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Deepika Padukone : हौलीवुड वाक औफ फेम का हिस्सा बनी दीपिका पादुकोण “यह उपलब्धि है या पीआर ऐक्टिविटी”

Deepika Padukone : दीपिका पादुकोण वैसे तो दुनियाभर में चर्चित अभिनेत्री हैं मगर उन का कद क्या इतना ऊंचा हो गया है कि वे हौलीवुड वाल औफ फेम का हिस्सा बन गईं. इसे ले कर राय दो धड़ों में बंट गई है.

3 जुलाई, 2025 को ‘हौलीवुड चैम्बर्स औफ कौमर्स’ ने अपने यूट्यूब चैनल पर लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान जो घोषणा की, उस के बाद बौलीवुड अदाकारा दीपिका पादुकोण इतिहास रचते हुए ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ में जगह बनाने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री बन गई हैं. जिन्हें ‘मोशन पिक्चर्स’ की कैटेगरी में 2026 क्लास में चुना गया है. उन्हें इस क्लास में 35 इंटरनैशनल हस्तियों में से चुना गया है. इस पर दीपिका पादुकोण ने खुशी जताते हुए इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी लिख कर धन्यवाद भी अदा किया. इस से पहले 1960 में यह उपलब्धि दक्षिण के अभिनेता साबू दस्तगीर को मिली थी. यह अलग बात है कि तब तक वह अमरीकी नागरिक बन चुके थे.

उस हिसाब से कहा जा रहा है कि ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ सम्मान पाने वाली दीपिका पादुकोण एकमात्र भारतीय कलाकार हैं. पर बौलीवुड और उस के बाहर भी यह बहस का मुद्दा बन गया है. सवाल उठाया जा रहा है कि यह दीपिका पादुकोण और भारतीय सिनेमा के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि है. कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि यह उपलब्धि है भी नहीं. कहीं यह अपना घर फूक कर दीवाली मनाने अथवा अपने गाल पर अपने हाथों से थप्पड़ मारने वाला मसला तो नहीं है?

हम याद दिला दें कि ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ में दिग्गज आर्टिस्ट्स जैसे एमिली ब्लंट, टिमोथी चालमेट, रामी मालेक, रैचेल मैकऐडम्स, स्टैनली टुच्ची, डेमी मूर सहित ढाई हजार से ज्यादा हौलीवुड कलाकारों के नाम शामिल हैं.

बौलीवुड में दीपिका पादुकोण के पीआर की तरफ से बाकायदा इसे बहुत बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि यह सम्मान विश्व सिनेमा में किसी भारतीय प्रतिभा के लिए मील का पत्थर है.

दीपिका पादुकोण की इस उपलब्धि व सम्मान को कमतर क्यों आंका जा रहा है? इस पर सवालिया निशान क्यों उठाए जा रहे हैं. उस के लिए ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ की चयन प्रक्रिया को समझना होगा.

पहली बात तो ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ क्या है? तो कैलीफोर्निया के लौस एंजेल्स में हौलीवुड बोलेवार्ड और वाइन स्ट्रीट के किनारे पर एक फुटपाथ है. हौलीवुड बोलेवार्ड के फुटपाथ पर 15 ब्लौक पर व वाइन स्ट्रीट के 3 ब्लौक पर पंचकोणीय चांदी और ताम्बे के सितारे जड़े हैं. 1960 में पहली बार स्थायी रूप से इन तारों को स्थापित किया गया था, जिन पर अभिनेताओं, संगीतकारों, निर्माताओं, निर्देशकों, नाट्य/संगीत समूहों, एथलीटों, काल्पनिक पात्रों और अन्य लोगों के नाम अंकित है.

10 जुलाई 2025 तक मार्लिन ब्राडो व चार्ली चैप्लीन सहित 2816 नाम अंकित हो चुके हैं. वाक औफ फेम का रखरखाव व देखभाल हौलीवुड चैम्बर औफ कौमर्स व हौलीवुड हिस्ट्री ट्रस्ट करती है. यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है. हर साल करीबन एक करोड़ पर्यटक आते हैं. हौलीवुड चैंबर चयनित मशहूर हस्तियों या उन के प्रायोजकों से हर साल शुल्क के रूप में (वर्तमान में 85,000 डौलर अर्थात लगभग 73 लाख रूपए) एकत्र करता है जिस से तारे के निर्माण और स्थापना के साथसाथ वाक औफ फेम के रखरखाव का खर्च वहन किया जाता है.

मसलन, स्टारज केबल नेटवर्क ने अपनी श्रृंखला क्रैश के प्रचार के लिए डेनिस हौपर के स्टार के लिए भुगतान किया. जबकि इस सम्मान को पाने के लिए दीपिका पादुकोण ने 73 लाख रुपए चुकाए हैं. कुल मिला कर जिस सम्मान को ले कर दीपिका पादुकोण खुशी जाहिर कर रही हैं, इंस्टाग्राम पर पोस्ट लिख रही हैं, उसे उन्होंने 73 लाख रुपए चुका कर पाया है. तो लोग सवाल उठा रहे हैं कि यह किस तरह की उपलब्धि है? क्या इस तरह खरीदे गए सम्मान से किसी व्यक्ति या सिनेमा या देश का सम्मान बढ़ता है? क्या इस तरह की उपलब्धि को उपलब्धि माना जाना चाहिए? क्या दीपिका पादुकोण अभिनय जगत में सभी को मात दे चुकी हैं?

बौलीवुड का ही एक तबका इसे अवार्ड या सम्मान के बजाय पीआर ऐक्टिविटी ही बता रहा है. पर इन सवालों का जवाब दीपिका पादुकोण की तरफ से नहीं दिया गया. हां, मीडिया में उन के पीआर की मारफत लेख छप रहे हैं कि हर साल हौलीवुड वाक औफ फेम में 200 नौमिनेशन आते हैं, उन में से 24 का ही चयन किया जाता है.

लोग तो सवाल यह उठा रहे हैं कि अगर प्रतिभा के बल पर यह सम्मान मिलता, तो फिर हौलीवुड वाक औफ फेम में ओम पुरी, इरफान, नसीरुद्दीन शाह, अमिताभ बच्चन, औस्कर विजेता ए आर रहमान का चयन क्यों नहीं किया गया. इतना ही नहीं, हौलीवुड से भी एंजिला जूली, अल पचीनो, रौबर्ट डाउनी ज्यूनियर, रौबर्ट डिनेरो, जिम केरी, ब्रैड पिट, लिनियार्डो डी कैपियो सहित कई बेहतरीन व नामचीन हौलीवुड स्टार भी हौलीवुड वाक औफ फेम का हिस्सा नहीं हैं. इन्होंने पैसा नहीं दिया तो क्या इन का सिनेमा जगत में कोई योगदान नहीं है? पर दीपिको पादुकोण की इस उपलब्धि पर कोई खुल कर कुछ कहने को तैयार नहीं. सभी के मुंह सिले हुए हैं.

लेकिन दीपिका पादुकोण के अति करीबी ने अपना नाम न बताने पर कहा, ‘लोग बेवजह बात का बतंगड़ बना रहे हैं.’ हौलीवुड वाक औफ फेम का हिस्सा बनना आसान नहीं है. हौलीवुड चैंबर्स औफ कौमर्स की चयन प्रक्रिया बहुत कठिन है. जहां तक 73 लाख रुपए का सवाल है, तो कलाकार का नाम सम्मान के साथ जिन तारों के साथ लिखा जाता है, वह सड़क पर है. यह क्षेत्र करीबन दो किलोमीटर में फैला हुआ है. ऐसे में साफसफाई व रखरखाव पर बहुत बड़ी धनराशि खर्च होती है. उसी को हौलीवुड चैंबर्स औफ कौमर्स वसलूता है, जिसे कहीं से भी गलत नहीं कहा जा सकता और इस से कलाकार को मिलने वाले सम्मान या उस की उपलब्धि कम नहीं हो जाती.’

भारत में एक मापदंड बन गया है कि अगर किसी भारतीय ने विदेश में कुछ पा लिया है, तो वह महान मान लिया जाता है. उस ने वह सम्मान कैसे पाया, कोई नहीं देखता. सिर्फ सम्मान ही क्यों, हमारे यहां कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल भी हौआ बना हुआ है. कुछ फिल्मकार अपनी फिल्म का कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में चयन न होने पर अपने खर्च से कान इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल जाते हैं और बाजार खंड का हिस्सा बन कर अपने खर्च पर डिस्ट्रीब्यूटरों को अपनी फिल्म दिखाते हैं. वहां से वापस आ कर भारतीय मीडिया में खबर छपवाते हैं कि कांस में उन की फिल्म को जबरदस्त सराहना मिली.

यों तो इस से पहले भी दीपिका पादुकोण को कई बार अंतर्राष्ट्रीय पटल पर सम्मानित किया जा चुका है. 2018 में टाइम मैगजीन की 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में उन का नाम था. उन्हें टाइम 100 इंपैक्ट अवार्ड भी मिल चुका है. 2022 में कतर में फीफा वर्ल्ड कप के दौरान ट्रौफी को अनवील करने का अवसर उन्हें मिला था.

Tokophobia : हौवा न बनने दें प्रैग्नैंसी के डर यानी टोकोफोबिया को

Tokophobia : टोकोफोबिया बीमारी से ज्यादा एक मानसिक अवस्था है जिस में महिलाएं प्रैग्नैंसी को ले कर डर जाती हैं. बेंगलुरु में हुई एक रिसर्च के मुताबिक 55 फीसदी महिलाएं इस का शिकार हैं. लेकिन यह कोई गंभीर बात नहीं है, थोड़ी सी समझ और इलाज से इस से छुटकारा पाना आसान है.

केस–1 : “इसी साल जनवरी की बात है. मैं और अनिमेष (बदला नाम) एक फ्रैंड के यहां पार्टी में गए थे. शुक्रवार का दिन था, दोनों बेफिक्र थे कि अगले 2 दिन छुट्टी है. हमारी पार्टियां हंगामेदार होती हैं.” एनसीआर की एक नामी कंपनी में 24 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर जौब कर रही 28 वर्षीया संभावना (बदला नाम) आगे बताती है, “उस रात हम दोनों ने ही ड्रिंक्स कुछ ज्यादा ले ली थी. कड़कड़ाती ठंड थी. रात कोई 3 बजे हम दोनों अपने ढाई कमरे के फ्लैट पर आए, तब खुमारी भी थी और थकान भी थी. इसी हालत में ड्राइंगरूम में सोफे पर ही लुढ़क गए. तभी एकाएक ही अनिमेष ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी तरफ खींच लिया.

“हमें इतना भी होश नहीं रहा कि जा कर बेडरूम से कंडोम यानी प्रोटैक्शन ले आते. हलके नशे में मन में खटका जरूर था कि कहीं वह गड़बड़ न हो जाए जिस से बचने के लिए हम लोग शादी के ढाई साल बाद से एहतियात बरत रहे थे. अकसर मन के ऐसे डर सच हो जाते हैं, वही मेरे साथ हुआ. टाइम पर पीरियड्स नहीं आए तो दिल धड़क उठा. स्ट्रिप ला कर प्रैग्नैंसी की पुष्टि की तो मैं तो घबरा उठी, क्योंकि हम दोनों ही अभी अगले 2 साल तक बच्चा नहीं चाहते थे. अनिमेष भी चिंता में पड़ गया और तुरंत कोई फैसला न ले सका कि बच्चा रखें या न.

“आखिर 15 दिन की ऊहापोह और सोचविचारी के बाद हम लोगों ने अबौर्शन कराने का फैसला लिया जो मानसिक रूप से मेरे लिए आसान काम नहीं था लेकिन फिर भी मैं इस के लिए तैयार हो गई क्योंकि प्लान के मुताबिक हमारी फाइनैंशियल पोजीशन ऐसी नहीं थी कि हम लोग बच्चा अफोर्ड कर पाते.

“हालांकि अबौर्शन में कोई परेशानी नही हुई, सबकुछ आराम से हो गया, मुझे पता भी नहीं चला. डाक्टर के मुताबिक तो मैं शाम को भी घर वापस जा सकती थी लेकिन कोई रिस्क उठाना ठीक नहीं समझा इसलिए एक रात हम ने बड़े से अस्पताल के लक्जरी वार्ड में गुजारी जो सहज नहीं थी. शायद, संस्कारों के चलते मन में गिल्ट था. खैर, अब सबकुछ ठीक है और पहले की तरह सामान्य है. लेकिन मन में प्रैग्नैंसी को ले कर एक अजीब सा डर बैठ गया है जिस का असर हमारी सैक्स लाइफ पर भी पड़ रहा है. डर यह कि कहीं एहतियात बरतने के बाद भी मैं प्रैग्नैंट न हो जाऊं जबकि मैं जानती हूं कि यह डर फुजूल है.

“दूसरा डर पहले डर से ज्यादा डरावना है कि कहीं ऐसा न हो कि जब हम बच्चा चाहें तब गर्भ ठहरे ही न. औपरेशन के दौरान कहीं कोई अंदरूनी गड़बड़ न हो गई हो. मम्मी अकसर उन की एक दूर की देवरानी का किस्सा बताया करती थीं कि उन्होंने यों ही सैक्स लाइफ एंजौय करने के लिए अबौर्शन करवा लिया था लेकिन फिर कभी मां नहीं बन सकीं. उन्हें दोतीन बार अपनेआप मिसकैरेज दूसरेतीसरे महीने में ही हो जाता था. लिहाजा, उन्होंने और चाचा ने बच्चे का खयाल ही छोड़ दिया. दो डाक्टर्स से कंसल्ट किया और तमाम चैकअप भी कराए. दोनों ने ही कहा कि कोई दिक्कत नहीं. आप के डर बेकार हैं, आप जब चाहें तब बच्चा प्लान कर सकते हैं.

“हालांकि अनिमेष मुझे हिम्मत बंधाते और हर तरह से समझाते रहते हैं लेकिन मैं अकसर महसूसती हूं कि वे भी पहले की तरह सहज नहीं हैं और उस रात के लिए खुद को दोष देते रहते हैं. अब 2 साल बाद जब प्रैग्नैंट हो कर बच्चे को जन्म दूंगी तभी यह डर पीछा छोड़ेगा.”

केस-2 : 26 वर्षीया आस्था (बदला नाम), जो चेन्नई में एक अंतर्राष्ट्रीय बैंक में कार्यरत है, का अनुभव भी संभावना सरीखा ही है. वह बताती है, “पिछले साल गरमी में मैं और शाश्वत (बदला नाम) एक रिश्तेदार की डैस्टिनेशन मैरिज में शामिल होने ऋषिकेश के पास एक रिजौर्ट में ठहरे थे. रिश्तेदार ने ही ट्रेन का रिजर्वेशन करा दिया था, इसलिए उसी से जाना मजबूरी हो गई थी. सफर लंबा था और मारे गरमी के बुरा हाल हो गया था. रात को ऋषिकेश के भव्य रिजौर्ट के अपने रूम में पहुंचे तो वहां की गुलाबी ठंडक ने हमें मदहोश कर दिया.

डिनर के बाद रूम में पहुंचे थे. बदले मौसम ने हमें यह सोचने का मौका भी नहीं दिया कि पास में कंडोम नहीं है. हम लोग 5 दिन ऋषिकेश घूमेफिरे, शादी अटेंड की. अच्छा यह हुआ कि शाश्वत कंडोंम ले आए थे. पर जो होना था वह पिछली रात ही हो चुका था यानी मैं प्रैग्नैंट हो चुकी थी. इस का पता मुझे चेन्नई पहुंचने के बाद चला. शादी को अभी एक साल ही हुआ था, हम लोग मांबाप बनने की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते थे.

भागेभागे डाक्टर के पास गए तो उन्होंने अबौर्शन की सलाह दी जो शाश्वत से सलाह के बाद मैं ने बिना देर किए करवा लिया. लेकिन 10 – 15 दिनों बाद ही पेट में दर्द शुरू हो गया. हलकीहलकी ब्लीडिंग भी हुई तो हम दोनों घबरा गए. फिर डाक्टर के पास भागे तो उन्होंने आश्वस्त किया कि चिंता की या घबराने की कोई बात नहीं, दवाइयों से सब ठीक हो जाएगा. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं बिलकुल ठीक हो गई हूं. अंदर कुछ गड़बड़ जरूर हो गई है, ऐसा मुझे लगता है और अकसर बिना किसी वजह के डर भी लगता है. कई बार तो लगता है कि अब दोबारा शायद ही प्रैग्नैंसी झेल पाऊंगी.

यह सैकंडरी टोकोफोबिया है

ये दोनों ही मामले दरअसल सैकंडरी टोकोफोबिया नाम की बीमारी के हैं जिस का संबंध शरीर से ज्यादा मन से होता है. चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक, टोकोफोबिया एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिस में महिला को प्रैग्नैंसी या डिलीवरी से बहुत ज्यादा चिंता होती है या तेज डर लगता है. इस की वजह उस का पहले का तकलीफदेह अनुभव होता है. संभावना और आस्था इसी सैकंडरी टोकोफोबिया की गिरफ्त में अनजाने में ही सही आ गई थीं. टोकोफोबिया शब्द टोको और फोबिया से मिल कर बना है. टोक का मतलब प्रसव होता है. इस के दूसरे नाम मेसियोफोबिया और पट्युरीफोबिया हैं.

इस हालत में महिला को दोबारा प्रैग्नैंट होने से डर लगने लगता है और वह प्रैग्नैंसी से बचने की कोशिश करती है. कुछ महिलाएं तो सैक्स से ही कतराने लगती हैं. ऐसा तब ज्यादा होता है जब वे पिछले अबौर्शन या डिलीवरी के बारे में सोचने लगती हैं. सोचतेसोचते ही गुजरा हादसा हकीकत सा लगने लगता है जिस से वे घबरा उठती हैं. दिमाग में तरहतरह के खयाल आने लगते हैं जो आमतौर पर नैगेटिव ही होते हैं.

“कुछ दिनों तक तो मैं ढंग से सो ही नहीं पाई थी,” संभावना बताती है, “सोचतेसोचते हार्ट बीट बढ़ जाती थी. सांस तक मुश्किल से ले पाती थी और पसीना भी आने लगता था. ऐसे में अनिमेष मुझे संभालता था. हम दोनों रातरातभर बैठे मोबाइल पर गेम खेलते रहते थे. इस से हमारे कामकाज पर भी असर पड़ने लगा था. अब हालांकि बहुत कुछ कंट्रोल में है लेकिन इसे सबकुछ नहीं कहा जा सकता.

असमंजस में महिलाएं

कभीकभी, अभी भी, यह सोचते घबराहट होने लगती है कि जब जरा से अबौर्शन से यह हालत हो गई तो डिलीवरी में क्या होगा, भले ही फिर वह नौर्मल न हो कर मेरी इच्छा के मुताबिक सिजेरियन हो. कई बार यह भी लगता है कि बच्चे की झंझट ही क्यों पालें, गोद भी तो ले सकते हैं. इस में क्या हर्ज है. फिर लगता है कि अपना बच्चा अपना ही होता है और मेरी मां और सास दोनों की इच्छा है कि मैं वक्त रहते मां बन जाऊं और उन्हें भी नातीपोते खिलाने का सुख और ख़ुशी मिले. इसी डर से उन्हें या किसी को भी अबौर्शन के बारे में नहीं बताया था.

अपनेआप को समझातेसमझाते मैं थक भी जाती हूं और झल्ला भी उठती हूं कि बेमतलब को फसाद मोल ले लिया. उस दिन खुद पर कंट्रोल कर पाते या कंडोम इस्तेमाल कर लेते तो यह नौबत तो न आती.

इन दोनों जैसी कई महिलाओं को ऐसी हालत से रूबरू होना पड़ता है जिस का असर उन के व्यक्तित्व के अलावा कैरियर सहित पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. कुछ महिलाएं तो इतनी घबरा जाती हैं कि फिर कभी मां न बनने का अप्रिय फैसला बेमन से ले लेती हैं. कई बार यह डर पीटीएसडी यानी पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रैस डिसऔर्डर से भी कनैक्ट रहता है.

पीटीएसडी भी एक मनोस्थिति है जिस में महिला का कोई अनुभव दर्दनाक, भयावह या किसी अप्रिय घटना का गवाह बनने के चलते होता है, मसलन किसी भीषण एक्सिडैंट को देख लेना या हिंसक लड़ाईझगड़ा देख लेना या फिर किसी प्राकृतिक आपदा को देख लेना. ऐसी घटनाएं महिलाओं को मानसिक और भावनात्मक रूप से डिस्टर्ब कर देती हैं.

आस्था और संभावना ने तो खुद अबौर्शन करवाया था लेकिन किसी और वजह से भी अबौर्शन का हो जाना महिला को सैकंडरी टोकोफोबिया का मरीज बना सकता है. संभावना का मामला इस से जुड़ा लगता है क्योंकि उस ने अपनी मम्मी से चाची के अबौर्शन के बारे में सुन रखा था जो उस के अचेतन में कहीं सुरक्षित रखा था.

लेकिन यह कोई खास चिंता की बात नहीं है. सैकंडरी टोकोफोबिया कोई ऐसी स्थिति नहीं है जिस से बचा न जा सके या जिस का इलाज न हो. इस स्थिति का निदान मनोचिकित्सक और गायनीकोलौजिस्ट से होने के बाद इलाज संभव है. इस में आमतौर पर एंटी डिप्रैशन दवाएं डाक्टर्स देते हैं. इस के अलावा सीबीटी यानी काग्निटिव विहेवियोरल थेरैपी भी कारगर साबित होती है. और भी कई थेरैपी फर्क डालती हैं लेकिन सब से अहम है परिवारजनों, खासतौर से पति, का हर स्तर पर सहयोग जो आस्था और संभावना को तो मिला हुआ है लेकिन सभी को मिले, यह जरूरी नहीं.

यह होता है प्राइमरी टोकोफोबिया

अब यह जिम्मेदारी पति की बनती है कि वह पत्नी की दिमागी हालत और परेशानी को समझते उस का सहयोग करे और बच्चे की जिद न करे जो कि पत्नी पर एक बड़े दबाब का काम करता है. सास और ससुराल वालों को टरकाना एक दफा आसान होता है लेकिन पति की इच्छा या दबाब की बहुत ज्यादा अनदेखी पत्नी नहीं कर पाती. इस हालत से गुजर रहीं महिलाएं शारीरिक सबंध बनाने से भी बचने की कोशिश करती हैं. इसलिए पति को समझ और सब्र से काम लेना चाहिए.

यह तो रही एक अप्रिय अनुभव या हादसे की बात लेकिन कई युवतियां बिना इन से रूबरू हुए भी प्रैग्नैंसी या डिलीवरी से डरने लगती हैं जिसे प्राइमरी टोकोफोबिया कहा जाता है. इस में भी युवतियां प्रैग्नैंट होने से डरती हैं जिस से उन की स्थिति सैकंडरी टोकोफोबिया की महिलाओं सरीखी हो जाती है. यह डर आमतौर पर कहेसुने की बिना पर पैदा होता है कि डिलीवरी में असहनीय दर्द होता है और बच्चा मुश्किल से जन्म ले पाता है.

फिल्मों में प्रसव के ऐसे दृश्य इफरात से दिखाए जाते हैं जिन में बच्चे को जन्म दे रही महिला भीषण दर्द से छटपटा रही होती है. उस के दोनों हाथ पीछे पलंग को पकड़े हुए होते हैं, दांत बंधे होते हैं वगैरहवगैरह. इस से डर जाना स्वभाविक है लेकिन यह भी याद रखा जाना चाहिए कि प्रसव भी बेहद स्वाभाविक है लगभग पहली बार के सहवास की तरह जिस के बाद का सुख और तृप्ति सारा दर्द भुला देते हैं.

हरेक युवती को यह भी याद रखना चाहिए कि वह कोई पहली या आखिरी नहीं है जो इस से हो कर गुजरेगी. उस से पहले करोड़ोंखरबों अनगिनत प्रसव सफलतापूर्वक हो चुके हैं. अब तो काफी सहूलियतें, दवाएं और तकनीकें मौजूद हैं जो दर्द से राहत दिलाती हैं वरना एक दौर वह भी था जब महिलाएं एक के बाद एक दर्जनभर तक बच्चों को जन्म देती थीं और उन्हें आराम करने की भी इजाजत न होती थी.

प्राइमरी टोकोफोबिया का इलाज भी सैकंडरी टोकोफोबिया जैसा ही है. इन दोनों से बचने के लिए एक स्वस्थ और व्यस्त दिनचर्या के साथसाथ प्रसव के बारे में जानकारियां हासिल करते रहना है जिस से डर कम हो या खत्म ही हो जाए.

Sex Tips : दूसरी शादी के बाद सैक्स

Sex Tips : दूसरी शादी के बाद सैक्स लाइफ एकदम आसान नहीं होती बल्कि उसे आसान बनाना पड़ता है. अगर समझ और सब्र से काम लिया जाए तो सैक्स लाइफ पहली शादी के मुकाबले ज्यादा बेहतर हो सकती है. आइए जानें इस में पेश आने वाली परेशानियां और उन के हल.

दूसरी शादी किसी के लिए भी एक तरह से नई जिंदगी की शुरुआत होती है लेकिन यह सुखद और सफल तभी होती है जब पतिपत्नी के बीच सैक्स और रोमांस में कोई कमी न हो. आमतौर पर दूसरी शादी करने वाले पुरुष और महिला दोनों इस बात को ले कर शंकित रहते हैं कि अगर वे नए जीवनसाथी के साथ सैक्स में तालमेल नहीं बैठाल पाए तो क्या होगा. दूसरी शादी एक ऐसा जुआ है जिस में जीतहार यानी सफलताअसफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि पतिपत्नी दोनों का यौन व्यवहार कैसा है.

भोपाल के 35 वर्षीय राघवेंद्र की पत्नी का निधन कोरोना के दौरान हो गया था. परिवार के दबाव के चलते उन्हें दूसरी शादी साल 2023 की शुरुआत में करनी पड़ी हालांकि खुद उन की भी इच्छा थी. लेकिन डर इस बात से रहे थे कि बाकी सब तो ठीक है लेकिन क्या पता दूसरी पत्नी के साथ सहज ढंग से सैक्स संबंध बना पाएंगे या नहीं. पेशे से सरकारी नौकर राघवेंद्र की दूसरी पत्नी रंजना भी जौब में थीं.

दिक्कत क्रमांक – 1

सुहागरात को शारीरिक संबंध नहीं बने, केवल औपचारिक बातें होती रहीं. राघवेंद्र बताते हैं-
“मैं ने रंजना को शादी तय होने से पहले ही बता दिया था कि शुरू के कुछ दिन जिन कुछ मामलों में सहज रहना मेरे लिए आसान नहीं होगा, सैक्स उन में से एक होगा. रंजना समझदार थी, सो, समझ गई कि पहली तलाकशुदा को एक दफा भुला देना आसान काम है लेकिन मृतक पत्नी को भूल पाना सहज नहीं होता क्योंकि उस से तमाम तरह के लगाव रहते हैं जो मौत के बाद एकदम खत्म नहीं हो जाते. इस में वक्त लगता है. उस ने एतराज नहीं जताया, न ही इस बारे में ज्यादा सवालजवाब किए.”

जब इन दोनों से अनौपचारिक चर्चा इस प्रतिनिधि द्वारा उन्हीं के घर में बैठ कर की जा रही थी तब दोनों ही, जाहिर है, गोपनीयता बरतने की शर्त पर काफीकुछ बताने के लिए उत्साहित थे. रंजना ने बताया, “इन की मंशा मैं समझ गई थी कि दीदी को भुला पाना इन के लिए कठिन होगा, इसलिए किसी भी बात के लिए मैं इन्हें इंसिस्ट नहीं करना चाहती थी. अगर पुरुष के लिए दूसरी शादी मौका और चुनौती दोनों हैं तो अविवाहित महिला के हिस्से में सिर्फ चुनौतियां ही आती हैं.”

“रंजना से अंतरंग संबंध बनाने में मुझे एक अजीब सी हिचक हो रही थी,” राघवेंद्र बोले, “कुछ था जो हम दोनों के आड़े आ रहा था. शायद वह सुधा की याद थी. मैं ने यह बात शादी के तीसरे दिन ही अंजना को बता भी दी थी तो वह बेहद गंभीरता से बोली थी, ‘कोई बात नहीं, जब आप का मन करे, पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास और आपसी अंडरस्टैंडिंग पर टिका होता है.’ यह जवाब मुझे अंदर तक आश्वस्त कर गया था कि मैं बेवजह खुद के और रंजना के साथ ज्यादती कर रहा हूं और उस में यह घर और माहौल भी आड़े आ रहे हैं. लिहाजा, मैं ने तुरंत मनाली जाने के लिए रिजर्वेशन करवा लिए.

“वहां जा कर सारी झिझक और कोई कौम्पलैक्स था तो वे दूर हो गए. 4 दिन हम ने न्यू कपल्स जैसे रोमांस और सैक्स में गुजारे. भोपाल से दिल्ली और वहां से मनाली तक टैक्सी का सफर बेहद सुहाना था. मनाली उतरते ही मुझे जाने क्या हुआ कि मैं टैक्सी से उतर कर सामने वाली मैडिकल शौप से कंडोम का पैकेट खरीद लाया और चुपचाप रंजना को दिखा भी दिया तो उस ने भी एक खास अंदाज में मुसकरा कर बाईं आंख दबा दी, तो मैं तो पगला उठा था.

“अब मुझे उस दिन और उन दिनों के बारे में सोचते ही हंसी आती है. भोपाल वापस आए तो सबकुछ सहज था. आज हमारा बिट्टू सवा साल का होने जा रहा है और हमारी सैक्स लाइफ बहुत बेहतर गुजर रही है जिस में रंजना की समझ, स्मार्ट पहल और धैर्य का बड़ा हाथ है. अगर वह मुंह चढ़ाती, मुझ पर कोई कमैंट करती तो शायद दिक्कत पेश आती.”

इस जोड़े की बातों से समझ यही आता है कि दूसरी शादी के बाद सैक्स करना आसान नहीं होता. पुरुष अगर पत्नी की मौत के बाद शादी करता है तो पहली पत्नी की याद स्वाभाविक रूप से उसे आती है. वह उस की जगह, खासतौर से बिस्तर, किसी और को देते गिल्ट फील कर सकता है. हैरानी की बात इस मानसिकता में यह है कि वह सामाजिक तौर पर उसे पत्नी का दर्जा विधिविधान से दे चुका होता है.

लेकिन अगर यह यानी पहले जीवनसाथी की याद सैक्स संबंधों और रोमांस में बाधक बनने लगे तो बहुत सा वक्त जाया हो जाता है और कई तरह की गलतफहमियां पैदा होती हैं सो अलग.

दिक्कत क्रमांक -2

48 वर्षीय रवि की दूसरी शादी रश्मि से हुई थी. रवि की पहली शादी का अनुभव बेहद कटु रहा था. पत्नी से कलह और अनबन के चलते तलाक हुआ था जिस का मुकदमा कोई 6 साल चला था. तलाक के बाद 42 वर्षीया रश्मि से उन की शादी हुई तो वे थोड़ा डरे हुए थे कि क्या पता, इस अरसे के बाद सहवास कर पाएंगे या नहीं. दूसरे, बढ़ती उम्र और बेतरतीब लाइफस्टाइल के अलावा मुकदमे के तनाव ने उन्हें ब्लडप्रैशर और डाइबिटीज का भी मरीज बना दिया था.

शादी से पहले अपने फिजिशियन को उन्होंने यह समस्या बताई तो उन्हें सलाह मिली कि उम्र और इन बीमारियों को सैक्स से कोई खास संबंध नहीं. कुछ और भी समझाइशें फिजिशियन ने उन्हें दीं जिन में अहम यह थी कि वे कोई वहम न पालें और सैक्सवर्धक दवाओं के झांसे में न आएं.

उधर रश्मि की हालत भी जुदा नहीं थी जिसे रोमांस का तो थोड़ा बहुत था लेकिन सैक्स का कतई तजरबा नहीं था. वह इस उम्र में मां बनने न बनने को ले कर भी हिचक रही थी. वह भी लेडी डाक्टर से मिली थी जिन्होंने यह सलाह दी थी कि इस बारे में शादी के बाद पति से चर्चा कर आगे बढ़ना. हालफ़िलहाल तो सैक्स में कोई दिक्कत नहीं आएगी. इस उम्र में भी मां बना जा सकता है. लेकिन यह शादी से बाद की बात है. अभी तो मन से सारे डर और आशंकाएं निकाल कर एंजौय करो.

दोनों ने अपनेअपने डाक्टर्स की सलाह मानी और आज शादी के 3 साल बाद सुखद वैवाहिक जीवन गुजार रहे हैं. सैक्स में कोई दिक्कत उन्हें पेश नहीं आ रही है. हां, मां बनने के लक्षण रश्मि को कतई नहीं दिखे जिसे ले कर दोनों को कोई गिला नहीं क्योंकि रवि का एक बेटा एक बेटी पहले से ही हैं जो पहली पत्नी की कस्टडी में हैं और महीनेदोमहीने में दोनों उन से मिल भी आते हैं.

इस मामले में दिक्कत उम्र और उम्रजनित बीमारियां थीं जो सैक्स में आड़े नहीं आतीं.

दिक्कत क्रमांक – 3

30 वर्षीय संकेत का तलाक हमउम्र नेहा से हुआ तो उस ने 6 महीने बाद ही अपनी तलाकशुदा सहकर्मी अनन्या से शादी कर ली. ये तीनों ही बेंगलुरु में रहते एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं. अनन्या और संकेत दोनों को ही सैक्स का अनुभव था, इसलिए उन्हें लग रहा था कोई परेशानी नहीं आएगी. लेकिन दिक्कत उस वक्त हुई जब संकेत बिस्तर में उस की तुलना नेहा से यह कहते करने लगा कि उस के साथ ज्यादा मजा आता था.

यह बात अनन्या को नागवार गुजरी लेकिन वह यह सोच कर खामोश रही कि अभी संकेत और नेहा के तलाक को ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, इसलिए उस ने यों ही रौ में आ कर कह दिया होगा. लेकिन हद तो तब हो गई जब वह हर कभी उस के यौन व्यवहार की तुलना नेहा से करने लगा. अनन्या ने उसे रोका और समझाया भी कि मुझे यह तुलना पसंद नहीं. जैसे दो लोगों का सामान्य व्यवहार अलग होता है वैसे ही उन का यौन व्यवहार भी अलग होता है, इसलिए हमें उस से जैसा भी है तालमेल बैठा लेना चाहिए.

संकेत तालमेल नहीं बैठा पाया. उलटे, अनन्या को ही ब्लेम करने लगा कि तुम इतनी पढ़ीलिखी हो, नए जमाने की हो, सौफ्टवेयर इंजीनियर हो लेकिन पति की सैक्स इच्छाओं और अपेक्षाओं को नहीं समझ पा रही हो. जबकि नेहा सबकुछ समझ रही थी कि संकेत का सैक्स करने का तरीका नौर्मल नहीं है. इस आरोप पर भरीभुनी बैठी अनन्या फट पड़ी कि तो जाओ फिर उसी के पास, जब इतना और ऐसेवैसे जैसे तुम चाहो वैसे मजा वह देती थी तो तलाक क्यों दे दिया. मेरे साथ रहना है तो थोड़ा एडजस्ट करना पड़ेगा जैसे मैं कर रही हूं.

अब दोनों की जिंदगी नरक सी हो गई है. एक छत के नीचे अजनबियों जैसे रहने लगे हैं दोनों. बस, दिनरात कंपनी के काम और काम, इस के सिवा कुछ नहीं, न सैक्स न रोमांस. दोनों को ही लगता है कि बेकार में शादी की. सैक्स तो बेंगलुरु जैसे शहर में आसानी से उपलब्ध हो जाता है, फिर गले में यह घंटा वेबजह लटका लिया.

इस मामले में दिक्कत पहले जीवनसाथी के यौन व्यवहार से दूसरे की तुलना ज्यादा है, जो निहायत ही गैरजरूरी है. दूसरे, काम की अधिकता और भावनात्मक लगाव का पैदा न हो पाने के अलावा अपरिपक्वता भी है.

दिक्कत क्रमांक -4

मुंबई की एक कंपनी में नौकरी कर रहे 32 वर्षीय अर्चित का पत्नी छवि से तलाक हुए 2 साल गुजरे थे कि दूसरी शादी एक छोटे शहर या क़सबा कुछ भी कह लें में रहने वाली 28 वर्षीया शोभा से तय हो गई. शोभा मामूली पढ़ीलिखी थी लेकिन थी बेइंतहा ख़ूबसूरत, जो रवि ने पहली बार उसे देखते ही हां कर दी थी. नहीं तो वह दूसरी शादी के लिए भी कोई आधा दर्जन लड़कियां रिजैक्ट कर चुका था. शादी के बाद कुछ दिन मुंबई स्थित अपने फ्लैट में ठहर कर हनीमून के लिए उस ने गोवा जाने का प्लान बनाया था.

मुंबई में पहली ही रात उस का मन कसैला हो उठा जब उसे शोभा की बगलों और प्राइवेट पार्ट के बाल खूंटे से महसूस हुए. क्या पता कैसी गंवार औरत पल्ले पड़ गई, नहीं तो आजकल गांवों तक की लड़कियां इतनी स्मार्ट तो होती हैं कि कम से कम सुहागरात के दिन तो साफसफाई और हाइजिन का खयाल रखें. यह सोचतेसोचते वह आधे रास्ते से वापस आ गया. उधर शोभा बेचारी समझ ही नहीं पाई कि आखिर अर्चित को एकाएक ही यह क्या हो गया जो वह बेरुखी से उठ कर ड्राइंगरूम में जा कर मोबाइल से खेलने लगा.

दोतीन दिन यों ही अनमने से गुजरे. पति की बेरुखी देख शोभा सकते में थी कि उस से क्या गलती हो गई लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. जितने सपने उस ने सुहागरात को ले कर संजोए थे, सब मिटटी में मिल गए. उधर अर्चित भी असमंजस में था कि क्या करे, अगर सलीके से रहना नहीं आता तो इस में शोभा की क्या गलती. हो सकता है उसे इन सब बातों का आइडिया ही न हो और फिर, यह कोई बहुत बड़ी कमी तो नहीं. लिहाजा, उस ने ठंडे दिमाग से सोचते अपनी समस्या हल करने का फैसला लिया. अगली सुबह अर्चित उठा तो उस का मूड बदला हुआ था. उस ने उठते ही शोभा को बांहों में जकड़ लिया.

शोभा बेचारी समझ ही नहीं पाई कि यह कैसा अजीब आदमी है. अभी तक तो सीधेमुंह बात नहीं कर रहा था और अब इफरात से लाड़प्यार और चुंबन बरसा रहा है. चायनाश्ते के दौरान ही अर्चित ने उस से कहा कि चलो, मुंबई घूमने चलते हैं. लंच बाहर ही करेंगे और किसी मौल से तुम्हारे मेकअप के लिए कुछ सामान ले आते हैं. इन में भी तुम्हारे लिए हेयररिमूवर बहुत जरुरी है. बाथरूम में नहातेनहाते शोभा को समझ आया कि क्यों अर्चित ने हेयररिमूवर शब्द पर जोर दिया था. समझ आते ही वह खुद पर झल्ला भी उठी और शर्मा भी उठी कि जल्दबाजी में इस का तो उसे ध्यान ही नहीं रहा जबकि भाभी ने इस तरफ इशारा किया था.

अब दोनों सैक्स लाइफ एंजौय कर रहे हैं और अकसर सुहागरात की इस बात की चर्चा कर हंस भी पड़ते हैं.

इस मामले में दिक्कत पत्नी का थोड़ा पिछड़ा होना था क्योंकि उस का बैकग्राउंड भी ऐसा ही था. इसी तरह जरूरी नहीं कि दूसरी पत्नी का बौद्धिक और शैक्षणिक स्तर भी पहली जैसा हो. इस परेशानी को दूर करने की जिम्मेदारी पति उठाए तो बात बनते देर नहीं लगती.

यह करें बेहतर सैक्स लाइफ के लिए

दूसरी शादी, महिला हो या पुरुष दोनों के लिए, एक तरह का रिस्क ही होती है. इसे निभाने के लिए कई छोटेबड़े समझौते करने दोनों की मजबूरी हो जाती है. कई नागवार बातों को नजरअंदाज भी करना पड़ता है. सैक्स लाइफ पहली शादी की तरह सहज और सामान्य नहीं होती क्योंकि किसी एक पक्ष को इस का अनुभव होता है पर वह अकसर बजाय सहूलियत देने के, दिक्कत पैदा करता है. इस के बाद भी कुछ दिन बीत जाने के बाद आमतौर पर सब सामान्य हो जाता है. थोड़ी दिक्कत तब पेश आती है जब पति या पत्नी के छोटे बच्चे हों.

भोपाल की ही एक बैंककर्मी सविता बताती हैं कि उन की शादी 42 वर्ष की उम्र के बाद तलाकशुदा अमित से हुई थी जिन का पहली पत्नी से 8 साल का बेटा था. पहली ही रात वह हतप्रभ रह गई जब बच्चे को भी सुहाग की सेज पर लेटे देखा. उस ने इसे सहजता से लिया. पति ने भी अपनी मजबूरी दोहराई. दोतीन महीने बाद ही बच्चे की पापा के साथ सोने की आदत छूट गई और सबकुछ ठीक हो गया लेकिन इस के लिए उसे काफी सब्र से काम लेना पड़ा.

कुल जमा दूसरी शादी के बाद सैक्स लाइफ कोई समस्या नहीं रह जाती अगर आप आमतौर पर पेश आने वाली ऊपर बताई कुछ दिक्कतों को समझें और नीचे दी गईं टिप्स पर अमल करें-

  •  सैक्स संबंध बनाने में जल्दबाजी न करें. शुरुआती दिनों में छूना और फोरप्ले करना सहजता की तरफ ले जाता है.
  • सब से पहले दूसरे जीवनसाथी से भावनात्मक परिचय बढ़ाते लगाव पैदा करें.
  • पहले जीवनसाथी की तुलना अव्वल तो किसी भी मसले पर नहीं करना चाहिए पर यौन व्यवहार की तुलना तो कतई नहीं करना चाहिए. इस से दूसरा हर्ट हो सकता है.
  •  दूसरे विषयों की तरह सैक्स पर भी खुल कर बातचीत करना ठीक रहता है.
  • साफसफाई और स्वच्छता का खयाल रखना चाहिए.
  • छोटीमोटी बीमारियां आमतौर पर सैक्स में बाधक नहीं होतीं लेकिन फिर भी अगर मन में शंका हो तो फिजिशियन या मनोचिकित्सक सलाह ले लेनी चाहिए.
  • यह हमेशा याद रखना चाहिए कि पहले या पहली की अब जिंदगी में कोई अहमियत नहीं है, इसलिए उस की याद या जिक्र भी फुजूल है.
  • दूसरी शादी कोई जुर्म नहीं है, इसलिए उसे ले कर मन में कोई गिल्ट नहीं रखना चाहिए.
  • आमतौर पर दूसरी शादी ज्यादा उम्र में ही होती है, इसलिए लाइफस्टाइल का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, मसलन खानपान, व्यायाम आदि.

Family Story : कृष्णिमा – बाबूजी को किस बात का संदेह था ?

Family Story : ‘‘आखिर इस में बुराई क्या है बाबूजी?’’ केदार ने विनीत भाव से बात को आगे बढ़ाया.

‘‘पूछते हो बुराई क्या है? अरे, तुम्हारा तो यह फैसला ही बेहूदा है. अस्पतालों के दरवाजे क्या बंद हो गए हैं जो तुम ने अनाथालय का रुख कर लिया? और मैं तो कहता हूं कि यदि इलाज करने से डाक्टर हार जाएं तब भी अनाथालय से बच्चा गोद लेना किसी भी नजरिए से जायज नहीं है. न जाने किसकिस के पापों के नतीजे पलते हैं वहां पर जिन की न जाति का पता न कुल का…’’

‘‘बाबूजी, यह आप कह रहे हैं. आप ने तो हमेशा मुझे दया का पाठ पढ़ाया, परोपकार की सीख दी और फिर बच्चे किसी के पाप में भागीदार भी तो नहीं होते…इस संसार में जन्म लेना किसी जीव के हाथों में है? आप ही तो कहते हैं कि जीवनमरण सब विधि के हाथों होता है, यह इनसान के वश की बात नहीं तो फिर वह मासूम किस दशा में पापी हुए? इस संसार में आना तो उन का दोष नहीं?’’

‘‘अब नीति की बातें तुम मुझे सिखाओगे?’’ सोमेश्वर ने माथे पर बल डाल कर प्रश्न किया, ‘‘माना वे बच्चे निष्पाप हैं पर उन के वंश और कुल के बारे में तुम क्या जानते हो? जवानी में जब बच्चे के खून का रंग सिर चढ़ कर बोलेगा तब क्या करोगे? रक्त में बसे गुणसूत्र क्या अपना असर नहीं दिखाएंगे? बच्चे का अनाथालय में पहुंचना ही उन के मांबाप की अनैतिक करतूतों का सुबूत है. ऐसी संतान से तुम किस भविष्य की कामना कर रहे हो?’’

‘‘बाबूजी, आप का भय व संदेह जायज है पर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में केवल खून के गुण ही नहीं बल्कि पारिवारिक संस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं,’’ केदार बाबूजी को समझाने का भरसक प्रयास कर रहा था और बगल में खामोश बैठी केतकी निराशा के गर्त में डूबती जा रही थी.

केतकी को संतान होने के बारे में डाक्टरों को उम्मीद थी कि वह आधुनिक तकनीक से बच्चा प्राप्त कर सकती है और केदार काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि लाखों रुपए क्या केवल इसलिए खर्च किए जाएं कि हम अपने जने बच्चे के मांबाप कहला सकें. यह तो केवल आत्मसंतुष्टि तक सोचने वाली बात होगी. इस से बेहतर है कि किसी अनाथ बच्चे को अपना कर यह पैसा उस के भविष्य पर लगा दें. इस से मांबाप बनने का गौरव भी प्राप्त होगा व रुपए का सार्थक प्रयोग भी होगा.

‘केतकी, बस जरूरत केवल बच्चे को पूरे मन से अपनाने की है. फर्क वास्तव में खून का नहीं बल्कि अपनी नजरों का होता है,’ केदार ने जिस दिन यह कह कर केतकी को अपने मन के भावों से परिचित कराया था वह बेहद खुश हुई थी और खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू बह निकले थे पर अगले ही क्षण मां और बाबूजी का खयाल आते ही वह चुप हो गई थी.

केदार का अनाथालय से बच्चा गोद लेने का फैसला उसे बारबार आशंकित कर रहा था क्योंकि मांबाबूजी की सहमति की उसे उम्मीद नहीं थी और उन्हें नाराज कर के वह कोई कार्य करना नहीं चाहती थी. केतकी ने केदार से कहा था, ‘बाबूजी से पहले सलाह कर लो उस के बाद ही हम इस कार्य को करेंगे.’

लेकिन केदार नहीं माना और कहने लगा, ‘अभी तो अनाथालय की कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, अभी से बात क्यों छेड़ी जाए. उचित समय आने पर मांबाबूजी को बता देंगे.’

केदार और केतकी ने आखिर अनाथालय जा कर बच्चे के लिए आवेदनपत्र भर दिया था.

लगभग 2 माह के बाद आज केदार ने शाम को आफिस से लौट कर केतकी को यह खुशखबरी दी कि अनाथालय से बच्चे के मिलने की पूर्ण सहमति प्राप्त हो चुकी है. अब कभी भी जा कर हम अपना बच्चा अपने साथ घर ला सकते हैं.

भावविभोर केतकी की आंखें मारे खुशी के बारबार डबडबाती और वह आंचल से उन्हें पोंछ लेती. उसे लगा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद उस के ममत्व की धारा में एक नन्ही जान की नौका प्रवाहित हुई है जिसे तूफान के हर थपेडे़ से बचा कर पार लगाएगी. उस नन्ही जान को अपने स्नेह और वात्सल्य की छांव में सहेजेगी….संवारेगी.

केदार की धड़कनें भी तो यही कह रही हैं कि इस सुकोमल कोंपल को फूलनेफलने में वह तनिक भी कमी नहीं आने देगा. आने वाली सुखद घड़ी की कल्पना में खोए केतकी व केदार ने सुनहरे सपनों के अनेक तानेबाने बुन लिए थे.

आज बाबूजी के हाथ से एक तार खिंचते ही सपनों का वह तानाबाना कितना उलझ गया.

केतकी अनिश्चितता के भंवर में उलझी यही सोच रही थी कि मांजी को मुझ से कितना स्नेह है. क्या वह नहीं समझ सकतीं मेरे हृदय की पीड़ा? आज बाबूजी की बातों पर मां का इस तरह से चुप्पी साधे रहना केतकी के दिल को तीर की तरह बेध रहा था.

केदार लगातार बाबूजी से जिरह कर रहा था, ‘‘बाबूजी, क्या आप भूल गए, जब मैं बचपन में निमोनिया होने से बहुत बीमार पड़ा था और मेरी जान पर बन आई थी, डाक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाने के लिए कहा था पर मेरा खून न आप के खून से मेल खा रहा था न मां से, ऐसे में मुझे बचाने के लिए आप को ब्लड बैंक से खून लेना पड़ा था. यह सब आप ने ही तो मुझे बताया था. यदि आप तब भी अपनी इस जातिवंश की जिद पर अड़ जाते तो मुझे खो देते न?

‘‘शायद मेरे प्रति आप के पुत्रवत प्रेम ने आप को तब तर्कवितर्क का मौका ही नहीं दिया होगा. तभी तो आप ने हर शर्त पर मुझे बचा लिया.’’

‘‘केदार, जिरह करना और बात है और हकीकत की कठोर धरा पर कदम जमा कर चलना और बात. ज्यादा दूर की बात नहीं, केवल 4 मकान पार की ही बात है जिसे तुम भी जानते हो. त्रिवेदी साहब का क्या हश्र हुआ? बेटा लिया था न गोद. पालापोसा, बड़ा किया और 20 साल बाद बेटे को अपने असली मांबाप पर प्यार उमड़ आया तो चला गया न. बेचारा, त्रिवेदी. वह तो कहीं का नहीं रहा.’’

केदार बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘बाबूजी, हम सब यही तो गलती करते हैं, गोद ही लेना है तो उन्हें क्यों न लिया जाए जिन के सिर पर मांबाप का साया नहीं है कुलवंश, जातबिरादरी के चक्कर में हम इतने संकुचित हो जाते हैं कि अपने सीमित दायरे में ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. संसार में ऐसे बहुत कम त्यागी हैं जो कुछ दे कर भूल जाएं. अकसर लोग कुछ देने पर कुछ प्रतिदान पा लेने की अपेक्षाएं भी मन में पाल लेते हैं फिर चाहे उपहार की बात हो या दान की और फिर बच्चा तो बहुत बड़ी बात होती है. कोई किसी को अपना जाया बच्चा देदे और भूल जाए, ऐसा संभव ही नहीं है.

‘‘माना अनाथालय में पल रहे बच्चों के कुल व जात का हमें पता नहीं पर सब से पहले तो हम इनसान हैं न बाबूजी. यह बात तो आप ही ने हमें बचपन में सिखाई थी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. अब आप जैसी सोच के लोग ही अपनी बात भुला बैठेंगे तब इस समाज का क्या होगा?

‘‘आज मैं अमेरिका की आकर्षक नौकरी और वहां की लकदक करती जिंदगी छोड़ कर यहां आप के पास रहना चाहता हूं और आप दोनों की सेवा करना चाहता हूं तो यह क्या केवल मेरे रक्त के गुण हैं? नहीं बाबूजी, यह तो आप की सीख और संस्कार हैं. मैं ने बचपन में आप को व मांजी को जो करते देखा है वही आत्मसात किया है. आप ने दादादादी की अंतिम क्षणों तक सेवा की है. आप के सेवाभाव स्वत: मेरे अंदर रचबस गए, इस में रक्त की कोई भूमिका नहीं है और ऐसे उदाहरणों की क्या कमी है जहां अटूट रक्त संबंधों में पनपी कड़वाहट आखिर में इतनी विषाक्त हो गई कि भाई भाई की जान के दुश्मन बन गए.’’

‘‘देखो, मुझे तुम्हारे तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ सोमेश्वर बोले, ‘‘मैं ने एक बार जो कह दिया सो कह दिया, बेवजह बहस से क्या लाभ? और हां, एक बात और कान खोल कर सुन लो, यदि तुम्हें अपनी अमेरिका की नौकरी पर लात मारने का अफसोस है तो आज भी तुम जा सकते हो. मैं ने तुम्हें न तब रोका था न अब रोक रहा हूं, समझे? पर अपने इस त्याग के एहसान को भुनाने की फिराक में हो तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो.’’

इतना कह कर सोमेश्वर अपनी धोती संभालते हुए तेज कदमों से अपने कमरे में चले गए. मांजी भी चुपचाप आदर्श भारतीय पत्नी की तरह मुंह पर ताला लगाए बाबूजी के पीछेपीछे कमरे में चली गईं.

थकेहारे केदार व केतकी अपने कमरे में बिस्तर पर निढाल पड़ गए.

‘‘अब क्या होगा?’’ केतकी ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘होगा क्या, जो तय है वही होगा. सुबह हमें अपने बच्चे को लेने जाना है, और मैं नहीं चाहता कि इस तरह दुखी और उदास मन से हम उसे लेने जाएं,’’ अपने निश्चय पर अटल केदार ने कहा.

‘‘पर मांबाबूजी की इच्छा के खिलाफ हम बच्चे को घर लाएंगे तो क्या उन की उपेक्षा बच्चे को प्रभावित नहीं करेगी? कल को जब वह बड़ा व समझदार होगा तब क्या घर का माहौल सामान्य रह पाएगा?’’

अपने मन में उठ रही इन आशंकाओं को केतकी ने केदार के सामने रखा तो वह बोला, ‘‘सुनो, हमें जो कल करना है फिलहाल तुम केवल उस के बारे में ही सोचो.’’

सुबह केतकी की आंख जल्दी खुल गई और चाय बनाने के बाद ट्रे में रख कर मांबाबूजी को देने के लिए बाहर लौन में गई, मगर दोनों ही वहां रोज की तरह बैठे नहीं मिले. खाली कुरसियां देख केतकी ने सोचा शायद कल रात की बहसबाजी के बाद मां और बाबूजी आज सैर पर न गए हों लेकिन उन का कमरा भी खाली था. हो सकता है आज लंबी सैर पर निकल गए हों तभी देर हो गई. मन में यह सोचते हुए केतकी नहाने चली गई.

घंटे भर में दोनों तैयार हो गए पर अब तक मांबाबूजी का पता नहीं था. केदार और केतकी दोनों चिंतित थे कि आखिर वे बिना बताए गए तो कहां गए?

सहसा केतकी को मांजी की बात याद आई. पिछले ही महीने महल्ले में एक बच्चे के जन्मदिन के समय अपनी हमउम्र महिलाओं के बीच मांजी ने हंसी में ही सही पर कहा जरूर था कि जिस दिन हमारा इस सांसारिक जीवन से जी उचट जाएगा तो उसी दिन हम दोनों ही किसी छोटे शहर में चले जाएंगे और वहीं बुढ़ापा काट देंगे.

सशंकित केतकी ने केदार को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘नहीं, नहीं, केतकी, बाबूजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे मुझ पर क्रोधित हो सकते हैं पर इतने गैरजिम्मेदार कभी नहीं हो सकते कि बिना बताए कहीं चले जाएं. हो सकता है सैर पर कोई परिचित मिल गया हो तो बैठ गए होंगे कहीं. थोड़ी देर में आ जाएंगे. चलो, हम चलते हैं.’’

दोनों कार में बैठ कर नन्हे मेहमान को लेने चल दिए. रास्ते भर केतकी का मन बच्चा और मांबाबूजी के बीच में उलझा रहा. लेकिन केदार के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. उमंग और उत्साह से भरपूर केदार के होंठों पर सीटी की गुनगुनाहट ही बता रही थी कि उसे अपने निर्णय पर जरा भी दुविधा नहीं है.

केतकी का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह बोला, ‘‘यार, क्या मुंह लटकाए बैठी हो? चलो, मुसकराओ, तुम हंसोगी तभी तो तुम्हें देख कर हमारा नन्हा मेहमान भी हंसना सीखेगा.’’

नन्ही जान को आंचल में छिपाए केतकी व केदार दोनों ही कार से उतरे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था पर बाहर ताला न देख वे समझ गए कि मां और बाबूजी घर के अंदर हैं. केदार ने ही दरवाजे की घंटी बजाई तो इसी के साथ केतकी की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. नन्ही जान को सीने से चिपटाए वह केदार को ढाल बना कर उस के पीछे हो गई.

दरवाजा खुला तो सामने मांजी और बाबूजी खडे़ थे. पूरा घर रंगबिरंगी पताकों, गुब्बारों तथा फूलों से सजा हुआ था. यह सबकुछ देख कर केदार और केतकी दोनों विस्मित रह गए.

‘‘आओ बहू, अंदर आओ, रुक क्यों गईं?’’ कहते हुए मांजी ने बडे़ प्रेम से नन्हे मेहमान को तिलक लगाया. बाबूजी ने आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में लिया.

‘‘अब तो दादादादी का बुढ़ापा इस नन्हे सांवलेसलौने बालकृष्ण की बाल लीलाओं को देखदेख कर सुकून से कटेगा, क्यों सौदामिनी?’’ कहते हुए बाबूजी ने बच्चे के माथे पर वात्सल्य चिह्न अंकित कर दिया.

बाबूजी के मुख से ‘बालकृष्ण’ शब्द सुनते ही केदार और केतकी ने एक दूसरे को प्रश्न भरी नजरों से देखा और अगले ही पल केतकी ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन बाबूजी, यह बेटा नहीं बेटी है.’’

‘‘तो क्या हुआ? कृष्ण न सही कृष्णिमा ही सही. बच्चे तो प्रसाद की तरह हैं फिर प्रसाद चाहे लड्डू के रूप में मिले चाहे पेडे़ के, होगा तो मीठा ही न,’’ और इसी के साथ एक जोरदार ठहाका सोमेश्वर ने लगाया.

केदार अब भी आश्चर्यचकित सा बाबूजी के इस बदलाव के बारे में सोच रहा था कि तभी वह बोले, ‘‘क्यों बेटा, क्या सोच रहे हो? यही न कि कल राह का रोड़ा बने बाबूजी आज अचानक गाड़ी का पेट्रोल कैसे बन गए?’’

‘‘हां बाबूजी, सोच तो मैं यही रहा हूं,’’ केदार ने हंसते हुए कहा.

‘‘बेटा, सच कहूं तो आज मैं ने बहुत बड़ी जीत हासिल की है. मुझे तुझ पर गर्व है. यदि आज तुम अपने निश्चय से हिल जाते तो मैं टूट जाता. मैं तुम्हारे फैसले की दृढ़ता को परखना चाहता था और ठोकपीट कर उस की अटलता को निश्चित करना चाहता था क्योंकि ऐसे फैसले लेने वालों को सामाजिक जीवन में कई अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ती हैं.’’

‘‘समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं न. यदि 4 लोग तुम्हारे कार्य को सराहेंगे तो 8 टांग खींचने वाले भी मिलेंगे. तुम्हारे फैसले की तनिक भी कमजोरी भविष्य में तुम्हें पछतावे के दलदल में पटक सकती थी और तुम्हारे कदमों का डगमगाना केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि आने वाली नन्ही जान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता था. बस, केवल इसीलिए मैं तुम्हें जांच रहा था.’’

‘‘देखा केतकी, मैं ने कहा था न तुम से कि बाबूजी ऐसे तो नहीं हैं. मेरा विश्वास गलत नहीं था,’’ केदार ने कहा.

‘‘बेटा, तुम लोगों की खुशी में ही तो हमारी खुशी है. वह तो मैं तुम्हारे बाबूजी के कहने पर चुप्पी साधे बैठी रही, इन्हें परीक्षा जो लेनी थी तुम्हारी. मैं समझ सकती हूं कि कल रात तुम लोगों ने किस तरह काटी होगी,’’ इतना कह कर सौदामिनी ने पास बैठी केतकी को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘वह तो ठीक है मांजी, पर यह तो बताइए कि सुबह आप लोग कहां चले गए थे. मैं तो डर रही थी कि कहीं आप हरिद्वार….’’

‘‘अरे, पगली, हम दोनों तो कृष्णिमा के स्वागत की तैयारी करने गए थे,’’ केतकी की बातों को बीच में काटते हुए सौदामिनी बोली, ‘‘और अब तो हमारे चारों धाम यहीं हैं कृष्णिमा के आसपास.’’

सचमुच कृष्णिमा की किलकारियों में चारों धाम सिमट आए थे, जिस की धुन में पूरा परिवार मगन हो गया था. Family Story

Social Story : बदला वेश बदला मन

Social Story : सेठ पूरनचंद बहुत ही कंजूस था. अपार धनदौलत होते हुए भी उस का दिल बहुत छोटा था. कभी किसी जरूरतमंद की उस ने सहायता नहीं की थी. वह सदा इसी तिकड़मबाजी में रहता कि किसी तरह उस की दौलत बढ़ती रहे. उस की इस कंजूसी की आदत के कारण उस के परिवार वाले भी उस से खिंचेखिंचे रहते थे. पर सेठ को किसी की परवा नहीं थी.

एक दिन सेठ पूरनचंद शाम को सदा की तरह टहलने निकला. चलतेचलते वह शहर से दूर निकल गया.

रास्ते में एक जगह उस ने देखा, एक चित्रकार बड़े मनोयोग से अपने सामने के दृश्य का चित्र बना रहा है. सेठ भी कुतूहलवश उस के पास चला गया. चित्रकार बड़े सधे हाथों से वह चित्र बना रहा था. सेठ प्रशंसा भरे स्वर में बोला, ‘‘वाह, बड़ा सजीव चित्र बनाया है तुम ने. क्या इनसान की तसवीरें भी बना लेते हो तुम?’’

‘‘जी हां,’’ चित्रकार मुसकराया, ‘‘क्या आप को अपनी तसवीर बनवानी है?’’

‘‘हां, बनवाना तो चाहता हूं पर तुम पैसे बहुत लोगे?’’

‘‘पर आप की जिंदगी की यादगार तसवीर भी तो बन जाएगी. अपनी तसवीर बनवाने के लिए आप को मुझे 3-4 घंटे का समय देना होगा. कल सुबह 8 बजे आप मेरी चित्रशाला में आ जाइए,’’ कहते हुए चित्रकार ने अपनी चित्रशाला का पता सेठ पूरनचंद को दे दिया.

अगले दिन सेठ पूरनचंद सजधज कर चित्रकार की चित्रशाला में पहुंचा. उस के गले में मोतीमाणिक के हार थे, हाथ में सोने की मूठ वाली छड़ी थी, पगड़ी में कलफ लगा हुआ था. चित्रकार ने सजेधजे सेठ को देखा तो बोला, ‘‘सेठजी, आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं?’’

‘‘हांहां, कहो,’’ सेठ बड़ी शालीनता से बोला.

‘‘जैसे आप हैं, वैसी तसवीर बनाने का तो फायदा नहीं. इस में कोई अनोखी बात भी नहीं होगी. तसवीर तो ऐसी बनवानी चाहिए जैसे आप दरअसल हैं ही नहीं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ सेठ उलझन में पड़ गया.

‘‘मतलब यह कि आप वह सामने दीवार पर टंगी तसवीर देख रहे हैं?’’

‘‘हां, ‘‘सेठ बोला, ‘‘किसी बड़े रईस की तसवीर मालूम पड़ती है. कोट पर सोने के बटन लगे हैं, सभी उंगलियों में हीरे या सोने की अंगूठियां हैं, कलाई पर कीमती घड़ी बंधी है.’’

‘‘यह असल में किसी रईस की नहीं, एक बेहद गरीब रिकशा चालक की तसवीर है,’’ चित्रकार मुसकराया, ‘‘और क्योंकि आप रईस हैं, इसलिए आप को गरीब भिखारी के वेश में तसवीर बनवानी चाहिए. जो भी उसे देखेगा, एक बार तो हक्काबक्का रह ही जाएगा.’’

’‘हां, कहते तो तुम ठीक हो,’’ सेठ को चित्रकार की बात पसंद आ गई, ‘‘तुम भिखारी के वेश में ही मेरी तसवीर बनाओ.’’

चित्रकार ने सेठ के कीमती वस्त्र व आभूषण उतरवा कर उसे एक चिथड़ा सा लपेटने को दे दिया. बाल बिखेर कर उन में धूल और घास फंसा दिए तथा शरीर को मैलाकुचैला प्रदर्शित करने के लिए मिट्टी लगा दी. फिर उस ने सेठ को एक लाठी पकड़ा कर कोने में खड़ा कर दिया और बोला, ‘‘सेठजी, मैं अब आप का चित्र बनाना आरंभ कर रहा हूं. बिना हिलेडुले खड़े रहिए. लगभग 3 घंटे लगेंगे आप का चित्र पूरा होने में.’’ सेठ ने सामने लगे शीशे में अपना प्रतिबिंब देखा तो मुसकरा कर बोला, ‘‘तुम ने तो कमाल का मेकअप कर दिया है. सचमुच मैं भिखारी ही लग रहा हूं. कौन कहेगा कि मैं शहर का सब से धनाढ्य सेठ पूरनचंद हूं?’’

चित्रकार ने चित्र बनाना प्रारंभ कर दिया था. इस दौरान चित्रकार का नौकर रघु भी आ गया और कमरे की सफाई करने लगा. बीचबीच में वह बुत की तरह खड़े सेठ पर भी नजर डाल लेता. कमरे में झाड़ू लगा कर वह रसोईघर में चला गया और बरतन मांज कर खाना बनाने लगा. काम करतेकरते उसे 3-4 घंटे हो गए थे. इस दौरान चित्रकार का काम पूरा हो गया. वह सेठ से बोला, ‘‘अभी रंग गीला है. चित्र में कुछ काम अभी बाकी है. आप कल आ कर अपनी तसवीर ले जाइएगा.’’ इस के बाद चित्रकार ने आवाज लगाई, ‘‘रघु, आ कर अपना वेतन ले जाओ.’’

रघु आया तो चित्रकार ने उसे 2 हजार रुपए दे दिए. इतने में चित्रकार से कोई मिलने आया तो वह बाहर चला गया. रघु अब भिखारी के वेश में खड़े सेठ के पास गया और बोला, ‘‘3 घंटे तक खड़ेखड़े तो तुम्हारी कमर अकड़ गई होगी भैया?’’ ‘‘हां,’’ सेठ ने अंगड़ाई ले कर बदन झटकाया और बोला, ‘‘हां भाई, मेरी तो सारी नसें अकड़ गई हैं.’’

‘‘मजबूरी जो न कराए सो थोड़ा. तुम तो बड़े ही गरीब और जरूरतमंद लगते हो. चित्रकार बाबू भला तुम्हारा चित्र बनाने के बदले तुम्हें 100-200 रुपए से ज्यादा क्या देंगे?’’

रघु की बात पर सेठ को मन ही मन हंसी आने लगी. वह समझ गया कि रघु उसे सचमुच भिखारी समझ रहा है. चित्रकार लोग अकसर चित्र बनाने के लिए भाड़े पर ऐसे गरीब जरूरतमंदों को ला कर उन के चित्र बनाते हैं और बदले में उन्हें थोड़ेबहुत रुपए दे देते हैं. तभी रघु ने जेब में हाथ डाला और 500 रुपए का नोट निकाल कर सेठ के हाथ पर रख दिया.

‘‘यह क्या है?’’ सेठ चौंक पड़ा.

‘‘ले लो भैया, तुम बड़े गरीब और जरूरतमंद लगते हो. गरीब तो मैं भी हूं, इसलिए इस से ज्यादा मदद करने की हालत में नहीं हूं. तुम इस नोट को रख लो.’’ फिर रघु वहां से चला गया. सेठ विस्मय से भरा वहीं खड़ा रह गया. वह सोच रहा था कि दुनिया में क्या ऐसे लोग भी होते हैं? यह चित्रकार का नौकर है. मात्र 2 हजार रुपए मिले हैं इसे वेतन के, लेकिन फिर भी इस ने बेझिझक मुझे 500 रुपए दे दिए. रघु गरीब बेशक है, पर दिल का अमीर है.

इस तरह की घटना सेठ पूरनचंद के साथ पहली बार घटी थी. इस का उस के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह अपने बारे में सोच कर स्वयं की रघु से तुलना करने लगा. उस के पास तो करोड़ों की दौलत है पर उस ने कभी किसी गरीब को 2 रुपए भी नहीं दिए. कभी किसी के दुख को नहीं समझा. सेठ का मन पश्चात्ताप से भर उठा. वह सोच रहा था कि अब तक का जीवन तो बीत गया पर अब बाकी का जीवन वह रघु द्वारा दिखाई राह पर चलते हुए बिताएगा. रघु को भी वह अपने कारखाने में अच्छे वेतन पर नौकरी देगा. Social Story

Romantic Story In Hindi : संदेशवाहक – शादी के बाद शिखा की जिंदगी में कैसे आया बदलाव?

Romantic Story In Hindi : नीरज से शिखा की शादी के समय महक अमेरिका गई हुई थी. जब वह लौटी, तब तक उन की शादी को 3 महीने बीत गए थे. अपनी सब से पक्की सहेली के आने की खुशी में शिखा ने अपने घर में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया. शिखा ने पार्टी में नीरज के 3 खास दोस्तों और अपनी 3 पक्की सहेलियों को भी बुलाया.

जब करीब 9 बजे महक ने उन के ड्राइंगरूम में कदम रखा, तब तक सारे मेहमान आ चुके थे. शिखा और उस की सहेलियों के अलावा बाकी सब उस से पहली बार मिल रहे थे. उस पर पहली नजर डालते ही वे सब उस की सुंदरता देख कर मुग्ध हो उठे. ‘‘अति सुंदर’’, ये शब्द शिखा के पति नीरज के मुंह से निकले.

रवि, मोहित और विपिन की भी आंखें चमक उठीं और मुंह खुले के खुले रह गए. ‘‘शिखा, शादी कर के तो तू फिल्मी हीरोइन सी सुंदर हो गई है,’’ महक ने पहले शिखा को गले लगाया औैर फिर गोद में उठा कर 2 चक्कर भी लगा दिए.

फिर जब वह नीरज से भी गले लग कर मिली, तो शिखा ने उस के तीनों दोस्तों की आंखों में हैरानी के भावों को पैदा होते देखा. ‘‘जीजू, मसल्स तो बड़ी जबरदस्त बना रखी हैं,’’ महक ने बेहिचक नीरज के बाएं बाजू को दबाते हुए उस की तारीफ की, ‘‘लगता है तुम्हें भी मेरी तरह जिम जाने का शौक है. यू आर वैरी हैंडसम.’’

नीरज तो उसी पल से महक का फैन बन गया. उसे अपने सुंदर रंगरूप और मजबूत कदकाठी पर बहुत गुमान था. फिर महक रितु, गुंजन औैर नीमा से गले लग कर मिली. मोहित, रवि और विपिन से उस ने दोस्ताना अंदाज में हाथ मिलाया.

महक के पहुंचते ही पार्टी में जान पड़ गई थी. नीरज और उस के दोस्त उस की अदाओं के दीवाने हो गए थे. महक उन से यों खुल कर हंसबोल रही थी मानो उन्हें वर्षों से जानती हो. ‘‘बिना डांस के पार्टी में मजा नहीं आता,’’ उस के मुंह से इन शब्दों के निकलने की देर थी कि उन चारों ने फटाफट सोफा औैर मेज एक तरफ खिसका कर ड्राइंगरूम के बीच में डांस करने की जगह बना दी.

डांस कर रही महक का उत्साह देखते ही बनता था. उस ने नीरज और उस के तीनों दोस्तों के साथ जम कर डांस किया. ‘‘अरे, हम चारों भी इस पार्टी में शामिल हैं. हमारे साथ भी कोईर् खुशीखुशी डांस कर ले, यार,’’ गुंजन के इस मजाक पर सब ठहाका मार कर हंसे जरूर, पर उन चारों के आकर्षण का केंद्र तब भी महक ही बनी रही.

महक को किसी भी पुरुष का दिल जीतने की कला आती थी. उस की बड़ीबड़ी चंचल आंखों की चमक और दिलकश मुसकान में खो कर नीरज औैर उस के दोस्तों को समय बीतने का एहसास ही नहीं हो रहा था. ‘‘आज जीजू के पास हमारे लिए वक्त नहीं है. वैसे जब मिलते थे तो भंवरे की तरह हमारे इर्दगिर्द ही मंडराते रहते थे,’’ रितु की इस बात पर चारों सहेलियां खूब हंसीं.

‘‘आज मौका है, तो नीरज के बाकी दोस्तों से गपशप क्यों नहीं कर रही हो? ये अच्छे और काबिल लड़के फंसाने लायक हैं, सहेलियो,’’ शिखा ने उन्हें मजाकिया अंदाज में छेड़ा. ‘‘आज इन सब के पास महक के अलावा किसी और की तरफ देखने की फुरसत नहीं है,’’ अपनी बात कह कर नीमा ने ऐसा मुंह बनाया कि हंसतेहंसते उन सब के पेट में बल पड़ गए.

‘‘यह है वैसे हैरान करने वाली बात,’’ गुंजन ने सीरियस दिखने का नाटक किया, ‘‘महक से इन्हें कुछ नहीं मिलने वाला है, क्योंकि वह आज के बाद इन्हें भूल जाएगी और…’’ ‘‘किसी अगली पार्टी में होने वाली मुलाकात तक यह इन से कोई वास्ता नहीं रखेगी,’’ नीमा बोली.

‘‘हां, किसी अगली पार्टी में होने वाली मुलाकात में महक इन से फिर जम कर फ्लर्ट करेगी और पार्टी खत्म होते ही फिर इन्हें भुला देगी. लेकिन इन में से कोई भी इस के ऐसे व्यवहार से सबक नहीं सीखेगा. अगली मुलाकात होने पर ये फिर महक के इर्दगिर्द दुम हिलाते घूमने लगेंगे. है न यह हैरानी वाली बात?’’

‘‘और इधर हम इंतजार में खड़ी हैं,’’ नीमा ने नाटकीय अंदाज में गहरी सांस छोड़ी, ‘‘इन्हें अपना घर बसाना हो, तो हमारे पास आना चाहिए. इन के बच्चों की मम्मी बनने को हम तैयार हैं, पर इन बेवकूफों की दिलचस्पी हमेशा फ्लर्ट करने वाली महक जैसी औरतों में ही क्यों रहती है?’’

नीमा के अभिनय ने उस की सहेलियों को एक बार फिर जोर से हंसने पर मजबूर कर दिया. ‘‘शिखा, नीमा के इस सवाल का जवाब तू दे न. जीजू भी महक की तरह फ्लर्ट करने में ऐक्सपर्ट हैं. क्या तुझे उन की इस आदत पर कभी गुस्सा नहीं आता?’’ गुंजन ने मुसकराते हुए नीरज की शिकायत की.

‘‘मुझे तुम सब पर विश्वास है, इसीलिए मैं उन के तुम लोगों के साथ फ्लर्ट करने को अनदेखा करती हूं,’’ शिखा ने लापरवाही से कंधे उचकाते हुए जवाब दिया. ‘‘चल, हमारी बात तो अलग हो गई, लेकिन कल को जीजू किसी और फुलझड़ी के चक्कर में फंस गए, तब क्या करोगी?’’

‘‘मैं और नीरज उस फुलझड़ी का हुलिया बिगाड़ देंगे,’’ शिखा ने अपनी उंगलियां मोड़ कर पंजा बनाया और रितु का मुंह नोचने का अभिनय किया, तो उस बेचारी के मुंह से चीख ही निकल पड़़ी. ‘‘अब मैं चली खाना लगाने की तैयारी करने. तुम सब अपने जीजू और उन के दोस्तों को महक के रूपजाल से आजाद कराने की कोशिश करो,’’ शिखा हंसती हुई रसोईर्घर की तरफ बढ़ गई.

पार्र्टी का सारा खाना बाजार से आया था. सिर्फ बादामकिशमिश वाली खीर शिखा ने घर में बनाई थी. नीरज और उस के दोस्त महक का बहुत ज्यादा ध्यान रखे हुए थे. उस की प्लेट में कोईर् चीज खत्म होने से पहले ही इन के द्वारा पहुंचा दी जाती थी.

‘‘मुझे खीर नहीं आइसक्रीम खानी है,’’ खाना खत्म होने के बाद जब महक ने किसी बच्चे की तरह से मचलते हुए यह फरमाइश की, तो नीरज फौरन आइसक्रीम लाने को तैयार हो गया. ‘‘मुझे शाहजी की स्पैशल चौकोचिप्स खाने हैं,’’ महक ने उसे अपनी पसंद भी बता दी.‘‘यह शाहजी की दुकान कहां है?’’ नीरज बाहर जातेजाते ठिठक कर रुक गया.

‘‘मेरे फ्लैट के पास. किसी से भी पूछोगे, तो वह तुम्हें बता देगा.’’‘‘साली साहिबा, बहुत दूर जाना पड़ेगा पर तुम्हारी खातिर जरूर जाऊंगा. वैसे तुम गाइड बन कर मेरे साथ क्यों नहीं चलती हो?’’ ‘‘कैसे जाओगे?’’‘‘मोटरसाइकिल से.’’‘‘फास्ट ड्राइव करोगे?’’‘‘हवा से बातें करते चलूंगा.’’‘‘तो मैं चली जीजू के साथ बाइक राइड का आनंद लेने, दोस्तो,’’ महक खुशी से उछल कर खड़ी हुई और उन सब की तरफ हाथ हिलाने के बाद नीरज के साथ बाहर निकल गई.रास्ते में नीरज ने ऊंची आवाज में महक से कहा, ‘‘मेरा मन कौफी पीने को कर रहा है.’’

‘‘यहां कहीं अच्छी कौफी नहीं मिलती है,’’ महक उस के कान के पास मुंह ला कर चिल्लाई.‘‘तुम्हारे घर चलें?’’‘‘कौफी के चक्कर में ज्यादा देर हो जाएगी.’’‘‘तो हो जाने दो. कह देंगे कि पैट्रोल भरवाने चले गए थे और देर हो गई.’’महक ने कोई जवाब नहीं दिया, तो नीरज ने उस पर दबाव बनाया, ‘‘महक, मैं भी तो तुम्हारी आइसक्रीम खाने की फरमाइश को पूरा करने के लिए फौरन उठा खड़ा हुआ था. अब तुम भी 1 कप बढि़या कौफी पिला ही दो.’’

‘‘ठीक है,’’ महक का यह जवाब सुन कर नीरज के दिल की धड़कनें बढ़ती चली गईं.अपने फ्लैट में घुसते ही महक ने पहले किचन में जा कर कौफी के लिए पानी गरम होने को रखा और फिर बाथरूम में चली गई. उस के वहां से बाहर आने तक नीरज ने अपने मन की इच्छा पूरी करने की हिम्मत जुटा ली थी.

महक वापस रसोई घर में जाने लगी, तो नीरज उस का रास्ता रोक कर रोमांटिक लहजे में बोला, ‘‘तुम जैसी सुंदर और स्मार्ट लड़की के पीछे तो उस के चाहने वालों की लंबी लाइन होनी चाहिए. फिर मैं शिखा की इस बात को सच कैसे मान लूं कि तुम्हारा कोई प्रेमी नहीं है?’’‘‘जीजू, मेरे प्रेमी आतेजाते रहते हैं. मुझे शादी कभी नहीं करनी है, इसलिए स्थायी प्रेमी रखने का झंझट मैं नहीं पालती,’’ महक ने बेझिझक उस के सवाल का जवाब दे दिया.

‘‘क्या कभी इस बात से चिंतित नहीं होती हो कि जीवनसाथी के बिना भविष्य में खुद को कभी बहुत अकेली पाओगी?’’‘‘क्या अकेलेपन का एहसास जीवनसाथी पा लेने से खत्म हो जाता है, जीजू?’’‘‘शायद नहीं, पर जीवन में प्रेम के महत्त्व को तो तुम नकार नहीं सकती हो.’’

‘‘मेरा काम अस्थायी प्रेमियों से अच्छी तरह चल रहा है,’’ हंसती हुई महक रसोई में जाने लगी.नीरज ने अचानक उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘और पहली मुलाकात में प्रेम हो जाने के बारे में क्या कहती हो?’’‘‘यह खतरनाक बीमारी किसे लग गई है?’’ महक अजीब से अंदाज में मुसकराने लगी.

‘‘मुझे.’’‘‘तब इस सवाल का जवाब तुम्हें शिखा देगी, जीजू.’’‘‘उसे बीच में क्यों ला रही हो?’’‘‘क्योंकि वह मेरी बैस्ट फ्रैंड है, सर,’’ महक ने उस की आंखों में देखते हुए कुछ भावुक हो कर जवाब दिया.‘‘मैं भी तुम्हारा बैस्ट फ्रैंड बनना चाहता हूं,’’ नीरज ने अचानक उसे खींच कर अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया.‘‘क्या मुझे पाने के लिए तुम शिखा को धोखा देने को तैयार हो?’’‘‘उसे हम कुछ पता ही नहीं लगने देंगे, स्वीटहार्ट.’’

‘‘पत्नियों को देरसवेर सब मालूम पड़ जाता है, जीजू.’’‘‘हम ऐसा नहीं होने देंगे.’’‘‘देखो, शिखा को पता लग ही गया न कि तुम उस की सहेली रितु के साथ 2 बार डिनर पर जा चुके हो और 1 फिल्म भी तुम दोनों ने साथसाथ देखी है. इस जानकारी को तो तुम शिखा तक पहुंचने से नहीं रोक पाए.’’

उस की बात सुन कर नीरज फौरन परेशान नजर आने लगा और उस ने महक को अपनी बांहों की कैद से आजाद कर दिया. उसे बिलकुल अंदाजा नहीं था कि शिखा को उस के और रितु के बीच चल रहे अफेयर की जानकारी थी.‘‘न… न… सच को झुठलाने कीकोशिश मत करो, जीजू. जब तक मैं कौफी बना कर लाती हूं, तब तक ड्राइंगरूम में बैठ कर तुम इस नईजानकारी की रोशनी में पूरी स्थिति पर सोचविचार करो. अगर बाद में भी तुम्हारे मन में मेरा प्रेमी बनने की चाहत रही, तो हम इस बारे में चर्चा जरूर करेंगे,’’ महक ने मुसकराते हुए उसे ड्राइंगरूम की ओर धकेल दिया.

कुछ देर बाद महक ने थर्मस और ट्रे में रखे कपों के साथ ड्राइंगरूम में प्रवेश किया, तो सोचविचार में डूबा नीरज चौंक कर सीधा बैठ गया.‘‘इतने सारे कप क्यों लाई हो?’’ उस के चेहरे का रंग उड़ गया.‘‘कौफी सब पिएंगे न, जीजू,’’ महक शरारती अंदाज में मुसकरा पड़ी.‘‘सब कौन?’’

‘‘तुम्हारे दोस्त, शिखा और हम सहेलियां.’’‘‘वे यहां आ रहे हैं?’’‘‘मुझे नीमा ने फोन किया और जब मैं ने उसे बताया कि हम कौफी पीने जा रहे हैं, तो उन सब ने भी यहां आने का कार्यक्रम बना लिया. वे बस पहुंचने ही वाले होंगे.’’‘‘तुम ने मुझे फौरन क्यों नहीं बताई यह बात?’’ नीरज को गुस्सा आ गया.

‘‘उन सब का सामना करने से डर लग रहा है, जीजू? देखो, मैं तो बिलकुल सहज हूं,’’ महक की सहज मुसकान मानो नीरज का मजाक उड़ा रही थी.

‘‘तुम कुछ पागल हो क्या? तुम ने यह क्यों बताया कि हम यहां हैं? हम फौरन यहां से निकल कर आइसक्रीम लेते हुए घर लौट जाते. तुम ने बेकार के झंझट में फंसा दिया,’’ नीरज बहुत परेशान और चिंतित नजर आ रहा था.

‘‘मैं तुम्हारे डर को समझ सकती हूं, लेकिन मैं शिखा को समझा दूंगी कि…’’‘‘तुम्हारे समझाने से वह कुछ नहीं समझेगी, औरतों से हंसनेबोलने की मेरी आदत के कारण वह तो वैसे ही मुझ पर शक करती है. तुम्हें बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए था, महक.’’

‘‘इतना ज्यादा परेशान क्यों हो रहे हो, जीजू? हम जैसे फ्लर्ट करने के शौकीनों को ऐसी परिस्थितियों से नहीं डरना चाहिए. जाल फेंकते रहने से कभी न कभी तो शिकार फंसेगा ही. वह शिकार रितु हो, मैं होऊं या कोईर् और इस से क्या फर्क पड़ता है? शिखा तुम्हें छोड़ कर तो जाने से रही. जस्ट रिलैक्स, जीजू.’’

‘‘शटअप, मैं यहां से जा रहा हूं और मुझ से तुम भविष्य में कोई वास्ता मत रखना.’’नीरज उठा और हैलमेट उठा कर दरवाजे की तरफ चल पड़ा.‘‘जीजू, प्लीज रुको. मेरे हाथ की बनाई कौफी तो पीते जाओ.’’‘‘भाड़ में जाए कौफी.’’‘‘जीजू, मैं दोनों कप नहीं पी सकूंगी.’’

‘‘दोनों कप?’’ नीरज ठिठक कर पलटा तो उस ने महक को थर्मस उलटा कर के हिलाते देखा. सिर्फ 2 कपों में कौफी नजर आ रही थी. बाकी सब खाली रखे हुए थे.

‘‘तुम ने सिर्फ 2 कप कौफी बनाई है?’’ वह अचंभित नजर आ रहा था.‘‘हां जीजू, इस लाडली साली ने अपने जीजू से जो छोटा सा मजाक किया है, उस का बुरा मत मानना,’’ महक शरारती अंदाज में मुसकरा रही थी.‘‘यह छोटा मजाक था? मैं तुम्हारा गला घोंट दूंगा,’’ नीरज ने नाटकीय अंदाज में दांत पीसे.‘‘वैसा करने से पहले एक वादा तो कर लो, जीजू.’’‘‘कैसा वादा?’’

‘‘यही कि शिखा का सामना करने की बात सोच कर कुछ देर पहले तुम्हें जिस डर, चिंता और शर्मिंदगी के एहसास ने जकड़ा था, उसे तुम आजीवन याद रखोगे.’’‘‘बिलकुल याद रखूंगा, साली साहिबा. तुम ने तो आज मेरी जान ही निकाल दी थी,’’ निढाल सा नीरज सोफे पर बैठ गया.

‘‘मेरी जिंदगी में तो कोई जीवनसाथी आएगा ही नहीं, पर जीवनसाथी के होते हुए भी उस के दिल से दूर होने की पीड़ा तुम कभी नहीं भोगना चाहते हो, तो आज की रात का सबक न भूलना.’’‘‘शिखा की तरफ से एक संदेश मैं तुम्हें दे रही हूं. उसे पहले से अंदाजा था कि तुम मुझे अपने चक्कर में फंसाने की कोशिश जरूर करोगे. उस ने कहलवाया है कि वह तुम्हारी फ्लर्ट करने की आदत को तो बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अगर तुम ने किसी दूसरी औरत से सचमुच संबंध बनाने की मूर्खता भविष्य में कभी की, तो तुम उसे हमेशा के लिए खो दोगे.’’

कुछ देर खामोश रहने के बाद नीरज ने संजीदा स्वर में पूछा, ‘‘क्या हमारे यहां आने की बात तुम शिखा को बताओगी?’’‘‘तुम ही बताओ कि उसे बताऊं या नहीं?’’‘‘बता ही देना, नहीं तो मेरा संदेश उस तक कैसे पहुंचेगा.’’‘‘तुम भी मुझे अपना संदेशवाहक बना रहे हो? वाह,’’ महक हंस पड़ी.

‘‘शिखा से कह देना कि मैं उस के विश्वास को कभी नहीं तोड़ूंगा.’’‘‘वैरी गुड, जीजू,’’ महक खुश हो गई, ‘‘तुम्हारे इस फैसले का स्वागत हम कौफी पी कर करते हैं,’’ महक ने नीरज के हाथ में कौफी का कप पकड़ा दिया.‘‘चीयर्स फौर युअर हैप्पी होम,’’ महक की इस शुभकामना ने नीरज के चेहरे को फूल सा खिला दिया था. Romantic Story In Hindi

Social Story In Hindi : मुलाकात का एक घंटा

Social Story In Hindi : एक ही साथ वे दोनों मेरे कमरे में दाखिल हुए. अस्पताल के अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा हुआ मैं उस घड़ी को मन ही मन कोस रहा था, जब मेरी मोटर बाइक के सामने अचानक गाय के आ जाने से यह दुर्घटना घटी. अचानक ब्रेक लगाने की कोशिश करते हुए मेरी बाइक फिसल गई और बाएं पैर की हड्डी टूटने के कारण मुझे यहां अस्पताल में भरती होना पड़ा.

‘‘कहिए, अब कैसे हैं?’’ उन में से एक ने मुझ से रुटीन प्रश्न किया.

‘‘अस्पताल में बिस्तर पर लेटा व्यक्ति भला कैसा हो सकता है? समय काटना है तो यहां पड़ा हूं. मैं तो बस यहां से निकलने की प्रतीक्षा कर रहा हूं,’’ मैं ने दर्दभरी हंसी से उन का स्वागत करते हुए कहा.

‘‘आप को भी थोड़ी सावधानी रखनी चाहिए थी. अब देखिए, हो गई न परेशानी. नगरनिगम तो अपनी जिम्मेदारी निभाता नहीं है, आवारा जानवरों को यों ही सड़कों पर दुर्घटना करने के लिए खुला छोड़ देता है. लेकिन हम तो थोड़ी सी सावधानी रख कर खुद को इन मुसीबतों से बचा सकते हैं,’’ दूसरे ने अपनी जिम्मेदारी निभाई.

‘‘अब किसे दोष दें? फिर अनहोनी को भला टाल भी कौन सकता है,’’ पहले ने तुरंत जड़ दिया.

लेकिन मेरी बात सुनने की उन दोनों में से किसी के पास भी फुर्सत नहीं थी. अब तक शायद वे अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुके थे और अब शायद उन के पास मेरे लिए वक्त नहीं था. वे आपस में बतियाने लगे थे.

‘‘और सुनाइए गुप्ताजी, बहुत दिनों में आप से मुलाकात हो रही है. यार, कहां गायब रहते हो? बिजनेस में से थोड़ा समय हम लोगों के लिए भी निकाल लिया करो. पर्सनली नहीं मिल सकते तो कम से कम फोन से तो बात कर ही सकते हो,’’ पहले ने दूसरे से कहा.

‘‘वर्माजी, फोन तो आप भी कर सकते हैं पर जहां तक मुझे याद है, पिछली बार शायद मैं ने ही आप को फोन किया था,’’ पहले की इस बात पर दूसरा भला क्यों चुप रहता.

‘‘हांहां, याद आया, आप को शायद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में कुछ काम था. कह तो दिया था मैं ने सिंह को देख लेने के लिए. फिर क्या आप का काम हो गया था?’’ पहले ने अपनी याददाश्त पर जोर देते हुए कहा.

‘‘हां, वह काम तो खैर हो गया था. उस के बाद यही बात बताने के लिए मैं ने आप को फोन भी किया था, पर आप शायद उस वक्त बाथरूम में थे,’’ गुप्ता ने सफाई दी.

‘‘लैंडलाइन पर किया होगा. बाद में वाइफ शायद बताना भूल गई होंगी. वही तो मैं सोच रहा था कि उस के बाद से आप का कोई फोन ही नहीं आया. पता नहीं आप के काम का क्या हुआ? अब यदि आज यहां नहीं मिलते तो मैं आप को फोन लगाने ही वाला था,’’ पहले ने दरियादिली दिखाते हुए कहा.

‘‘और सुनाइए, घर में सब कैसे हैं? भाभीजी, बच्चे? कभी समय निकाल कर आइए न हमारे यहां. वाइफ भी कह रही थीं कि बहुत दिन हुए भाभीजी से मुलाकात नहीं हुई,’’ अब की बार दूसरे ने पहले को आमंत्रित कर के अपना कर्ज उतारा, वह शायद उस से अपनी घनिष्ठता बढ़ाने को उत्सुक था.

‘‘सब मजे में हैं. सब अपनीअपनी जिंदगी जी रहे हैं. बेटा इंजीनियरिंग के लिए इंदौर चला गया. बिटिया को अपनी पढ़ाई से ही फुर्सत नहीं है. अब बच गए हम दोनों. तो सच बताऊं गुप्ताजी, आजकल काम इतना बढ़ गया है कि समझ ही नहीं आता कि किस तरह समय निकालें. फिर भी हम लोग शीघ्र ही आप के घर आएंगे. इसी बहाने फैमिली गैदरिंग भी हो जाएगी,’’ पहले ने दूसरे के घर आने पर स्वीकृति दे कर मानो उस पर अपना एहसान जताया.

‘‘जरूर, जरूर, हम इंतजार करेंगे आप के आने का, मेरे परिवार को भी अच्छा लगेगा वरना तो अब ऐसा लगने लगा है कि लाइफ में काम के अलावा कुछ बाकी ही नहीं बचा है,’’ दूसरे ने पहले के कथन का समर्थन किया.

मैं चुपचाप उन की बातें सुन रहा था.

‘‘और सुनाइए, तिवारी मिलता है क्या? सुना है इन दिनों उस ने भी बहुत तरक्की कर  ली है,’’ पहले ने दूसरे से जानकारी लेनी चाही.

‘‘सुना तो मैं ने भी है लेकिन बहुत दिन हुए, कोई मुलाकात नहीं हुई. फोन पर अवश्य बातें होती हैं. हां, अभी पिछले दिनों स्टेशन पर जोशी मिला था. मैं अपनी यू.एस. वाली कजिन को छोड़ने के लिए वहां गया हुआ था. वह भी उसी ट्रेन से इंदौर जा रहा था. किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर बता रहा था. इन दिनों उस ने अपने वजन को कुछ ज्यादा ही बढ़ा लिया है,’’ दूसरे ने भी अपनी तरफ से बातचीत का सूत्र आगे बढ़ाया.

‘‘आजकल तो मल्टीनेशनल्स का ही जमाना है,’’ पहले ने अपनी ओर से जोड़ते हुए कहा.

‘‘पैकेज भी तो अच्छा दे रही हैं ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां,’’ दूसरे ने अपनी राय व्यक्त की.

‘‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां पैसे तो देती हैं लेकिन काम भी खूब डट कर लेती हैं. आदमी चकरघिन्नी बन कर रह जाता है. उन में काम करने वाला आदमी मशीन बन कर रह जाता है. उस की अपनी तो जैसे कोई लाइफ ही नहीं रह जाती. एकएक सेकंड कंपनी के नाम समर्पित हो जाता है. सारे समय, चाहे वह परिवार के साथ आउटिंग पर हो या किसी सोशल फंक्शन में, कंपनी और टार्गेट उस के दिमाग में घूमते रहते हैं.’’

जाने कितनी देर तक वे कितनी और कितने लोगों की बातें करते रहे. अभी वे जाने और कितनी देर बातें करते तभी अचानक मुझे उन में से एक की आवाज सुनाई दी.

‘‘अरे, साढ़े 4 हो गए.’’

‘‘इस का मतलब हमें यहां आए 1 घंटे से अधिक का समय हो रहा है,’’ यह दूसरे की आवाज थी.

‘‘अब हमें चलना चाहिए,’’ पहले ने निर्णयात्मक स्वर में कहा.

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, घर में वाइफ इंतजार कर रही होंगी,’’ दूसरे ने सहमति जताते हुए कहा.

आम सहमति होने के बाद दोनों एक साथ उठे, मुझ से विदा मांगी और दरवाजे की ओर बढ़ गए.

मैं ने भी राहत की सांस ली.

अब मेरे कमरे में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था. मुझे ऐसा लगा जैसे अब कमरे में उस पोस्टर की कतई आवश्यकता नहीं है जिस के नीचे लिखा था, ‘‘कृपया शांति बनाए रखें.’’

एक और बात, वे एक घंटे बैठे, लेकिन मुझे कतई नहीं लगा कि वे मेरा हालचाल पूछने आए हों. लेकिन दूसरों के साथ दर्द बांटने में जरूर माहिर थे. जातेजाते दर्द बढ़ाते गए. उन की फालतू की बातें सोचसोच कर मैं अब उन के हिस्से का दर्द भी झेल रहा था. Social Story In Hindi

Love Story : चलो खुसरो अपने घर – प्रीति-सिद्धार्थ की हंसीठिठोली क्यों किसी को पसंद नहीं थी?

Love Story : सिद्धार्थ और प्रीति में आज फिर तूतू मैंमैं हो गई थी. ये इस घर की दरोदीवार के लिए कोई नई बात नहीं थी. दूसरे कमरे में सिद्धार्थ के मम्मीपापा और बड़ी बहन प्रगति चुपचाप बैठे हुए, ना चाहते हुए भी इस तमाशे का हिस्सा बने हुए थे.

सिद्धार्थ की मम्मी वीनू बोलीं, ‘‘ना जाने किस घड़ी में इस महारानी से शादी हुई थी. एक दिन भी मेरा बेटा सुकून की सांस नहीं ले सकता है.‘‘

बहन प्रगति बोली, ‘‘मम्मी तब तो सिद्धार्थ की आंखों में प्रीति की खूबसूरती और प्यार की पट्टी बंधी हुई थी. सच बात तो यह है, जो लड़की अपने मम्मीपापा की ना हुई, वह क्या किसी की होगी?‘‘

तभी भड़ाक से दरवाजा खुला और प्रीति मुंह फुलाए घर से बाहर निकल गई. क्याक्या सपने संजो कर उस ने शादी की थी, पर विवाह के पहले ही साल में रोमांस उन की शादी से काफूर हो गया था, जब प्रीति की बड़ी ननद प्रगति अपने पति का घर छोड़ कर आ गई थी.

प्रीति और सिद्धार्थ की हंसीठिठोली, छेड़छाड़ ना तो प्रगति को और ना ही वीनू को भाती थी. प्रीति क्या करे, उस के तो रिश्ते की अभी शुरुआत ही थी. पर प्रगति की खराब शादी, उन के प्रेमविवाह पर भारी पड़ती जा रही थी.
देखते ही देखते सारे प्यार के वादे शिकायतों में बदल गए थे. रहीसही कसर सिद्धार्थ की नौकरी जाने के बाद हो गई थी. सिद्धार्थ तो नौकरी जाने के कारण वैसे ही हताश हो गया था. साथ ही, घर पर बैठेबैठे वह रातदिन नकारात्मक विचारों से घिरा रहता था.

प्रीति अपने दफ्तर चली जाती थी, तो प्रगति ना जाने क्याक्या जहर सिद्धार्थ के जेहन में भरती रहती थी.
सिद्धार्थ को भी ये ही लगने लगा था कि प्रीति को लगता है कि वह उस के टुकड़े पर पल रहा है. अब वह भी प्रीति को कहता, ‘‘घर के काम को तो तुम हाथ भी नहीं लगाती हो? मेरी मम्मी और बहन तुम्हारी नौकरानी नही हैं.‘‘

अब प्रीति ने बस ये किया कि अपना खाना खुद बनाना शुरू कर दिया था. रातदिन की किचकिच से प्रीति तंग आ गई थी. उसे समझ आ गया था कि उस से एक गलत फैसला हो गया है. पर वह आज की व्यावहारिक लड़की थी, रोने के बजाय उस ने ऐसे रिश्ते से अलग होने का निर्णय ले लिया था. इसलिए प्रीति ने अपने दफ्तर के पास ही एक छोटा सा फ्लैट किराए पर ले लिया था.

जैसे ही प्रीति ने अलग घर में शिफ्ट होने की बात की, तो सिद्धार्थ के चेहरे पर आए राहत के भाव उस से छिपे ना रह सके. प्रीति थोड़ी सी आहत हो गई थी. उधर सिद्धार्थ की मम्मी को भी इस बार अपनी पसंद की लड़की लाने का मौका मिल गया था.

प्रीति के घर छोड़ने के एक हफ्ते बाद ही सिद्धार्थ की नौकरी लग गई थी. सिद्धार्थ की मम्मी ने खुश होते हुए कहा, ‘‘बेटा देखा तुम दोनों एकदूसरे के लिए बने ही नहीं थे. उस के जिंदगी से निकलते ही तुम्हारी नौकरी भी लग गई है.‘‘

प्रीति के घर छोड़ने के बाद सिद्धार्थ की जिंदगी सूनी, मगर शांत हो गई थी. उधर प्रीति की जिंदगी मे मयंक एक ठंडी हवा के झोंके की तरह ना जाने कहां से आ गया था. दोनों की मुलाकात एक कौमन फ्रैंड के यहां हुई थी. मयंक की शादी तो नहीं हुई थी, पर उस का दिल बहुत बुरी तरह टूटा हुआ था.

दोनों को धीरेधीरे एकदूजे का साथ भाने लगा था.
मयंक और प्रीति को साथ घूमतेफिरते देख कर, प्रीति की भाभी ने ही पहल की और प्रीति से कहा, ‘‘प्रीति, जब तुम्हें सिद्धार्थ के पास वापस नहीं जाना है तो उस रिश्ते को खत्म कर के ही आने वाली जिंदगी का स्वागत करो.‘‘

प्रीति सवालिया नजरों से भाभी से बोली, ‘‘भाभी, अगर इस बार भी मेरा चुनाव गलत निकला तो…?‘‘

भाभी बोली, ‘‘प्रीति, अगर तुम्हें सिद्धार्थ के पास वापस नहीं जाना है, तो क्यों ना उस रिश्ते से नजात पा लो.‘‘

प्रीति को भी भाभी की बात सही लगी. सिद्धार्थ के पास एक प्रेमी के रूप में दम तो था, पर पति के रूप में उस के पास रीढ़ की हड्डी नहीं थी. चाहे वह अकेली रहे, पर उस के पास वापस नहीं जाएगी.

मयंक प्रीति के फैसले को सुन कर खुश हो गया और बोला, ‘‘सोच तो मैं भी रहा था, पर फिर लगा कि हो सकता है, तुम उस रिश्ते को फिर से चांस देना चाहती हो, इसलिए चुप लगा गया.‘‘

सिद्धार्थ का परिवार भी लगातार उस पर तलाक लेने के लिए दबाव बना रहा था, पर सिद्धार्थ को समझ नहीं आ रहा था कि बात को मुद्दा बना कर प्रीति से डाइवोर्स ले.

उधर, सिद्धार्थ के परिवार ने पूरे जोरशोर से उस की दूसरी शादी की तैयारी शुरू कर दी थी. उन के अनुसार प्रीति अब उस की जिंदगी का बंद अध्याय है. सिद्धार्थ भी जिंदगी की नई शुरुआत करना चाहता था, इसलिए अपने दोस्त की सलाह पर वकील से मशवरा करने पहुंच गया था.

वकील कमलकांत 50 साल के अनुभवी वकील थे. सिद्धार्थ की बात सुन कर वे हंसते हुए बोले, ‘‘मसला भी क्या है… मसला तो कुछ खास नहीं है बरखुरदार. वैसे भी बिना किसी ठोस वजह के हमारे देश में तलाक नहीं होते हैं.‘‘

सिद्धार्थ बोला, ‘‘वकील साहब, कोई तो हल होगा.‘‘

वकील साहब बोले, ‘‘आपसी सहमति से तलाक हो सकता है या फिर कोई ऐसे सुबूत जुटाने पड़ेंगे, जो तुम्हारी पत्नी के खिलाफ इस्तेमाल कर सके.‘‘

सिद्धार्थ ये सब सोच ही रहा था कि प्रीति के वकील का तलाक का नोटिस आ गया. सिद्धार्थ ने चैन की सांस ली.

भले ही प्रीति उस की जिंदगी का हिस्सा नहीं थी, पर फिर भी वह कोई ऐसी बात नहीं करना चाहता था, जिस से प्रीति के आत्मसम्मान को ठेस लगे.

सिद्धार्थ के परिवार ने लड़की देखनी भी शुरू कर दी थी. उधर प्रीति ने भी नए घर के सपने सजाने शुरू कर दिए थे. दोनों ही पक्ष के वकीलों ने पूरी तसल्ली दी थी कि पहली ही तारीख में मामला हल हो जाएगा.

सिद्धार्थ ने अपने वकील को इस बात के लिए अच्छीखासी रकम दी थी. उधर प्रीति के वकील ने भी अपनी जेब गरम कर रखी थी.

पहली तारीख आई, परंतु जज नहीं बैठा और वह तारीख ऐसे ही चली गई. अब दूसरी तारीख पूरे 2 माह बाद की पड़ी थी. प्रीति को लगा था कि पहली तारीख पर जब कुछ हुआ ही नहीं, तो वकील को दोबारा फीस नहीं देनी पड़ेगी, परंतु वकील ने खींसे निपोरते हुए कहा, ‘‘मैडम, अपना बड़ा केस छोड़ कर, आप की समस्या को देखते हुए आप को डेट दिया हूं.‘‘

प्रीति ने फिर से 10,000 रुपए दिए. हालांकि उसे इस बार पैसा देना बहुत खल रहा था.

प्रीति और सिद्धार्थ पिछले 4 घंटे से प्रतीक्षा कर रहे थे. 4 घंटे बाद उन का नंबर आया, मगर जज ने फैसला नहीं सुनाया और आगे की तारीख दे दी थी.

जज ने अब 4 महीने बाद की नई तारीख दे दी थी. आज प्रीति और सिद्धार्थ दोनों ही बहुत हताश हो गए थे.

जब सिद्धार्थ घर पहुंचा, तो उस की मम्मी बोलीं, ‘‘अरे, कुछ लेदे कर एक महीने बाद की तारीख ले लो… आज ही तो तुम्हारी शादी की तारीख निकलवा कर आई हूं पंडितजी से.‘‘

उधर मयंक आतुर हो कर बोला, ‘‘प्रीति, घर वाले रातदिन शादी के लिए दबाव बना रहे हैं. अब कब तक बहाने बनाता रहूं?‘‘

उधर सिद्धार्थ ने इधरउधर से जज से जानपहचान निकलवानी शुरू कर दी थी. इस चक्कर में दलालों की जेब भी गरम करनी पड़ रही थी.

उधर मयंक और प्रीति भी दौड़धूप कर रहे थे. दोनों ही पक्ष जल्द से जल्द इस रिश्ते से छुटकारा चाहते थे, पर कानून के मसले भी अजीब थे.

4 माह में चक्कर काटकाट कर प्रीति और सिद्धार्थ दोनों के होश फाख्ता हो गए थे.

प्रीति तो एक दिन बोल भी उठी, ‘‘अगर मुझे पता होता कि आपसी सहमति से तलाक लेने में भी इतने झंझट हैं, तो मैं कभी ऐसा कदम नहीं उठाती.‘‘

मयंक प्रीति की बात सुन कर गुस्से में बोला, ‘‘मतलब, मैं ही बेवकूफ हूं.‘‘

सिद्धार्थ की मम्मी ने किसी तरह से शादी की तारीख आगे बढ़वा दी थी और उधर मयंक ने भी अपने परिवार से बस 4 महीने का समय मांगा था.

आज दोनों ही पक्ष को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी. दोनों वकील की जिरह सुनने के पश्चात जज महोदय बोले, ‘‘अगर ऐसी छोटीछोटी बातों पर विवाह टूटने लगे, तो वैवाहिक संस्था से लोगों का विश्वास ही उठ जाएगा.‘‘

फैसला आ गया था. दोनों को एकसाथ 6 माह तक एकसाथ रहने की सलाह दी गई थी. अगर 6 माह बाद भी विचार नहीं मिलते, तो फिर इस पर विचार किया जाएगा.

जज महोदय बोले, ‘‘अब आप लोग अपने घर जा कर दोबारा से नई शुरुआत करें.‘‘

प्रीति और सिद्धार्थ दोनों ही सोच रहे थे कि वो जिंदगी में इतना आगे बढ़ चुके हैं कि अब कौन से घर जाएं?
वह घर, जो कानून की बैसाखियों के सहारे लड़खड़ा रहा है या वह घर, जो अब इस फैसले के पश्चात बसने से पहले ही उजड़ गया था.

दूर कहीं से आवाज आ रही थी, ‘‘चलो खुसरो घर अपने.‘‘

दोनों ही जन उस दोराहे पर खड़े थे, जहां से उन्हें आगे जाने की राह ही नहीं सूझ रही थी. Love Story

Family Story In Hindi : टिकुली – पराई बच्ची को अपनाते दंपति की दिल छूती कहानी

Family Story In Hindi : आदिल ने कमरे में धीरे से झांका. उस की पत्नी बुशरा 7 साल की टिकुली को सीने से लगाए आंख बंद कर लेटी थी. वह बुशरा का थका सा चेहरा देर तक खड़ा देखता रहा. रात को 2 बज रहे थे, पता नहीं बुशरा की आंख लगी है या यों ही आंख बंद कर लेटी है. वह खुद कहां सो पा रहा है.

टिकुली तो अब उस की भी जान है. पीले बल्ब की मद्धिम सी रोशनी में भी उस ने देखा, नन्हा सा चेहरा बुखार की तपिश से कैसा लाल सा हो रहा है. 2 दिन हो गए हैं, टिकुली तेज़ बुखार से तप रही है. बस्ती के एक कामचलाऊ डाक्टर ने दवाई तो दी है, कहा भी है, ‘ज़्यादा परेशानी की बात नहीं है. तीनचार दिनों में ठीक हो जाएगी.’ इतने में बुशरा ने आंखें खोलीं, देखा आदिल गुमसुम खड़ा पता नहीं क्या सोच रहा है. उस ने टिकुली को अपने सीने से धीरे से हटाया, उठ कर बाहर आई. आदिल ने पूछा, “बुखार कम लग रहा है?”

“हां, थोड़ी तपिश कम है, पर अभी भी है. पहले तो बदन जैसे जल सा रहा था. हाय, पता नहीं कब पहले की तरह चहकेगी, चहकेगी भी या नहीं, आदिल? कहीं नन्हें से दिल को सब बता कर हम से गलती तो नहीं हुई?”

“नहीं, बुशरा. कोई और बताए, इस से अच्छा था कि हम ही साफ़साफ़ बता दें. दूसरे धर्म की बच्ची को पालपोस रहे हैं, कुछ भी हो सकता था. कभी भी किसी परेशानी में पड़ सकते थे.”

टिकुली अभी तक बुशरा के सीने से लगी सोई हुई थी. बुशरा का उठ कर जाना उस ने महसूस किया, ज़रा सा हिलीडुली तो बुशरा फिर उसे अपने से लिपटा कर लेट गई. आदिल भी नीचे बिछे बिस्तर पर लेट गया.

बुशरा की आंखों में दूरदूर तक नींद नहीं थी. टिकुली के मुंह से जैसे ही निकला, ‘मां, पानी.’ बुशरा को लगा जैसे उस के बदन में किसी ने जान फूंक दी हो. ‘हांहां, मेरी बच्ची, ले,’ कह कर पास रखा गिलास उस के मुंह से लगा दिया. टिकुली ने अब भी उस की उंगली पकड़ रखी थी. 2 दिनों बाद अपनेआप पानी मांगा था. उस ने पूरा गिलास पानी पी लिया.

बुशरा ने पूछा, “ठीक लग रहा है, कुछ खाएगी?”

‘न’ में सिर हिला कर टिकुली फिर उस से चिपट गई, फिर उस के माथे पर हाथ रख कर पूछा, “मां, आप की टिकुली कहां गई?”

बुशरा मुसकरा दी, उसे सीने से भींच लिया, “यह रही मेरी टिकुली.”

“टिकुली लगाओ न, मां.”

“हां, ये ले,’ कहती हुई उस ने अपने तकिए पर लगी बिंदी उठा कर अपने माथे पर लगा ली. टिकुली ने बिंदी को सीधा किया, फिर निढाल लेट गई. अब तक आदिल भी टिकुली की आवाज़ सुन कर आ गया था, “कैसी है हमारी बिटिया?”

टिकुली कुछ बोली नहीं. बस, आंखें बंद किए लेटी रही. बुशरा ने कहा, “कमज़ोरी बहुत होगी.” फिर छू कर दोबारा देखा, “अभी तो बुखार तेज़ ही लग रहा है. सुबह तक उतरना चाहिए.”

“हां, तुम अब थोड़ा सो लो. ठीक हो जाएगी.”

आदिल फिर लेट गया. बुशरा को अभी टिकुली का बिंदी ठीक करना याद आ गया. इसे अपनी मां की याद आती होगी. 7 साल की ही है, तो क्या हुआ. कुछ तो याद होगा ही. इसे सब सच बता कर कोई गलती तो नहीं हुई? जब से सब बताया है, तभी से बुखार में पड़ी है. टिकुली को देखतेदेखते उस के सामने अर्शी का चेहरा घूम गया. आंखों से आंसुओं की झड़ी सी लग गई. रोतेरोते अचानक हिचकियां बंध गईं. टिकुली की नींद खुल गई. छोटेछोटे गरम हाथ बुशरा के गाल पर रख दिए, “मां, अर्शी याद आ गई?”

बुशरा ने हां में सिर हिला दिया, तुरंत अपने आंसू पोंछे, पूछा, “थोड़ा दूध पिएगी?”

टिकुली ने ‘हां’ में सिर हिलाया तो बुशरा ने तुरंत बिस्तर छोड़ा और उस के लिए दूध ले आई. फिर दोनों चुपचाप एकदूसरे से लिपटी लेट गईं.

टिकुली फिर सो गई. बुशरा को लगा, पानी भी खुद मांग कर पिया है, थोड़ा दूध भी लिया, शायद टिकुली को अब थोड़ा आराम हो रहा है. अर्शी भी जबजब बीमार हुई, ऐसे ही थोड़ाथोड़ा खानापीना शुरू करती तो बुशरा समझ जाती थी कि अर्शी ठीक हो रही है. बुशरा के कलेजे में अपनी बेटी को याद कर फिर एक हूक सी उठी. उस की आंखों के सामने 3 साल पहले का कोरोना महामारी का भयावह मंज़र घूम गया जब अपनी जान बचाना ही लोगों का एकमात्र उद्देश्य रह गया था. पता नहीं कैसे अर्शी इस की चपेट में आ गई थी.

सरकारी अस्पताल में कैसे डाक्टरों के आगे गिड़गिड़ा कर उस ने और आदिल ने अर्शी को एडमिट किया था. पूरे 4 दिन अस्पताल से दूर भूखेप्यासे खड़े रहते, बड़ी मुश्किल से एक बार अर्शी को देखने को किसी तरह घुस गए थे, तो वहीं एक कोने में फटेहाल से राधा और रमेश भी अपनी आखिरी सांसें ले रहे थे.

राधा समझ गई थी कि अर्शी के मातापिता बाहर ही खड़े रहते हैं. बड़ी मुश्किल से उस की बुशरा से थोड़ी बातचीत भी हुई थी. यह समय ऐसा था कि अपने भी अपने नहीं रहे थे या कह सकते हैं कि रह नहीं पा रहे थे. अपनों के लिए भी कोई कुछ चाहते हुए भी नहीं कर पा रहा था. जब राधा और रमेश को समझ आ गया कि वे नहीं बचेंगे तो राधा ने अपनी उखड़ती सांसों के साथ बुशरा के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘बहन, हम दानापुर, बिहार से यहां कामधंधे के लिए आए थे. अब सब छूट रहा है. मेरी 4 साल की टिकुली कमरे पर अकेली है, भूखीप्यासी. पता नहीं कोई उसे खाना भी दे रहा होगा या नहीं. उसे तुम अपने पास रख लोगी?’ कह कर राधा ने अपने कमरे की चाबी बुशरा को सौंप दी थी.

‘आप के कोई रिश्तेदार?’

‘नहीं, टिकुली के पिताजी अनाथालय में पले हैं. मेरे मायके में भी कोई इसे देखने वाला नहीं बचा. यह महामारी सब को ले गई.’

उसी दिन अर्शी ने भी अंतिम सांस ली. रोतेकलपते आदिल और बुशरा को अर्शी का शव भी नहीं दिया गया था. यह ऐसा भयानक समय था कि किसी को यह देखने की फुरसत नहीं थी कि कौन मर रहा है, कौन घर जा रहा है. अफरातफरी का माहौल था. अस्पतालों में डाक्टर्स को घर गए हुए कईकई दिन बीत रहे थे. रातदिन, बस, एंबुलैंस की आवाज़ सुनाई देती. सूनी सड़कें. हर तरफ मौत की चुप्पी. इंसान घर से निकलते हुए डरता था कहीं मौत घात लगाए न बैठी हो.

ऐसी बीमारी कभी किसी ने देखी नहीं थी. ऐसे में अर्शी का दिल ही दिल में मातम मनाते आदिल और बुशरा सीधे राधा के कमरे पर पहुंचे. वहां आसपास के किसी घर से कोई टिकुली को खानापीना दे जाता था. जैसे ही बुशरा ने अकेली रह रही डरीसहमी टिकुली को देखा, वह उसे सीने से लगा कर रो पड़ी. उस से कहा, ‘बेटा, तुम्हारी मां ने हमें भेजा है. तुम्हारे मां, बाबा दोनों बहुत बीमार हैं. उन्हें ठीक होने में कुछ समय लगेगा. तब तक तुम हमारे साथ रहोगी.’  यह कह कर उस ने आदिल की तरफ इशारा किया था. आदिल ने स्नेह से उस के सिर पर अपना हाथ रख दिया था, ‘अब टिकुली हमारे साथ रहेगी.’

इस समय लोगों के पास दूसरों के घरों में, जिंदगी में तांकझांक करने का समय नहीं था. बुशरा और आदिल ने चुपचाप धीरेधीरे राधा का कमरा खाली कर दिया और टिकुली को अपनी बेटी मान कर अपने घर ले आए. जब बसें चलनी शुरू हो गईं तो थोड़े दिनों बाद अपना कमरा भी खाली कर के बनारस की इस बस्ती से काफी दूर एक और जगह अपना नया ठिकाना बना लिया. टिकुली कई दिन गुमसुम रही. पर बालमन जल्दी ही नई जगह रमना जानता है.

आदिल और बुशरा उस पर अपना इतना लाड़ उड़ेलते कि वह अब जल्दी ही उन से घुलमिल गई थी. अर्शी की याद बुशरा और आदिल को तड़पाती. वे अकेले में बैठ कर रो भी लेते पर टिकुली को देख कर फिर जीने की कोशिश करने में लगे थे.

धीरेधीरे महाविनाश के बाद जद्दोजहेद के साथ जीवन पटरी पर लौट रहा था. इस महामारी में हर वर्ग पर कहर टूटा था. अमीरों का पैसा भी उन की जान नहीं बचा पाया था. गरीबों पर गरीबी और बीमारी की दोहरी मार पड़ी थी. अब आदिल ने फिर एक फैक्ट्री में काम पर जाना शुरू कर दिया था. बुशरा भी छोटेमोटे काम करने लगी थी.

अर्शी की तरह टिकुली को पढ़ानेलिखाने की जिम्मेदारी भी उठानी थी. अर्शी और टिकुली एक ही उम्र की थीं. अर्शी के कपड़े पहन कर जब टिकुली आदिल और बुशरा के सामने खड़ी हो कर हंसती, खिलखिलाती, दोनों के आंसू बहते चले जाते. टिकुली ने एक दिन खुद ही बताया था, ‘पता है, मां, मुझे टिकुली क्यों कहते हैं, मां कहती थीं कि मुझे उन के माथे की टिकुली बहुत अच्छी लगती थी, मैं वही छेड़ती रहती थी, और खुद भी लगाती थी इसलिए मेरा नाम ही टिकुली पड़ गया.’ वह अपने ही नाम पर हंसती रहती.

टिकुली कई बार सोतेसोते चौंक कर उठ बैठती. अपनी मां को ढूंढ़ती. बुशरा उसे बहला लेती. धीरेधीरे वह बुशरा और आदिल के नए ठिकाने में रमती गई. बुशरा पहले बिंदी नहीं लगाती थी पर टिकुली कहीं से भी कुछ ला कर उस के माथे पर लगा देती, कहती, ‘मेरी मां बहुत अच्छी टिकुली लगाती हैं.’

टिकुली को अपनी मां इसी बात पर अकसर याद आती. बुशरा उस की ख़ुशी के लिए अपने माथे पर एक छोटी सी बिंदी लगा लेती.

एक दिन बुशरा और आदिल टिकुली को अपनी गोद में लिटा कर आपस में बात कर रहे थे. टिकुली बहुत ध्यान से सुन रही थी, ‘हम टिकुली को न हिंदू, न मुसलमान बनाने पर ज़ोर देंगे, उसे अच्छा इंसान बनाएंगे. उसे पढ़ालिखा कर उस के पैरों पर खड़ा कर देंगे. हम उसे किसी भी धर्म की बातों में फंसने ही नहीं देंगे. इस महामारी में कौन सा धर्म किस के काम आया है? हिंदू, मुसलमान, ईसाई सब तो चले गए, किस को कौन बचा पाया? हर धर्म का इंसान तड़पता चला गया है. लाशों तक का तो कोई ठिकाना न रहा. सच पूछो, आदिल, मैं तो जैसे अब नास्तिक सी होती जा रही हूं. बस, अपनी अर्शी जैसी टिकुली को अब डाक्टर ही बनाना है चाहे इस के लिए रातदिन मेहनत करनी पड़े.’

और अब 2 दिनों पहले ही बुशरा और आदिल ने आपस में बात की थी. आदिल ने कहा था, ‘बुशरा, टिकुली को अब बता दो कि उस के मातापिता नहीं रहे. थोड़ी और बड़ी हो गई तो फिर से नई बातों से घबरा न जाए. अभी तो एडजस्ट कर भी लेगी. हम से थोड़ी मिलजुल गई है. ईमानदारी से अब उसे समझा देते हैं.’

बुशरा ने भी अपनी सहमति दे दी थी. दोनों ने उस दिन टिकुली को बता दिया था कि उस के मातापिता नहीं बचे. अब वह हमेशा उन के साथ ही रहेगी. टिकुली चुपचाप बैठी रही थी, फिर रोई और रोतेरोते ही उसे बुखार चढ़ता चला गया था. 7 साल की बच्ची के लिए अब यह सब सहना कैसा होगा, वह ठीक हो कर क्या कहेगी, उन के साथ ख़ुशीख़ुशी रह लेगी या दुखी हो कर मजबूरी में रहेगी, क्या उसे इतने दिन में हम से प्यार नहीं हो गया होगा? अर्शी और टिकुली में कोई फर्क तो हम ने कभी समझा नहीं. आदिल और बुशरा के मन में बस यही सब चलता रहता.

बुशरा ने एक ठंडी सी सांस भरी तो टिकुली जाग गई. उस की हथेलियां बुशरा के गरदन पर टिकी थीं. हथेलियां कुछ भीगी सी लगीं, तो बुशरा चौंकी, शायद टिकुली का बुखार टूटा था, पसीना आ रहा था. वह उठ कर बैठ गई. टिकुली का माथा छुआ, पसीने से तर था. उस ने फौरन आदिल को आवाज़ दी, “आदिल, देखो तो. टिकुली का बुखार उतर रहा है, शायद.”

आदिल उठ कर आया, थर्मामीटर टिकुली की बांह में रखा. बुशरा ने अपनी आंखें पोंछीं जिन में अर्शी की याद में एक बार फिर नमी उतर आई थी. ऐसे ही तो बीमारी में अर्शी उस के साथ लिपटी रहती थी. टिकुली कभी आदिल को देख रही थी, कभी बुशरा को. कुछ बोली नहीं, तो बुशरा ने पूछा, “क्या हुआ, टिकुली?”

“तो फिर मेरे मांपिताजी मर गए? अब कभी नहीं आएंगे?”

“वे नहीं आएंगें, पर हम हैं न. तू अब हमेशा मेरे पास रहेगी.”

बुशरा और आदिल का दिल ज़ोर से धड़क रहा था. अब पता नहीं टिकुली क्या सोच रही होगी, कहीं शोर सा न मचा दे. आसपास वाले तो उसे उन की बेटी ही समझते थे. कहीं वे किसी बड़ी मुसीबत में न फंस जाएं. दोनों मन ही मन बहुत डर रहे थे. टिकुली की एक हरकत उन्हें जेल भी पहुंचा सकती थी जबकि उन्होंने कोई चोरी नहीं की थी. टिकुली के मातापिता ने ही उन्हें टिकुली सौंपी थी. पर उन के पास इस बात का कोई सुबूत तो था नहीं. दोनों की निगाहें टिकुली पर टिकी थीं. कमज़ोर सी आवाज़ में टिकुली ने कहा, “पिताजी, थर्मामीटर देखो न. कितनी देर हो गई.”

“अरे, वाह, बुखार तो बहुत कम हो गया,” थर्मामीटर देखते हुए आदिल ने खुश होते हुए कहा, “चलो, अब टिकुली को कुछ खिलाओ, बुशरा. उस ने कब से कुछ नहीं खाया है.”

बुशरा ने फौरन उस के लिए पतलीपतली खिचड़ी चढ़ा दी. जब तक खिचड़ी बनी, उसे अपने हाथों से सेब काट कर खिलाती रही. फिर खिचड़ी अपने हाथों से खिलाई.

धीरेधीरे टिकुली ठीक हो रही थी. आदिल ने काम पर जाना शुरू कर दिया. बुशरा अभी टिकुली की देखरेख के लिए घर पर ही थी. वह देख रही थी कि टिकुली ठीक तो हो रही है पर थोड़ा चुप सी रहती है. अब स्कूल खुलने लगे थे. पिछले कई महीने तो बच्चे घर में बंद ही रहे थे. अब सड़कों पर स्कूलबसें एक लंबे समय बाद दिखतीं.

कोरोना महामारी बच्चों के बचपन का बहुत ज़रूरी समय खा गई थी. अभी टिकुली का एडमिशन करवाना था. उस में कोई अड़चन न आ जाए, यह चिंता भी थी. इन सब से अलग टिकुली का थोड़ा चुप रह जाना दोनों को अखर रहा था. वे दोनों अपनी तरफ से टिकुली को संभलने के लिए समय दे रहे थे.

एक दिन बुशरा ने टिकुली को अपने पास लिटा लिया, प्यार से पूछा, “टिकुली, क्या सोचती रहती है? अब तो ठीक हो गई न? अब स्कूल जाना है?” टिकुली बुशरा को देखती रही, फिर पूछा, “मां, आप लोग तो मर नहीं जाओगे न?”

“क्या?” बुशरा हैरान सी उठ कर बैठ गई.

“मां, मुझे आजकल बहुत डर लगता है.”

“ओह्ह, मेरी बच्ची. क्याक्या सोचती रहती है. अरे, हम कहीं नहीं जा रहे हैं. अभी तुझे बहुत पढ़ानालिखाना है.”

“हां, और मुझे डाक्टर भी बनाना है न,” कहते हुए टिकुली जोश से उठ कर बैठ गई, तकिए पर लगी बुशरा की बिंदी को ठीक करते हुए उस से फिर लिपट गई. कुछ दिनों से घर में पसरा सन्नाटा दुम दबा कर कहीं भाग गया था.

Relationship Problems : शादी को एक साल ही हुआ है पर मुझे पति पर शक है

Relationship Problems : पति अकसर औफिशियल टूर पर हफ्तेदोहफ्ते के लिए बाहर जाते रहते हैं. वैसे तो सब ठीक है, पति मुझे बहुत प्यार करते हैं लेकिन फिर भी मुझे शक होता है कि घर से बाहर जा कर वे कहीं और फिजिकल रिलेशन तो नहीं बनाते. मैं पति के हिडेन सीक्रेट जानना चाहती हूं लेकिन इस तरह से कि उन्हें पता न चले.

जवाब : वैसे तो शक रिश्ते में खटास की पहली सीढ़ी है. मगर यह होने ही लगा है और आप पता करना चाहती हैं तो जब भी वे टूर से लौटें, उन का बरताव ध्यान से देखें. क्या पहले जैसा है या कुछ बदलाबदला लगता है? क्या वे मोबाइल छिपाने लगे हैं? अपना पासवर्ड बदलते हैं या कौल व मैसेज डिलीट कर देते हैं?

सफर के बारे में आराम से पूछें, बिना शक जताए पूछें- ‘कहां रुके थे’, ‘कौनकौन साथ गया था’, ‘होटल कैसा था’, ‘खाना कैसा था?’ झुठ बोलने वाले लोग बातों में फर्क करने लगते हैं या छोटी बातें भूल जाते हैं.

सोशल मीडिया और मोबाइल के डिजिटल निशान देखें. उन के फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया पर ध्यान दें. कोई लड़की बारबार लाइक, कमैंट या स्टोरी में दिख रही है क्या?

अगर आप को कभी उन का फोन मिलता है तो गूगल लोकेशन हिस्ट्री देख सकती हैं. इस से पता चलता है कि वे कहांकहां गए थे. ट्रूकौलर और मैसेज चैक करें अगर मौका मिले. ट्रूकौलर ऐप से यह पता चल सकता है कि अनजान नंबरों के पीछे किनकिन के नाम हैं.

अगर उन का फोन आप के हाथ लगता है तो वहाट्सऐप चैट, एसएमएस और कौल हिस्ट्री चुपचाप देख सकती हैं.अगर उन के आनेजाने के समय, कपड़ों की पसंद, खुशबू (परफ्यूम) या फोन पर बिजी रहने की आदत में अचानक बदलाव आ गया है तो ये संकेत हो सकते हैं कि कुछ अलग हो रहा है.

शक से ज्यादा जरूरी है विश्वास और संवाद. अगर आप का शक बढ़ता जा रहा है तो आप एक सही समय चुन कर शांतिपूर्वक बात कर सकती हैं बिना किसी इलजाम के. सिर्फ इतना कहें, ‘जब तुम दूर होते हो तो मैं थोड़ा अकेलापन महसूस करती हूं और मन में कई विचार आते हैं.’

इस से आप उन के दिल की बात जान सकती हैं और बिना लड़ाई के संबंध मजबूत कर सकती हैं. जब वह टूर पर हों तब भी हलकीफुलकी बातचीत या प्यारे मैसेज भेजें ताकि उन्हें लगे कि आप उन से जुड़ी हुई हैं.

कभीकभी ज्यादा शक करने से रिश्ते में दरार आ सकती है. इसलिए सब से जरूरी बात यह है कि आप खुद को मजबूत बनाएं. खुद पर भरोसा रखें और यह सोचें कि अगर कुछ सच में गलत है तो एक दिन सच सामने आ ही जाएगा.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

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