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सबसे बड़ा रूप्पया

सर्वेश वार्ष्णेय

सुख क्या होता है इस का एहसास अब प्रौढ़ावस्था में शेखर व सरिता को हो रहा था. जवानी तो संघर्ष करते गुजरी थी. कभी पैसे की किचकिच, कभी बच्चों की समस्याएं.

घर के कामों के बोझ से लदीफदी सरिता को कमर सीधी करने की फुरसत भी बड़ी कठिनाई से मिला करती थी.

आमदनी बढ़ाने के लिए शेखर भी ओवरटाइम करता. अपनी जरूरतें कम कर के भविष्य के लिए रुपए जमा करता. सरिता भी घर का सारा काम अपने हाथों से कर के सीमित बजट में गुजारा करती थी.

सेवानिवृत्त होते ही समय जैसे थम गया. सबकुछ शांत हो गया. पतिपत्नी की भागदौड़ समाप्त हो गई.

शेखर ने बचत के रुपयों से मनपसंद कोठी बना ली. हरेभरे पेड़पौधे से सजेधजे लान में बैठने का उस का सपना अब जा कर पूरा हुआ था.

बेटा पारस की इंजीनियरिंग की शिक्षा, फिर उस का विवाह सभी कुछ शेखर की नौकरी में रहते हुए ही हो चुका था. पारस अब नैनीताल में पोस्टेड है. बेटी प्रियंका, पति व बच्चों के साथ चेन्नई में रह रही थी. दामाद फैक्टरी का मालिक था.

शेखर ने अपनी कोठी का आधा हिस्सा किराए पर उठा दिया था. किराए की आमदनी, पेंशन व बैंक में जमा रकम के ब्याज से पतिपत्नी का गुजारा आराम से चल रहा था.

घर में सुख- सुविधा के सारे साधन उपलब्ध थे. सरिता पूरे दिन टेलीविजन देखती, आराम करती या ब्यूटी पार्लर जा कर चेहरे की झुर्रियां मिटवाने को फेशियल कराती.

शेखर हंसते, ‘‘तुम्हारे ऊपर बुढ़ापे में निखार आ गया है. पहले से अधिक खूबसूरत लगने लगी हो.’’

शेखर व सरिता सर्दी के मौसम में प्रियंका के घर चेन्नई चले जाते और गरमी का मौसम जा कर पारस के घर नैनीताल में गुजारते.

पुत्रीदामाद, बेटाबहू सभी उन के सम्मान में झुकेरहते. दामाद कहता, ‘‘आप मेरे मांबाप के समान हैं, जैसे वे लोग, वैसे ही आप दोनों. बुजर्गों की सेवा नसीब वालों को ही मिला करती हैं.’’

शेखरसरिता अपनेदामाद की बातें सुन कर गदगद हो उठते. दामाद उन्हें अपनी गाड़ी में बैठा कर चेन्नई के दर्शनीय स्थलों पर घुमाता, बढि़या भोजन खिलाता. नौकरानी रात को दूध का गिलास दे जाती.

सेवा करने में बहूबेटा भी कम नहीं थे. बहू अपने सासससुर को बिस्तरपर ही भोजन की थाली ला कर देती और धुले कपड़े पहनने को मिलते.

बहूबेटों की बुराइयां करने वाली औरतों पर सरिता व्यंग्य कसती कि तुम्हारे अंदर ही कमी होगी कि तुम लोग बहुओं को सताती होंगी. मेरी बहू को देखो, मैं उसे बेटी मानती हूं तभी तो वह मुझे सुखआराम देती है.

शेखर भी दामाद की प्रशंसा करते न अघाते. सोचते, पता नहीं क्यों लोग दामाद की बुराई करते हैं और उसे यमराज कह कर उस की सूरत से भी भय खाते हैं.

एक दिन प्रियंका का फोन आया. उस की आवाज में घबराहट थी, ‘‘मां गजब हो गया. हमारे घर में, फैक्टरी में सभी जगह आयकर वालों का छापा पड़ गया है और वे हमारे जेवर तक निकाल कर ले गए…’’

तभी शेखर सरिता के हाथ से फोन छीन कर बोले, ‘‘यह सब कैसे हो गया बेटी?’’

‘‘जेठ के कारण. सारी गलती उन्हीें की है. सारा हेरफेर वे करते हैं और उन की गलती का नतीजा हमें भोगना पड़ता है,’’ प्रियंका रो पड़ी.

शेखर बेटी को सांत्वना देते रह गए और फोन कट गया.

वह धम्म से कुरसी पर बैठ गए. लगा जैसे शरीर में खड़े रहने की ताकत नहीं रह गई है. और सरिता का तो जैसे मानसिक संतुलन ही खो गया. वह पागलों की भांति अपने सिर के बाल नोचने लगी.

शेखर ने अपनेआप को संभाला. सरिता को पानी पिला कर धैर्य बंधाया कि अवरोध तो आते ही रहते हैं, सब ठीक हो जाएगा.

एक दिन बेटीदामाद उन के घर आ पहुंचे. संकोच छोड़ कर प्रियंका अपनी परेशानी बयान करने लगी, ‘‘पापा, हम लोग जेठजिठानी से अलग हो रहे हैं. इन्हें नए सिरे से काम जमाना पडे़गा. कोठी छोड़ कर किराए के मकान में रहना पडे़गा. काम शुरू करने के लिए लाखों रुपए चाहिए. हमें आप की मदद की सख्त जरूरत है.’’

दामाद हाथ जोड़ कर सासससुर से विनती करने लगा, ‘‘पापा, आप लोगों का ही मुझे सहारा है, आप की मदद न मिली तो मैं बेरोजगार हो जाऊंगा. बच्चों की पढ़ाई रुक जाएगी.’’

शेखर व सरिता अपनी बेटी व दामाद को गरीबी की हालत में कैसे देख सकते थे. दोनों सोचविचार करने बैठ गए. फैसला यह लिया कि बेटीदामाद की सहायता करने में हर्ज ही क्या है? यह लोग सहारा पाने और कहां जाएंगे.

अपने ही काम आते हैं, यह सोच कर शेखर ने बैंक में जमा सारा रुपया निकाल कर दामाद के हाथों में थमा दिया. दामाद ने उन के पैरों पर गिर कर कृतज्ञता जाहिर की और कहा कि वह इस रकम को साल भर के अंदर ही वापस लौटा देगा.

श्ेखरसरिता को रकम देने का कोई मलाल नहीं था. उन्हें भरोसा था कि दामाद उन की रकम को ले कर जाएगा कहां, कह रहा है तो लौटाएगा अवश्य. फिर उन के पास जो कुछ भी है बच्चों के लिए ही तो है. बच्चों की सहायता करना उन का फर्ज है. दामाद उन्हें मांबाप के समान मानता है तो उन्हें भी उसे बेटे के समान मानना चाहिए.

अपना फर्ज पूरा कर के दंपती राहत का आभास कर रहे थे.

बेटे पारस का फोन आया तो मां ने उसे सभी कुछ स्पष्ट रूप से बता दिया.

तीसरे दिन ही बेटाबहू दोनों आकस्मिक रूप से दिल्ली आ धमके. उन्हें इस तरह आया देख कर शेखर व सरिता हतप्रभ रह गए. ‘‘बेटा, सब ठीक है न,’’ शेखर उन के इस तरह अचानक आने का कारण जानने के लिए उतावले हुए जा रहे थे.

‘‘सब ठीक होता तो हमें यहां आने की जरूरत ही क्या थी,’’ तनावग्रस्त चेहरे से पारस ने जवाब दिया.

बहू ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘‘आप लोगों ने अपने खूनपसीने की कमाई दामाद को दे डाली, यह भी नहीं सोचा कि उन रुपयों पर आप के बेटे का भी हक बनता है.’’

बहू की बातें सुन कर शेखर हक्केबक्के रह गए. वह स्वयं को संयत कर के बोले, ‘‘उन लोगों को रुपया की सख्त जरूरत थी. फिर उन्होंने रुपया उधार ही तो लिया है, ब्याज सहित चुका देंगे.’’

‘‘आप ने रुपए उधार दिए हैं, इस का कोई सुबूत आप के पास है. आप ने उन के साथ कानूनी लिखापढ़ी करा ली है?’’

‘‘वे क्या पराए हैं जो कानूनी लिखापढ़ी कराई जाती व सुबूत रखे जाते.’’

‘‘पापा, आप भूल रहे हैं कि रुपया किसी भी इनसान का ईमान डिगा सकता है.’’

‘‘मेरा दामाद ऐसा इनसान नहीं है.’’ सरिता बोली, ‘‘प्रियंका भी तो है वह क्या दामाद को बेईमानी करने देगी.’’

‘‘यह तो वक्त बताएगा कि वे लोग बेईमान हैं या ईमानदार. पर पापा आप यह मकान मेरे नाम कर दें. कहीं ऐसा न हो कि आप बेटीदामाद के प्रेम में अंधे हो कर मकान भी उन के नाम कर डालें.’’

बेटे की बातें सुन कर शेखर व सरिता सन्न रह गए. हमेशा मानसम्मान करने वाले, सलीके से पेश आने वाले बेटाबहू इस प्रकार का अशोभनीय व्यवहार क्यों कर रहे हैं. यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

आखिर, बेटाबहू इस शर्त पर शांत हुए कि बेटीदामाद ने अगर रुपए वापस नहीं किए तो उन के ऊपर मुकदमा चलाया जाएगा.

बेटाबहू कई तरह की हिदायतें दे कर नैनीताल चले गए पर शेखर व सरिता के मन पर ंिंचंताओं का बोझ आ पड़ा था. सोचते, उन्होंने बेटीदामाद की सहायता कर के क्या गलती की है. रुपए बेटी के सुख से अधिक कीमती थोड़े ही थे.

हफ्ते में 2 बार बेटीदामाद का फोन आता तो दोनों पतिपत्नी भावविह्वल हो उठते. दामाद बिलकुल हीरा है, बेटे से बढ़ कर अपना है. बेटा कपूत बनता जा रहा है, बहू के कहने में चलता है. बहू ने ही पारस को उन के खिलाफ भड़काया होगा.

अब शेखर व सरिता उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब दामाद उन का रुपया लौटाने आएगा और वे सारा रुपया उठा कर बेटाबहू के मुंह पर मार कर कहेंगे कि इसी रुपए की खातिर तुम लोग रिश्तों को बदनाम कर रहे थे न, लो रखो इन्हें.

कुछ माह बाद ही बेटीदामाद का फोन आना बंद हो गया तो शेखरसरिता चिंतित हो उठे. वे अपनी तरफ से फोन मिलाने का प्रयास कर रहे थे पर पता नहीं क्यों फोन पर प्रियंका व दामाद से बात नहीं हो पा रही थी.

हर साल की तरह इस साल भी शेखर व सरिता ने चेन्नई जाने की तैयारी कर ली थी और बेटीदामाद के बुलावे की प्रतीक्षा कर रहे थे.

एक दिन प्रियंका का फोन आया तो शेखर ने उस की खैरियत पूछने के लिए प्रश्नों की झड़ी लगा दी पर प्रियंका ने सिर्फ यह कह कर फोन रख दिया कि वे लोग इस बार चेन्नई न आएं क्योंकि नए मकान में अधिक जगह नहीं है.

शेखरसरिता बेटी से ढेरों बातें करना चाहते थे. दामाद के व्यवसाय के बारे में पूछना चाहते थे. अपने रुपयों की बात करना चाहते थे. पर प्रियंका ने कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया.

बेटीदामाद की इस बेरुखी का कारण उन की समझ में नहीं आ रहा था.

देखतेदेखते साल पूरा हो गया. एक दिन हिम्मत कर के शेखर ने बेटी से रुपए की बाबत पूछ ही लिया.

प्रियंका जख्मी शेरनी की भांति गुर्रा उठी, ‘‘आप कैसे पिता हैं कि बेटी के सुख से अधिक आप को रुपए प्यारे हैं. अभी तो इन का काम शुरू ही हुआ है, अभी से एकसाथ इतना सारा रुपया निकाल लेंगे तो आगे काम कैसे चलेगा?’’

दामाद चिंघाड़ कर बोला, ‘‘मेरे स्थान पर आप का बेटा होता तो क्या आप उस से भी वापस मांगते? आप के पास रुपए की कमी है क्या? यह रुपया आप के पास बैंक में फालतू पड़ा था, मैं इस रुपए से ऐश नहीं कर रहा हूं, आप की बेटी को ही पाल रहा हूं.’’

पुत्रीदामाद की बातें सुन कर शेखर व सरिता सन्न कर रह गए और रुपए वापस मिलने की तमाम आशाएं निर्मूल साबित हुईं. उलटे वे उन के बुरे बन गए. रुपया तो गया ही साथ में मानसम्मान भी चला गया.

पारस का फोन आया, ‘‘पापा, रुपए मिल गए.’’

शेखर चकरा गए कि क्या उत्तर दें. संभल कर बोले, ‘‘दामाद का काम जम जाएगा तो रुपए भी आ जाएंगे.’’

‘‘पापा, साफ क्यों नहीं कहते कि दामाद ने रुपए देने से इनकार कर दिया. वह बेईमान निकल गया,’’ पारस दहाड़ा.

सरिता की आंखों से आंसू बह निकले, वह रोती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, तू ठीक कह रहा है. दामाद सचमुच बेईमान है, रुपए वापस नहीं करना चाहता.’’

‘‘उन लोगों पर धोखाधड़ी करने का मुकदमा दायर करो,’’ जैसे सैकड़ों सुझाव पारस ने फोन पर ही दे डाले थे.

शेखर व सरिता एकदूसरे का मुंह देखते रह गए. क्या वे बेटीदामाद के खिलाफ यह सब कर सकते थे.

चूंकि वे अपनी शर्त पर कायम नहीं रह सके इसलिए पारस मकान अपने नाम कराने दिल्ली आ धमका. पुत्रीदामाद से तो संबंध टूट ही चुके हैं, बहूबेटा से न टूट जाएं, यह सोच कर दोनों ने कोठी का मुख्तियारनामा व वसीयतनामा सारी कानूनी काररवाई कर के पूरे कागजात बेटे को थमा दिए.

पारस संतुष्ट भाव से चला गया.‘‘बोझ उतर गया,’’ शेखर ने सरिता की तरफ देख कर कहा, ‘‘अब न तो मकान की रंगाईपुताई कराने की चिंता न हाउस टैक्स जमा कराने की. पारस पूरी जिम्मेदारी निबाहेगा.’’

सरिता को न जाने कौन सा सदमा लग गया कि वह दिन पर दिन सूखती जा रही थी. उस की हंसी होंठों से छिन चुकी थी, भूखप्यास सब मर गई. बेटीबेटा, बहूदामाद की तसवीरोें को वह एकटक देखती रहतीं या फिर शून्य में घूरती रह जाती.

शेखर दुखी हो कर बोला, ‘‘तुम ने अपनी हालत मरीज जैसी बना ली. बालों पर मेंहदी लगाना भी बंद कर दिया, बूढ़ी लगने लगी हो.’’

सरिता दुखी मन से कहने लगी,‘‘हमारा कुछ भी नहीं रहा, हम अब बेटाबहू के आश्रित बन चुके हैं.’’

‘‘मेरी पेंशन व मकान का किराया तो है. हमें दूसरों के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ शेखर जैसे अपनेआप को ही समझा रहे थे.

जब किराएदार ने महीने का किराया नहीं दिया तो शेखर ने खुद जा कर शिकायती लहजे में किराएदार से बात की और किराया न देने का कारण पूछा.

किराएदार ने रसीद दिखाते हुए तीखे स्वर में उत्तर दिया कि वह पारस को सही वक्त पर किराए का मनीआर्डर भेज चुका है.

‘‘पारस को क्यों?’’

‘‘क्योेंकि मकान का मालिक अब पारस है,’’ किराएदार ने नया किराया- नामा निकाल कर शेखर को दिखा दिया. जिस पर पारस के हस्ताक्षर थे.

शेखर सिर पकड़ कर रह गए कि सिर्फ मामूली सी पेंशन के सहारे अब वह अपना गुजारा कैसे कर पाएंगे.

‘‘बेटे पर मुकदमा करो न,’’ सरिता पागलों की भांति चिल्ला उठी, ‘‘सब बेईमान हैं, रुपयों के भूखे हैं.’’

शेखर कहते, ‘‘हम ने अपनी संतान के प्रति अपना फर्ज पूरा किया है. हमारी मृत्यु के बाद तो उन्हें मिलना ही था, पहले मिल गया. इस से भला क्या फर्क पड़ गया.’’

सरिता बोली, ‘‘बेटीदामाद, बेटा बहू सभी हमारी दौलत के भूखे थे. दौलत के लालच में हमारे साथ प्यारसम्मान का ढोंग करते रहे. दौलत मिल गई तो फोन पर बात करनी भी छोड़ दी.’’

पतिपत्नी दोनों ही मानसिक वेदना से पीडि़त हो चुके थे. घर पराया लगता, अपना खून पराया हो गया तो अपना क्या रह गया.

एक दिन शेखर अलमारी में पड़ी पुरानी पुस्तकों में से होम्योपैथिक चिकित्सा की पुस्तक तलाश कर रहे थे कि अचानक उन की निगाहों के सामने पुस्तकों के बीच में दबा बैग आ गया और उन की आंखें चमक उठीं.

बैग के अंदर उन्होंने सालोें पहले इंदिरा विकासपत्र व किसान विकासपत्र पोस्ट आफिस से खरीद कर रखे हुए थे. जिस का पता न बेटाबेटी को था, न सरिता को,यहां तक कि खुद उन्हें भी याद नहीं रहा था.

मुसीबत में यह 90 हजार रुपए की रकम उन्हें 90 लाख के बराबर लग रही थी.

उन के अंदर उत्साह उमड़ पड़ा. जैसे फिर से युवा हो उठे हों. हफ्ते भर के अंदर ही उन्होंने लान के कोने में टिन शेड डलवा कर एक प्रिंटिंग प्रेस लगवा ली. कुछ सामान पुराना भी खरीद लाए और नौकर रख लिए.

सरिता भी इसी काम में व्यस्त हो गई. शेखर बाहर के काम सभांलता तो सरिता दफ्तर में बैठती.

शेखर हंस कर कहते, ‘‘हम लोग बुढ़ापे का बहाना ले कर निकम्मे हो गए थे. संतान ने हमें बेरोजगार इनसान बना दिया. अब हम दोनों काम के आदमी बन गए हैं.’’

सरिता मुसकराती, ‘‘कभीकभी कुछ भूल जाना भी अच्छा रहता है. तुम्हारे भूले हुए बचत पत्रों ने हमारी दुनिया आबाद कर दी. यह रकम न मिलती तो हमें अपना बाकी का जीवन बेटीदामाद और बेटाबहू की गुलामी करते हुए बिताना पड़ता. अब हमें बेटीदामाद, बेटाबहू सभी को भुला देना ही उचित रहेगा. हम उन्हें इस बात का एहसास दिला देंगे कि उन की सहायता लिए बगैर भी हम जी सकते हैं और अपनी मेहनत की रोटी खा सकते हैं. हमें उन के सामने हाथ फैलाने की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

सरिता व शेखर के चेहरे आत्म- विश्वास से चमक रहे थे, जैसे उन का खोया सुकून फिर से वापस लौट आया हो.

एक प्रश्न लगातार

रजाई में मुंह लपेटे केतकी फोन की घंटी सुन तो रही थी पर रिसीवर उठाना नहीं चाहती थी सो नींद का बहाना कर के पड़ी रही. बाथरूम का नल बंद कर रोहिणी ने फोन उठाया रिसीवर रखने की आवाज सुनते ही जैसे केतकी की नींद खुल गई हो, ‘‘किस का फोन था, ममा?’’

‘‘कमला मौसी का.’’

यह नाम सुनते ही केतकी की मुख- मुद्रा बिगड़ गई.

रोहिणी जानती है कि कमला का फोन करना, घर आना बेटी को पसंद नहीं. उस की स्वतंत्रता पर अंकुश जो लग जाता है.

‘‘आने की खबर दी होगी मौसी ने?’’

‘‘कालिज 15 तारीख से बंद हो रहे हैं, एक बार तो हम सब से मिलने आएगी ही.’’

‘‘ममा, 10 तारीख को हम लोग पिकनिक पर जा रहे हैं. मौसी को मत बताना, नहीं तो वह पहले ही आ धमकेंगी.’’

‘‘केतकी, मौसी के लिए इतनी कड़वाहट क्यों?’’

‘‘मेरी जिंदगी में दखल क्यों देती हैं?’’

‘‘तुम्हारी भलाई के लिए.’’

‘‘ममा, मेरे बारे में उन्हें कुछ भी मत बताना,’’ और वह मां के गले में बांहें डाल कर झूल गई.

‘‘तुम जानती हो केतकी, तुम्हारी मौसी कालिज की प्रिंसिपल है. उड़ती चिडि़या के पंख पहचानती है.’’

‘अजीब समस्या है, जो काम ये लोग खुद नहीं कर पाते मौसी को आगे कर देते हैं. इस बार मैं भी देख लूंगी. होंगी ममा की लाडली बहन. मेरे लिए तो मुसीबत ही हैं और जब मुसीबत घर में ही हो तो क्या किया जाए, केतकी मन ही मन बुदबुदा उठी, ‘पापा भी साली साहिबा का कितना ध्यान रखते हैं. वैसे जब भी आती हैं मेरी खुशामदों में ही लगी रहती हैं. मुझे लुभाने के लिए क्या बढि़याबढि़या उपहार लाती हैं,’ और मुंह टेढ़ा कर के केतकी हंस दी.

‘‘अकेले क्या भुनभुना रही हो, बिटिया?’’

‘‘मैं तो गुनगुना रही थी, ममा.’’

मातापिता के स्नेह तले पलतीबढ़ती केतकी ने कभी किसी अभाव का अनुभव नहीं किया था. मां ने उस की आजादी पर कोई रोक नहीं लगाई थी. पिता अधिकाधिक छूट देने में ही विश्वास करते थे, ऐसे में क्या बिसात थी मौसी की जो केतकी की ओर तिरछी आंख से देख भी सकें.

इस बार गरमियों की छुट्टियों में वह मां के साथ लखनऊजाएंगी. मौसी ने नैनीताल घूमने का कार्यक्रम बना रखा था. कालिज में अवकाश होते ही तीनों रोमांचक यात्रा पर निकल गईं. रोहिणी और कमला के जीवन का केंद्र यह चंचल बाला ही थी.

नैनी के रोमांचक पर्वतीय स्थल और वहां के मनोहारी दृश्य सभी कुछ केतकी को अपूर्व लग रहे थे.

‘‘ममा, आज मौसी बिलकुल आप जैसी लग रही हैं.’’

‘‘मेरी बहन है, मुझ जैसी नहीं लगेगी क्या?’’

इस बीच कमला भी आ बैठी. और बोली, ‘‘क्या गुफ्तगू चल रही है मांबेटी में?’’

‘‘केतकी तुम्हारी ही बात कर रही थी.’’

‘‘क्या कह रही हो बिटिया, मुझ से कहो न?’’ कमला केतकी की ओर देख कर बोली.

‘‘मौसी, यहां आ कर आप प्रिंसिपल तो लगती ही नहीं हो.’’

सुन कर दोनों बहनें हंस दीं.

‘‘इस लबादे को उतार सकूं इसीलिए तो तुम्हें ले कर यहां आई हूं.’’

‘‘आप हमेशा ऐसे ही रहा करें न मौसी.’’

‘‘कोशिश करूंगी, बिटिया.’’

खामोश कमला सोचने लगी कि यह लड़की कितनी उन्मुक्त है. केतकी की कही गई भोली बातें बारबार मुझे अतीत की ओर खींच रही थीं. कैसा स्वच्छंद जीवन था मेरा. सब को उंगलियों पर नचाने की कला मैं जानती थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि शस्त्र सी मजबूत मेरे जैसी युवती कचनार की कली सी नाजुक बन गई.

सच, कैसी है यह जिंदगी. रेलगाड़ी की तरह तेज रफ्तार से आगे बढ़ती रहती है. संयोगवियोग, घटनाएंदुर्घटनाएं घटती रहती हैं, पर जीवन कभी नहीं ठहरता. चाहेअनचाहे कुछ घटनाएं ऐसी भी घट जाती हैं जो अंतिम सांस तक पीछा करती हैं, भुलाए नहीं भूलतीं और कभीकभी तो जीवन की बलि भी ले लेती हैं.

अच्छा घरवर देख कर कमला केमातापिता उस का विवाह कर देना चाहते थे पर एम.ए. में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने पर स्कालरशिप क्या मिली, उस के तो मानो पंख ही निकल आए. पीएच.डी. करने की बलवती इच्छा कमला को लखनऊ खींच लाई. यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर मुकेश वर्मा के निर्देशन में रिसर्च का काम शुरू किया. 2 साल तक गुरु और शिष्या खूब मेहनत से काम करते रहे. तीसरे साल में दोनों ही काम समाप्त कर थीसिस सबमिट कर देना चाहते थे.

‘कमला, इस बार गरमियों की छुट्टियों में मैं कोलकाता नहीं जा रहा हूं. चाहता हूं, कुछ अधिक समय लगा कर तुम्हारी थीसिस पूरी करवा दूं.’

‘सर, अंधा क्या चाहे दो आंखें. मैं भी यही चाहती हूं.’

थीसिस पूरी करने की धुन में कमला सुबह से शाम तक लगी रहती. कभीकभी काम में इतनी मग्न हो जाती कि उसे समय का एहसास ही नहीं होता और रात हो जाती. साथ खाते तो दोनों में हंसीमजाक की बातें भी चलती रहतीं. रिश्तों की परिभाषा धीरेधीरे नया रूप लेने लगी थी. प्रो. वर्मा अविवाहित थे. कमला को विवाह का आश्वासन दे उन्होंने उसे भविष्य की आशाओं से बांध लिया. धीरेधीरे संकोच की सीमाएं टूटने लगीं.

‘कितना मधुर रहा हमारा यह ग्रीष्मावकाश, समय कब बीत गया पता ही नहीं चला.’

‘अवकाश समाप्त होते ही मैं अपनी थीसिस प्रस्तुत करने की स्थिति में हूं.’

‘हां, कमला, ऐसा ही होगा. मेरे विभाग में स्थान रिक्त होते ही तुम्हारी नियुक्ति मैं यहीं करवा लूंगा, फिर अब तो तुम्हें रहना भी मेरे साथ ही है.’

इन बातों से मन के एकांतिक कोनों में रोमांस के फूल खिल उठते थे. जीवन का सर्वथा नया अध्याय लिखा जा रहा था.

‘तुम्हारी थीसिस सबमिट हो जाए तो मैं कुछ दिन के लिए कोलकाता जाना चाहता हूं.’

‘नहीं, मुकेश, अब मैं तुम्हें कहीं जाने नहीं दूंगी.’

‘अरी पगली, परिवार में तुम्हारे शुभागमन की सूचना तो मुझे देनी होगी न.’

‘सच कह रहे हो?’

‘क्यों नहीं कहूंगा?’

‘मुकेश, किस जन्म के पुण्यों का प्रतिफल है तुम्हारा साथ.’

‘तुम भी कुछ दिन के लिए घर हो आओ, ठीक रहेगा.’

परिवार में कमला का स्वागत गर्मजोशी से हुआ. पहले दिन वह दिन भर सोई. मां ने सोचा बेटी थकान उतार रही है. फिर भी उन्हें कुछ ठीक नहीं लग रहा था. अनुभवी आंखें बेटी की स्थिति ताड़ रही थीं. एक सप्ताह बीता, मां ने डाक्टर को दिखाने की बात उठाई तो कमला ने खुद ही खुलासा कर दिया.

‘विवाह से पहले शारीरिक संबंध… बेटी, समाज क्या सोचेगा?’

‘मां, आप चिंता न करें. हम दोनों शीघ्र ही विवाह करने वाले हैं. वैसे मुझे लखनऊ यूनिवर्सिटी में लेक्चररशिप भी मिल गई है. मुकेश भी वहीं प्रोफेसर हैं. मैं आज ही फोन से बात करूंगी.’

‘जरूर करना बेटी. समय पर विवाह हो जाए तो लोकलाज बच जाएगी.’

कमला ने 1 नहीं, 2 नहीं कम से कम 10 बार नंबर डायल किए, पर हर बार रांग नंबर ही सुनना पड़ा. वह बहुत दिनों तक आशा से बंधी रही. समय बीतता जा रहा था. उस की घबराहट बढ़ती जा रही थी. बड़ी बहन रोहिणी भी चिंतित थी. वह उसे अपने साथ पटना ले आई. नर्सिंग होम में भरती करने के दूसरे दिन ही उस ने एक कन्या को जन्म दिया. पर वह कमला की नहीं रोहिणी की बेटी कहलाई. सब ने यही जाना, यही समझा. इस तरह समस्या का निराकरण हो गया था. मन और शरीर से टूटी विवश कमला ड्यूटी पर लौट आई.

निसंतान रोहिणी को विवाह के 15 वर्ष बाद संतान सुख प्राप्त हुआ था. उस का आंगन खुशियों से महक उठा. बहुत प्रसन्न थी वह. कमला की पीड़ा भी वह समझती थी. सबकुछ भूल कर वह विवाह कर ले, अपनी दुनिया नए सिरे से बसा ले, यही चाहती थी वह. सभी ने बहुत प्रयत्न किए पर सफल नहीं हो पाए.

अवकाश समाप्त होने के कई महीनों बाद भी मुकेश नहीं लौटा था. बाद में उस के नेपाल में सेटिल होने की बात कमला ने सुनी थी. उस दिन वह बहुत रोई थी, पछताई थी अपनी भावुकता पर. आवेश में पुरुष मानसिकता को लांछित करती तो स्वयं भी लांछित होती. अत: जीवन को पुस्तकालय ही हंसतीबोलती दुनिया में तिरोहित कर दिया.

कभी अवकाश में दीदी के पास चली जाती, पर केतकी ज्योंज्यों बड़ी हो रही थी उसे मौसी का आना अखरने लगा था. वह देखती, समाज की वर्जनाओं की परवा न कर के जीजाजीजी ने बिटिया को पूरी छूट दे रखी है. आधुनिक पोशाकें डिस्को, ब्यूटीपार्लर, सिनेमा, थियेटर कहीं कोई रोकटोक नहीं थी. इतना सब होने पर भी वे बेटी का मुंह जोहते, कहीं किसी बात से राजकुमारी नाराज तो नहीं.

‘‘इस बार जन्मदिन पर मुझे कार चाहिए, पापा,’’ बेटी के साहस पर चकित थी रोहिणी. मन ही मन वह जानती थी कि जिस शक्ति का यह अंश है, संसार को उंगली पर नचाने की ऐसी ही क्षमता उस में भी थी. युवा होती केतकी के व्यवहार में रोहिणी को कमला की झलक दिखाई देती.

ऐसी ही हठी थी वह भी. मनमाना करने को छटपटाती रहती. हठ कर के लखनऊ चली आई. बेटी को त्यागने का निश्चय एक बार कर लिया तो कर ही लिया. पर आंख से ही दूर किया है, मन से कैसे हटा सकती है. अभी इस के एम.बी.बी.एस. पूरा करने में 2 वर्ष बाकी हैं. पर अभी से अच्छे जीवनसाथी की तलाश में जुटी हुई है. कैसे समझाऊं कमला को? कब तक छिपाए रखेंगे हम यह सबकुछ. एक न एक दिन तो वह जान ही जाएगी सब. सहसा केतकी के आगमन से उस के विचारों की शृंखला टूटी.

‘‘ममा, आप मेरे बारे में हर बात की राय मौसी से क्यों लेती हैं? माना वह कालिज में पढ़ाती हैं पर मैं जानती हूं कि वह आप से ज्यादा समझदार नहीं हैं.’’

‘‘मां को फुसलाने का यह बढि़या तरीका है.’’

‘‘नहीं, ममा, मैं सच कहती हूं. वह आप जैसी हो ही नहीं सकतीं. आप के साथ कितना अच्छा लगता है. और मौसी तो आते ही मुझे डिस्पिलिन की रस्सियों से बांधने की चेष्टा करने लगती हैं.’’

‘‘केतकी, कमला मुझे तुम्हारे समान ही प्रिय है. मेरी छोटी बहन है वह.’’

‘‘आप की बहन हैं, ठीक है पर मेरी जिंदगी के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं?’’

‘‘बिटिया सोचसमझ कर बोला कर. मौसी का अर्थ होता है मां सी.’’

‘‘सौरी, ममा, इस बार आप की बहन को मैं भी खुश रखूंगी.’’

वातावरण हलका हो गया था.

आज मौसम बहुत सुहाना था. लौन की हरी घास कुछ ज्यादा ही गहरी हरी लग रही थी. सफेद मोतियों से चमकते मोगरे के फूल चारों ओर हलकीहलकी मादक सुगंध बिखेर रहे थे. सड़क को आच्छादित कर गुलमोहर के पेड़ फूलों की वर्षा से अपनी मस्ती का इजहार कर रहे थे. प्रकृति का शीतल सान्निध्य पा कर कमला की मानसिक बेचैनी समाप्त हो गई थी. चाय की प्यालियां लिए रोहिणी पास आ बैठी.

‘‘क्या सोच रही हो, कमला?’’

‘‘कुछ नहीं, दीदी, ऊपर देखो, सफेद बगलों का जोड़ा कितनी तेजी से भागा जा रहा है.’’

‘‘अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी है इन को. क्या तुम नहीं जानतीं कि संध्या ढल रही है और शिशु नीड़ों से झांक रहे होंगे,’’ इतना कह कर रोहिणी खिलखिला दी.

‘‘जानती हूं दीदी, लेकिन जिस का कोई गंतव्य ही न हो वह कहां जाए? किनारे के लिए भटकती लहरों की तरह मंझधार में ही मिट जाना उस की नियति होती होगी.’’

‘‘ऐसा क्यों सोचती हो, कमला. तुम्हारा वर्तमान तुम्हारा गंतव्य है. चाहो तो अब भी बदल सकती हो इस नियति को.’’

‘‘नहीं, दीदी, मुक्त आकाश ही मेरा गंतव्य है, अब तो यही अच्छा लगता है मुझे.’’

कमला एकदम सावधान हो गई. पिछले कई महीनों से जीजाजी विवाह के लिए जोर डाल रहे हैं. मस्तिष्क में विचार गड्डमड्ड होने लगे. जीजी, आज फिर उस बैंक मैनेजर का किस्सा ले बैठेंगी. जीवन के सुनिश्चित मोड़ पर मिला साथी जब छल कर जाए तो कैसा कसैला हो जाता है संपूर्ण अस्तित्व.

‘‘केतकी को देखती हूं तो अविश्वास का अंधकार मेरे चारों ओर लिपट जाता है. इस मासूम का क्या अपराध? जीजी, तुम्हारा दिल कितना बड़ा है. मेरे जीवन की आशंका को तुम ने अपनी आशा बना लिया. मुकेश की सशक्त बांहों के आश्रय में कितना कुछ सहेज लिया था मैं ने, पर मुट्ठी से झरती रेत की तरह सब बह गया.’’

रात की कालिमा पंख फैलाने लगी थी. कमला के जेहन में बीती घटनाएं केंचुओं की तरह जिस्म को काटती हुई रेंग रही थीं. कैसेकैसे आश्वासन दिए थे मुकेश ने. प्रगतिशील पुरुष का प्रतिबिंब उस का व्यक्तित्व जैसे ‘डिसीव’ शब्द ही नहीं जानता था. मेरी आशंकाओं को निर्मल करने के लिए अपने स्तर पर वह इस शब्द का अस्तित्व ही मिटा देना चाहता था. अंत में क्या हुआ. दोहरे व्यक्तित्व का नकाबपोश. बहुत देर तक रोती रही कमला.

कभी अनजाने में ही मुकेश की उपस्थिति कमला के आसपास मंडराने लगती. तब वह बहुत बेचैन हो जाती, जैसे कोई खूनी शेर तीखे पंजों से उस के कोमल शरीर को नोच रहा हो. सबकुछ बोझिल और उदास लगने लगता. दुनिया को पैनी निगाहों से परखने वाली कमला सोचती, इस संसार में चारों ओर कितना सुख बिखरा है पर दुख की भी तो कमी नहीं है. ऐसे में कवि पंत की ये पंक्तियां वह अकसर गुनगुनाने लगती : ‘जग पीडि़त है अति सुख से जग पीडि़त है अति दुख से.

मानव जग में बंट जाए सुख दुख से, दुख सुख से.’

अंधकार बढ़ रहा था, वातावरण पूरी तरह से नीरव था. कमला बुदबुदा रही थी, अपने ही शब्द सुन रही थी. केतकी को क्या समझूं एक दिन के लिए भी मैं इसे अपना न कह सकी. दीदी सहारा न देतीं तो इस उपेक्षित बाला का भविष्य क्या होता? कितनी खुश है यहां. यह तो उन्हें ही वास्तविक मातापिता समझती है.

एम.बी.बी.एस. की परीक्षा केतकी ने स्वर्णपदक के साथ उत्तीर्ण की. हर बात की टोह रखने वाली कमला अगले ही दिन पटना पहुंच गई. केतकी हैरान रह गई.

‘‘ममा, यह आप ने क्या किया? कल रिजल्ट आया और आज आप ने मौसी को बुला भी लिया.’’

‘‘तुम्हारी पीठ ठोकने चली आई. उसे कैसे रोकती मैं.’’

कमला ने केतकी को हृदय से लगा लिया. मौसी की आंखों में अपने लिए आंसू देख कर वह चकित थी.

‘‘यह क्या? आप रो रही हैं?’’

‘‘पगली, खुशी के भी आंसू होते हैं. होते हैं न?’’ गाल को उंगली से छू कर कहा कमला ने, ‘‘मैं तुम्हें ताज में पार्टी दूंगी बिटिया. तुम अपने दोस्तों को भी खबर कर दो. मैं उन सब से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘सच मौसी, आप को अच्छा लगेगा?’’

‘‘क्यों नहीं? मेरी लाडली अब डाक्टर है, अबोध बच्ची नहीं.’’

कमला बहुत खुश थी. पार्टी चल रही थी. बहुत से जोडे़ हंस रहे थे. आपस में बतिया रहे थे. उसी दिन कमला ने देखा केतकी और कुणाल के हावभाव में झलकता निच्छल अनुराग.’’

‘‘कमला, केतकी और कुणाल के संबंधों की बात मैं खुद ही तुम्हें बताना चाहती थी पर कह न पाई,’’ रोहिणी बोली, अब तुम ने सब देख लिया है. अच्छा हो इस बार यह संबंध तय कर के जाओ.

‘‘जीजी, यह अधिकार आप का है.’’

‘‘तुम्हारी स्वीकृति आवश्यक है.’’

‘‘दीदी, कुणाल को मैं जानती हूं. मेरी क्लासमेट अनुराधा का बेटा है वह, बहुत भला और संस्कारी परिवार है. आप कहें तो कल अनु को बुला लूं.’’

‘‘क्यों नहीं, मैं तुम्हारे चेहरे पर खुशी की रेखा देखना चाहती हूं.’’

कमला ने कालिज से एक माह का अवकाश ले लिया था. विवाह खूब धूमधाम से संपन्न हुआ. कमला लखनऊ लौट गई. अपने कमरे के एकांत में वर्षों बाद उस ने मुकेश का नाम लिया था पर लगा जैसे चारों ओर कड़वाहट फैल गई हो. चाहत में डुबो कर तुम ने मुझे छला मुकेश और तुम्हारे राज को मैं ने 24 वर्ष तक हृदय की कंदरा में छिपाए रखा. मैं केतकी को तुम्हारी बेटी कभी नहीं कहूंगी. तुम इस योग्य हो भी नहीं. पता नहीं रिसर्च और सर्विस का झांसा दे कर तुम ने मेरे जैसी कितनी अबोध युवतियों के साथ यह खेल खेला होगा. बेटी के सुखी भविष्य के लिए मैं उसे तुम्हारा नाम नहीं बताऊंगी.

‘‘ममा, मौसी का फोन है.’’

‘‘दीदी, मैं कल ही कालिज का ट्रिप ले कर कुल्लूमनाली जा रही हूं. 10 दिन का टूर है. हां, केतकी कैसी है?’’

‘‘दोनों बहुत खुश हैं. तुम अपना ध्यान रखना.’’

‘‘ठीक है, जीजी,’’ कह कर कमला फोन पर खिलखिला कर हंसी थी. रोहिणी को लगा कि बेटी का घर बस जाने की खुशी थी यह.

नियत तिथि पर टूर समाप्त हुआ. केतकी के लिए ढेरों उपहार देख रोहिणी चकित थी कि हर समय इस के दिल में केतकी बसी रहती है.

अवकाश समाप्त होने में अभी 10 दिन शेष थे. कमला दीदी और केतकी के साथ घर पर रहने के मूड में थी. पर आने के 2 दिन बाद ही कमला को ज्वर हो आया. डा. केतकी ने दिनरात परिचर्या की. कोई सुधार होता न देख कर दूसरे डाक्टर साथियों से भी सहायता ली उस ने.

‘‘जीजी, लगता है अब यह ज्वर नहीं जाएगा. मेरा अंत आ पहुंचा है.’’

‘‘ऐसा मत कहो, कमला. अभी तुम्हें केतकी के लिए बहुत कुछ करना है.’’

‘‘समय क्या किसी के रोके रुका है, जो मैं उसे रोक लूंगी. दीदी, केतकी को बुला दीजिए.’’

‘‘वह तो यहीं बैठी है तुम्हारे पास.’’

‘‘बेटी, यह जरूरी कागज हैं तुम्हारे और कुणाल के लिए. इन्हें संभाल कर रख लेना.’’

‘‘यह क्या हो रहा है ममा? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा.’’

‘‘कमला, केतकी कुछ जानना चाहती है.’’

‘‘जीजी, आप सब जानती हैं, जितना ठीक समझो बता देना. मेरे पास अब समय नहीं है.’’

कमला ने अंतिम सांस ली. तड़प उठी केतकी. पहली बार रोई थी वह उस अभागी मां के लिए, जो जीवन रहते बेटी को बेटी कह कर छाती से न लगा सकी.

: सावित्री रांका

विदेशी मीडिया में उठा एयर स्ट्राइक पर सवाल

अमरीकी न्यूज पब्लिकेशन ‘फौरेन पौलिसी’ ने अनाम अमरीकी रक्षाधिकारियों के हवाले से यह खबर दी है कि भारत ने 27 फरवरी को पाकिस्तान से हुए संघर्ष के दौरान अपने लड़ाकू विमान से पाकिस्तानी एफ-16 विमान को मार गिराने का जो दावा किया था, वह गलत है क्योंकि पाकिस्तानी की वायुसेना में मौजूद एफ-16 विमानों में कोई भी विमान मिसिंग नहीं है. चार अप्रैल को प्रकाशित रिपोर्ट में पब्लिकेशन ने कहा, “हालात की सीधी जानकारी रखने वाले अमरीका के दो वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों ने ‘फौरेन पौलिसी’ को बताया कि अमरीकी अधिकारियों ने हाल ही में पाकिस्तान के एफ-16 विमानों की गिनती की है और वहां कोई भी विमान गायब नहीं पाया गया है.” गौरतलब है कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ एफ-16 लड़ाकू विमान के इस्तेमाल से तभी इंकार किया था.

26 फरवरी को पाकिस्तान के बालाकोट में स्थित आतंकवादी ट्रेनिंग कैम्प पर भारतीय वायुसेना द्वारा किये गये एयर स्ट्राइक से अगले दिन भारतीय वायुसेना के पायलट अभिनंदन वर्धमान ने एक पाकिस्तानी लड़ाकू विमान एफ-16 को मार गिराया था. कहा गया था कि यह पाकिस्तानी विमान भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की ताक में था. इस संघर्ष में अभिनंदन वर्धमान का विमान भी क्षतिग्रस्त होकर गिरा और अभिनंदन वर्धमान नियंत्रण रेखा के पार जाकर उतरे. वह तीन दिन पाकिस्तान की हिरासत में रहे और फिर अन्तरराष्ट्रीय दबाव में उन्हें भारत को लौटाया गया.

भारतीय वायुसेना ने 28 फरवरी को सबूत के तौर पर AMRAAM मिसाइल के टुकड़े दिखाये थे, जिन्हें पाकिस्तानी एफ-16 विमान से दागा बताया गया था. लेकिन उससे इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि अभिनंदन वर्धमान ने पाकिस्तानी एफ-16 विमान को मार गिराया था, जैसा भारत सरकार और भारतीय वायुसेना बार-बार दावा करती रही. पत्रिका ‘फौरेन पौलिसी’ के अनुसार, पाकिस्तान ने इस घटना के बाद अमरीका को खुद पाकिस्तान आकर एफ-16 विमानों की गिनती कर लेने की पेशकश की थी,  जैसा इस सैन्य बिक्री समझौते की शर्तों में दर्ज था. ‘फौरेन पौलिसी’ की लारा सैलिगमैन के मुताबिक, “पाकिस्तान के एफ-16 विमानों की अमरीका द्वारा की गयी गिनती में सभी विमान मौजूद पाये गये, जो भारत के उस दावे से पूरी तरह विरोधाभासी है कि उसने फरवरी में हुए संघर्ष में एक लड़ाकू विमान मार गिराया था…”

‘फौरेन पौलिसी’ के मुताबिक, “मुमकिन है कि संघर्ष के दौरान मिग-21 बाइसन में सवार अभिनंदन वर्धमान ने पाकिस्तानी एफ-16 पर निशाना लौक कर लिया हो, मिसाइल दागी भी हो, और उन्हें वास्तव में लगता हो कि उनका निशाना अचूक रहा. लेकिन पाकिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा की गयी गिनती भारत के पक्ष पर शक पैदा करती है और संकेत देती है कि भारतीय अधिकारियों ने संभवत: अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उस दिन की घटनाओं के बारे में गुमराह किया…”

यह रिपोर्ट ऐसे वक्त में सामने आयी है, जब भारत में लोकसभा चुनाव 2019 के लिए मतदान कुछ ही दिन में शुरू होने जा रहा है. विपक्षी दलों ने पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में बालाकोट पर किये गये हवाई हमले को अपने प्रचार भाषणों में इस्तेमाल करने का आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं पर लगाया है.

स्पा और बौडी पौलिशिंग

बड़े शहरों की ही तरह से अब छोटे शहरो की लाइपफ स्टाइल भी बदल रही है. युवाओं में ही नहीं शादीशुदा महिलाओं और पुरूषों में भी अपनी ब्यूटी और स्टाइल को लेकर क्रेज बड रहा है. 40 प्लस की महिलाओं में अपनी ब्यूटी और हेल्थ को लेकर क्रेज बढ रहा है. यही वजह है कि अब स्पा और बौडी पौलिशिंग का सबसे अध्कि प्रयोग वह कर रही है. महिलाओं में हो रहे ब्यूटी प्रेजेंटस इसको और भी अधिक क्रेजी बनाते जा रहे है. स्पा और बौडी पौलिशिंग सेंटर भी तमाम तरह के पैकेज लेकर आ रहे है. जिसकी वजह से स्पा और बौडी पौलिंशग सेंटर तेजी से बढते जा रहे हैं.

आज काम के घंटे लगातार बढ रहे है. इससे पूरे शरीर के साथ मांइड को भी रिलैक्स की जरूरत होती है. बडी बडी कंपनियों के लोग जब काम करके थक जाते हैं तो स्पा ट्रीटमेंट के जरीये वह अपने आपको दोबारा रिचार्ज कर लेते हैं. इसी लिये लगभग सभी बडे होटलों में स्पा की व्यवस्था होती है. स्पा में अलग अलग तरह के ट्रीटमेंट होते है जिनके जरीये कुछ बीमारियों का इलाज भी किया जाता है. होटलों के अलावा अब वेलनेंस सेंटर, जिम, पिफटनेस सेंटर और ब्यूटी सैलून में भी स्पा ट्रीटमेंट की सुविधयें दी जाने लगी है. लखनउ में ‘एस्थेवा ब्यटी एंड हेल्थ क्रियेटर’ की डायरेक्टर अपर्णा मिश्रा कहती है ‘स्पा में सिर से पांव तक का ट्रीटमेंट किया जाता है. इसकी शुरूआत हेड से करते है. सिर पर तेल डालकर मसाज करते हुये रिलैक्स कराने की कोशिश की जाती है. मसाज के लिये एंटी आक्सीडेंट तेल का प्रयोग किया जाता है. इसके बाद बौडी स्पा किया जाता है. यह अलग अलग तरह से होता है. इसका मकसद बौडी को रिपफ्रेश करना होता है’.

बौडी स्पा तरह तरह के

बौडी स्पा अलग अलग तरह से होता है. स्पा करने के लिये सबसे पहले बाॅडी को क्लीन किया जाता है. इसके बाद स्क्रबर लगाकर स्किन को रगडा जाता है. जिससे शरीर के उफपर की मरी हुई त्वचा हटाया जा सके. इसके बाद बौडी पैक लगाकर मसाज किया जाता है. मसाज करने के लिये अपवर्ड स्ट्रोक, जिक जैक मसाज और सरकुलर मसाज का सहारा लिया जाता है. स्पा ट्रीटमेंट शरीर के अलग अलग हिस्सो का अलग अलग भी होता है. स्पा का समय लगभग आध घंटा से 40 मिनट का होता है. इसके बाद बौडी को स्टीम बाथ दिया जाता है. अगर स्टीम बाथ कह सुविध नही है तो टौवल का गर्म करके उससे ही काम चलाया जा सकता है. स्पा अलग अलग तरह का होता है. सबसे ज्यादा अरोम स्पा प्रचलित है. इसके अलावा स्टोन थेरपी, हाइड्रा स्पा, मडपैक थैरेपी और समुद्री नमक स्पा भी होते है. स्पा थेरेपी के दौरान शरीर के एक्यूप्रेशर पर दबाव डालकर बौडी को रिलैक्स करने की कोशिश की जाती है. हाइड्रा स्पा में बाथटब में पानी के प्रेशर का प्रयोग किया जाता है. इसी तरह समुद्री नमक स्पा में समुद्र से निकाले गये नमक जिसका नमक चमक भी कहते से शरीर की मालिश की जाती है. इसी तरह कई तरह का मडपैक बीमारियों को दूर रखने में सहायक होता है. जिन लोगों को इस तरह की बीमारियां होती है वह मैडपैक स्पा के जरीये अपना ट्रीटमेंट कराते है. स्पा ट्रीटमेंट कराते समय यह जरूर देखना चाहिये कि यह किसी अच्छी जगह और जानकार हाथों के जरीये ही कराया जाये. नही तो कई बार यह कई बीमारियां भी ले आता है. अच्छी जगह पर ही यह सुविधयें लेनी चाहिये. तभी यह हेल्दी रहती है बौडी.

पौलिशिंग सुंदरता में लाये निखार

वंशिका को मौडलिंग का शौक था. वह जब भी रैम्प शो करने या मौडलिंग के लिये पोज देने के लिये जाती तो दूसरी मौडलों को देखकर लगता जैसे कि उसकी बौडी में चमक नही है. कई बार मेकअप मैन उससे कहता भी था कि आप अपनी बौडी की चमक को बढ़ाने के लिये कुछ कीजिये. वंशिका को समझ नही आ रहा था कि वह क्या करें? उसने अपनी साथी लता से इस बारे में बात की. लता उसको लेकर ब्यूटी क्लीनिक गयी. यहां पर वह खुद सप्ताह में एक बार बौडी पौलिशिंग कराने के लिये आती थी. लता ने उस दिन वंशिका की बौडी पौलिशिंग करायी. ब्यूटी पार्लर से निकल कर जब वंशिका ने अपने को देखा तो उसको यकीन ही नही हुआ कि यह उसकी त्वचा है. लता ने समझाया ‘वंशिका हम अपनी बौडी से पूरे दिन काम लेते है. इससे इसकी चमक खो जाती है. इस पर तमाम तरह का मेकअप होता है उसका असर भी होता है.

त्वचा के रोमछिद्र भर जाते है शरीर में कई तरह के जहरीले पदार्थ भी जमा हो जाते है. जो स्किन की उफपरी त्वचा को डेड कर देते है. बौडी पालिंशिग के जरीये इसको हटाकर स्किन को टोनअप किया जाता है’ . वंशिका को यह बात समझ आ गयी उसने भी तय कर लिया कि हर सप्ताह वह अपनी बौडी पौलिशिंग करायेगी. ‘एस्थेवा ब्यटी एंड हेल्थ क्रियेटर’ की डायरेक्टर अपर्णा मिश्रा कहती है ‘आज के समय में काम करने के तौर तरीके बदल गये है. इसका प्रभाव व्यक्ति की पूरी बौडी पर पडता है. खासतौर पर इससे स्किन बहुत प्रभावित होती है. स्किन की नेचुरल नमी और चमक खो जाती है. बौडी पालिंशिग मसाज के द्वारा इसको दोबारा पाया जा सकता है. साधरण तौर पर बौडी पौलिशिंग माह में एक बार करानी चाहिये.

अगर आप पफैशन जगत से जुडे है जहां पर बौडी स्किन पर ज्यादा प्रभाव पडता है. इस हालत में सप्ताह में एक बार बौडी पौलिशिंग जरूर करानी चाहिये. ब्राइडल मेकअप के दौरान भी बौडी पौलिशिंग करानी चाहिये. इससे पूरे शरीर की सुंदरता में और भी ज्यादा निखार आता है.

बौडी पौलिशिंग

बौडी पौलिशिंग स्किन को टोनअप करने के लिये कि जाती है. इसके लिये सबसे पहले बौडी को पूरी तरह से क्लीन किया जाता है. अगर कही पर बाल है तो वैक्स किया जाता है. इसके बाद क्लिजंर लगाकर बौडी को कुछ देर के लिये छोड देते है. लगभग 20 मिनट के बाद बौडी पर अच्छी किस्म का स्क्रबर उसकी मरी हुई त्वचा का निकाल दिया जाता है. जब बौडी की यह मरी हुई त्वचा निकल जाती है तो बौडी क्रीम लगाकर मसाज किया जाता है. मसाज के लिये कभी कभी मसाजर का प्रयोग भी किया जाता है.

इसके अलावा रोलर मसाज और ओजोन मसाज भी दिया जाता है. मसाज के बाद बौडी के हिसाब से चुना हुआ पैक लगायाल जाता है. 20 मिनट के बाद स्टीमबाथ देकर बौडी पर माश्चराइजर लगाया जाता है. बौडी का वह हिस्सा जो खुले में रहता है जहां पर धूप का ज्यादा असर होता है उसको साफ करने के लिये कई बार इस काम को करना होता है.

बौडी पौलिशिंग कभी बडे शहरों में ही रहने वालो का शौक माना जाता था. अब ऐसा नही है. लखनउ जैसे बदल रहे शहरों भी लोग धडल्ले से बौडी पौलिशिंग कराने लगे है. अपर्णा मिश्रा कहती है कि 25 साल से 45 साल के बीच वाली उम्र की महिलाएं यहां पर ज्यादा आती है. उनको लगता है कि पार्टी और दूसरी जगहो में जाने पर उनकी स्किन सबसे चमकदार और टोनअप दिखें. यह लोग बौडी पौलिशिंग कराने के बाद बहुत ही खुश होकर जाते है. जब से प्राइवेट कंपनियों ने अपने यहां लोगो को नौकरी देना शुरू किया है. एक कारपोरेट कल्चर आया है बौडी पौलिशिंग जरूरत बन गयी है. इससे कई बार स्किन संबंधी कई तरह की बीमारियां भी दूर हो जाती है.

नरेंद्र मोदी से खौफ खाते हैं लालकृष्ण आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी को बेवजह भाजपा का भीष्म पितामह नहीं कहा जाता उनका व्यक्तित्व और आचरण दोनों सचमुच में द्वापर के भीष्म से मेल खाते हैं. भीष्म विद्वान था, नीति का ज्ञाता था, साहसी योद्धा था लेकिन न्याय प्रिय नहीं था क्योंकि दुर्योधन के प्रति उसकी आसक्ति उसके तमाम गुणों पर भारी पड़ती थी. वह कभी दुर्योधन के अन्याय और मनमानी का खुलकर विरोध नहीं कर पाया. प्रसंग चाहे फिर द्रौपदी के चीरहरण का रहा हो या फिर पांडवों को परेशान कर छल कपट से उनके राजपाट छीनने का, भीष्म का समर्थन हमेशा दुर्योधन के साथ रहा. धर्म और नीति का राग अलापते रहने बाले भीष्म की हिम्मत कभी उसका विरोध करने की नहीं पड़ी और इसी मोह के चलते वह दुर्योधन के हर गलत काम का सहभागी बना.

आज भी यही हो रहा है लालकृष्ण आडवाणी का ताजा चर्चित ट्वीट कोई क्रांतिकारी या हाहाकारी वक्तव्य नहीं है बल्कि नरेंद्र मोदी का समर्थन और प्रचार ही है कि हर वो शख्स जो भाजपा की नीतियों रीतियों से इत्तफाक नहीं रखता वह देशद्रोही ही है. आडवाणी का मकसद नरेंद्र मोदी का विरोध नहीं बल्कि हताश होती भाजपा को यह संदेश देना है कि नरेंद्र मोदी अगर चुनाव को हिन्दुत्व के इर्द गिर्द समेटने की कोशिश कर रहे हैं तो पार्टीजन उनका साथ दें जिससे भाजपा दौबारा सत्ता में आकर हिन्दू राष्ट्र का अपना अधूरा मिशन पूरा कर सके.

जितना कट्टरवाद आडवाणी ने फैलाया है मोदी तो उसका दसवा हिस्सा भी नहीं फैला पाए हैं. 90 के दशक में मंदिर आंदोलन के दौरान हिंदुओं का जितना नुकसान आडवाणी ने किया और हजारों हिंदुओं की ज़िंदगी रामलला के नाम पर कुर्बान करबा दी इस बाबत इतिहास शायद ही उन्हें माफ कर पाएगा. यह वह दौर था जब वे रथ पर सवार होकर हाथ में तीर कमान लेकर और माथे पर मुकुट धारण कर निकलते थे तो हिन्दू समुदाय पगला उठता था और उन पर चंदे की बौछार कर देता था. आडवाणी ने भी खूब हिंदुओं की भावनाओं को भुनाया, भड़काया और दंगे भी करबाए और आखिरकार भाजपा को उसकी असल मंजिल सत्ता तक पहुंचाकर ही दम लिया.

तब कुर्सी की मलाई अटलबिहारी बाजपेयी के हिस्से में आई जो राम मंदिर को आस्था का विषय तो मानते थे लेकिन उसके लिए सड़कों पर आकर फसाद जैसी हल्की हरकतें करना उनकी फितरत में नहीं था. आडवाणी ने तब भी बेमन से मोहरा बनना कुबूल कर लिया था.

2014 में इसका दौहराव यानि आडवाणी के साथ फिर अन्याय हुआ तब भी वे खामोशी से महाभारत सरीखे छल प्रपंच देखते रहा. ऐसा भी नहीं था कि उनमें विरोध का साहस नहीं था बल्कि था ऐसा कि जब आरएसएस और साधु संतों ने उन्हें मोदी की महत्ता बतलाई तो वे फिर सत्ता के रास्ते से हट गए और कल के गुजराती छोरे को हिन्दू हित में प्रधानमंत्री बन जाने दिया. यह कोई दरियादिली नहीं बल्कि डर और  घोर सांप्रदायिकता थी जिस पर भी वे ख़ासी हमदर्दी बटोर ले गए थे.

आज भी वे सांप्रदायिकता ही फैला रहे हैं उनके ट्वीट के हर कोई अपने हिसाब से माने निकाल रहा है कि यह नरेंद्र मोदी का विरोध है पर हकीकत में यह एक भीष्म का दुर्योधन प्रेम और मोह है जिसे व्यक्त करने का तरीका ऐसा है कि विरोधी भी कहें कि वाह क्या बात है.

जो हमसे असहमत वे दुश्मन या देशद्रोही नहीं, ये 8 शब्द ही उनकी कुत्सित मंशा प्रदर्शित करते हुये हैं कि हमसे से तात्पर्य हिन्दुत्व से ही है और अब मोदी उसका न्रेतृत्व कर रहे हैं. भाजपा अपने हिंदूवादी एजेंडे से भटकी नहीं है यह जताने यह मुनासिब वक्त भी है क्योंकि नरेंद्र मोदी कमजोर पड़ रहे हैं. उनकी टीम में आदित्यनाथ के अलावा किसी को इजाजत नहीं कि वह नीतिगत बात कहे, हाँ गांधी नेहरू खानदान को कोसते रहने की इजाजत सबको दे दी गई है.

लालकृष्ण आडवाणी ने नरेंद्र मोदी के किसी भी अप्रिय फैसले या राष्ट्रवाद की आलोचना कभी नहीं की क्योंकि वह आरएसएस का एजेंडा है और खुद उनकी भी ख़्वाहिश है कि भारत हिन्दू राष्ट्र बने और उनके देखते ही देखते बने. इस बाबत वे कुछ भी कर सकते हैं हालिया ट्वीट उसी मिशन का हिस्सा है इसमें उनका दर्द, भड़ास या तथाकथित व्यथा ढूंढा जाना निरी मूर्खता है जो कुछ विपक्षी नेता कर भी रहे हैं. ममता बनर्जी और राहुल गांधी शायद ही समझ पाएँ कि यह नरेंद्र मोदी को महिमा मंडित करने की चाल है. दरअसल में यह मोदी का वह खौफ है जो साल 2014 में स्थापित हुआ था इसे विस्तार देकर उसका प्रचार ही आडवाणी कर रहे हैं.

घर पर ऐसे बनाए मैगी पकौड़े

मैगी हर किसी को पसंद होती है. बच्चे तो इसे पसंद करते ही करते हैं, इनके साथ बड़ो को भी मैगी बहुत पसंद होती है. आज हम आपको आप मैगी की स्पेशल डिश बताते हैं और ये स्पेशल डिश है मैगी पकौड़े. तो आइए इसकी रेसिपी जानते हैं.

1 टीस्पून नमक

2 टीस्पून लाल मिर्च पाउडर

45 ग्राम सूजी

35 ग्राम बेसन

2 टेबलस्पून पानी

300 मिली पानी

2 पैकेट मैगी

2 पैकेट मैगी मसाला

70 ग्राम पत्तागोभी

70 ग्राम प्याज

70 ग्राम शिमला मिर्च

25 ग्राम धनिया

बनाने की विधि

एक पैन में पानी डालकर उबालें.

अब इसमें मैगी और मैगी मसाला डालकर अच्छे से मिक्स करें और पकाएं और बाद में बाउल में निकाल लें.

इसमें पत्तागोभी, प्याज, शिमला मिर्च, धनिया, नमक, लाल मिर्च पाउडर, सूजी, बेसन और पानी डालकर अच्छे से मिक्स कर लें.

थोड़ा-सा मिक्सचर लेकर छोटी-छोटी बाल्स बना लें और साइड रख दें.

अब इसे  एक पैन में तेल गर्म कर इन्हें अच्छे से फ्राई करें.

इन्हें तब तक फ्राई करें जब तक इनका रंग हल्का गोल्डन ब्राउन न हो जाएं.

मैगी पकौड़े तैयार हैं और इसे गर्मागर्म परोसें.

राजनीति में महिलाएं आज भी हाशिए पर

औरतों को राजनीति में हिस्सेदारी देने की बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं. ममता बनर्जी ने 2019 के चुनावों में 40% सीटें औरतों को दी हैं. राहुल गांधी ने वादा किया है कि अगर जीते तो लोकसभा व विधानसभाओं में एकतिहाई सीटों पर औरतों का आरक्षण होगा. 2014 के चुनावों में बड़ी पार्टियों के 1,591 उम्मीदवारों में सिर्फ 146 औरतें थीं. लोकसभा हो या विधानसभाएं औरतें इक्कादुक्का ही दिखती हैं.

वैसे यह कोई चिंता की बात नहीं है. राजनीति कोई ऐसा सोने का पिटारा नहीं कि औरतें उसे घर ले जा कर कुछ नया कर सकती हैं. राजनीति राजनीति है और आदमी हो या औरत, फैसले तो उसी तरह के होते हैं. इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहीं और सोनिया गांधी प्रधानमंत्री सरीखी रहीं पर देश में कोई क्रांति उन की वजह से आई हो यह दावा करना गलत होगा. मायावती से दलितों व औरतों का उद्धार नहीं हुआ और ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को औरत की स्वर्णपुरी नहीं बना डाला.

जैसे बच्चों या बूढ़ों की गिनती राजनीति में नहीं होती वैसे ही अगर औरतों की भी न हो तो कोई आसमान नहीं टूटेगा. जरूरत इस बात की है कि सरकारी फैसले औरतों के हित में हों जो पुरुष भी उसी तरह कर सकते हैं जैसे औरतें कर सकती हैं.

औरतों के राजनीति में प्रवेश पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए और वह है भी नहीं. औरतों को वोट देने का हक भी है. वे अगर हल्ला मचाती हैं तो सरकारी निर्णयों में उस की छाप देखी जा सकती है. कमी तो इस बात की है कि औरतों को समाज में वह बराबर का स्थान नहीं मिल रहा है जिस की वे हकदार हैं और जिसे वे पा सकती हैं.

इस में रोड़ा धर्म है. धर्म ने औरतों को चतुराई से पटा रखा है. उन्हें तरहतरह के धार्मिक कार्यों में उलझाया रखा जाता है. राजनीति तो क्या घरेलू नीति में भी उन का स्थान धर्म ने दीगर कर दिया है. धर्म उपदेशों में औरतों को नीचा दिखाया गया है. चाहे कोई भी धर्म हो धार्मिक व्याख्यान आदमी ही करते फिरते हैं. हर धर्म की किताबें औरतों की निंदाओं से भरी हैं और उस की पोल खोलने की हिम्मत राजनीति में कूदी औरतों तक में नहीं है.

अगर औरतों को काम की जगह, घरों में, बाजारों में, अदालतों में सही स्थान मिलना शुरू हो जाए तो राजनीति में वे हों या न हों  कोई फर्क नहीं पड़ता. उन की सांसदों में चाहे जितनी गिनती हो पर अगर उन्हें फैसले आदमियों के बीच रह कर उन के हितों को देखते हुए लेने हैं तो उन की 40 या 50% मौजूदगी भी कोई असर नहीं डालेगी.

औरतों की राजनीति में भागीदारी असल में एक शिगूफा या जुमला है जिसे बोल कर वोटरों को भरमाने की कोशिश की जाती है. अगर राजनीति में औरतों की भरमार हो भी गई तो भी भारत जैसे देश में तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जहां धर्म व सामाजिक रीतिरिवाजों के सहारे उन्हें आज भी पुराने तरीकों से घेर रखा है. बाल कटी, पैंट पहने, स्कूटी पर फर्राटे से जाती लड़की को भी आज चुन्नी से अपना चेहरा बांध कर चलना पड़ रहा है ताकि कोई छेड़े नहीं. आज भी लड़की अपनी पसंद के लड़के के साथ घूमफिर नहीं सकती, शादी तो बहुत दूर की बात है.

औरतों की राजनीति में मौजूदगी के बावजूद अरसे से इस सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था को तोड़ने का कोई नियम नहीं बना है. औरतें तो केवल खिलवाड़ की चीज बन कर रह गई हैं. संसद व विधानसभाओं में पहुंच कर वे औरतों की तरह का नहीं सासों और पंडितानियों का सा व्यवहार नहीं करेंगी, इस की कोई गारंटी दे सकता है क्या?

भूलकर भी न खाएं जोड़ो के दर्द में ये चीज

जोड़ों का दर्द होना एक आम समस्या है. इसका दर्द किसी भी मौसम में बढ़ सकता है. जोड़ो के दर्द से उठने-बैठने हर काम में आपको परेशानी होती है. इस दर्द से निजात पाने के लिये कुछ लोग दवाई भी लेते हैं पर आप इसके लिए कुछ घरेलू उपाय भी अपना सकते हैं. ताकि आपको दर्द से आराम मिल सके.

क्या आप जानते हैं कि कुछ चीजें ऐसे भी होती हैं अगर इनका सेवन किया जाये तो जोड़ो के दर्द की समस्या और बढ़ भी सकती है. तो चलिए हम जानते हैं कि ऐसे कौन से फूड्स हैं जिनके सेवन से घुटनों में दर्द हो सकता है.

– सोडा, न सिर्फ दिल और डायबटीज रोगियों के लिए खतरनाक होता है बल्कि इसके अधिक सेवन से   जोड़ों में भी दर्द होने लगता है. चूंकि सोड़ा में शूगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है और जब आप बहुत   ज्यादा मात्रा में शूगर का सेवन करते हैं तो साइटोकिन्स, शरीर में रिलीज होता है. जिससे दर्द और ज्यादा   बढ़ता है.

–  लाल रसीला टमाटर स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता लेकिन अगर जोड़ों में दर्द की समस्या है तो       यह  नुकसान पहुंचाता है. टमाटर खाने से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. जिसकी वजह से शरीर में सूजन बढ़ जाती है और जोड़ों में दर्द होने लगता है.

– ज्यादा मात्रा में ओमेगा 6 फैटी एसिड खाने से भी जोड़ों में दर्द हो सकता है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ओमेगा 6 फैटी एसिड, अंडे की जर्दी, मीट, फ्राई फूड, कौर्न, सोयाबीन आदि में पाया जाता है.

नो फादर्स इन कश्मीरः प्यार, धोखा, उम्मीद और क्षमा की मार्मिक कहानी

रेटिंग: ढाई स्टार

धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर पर पिछले बीस वर्षों से लोगों ने बात करना बंद कर दिया था. फिल्मकारों ने भी कश्मीर की खूबसूरती को अपनी फिल्मों में पेश करने से दूरी बना ली थी. लेकिन अब कुछ फिल्मकार कश्मीर को लेकर गंभीर व संजीदा हुए हैं. जिसके चलते ‘‘हामिद’’जैसी फिल्में बनी हैं और इन फिल्मों ने लोगों को कश्मीर के प्रति सोचने पर मजबूर किया है. अब खुद को चैथाई कश्मीरी मानने वाले फिल्मकार अश्विन कुमार ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ लेकर आए हैं. फिल्म की कहानी कश्मीर घाटी में गायब या आर्मी द्वारा उठाए गए लोगों की तलाश के बहाने कश्मीर की जटिलता के साथ ही मानवीय रिश्तों व उनकी मजबूरियों का चित्रण किया है. अश्विन कुमार का दावा है कि उन्होंने कश्मीर के गांव जाकर काफी शोघकार्य किया है और उस दूसरे पक्ष को दिखाने का प्रयास किया है जिसे अमूमन नहीं दिखाया जाता.

माना कि फिल्म में मासूमियत, अपराध बोध, मानवता, उम्मीद, लालसा, धोखाधड़ी, गंदी राजनीति, ब्यूरोके्रट्स के साथ ही कश्मीर की वास्तवकिता का चित्रण है. मगर अश्विन कुमार की अपनी एकपक्षीय सोच के चलते यह फिल्म प्रोपेागंडा/प्रचारात्मक फिल्म ही बनकर रह जाती है. फिल्म कई सवालों पर चुप रहती है. फिल्मकार अश्विन कुमार राजनैतिक रूप से अति संवेदनशील विषय को सही परिपेक्ष्य में पेश नहीं कर पाए.

जबकि फिल्म की शुरूआत में ही दर्शकों को बताया जाता है कि यह फिल्म भारत व पाक के बीच होते आ रहे सैकड़ों गुप्त युद्ध की सत्य कथा पर आधारित है. मगर फिल्म के कई दृश्य नजर आते हैं.

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कश्मीर वैली/कश्मीर घाटी की पृष्ठभूमि वाली फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ की कहानी के केंद्र में 16 वर्ष की नूर(जारा वेब) है, जो कि लंदन में अपनी मां जैनब (नताशा मंगो) के साथ रहती है. स्वतंत्र है. दोस्तों संग सिगरेट वगैरह पी लेती है. अचानक वह अपनी मां जैनब के साथ कष्मीर आती है,साथ में वाहिद भी हैं.यह तीनो लोग कष्मीर में जब हालिमा के घर पहुॅचते हंै,तो पता चलता है कि हालिमा( सोनी राजदान),नूर की दादी हैं और नूर के दादा अब्दुल राशद(कुलभूशण खरबंदा)एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में शक्षक हैं.नूर के पिता बशीर लंबे समय से गायब हैं. अब जैनब चाहती है कि सरकारी दस्तावेज पूरा कर बशीर को मृत मान लिया जाए और वह वाहिद के साथ दूसरी शादी कर ले. पहले तो नूर के दादा व दादी इस बात के लिए राजी नही होते, मगर दबाव में उन्हें यह खानापूर्ती करनी पड़ती है. जैनब शादी के बाद वाहिद के साथ रहने चली जाती हैं, जो कि विदेश मंत्रालय में ब्यूरोके्रट्स हैं, जबकि नूर अपने दादा दादी के साथ रहने लगती है. नूर की दोस्ती एक हम उम्र कश्मीरी लड़के माजिद (शवम रैना) से हो जाती है. धीरे धीरे दोनों कश्मीर के हालतों को समझना शुरू करते हैं. धीरे धीरे नूर को कश्मीर की ‘आधी विधवा आधी विवाहित औरतों’ के बारे में भी जानकारी मिलती है .दोनों को गायब हो चुके अपने पिता की तलाश है. एक दृश्य में माजिद कहता है कि मिलिटेंट और टेररिस्ट में अंतर है. मिलिटेंट आजादी की लड़ाई लड़ते हैं, जबकि टेररिस्ट अपराधी हैं.

इस बीच नूर की मुलाकात एक मस्जिद में आर्शिद लोन से होती है. जो कि उसके पिता के दोस्त रहे हैं. एक दिन जब नूर छिपकर आर्शिद लोन के घर पहुंचती है, तो कुछ देखती है, उससे यही जाहिर होता है कि आर्शिद लोन, आर्मी के साथ साथ आतंकवादियों से भी मिला हुआ है. आर्मी के मेजर अंशुमन झा के साथ आर्शिद लोन के गहरे ताल्लुकात हैं. आर्शिद लोन, आर्मी और आतंकवादियों दोनों से पैसा लेता रहता है. नूर और आर्शिद के बीच होने वाली बात से यह भी उजागर हो जाता है कि उसके व माजिद के पिता के गायब होने और मौत की नींद सो जाने के पीछे आर्शिद लोन का ही हाथ है. आर्शिद लोन का दावा है कि वह इस्लाम की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि आतंकवादी कश्मीर की आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं. आर्शिद लोन के अनुसार नूर व माजिद के पिता भी आजादी की लड़ाई लड़ने लगे थे. यहां पर नूर को पता चलता है कि उसके व माजिद के पिता राज्य के खिलाफ बंदूक उठाने वाले उग्रवादी थे.

आर्शिद के इशारे पर नूर, अपने दोस्त माजिद, जिससे अब वह प्यार करने लगी है. इसको लेकर उस उंचाई पर जाती है, जहां आर्शिद के अनुसार उसके पिता की कब्र है. रात में दोनो रास्ता भटक जाते हैं और भारत पाक सीमा पर बने आर्मी हेडक्वाटर के सिपाही उन्हे पकड़कर मेजर पांडे के पास ले जाते हैं. आर्मी के सिपाही माजिद को बहुत यातनाएं देते हैं, जबकि वाहिद व मेजर पांडे के बीच हुई बातचीत तथा नूर के पास ब्रिटिश पासपोर्ट के चलते नूर को रिहा कर दिया जाता है. नूर व जैनब के गिड़गिड़ाने के बावजूद वाहिद, माजिद को छुड़ाने से मना कर देता है,तब जैनब,वाहिद का घर छोड़कर अपने ससुर अब्दुल राशद के घर वापस आ जाती है.

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वाहिद का घर छोड़ते ही मेजर पांडे अपने दल बल के साथ नूर व अब्दुल राशद के घर की तलाशी लेने पहुंच जाते हैं, सारा सामान तोड़कर रख देते हैं,तभी कुछ तस्वीरे मिलती हैं. उन तस्वीरों को देखकर नूर का शक यकीन में बदल जाता है. उधर अब्दुल राशद यह मानते हैं कि वह अपने बेटे बशीर के विचारों से सहमत नहीं थे पर चुप रहे. यानी कि नूर के पिता उग्रवादी/आतंकवादी  बनने की राह पर थे. अब नूर, आर्शिद लोन से मिलती है और धमकाती है कि वह माजिद को छुड़ाकर लाए अन्यथा वह आर्मी को बता देगी कि उसने एक आतंकवादी को अपने घर के अंदर छिपा रखा है. आर्शिद लोन,  माजिद को छुड़ाने से इंकार कर देता है और नूर को अपने रास्ते से हटाना चाहता है,पर नूर के दादा अब्दुल राशद बीच में आकर कहते हैं कि वह नूर को समझा लेंगे, पर आर्शिद जिद करता है, तो नूर के दादा कहते हैं कि वह उसकी सच्चाई पूरी कौम को बता देंगे. तब आर्शिद शांत होता है, पर नूर  आर्शिद लोन से कहती है कि वह चाहे जैसे माजिद को छुड़ाकर लाए.

तब लोन लोगों का मसीहा बनकर सभी औरतों के संग जुलूस लेकर ‘हमें आजादी चाहिए’के नारे लगाते हुए आर्मी के हेडक्वाटर पहुंचता है. सैनिक उन्हें बंदूक की नोक पर कुछ दूर पहले ही रोक देते हैं पर आर्षिद लोन आगे बढ़कर सैनिक से कहता है कि मेजर पांडे को बताएं कि आर्शिद लोन मिलना चाहता है. आर्शिद लोन अंदर जाकर माजिद को लेकर लौटता है. लोग खुश हो जाते हैं कि आर्शिद ने माजिद को छुड़ा लिया. कुछ देर में आर्मी पत्रकारों को बताती है कि मुठभेड़ मे एक आतंकवादी मारा गया और एक सैनिक शहीद हो गया. जब चेहरे पर से कपड़ा हटाया जाता है तो यह वही आतंकवादी होता है जिसे नूर ने आर्शिद लोन के घर में देखा था और सिपाही वही होता है जिसने माजिद को पीटा था पर नूर को खाने के लिए बिस्कुट दिए थे.

उसके बाद आर्शिद, माजिद की मां से शादी कर लेता है, इससे माजिद खुश है. नूर, माजिद को आर्शिद लोन का सच बताना चाहती है, पर फिर चुप रह जाती है. कुछ दिन बाद नूर अपनी मां जैनब के साथ वापस इंग्लैंड चली जाती है.

लेखक व निर्देशक अश्विन कुमार की यह फिल्म इंटरवल के पहले काफी धीमीगति से आगे बढ़ती है. कहानी में सारे जटिल मुद्दे इंटरवल के बाद ही आते हैं. यानी कि फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी गति है. इसकी दूसरी कमजोर कड़ी कैमरामैन जियान मार्क सेलवा हैं, जो कि कई दृश्यों में बुरी तरह से मात खा गए हैं. फिल्म की तीसरी कमजोरी इसका संगीत है जो कि कई बार फिल्म की कहानी की लय को बाधित करता है.

फिल्मकार अश्विन कुमार ने इस फिल्म में कई सवाल उठाए हैं. मसलन-कौन पंड़ित है और कौन नहीं है? एक कश्मीरी बालक या कश्मीरी युवा हाथ में बंदूक क्यों उठाता है? इस्लाम की लड़ाई और आजादी की लड़ाई में अंतर? आखिर युवा पीढ़ी को किस आजादी की तलाश है?

फिल्म में कश्मीर के अंदर ही विचारधारा का जो आपसी टकराव है, उसे रेखांकित करने वाला एक दृश्य है. इस दृष्य में आर्शिद, नूर से उसके पिता के संदर्भ में कहता है- ‘‘वे कश्मीर के लिए लड़ रहे थे, मैं इस्लाम के लिए लड़ रहा था. यह स्पष्ट है कि किसे बचना था. यह दृष्य शीत युद्ध की भयावता को भी चित्रित करता है. फिल्मकार ने फिल्म में ‘कश्मीर की आजादी’ का मुद्दा उठाया मगर ‘आजादी’के बाद क्या? राज्य का प्रबंधन कैसे होगा, जैसे सवालों पर फिल्म मौन व फिल्म के पात्र मौन रहते हैं.

कश्मीर में रह रहे लोग भी उन तकलीफों व उन खतरों पर बात नहीं करते हैं, जिनसे वह स्वयं जूझ रहे हैं. फिल्म‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ में भी वह पिता भी चुप हैं, जिनके बेटे गायब हो चुके हैं. पर फिल्म की कहानी धीरे धीरे ज्यों आगे बढ़ती रहती है, वह युद्ध के हालातों के अलावा कई चीजों पर रोशनी डालती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो नूर के किरदार में जारा वेब ने अपने पिता के बारे में जवाब मांगते हुए अपने किरदार को बहुत ही न्याय संगत तरीके से निभाया है. मासूम माजिद के किरदार में शवम रैना भी कमाल का अभिनय किया है. कश्मीरीयों व इस्लाम के भले की बात करने वाले अवसरवादी गंदे राजनीतिज्ञ आर्शीद लोन के किरदार को अश्विन कुमार ने अपने अभिनय से परदे पर बेहतर ढंग से उकेरा है. आर्मी मेजर की भूमिका में अंशुमन झा हैं मगर फिल्म में उनका किरदार बहुत छोटा है. बेबस मां के किरदार में सोनी राजदान ने जान डाल दी है.

एक घंटा पचास मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘नो फादर्स इन कश्मीर’’ का निर्माण अश्विन कुमार, सैल्वी लांड्व सायलवैन नहमिया ने ‘‘अलीपुर फिल्मस’’ के बैनर तले किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक अश्विन कुमार,  संगीतकार लौयक डूरी और क्रिस्टोफी ‘डिस्को’मिंक, कैमरामैन जियान मार्क सेलवा तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं-अश्विन कुमार, सोनी राजदान, जारा वेब, शवम रैना, अंशुमन झा, कुलभूशण खरबंदा, नताशा मोंगा व अन्य.

बिजी लाइफस्टाइल में इस तरह बनाएं मूंग दाल पालक चीला

आजकल लोगों अपने बिजी लाइफस्टाइल में सुबह नाश्ता करना पसंद नही करते. या ब्रेड और दूध पीकर ही नाश्ता कर लेते हैं, लेकिन पूरे दिन के लिए एनर्जी के लिए नाश्ता पोशण से भरपूर होना चाहिए. जिसमें मूंग दाल और पालक का चीला एक बेस्ट औप्शन है. मूंग दाल और पालक का चीला जितना टेस्टी नाश्ता है उतना ही पोषण से भरपूर भी है.

पेट के लिए मूंग दाल जितनी अच्छी होती है, उतनी ही पालक से बौडी में आयरन और मिनरल की पूर्ति होती है. वहीं इसे घर पर बनाना भी बेहद आसान होता है. बच्चों का टिफिन हो या सुबह-सुबह का झटपट नाश्ता, मूंग दाल पालक का चीला हर जगह फिट हो जाता है. आइए इस तरह बनाएं झटपट बनने वाला मूंग दाल पालक चीला…

हमें चाहिए

बिना छिलके वाली मूंग दाल- 250 ग्राम

दही- 1/2 कप

बारीक कटा पालक- 50 ग्राम

बारीक कटी धनिया पत्ती- 5 चम्मच

बारीक कटी मिर्च- 2

कद्दूकस किया अदरक- 1 चम्मच

जीरा- 3/4 चम्मच

हल्दी पाउडर- 1/2 चम्मच

लाल मिर्च पाउडर- 3/4 चम्मच

नीबू का रस- 2 चम्मच

नमक- स्वादानुसार

तेल- आवश्यकतानुसार

मूंग दाल पालक चीला बनाने का तरीका

मूंग दाल को धोकर चार से पांच घंटे के लिए पानी में भिगोएं. पानी से दाल को निकालें और थोड़ा-सा साफ पानी डालकर ग्राइंडर में डालें और मूंग दाल का पेस्ट बना लें. दाल के घोल का गाढ़ापन डोसा के घोल जैसा ही होना चाहिए. दाल के पेस्ट को एक बड़े बाउल में डालें और उसमें तेल को छोड़कर अन्य सभी सामग्री को डालकर अच्छी तरह से मिलाएं. ध्यान रहे कि घोल में गांठें न हों. अपने टेस्ट के अनुसार नमक मिलाएं. नॉनस्टिक पैन को गर्म करके उसमें हल्का-सा तेल डालें. एक बड़े चम्मच से दाल वाला घोल पैन के बीच में डालें और उसे फैलाएं. ऊपर से थोड़ा-सा तेल और डालें. दोनों तरफ से सुनहरा होने तक पकाएं. और फैमिली को मनपसंद चटनी के साथ सर्व करें.

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