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Social Story : दूसरा भगवान – धर्म से किस तरह हार गए डाक्टर रंजन?

Social Story : डाक्टर रंजन के छोटे से क्लिनिक के बाहर मरीजों की भीड़ थी. अचानक लाइन में लगा बुजुर्ग धरमू चक्कर खा कर गिर पड़ा. डाक्टर रंजन को पता चला. वे अपने दोनों सहायकों जगन और लीला के साथ भागे आए.

डाक्टर रंजन ने धरमू की नब्ज चैक की और बोले, ‘‘इन्हें तो बहुत तेज बुखार है. जगन, इन्हें बैंच पर लिटा कर माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखो,’’ समझा कर वे दूसरे मरीजों को देखने लगे.

वहां से गुजरते पंडित योगीनाथ और वैद्य शंकर दयाल ने यह सब देखा, तो वे जलभुन गए.

‘‘योगी, यह छोकरा गांव में रहा, तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. हमारे पास दवा के लिए इक्कादुक्का लोग ही आते हैं. इस के यहां भीड़ लगी रहती है,’’ भड़ास निकालते हुए वैद्य शंकर दयाल बोला.

‘‘वैद्यजी, आप सही बोल रहे हैं. अब तो झाड़फूंक के लिए मेरे पास एकाध ही आता है,’’ पंडित योगीनाथ ने भी जहर उगला.

उन के पीछेपीछे चल रहे पंडित योगीनाथ के बेटे शंभूनाथ ने उन की बातें सुनीं और बोला, ‘‘पिताजी, आप चिंता मत करो. यह जल्दी ही यहां से बोरियाबिस्तर समेट कर भागेगा. बस, देखते जाओ.’’

शंभूनाथ के मुंह से जलीकटी बातें सुन कर उन दोनों का चेहरा खिल गया. हरिया अपने बापू किशना को साइकिल पर बिठाए पैदल ही भागा जा रहा था. किशना का चेहरा लहूलुहान था.

वैद्य शंकर दयाल ने पुकारा, ‘‘हरिया, ओ हरिया. तू ने खांसी के काढ़े के उधार लिए 50 रुपए अब तक नहीं दिए. भूल गया क्या?’’

‘‘वैद्यजी, मैं भूला नहीं हूं. कई दिनों से मुझे दिहाड़ी नहीं मिली. काम मिलते ही पैसे लौटा दूंगा. अभी मुझे जाने दो,’’ गिड़गिड़ाते हुए हरिया ने रास्ता रोके वैद्य शंकर दयाल से कहा. किशना दर्द से तड़प रहा था.

‘‘शंभू, तू इस की जेब से रुपए निकाल ले.’’

‘‘वैद्यजी, रहम करो. बापू को दिखाने के लिए सौ रुपए किसी से उधार लाया हूं,’’ हरिया के लाख गिड़गिड़ाने के बाद भी पिता के कहते ही शंभूनाथ ने रुपए निकाल लिए.

डाक्टर रंजन आखिरी मरीज के बारे में दोनों सहायकों को समझा रहे थे.

‘‘डाक्टर साहब, मेरे बापू को देखिए. इन की आंख फूट गई है.’’

‘‘हरिया, घबरा मत. तेरे बापू ठीक हो जाएंगे,’’ हरिया की हिम्मत बढ़ा कर डाक्टर रंजन इलाज करने लगे.

बेचैन हरिया इधरउधर टहल रहा था कि तभी वहां जगन आया, ‘‘हरिया, तेरे बापू की आंख ठीक है. चल करदेख ले.’’

इतना सुनते ही हरिया अंदर भागा गया. ‘‘आओ हरिया, दवाएं ले आओ. शुक्र है आंख बच गई,’’ डाक्टर रंजन बोले. सबकुछ समझने के बाद हरिया ने डाक्टर रंजन को कम फीस दी, फिर हाथ जोड़ कर वैद्यजी वाली घटना सुनाई.

डाक्टर रंजन भौचक्के रह गए. ‘‘डाक्टर साहब, काम मिलते ही मैं आप की पाईपाई चुका दूंगा,’’ हरिया ने कहा. जगन और लीला लंच करने के लिए अपनेअपने घर चले गए. डाक्टर रंजन अकेले बैठे क्लिनिक में कुछ पढ़ रहे थे, तभी वहां दवाएं लिए हुए सैल्समैन डाक्टर रघुवीर आया, ‘‘डाक्टर साहब, मैं आप की सभी दवाएं ले आया हूं. कुछ दिनों के लिए मैं बाहर जा रहा हूं. जरूरत पड़ने पर आप किसी और से दवा मंगवा लेना,’’ बिल सौंप कर वह चला गया.

‘‘मैं जरा डाक्टर साहब के यहां जा रही हूं,’’ नेहा की बात सुन कर मां चौंक गईं.

‘‘क्या हुआ बेटी, तुम ठीक तो हो?’’

‘‘मां, मैं बिलकुल ठीक हूं. मेरा नर्सिंग का कोर्स पूरा हो गया है. घर में बोर होने से अच्छा है कि डाक्टर साहब के क्लिनिक पर चली जाया करूं. वहां सीखने के साथसाथ कुछ सेवा का मौका भी मिलेगा. पिताजी ने इजाजत दे दी है. तुम भी आशीर्वाद दे दो.’’

मां ने भी हामी भर दी. नेहा चली गई. डाक्टर रंजन के साथ अजय और शंभू गपशप मार रहे थे.

‘‘आज हम दोनों बिना पार्टी लिए नहीं जाएंगे,’’ अजय बोला.

‘‘नोट छाप रहे हो. दोस्तों का हक तो बनता है,’’ शंभू की बात सुन कर डाक्टर रंजन गंभीर हो गए. चश्मा मेज पर रखा, फिर बोले, ‘‘मेरी हालत से तुम वाकिफ हो. मैं जिन गरीब, लाचारों का इलाज करता हूं, उन से दवा की भी भरपाई नहीं होती. मैं ने बचपन में अपने मांबाप को गरीबी और बीमारियों के चलते तिलतिल मरते देखा है, इसलिए मैं इन के दुखदर्द से वाकिफ हूं.’’

‘‘क्या रोनाधोना शुरू कर दिया? मैं पार्टी दूंगा. चलो शहर. मैं डाक्टर रंजन की तरह छोटे दिल वाला नहीं,’’ शंभू बोला.

डाक्टर रंजन चुप रहे. तभी वहां नेहा दाखिल हुई. ‘‘आओ नेहा, सब ठीक तो है?’’ डाक्टर रंजन के पूछने पर नेहा ने आने की वजह बताई. ‘‘कल से आ जाना,’’ डाक्टर रंजन बोले.

‘‘ठीक है सर,’’ कह कर नेहा वहां से चल दी.

‘‘नेहा, ठहरो. डाक्टर साहब पार्टी दे रहे हैं,’’ शंभू ने टोका.

‘‘आप एंजौय करो. मैं चलती हूं,’’ कह कर नेहा चल दी.

‘‘शंभू, जलीकटी बातें मत करो,’’ अजय ने समझाया.

‘‘डाक्टर क्या पार्टी देगा? चलो, मैं देता हूं,’’ शंभू की बात रंजन को बुरी लगी. वे बोले, ‘‘तेरी अमीरी का जिक्र हरिया भी कर रहा था.’’

इतना सुनते ही शंभू के तनबदन में आग लग गई, ‘‘डाक्टर हद में रह, नहीं तो…’’ कह कर शंभू वहां से चला गया. अजय हैरान होते हुए बोला, ‘‘तुम दोनों क्या बक रहे हो? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’

वैद्य शंकर दयाल भागाभागा पंडित योगीनाथ के पास गया. पुराने मंदिर का पुजारी त्रिलोकीनाथ भी वहीं था. ‘‘मुझे अभीअभी पता चला है कि डाक्टर की दुकान ग्राम सभा की जमीन पर बनी है और खुद सरपंच ने जमीन दी है.’’

वैद्य शंकर दयाल की बात सुन कर वे दोनों उछल पड़े. पंडित योगीनाथ बोला, ‘‘इस में हमारा क्या फायदा है?’’ ‘‘डाक्टर को भगाने की तरकीब मैं बताता हूं… वहां देवी का मंदिर बनवा दो.’’

‘‘सुनहरा मौका है. नवरात्र आने वाले हैं,’’ वैद्य शंकर दयाल की हां में हां मिलाते हुए त्रिलोकीनाथ बोला.

‘‘वैद्यजी, तुम्हारा भी जवाब नहीं.’’ ‘‘सब सोहबत का असर है,’’ पंडित योगीनाथ से तारीफ सुन कर वैद्य शंकर दयाल ने कहा.

‘‘नेहा डाक्टर के साथ कहां जा रही है. अच्छा, यह तो सरपंच की बेटी के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगा है,’’ बड़बड़ाते हुए शंभू दयाल ने शौर्टकट लिया.

‘‘चाची, नेहा कहां है?’’ घर में घुसते ही शंभू ने पूछा.

‘‘क्या हुआ शंभू?’’ सुनते ही नेहा की मां ने पूछा.

शंभू ने आंखों देखी मिर्चमसाला लगा कर बात बता दी. मां को बहुत बुरा लगा. उन्होंने नेहा को पुकारा, ‘‘नेहा बेटी, यहां आओ.’’

नेहा को देख कर शंभू के चेहरे का रंग उड़ गया. ‘‘मेरी बेटी पर लांछने लगाते हुए तुझे शर्म नहीं आई,’’ मां ने शंभू को फटकार कर भगा दिया. ‘तो वह कौन थी?’ सोचता हुआ शंभू वहां से चल दिया.

पंडित योगीनाथ, त्रिलोकीनाथ और वैद्य शंकर दयाल सरपंच उदय प्रताप से मिलने गए. ‘‘श्रीमानजी, आप इजाजत दें, तो हम वहां देवी का मंदिर बनवाना चाहते हैं. बस, आप जमीन का इंतजाम कर दें,’’ त्रिलोकीनाथ बोले.

सरपंच बोले, ‘‘हमारी सारी जमीन गांव से दूर है और ग्राम सभा की जमीन का टुकड़ा गांव के आसपास है नहीं,’’ झट से पंडित योगीनाथ ने डाक्टर वाली जमीन की याद दिलाई. त्रिलोकीनाथ ने भी समर्थन किया.

‘‘उस जमीन के बारे में पटवारी से मिलने के बाद बताऊंगा,’’ सरपंच उदय प्रताप की बात सुन कर वे सभी मुसकराने लगे. डाक्टर रंजन, नेहा, जगन और लीला एक सीरियस केस में बिजी थे, तभी वहां अजय आया, ‘‘रंजन, गांव में बातें हो रही हैं कि इस जगह पर देवी का मंदिर बनेगा और तुम्हारा क्लिनिक यहां से हटेगा.’’

‘‘तुम जरा बैठो. मैं अभी आता हूं,’’ कह कर डाक्टर रंजन मरीजों को देखने में बिजी हो गए. फारिग हो कर वे अजय के पास आए. नेहा, जगन और लीला भी वहीं आ गए.

‘‘रंजन, मुझे थोड़ी सी जानकारी है कि इस जगह पर देवी का मंदिर बनेगा. कुछ दान देने वालों ने सीमेंटईंट वगैरह का इंतजाम भी कर दिया है. 1-2 दिन बाद ही काम शुरू हो जाएगा.’’

अजय की बात सुन कर नेहा बोली, ‘‘मैं ने तो ऐसी कोई बात घर पर नहीं सुनी.’’

‘‘तुम जानते हो, मैं दूसरे गांव से यहां आ कर अपनी दुकान में बिजी हो जाता हूं. तुम अपने मरीजों में बिजी रहते हो. न तुम्हारे पास समय है, न मेरे पास,’’ कह कर अजय डाक्टर रंजन को देखने लगे.

तभी वहां दनदनाता हुआ शंभूनाथ आया, ‘‘डाक्टर, तुम गांव के भोलेभाले लोगों को बहुत लूट चुके हो. अब अपना तामझाम समेट कर यह जगह खाली करो. यहां मंदिर बनेगा,’’ जिस रफ्तार से वह आया था, उसी रफ्तार से जहर उगल कर चला गया. सभी हक्केबक्के रह गए.

कुछ देर बाद डाक्टर रंजन बोले, ‘‘नेहा, तुम मरीजों को देखो. मैं सरपंचजी से मिलने जाता हूं. आओ अजय,’’ वे दोनों वहां से चले गए.

‘‘पिताजी, समय खराब मत करो. मंदिर बनवाना जल्दी शुरू करवा दो. मैं डाक्टर को हड़का कर आया हूं. सरपंच के भी सारे रास्ते बंद कर देता हूं,’’ शंभूनाथ ने पंडित योगीनाथ, वैद्य शंकर दयाल और पुजारी त्रिलोकीनाथ को समझाया.

‘‘सरपंच को तुम कैसे रोकोगे,’’ वैद्य शंकर दयाल ने पूछा.

‘‘वह सब आप मुझ पर छोड़ दो. जल्दी से मंदिर बनवाना शुरू करवा दो,’’ तीनों को समझाने के बाद शंभूनाथ वहां से चला गया.

‘‘सरपंचजी, आप किसी तरह हमारे क्लिनिक को बचा लो.’’

‘‘रंजन, मैं पूरी कोशिश करूंगा, क्योंकि उस जमीन के कागजात अभी तैयार नहीं हुए हैं. मैं कल कागजात पूरे करवा देता हूं,’’ डाक्टर रंजन को सरपंच उदय प्रताप ने भरोसा दिलाते हुए कहा.

रात में मंदिर बनाने का सामान आया. ट्रक और ट्रैक्टरों ने उलटासीधा लोहा, ईंट वगैरह सामान उतारा. जगह कम थी. टक्कर लगने से क्लिनिक की बाहरी दीवार ढह गई. सुबह डाक्टर रंजन ने यह सब देखा, तो वे दंग रह गए. नेहा, जगन, लीला शांत थे.

तभी पीछे से अजय ने डाक्टर रंजन के कंधे पर हाथ रखा, ‘‘इस समय हम सिर्फ चुपचाप देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकते हैं.

‘‘मैं ने इस सिलसिले में शंभूनाथ से बात की, तो वह बोला कि मैं कुछ नहीं कर सकता,’’ कह कर अजय चुप हो गया.

जेसीबी, ट्रैक्टर वगैरह मैदान को समतल कर रहे थे. जेसीबी वाले ने जानबूझ कर क्लिनिक की थोड़ी सी दीवार और ढहा दी. ‘धड़ाम’ की आवाज सुन कर सभी बाहर आए.

‘‘डाक्टर साहब, गलती से टक्कर लग गई. आज नहीं तो कल यह टूटनी है,’’ बड़ी बेशर्मी से जेसीबी ड्राइवर ने कहा. सभी जहर का घूंट पी कर रह गए.

शंभूनाथ ने पुजारी त्रिलोकीनाथ से कहा, ‘‘पुजारीजी, सब तैयारी हो चुकी है. आप बेफिक्र हो कर मंदिर बनवाना शुरू कर दो. मेरे एक दोस्त ने, जो विधायक का सब से करीबी है, विधायक से थाने, तहसील, कानूनगो को फोन कर के निर्देश दिया है. उस जमीन पर सिर्फ मंदिर ही बने. अब हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है.’’

सारी बातें सुनने के बाद पुजारी त्रिलोकीनाथ खुश हो गए. डाक्टर रंजन और अजय बहुत सोचविचार के बाद थाने गए. थानेदार ने जमीन के कागजात मांगे. कागजात न होने के चलते रिपोर्ट दर्ज न हो सकी. दोनों बुझे मन से थाने से निकल आए.

सरपंच उदय प्रताप पटवारी और कानूनगो से मिले, ‘‘आप किसी तरह से डाक्टर के क्लिनिक के कागजात आज ही तैयार कर दो. बड़ी लगन और मेहनत से डाक्टर रंजन गांव वालों की सेवा कर रहे हैं. कृपया, आप मेरा यह काम कर दो,’’ सरपंच की सुनने के बाद उन दोनों ने असहमति जताई. सरपंच उदय प्रताप को बड़ा दुख हुआ.

दोनों की नजर तहसील से बाहर आते उदय प्रताप पर पड़ी. उन की चाल देख डाक्टर रंजन और अजय समझ गए कि काम नहीं हुआ. ‘‘काम नहीं हुआ क्या सरपंचजी,’’ डाक्टर रंजन ने पूछा.

‘‘नहीं. बस एक उम्मीद बची है. विधायक साहब से मिले लें,’’ सरपंच उदय प्रताप का सुझाव दोनों को सही लगा. तीनों उन से मिलने चल दिए.

नेहा, जगन, लीला वगैरह बड़ी बेचैनी से तीनों के आने का इंतजार कर रहे थे. ‘‘डाक्टर साहब, हम आखिरी बार कह रहे हैं कि क्लिनिक खाली कर दो, नहीं तो सब इसी में दब जाएगा,’’ शंभूनाथ की चेतावनी सुन कर वे तीनों बाहर आए. शंभूनाथ वहां से जा चुका था.

विधायक का दफ्तर बंद था. घर पहुंचे, तो गेट पर तैनात पुलिस ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया. थकहार कर उदय प्रताप, अजय और डाक्टर रंजन गांव आ गए.

मंदिर की नींव रख दी गई थी. प्रसाद बांटा जा रहा था. जयकारे गूंज रहे थे.

‘‘पंडितजी ने मंदिर के लिए सही जगह चुनी है. उन्होंने गांव के लिए सही सोचा,’’ एक बुजुर्ग ने योगीनाथ की तारीफ करते हुए कहा.

तीनों के जानपहचान वाले डाक्टर रंजन को कोस रहे थे. कुछ गालियां दे रहे थे.

‘‘चोर है, गरीबों को लूट रहा है, नकली दवाएं देता है, पानी का इंजैक्शन लगा कर पैसे बना रहा है, पंडितजी इस को सही भगा रहे हैं,’’ एक आदमी बोला. एक आदमी सरपंच को भी बुराभला कह रहा था, ‘‘अब की इसे वोट नहीं देंगे, यह डाक्टर के साथ मिल कर गांव को लूट रहा है.’’

कुछ ही लोग सरपंच और डाक्टर रंजन के काम को अच्छा कह रहे थे. सरपंच उदय प्रताप डाक्टर रंजन के क्लिनिक के बाहर खड़े थे. नेहा, जगन, लीला और अजय भी वहीं मौजूद थे.

‘‘बेटे, जगह खाली करने के सिवा अब और कोई चारा नहीं है. गांव के भोलेभाले लोग पंडित योगीनाथ, वैद्य शंकर दयाल और पुजारी त्रिलोकीनाथ के मकड़जाल में फंस चुके हैं. हमारी सुनने वाला कोई नहीं. कोर्ट के चक्कर में फंसने से भी कोई हल नहीं निकलेगा,’’ सरपंच की बात सुन कर डाक्टर रंजन मायूस हो गए.

बहुत देर बाद डाक्टर रंजन ने पूछा, ‘‘फिर, मैं क्या करूं?’’

सरपंच उदय प्रताप बोले, ‘‘बेटे, गांव के नासमझ लोगों पर मंदिर बनवाने का भूत सवार है. इन्हें डाक्टररूपी दूसरे भगवान से ज्यादा जरूरत पत्थररूपी भगवान की चाह है. इन लोगों को हम जागरूक नहीं कर सकते. इन्हें सिर्फ इन का जमीर, इन की अक्ल ही जागरूक कर सकती है. हम हार चुके हैं रंजन, हम हार चुके हैं.’’

मायूस हो कर सरपंच उदय प्रताप वहां से चले गए. सभी मिल कर क्लिनिक खाली करने लगे. डाक्टर रंजन शांत खड़े थे.

Hindi Stories Love : कैक्टस के फूल – क्या विजय और सुषमा हमसफर बन पाए?

Hindi Stories Love : फोन आने की खबर पर सुषमा हड़बड़ी में पलंग से उठी और उमाजी के क्वार्टर की ओर लंबे डग भरती हुई चल पड़ी. कैक्टस के फूलों की कतार पार कर के वह लौन में कुरसी पर बैठी उमाजी के पास पहुंच गई.

‘‘तुम्हारे कजिन का फोन आया है, वह शाम को 7 बजे आ रहा है. उस के साथ कोई और भी आ रहा है इसलिए कमरे को जरा ठीकठाक कर लेना,’’ उमाजी के चेहरे पर मुसकराहट आ गई.

उमाजी के चेहरे पर आज जो मुसकराहट थी, उस में कुछ बदलाव, सहजता और सरलता भी थी. उमाजी तेज स्वर में बोली, ‘‘आज कोई अच्छी साड़ी भी पहन लेना. सलवारकुरता नहीं चलेगा.’’

बोझिल मन के साथ वह कब अपने रूम में पहुंच गई उसे पता ही नहीं चला. एक बार तो मन में आया कि वह तैयार हो जाए, फिर सोचा कि अभी से तैयार होने से क्या फायदा? आखिर विजय ही तो आ रहा है.

कई महीने पहले की बात है, उस दिन सुबह वाली शटल टे्रन छूट जाने के बाद पीछे आ रही सत्याग्रह ऐक्सप्रैस को पकड़ना पड़ा था. चैकिंग होने की वजह से डेली पेसैंजर जनरल बोगी में लदे हुए थे. वह ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कर रही थी तभी टे्रन चल पड़ी. गेट पर खड़े विजय ने उस का हाथ पकड़ कर उसे गेट से अंदर किया था. उस ने कनखियों से विजय को देखा था. सांवले चेहरे पर बड़ीबड़ी भावुक आंखों ने उसे आकर्षित कर लिया था.

उस के बाद वह अकसर विजय के साथ ही औफिस तक की यात्रा पूरी करती. विजय राजनीति, साहित्य और फिल्मों पर अकसर बहस व गलत परंपराओं और कुरीतियों के प्रति नाराजगी प्रकट करता. विजय मेकअप से पुती औरतों पर अकसर कमैंट करता. इस बात पर वह सड़क पर ही उस से झगड़ा करती और फिर विजय के हावभाव देखती.

एक दिन सुबह ही वह उमाजी के क्वार्टर पर पहुंची और उन से फिरोजाबाद से मंगाई चूडि़यां मांगने लगी थी. ‘मैडम, आप ने कहा था कि रंगीन चूडि़यां तो आप पहनती नहीं हैं, आप के पास कई पैकेट आए थे, उन में से एक…’

‘अरे, तुझे चूडि़यों की कैसे याद आई? तू तो कहती थी कि साहब के सामने डिक्टेशन लेने में चूडि़यां बहुत ज्यादा खनकती हैं. एकदो पैकेट तो मैं ने आया मां की लड़की को दे दिए हैं, वह ससुराल जा रही थी पर तुझे भी एक पैकेट दे देती हूं.’

एक दिन उमाजी ने सुषमा से मुसकराते हुए पूछा, ‘तुम्हारे जिस कजिन का फोन आता है, उस से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’

वह एकदम हड़बड़ा सी गई. उस ने अपने को संयत करते हुए कहा, ‘अशोक कालोनी में मेरे दूर के रिश्ते की आंटी हैं, उन का बेटा है.’

‘सीधा है, बेचारा,’ उमाजी मुसकराईं.

‘क्या मतलब आंटी? कैसे? मैं समझी नहीं,’ उस ने अनजान बनने की कोशिश की.

‘मैं ने फोन पर उस से तेज आवाज में पूछ लिया कि आप सुषमा से बात तो करना चाहते हैं पर बोल कौन रहे हैं, तो वह हड़बड़ा कर बोला, ‘मैं विजय सरीन बोल रहा हूं, मैं बहुत देर तक सोचती रही कि सरीन सुषमा गुप्ता का कजिन कैसे हो सकता है.’

‘ओह आंटी, आप को तो सीबीआई में होना चाहिए था. एक होस्टल वार्डन का पद तो आप के लिए बहुत छोटा है.’

उमाजी सुषमा में आए परिवर्तन को अच्छी तरह समझने लगी थीं. वे बेटी की तरह उसे प्यार करती थीं.

मुरादाबाद में सांप्रदायिक दंगे होने के कारण टे्रनों में भीड़ नहीं थी. एक दिन विजय उसे पेसैंजर टे्रन में मिल गया था. कौर्नर की सीट पर वह और विजय आमनेसामने थे. हलकी बूंदाबांदी होने से बाहर की तरफ फैली हरियाली मन को अधिक लुभा रही थी. सुषमा भी बेहद खूबसूरत नजर आ रही थी.

‘आज तुम्हें देख कर करीना कपूर की याद ताजा हो रही है,’ विजय ने उस को देख कर कहा. उसे लगा कि विजय ने शब्द नहीं चमेली के फूल बिखेर दिए हों. उस ने एक नजर विजय की ओर डाली तो वह दोनों हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर बरसात की बूंदों को अपनी हथेलियों में समेट रहा था.

वह उस से कहना चाहती थी कि विजय, तुम्हें एकपल देखने के लिए मैं कितनी रहती हूं. तुम से मिलने की खातिर बेचैन अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद शटल को छोड़ कर सर्कुलर से औफिस जाती हूं और देर से पहुंचने के कारण बौस की झिड़की भी खाती हूं.

अकसर विजय उस से मिलने होस्टल भी आ जाता था. उसे भी रविवार और छुट्टी के दिन उस का बेसब्री से इंतजार रहता था. अकसर रूटीन में वह रविवार को ही कमरा साफ करती थी, पर जब उसे मालूम होता कि विजय आ रहा है तो विशेष तैयारी करती. अपने लिए वह इतनी आलसी हो जाती थी कि मौर्निंग टी भी स्टेशन पहुंच कर टी स्टौल पर पीती. विजय के जाने के बाद जो सलाइस बच जाती उन्हें भी नहीं खाती. उसे या तो चूहे खा जाते या फिर माली के लड़के को दे देती, जिन्हें वह दूध में डाल कर बड़े चाव से खाता.

एक दिन विजय ने सुषमा के सारे सपने तोड़ दिए थे. डगमगाते कदमों से वह रूम तक आया और ब्रीफकेस को पटक कर पलंग पर लेट गया. शराब की दुर्गंध पूरे कमरे में फैल गई थी. उस ने उठ कर दरवाजे पर पड़ा परदा हटा दिया था.

उसे आज विजय से डर सा लगा था, जबकि वह उस के साथ नाइट शो में फिल्म देख कर भी आती रही है.

‘सुषमा, तुम जैसी खूबसूरत और होशियार लड़की को अपना बनाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है. उस दिन ट्रेन में पहले मैं चढ़ा था, मैं जानता था कि चलती टे्रन में चढ़ने के लिए तुम्हें सहारे की जरूरत होगी. उस दिन तुम्हें सहारा दे कर मैं ने आज तुम्हें अपने पास पाया,’ विजय ने लड़खड़ाती जबान से बोला.

उस ने सोचा था कि अपने सपनों को भरने के लिए उस ने गलत रंगों का इस्तेमाल कर लिया है. उस का चुनाव गलत साबित हुआ है. उस दिन सुषमा एक लाश बनी विजय को देखती रही थी. चौकीदार की सहायता से उस की मोटरसाइकिल को अंदर खड़ा करवा कर उसे ओटो से उस के घर के बाहर तक छोड़ आई थी. सुबह विजय चुपके से चौकीदार से मोटरसाइकिल मांग कर ले गया था.

अगले दिन उमाजी ने सुषमा को एक माह के अंदर होस्टल खाली करने का नोटिस दे दिया था. वह नोटिस ले कर मिसेज शर्मा के पास गई और उन के गले लग कर फफकफफक कर रो पड़ी थी. उमाजी ने नोटिस फाड़ दिया था.

विजय से मिलने में उस की कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी. उस ने अब लेडीज कंपार्टमैंट में आनाजाना शुरू कर दिया था. अगर वह स्टेशन पर मिल भी जाता तो हल्का सा मुसकरा कर हैलो कह देती. उस का सुबह उठने से ले कर रात सोने तक का कार्यक्रम एक ढर्रे पर चलने लगा था.

सुषमा की नीरसता से भरी दिनचर्या उमाजी से देखी नहीं गई. एक दिन उमाजी ने उसे चाय पर बुलाया, ‘सुषमा, नारी विमर्श और नारी अधिकारों की चर्चाएं बहुत हैं पर आज भी समाज में पुरुषों का डोमिनेशन है. इसलिए बहुत कुछ इग्नोर करना पड़ता है और तू कुछ ज्यादा ही भावुक है. अपनी जिंदगी को प्रैक्टिकल बना कर खुश रहना सीखो.

‘शराब को ले कर ही तो तुम्हारे अंकल से मैं लड़ी थी. 2 दिन बाद ही एक विमान दुर्घटना में उन की मौत हो गई. आज भी उस बात का मुझे दुख है.’

अचानक स्मृतियों की शृंखला टूट गई. सुषमा ने देखा कि गेट पर उमाजी खड़ी थीं. उन के हाथ में रात में खिले कैक्टस के फूल के साथ ही पिंक कलर की एक साड़ी थी.

‘‘आंटीजी, आप ने मुझे बुला लिया होता,’’ सुषमा को पता है कि पिंक कलर विजय को पसंद है.

‘‘जाओ, इस साड़ी को पहन लो.’’

साड़ी पहन कर जैसे ही सुषमा कमरे में आई तो उसे उमाजी के साथ एक और भद्र महिला दिखीं. उमाजी ने परिचय कराया, ‘‘यह तुम्हारे कजिन विजय की मम्मी हैं.’’

‘‘सुषमा, मेरा बेटा बहुत नादान है. तुम तो बहुत समझदार हो. उस के लिए तुम से मैं माफी मांगने आई हूं. तुम दोनों की स्मृतियों के हर पल को मैं ने महसूस किया, क्योंकि तुम्हारे से हुई हर मुलाकात का ब्योरा वह मुझे देता था. जिस रात तुम ने उसे घर तक छोड़ा है, उस रात वह मेरे गले लग कर बहुत रोया था. तुम उस के जीवन में एक नया परिवर्तन ले कर आई हो,’’ विजय की मम्मी ने सुषमा के चेहरे से नजरें हटा कर उमाजी की ओर डालीं, ‘‘उमाजी ने तुम तक पहुंचने में हमारी बहुत मदद की है. मैं तुम्हें अपनी बहू बनाना चाहती हूं, क्योंकि मेरे बेटे के उदास जीवन में अब तुम ही रंग भर सकती हो. यह साड़ी में उसी की पसंद की तुम्हारे लिए लाई हूं.’’

‘‘सुषमा, हर बेटी को विदा करने का एक समय आता है. विजय ने तुम्हें एक अंगूठी दी थी, तुम ने उसे कहीं खो तो नहीं दिया है.’’

‘‘नहीं आंटी, वह ट्रंक में कहीं नीचे पड़ी है,’’ सुषमा ने ट्रंक खोल कर अंगूठी निकाली तथा सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की को खोल दिया.

सुषमा ने देखा, बाहर मोटरसाइकिल पर विजय बैठा था. उमाजी और विजय की मम्मी ने एकसाथ आवाज दी, ‘‘विजय, ऊपर आ जा. इस अंगूठी को तो तू ही पहनाएगा,’’ सुषमा को लगा जैसे उस के सपने इंद्रधनुषी हो गए हैं. Hindi Stories Love 

Family Story Hindi : दुविधा – क्या संगीता शादी के लिए तैयार थी?

Family Story Hindi : संगीता को लगा कि उस के विचार सौमिल के विचारों से मेल नहीं खाते. उसे घूमने फिरने, मस्ती करने, डांस करने, पार्टियों में जाना तथा फैशनेबल कपड़े पहनना पसंद है जबकि सौमिल को शांत वातावरण, एकांत, साधारण रहनसहन एवं पुस्तकें पढ़ना पसंद है. इसीलिए संगीता को ही अंतत: फैसला करना पड़ा. देवकुमार सुबह से ही काफी खुश नजर आ रहे थे. उन की बेटी संगीता को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे. घर की पूरी साफसफाई तो उन्होंने कल ही कर डाली थी. फ्रूट्स, ड्राइफ्रूट्स तथा अच्छी क्वालिटी की मिठाई आज ले आए थे. लड़का रेलवे में इंजीनियर है, अच्छी तनख्वाह पाता है. लड़के के साथ उस के भाईभाभी व मातापिता भी आ रहे थे. वैसे, लड़के के मातापिता ने तो संगीता को पहले ही देख लिया था और पसंद भी कर लिया था. पसंद आती भी क्यों न? संगीता सुंदर तो है ही, बहुत व्यवहारकुशल भी है. उस ने भी इंजीनियरिंग की है तथा बैंक में काम कर रही है.

देवकुमार सरकारी मुलाजिम थे और उन की पत्नी अंजना सरकारी विद्यालय में शिक्षिका. इकलौती बेटी होने से उन दोनों की इच्छा थी कि जानेपहचाने परिवार में रिश्ता हो जाए, तो बहुत अच्छा होगा. लड़के वाले पास ही के शहर के थे और उन के दूर के रिश्तेदार, जिन के माध्यम से शादी की बात शुरू हुई थी, देवकुमारजी के भी दूर के रिश्ते में लगते थे. देवकुमार ने अपनी बहन व बहनोई को भी बुला लिया था ताकि उन की राय भी मिल सके. ठीक समय पर घर के सामने एक कार आ कर रुकी. देवकुमार और उन के बहनोई ने दौड़ कर उन का स्वागत किया. ड्राइंगरूम में आ कर सभी सोफे पर बैठ गए. लड़का थोड़ा दुबला लगा लेकिन स्मार्ट, चैक वाली हाफशर्ट तथा जींस पहने हुए, छोटी फ्रैंचकट दाढ़ी. बड़े भाई का एक छोटा सा बच्चा भी था, वे उसे खिलाने में ही व्यस्त रहे. लड़के के पिता बैंक मैनेजर थे.

उन्हें सेवानिवृत्त होने में एक वर्ष बचा था. काफी बातूनी लगे. बच्चों के जन्म से ले कर उन की पढ़ाई और फिर नौकरी तक की बातें बता डालीं. संगीता भी इसी बीच आ चुकी थी. लड़के की मां व भाभी उस से पूछताछ करती रहीं. लड़के की मां ने सु झाव दिया कि एक अलग कमरे में सौमिल और संगीता को बैठा दें ताकि वे एकदूसरे को सम झ सकें. संगीता की मां दोनों को बगल के कमरे में छोड़ कर आईं. इधर नाश्ते के साथसाथ मैनेजर साहब की बातों में पता ही न चला कि कब एक घंटा बीत गया. तब तक संगीता और सौमिल भी वापस आ चुके थे. मैनेजर साहब और उन का परिवार आवभगत से संतुष्ट नजर आए. चलते समय देवकुमार के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘हम लोगों को दोतीन दिनों का वक्त दीजिए ताकि घर में सब बैठ कर चर्चा कर सकें और आप को निर्णय बता सकें.’’

उन्हें आत्मीयता से विदा कर देवकुमार का परिवार फिर ड्राइंगरूम में बैठ कर सौमिल और उस के परिवार का विश्लेषण करने लगे. सभी की राय एकमत थी कि परिवार अच्छा व संभ्रांत है. लड़का थोड़ा दुबला है लेकिन सुंदर और स्मार्ट है. उस की सोच व विचार कैसे हैं, यह तो संगीता ही बता पाएगी कि उस से क्या बातें हुईं. संगीता ने अपनी मां को जो बताया उसे लगा कि उस के विचार सौमिल के विचारों से मेल नहीं खाते. संगीता को घूमनेफिरने, मस्ती करने, डांस करने, पार्टियों में जाना तथा फैशनेबल कपड़े पहनना पसंद है. सौमिल को शांत वातावरण, एकांत, साधारण रहनसहन एवं पुस्तकें पढ़ना पसंद है. लड़के की मां को ऐसी बहू चाहिए जो अच्छा खाना बनाना जानती हो, गृहस्थी के कार्यों में कुशल हो. उन्हें बहू से नौकरी नहीं करानी. उन्होंने संगीता से कम से कम 4-5 बार पूछा कि क्या वह खाना बना लेती है? क्याक्या बना लेती है? लड़के के विचार संगीता को पसंद नहीं आए, यह सुन कर देवकुमार चिंता में पड़ गए.

अभी तक वे बहुत खुश थे कि बिना इधरउधर भटके अच्छा घर तथा अच्छा वर मिल रहा है. थोड़ी देर के लिए शांति छा गई, फिर अंजना ने कहा कि अब यदि उन का फोन आता है तो उन्हें क्या जवाब देना है? सभी ने निर्णय संगीता पर ही छोड़ने को तय किया. आखिर उसे पूरी जिंदगी निर्वाह करना है. 3 दिन बीत जाने पर भी जब कोई फोन नहीं आया तो सभी अपनेअपने अनुमान लगाने लगे. संगीता के फूफाजी बोले, ‘‘मु झे लगता है कि लड़के के बड़े भाई और भाभी को संगीता पसंद नहीं आई, वे दोनों एकदूसरे से आंखोंआंखों के इशारों से पसंद आने न आने का पूछ रहे थे. मैं ने देखा कि बड़े भाई ने नकारात्मक इशारा किया था. आप लोगों ने नोटिस किया होगा, बड़ा भाई एक शब्द भी नहीं बोला पूरे समय, अपने बच्चे को खिलाने में ही लगा रहा था.’’ संगीता की मां बोली, ‘‘हमारी लड़की के सामने तो लड़का कुछ भी नहीं. गोरे रंग और सुंदरता में तो हमारी संगीता इक्कीस ही ठहरती है.’’ संगीता हंसती हुई बोली, ‘‘हम दोनों की जिस तरह से बातें हुई हैं, वह घबरा गया होगा, कभी हामी नहीं भरेगा.’’

संगीता के उठ कर चले जाने के बाद देवकुमार बोले, ‘‘यदि उन की तरफ से रिश्ता स्वीकार नहीं होता है तो हमारी संगीता के मन पर चोट पड़ेगी. पहली बार ही उस को दिखाया है और उन के मना कर देने पर मनोवैज्ञानिक असर तो पड़ेगा ही, उसे सदमा भी लगेगा.’’ संगीता की बूआजी बोली, ‘‘देखो, 2 लोगों के एकजैसे विचार हों, यह तो संभव ही नहीं. जब 2 सगे भाईबहनों के विचार नहीं मिलते, तो ये तो दूसरे परिवार का मामला है. विवाह तो समन्वय बनाने की कला है, प्रेम और त्याग का रिश्ता है. और यह तो सदियों से होता चला आ रहा है कि लड़की को ही निभाना पड़ता है. हमारी संगीता सब कर लेगी. शांत मन से मैं कल उस से बात करूंगी.’’ देवकुमार को पूरी रात नींद नहीं आई. उन्हें संगीता की बूआजी की बातें तर्कसंगत लगीं. वे सोचने लगे कि संगीता को एडजस्ट करना ही होगा.

यदि कल शाम तक बैंक मैनेजर साहब का फोन नहीं आता है तो मैं स्वयं फोन लगा कर बात करूंगा. दूसरे दिन बुआजी ने संगीता को सम झाने की कोशिश की किंतु व्यर्थ. संगीता बोली, ‘‘बूआजी, उन्हें सिर्फ खाना बनाने वाली बाई चाहिए तो शादी क्यों कर रहे हैं? एक नौकरानी रख लें. एडजस्टमैंट एक तरफ से संभव नहीं, दोनों तरफ से होना चाहिए. यह 21वीं सदी का दौर है. जमाना बदल गया है. उन की मम्मीजी ने कम से कम दस बार यही पूछा, ‘खाना बना लेती हो, क्याक्या बना लेती हो? हमारा लड़का खाने का बहुत शौकीन है, अभी होटल का खाना खाखा कर 3-4 किलो वजन कम हो गया है उस का.’’ देवकुमार शाम को बाजार से घर पहुंचे ही थे कि मैनेजर साहब का फोन आ गया.

बड़े ही साफ शब्दों में उन्होंने पूरी बात बताई कि संगीता सभी को अच्छी लगी है. सौमिल का कहना है कि उन दोनों की सोच और विचार मेल नहीं खाते हैं, फिर भी यदि संगीता को एडजस्ट करने में कोई दिक्कत न हो तो उसे कोई आपत्ति नहीं है. ‘‘आप सब सोचसम झ कर जो भी फैसला लें, मु झे 6-7 दिनों में बता दीजिएगा,’’ मैनेजर साहब ने बड़ी विनम्रता से अपनी बात समाप्त की. अब गेंद देवकुमार के पाले में आ गई थी. कल रात कैसेकैसे खयाल आते रहे थे. बेटी के मन पर सदमे का सोचसोच कर परेशान थे. मैनेजर साहब कितने सुल झे हुए और स्पष्टवादी हैं. संगीता को सम झना होगा. एक अच्छी और स्ट्रेट फौरवर्ड फैमिली है. रात में खाना खाते समय मन में एक ही बात घूमफिर कर बारबार आ रही थी कि कैसे संगीता को अपने मन की बात सम झाऊं. मैं ने और अंजना ने जो चाहा था, सब मिल रहा है.

लड़का अच्छा पढ़ालिखा, अच्छी नौकरी वाला, सुंदर और स्मार्ट है. जानापहचाना परिवार है. और सब से बड़ी बात, पास के शहर में रहेगी तो कभी भी बुला लो या जा कर मिल आओ. वे बारबार संगीता को देखते, उस के मन में क्या चल रहा होगा, फिर सोचते, नहीं अपने स्वार्थ के लिए उस की इच्छा पर अपनी इच्छा नहीं लाद सकते. खाने के बाद सब ड्राइंगरूम में बैठे. देवकुमार ने मैनेजर साहब के जवाब से संगीता को अवगत कराते हुए कहा, ‘‘बेटे, अब हम लोग बड़ी दुविधा में हैं, सबकुछ हम लोगों के मनमाफिक है पर अंतिम निर्णय तो तुम्हारी इच्छा से ही होगा. तुम चाहो तो सौमिल से मोबाइल पर और बात कर सकती हो.’’ संगीता पापा से कहना चाहती थी कि आज 4 दिन हो गए, यदि सचमुच मैं पसंद हूं उन्हें तो क्या सौमिल को नहीं चाहिए था कि वह मु झ से बात करता? इस में भी उस का ईगो है? मोबाइल पर बात करने की शुरुआत करने में भी मु झे ही एडजस्ट करना है? लेकिन उस ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गई. देवकुमार चुपचाप उसे जाते देखते रहे. Family Story Hindi

USA : लोकतंत्र बहाली के लिए अमेरिका को ट्रंपवादी राजनीति से निकलना होगा

USA : ट्रंप की राजनीतिक रेलगाड़ी डर और नफरत के उसी कोयले पर चलती है, जिस से भारत में भगवा पार्टी के मुखिया की चलती है. नफरत और धार्मिक उन्माद पैदा किए बगैर सत्ता पाना इन के बस की बात ही नहीं है.

लौस एंजलिस में नेशनल गार्ड्स की तैनाती, सड़कों पर पुलिस का तांडव, प्रदर्शनकारियों की चीखें और रुदन, हाथों में पोस्टरबैनर और मशालें, सरकारी आतंक से लोहा लेने की मजबूरी, अमेरिका की ऐसी स्थिति देख कर दुनिया अचरज में है. अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने नारा दिया था, ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’, लेकिन अब उन के अटपटे फैसलों और उन के नतीजों को देख कर ऐसा लगता है, जैसे उन का लक्ष्य हो ‘मेक अमेरिका बेड अगेन’ क्योंकि ट्रंप के शासन में अमेरिका में ग्रेटनेस कम और विवाद और प्रदर्शन ज्यादा हो रहे हैं.

अमेरिका के दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो रही है और दोस्तों की गिनती कम होती जा रही है. यहां तक कि जिन दोस्तों के अथक प्रयासों ने ट्रंप को सत्ता हासिल करने में मदद की, वे भी अब ट्रंप के निर्णयों से खफा हो कर किनारा कर रहे हैं.

ट्रंप की नस्लवादी सोच, दिखावा, घमंड, ताकत के प्रदर्शन का शौक और धार्मिक कट्टरता ने अमेरिका को गृहयुद्ध की स्थिति में झोंक दिया है. ट्रंप ने अवैध प्रवासियों को रिकार्ड संख्या में निर्वासित करने और अमेरिका व मैक्सिको सीमा बंद करने का ऐलान किया है.

ट्रंप की डिपोर्टेशन पौलिसी के तहत इमिग्रेशन एंड कस्टम्स इंफोर्समेंट (ICE) को हर दिन बिना दस्तावेज वाले 3000 अप्रवासियों को रिकार्ड संख्या में गिरफ्तार कर डिपोर्ट करने का लक्ष्य है. जिस के तहत लोगों को गिरफ्तार कर जबरन हथकड़ीबेड़ी में जकड़ कर उन के देश वापस भेजा जा रहा है. इस के विरोध में लौस एंजलिस सहित अमेरिका के 12 राज्यों के 25 शहरों के लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं.

सैन फ्रांसिस्को, डलौस, औस्टिन, टेक्सास और न्यूयौर्क जैसे शहरों में प्रदर्शन उग्र रूप लेता जा रहा है. प्रदर्शनकारियों के आगे जीवनमरण का सवाल है इसलिए अब उन्हें पुलिस की गोलियों का भी खौफ नहीं है. ये वे लोग हैं जिन्हें ट्रंप ने अवैध प्रवासी का तमगा दिया है. मगर ये कोई आसमान से टपके एलियंस तो नहीं हैं. ये वही लोग हैं जो सालों से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं. जो वहां दुकानों में काम करते हैं. बड़ीबड़ी बिल्डिंग्स और घर बनाते हैं. फल और अनाज उगाते हैं. गाड़ियां ठीक करते हैं.

दशकों से ये लोग वहां रह रहे हैं. ये न हों तो अमेरिका की रफ्तार थम जाए मगर इस वक्त ट्रंप को इन लोगों से परेशानी है. क्यों? क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उन की राजनीति की रेलगाड़ी पटरी से न उतर जाए, उन को वोटों का ईधन का मिलता रहे, इसलिए अमेरिका भर में बाहरी लोगों की धरपकड़ का खेल चल रहा है.

दरअसल ट्रंप की राजनीतिक रेलगाड़ी डर और नफरत के उसी कोयले पर चलती है, जिस से भारत में भगवा पार्टी के मुखिया की चलती है. नफरत और धार्मिक उन्माद पैदा किए बगैर सत्ता पाना इन के बस की बात ही नहीं है. जैसे भारत में ‘बाहरियों’ का होहल्ला मचा कर एनआरसी व सीएए करवाया जा रहा है, बिलकुल उसी तर्ज पर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप अप्रवासियों की धरपकड़ के लिए छापे पड़वा रहे हैं.

उन्हें यह गुमान है कि इस से गोरी चमड़ी वाले अमेरिकी खुश होंगे और उन की प्रसिद्धि बढ़ेगी. संविधान क्या कहता है, राज्यों के मेयर क्या चाहते हैं, जनता क्या चाहती है इस की ट्रंप को रत्तीभर परवाह नहीं है. तानाशाही रवैय्या इख्तियार कर वे लोकतंत्र का नेतृत्व करने का प्रयास कर रहे हैं. हास्यास्पद!

ट्रंप राज्य सरकारों की असहमति के बावजूद उन के राज्यों में सैनिकों की तैनाती कर के अप्रवासियों को दंगाई का तमगा दे कर विरोध की आवाज को कुचलने की कोशिश कर रहे हैं. 4000 नैशनल गार्ड्स और 700 मरीन की तैनाती देख कर ऐसा मालूम होता है कि हौलीवुड हस्तियों की रिहाइश के लिए मशहूर लौस एंजलिस कोई जंग का मैदान हो.

मेयर कैरन बैस ने नेशनल गार्ड और मरीन्स को भेजने की आलोचना करते हुए कहा कि अभी हम अंधेरे में हैं. हमें नहीं पता कि कब क्या होने वाला है. हमारे पास इस स्थिति से निपटने की क्षमता है और हमें सेना या नेशनल गार्ड्स की जरूरत नहीं है, खासकर तब जब हम ने इस के लिए कहा ही नहीं था. राष्ट्रपति ने राज्यपाल की शक्ति छीन ली है. यह अस्वीकार्य है.

वहीं, ट्रंप कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम को गिरफ्तार करने की बात कह रहे हैं. ट्रंप का कहना है कि न्यूसम ने बहुत खराब काम किया है. उन का सब से बड़ा जुर्म है कि वे फिर से गवर्नर बनना चाहते हैं. इस के लिए वे विद्रोहियों को पैसे से मदद कर रहे हैं. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर हिंसा जारी रही तो वे विद्रोह कानून लागू करेंगे.

ट्रंप कहते हैं, यह सब वे कानून और व्यवस्था के लिए कर रहे हैं. कानून व्यवस्था भी क्या कमाल की चीज है. जब कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम और मेयर कैरन बैस कहती हैं कि ये पुलिस तैनातियां गैरकानूनी हैं तो ट्रंप गरजते हैं, और कहते हैं, “अगर ये लोग अपना काम नहीं कर सकते, तो मैं करूंगा.” ठीक है आखिर वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं – सर्वशक्तिमान और सर्वसमर्थ. उन्हें इस से कोई मतलब नहीं कि गवर्नर कहते हैं कि ये तैनाती तानाशाही है, राज्य की संप्रभुता का उल्लंघन है.

ट्रंप के लिए तो शायद संविधान भी एक पुरानी किताब भर है, रद्दी में बेचने लायक. यह सबकुछ बिलकुल वैसा ही है जैसे भारत में पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की आपत्तियों के बावजूद केंद्र की मोदी सरकार वहां हर बात में अपनी टांग अड़ाए रखना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है. उन की अनुमति के बिना सीबीआई भेज देती है.

दिल्ली की पिछली केजरीवाल सरकार हो या पंजाब की भगवंत मान सरकार, उन के राज्य के अधिकारों को कुचल कर अपनी मनमर्जी चलाने में केंद्र को जो आनंद आता है, वैसे ही ट्रंप को आ रहा है.

लौस एंजिलस की सड़कों पर आंसू गैस, रबर की गोलियां, फ्लैश बम चल रहे हैं. प्रदर्शनकारी चिल्ला रहे हैं – जिन्हें कैद किया उन्हें आजाद करो और ट्रंप फतवा दे रहे हैं – दंगाइयों को कुचल देंगे. शांति और सद्भावना से जीने की इच्छा रखने वाले अमेरिकी पूछ रहे हैं कि ये दंगाई कौन हैं? ये तो वे लोग हैं जिन के घरों पर आप ने छापे मारे, जिन के परिवारों को आप ने बिखेर दिया, जिन के आशियाने आप ने उजाड़ दिए.

ये लोग सड़कों पर इसलिए नहीं उतरे कि इन्हें दंगा करना पसंद है या इन्हें पुलिस की गोलियों से मरने का शौक है, बल्कि ये सड़क पर इसलिए उतरे हैं क्योंकि उन की जिंदगी को आप की संकुचित राजनीतिक इच्छाओं ने दांव पर लगा दिया है.

आप का वोट बैंक खुश रहे इसलिए आप ने ये दमनकारी कदम उठाया है. ट्रंप प्रदर्शनकारियों की आवाज को अपनी सरकार के खिलाफ विद्रोह बता रहे हैं. जरा सोचिए अगर सरकार लोगों के साथ द्रोह करेगी तो क्या जनता को विद्रोह का हक भी नहीं है?

खैरियत है कि ट्रंप सरकार ने अभी तक इनसरैक्शन एक्ट का इस्तेमाल नहीं किया. धमकी जरूर दी है. पिछली बार 1992 में लौस एंजलिस में हुए दंगों में इस कानून को इस्तेमाल किया गया था मगर सरकार की सहमति से. तब जार्ज एच. डब्ल्यू. बुश अमेरिका के राष्ट्रपति थे, मगर ट्रंप को किसी सहमति की क्या जरूरत? वह तो मजबूत नेता हैं. बिना पूछे कहीं भी फौज उतार सकते हैं. सुनने में तो यह भी आ रहा है कि अगर हिंसा नहीं रुकी, तो मरीन बटालियन को और बढ़ाया जाएगा. यानी शहर को सैन्य कैंप में बदलने की पूरी तैयारी है.

तो यह है ट्रंप का नया अमेरिका – जहां जनता की आवाज को बंदूक की गोली से दबाया जाता है, जहां कानून और व्यवस्था का मतलब है डर और दमन. इस तमाशे का अंत क्या होगा ये तो वक्त ही बताएगा. लेकिन इतना तय है कि जब सत्ता सड़कों पर फौज उतारती है तो वह अपनी कमजोरी का ही ऐलान करती है. और खुद को दुनिया का बाप समझने वाले ट्रंप की कमजोरी दुनिया देख रही है.

खुद को विश्वगुरु घोषित करने वालों की भी अंदरूनी हालत कुछ ऐसी ही है. डोनाल्ड ट्रंप का राजनीतिक कैरियर और अमेरिका की वर्तमान स्थिति एकदूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है. ट्रंप के नेतृत्व और नीतियों ने अमेरिकी समाज, राजनीति और वैश्विक छवि पर गहरा प्रभाव डाला है. वर्तमान में अमेरिका जिन बिगड़ते हालात से जूझ रहा है, उस के जिम्मेदार ट्रंप हैं.

ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका में लोकतंत्र की नींव कमजोर हुई है. 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को न मानना, “कैपिटल हिल” पर 6 जनवरी 2021 को हुआ हमला यह सब अमेरिका की लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को हिला देने वाले घटनाक्रम थे. इस से दुनियाभर में अमेरिका की लोकतांत्रिक छवि को आघात पहुंचा.

ट्रंप की राजनीति हमेशा “हम बनाम वे” की भाषा में रही. नस्ल, प्रवासियों, धर्म और वैचारिक मतभेदों के आधार पर देश में ध्रुवीकरण और सामाजिक तनाव बढ़ा कर वे सत्ता पर काबिज हुए और अब इन्हीं चीजों को बढ़ाने में वे अपना राजनीतिक भविष्य देखते हैं.

गोरे वर्चस्ववाद, एंटीइमिग्रेंट भावना और अल्पसंख्यकों के प्रति कठोर रुख अमेरिका को सामाजिक रूप से अस्थिर बना रहा है. वह खुले तौर पर न्यायपालिका, मीडिया और विरोधियों के खिलाफ बोलते हैं जिस से सत्ता का केंद्रीकरण और निरंकुशता ही बढ़ी है.

ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” सिद्धांत ने पारंपरिक सहयोगियों को नाराज किया और चीन, रूस जैसे देशों को अवसर दिया. नाटो जैसे गठबंधनों में भरोसे की कमी और जलवायु समझौते (पेरिस समझौते) से अलग होने जैसे फैसले अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलगथलग कर चुके हैं.

ट्रंप के टैक्स कट और व्यापार युद्ध (विशेषतः चीन के साथ) ने अर्थव्यवस्था को अस्थिर किया. कोरोना महामारी के दौरान उन की अव्यवस्थित प्रतिक्रिया और वैज्ञानिक सलाह की अनदेखी ने स्वास्थ्य और आर्थिक संकट को और बढ़ाया. ट्रंप के नेतृत्व ने अमेरिका को केवल आंतरिक रूप से नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कमजोर किया है.

आज अमेरिका जिन बिगड़ते हालात का सामना कर रहा है, वह केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और संस्थागत संकट का भी संकेत है. अगर अमेरिका को स्थिर, समावेशी और वैश्विक नेतृत्व में वापसी करनी है, तो उसे ट्रंपवादी राजनीति से ऊपर उठ कर लोकतंत्र, समानता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की राह पर लौटना होगा.

Career In Agriculture : किसान का बच्चा किसान क्यों न बने

Career In Agriculture : अधिकतर युवा कृषि को अपना कैरियर इसलिए नहीं बनाना चाहते क्योंकि वे इसे पिछड़ेपने से जोड़ते हैं. मगर सफलता आंकी जाती है जीवन स्तर से, और कृषि में यदि सही कैरियर चुनाव किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है.

रामचरण दास के दोनों बेटे इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए शहर क्या गए, कि शहर के ही हो कर रह गए. बड़े बेटे संतोष ने एक दोस्त के साथ छोटा सा कमरा किराए पर लिया और इंटरमीडिएट के बाद ग्रेजुएशन की तैयारी करने लगा. आर्ट सब्जेक्ट ले कर 3 साल बाद ग्रेजुएट हो कर वह पहले तो एक बीमा एजेंट बना और जब उस के कोई ठीकठाक ग्राहक नहीं बने तो उस ने एक ठेकेदार के यहां एकाउंट्स वगैरा देखने का काम शुरू कर दिया. ठेकेदार उस को 10 हजार रुपए महीना देने लगा, जो संतोष को काफी संतोष देने वाला था. उस ने छोटे भाई कैलाश को भी शहर बुला लिया और उस का एक कालेज में एडमिशन करवा दिया.

पिछले 6 सालों से दोनों भाई शहर में हैं, प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं और उन के मातापिता गांव में अपनी खेती-किसानी देख रहे हैं. संतोष के पिता के पास 20 बीघा जमीन है. मगर काम करने वाले हाथ कम हैं, लिहाजा आधी से ज्यादा जमीन फसल के अभाव में बंजर हुई जा रही है.

संतोष और कैलाश की शादी की उम्र हो गई है मगर वे किसी गांव की लड़की से शादी नहीं करना चाहते हैं. वे शहर में रहना चाहते हैं और किसी शहरी लड़की से शादी करना चाहते हैं. गांव में उन को अपना भविष्य नजर नहीं आता जबकि उन दोनों के पास इतनी अचल संपत्ति है कि वे उस का उपयोग करें तो जितना शहर में कमा रहे हैं उस का दोगुना वह घर बैठे कमा सकते हैं बल्कि बहुत से हाथों को काम दे कर उन का भी भविष्य निखार सकते हैं.

समस्या यह है कि उन्होंने कृषि विज्ञान की शिक्षा नहीं पाई और न ही मातापिता से खेती-किसानी के गुण और अनुभव प्राप्त कर सके.

हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब जैसे राज्य जो खेती के लिए जाने जाते थे आज अधिकांश किसानों की खेती की जमीनें सरकार या प्राइवेट सेक्टर्स के पास आ गई हैं. वजह यह है कि वर्तमान युवा पीढ़ी जिन के बाप दादाओं के पास एकड़ों जमीन है उन को कृषि का न तो शौक है, न वे उस में अपना कोई भविष्य देखते हैं, लिहाजा जमीनें लगातार बिक रही हैं और उन पैसों से युवा शहरों में छोटेछोटे कबूतरनुमा मकान ले कर छोटीछोटी नौकरियों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं.

अनेक किसानों के बेटे आज लंदन, कनाडा जैसे देशों में शेफ या मकैनिक की नौकरी कर रहे हैं. क्योंकि कृषि को आधुनिक और व्यवसायिक कैसे बनाया जाए और कैसे उस से मुनाफ़ा कमाया जाए इस का ज्ञान उन्होंने नहीं अर्जित किया.

गौरतलब है कि भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती है और जीविका के लिए खेती पर निर्भर है. वर्तमान समय में शहरों की तरक्की के साथ गांवों का भी काफी विकास हो रहा है. अपनी जमीन से प्यार करने वाले पढ़ेलिखे किसान अब अपने खेतों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर के अच्छी फसलें उगा रहे हैं. वे अपनी जमीनों पर अनाज ही नहीं उगा रहे हैं, बल्कि नई तकनीक और ज्ञान के साथ ऐसी फसलें भी उगा रहे हैं जो तुरंत मुनाफा देती हैं, जैसे – मसालों की खेती, मशरूम की खेती, फूलों की खेती, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की खेती आदि.

हरिद्वार के आसपास के गांवों में जा कर देखें तो बहुतेरे किसान अपने खेतों में सिर्फ एलोवेरा, तुलसी, पपीता, गुलाब जैसे औषधीय प्रयोगों में आने वाली पौध तैयार करते हैं जो उन्हें तुरंत मुनाफ़ा देती हैं. बड़ीबड़ी कंपनियां जो कौस्मेटिक उद्योग चलाती हैं, इन से सीधे सौदा करती हैं. इन किसानों को अपनी फसलें काट कर कहीं मंडी में बेचने के लिए नहीं बैठना पड़ता है.

खेती के साथसाथ जिन किसानों के पास अपने तालाब हैं, वे मछली पालन, सीप और मोती उत्पादन जैसे व्यवसाय भी कृषि के साथ-साथ कर रहे हैं. इस के अलावा कृषक शहद उत्पादन, मवेशी और मुर्गी पालन, रेशम कीट पालन, गौशालाओं के संचालन और दुग्ध उत्पादन से भी जुड़े हुए हैं. इन तमाम क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन हो और कृषक ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित हों, इस के लिए नएनए तकनीकी संसाधन एवं उपकरण तो बाजार में आ ही रहे हैं, अनेकानेक सरकारी योजनाएं और जागरूकता अभियान भी चल रहे हैं. दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘फार्म एंड फ़ूड’ भी किसानों को अनेक जानकारियां उपलब्ध कराती है और विशेषज्ञों के साक्षात्कार के जरिये किसानों को उन्नत फसल प्राप्त करने के तरीके बताती है.

वैज्ञानिक उपकरणों, अच्छे संसाधनों, ऋण की सुविधाओं और कृषि विज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर कृषि के क्षेत्र को अपने कैरियर के रूप में चुनने वाले युवा अपने परिश्रम से कृषि क्षेत्र को अपने लिए बहुत बड़ा व्यवसाय बना सकते हैं.

अनेक देशों जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, नीदरलैंड, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, कनाडा, इजराइल और चीन में उन्नत तकनीकी संसाधन, मशीनरी, वैज्ञानिक अनुसंधान, और अच्छी कृषि नीतियों के चलते कृषि का क्षेत्र आज एक बहुत बड़े बिजनैस में परिवर्तित हो चुका है. वहां का युवा जो पढ़लिख कर इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने के उद्देश्य से आ रहा है, वह नई तकनीक, वैज्ञानिक उपकरणों और उन्नत बीज एवं खाद के जरिये न सिर्फ अच्छा अनाज, मसाले और दालें उगा रहा है, बल्कि उस के साथसाथ और्गनिक खेती भी कर रहा है और मुनाफा कमा रहा है.

कृषि विज्ञान में ग्रेजुएशन कर बना सकते हैं कैरियर

– कृषि विज्ञान की पढ़ाई के बाद नई तकनीक, नए वैज्ञानिक उपकरण, सरकारी योजनाएं, मार्केट और संसाधनों की भरपूर जानकारी प्राप्त होने से युवा अपनी कृषि-भूमि पर ज्यादा अच्छी फसलें, मसाले, सब्जियां, फूल, जड़ी-बूटियों आदि की खेती कर सकते हैं.

– कृषि विज्ञान की शिक्षा के अंतर्गत अनेक ऐसे व्यवसायों की जानकारी मिलती है, जिस के द्वारा न सिर्फ अत्यधिक धन की प्राप्ति होती है, बल्कि अपने उत्पादों को ले कर युवा अपना ब्रैंड भी स्थापित कर सकते हैं और एक सफल उद्यमी बन सकते हैं.

– मशरूम उत्पादन, मछली पालन, दुग्ध उत्पादन, मोती उत्पादन, फूलों की खेती, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की खेती, ऐलोवेरा उत्पादन, रेशम, मसाला उत्पादन, यह कृषि से जुड़े ऐसे क्षेत्र हैं, जिन से कम समय में अत्यधिक धन अर्जित किया जा सकता है.

– कृषि विज्ञान की पढ़ाई के बाद यह आवश्यक नहीं है कि हर युवा खेती ही करे. यदि आप के पास कृषि योग्य भूमि नहीं है परंतु आप के पास कृषि का ज्ञान और अनुभव है तो आप किसी फार्म हाउस के मैनेजर या सुपरवाइजर भी बन सकते हैं.

– बड़ी संख्या में कृषि विज्ञान की पढ़ाई करने वाले छात्रछात्राएं आज अनेक प्रयोगशालाओं में कार्यरत हैं और कृषि क्षेत्र से जुड़े प्रयोग और अनुसंधान कर रहे हैं. जैसे – उन्नत बीज तैयार करने वाली प्रयोगशालाओं में अथवा मिट्टी के बंजर और उपजाऊपन की जांच-परख करने वाले सोइल साइंटिस्ट के रूप में. कृषि विज्ञान के क्षेत्र में यह बहुत अच्छा कैरियर माना जाता है.

– कृषि विज्ञान होर्टिकल्चर यानि बागवानी के क्षेत्र में भी एक अच्छा कैरियर प्रदान करता है. उद्यान विशेषज्ञ के रूप में आज कृषि स्नातक युवा अच्छे वेतनमानों पर सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं.

– देश के जूलोजिकल पार्क अर्थात चिड़ियाघरों में, फन पार्क, छोटीबड़ी नर्सरी, मुगल गार्डन से ले कर तमाम शहरों में बने सरकारी बागों और पार्कों के रखरखाव और सुपरविजन के लिए उद्यान विशेषज्ञों की आवश्यकता हमेशा रहती है.

– कृषि विज्ञान के अध्ययन के पश्चात एग्रोनोमिस्ट यानि कृषि वैज्ञानिक, मौसम वैज्ञानिक, एग्रीकल्चर इंजीनियर, पशुपालक विशेषज्ञ जैसे क्षेत्रों में युवा बेहतरीन कैरियर बना सकते हैं. कृषि विज्ञान का अध्ययन आय के अनेक रास्ते खोलता है.

तकनीकी ज्ञान और ऊर्जा से भरे युवाओं के लिए कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जिस में बहुत जल्दी ग्रोथ मिलती है.

Housefull 5 : अब क्या करेंगे अक्षय कुमार

Housefull 5 : 6 जून को फिल्म ‘हाउसफुल 5’ रिलीज हुई. मगर जो उम्मीदें फिल्म से थीं उस में फिल्म सफल नहीं हो पाई. यहां तक कि फिल्म अपने वल्गर संवादों और अश्लील दृश्यों से विवादों में जरूर घिर गई.

2025 की पहली छमाही बीतने वाली है, लेकिन अब तक बौक्स औफिस पर ‘छावा’ के अलावा एक भी फिल्म सफलता तो दूर अपनी लागत की आधी रकम भी वसूल नहीं कर पाई. ऐसे में 6 जून को रिलीज हुई निर्माता साजिद नाड़ियादवाला की फिल्म ‘हाउसफुल 5’ से दर्शकों के साथसाथ ट्रेड पंडितों को भी काफी उम्मीदें थीं. इस की कई वजहें रहीं. पहली बात तो साजिद नाड़ियादवाला की यह फिल्म उन की 2010 की सफलतम कौमेडी फिल्म ‘हाउसफुल’ फ्रेंचाइजी की पांचवी फिल्म है. ऊपर से उन्होंने इस फिल्म के दो अंत फिल्माकर उन्हें अलगअलग ‘हाउसफुल 5 ए ’ और ‘हाउसफुल 5 बी’ के तहत एक साथ रिलीज किया. ऐसे में उम्मीद थी कि दर्शक हत्यारे के बारे में जानने के लिए दोनों फिल्में देखेगा और निर्माता दोहरी कमायी कर लेंगें.

मगर अफसोस दर्शक उन के इस झांसे में नहीं आया. इस की मूल वजह यह रही कि निर्माता ने फिल्म ‘हाउसफुल 5’ को ‘किलर कौमेडी’ के रूप में प्रचारित किया. जबकि फिल्म के अंदर द्विअर्थी, फूहड़ व वल्गर संवाद, वल्गर सैक्स दृश्य, अक्षय कुमार की वल्गर हरकतों के साथ हर हीरोइन केवल नग्नता का प्रदर्शन करती हुई नजर आई. लोग मानते हैं कि इसे सेंसर बोर्ड की तरफ से ‘ए’ / व्यस्क प्रमाणपत्र मिलना चाहिए था. लेकिन सेंसर बोर्ड ने इसे ‘यूए 16 प्लस’ प्रमाणपत्र दिया. निर्माता ने ‘जहां लिखना अनिवार्य था, वहां छोटे में ‘यूए 16 प्लस’ लिख दिया. सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो में दर्शक अपने साथ सात साल के बच्चों को भी ले जाते नजर आते हैं. यह वीडियो मुंबई के थिएटरों के ‘हाउसफुल 5’ के दौरान के हैं.

फिल्म देखते हुए मातापिता लज्जित हुए होंगे, जब उन सैक्सी दृश्यों को ले कर उन के बच्चों ने उन से सवाल कर दिया होगा. फिल्म पूरी तरह से बोर करती है. इस फिल्म में 19 लीड कलाकार हैं, इन में से 4 कलाकार 12 साल से अभिनय से दूर थे. बाकी के कलाकार सुपर फ्लौप हैं. केवल अक्षय कुमार अब तक लगातार 18 असफल फिल्में दे चुके हैं. फिल्म के निर्देशक तरूण मनसुखानी ‘दोस्ताना’ के बाद 12 साल बाद इस फिल्म का निर्देशन किया है.

फिर भी ‘हाउसफुल 5’ को सफल बताने के लिए निर्माता व अक्षय कुमार ने अपनी तरफ से पूरी ताकत झोंक दी, सारे तिकड़म लगा डाले. पहले इस फिल्म का बजट 375 करोड़ रूपए बताया गया था. जब फिल्म की एडवांस बुकिंग शुरू हुई, और पहले दिन 15 हजार टिकटें भी नहीं बिकी, तब निर्माता ने कहा कि फिल्म का बजट केवल 240 करोड़ रूपए है. इस पर लोगों ने सवाल किया कि 19 लीड किरदारों के अलावा बौबी देओल व अन्य कलाकार हैं. सभी को फीस दी या नहीं..शूटिंग करने में खर्च हुआ या नहीं.. अक्षय कुमार अकेले 120 से 170 करोड़ रूपए के बीच फीस लेते हैं, तो क्या इस फिल्म के लिए अक्षय कुमार ने कोई फीस नहीं ली. इतना ही नहीं अक्षय कुमार और रितेश देशमुख एक साथ रविवार के दिन मुंबई के गेईटी ग्लैक्सी सिनेमाघर के अंदर जा कर ‘हाउसफुल 5’ देख रहे दर्शकों से बाकी की. फिर फिल्म खत्म होने पर मास्क लगा कर फिल्म के बारे में दर्शकों से उन की राय पूछते नजर आए. इस के वीडियो बना कर अक्षय कुमार ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट कर वायरल किया.

इस के बावजूद सैकनिक के अनुसार पूरे 7 दिन में ‘हाउसफुल 5’ ने महज 120 करोड़ रूपए कमाए. इस में से निर्माता की जेब में बामुश्किल 50 करोड़ रूपए जांएगे. जबकि बौक्स औफिस इंडिया का दावा है कि ‘हाउसफुल 5’ ने पूरे सप्ताह में महज 113 करोड़ रूपए ही बौक्स औफिस पर एकत्र किए तथा इस फिल्म की लाइफ टाइम कमाई 133 करोड़ रूपए होगी.

बौलीवुड में एक अजीब सी बहस छिड़ गई है. एक तबका मान रहा है कि इस फिल्म की असफलता के लिए अक्षय कुमार ही दोषी हैं, क्योंकि वह जबरन हर सीन में घुस कर अश्लील हरकतें करते हुए या द्विअर्थी संवाद बोलते हुए नजर आते हैं. फिल्म की जो कुछ कमाई हुई है, उस की वजह बौबी देओल हैं. जबकि एक तबका मानता है कि अक्षय कुमार ने फिल्म को पूरी तरह डूबने से बचा लिया. निर्माता क्या मान रहा है, पता नहीं.

बौक्स औफिस पर इस दुर्गति के बाद फिल्म रिलीज के 6 दिन बाद फिल्म के निर्देशक तरूण मनसुखानी ने बयान दे कर कहा है कि उन्होंने तो एक साफसुथरी मनोरंजक फिल्म बनाई है. मगर यह उन लोगों की सोच व नजरिए का दोष है, जिन्हें फिल्म में द्विअर्थी संवाद व वल्गर सीन नजर आए.

New Fashion Trend : फास्ट फैशन ट्रैंड्स से खत्म हो गया अमीर गरीब का भेदभाव

New Fashion Trend : भारत में फैशन की दुनिया बदल गई है. बड़े ब्रांड अब सस्ते कपड़े बेच रहे हैं जिस से अमीर और गरीब का फर्क मिट गया है.

रामपुर गांव में एक 20 साल की लड़की सड़क पर प्रिटेंड टी शर्ट पहन कर घूम रही थी. वहां रिश्तेदारी करने आए रमेश को लगा यह लखनऊ, मुम्बई जैसे बड़े शहर की होगी. उस ने अपने पड़ोसी से पूछा तो पता लगा वह गांव की ही रहने वाली सुनीता है. वह कालेज में पढ़ने जाती है. बाकी घर का काम भी देखती है. इंस्टाग्राम रील्स, के-पोप ड्राप्स और कोचेला फिट्स मनोरंजन से कहीं ज्यादा हैं. वे फैशन का प्रचार करती हैं. अगर कोई चीज न्यूयौर्क या सियोल में वायरल है, तो एक सप्ताह तक सूरत के बाजार तक पहुंच जाती है.

आज अगर किसी व्यक्ति के पास फोन है, तो उस के पास फैशन भी है. फैशन की चाहत सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं रह गई है. फास्ट फैशन का अर्थ है तेजी से बदलते फैशन रुझानों का अनुसरण करते हुए कम कीमत पर कपड़े और एक्सेसरीज का उत्पादन करना. यह एक ऐसा व्यवसाय मौडल है जो जल्दी से रुझानों की नकल करता है, उन्हें बड़े पैमाने पर और कम कीमत पर बनाता है, और उन्हें जल्दी से स्टोर में बेचता है. एक समय था जब अंतर्राष्ट्रीय फैशन चमकदार पत्रिकाओं, एनआरआई रिश्तेदारों या हवाई अड्डे पर रुकने से कभीकभार जारा के सामान के जरिए भारत में आता था.

भारत में फास्ट फैशन का मतलब था नकल और देर से आने वाले उत्पाद. अंतर्राष्ट्रीय रुझान अपने समय के बाद महीनों तक छाए रहते थे. 2025 तक तेजी से आगे बढ़ते हुए, मिलान और मुंबई के बीच का अंतर लगभग मिट चुका है. भारत ने फास्ट फैशन ने कदम बढ़ाया है. जिस के चलते मुम्बई और मिलान के बीच का अंतर खत्म हो चुका है.

कोई फैशन अगर विदेशों में दिख रहा है तो उसे भारत आने में 2 सप्ताह से अधिक का समय नहीं लगता है. अब भारत नकलची नहीं, बल्कि इनोवेटर बन चुका है. डेटा, डिजिटल टूल और वैश्विक जानकारी का लाभ उठा कर भारत में ऐसे कलेक्शन लौन्च हो रहे हैं जो भारतीय उपभोक्ताओं की मौजूदा जरूरतों के अनुरूप हैं. भारतीय ब्रांड सिर्फ दूसरे ब्रांड का पीछा ही नहीं कर रहे हैं वे उन्हें क्यूरेट कर रहे हैं, उन्हें रीमिक्स कर रहे हैं और उन्हें वास्तविक समय में ऐसे बाजार में पहुंचा रहे हैं जहां युवा जुड़ा हुआ है.

कानपुर का एक 22 वर्षीय युवक नेटफ्लिक्स पर एक कोरियाई ड्रामा देखता है, मुख्य किरदार द्वारा पहनी गई एक क्रोप्ड जैकेट देखता है, उस का स्क्रीनशौट लेता है और एक सप्ताह के भीतर भारत के फास्ट फैशन ऐप पर वह मिलने लगता है. भारत के फैशन ग्राहक का आधार युवा है. बैन एंड कंपनी के अनुसार ‘जेन जेड और मिलेनियल्स भारत में फैशन ई-कौमर्स ट्रैफिक का 70 फीसदी से अधिक हिस्सा बनाते हैं. वे सिर्फ ट्रेंड का उपभोग नहीं करते हैं वे उन का पीछा करते हैं, उन्हें रीमिक्स करते हैं और अपनी शर्तों पर उन की मांग करते हैं.

छोटे शहरों ही नहीं गांवगांव में भी फैशन चाहत बढ़ गई है. मिंत्रा ने 2024 ने छोटे के शहरों के और्डर में 40 फीसदी सालाना वृद्धि हुई है. अर्बनिक और फ्रीकिंस जैसे ब्रांड लखनऊ, पटना, भोपाल और आगरा जैसे शहरों में अपने बिजनेस को और बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. इस के लिए ब्रांड अपने औनलाइन और औफलाइन दोनों तरह से प्रचार कर रहे हैं. स्निच एक ऐसा ब्रांड जो कभी स्टार्टअप हुआ करता था. अब एक ट्रेंडसेटर बन गया है. स्निच हर महीने 100 से ज्यादा नए डिजाइन लौन्च कर रहा है.

न्यूमी ऐसा ब्रांड जिस का प्रचार केवल मोबाइल पर है. इंस्टाग्राम इस का सब से बड़ा प्लेटफार्म है. यह हर 10 दिनों में नए कलैक्शन लौन्च करता है. इस का लुक कोरियाई स्ट्रीट वियर से प्रेरित है. इस के रंग और डिजाइन ऐसे होते हैं तो भारत के लोगों को पंसद आ जाएं. स्टाइल यूनियन बेहतरीन ब्रांड है. यह औफलाइन औनलाइन दोनो तरह से बिजनेस करता है. द रो और लोरो पियाना जैसे ब्रांड की टक्कर के फैशन ब्रांड यहां मिलने लगे हैं. भारत में लिनन और मौडल जैसे सांस लेने वाले कपड़ों में साफसुथरे गरमी के हिसाब से बनाए गए हैं.

स्ट्रीटवियर में भी भारत ने अपनी पहचान बना ली है. ड्राप-शोल्डर टीज, कार्गो पैंट, यूटिलिटी वेस्ट अब ये हर जगह मिलने लगे हैं. जहां पुराने फैशन हाउस स्कैच से ले कर स्टोर तक 6 महीने का समय लेते हैं, वहीं अब नएनए भारतीय ब्रांड इसे 3 से 4 हफ्तों में ही तैयार हो कर बाजारों तक पहुंचा रहा है. एक बार जब डिजाइन लाइव हो जाती हैं, तो ब्रांड सोशल मीडिया और ई कौमर्स एनालिटिक्स के जरिए रियल टाइम फीडबैक लूप का लाभ उठाते हैं.

भारत का फास्ट फैशन उद्योग 2024 में 15 बिलियन डौलर से ज्यादा हो गया है. जिनेसिस वन एक रिटेल सौफ्टवेयर सूट है जिसे फैशन इकोसिस्टम के लिए बनाया गया है. यह ब्रांडों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है. औनलाइन शौपिंग ने इस बाजार को और सरल बना दिया है. खरीदने के और्डर से ले कर घर पहुंचने तक सब कुछ एक एक स्टेप्स की जानकारी होती है. हर सामान को हर चैनल पर वास्तविक समय में ट्रैक किया जाए. और्डर सिंकिंग का मतलब है कि चाहे कोई इंस्टाग्राम पर रील के माध्यम से या मौल में कियोस्क के माध्यम से खरीदारी करता है. सिस्टम को पता होता है कि क्या बेचा गया है, यह कहां है, और इसे कितनी तेजी से शिप किया जा सकता है.

2024 की बेन रिपोर्ट के अनुसार, भारत का फैशन और लाइफस्टाइल बाजार 2025 तक 180 बिलियन डौलर तक पहुंचने की उम्मीद है. फास्ट फैशन की दुनिया में सफलता एक साधारण सवाल पर निर्भर करती है, आप कितनी तेजी से विचारों को आउटफिट में बदल सकते हैं, और ट्रैंड के आगे बढ़ने से पहले उन्हें वितरित कर सकते हैं. शौपिंग अब एक शो बन गया है. हर कोई देख रहा है. रेडसीर की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 40 फीसदी जनरेशन अब मुख्य रूप से शौर्ट वीडियो कंटेंट के माध्यम से फैशन की खोज करते हैं.

जो फैशन कल तक बड़े शहरों और अमीर लोगों तक सीमित था अब वह छोटे शहरों और साधारण लोगों तक पहुंच गया है. फैशन के हिसाब से अमीर गरीब के बीच कोई गैर बराबरी नहीं रह गई है. ऐसे में फास्ट फैशन ट्रैंड्स ने देश में एक क्रांतिकारी बदलाव किया है. जो साधारण लोगों में आत्मविश्वास भर कर उन की हीन भावना को खत्म कर रहे हैं.

Social Story : सेर को सवा सेर – घर और ऑफिस को मैनेज करने का मानसी ने क्या तरीका ढ़ूंढा

Social Story : मेरी सास पर नजर पड़ते ही हार्ट स्पैशलिस्ट डाक्टर पवन ने नाराजगी दर्शाने वाले बल अपने माथे में डाल लिए और पूछा, ‘‘तुम अपना वजन क्यों कम नहीं कर रही हो, आरती?’’

‘‘मैं कोशिश तो बहुत करती हूं, डाक्टर साहब पर वजन कम हो ही नहीं रहा है,’’ उन की नाराजगी को भांप कर सासूमां घबरा उठी थीं.

‘‘व्हाट ब्लडी कोशिश,’’ वे एकदम से भङक उठे, ‘‘जब हार्ट अटैक आ जाएगा या हाथपैर लकवे का शिकार हो जाएंगे, क्या तुम तब होश में आओगी…’’

‘‘आप को अगली बार शिकायत करने का मौका नहीं मिलेगा. मैं आज से ही शाम को भी घूमना शुरू कर दूंगी,’’ उन्हें खुश कररने को सासुमां उन की चमचागिरी करने पर उतर आईं.

‘‘इन को तलाभुना भी कम खाने को कहिए, डाक्टर साहब,’’ मेरी इस बात को सुन कर डाक्टर साहब ने मेरी सास को और मेरे सासससुर ने मुझे गुस्से से घूरा.

‘‘आलूगोभी का परांठा कल रात को खा लिया था. अब मन को पूरी तरह से मार लेना भी तो आसान नहीं है, डाक्टर साहब,’’ सासूमां ने बिगड़ी बात को संभालने की कोशिश करी.

‘‘परांठे के अलावा रसमलाई खाने की बात भी तो बताइए,’’ उन्हें डाक्टर साहब से डांट खाते देख कर मुझे मन ही मन मजा आ रहा था.

‘‘अरे, रसमलाई खाओगी तो बहुत जल्दी मर जाओगी, आरती. पता नहीं तुम मेरे पास इलाज कराने आती ही क्यों हो?’’ वे सासुमां का चैकअप करने के साथ लगातार उन्हें खूब डांट पिलाते रहे थे.

हमारे बाहर आने से पहले ही हमारी बगल से गुजर कर गांव की रहने वाली एक बुजुर्ग महिला अंदर घुस आई थी.

‘‘नमस्ते, मैडम. आज तो आप काफी ठीक दिख रही हैं,’’ डाक्टर पवन का उन्हें मिश्री घुली आवाज में संबोधित करना मुझे बहुत हैरान कर गया था.

‘‘क्या खाक ठीक हुई हूं. 1 पैसे का फायदा नहीं करा है तेरी दवा ने. देख डाक्टर, अगर तू मुझे ठीक नहीं कर सकता है तो साफसाफ कह…’’ इस के बाद दरवाजा बंद हो जाने के कारण मैं उस महिला की आगे की बात नहीं सुन पाई थी.

मैं ने कंपाउंडर से पूछा तो मालूम पड़ा कि वे लोकल एमएलए की माताजी हैं. बड़ा अजीब सा लगा था कि इतने बड़े स्पैशलिस्ट डाक्टर के साथ यह अनपढ़, गंवार बुढ़िया इतने गलत ढंग से पेश आने की हिम्मत सिर्फ इसलिए कर रही थी क्योंकि वह स्थानीय एमएलए की मां थी.

नर्सिंगहोम से बाहर निकलते ही मेरे सासससुर मुझ पर बरस पड़े,”हमारे साथ कहीं जाती हो तो अपनी जबान को कंट्रोल में रख कर चुप खड़ी रहा करो,’’ मेरे ससुरजी की आंखें गुस्से से लाल हो उठी थीं.

‘‘मैं ने डाक्टर साहब से जो कहा, वह मम्मी के भले को ध्यान में रख कर ही कहा था,’’ मैं ने लापरवाह लहजे में जवाब दिया.

‘‘हमारी चिंता मत कर क्योंकि हमारे सुखदुख में कभी काम आओगी, तुम से ऐसी उम्मीद हमें बिलकुल ही नहीं है,’’ अपनी सासुजी को बहुत चिढ़ा हुआ देख कर मैं मन ही मन मुसकरा उठी थी.

वैसे मैं सारे रास्ते उन दोनों से कुछ नहीं बोली क्योंकि अब बात बढ़ाना मेरे हित में नहीं होता. उन्हें घर छोड़ कर जब मैं औफिस पहुंची तो 12 बज चुके थे.

मैं अपनी सीट पर पहुंची तो गुस्से से भरी बैठी मेरी सहयोगी निशा मुझ से उलझ गई, ‘‘तू कोई न कोई बहाना बना कर हर दूसरे दिन लेट क्यों आती है? मैं अपना काम भी करूं और तेरा भी, यह कहां का इंसाफ हुआ.’’

‘‘झगड़ा शुरू करने से पहले जरा सांस तो ले लेने दे,’’ मैं ने उसे नाराजगी भरे अंदाज में उलटा घूरा तो वह एकदम से ढीली पड़ गई.

‘‘तू अपना काम पूरा नहीं करेगी तो मैं शोर तो मचाऊंगी ही.’’

‘‘तुझे जो शिकायत है, उसे बौस से कह. यों फालतू बोलबोल कर अगर तू मेरा दिमाग खराब करेगी, तो फिर मुझे बौस से तेरी शिकायत करनी पड़ेगी,’’ मैं ने सख्त स्वर में उसे चेतावनी दी तो वह मुंह फुला कर मजबूरन चुप हो गई.

औफिस में सब जानते हैं कि बौस मेरे जबरदस्त प्रशंसक हैं. मेरी शिकायत पर मोहित नाम के लङके को कुछ दिन पहले ही बौस ने नोटिस पकड़ा दिया था. इस कारण सारे सहयोगी मन ही मन मुझ से डरते हैं. मैं अगर सचमुच नाराज हो जाती हूं तो उन्हें अपनी जबानों को ताला लगा लेने में ही अपना हित नजर आता है.

आज कार मैं ले कर आई थी. सचिन और मुझे मेरे भतीजे राहुल के जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने मेरे घर जाना था. मैं शाम को सचिन के औफिस के बाहर कार से पहुंच गई। सचिन अपने बौस कपूर साहब के साथ बाहर आए थे.

‘‘सौरी, मानसी. अपने भतीजे के जन्मदिन की पार्टी में तुम थोड़ा लेट पहुंच पाओगी,’’ कपूर साहब ने बिना सौरी महसूस करते हुए यह वाक्य बोला और पिछली सीट पर जम गए थे. ‘‘सर को उन की ससुराल छोड़ते हुए जाना है,’’ सचिन ने माफी मांगने वाले अंदाज में मुझे सफाई दी और मेरी बगल में आ बैठे.

‘‘रास्ते में मिठाई भी लेनी है. खाली हाथ ससुराल जाना ठीक नहीं लगता है, यह तुम भी याद रखो,’’ अपनी बात कह कर वह यों ठहाका मार कर हंसे मानो उन्होंने कोई बढ़िया मजाक किया हो.

कपूर साहब सारे रास्ते पीछे से सचिन को लैक्चर पिलाते रहे थे. वे उस से बहुत रूखे से अंदाज में बात करते पर मुझ से अगर कुछ कहना होता तो उन की आवाज शहद सी मीठी हो जाती थी.

रास्ते में एक दुकान से सचिन 1 किलोग्राम काजू की बरफी पैक करा कर ले आए. कुछ देर बाद हम ने कपूर साहब को उन के ससुर की कोठी के सामने उतार दिया था. ‘‘कल औफिस जल्दी आना,’’ सचिन को ऐसी हिदायत दे कर वे मुझ से फ्लर्ट करने वाले अंदाज में बोले, ‘‘मानसी, तुम्हें और ज्यादा मुसकराना चाहिए क्योंकि तुम्हारी स्माइल बहुत लवली है.’’

कार को आगे बढ़ाते ही सचिन गुस्से से फट पड़े, ‘‘साला लंपट. लाइन मारने का कोई मौका नहीं चूकता है. साले ने न मिठाई के पैसे दिए, न यहां इतनी दूर तक छोङने के लिए ‘थैंक यू’ बोला. क्या काजू की बरफी या पैट्रौल फ्री में आता है…’’

‘‘अब यों भिनभिन करते हुए पार्टी में जाओगे,’’ सिर में दर्द शुरू हो जाने के कारण मेरी आवाज चिड़चिड़ी हो उठी थी.

‘‘सौरी, यार. साले ने दिमाग खराब कर दिया. मैं कल से ही नई जगहों पर अप्लाई करना शुरू कर दूंगा.’’

‘‘तुम्हें इस से बढिया कंपनी आसानी से नहीं मिलेगी.’’

‘‘गले में पड़ा अच्छी कंपनी वाला यही फंदा तो नौकरी नहीं छोङने देता है. लेकिन मैं किसी दिन साले को ऐसी सुनाऊंगा कि याद रखेगा. कमीना औफिस में शेर बनता है और अपनी बीवी के सामने बकरी की तरह मिमियाने लगता है.’’

‘‘उस की यह बात तो सीखने जैसी है. मैं तो तुम से अपने मन का दुखदर्द कहना शुरू ही करती हूं तो तुम मुझे एकदम से झगङने को तैयार हो जाते हो. आज सुबह भी तुम्हारे औफिस जाने के बाद तुम्हारे मम्मीपापा ने मेरे साथ बहुत झगड़ा किया.’’

‘‘यार, इस वक्त घर की बातें शुरू कर के मेरा दिमाग मत खराब करो,’’ वह हमेशा की तरह एकदम से गुस्सा हो गए थे.

‘‘तुम से अपने दिल की बात शेयर नहीं करूंगी तो किस से करूंगी. मेरे साथ जो रातदिन की कलह होती है, उस ने मेरी जिंदगी को नर्क बना दिया है,’’ मैं रोआंसी हो उठी.

‘‘तुम उन के सामने उलटा बोल कर बात ज्यादा बिगाड़ देती हो.’’

‘‘सारा कुसूर मेरा ही है तो तुम मुझे अलग मकान में ले चलो.’’

‘‘मैं घर से अलग होने को कभी तैयार नहीं हो पाऊंगा. अब अगर फालतू बोलोगी तो मैं पार्टी में भी नहीं जाऊंगा,’’ उन की इस धमकी को सुन कर मैं चुप होने को मजबूर हो गई थी.

सचिन मुंह फुला कर मेरे पापा के घर में घुसे और वार्तालाप में हिस्सा लेने के बजाय टीवी खोल कर न्यूज देखने लगे.

मेरे मम्मीपापा और भैयाभाभी फौरन उन का खराब मूड ठीक करने की कोशिश में लग गए. मैं ने बहुत बार नोट किया है कि इन की खातिर करते हुए वे सब जितना ज्यादा झुकते हैं, सचिन उतना ही ज्यादा टेढ़ा व्यवहार उन के साथ करते हैं.

आज भी इन्हें घंटे भर से ज्यादा रोके रखने के लिए उन सब को इन की बहुत खुशामद करनी पड़ती थी. भैया लगातार पास बैठ कर इन की बातें ध्यान से सुनता रहा, तो ही इन का मूड ठीक रहा था.

हम रात को 11 बजे के करीब वापस लौटे तो हमें देखते ही मेरी सास ने हायतौबा मचा दी,”फोन पर याद कराने के बावजूद तू जल्दी नहीं आ सकता था. अब मेरी दवाई कैसे आएगी?’’ सासूमां हमारा अच्छाखासा मूड खराब करने को पहले से तुली बैठी थीं.

‘‘दवा लाने वाली बात मेरे ध्यान से उतर गई, मां. मैं कल सुबह ला दूंगा,’’ सचिन फौरन परेशान नजर आने लगे थे.

‘‘देख भई, अगर तू हमारे प्रति अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर सकता है तो घर से अलग…’’

मैं ने ससुरजी को उन की धमकी पूरी नहीं करने दी और शांत स्वर में सचिन से कहा, ‘‘हीरादेवी अस्पताल के बाहर कैमिस्ट शौप सारी रात खुली रहती हैं. आप वहां से मम्मी की दवाई ले आओ.’’

‘‘मैं कल सुबह…’’

‘‘प्लीज, अभी चले जाओ,’’ मेरी बात सुन कर वे उलटे पैर दवा लाने चले गए थे.

आमतौर पर ऐसे मौकों पर हम सब के बीच झगड़ा बढ़ता ही चला जाता था. आज मेरे बदले व्यवहार से मेरे सासससुर इतने हैरान हुए कि उन की बोलती बंद हो गर्ई थी.

मैं ने दोनों को गुडनाइट विश किया और अपने कमरे में चली गई. वहां कपड़े बदलते हुए मैं लोगों के व्यवहार से जुड़े उस खास पहलू पर सोचविचार करने लगी जो कुछ देर पहले घर लौटते हुए ताजाताजा मेरी समझ में आया था। जिस के पास किसी को नुकसान पहुंचाने या तंग करने की पावर है, वह हमेशा उस का इस्तेमाल क्यों नहीं करेगा. ऐसी कई घटनाएं मुझे याद आईं जब सामने वाले इंसान को दबा या जलील कर के किसी ने मजा लिया या अपनी टैंशन को कम किया था.

मेरे सासससुर डाक्टर पवन के सामने मिमियाते हैं क्योंकि वे काबिल डाक्टर हैं और कम फीस ले कर उन की देखभाल कर रहे हैं. फिर कुदरत हाथ ही हाथ हिसाब बराबर करता है और एमएलए की अनपढ़ गंवार मां के सामने तेजतर्रार डाक्टर पवन भीगी दिल्ली बन जाते हैं.

मेरे बौस मेरे जबरदस्त प्रशंसक हैं और उन की शह पर मैं अपने सब सहयोगियों को डरादबा कर रखती हूं. मुझ से सीनियर लोग मेरे सामने जबान नहीं खाल सकते हैं क्योंकि मेरी शिकायत पर बौस उन्हें नौकरी से हरी झंडी दिखा सकते हैं.

दूसरी तरफ सचिन के बौस उसे यों डांटते हैंं मानो वे उन का घरेलू नौकर हों. यह कपूर साहब नाम का ऊंट पहाड़ के नीचे तब आता है जब उन की बीवी उन्हें सब के सामने बुरी तरह से इसलिए डांट देती हैं क्योंकि वह करोड़पति बाप की बेटी है. औफिस में शेर बनने वाले कपूर साहब चुपचाप उस की डांट सुनते हैं क्योंकि ससुराल से उन्हें माल जो बहुत मिलता है.

भावुक स्वभाव के सचिन घर से अलग नहीं होना हैं। वे जानते हैं कि किराए का मकान अफोर्ड करना मुश्किल है और उन की इसी कमजोरी का पूरा फायदा उठा मेरे सासससुर मौका मिलते ही हमें घर से अलग होने की धमकी देने से कभी नहीं चूकते हैं.

अपने मातापिता के हाथों अपमानित होने वाले मेरे साहब अपनी ससुराल में शेर बन जाते हैं क्योंकि मेरे मम्मीपापा व भैयाभाभी मुझे सुखी देखना चाहते हैं. कहीं हमारे बीच तलाक की नौबत न आ जाए, इस बात की कल्पना उन्हें इन के खराब व्यवहार के सामने भी मुसकराते रहने को मजबूर करती है.

मेरे मातापिता व भैयाभाभी से सीधे मुंह बात न करने वाले मेरे स्वामी अभी लौट कर आते ही मुझे अपनी बांहों में भरने को लायलित होंगे और तब मैं जो चाहूंगी वह कहूंगी और वे चुपचाप मेरी सारी शिकायतें सुनते हुए मेरी हां में हां मिलाएंगे.

मेरी समझ में तो यह बात आई है कि अगर सामने वाला किसी कारण से कमजोर या मजबूर है, तो ताकतवर उसे धड़ल्ले से खरीखोटी जरूर सुनाएगा. इस मामले में हर तरफ लेनदेन का सिद्धांत खूब काम कर रहा है. इधर किसी से कड़वीतीखी बातें सुनो और उधर किसी दूसरे को वैसी ही बातें सुना कर अपने मन ही भड़ास निकाल लो.

वैसे जिसे इस खेल को ढंग से खेलने का पूरा मजा लेना हो, उसे कुछ महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान जरूर रखना पड़ेगा. सासससुर की डांटफटकार से तंग आ कर घर से अलग होने की जिद पकङना बहू के हित में नहीं होगा. अगर बहू उचित मौके पर सासससुर को तंग कर के उन से बदला ले, तो उसे अपनी दुश्मनी मानना सासससुर की नादानी होगी.

बौस की डांट से चिढ़ कर किसी का नौकरी छोङने की सोचने लगना बेवकूफी है. दामाद का मुंह फुला कर घूमने को अपनी बेइज्जती समझना बेटी के मातापिता की नासमझी है. डाक्टर के डांटने के कारण उसे बदल डालना गलत व नुकसानदायक होगा. एमएलए की मां की तरह डाक्टर पवन को बेबात अपमानित करने वाले लोग भी तो इस दुनिया में मौजूद हैं.

मैं ने फैसला कर लिया है कि जब कहनेसुनने के मामले में हर सेर को सवा सेर मिलता ही मिलता है, तो सामने वाले के मुंह से निकले कड़वे शब्दों का बुरा मान कर अपना खून जलाने की मूर्खता मैं तो भविष्य में अब कभी नहीं करूंगी. Social Story

Family Story Hindi : अंखियों से गोली मारे – सोसायटी में नई पड़ोसन आने के बाद से क्या हुआ था?

Family Story Hindi : हाथों में अखबार लिए गैलरी में बैठे मिस्टर वासु की निगाहें लगभग आधे घंटे से अपने सामने वाली गैलरी में ही टिकी हुई थीं, लेकिन अभी तक उन्हें उस अप्सरा का दीदार नहीं हो पाया था जिस की प्रतीक्षा में वासुजी अखबार पढ़ने की आड़ में अपनी पलकें बिछाए बैठे थे. यह सिलसिला लगभग उसी दिन से प्रारंभ हो गया था जिस दिन से मिस्टर ऐंड मिसेज रंभा वासु के गैलरी के सामने वाले फ्लैट में किराए पर रहने आए थे.

वासु की निगाहों में आज भी रंभाजी की वह तसवीर बसी हुई है, जब उन्होंने रंभाजी को पहली बार अपने गीले बालों को झटकते हुए देखा था. बालों से गिर कर पानी की कुछ बूंदें यों लग रहा था मानो खिले हुए गुलाब पर ओस की बूंदें चमक रही हों और रंभा के सुर्ख गुलाबी होंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह. जिन्हें देख कर वासुजी का नन्हा दिल मचल उठा और फिर जब रंभाजी ने उन्हें देख कर मुसकराते हुए अपनी नजरों से एक ऐसा तीर चलाया कि उस दिन से ले कर आज तक वासुजी घायल ही हैं और रंभाजी से अपने दिल का इलाज और दवाई की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

आज रंभाजी तो न जाने क्यों गैलरी में अपने मधुर स्वर के संग वासुजी को सुप्रभात कहने नहीं आईं लेकिन किचन से वासुजी की धर्मपत्नी मोहिनी की कर्कश आवाज जरूर आई,”सुनते हो, आज गैलरी में ही बैठे रहने का इरादा है क्या? अगर स्वच्छ हवा का सेवन हो गया हो तो आ कर नाश्ता भी कर लो.” श्रीमती की आवाज सुनते ही वासुजी हड़बड़ा ग‌ए और बोले,”बस आ ही रहा हूं, तुम नाश्ता लगाओ.” मनमसोस कर वासुजी अंदर आ ग‌ए और बोले,”आज हवा में ताजगी नहीं थी, मजा नहीं आया.”

यह सुन कर मोहिनी बोली,”अरे शहर में प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि हवा में ताजगी कहां से रहेगी.” बेचारी मोहिनीजी को कहां पता था कि उन के श्रीमान किस हवा के ठंडे झोंके संग मिलने वाली ताजगी की बात कर रहे हैं. वासुजी नाश्ता तो कर रहे थे लेकिन उन का दिल गैलरी में ही अटका हुआ था और आज रंभाजी को देख न पाने की कसक दिल में चुभ रही थी. तभी मोहिनी बोली,”आज बंटी के स्कूल में पेरैंट्सटीचर्स मीटिंग है, आप समय निकाल कर मेरे साथ चलिएगा,” इतना सुनते ही वासुजी को अपने औफिस के सारे काम और बौस याद आ गए और बोले,”नहींनहीं… आज तो स्कूल जा‌ पाना मुश्किल है क्योंकि आज औफिस में बहुत काम है और बौस भी छुट्टी नहीं देंगे. मेरा औफिस जाना जरूरी है,” इतना कह कर वे नाश्ता कर औफिस जाने की तैयारी में लग गए और मोहिनी घर के कामों में.

आज रोज की तरह वासुजी गोविंदा का वह गाना भी नहीं गुनगुना रहे थे, “अंखियों से गोली मारे….” क्योंकि आज रंभाजी से आंखें चार ही नहीं हो पाई थीं.

घर से औफिस के लिए निकलते वक्त भी उन का ध्यान गैलरी में खड़ी हाथ हिला रही अपनी पत्नी मोहिनी की ओर नहीं बल्कि रंभाजी की गैलरी पर इस आशा से था कि शायद उन की एक झलक दिख जाएं लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

अपार्टमेंट से निकलते ही मोड़ पर खड़ी रंभाजी को देखते ही वासुजी के चहरे में चमक आ गई. जिस तरह शमां को देख परवाना फड़फड़ाने लगता है ठीक उसी तरह उन का भी यही हाल हो गया और उन्होंने अपनी कार की रफ्तार धीमी कर ली फिर रंभाजी के करीब पहुंच कर उन्होंने कार रोक दी.

गहरे गले का ब्लाउज उस पर स्लीवलैस, गुलाबी रंग की खूबसूरत साड़ी और खुले बालों में रंभाजी पूरी मनमोहिनी लग रही थीं. अपने सामने वासुजी को यों आ कर कार रोकते देख वे बड़ी अदा से कार के विंडो के पास आ कर झुकीं, उन के झुकते ही साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया और उन के दोनों वक्षों के बीच की गहराई दिखाई देने लगी जिसे देख वासुजी की नजरें वहां जा कर थम गईं और वे उस में डूबने को आतुर दिखे, जिसे रंभाजी भी भांप गईं और अपना पल्लू ठीक करती हुई बोलीं,”वासुजी, क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं? मुझे मेन मार्केट तक ड्रौप कर दीजिए, मुझे कुछ सामान खरीदना है.”

ललचाई आंखों से रंभाजी को देखते हुए वासुजी बोले,”अरे क्यों नहीं आइए बैठिए, मैं उसी तरफ जा रहा हूं,” कहते हुई उन्होंने कार की अगली सीट का दरवाजा खोल दिया. रंभाजी अपने बालों पर हाथ फेरती हुईं वासुजी के बगल वाले सीट पर सामने आ बैठीं. रंभाजी के बगल में बैठते ही वासुजी का पूरा बदन सिहर उठा और क‌ई रंगीन कल्पनाओं में गोते लगाते हुए उन के मन में लड्डू फूटने लगे. वासुजी ने रोमांटिक गाने लगा दिए.

“वासुजी कार रोकिए…” रंभाजी के ऐसा कहने पर उन्हें एहसास हुआ कि मार्केट तो आ गया. उन्हें लगा पलक झपकते ही मार्केट तक की दूरी तय हो गई. कार से उतरते हुए रंभाजी बोलीं,”थैंक्यू वासुजी, यहां से मैं शौप तक पैदल ही चली जाऊंगी,” उन के इतना कहते ही वासुजी का चेहरा बासी फूल की तरह मुरझा गया, यह देख रंभा थोड़ी मुसकराती हुई बोलीं,”यदि आप फ्री हों तो आप भी साथ चलिए, मेरी शौपिंग में हैल्प हो जाएगी, मुझे कुछ इवनिंग और नाइट गाउन खरिदने हैं. आज आप की पसंद से खरीद लूंगी,” रंभाजी के बस इतना कहने मात्र से ही वासुजी ऐसे खिल उठे जैसे पानी के छीटें पड़ते ही मुरझाए हुए फूलों में ताजगी आ जाती है.

कार पार्क कर रंभाजी को आगे चलने को कह, फटाफट अपने बौस को जरूरी काम की वजह से औफिस नहीं आ पाने के लिए मैसेज कर दिया और फिर रंभाजी के साथ हो लिए.

दुकान पहुंच कर रंभाजी के लिए एक से बढ़ कर एक इवनिंग और नाइट गाउन वासुजी कुछ इस तरह से पसंद कर रहे थे मानो ये सारे गाउन रंभाजी उन के लिए ही पहनने वाली हों और उसी तरह रंभाजी भी वासुजी से गाउन ऐसे पसंद करवा रही थीं जैसे वे गाउन उन्हीं के लिए पहनने वाली हैं.

दोनों को इस प्रकार गाउन सिलैक्ट करता देख काउंटर पर गाउन दिखा रहा लड़का आंखों में थोड़ी शरारत भरते हुए बोला,”भैयाजी, यह गाउन देखिए, फ्रंट ओपन इस गाउन में भाभीजी कमाल की लगेंगी.” इतना सुनते ही उन का चेहरा ऐसे लाल हो गया जैसे उस सैल्स बौय ने बैडरूम के कुछ सीक्रेट्स कह दिए हों.

गाउन पसंद करने के बाद जब दोनों कैश कांउटर पर पहुंचे तो 6 गाउन का बिल ₹12 हजार बना. बिल पेमैंट के लिए अपना पर्स खोलते ही रंभाजी अपसेट होती हुई कांउटर पर बैठे दुकानदार से बोलीं,”ओह… मैं तो अपना क्रैडिट कार्ड लाना ही भूल ग‌ई हूं. भैया, ये सारे गाउन रहने दीजिए, मैं फिर कभी आ कर ले जाऊंगी.”

रंभाजी को अपसेट और गाउन न खरीदते देख वासुजी बोले,”अरे यह क्या कह रही हैं, कोई बात नहीं यदि आप अपना क्रैडिट कार्ड लाना भूल ग‌ई हैं तो मैं अपने क्रैडिट कार्ड से पेमैंट कर देता हूं.”

पहले तो रंभाजी मानीं नहीं लेकिन जब वासुजी ने कहा,”मेरी तरफ से छोटा सा गिफ्ट समझ कर रख लीजिए, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा,” ऐसा सुनते ही रंभाजी फौरन मान गईं और मुसकराते हुए बोलीं,”मैं आप का दिल कैसे तोड़ सकती हूं.” और इस तरह से ₹12 हजार के बिल की कैंची रंभाजी ने बड़ी ही चालाकी से वासुजी के जेब पर चला दी.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। इस से पहले भी कई बार रंभाजी किसी न किसी बहाने से वासुजी के जेब की सफाई कर चुकी थीं और वासुजी ने बड़ी खुशी से उन्हें ऐसा करने दिया था.

खरीददारी के बाद रंभाजी अदाएं दिखाती हुई बोलीं,”थैंक यू… वासुजी मैं ने आप के रूप में एक बहुत अच्छा दोस्त पा लिया है.”

रंभा से अपने लिए ‘अच्छा’ दोस्त सुन कर वासुजी फूल कर कुप्पा हो ग‌ए और यह सोच कर मंदमंद मुसकराने लगे कि प्यार की पहली सीढ़ी दोस्ती ही तो होती है. तभी रंभाजी दोबारा बोलीं,”वासुजी, क्या आप मेरी एक और मदद कर सकते हैं? क्या आप मुझे मेरे बेटे चिंटू के स्कूल तक ड्रौप कर देंगे? आज उस के स्कूल में पेरैंट्सटीचर्स मीटिंग है.” रंभाजी के संग और कुछ समय गुजारने का यह मौका भला वासुजी अपने हाथों से कैसे जाने देते. बिना सोचेसमझे फौरन उन्होंने हामी भर दी और दोनों चिंटू के स्कूल की तरफ चल पड़े.

स्कूल के पार्किंग में पहुंचते ही वासुजी का माथा ठनका, यह तो उन के बेटे बंटी का स्कूल है और आज तो उन की पत्नी मोहिनी भी स्कूल आने वाली है, तभी उन्हें स्कूल के अंदर से मोहिनी आती हुई दिखाई दी. पत्नी को देखते ही वासुजी के पसीने छूट गए. रंभाजी के कार से उतरते ही वासुजी, रंभाजी को बाय कहे बगैर ही गाड़ी रिवर्स गियर में डाल वहां से नौ दो ग्यारह हो ग‌ए.

इस प्रकार एकाएक इतनी तेजी से किसी कार को जाता देख एक पल के लिए मोहिनी को लगा कि शायद यह कार उस के पति की थी पर अगले ही क्षण यह सोच कर कि अभी तो उस के पति औफिस में होंगे, वह टैक्सी स्टैंड की तरफ मुड़ गई. मोहिनी घर पहुंची तो उस ने देखा वासुजी घर पर हैं। यह देख वह आश्चर्य से बोली,”इस वक्त आप यहां घर पर…”

वासुजी पहले ही इस बात से डरे हुए थे कि कहीं मोहिनी ने उन्हें देख न लिया हो इसलिए लोमड़ी की तरह चालाकी से स्वांग करते हुए अपने चेहरे पर भोलेपन का भाव लाते हुए बोले,”वह सुबह तुम कह रही थीं न कि आज बंटी के स्कूल जाना‌ है पेरैंट्सटीचर्स मीटिंग में, इसलिए मैं घर आ गया.”

भोलीभाली मोहिनी वासुजी की बातों को सच मान गई और बोली,”अरे, आप आने वाले थे तो फोन कर देते मैं तो अभी स्कूल से ही आ रही हूं.” कहती हुई मोहिनी किचन की ओर चली गई.

उसी वक्त डोरबैल बजा, दरवाजा खोलते ही सामने सोसायटी का वौचमैन हाथों में एक परची लिए खड़ा था, वासुजी को देखते ही परची उन की हाथों में पकड़ा वहां से चला गया.

उस परची में आने वाले रविवार को सोसायटी में होने वाले गेटटुगेदर और सांस्कृतिक कार्यक्रम की सूचना थी, जिसे पढ़ते ही वासुजी के पूरे शरीर में गुदगुदी होने लगी। वह सोचने लगे कि इस रविवार तो खुले आसमान के नीचे पूरी सोसायटी खूबसूरत फूलों से गुलजार रहेगी और उन्हें अपनी आंखें सेंकने का भरपूर मौका मिलेगा. वे रविवार को होने वाले गेटटुगेदर के हसीन सपने और उस की तैयारियों में खो गए.

वह रविवार भी आ गया जिस दिन का वासुजी के साथ ही साथ कालोनी के और भी कई तथाकथित सभ्य एवं शरीफ पुरुषों को इस सुनहरे दिन की प्रतीक्षा थी, जो समाज के समक्ष यह मुखौटा पहने हुए थे कि वे ऐसे सज्जन पुरुष हैं, जो सभी स्त्रियों को सम्मान की नजरों से देखते हैं और कभी भी उन पर बुरी नजर नहीं डालते हैं. कुछ ऐसी स्त्रियां भी थीं जो पुरुषों के ताड़ते नजरों को बड़े आसानी से पकड़ लेती थीं और फिर अपने लटकेझटके दिखा कर उन का भरपूर इस्तेमाल करती थीं और अपने छोटेबड़े काम भी निकलवा लेती थीं.

सुबह से ही सोसायटी ग्राउंड में चहलपहल थी. सोसायटी की ज्यादातर महिलाएं शाम को होने वाले फंक्शन पर क्या पहनना है और कैसे मेकअप करना है इसी की तैयारियों में लगी हुई थीं ताकि वे सब से खूबसूरत लग सकें और अपनी खूबसूरती का जलवा कार्यक्रम में बिखेर सकें.

वासुजी निर्धारित समय पर बिलकुल अपटूडेट हो कर ग्रांउड पहुंच गए, जहां पहले से ही और भी कई लोग उपस्थित थे. धीरेधीरे कर सोसायटी के सभी लोग आ गए थे, लेकिन वासुजी को जिस का बेसब्री से इंतजार था वही रंभाजी अब तक नहीं आई थीं. तभी रंभाजी सजधज कर वहां आ पहुंचीं। उन्हें देखते ही वासुजी के साथ और भी कई लोगों के दिल जोरों से धड़कने लगे। आंखें बड़ी हो गईं और मुंह खुले के खुले रह गए. यों लग रहा था जैसे आज रंभाजी यह प्रण कर के आई हैं, ‘सजधज के मैं जरा बनठन के… बाण चलाऊंगी नैन के…’

वासुजी बारबार अपनी पत्नी मोहिनी और बाकी लोगों से नजरें बचा कर रंभाजी के करीब कोई न कोई बहाना बना कर आ जाते और रंभाजी की तसवीरें लेने लगते। रंभाजी भी अलगअलग पोज में तसवीर खिंचवातीं. कुछ देर बाद रंभाजी से वासुजी कुछ इस तरह व्यवहार एवं निकट होने का प्रयत्न करने लगे जैसे रंभाजी उन की संपत्ति हों, जिसे उन्होंने खरीद लिया हो.

तभी स्टेज पर रंभाजी का नाम पुकारा गया. रंभाजी आज अपना एक सोलो डांस परफौर्मैंस देने वाली थीं. जैसे ही उन्होंने अपना परफौर्मैंस देना शुरू किया तो वहां उपस्थित महिलाएं मुंह बनाने लगीं और पुरूषों में खलबली मच गई। सभी पुरुष भारी उत्साह से रंभाजी की डांस का मजा लेने लगे.

रंभाजी के नृत्य के दौरान उन के एक एक नृत्य मुद्रा पर देर तक तालियां बजती रहीं. डांस के बाद जब वे अपने सीट पर आईं तो काफी देर से उन की अदाओं को देख मचल रहे वासुजी का दिल बागी हो गया और वे रंभाजी के पास चले गए और फिर अपनी मर्यादा से बाहर होने लगे, यह देख उन के पति वहां आ गए क्योंकि इस के पहले भी उन्होंने क‌ई बार मिस्टर वासु को अपनी पत्नी के साथ इस प्रकार बेतकल्लुफ होते हुए देखा था. बात इतनी बढ़ गई कि पूरी सोसायटी के बीच मिस्टर सिंघ‌ई हाथापाई पर उतर आए और उन्होंने मिस्टर वासु की पिटाई कर दी.

पूरी सोसायटी के समक्ष वासुजी के इज्जत की किरकिरी हो गई. मोहिनी अलग नाराज हो गई और रंभाजी जिस पर वासुजी अपने रूपए बिना सोचेसमझे लुटा रहे थे अपने पति के संग उन्हें ठेंगा दिखा कर चलती बनीं।

1 हफ्ते तक रोज वासुजी सुबह रंभाजी के इंतजार में अखबार पढ़ते, गैलरी में बैठे रहते लेकिन रंभाजी फिर कभी गैलरी में दिखाई नहीं दी. एक रविवार वासुजी ने देखा की रंभाजी के घर का सामान शिफ्ट हो रहा है. मालूम करने पर पता चला कि उन का पूरा परिवार दूसरे कालोनी में शिफ्ट हो रहा है. वासुजी बेहद दुखी हुए, इस बात पर नहीं कि रंभाजी सोसायटी छोड़ कर जा रही हैं बल्कि यह सोच कर कि खायापिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना.

इतने पैसे उन्होंने रंभाजी पर खर्च किए लेकिन रंभाजी उन्हें छूने को भी नहीं मिलीं.

अगली सुबह जब वे गैलरी में बेमन से ग‌ए तो उन्होंने फिर एक नई खूबसूरत हसीन चेहरे को गैलरी में खड़े पाया और फिर वासुजी अखबार ले कर यह गुनगुनाते हुए बैठ ग‌ए,”अंखियों से गोली मारे…  Family Story Hindi

Hindi Stories Love : नास्तिक – कैसे परिवार में हुई श्वेता की शादी

Hindi Stories Love : श्वेता के ससुराल जाने के बाद उस के मातापिता को अपना खाली घर काटने को दौड़ रहा था.

श्वेता चुलबुली, बड़बोली और खुले दिल की लड़की थी. मम्मी के दिल में एक ही बात खटकती रहती थी कि श्वेता देवधर्म, कर्मकांड वगैरह नहीं मानती थी.

तरहतरह के पकवान हम कभी भी खा, बना सकते हैं, इस के लिए किसी त्योहार की जरूरत क्यों? दीवाली के व्यंजन तो पूरे साल मिलते हैं. हम कभी भी खरीद सकते हैं, इस में कोई समस्या नहीं है? श्वेता की सोच कुछ ऐसी ही थी.

मातापिता को तो कभी कोई समस्या नहीं हुई, लेकिन उस की ससुराल वालों को होने लगी.

श्वेता का पति आकाश किसी सुपरस्टार की तरह दिखता था. औरतें मुड़मुड़ कर उसे देखती थीं और कहती थीं कि एकदम रितिक रोशन की तरह दिखता है.

श्वेता की सहेलियां उस से जलती थीं. जिम जाने और खूबसूरत दिखने वाले पति के साथ श्वेता की शादीशुदा जिंदगी बहुत अच्छी बीत रही थी.

दोनों पर मिलन की एक अलग ही धुन सवार थी.

लेकिन एक दिन आकाश ने उस से बोल ही दिया, ‘‘केवल मेरे मातापिता के लिए तुम रोज पूजा कर लिया करो… प्लीज. प्रसाद के रूप में नारियल बांटने में तुम्हें क्या दिक्कत है. नाम के लिए एक दिन व्रत रखा करो ताकि मां को तसल्ली हो कि उन की बहू सुधर गई है.’’

श्वेता गुस्से में बोली, ‘‘सुधर गई, मतलब…? नास्तिक औरतें बिगड़ी हुई होती हैं क्या? दबाव में आ कर भक्ति करना क्या सही है?

‘‘जब मुझे यह सब करना नहीं अच्छा लगता तो जबरदस्ती कैसी? मैं ने कभी अपने मायके में उपवास नहीं किया है. मुझे एसिडिटी हो जाती है इसलिए मैं कम खाती हूं, 2 रोटी और थोड़े चावल तो व्रत क्यों रखना?’’

श्वेता सच बोल रही थी. लेकिन इस बात से आकाश नाराज हो गया और धीरेधीरे उस ने श्वेता से बात करना कम कर दिया.

जब भी श्वेता की जिस्मानी संबंध बनाने की इच्छा होती तो ‘आज नहीं, मैं थक गया हूं’ कहते हुए आकाश मना कर देता. ये सब बातें अब रोज की कहानी बन गई थीं.

‘‘तुम्हारा मुझ में इंटरैस्ट क्यों खत्म हो गया? तुम्हारी दिक्कत क्या है?’’ श्वेता ने आकाश से पूछा.

बैडरूम में उस का खुला और गठीला बदन देख कर श्वेता का मन अपनेआप ही मचल जाता था, लेकिन आकाश ने साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘तुम पहले भगवान को मानने लगो, मां को खुश करो, उस के बाद हम अपने बारे में सोचेंगे…’’

‘‘मेरा भगवान, पूजापाठ में विश्वास नहीं है, यह सब मैं ने शादी से

पहले तुम्हें बताया था. जब हम दोनों गोरेगांव के बगीचे में घूमने गए थे… तुम्हें याद है?’’

‘‘मुझे लगा था कि तुम बदल जाओगी…’’

‘‘ऐसे कैसे बदल जाऊंगी. मैं

कोई मन में गुस्से की भावना रख कर नास्तिक नहीं बनी हूं, यह मेरा सालों का अभ्यास है.’’

धीरेधीरे श्वेता और उस की सास के बीच झगड़े होने लगे. श्वेता उन के साथ मंदिर तो जाती थी लेकिन बाहर ही खड़ी रहती थी, जिस पर झगड़े और ज्यादा बढ़ जाते थे.

एक बार सास ने कहा, ‘‘मंदिर के बाहर चप्पल संभालने के लिए रुकती है क्या? अंदर आएगी तो क्या हो जाएगा?’’

श्वेता ने भी तुरंत जवाब देते हुए कहा, ‘‘आप अपना काम पूरा करें, मुझे सिखाने की जरूरत नहीं है. मैं इन ढकोसलों को नहीं मानती.’’

सास घर लौट कर रोने लगीं, ‘‘मुझ से इस जन्म में आज तक किसी ने ऐसी बात नहीं की थी. ऊपर वाला देख लेगा तुम्हें,’’ ऐसा बोलते हुए सास ने पलभर में एक पढ़ीलिखी बहू को दुश्मन ठहरा दिया.

शाम को आकाश के आने के बाद श्वेता बोली, ‘‘मैं मायके जा रही हूं, मुझे लेने मत आना. जब मेरा मन करेगा तब आऊंगी. लेकिन अभी से कुछ तय नहीं है. मायके ही जा रही हूं, कहीं भाग नहीं रही हूं. नहीं तो कुछ भी झूठी अफवाहें उड़ेंगी.’’

आकाश उस की तरफ देखता रह गया. उस की तीखी और करारी बातों से उसे थोड़ा डर लगा.

श्वेता अपने अमीर मातापिता के साथ जा कर रहने लगी. मां को यह बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन श्वेता ने कहा, ‘‘आप थोड़ा धीरज रखो. आकाश को मेरे बिना अच्छा नहीं लगेगा.’’

आखिर वही हुआ. 15-20 दिन बीतने के बाद उस का फोन आना शुरू हो गया. पत्नी का मायके में रहने का क्या मतलब है? यह सोच कर वह बेचैन हो रहा था. उस का किया उस पर ही भारी पड़ गया. मां के दबाव में आ कर वह भगवान को मानता था.

श्वेता ने फोन काट दिया इसलिए आकाश ने मैसेज किया, ‘मुझे तुम से बात करनी है, विरार आऊं क्या?’

श्वेता के मन में भी प्यार था और उस ने झट से हां कह दिया.

श्वेता ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें भगवान को मानने के लिए कभी मना नहीं किया. पूजाअर्चना, जो तुम्हें करनी है जरूर करो, लेकिन मुझे मेरी आजादी देने में क्या दिक्कत है. तुम्हारी मां को समझाना तुम्हारा काम है. अब तुम बोल रहे हो इसलिए आ रही हूं. अगर फिर कभी मेरी बेइज्जती हुई तो मैं हमेशा के लिए ससुराल छोड़ दूंगी…

इस तरह से श्वेता ने अपनी नास्तिकता की आजादी को हासिल कर लिया. Hindi Stories Love

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