Download App

Family Story : हल – आखिर नवीन इरा से क्यों चिढ़ता था ?

Family Story : इरा कल रात के नवीन के व्यवहार से बेहद गुस्से में थी. अब मुख्यमंत्री की प्रैस कौन्फ्रैंस हो और वह मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हो कर जल्दी कैसे घर आ सकती थी. पर नहीं. नवीन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. माना लौटने में रात के 11 बज गए थे, लेकिन मुख्यमंत्री को बिदा करते ही वह घर आ गई थी. नवीन के मूड ने उसे वहां एक भी निवाला गले से नीचे नहीं उतारने दिया. दिनभर की भागदौड़ से थकी जब वह रात को भूखी घर आई, तो मन में कहीं हुमक उठी कि अम्मां की तरह कोई उसे दुलारे कि नन्ही कैसे मुंह सूख रहा है तुम्हारा. चलो हम खाना परोस दें. लेकिन कहां वह कोमलता और ममत्व की कामना और कहां वास्तविकता में क्रोध से उबलता चहलकदमी करता नवीन. उसे देखते ही उबल पड़ा, ‘‘यह वक्त है घर आने का? 12 बज रहे हैं?’’

‘‘आप को पता तो था आज सीएम की प्रैस कौन्फ्रैंस थी. आप की नाराजगी के डर से मैं ने वहां खाना भी नहीं खाया और आप हैं कि…’’ इरा रोआंसी हो आई थी.

‘‘छोड़ो, आप का पेट तो लोगों की सराहना से ही भर गया होगा. खाने के लिए जगह ही कहां थी? हम ने भी बहुत सी प्रैस कौन्फ्रैंस अटैंड की हैं. सब जानते हैं महिलाओं की उपस्थिति वहां सिर्फ वातावरण को कुछ सजाए रखने से अधिक कुछ नहीं?’’

‘‘शर्म करो… जो कुछ भी मुंह में आ रहा है बोले चले जा रहे हो,’’ इरा साड़ी हैंगर में लगाते हुए बोली.’’

‘‘इस घर में रहना है, तो समय पर आनाजाना होगा… यह नहीं कि जब जी चाहा घर से चली गई जब भी चाहा चली आई. यह घर है कोई सराय नहीं.’’

‘‘क्या मैं तफरीह कर के आ रही हूं? तुम इतने बड़े व्यापारिक संस्थान में काम करते हो, तुम्हें नहीं पता, देरसबेर होना अपने हाथ की बात नहीं होती?’’ इरा को इस बेमतलब की बहस पर गुस्सा आ रहा था.

गुस्से से उस की भूख और थकान दोनों ही गायब हो गई. फिर कौफी बना कप में डाल कर बच्चों के कमरे में चली गई. दोनों बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे.

इरा ने शांति की सांस ली. नवीन की टोकाटाकी उस के लिए असहनीय हो गई थी.

फोन किसी का भी हो, नवीन के रहते आएगा तो वही उठाएगा. फोन पर पूरी जिरह करेगा क्या काम है? क्या बात करनी है? कहां से बोल रहे हो?

लोग इरा का कितना मजाक उड़ाते हैं. नवीन को उस का जेलर कहते हैं. कुछ लोगों की नजरों में तो वह दया की पात्र बन गई है.

इरा सोच कर सिहर उठी कि अगर ये बातें बच्चे सुनते तो? तो क्या होती उस की छवि बच्चों की नजरों में. वैसे जिस तरह के आसार हो रहे हैं जल्द ही बच्चे भी साक्षी हो जाएंगे ऐसे अवसरों के. इरा ने कौफी का घूंट पीते हुए

निर्णय लिया, बस और नहीं. उसे अब नवीन के साथ रह कर और अपमान नहीं करवाना है. पुरुष है तो क्या हुआ? उसे हक मिल गया है

उस के सही और ईमानदार व्यवहार पर भी आएदिन प्रश्नचिन्ह लगाने का और नीचा दिखाने का…अब वह और देर नहीं करेगी. उसे जल्द से जल्द निर्णय लेना होगा वरना उस की छवि बच्चों की नजरों में मलीन हो जाएगी. इसी ऊहापोह में कब वह वहीं सोफे पर सो गई पता ही नहीं चला.

अगले दिन बच्चों को स्कूल भेजा. नवीन ऐसा दिखा रहा था मानो कल की रात रोज गुजर जाने वाली सामान्य सी रात थी. लेकिन इरा का व्यवहार बहुत सीमित रहा.

इरा को 9 बजे तक घर में घूमते देख, नवीन बोला, ‘‘क्या आज औफिस नहीं जाना है? आज छुट्टी है? अभी तक तैयार नहीं हुई.’’

‘‘मैं ने छुट्टी ली है,’’ इरा ने कहा.

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक लग रही है, फिर छुट्टी क्यों?’’ नवीन ने पूछा.

‘‘कभीकभी मन भी बीमार हो जाता है इसीलिए,’’ इरा ने कसैले स्वर में कहा.

‘‘समझ गया,’’ नवीन बोला, ‘‘आज तुम्हारा मन क्या चाह रहा है. क्यों बेकार में अपनी छुट्टी खराब कर रही हो, जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

‘‘नहीं,’’ इरा बोली, ‘‘आज मैं किसी हाल में भी जाने वाली नहीं हूं,’’ इरा की आवाज में जिद थी. नवीन कार की चाबी उठाते हुए बोला, ‘‘ठीक है तुम्हारी मरजी.’’

बच्चों और पति को भेजने के बाद वह देर तक घर में इधरउधर चहल कदमी करती रही. उस का मन स्थिर नहीं था. अगर नवीन की नोकझोंक से तंग आ कर नौकरी छोड़ भी दूं तो क्या भरोसा कि नवीन के व्यवहार में अंतर आएगा या फिर बात का बतंगड़ नहीं बनाएगा… लड़ने वाले को तो बहाने की भी जरूरत नहीं होती. नवीन के पिता के इसी कड़वे स्वभाव के कारण ही उस की मां हमेशा घुटघुट कर जी रही थीं. पैसेपैसे के लिए उन्हें तरसा कर रखा था नवीन के पिता ने.

अपनी मरजी से हजारों उड़ा देंगे. नवीन की नजरों में उस के पिता ही उस के आदर्श पुरुष थे और मां का पिता से दब कर रहना ही नवीन के लिए मां की सेवा और बलिदान था.

इरा जितना सोचती उतना ही उलझती जाती, उसे लग रहा था अगर वह इसी तरह मानसिक तनाव और उलझन में रही तो पागल हो जाएगी. हर जगह सम्मानित होने वाली इरा अपने ही घर में यों प्रताडि़त होगी उस ने सोचा भी न था. असहाय से आंसू उस की आंखों में उतर आए. अचानक उस की नजर घड़ी पर पड़ी. अरे, डेढ़ बज गया… फटाफट उठ कर नहाने के लिए गई. वह बच्चों को अपनी पीड़ा और अपमान का आभास नहीं होने देना चाहती थी. नहा कर सूती साड़ी पहन हलका सा मेकअप किया. फिर बच्चों के लिए सलाद काटा, जलजीरा बनाया, खाने की मेज लगाई.

दोनों बेटे मां को देख कर खिल उठे. बिना छुट्टी के मां का घर होना उन के लिए कोई पर्व सा बन जाता है. तीनों ने मिल कर खाना खाया. फिर बच्चे होमवर्क करने लग गए.

5 बजे के लगभग इरा को याद आया कि उस की सहेली मानसी पाकिस्तानी नाटक का वीडियो दे कर गई थी. बच्चे होमवर्क कर चुके थे. इरा ने उन्हें नाटक देखने के लिए आवाज लगाई. दोनों बेटे उस की गोदी में सिर रख कर नाटक देख रहे थे. अजीब इत्तफाक था. नाटक में भी नायिका अपने पति की ज्यादतियों से

तंग आ कर अपने अजन्मे बच्चे के संग घर छोड़ कर चली जाती है हमेशा के लिए.

इरा की तरफ देख कर अपूर्व बोला, ‘‘मां, आप ये रोनेधोने वाली फिल्में मत देखा करो. मन उदास हो जाता है.’’

‘‘मन उदास हो जाता है इसीलिए नहीं देखनी चाहिए?’’ इरा ने सवाल किया.

‘‘बेकार का आईडिया है एकदम,’’ अपूर्व खीज कर बोला, ‘‘इसीलिए नहीं देखनी चाहिए?’’

‘‘अपूर्व,’’ इरा ने कहा, ‘‘समझो इसी औरत की तरह अगर हम भी घर छोड़ना चाहें तो तुम किस के साथ रहोगे?’’

‘‘कैसी बेकार की बातें करती हैं आप भी मां,’’ अपूर्व नाराजगी के साथ बोला, ‘‘आप ऐसा क्यों करेंगी?’’

‘‘यों समझो कि हम भी तुम्हारे पापा के साथ इस घर में नहीं रह सकते तो तुम किस के साथ रहोगे?’’ इरा ने पूछा.

‘‘जरूरी नहीं है कि आप के हर सवाल का जवाब दिया जाए,’’ 13 वर्ष का अपूर्व अपनी आयु से अधिक समझदार था.

‘‘अच्छा अनूप तुम बताओ कि तुम क्या करोगे?’’ इरा ने छोटे बेटे का मन टटोला.

अनूप को बड़े भाई पर बड़प्पन दिखाने का अवसर मिल गया. बोला, ‘‘वैसे तो हम

चाहते हैं कि आप दोनों साथ रहें? लेकिन अगर आप जा रही हैं तो हम आप के साथ चलेंगे. हम आप को बहुत प्यार करते हैं,’’ अनूप बोला, ‘‘चल झूठे…’’ अपूर्र्व बोला, ‘‘मां, अगर पापा आप की जगह होते तो यह उन्हीं को भी यही जवाब देता.’’

‘‘नहीं मां, भैया झूठ बोल रहा है. यही पापा के साथ जाता. पापा हमें डांटते हैं. हमें नहीं रहना उन के साथ. आप हमें प्यार करती हैं. हम आप के साथ रहेंगे,’’ अनूप प्यार से इरा के गले में बांहें डालते हुए बोला.

‘‘डांटते तो हम भी है,’’ इरा ने पूछा, ‘‘क्या तब तुम हमारे साथ नहीं रहोगे?’’

‘‘आप डांटती हैं तो क्या हुआ, प्यार भी तो करती हैं, फिर आप को खाना बनाना भी आता है. पापा क्या करेंगे?’’ अगर नौकर नहीं होगा तो? अनूप ने कहा.

‘‘अच्छा अपूर्व तुम जवाब दो,’’ इरा ने अपूर्व के सिर पर हाथ रख कर उस का मन फिर से टटोलना चाहा.

इरा का हाथ सिर से हटा कर अपूर्र्व एक ही झटके में उठ बैठा. बोला, ‘‘आप उत्तर चाहती हैं तो सुन लीजिए, हम आप दोनों के साथ ही रहेंगे.’’

इरा हैरत से अपूर्व को देखने लगी. फिर पूछा, ‘‘अरे, ऐसा क्यों?’’

‘‘जब आप और पापा 15 साल एकदूसरे के साथ रह कर भी एकदूसरे के साथ नहीं रह सकते, अलग होना चाहते हैं तब हम तो आप के साथ 12 साल से रह रहे हैं. हमें आप कैसे जानेंगे? आप और पापा अगर अलग हो रहे हैं तो हमें होस्टल भेज देना, हम आप दोनों से ही नहीं मिलेंगे,’’ अपूर्व तिलमिला उठा था.

‘‘पागल है क्या तू?’’ इरा हैरान थी, ‘‘नहीं बिलकुल नहीं. इतने वर्षों साथ रह कर भी आप को एकदूसरे का आदर करना, एकदूसरे को अपनाना नहीं आया, तो आप हमें कैसे अपनाएंगे.

‘‘पापा आप का सम्मान नहीं करते तभी आप को घर छोड़ कर जाने देंगे. आप पापा को और घर को इतने सालों में भी समझा नहीं पाईं तभी घर छोड़ कर जाने की बात कर सकती हैं. इसलिए हम आप दोनों का ही आदर नहीं कर सकेंगे और हम मिलना भी नहीं चाहेंगे आप दोनों से,’’ अपूर्व के चेहरे पर उत्तेजना और आक्रोश झलक रहा था.

इरा ने अपूर्व के कंधे को कस कर पकड़ लिया. उस का बेटा इतना समझदार होगा उस ने सोचा भी नहीं था. नवीन से अलग हो कर उस ने सोचा भी नहीं था कि अपने बेटे की नजरों में वह इतनी गिर जाएगी. अगर नवीन उसे सम्मान नहीं दे रहा, तो वह भी अलग हो रही है नवीन का तिरस्कार कर के. इस से वह नवीन को भी तो अपमानित कर रही है. परिवार टूट रहा है, बच्चे असंतुलित हो रहे हैं. वह विवाहविच्छेद नहीं करेगी. उस के आशियाने के तिनके उस के आत्मसम्मान की आंधी में नहीं उड़ेंगे. उसे नवीन के साथ अब किसी अलग ही धरातल पर बात करनी होगी.

अकसर ही नवीन झगड़े के बाद 2-4 दिन देर से घर आता है. औफिस में अधिक काम

का बहाना कर के देर रात तक बैठा रहता.

इरा उस की इस मानसिकता को अच्छी तरह समझती है.

इरा ने औफिस से 10 दिनों का अवकाश लिया. नवीन 2-4 दिन तटस्थता से इरा का रवैया देखता रहा. फिर एक दिन बोला, ‘‘ये बेमतलब की छुट्टियां क्यों ली जा रही हैं?’’

छुट्टियां खत्म हो जाएंगी तो हाफ पे ले लूंगी, जब औफिस जाना ही

नहीं है तो पिछले काम की छुट्टियों का हिसाब पूरा कर लूं,’’ इरा ने स्थिर स्वर में कहा.

‘‘किस ने कहा तुम औफिस छोड़ रही हो?’’ नवीन ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘मैडम, आजकल नौकरी मिलती कहां है जो तुम यों आराम से लगीलगाई नौकरी को लात मार रही हो?’’

‘‘और क्या करूं?’’ इरा ने सपाट स्वर में कहा, ‘‘जिन शर्तों पर नौकरी करनी है वह मेरे बस के बाहर की बात है.’’

‘‘कौन सी शर्तें?’’ ‘‘नवीन ने अनजान बनते हुए पूछा.’’

‘‘देरसबेर होना, जनसंपर्क के काम में सभी से मिलनाजुलना होता है, वह भी तुम्हें पसंद

नहीं. कैरियर या होम केयर में से एक का चुनाव करना था. सो मैं ने कर लिया. मैं ने नौकरी छोड़ने का निर्णय कर लिया है,’’ इरा ने अपना फैसला सुनाया.

‘‘क्या बच्चों जैसी जिद करती हो,’’ नवीन झल्लाई आवाज में बोला, ‘‘एक जने की सैलरी में घरखर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी?’’

‘‘पर नौकरी छोड़ कर तुम सारा दिन करोगी क्या?’’ नवीन को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह इरा का निर्णय बदले.

‘‘जैसे घर पर रहने वाली औरतें खुशी से दिन बिताती हैं. टीवी, वीडियो, ताश, बागबानी, कुकिंग, किटी पार्टी हजार तरह के शौक हैं. मेरा भी टाइम बीत जाएगा. टाइम काटना कोई समस्या नहीं है,’’ इरा आराम से दलीलें दे रही थी.

‘‘तुम्हारा कितना सम्मान है, तुम्हारे और मेरे सर्किल में लोग तुम्हें कितना मानते हैं. कितने लोगों के लिए तुम प्रेरणा हो, सार्थक काम कर रही हो,’’ नवीन ने इरा को बहलाना चाहा.

‘‘तो क्या इस के लिए मैं घर में रोजरोज कलहकलेश सहूं, नीचा देखूं, हर बात पर मुजरिम की तरह कठघरे में खड़ी कर दी जाऊं बिना किसी गुनाह के?

‘‘क्यों सहूं मैं इतना अपमान इस नौकरी के लिए? इस के बिना भी मैं खुश रह सकती हूं. आराम से जी सकती हूं,’’ इरा ने बिना किसी तनाव के अपना निर्णय सुनाया.

‘‘इरा आई एम वैरी सौरी, मेरा मतलब तुम्हें अपमानित करने का नहीं था. जब भी तुम्हें आने में देर होती है मेरा मन तरहतरह की आशंकाओं से घिर जाता है. उसी तनाव में तुम्हें बहुत कुछ उलटासीधा बोल दिया होगा. मुझे माफ कर दो. मेरा इरादा तुम्हें पीड़ा पहुंचाने या अपमानित करने का नहीं था,’’ नवीन के चेहरे पर पीड़ा और विवशता दोनों झलक रही थीं.

‘‘ठीक है कल से काम पर चली जाऊंगी. पर उस के लिए आप को भी वचन देना होगा कि इस स्थिति को तूल नहीं देंगे. मैं नौकरी करती हूं. मेरे लिए भी समय के बंधन होते हैं. मुझे भी आप की तरह समय और शक्ति काम के प्रति लगानी पड़ती है. आप के काम में भी देरसबेर होती ही है पर मैं यों शक कर के क्लेश नहीं करती,’’ कहतेकहते इरा रोआंसी हो उठी.

‘‘यार कह दिया न आगे से ऐसा नहीं करूंगा. अब बारबार बोल कर क्यों नीचा दिखाती हो,’’ इरा का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम कर नवीन ने कहा.

इरा सोच रही थी कि रिश्ता तोड़ कर अलग हो जाना कितना सरल हल लग रहा था. लेकिन कितना पीड़ा दायक. परिवार के टूटने का त्रास सहन करना क्या आसान बात थी. मन ही मन वह अपने बेटे की ऋणी थी, जिस की जरा सी परिपक्वता ने यह हल निकाल दिया था, उस की समस्या का.

Parenting Tips : दो बच्चों का सिंगल पेरैंट हूं, बेटी पहली क्लास में गई है

Parenting Tips : 2 महीने हो गए हैं. अकसर सिर में दर्द की शिकायत करती है. डाक्टर को दिखा दिया. एमआरआई रिपोर्ट ठीक आई है फिर भी सिरदर्द हो रहा है. बेटा नर्सरी में है. मेरी मां ही बच्चों की देखभाल करती है. मैं बच्चों का पूरा ध्यान रखता हूं. बेटी की इस समस्या से परेशान हूं?

जवाब : आप की बेटी के सिरदर्द की शिकायत के कई कारण हो सकते हैं भले ही रिपोर्ट सामान्य हो. 6 साल की उम्र में बच्चे कई बार शारीरिक या मानसिक कारणों से ऐसी शिकायतें करते हैं.

क्या आप की बेटी पर्याप्त नींद ले रही है? बच्चों को 9 से 11 घंटे की नींद चाहिए. नींद पूरी न होने पर सिरदर्द हो सकता है. डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द का कारण हो सकता है. सुनिश्चित करें कि वह दिनभर पर्याप्त पानी पी रही हो. कभीकभी आंखों का नंबर या तनाव सिरदर्द का कारण बनता है. एक बार आंखों का टैस्ट करवा लें. असंतुलित खानपान या लंबे समय तक भूखे रहने से भी सिरदर्द हो सकता है. उस का खानपान नियमित और पौष्टिक रखें.

आप ने बताया कि आप सिंगल पेरैंट हैं और आप की मां बच्चों की देखभाल करती हैं. आप की बेटी शायद मां की कमी महसूस करती हो या घर के माहौल में कोई तनाव हो. बच्चे कई बार भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते और सिरदर्द जैसी शिकायत करते हैं. आप का बेटा भी है, हो सकता है कि बेटी को लगता हो कि उसे कम ध्यान मिल रहा है. बच्चे अनजाने में शारीरिक शिकायतों के जरिए ध्यान मांगते हैं.

वह स्कूल जाती है तो वहां का कोई तनाव (जैसे पढ़ाई, दोस्तों के साथ झगड़ा) भी कारण हो सकता है. उस से बातचीत करें. उस से प्यार से पूछें कि वह स्कूल, दोस्तों या घर में कैसा महसूस करती है.

अगर सिरदर्द की शिकायत बारबार हो रही है और कोई शारीरिक कारण नहीं मिल रहा, तो हां, एक बाल मनोवैज्ञानिक से मिलना अच्छा रहेगा. वे बच्चे के व्यवहार और भावनाओं को सम झ कर सही सलाह दे सकते हैं. आप अकेले पेरैंटिंग कर रहे हैं जो आसान नहीं है. अपनी मां से भी बात करें कि क्या वे बेटी के व्यवहार में कुछ असामान्य देखती हैं. धैर्य रखें और बेटी को अतिरिक्त समय व प्यार दें

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Social Media Trolls : ट्रोल आर्मी नहीं, ये जौम्बी सेना है

Social Media Trolls : देश की सुरक्षा के लिए आर्मी होती है जो देश की सीमाओं की रक्षा के लिए दिनरात मुस्तैदी से काम करती है लेकिन इधर कुछ वर्षों से देश में एक और आर्मी का गठन हुआ है जो सत्ता के नैरेटिव की सुरक्षा के लिए दिनरात काम कर रही है. सत्ता के खिलाफ बोलने वालों पर यह ट्रोल आर्मी जौम्बी की तरह टूट पड़ती है. कौन हैं ये जौम्बी आर्मी के लोग, पढ़िए.

देश का सैनिक देश की सुरक्षा के लिए शहीद होता है और इस ट्रोल आर्मी के सिपाही शहीदों की पत्नियों को गालियां बकते हैं उन का चरित्रहरन करते हैं निर्लज्जता की सारी सीमाओं को पार कर ये लोग सरेआम महिलाओं की इज्जत को तारतार करते हैं.

हिमांशी नरवाल के खिलाफ ट्रोल आर्मी की हैवानियत

पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकियों ने हमला कर दिया था, जिस में लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की भी मौत हो गई थी. आतंकियों द्वारा किए इस जघन्यतम वारदात के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया ने जम कर नफरत फैलाई. हिंदूमुसलिम के नफरती नैरेटिव को फैलाने में मेनस्ट्रीम मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

इस बीच लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की विधवा पत्नी हिमांशी नरवाल ने 1 मई को एएनआई को दिए एक बयान में हिंदूमुसलिम के नैरेटिव की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि ‘जिन लोगों ने गलत किया है, उन्हें सजा मिलनी चाहिए लेकिन हम नहीं चाहते कि लोग कश्मीरियों और मुसलिमों से नफरत करें.’

हिमांशी नरवाल के इस बयान के बाद ट्रोल आर्मी सक्रिय हो गई. हिमांशी को भद्दीभद्दी गालियां दी जाने लगीं. हिमांशी का चरित्रहरण किया जाने लगा. हिमांशी के खिलाफ सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी ने बेशर्मी और हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं.

आखिरकार राष्ट्रीय महिला आयोग ने संज्ञान लिया और कहा कि “किसी महिला को उस की वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए ट्रोल करना किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है. लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की मौत के बाद जिस तरह से उन की पत्नी हिमांशी नरवाल को उन के एक बयान को ले कर सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है, वह बेहद निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है. किसी भी सहमति या असहमति को शालीनता और संविधान के दायरे में रह कर व्यक्त किया जाना चाहिए.”

धर्म और जाति नहीं मानने की सजा

कोलकाता की 17 साल की सृजनी नाम की लड़की जिस ने आईएससी बोर्ड में 400 में 400 नंबर प्राप्त कर पूरे पश्चिम बंगाल का नाम रौशन किया है. सृजनी को उस की इस उपलब्धि के लिए देशभर से सराहना मिल रही हैं वहीं ट्रोल आर्मी इस लड़की के पीछे पड़ गई है कारण यह है कि सृजनी ने बोर्ड फार्म में जहां धर्म लिखना था, वहां लिखा “मानवता”, जहां सरनेम था, उसे खाली छोड़ दिया.

गूगल पर सृजनी का इतिहास खंगाला जाने लगा और ग्रोक एआई से बैकग्राउंड निकाल लिया गया. मां प्रोफैसर निकली और पिता साइंटिस्ट, वह भी भटनागर अवार्ड विनर. एक रिपोर्टर के पूछे जाने पर सृजनी ने जो कहा वो ट्रोल आर्मी के लिए काफी था. “मैं धर्म, जाति या जैंडर से नहीं बल्कि इंसान होने से पहचानी जाऊं. यही मेरी पहचान है.”

ऐसा कह कर सृजनी ने धर्म और जाति के नाम पर फैलाए गए नैरेटिव को चुनौती दे डाली. जो लोग भारत को धर्म और जाति में बांटना चाहते हैं सृजनी ने उन्हें एक खाली कालम से हरा दिया. जौम्बी आर्मी को मिर्ची लग गई. 17 साल की होनहार छात्रा को गालियां दी जाने लगीं. सृजनी के मांबाप को भी नहीं बक्शा जा रहा. संस्कारों की ठेकेदारी करने वाली ट्रोल आर्मी नंगानाच करने लगी.

राजनैतिक स्वार्थों के लिए ट्रोल आर्मी का सहारा

सत्ता को हथियाने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए राजनैतिक दलों को अपनी विचारधारा के पक्ष में कई झूठे नैरेटिव गढ़ने पड़ते हैं और जनता इस झूठे नैरेटिव को सच समझ कर उन्हें सर आंखों पर बिठाए रखे इस के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं.

मेनस्ट्रीम मीडिया पर कंट्रोल हो जाए तो सत्ता के झूठे नैरेटिव का व्यापक प्रचार होता है और जनता के दिमागों तक वहीं खबरें पहुंचाई जाती हैं जो सत्ता के झूठे नैरेटिव को सच साबित करती हैं. कांग्रेस के दौर में भी ऐसा होता था जब मेनस्ट्रीम मीडिया सत्ता के नैरेटिव को जनता के सामने आखिरी सच की तरह पेश करती थी.

2014 के बाद देश में बीजेपी की सत्ता आई जिस के पास अपनी विचारधारा थी. धर्म और राष्ट्रवाद के घालमेल से नएनए नैरेटिव गढ़े गए और मेनस्ट्रीम मीडिया का इस्तेमाल कर जनता के दिमाग तक पहुंचाया गया और जनता को बरगलाने के लिए पिछले 11 वर्षों से लगातार यह प्रयास चल रहा है लेकिन इस बीच सोशल मीडिया भी मजबूत हुआ है जिस से सत्ता के झूठे नैरेटिव की पोल खुलते देर नहीं लगती.

सत्ता के पक्ष में मेनस्ट्रीम मीडिया के द्वारा फैलाए गए झूठ पर तुरंत प्रतिक्रिया होती है और सच बाहर आ जाता है. विपक्षी दलों या सत्ता के नैरेटिव के खिलाफ सोशल मीडिया पर बोलने वाले लोगों पर कंट्रोल करना सरकार के लिए संभव नहीं है इसलिए एक ऐसी ट्रोल आर्मी बनाई गई है जो ऐसे लोगों के खिलाफ मोर्चा खोले रहती है और नीचता की हद तक जा कर उन का चरित्रहरण करती है.

महिला हो, विकलांग हो, विद्यार्थी हो, एथलीट हों, सैनिकों की विधवाएं हों या बूढ़े लोग यह ट्रोल आर्मी किसी को नही छोड़ती. इस ट्रोल आर्मी के पास न कोई नैतिकता होती है और न ही कोई शर्म.

Sexual Problem : मैं अपनी सैक्सुअलिटी को ले कर बहुत कन्फ्यूज्ड हूं

Sexual Problem : मैं प्राइवेट सैक्टर में जौब करता हूं, 30 साल का हो गया हूं. घर में पेरैंट्स शादी करने के लिए दबाव डाल रहे हैं. मुझे कभी किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं रही. 2 साल पहले औफिस के पुरुष कलीग से बहुत गहरी दोस्ती हो गई थी. इस बात से मैं इतना परेशान हो गया कि नौकरी ही बदल ली. मैं शादी कर के किसी लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहता. मैं पेरैंट्स का इकलौता बेटा हूं. उन के प्रति भी मेरी जिम्मेदारियां हैं. इन सब परेशानियों की वजह से मेरा कैरियर प्रभावित हो रहा है. कृपया मेरी उल झन को सुल झाएं.

जवाब : आप की बात को ध्यान से पढ़ने व समझने के बाद यह साफ हुआ कि आप एक गहरे भावनात्मक और मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे हैं. यह बहुत बड़ी बात है कि आप अपनी भावनाओं को खुलेपन से व्यक्त कर रहे हैं. सैक्सुअलिटी को ले कर कन्फ्यूजन होना असामान्य बात नहीं है खासकर तब जब समाज और परिवार की अपेक्षाएं हम पर हावी हो जाती हैं. आप ने बताया कि आप को कभी किसी लड़की में दिलचस्पी नहीं रही और एक पुरुष मित्र के साथ आप की गहरी दोस्ती हुई, जिस ने आप को परेशान कर दिया. यह संकेत हो सकता है कि आप की सैक्सुअलिटी ‘होमोसैक्सुअल’ (समलैंगिक) हो.

यह आत्मस्वीकृति का सफर धीरेधीरे और अपने समय पर होता है. खुद से सवाल करें कि आप सचमुच क्या चाहते हैं. बिना किसी दबाव के, सिर्फ अपने दिल की सुनें. दूसरी ओर, मातापिता का शादी के लिए दबाव डालना भारतीय परिवारों में आम है, खासकर जब आप उन की इकलौती संतान हैं.

शादी कर के किसी की जिंदगी बरबाद न करने की आप की सोच का मतलब है कि आप न सिर्फ अपने बारे में, बल्कि दूसरों के बारे में भी सोचते हैं. कुछ सु झाव जो आप की मदद कर सकते हैं. अपनी सैक्सुअलिटी को सम झने के लिए जल्दबाजी न करें. यह एक निजी यात्रा है और इस में आत्मचिंतन की जरूरत होती है. अगर संभव हो तो किसी भरोसेमंद दोस्त या काउंसलर से बात करें, जो आप को बिना जज किए सुन सके.

अपने मातापिता से खुल कर बात करें. यह मुश्किल हो सकता है, लेकिन उन्हें बताएं कि आप अभी शादी के लिए तैयार नहीं हैं. आप को अपनी सैक्सुअलिटी के बारे में पूरी बात बताने की जरूरत नहीं है, अगर आप सहज नहीं हैं. बस, इतना कहें कि आप अपने कैरियर और जिंदगी को ले कर कुछ और समय चाहते हैं. धीरेधीरे उन्हें अपनी सोच के लिए तैयार करें.

अगर आप को लगता है कि आप पुरुषों की ओर आकर्षित हैं तो इस में शर्मिंदगी या ग्लानि की कोई बात नहीं है.

आप अकेले नहीं हैं, दुनिया में लाखों लोग हैं जो समलैंगिक हैं और सुखी, सफल जिंदगी जी रहे हैं. भारत में परिवार और समाज अभी भी समलैंगिकता को ले कर बहुत जागरूक नहीं हैं. लेकिन समय के साथ चीजें बदल रही हैं. 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटा कर समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता दी. इस का मतलब है कि आप के पास अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का हक है.

भविष्य में अगर आप चाहें तो ऐसा साथी ढूंढ़ सकते हैं जो आप को सम झे और जिस के साथ आप सुखी रहें या अगर आप अकेले रहना पसंद करें तो भी आप अपनी जिंदगी को अपने शौक, दोस्ती और लक्ष्यों से भरपूर बना सकते हैं.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Mahabodhi Temple Controversy : हर धर्म के मामले में हिंदुओं की अड़ंगी

Mahabodhi Temple Controversy : लड़ाई या विवाद सिर्फ इतना सा है कि ब्राह्मण पंडेपुजारी महाबोधि मंदिर से अपनी दुकान समेटना नहीं चाहते क्योंकि यह मंदिर उन के लिए दुधारू गाय सरीखा है. दूसरी तरफ बौद्ध भिक्षु इस मंदिर में पिंडदान और दूसरे कर्मकांडों से व्यथित हैं. मंदिर उन का है लेकिन पूर्ण आधिपत्य उन का नहीं. ऐसे में उन का विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक है जिस के भविष्य में विस्फोटक या उग्र हो जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

वक्फ मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान 16 अप्रैल को उस वक्त दिलचस्प मोड़ आया था जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने बेहद तल्ख और साफ लहजे में यह पूछा था कि क्या आप कह रहे हैं कि अब से आप हिंदुओं के ट्रस्ट या दान प्रबंधन करने वाले बोर्ड में मुसलिमों को शामिल करने की अनुमति देंगे, साफसाफ बताइए. इस अप्रत्याशित सवाल पर सरकार की ओर से पैरवी कर रहे सौलीसिटर जनरल तुषार मेहता कुछ देर के लिए सकपकाए, फिर संभल कर बोले थे कि संपत्ति के प्रबंधन और धार्मिक मामलों से जुड़े मामलों में फर्क करना होगा.

जाहिर है, इस दलील में कोई दम नहीं था लेकिन, हां, मेहता अपने तजरबे के दम पर बात को एक खुबसूरत से मोड़ पर ले जाने में कामयाब रहे थे पर वह मोड़ इस अफसाने का अंजाम नहीं था. इसलिए 17 अप्रैल को इस मामले को उबाऊ ढंग से भी देख और सुन रहे लोगों ने सब से बड़ी अदालत के इस सवाल का जवाब अपनेअपने ढंग से अपनेआप ही को देने की कोशिश की थी लेकिन वे भी खी झ और लड़खड़ा कर रह गए थे.

लड़खड़ाने की वजहें धार्मिक थीं कि जिस धर्म के सब से बड़े आयोजन कुंभ में मुसलिमों का प्रवेश वर्जित हो, जिस के धीरेंद्र शास्त्री जैसे दर्जनों धर्मगुरु आएदिन यह फतवा जारी करते रहते हों कि हिंदू मंदिरों के बाहर मुसलमानों को दुकान नहीं लगाने देंगे, और तो और, आएदिन ही खासतौर से हिंदू तीजत्योहारों पर सोशल मीडिया पर इस आशय की अपीलें जारी की जाती हों कि मुसलमानों से सामान नहीं खरीदना है, हमें उन का आर्थिक बहिष्कार कर उन की कमर तोड़नी है, उस धर्म से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह अपने ट्रस्टों में या दान प्रबंधन करने वाले बोर्डों में मुसलिम तो मुसलिम किसी और अल्पसंख्यक धर्म को झांकने देंगे. मंदिरों के खजानों की तरफ तो पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और औरतों तक के लिए नो एंट्री की तख्ती सदियों से लटकी है.

शायद ही कभी किसी ने देखासुना या महसूस किया हो कि किसी मंदिर की दानपेटी खोल कर दक्षिणा गिनने वालों में इन तबकों का कोई सदस्य शामिल भी था.

लेकिन खुद हिंदू अल्पसंख्यक धर्मों के मामलों में अपनी टांग फंसाने का कोई मौका नहीं छोड़ते. ताजी मिसाल बिहार के बोधगया मंदिर की है जहां फरवरी के महीने से बौद्ध धर्म के अनुयायी मांग कर रहे हैं कि बीटीए को निरस्त किया जाए. बौद्धों को महाबोधि महाविहार दें. बीटीए संविधान विरोधी है.

क्या है बीटीए

बीटीए का पूरा नाम बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 बिहार विधानसभा द्वारा बनाया एक ऐसा कानून है जिस के तहत बौद्धों और हिंदुओं के बीच एक समिति बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति यानी बीटीएमसी बनाई गई थी. जिस के 8 सदस्यों में से 4 बौद्ध और 4 हिंदू होते हैं. ये सभी बिहार सरकार द्वारा नामित होते हैं. इस में गया का डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अध्यक्ष होता है, जिस का हिंदू होना अनिवार्य था. लेकिन 2013 में यह प्रावधान हटा लिया गया था.

यह व्यवस्था लंबे वक्त से चले आ रहे विवाद को सुल झाने के नाम पर बौद्धों के लिए एक झुन झुना मात्र थी क्योंकि इस से हिंदुओं का दबदबा कायम रहा. बोधगया मंदिर विवाद दूसरे मंदिर विवादों से अलग नहीं है जिस का इतिहास बताता है, यह दरअसल एक बौद्ध मंदिर ही है जिसे पहले हिंदू पंडेपुजारियों ने कब्जाया. लेकिन इस पर देशविदेश के बौद्धों ने एतराज जताया तो इसे चालाकी दिखाते कानूनी तौर पर हिंदुओं के हवाले कर दिया गया. इस में देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का अहम रोल रहा जो कांग्रेसी होते हुए भी कट्टर हिंदूवादी थे.

1922 में जब गया में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था तब महाबोधि सोसाइटी के सदस्यों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था. लेकिन कांग्रेसी सनातनियों ने धूर्तता दिखाते बौद्धों को हाशिए पर ही रखा. लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य या प्रमाण न पहले कभी झुठलाया जा सका था और न आज विवाद के फिर से सुलगने पर कोई यह कह पा रहा है कि इसे तीसरी शताब्दी के पहले सम्राट अशोक ने नहीं बनवाया था व यहीं वट वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था और यह ज्ञान ऊपर कहीं से नहीं टपका था बल्कि बुद्ध का अपना चिंतन और दर्शन एक निष्कर्ष की शक्ल में सार्वजनिक तौर पर व्यक्त होना शुरू हुआ था.

मंदिर का विवादित इतिहास

सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाए जाने के बाद यह मंदिर पूरी तरह बौद्धों के नियंत्रण में रहा. इस के बाद 16वीं शताब्दी में शैव संप्रदाय के एक हिंदू ब्राह्मण पुजारी घमंड गिरी ने यहां पूजापाठ शुरू कर दी तब बौद्धों और भिक्षुओं ने बुद्ध के करुणा के सिद्धांत के तहत कोई एतराज नहीं जताया. तब से ले कर रहरह कर जो विवाद खड़े होते रहे हैं उस की जड़ भी यही करुणा है.

घमंड गिरी के वंशज आज भी अपने पुश्तैनी कारोबार को अंजाम दे रहे हैं. अब तो पैसा कमाने की गरज से और भी पंडेपुजारी गया की इस बहती फल्गु नदी में हाथ धोने इस मंदिर में अपनी दुकान चला रहे हैं. उन की दलील है कि यह हिंदू तीर्थ हैं क्योंकि बुद्ध विष्णु के वशंज थे.

बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करने की ब्राह्मणी साजिश से परे यहां स्वाभाविक तर्क यह उठता है कि अगर ऐसा है तो देशभर के विष्णु और उस के अवतारों राम व कृष्ण के मंदिरों में बुद्ध की मूर्तियां क्यों नहीं? वहां उन का पूजापाठ क्यों नहीं?

अगर कोई हिंदू धर्मगुरु इस मामूली से सवाल का जवाब कभी दे पाता या आज दे पाए तो बात या विवाद इस मुकाम तक पहुंचता ही नहीं, इस मुकाम तक यानी हालिया धरनेप्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट तक.

दरअसल, घमंड गिरी के बोधगया कब्जाने की अपनी एक अलग और अहम वजह यह थी कि 13वीं शताब्दी में तुर्की आक्रमण के बाद अधिकतर बौद्ध भिक्षु यहांवहां हो गए थे. मैदान खाली देख घमंड गिरी ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि वही महाविहार यानी महाबोधि मंदिर के वैध उत्तराधिकारी हैं. इस के बाद वे और उन के वारिस तबीयत से पूजापाठ के अपने पुश्तैनी कारोबार के जरिए पैसा कमाते रहे. जिन बुद्ध ने हिंदू कर्मकांडों और पूजापाठ का जम कर विरोध किया था उसी मंदिर के गया में होने के चलते पिंडदान भी होने लगे.

लंबा वक्त गुजरने के बाद एक इंग्लिश लेखक व पत्रकार एडविन अर्नोल्ड ने 1885 में महाबोधि मंदिर को बौद्धों को वापस लौटाने की बात उठाई. इस के 5-6 साल बाद ही श्रीलंका के एक नागरिक/अनागरिक धर्मपाल के पांव यहां पड़े और उन्होंने महाबोधि सोसाइटी की स्थापना करते मंदिर पर बौद्धों के नियंत्रण के लिए मुहिम छेड़ दी.

फिर कांग्रेस अधिवेशन के बाद इस में राजनीति भी इन्वौल्व हो गई. डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जो किया सो किया लेकिन महात्मा गांधी स्वीकार चुके थे कि यह बौद्ध मंदिर है. इस के बाद रवींद्रनाथ टेगौर ने भी इस से सहमति जताते हिंदुओं से आग्रह किया था कि वे इसे बौद्धों को सौंप दें.

कांग्रेस के मौजूदा दिग्गज नेता जयराम रमेश भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि यह बौद्ध मंदिर है. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द लाइट औफ एशिया द पोयम दैट डिफाइन बुद्धा’ में एडविन अर्नोल्ड का जिक्र करते लिखा है, ‘‘अगस्त 1727 में एक मुगल राजकुमार ने शिवियों (शैवों) को इस क्षेत्र में स्वामित्व अधिकार स्थापित करने के लिए एक विलेख दिया था. विलेख दिए जाने के बाद शिवियों ने मंदिर और उस के आसपास के क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और तब से हिंदू और बौद्ध दोनों ही इस तक पहुंच सकते थे.’’

केजरीवाल सरकार में मंत्री रह चुके राजेंद्र गौतम ने भी बोधगया पहुंच कर बौद्धों का समर्थन किया था. हिंदू देवीदेवताओं पर विवादित टिप्पणियां करने से सुर्खियों में रहे राजेंद्र गौतम कहते हैं, ‘‘ब्राह्मणों को अपना दिल बड़ा कर के हमारा मंदिर हमें दे देना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज होगा.’’

दलित सांसद व भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद भी इस मामले को संसद में उठा चुके हैं. उन्होंने भी बोधगया जा कर बौद्ध भिक्षुओं का समर्थन करते मंदिर को ब्राह्मणमुक्त करने की बात कही.

अप्रत्यक्ष और अघोषित रूप से यह लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण भी होती जा रही है क्योंकि बाकी सवर्ण हिंदुओं का बुद्ध से कोई बैर या परहेज नहीं. वे न तो बुद्ध को मानतेपूजते और न ही उन से असहमत हो पाते हैं. सिर्फ ब्राह्मण ही बुद्ध विरोधी हमेशा से रहा है. दूसरी तरफ अधिकतर दलित ही बौद्ध धर्म को मानते और अपनाते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में यह आंदोलन एक बड़ा मुद्दा होगा, यह भी साफ दिख रहा है. बिहार के सवा लाख बौद्ध और बौद्ध धर्म से प्रभावित लाखों दलित एकतरफा वोट भी कर सकते हैं, जो जाहिर है इंडिया गठबंधन के खाते में जाएंगे.

अब क्या और क्यों चाहते हैं बौद्ध

इस बार फिर पिछली 12 फरवरी से बौद्ध भिक्षु बोधगया में धरनाप्रदर्शन कर रहे हैं. उन की पहली और सीधी मांग यह है कि बीटी एक्ट खत्म किया जाए. इस मुहिम ने जोर पकड़ना शुरू किया तो देशभर के बौद्ध भिक्षुओं के समर्थन में बौद्ध गया पहुंचने लगे. इस पर प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को महाबोधि मंदिर से खदेड़ दिया तो इन लोगों ने मंदिर से एक किलोमीटर दूर दोमुहान नाम की जगह को अपना ठिकाना बना लिया. इस धरना स्थल पर जगहजगह संविधान की प्रतियां और भीमराव अंबेडकर के फोटो देखने को मिल जाते हैं.

विरोध प्रदर्शन की बात और फैली तो बड़ी तादाद में बुद्धिस्ट दोमुहान लगातार अभी भी पहुंच रहे हैं. इन में महिलाओं की तादाद खासी है. कई शहरों में बीटीए को संविधान विरोधी बताते कैंडल मार्च निकलने लगे. देशभर के बौद्ध विहारों में इस मुद्दे को ले कर मीटिंग्स हो रही हैं. ये सभी चाहते यही हैं कि महाबोधि मंदिर का प्रबंधन और नियंत्रण पूरी तरह बौद्धों के हाथ में दिया जाए. राजेंद्र गौतम और चंद्रशेखर जैसे नेता तुक की बात कहते हिंदू की जगह ब्राह्मण शब्द बेवजह इस्तेमाल नहीं करते दिखे.

इस मुहिम की अगुआई कर रहे अखिल भारतीय बौद्ध मंच के आकाश लामा यहां आ रहे मीडियाकर्मियों से कहते हैं कि इस दुनिया में किसी भी धार्मिक स्थल पर दूसरे धर्म का कब्जा नहीं है. मसजिद को मुसलमान चलाते हैं, मंदिर को हिंदू और गुरुद्वारे को सिख चलाते हैं. लेकिन महाबोधि मंदिर में हिंदुओं का कब्जा है.

बकौल आकाश लामा, इस मांग को ले कर वे बिहार सरकार और अल्पसंख्यक आयोग भी गए लेकिन कहीं हमारी सुनवाई नहीं हुई. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है जिस में अपनी टांगफसाऊ आदत के मुताबिक हिंदू पक्ष की तरफ से विश्व हिंदू परिषद भी कूद पड़ा है.

हिंदुओं का दावा चूंकि कमजोर है, इसलिए उन्हें समर्थन भी कम मिल रहा है. उलट इस के, बौद्धों के समर्थन में आवाजें विदेशों से भी आईं जिन में अमेरिका और जापान के नाम उल्लेखनीय हैं. 7 मार्च को अमेरिका में भारतीय दूतावास के बाहर सैकड़ों बौद्ध अनुयायियों ने इकट्ठा हो कर महाबोधि मंदिर को बौद्धों को सौंपने की बात कही थी. भारत सहित दुनियाभर के 500 से भी ज्यादा बौद्ध संगठन इस मुद्दे पर लामबंद हैं. वैसे भी, साल 1992 में जापान से भारत आ कर बस गए एक बौद्ध भिक्षु सराई सुसाई ने इस मांग को ले कर एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था.

लड़ाई का असल मुद्दा कर्मकांड

हिंदू यानी ब्राह्मण महाबोधि मंदिर से आसानी तो क्या मुश्किल से भी कब्जा छोड़ेंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि पिंडदान जैसे कर्मकांड से इन की जेबें भरती हैं. हैरानी तो इस बात की ज्यादा है कि बौद्ध धर्म की बुनियाद ही हिंदू कर्मकांडों, जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसे विकारों पर पड़ी है. बुद्ध ने एक वक्त में अपनी थ्योरियों के प्रभाव से ब्राह्मणवाद लगभग खत्म कर दिया था. लेकिन धूर्त ब्राह्मणों ने उन्हें ही विष्णु का अवतार घोषित कर अपनी रोजीरोटी आंशिक रूप से बचा ली थी जो बाद में बढ़ती गई और अब मोदी राज में भाजपा की मंदिर नीति के चलते सरपट दौड़ रही है.

अब इस मंदिर में दुकान चला रहे पंडेपुजारी स्थानीय लोगों को यह बताते रहते हैं कि दरअसल महाबोधि मंदिर हिंदू मंदिर है. विद्यानंद पांडे नाम के एक पुरोहित इन में से एक हैं जिन की दलील यह है कि हमारे यानी हिंदुओं के शिवलिंग और 5 पांडव यहां हैं. लाखों लोग यहां पिंडदान करते हैं. हम पीढि़यों से पिंडदान कराते आ रहे हैं और आगे भी कराते रहेंगे. लेकिन ये लोग कहते हैं कि सनातन धर्म को हटा दो. आखिर, भगवान बुद्ध किस की औलाद हैं.

उलट इस के, आकाश लामा का रोना यह है कि मंदिर में पिंडदान के नाम पर लोटाथाली सब जा रहा है लेकिन हम अपना कैमरा भी नहीं ले जा सकते. उन की नई चिंता इस्कौन मंदिर वालों के यहां पड़ते कदम हैं. उन के मुताबिक, यह मंदिर विश्व धरोहर है, इस का सम्मान किया जाना चाहिए. धरनाप्रदर्शन कर रहे बौद्ध यह दलील भी देते हैं कि यह एक्ट संविधान बनने के पहले बना था, हमें तो भीमराव अंबेडकर के संविधान के हिसाब से एक्ट चाहिए. महाबोधि मंदिर बौद्धों को सौंप दिया जाना चाहिए.

बौद्धों की इस दलील में भी दम है कि महाबोधि मंदिर को दुनियाभर के बौद्धों से दान मिलता है लेकिन वह पैसा स्कूलअस्पताल वगैरह बनवाने में खर्च नहीं किया जाता. वह स्वागतसत्कार में ही उड़ा दिया जाता है. यानी लड़ाई दानदक्षिणा की भी है पर हिंदू इस मंदिर में ज्यादा दान नहीं देते बनिस्बत बौद्धों के.

यानी बौद्धों की बड़ी तकलीफ बुद्ध के इस मंदिर में होते कर्मकांड भी हैं और जाहिर है वे तब तक होते रहेंगे जब तक बीटी एक्ट में हिंदू सदस्यों का प्रावधान है. अब देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्ष क्या दलीलें देते हैं और कौन सा पक्ष अपने पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य पेश कर पाएगा. हालांकि इस लिहाज से बौद्धों का दावा भारी और दमदार है.

गुरुद्वारों को भी नहीं बख्शा था

हिंदू यानी ब्राह्मण पंडेपुजारी अपने मठमंदिरों से पैसा कमाएं, यह बहुत ज्यादा एतराज की बात इस लिहाज से नहीं कि हर धर्म अपनी प्राथमिकता में भक्तों और अनुयायियों की जेब पर उस्तरा चलाने को ही निर्मित हुआ है. चर्चों और मसजिदों में इस से जुदा कुछ नहीं है, न ही जैन मंदिर अछूते हैं. बस, तरीके अलगअलग हैं. ये सब के सब दरअसल दानदक्षिणा और चढ़ावा कलैक्शन सैंटर हैं. लेकिन सिख और बौद्ध धर्म में यह लूटपाट अपेक्षाकृत कम और लगभग स्वैछिक है.

दिलचस्प चिंता की बात यह है कि क्यों पंडेपुजारी दूसरे धर्मों के स्थलों से भी पैसा बटोरना चाहते हैं जबकि देश में लाखों मंदिर हैं और अब तो रोजरोज नएनए बन रहे हैं. पुराने ब्रैंडेड मंदिर कैसे सरकार चमका रही है, यह हम आएदिन तथ्य और आंकड़ों के साथ प्रकाशित करते रहे हैं और यह सिलसिला टूटेगा नहीं.

वक्फ बोर्ड में गैरमुसलिम सदस्यों, जाहिर है, हिंदुओं की भरती पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है. सवाल यह कि क्यों हिंदुवादियों की सरकार हर धर्म में किसी न किसी तरह हिंदू घुसपैठ चाहती है? जहां वह सीधे नहीं पहुंच सकती वहां यह काम उस के अघोषित एजेंट पंडेपुजारी कर रहे हैं. इस की ताजी मिसाल महाबोधि मंदिर है लेकिन इस के पहले ये पंडेपुजारी सिखों के गुरुद्वारों से भी इफरात से पैसा कमाते थे.

पृथक खालिस्तान की मांग हालफिलहल भले ही हाशिए पर हो लेकिन इस का जिन्न हर कभी बोतल के बाहर आ जाता है. हिंदूसिख मतभेदों का इतिहास इस से जुड़ा है. अब से कोई 105 साल पहले ये मतभेद उजागर होना शुरू हुए थे जब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन चरम पर था.

गुरुद्वारे सिखों की सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र तब भी हुआ करते थे. लेकिन इन का संचालन तब ब्राह्मणपुजारी किया करते थे जिन्हें महाद कहा जाता था. पैसा कमाने की गरज और नीयत से इन महादों ने एक वक्त में गुरुद्वारों को भी लूटखसोट का अड्डा बना डाला था. इस के लिए जाहिर है उन्हें ज्योतिष, टोनेटोटके, तंत्रमंत्र सहित मूर्तिपूजा और दूसरे डर दिखाने पड़ते थे.

हद तो तब हो गई थी जब इन्होंने छोटी जाति के सिखों के गुरुद्वारे आने पर रोक लगाना शुरू कर दी थी जोकि सिख धर्म के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ बात थी.

सिखों ने इस लूट और अंधविश्वासों का विरोध किया और गुरुद्वारों का प्रबंधन ब्राह्मणपुजारियों यानी महादों से छीनते उन्हें खदेड़ दिया. इस के बाद ही अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी वजूद में आए. मुफ्त की रोजीरोटी छिनी, तो ब्राह्मणों ने सिखों को तरहतरह से बदनाम करना शुरू कर दिया.

शुक्र इस बात का है कि बौद्धों को वे ज्यादा बदनाम नहीं कर पा रहे. लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट से हारे तो उन्हें बदनाम नहीं करेंगे, इस बात की गारंटी नहीं. लेकिन तब तक मोक्ष प्राप्ति और पिंडदान के नाम पर वे खासी रकम बना चुके होंगे और नहीं हारे यानी कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था कायम रखी तो धंधा और तेज व बेखटक चलेगा ही.

Love Story : छाया – दो प्रेम दीवानों की अधूरी कहानी

Love Story : ‘‘तुम में इतना धैर्य कहां से आ गया. 2 दिन हो गए एक फोन भी नहीं किया,’’ विनय झल्लाहट दबा कर बोला.

‘‘नारी का धैर्य तुम ने अभी देखा ही कहां है. वैसे भी मैं तुम्हारे साथ थी भी कहां. बस, एक भीड़ का हिस्सा थी,’’ वृंदा का स्वर शांत था.

‘‘क्या मतलब है. ऐसे कैसे कह सकती हो. परसों मिले थे तो कोई लड़ाईझगड़ा नहीं हुआ था. मैं ने तुम्हें कुछ कहा भी नहीं जिस से तुम्हें गुस्सा आए.’’

‘‘कहने की जरूरत नहीं होती. पिछले 6 महीने से तुम लगातार मुझे अनदेखा करते आ रहे हो और मैं हमेशा सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचती रहती हूं. परसों भी अपनी किसी न किसी महिला मित्र से तुम फोन पर बात करते रहे, मानो मैं तुम्हारे साथ थी ही नहीं.’’

‘‘वह तो मेरी लाइन ही ऐसी है.’’

‘‘पर मैं तो पूरी तरह तुम्हारे सुखदुख में भागीदार बन कर समर्पित रही. जब भी तुम्हें कोई काम पड़ा तुम मुझे कह देते और तुम्हारा वह काम करते हुए मुझे लगता कि मैं प्यार के लिए अपना फर्ज निभा रही हूं.’’

‘‘यार, ऐसा कुछ भी नहीं है. अच्छा तुम कल मिलो. ये बेकार की बातें हैं, इन्हें दिमाग से निकालो. कुछ भी नहीं बदला है.’’

‘‘अभी आफिस में काम है, फिर बात करेंगे,’’ कह कर वृंदा मोबाइल औफ करती हुई दफ्तर में लौट आई.

अपनी कुरसी पर बैठी वृंदा सोचने लगी कि इसी विनय ने 2 साल पहले शुरुआती दौर में कितनी कोशिश कर के उस से संपर्क बढ़ाया था. नौकरी लगने के बाद जब वृंदा ने अपनी कहानी छपवाई तो उस को लगा था कि वह हवा में उड़ रही है. पहली ही कहानी किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छप जाए और प्रशंसा के सैकड़ों पत्र मिलें तो मन तो उड़ेगा ही.

बाद में उस की कुछ और कहानियां छपीं तो कुछ पाठकों के फोन भी आने लगे. कुछ तो प्रशंसा के बहाने अपनी रचना पढ़ने का अनुरोध कर देते. कुछ छपी कहानी की समीक्षा विस्तार से करते.

उन्हीं प्रशंसकों में से एक विनय भी था. किसी भी अखबार में वृंदा का कुछ छप जाता तो सब से पहले उस का फोन आता.

एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘आप क्या हर महिला लेखिका को फोन करते हैं? मेरे अलावा दूसरे लेखकों को भी पढ़ते हैं क्या?’

‘मैडम, मैं पत्रकार हूं. साहित्यिक पृष्ठ मैं ही तैयार करता हूं. बाकी पत्रपत्रिकाओं में क्या जा रहा है उस की पूरी जानकारी मुझे रहती है.’

‘क्या आप मेरी कहानियों को संभाल कर रखते हैं?’ वृंदा ने झिझकते हुए पूछा.

‘मैं आप का जबरदस्त प्रशंसक हूं. बताइए, क्या सेवा है.’

‘आप के यहां से प्रकाशित पत्रिका के पिछले अंक में मेरी एक कहानी छपी है. उस की एक भी प्रति मेरे पास नहीं है. क्या आप एक प्रति भिजवा देंगे. शायद पोस्टमैन ने रख ली होगी.’

और अगले दिन विनय मेरे आफिस के रिसेप्शन पर बैठा था. हम दोनों चाय पीने के लिए पास के रेस्तरां में बैठे तो विनय का फोन बारबार बज उठता.

‘किसी मित्र का फोन है क्या? सुन लो.’

‘नहीं, बड़ी मुश्किल से आप से मिलना हो पाया है. बाद में फोन सुन लूंगा. मुझे आप की कहानियां सच में बहुत अच्छी लगती हैं और प्रभावित भी करती हैं. बाकी लेखिकाएं नारी विमर्श के नाम पर मीडिया से जुड़ा जो कुछ लिख रही हैं वह पढ़ा नहीं जाता है.’

‘मुझे भी लगता है कि नारी आंदोलन को व्यवसाय बना लिया गया है. ऐसी औरतें नारी मुक्ति का झंडा उठाए हुए हैं जो खुद कब की आजाद हो चुकी हैं.’

‘आप समाज के सभी पात्रों को लेती हैं. हमारे परिवार के ढांचे को तोड़ने वाले साहित्य का क्या फायदा. कुछ लेखिकाएं ‘लिव इन रिलेशन’ को मुद्दा बना कर लिख रही हैं तो कुछ कई पुरुषों के साथ यौन संबंधों पर. हम कह सकते हैं कि आपस में वादा और विश्वास होने की बातें कहीं खोती जा रही हैं.’

‘ये तथाकथित लेखिकाएं महिलाओं के किस वर्ग को चित्रित कर रही हैं. इन की चकाचौंध में समस्याओं का सामना करने वाली निम्न और मध्यम वर्ग की महिलाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता,’ वृंदा जोश में बहती जा रही थी.

‘मैडम, आज मेरा इंटरव्यू है. अब निकलता हूं. अब तो आप से मिलना- जुलना होता ही रहेगा,’ यह कह कर विनय फटाफट चला गया.

फिर तो वृंदा को मानो बात करने के लिए बेहद सुलझा हुआ अपनी तरह की सोच वाला साथी मिल गया. घर और आफिस के बंधेबंधाए ढांचे में सामाजिक चर्चाओं के लिए कोई भी नहीं था. पर विनय के साथ चर्चाओं का दायरा जल्दी ही टूट गया. बौद्धिक चर्चाएं स्त्रीपुरुष के परस्पर आकर्षण पर आ कर रुक गईं. साहित्य जीवन से ही तो बना है. मगर विनय फ्रीलांसर था. इसलिए उस ने साफ कह दिया कि कहीं पक्की नौकरी लगने तक उसे शादी के लिए रुकना होगा.

विनय ने भी हिंदी और अंगरेजी साहित्य पढ़ा था. पर उसे सरकारी नौकरी से चिढ़ थी. पत्रकार को जो आजादी है, वह और किस को है. फिर पावर भी तो है. सत्ता के साए में रहने वाले बड़ेबड़े लोगों से मिलने और बात करने का मौका जिस सहजता से एक पत्रकार को मिलता है वह दूसरों को कहां मिलता है. विनय को एक न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो उस का व्यक्तित्व निखर गया और उसी के साथ उस के संपर्क बढ़ते जा रहे थे.

उस दिन लंच में वे दोनों पार्क में बैठे थे तो विनय फोन सुनने लगा. ग्रुप के मित्रों की आपसी खटपट को ले कर वह नीता से 20 मिनट तक बात करता रहा. धीरेधीरे अलगअलग नामों के फोन आने लगे. विनय फोन काटता तो तुरंत एसएमएस आ जाता. वृंदा के साथ होने पर भी विनय का ध्यान दूर जाने लगा था.

वृंदा को विनय अपने कामों में उलझाए रखता. कभी समीक्षा के लिए लाइब्रेरी से किताब मंगाता तो कभी कोलकाता में अपने घर जाने के लिए रेल का आरक्षण कराने के लिए वृंदा को कह देता. वह लंच में आधाआधा घंटा उस का इंतजार करती रहती और जब विनय आता तो फोन पर कोई न कोई डिस्टर्ब करता रहता.

धीरेधीरे वृंदा को लगने लगा कि वह प्यार किसे करती है विनय को या प्यार की धारणा को. जो आदमी अभी से कई लोगों में बंटा है, शादी के बाद उस से कैसे निष्ठा की उम्मीद की जा सकती है. फिर तो पूरा परिवार और समाज बीच में आ जाएगा. कभी वह विनय को टोकती तो कह देता, ‘तुम्हारा वहम है. वह मेरी महिला मित्र है. सब से काम पड़ता है. फिर हमारा दायरा ऐसा है जिस में पीनेपिलाने के लिए पार्टीज चलती ही रहती हैं.’

‘मुझे इन्हीं से चिढ़ है. जहां तक शराब की बात है तो हमारे यहां इसे कोई पसंद नहीं करता. फिर औरतों का शराब पीना तो हम सोच भी नहीं सकते.’

‘तुम अपनी मध्यवर्गीय सोच से बाहर निकलो. सब की अपनीअपनी जिंदगी है. मैं तो कम ही पीता हूं पर ग्रुप में कुछ लोग मुफ्त की देख कर इतनी पी लेते हैं कि उन के लिए घर लौटना मुश्किल हो जाता है.’

‘देखो विनय, अगर तुम शराब नहीं छोड़ोगे तो हम शादी भी नहीं कर सकते हैं.’

‘रहना तो मुझे पत्रकारिता की दुनिया में ही है. तुम अपने मातापिता को समझाओ न कि शायद पीने वाला हर आदमी बुरा नहीं होता है.’

‘मुझे मत समझाओ. मैं ने शादियों में शराब पी कर लोगों को हुड़दंग करते देखा है. बीवी को पीटते लोग भी देखे हैं. हमारे एक रिश्तेदार की मौत शराब पीने के बाद छत से गिर कर हो गई थी. जब मैं ही तुम से कनविंस नहीं हो पा रही हूं तो मम्मीपापा को कैसे करूं. हम दोनों की जिंदगी और हमारे मूल्यांकन का तौर- तरीका बिलकुल अलग है. जो चीज तुम्हें सामान्य लगती है वह मेरे लिए अजीब हो जाती है. फिर तुम सिर्फ मेरे नहीं हो बल्कि नीता, पिंकी, श्वेता यानी एकसाथ कितनी लड़कियों से दोस्ती की हुई है, जो तुम्हारे करीब आने के लिए एकदूसरे को पछाड़ने में लगी हुई हैं.’

‘उन के साथ काम के सिलसिले में बाहर जाना होता है. फिर मैं हूं ही इतना हैंडसम और वैलबिहेव्ड कि सभी मुझे पसंद करती हैं. पर मैं शादी तो तुम से ही करूंगा.’

वृंदा का फ्रस्ट्रैशन बढ़ने लगा था. विनय का फोन अकसर व्यस्त मिलने लगा. कहीं उस की सरकारी नौकरी के कारण ही तो उस से वह शादी करने के लिए जिद पर अड़ा हुआ है. फिर वृंदा की कहानियों और व्यक्तित्व की जो तारीफ शुरू में होती थी वह क्या था? शायद फ्लर्ट करने का तरीका. जिन सामाजिक महिला कार्यकर्ताओं, लेखिकाओं की शुरू में विनय आलोचना करता था, हमेशा उन्हीं के बीच तो रहता है. वह रिश्ता शायद दोनों के लिए अपरिचित संसार का आकर्षण था. वृंदा मुलाकातों में खुद के लिए विनय के मन में जगह ढूंढ़ती मगर वहां उसे भीड़ नजर आती.

शाम को विनय का फोन फिर आया, ‘‘कल लंच में मिलो न, नाराज क्यों हो?’’

‘‘नाराज नहीं हूं पर मुझे नहीं लगता कि हमें शादी करनी चाहिए. ऐसी जिंदगी का क्या फायदा जिस में मैं तुम्हारे लाइफस्टाइल की आलोचना करती रहूं और तुम मेरे. अपनी लाइफ स्टाइल की ही किसी लड़की से शादी कर लो. मैं भी अपने रिश्ते के बारे में सोचतेसोचते थक गई हूं. कोई रास्ता तो निकलेगा ही.’’

‘‘ध्यान से सोचो. जल्दबाजी में कोई फैसला मत लो.’’

‘‘नहीं, मैं तुम से जितना प्यार करती हूं उतना तुम मुझ से कभी भी नहीं कर पाओगे. हमेशा मैं ही समझौता करती हूं और तुम पूरा ध्यान न दो, ऐसा कब तक चलेगा,’’ कह कर वृंदा ने फोन काट दिया.

अचानक उस ने राहत की सांस ली. रुलाई फूट रही थी मगर प्यार या रिश्ते की छाया के पीछे कब तक भागा जा सकता है. एक कविता की पंक्ति मन में उभरी :

‘मेरा तेरा रिश्ता तू तू मैं मैं का रहा. मैं तू तू करती रही, तू मैं मैं करता रहा.’

Online Hindi Story : उसके साहबजी – श्रीकांत की जिंदगी में क्या शामिल हो पाई शांति ?

Online Hindi Story : दरवाजे की कौलबैल बजी तो थके कदमों से कमरे की सीढि़यां उतर श्रीकांत ने एक भारी सांस ली और दरवाजा खोल दिया. शांति को सामने खड़ा देख उन की सांस में सांस आई. शांति के अंदर कदम रखते ही पलभर पहले का उजाड़ मकान उन्हें घर लगने लगा. कुछ चल कर श्रीकांत वहीं दरवाजे के दूसरी तरफ रखे सोफे पर निढाल बैठ गए और चेहरे पर नकली मुसकान ओढ़ते हुए बोले, ‘‘बड़ी देर कर देती है आजकल, मेरी तो तुझे कोई चिंता ही नहीं है. चाय की तलब से मेरा मुंह सूखा जा रहा है.’’

‘‘कैसी बात करते हैं साहबजी? कल रातभर आप की चिंता लगी रही. कैसी तबीयत है अब?’’ रसोईघर में गैस पर चाय की पतीली चढ़ाते हुए शांति ने पूछा. पिछले 2 दिनों से बुखार में पड़े हुए हैं श्रीकांत. बेटाबहू दिनभर औफिस में रहते और देर शाम घर लौट कर उन्हें इतनी फुरसत नहीं होती की बूढ़े पिता के कमरे में जा कर उन का हालचाल ही पूछ लिया जाए. हां, कहने पर बेटे ने दवाइयां ला कर जरूर दे दी थीं पर बूढ़ी, बुखार से तपी देह में कहां इतना दम था कि समयसमय पर उठ कर दवापानी ले सके. उस अकेलेपन में शांति ही श्रीकांत का एकमात्र सहारा थी.

श्रीकांत एएसआई पद से रिटायर हुए. तब सरकारी क्वार्टर छोड़ उन्हें बेटे के साथ पौश सोसाइटी में स्थित उस के आलीशान फ्लैट में शिफ्ट होना पड़ा. नया माहौल, नए लोग. पत्नी के साथ होते उन्हें कभी ये सब नहीं खला. मगर सालभर पहले पत्नी की मृत्यु के बाद बिलकुल अकेले पड़ गए श्रीकांत. सांझ तो फिर भी पार्क में टहलते हमउम्र साथियों के साथ हंसतेबतियाते निकल जाती मगर लंबे दिन और उजाड़ रातें उन्हें खाने को दौड़तीं. इस अकेलेपन के डर ने उन्हें शांति के करीब ला दिया था. 35-36 वर्षीया परित्यक्ता शांति श्रीकांत के घर पर काम करती थी. शांति को उस के पति ने इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि वह उस के लिए बच्चे पैदा नहीं कर पाई. लंबी छरहरी देह, सांवला रंग व उदास आंखों वाली शांति जाने कब श्रीकांत की ठहरीठहरी सी जिंदगी में अपनेपन की लहर जगा गई, पता ही नहीं चला. अकेलापन, अपनों की उपेक्षा, प्रेम, मित्रता न जाने क्या बांध गया दोनों को एक अनाम रिश्ते में, जहां इंतजार था, फिक्र थी और डर भी था एक बार फिर से अकेले पड़ जाने का.

पलभर में ही अदरक, इलायची की खुशबू कमरे में फैल गई. चाय टेबल पर रख शांति वापस जैसे ही रसोईघर की तरफ जाने को हुई तभी श्रीकांत ने रोक कर उसे पास बैठा लिया और चाय की चुस्कियां लेने लगे, ‘‘तो तूने अच्छी चाय बनाना सीख ही लिया.’’ मुसकरा दी शांति, दार्शनिक की सी मुद्रा में बोली, ‘‘मैं ने तो जीना भी सीख लिया साहबजी. मैं तो अपनेआप को एक जानवर सा भी नहीं आंकती थी. पति ने किसी लायक नहीं समझा तो बाल पकड़ कर घर से बाहर निकाल दिया. मांबाप ने भी साथ नहीं दिया. आप जीने की उम्मीद न जगाते तो घुटघुट कर या जहर खा कर अब तक मर चुकी होती, साहबजी.’’

‘‘पुरानी बातें क्यों याद करती है पगली. तू क्या कुछ कम एहसान कर रही है मुझ पर? घंटों बैठ कर मेरे अकेलेपन पर मरहम लगाती है, मेरे अपनों के लिए बेमतलब सी हो चुकी मेरी बातों को माने देती है और सब से बड़ी बात, बीमारी में ऐसे तीमारदारी करती है जैसे कभी मेरी मां या पत्नी करती थी.’’ भीग गईं 2 जोड़ी पलकें, देर तक दर्द धुलते रहे. आंसू पोंछती शांति रसोईघर की तरफ चली गई. उस की आंखों के आगे उस का दूषित अतीत उभर आया और उभर आए किसी अपने के रूप में उस के साहबजी. उन दिनों कितनी उदास और बुझीबुझी रहती थी शांति. श्रीकांत ने उस की कहानी सुनी तो उन्होंने एक नए जीवन से उस का परिचय कराया.

उसे याद आया कैसे उस के साहबजी ने काम के बाद उसे पढ़नालिखना सिखाया. जब वह छुटमुट हिसाबकिताब करना भी सीख गई, तब श्रीकांत ने उस के सिलाई के हुनर को आगे बढ़ाने का सुझाव दिया. आत्मविश्वास से भर गई थी शांति. श्रीकांत के सहयोग से अपनी झोंपड़पट्टी के बाहर एक सिलाईमशीन डाल सिलाई का काम करने लगी. मगर अपने साहबजी के एहसानों को नहीं भूल पाई, समय निकाल कर उन की देखभाल करने दिन में कई बार आतीजाती रहती. सोसाइटी से कुछ दूर ही थी उस की झोंपड़ी. सो, श्रीकांत को भी सुबह होते ही उस के आने का इंतजार रहता. मगर कुछ दिनों से श्रीकांत के पड़ोसियों की अनापशनाप फब्तियां शांति के कानों में पड़ने लगी थीं, ‘खूब फांस लिया बुड्ढे को. खुलेआम धंधा करती है और बुड्ढे की ऐयाशी तो देखो, आंख में बहूबेटे तक की शर्म नहीं.’

खुद के लिए कुछ भी सुन लेती, उसे तो आदत ही थी इन सब की. मगर दयालु साहबजी पर लांछन उसे बरदाश्त नहीं था. फिर भी साहबजी का अकेलापन और उन की फिक्र उसे श्रीकांत के घर वक्तबेवक्त ले ही आती. वह भी सोचती, ‘जब हमारे अंदर कोई गलत भावना नहीं तब जिसे जो सोचना है, सोचता रहे. जब तक खुद साहबजी आने के लिए मना नहीं करते तब तक मैं उन से मिलने आती रहूंगी.’ शाम को पार्क में टहलने नहीं जा सके श्रीकांत. बुखार तो कुछ ठीक था मगर बदन में जकड़न थी. कांपते हाथों से खुद के लिए चाय बना, बाहर सोफे पर बैठे ही थे कि बहूबेटे को सामने खड़ा पाया. दोनों की घूरती आंखें उन्हें अपराधी घोषित कर रही थीं.

श्रीकांत कुछ पूछते, उस से पहले ही बेटा उन पर बरस उठा, ‘‘पापा, आप ने कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा हमें. एक नौकरानी के साथ…छी…मुझे तो कहते हुए भी शर्म आती है.’’ ‘‘यह क्या बोले जा रहे हो, अविनाश?’’ श्रीकांत के पैरों तले से मानो जमीन खिसक गई.

अब बहू गुर्राई, ‘‘अपनी नहीं तो कुछ हमारी ही इज्जत का खयाल कर लेते. पूरी सोसाइटी हम पर थूथू कर रही है.’’ पैर पटकते हुए दोनों रोज की तरह भीतर कमरे में ओझल हो गए. श्रीकांत वहीं बैठे रहे उछाले गए कीचड़ के साथ. वे कुछ समझ नहीं पाए कहां चूक हुई. मगर बच्चों को उन की मुट्ठीभर खुशी भी रास नहीं, यह उन्हें समझ आ गया था. ये बेनाम रिश्ते जितने खूबसूरत होते हैं उतने ही झीने भी. उछाली गई कालिख सीधे आ कर मुंह पर गिरती है.

दुनिया को क्या लेना किसी के सुखदुख, किसी की तनहाई से. वे अकेलेपन में घुटघुट कर मर जाएं या अपनों की बेरुखी को उन की बूढ़ी देह ताउम्र झेलती रहे या रिटायर हो चुका उन का ओहदा इच्छाओं, उम्मीदों को भी रिटायर घोषित क्यों न कर दे. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. मगर न जाने उन की खुशियों पर ही क्यों यह समाज सेंध लगा कर बैठा है?

श्रीकांत सोचते, बूढ़ा आदमी इतना महत्त्वहीन क्यों हो जाता है कि वह मुट्ठीभर जिंदगी भी अपनी शर्तों पर नहीं जी पाता. बिलकुल टूट गए थे श्रीकांत, जाने कब तक वहीं बैठे रहे. पूरी रात आंखों में कट गई. दूसरे दिन सुबह चढ़ी. देर तक कौलेबैल बजती रही. मगर श्रीकांत ने दरवाजा नहीं खोला. बाहर उन की खुशी का सामान बिखरा पड़ा था और भीतर उन का अकेलापन. बुढ़ापे की बेबसी ने अकेलापन चुन लिया था. फिर शाम भी ढली. बेटाबहू काम से खिलखिलाते हुए लौटे और दोनों अजनबी सी नजरें श्रीकांत पर उड़ेल, कमरों में ओझल हो गए.

Romantic Story : शरणार्थी – मीना ने कैसे लगाया अविनाश और किशन को चूना ?

Romantic Story : वह हांफते हुए जैसे ही खुले दरवाजे में घुसी कि तुरंत दरवाजा बंद कर लिया. अपने ड्राइंगरूम में अविनाश और उन का बेटा किशन इस तरह एक अनजान लड़की को देख कर सन्न रह गए.

अविनाश गुस्से से बोले, ‘‘ऐ लड़की, कौन है तू? इस तरह हमारे घर में क्यों घुस आई है?’’

‘‘बताती हूं साहब, सब बताती हूं. अभी मुझे यहां शरण दे दो,’’ वह हांफते हुए बोली, ‘‘वह गुंडा फिर मुझे मेरी सौतेली मां के पास ले जाएगा. मैं वहां नहीं जाना चाहती हूं.’’

‘‘गुंडा… कौन गुंडा…? और तुम सौतेली मां के पास क्यों नहीं जाना चाहती हो?’’ अविनाश ने जब सख्ती से पूछा, तब वह लड़की बोली, ‘‘मेरी सौतेली मां मुझ से देह धंधा कराना चाहती है. उदय प्रकाश एक गुंडे के साथ मुझे कोठे पर बेचने जा रहा था, मगर मैं उस से पीछा छुड़ा कर भाग आई हूं.’’

‘‘तू झूठ तो नहीं बोल रही है?’’

‘‘नहीं साहब, मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. सच कह रही हूं,’’ वह लड़की इतना डरी हुई थी कि बारबार बंद दरवाजे की तरफ देख रही थी.

अविनाश ने पूछा, ‘‘ठीक है, पर तेरा नाम क्या है?’’

‘‘मीना है साहब,’’ वह लड़की बोली.

अविनाश ने कहा, ‘‘घबराओ मत मीना. मैं तुम्हें नहीं जानता, फिर भी तुम्हें शरण दे रहा हूं.’’

‘‘शुक्रिया साहब,’’ मीना के मुंह से निकल गया.

‘‘एक बात बताओ…’’ अविनाश कुछ सोच कर बोले, ‘‘तुम्हारी मां तुम से धंधा क्यों कराना चाहती है?’’

मीना ने कहा, ‘‘जन्म देते ही मेरी मां गुजर गई थीं. पिता दूसरी शादी नहीं करना चाहते थे, मगर रिश्तेदारों ने जबरदस्ती उन की शादी करा दी.

‘‘मगर शादी होते ही पिता एक हादसे में गुजर गए. मेरी सौतेली मां विधवा हो गई. तब से ही रिश्तेदार मेरी सौतेली मां पर आरोप लगाने लगे कि वह पिता को खा गई. तब से मेरी सौतेली मां अपना सारा गुस्सा मुझ पर उतारने लगी.

‘‘इस तरह तानेउलाहने सुन कर मैं ने बचपन से कब जवानी में कदम रख दिए, पता ही नहीं चला. मेरी सौतेली मां को चाहने वाले उदय प्रकाश ने उस के कान भर दिए कि मेरी शादी करने के बजाय किसी कोठे पर बिठा दे, क्योंकि उस के लिए वह कमाऊ जो थी.

‘‘मां का चहेता उदय प्रकाश मुझे कोठे पर बिठाने जा रहा था. मैं उस की आंखों में धूल झोंक कर भाग गई और आप का मकान खुला मिला, इसी में घुस गई.’’

अविनाश ने पूछा, ‘‘कहां रहती हो?’’

‘‘शहर की झुग्गी बस्ती में.’’

‘‘तुम अगर मां के पास जाना चाहती हो, तो मैं अभी भिजवा सकता हूं.’’

‘‘मत लो उस का नाम…’’ मीना जरा गुस्से से बोली.

‘‘फिर कहां जाओगी?’’ अविनाश ने पूछा.

‘‘साहब, दुनिया बहुत बड़ी है, मैं कहीं भी चली जाऊंगी?’’

‘‘तुम इस भेडि़ए समाज में जिंदा रह सकोगी.’’

‘‘फिर क्या करूं साहब?’’ पलभर सोच कर मीना बोली, ‘‘साहब, एक बात कहूं?’’

‘‘कहो?’’

‘‘कुछ दिनों तक आप मुझे अपने यहां नहीं रख सकते हैं?’’ मीना ने जब यह सवाल उठाया, तब अविनाश सोचते रहे. वे कोई जवाब नहीं दे पाए.

मीना ही बोली, ‘‘क्या सोच रहे हैं आप? मैं वैसी लड़की नहीं हूं, जैसी आप सोच रहे हैं.’’

‘‘तुम्हारे कहने से मैं कैसे यकीन कर लूं?’’ अविनाश बोले, ‘‘और फिर तुम्हारी मां का वह आदमी ढूंढ़ता हुआ यहां आ जाएगा, तब मैं क्या करूंगा?’’

‘‘आप उसे भगा देना. इतनी ही आप से विनती है,’’ यह कहते समय मीना की सांस फूल गई थी.

मीना आगे कुछ कहती, तभी दरवाजे के जोर से खटखटाने की आवाज आई. कमरे में तीनों ही चुप हो गए. इस वक्त कौन हो सकता है?

मीना डरते हुए बोली, ‘‘बाबूजी, वही गुंडा होगा. मैं नहीं जाऊंगी उस के साथ.’’

‘‘मत जाना. मैं जा कर देखता हूं.’’

‘‘वही होगा बाबूजी. मेरी सौतेली मां का चहेता. आप मत खोलो दरवाजा,’’ डरते हुए मीना बोली.

एक बार फिर जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आई.

अविनाश बोले, ‘‘मीना, तुम भीतर जाओ. मैं दरवाजा खोलता हूं.’’

मीना भीतर चली गई. अविनाश ने दरवाजा खोला. एक गुंडेटाइप आदमी ने उसे देख कर रोबीली आवाज में कहा, ‘‘उस मीना को बाहर भेजो.’’

‘‘कौन मीना?’’ गुस्से से अविनाश बोले.

‘‘जो तुम्हारे घर में घुसी है, मैं उस मीना की बात कर रहा हूं…’’ वह आदमी आंखें दिखाते हुए बोला, ‘‘निकालते हो कि नहीं… वरना मैं अंदर जा कर उसे ले आऊंगा.’’

‘‘बिना वजह गले क्यों पड़ रहे हो भाई? जब मैं कह रहा हूं कि मेरे यहां कोई लड़की नहीं आई है,’’ अविनाश तैश में बोले.

‘‘झूठ मत बोलो साहब. मैं ने अपनी आंखों से देखा है उसे आप के घर में घुसते हुए. आप मुझ से झूठ बोल रहे हैं. मेरे हवाले करो उसे.’’

‘‘अजीब आदमी हो… जब मैं ने कह दिया कि कोई लड़की नहीं आई है, तब भी मुझ पर इलजाम लगा रहे हो? जाते हो कि पुलिस को बुलाऊं.’’

‘‘मेरी आंखें कभी धोखा नहीं खा सकतीं. मैं ने मीना को इस घर में घुसते हुए देखा है. मैं उसे लिए बिना नहीं जाऊंगा…’’ अपनी बात पर कायम रहते हुए उस आदमी ने कहा.

अविनाश बोले, ‘‘मेरे घर में आ कर मुझ पर ही तुम आधी रात को दादागीरी कर रहे हो?’’

‘‘साहब, मैं आप का लिहाज कर रहा हूं और आप से सीधी तरह से कह रहा हूं, फिर भी आप समझ नहीं रहे हैं,’’ एक बार फिर वह आदमी बोला.

‘‘कोई भी लड़की मेरे घर में नहीं घुसी है,’’ एक बार फिर इनकार करते हुए अविनाश उस आदमी से बोले.

‘‘लगता है, अब तो मुझे भीतर ही घुसना पड़ेगा,’’ उस आदमी ने खुली चुनौती देते हुए कहा.

तब एक पल के लिए अविनाश ने सोचा कि मीना कौन है, वे नहीं जानते हैं, मगर उस की बात सुन कर उन्हें उस पर दया आ गई. फिर ऐसी खूबसूरत लड़की को वे कोठे पर भिजवाना भी नहीं चाहते थे.

वह आदमी गुस्से से बोला, ‘‘आखिरी बार कह रहा हूं कि मीना को मेरे हवाले कर दो या मैं भीतर जाऊं?’’

‘‘भाई, तुम्हें यकीन न हो, तो भीतर जा कर देख लो,’’ कह कर अविनाश ने भीतर जाने की इजाजत दे दी. वह आदमी तुरंत भीतर चला गया.

किशन पास आ कर अविनाश से बोला, ‘‘यह क्या किया बाबूजी, एक अनजान आदमी को घर के भीतर क्यों घुसने दिया?’’

‘‘ताकि वह मीना को ले जाए,’’ छोटा सा जवाब दे कर अविनाश बोले, ‘‘और यह बला टल जाए.’’

‘‘तो फिर इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी. उसे सीधेसीधे ही सौंप देते,’’ किशन ने कहा, ‘‘आप ने झूठ बोला, यह उसे पता चल जाएगा.’’

‘‘मगर, मुझे मीना को बचाना था. मैं उसे कोठे पर नहीं भेजना चाहता था, इसलिए मैं इनकार करता रहा.’’

‘‘अगर मीना खुद जाना चाहेगी, तब आप उसे कैसे रोक सकेंगे?’’ अभी किशन यह बात कह रहा था कि तभी वह आदमी आ कर बोला, ‘‘आप सही कहते हैं. मीना मुझे अंदर नहीं मिली.’’

‘‘अब तो हो गई तसल्ली तुम्हें?’’ अविनाश खुश हो कर बोले.

वह आदमी बिना कुछ बोले बाहर निकल गया.

अविनाश ने दरवाजा बंद कर लिया और हैरान हो कर किशन से बोले, ‘‘इस आदमी को मीना क्यों नहीं मिली, जबकि वह अंदर ही छिपी थी?’’

‘‘हां बाबूजी, मैं अगर अलमारी में नहीं छिपती, तो यह गुंडा मुझे कोठे पर ले जाता. आप ने मुझे बचा लिया. आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी,’’ बाहर निकलते हुए मीना बोली.

‘‘हां बेटी, चाहता तो मैं भी उस को पुलिस के हवाले करा सकता था, मगर तुम्हारे लिए मैं ने पुलिस को नहीं बुलाया,’’ समझाते हुए अविनाश बोले, ‘‘अब तुम्हारा इरादा क्या है?’’

‘‘किस बारे में बाबूजी?’’

‘‘अब इतनी रात को तुम कहां जाओगी?’’

‘‘आप मुझे कुछ दिनों तक अपने यहां शरणार्थी बन कर रहने दो.’’

‘‘मैं तुम को नहीं रख सकता मीना.’’

‘‘क्यों बाबूजी, अभी तो आप ने कहा था.’’

‘‘वह मेरी भूल थी.’’

‘‘तो मुझे आप एक रात के लिए अपने यहां रख लीजिए. सुबह मैं खुद चली जाऊंगी,’’ मीना बोली.

‘‘मगर, कहां जाओगी?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘नहीं बाबूजी, इसे अभी निकाल दो,’’ किशन विरोध जताते हुए बोला.

‘‘किशन, मजबूर लड़की की मदद करना हमारा फर्ज है.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर कहीं इसी इनसानियत में हैवानियत न छिपी हो बाबूजी.’’

‘‘आप आपस में लड़ो मत. मैं तो एक रात के लिए शरणार्थी बन कर रहना चाहती थी. मगर आप लोगों की इच्छा नहीं है, तो…’’ कह कर मीना चलने लगी.

‘‘रुको मीना,’’ अविनाश ने उसे रोकते हुए कहा. मीना वहीं रुक गई.

अविनाश बोले, ‘‘तुम कौन हो, मैं नहीं जानता, मगर एक अनजान लड़की को घर में रखना खतरे से खाली नहीं है. और यह खतरा मैं मोल नहीं ले सकता. तुम जो कह रही हो, उस पर मैं कैसे यकीन कर लूं?’’

‘‘आप को कैसे यकीन दिलाऊं,’’ निराश हो कर मीना बोली, ‘‘मैं उस सौतेली मां के पास भी नहीं जाना चाहती.’’

‘‘जब तुम सौतेली मां के पास नहीं जाना चाहती हो, तो फिर कहां जाओगी?’’

‘‘नहीं जानती. मैं रहने के लिए एक रात मांग रही थी, मगर आप को एतराज है. आप का एतराज भी जायज है. आप मुझे जानते नहीं. ठीक है, मैं चलती हूं.’’

अविनाश उसे रोकते हुए बोले, ‘‘रुको, तुम कोई भी हो, मगर एक पीडि़त लड़की हो. मैं तुम्हारे लिए जुआ खेल रहा हूं. तुम यहां रह सकती हो, मगर कल सुबह चली जाना.’’

‘‘ठीक है बाबूजी,’’ कहते हुए मीना के चेहरे पर मुसकान फैल गई… ‘‘आप ने डूबते को तिनके का सहारा दिया है.’’

‘‘मगर, सुबह तुम कहां जाओगी?’’ अविनाश ने फिर पूछा.

‘‘सुबह मौसी के यहां उज्जैन चली जाऊंगी?’’

अविनाश ने यकीन कर लिया और बोले, ‘‘तुम मेरे कमरे में सो जाना.’’

‘‘आप कहां साएंगे बाबूजी?’’ मीना ने पूछा.

‘‘मैं यहां सोफे पर सो जाऊंगा,’’ अविनाश ने अपना फैसला सुना दिया और आगे बोले, ‘‘जाओ किशन, इसे मेरे कमरे में छोड़ आओ.’’

काफी रात हो गई थी. अविनाश और किशन को जल्दी नींद आ गई. सुबह जब देर से नींद खुली. मीना नहीं थी. सामान बिखरा हुआ था. अलमारियां खुली हुई थीं. उन में रखे गहनेनकदी सब साफ हो चुके थे.

अविनाश और किशन यह देख कर हैरान रह गए. उम्रभर की कमाई मीना ले गई. उन का अनजान लड़की पर किया गया भरोसा उन्हें बरबाद कर गया. जो आदमी रात को आया था, वह उसी गैंग का एक सदस्य था, तभी तो वह मीना को नहीं ले गया. चोरी करने का जो तरीका उन्होंने अपनाया, उस तरीके पर कोई यकीन नहीं करेगा.

मीना ने जोकुछ कहा था, वह झूठ था. वह चोर गैंग की सदस्य थी. शरणार्थी बन कर अच्छा चूना लगा गई.

Hindi Kahani : डस्टबिन में बाबा – क्या बूआ प्रशांत का कहा मान गईं ?

Hindi Kahani : जज प्रशांत शर्मा ने कोर्ट से आ कर अपनी पत्नी सुगंधा के साथ शाम की चाय पीते हुए पूछा, ‘‘उमा बूआ से बात हो गई? कब पहुंच रही हैं?’’
‘‘कल सुबह आ जाएंगी,’’ फिर अपने पति को गंभीर देख कर सुगंधा ने पूछा, ‘‘क्या हुआ…? बहुत सीरियस हो.’’

‘‘अपने देश की मूर्ख जनता पर तरस आता है, सुगंधा. अदालत में ढोंगी बाबाओं की केस फाइलें बढ़ती जा रही हैं और हमारी गरीब जनता इन बाबाओं के हाथ की कठपुतली बनती ही जा रही है, इन्हें नेताओं का संरक्षण प्राप्त है, नेताओं को वोट चाहिए और बाबाओं के पास अंधभक्तों के वोट हैं, देख कर कोफ्त होती है. सब से बड़ी बात तो यह है कि जब उमा बूआ को प्रेमशंकर बाबा का नाम जपते देखता हूं, दिल जलने लगता है. अपने ही घर में बूआ को मूर्खता करते देख मुझे कैसे चैन मिल सकता है. कल प्रेमशंकर का फैसला हो जाएगा, जानता हूं कि बूआ प्रेमशंकर के पक्ष में फैसला सुनाने पर मुझ पर प्रैशर डालने आ रही हैं, उन्होंने ही मुझ अनाथ को पालपोस कर इस पद तक पहुंचाया है, वे मुझ से क्या उम्मीद रख कर आ रही हैं, जानता हूं. अपने ही घर में प्रेमशंकर जैसे धूर्त, ढोंगी की अंधभक्त उमा बूआ को कल कैसे समझाना है, यही सोच रहा हूं.

सुगंधा ने कर्मठ, न्यायप्रिय पति को तसल्ली देती नजरों से देखा. वे अच्छी तरह जानती हैं कि प्रशांत उमा बूआ के एहसानों तले दबे हैं, पर अपना कर्तव्य, न्याय व्यवस्था से बढ़ कर भला उन के लिए और क्या हो सकता है.

कल एक बड़े केस का फैसला उन्हें सुनाना था, करोड़ों की संपत्ति वाले ऐयाश प्रेमशंकर का परदाफाश एक लड़की कर चुकी थी. प्रेमशंकर पर दर्जनों हत्याओं, बलात्कार के पहले भी आरोप लगते रहे थे, पर हर बार इन मामलों को दबाया जाता रहा था, अब वह एक निडर लड़की के कारण जेल की हवा खा रहा था. कल सुबह प्रशांत शर्मा को फैसला सुनाना था.

उमा सुबह साढ़े 4 बजे की ट्रेन से पहुंच गई थी. वे प्रशांत के लिए मां जैसा दर्जा ही रखती थीं, वे अपने बेटे विकास, बहू पूजा और पोती निया के साथ रहती थीं. प्रशांत और सुगंधा ने उन के पैर छुए. हालचाल के बाद जब तक उमा फ्रेश हो कर आई, नौकर चाय ले कर आ गया था. प्रशांत और सुगंधा के दोनों बच्चे हौस्टल में पढ़ रहे थे. सुगंधा भी कालेज में प्रोफैसर थी. उमा ने चाय पीते हुए कहा, ‘‘प्रशांत, आज बाबाजी का फैसला होगा न…?’’

‘‘हां बूआ.’’

‘‘बेटा, लोगों ने बेवजह ही उन्हें फंसा दिया. उन्हें बचा लेना, बेटा. अपने सभी साथियों की तरफ से तुम से गुहार लगाने आई हूं, बेटा,’’ कह कर उमा ने अपने पर्स से प्रेमशंकर की फोटो निकाल कर माथे से लगाई, गले में पहनी माला के लौकेट की प्रेमशंकर की तसवीर को माथे से लगाया, कहा, ‘‘बड़े पुण्यात्मा हैं, बाबा. जब भी मेरठ में आते हैं, उन के सत्संग में हजारों की भीड़ यों ही तो नहीं होती होगी न. यह सब आजकल के धर्म से भागने वाले नास्तिक लोगों का कियाधरा है. बाबाजी को बचा लेना, बेटा. तुम से बड़ी उम्मीद ले कर आई हूं.’’

‘‘बूआ, आप ने न्यूज देखी है न. न्यूजपेपर पढ़े हैं न? फिर कैसे आप उस का पक्ष ले सकती हैं? उस के सारे कुकर्मों का प्रमाण मेरे सामने होगा, तो उस के बचने का मतलब ही नहीं है.’’

उमा का गला भर आया, ‘‘न बेटा, बाबा को बचा लो.’’

यह सुन कर प्रशांत चुप ही रहे, फिर कुछ न कहा.

बड़े फैसले का दिन था. प्रशांत पर कई तरह से प्रैशर डाला गया था, पर उन्हें अपने कर्तव्य से प्यारा कुछ भी न था. सुबह से ही उमा टीवी के आगे डट गई थी. आज सुगंधा ने भी उमा के साथ रहने के लिए छुट्टी ले ली थी, हर चैनल पर यही खबर थी. फैसला सुना दिया गया था, जज प्रशांत शर्मा ने फैसले में लिखा था, ‘‘अभियुक्त ने न केवल पीड़िता का भरोसा तोड़ा, बल्कि आम लोगों में संतों की इमेज को भी नुकसान पहुंचाया. सजा देने का उद्देश्य समाज को सुरक्षित करना है और अभियुक्त को रोकना है. अपराध न केवल पीड़ित, बल्कि उस समाज के विरुद्ध भी है, जिस से अपराधी और पीड़ित संबंध रखते हैं. उचित दंड नहीं दिया तो कोर्ट कर्तव्य से पथभ्रष्ट हो जाएगा. अभियुक्त के प्रति अवांछित सहानुभूति न्याय व्यवस्था को अधिक हानि पहुंचाएगी, क्योंकि इस से जनता को विधि की व्यवस्था में विश्वास कम होगा. यदि न्यायालय क्षतिग्रस्त व्यक्ति को संरक्षित नहीं करेगा, तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति स्वयं बदला देने के मार्ग पर चलेगा.’’

प्रेमशंकर को उम्रकैद की सजा हुई. उमा तो वहीं सिर पकड़ कर बैठ गई. प्रशांत पर बहुत तेज गुस्सा आया. उमा कमरे से भी न निकली, न कुछ खायापीया.

सुगंधा को पति पर गर्व हुआ. प्रशांत घर आए तो सीधे उमा के रूम में ही गए. फोन पर सुगंधा प्रशांत को उन के गुस्से के बारे में पहले ही बता चुकी थी. उमा के चेहरे का रंग ही उड़ा था, चेहरे पर झुंझलाहट और नाराजगी थी. सुगंधा उमा के बैड पर ही बैठ गई. सुगंधा ने ही कहा, ‘‘प्रशांत, न्यूज तो हम ने देख ली, अपने मुंह से बताओ न, कोर्ट में क्या रहा?’’

प्रशांत ने उमा से कहा, ‘‘सुनोगी, बूआ?’’

उमा चुप रही, प्रशांत ने फिर कहा, ‘‘बूआ, मुझे नहीं लगता कि आप ने अपने बाबा की अंधशक्ति में सचाई पर ध्यान दिया होगा. सच से तो आप आंखें फेरे ही रहीं. पोक्सो ऐक्ट, जुवैनाइल जस्टिस ऐक्ट और इंडियन पीनल कोर्ट की धारा के अंतर्गत आप के बाबा पर चार्जशीट दाखिल हुई थी, इस के खिलाफ रेप, ट्रैफिकिंग और सैक्सुअल क्राइम के केस हैं. यह पापी धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और आडंबर के खेल में 40 सालों से जनता को मूर्ख बना रहा था, साढ़े 4 साल से चल रही कार्यवाही में इस के झूठ, पाखंड का आवरण हट चुका है, आज उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो लगा कि लोगों के मन में न्याय के प्रति एक नई आशा जगी है. इतना तो आप को पता ही होगा न कि इस के गुरुकुल में एक लड़की पढ़ती थी, वह कुछ अस्वस्थ हुई, तो इस के चेले बुरी आत्मा का फेर बता कर इसे आश्रम ले गए, जहां इस लडकी को बंद कर के आप के बाबा ने रेप किया. इस लडकी के शब्दों में, ‘‘मैं आश्रम की सीढ़ियों पर बैठी हुई थी. बाबा ने मुझे इशारे से बुलाया. मैं गई, तो बाबा ने रूम की लाइट बंद कर मुझे अपने पास बैठा लिया, और कहा, ‘‘पढ़लिख कर क्या करोगी, समर्पित हो जाओ, मेरे साथ रहो, मैं तुम्हारा जीवन संवार दूंगा.’’

प्रशांत ने कहा, ‘‘आप के बाबा ने जबरदस्ती इस लडकी का रेप किया, बूआ. आप की तरह वह जिसे भगवान समझती थी, उस के साथ उस ने ऐसी घिनौनी हरकत की. बड़ी मुश्किल से इसे गिरफ्तार किया गया था. इस ने सजा से बचने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाए. आप जैसे अंधभक्तों ने सुप्रीम कोर्ट तक को प्रभावित करने की कोशिशें की, कभी लड़की को झूठी बताया गया, तो कभी उस के घर वालों पर दबाव बनाया गया. मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें भी की गई, नेताओं से कहलवाया गया कि हिंदू संत को ही क्यों फंसाया गया. यहां तक कि इस पाखंडी ने खुद को नपुंसक साबित करने की कोशिश भी की. इस पापी के भक्तों की फौज यह सच स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थी, कई गवाहों की हत्याएं हुईं, कई गवाह लापता हुए. उस की जमानत के लिए 12 बार अर्जी लगाई गई, पर हर बार वे निरस्त कर दी गई. कभी इस के आश्रम में कालाजादू के नाम पर हत्याएं हुई हैं, कभी इस के गुरुकुल के बाथरूम में 2 छात्रों के शव मिले. 70 के दशक में छोटे से आश्रम से निकल कर 19 देशों में 400 से अधिक आश्रम, 4 करोड़ से ज्यादा भक्त और 10,000 करोड़ से भी अधिक की संपत्ति का स्वामी बना आप का पूजनीय. ऐसा नाम है बूआ, जो धर्म के नाम पर धंधा करता रहा. जिस के आगे बड़ेबड़े नेता, उद्योगपति और राजनीतिबाज उस का रास्ता आसान ही करते रहे.’’

प्रशांत ने पलभर रुक कर एक गहरी सांस ली, फिर कहना शुरू किया, ‘‘बूआ, आप ने मुझे मां बन कर पाला है, आप ने आसरा न दिया होता तो मैं पता नहीं कहा होता. आज जो कुछ हूं, आप के स्नेह के ही कारण हूं. पर, आप को ऐसे दुष्ट की पूजा करते हुए देखना मेरा दुर्भाग्य है. आप को कुछ कह नहीं सकता, पर दुखी हूं कि अपने ही घर के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझा नहीं पा रहा हूं कि आप जैसे अंधभक्तों की अंधश्रद्धा का फायदा उठा कर ये ढोंगी बाबा, स्वयंभू संत हर गलत काम को अंजाम देने से नहीं चूकते. इन का साम्राज्य रातोंरात खड़ा नहीं होता, धीरेधीरे ये जनता के दुखदर्द की नस पकड़ लेते हैं.

‘‘बूआ, आप मुझे एक बात बताइए, अगर आप के ये बाबा बलात्कार के मामलों में आजीवन कारावास की सजा पाते हैं तो भी आप को अपनी कोई गलती नजर नहीं आती? कथित चमत्कारी बाबाओं और स्वयंभू भगवानों द्वारा औरतों के शोषण के किस्से हमेशा से सुनते रहते हैं, पर आप जैसी औरतें क्यों इन की बातों में आती हैं? आप पढ़ीलिखी हैं. आप के घर में निया जैसी एक बच्ची है, वैसे ही कई घरों में बेटियां हैं, आप अपने घर में भी यह अंधभक्ति फैला रही होंगी तो कैसे और कब तक सुरक्षित रहेंगी बेटियां? इस केस में पीड़िता के दोषी उस के मातापिता भी तो हैं, जिन्होंने ऐसे ढोंगी, धूर्त बाबा पर आंख बंद कर विश्वास किया. आप तो एक औरत है, बलात्कार की शिकार लड़की की व्यथा जानने के बाद भी मुझ से कैसे यह आशा रख कर आई थीं कि ऐसे पाखंडी के पक्ष में कही आप की कोई भी बात मुझ पर असर करेगी.’’

उमा ने बहुत ही शिथिल स्वर में कहा, ‘‘तुम तो जानते हो न कि इन के परलोक सिधारने के बाद मैं कितनी बीमार हो गई थी, बाबा के सत्संग में गई तो चैन आया.’’

‘‘नहीं, आप को इस पापी की शरण में नहीं, विकास के करवाए इलाज से आराम हुआ था, तभी आप इस के सत्संग में बैठ भी पाईं, दुख हो रहा है बूआ, जिस पापी ने कितनी ही लड़कियों की इज्जत लूट ली, उस की तसवीर मेरी बूआ कैसे गले में लटका कर घूम सकती है?’’

उमा का चेहरा बहुत शांत और गंभीर था, एक नजर प्रशांत और सुगंधा पर डाली, पलभर बाद किचन की तरफ बढ़ी, सुगंधा फौरन उठ कर धीरे से उन के पीछे गई, किचन में झांका, बूआ गले का बाबा का लौकेट डस्टबिन में डाल रही थीं, इतने में प्रशांत भी आ गए थे, पूछा, ‘क्या हुआ?’’
सुगंधा हंस पड़ी, ‘‘बाबा तो गया.’’

‘‘कहां…?’’

‘‘डस्टबिन में.’’

‘‘मेरी बूआ,’’ कहतेकहते प्रशांत ने उमा को गले लगा लिया, कहा, ‘‘ वैल डन, बूआ.’’ तीनों मुसकरा रहे थे, उमा ने भी अपनेआप को बहुत हलका महसूस किया था.

Family Story : मोहजाल – शांति से क्या गलती हुई कि उसे इतनी बड़ी सजा मिली ?

Family Story : पूरे दक्षिणपुरी मदनगीर इलाके में शोर मच चुका था कि शांति मंडल की लड़की राजेश्वरी के लड़के के साथ भाग गई. शांति ठंडी जमीन पर बैठी भी झलस रही थी. नए कूलर की ठंडी हवा भी उसे गरम लग रही थी. सूनी आंखों से खुले दरवाजे को ताक रही थी कि अभी शायद शर्मिला रोज की तरह आ कर कहे, ‘यह सब झठ है, मां.’ मगर शाम के 7 बज गए थे. दीयाबात्ती का समय हो गया था. शांति सोचने लगी, ‘अब क्या आएगी?’

रामरतन मंडल 3-3 बेटियां शांति की छाती पर लाद कर गांव से दूर भाग गया था. किसी ने कहा कोलकाता भाग गया, किसी ने कहा मुंबई भाग गया है, किसी ने कहा दिल्ली में है. जहांजहां रिश्तेदार थे, शांति चिट्ठियां भेजती रही. उड़तीउड़ती खबर मिली कि रामरतन ने दूसरी औरत रख ली है. उस के 2 बेटे भी हैं. अब वह ट्रक चलाता है. शांति ने उसे शहरशहर ढूंढ़ा पर वह भगोड़ा नहीं मिला. गांव में छोटा सा घर था और साझे की जमीन, छल्ला तक नहीं बचा, सारा जेवर सेठसाहूकारों के पास चला गया. तीनों लड़कियां ले कर वह दिल्ली में रहने लगी. कुछ न कुछ काम मिल जाता था. गांव व बिरादरी के लोगों ने झग्गी डालने में उस की मदद की. गाड़ी चल निकली.

एक दिन शांति के पैरों को कुछ हो गया. खैराती अस्पताल की गोलियों से ठीक न हुआ. वह एक डाक्टर के घर भी झड़ूपोंछा करती थी. उस के इंजैक्शन भी काम न आए. बड़ी लड़की जवान होती जा रही थी. उस के सब कपड़े छोटे हो गए थे. कभीकभी वह घर में शांति की साड़ी भी लपेट लेती तो बहुत सयानी लगती. शांति डरती रहती थी कि यदि उसे खुद को कुछ हो गया तो वह क्या करेगी? पैर नहीं चले तो सब का पेट कैसे भरेगी. फिर तीनों अभी बच्चियां थीं.

झग्गियों में द्वारका भी रहता था. वह रिश्ते में रामरतन की मौसी का लड़का, यानी भाई लगता था. द्वारका से चाचाताऊ जमीन हड़प गए थे. उसे घर से ही खदेड़ दिया था. उस का बाप फौज में मर गया था, मां पहले ही चल बसी थी. जमीनजायदाद चली गई, उस का उसे दुख न था. दुख था तो सिर्फ इसी का कि उसे घर से भी निकाल दिया था. दिल्ली में वह खुश नहीं था.

गांव, घर, खेतखलिहान की याद आती थी पर क्या करता? वह आटादाल वाले का रिकशा चलाता था. कच्चेपक्के

2 टिक्कड़ सेंक कर खा लेता था. शांति से हमदर्दी थी कि अकेली औरत बिना मर्द के 3-3 बेटियां पाल रही है. वह कभीकभी रोटी के वक्त बच्चों के लिए बिस्कुट, केले ले जाता था. शांति उसे गरमगरम 2 रोटियां डाल देती. वही बेचारा खबर लाया था कि थोड़ी दूर एक चर्च में एक अंगरेज डाक्टर आया है. बड़ी शिफा है, बड़ा जादू है उस के हाथ में.

उस की दवा से शांति वाकई ठीक हो गई. कुछ दिनों में वह डाक्टर साहब का खाना भी बनाने लगी. हाथपैरों की कई तकलीफों के लिए डाक्टर साहब ने नसों की मालिश सिखाने की क्लास भी शुरू कर दी. शांति बड़े गौर से देखती. डाक्टर साहब ने उस की इच्छा देख उसे क्लास में रहने की इजाजत दे दी और वह जल्दी सीख भी गई. इंग्लिश के कुछ शब्द भी उस की जबान पर चढ़ने लगे. चर्च से 2-3 मेमसाहबों का काम मिल गया. शांति की दुनिया ही बदल गई. उस ने पिछले सब काम छोड़ दिए. मालिश में मेहनत थी, मगर पैसा था.

हाय, क्या काम आया यह पैसा? कैसा भी मौसम हो, कभी 4-5 तो कभी

6-7 घरों में भागतीफिरती. उसे बसों के नंबर कुछ रट गए. नएपुराने इलाके, गलीमहल्ले, कालोनी, बाग उस ने सब देख लिए. शाम हो जाती तो द्वारका झग्गी के बाहर पालतू जानवर की तरह पहरा देता. डाक्टर तो विदेश चला गया. वह देशदेशांतर में घूमघूम कर गरीबों का इलाज करता था. मगर शांति मालिश में ही सुबहशाम लगी रही. बड़ीबड़ी कोठियों की मेमसाहबें उसे मुंहमांगा पैसा और खुश हो कर इनाम भी देतीं. रोटीपानी बड़ी लड़की कांता करने लगी.

बीच की बेटी रानी भी बड़ी हो चली. शांति को तो खाने का लालच ही न था, सो कुछ फल, मिठाई जो भी कोठियों से मिलता उसे भी वह इन्हीं बढ़ती हुई लड़कियों के लिए थैले में भर लाती.

इलाके के सभी झग्गी वालों को दक्षिणपुरी मदनगीर में प्लौट मिल गए. छोटेछोटे पक्के घर बन गए. शांति के केशों में कहींकहीं सफेदी चमकने लगी, मगर फुरती और भी बढ़ गई. कई अमेरिकी, कोरियाई और जापानी महिलाओं का भी उसे काम मिलने लगा. पैसे चौगुने हो गए. वह ज्यादातर घर से बाहर रहने लगी.

पास में ही कपड़ों की फैक्टरी थी. कांता जिद करने लगी कि और लड़कियां भी जा रही हैं, वह भी उस में काजबटन का काम करेगी. बहुत मना करने पर भी न मानी तो द्वारका के साथ भेज दिया.

सब ठीक होने लगा. कांता खुश रहने लगी. वह सुबह का खाना बना कर फैक्टरी जाती, शाम का खाना बीच की बेटी रानी स्कूल से आ कर बना लेती. वह भी बड़ी हो रही थी. शांति घर से बाहर जाती तो डरती. लड़कियों को समझती रहती कि किसी से ज्यादा हंसनाबोलना मत, शहरों में लोग बहलाफुसला लेते हैं. किसी की बातों में न आना. कोई भी बात हो तो मुझे बताना. ‘अपने गांव जा कर, अच्छा रिश्ता देख कर कांता की शादी करेगी,’ शांति यही सोचती रह गई. पहला बम कांता ने ही फोड़ा.

‘भाभी, कांता का इंतजार कर रही हो?’ द्वारका ने पूछा.

‘अब वह कहां आएगी.’

‘क्या? सब ठीक तो है? क्या हुआ उसे?’ शांति ने घबरा कर पूछा.

‘भाभी, उस ने फैक्टरी के एक टेलर मास्टर से आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली है.’

यह सुन कर शांति सिर पीट कर रोने लगी, ‘मैं तो धनीरामजी के बेटे के या फिर चौधरी लखनपाल के छोटे भाई के बारे में सोच रही थी. सिर्फ एक हफ्ते में गांव जाना था. ऐसी जल्दी क्या थी, मां को मरा मान लिया. अरे, कभी बोली भी नहीं. पता भी न चला. इसीलिए तो मैं फैक्टरी नहीं भेजना चाहती थी.’

‘अब रोने से क्या फायदा, भाभी. खुद को संभालो. बाकी लड़कियां घबरा गई हैं. शक तो मुझे हुआ था पर छोटी सी बच्ची खुद शादी कर लेगी, पता न था. सुनते ही गुस्सा तो आया. सोचा, पीछेपीछे जाऊं और उस टेलर मास्टर के हाथपैर तोड़ दूं, मगर फैक्टरी वालों ने समझया कि अब तो शादी हो चुकी है. मांग में सिंदूर भर दिया, मंगलसूत्र पहना दिया, अब क्या होगा.’

‘द्वारका, उस ने मेरे सीने पर घूंसा क्यों मारा? उस भगोड़े नाग की बच्ची को दूध पिलाती रही. क्या लात मारी है, मां को डस गई. मेरी कोख पर थूक दिया है.’

कुछ दिनों बाद दोनों आए. शांति ने कुछ नहीं कहा. कांता आते ही शांति के पैरों में गिर गई और रोने लगी. आंसुओं में सब बह गया. दामाद देख कर शांति का दिल तड़प उठा. अधेड़, दांतों में सोना जड़ा, रंगरूप भी खास नहीं. वह पान मसाला चबाता, चारों तरफ घूरघूर कर देखता और बेबात हंसता रहा. द्वारका भी भागा आया था. खैर, शांति चुप बैठी रही. रानी और शर्मिला ने जल्दीजल्दी आलू की सब्जी और पूरियां बनाईं. द्वारका नुक्कड़ के हलवाई से मिठाई ले आया.

बस, उस के बाद फिर शांति ने नई जिंदगी शुरू कर दी. रातदिन मेहनत करती रही. कांता की भी लड़की हो गई. वह रोतीपीटती आती थी और जो भी टेलर मास्टर मांग करता था, बरतनभांडे, कपड़ेलत्ते और रुपयापैसा, वह सब ले जाती थी.

दूसरा बम फूटा 2 साल बाद. सुबहसुबह चिट्ठी मिली. पहले तो शांति से पढ़ी ही नहीं गई. आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा, अक्षर साफ दिखाई नहीं दिए. बड़ी मुश्किल से शर्मिला ने चिट्ठी पढ़ी, ‘रानी चली गई, एक ड्राइवर के साथ.’

शांति छाती पीटपीट कर रोने लगी.

यह क्या हो रहा था, इतने जतन और प्यार से पाला था. पता नहीं, क्या कमी रह गई. वह उन के लिए पैसा कमाने को भूखीप्यासी, रातदिन भागती रही. रोज समझती थी कि किसी से भी हंसीमजाक, नजरें मत मिलाया करो, किसी के फुसलाने में मत आओ. बाप न भागता, घर में रहता तो अपनी बच्चियों को अपने साए में छिपा कर रखता.

शर्मिला मां की हालत देख कर घबरा गई. वह भी उस से चिपट कर रोने लगी थी, ‘मां, मैं आप को कभी छोड़ कर नहीं जाऊंगी.’

सालभर में ड्राइवर रानी को वापस उसी के घर पटक गया. उस के मांबाप रानी को अपने घर में रखने को तैयार नहीं थे. पेट में बच्चा था. शादी का कोई पक्का सुबूत भी नहीं था. प्यार का बुखार उतर गया था. मां का कलेजा द्रवित हो उठा, सो शांति ने चुपचाप लड़की को संभाला. रानी के हाथपांव काफी कमजोर हो गए थे. खुराक भी शायद पूरी नहीं मिली थी. उस की भी स्वस्थ लड़की हुई. रानी इसी उम्मीद में रही कि बच्ची को देखने को शायद ड्राइवर आएगा, प्यार के वादे निभाएगा.

बाहर राजेश्वरी ने कोसना शुरू कर दिया, ‘‘छिनाल को मेरा ही घर मिला था. मेरे घनश्याम को भगा दिया, भोलाभाला घनश्याम. अरे, पुरखे उसे कोस रहे होंगे. बुड्ढी चालू है, 2 पहले भगा दीं और अब मेरे घर डाका डाल दिया. खुद घरघर घूमती है. लड़कियों को खुला छोड़ रखा है. अरी, मेरा बेटा लौटा दे, अरी बाहर निकल.’’

शांति दरवाजे पर सिर झकाए हुए द्वारका को देख कर सोचने लगी कि अगर किसी के साथ निभाया है तो इसी बेचारे ने. मैं ने कभी इसे अपना नहीं समझ. जब से रामरतन भागा था और वह भटकती हुई दिल्ली आई थी, यही बेचारा दुखसुख में हमेशा काम आया. 5-6 साल छोटा है तो क्या हुआ, बाहर अलग मकान में क्यों रहेगा. इसे यहीं बुला लेना चाहिए. शायद घर के अंदर रहता तो लड़कियां भी काबू में रहतीं, आलतूफालतू लोगों के साथ न भागतीं. फिर बोली, ‘‘द्वारका, अंदर आ जाओ. जो हुआ सो हुआ, अब क्या करूं? अकेले मुझ से कुछ संभाला नहीं जाता. मैं थक गई हूं.’’

अंदर आ कर द्वारका शांति के चरणों में एकदम झक गया. उस के आंसू उमड़ आए, बोला, ‘‘भाभी, तुम अकेली नहीं हो, हम हैं न. आप ने मुझे भी इतना सहारा दिया है. अपना समझ, अब मैं आप की सेवा के लिए बहू भी ले आया हूं. अगली अष्टमी को मुहूर्त निकला है. वह आप की बहुत इज्जत करती है. पैर दबाएगी, सिर में तेल डालेगी. अरी पारबती, भीतर आ जा. डर के मारे ड्योढ़ी में ही बैठी है.’’

यह सुन कर शांति की आंखें फटी की फटी रह गईं. दरवाजे से चिकनी, सांवली, अल्हड़ सी एक औरत घुसी और उस ने पसीने से गीली हथेलियों से शांति के पैर छुए, शांति उसे आशीर्वाद भी न दे सकी, गुमसुम सी

हो गई. फिर बुदबुदाई, ‘द्वारका तू भी…?’

इतने में लाल जोड़े में सजी शर्मिला आ गई, साथ में खिलखिलाता घनश्याम भी था. शर्मिला बोली, ‘‘लो मां, हमें भी आशीर्वाद दो, मैं आ गई. मैं ने कहा था न कि मैं आप को छोड़ कर नहीं जाऊंगी. आप के घर के सामने ही रहूंगी और आतीजाती रहूंगी. रोना मत, मां,’’ फिर वह घनश्याम की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘मां के पैर छुओ.’’

तभी बाहर एक गाड़ी रुकी और झेंपताशरमाता रानी का ड्राइवर पति भी अपनी लड़की को देखने आ गया. वह लड़की से मिलने का मोह नहीं छोड़ सका. धीरेधीरे पत्थर बनी शांति में ममता का सागर हिलोरें मारने लगा. वह फफक उठी, शायद अब लड़कियों का भविष्य सुधर सके.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें