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Family Story : आस पूरी हुई – क्या पूरी हो पाई कजरी की आस

Family Story : रमेश्वर आज अपनी पहली कमाई से सोमरू के लिए नई धोती और कजरी के लिए  चप्पल लाया था. अपनी मां को उस ने कई बार राजा ठाकुर के घर में नईनई लाललाल चप्पलों को ताकते देखा था. वह चाहता था कि उस के पिता भी बड़े लोगों की तरह घुटनों के नीचे तक साफ सफेद धोती पहन कर निकलें, पर कभी ऐसा हो न सका था.

कजरी ने धोती और चप्पल संभाल कर रख दी और बेटे को समझा दिया कि कभी शहर जाएंगे तो पहनेंगे. गांव में बड़े लोगों के सामने सदियों से हम छोटी जाति की औरतें चप्पल पहन कर नहीं निकलीं तो अब क्या निकलेंगी.

कजरी मन ही मन सोच रही थी कि इन्हीं चप्पलों की खातिर राजा ठाकुर के बेटे ने कैसे उस से भद्दा मजाक किया था और घुटनों से नीचे तक धोती पहनने के चलते भरी महफिल में सोमरू को नंगा किया गया था.

कजरी और सोमरू धौरहरा गांव में रहते थे. सोमरू यानी सोनाराम और कजरी उस की पत्नी.

सोमरू कहार था और अपने पिता के जमाने से राजा ठाकुरों यहां पानी भरना, बाहर से सामान लाना, खेतखलिहानों में काम करना जैसी बेगारी करता था.

राजा ठाकुरों की गालीगलौज, मारपीट  जैसे उस के लिए आम बात थी. कजरी भी उस के साथसाथ राजा ठाकुरों के घरों में काम करती थी.

कजरी थी सलीकेदार, खूबसूरत और फैशनेबल भी. काम ऐसा सलीके से करती थी कि राजा ठाकुरों की बहुएं भी उस के सामने पानी भरती थीं.

एक दिन आंगन लीपते समय कजरी घर की नई बहू की चमचमाती नईनई चप्पलें उठा कर रख रही थी कि राजा ठाकुर के बड़े बेटे की नजर उस पर पड़ गई. उस ने कहा, ‘‘कजरी, चप्पल पहनने का शौक हो रहा है क्या…? बोलो तो तुम्हारे लिए भी ला दें, लेकिन सोमरू को मत बताना. हमारीतुम्हारी आपस की बात रहेगी.

‘‘तुम्हारे नाजुक पैर चप्पल बिना अच्छे नहीं लगते. सब के सामने नहीं पहन सकती तो क्या हुआ… मेरा कमरा है न… रात को मेरे कमरे में पहन कर आ जाना. कोई नहीं देखेगा मेरे अलावा.’’

कजरी का मन हुआ कि चप्पल उस के मुंह पर मार दे, पर क्या करती… एक भद्दी सी गाली दे कर चुप रह गई.

कजरी आंगन लीप कर हाथ धोने बाहर जा रही थी तभी देखा कि राजा साहब सोमरू को बुला रहे थे.

सोमरू घर के बाहर झाड़ू लगा रहा था. राजा ठाकुर भरी महफिल के सामने गरजे, ‘‘अबे सोमरू, बहुत चरबी चढ़ गई है तुझे. कई दिन से देख रहा हूं तेरी धोती घुटनों से नीची होती जा रही है. राजा बनने का इरादा है क्या?

‘‘जो काम तुम्हारे बापदादा ने नहीं किया, तुम करने की जुर्रत कर रहे हो? लगता है, जोरू कुछ ज्यादा ही घी पिला रही है…’’ और राजा साहब ने सब के सामने उस की धोती खोल कर फेंक दी.

भरी सभा में यह सब देख कर लोग जोरजोर से हंसने लगे. एक गरीब आदमी सब के सामने नंगा हो गया था. सोमरू को तो जैसे काठ मार गया. सोमरू इधरउधर देख रहा था कि कहीं कजरी उसे देख तो नहीं रही. दरवाजे के पीछे खड़ी कजरी को उस ने खुद देख लिया. वह जमीन में गड़ गया.

कजरी दरवाजे की ओट से सब देख रही थी. शरीर जैसे जम सा गया था. वह जिंदा लाश की तरह खड़ी थी.

कजरी और सोमरू एकदूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे. आखिर क्या कहते? कैसे दिलासा देते? दोनों अंदर ही अंदर छटपटा रहे थे.

कजरी ने सोमरू की थाली जरूर लगाई, पर वह रातभर वैसी ही पड़ी रही. दोनों पानी पी कर लेट गए, पर नींद किस की आंखों में थी? उन का दर्द इतना साझा था कि बांटने की जरूरत न थी.

कजरी का दर्द पिघलपिघल कर उस की आंखों से बह रहा था, पर सोमरू… वह तो पत्थर की मानिंद पड़ा था. कजरी के सामने बारबार अपने पति का भरी सभा में बेइज्जत किया जाना कौंध जाता था और सोमरू को कजरी की डबडबाई आंखें नहीं भूल रही थीं.

कजरी और सोमरू की जिंदगी यों ही बीत रही थी. बेटे रमेश्वर को उन्होंने जीतोड़ मेहनतमजदूरी, कर्ज ले कर पढ़ायालिखाया था.

सोमरू चाहता था कि उस के बेटे को कम से कम ऐसी जलालत भरी जिंदगी न जीनी पड़े. जिंदा हो कर भी मुरदों जैसे दिन न काटने पड़ें.

रमेश्वर पढ़लिख कर एक स्कूल में टीचर हो गया था और शहर में ही रहने लगा था. सोमरू चाहता भी नहीं था कि वह गांव लौटे. उन का बुढ़ापा जैसेतैसे कट ही जाएगा, पर बेटा खुशी और इज्जत से तो रहेगा.

सोमरू की एक आस मन में ही दबी थी कि वह और कजरी साथ घूमने जाएं.  कजरी अपनी मनपसंद चप्पल पहन कर उस के साथ शहर की चिकनी सड़क पर चले, जो रमेश्वर उस के लिए लाया था.

सोमरू अपने मन की आस किसी के सामने कह भी नहीं सकता था और कजरी को तो बिलकुल भी नहीं बता सकता था. कहां खाने के लाले पड़े थे और वह घूमने के बारे में सोच रहा है.

जमुनिया ताल के किनारे कजरी एक दिन बरतन धो रही थी. सोमरू भी वहीं बैठा था. उस दिन सोमरू ने अपने मन की बात कजरी को बताई, ‘‘बुढ़ापा आ गया  कजरी, पर मन की एक हुलस आज तक पूरी न कर पाया. चाहता था कि कसबे में चल रहे मेले में दोनों जन घूम आएं.’’

सोमरू एक बार उसे चप्पल पहने देखना चाहता था, जैसे नई ठकुराइन अपने ब्याह में पहन कर आई थीं.

रमेश्वर कितने प्यार से लाया था अपनी पहली कमाई से, पर इस गांव में यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. जिंदगी बीत गई. अब जाने कितने दिन बचे हैं. एक बार मेला भी देख लें. कितना सुना है उस के बारे में. यह इच्छा पूरी हो जाए, फिर चाहे मौत ही क्यों न आ जाए, शिकायत न होगी.

कजरी को लगा कि सोमरू का दिमाग खिसक गया है. यह कोई उम्र है चप्पल पहन कर घूमने की. सारी जिंदगी नंगे पैर बीत गई. जब उम्र थी तब तो कभी न कहा कि चलो घूम आएं. अब बुढ़ापे में घूमने जाएंगे. उस समय तो कजरी ने कुछ न कहा, पर कहीं न कहीं सोमरू ने उस की दबी इच्छा जगा दी थी.

रात में कजरी सोमरू को खाना खिलाते समय बोली, ‘‘कहते तो तुम ठीक ही हो. जिंदगीभर कमाया और इस पापी पेट के हवाले किया. कुछ पैसा जोड़ कर रखे थे कि बीमारी में काम आएगा, पर लगता है कि अब थोड़ा हम अपने लिए भी जी लें, खानाकमाना तो मरते दम तक चलता ही रहेगा. पेट ने कभी बैठने दिया है इनसान को भला?’’

दोनों ने अगले महीने ही गांव से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ओरछा के मेले में जाने की योजना बनाई.

पूरे महीने दोनों तैयारी करते रहे. पैसा इकट्ठा किया. कपड़ेलत्ते संभाले. गांव वालों को बताया. बेटों को बताया. नातेरिश्तेदारों को खबर की कि कोई साथ में जाना चाहे तो उन के साथ चले. आखिर कोई संगीसाथी मिल जाएगा तो भला ही होगा. जाने का दिन भी आ गया, पर कोई तैयार न हुआ.

गांव से 4 किलोमीटर पैदल जा कर एक कसबा था, जहां से ओरछा के लिए सीधी ट्रेन जाती थी. दोनों बूढ़ाबूढ़ी भोर में ही गांव से पैदल चल दिए.

स्टेशन तक पहुंचतेपहुंचते सूरज भी सिर पर आ गया था. 11 बजे दोनों ट्रेन में खुशीखुशी बैठ गए. आखिर बरसों की साध पूरी होने जा रही थी.

कजरी घर से ही खाना बना कर लाई थी. दोनों ने खाया और बाहर का नजारा देखतेदेखते जाने कब सफर पूरा हो गया, पता ही न चला.

रात में दोनों एक धर्मशाला के बाहर ही सो गए. अगले दिन सुबह मेले में शामिल हुए. पूरा दिन वहीं गुजारा. कजरी ने एकसाथ इतनी दुकानें कभी न देखी थीं. हर दुकान के सामने खड़ी हो कर वह वहां रखे चमकते सामान को देखती और अपनी गांठ में बंधे रुपयों पर हाथ फेरती. दुकान में घुस कर दाम पूछने की हिम्मत न पड़ती.

एक दुकान में दुकानदार के बहुत बुलाने पर सोमरू और कजरी घुसे. कजरी वहां रखी धानी रंग की चुनरी देख कर पीछे न हट सकी.

सोमरू ने उस के लिए डेढ़ सौ रुपए की वह चुनरी खरीद ली और दुकान से बाहर आ गए. अब सोमरू के पास कुछ ही पैसे बचे थे. वह सोच रहा था कि कजरी के पास भी कुछ रुपए होंगे. उस ने पूछा तो कजरी ने हां में सिर हिला दिया.

कजरी ने जातबिरादरी में बांटने के लिए टिकुली, बिंदी, फीता, चिमटी के अलावा और भी बहुत सा सामान खरीदा. आखिर वह इतने बड़े मेले में आई थी. पासपड़ोसी, नातेरिश्तेदार सब को कुछ न कुछ देना था. खाली हाथ वापस कैसे जाती.

कजरी आज जब चप्पल पहन कर चल रही थी, सोमरू को रानी ठाकुराइन के गोरेगोरे महावर सजे पैर याद आ गए. कजरी के पैर आज भी गोरे थे और सुहागन होने के चलते महावर उस के पैरों में हमेशा लगा रहता था.

कजरी लाललाल चप्पल पहन कर जैसे आसमान में उड़ रही थी. आज उसे किसी के सामने चप्पल उतारने की जरूरत न थी. लोग उसे देख रहे थे और वह लोगों को.

सोमरू ने आज घुटनों तक धोती पहनी थी. वह आज इतना खुश था, जितना अपनी शादी में भी न हुआ था.

आज 70 बरस की कजरी उस के साथसाथ पक्की सड़क पर सब के सामने लाललाल चप्पल पहने, धानी रंग की चुनरी ओढ़े ठाट से चल रही थी, मानो किसी बड़े घर की नईनई बहू ससुराल से मायके आई हो.

सोमरू आज अपनेआप को दुनिया का सब से रईस आदमी समझ रहा था.

दोनों घर वापस जाने के लिए स्टेशन आ गए. रात स्टेशन पर ही बितानी थी. ट्रेन सवेरे 5 बजे की थी. दोनों ने पास में बंधा हुआ खाना खाया और वहीं स्टेशन पर आराम करने लगे.

सोमरू सुबह टिकट लेने के लिए उठा. कजरी से बोला, ‘‘पैसे निकाल. टिकट ले लिया जाए. ट्रेन के आने का समय भी हो रहा है.’’

दोनों ने अपनेअपने पैसे निकाले और गिनने लगे. टिकट के लिए 40 रुपयों की जरूरत थी और दोनों के पास कुलमिला कर 38 रुपए ही हुए. अब वे क्या करें?

दोनों बारबार कपड़े, झोले को झाड़ते, सामान झाड़झाड़ कर देखते, कहीं से 2 रुपए निकल जाएं. पर पैसे होते तब न निकलते.

दोनों ऐसे भंवर में थे कि न डूब रहे थे, न निकल रहे थे. धीरेधीरे लोग उन के आसपास इकट्ठा होने लगे थे. दरअसल, रात को सोमरू ने 2 रुपए का तंबाकू खरीदा था और अब टिकट के लिए पैसे कम पड़ रहे थे.

कजरी की आंखों से आग बरस रही थी. उस ने सोमरू को गुस्से में कहा, ‘‘अब क्या करोगे? टिकट के लिए पैसे कम पड़ गए. अब घर क्या उड़ कर जाएंगे? तुम्हारी तंबाकू की लत ने…’’

बेचारा सोमरू क्या करे. जिस दर्द को वह पूरी जिंदगी ढोता रहा, उस ने आज इतनी दूर आ कर भी उस का पीछा नहीं छोड़ा था. कभी अपने आसपास लगी भीड़ को देखता, तो कभी अपनी बूढ़ी पत्नी को.

सोमरू का मन पछतावे से इस तरह छटपटा रहा था जैसे वह पूरे समाज के सामने चोरी करता पकड़ा गया हो. आज फिर 2 रुपयों ने सब के सामने उसे नंगा कर दिया था. Family Story

Hindi Love Stories : हादसा – मौली के साथ ऐसा कौन-सा हादसा हुआ था

Hindi Love Stories : इधरउधर देख कर मालविका ने पार्टी में आए अन्य लोगों का जायजा लेने का यत्न किया था पर कोई परिचित चेहरा नजर नहीं आया था.

‘‘अरे मौली, तुम यहां?’’ तभी पीछे से किसी का परिचित स्वर सुन कर उस ने पलट कर देखा तो सामने नमन खड़ा मुसकरा रहा था.

‘‘यही प्रश्न मैं तुम से भी कर सकती हूं. तुम यहां क्या कर रहे हो?’’ मालविका मुसकरा दी थी.

‘‘बोर हो रहा हूं और क्या. सच कहूं तो इस तरह की पार्टियों में मेरी कोई रुचि नहीं है,’’ नमन ने उत्तर दिया था.

‘‘ऐसा है तो पार्टी में आए ही क्यों हो?’’

‘‘आया नहीं हूं, लाया गया हूं. सेठ रणबीर मेरे चाचाजी हैं. उन का निमंत्रण मिलने के बाद पार्टी में न आने से बड़ा अपराध कोई नहीं हो सकता,’’ नमन मुसकराया था.

‘‘वही हाल मेरा भी है. पर छोड़ो यह सब, बताओ, जीवन कैसा चल रहा है?’’

‘‘कुछ विशेष नहीं है बताने को. तुम्हारी ही तरह बैंक में अफसर हूं. पूरा दिन यों ही बीत जाता है. सप्ताहांत में थोड़ाबहुत रंगमंच पर अभिनय कर लेता हूं. हम कुछ मित्रों ने मिल कर नाट्य क्लब बना लिया है.’’

‘‘यह तो शुभ समाचार है कि तुम कालेज के दिनों के कार्यकलापों के लिए अब भी समय निकाल लेते हो. कभी हमें भी बुलाओ अपने नाटक दिखाने के लिए.’’

‘‘क्यों नहीं, हमारा एक नाटक शीघ्र ही मंचित होने वाला है. आमंत्रण मिले तो आना अवश्य. आजकल मेरे अधिकतर मित्र फिल्म या डिस्को में रुचि लेते हैं, नाटकों से वे दूर ही भागते हैं, पर तुम उन सब से अलग हो.’’

तभी नमन का कोई परिचित उसे पकड़ कर ले गया था और उतनी ही तेजी से हाथ में बीयर का गिलास थामे रोमी उस की ओर आया था.

‘‘कौन था वह?’’ रोमी ने तीखे स्वर में प्रश्न किया था.

‘‘किस की बात कर रहे हो तुम?’’

‘‘वही जिस से बहुत घुलमिल कर बात कर रही थीं तुम.’’

‘‘अच्छा वह, वह नमन है. कालेज में मेरा सहपाठी था और अब मेरी ही तरह बैंक की एक अन्य शाखा में कार्यरत है. मेरा अच्छा मित्र है,’’ मालविका ने उत्तर दिया था.

‘‘तुम से कितनी बार कहा है कि इन टुटपुंजियों को मुंह मत लगाया करो. तुम अब केवल एक मध्यवर्गीय परिवार की युवती नहीं बल्कि मेरे जैसे जानेमाने उद्योगपति की महिलामित्र हो. मैं नहीं चाहता कि तुम अब अपने पुराने मित्रों से कोई भी संबंध रखो,’’ रोमी गुर्राया था. उस का तीखा स्वर सुन कर मालविका स्तब्ध रह गई थी.

वह चित्रलिखित सी पार्टी में भाग लेती रही थी पर मन ही मन सहमी हुई थी. यह सच था कि वह एक मध्यवर्गीय परिवार से संबंधित थी. जबकि रोमी एक जानेमाने उद्योगपति परिवार से था. मर्सिडीज, बीएमडब्लू जैसी गाडि़यों में घूमने वाले और पांचसितारा होटलों में उसे ले जाने वाले रोमी से मालविका बेहद प्रभावित थी. और कोई उस की नजरों में ठहरता ही नहीं था.

मौली उर्फ मालविका का परिवार बहुत अमीर न होने पर भी खासा प्रतिष्ठित था. पिता जानेमाने चिकित्सक थे पर पैसा कमाने को उन्होंने अपना ध्येय कभी नहीं बनाया. अपनी संतान में भी उन्होंने वैसे ही संस्कार डालने का यत्न किया था पर मौली रोमी की चकाचौंधपूर्ण जिंदगी से कुछ इस तरह प्रभावित थी कि किसी के समझानेबुझाने का उस पर कोई असर नहीं होता था.

पार्टी समाप्त हुई तो रोमी पूर्णतया सुरूर में था.

‘‘कैसी रही पार्टी?’’ उस ने कार को मुख्य सड़क पर मोड़ते हुए पूछा था.

‘‘बेहद उबाऊ और बकवास पार्टी थी. मेरा तो दम घुट रहा था वहां,’’ मौली बोली थी.

‘‘मैं जानता था तुम यही कहोगी. कभी गई हो ऐसी शानदार पार्टियों में? मैं तो यह सोच कर तुम्हें ऐसी पार्टियों में ले जाता हूं कि तुम सभ्य समाज के कुछ तौरतरीके सीख लोगी. पर तुम तो हर जगह अपने पुराने मित्र ढूंढ़ निकालती हो. कभी अपनी तुलना की है ऊंची सोसाइटी की अन्य युवतियों से? माना, कुदरत ने सौंदर्य दिया है पर ढंग से सजनासंवरना तो सीखना ही पड़ता है. अपनी पोशाक पर कभी दृष्टि डाली है तुम ने? महेंद्र बाबू की बेटी सुहानी पूछ बैठी कि तुम किस डिजाइनर की बनी पोशाक पहने हुए हो तो मैं तो शर्म से पानीपानी हो गया,’’ रोमी धाराप्रवाह बोले जा रहा था.

‘‘बस या और कुछ?’’ रोमी के चुप होते ही मौली चीखी थी, ‘‘तुम और तुम्हारा पांचसितारा कल्चर, मेरा दम घुटता है वहां. भूल मेरी थी जो मैं तुम्हारे साथ पार्टी में चली आई. मुझे नहीं चाहिए यह चमकदमक और तुम्हारे साथ इन बड़ी गाडि़यों में घूमना.’’

‘‘ठीक कहा तुम ने, तुम्हारी औकात ही नहीं है ऊंचे लोगों के बीच उठनेबैठने की या मेरे साथ महंगी कारों में घूमने की. चलो उतरो, इसी समय,’’ रोमी ने झटके से कार रोक दी थी.

मौली को काटो तो खून नहीं. उस के घर से 15 किलोमीटर दूर, निर्जन सड़क और रात के 12 बजे का समय, कहां जाएगी वह.

‘‘क्या कह रहे हो? मैं आधी रात को अकेली कहां जाऊंगी? मुझे मेरे घर तक छोड़ दो. मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगी,’’ मौली बिलख उठी थी.

‘‘ये भावुकता की बातें रहने दो. मैं तुम मिडिल क्लास लोगों को भली प्रकार पहचानता हूं. अपनी गरज के लिए गिड़गिड़ाने लगते हो, रोनेपीटने लगते हो. काम निकल जाने पर अपने आदर्शों की बड़ीबड़ी बातें करते हो. दफा हो जाओ मेरी आंखों के सामने से,’’ रोमी ने घुड़क दिया था.

हार कर डरीसहमी सी मालविका कार से उतर गई थी. उसे आशा थी कि उस के उतरने के बाद रोमी का दिल पसीज जाएगा और वह उसे फिर कार में बैठने को कहेगा. पर ऐसा नहीं हुआ. उस के उतरते ही रोमी की कार फर्राटे भरते उस की आंखों से ओझल हो गई थी.

मौली ने अपना पर्स खोल कर देखा. टैक्सी का बिल चुकाने लायक पैसे थे पर टैक्सी मिले तब न. उस की आंखें डबडबा आईं. घर में तो सब यही सोच रहे होंगे कि वह रोमी के साथ है. वे बेचारे क्या जानें कि वह आधी रात को दूर तक नागिन की तरह फैली सीधीसपाट सड़क पर अपने ही आंसुओं को पीती पैदल चली आ रही होगी.

मौली कुछ दूर ही चली होगी कि उस के पास एक कार आ कर रुकी, जिस में 5 मनचले युवक सवार थे. शराब के नशे में धुत वे तरहतरह की आवाजें निकाल रहे थे. मौली को अकेले चलते देख कर उन्होंने अभद्र इशारे करते हुए उस से कार में बैठने का आग्रह किया. उस ने पहले तो उन की बात अनसुनी कर दी पर जब वे उस के साथ कार चलाते हुए उलटीसीधी हरकतें करने लगे तो वह फट पड़ी.

‘‘मेरा घर पास ही है. मैं ने एक बार कह दिया कि मुझे सहायता नहीं चाहिए तो क्या सुनाई नहीं पड़ता,’’ मौली दम लगा कर चीखी थी. पर कार में से

2 युवक डरावने अंदाज में उस की ओर बढ़े थे. वह सहायता के लिए चीखी तो दूसरी दिशा से आती एक कार उस के पास आ कर रुकी थी.

‘‘क्या हो रहा है यह?’’ कारचालक ने प्रश्न किया था.

‘‘देखिए न, मैं शरीफ लड़की हूं, ये गुंडे मुझे तंग कर रहे हैं,’’ मौली बोली थी.

‘‘शरीफ…हुंह, शरीफ लड़कियां आधी रात को यों सड़कों पर नहीं घूमतीं,’’ कारचालक हिकारत से बोला था, ‘‘और तुम लोग जाते हो यहां से या बुलाऊं पुलिस को?’’ उस ने युवकों को धमकाया तो वे भाग खड़े हुए.

‘‘कृपया मुझे मेरे घर तक छोड़ दीजिए,’’ मौली ने कारचालक से विनती की थी.

‘‘क्षमा कीजिए, महोदया. मेरी बहन नर्सिंगहोम में है. मैं उसे देखने जा रहा हूं. वैसे भी मैं न तो अनजान लोगों को लिफ्ट देता हूं न उन से लिफ्ट लेता हूं,’’ कार- चालक भी उसे अकेला छोड़ कर चला गया था.

अब उस ने अपना फोन निकाला था. अब तक वह डर रही थी कि किसी को उस के इस अपमान का पता चल गया तो कितनी बदनामी होगी पर अब नहीं. पापा भी नाराज होंगे पर इस समय सहीसलामत घर पहुंचना अत्यंत आवश्यक था. उस ने फोन किया तो मां ने फोन उठाया था.

‘‘मौली, कहां हो तुम? 1 बजने जा रहा है. मेरा चिंता के मारे बुरा हाल है. पार्टी क्या अभी तक चल रही है?’’ उस की मां नीता देवी ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी. पर जब मौली ने वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो उन के पांवों तले से जमीन खिसक गई थी.

‘‘किसे भेजूं इस समय? तुम्हारे पापा तो 2 घंटे पहले ही नींद की गोलियां ले कर सो चुके हैं. किस पड़ोसी को जगाऊं, इस समय. तुम जहां हो, वहीं आड़ में छिप कर खड़ी हो जाओ. सड़क पर अकेले चलना खतरे से खाली नहीं है. मैं अश्विन को जगाती हूं. वह न नहीं करेगा,’’ नीता देवी बोली थीं.

‘‘अश्विन? रहने दो मां. उस के पास तो कार भी नहीं है. मैं पुलिस को फोन करूंगी.’’

‘‘भूल कर भी ऐसी गलती मत करना. मैं अश्विन से पूछूंगी. यदि कार चला सकता है तो हमारी कार ले जाएगा, नहीं तो अपने स्कूटर पर आ जाएगा. यह समय नखरे दिखाने का नहीं है,’’ नीता देवी ने डपट दिया था.

अश्विन की बात सुनते ही मौली को झुरझुरी हो आई. वह मौली के घर में ही किराएदार था और किसी कालेज में व्याख्याता था. आजकल अखिल भारतीय प्रतियोगिता की तैयारी में जुटा था. नीता देवी से उस की खूब पटती थी. पर मौली ने उसे कभी महत्त्व नहीं दिया. प्रारंभ में उस ने मौली से बातचीत करने का प्रयत्न किया था पर उस की बेरुखी देख कर उस ने भी उस से किनारा कर लिया था. इस समय आधी रात को उस से मदद मांगना मौली को अजीब सा लग रहा था. वह आने के लिए तैयार भी होगा या नहीं, कौन जाने.

मौली खंभे की आड़ में खड़ी यह सब सोच ही रही थी कि नीता देवी का फोन आया था.

‘‘अश्विन को कार चलानी नहीं आती. वह अपने स्कूटर पर ही आ रहा है. शास्त्री रोड पर वह अपना हौर्न बजाते हुए आएगा तभी तुम सड़क पर आना,’’ नीता देवी ने आदेश दिया था.

लगभग 15 मिनट में हौर्न बजाता हुआ अश्विन उस के पास आ पहुंचा था, पर मौली को लगा मानो सदियां बीत गई हों. वह चुपचाप पिछली सीट पर बैठ गई थी.

घर पहुंची तो मां से गले मिल कर देर तक रोती रही थी मालविका. मां ने ही अश्विन की भूरिभूरि प्रशंसा करते हुए धन्यवाद दिया था. उस के मुंह से तो बोल ही नहीं फूटे थे.

इस के 2 दिन बाद ही रोमी का फोन आया था. देर तक क्षमायाचना करता रहा था. नशे में उस से बड़ी भूल हो गई. मालविका जो सजा दे उसे मंजूर है.

मौली ने उस की किसी बात का उत्तर नहीं दिया. सबकुछ चुपचाप सुनती रही थी. दोचार बार के फोन वार्त्तालाप के बाद रोमी घर आया. आज फिर वह मालविका को किसी विशेष आयोजन में ले जाने आया था.

उस के पिता के मित्र प्रसिद्ध फिल्म निर्माता नलिन बाबू की नई फिल्म का मुहूर्त था और रोमी सोचता था कि ऐसे ग्लैमरस आयोजन के लिए मौली न नहीं कह पाएगी.

नीता देवी ने तो सुनते ही डपट दिया था, ‘‘उस का साहस कैसे हुआ यहां आने का? उस दिन जो कुछ हुआ उस के बाद तुम उस के साथ जाने की बात सोच भी कैसे सकती हो.’’

‘‘जाने दो, मां. उस दिन रोमी नशे में था. बारबार थोड़े ही ऐसा करेगा. मैं तैयार हो कर आती हूं,’’ मालविका उठ कर अंदर गई थी.

कुछ ही क्षणों में बाहर से शोर उभरा था. किसी की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ पर मालविका के घर के सामने खड़ी रोमी की मर्सिडीज कार धूधू कर जल उठी थी.

आसपास के घरों के लोग घबरा गए थे. कुछ ही क्षणों में अग्निशामक दस्ता आ पहुंचा था. लोगों ने आग बुझाने के लिए पानी डालने का प्रयत्न भी किया था.

कैसे लगी यह आग? जितने मुंह उतनी बातें. कोई भी किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहा था. हैरानपरेशान रोमी अधजली कार ले कर जा चुका था. तभी नीता देवी की नजर मालविका पर पड़ी थी. उस के चेहरे पर अजीब संतुष्टि का भाव था. उन्होंने अपनी नजरें झुका लीं. मानो, बिना कहे ही सब समझ गई हों.  Hindi Love Stories

Family Story : 3 शर्ते

Family Story :प्रोफैसर हंसराज चिंतित रहा करते कि ना जाने उन्हें कैसे पड़ोसी मिलेंगे. दरअसल, नईनई विकसित हुई इस अमलतास कालोनी में वह 2 महीने पहले ही रहने आए हैं. कालोनी के सभी मकान देखतेदेखते भर गए, सिवाय उन के पड़ोस वाले मकान के.

हंसराजजी और उन की पत्नी सुधा ऊपर वाले से प्रार्थना करते कि कोई बालबच्चों वाला संभ्रांत परिवार पड़ोसी के रूप में आ जाए, तो उन्हें बड़ा सहारा हो जाएगा. वैसे तो उन के 2-2 बेटे हैं, लेकिन दोनों विदेश में जा कर बस गए. बड़ा यूएस में और छोटा यूके में.

एक दिन बिल्डर ने जब उन्हें सूचना दी कि जल्दी ही इस मकान में रहने के लिए बुलानीजी आ रहे हैं, तो वे निश्चिंत हो गए. पर सुधा के यह कहते ही कि बुलानी तो सिंधी होते हैं, उन में तो मीटमटन, दारू वगैरह सब चलता है तो वे थोड़ा परेशान हो गए. फिर स्वयं ही विवेक का परिचय देते हुए सुधा को समझाने का प्रयास करने लगे, “किसी के बारे में बिना जाने, बिना उस से मिले, पहले से गलत धारणा बना लेना ठीक नहीं. और खानेपीने के मामले में जब अपने स्वयं के बच्चे ही नौनवेजिटेरियन हो गए हैं, तो किसी और के नौनवेज खाने से आपत्ति क्यों?”

अगले दिन दोपहर के समय जब वे आरामकुरसी पर अधलेटे अखबार पढ़ रहे थे, तभी उन के मकान के ठीक सामने एक कार आ कर रुकी. कार से पहले एक सज्जन बाहर निकले और फिर पीछे से एक महिला और एक 10-12 साल की बच्ची. हंसराजजी ने हाथ के अखबार को टेबल पर रखा और उठ कर बाहर के गेट तक आए.

उतरने वाले सज्जन ने दोनों हाथ जोड़ते हुए नमस्कार किया, “मैं अशोक बुलानी हूं और यह मेरी पत्नी शशि और बेटी सौम्या. हम लोग आप के बाजू वाले मकान में शिफ्ट हो रहे हैं. अभी गर्ल्स हायर सेकेंडरी के पास ‘टीचर्स कालोनी’ में रह रहे थे. मैं सिविल इंजीनियर हूं और शशि शासकीय कमला नेहरू गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में व्याख्याता. सौम्या डीपीएस स्कूल में छठी कक्षा की विद्यार्थी है.”

बुलानी और उन के छोटे से परिवार को देख कर हंसराजजी गदगद हो गए. एक सुसंस्कृत सभ्य परिवार उन का पड़ोसी बन रहा है. उन्होंने गेट खोलते हुए आमंत्रित किया, “अंदर आइए. मैं अपनी पत्नी सुधा से मिलवाता हूं.”

ड्राइंगरूम में सब के बैठते ही सुधा पानी की ट्रे ले आईं. यह मेरी धर्मपत्नी सुधा है. हम दोनों 4 माह पहले ही शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से प्रोफैसर पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. अभी 2 महीने पहले ही इस कालोनी में शिफ्ट किया है. इस से पहले कालेज के पास ही ‘औफिसर कालोनी’ में रहते थे.

सुधा ने बीच में टोकते हुए शशि से पूछा, “आप लोग क्या लेना पसंद करेंगे? चाय या कौफी?” शशि कुछ जवाब दे पाती, उस के पहले ही बुलानी बोल पड़े, “मैडम, चाय ले लेंगे.”चाय की चुसकियों के बीच गपशप से यह पता चला कि बुलानी सिविल कांट्रैक्टर हैं, और उन का प्रोजैक्ट अभी शहर के बाहरी छोर पर बन रही ‘विशाल कालोनी’ में चल रहा है.

शशि ने पहली मुलाकात में ही सुधा को आंटी बना लिया. उसे सब से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि अंकलआंटी उसी की तरह शिक्षाजगत से हैं. उस ने अपनी उत्कंठा व्यक्त करते हुए पूछ ही लिया, “आंटी, आप कालेज में क्या पढ़ाती थीं?”

“शशि, हम दोनों बौटनी वाले हैं. एमएससी कक्षाओं को मैं ‘एलगी’ पढ़ाती थी और सर ‘फंगाई’. स्टूडेंट लाइफ में हम दोनों एक ही यूनिवर्सिटी में सहपाठी थे. एमएससी और पीएचडी भी साथ ही की, तभी एकदूसरे से प्रेम हुआ और फिर विवाह हो गया. उस जमाने में प्रेम विवाह आसान नहीं होता था. मैं ब्राह्मण थी और सर कायस्थ.”

फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ संकोच सा हुआ, तो बोल पड़ीं, ” अरे, ये क्या मैं ने अपना टौपिक शुरू कर दिया. तुम अपना बताओ शशि, स्कूल में क्या पढ़ाती हो?””आंटी, मै बायोलौजी लेक्चरर हूं. मैं ने जूलौजी से पीजी किया है. मैं भी पीएचडी करना चाहती थी, पर उस से पहले गवर्नमेंट जौब मिल गई. मेरी तमन्ना तो अभी भी कालेज में पढ़ाने की है, पर पिछले 6 सालों में जूलौजी में लेक्चरर की वैकेंसी ही नहीं निकली.”

“शशि, यदि तुम कालेज में लेक्चरर बनना चाहती हो, तो मेरी सलाह है कि पीएचडी कर डालो. तुम्हें गाइड के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. जूलौजी में प्रोफैसर हम लोगों के कलीग डा. सिलावट हैं. हां,  तुम्हें पीएचडी क्वालीफाइंग एक्जाम क्लियर करना पड़ेगा, और फिर 90 दिन का थीसिस राइटिंग कोर्स भी.”

बुलानी जो अब तक बड़े धैर्य से वार्तालाप सुन रहे थे, बेचैन हो उठे. थोड़े तल्खी से वह बोले, “अरे शशि, जिस काम के लिए आए हैं, उस के बारे में तो बात कर लो.”हंसराजजी ने माहौल हलका करते हुए कहा, “शिक्षाजगत के लोगों की यही समस्या है, मिलते ही वे हर समय एजुकेशन पर बात शुरू कर देते हैं.”

“आंटी, हमारा सामान आज रात यहां अनलोड हो जाएगा और हम लोग कल सुबह शिफ्ट करेंगे. आप के यहां घरेलू काम करने वाली बाइयां क्या मेरे यहां भी काम कर देंगी? टीचर्स कालोनी में तो 2 बाइयों से काम चल जाता था. एक झाड़ूबरतन और साफसफाई करती थी और दूसरी खाना बनाती थी.””शशि, मेरे यहां तो एक ही काम वाली बाई सुबह आती है, झाड़ूबरतन के लिए. खाना तो अब मैं खुद ही बनाती हूं.

“रिटायरमेंट के बाद अब दिनभर कोई काम तो रहता नहीं, तो इसी में समय गुजारती हूं. मैं तुम्हें अपनी महरी लक्ष्मी का मोबाइल नंबर देती हूं, उस से बात कर लो और खाना बनाने वाली बाइयां भी कालोनी के कई घरों में आती हैं,  तुम यहां रहना शुरू करोगी तो सब व्यवस्थाएं अपनेआप हो जाएंगी.”

“सर, दूध वाले का नंबर भी चाहिए और न्यूजपेपर और केबल टीवी वाले का भी,बुलानी ने हंसराजजी की ओर देखते हुए रिक्वेस्ट की.”कालोनी के गेट पर सुपरवाइजर और गार्ड के रूम हैं. आप गणेश सुपरवाइजर को बोल देना. आप की सभी व्यवस्थाएं वह करा देगा. उस के पास  सभी के नंबर हैं- केबल टीवी,  इलेक्ट्रीशियन, न्यूज पेपर, दूध वाले, प्लंबर और कारपेंटर सभी के.”

( 6 साल बाद)पिछले 6 सालों में दोनों पड़ोसी पड़ोसी कम, एक परिवार के अंग ज्यादा हो चुके थे. बुलानी तो अपने प्रोजैक्ट के सिलसिले में सुबह निकल जाते और देर रात लौटते. पर, शशि और सौम्या का ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब वे आंटी के यहां दिन में 1-2 बार फेरे न लगा लें. आंटी धीरेधीरे  शशि को बेटी की तरह मानने लगी थीं. शशि ने भी अपने बारे में उन्हें सारी बातें बता डाली थीं. आंटी को यह भी बता दिया था  कि उस का भी यह  ‘प्रेम विवाह’ है और वह ब्राह्मण है और बुलानी सिंधी.

सौम्या पूरी तरह अपनी मां पर गई थी. उस का ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर रहता. वह देर रात तक पढ़ती रहती. हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में वह अपने जिले की टौपर थी और उस की प्रशंसा में जिले के सभी अखबारों ने सौम्या के साथसाथ उस के मांपापा के भी फोटो सहित इंटरव्यू छापे थे. अब इस वर्ष भी उस का टारगेट कक्षा 12वीं में मेरिट में आने का था.

सौम्या की आदत थी, जोरजोर से बोलबोल कर पढ़ने की. रात में उस की आवाज अंकलआंटी के बेडरूम में साफ सुनाई देती और उन की नींद में खलल डालती. नींद डिस्टर्ब होने पर भी कभी उन्होंने सौम्या को टोका नहीं. पढ़ाई का महत्व उन से ज्यादा कौन समझता. उन्होंने भी अपने दोनों बेटों की शिक्षादीक्षा में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी और आज उसी शिक्षा की बदौलत दोनों बेटे यूएस और यूके में बड़ीबड़ी कंपनियों में उच्च पदों पर थे.

हंसराजजी और सुधा बारीबारी से हर साल 3 माह के लिए एक बार यूके जाते और अगली बार यूएस. उन दिनों उन के घर की पूरी देखभाल और सुरक्षा शशि और सौम्या करतीं.पहली बार ऐसा हुआ कि इस साल कोरोना के कारण इंटरनेशनल फ्लाइट बंद कर दी गईं और बेटों के पास उन का जाना नहीं हो पाया. हालात यहां तक आ गए कि देशभर में लौकडाउन के कारण लोगों का घर से निकलना भी बंद हो गया. बुलानी के प्रोजैक्ट का काम भी ठप हो गया और प्रोजैक्ट के बंद होने से सभी कर्मचारी और मजदूर काम छोड़ कर अपनेअपने घर चले गए. सुबह से रात तक  बाहर रहने वाले बुलानी अब घर में कैद हो कर रह गए. लंबे समय के लौकडाउन ने उन्हें डिप्रेशन में ला दिया.शशि की व्यस्तता दोगुनी बढ़ गई. कामवाली बाइयों के न आने से घर के सारे काम भी करने पड़ते और औनलाइन क्लास भी लेनी पड़ती.

सौम्या भी औनलाइन क्लासेज अटेंड करती और अपनी स्टडी में व्यस्त रहती. मांबेटी दोनों का आंटी के यहां आनाजाना भी बंद हो गया. उन्हें अंकलआंटी की वृद्धावस्था के कारण पूरी सावधानी जो बरतनी थी.6 वर्षों में आज पहली बार शशि और बुलानी के आपसी झगड़े की आवाजें छनछन कर हंसराज और सुधा के कानों में पड़ रही थीं. दोनों अचंभित थे कि यह क्या हो गया?

झगड़े का यह सिलसिला धीरधीरे प्रतिदिन की रूटीन  में तबदील हो गया. बुलानी अब रोज नशा भी करने लगा और नशे की हालत में वह शशि को गालियां भी देता. जिस तरह के शब्द उस के मुंह से निकलते, उसे सुन कर कोई भी निष्कर्ष निकाल सकता कि ये शब्द सभ्य पुरुष की निशानी नहीं हो सकते हैं.

सुधा को इन घटनाओं के कारण पूरी रात नींद नहीं आती. वे शशि को बेटी की तरह प्यार करने लगी थीं. आज रात तो बुलानी ने गालियों के साथ शशि पर हाथ भी उठा दिया था.सुधा का दिल व्याकुल हुआ जा रहा था. उन्हें इंतजार था कि कब सुबह हो और वे शशि से मिल कर झगड़े की जड़ का पता लगाएं. अन्याय के प्रति उदासीन रवैया अपनाना बुजदिली कहलाएगी. उन्होंने अपने महाविद्यालय की अनेक छात्राओं में आत्मविश्वास जागृत किया था, जो किन्हीं कारणों से प्रताड़ित थीं.

अपने मन की बात जब सुबह उन्होंने हंसराजजी को बताई तो उन्होंने बुलानी के घर में रहते शशि के यहां जाने से मना किया और कुछ समय धैर्य रखने की सलाह दे डाली.आज रात तो पानी सारी हदें पार कर गया. शशि ने बुलानी के मोबाइल की उस समय पड़ताल कर डाली थी, जब वह बाथरूम में था. उस का शक सही साबित हुआ था. बुलानी चोरीछिपे जिस महिला से बातें करता था, उस की चैट शशि ने पढ़ डाली थी. अश्लील चैट को देख उस का खून खौल उठा था. वह चिल्लाचिल्ला कर बुलानी से सफाई मांग रही थी. बुलानी सीधे स्पष्टीकरण देने के बजाय गुस्से में शशि से बारबार यही पूछ रहा था कि उस की हिम्मत कैसे हुई उस के मोबाइल को छूने की? धीरेधीरे बहस हाथापाई में तबदील हो गई थी.

मां की चीख सुन कर सौम्या दौड़ती हुई नीचे आई थी और बीचबचाव कर मां को अपने कमरे में ले आई थी.शशि बुरी तरह आहत थी. उसे पति की ऐयाशी किसी कीमत पर गवारा नहीं थी. उस की दूसरी चिंता यह थी कि घर में जवान बेटी है. ऐसी बेटी जिस के कारण पूरे शहर में उन दोनों का भी नाम और प्रतिष्ठा बनी हुई है. लोगों को जब पता चलेगा और वे सौम्या को ताने दे कर कुछ कहेंगे, तो उस के दिल पर कैसा प्रभाव पड़ेगा.

सौम्या अपने विद्यालय में जूडोकराटे की चैंपियन भी थी. उस ने मां को आश्वस्त किया, “यदि पापा ने अब आप के साथ दुर्व्यवहार किया तो वह भूल जाएगी कि वे उस के पापा हैं. मां का और वह भी निर्दोष मां का अपमान वह अब सहन नहीं करेगी. जो व्यक्ति महिलाओं की इज्जत नहीं करता, उसे दंड देना मुझे सिखाया गया है.”पूरी रात मांबेटी भविष्य की योजना बनाती रहीं. सौम्या ने मां को समझाया कि उसे साहसी बनना होगा. अपराध करने वाले को सही राह पर लाने की युक्ति स्वयं खोजनी होगी. आप दिनरात मेहनत करें और आप की कमाई पर कोई दूसरा गुलछर्रे उड़ाए, इसे बदलना होगा.

अगले दिन शशि एकदम बदले हुए रूप में थी. सौम्या मां से सट कर खड़ी हुई थी. शशि ने बुलानी से पूरे धैर्य और गंभीरता से अपनी बात कहनी शुरू की, “आप मेरी 3 शर्तें पूरी करें और उस के बाद हमारा आप से कोई रिश्ता नहीं. आप पूरी तरह स्वतंत्र होंगे, कहीं भी जाने के लिए, कुछ भी करने के लिए. एक तो इस मकान के खरीदने में पूरा पैसा मेरा लगा है, इसलिए संयुक्त मालिकाना हक से आप अपना नाम तुरंत हटवा लें. दूसरा, मेरे सभी बैंक खाते आप के साथ संयुक्त नाम से हैं, उन में से आप अपना नाम पृथक करा लें और तीसरा, मेरी सभी ‘एफडी’ और ‘बीमा पौलिसी’ में से भी आप अपना नाम हटवाएं. अब सभी में नौमिनी आप के स्थान पर सौम्या होगी.

बुलानी यह सुन कर अवाक रह गया. उस ने तो इस सब की कल्पना भी नहीं की थी. वह अपने कंस्ट्रक्शन प्रोजैक्ट में पहले से ही कर्ज में डूबा हुआ था. पूरी रात वह विचार करता रहा. वह तो अभी पूरी तरह शशि की कमाई पर ही निर्भर है. शर्तें मानने पर तो उसे भूखों मरने की नौबत आ जाएगी.

अगले दिन से घर में पूरी तरह शांति थी. लौकडाउन में छूट मिलते ही वह कंस्ट्रक्शन साइट पर जाने लगा. अब वह सिर्फ शनिवार की रात में आता और बेटी सौम्या को समझाने की कोशिश करता कि वह अपनी मां को सुलह करने के लिए समझाए.

सौभ्या साफसाफ कहती, “पापा, आप ने मां को बहुत कष्ट दिया है, उन्हें जिस दिन यह विश्वास हो जाएगा कि आप ने वे सभी बुराइयां त्याग दी हैं, जिन से मां आहत हुई थीं, उसी दिन से सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा.

“एक बात और भी मैं कहना चाहती हूं, यदि सचमुच मैं  आप की बेटी हूं और आप चाहते हैं कि मैं सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में मेरिट में आ कर आप लोगों का नाम रोशन करूं, तो आप वह सब बातें छोड़ दीजिए, जो मां को आहत करती हैं.”

बेटी की बातों ने पिता को अंदर तक झकझोर दिया और इस तरह एक दक्ष कन्या ने अपनी बुद्धिमानी और दूरदर्शिता से टूटते परिवार को बिखरने से बचा लिया. Family Story

लेखक : डा. आरएस खरे

Indian Railways : रेल यात्रा या रेल यंत्रणा? भारतीय रेलवे की असल तस्वीर

Indian Railways : कभी गर्व का विषय रही भारतीय रेलवे अब दर्द का विषय बन गई है. यह बात इसलिए कहीं जा रही है क्योंकि रेलवे का प्रबंधन अब प्रबंधन नहीं कुप्रबंधन हो गया है. रेलवे को शुरू से ही एक ऐसी व्यवस्था के रूप में जाना जाता था जो भारत की जीवन रेखा कही जाती थी.

रेलवे गुलामी ला रही है

रेलवे एक ऐसी व्यवस्था है जो दूर दराज के गांव को महानगरों से जोड़ती है, यह गरीब से गरीब व्यक्ति को भी राजधानी पहुंचने का मौका देती थी लेकिन आज यही रेलवे है जो आम आदमी के जेब पर डाका डाल रही है. ऐसा लगता है कि रेल मंत्री ने जानबूझ कर रेलवे की तस्वीर बिगाड़ने की ठान ली है. भारतीय रेल नहीं चाहता कि गरीब लोग अब रेल की यात्रा करें. रेल मंत्री ने अब गरीब लोगों को बैलगाड़ी युग में ले जाने की पूरी तैयारी कर ली है. वे नहीं चाहते कि जो गरीब लोग जो अपने गांवघर छोड़ आए हैं वो दुबारा अपने परिवारजनों से मिलने अपने गांव जाए. दशकों पहले अंग्रेजों ने गरीबों को गुलाम बनाया था, अब भारतीय रेल उसी पटरी पर चल रही है. आम गरीब लोग जो मजदूरी करते है, बड़े शहरों में छोटामोटा काम करके पैसे जोड़कर अपने घर भेजते है, उन्हें अब भारतीय रेल साजिशन गुलाम बना बनाने पर तुली हुई है. आज भारतीय रेलवे अपमान उत्पीड़न और पीड़ा का पर्याय बन गई है. चाहे टिकट बुक करना हो या प्लेटफार्म पर पहुंचना हो या ट्रेन का शौचालय हो या ट्रेन का खान-पान हो या ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा हो, हर ट्रैक पर रेलवे अब पूरी तरह से विफल हो चुकी है. रेलवे का हर क्षेत्र अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और संवेदनशीलता के अधीन है.

रिजर्वेशन के चक्कर

भारतीय रेल की वेटिंग लिस्ट अब एक मजाक बन चुकी है. अगर किसी को भी यात्रा करनी है तो उसे 60 दिन पहले टिकट बुक करनी पड़ती है और इसके बाद भी यह सुनिश्चित नहीं होता है की टिकट कंफर्म मिल ही जाएगी. त्योहारों के समय यह संकट और विकराल हो जाता है. महीनों घर से दूर रहने वाले जब त्योहारों में अपने घर जाना चाहते हैं तो टिकटों के लिए इतनी जद्दोजहद होती है कि मत पूछिए. लंबी वेटिंग लिस्ट, और बढ़ते किराए ने आम लोगों के लिए रेलवे का सफर अब दूभर कर दिया है. कई ट्रेनों में वेटिंग लिस्ट 300 तक पहुंच जाती है यह स्थिति रेलवे की नाकामी को दर्शाती है कि वह लोगों की डिमांड को पूरा नहीं कर पा रही है. रेलवे ना नई ट्रेन चला पा रही है, ना नई कोच फैक्ट्री लगा पा रही है और ना ही ट्रेनों में भीड़ कम करने में सफल हो रही है. अगर किसी को आपातकालीन स्थिति में अपने घर या अपने परिजन से मिलने के लिए किसी शहर से किसी दूसरे शहर जाना हो तो उसके लिए यह मुसीबत कितनी बड़ी है यह लिखकर बयां नहीं की जा सकती. ट्रेन में धक्का खाना अब इस मौडर्न रेलवे युग में बहुत ही आम बात है.

तत्काल और प्रीमियम तत्काल सेवा रेलवे ने उन लोगों के लिए शुरू की थी जिन्हें आपात स्थिति में यात्रा करनी होती है लेकिन अब यह तत्काल और प्रीमियम तत्काल एक व्यापार बन गया है. विंडो खुलते ही 30 सेकंड में टिकट धड़ाधड़ गायब हो जाते हैं और टिकट एजेंट के पास उपलब्ध हो जाते हैं. हालांकि 1 जुलाई से नए जो नियम में बदलाव हुए हैं उसे इस पर कुछ तो असर पड़ा है लेकिन फिर भी आम आदमी को अभी भी आईआरसीटीसी ऐप और आईआरसीटीसी की वेबसाइट से टिकट खरीदनी नहीं आती है इसलिए वह एजेंट का रुख करते हैं या फिर टिकट लेने के लिए लाइनों में लगते हैं. एजेंटों के पास जो टिकट उपलब्ध होता है उस पर भारी जेब काटी जाती है, 400 का टिकट 3000 रुपए तक बिकता है और यात्री को मजबूरन यह टिकट लेना ही पड़ता है. भारतीय रेलवे की डायनेमिक प्राइसिंग नीति की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है.

भारतीय रेलवे में इन दिनों सबसे बड़ा सिर दर्द आईआरसीटीसी की वेबसाइट और मोबाइल ऐप है. जब भी टिकट बुकिंग का पिक टाइम होता है जैसे कि तत्काल, प्रीमियम तत्काल और त्योहारी सीजन. ऐसे समय में आईआरसीटीसी की वेबसाइट बारबार क्रैश होती है कैप्चा लोड नहीं होता पेमेंट गेटवे फेल हो जाता है और टिकट खरीदने की प्रक्रिया करते करते अपने आप यूजर लौग आउट हो जाता है. मोबाइल ऐप पर टिकट बुक करना किसी भी परीक्षा से कम नहीं है धीमी स्पीड और रुक रुक कर लोड होना और बार बार फेल होते पेमेंट से यात्री मानसिक तनाव में आ जाते हैं. आईआरसीटीसी यह दावा करती है कि उसके सर्वर हमेशा अपडेटेड रहते हैं लेकिन वास्तविक अनुभव ठीक इसके उलट है.

भारतीय रेलवे की रिफंड प्रणाली आजकल कछुआ गति से चल रही है और इसमें यह सुनिश्चित नहीं है कि आपका पैसा 100 प्रतिशत वापस आपको मिल ही जाएगा. अगर किसी यात्री की ट्रेन कैंसिल हो जाती है या टिकट वेटिंग में रह जाता है और वह रिफंड के लिए आवेदन करता है तो वह प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल है. कई बार तो ऐसा होता है कि रिफंड 15-15 दिन तक नहीं आता. शिकायत करने पर आईआरसीटीसी की कस्टमर केयर से औपचारिक जवाब भी ठीक से नहीं मिलता है यानी की समाधान का तो पता नहीं लेकिन एक और समस्या पनप जाती है. वहीं तत्काल टिकट में कैंसिलेशन चार्ज इतनी अधिक होती है कि यात्री को रिफंड के नाम पर भीख दिया जाता है. यह पूरी प्रणाली यात्री को नुकसान में डाल देती है.

आपने कितने महीने पहले टिकट खरीदा, टिकट कंफर्म है, इसका कोई मतलब नहीं बनता स्लीपर कोच में. स्लीपर और एसी कोच में आपने महीनों पहले टिकट लिया, सीट कन्फर्म है, फिर भी चैन की यात्रा नहीं मिलती. स्लीपर और एसी कोच में टीटीई जनरल टिकट धारियों को पैसे लेकर चढ़ा देते हैं. वह व्यक्ति आपकी सीट पर लेटा होता है, आप शिकायत करते हैं तो टीटीई आपको ही दोषी ठहराने लगता है. यह न केवल यात्री के साथ अन्याय है, बल्कि साफ दर्शाता है कि रेलवे में रिश्वत का खेल कितना गहरा है.

हर किसी व्यक्ति का दिल भारतीय रेल के जनरल कोच का दृश्य देखकर दहल जाता है. 100 लोगों की क्षमता वाले जनरल कोच में 400 लोग घुसे होते हैं जहां खड़े रहने तक की जगह नहीं होती, लोगों को शौचालय में भी यात्रा करनी पड़ती है. लोग एक दूसरे के ऊपर लदे होते हैं बदबू, दमघोंटू गर्मी, झगड़ा और चिल्लाहट, यह सब आम बात हो चुकी है ऐसे सफर में महिलाएं असुरक्षित महसूस करती है बुजुर्ग और बच्चे दम तोड़ते नजर आते हैं और आरपीफ का कोई भी जवान दिखाई नहीं देता.

यह जगजाहिर है कि त्योहारों के सीजन में टिकट मिलना चमत्कार से कम नहीं है. आईआरसीटीसी की वेबसाइट त्योहारों के समय बार-बार क्रैश हो जाती है और एजेंट तो ठगने के लिए बैठे ही है, लोगों को 500 की टिकट एजेंट 5000 में भी बेच देते हैं. सरकार एजेंटों को लाइसेंस देती है लेकिन उसकी मौनिटरिंग बिल्कुल भी नहीं करती है.

पहले यह देखा जाता था कि रेल यात्रा के दौरान टीटीई यात्रियों की बहुत मदद करते थे चाहे वह सुरक्षा के मद्देनजर हो या फिर टिकट न मिलने के दौरान यात्री को परेशानी का सामना करना पड़ा हो. लेकिन अब ऐसा बिल्कुल भी नहीं है टीटीई साहब अब टिकट चेकर नहीं दलाल बन गए हैं. ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह टिकट चेककर 200 की सीट 1000 रुपये में बेचता है. कंफर्म टिकट वाले को एडजस्ट करने को कहकर वेटिंग वाले को रिजर्वेशन में बैठा देता है. यह सब देखकर यह साफ जाहिर है कि रेलवे में भ्रष्टाचार किस तरह फैला हुआ है.

मंडुआडीह रामेश्वरम एक्सप्रेस 2024- 25 में 11:30 घंटे औसत देरी के साथ सबसे ज्यादा सुर्खियों में रही. उसके साथ ही प्रताप एक्सप्रेस, आजाद हिंद एक्सप्रेस, उत्कल एक्सप्रेस और कई मेल एक्सप्रेस ट्रेन 6 से 12 घंटे की देरी से चलना आम बात मानी जा रही है. वहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों का टाइम टेबल अब सिर्फ मजाक बनकर रह गया है. रेलवे और सरकार पंक्चुअलिटी के झूठे आंकड़े पेश कर रही है और यात्रियों की नींद प्लेटफार्म पर खुल रही है.

खानपान में करप्शन

ट्रेन में खाने की गुणवत्ता को लेकर हमेशा ही सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होती रहती है इससे यह साफ जाहिर है कि ट्रेन में खाने की गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है और इसके साथ ही लूटमार तो खूब जारी है. 10 रुपए की चाय ट्रेन में 30 से 50 रुपए में बिकती है. 80 का खाने का पैकेट 100 से 150 और कभी कभी तो यह 180 रुपए में भी बिक रहा है. जरा पैंट्री की ओर ध्यान दिया जाए, पैंट्री कार की विशेष सेवाएं है गंदी दाल, अधपकी रोटियां और जली हुई सब्जियां. भारतीय रेलवे में ना ही पैंट्री कार के द्वारा रेट लिस्ट दिया जाता है और ना ही खाने का बिल. सोशल मीडिया पर इसके कई वीडियो वायरल है, जिसमें पैंट्री कार कर्मचारियों से यात्री द्वारा रेट लिस्ट मांगने और बिल मांगने पर बदतमीजी की गई और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई. खराब खाने की क्वालिटी की वजह से ट्रेन में यात्रियों को फूड प्वाइजनिंग का शिकार होना पड़ता है. भारतीय रेल पूरे देश के लोगों को जोड़ता है ऐसे में भारतीय रेल की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह ट्रेन में यात्रा कर रहे लोगों का विशेष ख्याल रखें. भारतीय रेल को पैंट्री कार सेवा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. इसके साथ ही रेट लिस्ट कस्टमर को वैसे ही दिया जाना चाहिए जैसे कि रेस्टोरेंट में मेनू कार्ड दिया जाता है.

लंबी दूरी की सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेनों में कई बार शौचालय की सफाई नहीं होती है इससे यात्रियों को दुर्गंध में ही यात्रा करनी पड़ती है. ट्रेनों के शौचालय गंदगी और दुर्गंध के अड्डे बन चुके हैं. इसके साथ ही फ्लश में पानी नहीं आता है और कई बार तो नल भी टूटे हुए मिलते हैं. त्योहारों पर स्थिति और भी ज्यादा खराब हो जाती है यात्रियों को नाक बंद करके अपनी यात्रा करनी पड़ती है. साथ ही कई बुजुर्ग और महिलाएं ट्रेन के शौचालय का उपयोग करने से डरते भी है.

भारतीय रेलवे असामाजिक तत्वों की शरणस्थली बन चुकी है. जेब कतरे, मोबाइल चोर, शराबी, गुंडे सब ट्रेन और प्लेटफार्म पर मौजूद होते हैं. आखिर यह लोग बिना प्लेटफार्म टिकट लिए या बिना टिकट खरीदे ट्रेन में कैसे घुस जाते हैं और लोगों के साथ बदसलूकी करते हैं चोरी करते हैं और यात्रियों को परेशान करते हैं. यह आरपीएफ और जीआरपी की भूमिका पर संदेह प्रकट करता है. क्या यह आरपीएफ और जीआरपी की मिलीभगत से हो रहा है?  अक्सर स्लीपर क्लास में कीमती सामान लेकर ट्रेवल कर रहे लोगों को यात्रा के दौरान जागना ही पड़ता है. इसके साथ ही चलती ट्रेन में भिखारी भी पहुंच जाते हैं और लोगों से भीख ना देने पर बदसलूकी करते हैं. जब यात्री अपने यात्रा का किराया पहले ही दे चुका है तो वह भिखारी को ट्रेन में भीख क्यों दे और इन भिखारी को टीटी साहब भी चढ़ने से नहीं रोकते हैं. इससे यह साफ जाहिर होता है कि रेलवे कर्मचारियों की मिलीभगत से ही यह सब कुछ संभव है. ट्रेन में किन्नरों का आतंक हमेशा ही देखने को मिलता है. यात्री द्वारा पैसे ना देने पर यह यात्री से बदतमीजी करते हैं और कई बार यात्रियों की पिटाई भी कर देते हैं. सबसे ज्यादा परेशान आजकल रेल यात्रा में किन्नर ही कर रहे हैं. यह भीख नहीं मांगते है बल्कि जबरन वसूली का काम करते हैं. कोई पैसे ना दे तो ये इतनी ज्यादा अपशब्द कहते हैं कि हर व्यक्ति शर्मिंदा हो जाता है और अपनी जेब में जो भी कुछ पैसे रहते है वह निकाल कर दे देता है.

कई रूट आज भी सिंगल लाइन पर चल रहे हैं, ओवर ब्रिज, अंडरपास, प्लेटफौर्म्स आज भी कई स्टेशनों के जर्जर अवस्था में है. चलती ट्रेनों में सफाई कम ही देखने को मिलती है. नई ट्रेनों की घोषणा तो हवा हवाई है और पुराने ट्रेनों की हालत जस की तस है. इसके साथ इलेक्ट्रिफिकेशन धीमी गति से हो रहा है और ट्रैक अपग्रेडेशन लगभग ठप है.

इन रूट्स पर अधिकतम भीड़:

1. नई दिल्ली – पटना (पूर्वा, संपर्क क्रांति, राजधानी)
2. हावड़ा – दिल्ली (पूर्वा, कालका मेल, राजधानी)
3. मुंबई – गोरखपुर (कुशीनगर, अवध एक्सप्रेस)
4. अहमदाबाद – पटना (साबरमती, ट्रेन नं. 09447)

इन ट्रेनों में आम यात्रियों के लिए टिकट पाना दुश्वार ही नहीं बल्कि असंभव सा हो गया है. 6-8 घंटे लाइन में लगने पर भी यात्रियों को रिजर्वेशन नहीं मिलता है.

रेल मंत्री हर महीने नए ऐप, बुलेट ट्रेन और वंदे भारत को लेकर घोषणाएं करते रहते हैं. लेकिन आम आदमी को जो चाहिए उसकी घोषणाएं वह बिल्कुल भी नहीं करते हैं क्योंकि अब रेलवे का मकसद सिर्फ और सिर्फ बिजनेस करना रह गया है आम लोगों के जनकल्याण के लिए रेलवे कोई भी घोषणाएं नहीं कर रही है और ना ही आम लोगों पर ध्यान दे रही है. रेल मंत्री की घोषणाएं सीधे सीधे अपर क्लास लोगों के लिए होती है मिडिल क्लास और लोअर क्लास लोगों के लिए रेल मंत्री के पास ना कोई योजनाएं हैं ना कोई विचार है और ना ही कोई नया रेल चलाने के लिए ट्रैक. रेल मंत्री अब सिर्फ उन्हीं लोगों को अपना यात्री मानते हैं जो लोग ऐसी फर्स्ट क्लास और सेकंड क्लास में बैठते हैं बाकी लोगों को रेल मंत्री अपना यात्री नहीं मानते हैं इसलिए तो हमेशा ही यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है. दिल्ली में अपने औफिस में बैठकर रेल  मंत्री पता नहीं किस चीज की मौनिटरिंग करते हैं. रेल मंत्री के कार्यकाल में तमाम बड़े रेल हादसे हुए लेकिन इसके बावजूद भी वह अपने पद पर बने हुए हैं पता नहीं वह रेलवे में कौन सा बदलाव लेकर आना चाहते है जो आज तक रेल इतिहास में कभी नहीं हुआ है.

इन दिनों यह साफ दिखाई देता है कि रेलवे अपने बजट का बड़ा हिस्सा प्रचार, डिजिटलीकरण और पीआर में झोंक रहा है. जबकि धरातल में कोच टूटे, ट्रैक जर्जर हालात में और स्टेशन गंदी हालत में है. भारतीय रेलवे आज सुविधा नहीं मजबूरी बन कर रह गई है. आम आदमी के लिए अब रेल यात्रा कष्ट, धोखा, अपमान और त्रासदी बन गई है. सरकार को अपना प्रचार का भोपू बजाने से ज्यादा जनता का ध्यान देने की जरूरत है. वरना वह दिन दूर नहीं जब ऐतिहासिक भारतीय रेलवे के नाम से लोगों को घिन आने लगेगी.

Parivarik Kahani : सौतन का बेबी

Parivarik Kahani : हरीतिमा के आने से सरिता की परेशानी बहुत कम हो गई थी, क्योंकि वह घर का सारा काम संभाल लेती थी. पहले सरिता घर के बहुत से काम निबटा लेती थी. लेकिन जब से पति बीमार हुए थे और बिस्तर पकड़ चुके थे तब से पार्ट टाइम कामवाली बाई से उस का काम नहीं चलता था. उसे परमानैंट नौकरानी की जरूरत थी जो पूरा घर संभाल सके.

सरिता को पति का मैडिकल स्टोर सुबह से रात तक चलाना होता था. दुकान में 3 नौकर थे. सरिता बीच में थोड़ी देर के लिए खाना खाने और फ्रैश होने घर आती थी. सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक उसे मैडिकल स्टोर पर बैठना पड़ता था. काम सारा नौकर ही करते थे लेकिन हिसाब उसे ही देखना पड़ता था.

काफी समय तक सरिता को बहुत समस्या हुई. घर में एक बेटा, एक बेटी थे जो 8वीं और 9वीं क्लास में पढ़ते थे. उन के लिए चाय, नाश्ता, सुबह का टिफिन तैयार कर के स्कूल भेजना और शाम की चाय के बाद भोजन तैयार करना और खिलाना सब हरीतिमा की जिम्मेदारी थी.

बीमार पति को समय पर दवाएं और डाक्टर के बताए मुताबिक भोजन देना… यह सब हरीतिमा के बिना मुमकिन नहीं था.

सरिता जब बहुत परेशान हो गई तब उस ने एजेंसी में जा कर कई बार परमानैंट नौकरानी का इंतजाम करने के लिए कहा.

एक दिन एजेंसी के मालिक ने कहा, ‘‘अभी तो कोई लड़की नहीं है. जल्द ही असम और बिहार से लड़कियां आने वाली हैं. मैं आप को बता दूंगा.’’

सरिता ने एजेंसी वाले से कहा, ‘‘आप ज्यादा कमीशन ले लेना. लड़की को अच्छी तनख्वाह के साथ रहनेखाने की सारी सुविधाएं भी दूंगी लेकिन मुझे उस की सख्त जरूरत है.’’

और जल्द ही एजेंसी वाले का फोन आ गया. एजेंसी से 13 साल की हरीतिमा को लाने के बाद सरिता की सारी मुसीबतों का हल हो गया.

हरीतिमा सुबह से रात तक चकरघिन्नी बनी रहती. पूरे घर का काम करती. घर के हर सदस्य का ध्यान रखती.

हर समय पूरा घर साफसुथरा रहता. हरीतिमा हमेशा काम करती नजर आती. न कोई नखरा, न कोई शिकायत और न कोई छुट्टी.

13 साल की खूबसूरत, गोरी, नाजुक, मेहनती हरीतिमा बिहार के एक छोटे से गांव की थी. घर की माली हालत खराब थी. मां बीमार थीं. घर में 2 छोटे भाई थे. उस के पिता बचपन में ही गुजर गए थे.

शुक्रवार को जब मैडिकल स्टोर बंद रहता तब सरिता उस से बात करती. उस से पूछती, ‘‘किसी चीज की कोई जरूरत हो तो बेझिझक कहना. खाने में जो पसंद हो, बना कर खा लिया करो.’’

हरीतिमा को पढ़ने का शौक था. सरिता उस के लिए किताबें भी ला देती.

पति रतनलाल के एक के बाद एक 2-3 बड़े आपरेशन हुए थे. उन्हें आराम की सख्त जरूरत थी.

सरिता पति के कमरे में कम ही जाती थी. कमरे से आती दवाओं और गंदगी की बदबू से उसे उबकाई आती थी. पति की ऐसी बुरी दशा देखने का भी उस का मन नहीं करता था.

पति बिस्तर पर लेटे रहते. काफी समय तक तो उन के मलमूत्र का मार्ग बंद कर प्लास्टिक की थैलियां लटका दी गई थीं. उन्हें साफ करने का काम पहले तो एक नर्स करती थी, बाद में रतनलाल खुद करने लगे थे. लेकिन अब हरीतिमा ने इस जिम्मेदारी को संभाल लिया था.

सरिता को लगता था कि उस के पति की जिंदगी एक तरह से खत्म ही हो चुकी है. उन्हें बाकी जिंदगी बिस्तर पर ही गुजारनी है. ठीक हो भी गए तो पहले जैसे नहीं रहेंगे.

सरिता ने अपना कमरा अलग तैयार कर लिया था. अपनी जरूरतों के हिसाब से सबकुछ अपने कमरे में रख लिया था. बच्चे बड़े हो रहे थे. वह गलती से ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी कि बच्चों की जिंदगी पर उस का बुरा असर पड़े.

सरिता की उम्र 40 साल थी और पति की उम्र 45 साल के आसपास. पिछले एक साल से वह पति की दुकान और घर सब देख रही थी.

आज रतनलाल को प्लास्टिक की थैली निकलवाने जाना था, लेकिन यह बहुत आसान काम नहीं था.

सरिता को साथ जाना था लेकिन उस ने कह दिया, ‘‘मैं जा कर क्या करूंगी? मुझ से यह सब देखा नहीं जाता. तुम हरीतिमा को साथ ले जाओ. फिर मुझे दुकान भी देखनी है. काम करूंगी तो पैसा आएगा. आप के इलाज में लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं.’’

तय हुआ कि हरीतिमा ही साथ जाएगी.

रतनलाल अस्पताल से 3 दिन बाद घर वापस आए. उन्हें परहेज के साथ दवाएं समय पर लेनी थीं.

हरीतिमा बोर न हो, इस वजह से सरिता शुक्रवार को उसे बच्चों के साथ बाहर घुमाने ले जाती. बच्चे जो खाते, हरीतिमा को भी खिलाया जाता. चाट, पकौड़े, गोलगप्पे. बच्चे पार्क में खेलते तो हरीतिमा भी साथ में खेलती. बच्चों के लिए कपड़े खरीदने जाते तो हरीतिमा के लिए भी खरीदे जाते.

चाट खाते समय एक लड़के ने हरीतिमा से बात की. सरिता को अच्छा नहीं लगा. लौटते समय सरिता ने उस से पूछा, ‘‘तुम इसे कैसे जानती हो?’’

‘‘मेरे मुल्क का है मैडम.’’

‘‘मुल्क के नहीं राज्य के. मुल्क तो हम सब का एक ही है,’’ सरिता ने हंसते हुए कहा, फिर उसे समझाया, ‘‘देखो हरीतिमा, तुम मेरी बेटी जैसी हो. इस उम्र में लड़कों से दोस्ती ठीक नहीं है. अभी तुम्हारी उम्र महज 15 साल है.’’

अब हरीतिमा को अकसर ऐसी हिदायतें मिलने लगी थीं.

रतनलाल लाठी के सहारे घर में ही टहलने लगे थे. एक बार वे लड़खड़ा कर गिर गए. तब से सरिता ने हरीतिमा को हिदायत दी, ‘‘तुम अंकल को थोड़ा बाहर तक घुमा दिया करो. कहीं और कोई परेशानी न हो जाए.’’

तब से हरीतिमा घर से थोड़ी दूर बने पार्क में उन के साथ जाने लगी. वह पहले जैसी शांत और सहमी हुई नहीं थी. अब वह हंसने, बोलने लगी थी. खुश रहने लगी थी.

लेकिन हरीतिमा के खिलते शरीर और उस में आए बदलावों को देख कर सरिता जरूर चिंता में रहने लगी थी. उसे उस लड़के का चेहरा याद आया तो क्या बाहर जा कर इतनी उम्र में वह सब करने लगी थी हरीतिमा, जो उस की उम्र की लिहाज से गलत था? कहीं पेट में कुछ ठहर गया तो? सरिता ने एजेंसी वाले को सारी बात फोन पर बताई.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘‘मैडम, यह उस का निजी मामला है. हम और आप इस में क्या कर सकते हैं? वह अपनी नौकरी से बेईमानी नहीं करती. आप के घर की देखभाल ईमानदारी से कर रही है. और आप को क्या चाहिए?’’

सरिता को लगा कि एजेंसी वाला ठीक ही कह रहा है. फिर हरीतिमा उस की जरूरत बन गई थी. जरूरी नहीं कि दूसरी लड़की इतनी ईमानदार हो, मेहनती हो.

सरिता इस बात को भूलने की कोशिश कर ही रही थी. 2-4 दिन ही गुजरे थे कि सरिता ने हरीतिमा को उलटी करते हुए देख लिया.

सरिता घबरा गई. उस ने प्यार से हरीतिमा के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा, ‘‘तुम ने आखिर बेवकूफी कर ही दी. जब यह सब कर रही थी तो सावधानी क्यों नहीं बरती? कितना समय हो गया? अभी जा कर अपने चाहने वाले के साथ मिल कर डाक्टर से अबौर्शन करा लो. बाद में मुसीबत में पड़ जाओगी और तुम्हारे आशिक को बलात्कार के जुर्म में जेल हो जाएगी. इतना तो समझती होगी कि 18 साल से कम उम्र की लड़की से संबंध बनाना बलात्कार कहलाता है?’’

हरीतिमा ने कुछ नहीं कहा.

‘‘चुप रहने से काम नहीं चलेगा…’’ सरिता ने गुस्से में कहा, ‘‘मैं इस हालत में तुम्हें काम पर नहीं रख सकती. अभी इसी वक्त निकल जाओ मेरे घर से.’’

हरीतिमा रोने लगी. उस ने सरिता के पैर पकड़ते हुए कहा, ‘‘मैडम, गलती हो गई. मुझे माफ कर दीजिए. आप ही कोई रास्ता निकालिए. मैं इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

सरिता को गुस्सा तो था लेकिन हरीतिमा की जरूरत भी थी. उस ने अपने परिचित डाक्टर को दिखाया. एक महीने का पेट था. 5,000 रुपए ले कर डाक्टर ने आसानी से पेट गिरा दिया.

सरिता ने फिर डांटा, समझाया और दोबारा ऐसी गलती न करने को कहा.

रात में उसे अपने पास बिठा कर प्यार से पूछा, ‘‘कौन है वह, जिस के साथ तुम्हारे संबंध बने? चाटपकौड़े की दुकान में मिला वह लड़का?’’

हरीतिमा चुप रही. सरिता समझ गई कि वह बताना नहीं चाहती.

रतनलाल की ठीक होती तबीयत अचानक बिगड़ने लगी. उन्हें फिर अस्पताल ले जाया गया. डाक्टरों ने हालत गंभीर बताई. जिस कैंसर से वे उबर चुके थे, वही कैंसर उन्हें पूरी तरह अंदर ही अंदर खोखला कर चुका था.

अस्पताल में ही रतनलाल की मौत हो गई. उस दिन सरिता फूटफूट कर रोई और हरीतिमा अकेले में अपनी रुलाई रोकने की कोशिश करती रही.

पति के अंतिम संस्कार की सारी रस्में निबट चुकी थीं. सरिता की जिंदगी अपने ढर्रे पर आ चुकी थी. बच्चे अपनी पढ़ाई में लग चुके थे. दुख की परतें अब छंटने लगी थीं.

तभी फिर सरिता को हरीतिमा में वे सारे लक्षण दिखे जो एक गर्भवती औरत में दिखाई देते हैं. इस बार हरीतिमा अपने पेट को छिपाने की कोशिश करती नजर आ रही थी.

सरिता ने उसे गुस्से में थप्पड़ जड़ कर कहा, ‘‘फिर वही पाप…’’ इस बार हरीतिमा ने जवाब दिया, ‘‘पाप नहीं, मेरे प्यार की निशानी है.’’

हरीतिमा का जवाब सुन कर सरिता सन्न रह गई, ‘‘प्यार समझती भी हो? यह प्यार नहीं हवस है, बलात्कार है. चलो, अभी डाक्टर के पास,’’ सरिता ने गुस्से में कहा.

‘‘मैं नहीं गिराऊंगी.’’

‘‘यह कानूनन अपराध है. जेल जाएगा तुम्हारा आशिक.’’

‘‘कुछ भी हो, मैं इस बच्चे को जन्म दूंगी.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? समझती क्यों नहीं हो?’’

‘‘हां, मेरा दिमाग खराब है. प्यार ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है.’’

‘‘बुलाओ इस बच्चे के बाप को.’’

‘‘वे अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘क्या… कौन है वह?’’

‘‘मैं उन्हें बदनाम नहीं करना चाहती.’’

‘‘चली जाओ यहां से.’’

हरीतिमा चली गई. सरिता ने एजेंसी वाले को फोन कर दिया.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘‘आप निश्चिंत रहिए. मैं सब संभाल लूंगा.’’

सरिता निश्चिंत हो गई. कुछ दिन बीत गए. एक दिन वह घर की साफसफाई करने लगी. पति के कमरे का नंबर आया तो सरिता ने पति के सारे कपड़े, पलंग, बिस्तर सबकुछ दान कर दिया. वह एक अरसे बाद पति के कमरे में गई थी.

कमरा पूरी तरह खाली था. बस, एक पैन और डायरी रखी थी. सरिता ने डायरी के पन्ने पलटे. कुछ जगह हिसाब लिखा हुआ था. कुछ कागजों पर दवा लेने की नियमावली. एक पन्ने पर हरी स्याही से लिखा था हरीतिमा. यह नाम पढ़ कर वह चौंक गई. उस ने अपने कमरे में जा कर हरीतिमा के बाद पढ़ना शुरू किया…

‘सरिता, माना कि 15 साल की लड़की से प्यार करना गलत है. उस से संबंध बनाना अपराध है. लेकिन इस अपराध की हिस्सेदार तुम भी हो. मैं बीमार क्या हुआ, तुम ने मुझे मरा ही समझ लिया. अपना कमरा बदल लिया. मेरे कमरे में आना, मुझ से मिलना तक बंद कर दिया.

‘‘मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी, तुम ने सोचा कभी? लेकिन तुम तो जिम्मेदारियां निभाने में लगी थीं. मैं तो जैसे अछूत हो चुका था तुम्हारे लिए.

‘सच कहूं तो मैं तुम्हारी बेरुखी देख कर ठीक होना ही नहीं चाहता था. लेकिन मैं ठीक हुआ हरीतिमा की देखभाल से. उस के प्यार से.

‘हां, मैं ने हरीतिमा से तुम्हारी शिकायतें कीं. उस से प्यार के वादे किए. उस के पैर पड़ा कि मेरी जिंदगी में तुम्हीं बहार ला सकती हो. मुझे तुम्हारी जरूरत है हरीतिमा. मैं तुम से प्यार करता हूं.

‘कम उम्र की नाजुक कोमल भावों से भरी लड़की मेरे प्यार में बह गई. उस ने मेरी जिस्मानी और दिमागी जरूरतें पूरी कीं.

‘हां, वह मेरे ही बच्चे की मां बनने वाली है. मैं उस के बच्चे को अपना नाम दूंगा. दुनिया इसे पाप कहे या अपराध, लेकिन वह मेरा प्यार है. मेरी पतझड़ भरी जिंदगी में वह हरियाली बन कर आई थी.

‘इस घर पर जितना तुम्हारा हक है, उतना ही हरीतिमा का भी है. लेकिन अब मुझे लगने लगा है कि मैं बचूंगा नहीं. अचानक से सारे शरीर में पहले की तरह भयंकर दर्द उठने लगा है.

‘मैं तुम से किसी बात के लिए माफी नहीं मांगूंगा. चिंता है तो बस हरीतिमा की. अपने होने वाले बच्चे की. उसे तुम्हारी दौलत नहीं चाहिए. तुम्हारा बंगला, तुम्हारा बैंक बैलैंस नहीं चाहिए. उसे बस सहारा चाहिए, प्यार चाहिए.’

डायरी खत्म हो चुकी थी. सरिता अवाक थी. उसे अपने पति पर गुस्सा आ रहा था और खुद पर शर्मिंदगी भी. किस तरह झटक दिया था उस ने अपने पति को. बीमारी, लाचारी की हालत में. हां, वही जिम्मेदार है अपने पति की बेवफाई के लिए. इसे बेवफाई कहें या अकेले टूटे हुए इनसान की जरूरत.

सरिता को उसी एजेंसी से दूसरी लड़की मिल चुकी थी. उस ने पूछा, ‘‘तुम हरीतिमा को जानती हो?’’

‘‘नहीं मैडम, एजेंसी वाले जानते होंगे.’’

सरिता ने एजेंसी में फोन लगा कर बात की.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘क्या बताएं मैडम, किस के प्यार में थी? बच्चा गिराने को भी तैयार नहीं थी. न ही मरते दम तक बच्चे के बाप का नाम बताया.’

‘‘मरते दम तक… मतलब?’’ सरिता ने पूछा.

‘हरीतिमा बच्चे को जन्म देते समय ही मर गई थी.’

‘‘क्या…’’ सरिता चौंक गई ‘‘और बच्चा…’’

‘‘वह अनाथाश्रम में है.’’

सरिता सोचने लगी, ‘एक मैं हूं जिस ने पति के बंगले, कारोबार, बैंक बैलैंस को अपना कर पति को छोड़ दिया बंद कमरे में. बीमार, लाचार पति. बच्चों तक को दूर कर दिया. और एक गरीब हरीतिमा, जिस ने न केवल बीमारी की हालत में पति की देखभाल की, अपना सबकुछ सौंप दिया. यह जानते हुए भी कि उसे कुछ नहीं मिलेगा सिवा बदनामी के.

‘उस ने अपने प्यार की निशानी को जन्म दिया. वह चाहती तो क्या नहीं कर सकती थी? इस धनदौलत पर उस का भी हक बनता था. वह ले सकती थी लेकिन उस ने सबकुछ छोड़ दिया अपने प्यार की खातिर. उस ने एक बीमार मरते आदमी से प्यार किया और उसे निभाया भी और एक मैं हूं…

‘चाहे कुछ भी हो जाए, मैं हरीतिमा के प्यार की निशानी, अपने पति के बच्चे को इस घर में ला कर रहूंगी. मैं पत्नी का धर्म तो नहीं निभा सकी, पर उन की संतान के प्रति मां होने की जिम्मेदारी तो निभा ही सकती हूं.’

सारी कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद सरिता बच्चे को घर ले आई. Parivarik Kahani

Family Story : टूटते जुड़ते सपनों का दर्द – मुदित ने क्या लिखा था पत्र में?

Family Story : 7कालेज की लंबी गोष्ठी ने प्रिंसिपल गौरा को बेहद थका डाला था. मौसम भी थोड़ा गरम हो चला था, इसलिए शाम के समय भी हवा में तरावट का अभाव था. उन्होंने जल्दीजल्दी जरूरी फाइलों पर हस्ताक्षर किए और हिंदी की प्रोफेसर के साथ बाहर आईं. अनुराधा की गाड़ी नहीं आई थी, सो उन्हें भी अपनी गाड़ी में साथ ले लिया. घर आने पर अनुराधा ने बहुत आग्रह किया कि चाय पी कर ही वे जाएं, लेकिन एक तो गोष्ठी की गंभीर चर्चाओं पर बहस की थकान, दूसरे मन की खिन्नता ने वह आमंत्रण स्वीकार नहीं किया. वे एकदम अपने कमरे में जाना चाह रही थीं.

सुबह से ही मन खिन्न हो उठा था. अगर यह अति आवश्यक गोष्ठी नहीं होती तो वे कालेज जाती भी नहीं. आज की सुबह आंखों में तैर उठी. कितनी खुश थीं सुबह उठ कर. सिरहाने की लंबी खिड़की खोलते ही सिंदूरी रंग का गोला दूर उठता हुआ रोज नजर आता. आज भी वे उस रंग के नाजुक गाढ़ेपन को देख कर मुग्ध हो उठी थीं. तभी पड़ोस में रहने वाली अनुराधा के नौकर ने बंद लिफाफा ला कर दिया, जो कल शाम की डाक से आया था और भूल से उन के यहां डाकिया दे गया था.

उसी मुदित भाव से लिफाफा खोला. छोटी बहन पूर्वा का पत्र था उस में. गोल तकिए पर सिर टेक कर आराम से पढ़ने लगीं, लेकिन पढ़तेपढ़ते उन का मन पत्ते सा कांपने लगा और चेहरे से जैसे किसी ने बूंदबूंद खुशी निचोड़ ली थी. ऐसा लगा कि वे ऊंची चट्टान से लुढ़क कर खाई में गिर कर लहूलुहान हो गई हैं. जैसे कोई दर्द का नुकीला पंजा है जो धीरेधीरे उन की ओर खौफनाक तरीके से बढ़ता आ रहा है. उन की आंखों से मन का दर्द पानी बन कर बह निकला.

दरवाजे की घंटी बजी. दुर्गा आ गई थी काम करने. गौरा ने पलकों में दर्द समेट लिया और कालेज जाने की तैयारी में लग गईं. मन उजाड़ रास्तों पर दौड़ रहा था, पागल सा. आंखें खुली थीं, पर दृष्टि के सामने काली परछाइयां झूल रही थीं. कितनी कठिनाई से पूरा दिन गुजारा था उन्होंने. हंसीं भी, बोलीं भी, कई मुखौटे उतारतीचढ़ाती भी रहीं, परंतु भीतर का कोलाहल बराबर उन्हें बेरहमी से गरम रेत पर पछाड़ता रहा. क्या पूर्वा का जीवन संवारने की चेष्टा व्यर्थ गई? क्या उन के हाथों कोई अपराध हुआ है, जिस की सजा पूरी जिंदगी पूर्वा को झेलनी होगी?

अपने कमरे में आ कर वे बिस्तर पर निढाल हो कर पड़ गईं. मैले कपड़ों की खुली बिखरी गठरी की तरह जाने कितने दृश्य आंखों में तैरने लगे. विचारों का काफिला धूल भरे रास्तों में भटकने लगा.

3 भाइयों के बाद उन का जन्म हुआ था. सभी बड़े खुश हुए थे. कस्तूरी काकी और सोना बूआ बताती रहती थीं कि 7 दिन तक गीत गाए गए थे और छोटेबड़े सभी में लड्डू बांटे गए थे. बाबा ने नाम दिया, गौरा. सोचा होगा कि बेटी के बाद और लड़के होंगे. इसी पुत्र लालसा के चक्कर में 2 बहनें और हो गईं. तब न गीत गाए गए और न लड्डू ही बांटे गए.

कहते हैं न कि जब लोग अपनी स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति मनचाहे ढंग से प्राप्त नहीं कर पाते हैं तब घर के द्वारदेहरी भी रुष्ट हो जाते हैं. वहां यदि अपनी संतान में बेटाबेटी का भेद कर के निराशा, कुंठा, निरादर और घृणा को बो दिया जाए तो घर एक सन्नाटा भरा खंडहर मात्र रह जाता है.

उस भरेपूरे घर में धीरेधीरे कष्टों के दायरे बढ़ने प्रारंभ होने लगे. बड़े भाई छुट्टी के दिन अपने साथियों के साथ नदी स्नान के लिए गए थे. तैरने की शर्त लगी. उन्हें नदी की तेज लहरें अपने चक्रवात में घेर कर ले डूबीं. लौट कर आई थी उन की फूली हुई लाश. घर भर में कुहराम मच गया था. मां और बाबूजी पागल हो उठे. बाबा की आंखें सूखे कुएं की तरह अंधेरों से अट गईं.

धीमेधीमे शब्दों में कहा जाने लगा कि तीनों लड़कियां भाई की मौत का कारण बनी हैं. न तीनों नागिनें पैदा होतीं और न हट्टाकट्टा भाई मौत का ग्रास बनता. समय ने सभी के घावों को पूरना शुरू ही किया था कि बीच वाले भाई हीरा के मोतीझरा निकला. वह ऐसा बिगड़ा कि दवाओं और डाक्टरों की सारी मेहनत पर पानी फेरता रहा.

मौत फिर दबेपांव आई और चुपचाप अपना काम कर गई. इस बार के हाहाकार ने आकाश तक हिला दिया. पिता एकदम टूट गए. 20 वर्ष आगे का बुढ़ापा एक रात में ही उन पर छा गया था. बाबा खाट से चिपक गए थे. मां चीखचीख कर अधमरी हो उठीं और बिना किसी लाजहिचक के जोरजोर से घोषणा करने लगीं कि मेरी तो लड़कियां ही साक्षात मौत बन कर पूरा कुनबा खत्म करने आई हैं. इन का तो मुंह देखना भी पाप है.

महल्ला, पड़ोस, रिश्तेदार सभी परिवार के सदस्यों के साथ तीनों बहनों को भरपूर कोसने लगे. अपने ही घर में तीनों किसी एकांत कोने में पड़ी रहतीं, अपमानित और दुत्कारी हुईं. न कोई प्यार से बोलता, न कोई आंसू पोंछता. तीनों की इच्छाएं मर कर काठ हो गईं. लाख सोचने पर भी वे यह समझ नहीं पाईं कि भाइयों की मृत्यु से उन का क्या संबंध है, वे मनहूस क्यों हैं.

तीसरा भाई बचपन से जिद्दी व दंगली किस्म का था. अब अकेला होने पर वह और बेलगाम हो गया था. सभी उसी को दुलारते रहते. उस की हर जिद पूरी होती और सभी गलतियां माफ कर दी जातीं. नतीजा यह हुआ कि वह स्कूल में नियमित नहीं गया. उलटेसीधे दोस्त बन गए. घर से बाहर सुबह से शाम तक व्यर्थ में घूमता, भटकता रहता. ऐसे ही गलत भटकाव में वह नशे का भयंकर आदी हो गया. न ढंग से खाता, न नींद भर सो पाता था. मातापिता से खूब जेबखर्च मिलता. कोई सख्ती से रोकनेटोकने वाला नहीं था. एक दिन कमरे में जो सोया तो सुबह उठा ही नहीं. उस के चारों ओर नशीली गोलियों और नशीले पाउडरों की रंग- बिरंगी शीशियां फैली पड़ी थीं और वह मुंह से निकले नीले झाग के साथ मौत की गोद में सो रहा था.

उस की ऐसी घिनौनी मौत को देख कर तो जैसे सभी गूंगेबहरे से हो उठे थे. पूरे पड़ोस में उस घर की बरबादी पर हाहाकार मच गया था. कहां तक चीखतेरोते? आंसुओं का समंदर भीतर के पहाड़ जैसे दुख ने सोख लिया था. घर भर में फैले सन्नाटे के बीच वे तीनों बहनें अपराधियों की तरह खुद को सब की नजरों से छिपाए रहती थीं. उचित देखभाल और स्नेह के अभाव में तीनों ही हर क्षण भयभीत रहतीं. अब तो उन्हें अपनी छाया से भी भय लगने लगा था. दिन भर उन्हें गालियां दे कर कोसा जाता और बातबात पर पिटाई की जाती.

जानवर की तरह उन्हें घर के कामों में जुटा दिया गया था. वे उस घर की बेटियां नहीं, जैसे खरीदी हुई गुलाम थीं, जिन्हें आधा पेट भोजन, मोटाझोटा कपड़ा और अपशब्द इनाम में मिलते थे. पढ़ाई छूट गई थी. गौरा तो किसी तरह 10वीं पास कर चुकी थी लेकिन छोटी चित्रा और पूर्वा अधिक नहीं पढ़ पाईं. जब भी सगी मां द्वारा वे दोनों जानवरों की तरह पीटी जातीं, तब भयभीत सी कांपती हुई दोनों बड़ी बहन के गले लग कर घंटों घुटीघुटी आवाज में रोती रहती थीं.

कुछ भीतरी दुख से, कुछ रातदिन रोने से पिता की आंखें कतई बैठ गई थीं. वे पूरी तरह से अंधे हो गए थे. मां को तो पहले ही रतौंधी थी. शाम हुई नहीं कि सुबह होने तक उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था. बाबा का स्नेह उन बहनों को चोरीचोरी मिल जाया करता था लेकिन शीघ्र ही उन की भी मृत्यु हो गई थी.

पिता की नौकरी गई तो घर खर्च का प्रश्न आया. तब बड़ी होने के नाते गौरा अपना सारा भय और अपनी सारी हिचक,  लज्जा भुला कर ट्यूशन करने लगी थी. साथ ही प्राइवेट पढ़ना शुरू कर दिया. बहनों को फिर से स्कूल में दाखिला दिलाया. तीनों बहनों में हिम्मत आई, आत्मसम्मान जागा.

तीनों मांबाबूजी की मन लगा कर सेवा करतीं और घरबाहर के काम के साथसाथ पढ़ाई चलती रही. वे ही मनहूस बेटियां अब मां और बाबूजी की आंखों की ज्योति बन उठी थीं, सभी की प्रशंसा की पात्र. महल्ले और रिश्तेदारी में उन के उदाहरण दिए जाने लगे. घर में हंसीखुशी की ताजगी लौट आई. इस ताजगी को पैदा करने में और बहनों को ऊंची शिक्षा दिलाने में वे कब अपने तनमन की ताजगी खो बैठीं, यह कहां जान सकी थीं? विवाह की उम्र बहुत पीछे छूट गई थी. छोटेबड़े स्कूलों का सफर करतेकरते इस कालेज की प्रिंसिपल बन गईं. घर में गौरा दीदी और कालेज में प्रिंसिपल डा. गौरा हो गई थीं. छोटी दोनों बहनों की शादियां उन्होंने बड़े मन से कीं. बेटियों की तरह विदा किया.

चित्रा के जब लगातार 5 लड़कियां हुईं, तब उस को ससुराल वालों से इतने ताने मिले, ऐसीऐसी यातनाएं मिलीं कि एक बार फिर उस का मन आहत हो उठा. बहुत समझाया उन लोगों को. दामाद, जो अच्छाखासा पढ़ालिखा, समझदार और अच्छी नौकरी वाला था, उसे भी भलेबुरे का ज्ञान कराया, परंतु सब व्यर्थ रहा.

चित्रा की ससुराल के पड़ोस में ही सुखराम पटवारी की लड़की सत्या की शादी हुई थी. उस ने आ कर बताया था, ‘बेकार इन पत्थरों के ढोकों से सिर फोड़ती हो, दीदी. उन पर क्या असर होने वाला है? हां, जब भी तुम्हारे खत जाते हैं या उन्हें समाज, संसार की बातें समझाती हो, तब और भी जलीकटी सुनाती हैं चित्रा की सास और जेठानी. जिस दामाद को भोलाभाला समझती हो, वह पढ़ालिखा पशु है. मारपीट करता है. हर समय विधवा ननद तानों से चित्रा को छलनी करती रहती है. चित्रा तो सूख कर हड्डियों का ढांचा भर रह गई है. बुखार, खांसी हमेशा बनी रहती है. ऊपर से धोबिया लदान, छकड़ा भर काम.’’

वे कांप उठी थीं सत्या से सारी बातें सुन कर. उस के लिए उन का मन भीगभीग उठा था. बचपन में मां से दुत्कारी जाने पर वे उसे गोदी में छिपा लेती थीं. उन की विवशता भीतर ही भीतर हाहाकार मचाए रहती थी.

एक दिन बुरी खबर आ ही गई कि क्षयरोग के कारण चित्रा चल बसी है. शुरू से ही अपमान से धुनी देह को क्षय के कीटाणु चाट गए अथवा ससुराल के लोग उस की असामयिक मौत के जिम्मेदार रहे? प्रश्नों से घिर उठीं वे हमेशा की तरह.

और इधर आज महीनों बाद मिला यह पूर्वा का पत्र. क्या बदल पाईं वे बहनों का जीवन? सोचा था कि जो कुछ उन्हें नहीं मिला वह सबकुछ बहनों के आंचल में बांध कर उन के सुखीसंपन्न जीवन को देखेगी. कितनी प्रसन्न होगी जीवन की इस उतरती धूप की गहरी छांव में. अपनी सारी महत्त्वाकांक्षाएं और मेहनत से कमाई पाईपाई उन पर न्योछावर कर दी थी. हृदय की ममता से उन्हें सराबोर कर के अपने कर्तव्यों का एकएक चरण पूरा किया परंतु…

पंखे की हवा से जैसे पूर्वा के पत्र का एकएक अक्षर उन के सामने गरम रेत के बगलों की तरह उड़ रहा था या कि जैसे पूर्वा ही सामने बैठ कर हमेशा की तरह आंसुओं में डूबी भाषा बोल रही थी. किसे सुनाएं वे मन की व्यथा? पत्र का एक- एक शब्द जैसे लावा बन कर भीतर तक झुलसाए जा रहा था :

‘दीदी, मैं रह गई थी बंजर धरती सी सूनीसपाट. कितने वर्ष काटे मैं ने ‘बंजर’ शब्द का अपमान सहते हुए और आप भी क्या कम चिंतित और बेचैन रही थीं मेरी मानसिकता देखसुन कर? फिर भी मैं अपनेआप को तब सराहने लगी थी जब आप के बारबार समझाने पर मेरे पति और ससुराल के सदस्य किसी बच्चे को गोद लेने के लिए इस शर्त पर तैयार हो गए थे कि एकदम खोजबीन कर के तुरंत जन्मा बच्चा ही लिया जाएगा और आप ने वह दुरूह कार्य भी संपन्न कराया था.

‘‘फूल सा कोमल सुंदर बच्चा पा कर सभी निहाल हो उठे थे. सास ने नाम दिया, नवजीत. ससुर प्यार से उसे पुकारते, निर्मल. बच्चे की कच्ची दूधिया निश्छल हंसी में हम सभी निहाल हो उठे. आप भी कितनी निश्ंिचत और संतुष्ट हो उठीं, लेकिन दीदी, पूत के पांव पालने में दिखने शुरू हो गए थे. मैं ने आप को कभी कुछ नहीं बताया था. सदैव उस की प्रशंसा ही लिखतीसुनाती रही. आज स्वयं को रोक नहीं पा रही हूं, सुनिए, यह शुरू से ही बेहद हठी और जिद्दी रहा. कहना न मानना, झूठ बोलना और बड़ों के साथ अशिष्ट व्यवहार करना आदि. स्कूल में मंदबुद्धि बालक माना गया.

‘क्या आप समझती हैं कि हमसब चुप रहे? नहीं दीदी, लाड़प्यार से, डराधमका कर, अच्छीअच्छी कहानियां सुना कर और पूरी जिम्मेदारी से उस पर नजर रख कर भी उस के स्वभाव को रत्ती भर नहीं बदल सके. आगे चल कर तो कपटछल से बातें करना, झूठ बोलना, धोखा देना और चोरी करना उस की पहचान हो गई. पेशेवर चोरों की तरह वह शातिर हो गया. स्कूल से भागना, सड़क पर कंचे खेलना, उधार ले कर चीजें खाना, मारनापीटना, अभद्र भाषा बोलना आदि उस की आदत हो गई. सभी परेशान हो गए. शक्लसूरत से कैसा मनोहारी, लेकिन व्यवहार में एकदम राक्षसी प्रवृत्ति वाला.

‘उम्र बढ़ने के साथसाथ उस की आवारागर्दी और उच्छृंखलता भी बढ़ने लगी. दीदी, अब वह घर से जेवर, रुपया और अपने पिता की सोने की चेन वाली घड़ी ले कर भाग गया है. 2 दिन हो चुके हैं. गलत दोस्तों के बीच क्या नहीं सीखा उस ने? जुए से ले कर नशापानी तक. सब बहुत दुखी हैं. कैसे करते पुलिस में खबर? अपनी ही बदनामी है. स्कूल से भी उस का नाम काट दिया गया था. हम क्या रपट लिखाएंगे, किसी स्कूटर की चोरी में उस की पहले से ही तलाश हो रही है.

‘दीदी, यह कैसा पुत्र लिया हम ने? इस से अच्छा तो बांझपन का दुख ही था. यों सांससांस में शर्मनाक टीसें तो नहीं उठतीं. संतानहीन रह कर इस दोहरेतिहरे बोझ तले तो न पिसती हम लोगों की जिंदगी. पढ़ेलिखे, सुरुचिपूर्ण, सुसंस्कृत परिवार के वातावरण में उस बालक के भीतर बहता लहू क्यों स्वच्छ, सुसंस्कृत नहीं हुआ, दीदी? हमारी महकती बगिया में कहां से यह धतूरे का पौधा पनप उठा? लज्जा और अपमान से सभी का सुखचैन समाप्त हो गया है. गौरा दीदी, आप के द्वारा रोपा गया सुनहरा स्वप्न इतना विषकंटक कैसे हो उठा कि जीवन पूर्णरूप से अपाहिज हो उठा है. परंतु इस में आप का भी क्या दोष?’

पत्र का अक्षरअक्षर हथौड़ा बन कर सुबह से उन पर चोट कर रहा था. टूटबिखर तो जाने कब की वे चुकी थीं, परंतु पूर्वा के खत ने तो जैसे उन के समूचे अस्तित्व को क्षतविक्षत कर डाला था. वे सोचने लगीं कि कहां कसर रह गई भला? इन बहनों को सुख देने की चाह में उन्होंने खुद को झोंक दिया. अपने लिए कभी क्षण भर को भी नहीं सोचा.

क्या लिख दें पूर्वा को कि सभी की झोली में खुशियों के फूल नहीं झरा करते पगली. ठीक है कि इस बालक को तुम्हारी सूनी, बंजर कोख की खुशी मान कर लिया था, एक तरह से उधार लिया सुख. एक बार जी तो धड़का था कि न जाने यह कैसी धरती का अंकुर होगा? जाने क्या इतिहास होगा इस का? लेकिन तसल्ली भरे विश्वास ने इन शंकालु प्रश्नों को एकदम हवा दे दी थी कि तुम्हारे यहां का सुरुचिपूर्ण, सौंदर्यबोध और सभ्यशिष्ट वातावरण इस के भीतर नए संस्कार भरने में सहायक होगा. पर हुआ क्या?

लेकिन पूर्वा, इस तरह हताश होने से काम नहीं चलेगा. इस तरह से तो वह और भी बागी, अपराधी बनेगा. अभी तो कच्ची कलम है. धीरज से खाद, पानी दे कर और बारबार कटनीछंटनी कर के क्या माली उसी कमजोर पौधे को जमीन बदलबदल कर अपने परीक्षण में सफल नहीं हो जाता? रख कर तो देखो धैर्य. बुराई काट कर ही उस में नया आदमी पैदा करना है तुम्हें. टूटे को जोड़ना ही पड़ता है. यही सार्थक भी है.

यह सोचते ही उन में एक नई शक्ति सी आ गई और वे पूर्वा को पत्र लिखने बैठ गईं. Family Story

Love Stories In Hindi : ऐ चांद जहां वो जाएं

Love Stories In Hindi : आज से लगभग 60 साल पहले की बात है. तब मैं हरिद्वार के पन्ना लाल भल्ला इंटर कालेज में 10वीं क्लास में पढ़ता था. मेरे पिताजी हरिद्वार में स्टेशन मास्टर थे. हरिद्वार का अपना ही महत्त्व था. भारत के दूरदराज से आने वाले यात्रियों के लिए रेलगाड़ी ही एकमात्र साधन था. शायद अंगरेजों ने इसी के चलते सोचा होगा कि यहां किसी  वक्त बहुत बड़ी लड़ाई हुई होगी, इसलिए स्टेशन मास्टर साहब के रहने के लिए वैस्टर्न स्टाइल का घर बनाया.

हमारे घर की बाउंड्री वाल के साथ सड़क के किनारे पर एक झोंपड़ी थी. इस में सतीश मेरा दोस्त रहता था. उस के पिता मोची थे, जो सड़क के किनारे बैठ कर लोगों के जूतों की मरम्मत व पौलिश किया करते थे. मांबाप की इकलौती औलाद थी सतीश, जिस पर उन की उम्मीदें टिकी थीं. अपना पेट काट कर वे सतीश की पढ़ाई और देहरादून में रहने का खर्च उठाते थे. सतीश देहरादून के डीएवी कालेज से एमए इंगलिश लिटरेचर में अपनी पढ़ाई कर रहा था. लगभग 21-22 साल का नौजवान, दरमियाना कद, पतला शरीर और सब से अधिक प्रभावित करने वाली थी उस की गहरे सांवले रंग की आंखें, जो उस के काले रंग के बावजूद किसी को भी आकर्षित कर सकती थीं. उस का सपना था कि वह आईएएस अफसर बनेगा.

सतीश के इंगलिश विभाग के हैड प्रोफैसर शुक्ला का मानना था कि वह एक दिन जरूर बड़ा आदमी बनेगा. यहां तक कि वह चाहते थे कि एमए पूरी करने के बाद वह कालेज में ही इंगलिश विभाग का प्रोफैसर बने. इतनी खूबियों का मालिक होने के बावजूद वह जब भी गाता तो सुनने वाले उस के मुरीद हो जाते. वह बात करता तो ऐसा लगता मानो घंटियां बज रही हैं.

घर के ही पास रहने और देहरादून में पढ़ने के चलते मेरी दोस्ती सतीश से हो गई थी. वह गाहेबगाहे हमारे घर आता. शायद उसे अहसास हो गया था कि उस के घरेलू हालात को देखतेजानते भी हम कोई भेदभाव नहीं करते. कहना न होगा कि वह हमारे परिवार का एक सदस्य ही बन गया था. मैं भी सतीश के पास झोंपड़ी में जाता तो उस की मां बड़े प्रेम से एक पुरानी प्याली में चाय पिलाती. झोंपड़ी में घरगृहस्थी का थोड़ा सा ही सामान था. हां, सतीश की पढ़ाई की मोटीमोटी किताबें एक पुरानी लक्कड़ की अलमारी में करीने से सजी हुई थीं.

जब भी सतीश कालेज से गरमियों की छुट्टियों में हरिद्वार आता तो हम दोनों गंगा पर बने पुल मायापुर डैम, जो हमारे घर से 2 किलोमीटर और था, में शाम को साथसाथ जाते.

यों तो आज से 60 साल पहले का हरिद्वार भक्तिपूर्ण वातावरण के कारण हरि का द्वार था. गंगा की धारा पर बने मायापुरी डैम का अपना ही आकर्षण था. शाम के झुटपुटे में गंगा की पवित्र कलकल करती धारा, क्षितिज के पार सूर्य नारायण की ब्रह्मांड की यात्रा से थक कर जल धारा पर पड़ती रंगबिरंगी किरणें और गंगा के साथ मंदमंद बहती बयार हमें अलग ही दुनिया में ले जाती थी.

मायापुरी डैम के किनारे पड़ी बैंच पर हम दोनों बैठ जाते. ऐसे माहौल में सतीश अपने कालेज के बारे में खुल कर बातें किया करता था और मैं 10वीं कक्षा का छात्र उस की बातें बड़े चाव से सुनता.

उस ने बताया कि कालेज के वार्षिकोत्सव में उस ने शैक्सपियर के एक नाटक में हीरो और उस की कक्षा में पढ़ने वाली लड़की मानसी ने हीरोइन का पार्ट किया था, जिस में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला था. मानसी का जिक्र करते ही उस का चेहरा चमक उठता था.

…और फिर शुरू होता सिलसिला गानों का. मेरा चहेता गाना वह जरूर गाता था, ‘‘रमैया वस्ता वईय्या, रमैया वस्ता वईय्या, मैं ने दिल तुझ को दिया…’’

सतीश की आवाज में ऐसी कशिश थी कि डैम पर सैर करने वाले सैर छोड़ कर हमारी बैंच के आसपास व गाने सुनने को खड़े हो जाते थे. पर उस का सब से चहेता गाना था, जिसे वह पूरी शिद्दत से गाता था,    ‘‘ऐ चांद जहां वो जाएं तू भी साथ चले जाना, वैसे है कहां है वो हर रात खबर लाना…’’ गाते हुए वह किसी और ही दुनिया में खो जाता था.

10वीं कक्षा पास कर ली थी. पिताजी का भी हरिद्वार से ट्रांसफर हो गया था. मेरे जाने के दिन नजदीक आ रहे थे. पर, सतीश गरमियों की छुट्टियों में नहीं आया था. एक दिन मैं उस के मांबाप से मिलने उस की झोंपड़ी में गया, तो बाहर ताला लगा हुआ था. मैं सोच ही रहा था कि क्या करूं, तभी हमारे रेलवे के टिकट बाबू मिश्रा अंकल भी जो पास ही रेलवे क्वार्टर में रहते थे, मुझे अकसर सतीश के साथ देखते थे. वे हाथ हिला कर मुझे बुला रहे थे. मैं उन के पास चला गया. कमरे में पड़ी हुई कुरसी पर बैठते हुए मैं ने पूछा, ‘‘सतीश के घर पर ताला लगा हुआ है, क्या वे सब कहीं गए हैं?”

मिश्रा अंकल ने लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘‘सतीश ने कुछ दिन पहले मायापुरी डैम से गंगा में कूद कर आत्महत्या कर ली है,’’ कहते हुए उन की आंखें नम हो गई थीं.

मुझे लगा कि मैं ने कुछ गलत सुन लिया है. मिश्रा अंकल रुंधे गले से बोले जा रहे थे, “गुरबीर, उस की क्लास में एक लड़की पढ़ती थी, कालेज में एक ड्रामे के दौरान उन की दोस्ती हो गई. वे एकदूसरे को चाहने लगे थे. वह जानती थी कि सतीश एमए इंगलिश में कालेज ही नहीं यूनिवर्सिटी का सब से मेधावी छात्र है. उस का आईएएस अफसर बनने का सपना साकार हो कर रहेगा.”

मैं मूक बना सुन रहा था और मिश्रा अंकल बोले जा रहे थे, ‘‘लड़की का नाम मानसी था और वह देहरादून के एक प्रतिष्ठित अमीर घराने की लड़की थी.”

सतीश ने उस से यह बात छिपाई थी कि उस के पिता एक मोची हैं और वह लोगों के जूते पौलिश, मरम्मत करते हैं. हो सकता है कि  उस ने इस डर से कि लड़की उस से मिलनाजुलना न बंद कर दे, सचाई नहीं बताई.

मैं ने देखा कि मिश्रा अंकल की पत्नी भी कमरेे में आ गई थीं. उन की भी आंखें नम थीं. मिश्रा अंकल ने कहा, ‘‘लड़की के पिता को उन के प्रेम संबंधों की जानकारी हो गई थी. उस के पिता ने हरिद्वार में रह रहे अपने मित्रों, संबंधियों से सतीश के बारे में जानकारी हासिल कर ली थी. लड़की के मातापिता हरिद्वार आए, लड़की भी उन के साथ थी. लड़की को सतीश की सचाई के बारे में पता चल चुका था. उस ने अपनी आंखों से सतीश की झोंपड़ी, जिस में उस का परिवार रहता था, सड़क के किनारे बैठे मोची को उस के पिता ने देख लिया था. लड़की ने सतीश के सामने सारी बातें खोल दी थीं, उस ने सतीश से बोलनाचालना बंद कर दिया था. लड़की के पिता ने सतीश को कालेज छोड़ने के लिए कहा और ऐसा न करने पर जान से मारने की धमकी दी. सतीश ने पढ़ाई छोड़ दी थी और वह हरिद्वार अपने मांबाप के पास आ गया था. अब वह पहले वाला आशाविश्वास से भरा सतीश नहीं रह गया था. उस ने लोगों से मिलनाजुलना बंद कर दिया था. वह अपने में ही खोयाखोया सा रहता था और घर में ही पड़ा रहता था.

मिश्रा आंटी की आंखों में आंसू थे. वे कह रही थीं, ‘‘गुरबीर, कितना बुरा हुआ एक होनहार बच्चे का ऐसा दर्द भरा अंत. उस के मांबाप इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर पाए. दोनों झोंपड़ी में ताला लगा कर कहीं चले गए हैं. कुछ लोग कहते हैं कि अपने गांव चले गए  है… पर पता नहीं, वे कहां गए हैं.

आज 60 साल से भी अधिक हो गए हैं, पर सतीश नहीं भूलता और न ही भूलता है उस का गाना, ‘‘ऐ चांद जहां वो जाएं तू भी साथ चले जाना…’’  Love Stories In Hindi

Stories In Hindi Love : जन्मदिन का तोहफा

Stories In Hindi Love : सुमन ने अपनी बड़ी बहन दीपिका की मौत के बाद उस की गृहस्थी की डोर मजबूती से थाम ली थी लेकिन रमेश उस के समर्पण, प्यार का हर पल तिरस्कार करता रहा. सुमन आखिर कब तक सहती. प्रस्तुत है, स्मिता टोके की दिल को छूती कहानी.

‘‘कितनी लापरवाही से काम करती हो तुम,’’ रमेश के स्वर की कड़वाहट पिघले सीसे की तरह कानों में उतरती चली गई.

सुबहसुबह काम की हड़बड़ी में रमेश के लिए रखा दूध का गिलास मेज पर लुढ़क गया था. सुमन बेजबान बन कर अपमान के घूंट पीती रही, फिर खुद को संयत कर बोली, ‘‘टिफिन तो रख लो.’’

‘‘भाड़ में जाए तुम्हारा टिफिन. बच्चा रो रहा है और तुम्हें टिफिन की पड़ी है.’’

‘‘ले रही हूं विनय को, लेकिन आप के खानेपीने की चिंता भी तो मुझे ही करनी पडे़गी न.’’

‘‘छोड़ो ये बड़ीबड़ी बातें,’’ रोज की तरह सुमन को शर्मिंदा कर रमेश जूते खटखटाते हुए आफिस निकल गए और सुमन ठगी सी खड़ी रह गई. नन्हे विनय को गोद में उठा कर वह जब तक आंगन में पहुंचती, रमेश गाड़ी स्टार्ट कर फुर्र से निकल गए, न मुड़ कर देखा, न परवा की.

‘‘अच्छा, भूख लगी है राजा बेटे को. हांहां, हम बिट्टू को दूध पिलाएंगे…’’ सुमन के हाथ यंत्रवत बोतल में दूध भरने लगे. मुंह में दूध की बोतल लगते ही विनय का रोना थम गया. लेकिन सुमन तो जैसे झंझावात से घिर गई थी. अंतर्मन में घुमड़ रहे बवंडर पर उस का खुद का भी बस न था.

वह सोच रही थी, आखिर उस की गलती क्या है? क्या समर्पण का यही फल मिलेगा उसे. 22 साल की उम्र में उस ने अपनी भावनाओं का गला घोंट दिया. दीदी के उजड़े परिवार को बसाने की खातिर खुद का बलिदान दे दिया तो क्या गलती हो गई उस से. यह ठीक है कि दीपिका दीदी के असमय बिछोह ने रमेश को अस्तव्यस्त कर दिया है, लेकिन क्या इस के लिए वह सुमन पर जबतब व्यंग्य बाण चलाने का हकदार बन जाते हैं?

दूसरे दिन आने वाले अपने जन्मदिन पर सुमन ने अपनी सहेलियों को घर पर आमंत्रित किया. मधु, रीना, वाणी, महिमा सब कितनी बेताब थीं उस के घर आने को. सुमन की अचानक हुई शादी में शामिल न होने की कसर वे उस का जन्मदिन मना कर ही पूरी कर लेना चाहती थीं. सुबह की घटना को भूल कर सुमन ने रमेश के सामने बात छेड़ी, ‘‘सुनिए, कल मैं ने कुछ सहेलियों को घर पर बुलाया है. आप भी 6 बजे तक आ जाएंगे न.’’

‘‘क्यों, कल क्या है?’’ रमेश ने आंखें तरेरते हुए पूछा.

‘तो जनाब का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है,’ सुमन मन ही मन सोचते हुए चुहल के मूड में बोली, ‘‘जैसे आप को मालूम ही नहीं है?’’

‘‘हां, नहीं मालूम मुझे, क्या है कल?’’ कहते हुए रमेश के माथे पर बल पड़ गए.

रमेश के तेवर देख कर सुमन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. वह मायूसी से बोली, ‘‘मधु, वाणी वगैरह कल मेरा बर्थडे मनाना चाहती थीं. इसी बहाने मिलना भी हो जाएगा और हम सहेलियां मिल कर गपशप भी कर लेंगी.’’

‘‘बर्थडे और तुम्हारा? ओह, कम आन सुमन. एक बच्चे की मां हो तुम और बर्थडे मनाओगी, सहेलियों को बुलाओगी. यह बचकानापन छोड़ो और थोड़ी मैच्योर हो जाओ,’’ रमेश की बातें सुन कर उस के धैर्य का बांध टूटने लगा.

‘‘इस में बचकानेपन की क्या बात है? आप नहीं आ पाएंगे क्या?’’ वह संयत स्वर में बोली.

‘‘देखूंगा. वैसे तुम्हारी सहेलियों से मिलने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. और तुम तो जानती हो कि दीपिका के बाद कोई भी फंक्शन, भले ही वह छोटा क्यों न हो, मैं उस में शामिल होना पसंद नहीं करता. फिर क्यों जोर दे रही हो तुम?’’ रमेश की आवाज में उपेक्षा साफ झलक रही थी.

शादी के बाद इस दिन के लिए कितनी कल्पनाएं की थीं सुमन ने पर वे सारी कल्पनाएं धराशायी हो गईं. वह मन ही मन आशाएं लगा रही थी कि उस दिन रमेश सुबहसुबह उसे उठा कर कोई अच्छा सा गिफ्ट देंगे और वह सारे गिलेशिकवे भुला कर उन्हें माफ कर देगी. सारी कड़वाहट भुला देगी. रमेश उसे सरप्राइज देते हुए, एक दिन की छुट्टी ले लेंगे. उस की सहेलियों के घर में आने पर सारे लोग मिल कर खूब मौजमस्ती करेंगे. विनय भी खूब खुश होगा. सब को हंसीखुशी देख कर बाबूजी को बहुत संतोष होगा कि उन का निर्णय गलत नहीं था. क्या कुछ नहीं सोचा था उस ने, पर सब धरा का धरा रह जाएगा.

‘मैच्योर होने की ही तो सजा भुगत रही हूं रमेश. आज मैं किसी दूसरे घर में होती तो मुझे यों उलाहने न सुनने पड़ते. दूसरी बीवी हूं न इसलिए मेरे किए का, मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं है आप के लिए,’ वह तड़प कर बुदबुदाई.

लेकिन उस की बुदबुदाहट सुनने के लिए रमेश वहां थे कहां? वह तो कब के मामले का पटाक्षेप कर के अपने कमरे में बैठे टेलीविजन देख रहे थे.

दूसरे दिन सुबह उठ कर जब बाबूजी को प्रणाम किया तो उन्होंने आशीर्वाद की झड़ी लगा दी, ‘‘खुश रहो बेटा. तुम्हारे आने से यह घर बस गया है बेटी. अच्छा सुनो, आज मां के यहां भी सहेलियों के आने से पहले हो आना. वे दोनों भी तो राह देखते होंगे. रमेश चला गया न, नहीं तो तुम तीनों ही चले जाते.’’

‘‘कोई बात नहीं, बाबूजी. मैं आटो कर लूंगी,’’ इतना कह कर वह धीरे से मुसकराई.

नए कपड़ों में 5 माह का गोलमटोल विनय और भी प्यारा लग रहा था. सुनहरी किनारी वाला रानी कलर का सूट सुमन पर खूब फब रहा था.

आटो रुकते ही मां दौड़ी चली आईं. उस ने विनय को अपनी मम्मी की गोद में दे कर मम्मीपापा दोनों को झुक कर प्रणाम किया.

पापा बोले, ‘‘बेटा, रमेश आते तो अच्छा होता.’’

‘‘वह तो चाहते थे, लेकिन छुट्टी ही नहीं मिली,’’ अपनी प्रतिष्ठा बचाने और मम्मीपापा को दिलासा देने की खातिर झूठ बोलने में कितनी कुशल हो गई थी सुमन.

थोड़ी देर बाद पापा विनय को घुमाने ले गए. उन के निकलते ही मां को टोह लेने का मौका मिल गया.

‘‘सच बता सुमी, तू खुश तो है न? रमेश का व्यवहार कैसा है?’’

‘‘सब ठीक है, मां,’’ वह उदास स्वर में बोली.

‘‘सब ठीक है तो फिर तू उदास, खोईखोई सी क्यों लगती है?’’

‘‘मां, विनय रात में सोने कहां देता है. नींद पूरी नहीं हो पाती, इसी से सुबह भी थकी हुई लगती हूं.’’

‘‘बेटी, वह तो ठीक है. पर…’’ मां की आवाज का प्रश्नचिह्न बहुत कुछ कह गया.

‘‘पर क्या, मां? मैं ने कभी कुछ कहा क्या?’’ वह झुंझलाई.

‘‘बोला नहीं तभी तो सुमी. यह जो तेरी कुछ न बोलने की आदत है न, उसी से तो डर लगता है. तू शुरू से ही ऐसी है. मन की बात भीतर दबा कर रखने वाली. तू घुटघुट कर जी लेगी, लेकिन अपनी पीड़ा कहेगी नहीं. बेटी, क्या हम नहीं समझते कि यह शादी तुम ने सिर्फ हमारी इच्छा रखने की खातिर की है.’’

‘‘अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ उस का शुष्क स्वर उभरा.

मां लगभग चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘क्योंकि तू अभी जिंदा है और तू अपने परिवार के साथ हंसतीखेलती रहे यही हमारी हसरत है. एक बेटी को तो हम खो ही चुके हैं. आगे कुछ भलाबुरा सहन नहीं…’’ मां की आवाज तर हो गई. मां ने हथेलियों से आंसू छिपाने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहीं.

सुमन मां के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘सौरी मां, मैं ने तुम्हें रुला दिया. मैं ने कहा न सब ठीक है, तुम बेकार ही परेशान होती हो. अच्छा, मां, बोलो तो मेरे लिए क्या बनाया है?’’

मां आंसू पोंछते हुए नाश्ते की थाली लगाने लगीं. पापा भी विनय को ले कर लौट आए. मां ने सुमन की सहेलियों के लिए भी केक, मटर कचौरी, नमकीन और गाजर का हलवा रखवा दिया.

पापा उसे घर तक छोड़ने गए. फिर दोनों समधी देर तक बरामदे में बैठ कर बतियाते रहे.

महीनों बाद सुमन खुल कर हंस रही थी, वरना शादी के बाद तो उस का जीवन जैसे दुस्वप्न बन गया था. उस की बड़ी बहन दीपिका की सड़क दुर्घटना में हुई आकस्मिक मौत ने जैसे सभी के जीवन से खुशियों के रंग छीन लिए थे. मम्मी, पापा और बाबूजी की समझ से परे था कि दीपिका की मौत का गम करें या विनय और रमेश के बचने के लिए नियति को धन्यवाद दें.

सुमन ने स्वेच्छा से नन्हे विनय की देखभाल का जिम्मा खुद पर ले लिया था. पत्नी की इस तरह मौत से रमेश बिलकुल जड़ हो गए. चिड़चिड़े, तुनकमिजाज और छोटीछोटी बातों पर बिफरने वाले. घर के बड़े लोगों ने सोचा कि यदि रमेश की शादी कर दी जाए तो शायद वह फिर सामान्य जीवन बिता सके.. और उन्हें इस के लिए सुमन से बेहतर विकल्प नहीं दिख रहा था. बड़ों के प्रश्न के जवाब में वह ना नहीं कह सकी और ब्याह कर इस घर में आ गई, जो कभी उस की दीदी का घर था.

मुखर दीपिका को शांत सुमन में खोजने की रमेश की कोशिश निष्फल रही. धीरेधीरे घर में उन का व्यवहार सिर्फ खाना खाने, कर्तव्यपूर्ति के लिए धन और सामान जुटाने व आराम करने के लिए ही शेष रह गया था.

सुमन के प्रति रमेश का कटु व्यवहार कभीकभी उस में भी अपराधभाव जगाता, लेकिन जल्द ही वह उस से फारिग भी हो जाता. हां, रमेश के इस आचरण से सुमन जरूर दिन ब दिन उन से दूर होती चली जा रही थी. रमेश के उखड़े व्यवहार के बावजूद सुमन विनय की बाललीलाओं और बाबूजी के स्नेह के सहारे अपने नवनिर्मित घरौंदे को बचाने की कोशिश करती रहती.

उस दिन सुमन की उम्मीद के विपरीत रमेश सही वक्त पर घर पहुंच गए. उस की सखियां चुहल करने लगीं कि तू तो कह रही थी कि जीजाजी नहीं आएंगे.

रमेश बड़ी देर तक सुमन की सभी सहेलियों से बातचीत करते रहे. बड़े खुशनुमा माहौल में उस की सखियों ने सब से विदा ली. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘जीजाजी, सुमन को ले कर घर जरूर आइएगा.’’

‘‘जरूरजरूर, क्यों नहीं.’’

वह विस्मित थी कि लोगों के सामने उस के साथ से भी कतराने वाले रमेश आज इतने मुखर कैसे हो उठे?

‘‘थैंक्स, रमेश, जल्दी आने के लिए,’’ सुमन, विनय को चादर ओढ़ाते हुए बोली.

‘‘इस में थैंक्स की क्या बात है. मैं ने सिर्फ अपना फर्ज पूरा किया है,’’ रमेश का स्वर हमेशा की तरह सपाट था.

‘‘फर्ज निभाया? और मेरी गिफ्ट?’’ वह शरारत से बोली.

‘‘गिफ्ट, कैसी गिफ्ट? तुम्हारी सहेलियों से जरा अच्छे से बात क्या कर ली कि तुम्हारे तो हौसले ही बढ़ने लगे. इस घर में किस बात की कमी है तुम्हें जो एक गिफ्ट और चाहिए. इन सब की उम्मीद मत रखना मुझ से,’’ रमेश गुस्से में बोला.

‘‘क्यों, मैं ने ऐसी कौन सी बात बोल दी, जो इतने लालपीले हो रहे हो,’’ पहली बार जबान खोली उस ने. आवेश में उस की आवाज कांपने लगी.

‘‘मैं लालपीला हो रहा हूं, यह बोलने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी,’’ रमेश फटकारते हुए बोले.

‘‘रमेश, सब्र की भी कोई सीमा होती है. 6 माह से मैं लगातार आप का मन जीतने और आप को सामान्य महसूस कराने की कोेशिश कर रही हूं. लेकिन आप ने तो जैसे खुद को एक पिंजरे में कैद कर लिया है. न खुद बाहर निकलते हैं, न मुझे अपने करीब आने देते हैं. दीदी के जाने का सदमा सिर्फ आप को ही नहीं हम सब को हुआ है. अब तो इस पिंजरे की दीवारों से टकरा कर मैं लहूलुहान हो चुकी हूं. अब इस से ज्यादा मैं नहीं सह सकती. आप के इस रवैये को देख कर तो मैं कभी का घर छोड़ चुकी होती, लेकिन बाबूजी के स्नेह ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया. आप मुझे सह नहीं पा रहे हैं इस घर में तो मैं यह घर ही छोड़ दूंगी. कल सुबह ही मैं मुन्ने को ले कर मां के यहां जा रही हूं,’’ सुमन की आवाज थरथराई, वह धम्म से पलंग पर बैठ गई.

रमेश पैर पटकते हुए तकिया और चादर ले, हाल में जा कर सोफे पर लेट गए.

वह सोचने लगी, ‘मैं कोई बेजबान गुडि़या तो नहीं जो ठोकरों को सहती रहे और उसे चोट भी न लगे.’ आवेश के मारे उस का रगरग तपने लगा और सोचतेसोचते शरीर को बुखार ने चपेट में ले लिया. रात 1 बजे तक चिंतन से जब दिमाग जवाब देने लगा तो वह खुद नींद की आगोश में चली गई.

सुबह आंख खुली तो घड़ी 7 बजा रही थी. विनय सोया हुआ था. सिर दर्द से फटा जा रहा था. उस ने उठने की असफल कोशिश की. उसे जागा देख कर रमेश तुरंत आ गए. उस ने घृणा से मुंह फेर लिया.

‘‘ओह, तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है,’’ रमेश उस के तपते माथे पर हाथ रखते हुए बोले.

वह आंखें मूंदे लेटी रही.

‘‘लो, चाय पी लो.’’

‘‘बाई आ गई क्या?’’ क्षीण स्वर में सुमन ने पूछा.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर चाय?’’

‘‘क्यों, मैं नहीं बना सकता क्या?’’ रमेश ने मुसकराते हुए बिस्कुट की तश्तरी आगे कर दी.

‘‘एक मिनट, ब्रश कर के आती हूं.’’

जैसे ही सुमन उठने को हुई कि उसे चक्कर सा आ गया और वह फिर से पलंग पर बैठ गई. तब रमेश उसे सहारा दे कर वाशबेसिन तक ले कर आए.

जब वह मुंह धो चुकी तो रमेश हाथों में टावेल ले कर खड़े थे.

वह चाय पी कर लेट गई. रमेश उस के सिरहाने ही बैठ गए.

पिछली रात के घटनाक्रम और रमेश के सुबह के रूप में तालमेल बिठातेबिठाते सुमन की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी.

‘‘प्लीज, रोओ मत तुम, नहीं तो तबीयत और खराब होगी.’’

रमेश का चिंतित स्वर अंदर तक हिला गया उसे.

रमेश का कौन सा रूप सच्चा है.

रमेश उस के सिर पर हथेली रख कर बोले, ‘‘कल के लिए सौरी, सुमन. मैं सारी सीमाएं तोड़ गया कल. तुम्हें चोट पहुंचा कर मेरा अहं संतुष्ट होता रहा अब तक. दीपिका के बाद मैं तो टूट ही चुका था. तुम्हीं थीं जिस ने मेरा उजड़ा घर फिर बसाया. नातेरिश्तेदार तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकते थे. इस से मुझे बहुत तकलीफ होती थी, लेकिन ये तारीफ मिलने के पहले तुम ने अपने सारे अरमानों को राख कर दिया है, इतनी छोटी सी बात को नहीं समझ पाया मैं. हर रोज छोटीछोटी बातों पर तुम्हें अपमानित कर के भले ही मैं थोड़ी देर का संतोष पा लेता था, लेकिन अपनी यह हरकत मुझे भी कचोटती रहती थी. आखिर इतना बुरा तो नहीं हूं मैं. हां, मैं अपनी कुंठा, तुम पर निकालता रहा, तुम्हारी तपस्या को कभी देख ही नहीं पाया. कल तुम ने घर छोड़ कर जाने की बात की तो मैं बर्दाश्त नहीं कर सका.’’

एक पल को रमेश रुके फिर बोले, ‘‘सुमन, तुम्हारे बिना अब मैं अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’

यह सब सुन कर सुमन उन्हें अपलक देखती रही. तभी दरवाजे के बाहर बाबूजी की आहट पा कर रमेश एक झटके में उठ खड़े हुए.

‘‘बेटा, डाक्टर साहब से बात हो गई है. वह आधे घंटे में क्लिनिक पहुंच जाएंगे. सुमन बेटा, तुम विनय की चिंता मत करना, वह मेरे पास खेल रहा है.’’

‘‘जी, बाबूजी, हम लोग अभी तैयार हो जाते हैं,’’ सुमन ने कहा.

‘‘सुनो, तुम कपड़े बदल लो. हमें 10 मिनट में निकलना है.’’

‘‘हां,’’ सुमन का स्वर अशक्त था.

पलंग से उठ कर सुमन ने मेज पर देखा तो लखनवी कढ़ाई वाला आसमानी रंग का सूट रखा था और पास ही थी लाल गुलाब की ताजी कली.

सुमन सोचने लगी कि वह कहीं कोई सपना तो नहीं देख रही है.

डाक्टर के क्लिनिक से लौटते समय उस ने रमेश से पूछा, ‘‘आफिस के लिए लेट हो रहे हो न?’’

‘‘नहीं, आज छुट्टी ले ली है.’’

सुन कर वह बड़ी आश्वस्त हुई. हलके से मुसकराते हुए यह विचार उस के दिलोदिमाग में कौंध गया कि रमेश ने उसे भले ही कोई कीमती उपहार न दिया हो, पर जन्मदिन का इस प्यार से बढ़ कर बड़ा तोहफा क्या हो सकता है?  Stories In Hindi Love

Social Story : तू रुक, तेरी तो – क्या रुचि हो रहे अन्याय के प्रति आवाज उठाई?

Social Story : ‘चटाक…’’ समर्थ ने आव देखा न ताव, रुचि के गालों पर झन्नाटेदार तमाचा आज फिर रसीद कर दिया. तमाचा इतनी जोर का था कि वह बिलबिला उठी. आंखों से गंगायमुना बह निकली. वह गाल पकड़े जमीन पर जा बैठी. समर्थ रुका नहीं, ‘‘तू रुक तेरी तो बैंड बजाता हूं अभी,’’ कहते हुए खाने की थाली जमीन पर दे मारी, फिर इधरउधर से लातें ही लातें जमा कर अपना पूरा सामर्थ्य दिखा गया. 5 साल का बेटा पुन्नू डर कर मां की गोद में जा छिपा. ‘‘चल छोड़ उसे, बाहर चल,’’ समर्थ उसे घसीटे जा रहा था, ‘‘चल, नहीं तो तू भी खाएगा…’’

वह गुस्से से बावला हो रहा था. ‘‘नई…नई… जाना आप के साथ, आप गंदे हो,’’ पुनीत चीखते हुए रो रहा था. ‘‘ठीक है तो मर इस के साथ,’’ समर्थ ने झटके से उसे छोड़ा तो वह गिरतेगिरते बचा. अपने आंसू पोंछता हुआ भाग कर वह मां के आंसू पोंछने लगा. रुचि का होंठ कोने से फट गया था, खून रिस रहा था. ‘‘मम्मा, खून… आप को तो बहुत चोट आई है. गंदे हैं पापा. आप को आज फिर मारा. मैं उन से बात भी नहीं करूंगा. आप पापा से बात क्यों करते हो, आप कभी बात मत करना,’’ वह आंसुओं के साथ उस का खून भी बाजुओं से साफ करने लगा, ‘‘मैं डब्बे से दवाई ले आता हूं,’’ कह कर वह दवा लेने भाग गया. रुचि मासूम बच्चे की बात पर सोच रही थी, ‘कैसे बात न करूं समर्थ से. घर है, तमाम बातें करनी जरूरी हो जाती हैं, वरना चाहती मैं भी कहां हूं ऐसे जंगली से बात करना.

2 घरों से हैं, 2 विचार तो हो ही सकते हैं, वाजिब तर्क दिया जा सकता है कोई है तो, पर इस में हिंसा कहां से आ जाती है बीच में. समर्थ को बता कर ही तो सब साफ कर के खाना तैयार कर दिया था समय पर. अम्माजी को आने में देर हो रही थी. फोन भी नहीं उठा रही थीं. खाना तैयार नहीं होता, तो भी सब चिल्लाते.’ ‘‘अपने को गलत साबित होते देख नहीं पाते ये मर्द. बस, यही बात है,’’ अपनी सूजी आंखों के साथ जब अपने ये विचार अंजलि को बताए तो वह हंस पड़ी. ‘‘यार देख, मन तो अपना भी यही करता है. कोई अपनी बात नहीं मानता तो उसे अच्छे से पीटने का ही दिल करता है. पर हम औरतों के शरीर में मर्दों जैसी ताकत नहीं होती, वरना हम भी न चूकतीं, जब मरजी, धुन कर रख देतीं, अपनी बात हर कोई ऊपर रखना चाहता है.’’ ‘‘तू तो हर बात को हंसी में उड़ा देना चाहती है. पर बता, कोई बात सहीगलत भी तो होती है.’’ ‘‘हां, होती तो जरूर है पर अपनेअपने नजरिए से.’’

‘‘फिर वही बात. ऐसे तो गोडसे और लादेन भी अपने नजरिए से सही थे. पर क्या वे वाकई में सही कहे जा सकते हैं?’’ अंजली को सम झ नहीं आ रहा था, वह रुचि का ध्यान कैसे हटाए. आएदिन मासूम सी रुचि के साथ समर्थ की मारपीट की घटनाएं उसे कहीं अंदर तक झिंझोड़ रही थीं, बेचारे नन्हे पुन्नू के दिलोदिमाग पर क्या असर होता होगा. सारी बातें सुनी उस ने, किचन से सटे पूजाघर में सुबह से बह रहे दूध, बताशे, गुड़, खीर, मिष्ठान के चढ़ावे की सुगंध आकर्षित लग रही थी. मक्खियों, चीटियों की बरात से परेशान हो कर रुचि ने लाईजोल डालडाल कर किचन के साथसाथ पूजाघर को भी अच्छी तरह चमका डाला था. किचन के चारों कोनों में पंडित मुखानंद के बताए 5-5 बताशे रख कर दूध चढ़ाने के टोटके का आज भी पालन कर के अपने भाई के घर गई. सास को लौटने में देर हो रही थी. चींटियों, मक्खियों के बीच रात का खाना बनाना मुश्किल हो रहा था. रुचि ने तंग आ कर सफाई का कदम उठाया था, क्या गलत किया उस ने. रुचि की कोई गलती आज भी उसे नहीं लगी.

और फिर, गलती हो भी तो क्या कोई जानवरों की तरह सुलूक करता है भला? रोजरोज ऐसे बेसिरपैर के टोटके, पूजा, पाखंड उन का चलता ही रहता. हैरानी तो यह कि बहुत मौडर्न बनने वाला समर्थ भी ये सब मानता है. पहले ही मना किया था रुचि से कि समर्थ कुछ ज्यादा ही जता रहा है अपने को, अच्छे से एक बार और सोच ले, फिर शादी कर. पर मानी नहीं. पापा के सिर का बो झ जल्द से जल्द उतार कर उन्हें खुश देखना चाहती थी वह तो? ‘‘तू भी न, गौ बनी हुई है, गौ के भी 2 सींगें, 4 लातें और लंबी दुम होती है, वक्त आने पर इस्तेमाल भी करती है. पर तू तो बिलकुल सुशील, संस्कारी अबला नारी बनी हुई है, बड़ेबड़े मैडल मिलेंगे तु झे क्या? इतनी ज्यादती सहती क्यों है? डिपैंडैंट है इसलिए…’’ इतनी पढ़ीलिखी है, बोला था जौब कर ले. पर नहीं, पतिपरमेश्वर नहीं मानते. अरे, मानेंगे कैसे भला, फुलटाइम की दासी जो छिन जाएगी,’’ उस ने चिढ़ते हुए उस की ही बात कही. अंजलि का घर रुचि से कुछ ही दूर था.

बचपन से कालेज तक साथ पढ़ी अंजलि अपनी शादी के 2 महीने बाद ही पति के हादसे में हुई मौत के बाद वापस आ कर उसी स्कूल में पढ़ाने लगी थी. पड़ोस के ब्लौक में ही रुचि की शादी हुई थी तो अकसर अंजलि लौटते समय रुचि से मिलने आ जाया करती. खूबसूरत रुचि को स्मार्ट समर्थ ने अपने को खुलेदिमाग का जता, उस के पिता हरिभजन के आगे अपने को चरित्रवान बताया, महात्मा गांधी, विवेकानंद आदि पर अपना पुस्तक संग्रह दिखा कर अच्छे होने का प्रमाण देदे कर, उस से शादी तो कर ली पर शादी के बाद ही उस की 18वीं सदी की मानसिकता सामने आ गई. खुलेदिमाग की हर तरह की सफाईपसंद रुचि जाहिलों में फंस कर रह गई. पिता के संस्कार थे, ‘बड़ों की आज्ञा का पालन करना है सदैव, अवज्ञा कभी नहीं,’ सो, किए जा रही थी. मां तो थी नहीं. पर नेकी, ईमानदरी, सत्य पर चलने वाले पिता ने अच्छे संस्कार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पर यहां उन बातों की न इज्जत है न जरूरत. अब रुचि को कौन सम झाए, उस ने तो पिता की बातें गांठ बांध अंतस में बिठा ली हैं.

बात वही है, ‘सबकुछ सीखा हम ने, न सीखी होशियारी.’ क्या करूं इस लड़की का? रोज ही मार खाए जा रही है. पर पिता से बताती भी नहीं कि वे आघात सह नहीं पाएंगे. लेदे के वही तो हैं उस के परिवार में. पुन्नू घर पर होता तो वे रोतेरोते अपनी मासूम जबां से मम्मा के साथ घटी पूरी हिंसा का ब्योरा अंजलि मौसी को देने की कोशिश करता. ‘कैसे दादी, बूआ, चाचू सभी पापा की साइड लेते हैं. कोई मम्मा को बचाने नहीं आता. कहते हैं, और मारो और मारो.’ अंजलि सोचती, वे बचाने क्या आएंगे, सभी एक थाली के चट्टेबट्टे हैं. जंगली गंवई हूश. छोटे से बच्चे में दिनबदिन कितना आक्रोश भरता जा रहा है, अंजलि देख रही थी. इतनी नफरत, इतना गुस्सा उस अबोध के व्यक्तित्व को बरबाद किए जा रहा है. पर करती भी क्या? रुचि तो हठ किए बैठी थी कि उस की मूक सेवा कभी तो रंग लाएगी, एक दिन प्रकृति सब ठीक करेगी. अब तो पुन्नू भी पापा, चाचू के जैसे चीजें तोड़नेफेंकने लगा है. गुस्सा होता तो घरवालों की तरह चीखता है. खाना उठा कर जमीन पर दे मारता, तो रुचि थप्पड़ रसीद करती. तो रुचि को ही डांट पड़ने लगती. उसे तुरंत साफ करने के लिए आदेश हो जाता. घर के लोग शह भी देते उसे. कितनी बार देखासुना है उन्हें कहते हुए, ‘लड़का है, लड़की थोड़ी ही है. मर्द है वह क्यों करेगा भला. बहू, चल साफ कर जल्दी से, मुखानंद महाराज आते ही होंगे, इस की कुंडली का वार्षिक फल विचार कर के.

आजा मेरे लाल, तू तो हमारे घर का वारिस है. तेरा कोई कुछ भी नहीं बिगड़ेगा. तु झे तो, मिनिस्टर बनना है. आज वे तेरे और तेरे पापा समर्थ के लिए असरदार टोटका बताने वाले हैं. नई तावीज भी लाएंगे तेरे लिए.’ उस दिन अंजलि स्कूल से लौटी तो रुचि के घर के आगे ऐंबुलैंस खड़ी देख कर माथा ठनका, किस को क्या हो गया? उस ने पांव तेजी से बढ़ाए, पास पहुंची तो देखा लोग रुचि को स्ट्रैचर पर डाले ऐंबुलैंस से निकाल कर घर में ले जा रहे हैं. रुचि बेसुध थी. खून से लथपथ सिर फट गया था, खून बह कर माथेचेहरेगरदन, कपड़ों पर जम चुका था. कुछ अभी भी सिर से बहे जा रहा था. पड़ोसियों ने बताया, ‘घर मैं काफी देर तक आएदिन की तरह चीखपुकार होती रही थी. 2 घंटे से रुचि यों ही पड़ी रही. तब जा कर ऐंबुलैंस ले आने का इन्हें होश आया. तब तक देर हो चुकी थी. रुचि ने ऐंबुलैंस में जाते ही दम तोड़ दिया.’ रुचि के पिता हरिभजन को किसी भले मानस ने खबर दे दी थी.

वह ही उन्हें थाम कर रुचि के अंतिम दर्शन करवाने ले आया था. वे रुचि के खून सने सिर पर हाथ रख कर बिलख उठे. पुन्नू को लिपटा कर फूटफूट कर रो पड़े थे. हादसे से अवाक अंजलि के रुंधे गले से शब्द ही नहीं निकल रहे थे. अंकल को क्या और कैसे ढाढ़स बंधाए. उस को देखते ही रुचि के पिता विलाप करते हुए बोल पड़े, ‘‘बेटी, इतना सब हो रहा था उस के साथ, तू ने कुछ बताया क्यों नहीं कभी. न उस ने कभी कोई भनक लगने दी. लकवे के कारण एक पैर से लाचार मु झे यह कह कर कि ‘ससुराल में यहां पूजा, पंडित, शकुन, अपशकुन बहुत मानते विचार करते हैं, घर नहीं आने देती थी मु झे. खुद ही पुन्नू को ले कर हफ्ते में एकदो बार आ जाती थी. तू तो उस की पक्की सहेली थी. तु झ से पूछता तो तू कहती बिलकुल ठीक है, आप उस की चिंता मत कीजिए. अब बता, ठीक है? चली गई मेरी रुचि. ‘वे अंजलि को, तो कभी रुचि के शव को पकड़ कर लगातार हिचकियों से रोए जा रहे थे. उन का क्रंदन सुन अंजलि का दिल टूकटूक हुआ जा रहा था. अपनी आंखों के सैलाब को किसी तरह रोकते हुए वह बोली, ‘‘अंकल, संभालिए अपने को, आप की तबीयत पहले ही ठीक नहीं. इसी से रुचि ने कसम दे रखी थी आप से कुछ न कहूं. मैं क्या करती अंकल. यहां आप की अच्छी सीख ने उसे बांधे रखा, जिन का इन जाहिलों के यहां कोई मोल नहीं था,’’ पुन्नू अंजलि को देखते ही उस से लिपट गया.

‘‘अंजलि मौसी, इन सब ने मिल कर मेरी मम्मा को मारा. पापा ने दीवार पर मम्मा का सिर दे मारा था. वे गिर पड़ीं. मम्मा तभी से मु झ से बोली नहीं बिलकुल भी. दादी ने पापा, चाचू को भगा दिया. अब झूठ कह रही हैं कि मम्मा सीढ़ी से गिर पड़ी,’’ वह रुचि से लिपट कर जोरजोर से रोने लगा. ‘‘उठो न मम्मा, अपने पुन्नू से बोलो न. मैं छोड़ूंगा नहीं किसी को. बड़ा हो कर बैंड बजा दूंगा इन सब की,’’ वह समर्थ से सीखे हुए शब्दों को दोहराने लगा. रोजरोज की चीखनेचिल्लाने व मारपीट की आवाजों से तंग आ कर आज किसी पड़ोसी ने 100 नंबर डायल कर दिया था. पुलिस आ गई. नन्हे पुन्नू के बयान पर तफ्तीश हुई. 2 दिन के अंदर पुलिस ने समर्थ और उस के भाई को धरदबोचा.

उन्हें जेल हो गई. नन्हा पुनीत किस के पास रहता, समस्या थी. क्योंकि पुन्नू अपनी दादी, बूआ के पास रहने को बिलकुल तैयार न था. अंजलि उसे यह कह कर अपने साथ ले गई. ‘‘अंकल, आज के दौर में सज्जनता, सिधाई, संस्कारों का मोल सम झने वाले बहुत कम हैं. दुनिया के हिसाब से अपने को तैयार करना चाहिए और सामने आई चुनौतियों को सिधाई से नहीं, चतुराई से निबटना चाहिए. सिधाई से अकसर आज की दुनिया मूर्ख बनाती है, दबाती है, अपना उल्लू सीधा करती है. जो, रुचि झेलती रही.

कितना सम झाया था उसे. अंकल, पुन्नू चाहे कहीं भी रहे मैं उस को दूसरा समर्थ कभी नहीं बनने दूंगी. आप निश्चित रहें अंकल. शादी के 2 महीने बाद ही दुर्घटना में पति प्रशांत की मौत के बाद निरुद्देश्य बंजर से मेरे जीवन को पुनीत के रूप में एक नया लक्ष्य मिल गया है. अब आप भी मु झे अपनी रुचि ही सम िझए अंकल. मैं इसे ले कर आप से मिलने उसी के जैसे आती रहूंगी.’’ रुचि के पिता हरिभजन के कांपते बूढ़े हाथ अंजलि के सिर पर जा रुके थे. उन से कुछ बोलते न बना, केवल आंसू आंखों से बहे चले जा रहे थे. अंजलि भीगे मन से उन्हें पोंछने लगी. पुन्नू ने दोनों हाथों से नाना और अंजलि मौसी को कस कर पकड़ लिया और आंखें मीचे वह गालों पर ढुलकते आंसुओं में अपनी मम्मा का एहसास ढूंढ़ रहा था. ‘‘मम्मा…’’ उस की हिचकियों के साथ निकलता बारबार वह एक शब्द सभी के हृदय को बींध रहा था.

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