Family Story :प्रोफैसर हंसराज चिंतित रहा करते कि ना जाने उन्हें कैसे पड़ोसी मिलेंगे. दरअसल, नईनई विकसित हुई इस अमलतास कालोनी में वह 2 महीने पहले ही रहने आए हैं. कालोनी के सभी मकान देखतेदेखते भर गए, सिवाय उन के पड़ोस वाले मकान के.

हंसराजजी और उन की पत्नी सुधा ऊपर वाले से प्रार्थना करते कि कोई बालबच्चों वाला संभ्रांत परिवार पड़ोसी के रूप में आ जाए, तो उन्हें बड़ा सहारा हो जाएगा. वैसे तो उन के 2-2 बेटे हैं, लेकिन दोनों विदेश में जा कर बस गए. बड़ा यूएस में और छोटा यूके में.

एक दिन बिल्डर ने जब उन्हें सूचना दी कि जल्दी ही इस मकान में रहने के लिए बुलानीजी आ रहे हैं, तो वे निश्चिंत हो गए. पर सुधा के यह कहते ही कि बुलानी तो सिंधी होते हैं, उन में तो मीटमटन, दारू वगैरह सब चलता है तो वे थोड़ा परेशान हो गए. फिर स्वयं ही विवेक का परिचय देते हुए सुधा को समझाने का प्रयास करने लगे, “किसी के बारे में बिना जाने, बिना उस से मिले, पहले से गलत धारणा बना लेना ठीक नहीं. और खानेपीने के मामले में जब अपने स्वयं के बच्चे ही नौनवेजिटेरियन हो गए हैं, तो किसी और के नौनवेज खाने से आपत्ति क्यों?”

अगले दिन दोपहर के समय जब वे आरामकुरसी पर अधलेटे अखबार पढ़ रहे थे, तभी उन के मकान के ठीक सामने एक कार आ कर रुकी. कार से पहले एक सज्जन बाहर निकले और फिर पीछे से एक महिला और एक 10-12 साल की बच्ची. हंसराजजी ने हाथ के अखबार को टेबल पर रखा और उठ कर बाहर के गेट तक आए.

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