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Slow Travel : स्पौट घूमने से अधिक उन्हें महसूस करें

Slow Travel : बड़े पर्यटन स्थलों की भीड़भाड़ में ट्रैवल को सही से महसूस नहीं किया जा सकता. इस के लिए स्लो ट्रैवल नया ट्रैंड बन गया है, जिस में जगह घूमने से अधिक महसूस की जाती है.

एक समय जब लोग उत्तराखंड में पहाड़ पर घूमने जाते थे तो मसूरी उन की सब से पसंदीदा जगह होती थी. वहां माल रोड, क्लौक टावर पर बहुत सारे होटल हैं, उन में ही वे रुकते थे. वहां से लाल टिब्बा और लैंडोर जैसी जगहें नजदीक थीं. अब माल रोड और क्लौक टावर जैसी जगहों पर भीड़भाड़ बढ़ गई है. पर्यटक उन जगहों पर रुकना नहीं चाहते. पर्यटकों के बदलते रुझान ने इस तरह की जगहों को विकसित करना शुरू कर दिया है जो शहर से दूर हैं.

इसी तरह की एक जगह झड़ीपानी है. वहां मसूरी कौटेज हैं. ये डुप्लैक्स बने कौटेज जैसे घर हैं जिन में अपना किचन, लौन है. 28 कौटेजों के समूह को कमल कौटेज के नाम से जाना जाता है. कभी यह नेपाल के राजा का महल होता था. इस के बाद अंगरेजों के समय में मिस ए फेयर नामक महिला ने इस को पहले लौन के रूप में विकसित किया. इस क्षेत्र को फेयर लौन के नाम से भी जाना जाता है.

अब यहीं पर खूबसूरत कौटेज बन गए हैं, जहां पर्यटक आराम से रहते हैं. इस के एक तरफ मसूरी है तो दूसरी तरफ देहरादून दिखता है. यहां क्लब हाउस भी है. वहां पर बिलियर्ड्स, स्नूकर, टेबल टैनिस, कैरम और कार्ड खेलने के साथ किचन की भी सुविधा है. जो लोग खाना बनाना नहीं चाहते वे खाना मंगवा कर खा सकते हैं. यहां रह कर मसूरी और आसपास घूमा जा सकता है.

यहां आने वाले ज्यादातर पर्यटक झड़ीपानी झरना देखने जाते हैं. वहां पैदल जाना पड़ता है. जो लोग पहाड़ पर ट्रेकिंग या हाईकिंग करने के शौकीन हैं उन को यह जगह खास पसंद आने वाली है. वहां रह कर उस जगह को महसूस किया जा सकता है. इस से दिल को सुकून मिलता है.

क्या है स्लो ट्रैवल

एक जगह पर ज्यादा समय बिताना, लोकल फूड, मार्केट और कल्चर को ठीक से समझने को स्लो ट्रैवल कहते हैं. आज के दौर में बहुत सारे ऐसे माध्यम हैं जिन के जरिए बिना कहीं जाए पर्यटन और इतिहास को जानासमझा जा सकता है. अगर आप लखनऊ घूमने के लिए आते हैं तो पुराने पर्यटक स्थल- इमामबाड़ा, रैजीडैंसी और घंटाघर आदि जैसे स्थानों को देखने में रुचि कम हो गई होगी. पर्यटक कोई ऐसी जगह जाना चाहता है जहां के बारे में लोगों को कम पता हो. यह जगह कोई खाने की चीज मिलने का केंद्र हो सकता है, कोई बाजार हो सकता है, कोई घूमने की जगह भी हो सकती है.

स्लो ट्रैवल लोकल जगह को गहराई से देखने और यात्रा के अनुभव को अधिक से अधिक तरह से शेयर करने का होता है. यह आज की भागदौड़भरी जिंदगी में से सुकून के पलों को तलाशने जैसा होता है. लोग बड़े होटल और महंगी जगह पर रुकने के बजाय भीड़भाड़ से अलग थोड़ा शांत जगह पर रहना पसंद करते हैं. पहले जब लोग पहाड़ पर रुकने जाते थे तो उन की चाहत होती थी कि मुख्य बाजार जैसे माल रोड के होटल में रुकें. अब माल रोड वाली जगहों पर भीड़भाड़ बढ़ गई है. ऐेसे में पर्यटक बड़े शहर से दूर शांत जगह पर रहना चाहते हैं. ऐसे में बड़े रिजौर्ट कई बार काफी महंगे होते हैं. अब छोटेछोटे घर, जो कौटेज टाइप के बने होते हैं, उपलब्ध रहते हैं. ये सस्ते और सकूनभरे होते हैं.

लोगों ने अपने घरों को तमाम जगहों पर होटल बना दिया है. सरकार के पर्यटन विभाग से इस को अनुमति मिली हुई है. एयर बीएनबी नाम के औनलाइन प्लेटफौर्म के जरिए इस तरह के घरों को किसी भी शहर में तलाश किया जा सकता है. यहां हफ्तों या महीनों तक रुका जा सकता है. इस से उस शहर को पूरी तरह से महसूस कर सकते हैं. इस से भीड़भाड़ वाले पर्यटन स्थलों से हट कर लोकल लोगों के साथ घुलनेमिलने, लोकल भोजन का आनंद लेने और वहां की संस्कृति के बारे में जानने का मौका मिलता है. इस से यात्रा को सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाने के बजाय उस स्थान को पूरी तरह से अनुभव करने का मौका मिलता है.

स्लो ट्रैवल का एक लाभ यह भी होता है कि जब आप किसी जगह पर ज्यादा समय बिताते हैं तो आप उस जगह को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं और वहां के लोगों से गहरे संबंध बना पाते हैं. भागदौड़ कम होने के कारण यात्रा का तनाव कम होता है. इस में लोकल बाजार के लोगों की आर्थिक मदद हो सकती है. वहां बिना किसी बड़ी योजना को बनाए घूमने का मौका मिलता है, जिस से सुकून महसूस होता है. इस तरह की यात्रा में बजट कम होने से घूमने का ज्यादा से ज्यादा आनंद लिया जा सकता है.

लाइफस्टाइल बनता जा रहा है स्लो ट्रैवल

स्लो ट्रैवल में एकसाथ 10 जगहों को नहीं घूमते, बल्कि कम जगहों को चुनते हैं. वहां ज्यादा समय बिताते हैं. इस में न तो दौड़भाग, न ही सोशल मीडिया के लिए फटाफट रील्स बनाते हैं. स्लो ट्रैवल में सफर को गहराई से महसूस करने पर जोर है. इसी वजह से ही कि यह सिर्फ एक ट्रैंड नहीं बल्कि लाइफस्टाइल बनता जा रहा है. इस में जिस जगह घूमने जाते हैं वहां की सिंपल लाइफ को महसूस करने लगते हैं फिर चाहे किसी गांव के परिवार संग खाना बनाना हो या समुद्र के किनारे किसी लाइब्रेरी में किताब पढ़ना. इस में जीवन को महसूस करने का भरपूर समय मिलता है.

अब लोगों की सोच बदल गई है. छुट्टियों में घूमने का मतलब सुकून पाना हो गया है. पार्टी क्लब में जो महसूस नहीं किया जा सकता वह यहां महसूस होता है. स्लो ट्रैवल मैंटली रिलैक्स रखता है. होटल के बजाय लोकल होमस्टे से लोकल लोगों की इनकम बढ़ती है. लंबे समय तक सफर से लोकल चीजों के प्रति ज्यादा समझ बनती है.

वर्क फ्रौम होम करने वाले प्रोफैशनल्स इस को बहुत पसंद करते हैं. फैमिली या कपल्स, जो भीड़ से दूर सुकून चाहते हैं, वे भी इस को पंसद करते हैं. ऐसे लोग जो सिर्फ टूरिज्म को महसूस करना चाहते हैं.

स्लो ट्रैवल को पसंद करने की खास वजह यह होती है कि कोई बड़ा खर्च या तैयारी करने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ थोड़ी सोच बदलनी होती है. एक ही डैस्टिनेशन चुनें और वहां 7 से 10 दिन स्टे करें. रहने के लिए होटल की जगह होमस्टे चुनें. पैदल घूमें या साइकिल की सवारी करें. लोकल लोगों से बात करें. नई चीजें सीखें, खाना बनाना, लोकल भाषा, कोई कला आदि तो बेहतर अनुभव करेंगे. स्लो ट्रैवल घूमने से अधिक महसूस करने की जगह है. इस को सही से तभी समझ पाएंगे, जब इसे महसूस करेंगे.

Bollywood : बजट के बोझ तले दम तोड़ती फिल्में

Bollywood : पोस्ट कोविड बौलीवुड संकट में है. बड़े बजट वाली स्टारर फिल्में लगातार फ्लौप हो रही हैं, ‘हाउसफुल 5’, ‘सिकंदर’ और ‘मैट्रो इन दिनों’ जैसी फिल्में अपनी लागत भी नहीं कमा पा रहीं. कारण? कौर्पोरेटाइजेशन के बाद फिल्में सिर्फ बैलेंसशीट और स्टारपावर पर बन रही हैं, उन में कंटैंट नहीं. एमबीए वाले सीईओ कलाकारों की फीस और शेयर मार्केट को प्राथमिकता देते हैं, दर्शकों की पसंद नहीं. नतीजा, बजट बढ़ा, कहानी गायब. सो, इंडस्ट्री संकट में है.

कोविड के बाद से अब तक बौलीवुड में लगभग सूखा पड़ा हुआ है. सभी ए लिस्टर यानी कि स्टार कलाकारों की बड़ेबड़े बजट की फिल्में बौक्स औफिस पर धराशायी हो चुकी हैं. हालिया प्रदर्शित साजिद नाडियाडवाला की फिल्म ‘हाउसफुल 5’ की कमाई बौक्स औफिस पर 217 करोड़ रुपए बताया जा रहा है. फिर भी इसे सफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस का बजट 375 करोड़ रुपए है. तो वहीं टीसीरीज की मल्टीस्टारर फिल्म ‘मेट्रो इन दिनों’ 50 करोड़ ही कमा पाई. ये सभी फिल्में डिजास्टर ही हैं.

नियमतया जब फिल्म ‘हाउसफुल 5’ बौक्स औफिस पर कम से कम 800 करोड़ रुपए कमाए, तब यह फिल्म ‘नो लौस नो प्रौफिट’ में पहुंचेगी जबकि ‘हाउसफुल 5’ में अक्षय कुमार, जैकी श्रौफ, रंजीत, फरदीन खान, रितेश देशमुख, जैकलीन फर्नांडिस, बौबी देओल सहित 20 स्टार कलाकार हैं.

इस से पहले 30 मार्च, 2025 को सलमान खान की फिल्म ‘सिकंदर’ रिलीज हुई थी, निर्माता ने ब्लौक बुकिंग, फेक बुकिंग वगैरह कर अपनी जेब से करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा कर दावा किया कि फिल्म ने 145 करोड़ कमा लिए, जबकि पूरा बौलीवुड ही नहीं दर्शक भी जानते हैं कि फिल्म बिलकुल नहीं चली. निर्माता ने झुठे आंकड़े पेश किए, फिर भी वे अपनी फिल्म को सफल नहीं करा सके क्योंकि फिल्म का बजट 250 करोड़ रुपए है.

गत वर्ष 11 अप्रैल, 2024 को अक्षय कुमार, टाइगर श्रौफ, पृथ्वीराज सुकुमारन, मानुषी छिल्लर व सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ रिलीज हुई थी. इस का बजट 350 करोड़ रुपए था पर निर्माता के अनुसार इस ने बौक्स औफिस पर 100 करोड़ रुपए एकत्र किए. इस फिल्म की असफलता के बाद से निर्माता वासु भगनानी लंदन में हैं. फिल्म से जुडे़ कई कलाकारों व तकनीशियनों के पैसे अभी तक नहीं दिए गए. ये चंद उदाहरण हैं.

सच्चाई यह है कि 50 करोड़ रुपए से 130 करोड़ रुपए तक की फीस लेने वाले किसी भी स्टार कलाकार की फिल्में अपने निर्माता को कमा कर नहीं दे रही हैं.

पिछले 4 वर्षों के दौरान अक्षय कुमार की लगातार 18 फिल्में बौक्स औफिस पर अपनी लागत वसूल नहीं कर पाईं. इन बड़ी फिल्मों की असफलता के ही चलते केवल पीवीआर आयनौक्स मल्टीप्लैक्स के शेयर के दाम एक साल के अंदर 1,800 रुपए से गिर कर 14 जुलाई को 979 रुपए पर आ गए.

बढ़ता कौर्पोरेट कल्चर

बड़े बजट और बड़े स्टार की फिल्में लगातार असफल हो रही हैं. इस की मूल वजह यह है कि अब फिल्में कागज पर यानी कि बैलेंसशीट पर बनती हैं. 2001 के बाद जिस तरह से बौलीवुड का कौर्पोरेटाइजेशन हुआ है, उस के तहत हर स्टूडियो और हर बडे़ प्रोडक्शन हाउस में एमबीए पास कर आए लोग बैठे हुए हैं जिन्हें इंग्लिश भाषा में एमबीए की पढ़ाई के दौरान साबुन, तेल, कार, स्टील आदि बेचना सिखाया जाता है. ये ठीक से न हिंदी पढ़ सकते हैं और न ही हिंदी में बातचीत कर सकते हैं. इन एमबीए के नुमाइंदों को हिंदी साहित्य का एबीसीडी भी नहीं पता होता.

एमबीए की शिक्षा में सिनेमा की कोई चर्चा ही नहीं होती, जिस की वजह से न इन्हें सिनेमा बेचना आता है और न ही इन्हें सिनेमा या कहानी आदि की कोई समझ है पर अब ये सभी खुद को सिनेमा के उद्धारकर्ता के रूप में पेश करते हुए फिल्म इंडस्ट्री को डुबाने पर आमादा हैं. इन्हें एमबीए में जो कुछ पढ़ाया गया, उसी के कदमों पर चलते हुए ये सभी अपनी कंपनी की बैलेंसशीट को संभालने के जुगाड़ में लगे रहते हैं. इन की मूल जिम्मेदारी होती है कि कंपनी की बैलेंसशीट ऐसी हो जिस से कंपनी के शेयर के दाम न गिरें और शेयर बाजार से जो कमाई हो रही है, वह लगातार जारी रहे.

अब ऐसा करने के लिए तो शेयरधारकों को धोखे में रखना ही पड़ता है. इसलिए सभी कंपनी के सीईओ और उन के साथ काम कर रहे एमबीए डिग्रीधारी लोग फिल्म की कहानी की गुणवत्ता या निर्देशक की काबिलीयत पर गौर करने के बजाय निर्देशक के सामने एक ही शर्त रखते हैं कि वह किस स्टार कलाकार को ला सकता है.

इस के बाद वे कहते हैं कि, ‘स्टार कलाकारों के सहमतिपत्र के साथ फिल्म की कहानी की सिनौप्सिस इंग्लिश में ईमेल कर दें.’ इन एमबीए डिग्रीधारकों की सोच व समझ सिर्फ यह कहती है कि अगर उन की फिल्म में स्टार कलाकार होगा तो वे इंग्लिश में फिल्म की सिनौप्सिस के साथ पेपरवर्क तैयार करेंगे और उन की कंपनी की बैलेंसशीट गड़बड़ नहीं होगी व शेयर के दाम नहीं गिरेंगे.

कहानी पर कम ध्यान

एक बार हम ने एक बहुत बड़े कौर्पोरेट स्टूडियो के सीईओ से जब पूछा था कि आप फिल्में बना रहे हैं लेकिन आप के स्टूडियो की बड़े बजट की फिल्में लगातार फ्लौप हो रही हैं तो उन्होंने जो जवाब दिया था उस के माने मेरी समझ से परे थे. उन्होंने कहा था, ‘हर कौर्पोरेट स्टूडियो के लिए जरूरी है कि उस का कैटलौग मजबूत हो.’

‘हम अपनी फिल्म की कहानी की बात ही नहीं करते. ज्यादा से ज्यादा फिल्म के जौनर की चर्चा करते हैं कि यह कौमेडी या ऐक्शन है या अन्य जौनर की फिल्म है. फिल्म के प्रमोशन के लिए हम उन शहरों में अपनी फिल्म के कलाकारों को ले जा कर डांस वगैरह के इवैंट करते हैं जहां हमारी कंपनी के शेयरधारक ज्यादा हैं.

हम कभीकभी अपनी कंपनी के कुछ चुनिंदा बड़े शेयरधारक को फिल्म के प्रीमियर में बुला कर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध से अचंभित कर देते हैं. इस से हमारी कंपनी का ‘कैटलौग’ और बैलेंसशीट दोनों मजबूत बनी रहती हैं. ‘देखिए अब यह युग डिजिटल मार्केटिंग और सोशल मीडिया का है. लोग यह जान कर खुश होते हैं कि उन का पसंदीदा कलाकार अब कितनी अधिक फीस ले रहा है.’

जी हां, यही कटु सत्य है. इन्हें इस बात का एहसास ही नहीं है कि फिल्म की सफलता के लिए पहली जरूरत कंटैंट यानी कि कहानी होती है. यदि कहानी व पटकथा अच्छी हो तो फिर ऐसे काबिल निर्देशक की जरूरत पड़ती है जो कागज पर लिखी कहानी व पटकथा को कलाकारों के माध्यम से सैल्यूलाइड के परदे पर ज्यों का त्यों उतार सके. उस के बाद उस बेहतरीन कहानी पर बनी बेहतरीन फिल्म को मार्केट करना चाहिए.

80 व 90 के दशकों में ऐसा ही हुआ करता था पर अब इन एमबीएधारी लोगों के पास कहानी के नाम पर एक ही विचार होता है. कहानियां तो सब एक ही होती हैं. पूरे विश्व में 9 कहानियां ही हैं. उन्हीं को घुमाफिरा कर सुनाना है. असली टैलेंट तो यह है कि हम अपनी फिल्म में किस बड़े कलाकार को जोड़ते हैं.

अपने टैलेंट को साबित करने के लिए ये एमबीएधारी अभिनेता को उस की औकात से काफी ज्यादा रकम देते हैं. इस तरह फिल्म का बजट बेहिसाब बढ़ता जाता है. हमें याद है कि 2001 में जब नितिन केणी के नेतृत्व में जी टैली फिल्म्स ने स्टूडियो सिस्टम के तहत फिल्म ‘गदर एक प्रेम कथा’ का निर्माण महज साढ़े 18 करोड़ रुपए में किया था और इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर 133 करोड़ रुपए कमा कर हंगामा बरपा दिया था, उस वक्त पहली बार इस फिल्म के निर्माण से जुड़े हर शख्स को चैक से पेमेंट मिला था.

उस के बाद कुकुरमुत्ते की तरह तमाम कौर्पोरेट कंपनियां उग आई थीं और इन के बीच कलाकार को अपने साथ जोड़ने की होड़ लग गई थी.

वर्ष 2012 तक करीबन 35 कौर्पोरेट कंपनियां सक्रिय थीं और कलाकारों को 10 लाख के बजाय 50 करोड़ रुपए तक फीस दे कर फिल्में बना रहे थे. 2012 से 2015 के बीच तकरीबन 15 कंपनियां धड़ाधड़ बंद हो गईं. यह सिलसिला लगातार चलता रहा. अब गिनती के महज चारपांच स्टूडियो ही बचे हैं. इन स्टूडियो द्वारा बनाई जा रहीं सभी बड़े बजट की फिल्में बौक्स औफिस पर अपनी लागत का आधा हिस्सा भी नहीं जुटा पा रही हैं पर ये कंपनियां अपनी बैलेंसशीट व कैटलौग के मजबूत होने के दावे जरूर कर रही हैं.

अब तो मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अक्षय कुमार को प्रति फिल्म 135 करोड़ रुपए, अल्लू अर्जुन को ‘पुष्पा 2’ के बाद प्रति फिल्म 250 करोड़ रुपए, अजय देवगन 50 करोड़, प्रभास प्रति फिल्म 150 करोड़, शाहरुख खान प्रति फिल्म 90 करोड़ रुपए की फीस ले रहे हैं.

अफसोस की बात यह है कि प्रति फिल्म 135 करोड़ रुपए लेने वाले अक्षय कुमार की लगातार 18 फिल्में बौक्स औफिस पर धूल चाट चुकी हैं. अक्षय कुमार की फिल्में 100 करोड़ रुपए भी नहीं कमा पा रही हैं.

2014 में वासु भगनानी निर्मित फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ रिलीज हुई थी. इस में अक्षय कुमार व टाइगर श्रौफ की जोड़ी थी. साढ़े 300 करोड़ रुपए के बजट में बनी यह फिल्म बौक्स औफिस पर 90 करोड़ रुपए भी एकत्र न कर सकी. ‘बड़े मियां छोटे मियां’ में कहानी नहीं चूंचूं का मुरब्बा था. अगर वासु भगनानी ने एक अच्छी कहानी व पटकथा चुन कर सीमित बजट में फिल्म का निर्माण किया होता तो फिल्म को नुकसान न होता.

एक बार मशहूर फिल्म निर्देशक राज कुमार संतोषी ने हम से कहा था, ‘देखिए, हर कहानी का अपना एक बजट होता है. हर कहानी की डिमांड के अनुरूप कलाकार चुन कर उन्हें उसी हिसाब से फीस दे कर बनाया जाए और उसे सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचाया जाए तो नुकसान नहीं हो सकता पर कौर्पोरेट कंपनी में बैठे एमबीए वालों को कुछ पता ही नहीं होता. वे कहानी पढ़ते नहीं हैं, केवल कागजी खानापूर्ति के लिए कहानी को इंग्लिश में मांग कर उसे कौलम में भर देते हैं.

बदला हुआ कल्चर

वास्तव में फिल्म के बजट बढ़ने और फिल्मों की असफलता की एक वजह इन फिल्म प्रोडक्शन कंपनियों व स्टूडियोज में बदला हुआ वर्क कल्चर भी है. औक्सफोर्ड सहित कई विदेशी यूनिवर्सिटीज से एमबीए या ज्यादा से ज्यादा फिल्ममेकिंग का कोर्स कर वापस लौटने के बाद भारत में स्टूडियो या प्रोडक्शन हाउस में सीईओ के पद पर आसीन ये लोग नई फिल्म की प्लानिंग व कहानी सुनने के नाम पर प्रोड्यूसर या डायरैक्टर या ऐक्टर के साथ मीटिंग किसी न किसी फाइवस्टार होटल में बैठ कर हजार रुपए की कौफी की चुस्कियां लगाते हुए करते हैं तो इन्हें उस दर्शक के स्वाद का एहसास कैसे होगा जोकि सिनेमाघर के बाहर पहले 5 रुपए से ले कर 10 रुपए तक की कीमत की कटिंग चाय पीने के बाद सिनेमाघर के अंदर फिल्म देखने के लिए घुसता है.

ये एमबीएधारी वे लोग हैं जिन्हें हिंदी आती नहीं. आम इंसानों से इन का कभी वास्ता नहीं रहा. इसी के चलते इन्हें दर्शक की नब्ज का अतापता ही नहीं होता. हजार रुपए की कौफी पीने वाला यह शख्स कभी भी किसी गरीब के घर जाने का भी साहस नहीं करता. यह तो गिरी हुई हालत में भी स्टारबक्स में बैठ कर 400 रुपए की चाय की चुस्कियां लेते हुए गांव की पगडंडियों व गांव के मकान की कल्पना करता है तो वह कितना अधिक काल्पनिक होता है, वह हम सब फिल्म में देखते ही रहते हैं.

तभी तो अनुराग बसु की हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘मेट्रो इन दिनों’ में मुंबई में रह रहे दंपती मोंटी (पंकज त्रिपाठी) और काजोल (कोंकणा सेन शर्मा) की कहानी देख कर दर्शकों को यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा कुछ हो सकता है. कहानी के अनुसार, मोंटी व काजोल की 2 टीनएजर बेटियां हैं. मोंटी और काजोल दोनों की जिंदगी में सुकून नहीं है. दोनों नाम बदल कर व्हाटसऐप चैट करते हैं. काजोल, माया बन कर अपने पति को रोमांस के लिए होटल बुलाती है, जहां वह अपनी सहेली की मदद से पति मोंटी को नंगा कर पूरे फाइवस्टार होटल व सड़क पर निर्वस्त्र दौड़ाती है.

मोंटी माफी मांगता है तो काजोल उसे गोवा ले जाती है जहां वह अपनी उम्र से भी आधी उम्र के युवक के साथ रोमांस करती है और होटल के एक कमरे में अपने प्रेमी संग ऐयाशी करती है. अपनी पत्नी की ये सारी हरकतें बेचारा मोंटी देखता रहता है. इस के बावजूद, मोंटी माफी मांगते हुए पत्नी के पैर की उंगलियों को चूसता है.

अंगरेजीदां लोगों की घुसपैठ

दर्शक पूछ रहे हैं कि क्या भारत में इस तरह की आधुनिक मिडिल क्लास पत्नियां हैं? मोंटी की एक टीनएजर बेटी पूछती है कि उसे सैक्स के लिए लड़के को ‘किस’ करना चाहिए या लड़की को ‘किस’ करना चाहिए? अब इस तरह के दृश्यों व कहानी से भारत का मिडिल क्लास दर्शक रिलेट नहीं कर पाया और फिल्म फ्लौप हो गई. 150 करोड़ रुपए की लागत में बनी यह फिल्म लगभग 50 करोड़ रुपए ही एकत्र कर सकी. नो लौस नो प्रौफिट के लिए इस फिल्म को 450 करोड़ रुपए कमाने होंगे, जोकि असंभव है.

सब से बड़ी समस्या यह है कि इतने बड़े बजट की फिल्म बनाने वाले फिल्म के फ्लौप होने पर दशकों की अक्ल पर सवाल उठाते हैं. अक्षय कुमार के अभिनय से सजी फिल्म ‘खेल खेल में’ बौक्स औफिस पर केवल 20 करोड़ रुपए कमा कर डिजास्टर हो गई तब फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज ने कहा, ‘इस तरह की बेहतरीन फिल्म के समझने का आईक्यू लैवल हमारे देश के लोगों में नहीं है.’ इसी तरह फिल्म ‘फाइटर’ के डिजास्टर होने पर फिल्म के निर्देशक सिद्धार्थ आनंद ने कहा, ‘हमारे देश में 3 प्रतिशत लोगों ने एयरपोर्ट ही नहीं देखा, तो फिर हमारी फिल्म उन की समझ में कैसे आएगी.’

कहने का अर्थ यह कि इन अंगरेजीदां लोगों ने अपना रहनसहन ही बदल लिया है और इन लोगों ने अब देश में नया कास्ट सिस्टम बना दिया है. अंगरेजीदां लोग हजार रुपए की शर्ट पहन कर खुद को एलीट क्लास बताते हुए गुमान करते हैं और हिंदीभाषी लोगों को ‘पिछड़ा वर्ग’ बताते हैं. इन की नजर में पिछड़ा वर्ग अनपढ़, गंवार है, जिस की समझ में सिनेमा आ ही नहीं सकता. ऐसे में कई सवाल उठते हैं. वे करोड़ों रुपए खर्च कर सिनेमा बनाते ही क्यों हैं?

सवाल यह भी कि वे इस तरह समाज के अंदर ही तोड़फोड़ कर क्या हासिल करना चाहते हैं या देश को कहां ले जाना चाहते हैं? और यदि सिर्फ सिनेमा की असली सम?ा सिर्फ इन्हें है तो फिर इन का सिनेमा बौक्स औफिस पर दम क्यों तोड़ रहा है. क्या ये लोग ‘क्रिमिनल वेस्टेज औफ मनी’ का काम नहीं कर रहे?

पूरे हालात पर गौर करने के बाद यह बात साफतौर पर उभर कर आती है कि भारतीय सिनेमा का विकास तभी संभव है जब हर प्रोडक्शन कंपनी से इन अंगरेजीदां लोगों को हटा कर बाहर किया जाए, हर कलाकार को उस की अभिनय क्षमता और बौक्स औफिस पर एकत्र कर सकने वाली रकम के अनुपात में ही फीस दी जाए और कम से कम बजट में बेहतरीन कहानी वाली फिल्में बनाई जाएं ऐसी कि जिन से आम भारतीय दर्शक रिलेट कर सके.

Bihar Assembly Election : क्या है तेजस्वी की राजनीति खत्म करने की साजिश ?

Bihar Assembly Election : बिहार विधानसभा की चुनावी लड़ाई मतदान से पहले ही शुरू हो गई है. बिहार में विपक्ष का चेहरा राजद नेता तेजस्वी यादव हैं. वह बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री हैं. जनाधार वाले नेता हैं. उन के कारण भाजपा बिहार में अपने बल पर खड़ी नहीं हो पा रही है. बिहार में तेजस्वी यादव के चुनाव लड़ने में बाधा खड़ी हो गई है. सवाल उठ रहा है कि क्या तेजस्वी यादव को दो वोटर आईडी रखने के आरोप में चुनाव लड़ने से रोकने की साजिश हो रही है.

तेजस्वी यादव कहते है उन्होंने पिछले साल के लोकसभा चुनाव में इपिक नंबर आरएबी 2916120 वोटर आई कार्ड से मतदान किया था, जो अब ड्राफ्ट रोल से गायब है. इस के बजाय चुनाव आयोग की नई वोटर लिस्ट में तेजस्वी का नाम इपिक नंबर आरएबी 0456228 दर्ज है. अब इसे ले कर ही तेजस्वी की मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि उन के पास दोदो वोटर आई कार्ड हैं. चुनाव आयोग ने चिट्ठी लिख कर तेजस्वी यादव से मतदाता पहचान पत्र नंबर का ब्यौरा देने को कहा है.

तेजस्वी यादव बिहार की दीघा विधानसभा सीट के वोटर हैं, लेकिन राज्य विधानसभा में विधायक के तौर पर वह राघोपुर विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं. दीघा निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी (ईआरओ) ने आरजेडी नेता को चिट्ठी लिख कर कहा कि जांच में पता चला कि आप का नाम मतदान केंद्र संख्या 204 के सीरियल नंबर 416 पर दर्ज है, जिस का इपिक नंबर आरएबी 0456228 है.

तेजस्वी ने चुनाव आयोग पर बीजेपी के लिए काम करने का आरोप लगाया है. दूसरी तरफ विपक्षी दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग से तेजस्वी यादव के दो वोटर कार्ड का संज्ञान लेने और उन के खिलाफ मामला दर्ज करने का अपील की है. बीजेपी और बिहार में उस के सभी सहयोगी दलों के नेताओं का साफ कहना है कि तेजस्वी के पास दो वोटर कार्ड कहां से आए, किसी भी व्यक्ति के पास दो मतदाता पहचान पत्र होना अपराध है.

भारत में एक व्यक्ति के पास दो वोटर कार्ड होना कानूनन अपराध है. यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत एक गंभीर उल्लंघन माना जाता है. दो वोटर आईडी कार्ड रखने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है, जिस में जुर्माना, जेल या दोनों शामिल हो सकते हैं. इस के अलावा यह तेजस्वी यादव जैसे किसी नेता के चुनाव लड़ने की योग्यता को भी प्रभावित कर सकता है. दो वोटर आईडी कार्ड रखना वोटर लिस्ट में डुप्लीकेट एंट्री माना जाता है, जो गैरकानूनी है.

धारा 31 के तहत, अगर कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में गलत जानकारी देता है या फर्जी दस्तावेज पेश करता है, तो यह अपराध माना जाता है. अगर दूसरा वोटर आईडी कार्ड फर्जी दस्तावेज दे कर बनवाया गया है, तो कानूनी तौर पर जेल या जुर्माना लगाया जा सकता है.

जिस तरह से राहुल गांधी के खिलाफ साजिश कर के उन की सदस्यता खत्म कराने का काम किया गया, उसी तरह से बिहार के प्रमुख नेता तेजस्वी यादव को भी वोटर लिस्ट विवाद में खींच कर चुनाव के पहले ही विपक्ष को खत्म करने की साजिश रची जा रही है. वोटर लिस्ट विवाद में अगर तेजस्वी का दोष साबित होता है तो वह गहरे संकट में फंस सकते हैं. इस तरह से विपक्ष को खत्म करने की साजिश रची जा रही है.

Vice Presidential Election : राजनीतिक छीछालेदर के बाद रायता समेटना

Vice Presidential Election : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अप्रत्याशित इस्तीफा भगवा खेमे की छीछलेदार जम कर करा गया. जिन हालातों में खराब सेहत का बहाना बनाते उन्होंने देश का दूसरा बड़ा संवैधानिक पद छोड़ा उस से हर कोई हैरत में है. विपक्ष ने तो सवालिया निशान खड़े किए ही लेकिन आम लोगों को भी समझ आ गया कि यह दोनों जिल्लेलाहियों के हुक्मो और इच्छाओं की नाफरमानी की सजा है. वैसे भी समाजवादी संस्कारों में पलेबढ़े धनखड़ खुद सही गलत को ले कर उहापोह का शिकार थे सो यह तो होना ही था.

लेकिन अब क्या होगा इस पर सभी की निगाहें हैं. चुनाव आयोग की उपराष्ट्रपति पद के लिए अधिसूचना के मुताबिक चुनाव 9 सितम्बर को होगा. वोटों के लिहाज से एनडीए बेफिक्र है लेकिन उम्मीदवार को ले कर वह छाछ फूंकफूंक कर पी रहा है. उप राष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य वोट करते हैं. लोकसभा के 542 और राज्यसभा के 240 सदस्यों को मिला कर वोटों की संख्या 782 होती है. इस में से एनडीए के खाते में 422 वोट होते हैं जो बहुमत से 41 ज्यादा हैं.

पिछला चुनाव 6 अगस्त 2022 को हुआ था जिस में धनखड़ को 528 और विपक्ष की उम्मीदवार मार्ग्रेट अल्वा को 182 वोट मिले थे. इस वार विपक्ष की कोशिश इस आंकड़े को पार करने की होगी इस बाबत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 7 अगस्त को डिनर पार्टी आयोजित कर रहे हैं. दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राष्ट्रपति से मुलाकातों को इसी नजरिए के साथ साथ मंत्रीमंडल की संभावित फेरबदल की अटकलों के साथ भी देखा जा रहा है.

एनडीए की तरफ से दर्जनों नाम चल रहे हैं तो विपक्ष ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. बिहार में विधानसभा चुनाव के चलते दोनों ही गठबंधन सत्ता के लिए किसी बिहारी पर दांव खेल सकते हैं. सवा दो साल में पहली बार चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की वफ़ादारी का इम्तिहान होगा. क्योंकि अपने अकेले के दम पर भाजपा बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पा रही. उपराष्ट्रपति कोई भी हो यह साफ़ दिख रहा है कि वह काबिलियत के दम पर नहीं बल्कि वफादारी के गुण के चलते चुना जाएगा.

Karnataka : प्रज्वल रेवन्ना को मिली उम्रकैद

Karnataka : कर्नाटक की राजनीति को झकझोर देने वाले सैक्स स्कैंडल में आखिरकार अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुना दिया. इस मामले में हासन से पूर्व सांसद और जनता दल (सेक्युलर) के नेता प्रज्वल रेवन्ना को बेंगलुरु की विशेष अदालत ने 2 अगस्त 2025 को उम्रकैद की सजा सुनाई. कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(के) और 376(2)(एन) के तहत सजा सुनते हुए प्रज्वल रेवन्ना पर 11 लाख रुपये का जुर्माना और पीड़िता को 7 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

धमकी और बलात्कार का यह मामला हासन जिले के होलेनारसीपुरा में रेवन्ना परिवार के फार्म हाउस में सहायिका के रूप में काम करने वाली 48 वर्षीय महिला से संबंधित है. साल 2021 में फार्म हाउस और बेंगलुरु में स्थित रेवन्ना के आवास पर इस महिला से दुष्कर्म किया गया. आरोपी ने इस कृत्य को अपने मोबाइल फोन में भी रिकौर्ड किया. पुलिस के आगे केवल प्रज्वल ही नहीं, पीड़िता ने उस के पिता और जेडीएस के वरिष्ठ नेता एचडी रेवन्ना पर भी गंभीर आरोप लगाए. उस ने कहा था कि बापबेटे आदतन अपराधी हैं. इन दोनों ने उस की मां के साथ भी बलात्कार किया. यही नहीं घर में काम करने वाली अन्य महिला कर्मचारियों का भी यौन शोषण होता है. पीड़िता द्वारा किये गए इस खुलासे के बाद 3 नौकरानियां भी गवाह के रूप में सामने आईं.

प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ बलात्कार का मामला मई 2024 में मैसूर की सीआईडी साइबर क्राइम थाने में दर्ज किया गया. मामले की जांच सीआईडी के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने की. जांच के दौरान टीम ने कुल 123 सबूत जुटाए और करीब 2,000 पन्नों की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की. 31 दिसंबर 2024 को शुरू हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने 23 गवाहों की गवाही दर्ज की. एक महत्वपूर्ण सबूत के रूप में पीड़िता की साड़ी को भी कोर्ट में पेश किया गया. आरोप था कि पूर्व सांसद ने घरेलू सहायिका के साथ एक नहीं बल्कि दो बार बलात्कार किया. पीड़िता के पास वह साड़ी भी मौजूद थी, जिसे उस ने सबूत के तौर पर संभाल कर रखा था. जांच में उस साड़ी पर स्पर्म के निशान पाए गए, जिस से यह मामला और भी मजबूत हो गया. अदालत ने साड़ी को निर्णायक सबूत के रूप में पाया.

इस के अलावा कोर्ट ने वीडियो क्लिप्स की फोरेंसिक रिपोर्ट और घटनास्थल की निरीक्षण रिपोर्टों की भी समीक्षा की. ट्रायल मात्र सात महीनों में पूरा हो गया और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश संतोष गजानन भट्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

इस मामले में न्याय प्रणाली की गति और प्रभावशीलता की व्यापक प्रशंसा हो रही है. केवल 14 महीनों में जिस तरह ये केस न्याय तक पहुंचा, इसे एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है कि उच्च प्रभाव वाले मामलों में भी सख्त और समयबद्ध निर्णय हो सकता है. अदालत का यह निर्णय बताता है कि कानून सभी के लिए एक समान है, चाहे व्यक्ति कितनी भी राजनीतिक शक्ति या प्रतिष्ठा रखता हो.

Bihar Elections : एसआईआर पर विपक्ष एकजुट, राहुल की बिहार यात्रा का ऐलान

Bihar Elections : बिहार में वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट जारी होने के बीच सियासी संग्राम और तेज हो गया है. इस बीच लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी समेत इंडिया ब्लौक के बाकी सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की और उन से संसद के दोनों सदनों में एसआईआर पर चर्चा करने की मांग की. इस से एसआईआर के मुद्दे पर विपक्ष और सरकार के बीच आरपार का सीन बन गया है.

चूंकि बिहार में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं, तो एसआईआर मुद्दे पर राहुल गांधी बहुत ज्यादा मुखर हो गए हैं. लिहाजा, जो महागठबंधन बिहार में कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा था, एसआईआर ने उसे नई सांसें दे दी हैं. इसी का नतीजा है कि राहुल गांधी ने राज्यव्यापी यात्रा का प्लान बनाया है. कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय ने 10 अगस्त से राहुल गांधी की यह यात्रा शुरू करने के संकेत दिए हैं, जो 26 अगस्त तक चलेगी.

इस यात्रा में राहुल गांधी प्रदेश के 18 जिलों का दौरा करेंगे, जिन में मुख्य रूप से मगध, पटना और कोसी प्रमंडल के जिले शामिल हैं. 3 चरणों में होने वाली इस पदयात्रा में राहुल गांधी जनता से सीधा संवाद करेंगे, कार्यकर्ताओं में जोश भरेंगे और महागठबंधन के साथ मिल कर विपक्ष की ताकत का प्रदर्शन करेंगे.

इस यात्रा में राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव भी राहुल गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलेंगे और मतदाता सूची में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाएंगे. इस के अलावा वे बिहार में बढ़ते अपराध, बेरोजगारी और पलायन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सरकार को घेरेंगे. वे सरकार की नाकामियों को उजागर करेंगे और अपनी उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं के बारे में जनता को बताएंगे.

Hindi Love Stories : विकराल शून्य – निशा की कौनसी बीमारी से बेखबर था सोम?

Hindi Love Stories : ‘‘कैसी विडंबना है, हम पराए लोगों को तो धन्यवाद कहते हैं लेकिन उन को नहीं, जो करीब होते हैं, मांबाप, भाईबहन, पत्नी या पति,’’ अजय ने कहा.

‘‘उस की जरूरत भी क्या है? अपनों में इन औपचारिक शब्दों का क्या मतलब? अपनों में धन्यवाद की तलवार अपनत्व को काटती है, पराया बना देती है,’’ मैं ने अजय को जवाब दिया.

‘‘यहीं तो हम भूल कर जाते हैं, सोम. अपनों के बीच भी एक बारीक सी रेखा होती है, जिस के पार नहीं जाना चाहिए, न किसी को आने देना चाहिए. माना अपना इनसान जो भी हमारे लिए करता है वह हमारे अधिकार या उस के कर्तव्य की श्रेणी में आता है, फिर भी उस ने किया तो है न. जो मांबाप ने कर दिया उसी को अगर वे न करते या न कर पाते तो सोचो हमारा क्या होता?’’ अजय बोला.

अजय की गहरी बातें वास्तव में अपने में बहुत कुछ समाए रखती हैं. जब भी उस के पास बैठता हूं, बहुत कुछ नया ही सीख कर जाता हूं.

बड़े गौर से मैं अजय की बातें सुनता था जो अजय कहता था, गलत या फिजूल उस में तो कुछ भी नहीं होता था. सत्य है हमारा तो रोमरोम किसी न किसी का आभारी है. अकेला इनसान संपूर्ण कहां है? क्या पहचान है एक अकेले इनसान की? जन्म से ले कर बुढ़ापे तक मनुष्य किसी न किसी पर आश्रित ही तो रहता है न.

‘‘मेरी पत्नी सुबह से शाम तक बहुत कुछ करती है मेरे लिए, सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक, मेरे कपड़े, मेरा कमरा, मेरी व्यक्तिगत चीजों का खयाल, यहां तक कि मेरा मूड जरा सा भी खराब हो तो बारबार मनाना या किसी तरह मुझे हंसाना,’’ मैं अजय से बोला.

‘‘वही सब अगर वह न करे तो जीवन कैसा हो जाए, समझ सकते हो न. मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन की बीवियां तिनका भी उठा कर इधरउधर नहीं करतीं. पति ही घर भी संभालता है और दफ्तर भी. पत्नी को धन्यवाद कहने में कैसी शर्म, यदि उस से कुछ मिला है तुम्हें? इस से आपस का स्नेह, आपस की ऊष्मा बढ़ती है, घटती नहीं,’’ अजय ने कहा.

सच ही कहा अजय ने. इनसान इतना तो समझदार है ही कि बेमन से किया कोई भी प्रयास झट से पहचान जाता है. हम भी तो पहचान जाते हैं न, जब कोई भावहीन शब्द हम पर बरसाता है.

उस दिन देर तक हम साथसाथ बैठे रहे. अपनी जीवनशैली और उस के तामझाम को निभाने के लिए ही मैं इस पार्टी में आया था, जहां सहसा अजय से मुलाकात हो गई थी. हमारी कंपनी के ही एक डाइरेक्टर ने पार्टी दी थी, जिस में मैं हाजिर हुए बिना नहीं रह सकता था. इसे व्यावसायिक मजबूरी कह लो या तहजीब का तकाजा, निभाना जरूरी था.

12 घंटे की नौकरी और छुट्टी पर भी कोई न कोई आयोजन, कैसे घर के लिए जरा सा समय निकालूं? निशा पहले तो शिकायत करती रही लेकिन अब उस ने कुछ भी कहनासुनना छोड़ दिया है. समूल सुखसुविधाओं के बावजूद वह खुश नजर नहीं आती. सुबह की चाय और रात की रोटी बस यही उस की जिम्मेदारी है. मेरा नाश्ता और दोपहर का खाना कंपनी के मैस में ही होता है. आखिर क्या कमी है हमारे घर में जो वह खुश नजर नहीं आती? दिन भर वह अकेली होती है, न कोई रोकटोक, न सासससुर का मुंह देखना, पूरी आजादी है निशा को. फिर भी हमारे बीच कुछ है, जो कम होता जा रहा है. कुछ ऐसा है जो पहले था अब नहीं है.

सुबह की चाय और अखबार वह मेरे पास छोड़ जाती है. जब नहा कर आता हूं, मेरे कपड़े पलंग पर मिलते हैं. उस के बाद यंत्रवत सा मेरा तैयार होना और चले जाना. जातेजाते एक मशीनी सा हाथ हिला कर बायबाय कर देना.

मैं पिछले कुछ समय से महसूस कर रहा हूं, अब निशा चुप रहती है. हां, कभी माथे पर शिकन हो तो पूछ लेती है, ‘‘क्या हुआ? क्या आफिस में कोई समस्या है?’’

‘‘नहीं,’’ जरा सा उत्तर होता है मेरा.

आज शनिवार की छुट्टी थी लेकिन पार्टी थी, सो यहां आना पड़ा. निशा साथ नहीं आती, उसे पसंद नहीं. एक छत के नीचे रहते हैं हम, फिर भी लगता है कोसों की दूरी है.

मैं पार्टी से लौट कर घर आया, चाबी लगा कर घर खोला. चुप्पी थी घर में. शायद निशा कहीं गई होगी. पानी अपने हाथ से पीना खला. चाय की इच्छा नहीं थी. बीच वाले कमरे में टीवी देखने बैठ गया. नजर बारबार मुख्य

द्वार की ओर उठने लगी. कहां रह गई यह लड़की? चिंता होने लगी मुझे. उठ कर बैडरूम में आया और निशा की अलमारी खोली. ऊपर वाले खाने में कुछ उपहार पड़े थे. जिज्ञासावश उठा लिए. समयसमय पर मैं ने ही उसे दिए थे. मेरा ही नाम लिखा था उन पर. स्तब्ध रह गया मैं. निशा ने उन्हें खोला तक नहीं था. महंगी साडि़यां, कुछ गहने. हजारों का सामान अनछुआ पड़ा था. क्षण भर को तो अपना अपमान लगा यह मुझे, लेकिन दूसरे ही क्षण लगा मेरी बेरुखी का इस से बड़ा प्रमाण और क्या होगा?

उपहार देने के बाद मैं ने उन्हें कब याद रखा. साड़ी सिर्फ दुकान में देखी थी, उसे निशा के तन पर देखना याद ही नहीं रहा. कान के बुंदे और गले का जड़ाऊ हार मैं ने निशा के तन पर सजा देखने की इच्छा कब जाहिर की? वक्त ही नहीं दे पाता हूं पत्नी को, जिस की भरपाई गहनों और कपड़ों से करता रहा था. जरा भी प्यार समाया होता इस सामान में तो मेरे मन में भी सजीसंवरी निशा देखने की इच्छा होती. मेरा प्यार और स्नेह ऊष्मारहित है. तभी तो न मुझे याद रहा और न ही निशा ने इन्हें खोल कर देखने की इच्छा महसूस की होगी. सब से पुराना तोहफा 4 महीनों पुराना है, जो निशा के जन्मदिन का उपहार था. मतलब यह कि पिछले 4 महीनों से यह सामान लावारिस की तरह उस की अलमारी में पड़ा है, जिसे खोल कर देखने तक की जरूरत निशा ने नहीं समझी.

यह तो मुझे समझ में आ गया कि निशा को गहनों और कपड़ों की भूख नहीं है और न ही वह मुझ से कोई उम्मीद करती है.

2 साल का वैवाहिक जीवन और साथ बिताया समय इतना कम, इतना गिनाचुना कि कुछ भी संजो नहीं पा रहा हूं, जिसे याद कर मैं यह विश्वास कर पाऊं कि हमारा वैवाहिक जीवन सुखमय है.

निशा की पूरी अलमारी देखी मैं ने. लाकर में वे सभी रुपए भी वैसे के वैसे ही पड़े थे. उस ने उन्हें भी हाथ नहीं लगाया था.

शाम के 6 बज गए. निशा लौटी नहीं थी. 3 घंटे से मैं घर पर बैठा उस का इंतजार कर रहा हूं. कहां ढूंढू उसे? इस अजनबी शहर में उस की जानपहचान भी तो कहीं नहीं है. कुछ समय पहले ही तो इस शहर में ट्रांसफर हुआ है.

करीब 7 बजे बाहर का दरवाजा खुला.

बैडरूम के दरवाजे की ओट से ही मैं ने देखा, निशा ही थी. साथ था कोई पुरुष, जो सहारा दे रहा था निशा को.

‘‘बस, अब आप आराम कीजिए,’’

सोफे पर बैठा कर उस ने कुछ दवाइयां मेज पर रख दी थीं. वह दरवाजा बंद कर के चला गया और मैं जड़वत सा वहीं खड़ा रह गया. तो क्या निशा बीमार है? इतनी बीमार कि कोई पड़ोसी उस की सहायता कर रहा है और मुझे पता तक नहीं. शर्म आने लगी मुझे.

आंखें बंद कर चुपचाप सोफे से टेक लगाए बैठी थी निशा. उस की सांस बहुत तेज चल रही थी. मानो कहीं से भाग कर आई हो. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी पास जाने की. शब्द कहां हैं मेरे पास जिन से बात शुरू करूंगा. पैसों का ढेर लगाता रहा निशा के सामने, लेकिन यह नहीं समझ पाया, रुपयापैसा किसी रिश्ते की जगह नहीं ले सकता.

‘‘क्या हुआ निशा?’’ पास आ कर मैं ने उस के माथे पर हाथ रखा. तेज बुखार था, जिस वजह से उस की आंखों से पानी भी बह रहा था. जबान खिंच गई मेरी. आत्मग्लानि का बोझ इतना था कि लग रहा था कि आजीवन आंखें न उठा पाऊंगा.

किसी गहरी खाई में जैसे मेरी चेतना धंसने लगी. अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह के साथ मेरा घर, मेरी गृहस्थी कहीं उजड़ने तो नहीं लगी? हंसतीखेलती यह लड़की ऐसी कब थी, जब मेरे साथ नहीं जुड़ी थी. मेरी ही इच्छा थी कि मुझे नौकरी वाली लड़की नहीं चाहिए. वैसी हो जो घर संभाले और मुझे संभाले. इस ने तो मुझे संभाला लेकिन क्या मैं इसे संभाल पाया?

‘‘आप कब आए?’’ कमजोर स्वर ने मुझे चौंकाया. अधखुली आंखों से मुझे देख रही थी निशा.

निशा का हाथ कस कर अपने हाथ में पकड़ लिया मैं ने. क्या उत्तर दूं, मैं कब आया.

‘‘चाय पिएंगे?’’ उठने का प्रयास किया निशा ने.

‘‘कब से बीमार हो?’’ मैं ने उठने से उसे रोक लिया.

‘‘कुछ दिन हो गए.’’

‘‘तुम्हारी सांस क्यों फूल रही है?’’

‘‘ऐसी हालत में कुछ औरतों को सांस की तकलीफ हो जाती है.’’

‘‘कैसी हालत?’’ मेरा प्रश्न विचित्र सा भाव ले आया निशा के चेहरे पर. वह मुसकराने लगी. ऐसी मुसकराहट, जो मुझे आरपार तक चीरती गई.

फिर रो पड़ी निशा. रोना और मुसकराना साथसाथ ऐसा दयनीय चित्र प्रस्तुत करने लगा मानो निशा पूर्णत: हार गई हो. जीवन में कुछ भी शेष नहीं बचा. डर लगने लगा मुझे. हांफतेहांफते निशा का रोना और हंसना ऐसा चित्र उभार रहा था मानो उसे अब मुझ से

कोई भी आशा नहीं रही. अपना हाथ खींच लिया निशा ने.

तभी द्वार घंटी बजी और विषय वहीं थम गया. मैं ही दरवाजा खोलने गया. सामने वही पुरुष खड़ा था, मेरी तरफ कुछ कागज बढ़ाता हुआ.

‘‘अच्छा हुआ, आप आ गए. आप की पत्नी की रिपोर्ट्स मेरी गाड़ी में ही छूट गई थीं. दवा समय से देते रहिए. इन की सांस बहुत फूल रही थी इसलिए मैं ही छोड़ने चला आया था.’’

अवाक था मैं. निशा को 4 महीने का गर्भ था और मुझे पता तक नहीं. कुछ घर छोड़ कर एक क्लीनिक था, जिस के डाक्टर साहब मेरे सामने खड़े थे. उन्होंने 1-2 कुशल स्त्री विशेषज्ञ डाक्टरों का पता मुझे दिया और जल्दी ही जरूरी टैस्ट करवा लेने को कह कर चले गए. जमीन निकल गई मेरे पैरों तले से. कैसा नाता है मेरा निशा से? वह कुछ सुनाना चाहती है तो मेरे पास सुनने का समय नहीं. तो फिर शादी क्यों की मैं ने, अगर पत्नी का सुखदुख भी नहीं पूछ सकता मैं.

चुपचाप आ कर बैठ गया मैं निशा के पास. मैं पिता बनने जा रहा हूं, यह सत्य अभीअभी पता चला है मुझे और मैं खुश भी नहीं हो पा रहा. कैसे आंखें मिलाऊं मैं निशा से? पिछले कुछ महीनों से कंपनी में इतना ज्यादा काम है कि सांस भी लेने की फुरसत नहीं है मुझे. निशा दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और मैं ने एक बार भी पूछा नहीं, उसे क्या तकलीफ है.

निशा के विरोध के बावजूद मैं उसे उठा कर बिस्तर पर ले आया. देर तक ठंडे पानी की पट्टियां रखता रहा. करीब आधी रात को उस का बुखार उतरा. दूध और डबलरोटी ही खा कर गुजारा करना पड़ा उस रात, जबकि यह सत्य है, 2 साल के साथ में निशा ने कभी मुझे अच्छा खाना खिलाए बिना नहीं सुलाया.

सुबह मैं उठा तो निशा रसोई में व्यस्त थी. मैं लपक कर उस के पास गया. कुछ कह पाता, तब तक तटस्थ सी निशा ने सामने इशारा किया. चाय ट्रे में सजी थी.

‘‘यह क्या कर रही हो तुम? तुम तो बीमार हो,’’ मैं ने कहा.

‘‘बीमार तो मैं पिछले कई दिनों से हूं. आज नई बात क्या है?’’

‘‘देखो निशा, तुम ने एक बार भी मुझे नहीं बताया,’’ मैं ने कहा.

‘‘बताया था मैं ने लेकिन आप ने सुना ही नहीं. सोम, आप ने कहा था, मुझे इस घर में रोटीकपड़ा मिलता है न, क्या कमी है, जो बहाने बना कर आप को घर पर रोकना चाहती हूं. आप इतनी बड़ी कंपनी में काम करते हैं. क्या आप को और कोई काम नहीं है, जो हर पल पत्नी के बिस्तर में घुसे रहें? क्या मुझे आप की जरूरत सिर्फ बिस्तर में होती है? क्या मेरी वासना इतनी तीव्र है कि मैं चाहती हूं, आप दिनरात मेरे साथ वही सब करते रहें?’’ निशा बोलती चली गई.

काटो तो खून नहीं रहा मेरे शरीर में.

‘‘आप मुझे रोटीकपड़ा देते हैं, यह सच

है. लेकिन बदले में इतना बड़ा अपमान भी करें, क्या जरूरी है? सोम, आप भूल गए, पत्नी का भी मानसम्मान होता है. रोटीकपड़ा तो मेरे पिता के घर पर भी मिलता था मुझे. 2 रोटी तो कमा भी सकती हूं. क्या शादी का मतलब यह होता है कि पति को पत्नी का अपमान करने का अधिकार मिल जाता है?’’ निशा बिफर पड़ी.

याद आया, ऐसा ही हुआ था एक दिन. मैं ने ऐसा ही कहा था. इतनी ओछी बात पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गई थी. सच है, उस के बाद निशा ने मुझ से कुछ भी कहना छोड़ दिया था. जिस खबर पर मुझे खुश होना चाहिए था उसे बिना सुने ही मैं ने इतना सब कह दिया था, जो एक पत्नी की गरिमा पर प्रहार का ही काम करता.

निशा को बांहों में ले कर मैं रो पड़ा. कितनी कमजोर हो गई है निशा, मैं देख ही नहीं पाया. कैसे माफी मांगूं अपने कहे की. लाखों रुपए हर महीने कमाने वाला मैं इतना कंगाल हूं कि न अपने बच्चे के आने की खबर का स्वागत कर पाया और न ही शब्द ही जुटा पा रहा हूं कि पत्नी से माफी मांग सकूं.

पत्नी के मन में पति के लिए एक सम्मानजनक स्थान होता है, जिसे शायद मैं खो चुका हूं. लाख हवा में उड़ता रहूं, आना तो जमीन पर ही था मुझे, जहां निशा ने सदा शीतल छाया सा सुख दिया है मुझे.

मेरे हाथ हटा दिए निशा ने. उस के होंठों पर एक कड़वी सी मुसकराहट थी.

‘‘ऐसा क्या हुआ है मुझे, जो आप को रोना आ गया. आप रोटीकपड़ा देते हैं मुझे, बदले में संतान पाना तो आप का अधिकार है न. डाक्टर ने कहा है, कुछ औरतों को गर्भावस्था में सांस की तकलीफ हो जाती है. ठीक हो जाऊंगी मैं. आप की और घर की देखभाल में कोई कमी नहीं आएगी,’’ निशा ने कहा.

‘‘निशा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो. पता नहीं क्यों मेरे मुंह से

वह सब निकल गया,’’ मैं निशा के आगे गिड़गिड़ाया.

‘‘सच ही आया होगा न जबान पर, इस में माफी मांगने की क्या जरूरत है? मैं जैसी हूं वैसी ही बताया आप ने.’’

‘‘तुम वैसी नहीं हो, निशा. तुम तो संसार की सब से अच्छी पत्नी हो. तुम्हारे बिना मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा. अगर मैं अपनी कंपनी का सब से अच्छा अधिकारी हूं तो उस के पीछे तुम्हारी ही मेहनत और देखभाल है. यह सच है, मैं तुम्हें समय नहीं दे पाता लेकिन यह सच नहीं कि मैं तुम से प्यार नहीं करता. तुम्हें गहनों, कपड़ों की चाह होती तो मेरे दिए तोहफे यों ही नहीं पड़े होते अलमारी में. तुम मुझ से सिर्फ जरा सा समय, जरा सा प्यार चाहती हो, जो मैं नहीं दे पाता. मैं क्या करूं, निशा, शायद आज संसार का सब से बड़ा कंगाल भी मैं ही हूं, जिस की पत्नी खाली हाथ है, कुछ नहीं है जिस के पास. क्षमा कर दो मुझे. मैं तुम्हारी देखभाल नहीं कर पाया.’’ मैं रोने लगा था.

मुझे रोते देख कर निशा भी रोने लगी थी. रोने से उस की सांस फूलने लगी थी. निशा को कस कर छाती से लगा लिया मैं ने. इस पल निशा ने विरोध नहीं किया. मैं जानता हूं, मेरी निशा मुझ से ज्यादा नाराज नहीं रह पाएगी. मुझे अपना घर बचाने के लिए कुछ करना होगा. घर और बाहर में एक उचित तालमेल बनाना होगा, हर रिश्ते को उचित सम्मान देना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं जब मेरे बैंक खातों में तो हर पल शून्य का इजाफा होगा ही, वहीं शून्य अपने विकराल रूप में मेरे जीवन में भी स्थापित हो जाएगा. Hindi Love Stories

Romantic Story in Hindi : हम तुम कुछ और बनेंगे

Romantic Story in Hindi : बगल के कमरे से अब फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी. कुछ देर पहले तक उन की आवाजें लगभग स्पष्ट आ रही थीं. बात कुछ ऐसी भी नहीं थी. फिर दोनों इतने ठहाके क्योंकर लगा रहे? जाने क्या चल रहा है दोनों के बीच. वार्त्तालाप और ठहाकों का सामंजस्य उस की सोच के परे जा रहा था. उफ, तीर से चुभ रहे हैं, बिलकुल निशाना बैठा कर नश्तर चुभो रही है उन की हंसी. रमण का मन किया कि वह कोने वाले कमरे में चला जाए और दरवाजा बंद कर तेज संगीत चला दुनिया की सारी आवाजों से खुद को काट ले. परंतु एक कीड़ा था जो कुलबुला रहा था, काट रहा था, हृदय क्षतविक्षत कर भेद रहा था, पर कदमों में बेडि़यां भी उसी ने डाल रखी थीं. वह कीड़ा बारबार विवश कर रहा था कि वह ध्यान से सुने कि बगल के कमरे से क्या आवाजें आ रही हैं:

‘‘जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी,

खुशियों की कलियां झूमेंगी,

झूलेंगी, फूलेंगी,

जीवन की बगिया…’’ काजल इन पंक्तियों को गुनगुना रही थी.

‘रोहन को अब सीटियां बजाने की क्या जरूरत है इस पर? बेशर्म कहीं का,’ सोफे पर अधलेटे रमण ने सोचा. उस का सर्वांग सुलग रहा था. अब जाने उस ने क्या कहा जो काजल को इतनी हंसी आ रही है. रमण अनुमान लगाने की कोशिश कर ही रहा था कि रोहन के ठहाकों ने उस के सब्र के पैमाने को छलका ही दिया. रमण ने कुशन को गुस्से से पटका और सोफे से उठ खड़ा हुआ.

‘‘क्या हो रहा है ये सब? कितनी देर से तुम दोनों की खीखी सुन रहा हूं. आदमी अपने घर में भी कुछ पल चैनसुकून से नहीं रह सकता है,’’ रमण के गुस्से ने मानो खौलते दूध में नीबू निचोड़ दिया.

रोहन, सौरीसौरी बोलता हुआ उठ कर चला गया. पर काजल अभी भी कुछ गुनगुना रही थी. रोहन के जाने के बाद काजल का गुनगुनाना उस की रूह को मानो ठंडक पहुंचाने लगा. उस ने भरपूर नजरों से काजल को देखा. 7वां महीना लग गया है. इतनी खूबसूरत उस ने अपनी ब्याहता को पहले कभी नहीं देखा था. गालों पर एक हलकी सी ललाई और गोलाई प्रत्यक्ष परिलक्षित थी. रंगत निखर कर एक सुनहरी आभा से मानो आलोकित हो दिल को रूहानी सुकून पहुंचा रही थी. सदा की दुबलीपतली छरहरी काजल आज अंग भर जाने के पश्चात अपूर्व व्यक्तित्व की स्वामिनी लग रही थी.

कोई स्त्री गर्भावस्था में ही शायद सर्वाधिक रूपवती होती है. रोमरोम से छलकती मातृत्व से परिपूर्ण सुंदरता अतुलनीय है. रमण अपने दोनों चक्षुओं सहित सभी ज्ञानेंद्रियों से अपनी ही बीवी के इस अद्भुत नवरूप का रसास्वादन कर ही रहा था कि रोहन फिर आ गया और रमण हकीकत की विकृत सचाई से आंखें चुराता हुआ झट कमरे से निकल गया.

रोहन के हाथ में विभिन्न फलों को काट कर बनाया गया फ्रूट सलाद था.

इस बार रमण सच में कोने वाले कमरे में चला गया और तेज संगीत बजा वहीं पलंग पर लेट गया. म्यूजिक भले ही कानफोड़ू हो गया, परंतु उस कमरे से आती फुसफुसाहट को रोकने में अभी भी असमर्थ ही था. रोहन की 1-1 सीटी इस संगीत को मध्यम किए जा रही थी, साथ ही साथ बीचबीच में काजल की दबीदबी खिलखिलाहट भी. ऐसा लग रहा था कि दोनों कर्ण मार्ग से प्रवेश कर उस के मानस को क्षतविक्षत कर के ही दम लेंगे.

इसी बीच स्मृति कपाट पर विगत की दस्तक शुरू हो गई. इस नवआगंतुक ने मानो उस की सुधबुध को ही हर लिया. बगल के कमरे की फुसफुसाहट, तेज संगीत और अब स्मृतियों की थाप. इस स्वर मिश्रण ने उसे आभास दिला दिया कि शायद जहन्नुम यही है.

सच इन दिनों उसे आभास होने लगा है कि वह मानो जहन्नुम की अग्नि में झुलस रहा हो. जिस उत्कंठा से उस ने इस खुशी को पाने की तमन्ना की थी, वह इस अग्नि कुंड से हो कर निकलेगी, यह उस के लिए कल्पनातीत थी.

‘कुछ महीने पहले तक सब कितना मधुर था,’ रमण ने सोचा, ‘पर कैसे कहा जाए कि मधुर था तब तो कुछ और ही शूल चुभ रहे थे,’ चेतना की बखिया उधड़ने लगीं.

विवाह के 10 वर्ष होने को थे. शुरू के वर्षों में नौकरी, कैरियर, पदोन्नति और घर की जिम्मेदारियों के चलते रमण और काजल परिवार बढ़ाने की अपनी योजना को टालते रहे. आदर्श जोड़ी रही है दोनों की. कितना दबाव था सब का कि उन के बच्चे होने चाहिए. काजल के मातापिता, रमण के मातापिता, नातेरिश्तेदार यहां तक कि दोस्त भी टोकने लगे थे. रमण के सासससुर उस की शादी की 7वीं वर्षगांठ परआए थे.

‘‘तुम लोगों ने बड़ा ही अच्छा आयोजन किया अपनी 7वीं वर्षगांठ पर. इस से पहले तो तुम लोग वर्षगांठ मनाने के ही विरुद्ध होते थे. बहुत खुशी हो रही है.’’

रमण के ससुरजी ने ऐसा कहा तो काजल झट से बोल पड़ी, ‘‘हां पापा, इस बार बात ही कुछ ऐसी थी. मेरे देवर ने अपनी पढ़ाई बहुत हद तक पूरी कर ली है. अपने आगे की पढ़ाई का खर्च अब वह खुद वहन कर सकता है. मेरा देवर डाक्टर बन गया, हमारी तपस्या सफल हुई. वर्षगांठ तो बस एक बहाना है अपनी खुशियों को सैलिब्रेट करने का.’’

‘‘बहनजी, अब आप ही रमण और काजल को समझाएं कि ये जल्दी से हमें खुशखबरी सुनाएं. मेरी तो आंखें तरस गई हैं कि कोई शिशु मेरे आंगन में खेले. ऐसा न हो कि कहीं देर हो जाए,’’ रमण की मां ने अपनी समधिन से कहा.

‘‘हां बहनजी, आप सही कह रही हैं. हर चीज का एक वक्त होता है, जो सही वक्त पर पूरी हो जानी चाहिए. हम भी तो बूढ़े हो चले हैं,’’ रमण की सास ने कहा.

कुछ ही महीनों में काजल को यह भान होने लगा कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है. फिर शुरू हुआ जांचरिपोर्ट का अंतहीन सिलसिला. जब तक चाह नहीं थी तब तक इतनी बेसब्री और संवेदनाएं भी जाग्रत नहीं थीं. अब जब असफलता और अनचाहे परिणाम मिलने लगे तो दोनों की बच्चे के प्रति उत्कंठा भी उतनी ही तीव्र हो गई. घर के बुजुर्गों की आशंकाएं मूर्त हो रही थीं. रमण की प्रजनन क्षमता ही संदेह के दायरे में आ गई थी. किसी ने कभी सोचा भी नहीं था कि हर तरह से स्वस्थ दिखने वाले और स्वस्थ जीवनशैली जीने वाले रमण को यह समस्या होगी.

‘‘अब जब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है, तो हर चीज का समाधान है. हम किसी अच्छे क्लिनिक या अस्पताल से बात करने की सोच रहे हैं, जहां से शुक्राणु ले कर मेरे गर्भ में निषेचित किया जाएगा,’’ पूरे परिवार के सामने काजल ने रमण के हाथ को थामे हुए रहस्योद्घाटन किया.

‘‘आप कहीं और जाने की क्यों सोच रहे हैं? मेरे ही हौस्पिटल में कृत्रिम शुक्राणु निषेचन का अच्छा डिपार्टमैंट है. मैं संबंधित डाक्टर से बात कर लूंगा. सब अच्छी तरह निष्पादित हो जाएगा,’’ रोहन ने कहा.

फिर तो दोनों के मातापिता सिर जोड़े इस समस्या के निदान में जुट गए. वहीं काजल और रमण ने बालकनी से नीचे पार्क में खेलते छोटे बच्चों को देख ख्वाबों का एक लिहाफ बुन लिया.

उन दिनों काजल उस का हाथ मानो एक क्षण को भी नहीं छोड़ती थी. रमण को उस ने यह एहसास ही नहीं होने दिया कि कमी उस में है. दोनों ने इस आती रुकावट को पार करने हेतु जमीनआसमान एक कर दिया. दोनों दो शरीर एक जान हो गए थे.

‘‘लेकिन…पर…’’ अपनी सास की बनतीबिगड़ती माथे की लकीरों को काजल भांप रही थी.

‘‘उस तरीके से जन्मा बच्चा क्या पूरी तरह स्वस्थ होगा?’’ रमण के पिताजी ने पूछा था.

‘‘फिर जाने किस कुल या गोत्र का होगा वह?’’ रमण की सास ने बुझी वाणी में कहा.

‘‘देर तक एक लंबी चुप्पी छाई रही. जब चुप्पी के नुकीले नख रक्तवाहिनियों से खून टपकाने की हद तक पहुंच गए तो रमण ने ही चुप्पी तोड़ी, हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है. हम चाहते तो किसी को कुछ नहीं बताते पर आप सब को जानने का हक है.’’

‘‘एक रास्ता है. यदि घर का ही कोई स्वस्थ पुरुष अपने शुक्राणु दान करे इस हेतु तो वह अनजाना कुलपरिवार की भांति नहीं रहेगा,’’ काजल के पिताजी ने कहा.

‘‘आप सब निश्चिंत रहें, बहुत लोग इस विधि से बच्चे प्राप्त कर रहे हैं. हर नए आविष्कार को संशय और अविश्वास की दृष्टि से देखा ही जाता है. मैं खुद ध्यान रखूंगा कि सब अच्छे से संपन्न हो,’’ रोहन के इस आश्वासन ने उन्हें फौरी तौर पर थोड़ी राहत दे दी.

आखिर वर्षों बाद वह दिन आया जब काजल के गर्भवती होने की डाक्टर ने पुष्टि की. काजल ने अपनी नौकरी से अनिश्चितकालीन छुट्टी ले ली. एक बच्चे की आहट से परिवार में हर्ष की लहर दौड़ गई. आंगन में घुटनों के बल चलते शिशु की कल्पना से ओतप्रोत हरेक सदस्य अपनी तरह से खुशियां जाहिर कर रहा था. अचानक घर में काजल सब से महत्त्वपूर्ण हो गई. आखिर क्यों न होती? आती खुशियों को तो उसी ने अपने में सहेज रखा था.

रमण देखता उस की प्रिया उस से ज्यादा उस के मातापिता के साथ वक्त गुजार रही है. आजकल उस के सासससुर भी जल्दीजल्दी आते. रमण भी एक विजयी भाव से हर जाते पल को महसूस कर रहा था. पापापापा सुनने को बेचैन उस के दिल को कुछ ही दिनों में सुकून जो मिलने वाला था.

सब ठीक चल रहा था. डाक्टर हर चैकअप के बाद संतुष्टि जाहिर करते. माह दर माह बीत रहे थे. इस दौरान रमण महसूस कर रहा था कि आजकल रोहन भी कुछ ज्यादा ही जल्दीजल्दी आने लगा है. जल्दी आना तो तब भी चलता, आखिर उस का भी घर है, ऊपर से डाक्टर. सब को उस की जरूरत रहती. कभी मां को, कभी पिताजी को. बूढ़े जो हो चले थे. पर देखता जब रोहन आता, वह काजल की कुछ अधिक ही देखभाल करता. यह बात रमण को अब चुभने लगी थी. शक का बुलबुला उस के मानस में आकार पाने लगा था कि कहीं यह वीर्यदान रोहन ने तो नहीं किया है?

हालांकि उस के पास इस बात का कोई सुबूत नहीं था पर जब कमी खुद में होती है तो शायद ऐसे विचार उठने स्वाभाविक हैं.

रोहन को देखते ही उसे अपनी कमी और बड़ेबड़े स्पष्ट अक्षरों में परिलक्षित होने लगती. रोहन का काजल के साथ वक्त गुजारना उसे बड़ा ही नागवार गुजरता. धीरेधीरे उसे महसूस हो रहा था कि जब तक वह कुछ करने की सोचता है काजल के लिए, रोहन तब तक वह कर गुजरता है. रोहन सहित घर के सभी सदस्य जब आपस में हंसीमजाक कर रहे होते, रमण कोई न कोई बहाना बना वहां से खिसक लेता. धीरेधीरे रमण अपने पलकपांवड़े समेटने लगा जो बिछा रखे थे नव अंकुरण के लिए. एक अजीब सी विरक्ति हो चली उसे जिंदगी से. रमण खुद को बिलकुल अनचाहा सा महसूस कर रहा था. काजल बुलाती रह जाती. वह उस के पास नहीं जाता.

रोहन और काजल की घनिष्ठता उसे बेहद नागवार गुजर रही थी. रमण सोचता, ‘यदि बच्चे का पिता रोहन ही है तो मैं क्यों दालभात में मूसलचंद बनूं?’

इस सोच ने उस की दुनिया पलट दी थी. वह अपना ज्यादा वक्त दफ्तर में गुजारता. कभीकभी तो टूअर का बहाना कर कईकई दिनों तक घर भी नहीं आता था. गर्भावस्था के आखिर के दिन बड़े ही तकलीफदेह थे. काजल को बैठानाउठाना सब रोहन करता. रिश्ते बेहद उलझ गए थे. सिरा अदृश्य था और उलझनों का मकड़जाल पूरे शबाब पर. रमण को याद आता, जब उस की शादी हुई थी तब रोहन छोटा ही था. काजल को भाभी मां कहता था. काजल कितनी फिक्रमंद रहती थी उस की पढ़ाई के लिए.

‘छि: सब गडमड हो गया… इस से अच्छा बेऔलाद रहता.’ बेसिरपैर के खयालात रमण के सहभागी बन उस की मतिभ्रष्ट किए जा रहे थे. तभी रोहन की आवाज आई, ‘‘भैया जल्दी आइए भाभी की तबीयत खराब हो रही है. हौस्पिटल ले जाना होगा तुरंत.’’

‘‘तुम ले जाओ… मैं भला जा कर क्या करूंगा. कोई डाक्टर तो हूं नहीं. मुझे आज ही 15 दिनों के लिए हैदराबाद जाना है,’’ रमण ने उचटती हुई आवाज में कहा.

काजल को लग रहा था कि रमण की यह उदासीनता उस के अपराधभाव के कारण है कि वह होने वाले बच्चे का जैविक पिता नहीं है. डाक्टर ने पहले ही काजल को सचेत कर दिया था कि बहुत से पिता इस तरह का व्यवहार करते हैं और नकारात्मक रवैया अपनाते हैं. उस ने जानबूझ कर बखेड़ा नहीं खड़ा किया.

करीब 10 दिनों के बाद काजल भरी गोद वापस आई. इस बीच रमण एक बार भी हौस्पिटल नहीं गया. 15वें दिन वापस आया था.

मां से उसे पता चला. पहले दिन तो बच्चे को छुआ भी नहीं. काजल से बेहतर उस के मनोभावों को कौन समझता पर उस ने भी शायद अब वही रुख इख्तियार कर लिया था जो रमण ने. उस दिन उसी कोने वाले कमरे में तेज संगीत को चीरती एक मधुर सी रुनझुन संगीतमय लहरी रमण को बेचैन किए जा रही थी.

‘हां, यह तो बच्चे की आवाज है,’ रमण ने कानफोड़ू म्यूजिक औफ किया और ध्यानमग्न हो शिशु की स्वरलहरियों को सुनने लगा. जाने लड़का है या लड़की? उफ कोई चुप क्यों नहीं करा रहा. मन उद्वेलित होने लगा. एक क्षण को चुप्पी छाई फिर रुदन…

रमण कमरे में चहलकदमी करने लगा. अब तो लग रहा था जैसे बच्चे का कंठ सूख रहा हो. इस आरोहअवरोह ने शीत शिला को धीमी आंच पर पिघलाना आरंभ कर दिया. मां भी न जाने क्यों उन्हें छोड़ कर चली गईं. अभी कुछ दिन तो रहना चाहिए था.

इसी बीच उस का मोबाइल बजने लगा. जाने कौन है. नया नंबर है… सोचते उस ने कान से लगाया.

‘‘भैया, मैं रोहन बोल रहा हूं, प्लीज, फोन मत काटिएगा. मैं आज सुबह ही सिडनी, आस्ट्रेलिया आ गया हूं. यहां के एक अस्पताल में मुझे काम मिल गया है. साथ ही मैं कुछ कोर्स भी करूंगा. आप और भाभी मां ने जीवन में मेरे लिए बहुत कुछ किया है. भैया, पिछले कुछ महीनों में भाभी मां बेहद मानसिक संत्रास से गुजरी हैं. आप की बेरुखी उन्हें जीने नहीं दे रही. छोटा मुंह बड़ी बात हो जाएगी पर मैं कहना चाहूंगा कि आप ने भाभी मां को उस वक्त छोड़ दिया जब उन को सर्वाधिक आप की जरूरत थी,’’ इतना कह रोहन फूटफूट कर रोने लगा. एक लंबी सी चुप्पी पसरी रही कुछ क्षण रिसीवर के दोनों तरफ…

‘‘कितना बड़ा और समझदार हो गया है रोहन. मैं ने ही खुद को अदृश्य उलझनों और विकारों में कैद कर लिया था.’’

रमण शायद कुछ और भी कहता कि तभी रोहन बोल पड़ा, ‘‘भैया बच्चे क्यों रो रहे हैं? मुझे उन के रोने की आवाजें आ रही हैं.’’

‘‘बच्चे क्या जुड़वा हैं?’’ रमण उछल पड़ा और दौड़ पड़ा उन की तरफ. 2 नर्मनर्म गुलाबी रुई के फाहे हाथपैर फेंकते समवेत स्वर में आसमान सिर पर उठाए थे.

‘‘धन्यवाद रोहन, धन्यवाद भाई. घर जल्दीजल्दी आते रहना,’’ कह उस ने यह सोचते हुए बच्चों को छाती से लगा लिया कि क्या फर्क पड़ता है कि बच्चे रोहन के स्पर्म से पैदा हुए हैं या किसी और के. अब ये बच्चे उस के हैं. वही उन का पिता है. रोहन के होते तो शायद वह उन्हें छोड़ कर नहीं जाता. यह तसल्ली कम नही है. Romantic Story in Hindi 

Social Story : यह कैसा प्यार – युवा पीढ़ी आत्महत्या करने के लिए क्यों हो रही है प्रेरित ?

Social Story : ‘‘अब आप का बेटा खतरे से बाहर है,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘4-5 घंटे और आब्जर्वेशन में रखने के बाद उसे वार्ड में शिफ्ट कर देंगे. हां, ये कुछ दवाइयां हैं… एक्स्ट्रा आ गई हैं…इन्हें आप वापस कर सकते हैं.’’

24 घंटे के बाद डाक्टर की यह बात सुन कर मन को राहत सी मिली, वरना आई.सी.यू. के सामने चहलकदमी करते हुए किसी अनहोनी की आशंका से मैं और पत्नी दोनों ही परेशान थे. मैं ने दवाइयां उठाईं और अस्पताल के ही मेडिकल स्टोर में उन्हें वापस करने के लिए चल पड़ा.

दवाइयां वापस कर मैं जैसे ही मेडिकल स्टोर से बाहर निकला, एक अपरिचित सज्जन अपने एक साथी के साथ मिल गए और मुझे देखते ही बोले, ‘‘अब आप के बेटे की तबीयत कैसी है?’’

‘‘अब ठीक है, खतरे से बाहर है,’’ मैं ने कहा.

‘‘चलिए, यह तो बहुत अच्छी खबर है, वरना कल आप लोगों की परेशानी देखते नहीं बन रही थी. जवान बेटे की ऐसी दशा तो किसी दुश्मन की भी न हो.’’

यह सुन कर उन के दोस्त बोले, ‘‘क्या हुआ था बेटे को?’’

मैं ने इस विषय को टालने के लिए उस अपरिचित से ही प्रश्न कर दिया, ‘‘आप का यहां कौन भरती है?’’

‘‘बेटी है, आज सुबह ही उसे बेटा पैदा हुआ है.’’

‘‘बधाई हो,’’ कह कर मैं चल पड़ा.

अभी मैं कुछ ही कदम आगे चला था कि देखा मेडिकल स्टोर वाले ने मुझे 400 रुपए अधिक दे दिए हैं. उस ने शायद जल्दी में 500 के नोट को 100 का नोट समझ लिया था.

मैं उस के रुपए वापस लौटाने के लिए मुड़ा और पुन: मेडिकल स्टोर पर आ गया. वहां वे दोनों मेरी मौजूदगी से अनजान मेरे बेटे के बारे में बातें कर रहे थे.

‘‘क्या हुआ था उन के बेटे को?’’

‘‘अरे, नींद की गोलियां खा ली थीं. कुछ प्यारव्यार का चक्कर था. कल बिलकुल मरणासन्न हालत में उसे अस्पताल लाया गया था.’’

‘‘भैया, इस में तो मांबाप की गलती रहती है. नए जमाने के बच्चे हैं…जहां कहें शादी कर दो, अब मैं ने तो अपने सभी बच्चों की उन की इच्छा के अनुसार शादियां कर दीं. जिद करता तो इन्हीं की तरह भुगतता.’’

शायद उन की चर्चा कुछ और देर तक चलती पर उन दोनों में से किसी एक को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया और वे चुप हो गए. मैं ने भी ज्यादा मिले पैसे मेडिकल स्टोर वाले को लौटाए और वहां से चल पड़ा पर मन अजीब सा कसैला हो गया. संतान के पीछे मांबाप को जो न सुनना पडे़ कम है. ये लोग मांबाप की गलती बता रहे हैं, हमें रूढि़वादी बता रहे हैं, पर इन्हें क्या पता कि मैं ने खुद अंतर्जातीय विवाह किया था.

मेरी पत्नी बंगाली है और मैं हिंदू कायस्थ. समाज और नातेरिश्तेदारों ने घोर विरोध किया तो रजिस्ट्रार आफिस में शादी कर के कुछ दिन घर वालों से अलग रहना पड़ा, फिर सबकुछ सामान्य हो गया. बच्चों से भी मैं ने हमेशा यही कहा कि तुम जहां कहोगे वहां मैं तुम्हारी शादी कर दूंगा, फिर भी मुझे रूढि़वादी पिता की संज्ञा दी जा रही है.

मेरा बेटा प्यार में असफल हो कर नींद की गोलियां खा कर आत्म- हत्या करने जा रहा था. आज के बच्चे यह कदम उठाते हुए न तो आगा- पीछा सोचते हैं और न मातापिता का ही उन्हें खयाल रहता है. हर काम में जल्दबाजी, प्यार करने में जल्दबाजी, प्यार में असफल होने पर जान देने की जल्दबाजी.

हमारे कुलदीपक ने 3 बार प्यार किया और हर बार इतनी गंभीरता से कि असफल होने पर तीनों ही बार जान देने की कोशिश की. पहला प्यार इसे तब हुआ था जब यह 11वीं में पढ़ता था. हुआ यों कि इस के गणित के अध्यापक की पत्नी की मृत्यु हो गई. तब उस अध्यापक ने प्रिंसिपल से अनुरोध कर के अपनी बेटी का सुरक्षा की दृष्टि से उसी कालिज में एडमिशन करवा लिया जिस में वह पढ़ाते थे, ताकि बेटी आंखों के सामने बनी रहे.

वह कालिज लड़कों का था. अकेली लड़की होने के नाते वह कालिज में पढ़ने वाले सभी लड़कों का केंद्रबिंदु थी, पर मेरा बेटा उस में कुछ अधिक ही दिलचस्पी लेने लगा.

वह लड़की मेरे बेटे पर आकर्षित थी कि नहीं यह तो वही जाने, पर मेरा बेटा अपने दिल का हाल लिखलिख कर उसे देने लगा और उसी में एक दिन वह पकड़ा भी गया. बात लड़की के पिता तक पहुंची…फिर प्रिंसिपल तक. मुझे बुलाया गया. सोचिए, कैसी शर्मनाक स्थिति रही होगी.

प्रिंसिपल ने चेतावनी देते हुए मुझ से कहा, ‘आप का बेटा पढ़ाई में अच्छा है और मैं नहीं चाहता कि एक होनहार छात्र का भविष्य बरबाद हो, अत: इसे समझा दीजिए कि भविष्य में ऐसी गलती न करे.’

घर आ कर मैं ने बेटे को डांटते हुए कहा, ‘मैं ने तुम्हें कालिज में पढ़ने  के लिए भेजा था कि प्यार करने के लिए? आज तुम ने अपनी हरकतों से मेरा सिर नीचा कर दिया.’

‘प्यार करने से किसी का सिर नीचा नहीं होता,’ बेटे का जवाब था, ‘मैं उस के साथ हर हाल में खुश रह लूंगा और जरूरत पड़ी तो उस के लिए समाज, आप लोगों को, यहां तक कि अपने जीवन का भी त्याग कर सकता हूं.’

मैं ने कहा, ‘बेटा, माना कि तुम उस के लिए सबकुछ कर सकते हो, पर क्या लड़की भी तुम से प्यार करती है?’

‘हां, करती है,’ बेटे का जवाब था.

मैं ने कहा, ‘ठीक है. चलो, उस के घर चलते हैं. अगर वह भी तुम से प्यार करती होगी तो मैं उस के पिता को मना कर तुम दोनों की मंगनी कर दूंगा, पर शर्त यह रहेगी कि तुम दोनों अपनी पढ़ाई पूरी करोगे तभी शादी होगी.’

बेटे की इच्छा रखने के लिए मैं लड़की के घर गया और उस के पिता को समझाने की कोशिश की तो वह बडे़ असहाय से दिखे, पर मान गए कि  अगर बच्चों की यही इच्छा है तो आप जैसा कहते हैं कर लेंगे.

लेकिन जब उन की बेटी को बुला कर यही बात पूछी गई तो वह क्रोध में तमतमा उठी, ‘किस ने कहा कि मैं इस से प्यार करती हूं… अपनी कल्पना से कैसे इस ने यह सोच लिया. आप लोग कृपा कर के मेरे घर से चले जाइए, वैसे ही व्यर्थ में मेरी काफी बदनामी हो चुकी है.’

मैं अपमानित हो कर बेटे को साथ ले कर वहां से चला आया और घर आते ही गुस्से में मैं ने उसे कस कर एक थप्पड़ मारा और बोला, ‘ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही भला है.’

रात के करीब 12 बजे होंगे, जब बेटे ने जा कर अपनी मां को जगाया और बोला, ‘मां, मैं मरना नहीं चाहता हूं. मुझे बचा लो.’

उस की मां ने नींद से जग कर देखा तो बेटे ने अपने हाथ की नस काटी हुई थी और उस से तेजी से खून बह रहा था. पत्नी ने रोतेरोते मुझे जगाया. हम लोग तुरंत उसे ले कर नर्सिंग होम गए. वहां पता चला कि हाथ की नस कटी नहीं थी. खैर, मरहम पट्टी कर के उसे घर भेज दिया गया.

पत्नी का सारा गुस्सा मुझ पर फूट पड़ा, ‘जवान बेटे को ऐसे मारते हैं क्या? आज उसे सही में कुछ हो जाता तो हम लोग क्या करते?’

खैर, अब हम दोनों बेटे के साथ साए की तरह बने रहते. मनोचिकित्सक को भी दिखाया. किसी तरह उस ने परीक्षा दी और 12वीं में 62 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. अब समय आया इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की कोचिंग का. प्यार का भूत सिर पर से उतर चुका था. बेटा सामान्य हो गया था. पढ़ाई में मन लगा रहा था. हम लोग भी खुश थे कि इंजीनियरिंग में प्रवेश परीक्षाओं के पेपर ठीकठाक हो गए थे. तभी मेरे सुपुत्र दूसरा प्यार कर बैठे. हुआ यों कि पड़ोस में एक पुलिस के सब- इंस्पेक्टर ट्रांसफर हो कर किराएदार के रूप में रहने को आ गए. उन की 10वीं में पढ़ने वाली बेटी से कब मेरे बेटे के नयन मिल गए हमें पता नहीं चला.

कुल 3 हफ्ते के प्यार में बात यहां तक बढ़ गई कि एक दिन दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया, क्योंकि लड़की को देखने के लिए दूसरे दिन कुछ लोग आने वाले थे, पर उन का भागने का प्लान असफल रहा और वे पकड़े गए. लड़की के पिता ने बेटी की तो लानत- मलामत की ही दोचार पुलिसिया हाथ मेरे कुलदीपक को भी जड़ दिए और पकड़ कर मेरे पास ले आए.

‘समझा लीजिए अपने बेटे को. अगर अब यह मेरे घर के आसपास भी दिखा तो समझ लीजिए…बिना जुर्म के ही इसे ऐसा अंदर करूंगा कि इस की जिंदगी चौपट हो कर रह जाएगी.’

मैं कुछ बोला तो नहीं पर उसे बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखा. वह भी चुपचाप नजरें झुकाए अपने कमरे में चला गया.

रात को बेटी और दामाद अचानक आ गए. उन लोगों ने हमें सरप्राइज देने के लिए कोई सूचना न दी थी. थोड़ी देर तक इधरउधर की बातों के बाद मेरी बेटी बोली, ‘पापा, राहुल कहां है…सो गया क्या?’

राहुल की मां बोली, ‘शायद, अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा होगा. जा कर बुला लाती हूं.’

‘रहने दो मां, मैं ही जा रही हूं उसे बुलाने,’ बेटी ने कहा.

ऊपर जा कर जब उस ने उस के कमरे का दरवाजा धकेला तो वह खुल गया और राहुल अचकचा कर बोला, ‘दीदी, तुम कैसे अंदर आ गईं, सिटकनी तो बंद थी.’

बेटी ने बिना कुछ बोले राहुल के गाल पर कस कर चांटा मारा और राहुल को स्टूल से नीचे उतार कर रोने लगी. दरअसल, राहुल कमरा बंद कर पंखे से लटक कर अपनी जान देने जा रहा था.

‘मुझे मर जाने दो, दीदी. मेरी वजह से पापा को बारबार शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

‘तुम्हारे मरने से क्या उन का सिर गर्व से ऊंचा उठ जाएगा. अरे, अपना व्यवहार बदलो और जीवन में कुछ बन कर दिखाओ ताकि उन का सिर वास्तव में गर्व से ऊंचा हो सके.’

प्रवेश परीक्षाएं अच्छी हुई थीं.

इंजीनियरिंग कालिज में राहुल को प्रवेश मिल गया क्योंकि अच्छे नंबरों से उस ने परीक्षाएं पास की थीं. मित्रमंडली का समूह, जिन में लड़केलड़कियां सभी थे, अच्छा था. हम लोग निश्चिंत हो चले थे. वह खुद भी जबतब अपने प्रेमप्रसंगों की खिल्ली उड़ाता था.

इंजीनियरिंग का तीसरा वर्ष शुरू होते ही उस मित्रमंडली में से एक लड़की से राहुल की अधिक मित्रता हो गई. वे दोनों अब अकसर ग्रुप के बाहर अकेले भी देखे जाते. मैं एकआध बार इन की पढ़ाई को ले कर सशंकित भी हुआ, पर लड़की बहुत प्यारी थी. वह हमेशा पढ़ाई और कैरियर की ही बात करती, साथ ही साथ मेरे बेटे को भी प्रोत्साहित करती और जबतब वे दोनों विदेश साथ जाने की बात करते थे.

विदेश जाने के लिए दोनों ने साथ मेहनत की, साथ परीक्षा दी, पर लड़की क्वालीफाई कर गई और राहुल नहीं कर सका. लड़की को 3 साल की पढ़ाई के लिए विदेश जाने की खबर से राहुल बहुत टूट गया. हालांकि लड़की ने उसे बहुत समझाया कि कोई बात नहीं, अगली बार क्वालीफाई कर लेना.

धीरेधीरे लड़की के विदेश जाने का समय नजदीक आने लगा और राहुल को उसे खोने का भय सताने लगा. वह बारबार उस से विवाह की जिद करने लगा. लड़की ने कहा, ‘देखो, राहुल, हम लोगों में बात हुई थी कि शादी हम पढ़ाई के बाद करेंगे, तो इस प्रकार हड़बड़ा कर शादी करने से क्या फायदा? 3 साल बीतते समय थोड़ी न लगेगा.’

राहुल जब उसे न समझा सका तो हम लोगों से कहने लगा कि विधि के पापा से बोलिए न. शादी नहीं तो उस के जाने के पहले मंगनी ही कर दें.

बच्चों के पीछे तो मातापिता को सबकुछ करना पड़ता है. मैं विधि के घर गया और उस के मातापिता से बात की तो वे बोले, ‘हम लोग तो खुद यही चाहते हैं.’

यह सुन कर विधि बोली, ‘पर मैं तो नहीं चाहती हूं…क्यों आप लोग मंगेतर या पत्नी का ठप्पा लगा कर मुझे भेजना चाहते हैं या आप लोगों को और राहुल को मुझ पर विश्वास नहीं है? और अगर ऐसा है तो मैं कहती हूं कि यह संबंध अभी ही खत्म हो जाने चाहिए, क्योंकि वास्तव में 3 साल की अवधि बहुत होती है. उस के बाद घटनाक्रम किस प्रकार बदले कोई कह नहीं सकता. क्या पता मेरी विदेश में नौकरी ही लग जाए और मैं वापस आ ही न सकूं. इसलिए मैं सब बंधनों से मुक्त रहना चाहती हूं.’

मैं और पत्नी अपना सा मुंह ले कर लौट आए. भारी मन से सारी बातें राहुल को बताईं…साथ में यह भी कहा कि वह ठीक कहती है. तुम लोगों का प्यार सच्चा होगा तो तुम लोग जरूर मिलोगे.

‘मैं सब समझ रहा हूं,’ राहुल बोला, ‘जब से उस के विदेश जाने की खबर आई है वह मुझे अपने से कमतर समझने लगी है. जाने दो, मैं कोई उस के पीछे मरा जाता हूं. बहुत लड़कियां मिलेंगी मुझे.’

परसों रात को विधि का प्लेन गया और परसों ही रात को राहुल ने नींद की गोलियां खा लीं. मैं और राहुल की मां एक शादी में गए हुए थे. कल शाम को लौट कर आए तो बेटे की यह हालत देखी. तुरंत अस्पताल ले कर आए. तभी कानों में शब्द सुनाई पड़े, ‘‘पापा, चाय पी लीजिए.’’

सामने देखा तो बेटी चाय का कप लिए खड़ी थी. मैं ने उस के हाथों से कप ले लिया.

बेटी बोली, ‘‘पापा, क्या सोच रहे हैं. राहुल अब ठीक है. इतना सोचेंगे तो खुद बीमार पड़ जाएंगे.’’

मैं ने चाय की चुस्की ली तो विचारों ने फिर पलटा खाया. यह कोई सिर्फ मेरे बेटे की ही बात नहीं है. आज की युवा पीढ़ी हो ही ऐसी गई है. हर कुछ जल्दी पाने की ललक और न पाने पर हताशा. समाचारपत्र उठा कर देखो तो ऐसी ही खबरों से पटा रहता है. प्यार शब्द भी इन लोगों के लिए एक मजाक बन कर रह गया है. अभी हमारे एक हिंदू परिचित हैं. उन की बेटी ने मुसलमान से शादी कर ली. दोनों ही पक्षों में काफी विरोध हुआ. अंतर्जातीय विवाह तो फिर भी पचने लगे हैं पर अंतर्धर्मीय नहीं. मैं ने अपने परिचित को समझाया.

‘जब बच्चों ने विवाह कर ही लिया है तब आप क्यों फालतू में सोचसोच कर हलकान हो रहे हैं. खुशीखुशी आशीर्वाद दे दीजिए.’

एक साल में उन के यहां बेटा भी पैदा हो गया. पर नाम को ले कर दोनों पतिपत्नी में जो तकरार शुरू हुई तो तलाक पर आ कर खत्म हुई. बात सिर्फ इतनी थी कि पिता बेटे का नाम अमन रखना चाहता था और मां शांतनु. दोनों के मातापिता ने समझाया…दोनों शब्दों का अर्थ एक होता है, चाहे जो नाम रखो, पर वे लोग न समझ पाए और आजकल बच्चा किस के पास रहे इस को ले कर दोनों के बीच मुकदमा चल रहा है.

‘‘नानू, नानू, यह आयुषी है,’’ मेरा 6 वर्षीय नाती एक प्यारी सी गोलमटोल लड़की से मेरा परिचय कराते हुए कहता है.

मैं अपने विचारों की दुनिया से बाहर आ कर थोड़ा सहज हो कर पूछता हूं, ‘‘आप की फ्रैंड है?’’

‘‘नो नानू, गर्लफ्रैंड,’’ मेरा नाती कहता है.

मैं कहना चाहता हूं कि गर्लफ्रैंड के माने जानते हो? पर देखता हूं कि गर्लफ्रैंड कह कर परिचय देने पर उस बच्ची के गाल आरक्त हो उठे हैं और मैं खुद ही इस भूलभुलैया में फंस कर चुप रह जाता हूं. Social Story

Family Story : बंधन कच्चे धागों का

Family Story : पूजा अकसर अपनी सहेलियों व दोस्तों से कहा करती थी कि मैं सारी उम्र जगजीत सिंह की गजलों, गुलजार सिंह की गजलों और गुलजार की फिल्मों के सहारे बिताऊंगी. ये दोनों कमरे में हों तो कोई अकेला नहीं हो सकता.

संजय वर्मा को पूजा की बातें और अंदाज दोनों इस कदर पसंद थे कि कई बार वह उस से शादी की बात करने की सोच कर भी कह नहीं सका क्योंकि हिम्मत नहीं जुटा पाया था.

पूजा अकसर कैंटीन में चाय के साथ समोसे या पकौड़े खाते हुए अपने दोस्तों को अपने साथ बीती हुईं सड़कछाप आशिकों की कहानियां सुनाया करती.

‘‘मैं कल घर जा रही थी. दोपहर का समय था. 2 लड़के बेसुरा राग अलापते हुए बगल से गुजरे, ‘तुम हम से दोस्ती कर लो, ये हसीं गलती कर लो.’ मैं ठीक उन के सामने जा कर खड़ी हो गई और कहा, ‘ठीक है, चलो, दोस्ती करते हैं.’ मेरे इतना कहते ही वे दोनों लड़के सकपका गए और माफी मांगने लगे.’’

सीमा ने कहा, ‘‘तुम्हें क्या पड़ी थी इस तरह प्रतिक्रिया जाहिर करने की?’’

‘‘क्या मैं सब्जी या गोबर हूं जो प्रतिक्रिया व्यक्त न करती. मैं उन लड़कों को छेड़खानी का वह मजा चखाती कि याद रखते.’’

‘‘क्या कर लेतीं तुम?’’

‘‘मैं उन के ‘आई कार्ड’ रखवा लेती. उन को यूनिवर्सिटी से निकलवा देती…’’

संजय बीच में बोला, ‘‘पूजाजी, आप जीवन को इतनी सख्ती से क्यों लेती हैं. क्या हुआ किसी का मन थोड़ा आवारा हो उठा तो.’’

‘‘नहीं, मु झे आवारगी पसंद नहीं. वह तो उन्होंने माफी मांग ली वरना…’’

‘‘आप को तो खुद संगीत से लगाव है.’’

‘‘हां, लेकिन सड़कछाप संगीत से नफरत है.’’

पूजा को खुद पता नहीं कि इधर वह कुछ ज्यादा ही सख्त मिजाज होती जा रही है. अगर कक्षा में कोई विषय अधूरा है तो वह बुखार में भी दवा की शीशी पर्स में डाल कर कक्षा में आ जाती. ऐसा लगता है जैसे इस एक प्राणी में अनेक और प्राणी आ बसे हैं- असफल समाजसुधारक, अकड़ू अफसर, अडि़यल क्लर्क और अधेड़ यौवना.

लेकिन 2-3 साल पहले तक ऐसा नहीं था. तब उस की अनेक सहेलियां और कई मित्र थे. दिन में जब यूनिवर्सिटी से लौटती तो उस की नजर अपने कंपाउंड के गुलमोहर पर पड़ती जहां अकसर कोई न कोई विद्यार्थी जोड़ा पढ़ाई के बहाने प्यार करता होता. प्रकृति के हरेपन के बीच उन की गुलाबी गुफ्तगू घंटों चलती.

पूजा को अकसर पुराने बीते दिन याद आते. कभी वह अपने 16वें तो कभी 21वें साल की यादों में डूब जाती. उसे लगता जैसे कल की ही बात थी जब वह रिकशा में बैठ कालेज जाने लगती तो उस के तीनों भाई उसे घेर लेते. एक रिकशे के आगे पायलट बन जाता, दूसरा, बगल में गार्ड और तीसरा, पीछे फुटमैन. तब इस बैंक रोड पर क्या मजाल जो कभी कोई फब्ती कसे या उसे घूरे. कालेज की अन्य लड़कियां जब उसे छेड़खानी के किस्से सुनातीं तो उसे अचंभा होता कि क्या लड़के ऐसे भी होते हैं? कभीकभी वह शीशे में अपनेआप को देखते हुए सवाल करने लगती, ‘क्या मैं सुंदर नहीं हूं? मु झे कोई कुछ क्यों नहीं कहता?’

एमएससी तक पहुंचतेपहुंचते पूजा की शादी के लिए कई प्रस्ताव आ चुके थे पर भाइयों को कोई भी लड़का अपनी बहन के काबिल नहीं लगा. एकाएक उस के पिताजी चल बसे. उन के स्थान पर उसे नौकरी मिल गई. इस के साथ ही जिंदगी की घड़ी कुछ अलग ढंग से टिकटिक करने लगी.

अब वह घर की बुजुर्ग थी. उस ने अपनी शादी का इरादा ताक पर रख भाइयों के भविष्य पर ध्यान दिया.

इस के बाद जिंदगी में कई  झटके लगे. मां का भी निधन हो गया. नए मिजाज की भाभियों का घर में आगमन, फिर भतीजेभतीजियों की चेंचेंपेंपें के साथ घर में कलह. अगर यह मकान पूजा के नाम न होता तो उसे यहां से कब का निकाल दिया गया होता. एकएक कर के सभी भाभियां अपने पति और सामान के साथ विदा हुईं. ऊपर से यह आरोप कि ये इतना लंबाचौड़ा मकान ले कर अकेली बैठी हैं और हम किराए के घरों में पड़े हैं.

पूजा किसकिस से कहे कि भाई सिर्फ नाम को अलग घर में रहते हैं. उन की आवाजाही और दखलंदाजी में कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा था.

बड़े भाई के दोनों बच्चे स्कूल के बाद सीधे उस के पास ही आते हैं. वे यहीं बैठ कर होमवर्क कर के वीडियो गेम खेलते और चाटकुल्फी खाने का मजा लेते. वापस जाते समय बच्चे ऐसे रोने लगते जैसे अपने घर नहीं, पराए घर जा रहे हों.

गरमी की छुट्टियों में जैसे ही भाभी का इरादा मां या अपने भाई के घर जाने का बनता, दोनों बच्चे तुरंत कह देते कि हम तुम्हारे साथ नहीं जाएंगे, बूआ के पास रह लेंगे. भाभी तुनक कर बच्चों का गाल नोचती और कहती, ‘बूआ के यहां लड्डू बंट रहे हैं क्या?’

तीनों भाभियों के तेवर इस बात पर तीखे बने रहते कि पूजा की खोजखबर रखने में भाइयों को कोई आलस नहीं होता था. छोटे भाई की शादी को सिर्फ डेढ़ साल हुआ था. छोटी भाभी शाम को तैयार हो कर अपने पति से कहती, ‘चलो, घूम आएं.’

पति साथ चल देता पर स्कूटर उस का पूजा के घर आ कर रुक जाता.

वैसे पूजा कहीं कम ही आतीजाती थी. बहुत जरूरी होने पर ही कहीं जाती थी. उस दिन वह चित्रकला प्रदर्शनी देखने चली गई थी. आने में देरी हुई तो भाई नंबर 3 आपे से बाहर हो गया, ‘तुम इतनी रात को बाहर क्यों गईं? जमाना बहुत खराब है, दीदी, तुम जानती नहीं.’

पूजा ने उस के आगे अपनी कलाईघड़ी कर दी और बोली, ‘तू तो बेवजह डर रहा है, अभी सिर्फ 9 बजे हैं.’

भाई गुर्राया, ‘नहीं, बस, कह दिया, 5 बजे के बाद तुम घर से निकलोगी नहीं.’

‘मैं इतनी बड़ी हो गई हूं, बता, मेरी चौकीदारी तू करेगा या तेरी चौकीदारी मैं?’

‘दीदी, मजाक की बात नहीं, वारदात कभी भी हो सकती है.’ और फिर दीदी, आप के हाथों में मोटेमोटे 3 तोले के कड़े देख कर तो कोई भी लूट लेगा,’ भाभी ने कह डाला.

भाई से हुई तूतूमैंमैं पूजा को बिलकुल सामान्य लग रही थी पर उस की बीवी की बात उसे डंक मार गई.

‘हमारे दफ्तर में तो लड़कियां इस से भी भारी कंगन पहन कर आती हैं,’ पूजा ने अपनी भाभी को जवाब दिया.

पूजा की कलाइयों में पड़े कंगनों का इतिहास यह था कि ये कंगन उस की मां की यादगार थे. मां इन्हें हमेशा पहने रहतीं. उन के मरने के बाद उन का गहनों का बक्सा पूजा ने तीनों भाभियों में बांट दिया पर मां के हाथों में पड़े ये कंगन पूजा नहीं दे पाई. इसलिए जबतब भाभियों को ये कंगन खटकते रहते.

पिताजी के मरने के बाद मझली भाभी उन की आरामकुरसी ले जाना चाहती थी. मां ने टोका, ‘नहीं बहू, यह बरामदे में रखी है तो मुझे लगता है वे बैठे हैं.’

म झले भाई ने जवाब दिया, ‘इसीलिए तो हम इसे कमरे में रखना चाहते हैं.’

मां नहीं मानीं. उस समय तो भाई चुप हो गए पर मां के चले जाने पर वे एक दिन आ कर आरामकुरसी ले गए. जब तक भाइयों के नए घर सामान से भर नहीं गए, वे महमूद गजनवी की तरह हर हफ्ते आते और कोई न कोई चीज उठा ले जाते.

ऐसे तजरबों ने पूजा को तल्ख बना दिया. इस में सब से खराब बात यह थी कि पूजा के अंदर दूसरों की अच्छाइयां देखने, परखने की जो कुदरती क्षमता थी वह खत्म होने लगी और वह हर वक्त आशंकाओं से घिरी रहती.

वैसे भाइयों के लिए अभी भी उस का हृदय जबतब उमड़ता रहता था. भाइयों को ही फुरसत नहीं थी. अकसर वे शाम को सचल दस्ते की तरह आते, बहन को घर में देख आश्वस्त हो लौट जाते.

रक्षाबंधन पूजा के घर का बड़ा त्योहार था. जब पूजा छोटी थी तो हफ्तों पहले तीनों भाइयों की कलाइयों की नाप ले कर फूलों की राखियां बनाती. बड़ी होने पर न उस के पास इतना समय था, न धीरज. फिर भी वह जयपुर की बनी कलावस्तु की राखियां ला कर फल, मिठाई से थाल सजा कर भाइयों का इंतजार करती. सारा दिन आमोदप्रमोद में व्यतीत होता. लेकिन धीरेधीरे इस त्योहार का छोटा रूप सामने आने लगा. कई बार भाई भाभी व बच्चों के साथ आते पर कई बार भाभी और बच्चे साथ न आ पाते.

पूजा यही सोच कर खुश थी कि उस के भाई अभी भी उसे एकदम से भूले नहीं हैं.

इस बार सभी भाई आए, लेकिन अलगअलग.

भाई नंबर एक ने कहा, ‘‘दीदी, औफिस में आज छुट्टी नहीं है. राखी बांध कर जल्दी से खाना खिला दो तो मेरी एक छुट्टी बच जाएगी.’’

पूजा ने जल्दी से भाई की कलाई पर प्यार का बंधन बांधा, मुंह मीठा कराया और घर ले जाने के लिए मिठाई का डब्बा दिया.

भाई उल झन में पड़ गया और बोला, ‘‘इस समय तो मैं सीधा दफ्तर जाऊंगा. तू डब्बा रख ले, मैं शाम को वापसी में इसे ले जाऊंगा.’’

भाई नंबर 2 बीवीबच्चों समेत आया. पूजा ने राखी बांधने के बाद खाना लगाने का उपक्रम किया. भाभी के माथे पर बल पड़ गए.

भाई बोला, ‘‘दीदी, अभी इन्हें अपने घर जा कर भाइयों को राखी बांधनी है. वहीं खानापीना होगा.’’

पूजा ने कहा, ‘‘चलो, खीर तो खाते जाओ.’’

भाभी ने यह कह कर खीर भी नहीं चखी कि आज उस का व्रत है.

छोटा भाई अकेला आया और बोला, ‘‘दीदी, जल्दी से राखी बांध दो, मु झे वापस घर जाना है.’’

‘‘अभी तो आए हो, ऐसी क्या जल्दी है,’’ पूजा बोली.

‘‘बिंदू को अकेले डर लगता है. पड़ोस के लोग सब बाहर गए हुए हैं.’’

‘‘उसे भी ले आते. अकेला क्यों छोड़ आए?’’ पूजा ने कहा.

‘‘वह सुबह से नाराज है क्योंकि वह अपने भाइयों को राखी बांधने के लिए देहरादून नहीं जा सकी. उस का सारा कार्यक्रम मु झे छुट्टी न मिलने की वजह से बिगड़ गया. वैसे मैं ने कल ही स्पीडपोस्ट से उस की राखियां तो भेज दी हैं पर दुख तो होता ही है,’’ राखी बंधवाते ही भाई नंबर 3 चला गया.

पूजा का मन भारी हो गया. उसे लगा, शहर में ऐसा कोई नहीं जिसे वह अपना सगा कह सके. उस के ये तीनों भाई रक्षाबंधन के दिन भी ठीक से भाई नहीं बन सकते. वे इस कदर अपनी पत्नियों के गुलाम और अपने अफसरों के सेवक हैं कि बहन उन की सूची में शामिल ही नहीं है. हक जमाने, अंकुश लगाने के सिवा और इन का उस से कोई नाता नहीं है.

मेज पर 3 लिफाफे पड़े थे मानो त्योहार के 3 चंदे हों. पूजा ने खुद आज की छुट्टी ले रखी थी. उसे अपनी छुट्टी और स्थिति दोनों काफी बेतुकी लगीं. इस समय उन छोटीछोटी बातों को याद करने से कोई फायदा नहीं है, यह सोच कर कि उस के जीवन की रफ्तार में ये तीनों भाई 3 गतिरोधक थे, 3 लाल बत्तियां. 3 ताले.

पूजा ने दरवाजा बंद किया और टेपरिकौर्डर पर जगजीत सिंह की गजल सुनने लगी. Family Story

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