रश के साथ ही साथ रूई के फाहे और मुंह पोछने का कपड़ा भी साथ रखें.

– अब फेस मास्क लगाने वाले ब्रश की मदद से फेस मास्क को चेहरे पर लगायें. यदि आपके पास ब्रश न हो तो मास्क को हाथों से लगाने से पूर्व उन्हें अच्छी तरह से धो कर सुखा लें.

– मास्क लगाने के बाद खीरे या आलू के टुकड़ों को आंखों पर रख कर उत्पाद के निर्देशानुसार मास्क के सूखने का इंतजार करें. बत्तियां बुझा दें. इस प्रकार का वातावरण शांति प्रदान करता है.

– निश्चित समय तक इंतजार करने के उपरांत मास्क को गीले कपड़े अथवा रूई के फाहों से पोंछ दें. मिट्टी के मास्क की स्थिति में जब वह सूखने लगे तो धुलना बेहतर होता है. लेकिन यह प्रयास करें कि मिट्टी का मास्क चेहरे पर पूरी तरह से सूखने न पाये.

– मिट्टी के मास्क को चेहरे पर पूरी तरह से नहीं सूखने देना चाहिये क्योंकि ऐसी स्थिति में चेहरे पर झुर्रियां और पतली रेखायें पड़ जाती हैं और मिट्टी सूख जाने के कारण त्वचा से ही परासरण द्वारा नमी चुराने लगती है.

इम्यून सिस्टमः कैसे बनाएं मजबूत

शरीर कई तरह की बीमारियों के जीवाणुओं का हमला झेलता रहता है और कई बार इन की चपेट में आ जाता है. इन हमलों को नाकाम तभी किया जा सकता है, जब हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो यानी इम्यून सिस्टम सौलिड होना जरूरी है. इसे मजबूत करना ज्यादा मुश्किल नहीं है. तो आइए, देखते हैं कि किस तरह हम अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत बना सकते हैं, कुछ खास टिप्स :

चोकरयुक्त अनाजः गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का जैसे अनाज का सेवन चोकर सहित करें. इस से आप को कब्ज नहीं होगी तथा आप की रोग प्रतिरोध क्षमता चुस्तदुरुस्त रहेगी.

पानीः पानी भी प्राकृतिक औषधि है. प्रचुर मात्रा में शुद्ध पानी पीने से शरीर में जमा कई तरह के विषैले तत्त्व बाहर निकल जाते हैं और इस से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. पानी सामान्य या फिर थोड़ा कुनकुना हो तो ज्यादा लाभदायक रहता है. फ्रिज का ठंडा पानी पीने से बचें.

तुलसीः तुलसी एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में काफी फायदेमंद है. रोजाना सुबह तुलसी के 3-4 पत्तों का सेवन करें, काफी फायदा मिलेगा.

योगः योग व प्राणायाम भी शरीर को स्वस्थ और रोगमुक्त रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. रोजाना घर पर इन का अभ्यास किया जा सकता है.

जोर से हंसनाः जोर से हंसने से रक्त संचार सुचारु होता है व शरीर अधिक मात्रा में औक्सीजन लेता है. तनावमुक्त हो कर हंसने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने में मदद मिलती है.

रसदार फलः संतरा, मौसमी, कीनू आदि रसदार फलों में भरपूर मात्रा में खनिज लवण तथा विटामिन सी होता है. प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में ये महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. आप चाहें तो साबुत फल खाएं और चाहें तो इन का रस निकाल कर सेवन करें ध्यान रखें रस में चीनी या नमक न मिलाएं.

गिरीदार फलः सर्दी के मौसम में गिरीदार फलों जैसे बादाम, काजू, अखरोट का सेवन बहुत फायदेमंद है. इन्हें रात भर भिगो कर रखने व सुबह चाय या दूध के साथ आधा घंटा पहले खाने से बहुत लाभ होता है.

अंकुरित अनाजः अंकुरित अनाज (जैसे मूंग, मोठ, चना आदि) तथा भीगी हुई दालों का भरपूर मात्रा में सेवन करें. अनाज को अंकुरित करने से उन में मौजूद पोषक तत्त्वों की क्षमता बढ़ जाती है. ये पचाने में आसान, पौष्टिक और स्वादिष्ठ होते हैं.

सलादः  भोजन के साथ सलाद का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा करें. भोजन का पाचन पूर्ण रूप से हो, इस के लिए सलाद का सेवन जरूरी होता है. ककड़ी, टमाटर, मूली, गाजर, पत्तागोभी, प्याज, चुकंदर आदि को सलाद में जरूर शामिल करें. इन में प्राकृतिक रूप से मौजूद नमक हमारे लिए पर्याप्त होता है. अलग से नमक न डालें.

मर्द को दर्द नहीं होता है: प्रयोगात्मक हास्य व एक्शन फिल्म

फिल्म- ‘‘मर्द को दर्द नही होता”

रेटिंगः ढाई स्टार

डायरेक्टर: वासन बाला

एक्टर्स: अभिमन्यु दसानी, राधिका मदान, गुलशन देवैय्या और महेश मांजरेकर

‘‘पेडलर्स’’ जैसी फार्मूला फिल्म के बाद फिल्मकार वासन बाला एक बार फिर फार्मूला फिल्म ‘‘मर्द को दर्द नहीं होता’’ लेकर आए हैं. इस फिल्म में उन्होने कहानी का केंद्र एक ऐसे पुरुष को बनाया है,  जिसे ‘कांजिनेटियल इंनसेंसिटीविटी टू पेन’ नामक गंभीर बीमारी से ग्रसित होने के कारण शरीर में दर्द का अहसास ही नहीं होता. इस फैंटसी कहानी में बुराई पर अच्छाई की जीत की कहानी भी है. मगर फिल्म में फिल्म के हीरो की बजाय हीरोइन ज्यादा खतरनाक एक्शन करते हुए नजर आती है. कई सीन्स में तो हीरो सूर्या डरपोक और हीरोइन सुप्रि बेखौफ नजर आती है. जबकि पूरी फिल्म में सूर्या का तकिया कलाम है- ‘‘दिमाग को सन्न कर देने वाली हर कहानी के पीछे बहुत बुरे फैसले होते हैं.’’

कहानी…

फिल्म ‘‘मर्द को दर्द नही होता’’ की कहानी मुंबई के लड़के सूर्या (अभिमन्यु दसानी) की है. सूर्या को ‘कांजिनेटियल इंनसेंसिटीविटी टू पेन’ नामक गंभीर बीमारी है, जिसका डाक्टरों के पास कोई इलाज नही है. इस बीमारी के चलते उसे दर्द नहीं होता, फिर उसे चाहे जितनी चोट लगती रहे. सूर्या के नाना (महेश मांजरेकर) बार बार उसे एक्शन फिल्में दिखाकर दर्द का अहसास कराते रहते हैं. जिससे आम लोग उसे एक आम लड़के की तरह माने. मगर सूर्या के पिता जतिन (जिमित त्रिवेदी ) नहीं चाहते कि सूर्या घर से बाहर निकले. उधर सूर्या बचपन से ही सौ लोगों को हराने वाले दिव्यांग कराटे मैन मणि (गुलशन देवैय्या) का फैन है और उसकी तमन्ना इस कराटे मैन से मिलने की है. जिसके बाद वह भी उसी की तरह ताकतवर बनकर पाप को जलाकर राख कर सके. सूर्या की बचपन की दोस्त है सुप्रि (राधिका मदान) जो कि हर मुसीबत के समय सूर्या की मदद करती रहती है. लेकिन सूर्या की शरारतों के कारण सूर्या और सुप्रि अलग हो जाते हैं. कुछ सालों बाद सूर्या को कराटेमैन का पता मिलता है, जब वह वहां पहुंचता है, तो उसकी मुलाकात फिर से सुप्रि से होती है और यहीं पर वो पहली बार विलेन जिमी (गुलशन देवैय्या) से मिलता हैं. मणि और जिमी दोनो भाई हैं. लेकिन जिमी एक अपराधी है. इसके बाद एक्शन सीन्स के साथ कहानी तेजी से आगे बढ़ती है.

स्टोरी और डायरेक्शन…

पटकथा लेखक के तौर पर वासन बाला को थोड़ी और मेहनत करनी चाहिए थी. इंटरवल से पहले कहानी कंफ्यूज करने के साथ बहुत धीमी रफ्तार से आगे बढ़ती है, जबकि इंटरवल के बाद जैसे ही सूर्या, सुप्रि और मणि का जिमी के साथ टकराव शुरू होता है, वैसे ही एक्शन सीन्स के साथ कहानी तेज गति से आगे बढ़ती है. पटकथा लेखक के तौर पर वासन बाला ने एक्शन के बीच में भी कुछ अच्छे कौमेडी सीन्स डाले हैं. लेखक और निर्देशक वासन बाला ने सुप्रि के प्रेमी अतुल के किरदार को जबरन जोड़ा है. अतुल के किरदार की वजह से कहानी भटकने के साथ ही फिल्म भी लंबी हो गयी है. एडीटिंग टेबल पर इसे कसने की जरुरत थी. तर्क की कसौटी पर कसेंगे,  तो फिल्म पसंद नहीं आएगी. हालांकि, फिल्म के कैमरामैन जय पटेल अपने बेहतरीन काम के लिए बधाई के पात्र हैं.

एक्टिंग…

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अभिमन्यु दसानी बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करते हैं. उन्हे अभी मेहनत करने की जरुरत है. कई सीन्स में उनके चेहरे पर भाव ही नही आते. मगर राधिका मदान ने बेहतरीन एक्टिंग की है. दोहरी भूमिका में गुलशन देवैय्या ने कमाल का काम किया है. नाना की भूमिका में महेश मांजरेकर ठीक ठाक हैं.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मर्द को दर्द नहीं होता’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला, लेखक व निर्देशक वासन बाला, संगीतकार करण कुलकर्णी व दीपांजना गुहा है.

‘फ्रेंडली लड़ाई’ से कांग्रेस रोकेगी ‘वोट का बिखराव’

कांग्रेस ने भले ही उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से गंठबंधन ना किया हो पर टिक के बंटवारे में इस बात का पूरा ध्यान रखा जायेगा कि किस तरह से वोट का बिखराव रोक कर भाजपा का विरोध करने वाले दलों के ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशी चुनाव जीत जाये. जहां सपा-बसपा ने कांग्रेस के लिये केवल दो सीटें छोडी थी वहीं कांग्रेस ने बडा दिल दिखाते हुये सपा-बसपा के लिये लोकसभा की 7 सीटें छोड दी है.

कांग्रेस का मत है कि जिस सीट पर जो दल मजबूती से भाजपा के खिलाफ चुनाव लड रहा हो वहां उसके प्रत्याशी को चुनाव जीतने में मदद की जा सके. भाजपा इस बात से खुश थी कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस के शामिल ना होने से प्रदेश में त्रिकोणीय मामला होगा. जिससे विपक्ष के वोट बिखर जायेगे. भाजपा को लाभ होगा.

कांग्रेस ने सपा-बसपा गठबंधन से फ्रैंडली लडाई लडने की योजना तैयार की है. इसके तहत कांग्रेस ने इस गंठबंधन के प्रमुख नेताओं के लिये 7 सीटे छोड दी है. कांग्रेस न ‘अपना दल’ के कृष्णा पटेल ग्रुप और दूसरे दलों के साथ भी तालमेल किया है. ऐसे में कुछ और दलों से भी कांग्रेस की बातचीत चल रही है.

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के सक्रिय होने के बाद कांग्रेस अपनी नीति में बदलाव करके काम कर रही है. वह छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव में वोट के बिखराव को रोक रहीं है. कांग्रेस के इस कदम से खुद मायावती खुश नहीं है. उनका कहना है कि ‘कांग्रेस इस तरह से लोगों में भ्रम फैलाने का काम कर रही है. हमें उसकी 7 सीटो की जरूरत नहीं है कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा नहीं है वह अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड सकती है.’

कांग्रेस से मायावती की अपनी मजबूरी है. मायावती को लगता है कि इस चुनाव में दलित और मुसलिम वोट बसपा के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा भाव देगा. इसका कारण यह है कि जब मुसलिम और दलित परेशान हो रहे थे तब मायावती एक भी बार उनके साथ खडी नजर नहीं आई. कांगेस नेता राहुल गांधी अकेले ही सडक से लेकर संसद तक भाजपा और ‘मोदीशाह’ के सामने अपनी आवाज उठाई. मायावती से अधिक तो चन्द्रशेखर रावण जैसे युवाओं ने दलित उत्पीडन के खिलाफ अपनी आवाज उठाई.

बसपा की नेता मायावती 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे दलितों की हालत में कोई बदलाव आये. 1993 से पहले प्रदेश में दलितों की जो हालत थी वही हालत आज भी है. ऐसे में दलितों की पार्टी कहीं जाने वाली मायावती से उनको क्या मिला ? अपनी खराब होती हालत देख मायावती ने अखिलेश यादव से हाथ मिलाकर सपा-बसपा का गठबंधन तैयार किया. इस गंठबंधन में मायावती कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में लोकसभा की केवल 2 सीटे दे रही थी. कांग्रेस ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और गठबंधन से बाहर हो गई.

उस समय तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव नहीं हुये थे. इन चुनावों में भी सपा बसपा कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लडे. इसके बाद भी कांग्रेस ने तीनों ही राज्यों में अपनी सरकार बनाई. नई ताकत और आत्मविश्वास के बाद भी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा के खिलाफ वोट के बिखराव को रोकने के लिये जिस तरह से मायावती की टिप्पणी सुनकर भी समर्थन दे रही है यह उसके बडे दिल का कमाल है. कांग्रेस सत्ता विरोधी मतों को बिखरने से रोकने के लिये ही सपा-बसपा और दूसरे छोटे दलों से तालमेल कर भाजपा को मात देने की योजना पर आगे बढ़ रही है.

हां, भाजपा चौकीदार है पर हिंदुत्व की

कांग्रेस के ‘चौकीदार चोर हैं’ मुहिम के बाद भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया में अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ लगाने का अभियान चलाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से पहले चौकीदार लगाने के बाद भाजपा के दूसरे नेताओं ने भी ‘मैं भी चौकीदार’ लगाना शुरू कर दिया. भाजपा का यह अभियान ट्विटर पर ट्रेंड भी करने लगा. इसे ले कर भाजपा और विपक्षी दलों में सोशल मीडिया पर वार छिड़ गया.

भाजपा के प्रचार विभाग का कहना है कि सोशल मीडिया पर सफल रहे इस अभियान को आगे बढाते हुए प्रधानमंत्री देश भर के 25 लाख चौकीदारों को औडियो ब्रिज के जरिए संबोधित करने जा रहे हैं और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए 500 जगहों से सीधा संवाद करेंगे. इस में खिलाड़ी, युवा, पूर्व सैनिक, किसान, डाक्टर, वकील सहित विभिन्न वर्गों के लोग जुड़ेंगे.

उधर भाजपा का यह अभियान विपक्ष के निशाने पर है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री प्रयास करते रहें पर इस से सच्चाई को नहीं दबाया जा सकता. उन्होंने कहा कि हर कोई कह रहा है कि चौकीदार चोर है. बसपा प्रमुख मायावती ने ‘मैं भी चौकीदार’ को ले कर तंज कसे हैं. उन्होंने भाजपा के इस अभियान को नाटक करार देते हुए कहा कि अब वोट के लिए अपने को चौकीदार बताया जा रहा है. पिछले चुनाव के समय वोट की खातिर खुद को चायवाला प्रचारित किया था.

लोकसभा के 2019 के आम चुनावों में जिस तरह से प्रचार चल रहा है लगता है जनता से जुड़े किसी मुद्दे की चर्चा ही नहीं है. 130 करोड़ जनता के लिए सिर्फ चौकीदार लोकसभा चुनाव का मुद्दा बनाया जा रहा है. इससे पहले ‘मोदी है तो मुमकिन है’, नारे को प्रचारित किया गया. पिछले 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री को चाय वाला के रूप में प्रचारित किया गया था. यानी इस देश का प्रधानमंत्री खुद को चाय वाला, चौकीदार बता कर उस निचले दलित, पिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ लेना चाहता है जो छोटेछोटे कामधंधे, नौकरी कर रहे हैं.

क्या चायवालों और चौकीदारों की दशा सुधर गई? भाजपा के शासन में इन निचले तबकों की कोई तरक्की नहीं हुई. दलित, पिछड़े, गरीब वर्गों को चौकीदार की जरूरत ही नहीं पड़ती. यह वर्ग तो खुद औरों की चौकीदारी करता है और अपना पेट पालता है.

प्रधानमंत्री और उन का पूरा मंत्रिमंडल फिर किस की चौकीदारी की बात कर रहा है? देश के खजाने के पैसे की. वह पैसा किस के पास रहता है? नौकरशाहों के, चुन कर आए नेताओं के पास. ये लोग कितने होंगे गिनती के? प्रधानमंत्री की सारी कवायद यही है कि ये लोग भ्रष्टाचार न करें. तो क्या प्रधानमंत्री केवल चंद लोगों की चौकीदारी करने के लिए इतना बड़ा मुद्दा बना रहे हैं?

बात चौकीदारी की हो तो भाजपा की सरकार रहते हुए विजय माल्या 9 हजार करोड़ रुपए ले कर क्यों भाग गया? कई बैंकों का पैसा ले कर नीरव मोदी, चौकसे, ललित मोदी क्यों फुर्र हो गएं? रफाल सौदे पर क्यों बवाल मचा हुआ है? सौदे के गायब दस्तावेजों पर सरकार क्यों डरी हुई है? सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के दो बेटों का विदेशों में कालाधन होने का मामला पब्लिक डोमेन में है. इन मामलों को ले कर चौकीदार की ईमानदारी पर सवाल उठ रहे हैं.

काला धन जमा करने वालों के नाम संसद में उजागर नहीं होने दिए गए. सुप्रीम कोर्ट ने नामों की लिस्ट मांगी तब दी गई पर नाम जाहिर न करने की अदालत से गुहार की गई.

इन के अलावा किसान, बेरोजगार, अल्पसंख्यक, गरीब, वंचित दलित, पिछड़े बगैर चौकीदारी के त्रस्त हैं, पिस रहे हैं. उन के बुनियादी हक तक उन्हें मुहैया नहीं हो रहे. देश भर के चौकीदार मीडिया के सामने आ कर कह रहे हैं उन्हें न्यूनतम वेतन भी मुहैया नहीं है.

हां, सरकार पंडों, पुजारियों, गौरक्षकों, साधु, संतों, गुरुओं, ज्योतिषियों, प्रवचकों, योगाचार्यों, धर्म के नाम पर तमाम तरह के ढोंग करने वालों और राम मंदिर बनाने वालों के जरूर चौकीदार हैं. इन लोगों के धंधें की चौकसी आप बखूबी करते आए हैं.

सरकार स्त्रियों की सुरक्षा के नहीं, उन्हें धार्मिक मर्यादा के बाहर न निकलने देने की पहरेदारी जरूर कर रही है. धर्म के ठेकेदारों के धंधे को बचाने के लिए आप ने पाखंड, झूठ, की पोल खोलने वालों पर डंडे फटकारे हैं. धमकियां दी हैं. सरकार को उन की चौकीदारी की परवाह नहीं है.

पिछले 5 साल में अगर चौकीदारी हुई है तो केवल हिंदुत्व की. प्रयागराज में अर्धकुंभ था पर इस में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च कर महाकुंभ के रूप में बंदोबस्त किया गया. देश भर के निठल्ले साधुओं, शंकराचार्यों, महंतों, मठाधीशों के लिए हलवापूरी का इंतजाम किया गया. पंडों के लिए दानदक्षिणा की व्यवस्था कराई गई.

सरकार ने चाय वालों, चौकीदारों जैसे छोटे कामधंधा करने वालों की दुकानदारी नोटबंदी, जीएसटी से उजाड़ दी और धर्म के धंधेबाजों की दुकानदारी बचाने में पूरी ताकत झोंके रखी, कुंभ के नाम पर, मंदिर निर्माण के नाम पर, गौरक्षा के नाम पर.

दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमलों की अनगिनत वारदातों पर सरकार खामोश रहती है या इन हमलों को जायज ठहराती रही है, इन की चौकदारी की चिंता नहीं है. असली चौकीदारी वर्णव्यवस्था को बनाए रखने की रही है.

सदियों से धर्म के जरिए जिस तरह जनता को बेवकूफ बनाया जाता रहा है, ‘मैं भी चौकीदार’ जैसा प्रचार अभियान भाजपा का एक और ढोंग ही है, इस से किसी का भला नहीं होगा, हां, भाजपा एक बार फिर सत्ता में आ कर फिर से धर्म के धंधेबाजों की चौकीदारी करती रहेगी. इस से न तो जनता का विकास होगा, न देश का.

सिनेमा से ही बदलाव आता है: अक्षय कुमार

बौलीवुड में अक्षय कुमार एक मात्र ऐसे कलाकार हैं, जो लगातार व्यावसायिक फिल्मों के साथ साथ लीक से हटकर विषयों व सच्चे घटनाक्रमों पर आधारित फिल्में भी करते आ रहे हैं. फिर चाहे वह ‘एयरलिफ्ट’ हो या ‘रूस्तम’ या ‘ट्वायलेट एक प्रेम कथा’ हो या ‘पैडमैन’. अब वह सत्य घटनाक्रम यानी कि ‘सारागढ़ी के युद्ध’ पर फिल्म ‘‘केसरी’’ लेकर आ रहे हैं. अनुराग सिंह निर्देशित फिल्म ‘‘केसरी’’ होली के अवसर पर 21 मार्च को सिनेमा घरों में पहुंच रही है.

सारागढ़ी के युद्ध पर आधारित फिल्म ‘‘केसरी’ ’को आप महज एक युद्ध वाली फिल्म मानते हैं?

हकीकत में यह फिल्म ‘‘युद्ध’’ पर आधारित ही है. पर यह इमोशनल बहुत है. यह फिल्म 21 सिख जवानों की कहानी है. जो कि जानते थे कि उनकी मृत्यू निश्चित है. उस वक्त उनके पास वहां से भागने का मौका था, पर इन सैनिकों ने भागने की बजाय अपनी मातृभूमि के लिए दुश्मनों से लड़कर अपनी जान न्यौछावर करने का विकल्प अपनाया. वह जानते थे कि दस हजार अफगान सैनिकों से उन 21 जवानों के लिए लड़ना संभव नही है, पर उन्होंने अपनी तरफ से अफगान सैनिकों को किले के अंदर घुसने से रोकने के लिए लड़ा. अफगान सैनिक सोच रहे थे कि सैनिकों की नई खेप आने से पहले ही हम आधे घंटे के अंदर इन 21 जवानों को खत्म कर देंगे. मगर ईश्वर सिंह के नेतृत्व में इन 21 जवानों ने निर्णय ले लिया था कि हम इन्हें किसी भी सूरत में अंदर घुसने नहीं देंगे. वह सुबह नौ बजे से लेकर शाम के छह बजे तक लड़े. जब वह अंदर घुसे तभी सैनिकों का दूसरा दल आ गया और अफगान सैनिकों को वहां से भागना पड़ा था. मेरी सोच कहती है कि इसमें एक सैनिक के माइंड सेट और उसकी मानसिक सोच की कहानी है. हम लोग युद्ध की बात समझते हैं पर एक सैनिक के दिमाग में क्या चल रहा होता है, इसके बारे में हम नहीं जानते. हमारी फिल्म ‘केसरी’ दषर््ाकांे को उस यात्रा पर भी ले जाती है कि उस वक्त जवानों ने अपने दिमाग में क्या सोच रखा था.

फिल्म के निर्देशक अनुराग सिंह ने इस बात को लेकर काफी शोध किया. मैं तो चाहूंगा कि आप बड़े शब्दों में लिखें कि मैं अपली करता हूं कि हर माता पिता अपने बच्चों को यह फिल्म जरुर दिखाए. क्योंकि यह आपका अपना इतिहास है. आपके अपने वतन के इतिहास का हिस्सा है. इतिहास हर बच्चे को देश के भविष्य के बच्चों को पता होना चाहिए कि कैसे यह 21 जवान लड़े थे. यह दुःख की बात है कि ‘सारागढ़ी के इस युद्ध’ का हमारी इतिहास की किताबो में जिक्र ही नही है. हमारे इतिहास में अब तक छात्रों को यह पढ़ाया नहीं गया. आज हमें अचसर मिला कि मैं इस कहानी को फिल्म के माध्यम से लोगों के सामने लेकर आउं, जिसे मैंने पूरी इमानदारी के साथ अंजाम दिया है.

आप शायद न जानते हो मगर जब मैने फिल्म ‘‘एयर लिफ्ट’’ बनायी, उस वक्त इस कहानी के बारे में किसी को नहीं पता था. उस वक्त तक एक खबर छपी थी. मगर आज ‘एयरलिफ्ट’ को लेकर एक लाख लेख कई पन्ने भरे जा चुके हैं. अब धीरे धीरे ‘सारागढ़ी’ पर भी कई लेख आ गए है. मैं चाहता हूं कि सारागढ़ी के युद्ध पर ज्यादा से ज्यादा लेख छपें. इन 21 जवानों की कथा इतिहास के पन्नों में हमेशा हमेशा के लिए अमर रहे.

तो क्या आप मानते हैं कि एक सैनिक किसी भी युद्ध को महज हथियार के बल पर नहीं बल्कि अपनी दिमागी सोच यानी कि अपने माइंड सेट की वजह से जीतता है?

जी हां! आपने एकदम कटु सत्य को पकड़ा है. मैं मानता हूं कि यदि एक सैनिक अपने मन में निश्चय कर ले तो फिर उसे हराना बहुत मुश्किल है.

आपने एयरलिफ्ट, रूस्तम या केसरी जैसी सत्य घटनाक्रमों पर आधारित फिल्में करते हैं. तब आपके उपर कितना दबाव रहता है. दूसरे लोग जब इसी तरह की फिल्में करते हैं, तो उन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं?

देखिए हम जितनी कोशिश कर सकते हैं उतनी इमानदार कोशिश करते हुए सच को ही अपनी फिल्म का हिस्सा बनाते हैं. अब जैसे कि आप फिल्म ‘‘केसरी’ को लें. तो इस फिल्म के निर्देशक व लेखक अनुराग सिंह ने काफी शोध करके इसकी पटकथा लिखी. मैं इस फिल्म का सारा श्रेय उन्हे ही देता हूं. देखिए,मैं हर साल चार फिल्में करता हूं तो स्वाभाविक तौर पर हर फिल्म पर मैं उतना ध्यान नहीं दे सकता. इसलिए मेरी हर फिल्म के लिए सारा रिसर्च करने वाले निर्देशक या लेखक ही होते है. पर हम जिम्मेदारी से ही काम करते हैं. हम किसी की फिलिंग को हर्ट करने का प्रयास कभी नहीं करते. वैसे भी देखा जाए तो कोई भी फिल्मकार या कलाकार किसी की फींलिंग को हर्ट नहीं करता फिर भी कई बार अनजाने में ऐसा हो जाता है. अगर वह माफी मागते हैं तो उसे माफ कर आगे बढ़ना चाहिए. यह नहीं कि उसको हम खींचते रहे. ‘केसरी’के निर्माण से पहले कई किताबें पढ़ी गयी काफी शोध किया गया.

कहानी ‘सारागढ़ी युद्ध’ की है, तो फिर पर फिल्म का नाम ‘केसरी’ रखने के पीछे सोच क्या रही?

केसरी का रंग बहादुरी का, शौर्य का, वीरता का प्रतीक है. यह कलर आफ वार है. इसलिए इससे बेहतर नाम सूझा ही नहीं.

फिल्म‘‘केसरी’’के एक्शन दृश्य को लेकर क्या कहना चाहेंगे?

इस फिल्म का एक्शन बहुत अलग है. हमने इसमें सिख, सरदारों का जो मार्शल आर्ट का फार्म है-गटका’, उसका उपयोग किया है, जिसके लिए हमें ट्रिनंग भी लेनी पड़ी. उस वक्त की लड़ाई गटका से लड़ी गयी थी. सरदारों को पकड़ना मुशिक्ल था. वह घूम घूम कर अपने शत्रु पर वार करते थे. उनकी तलवार ही बीस से बाइस किलो की होती थी. उनकी पगड़ी ही सवा किलो की वजन की होती थी.

आपके करियर में एक खास बात नजर आती है कि आप जिस विषय वाली फिल्म से जुड़ते हैं, वह जल्द बन जाती हैं, जबकि दूसरे लोग सिर्फ योजना बनाते रह जाते हैं. ‘सारागढ़ी के युद्ध’पर तीन दूसरे फिल्मकार पिछले चार वर्षों से भी अधिक समय से फिल्म बना रहे हैं, पर अब तक नहीं बना पाए. आप ‘केसरी’ लेकर आ गए. इसी तरह स्पेस पर भी दो फिल्में चार साल से बन रही हैं पर नही बन पायी. आपने स्पेस फिल्म ‘मंगल यान’’ की शूटिंग पूरी कर चुके हैं?

शायद मैं लक्की हूं दूसरो की फिल्में क्यों रूक जाती हैं, पता नही.मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे अच्छे लोग मिल जाते हैं और हम तीन माह कें अंदर फिल्म पूरी कर लेते हैं.

गत वर्ष आपकी दो महत्वपूर्ण  फिल्में ‘‘ट्वायलेट एक प्रेम कथा’’ और ‘‘पैडमैन’’ आयी. दोनों ही फिल्में औरतों की सुरक्षा व उनके आत्म सम्मान से जुड़ी फिल्में रही. इन फिल्मों के प्रदर्शन के बाद कोई खास प्रतिक्रिया मिली हो जिसने आपके दिल को भी छू लिया हो.

मैं एक किस्सा बताना चाहूंगा, जो कि पंजाब में रह रहे मेरे एक दोस्त के साथ घटी थी. एक रात डेढ़ बजे मेरे दोस्त की बेटी ने अपनी मां से कहा कि मेरे पीरियड शुरू हो गए हैं. और मैं सैनेटरी पैड लाना भूल गयी. डेढ़ बजे सैनेटरी पैड कैसे आए. क्योंकि 24 घंटे खुली रहने वाली दवा की दुकान उसके घर से 18 किलोमीटर दूर थी. मेरे दोस्त ने जब अपनी बेटी की बात सुनी तो वह तुरंत घर से निकलकर गया और अपनी बेटी को सैनेटरी पैड लाकर दिया. एक पिता अपनी बेटी को सैनेटरी पैड लाकर दिया.उसने मुझे बताया कि उसे यह प्रेरणा मेरी फिल्म ‘‘पैडमैन’’ की वजह से ही मिली थी. मेरं दोस्त ने मुझसे कहा- अक्षय वह दिन है और आज का दिन है, मेरी बेटी अपने मन की हर बात मुझसे करती है. मेरी बेटी मुझसे बहुत प्यार करती है. यह होता है फिल्म का असर. मैं बहुत खुश हूं कि अब बडे शहर में इसको लेकर टैबू नही रहा. अब लोग इस पर खुलकर बात करने लगे हैं. यह जो बदलाव है, वह मेरी या आपकी नहीं बल्कि सिनेमा की ताकत है. सिनेमा से ही बदलाव आता है.

हम बौलीवुड वाले हौलीवुड से इतना डरे हुए क्यों रहते हैं. सभी हौलीवुड फिल्म ‘‘अवेजर’’ को लेकर सहमें हुए हैं?

उनकी फिल्मों का बजट बहुत बड़ा है. उस तरह की फिल्में भारत में नहीं बन रही हैं, इसलिए एक डर तो रहेगा.वह हमारा काफी बिजनेस खा जाते हैं. हमारे पास उस स्तर की फिल्में बनाने के लिए नहीं है. यदि हमें उनकी तरह बजट मिले तो हम उन्हे डरा दें. जिस बजट में उनकी फिल्में बनती हैं. उसके एक प्रतिशत के बजट में हम फिल्म बनाकर लाभ कमाते हैं. हमें सीधा देखना चाहिए. मैं यह मानता हूं कि उनकी फिल्मों में इमोशन कम होता है और हमारी फिल्मों में इमोशन बहुत होता है.

चांदनी चैक,दिल्ली से चुनाव लड़ने की खबरें भी रही है?

बिलकुल गलत खबर है. यदि ऐसा होता तो मैं खुद ही बता देता.

पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के संग आपकी काफी नजदीकियां हैं?

नही.. मेरी नजदीकियां अच्छे कार्य से है.

आप ऐतिहासिक फिल्म ‘‘पृथ्वीराज चैहाण’’ कर रहे हैं?

हां डां.चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में यह फिल्म कर रहा हूं. इस साल के अंत में हम इसकी शूटिंग शुरू करेंगे. निर्देशक से बात हुई. वह बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं.

आपकी रूचि इतिहास में कितनी है?

इतिहास, रामायण, महाभारत की कहानियां सुनने में मजा आता है. शूरवीर वाली कहानी सुनने में बहुत मजा आता है.

आने वाली फिल्में?

‘मंगलयान’, ‘सूर्यवंशी’ कौमेडी फिल्म ‘हाउसफुल 4’, ‘पृथ्वीराज चैहाण और एक हौरर फिल्म कर रहा हूं

‘हेराफेरी 3’ भी कर रहे हैं?

नहीं..हेरा फेरी 3 नहीं कर रहा.

 

साजिश की शिकार शिक्षा

शिक्षा के संवैधानिक अधिकार का कचरा करने के लिए तरहतरह की साजिशें रची जा रही हैं. इन में से एक है बिना परीक्षा लिए बच्चों को अगली कक्षा में भेज देना, जहां वे दूसरे छात्रों से पिछड़े नजर आएं और फिर स्कूल आना बंद कर दें. शिक्षा के संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत निजी स्कूलों को 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों को देनी होती हैं और इन का कुछ खर्चा सरकार देती है, बाकी स्कूल उठाता है यानी वह दूसरे बच्चों की फीस में से उसे पूरा करता है.

यह प्रयोग अपनेआप में ही बेकार हैं. भारत में समानता असमानता की खाई में सिर्फ पैसा ही नहीं है, जन्म से तय जाति भी है जिस में बहुत से लोगों को छूने, उन से लेनदेन करने और उन के साथ बात करने पर भी पाबंदी है. उन के बच्चे जब दूसरे तबके या अमीरों के बच्चों के साथ बैठते हैं तो कक्षाओं में न दिखने वाली दीवारें खिंच जाती हैं.

ऐसे अलगथलग पड़े बच्चों के पास न अच्छे कपड़े होते हैं न किताबें. उन के घरों का वातावरण भी पढ़ाईलिखाई का नहीं होता. ऐसे बच्चों के मातापिता अपनी संतानों को कखग या एबीसी पढ़वा कर कुछ खास खुश नहीं होते. उन्होंने, दरअसल, सपने में भी पढ़ाई की कीमत नहीं जानी थी. उन के आसपास  के जो बच्चे पढ़लिख भी गए, वे भी वैसे के वैसे ही रह गए.

पढ़ाई का फायदा वहां है जहां विद्यार्थियों को तकनीकी कामों से जोड़ा जाए. हमारे प्राइवेट स्कूलों का डिजाइन बच्चों को सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए तैयार करना होता है. स्कूलों और यहां तक कि आर्ट्स कालेजों तक में ऐसा कुछ नहीं पढ़ाया जाता जिस से पैसा कमाने के किसी काम को करने में कोई सुविधा होती हो. इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेजों में ही व्यावहारिक ज्ञान मिलता है, वह भी बाद में चमकाया जाता है जब फैक्टरियों के फ्लोरलैवल या अस्पतालों में काम करना होता है. थोड़ी सी तकनीकी शिक्षा अकाउंटैंसी में है पर वह भी सिर्फ इसलिए कि सरकार ने टैक्स जमा करने के पेचीदा कानून बना रखे हैं.

गरीबों के बच्चे ऊंचे स्कूलों में जा कर बैठ जाते हैं पर जब उन का मखौल उड़ाया जाता है, उन को हिकारत की नजरों से देखा जाता हैं, उन्हें अध्यापक नजरअंदाज करते हैं क्योंकि वे उन के पास ट्यूशन पढ़ने जाने से रहे, तो वे पढ़ाई को ही नकार देते हैं. आप उन्हें पास करें या न करें, वे सब पढ़ने वाले नहीं हैं. हां, कुछ सिरफिरे जरूर होंगे जो इन खाइयों को पार कर लेंगे.

इस पूरी समस्या का कोई आसान हल नहीं है. फिलहाल तो उस्ताद के शागिर्द बन कर छोटे कारखानों में काम करना ही एक उपाय दिख रहा है पर चाइल्ड लेबर यानी बालश्रम वे विरोधी उसे भी न करने देंगे, यह पक्का है.

तानी ने पिलाया पानी

भारत के शतरंज के खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं. इस खेल में भारत की ओर से सिरमौर रहे मासूम चेहरे के इस खिलाड़ी को लोग आज भी प्यार से ‘विशी’ कह कर बुलाते हैं. वैसे, जब ये किशोर अवस्था में थे तो इन्हें ‘लाइटनिंग किड’ कहा जाता था.आज विश्वनाथन आनंद जैसा ही एक ‘लाइटनिंग किड’ दोबारा सुर्खियों में है.

नाम उस का तानी है और उम्र महज 8 साल, पर शतरंज में वह अच्छे अच्छों को पानी पिला रहा है. उस ने हाल ही में न्यूयौर्क स्टेट चैस चैंपियनशिप में ट्रौफी जीती है.लेकिन तानी के साथ एक ऐसी कहानी भी जुड़ी है जो उसे दूसरे नन्हे खिलाड़ियों से अलग करती है. सच कहें तो उस का यहां तक का सफर इतना आसान नहीं रहा है.दरअसल, तानी एक नाइजीरियाई रिफ्यूजी है जो न्यूयौर्क के मैनहेटन में एक शेल्टर होम में रहता है. उस का परिवार साल 2017 में नाइजीरिया से भाग आया था और तकरीबन एक साल से न्यूयॉर्क में रह रहा है.

तानी के पिता कायोदे एडेवुमी एक कैब ड्राइवर हैं. वे बताते हैं कि नाइजीरिया में जब बोको हरम के आतंकवादियों ने उन के जैसे ही ईसाई लोगों पर हमला किया, तब वे वहां से निकल आए थे. वे किसी भी अपने को खोना नहीं चाहते थे. फिलहाल नाइजीरिया बहुत सी समस्याओं से जूझ रहा है. वहां के बहुत से लोग इतने गरीब हैं कि वे कर्ज में डूबे हुए हैं और अपना कर्ज चुकाने के लिए बेटियों तक का सौदा कर देते हैं. बोको हरम ने भी नाक में दम किया हुआ है.

वहां से आतंकी वारदातों की खबरें आती ही रहती हैं. ऐसे में वहां से लोगों का अपनी जान बचा कर भागना रोजमर्रा की बात है.ऐसे ही एक परिवार के तानी ने एक साल पहले ही शतरंज खेलना सीखा है और अब तक वह 7 ट्रौफी अपने नाम कर चुका है. वह फिलहाल मई में होने वाली एलिमेंट्री नैशनल चैंपियनशिप के लिए तैयारी कर रहा है. अपने शतरंज प्रेम को ले कर उस ने बताया, ”मैं सब से कम उम्र का ग्रैंडमास्टर बनना चाहता हूं.”तानी की यह तमन्ना जरूर पूरी होनी चाहिए क्योंकि इस कमउम्र खिलाड़ी ने साबित कर दिया है कि चाहे हालात आप के कितने भी खिलाफ क्यों न हों, लेकिन अगर आप में हुनर है और कुछ करने का जज्बा है तो फिर मंजिल कितनी भी मुश्किल हो, आप उसे पा ही लेंगे.

एरिक्सन के कर्ज को चुकाने में मुकेश ने की अनिल की मदद

कर्ज के बोझ तले दबे रिलायंस कम्यूनिकेशन ने एरिक्शन के बकाया 550 करोड़ रुपये का भुगतान ब्याज समेत कर दिया है. अनील अंबानी की कंपनी आरकौम के इस कर्ज को चुकाने में उनके भाई मुकेश अंबानी और भाभी नीता अंबानी अहम किरदार रहें. आपको बता दें कि दोनों कंपनियों के बीच चल रहे इस कर्ज के विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी. कोर्ट ने अनिल अंबानी को एक तय वक्त में बकाया का भुगतान करने के आदेश दिए थे, ऐसा ना करने पर अनिल अंबानी को जेल भी जाना पड़ सकता था. लंबे समय से चल रहे इस मामले में वो अदालत की अवमानना के दोषी करार दे गए थे जिसके बाद ये खबर उनके लिए किसी राहत से कम नहीं, वो जेल जाने से बच गए.

एरिक्सन के बकाये की भुगतान के बाद अनिल ने अपने बड़े भाई और भाभी के प्रति आभार जताते हुए कहा, ‘मैं अपने आदरणीय बड़े भाई मुकेश और भाभी नीता के इस मुश्किल वक्त में मेरे साथ खड़े रहने और मदद करने का तहेदिल से शुक्रिया करता हूं. समय पर यह मदद करके उन्होंने परिवार के मजबूत मूल्यों और परिवार के महत्व को रेखांकित किया है. मैं और मेरा परिवार बहुत आभारी हैं कि हम पुरानी बातों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ चुके हैं और उनके इस व्यवहार ने मुझे अंदर तक प्रभावित किया है.’

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने रिसायंस कम्यूनिकेशन के प्रमुख अनिल अंबानी को जानबूझ कर उनके आदेश की अवमानना करने और एरिक्सन के बकाये का भुगतान नहीं करने पर आदालत द्वारा दोषी करार दिए गए थे.

एरिक्सन का भुगतान करने के बाद आरकौम ने रिलायंस जियो के साथ 2017 में दूरसंचार संपत्तियों की बिक्री के लिए किए गए करार भी खत्म कर दिया है. आपको बता दें कि ये करार 17,000 करोड़ का था. दोनों समूहों ने सोमवार को इस करार को निरस्त करने की घोषणा करते हुए कहा कि सरकार और ऋणदाताओं से मंजूरी मिलने में देरी और कई तरह की अड़चनों यह समझौता समाप्त किया जाता है.

ऐसी भी होती हैं औरतें

सी तापुर जिले के गांव नेवादा प्रेम सिंह में भगौती प्रसाद अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी रामबेटी के अलावा 3 बेटियां और एक बेटा था. रीना उन की सब से बड़ी बेटी थी. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी, जिस की वजह से परिवार खुशहाल था.

भगौती प्रसाद ने 25 साल पहले अपनी बड़ी बेटी रीना की शादी सीतापुर के ही गांव माखूबपुर के रहने वाले विश्वनाथ उर्फ बबलू से कर दी थी. बबलू टैंपो चलाता था.

कालांतर में रीना 2 बच्चों की मां बनी. दोनों बच्चे बड़े हो चुके थे. बबलू पत्नी की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देता था, जिस से रीना कुंठित सी हो गई थी. रीना की बहन गुडि़या का विवाह सीतापुर शहर के मोहल्ला सुंदरनगर के अवधेश से हुआ था. अवधेश भी टैंपो चालक था.

अवधेश था तो 3 बच्चों का बाप, लेकिन शरीर से हृष्टपुष्ट था. उस का रीना के घर आनाजाना लगा रहता था. अवधेश को अपनी पत्नी से वह प्यार नहीं मिल पाता था, जिस की उसे चाहत थी. रीना को वह पहले से ही पसंद करता था, इसलिए जब तब उस से मिलने आ जाता था.

एक दिन अवधेश रीना के घर गया तो विश्वनाथ घर पर ही था. वह विश्वनाथ से बोला, ‘‘मुझे यहां पास में ही काम मिल रहा है, इसलिए मुझे यहीं रहना पड़ेगा. अगर तुम्हें बुरा न लगे तो मैं कुछ दिन के लिए तुम्हारे घर में रह सकता हूं?’’

इस से पहले कि विश्वनाथ कुछ बोलता, रीना बोल बोल पड़ी, ‘‘जीजा, इस में पूछने वाली क्या बात है. इसे अपना ही घर समझो और जब तक चाहो, रहो.’’

मजबूरी में विश्वनाथ को रीना की हां में हां मिलानी पड़ी, ‘‘रीना सही कह रही है. तुम बेहिचक यहां रह सकते हो.’’

इस के बाद अवधेश खाना खा कर अपने घर लौट गया.

इस के अगले ही दिन वह बैग में कपड़े वगैरह ले कर रीना के घर पहुंच गया. यह करीब 3 साल पहले की बात है. काम तो अवधेश का बहाना था, असल में उसे रीना के नजदीक आना था. विश्वनाथ सुबह घर से निकल जाता था और कभी देर शाम तो कभी देर रात तक घर लौटता था.

रीना के जवान हो चुके दोनों बेटे भी काम से निकल जाते थे. घर में रह जाते थे विश्वनाथ और रीना. रीना को अवधेश पति से ज्यादा अच्छा लगता था. अवधेश खाना खाने के लिए दोपहर को भी घर पहुंच जाता था. उस के घर आने के समय रीना दरवाजे पर खड़ी हो कर उस का इंतजार करती थी.

एक दिन रीना जब इंतजार करतेकरते थक गई, तो अंदर जा कर चारपाई पर लेट गई. कुछ देर बाद दरवाजा खटखटाने की आवाज आई तो रीना ने दरवाजा खोला. अवधेश आया था. उसे अंदर आने को कह कर वह लस्तपस्त सी चारपाई पर जा लेटी.

अवधेश ने घबरा कर पूछा, ‘‘क्या हुआ रीना, इस तरह सुस्त क्यों पड़ी

हो? लगता है, अभी नहाई नहीं हो.’’

रीना ने धीरे से कहा, ‘‘आज तबीयत ठीक नहीं है, कुछ अच्छा नहीं लग रहा.’’

अवधेश ने जल्दी से झुक कर रीना की नब्ज पकड़ ली. उस के स्पर्श से रीना के शरीर में हलचल सी मच गई, आंखें अजीब से नशे से भारी हो गईं. आवाज जैसे गले में ही फंस गई. उस ने भर्राए स्वर में कहा, ‘‘तुम तो ऐसे नब्ज टटोल रहे हो जैसे डाक्टर हो.’’

‘‘रीना, मैं बहुत बड़ा डाक्टर हूं.’’ अवधेश ने हंस कर कहा, ‘‘देखो न, नाड़ी छूते ही मैं ने तुम्हारा रोग भांप लिया. बुखार, हरारत कुछ नहीं है. बात है कि विश्वनाथ सुबह ही काम पर चला जाता है और देर शाम को घर लौटता है.’’

रीना के मुंह का स्वाद जैसे एकाएक कड़वा हो गया. वह तुनक कर बोली, ‘‘शाम को भी लौटे या न लौटे, मुझे क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रही हो, कितना खयाल रखता है तुम्हारा.’’ अवधेश ने उसे कुरेदा.

‘‘क्या खाक खयाल रखता है?’’ कहते उस की आंखों में आंसू छलक आए.

यह देख अवधेश व्याकुल हो उठा. कहने लगा, ‘‘रोओ मत, नहीं तो मुझे बहुत दुख होगा. तुम्हें मेरी कसम उठो और अभी नहा कर आओ. तुम्हारा मन थोड़ा शांत हो जाएगा.’’

अवधेश के बहुत जिद करने पर रीना को उठना पड़ा. वह नहाने की तैयारी करने लगी तो अवधेश चारपाई पर लेट गया. रीना के बाथरूम में जाने के बाद अवधेश का मन विचलित हो रहा था. रीना की बातें उसे कुरेद रही थीं. उस से रहा नहीं गया, उस ने बाथरूम की ओर देखा तो दरवाजा खुला हुआ था.

अवधेश का दिल एकबारगी जोर से धड़क उठा. उस ने एक बार चोर नजरों से बाहर की ओर देखा. सन्नाटा देख कर उस ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया और कांपते पैरों से बाथरूम के सामने जा कर खड़ा हो गया. रीना उन्मुक्त भाव से बैठी नहा रही थी. निर्वसन रीना के शरीर की चकाचौंध से अवधेश की आंखें फटी की फटी रह गईं.

आहट हुई तो रीना ने बाहर की ओर देखा. बाहर अवधेश को देख कर वह चौंक पड़ी. फिर भी उस ने छिपने या कपड़े पहनने की कोई आतुरता नहीं दिखाई. अपने नग्न बदन को हाथों से ढकने का असफल प्रयास करती हुई वह शरारती अंदाज में बोली, ‘‘बड़े शरारती हो तुम जीजा. अभी कोई देख ले तो…कमरे में जाओ.’’

लेकिन अवधेश सीधा बाथरूम में घुस गया और कहने लगा, ‘‘कोई नहीं देखेगा रीना, मैं ने बाहर वाले दरवाजे में कुंडी लगा दी है.’’

‘‘तो यह बात है. इस का मतलब तुम्हारी नीयत पहले से ही खराब थी.’’

‘‘तुम भी तो प्यासी हो. विश्वनाथ से तुम्हारी डोर बांध कर तुम्हारे मातापिता ने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा छल किया है.’’ कहतेकहते अवधेश ने रीना की धुली देह बांहों में भींच ली. पलक झपकते ही बाथरूम में तूफान सा उमड़ पड़ा. तूफान शांत हो जाने के बाद रीना बहुत खुश थी.

अवधेश जब तक वहां रहा, दोनों के बीच यह खेल चलता रहा. कुछ दिनों तक रहने के बाद वह अपने घर चला गया. लेकिन वह बारबार काम का बहाना बना कर रीना के घर आ जाता और कईकई दिनों तक रुकता.

हालांकि अवधेश रीना का रिश्तेदार था लेकिन इश्कविश्क की बातें आखिर छिपती कहां हैं. लोगों को इस की भनक लग ही जाती है. धीरेधीरे उन के अनैतिक संबंधों की चर्चा आसपड़ोस के लोगों में भी होने लगी.

जब यह बात विश्वनाथ के कानों तक पहुंची तो उस ने रीना से पूछा, ‘‘मैं यह क्या सुन रहा हूं, तुम मेरे पीछे तुम अपने जीजा अवधेश के साथ गुलछर्रे उड़ाती हो?’’

‘‘अपनी बीवी पर बस इतना ही विश्वास करते हो. कोई भी तुम से मेरे बारे में कुछ कह दे तो तुम सीधे मेरे ऊपर आ कर चढ़ाई कर दोगे.’’ उलटे रीना ने पति को आड़े हाथों लिया.

‘‘तो तुम्हारा मतलब है कि यह सब झूठ है?’’ विश्वनाथ बोला.

‘‘सरासर झूठ है, इस में कोई सच्चाई नहीं है.’’ रीना ने उसे विश्वास में लेते हुए कहा.

‘‘काश! यह झूठ ही हो, इसी में तुम्हारी भलाई है.’’ विश्वनाथ रीना को घूरते हुए बोला और फिर वहां से चला गया. रीना उस के जाते ही मुसकरा उठी.

लेकिन उन के संबंधों का राज राज नहीं रहा. इस बार रीना भी खुल कर मैदान में आ गई. जब रीना को किसी का डर नहीं था तो अवधेश क्यों पीछे हटता.

इधरउधर की बातें होने लगीं तो रीना अवधेश के घर चली गई. वह अवधेश के घर में रहती और जब मन होता 1-2 दिन के लिए अपने घर आ जाती. अवधेश ने अपनी पत्नी गुडि़या को डराधमका कर चुप करा दिया था.

विश्वनाथ के पिता यानी रीना के ससुर शंभूदयाल नौकरी से रिटायर हो चुके थे. रिटायर होने के बाद उन्हें सरकार से पेंशन मिलती थी. वह पेंशन के रुपए लेने के लिए महीने की 1 तारीख को उन के पास आ जाती थी. रुपए ले कर वापस अवधेश के घर लौट जाती.

शंभूदयाल ने अपनी पुश्तैनी जमीन भी रीना के नाम कर दी थी. जबकि अपने बेटे और 2 पोते होने के बावजूद उन्होंने विश्वनाथ को कुछ नहीं दिया था. ऐसा क्या हुआ कि शंभूदयाल अपनी बहू से इतने खुश थे कि उन्होंने ऐसा कदम उठाया. गांव के लोग इस के तरहतरह से मायने निकालने लगे.

पहली अक्तूबर, 2018 की सुबह खैराबाद थाने में किसी ने फोन पर खबर दी कि मीनापुर गांव के पास सड़क किनारे एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. सूचना पा कर इंसपेक्टर सचिन सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक की उम्र लगभग 40-41 साल थी. उस के गले पर चोटों के निशान थे.

बाकी शरीर पर किसी तरह की चोट के निशान नहीं थे. तब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे. लोगों ने लाश की शिनाख्त गांव माखूबपुर निवासी विश्वनाथ के रूप में की.

उन्होंने मृतक के घर वालों को घटना की सूचना भिजवा दी. घर वाले आए तो उन्होंने लाश की शिनाख्त विश्वनाथ के रूप में कर दी. पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

विश्वनाथ के बेटे पंकज ने रीना व 2 अज्ञात लोगों पर शक जताया तो पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर केस की जांच शुरू कर दी.

इंसपेक्टर सचिन सिंह ने मृतक विश्वनाथ के पिता से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रीना के नाजायज संबंध उस के बहनोई अवधेश से थे. वह उसी के साथ रहती थी. वह कभीकभी ही घर आती थी.

घटना से 6 महीने पहले वह अवधेश के साथ भाग गई थी. घटना की रात रीना की 5 वर्षीय बेटी राधिका उस के पास ही सोई थी. हो सकता है उस ने इस घटना को होते देखा हो.

इंसपेक्टर सचिन सिंह ने राधिका से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रात में मम्मी का पापा से झगड़ा हुआ था, जिस के बाद मम्मी ने कुछ लोगों को बुला कर पापा को मार दिया.

राधिका के इस बयान के बाद इंसपेक्टर सिंह ने रीना को हिरासत में ले लिया. उसे थाने ला कर जब सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने पति की हत्या का जुर्म स्वीकार करते हुए हत्या में शामिल लोगों के नाम भी बता दिए.

अप्रैल, 2018 में रीना अवधेश के साथ कहीं चली गई थी. किसी को इस की जानकारी नहीं मिल सकी कि रीना आखिर कहां गई. वह घटना से 2 दिन पहले ही घर लौटी थी.

गायब होने के दौरान ही उस ने अवधेश से कोर्टमैरिज कर ली थी. अब वह पति से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी. इसलिए उस ने अवधेश से विश्वनाथ को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की बात कर ली थी. अवधेश ने इस के लिए रीना के गांव के ही अपने एक साथी हिमांशु त्रिपाठी और खैराबाद कस्बे के शिवकुमार को इस योजना में शामिल कर लिया था.

30 सितंबर, 2018 की रात विश्वनाथ रीना से शारीरिक संबंध बनाना चाहता था. रीना अवधेश से कोर्टमैरिज कर चुकी थी, इसलिए उस ने विश्वनाथ को अपने पास नहीं फटकने दिया. इस पर दोनों में झगड़ा हुआ. झगड़े के बाद विश्वनाथ सो गया. लेकिन रीना गुस्से से भरी हुई थी. उस ने अवधेश को फोन किया और विश्वनाथ को तुरंत ठिकाने लगाने को कहा.

अवधेश उसी समय शिवकुमार और हिमांशु को ले कर रीना के घर पहुंच गया. उन्होंने सोते हुए विश्वनाथ को दबोच लिया. फिर विश्वनाथ के गले में नायलौन की रस्सी डाल कर उस का गला कस दिया, जिस से उस की मृत्यु हो गई. यह सब करते हुए रीना की बेटी राधिका चुपचाप देख रही थी, लेकिन वह डरीसहमी सी सोने का नाटक करती रही.

विश्वनाथ को मौत के घाट उतारने के बाद उन्होंने उस की लाश हिमांशु की स्प्लेंडर बाइक पर लाद कर मीनापुर गांव के पास सड़क किनारे फेंक दी. इस के बाद तीनों वहां से फरार हो गए.

लेकिन चश्मदीद राधिका के बयान के बाद उन का राजफाश हो गया. रीना से पूछताछ के बाद अवधेश, हिमांशु त्रिपाठी और शिवकुमार को भी पुलिस ने लालपुर रोड से गिरफ्तार कर लिया. उन के पास से हत्या में इस्तेमाल की गई नायलौन की रस्सी और बाइक बरामद कर ली.

आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी के बाद चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.??????   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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