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Hindi-Marathi Controversy : हिंदी के मुद्दे पर बेकफुट पर क्यों भाजपा

Hindi-Marathi Controversy : भाजपा हिंदी क्यों थोपना चाहती है इस सवाल का जवाव हिंदू वादियों के अतीत से भी मिलता है और वर्तमान से भी कि लोग धर्म क्षेत्र और भाषा के नाम पर आपस में लड़ते रहें तो उस का अस्तित्व बना रहेगा लेकिन महाराष्ट्र का हालिया विवाद देख लगता है कि आम लोग अगर समझ से काम लें तो बंटवारे की राजनीति खुद बंट कर दम तोड़ देगी.

हिंदी हिंदू हिंदुस्तान न केवल हिंदूवादी संगठनों और राजनैतिक दलों का एजेंडा है बल्कि उन का मकसद, मंजिल और मुहिम भी है. हिंदू राष्ट्र का तम्बू इन्हीं तीन बम्बुओ पर टिका है जिस की कल्पना अब से कोई सवा सौ साल पहले हिंदू महासभा के मुखिया विनायक सावरकर ने की थी. धर्म और मन्दिरों की राजनीति को परवान चढ़ाने के बाद भाजपा की मंशा अब भाषा की राजनीति को हवा देने की है जिस के लिए महाराष्ट्र से मुफीद कोई और राज्य नहीं क्योंकि वह यहां सत्ता में है.

लेकिन बात चूंकि बिगड़ने लगी थी इसलिए 29 जून को मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडवनीस ने घुटने टेकते घोषणा कर डाली कि पहले के त्रिभाषा नीति से जुड़े सरकारी आदेश वापस लिए जाते हैं. अब डाक्टर नरेन्द्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जाएगी जो त्रिभाषा नीति के अमल पर सुझाव देगी. बात में वजन लाने उन्होंने यह सफाई भी दी कि हिंदी को अनिवार्य नहीं बनाया गया था छात्रों को अन्य भाषा चुनने की छूट थी.

यह है विवाद

देवेन्द्र फडवनीस की यह मजबूरी हो गई थी कि जैसे भी हो अब शिवसेना ( यूबीटी ) और मनसे का 5 जुलाई का प्रस्तावित विरोध मार्च रोका जाए नहीं तो लेने के देने पड़ जाएंगे. कैसे उद्धव और राज ठाकरे मराठी भाषा को ले कर एक हो रहे थे और इस का महाराष्ट्र सहित देश की राजनीति पर क्या असर पड़ता उस से पहले यह समझ लेना जरुरी है कि इस विवाद की स्क्रिप्ट क्या है और इसे लिखा किस ने था.

16 अप्रैल, 2025 को महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी करते कहा था कि कक्षा 1 से ले कर 5 तक के मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य किया जाता है. इस के समर्थन में दलील यह दी गई थी कि यह फैसला एनईपी यानी नई शिक्षा नीति 2020 के तहत लिया गया है जिस में मातृभाषा / स्थानीय भाषा अंग्रेजी और हिंदी या अन्य भारतीय भाषा पढ़ाने की सिफारिश की गई है. इस आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि 20 से अधिक छात्र हिंदी के बजाय दूसरी किसी भारतीय भाषा को चुनते हैं तो स्कूल को उस भाषा के शिक्षक की वैकल्पिक व्यवस्था करना पड़ेगी.

विरोध की धमक से सहमी सरकार

इतना कहना भर था कि मराठी प्रेमियों ने आसमान सर पर उठा लिया. विरोध गैरों ने तो किया ही लेकिन अपने भी पीछे नहीं रहे. मराठी भाषा सलाहकार समिति के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत देशमुख ने इस फैसले का विरोध करते कहा कि यह नीति मराठी भाषा और संस्कृति के लिए खतरा है. किसी को उम्मीद नहीं थी कि सरकार की सलाहकार समिति ही खुले तौर पर सरकार के फैसले का विरोध करेगी.

मनसे के राज ठाकरे ने तो बेहद हमलावर होते इस फैसले को मराठी अस्मिता पर हमला करार देते हिंदी थोपने की कोशिश बताया और अपने वक्तव्य में यह भी जोड़ दिया कि हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं है. राज का साथ देने उन के कजिन और शिवसेना ( बाल ठाकरे ) के मुखिया उद्धव ठाकरे भी पार्टी सहित साथ आए तो मुंबई से ले कर दिल्ली तक के माथे पर बल पड़ गए कि जैसेतैसे तो इन दोनों को लड़ा भिड़ा कर कौरवों और पांडवों की तरह अलग किया गया था. अब अगर ये भाषा के मुद्दे जो हर दिन संवेदनशील होता जा रहा था पर साथ हो लिए तो भाषाई मुहिम परवान चढ़ने के पहले ही फिसल जाएगी.

इन दोनों ने एलान किया था कि 7 जुलाई को मुंबई के आजाद मैदान पर धरना आंदोलन आयोजित किया जाएगा. ठाकरे ब्रदर्स ने यह धौंस भी दी थी कि जब तक हिंदी को अनिवार्य करने का फैसला पूरी तरह वापस नहीं लिया जाएगा तब तक वे चुप नहीं बैठेंगे. ऐसा होता तो अकेले मुंबई में नहीं बल्कि गांव कस्बों तक हिंदी का विरोध होता जो होतेहोते हिंदी भाषी हिन्दुओं यानी उत्तर प्रदेश व बिहार सहित झारखंड के लोगों को भी चपेट में ले सकता था. फिर हालात क्या होते इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. क्योंकि तमाम उतारचढ़ावों और विवाद के बाद भी ठाकरे भाइयों की जमीनी पकड़ किसी और से बहुत ज्यादा है.

यही वह मुकाम है जिस ने भाजपा को पांव खींचने मजबूर कर दिया. लेकिन विवाद अभी टला है खत्म नहीं हुआ है. देवेन्द्र फडवनीस इस मसले पर फस गए हैं जो हिंदी और मराठी भाषी दोनों तबकों में से किसी एक को भी नाराज नहीं कर सकते. समिति बनाएंगे, वह फैसला लेगी जैसे बयान वक्ती तौर पर तो पल्ला छुड़ाने मुफीद हैं लेकिन आज नहीं तो कल भाषाई गुल फिर खिलेंगे. ठाकरे ब्रदर्स के साथ कांग्रेस भी है और शरद पावर जैसे दिग्गज नेता भी हैं जो हिंदी की अनिवार्यता को थोपना मानते हैं.

हकीकत समझे लोग

यह ठीक है कांग्रेस और एनसीपी ( शरद पवार) मनसे और शिवसेना यूबीटी की तरह भाषा को ले कर आक्रामक नहीं होते लेकिन अंदरूनी तौर पर हिंदी थोपने को ले कर चिंतित वे भी हैं. इस की वजह साफ़ है कि धर्म और हिंदुत्व की राजनीति के चलते हिंदी भाषी वोट भाजपा के खाते में ज्यादा गिरते रहे थे लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंदी भाषियों ने इन तीन दलों बाले एमवीए यानी महाविकास अघाड़ी को वोट किया था. जिस से एनडीए 48 में से महज 17 सीटों पर सिमट कर रह गया था जबकि एमवीए या यूपीए कुछ भी कह लें को 30 सीटें मिली थीं और कांग्रेस 13 सीटें ले जा कर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी.

गेम अब ठाकरे ब्रदर्स और भाजपा के बीच खुले तौर पर है क्योंकि ये दोनों ही मांग करते रहे हैं कि सरकारी कामकाज रोजगार और शिक्षा में मराठी भाषा ही रहे कोई और भाषा मंजूर नहीं. इस मसले पर मराठियों का साथ इन दोनों को मिलता रहा है जिसे बनाए और संभाले रखने का कोई मौका ये दोनों नहीं छोड़ते. हैरानी की बात तो यह है कि हिंदी भाषियों को ऐसी राजनीति से कोई खास परहेज नहीं रहता.

मार्च के महीने में शिवसेना यूबीटी के नेता कृष्णा पावले ने मांग की थी कि मुंबई के रेस्तरा और होटलों में मेन्यु कार्ड अनिवार्य रूप से मराठी मरण हों. इस मांग पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई थी लेकिन मराठियों ने इस से सहमति रखी थी क्योंकि इस से उन का भाषाई अहम तुष्ट हो रहा था.

लेकिन बबाल तब मचा था जब मार्च के महीने में ही एक कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ नेता भैयाजी जोशी ने यह कहा था कि मुंबई में रहने वालों को मराठी बोलना जरुरी नहीं है. बवाल मचा तो भैया जी जोशी आम नेताओं की तरह यह सफाई देते गायब हो गए कि उन के बयान का गलत मतलब निकाला गया. मराठी न केवल मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र की भाषा है और सभी को इसे सीखना चाहिए.

समझने वालों को तभी समझ आ गया था कि अब प्राइमरी स्कूलों को निशाने पर लिया जाएगा और ऐसा हुआ भी जिस पर मनसे ने जो तांडव मचाया उस से यह साबित हुआ था कि भाजपा और आरएसएस की राह उतनी आसान है नहीं जितनी कि वे गलतफहमी या अतिआत्मविश्वास के चलते मान बैठे हैं. मनसे कार्यकर्ताओं ने अपने संस्कारों का हिंसक प्रदर्शन सार्वजनिकतौर पर करते मराठी न बोलने वालों की मार कुटाई करते अपना मैसेज फारवर्ड कर दिया कि हिंदी नहीं चलेगी और जबरन चलाई गई तो हिंदी भाषी भी नहीं बख्शे जाएंगे.

महाराष्ट्र के हिंदी भाषी जो लगभग 22 फीसदी हैं 70 फीसदी मराठी भाषियों से भाषा के आधार पर नहीं टकराना चाहते क्योंकि इस से उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला उलटे हासिल किया हुआ जो छिनता है वह उन्हें एक झटके में सालों पीछे ढकेल देता है. पिछले लोकसभा चुनाव में इस समझदारी की झलक पूरे महाराष्ट्र सहित महाराष्ट्र के सब से बड़े और अहम हिंदी भाषी शहर मुंबई में भी दिखी थी जहां एमवीए को 6 में से 4 सीटें मिली थीं जबकि एनडीए 2 पर सिमट कर रह गई थी.

नया विवाद देखा जाए तो नई शिक्षा नीति की आड़ में भाजपा का फैलाया हुआ रायता है जिसे मजबूरी में ही सही ज्यादा बहने से उसने रोक लिया है. लेकिन भाषा का मामला धर्म से कम संवेदनशील नहीं होता इसलिए आम लोगों को ही समझ से काम लेना होगा.

Bihar Elections : गैर सवर्णों की भागीदारी समेटने की दोतरफा साजिश

Bihar Elections : मतदाता सूची में बदलाव को ले कर बिहार में बवाल मचा हुआ है. ईसीआई के तुगलकी हुक्म से करोड़ों वोटर हैरान परेशान हैं जिन में सब से ज्यादा गैर सवर्ण हैं. क्या इन्हें एक साजिश के तहत वोट डालने से वंचित किया जा रहा है और क्यों बारिश के मौसम में बिहार में एकाएक ही चुनावी बाबाओं और धार्मिक आयोजनों की चुनावी बाढ़ आ गई है?

धीरेन्द्र शास्त्री उर्फ़ बागेश्वर बाबा और उन के गुरु राम भद्राचार्य ने भाजपा की तरफ से एलान कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में मुद्दा सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व है. बेरोजगारी, पिछड़ापन, गरीबी, शिक्षा बदहाली और गरीब मजदूरों के पलायन से चुनाव का कोई लेना देना नहीं. ये सब बेकार की बातें हैं तुक की इकलौती बात धर्म हिंदुत्व और राष्ट्रवाद है. चुनाव आयोग भी कैसे इस मुहिम को अंजाम देने में जुट गया है यह जानने से पहले इन बाबाओं के भाषणों पर गौर करें तो लगता है कि वह और बाबा एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं.

पटना के गांधी मैदान में आयोजित सनातन महाकुम्भ में दहाड़ते हुए धीरेन्द्र शास्त्री ने कहा –

1- अगर भारत हिंदू राष्ट्र बना तो पहला राज्य बिहार होगा. हिंदू राष्ट्र का नक्शा बना तो उस की शुरुआत बिहार से ही होगी.

2 – अगर हिंदू धर्म पर हमला हुआ तो मैं जबाब दूंगा, मेरा सपना भगवा – ए – हिन्द है.

3 – मैं मुसलमानों या ईसाइयों से नहीं बल्कि उन हिंदूओं से नाराज हूं जो जातिगत विभाजन फैला रहे हैं.

4 – मेरा मकसद राजनीति करना नहीं है, मैं तो रामनीति की बात करने आया हूं.

ब्राह्मणों के आराध्य तथाकथित भगवान परशुराम की जयंती पर आयोजित सनातन महाकुम्भ के कर्ताधर्ता यानी यजमान केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव थे. एक तरह से यह ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए ब्राह्मणों का जलसा था जिस में कुछ और ऊंची जाति वालों ने भी भागीदारी की. गांधी मैदान पर दिन भर भजन पूजन, कीर्तन, पूजापाठ और अनुष्ठान वगैरह होते रहे. इस मजमे का मकसद और पैगाम साफ था कि सवर्णों एकजुट हो जाओ और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी भाषी राज्य बिहार की भी सत्ता हथिया लो. तभी देश हिंदू राष्ट्र बन पाएगा.

हिंदू राष्ट्र यानी राज सवर्णों का, जिस में दलित पिछड़े मुसलमान आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक हो कर इन की गुलामी करते रहते हैं. लोकतंत्र में यह चूंकि आसान काम नहीं है कि सभी को वोट देने से रोका जा सके लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि गैर सवर्णों को कम से कम वोट देने का मौका या हक दिया जाए. अब यह काम तो बाबा लोग कर नहीं सकते थे इसलिए संविधान नियम और कायदे कानूनों की आड़ ले कर यह जिम्मेदारी चुनाव आयोग ने संभाल ली.

बेतुका फरमान

बीती 24 जून को भारत निर्वाचन यानी चुनाव आयोग (इसीआई) ने एक हुक्म जारी किया कि बिहार की मौजूदा वोटर लिस्टों को रद्द किया जाता है. अब इन्हें नए सिरे से तैयार किया जाएगा जिस के लिए जरुरी है कि सभी मौजूदा वोटर्स अपनी पहचान और नागरिकता साबित करने के लिए तयशुदा 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करें. इसे विशेष मतदाता गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर नाम दिया गया.

यह दस्तावेज बीएलओ यानी बूथ लेवल औफिसर के पास ले जा कर जमा करना होगा. इन दस्तावेजों में खास है, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट और मांबाप की नागरिकता से ताल्लुक रखते लेखी सबूत. इस के अलावा मैट्रिक या हाई स्कूल का प्रमाण्पत्र, डिग्री या डिप्लोमा सर्टिफिकेट, मातापिता का जन्म प्रमाण पत्र, पेन कार्ड, सरकारी या उस के बराबर की नौकरी का पहचान पत्र, पेंशन दस्तावेज या फिर शादी का सर्टिफिकेट.

यह तो थी एक चालाकी दूसरी यह थी कि इस कार्रवाई में आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी और मनरेगा कार्ड मान्य नहीं होंगे क्योंकि ये दस्तावेज जन्म तारीख, जगह या नागरिकता को साबित नहीं करते. धन्य है भारत सरकार और ईसीआई जो आधार कार्ड, पेन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और मनरेगा कार्ड जैसे अहम दस्तावेजों को किसी के वोटर और नागरिक होने का सबूत नहीं मानते तो इस खामी का जिम्मेदार वे ही नहीं तो और कौन है.

सार ये कि अगर आप के पास ये सरकारी दस्तावेज हैं भी तो आप सरकार चुनने के हकदार नहीं जबकि ये तमाम पहचान पत्र भी सरकार द्वारा ही जारी किए जाते हैं. जो 11 दस्तावेज मांगे गए हैं उन में से कितनो के पास कितने हैं इस पर नजर डालें तो साजिश और धूर्तता साफ नजर आती है कि यह भी बाबाओं सरीखी ही हिंदू राष्ट्र की मुहिम है.

प्रमाणपत्रों का टोटा

जानकर हैरानी और अफ़सोस दोनों होते हैं कि बिहार में केवल 2.8 फीसदी लोगों के पास ही जन्म प्रमाण पत्र हैं. यह विकट के पिछड़ेपन की निशानी है और नेता विकास और जागरूकता के कसीदे गढ़ रहे हैं. गांवदेहातों जहां तकरीबन 80 फीसदी वोटर हैं वहां तो न के बराबर लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र हैं. क्योंकि वहां जचकी यानी डिलीवरी घरों में ही ज्यादा लगभग 80 फीसदी होती हैं. यह बदहाल स्वास्थ सेवाओं का सबूत है. इन्हें जन्म प्रमाण पत्र क्यों मुहैया नहीं कराया गया इस का जवाब शायद ही सुशासन बाबू नीतीश कुमार दे पाएं जो भगवा गोद में विराजे हिंदू राष्ट्र की शर्त पर अपने फिर से मुख्यमंत्री बन जाने का ख्वाव देख रहे हैं.

यही हाल पासपोर्ट का भी है जो बिहार में 3 फीसदी लोगों के पास भी नहीं और जिन के पास हैं वे सिरे से शहरी इलाकों के रहने वाले हैं. इन में भी सवर्णों की तादाद ज्यादा है. यह भी जाहिर बात है कि जिस के पास हवा में उड़ने का यह दस्तावेज होगा वह हवाई चप्पल पहनने वाला गरीब तो कतई नहीं होगा बल्कि खासे पैसों बाला और मालदार होगा.

अब और हैरान होने मैट्रिक और हाई स्कूल के प्रमाणपत्रों का आंकड़ा देखिए यह बिहार में महज 14.71 फीसदी लोगों के पास है बाकी लगभग 85 फीसदी लगभग अनपढ़ हैं. ईसीआई की मनमानी से परे पहले तो नीतीश बाबू की गर्दन इस बाबत पकड़ी जानी चाहिए कि आप 25 सालों से बिहार में राज कर रहे हैं फिर ये हालात क्यों? शिक्षा की इतनी बदहाली क्यों?

इस से आगे चलें तो बिहार में 7 फीसदी लोग भी ग्रेजुएट नहीं हैं. वह सिर्फ इसलिए कि कालेज सवर्णों के लिए हैं ताकि उन के बच्चे पढ़ लिख कर सरकारी या गैरसरकारी अच्छी पगार वाली नौकरी करने विदेश या फिर देश में बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे शहर चले जाएं और गरीब, दलित, पिछड़े, मुसलिम, आदिवासी बच्चे या तो बिहार में ही मजदूरी करते नजर आएं या फिर इन्हीं शहरों में जा कर हाड़तोड़ मेहनत कर जैसेतैसे जिंदगी बसर कर लें.

यह आंकड़ा महाभारत के एकलव्य की याद दिलाता है जिस का अंगूठा द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में मांग लिया था जिस से क्षत्रिय राजकुमार अर्जुन को कोई चैलेंज या खतरा ही न रहे. अब अंगूठा काटने के तौर तरीके बदल गए हैं लेकिन मकसद द्वापर युग सरीखा ही है.

इस लिहाज से तो धीरेंद्र शास्त्री जैसे कट्टर सनातनी ब्राह्मण बाबाओं को तो कोई चिंता करनी ही नहीं चाहिए क्योंकि ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार पहले से ही हिंदू राज्य है. अब बाबा लोग और चुनाव आयोग चाहते हैं कि इस अघोषित वर्ण व्यवस्था और मनुवाद पर चुनाव के जरिए संवैधानिक मोहर और लग जाए तो सारा सिस्टम यूपी एमपी की तरह ऊंची जाति वालों की मुट्ठी में होगा. रहे बुढ़ाते और याददाश्त खोते बीमार नीतीश कुमार तो उन्हें डुबोने और धकियाने की स्क्रिप्ट तो मोदीशाह 6 महीने पहले ही लिख चुके हैं.

अब बात नागरिकता प्रमाणपत्र की जो देश में ही अच्छेअच्छों के पास नहीं तो बिहारियों की बिसात क्या. आम लोगों को इस की जरूरत ही नहीं पड़ती. यह भी उन खास लोगों का शगल है जो विदेश जा कर बस गए हैं. इस प्रमाण पत्र को हासिल करना भी बहुत कठिन है. मातापिता का जन्म प्रमाण पत्र मांगा जाना भी कोई छोटामोटा मजाक नहीं. जब 97 फीसदी से भी ज्यादा लोगों के पास अपने ही जन्म का प्रमाण पत्र नहीं तो वे अपने पुरखोंपूर्वजों के जन्म प्रमाण पत्र किस चित्रगुप्त से लाएंगे यह तो भगवान कहीं हो तो वही जाने.

1987 के बाद पैदा हुए 2 करोड़ 93 लाख नौजवान वोटर अब बगलें झांक रहे हैं कि जब अपने खुद के पैदा होने का ही सर्टिफिकेट नहीं तो हमें पैदा करने वलों का कहां से मिलेगा. मातापिता के जन्म का प्रमाण पत्र शायद सौ पचास शिक्षित शहरी लोगों के पास मिल भी जाए लेकिन मातापिता की नागरिकता का एक भी प्रमाण पत्र बिहार में ढूंढे से न मिलेगा. क्योंकि इस की जरूरत खास मामलों में ही पड़ती है मसलन विदेशी मूल के नागरिकों से ही आमतौर पर यह दस्तावेज मांगा जाता है.

सेवा पहचान पत्र जिस के पास होगा उस के पास तो दूसरे कई दस्तावेज भी होंगे क्योंकि उन के बगैर सरकारी नौकरी मिलती नहीं. इसलिए यह भी गैरजरूरी और अव्यवहारिक मांग है. एक अंदाजे के मुताबिक कोई डेढ़ फीसदी लोगों के पास यह हो सकता है. इस से बदतर और बुरी हालत पेंशन दस्तावेज की है जो 1 फीसदी लोगों के पास भी नहीं. यह उन्हीं के पास होता है जो सरकारी नौकरी या संगठित क्षेत्र में काम कर चुके हैं. कितने लोग शादी का रजिस्ट्रेशन कराते हैं बिहार का आंकड़ा देखें तो 15 फीसदी के लगभग ही विवाह पंजीयन करवाते हैं और ये भी शहरी इलाकों के हैं. गांवदेहात के लोगों को तो मालूम भी नहीं रहता कि शादी का रजिस्ट्रेशन भी होता है और होता है तो कहां होता है.

जैसे ही यह फरमान आम हुआ तो लोग अपनीअपनी जेबें टटोलने लगे जिन में इन में से एक भी दस्तावेज नहीं था. विपक्ष ने उम्मीद के मुताबिक हल्ला मचाया क्योंकि इस हुक्म की जद में 95 फीसदी दलित, मुसलिम, पिछड़े और आदिवासी वोटर आ रहे थे जो आरजेडी और कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक हैं. लोगों के पास ये प्रमाणपत्र नहीं हैं इस से भी ज्यादा अचम्भे की बात यह है कि बिहार की कोई 29 फीसदी आबादी जो 1 करोड़ 76 लाख होती है बिहार में नहीं रहती. ये लोग जिन्हें प्रवासी मजदूर कहा जाता है दूसरे राज्यों में जा कर मेहनत मजदूरी या छोटीमोटी नौकरी कर अपना पेट पालते हैं क्योंकि बिहार में रोजगार का भी टोटा है और इन में 98 फीसदी दलित मुसलिम पिछड़े और आदिवासी हैं. बचे 2 फीसदी में से अधिकतर सवर्ण युवा या पैसे वाले पिछड़े जिन्हें अगड़ा मान लिया गया है, हैं जो कम्पनियों की तगड़े पैकेज वाली नौकरी कर रहे हैं.

सीधेसीधे प्रवासी पौने 2 करोड़ बिहारी मजदूर वोट डालने से वंचित हो सकते हैं क्योंकि इन्हें बाहरी राज्यों से बिहार आना पड़ेगा जो बेहद खर्चीला काम है. बिहारी मजदूर केवल छठ के त्यौहार पर ही घर आते हैं लेकिन इस के लिए उन का अलग से फंड होता है जिस में वे साल भर पैसा जमा करते हैं. अब ये दिक्कत में आ गए हैं कि अभी 15 – 20 हजार रुपए आने जाने में खर्च किए तो साल भर का बजट बिगड़ेगा फिर वोट डालने तो जाने का सवाल ही नहीं उठता तो क्यों बेकार में एक पहचान पत्र के लिए भागादौड़ी और मगजमारी की जाए.

यही चुनाव आयोग और बाबा लोग चाहते हैं कि ये गैर सवर्ण वोट डाल ही न पाएं क्योंकि इन में से अधिकतर भाजपा के वोटर नहीं हैं.

कोढ़ में खाज सरीखी बात यह कि चुनाव आयोग ने इतने बड़े काम के लिए महज एक महीने का वक्त दिया यानी आयोग यह मानकर चल रहा है कि जैसे ही लोग जन्म प्रमाण पत्र बनवाने जाएंगे वह थाल में कहीं सजा रखा होगा. यही हाल दूसरे दस्तावेजों का है जिन्हें हासिल करने में महीनों और कभीकभी तो सालों लग जाते हैं. ऊपर से घूस देना पड़ती है सो अलग. जिस राज्य में लोगों को खानेपीने और रहने सहित रोजगार के लाले पड़े हों वे घूस के पैसे कहां से लाएंगे यह सोचना किसी आयोग या सरकार का काम नहीं. यह भी नहीं देखा गया कि मौसम बारिश और बाढ़ का है ऐसे में गांव वालों का बाहर निकलना दूभर हो जाता है.

और जिन लोगों की यह जिम्मेदारी है उन्होंने हल्ला भी मचाया और सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया. आरजेडी सांसद मनोज झा, स्वराज इंडिया के योगेन्द्र यादव और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ये दलीलें ले कर सुप्रीम कोर्ट गए हैं कि एसआईआर संविधान के अनुच्छेद 14, 19 ( 1 )( ए ), 21, 325 और 328 की अनदेखी या उल्लंघन है. जिस से लाखों वोटर वोट डालने के अपने हक से महरूम रह जाएंगे.

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई कर अपना फैसला देगा. उधर बात और माहौल बिगड़ते देख चुनाव आयोग ने राहत के नाम पर यह घोषणा कर दी है कि अभी वोटर गणना फार्म जमा कर दें दस्तावेज बाद में जमा कर सकते हैं. यह मन बहलाने जैसी और विवाद टकराऊ बात नहीं तो और क्या है.

इस दौरान आरजेडी मुखिया तेजस्वी यादव ने इस फरमान के विरोध में 9 जुलाई को चक्का जाम की घोषणा कर दी जिस में कांग्रेस इस में शामिल होगी. तेजस्वी इसे लोकतंत्र को कमजोर करने की साजिश और एनआरसी जैसा कदम बता रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे भी विरोध जता रहे हैं.

खामोश हैं तो 2 प्रमुख दलित नेता राम को काल्पनिक करार देने वाले जीतन राम मांझी जिन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता और वे अगर किसी मंदिर में चले भी जाएं तो मंदिर को गंगा जल से धो कर पवित्र किया जाता है. दूसरे हैं रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान जो इन दिनों गागा कर दलितों को बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने अपने पिता को भाजपा के साथ जाने के लिए मनाया था जबकि उन्होंने यह घोषणा कर दी थी कि एक दफा जहर खा लूंगा लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा. अब भगवा गोद में झुला झूल रहे और सत्ता सुख भोग रहे चिराग अपने पिता के समाजवादी उसूलों में आग लगा रहे हैं.

बिहार में बवाल मचा हुआ है. गेंद अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है. उस के 10 जुलाई के फैसले पर सभी की निगाहें हैं अगर वह चुनाव आयोग से इत्तफाक नहीं रखता तो चुनाव आयोग की खासी किरकिरी होगी और घुसपैठियों की रोकथाम के लिए यह कवायद की जा रही है जैसी दलीलों से सहमत होता है तो यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि लगभग 2 करोड़ वोटर अपना वोट नहीं डाल पाएंगे. बीच का रास्ता कोर्ट यह निकाल सकती है कि इस की मियाद थोड़ी और बढ़ा दे लेकिन इस से सभी लोग यानी वोटर रजिस्टर हो जाएंगे ऐसा लगता नहीं.

जिस राम नीति की बात धीरेन्द्र शास्त्री पटना से कर गए उस में शंबूक नाम के शूद्र को महज इसलिए मार दिया गया था कि उस के धर्म कर्म करने से रामराज में एक ब्राह्मण बालक की मौत हो गई थी. इसी नीति पर चुनाव आयोग संवैधानिक तरीके से चल रहा है कि गैर सवर्ण वोट ही न डाल पाएं.

Childless Women : 60 प्रतिशत निःसंतान महिलाएं तांत्रिकों के कुचक्र में

Childless Women : कुसुम की शादी को दूसरा साल बीत रहा था, मगर अभी तक वह कंसीव नहीं कर पाई थी. कुसुम की सास ने तो शादी के दिन ही पोतेपोतियों की फरमाइश कर दी थी. साल भर तो वह चुप रही, मगर दूसरे साल से ही वह बचा पैदा करने के लिए बहू के पीछे पड़ गई. रिश्तेदारों से फ़ोन पर बात करती तो बस यही बात ले कर बैठ जाती कि बहू की गोद अभी तक सूनी है. कुछ और समय बीता तो वह कुसुम को बांझ होने का दोष देने लगी. सुबह शाम के उलाहनों से कुसुम का जीना दूभर हुआ जा रहा था. एक दिन उस ने झुंझला कर सास से कह दिया, ‘अब बच्चा नहीं ठहर रहा तो मैं क्या करूं. जब होना होगा तब हो जाएगा.’

मगर सास कहां चुप बैठने वाली थी. बेटे को समझा बुझा कर उस ने कुसुम को एक तांत्रिक के पास ले जा कर झाड़फूक कराने को कहा. मां की जिद के आगे बेटा भी झुक गया. कुसुम से बोला, ‘जैसा मां कहती हैं करो. वह अनुभवी हैं. हमारा बुरा नहीं चाहती हैं.’

कुसुम पढ़ीलिखी थी, फिर भी परिवार के दबाव में तांत्रिक के पास जाने को राजी हो गई. तांत्रिक ने 16 शनिवार लगातार आने और एक घंटे की पूजा का मंतर सुनाया. इस सब में अब हर शनिवार उन के 1000 रुपए से ज्यादा खर्च होने लगे. 501 रुपए तो वह अपनी दक्षिणा ले लेता और बाकी हवन सामग्री के नाम पर ऐंठता था. चार शनिवार तो कुसुम की सास उस के साथ गई मगर बाद में कुसुम अकेले ही जाने लगी. एक दिन तांत्रिक ने कुसुम से कहा कि तुम्हारा पति योग्य नहीं है. तुम उस के साथ समय नष्ट कर रही हो. बच्चा चाहो तो मैं तुम्हें दे सकता हूं. सब गोपनीय रहेगा.

इतना सुनना था कि कुसुम ने आव देखा ना ताव एक झन्नाटेदार थप्पड़ तांत्रिक के गाल पर बजा दिया और एक झटके में वहां से बाहर निकल गई. घर आ कर उस ने पति को सारी बात बताई. वह सारी बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. मां से कुछ कहते तो वह उलटे बहू को ही दोष देने लगतीं. लिहाजा मां को कुछ बताए बगैर अगले शनिवार दोनों एक गाइनेकोलौजिस्ट से मिले.

कुसुम के कुछ टेस्ट होने के बाद पता चला कि उसके यूट्रस में फाइब्राइड्स हैं जो गर्भ नहीं ठहरने दे रहे हैं. फाइब्राइड्स, जिन्हें मायोमा या लियोमायोमा भी कहा जाता है, गर्भाशय में होने वाले गैर-कैंसरयुक्त ट्यूमर होते हैं. ये मांसपेशियों और रेशेदार ऊतक से बने होते हैं. इन के कारण निषेचन के पश्चात बना भ्रूण बच्चेदानी की दीवार से चिपक नहीं पाता और नष्ट हो कर शरीर से बाहर चला जाता है. ये फाइब्राइड्स बांझपन को तो बढ़ाते ही हैं, अधिक रक्तश्राव के कारण महिलाएं एनिमिक भी हो जाती हैं. इस के अलावा बारबार पेशाब आना, कब्ज, पीठ और पैर में दर्द जैसी परेशानियों से भी जूझती हैं.

अब कुसुम के फाइब्रायड का इलाज चल रहा है. डाक्टर ने कहा है कि फाइब्राइड्स ख़त्म होने पर वह कंसीव कर पाएगी. यदि फिर भी गर्भ ना ठहरे हो वह आईवीएफ पद्धति से बच्चा पा सकती है जो आजकल बहुत नार्मल बात है.

कुसुम समझदार है इसलिए तांत्रिक के चक्कर से जल्दी निकल गई. मगर देश में आएदिन हजारों औरतें तंत्रमंत्र झाड़फूंक से बच्चा पैदा करने के मोह में तांत्रिकों और बाबाओं की आपराधिक साजिशों का शिकार हो कर अपना सबकुछ गंवा रही हैं. हर दिन अखबारों में किसी ना किसी महिला से बलात्कार और बाबा के कुकर्मों की खबर छपती है.

ग्वालियर शहर के थाटीपुर इलाके में रहने वाली एक महिला को शादी के 5 साल बाद भी संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ. बच्चे की चाह में महिला एक तांत्रिक के चंगुल में फंस गई. तांत्रिक ने पहले तो महिला को घर छोड़ दूसरे मकान में रहने की सलाह दी. कहा कि पुराना घर संतान उत्पत्ति में बाधा पैदा कर रहा है. पतिपत्नी तांत्रिक की बातों में आ कर अपना पुराना घर छोड़ किराए के मकान में रहने लगे. तांत्रिक वहां आ कर प्रतिदिन तंत्र क्रियाएं करने लगा. फिर एक दिन तांत्रिक एक बड़े संत से मिलवाने के बहाने महिला को चुपचाप अपने साथ दिल्ली ले गया और वहां पर 3 दिन होटल के कमरे में दुष्कर्म किया. वहां से राजस्थान ले गया. जैसेतैसे भाग कर आई महिला ने आरोपी के खिलाफ ग्वालियर में मामला दर्ज कराया. ये मामला सितम्बर 2023 का है.

उत्तर प्रदेश के कासगंज में बेटी को बच्चा नहीं होने से परेशान एक महिला को तांत्रिक ने अपने झांसे में ले कर 20 लाख रुपए की ठगी कर ली. इतना ही नहीं, उस ने महिला के अश्लील फोटो खींच लिए. फिर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा. पीड़िता ने एसपी से मामले की शिकायत की.

कासगंज शहर की रहने वाली इस महिला का कहना है कि उन की बेटी की शादी को कई वर्ष हो गए थे, लेकिन बेटी को बच्चा नहीं हो रहा है. इस वजह से उस के ससुराल वाले उस को परेशान करते हैं. बेटी के लिए वह प्रभात नामक तांत्रिक के संपर्क में आई और उस के कहे अनुसार करती चली गई.

प्रभात ने कहा कि बुरी आत्माओं का साया होने के कारण उस की बेटी को बच्चा नहीं हो रहा है. तांत्रिक प्रभात ने महिला को बताया कि उन की बेटी के हाथ में संतान रेखा भी सही नहीं है. इस के लिए कुछ तंत्र क्रिया करनी होगी तो सब सही हो जाएगा. तंत्र विद्या करने के बहाने वह उस महिला के घर आने लगा और एक दिन उस ने महिला के कुछ आपत्तिजनक फोटो उस वक्त खींच लिए जब वह अपने बाथरूम में नहा रही थी. बाद में वह उन फोटो को वायरल करने की धमकी दे कर उसे ब्लैकमेल करने लगा. तांत्रिक को पैसे देने के लिए महिला ने अपने जेवर तक बेच दिए. यह मामला दिसंबर 2024 का है.

बरेली में शादी के बाद बच्चा न होने पर एक शख्स अपनी पत्नी को तांत्रिक के पास ले गया. जहां तांत्रिक ने तंत्रमंत्र की आड़ में पति की मौजूदगी में ही महिला को नशीला पेय पिला कर उस के देवरों से उस का रेप कराया. नशा उतरने पर युवती को जब अपने साथ हुए दुष्कर्म का भान हुआ तो उस ने स्थानीय थाने पर जा कर तांत्रिक, पति, दोनों देवरों और अन्य ससुरालियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया और तुरंत ससुराल छोड़ मायके आ गई. युवती की शादी जून 2023 में हुई थी और शादी के बाद से ही उस के ऊपर बच्चा पैदा करने का दबाव ससुरालियों की तरफ से था. बाद में सास ने बेटेबहू को तांत्रिक के पास जाने की सलाह दी थी. यह घटना 3 जून 2025 को मीरगंज क्षेत्र के आमजपुर की है.

पिछले दिनों लखनऊ के किंग जौर्ज मैडिकल कालेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग और लोहिया संस्थान के ओब्स एंड गायनी विभाग ने एक साल में बांझपन की शिकार 200 महिलाओं की काउंसलिंग से जो तथ्य जुटाए उन से पता चलता है कि निसंतान 60% महिलाएं इलाज से पहले तांत्रिकों के फेर में फंसती हैं.

काउंसलिंग के दौरान 60 फीसदी महिलाओं ने इलाज से पहले तांत्रिक और झाड़फूंक के उपाय अपनाने की बात कबूल की. कामयाबी न मिलने पर 20 प्रतिशत महिलाओं ने जड़ीबूटी और दूसरी पैथी का सहारा लिया. बाकी 20 फीसदी महिलाओं ने दिक्कत को भांपा. एक से दो साल तक संतान सुख के लिए इंतज़ार किया और सफलता न मिलने पर डाक्टर की सलाह पर इलाज शुरू किया.

जानीमानी गायनेकोलौजिस्ट डा. नीना बहल कहती हैं, ‘25 से 30 साल की उम्र परिवार बढ़ाने का सब से उपयुक्त समय है. 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं में बांझपन की आशंका बढ़ जाती है. समय पर इलाज हो जाए तो गोद भरने की उम्मीद बहुत ज्यादा होती है. कई बार महिलाओं की फेलोपियन ट्यूब ब्लौक होती है जिसे आसानी से खोला जा सकता है. कुछ महिलाओं को फाइब्राइड की समस्या होती है. कुछ में हार्मोनल असंतुलन होता है, वहीं अधिक उम्र में शादी, पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, मोटापा, यौन संचारित संक्रमण जैसे कई कारण होते हैं, जिस से गर्भ नहीं ठहरता है. इन का इलाज अब काफी आसान है. कई बार पुरुष में शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम होती है अथवा उन की क्वालिटी अच्छी नहीं होती है. इन सब का इलाज एलोपैथी में है. बहुत से दंपत्ति तांत्रिक बाबा, भूतप्रेत और दूसरी मान्यताओं में अपना कीमती समय गंवा देते हैं. जब कहीं से कोई फायदा नहीं होता तब एलोपैथी में इलाज ढूंढने आते हैं, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

डाक्टर की मानें तो गर्भ ना ठहरने के अनेक कारण होते हैं. यह स्त्री और पुरुष दोनों की वजह से हो सकता है मगर उस का समय से इलाज जरूरी है. महिलाओं में जहां 35 की उम्र के बाद प्रजनन क्षमता घटने लगती है वहीं पुरुष के शुक्राणुओं की क्वालिटी भी 40 की उम्र के बाद अच्छी नहीं रहती. ऐसे में तांत्रिकों और बाबाओं के चक्कर में समय खराब करने की बेवकूफी नहीं करनी चाहिए क्योंकि इलाज सिर्फ एलोपैथी में है और कहीं नहीं.

डाक्टर के मुताबिक महिलाओं में गर्भ न ठहरने के अनेक कारण हो सकते हैं जैसे – अनियमित ओवुलेशन, पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, थायरौइड गड़बड़ी (हाइपो या हाइपरथायरौइडिज़्म), समय से पहले रजोनिवृत्ति, फैलोपियन ट्यूब की रुकावट, पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिज़ीज, पुराने यौन संक्रामण (जैसे क्लैमाइडिया, गोनोरिया), एंडोमेट्रियोसिस, गर्भाशय की समस्याएं – गर्भाशय में फाइब्राइड्स, पोलीप्स या असामान्य बनावट, एंडोमेट्रियल परत की गड़बड़ी, हार्मोनल असंतुलन – प्रोलैक्टिन का अधिक स्तर या इंसुलिन असंतुलन आदि.

आधुनिक जीवनशैली भी महिलाओं में बांझपन को बढ़ा रही है. अब महिलाएं भी पुरुषों की तरह घर से बाहर निकल कर नौकरियां कर रही हैं. औफिस और घर के बीच संतुलन न बैठने पर या काम का अधिक बोझ होने पर अत्यधिक तनाव में रहना, मोटापा या बहुत कम वजन, धूम्रपान, शराब या किसी अन्य तरह के नशे की लत, औटोइम्यून या जेनेटिक समस्याएं बांझपन को बढ़ाती हैं.

पुरुषों में भी अनेक समस्याएं होती हैं जो उन्हें संतान सुख से दूर रखती हैं. जैसे – शुक्राणुओं की गुणवत्ता या मात्रा में कमी – कम स्पर्म काउंट, कम गतिशीलता, असामान्य आकार आदि. इस के अलावा अंडकोष की समस्याएं भी अवरोध पैदा करती हैं. जैसे वैरिकोसील, संक्रमण, चोट या सर्जरी, हार्मोनल असंतुलन, टेस्टोस्टेरोन की कमी आदि. कुछ पुरुषों में शीघ्रपतन की समस्या होती है तो कुछ में इरैक्टाइल डिसफंक्शन जो शुक्राणुओं को उन के गंतव्य तक नहीं पहुंचने देता है. जीवनशैली भी इस में महत्वपूर्ण रोल अदा करती है. अधिक गरमी (जैसे गर्म पानी से स्नान) शुक्राणुओं को पैदा करने में बाधक है, वहीं धूम्रपान, शराब, स्टेरौइड्स का इस्तेमाल भी नपुंसक बनाता है.

बांझपन का इलाज समय रहते करा लेना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि समय के साथ पुरुष और महिला दोनों की प्रजनन क्षमता कम हो सकती है. अगर शादी के एक साल बाद भी नियमित प्रयासों के बावजूद गर्भ न ठहरे, तो डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए. क्योंकि उम्र बढ़ने से अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता घटती है. कई बार कारण मामूली होते हैं जिन्हें समय रहते ठीक किया जा सकता है. देर होने पर मानसिक तनाव बढ़ता है, जो और ज्यादा असर डालता है.

अगर प्राकृतिक रूप से गर्भ ठहरने में कठिनाई हो रही है और अन्य उपचार (जैसे दवाएं या आईयूआई) से भी फायदा नहीं मिल रहा है तो इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) एक आम और प्रभावी विकल्प है. आजकल यह तकनीक बहुत आम हो गई है. इस में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि जितनी देर होती जाएगी होने वाले बच्चे को स्वास्थ समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाएगी.

आधुनिक तकनीक की मदद से आईवीएफ की सफलता दर पहले से कहीं बेहतर हो गई है. इसे सामाजिक स्वीकार्यता भी मिल चुकी है. अब लोग खुल कर आईवीएफ के बारे में बात करते हैं और इसे अपनाने में हिचक महसूस नहीं करते. भारत सहित कई देशों में आईवीएफ क्लीनिक हर छोटेबड़े शहर में उपलब्ध हैं. बढ़ती उम्र और तनाव भरे जीवन में जब प्राकृतिक रूप से गर्भधारण मुश्किल होता है, तो आईवीएफ एक उम्मीद की किरण बनता है.

Porn And Mythology : पोर्न हो या पौराणिक, दोनों बरगलाते ही हैं

Porn And Mythology : सुखी जीवन के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं इस के लिए जिस तरह धर्म मोक्ष को आखिरी मंजिल बताता है उसी तरह सैक्स ओर्गज्म को, लेकिन ये दोनों ही भ्रामक सुख और अवस्थाएं हैं. ये सहज क्या मुश्किल से भी मिलने बाली चीजें नहीं हैं बल्कि इन के लिए कई कर्मकांडों को करते रहना पड़ता है. सुख प्राप्ति के लिए कब, क्या, क्यों और कैसे करना है यह हम आप नहीं बल्कि सुखों के ठेकेदार तय करते हैं.

ईश्वर प्राप्ति यानी मोक्ष के जो जो मुख्य मार्ग धर्म ग्रन्थों ने बताए हैं वे हैं कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्ग. इन में भी सब से सरल है भक्ति मार्ग क्योंकि उस में वही करते रहना पड़ता है जो धर्म के ठेकेदार बताते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो आदमी अपनी हैसियत के मुताबिक दान दक्षिणा दे कर और बहुत सा वक्त बर्बाद कर मोक्ष मिलने न मिलने की झंझट और डर से मुक्त हो जाता है. ओर्गज्म इसी तरह का शाब्दिक सुख है जिस का एक बड़ा जरिया इन दिनों पोर्न फिल्में हैं. इन फिल्मों का सेवन भक्ति के नशे जैसा ही होता है जिस में कुछ देर झूमझाम कर लोग वापस वास्तविक जीवन में आ कर यह मान बैठते हैं कि यही सुख था.

पोर्न फिल्मों में आखिर ऐसा होता क्या है जिस का जूनून इतने सर चढ़ कर बोल रहा है, इस मसले पर दुनिया भर की अदालतें भी असमंजस में हैं. हाल ही में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला देते कहा है कि पोर्न बेबसाइटों को यह तय करना होगा कि उन की साइट्स देखने वाले बालिग यानी 18 साल से बड़ी उम्र के हैं. इस के लिए उन्हें यूजर्स से सरकारी पहचान पत्रों या दूसरे तरीकों से उम्र की पुष्टि करनी होगी. अगर कोई वेबसाइट ऐसा नहीं करती है तो उसे हर दिन 10 हजार डौलर का जुर्माना देना पड़ेगा. अगर कोई नाबालिग उन की वेबसाइट देखते पाया गया तो यह जुर्माना बढ़ कर 25 हजार डौलर तक होगा.

दरअसल में टेक्सास ने साल 2023 में एक कानून ( एचबी 1181 ) पारित किया था जिस का मकसद नाबालिगों को औन लाइन पोर्नोग्राफी से बचाना है. इस कानून को वयस्क मनोरंजन उद्योग का प्रतिनिधित्व करती संस्था फ्री स्पीच कोएलिशन ने यह दलील देते चुनौती दी थी कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और निजता के अधिकार का उल्लंघन है. निचली अदालत ने इस कानून के कुछ हिस्सों को असंवैधानिक करार दिया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उलट दिया. हालांकि फैसला देने बाले 6 जजों में से 3 निचली अदालत के फैसले से सहमत थे.

अब आगे जो भी हो लेकिन हालफिलहाल टेक्सास में पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स ने पोर्न फिल्में दिखाना बंद कर दी हैं. क्योंकि यह उन के लिए वाकई मुश्किल और महंगा काम है कि वे दर्शकों की उम्र का सत्यापन करती फिरें. टेक्सास सहित अमेरिका के कुछ अन्य राज्यों के लोग भी अब पोर्न सुख से वंचित हो गए हैं. लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि वे पोर्न फिल्में देखना बंद कर देंगे या पोर्न इंडस्ट्री को कोई भारी नुकसान होगा कहने का मतलब यह कि लोग धर्म की तरह सैक्स को नहीं छोड़ सकते अब वे चोरी से पोर्न फिल्मे देखेंगे. एक दफा लोग धर्म को छोड़ सकते हैं सैक्स को नहीं ( इस की मिसाल नास्तिक हैं ).

कोरोना काल भी इस का उदाह्ररण है जब मंदिर, मस्जिद, चर्च गुरूद्वारे वगैरह के द्वार बंद थे इस के बाद भी लोग घरों से भक्ति कर रहे थे लेकिन तब भक्ति की तादाद कम हो गई थी और सैक्स व पोर्न फिल्मों की बढ़ गई थी.

जब सब कुछ सामान्य हो गया तो देखते ही देखते धर्म का बाजार फिर गरमा उठा. लोगों ने बिना कोई तर्क किये मान लिया कि संकट और मुसीबतों का यह दौर उपर बाले की नाराजी की वजह से था अब दोबारा ऐसा न हो इस के लिए जरुरी है कि धर्म स्थलों में पैसा चढ़ाया जाता रहे सो इफरात से लोग दान दक्षिणा दे रहे हैं.

धर्म ग्रन्थ पौराणिक किस्सेकहानियों से भरे पड़े हैं जो लोगों को बताते हैं कि सुख कैसे हासिल किया जा सकता है. इस के लिए भक्तों को बरगलाने चमत्कारिक प्रसंगों की भरमार है. हरेक धर्म का नायक बहुत ताकतवर और सुपरमेन दिखाया गया है. ईसा मसीह, राम, कृष्ण मोहम्मद वगैरह अतिमानव बताए गए हैं और कुछ इस तरह बताए गए हैं कि उन की लीलाओं के बाबत कोई सवाल या तर्क नहीं करता. आइए कुछ प्रसंगों से समझें कि कैसेकैसे उटपटांग किस्से हरेक धर्म ने गढ़ रखे हैं.

ईसा मसीह बीमार लोगों को बिना किसी डाक्टरी इलाज के सेकंडों में तो ठीक कर देते थे. वे भूतप्रेत भी भगा देते थे लेकिन एक बार तो उन्होंने 120 गेलन पानी को शराब में बदल दिया था. उत्पत्ति 2 – 18 – 25 व मत्ती 1.11-13 के मुताबिक गलील के काना में एक शादी समारोह में उन्होंने यह करिश्मा कर दिखाया था. यह शराब भी उम्दा क्वालिटी की थी यह पीने वालों ने बताया. यह किस्सा शिर्डी वाले साईं बाबा के पानी से दिए जलाने वाले प्रसंग से मिलताजुलता है.

इन मनगढ़ंत बातों पर लोग सदियों से भरोसा कर रहे हैं तो भला पोर्न फिल्मों के कारोबारी क्यों न इस फार्मूले की कौपी करें. अब उन का नायक लगातार 8 – 10 बार सहवास कर रहा है तो इस में गलत किया अगर उस में भी कुछ गलत नहीं है तो पोर्न फिल्में यही तो बताती हैं कि आप कैसेकैसे आर्गेज्म और फोरप्ले सहित दूसरे सैक्स सुख प्राप्त कर सकते हैं लेकिन चूंकि यह तथाकथित रूप से अनैतिक है इसलिए भक्ति की तरह खुलेआम नहीं किया जा सकता.

पोर्न फिल्में देख लोग उत्तेजित होते हैं यह एक तरह की आस्था और ध्यान नहीं तो क्या है. ओशो यानी रजनीश ने लोगों की इन दोनों कमजोरियों और जरूरतों पर एक चर्चित और विवादित किताब ही लिख डाली थी जिस का नाम था सम्भोग से समाधि तक. वह इन दोनों को ही चेतना और ऊर्जा मानते थे. हालांकि यह मशहूर मनोविज्ञानी सिंगमड फ्रायड की थ्योरी का विस्तार था जिसे उन्होंने सरल तरीके से समझाया था.

यही धर्म के दुकानदारों ने किया, मसलन हजरत मोहम्मद चांद को दो हिस्सों में बांट सकते हैं, कृष्ण उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा सकते हैं तो पोर्न फिल्मों के नायक नायिका तरहतरह से सैक्स और सहवास क्यों नहीं कर सकते. इन फिल्मों पर लगता यह आरोप गलत कहीं से नहीं है कि ये दर्शकों को भरमाती और बरगलाती हैं जिस से लोगों की सैक्स लाइफ क्वालिटी गिरती है और सुखी नहीं रह जाती. तो फिर पौराणिक किस्से कहानियों में आस्था क्यों जबकि वे भी यही करती हैं पौराणिक धार्मिक चक्करों में तो पूरी लाइफ ही ख़राब हो जाती है.

दिक्कत तो यह है कि नैतिकता की परिभाषा और उदाहरण धर्म के धंधेबाजों ने तय किए. उन के नाम पर लोगों को डराया पाप पुण्य मोक्ष मुक्ति स्वर्ग नरक वगैरह के सांप बिच्छू दिखाए जब इन्हें यह लगा कि उन्मुक्त सैक्स दुकान खराब कर सकता है तो उन्होंने इसे वर्जित अनैतिक और समाज को बिगाड़ने वाला घोषित कर दिया और ऐसे किया कि लोग सैक्स को पाप ही समझने लगे.

आज के दौर के टीनएजर्स भले ही कितने आस्थावादी हो जाएं इफरात से पोर्न फिल्में चोरी छिपे देखते हैं और फिर हस्तमैथुन कर अपनी उत्तेजना शांत करते हैं.

कपल्स मनमाफिक तरीकों से सहवास करते हैं

विवाहितों के सैक्स प्रयोग चर्चा का विषय कम ही बनते हैं लेकिन शामत अविवाहितों की होती है जो हस्तमैथुन करने के बाद कुंठा और ग्लानि से भर जाते हैं. इस समस्या पर एक सटीक फिल्म ‘ओ माई गोड – 2’ साल 2023 में निर्देशक अमित राय ने बनाई थी. एक टीनएजर अपनी सैक्स अज्ञानता के चलते आत्महत्या करने तक उतारू हो जाता है क्योंकि स्कूल के बाथरूम में हस्तमैथुन करते उस का वीडियो दोस्तों ने बना कर वायरल कर दिया था. इस किशोर को यह वहम भी हो गया था कि उस का पेनिस आम या सामान्य आकार से छोटा है. सैक्स के लिए वह नीम हकीमों के चक्कर में भी पड़ जाता है और वियाग्रा भी खरीदता है जो नकली निकलती है.

किशोर मानसिकता पर बनी यह पहली फिल्म है जिसे शिक्षाप्रद कहा जा सकता है. निर्देशक ने सेंसर के प्रकोप से बचने शंकरजी को भी ठूंस दिया है जो पीड़ित परिवार की मदद किया करते हैं. यानी भगवान भी सैक्स समस्याएं हल करता है और सैक्स को वर्जित नहीं मानता. खजुराहों के मंदिरों की तो थीम ही सैक्स और सहवास है कि यह कैसे कैसे किया जा सकता है. बात आज के लिहाज से अजीब तो है कि मंदिरों के अंदर देवीदेवताओं भगवानों की मूर्तियां हैं और बाहर दीवारों पर यौन क्रियाओं को उसी तरह चित्रित किया गया है जैसा पोर्न चलचित्रों में दिखाया जाता है. इन चित्रों में वह सब कुछ है जो पोर्न फिल्मों में दिखाया जाता है और वह भी जो मस्तराम टाइप की नीली पीली किताबों में लिखा होता है.

इन मंदिरों और मूर्तियों का मकसद यौन शिक्षा देना ही माना जा सकता है क्योंकि मैथुनरत मूर्तियों की पूजा कोई नहीं करता लेकिन शिव और विष्णु की करते हैं. यह धर्म के धंधेबाजों की साजिश ही है कि उन्होंने धर्म और सैक्स को नदी के दो किनारों की तरह कर दिया है. गौर और बारीकी से पढ़ें और देखें तो धार्मिक साहित्य में भी इफरात से पोर्न है यह और बात है कि उस की चर्चा कोई कथाकार या धर्म गुरु नहीं करता.

यह सच है कि पोर्न फिल्में जागरूकता को बढ़ावा दे सकती हैं लेकिन उन के निर्माताओं और कारोबारियों ने ज्यादा पैसा कमाने के लालच में इन का कचरा कर दिया है ठीक वैसे ही जैसे धर्म गुरुओं ने पौराणिक साहित्य का कर रखा है. इन फिल्मों से कल्पनाशीलता गलत दिशा में बढ़ती है तो पौराणिक साहित्य भी कोई सही दिशा नहीं दिखाता जो अंधविश्वासों और कुरीतियों को प्रोत्साहन देता रहता है.

शनिवार की रात पीपल के पेड़ के नीचे दिया रखने से अगर सारे कष्ट दूर होते और जीवन सुखी होता तो दुनिया में कोई हैरान परेशान नहीं होता. करवा चौथ का व्रत रखने से अगर अखंड सुहाग मिलता तो देश में लाखों करोड़ों विधवाए न होतीं.

पोर्न और पौराणिक दोनों ही भ्रमित करने वाले हैं लेकिन इन से बचा भी नहीं जा सकता क्योंकि सैक्स कुदरती जरूरत है तो धर्म एक ऐसी परिकल्पना है जिस ने सदियों से लोगों के दिमाग को जकड़ रखा है. पोर्न तो जिंदगी के एक पहलू को डसता है लेकिन धर्म जन्म से पहले से ले कर मरने के बाद तक पीछा नहीं छोड़ता.

Parivarik Kahani : गुलाम – क्या शहर में मधुलिका अपने सपने को पूरा कर पाई?

Parivarik Kahani : यह कैसा वातावरण था विश्वविद्यालय का, जहां दिन में तो सब शांत दिखता था मगर शाम ढलते ही एक अजीब सी मदहोशी छा जाती थी. खुलेपन की चाह लिए छात्रछात्राएं शराब और दैहिक सुख को ही असल आजादी समझते थे. ऐसे में गांव से अपना कैरियर बनाने आई मधुलिका करे भी तो क्या करे…

मुझ को जैसे ही यह खबर मिली कि मैं दिल्ली के एक मशहूर विश्वविद्यालय में एमफिल के लिए चयनित हो गई हूं तो खुशी के कारण मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. इस विश्वविद्यालय में एमफिल के लिए चयनित होने का मतलब सीधा सा था, कैरियर की ऊंची उड़ान.
एमफिल के बाद पीएचडी और फिर किसी विश्वविद्यालय में प्रोफैसर के पद पर नियुक्ति, बड़ी पगार और सम्मान का जीवन.

मैं सपनों का महल बनाने लगी थी और बस उसे अब सच के धरातल पर उतारना भर था. मुझ जैसी देहाती लङकी के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. यहां तो कोई पुलिस की नौकरी भी पा जाता है तो गांव भर में मिठाई बंटती है, नाचगाना होता है और इलाके में नाम हो जाता है.

विश्वविद्यालय में प्रवेश की सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद मुझे छात्रावास में कमरा नंबर 303 आवंटित किया गया. कमरे में सामान ले कर पहुंची तो हक्कीबक्की रह गई. कमरे की दीवारों पर अश्लील भाषा लिखी हुई थी, टौयलेट की दीवारों पर भारत के महापुरुषों के बारे में अपशब्द लिखे हुए थे. इसे देख कर ऐसा प्रतीत हुआ कि पिछली बार यहां पर कोई निहायत ही बदतमीज लङकी रही होगी जो मेरी नजरों में छात्रा कहलाने लायक भी नहीं थी.

मैं ने सफाईकर्मी को बुलाने के बजाय खुद ही एक गीले कपड़े से दीवारों पर लिखी अश्लील भाषा और अपशब्दों को मिटा दिया. आखिर देश के महापुरुष मेरे भी तो महापुरुष थे. यदि हम उन का आदर नहीं कर सकते तो उन का अपमान करने का भी तो हमें कोई अधिकार नहीं.

विश्वविद्यालय का महौल भी कुछ अजीबोगरीब लग रहा था, लेकिन यह सोच कर कि जल्दी ही मैं खुद को इस माहौल में ढाल लूंगी, मैं ने एक लंबी और गहरी सांस ली. पर मुझे जल्दी ही यह एहसास हो गया कि इस विश्वविद्यालय के माहौल को मैं जितना असामान्य समझ रही थी, यह उस से भी अधिक असामान्य था. शाम के समय विश्वविद्यालय में अजीब सी मदहोशी छाने लगती थी. रातों के रंगीन होने की तो बातें ही क्या? ऐसी बातें सोच कर भी मेरे दिमाग में अजीब सी सिहरन दौड़ जाती थी.

जल्दी ही मेरी दोस्ती वैशाली से हो गई. वह जोधपुर के पास की रहने वाली थी. मेरी और उस की पारिवारिक पृष्ठभूमि लगभग एक जैसी थी. मेरे ही छात्रावास में उस का भी कमरा था. हम दोनों को हमेशा विश्वविद्यालय के बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा रहती थी. हम इस बात पर खूब हंसा करती थीं कि कई छात्र तो यहां के प्रोफैसरों से भी ज्यादा गंजे हैं. पता ही नहीं चलता कौन छात्र है, कौन प्रोफैसर है.

धीरेधीरे लाइब्रेरी, कैंटीन आदि स्थानों पर सीनियर छात्राओं का साथ भी मिलने लगा. उन्होंने इशारों ही इशारों में विश्वविद्यालय की अनेक अंदरूनी जानकारी दे दी, जिन से नए छात्र शुरू में अनजान रहते हैं. कौन सा प्रोफैसर कौन सी विचारधारा का है, कौनकौन से प्रोफैसर शोध के दौरान कैसे मदद करते हैं, कौन से प्रोफैसर के क्या शौक हैं, कौन सा प्रोफैसर अपने छात्रों के कैरियर के लिए कितना गंभीर है, कौन सा प्रोफैसर रंगीला है वगैरहवगैरह.

एक दिन में और वैशाली शाम के समय अपने एक सीनियर छात्रा शिखा के साथ विश्वविद्यालय के कैंपस में टहल रही थीं. तभी मुझे वहां एटीएम का बूथ दिखाई दिया. मैं ने वैशाली और शिखा से कहा, ‘‘मुझे कुछ पैसे निकालने हैं, अभी एटीएम से हो कर आई.’’

यह सुन कर शिखा हंस पड़ी,”मधुलिका, यह एटीएम नहीं. यह कंडोम निकालने का एटीएम है. सुरक्षित यौन संबंध बनाने के लिए सरकार ने विश्वविद्यालय में जगहजगह पर कंडोम निकालने के एटीएम लगवाए हैं. यहां लङकों से ज्यादा लड़कियां आती हैं. लङके तो खुले सैक्स का आनंद लेना चाहते हैं लेकिन गर्भ ठहरने का खतरा तो लड़कियों को होता है.’’

वैशाली और मेरे लिए यह बड़ी चौंका देने वाली बात थी. लेकिन शिखा के अपने तर्क थे और वह इस की आवश्यकता पर बल दे रही थी और हमें एहसास दिला रही थी कि हम दकियानूसी हैं. शिखा ने बताया, ‘‘मधुलिका, यह वह विश्वविद्यालय है जहां लड़कियों को वास्तव में लङकों  की बराबरी का एहसास होता है. इसलिए यहां रात के समय एकदूसरे के छात्रावासों में जाने के लिए लङकेलड़कियों को कोई मनाही नहीं है. वास्तविक आजादी तो यहीं है. तू भी ऐसी आजादी का आनंद लूटना चाहे तो स्वागत है.’’

‘‘धत… हम यहां पढ़ने के लिए आई हैं. ऐसी आजादी के मजे लूटने नहीं.’’

‘‘तो मधुलिका, जो ऐसा कर रहे हैं, क्या वे पढ़ नहीं रहे हैं? यहां विद्वानों की कतार लगी है कतार. अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक सम्मेलनों के लिए यह विश्वविद्यालय सर्वोत्तम स्थल है.’’

मैं ने शिखा की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा, ‘‘लेकिन पढ़ तो वे भी रहे हैं, जो ऐसी आजादी का जश्न नहीं मनाते. अच्छा अब चलते हैं, खाने का समय हो रहा है.’’

मैं ने बात को आगे बढ़ाने की बजाय, बात का रूख बदलने की कोशिश की. लेकिन ऐसा लगा जैसे मेरी बात शिखा को चुभ गई हो.

उस रात मैं शिखा की बातों को फिर से याद कर रोमांचित हो रही थी. कितनी आजादी है यहां औरत के लिए. मेरी बाली उमर मुझे धिक्कार रही थी कि आजादी की इस लहर का हिस्सा मैं क्यों नहीं बन रही हूं. लेकिन मेरे अंदर कुछ था जो मुझे ऐसा करने से रोकता था. देहातीपन, शर्म और हया या फिर छुट्टी में पिलाई गई नैतिकता.

शिखा ने बहुत कोशिश की कि मैं जल्दी से जल्दी उस माहौल में आत्मसात हो जाऊं. मेरा देहातीपन हमेशा हिचक पैदा करता था और मेरा यौवन उस हिचकिचाहट को कुरबान कर देना चाहता था. मेरी कश्ती डांवाडोल थी. वह कभी आजादी के उस तूफान में बह जाना चाहती थी, कभी किनारे लगना चाहती थी.

एक दिन शिखा मुझे अपने कमरे में ले गई. कमरे में सिगरेट के धुएं की गंध समाई हुई थी. कमरे में पहुंचते ही उस ने सिगरेट के पैकेट से एक सिगरेट अपने लिए निकाली और फिर सिगरेट का पैकेट मेरी ओर बढ़ा दिया. मेरे मना करने पर वह बोली, ‘‘मधुलिका, शरमाओ मत. मैं भी पहले ऐसी ही थी. मुझे भी तुम्हारी तरह लज्जा का एहसास होता था. लेकिन इस नशे ने मुझे जिंदगी जीने की कला सिखाई. दुनिया के सारे गम सिगरेट के धुएं के छल्लों में उड़ जाते हैं. यह जिंदगी हमें जीने के लिए मिली है, मधुलिका. इसे खुल कर जिओ, यार. क्या रखा है पाप और पुण्य में. भगवान तो हमें डराने के लिए बनाया गया है.’’

‘‘तो शिखा, तुम भगवान से नहीं डरतीं?’’

शिखा मेरी इस बात पर हंसी और फिर सिगरेट का कश भरते हुए कहा, ‘‘मधुलिका, मेरी विचारधारा में भगवान का कोई स्थान नहीं. ये पापपुण्य, स्वर्गनरक अज्ञानियों के इजाद किए हुए शब्द हैं. ये सब ढकोसले हैं. और धर्म, जिसे तुम धर्म कहती हो न, यह वह अफीम है जिस का नशा कभी उतरता ही नहीं.’’

‘‘लेकिन शिखा सोचो, तुम्हारे होने वाले पति को जब इन सब बातों का पता चलेगा, तब क्या होगा?’’

‘‘पति…कैसा पति? कौन पति?’’ शिखा ने बड़े आश्चर्य से कहा. फिर उस ने सिगरेट के राख को चुटकी मार कर गिराते हुए कहा, ‘‘मधुलिका, हमारे लिए पति ठोकरों पर होते हैं. हमें पति की जरूरत ही क्या है? हम जैसी आजाद खयालों की लड़कियां पति के बंधन में बंध कर गुलाम नहीं बनतीं. ये शादीविवाह के बंधन दकियानूसी और रूढ़िवादी लोगों के लिए हैं. गृहस्थी, परिवार, बच्चे, पति सासससुर की सेवा, छी, ये भी कोई काम है.’’

‘‘तो शिखा, फिर तुम्हारी नजरों में काम क्या है?’’

‘‘जिंदगी की मौज. हर बंधन को तोङना, आदमी को बंधनों से मुक्त करना. आजादी, आजादी, आजादी, बस आजादी. यही हमारे जीवन का मकसद है.’’

‘‘लेकिन शिखा, आजादी तो वे मांगते हैं जो गुलाम हों. तुम तो आजाद हो. फिर, तुम्हें किस बात की आजादी चाहिए?’’

शिखा ने सिगरेट में एक जोरदार कश और मारा और मुझ पर अपनी आजादी का रौब गालिब करने के लिए अलमारी से शराब की बोतल निकाल कर मेज पर रख दी,”ओह मधुलिका, तुम अभी नई हो इसलिए हमारे विचारों को समझती नहीं. ये जो धर्म और जाति की दीवारें हैं न, इन्होंने समाज को बांट रखा है. हमें ये दीवारें गिरानी हैं. हमें सब को बराबर के पायदान पर लाना है. सरकारों के नियमों और कानूनों ने इंसान का जीना हराम कर दिया है. इंसान अपनेआप को हर जगह गुलाम सा महसूस करता है. हमें ये सब बंधन तोङने हैं जो गुलामी का एहसास कराते हैं. इसलिए हम अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को भी नहीं मानते. इस धरती पर सभी इंसानों को स्वतंत्रतापूर्वक रहने का अधिकार है.’’

‘‘लेकिन शिखा, ये नियम और कानून तो सभ्य समाज की स्थापना के लिए हैं. ये नियम कानून नहीं होंगे तो जंगल राज स्थापित हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन मधुलिका, यह भी तो समझो कि जंगल में सब आजाद रहते हैं. खुली हवा में सब सांस लेते हैं. धर्म के संस्कार तो गुलाम बनाने के सिवाय कुछ करते ही नहीं. जातियां विभेद की दीवारें खड़ी करती हैं. जब तक यौन उन्मुक्त नहीं होगा तब तक  स्वतंत्रता की बात करना ही बेईमानी है. श्रेष्ठ मानव तभी जन्मेंगे जब एक औरत अलगअलग मर्दों से बच्चे जनेगी. एक मर्द की औलादें शक्लसूरत और बुद्धि से अपवादों को छोड़ कर एकजैसी ही होती हैं. इसलिए एक औरत को चाहिए कि वह अलगअलग मर्दों…’’

तभी शिखा के फोन की घंटी बज उठी,”हैलो, जतिन…’’

‘‘कहां हो शिखा?’’ उधर से जतिन की आवाज आई.

‘‘कमरे पर ही हूं. आ रहे हो क्या?’’

‘‘आ नहीं रहा हूं, आ चुका हूं.’’

‘‘अच्छा, तो एक मिनट रुको,’’ यह कह कर शिखा ने फोन काट दिया. उस की आंखों में इशारा था कि मैं वहां से दफा हो जाऊं. शिखा के कुछ कहने से पहले ही मैं उठ कर कमरे से बाहर आ गई. बाहर जतिन खड़ा था.
जतिन ने कमरे में दाखिल होते हुए पूछा, ‘‘शिखा, कौन थी यह?’’
शिखा ने हंसते हुए कहा, ‘”गुलाम.'”  Parivarik Kahani 

Samajik Kahani : नए जमाने की सिंड्रेला

Samajik Kahani : आज मयंक ने मनाली को खूब शौपिंग करवाई थी. मनाली काफी खुश लग रही थी. उसे खुश देख कर मयंक भी अच्छा महसूस कर रहा था. वैसे वह बड़ा फ्लर्ट था, पर मनाली के लिए वह बिलकुल बदल गया था. मनाली से पहले भी उस की कई गर्लफ्रैंड्स रह चुकी थीं, पर जैसी फीलिंग उस के मन में मनाली के प्रति थी वैसी पहले किसी के लिए नहीं रही.

‘‘चलो, तुम्हें घर ड्रौप कर दूं,’’ मयंक ने कहते ही मनाली के लिए कार का दरवाजा खोल दिया.

‘‘नहीं मयंक, मुझे निमिशा दीदी का कुछ काम करना है इसलिए आप चले जाइए. मैं घर चली जाऊंगी,’’ प्यार से मुसकराते हुए मनाली निकल गई. फिर उस ने फोन कर के कोको स्टूडियो में पता किया कि कोको सर आए हैं कि नहीं. उसे आज हर हाल में फोटोशूट करवाना था. कैब बुक कर के वह कोको स्टूडियो पहुंच गई. तभी उसे याद आया, ‘आज तो ईशा मैम की क्लास है. उन की क्लास मिस करना बड़ी बात थी. वे क्लास बंक करने वाले स्टूडैंट्स को प्रैक्टिकल में बहुत कम नंबर देती थीं. तुरंत कीर्ति को फोन कर रोनी आवाज में दुखड़ा रोया, ‘‘प्लीज मेरी हाजिरी लगवा देना. चाची और निमिशा दीदी ने सुबह से जीना हराम कर रखा है.’’

‘‘ओह, तुम परेशान मत हो,’’ कीर्ति उसे दुखी नहीं देख सकती थी. वह समझती थी कि चाचाचाची मनाली को बहुत तंग करते हैं. तभी कोको सर भी आ गए. मौडलिंग की दुनिया में काफी नाम कमाया था उन्होंने. हां, थोड़े सनकी जरूर थे पर मौलिक, कल्पनाशील लोग ज्यादातर ऐसे होते ही हैं. कोको सर ने मनाली को ध्यान से देखा और उस पर बरस पड़े, ‘‘तुम्हें वजन कम करने की जरूरत है. मैं ने पहले भी तुम्हें बताया था. आज तुम्हारा फोटोशूट नहीं हो सकेगा.’’‘‘बुरा हो इस मयंक का और कालेज के अन्य दोस्तों का. जबतब जबरदस्ती कुछ न कुछ खिलाते रहते हैं,’’ मनाली आगबबूला हो कर स्टूडियो से बड़बड़ाती हुई निकली. घर पहुंची तो चाची ने चुपचाप खाना परोस दिया. चाची उस से ज्यादा बातचीत नहीं करती थीं पर उस का खयाल अवश्य रखती थीं.

उस ने खाने की प्लेट की तरफ देखा तक नहीं, क्योंकि अब उस पर डाइटिंग का भूत सवार हो चुका था. रात का खाना भी उस ने नहीं खाया तो चाचाचाची को चिंता हुई. वैसे भी वह चाचा की लाड़ली थी. वे उसे अपने तीनों बच्चों की तरह ही प्यार करते थे. मनाली के मातापिता का तलाक हो गया था. उस की मां ने एक एनआरआई डाक्टर के साथ दूसरी शादी कर ली थी और अमेरिका में ही सैटल हो गई थीं. वहीं पिता कैंसर के मरीज थे. मनाली जब 8 वर्ष की थी तभी उन की मृत्यु हो गई थी. कुछ समय बूआ के पास रहने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसे चंडीगढ़ चाचाचाची के पास भेजा गया. पढ़ाईलिखाई में मनाली का मन कम ही लगता था जबकि चाचा के तीनों बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे थे. चाची उसे भी पढ़ने को कहतीं पर मनाली पर उस का कम ही असर होता था. इंटर में गिरतेपड़ते पास हुई तो चाचा उस के अंक देख कर चकराए. ‘‘किस कालेज में दाखिला मिलेगा?’’

इस का हल भी मनाली ने सोच लिया था. वह चाचा को आते देख कर किसी न किसी काम में जुट जाती. यह देख कर चाचा चाची पर खूब नाराज होते. उस के कम अंक आने का जिम्मेदार चाचा ने चाची और बड़ी बेटी निमिशा को मान लिया था. खैर, जैसेतैसे चाचा ने मनाली का ऐडमिशन अच्छे कालेज में करा दिया था. कालेज में भी मनाली ने सब को चाची और निमिशा के अत्याचारों के बारे में बता कर सहानुभूति अर्जित कर ली थी. चाचा की छोटी बेटी अनीशा की मनाली के साथ अच्छी बनती थी. अनीशा थोड़ी बेवकूफ थी और अकसर मनाली की बातों में आ जाती थी. दोनों बाहर जातीं और देर होने पर मनाली अनीशा को आगे कर देती. बेचारी को चाचाचाची से डांट खानी पड़ती. चाची मनाली की चालाकियां खूब समझती थीं पर अनीशा मनाली का साथ छोड़ने को तैयार न थी. उस का लैपटौप, फोन, मेकअप का सामान मनाली खूब इस्तेमाल करती थी.

एक दिन अनीशा ने उसे बताया कि वह एक लड़के को पसंद करती है. पापा के दोस्त का बेटा है. उस की पार्टी में ही मुलाकात हुई थी. अनीशा ने मनाली को मयंक से मिलवाया. मयंक बहुत हैंडसम था और अमीर बाप की इकलौती संतान. मनाली ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह कैसे भी मयंक को हासिल कर के रहेगी. ‘‘देखो मयंक, मैं कहना तो नहीं चाहती पर अनीशा को साइकोसिस की बीमारी है.’’ मनाली ने भोली सी सूरत बना कर कहा.

‘‘क्या?’’ मयंक तो हैरान रह गया था.

‘‘प्लीज, तुम यह बात अनीशा और उस की फैमिली से मत कहना. तुम्हें तो पता ही है न उस घर में मेरी क्या हैसियत है.’’

मयंक मनाली की बातों में आ गया. और उस ने अनीशा के प्रति अपना नजरिया बदल लिया. उधर अनीशा को मयंक का व्यवहार कुछ अलग लगने लगा. उस के फोन उठाने भी उस ने बंद कर दिए. अनीशा ने मनाली को इस बारे में बताया तो उस ने आंखें मटकाते हुए समझाया, ‘‘मयंक को मैं ने एक नामी मौडल के साथ देखा है. वह उस की गर्लफ्रैंड है. तुम उसे भूल जाओ.’’ मनाली को तसल्ली हो गई कि अनीशा के भी अंक इस बार कम ही आएंगे. अच्छा हो, दोनों ही डांट खाएं. एक दिन चाचा के बेटे मनीष ने उसे कालेज टाइम में मयंक के साथ घूमते देख लिया. घर आ कर चाचाचाची के सामने मनाली की पोल खुली. ‘‘मैं तो मयंक की खबर लेने गई थी कि उस ने अनीशा का दिल दुखाया,’’ सुबकते हुए मनाली ने कारण बताया. बात बनाना उसे खूब आता था. घर वालों को अनीशा की उदासी का कारण भी पता चला. अनीशा मनाली से नाराज होने के बजाय उस से लिपट गई, ‘‘इस घर में एक तुम ही हो, जिसे मेरी फिक्र है.’’ खैर, कड़ी मेहनत के बाद मनाली ने वजन घटा ही लिया. फोटोशूट भी हो गया और चोरीछिपे एक दो असाइनमैंट भी मिल गए.

एक दिन मयंक से उस ने साफसाफ पूछा, ‘‘मयंक, मैं चाचाचाची के पास रहते हुए तंग आ चुकी हूं. मुंबई में मेरी मौसी रहती हैं. क्या, तुम कुछ समय के लिए मेरी मदद कर सकते हो?’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं. मैं तुम्हारे रहने का बंदोबस्त कर देता हूं. तुम बस मुझे बताओ कि तुम्हें कितनी रकम चाहिए,’’ मयंक सोच रहा था कि मनाली मुंबई जा कर मौसी के पास रह कर अपनी पढ़ाई करना चाहती है. उस ने ढेर सारी रकम और एटीएम कार्ड मनाली को दिया और निश्चित तारीख का टिकट भी पकड़ा दिया. चाचाचाची से कालेज ट्रिप का बहाना बना कर मुंबई जाने का रास्ता मनाली ने खोज लिया था. ‘वापसी शायद अब कभी न हो,’ सोच कर मंदमंद मुसकराती मौडर्न सिंड्रेला मुंबई की उड़ान भर चुकी थी. उसे खुद पर और उस से भी ज्यादा लोगों की बेवकूफी पर भरोसा था कि वह जो चाहेगी वह पा ही लेगी. Samajik Kahani

Love Stories In Hindi : एक खूबसूरत बहस – शाम को लाइब्रेरी में क्या हुआ था?

Love Stories In Hindi : आज क्रिसमस है. रंगबिरंगी मोमबत्तियां जल रही हैं. उन की टिमटिमाहट में उस लड़की की याद फिर ताजा हो गई. क्रिसमस से एक दिन पहले की वह बहस भी याद आ गई जो कि उस लड़की से हुई थी. इसे सिर्फ बहस कह देना ठीक नहीं, मैं इसे ‘एक खूबसूरत बहस’ कहूंगा. इस खूबसूरत बहस ने मु?ा को एक खूबसूरत मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया. शहर के मध्य स्थित वह लाइब्रेरी.

उसी लाइब्रेरी में तो रोज शाम को वह आती थी. अकसर मैं भी शाम को ही लाइब्रेरी जाता था. वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी किया करती थी और मैं साहित्यिक पत्रपत्रिकाएं पढ़ता था. हमारी मेजें अलगअलग थीं. हम दोनों ही अपनेअपने कार्यों में व्यस्त रहते. हमारे बीच कभी कोई संवाद नहीं हुआ. क्रिसमस से एक रोज पहले मैं अपने दोस्तों के साथ लाइब्रेरी की बालकनी में बातें कर रहा था और जब कभी भी दोस्त मिलते हैं, बातें करते हैं तो सहज ही उन की आवाजें तेज हो जाती हैं. यही हुआ भी. हमारी आवाज के शोर से वह लड़की परेशान हो गई थी. उस ने सीधे हमारे पास आ कर गुस्से में कहा, ‘बातें ही करनी हैं तो किसी बगीचे में चले जाओ. लाइब्रेरी में बातें कर के तुम यहां का नियम तोड़ रहे हो.’ ‘लेकिन, हम तो बाहर आ कर बातें कर रहे हैं,’

मेरे एक मित्र ने जवाब दिया. ‘तुम्हारी आवाज लाइब्रेरी के भीतर तक पहुंच रही है और मैं कुछ भी पढ़ नहीं पा रही हूं,’ उस लड़की ने कहा. ‘अच्छा तो आप हमारी बातें सुन रही थीं? बताओ तो हम क्या बातें कर रहे थे?’ एक मित्र ने उसे चिढ़ाया. ‘लाइब्रेरी का नियम है- मौन रहना और पढ़ना. यदि आप नियम तोड़ोगे तो मैं लाइब्रेरियन से शिकायत करूंगी,’ लड़की ने गुस्से से कहा. ‘एक नियम और भी है, पत्रपत्रिकाओं को खराब नहीं करना. आप उन पर कैल्कुलेशन कर के उन को गंदी करती हो. हम भी लाइब्रेरियन से शिकायत करेंगे,’ मैं ने कहा. (बहस बढ़ती ही जा रही थी.) ‘किसी ने ठीक ही कहा है- भैंस के सामने बीन बजाने से क्या फायदा. वैसे भी चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता,’

वह लड़की हम को व्यंग्य कर के पैर पटकती हुई हौल में चली गई. मैं उसे जाते हुए देख रहा था. बहस के अंत में उस की आंखों में आंसू आ गए थे. उस का गला भर आया था. मैं ने उस के लहराते हुए केश देखे थे. मैं ने पहली बार उस लड़की को इतने करीब से देखा था. उस के पतले होंठ गुलाबी रंग लिए थे. आंखें बड़ीबड़ी और काली थीं. लंबी सुराहीदार गरदन में कोई आभूषण नहीं था और सच कहूं तो उसे किसी आभूषण की आवश्यकता भी नहीं थी. नुकीली सुंदर नाक उस के चेहरे को और भी अधिक आकर्षक बना रही थी. उस के केश घने और कुछ सुनहरा रंग लिए थे.

सामान्य कद की और छरहरी थी. वह बहुत आकर्षक थी. मैं ने जलपरी तो कभी नहीं देखी, लेकिन जलपरी से भी अधिक सुंदर लड़की को इतने करीब से देखा था. साधारण वेशभूषा वाली वह लड़की मुझे सम्मोहित कर गई थी. बहस में उस ने मुझ पर बहुत से कटाक्ष किए थे, लेकिन मुझे उस पर गुस्सा नहीं आ रहा था. मैं मुसकरा रहा था. मेरा व्यवहार देख कर मेरे मित्र भी चकित थे. उसे लग रहा था कि वह बहस में हार गई है, लेकिन वास्तविकता यह थी कि मैं अपना हृदय हार चुका था. बहस और लड़ाई का अंत सदैव दुखद होता है, किंतु इस बहस का अंत सुखद रहा. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी से पहले बहस हो और फिर प्यार. मेरी इच्छा थी कि अभी उस लड़की से ‘सौरी’ कह दूं,

लेकिन उस समय वह बहुत गुस्से में थी. थोड़ी ही देर बाद वह अपने घर चली गई. वह अपनी पुरानी जंग लगी साइकिल से लाइब्रेरी आती थी. साइकिल में चेनकवर नहीं था. फ्रेम में एकदो जगह तो वेल्डिंग भी की हुई थी. घंटी थी, लेकिन बजती नहीं थी. साइकिल को देख कर उस की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था. आर्थिक रूप से भले ही वह गरीब थी, लेकिन प्रकृति ने उसे सौंदर्य की अकूत संपत्ति दी हुई थी. मैं उसी के विषय में सोच रहा था. पंखे में भी उसी का चेहरा दिखाई दे रहा था. हवा से हिलता परदा उस के लहराते केशों की स्मृति कराता. मैं घड़ी देखता तो उस में भी वही नजर आती. दीवार में भी उसी का अक्स था. मैं ने दीवार को ही कई बार ‘सौरी’ कह दिया. मुझे उसी के खयाल आते रहे. सच तो यह है कि मैं प्रेम में पड़ गया था, लेकिन क्या यह प्रेम एकतरफा था? यही जानने के लिए दूसरे दिन लाइब्रेरी जाना जरूरी था. दूसरे दिन मैं लाइब्रेरी खुलने से पहले ही वहां पहुंच गया था.

मेरी जेब में कुछ टौफियां थीं, जो मैं ने रास्ते की दुकान से खरीदी थीं. 15 मिनट के बाद लाइब्रेरी का गेट खुला. मैं उस के आने का इंतजार करने लगा. मैं ने घड़ी देखी, उस के आने में आधे घंटे का समय शेष था. इंतजार का आधा घंटा आधे माह की तरह लंबा लगा. वह आई और अपनी सीट पर जा कर बैठ गई. मैं हिम्मत जुटा कर उस के पास पहुंचा और ‘मैरी क्रिसमस’ कह कर टौफियां उस की ओर बढ़ा दीं. वह हौले से मुसकराई और एक टौफी उठा कर बोली, ‘सेम टू यू, थैंक्यू.’ ‘कल शाम को आप से मेरी बहस के लिए मैं शर्मिंदा हूं,’ मैं ने कहा. ‘रात गई, बात गई,’ उस का मुहावरेदार उत्तर सुन कर मैं भी मुसकरा दिया. ‘देयर आर मैनी गिफ्ट्स अंडर द क्रिसमस ट्री, बट द बैस्ट वन इज द गिफ्ट औफ योर फ्रैंडशिप,’ यह वाक्य मैं ने क्रिसमस पर कहीं पढ़ा था, उस के सामने कह दिया.

जवाब में वह अपना दाहिना हाथ मेरी ओर बढ़ा कर बोली, ‘शेक हैंड एंड होली क्रिसमस.’ और हमारी दोस्ती का श्रीगणेश हो चुका था. बातों ही बातों में उस ने बताया कि उस का घर बहुत छोटा है और सदस्य अधिक हैं. घर के पास ही लोहा बाजार है. कुछ लघु उद्योग भी हैं. सारा दिन कोलाहल रहता है, इसलिए वह घर पर ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाती. बीते दिवस की बहस और कटाक्ष के लिए उस ने भी खेद व्यक्त किया. ‘वह सब तात्कालिक था,’ मैं ने कहा. इस पर वह हंसने लगी. जिसे मैं ने बहुत तुनकमिजाज समझ था, वह लड़की बहुत ‘फ्रैंडली’ और खुशमिजाज थी. मैं सोचता रहा कि किसी भी व्यक्ति के विषय में हमें कोई भी राय इतनी जल्दी नहीं बना लेनी चाहिए. वह पुस्तक पढ़ने में व्यस्त हो गई. अब हम रोज ही मिलने लगे थे. पढ़ाई के साथ बहुत सी बातें भी करते. अब फोन पर भी बातें होतीं तकरीबन रोज ही.

वह बहुत अच्छी हिंदी बोलती. उस का शब्दकोश बहुत अच्छा था. वाक्यों में मुहावरे और लोकोक्तियां होतीं. बहुत से शब्दों के पर्यायवाची उसे याद थे. उसे हिंदी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता. महादेवी वर्मा और मुंशी प्रेमचंद को उस ने खूब पढ़ा था. स्कूल के दिनों में छुट्टी वाले दिन और वार्षिक परीक्षाओं के बाद हिंदी साहित्य पढ़ा करती, ऐसा उस ने बताया था. मैं ने देखा कि उस लड़की में बनावट बिलकुल नहीं. वह अपनी सादगी और मौलिकता में भी खूबसूरत थी. सिर्फ बाहर से ही नहीं, भीतर से भी खूबसूरत. सूरत और सीरत दोनों आकर्षक. एक शाम किसी कारण से मुझे लाइब्रेरी जाने में देर हो गई. वह बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी. मेरे पहुंचते ही उस ने कहा, ‘मैं कब से इंतजार कर रही हूं. क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि हम एकदूसरे के पूरक हैं?’ ऐसा कहते वक्त उस की आंखें झिलमिलाने लगी थीं. मुझे लगा कि मैं आकाश में उड़ने लगा हूं. ठंडे बादल मेरे आसपास से हो कर गुजर रहे हैं. मैं अपने शरीर में बादलों की छुअन से उत्पन्न एक शीतल लहर को महसूस कर रहा था.

सब से खूबसूरत और खूबसीरत लड़की मुझे अपना पूरक मानती है. जब मैं विद्यार्थी था, तब मुझे ‘अनुत्तीर्ण’ और ‘पूरक’ शब्दों से डर लगता था, किंतु आज मुझे ‘पूरक’ शब्द अच्छा लगा. ‘पूरक’ तो मुझे ‘पूरब’ की तरह लगने लगा था- सुहाना. ‘पूरक’ में भी मुझे ‘पूरब’ के जैसी ही सुनहरी किरणें दिखाई दे रही थी, प्रेम की किरणें, रोमांच की किरणें. 2 दिनों बाद ‘वैलेंटाइन डे’ था. उस के लिए मैं ने गिफ्ट खरीदा और ‘वैलेंटाइन डे’ के दिन अपने प्रेम का इजहार कर दिया. Love Stories In Hindi

Family Story : चक्रव्यूह भेदन – वान्या क्यों सोचती थी कि उस की नौकरी से घर में बरकत थी

Family Story : जून का महीना था. सुबह के साढ़े 8 ही बजे थे, परंतु धूप शरीर को चुभने लगी थी. दिल्ली महानगर की सड़कों पर भीड़ का सिलसिला जैसे उमड़ता ही चला आ रहा था. बसें, मोटरें, तिपहिए, स्कूटर सब एकदूसरे के पीछे भागे चले जा रहे थे. आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए वान्या तेज कदमों से चली आ रही थी. उसे घर से निकलने में देर हो गई थी. वह मन ही मन आशंकित थी कि कहीं उस की बस न निकल जाए. ‘अब तो मुझे यह बस किसी भी तरह नहीं मिल सकती,’ अपनी आंखों के सामने से गुजरती हुई बस को देख कर वान्या ने एक लंबी सांस खींची. अचानक लाल बत्ती जल उठी और वान्या की बस सड़क की क्रौसिंग पर जा कर रुक गई.

वान्या भाग कर बस में चढ़ गई और धक्कामुक्की करती हुई अपने लिए थोड़ी सी जगह बनाने लगी. उस ने इधरउधर दृष्टि दौड़ाई. बस की सारी सीटें भर चुकी थीं. कहींकहीं 2 की सीट पर 3 लोग बैठे थे. कोई और उपाय न देख कर वह भी बस में खड़े अन्य यात्रियों की कतार में खड़ी हो गई. बस में बैठे पुरुषों में से किसी ने भी उठ कर उसे सीट देने की सहानुभूति न जताई. वान्या सोचने लगी, ‘ठीक ही तो है, जब महिलाओं ने घर से निकल कर बाहर की दुनिया में कदम रखा है, तो उन्हें अब अपनी सुकुमारता भी छोड़नी ही होगी.’

हरी बत्ती जल चुकी थी और बस ने क्रौसिंग पार कर के गति पकड़ ली थी. ‘उफ, इतनी गरमी और ऊपर से यह भीड़,’ वान्या पर्स से टिकट के पैसे निकालते हुए बुदबुदाई. वह अपनेआप को संभाल भी नहीं पाई थी कि बस अचानक एक ओर मुड़ी. बस के मुड़ने के साथ ही वान्या सामने की सीट पर बैठे पुरुष यात्रियों के ऊपर जा गिरी. किसी तरह उस ने पर्स से पैसे निकाल कर टिकट खरीदा और बस की छत में लगे पाइप को मजबूती से पकड़ कर खड़ी हो गई.

पड़ोसिन ने एक दिन व्यंग्य कसा था, ‘नौकरी करने में कितना आनंद है, प्रतिदिन अच्छीअच्छी साडि़यां पहनना और सुबहसुबह बनसंवर कर सैर को चल देना.’ ‘उन्हें तो मेरा सिर्फ बननासंवरना ही नजर आता है. बसों में भीड़ के बीच इस तरह पिचके रहना और घंटों हाथ ऊपर कर के खड़े रहना नजर ही नहीं आता. उस पर सारा दिन शिशु सदन में पड़े बच्चों की चिंता अलग से रहती है,’ वान्या अपने विचारों में खोई हुई थी कि अचानक उस ने अपने ऊपर कुछ भार सा महसूस किया. पलट कर देखा तो एक महाशय भीड़ का फायदा उठा कर अनावश्यक रूप से उस के ऊपर झुके जा रहे थे.

‘‘जरा सीधे खड़े रहिए,’’ वान्या खिसियाते हुए बोली.

बस ने गति पकड़ ली थी और इस के साथ ही वान्या के मन की परतें भी उघड़ने लगीं… 

आज तो कपड़े धो कर सूखने के लिए डालना ही भूल गई. सारे कपड़ों में सिलवटें पड़ गई होंगी और शाम को जा कर उन्हें फिर से पानी में निकालना पड़ेगा. सुबहसुबह काम का इतना तूफान मचा होता है कि कुछ होश ही नहीं रहता. बिस्तर से उठते ही सब से पहले पानी का झमेला. इसी बीच पति की चाय की फरमाइश. नौकरीपेशा महिलाओं की जिम्मेदारियां तो दोहरी हो गईं, परंतु पुरुषों की जिम्म्ेदारियां वहीं की वहीं रह गईं. शायद पुरुष यह सोचते हैं कि जब औरत में इतनी सामर्थ्य है कि वह घर का कामकाज संभालने के साथ बाहर का भी कर सकती है तो क्यों न उस के सामर्थ्य का सदुपयोग किया जाए.’

‘वान्या, जरा बाहर देखना, शायद समाचारपत्र आ गया होगा,’ अक्षत ने बिस्तर में लेटेलेटे ही आवाज दी थी. सोनू और लवी अभी सो कर नहीं उठे थे. सो उसे ही समाचारपत्र लाने के लिए बाहर भागना पड़ा था. वह चाय का घूंट भी नहीं ले पाई थी कि उस की कामवाली आ गई थी. फिर तो सारे काम छोड़ कर वह मायारानी की सहायिका बन कर उस के पीछेपीछे घूमती रही. मायारानी को बरतन धोने हैं तो पानी गरम कर के वह दे, उसे झाड़ू मारनी है तो सोफा, टेबल वह खिसकाए. माया की बच्ची रोए तो उसे भी चुप कराए. फिर मायारानी का काम समाप्त होने पर उसे चाय बना कर पिलाए. उसे दफ्तर के लिए देर माया के कारण ही हुई थी.

वान्या चिल्लाती रही, ‘माया, जल्दी, चाय पी ले, मुझे दफ्तर को देर हो रही है.’ पर वह बालकनी में बैठी अपनी 2 वर्षीया बेटी कमली को खिलाने में लगी थी.

‘तू यहां क्या कर रही है माया, अभी कमरे में पोंछा लगाना बाकी है.’आवाज सुनते ही वह हड़बड़ा कर उठी थी और पोंछा लगाने के लिए चल पड़ी थी. वान्या सोनू के टिफिन में सैंडविच डाल कर लवी की शिशु सदन की टोकरी तैयार करने लगी थी. दूध की बोतल, बदलने के लिए फ्रौक, बिस्कुट, फल आदि सबकुछ उस ने ध्यान से टोकरी में रख दिया था. अब सिर्फ लवी को दलिया खिलाना बाकी था. उस ने अक्षत को आवाज दी, ‘सुनो जी, जरा लवी को दलिया खिला देना, मैं सोनू की कमीज में बटन टांक रही हूं.’

‘वान्या, तुम मुझे प्रतिदिन दफ्तर के लिए देर कराती हो. अभी मुझे स्वयं भी तैयार होना है, सोनू को बस तक छोड़ना है.’ शिशु सदन का नाम सुनते ही वान्या की 3 वर्षीया बेटी लवी बिफर पड़ी थी, ‘मैं नहीं जाऊंगी वहां.’ लवी का यह रोनाधोना और फिर उसे मनाना उस का प्रतिदिन का काम था. 10-15 मिनट का समय तो इसी में निकल जाता था. वान्या लवी के आंसू पोंछ कर उसे पुचकारने लगी थी.

‘मैं तो कहता हूं वान्या, तुम यह नौकरी छोड़ दो. मेरा वेतन अब इतना तो हो ही चुका है कि मैं तुम्हारी नौकरी के बिना भी घर का खर्च चला सकता हूं,’ अक्षत ने गुसलखाने में जातेजाते कहा था. शायद अपनी लाड़ली बेटी को रोता हुआ देख कर उस का हृदय द्रवित हो उठा था. ‘तुम्हारी यह बेटी जरा सा रोई नहीं कि तुम तुरंत मेरी नौकरी छुड़वाने के बारे में सोचने लगते हो. याद नहीं तुम्हें, कितनी मुश्किलों से मिली है मुझे यह नौकरी,’ वान्या अक्षत को बीते दिनों की याद दिलाना चाहती थी.

अक्षत को कार्यालय के लिए देर हो रही थी. वह नहाने के लिए गुसलखाने की ओर चला गया और वान्या सोचती रही, ‘कितने पापड़ बेले हैं इस नौकरी को पाने के लिए और आज चार पैसे घर में लाने लगी हूं तभी तो थोड़ा सलीके से रह पा रहे हैं. इस नौकरी के पहले तो न उन के पास ढंग के कपड़ेलत्ते होते थे और न ही कोई कीमती सामान. उसे तो सिर्फ 2-4 साडि़यों में ही गुजारा करना पड़ता था. बेचारे सोनू के पास तो केवल 2 ही स्वेटर हुआ करते थे. अक्षत के पास स्कूटर तो क्या साइकिल भी नहीं हुआ करती थी. बस स्टौप तक पहुंचने के लिए उन्हें काफी दूर तक पैदल चलना पड़ता था. उन दिनों प्रतिदिन रिकशे का भाड़ा भी तो देने की सामर्थ्य नहीं थी उन में. एक बच्चे को भी वह पूरा पौष्टिक आहार नहीं दे पाती थी.

‘नहींनहीं, कभी नहीं छोड़ूंगी मैं यह नौकरी,’ वान्या सोचतेसोचते मुखर हो उठी थी.

डै्रसिंग टेबल के सामने खड़ा अक्षत उसे तिरछी नजरों से देख रहा था. शायद वह वान्या की मनोस्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था. वान्या सोनू को नाश्ते के लिए आवाज लगा कर उस का बैग स्कूटर पर रखने लगी थी. अक्षत ने स्कूटर स्टार्ट किया तो उस ने स्कूटर के पीछे बैठे सोनू के सिर पर प्यार से हाथ फेरा. 10 वर्षीय सोनू समय से पहले ही इतना गंभीर हो गया था. वान्या को ऐसा लगता, जैसे वह अपराधिनी है, उस ने ही अपने बच्चों से उन का बचपन छीन लेने का अपराध किया है. वह खयालों में खोई हुई दूर तक जाते हुए अक्षत के स्कूटर को देखती रही. अचानक उसे ध्यान आया, अभी तो कमरे में फैला सारा सामान समेटना है. वह भाग कर ऊपर आई. उस ने एक दृष्टि पूरे कमरे में दौड़ाई. बिस्तर पर गीला तौलिया पड़ा था. उस ने तौलिए को निचोड़ कर बालकनी में फैला दिया. वान्या ने बिजली की गति से भागभाग कर सामान समेटना शुरू किया. सभी वस्तुओं को यथास्थान रखने में उसे कम से कम 10 चक्कर लगाने पड़े. नाश्ते का निवाला निगलतेनिगलते उसे ध्यान आया, ‘कहीं मायारानी गुसलखाने की बालटी खाली तो नहीं कर गई.’

वान्या ने स्नानघर में जा कर देखा तो बालटी सचमुच ही खाली पड़ी थी. अब तो पानी भी जा चुका था. वह गुस्सा पी कर रह गई. अभी उसे तैयार भी होना था. घड़ी की सूइयों पर नजर गई तो हड़बड़ा कर अलमारी में से साड़ी निकालने लगी. लवी को शिशु सदन में छोड़ते समय वान्या का मन बहुत विचलित हो गया था. उस की सोच जारी थी, ‘आखिर क्या दे पा रही है वह अपने बच्चों को इस नौकरी से? इस उम्र में जब उन्हें उस के प्यार की जरूरत है, तो वह उन्हें छोड़ कर दफ्तर चली जाती है और शाम को जब थकीहारी लौटती है तो उन्हें दुलारने, पुचकारने का उस के पास समय नहीं होता. आखिर इस नौकरी से उसे मिलता ही क्या है? सुबह से शाम तक की भागदौड़ जीवन स्तर बढ़ाने की होड़ और इस होड़ में कुछ भी तो नहीं बचा पाती वह अपनी आमदनी का.

‘जब वह नौकरी नहीं करती थी तो उस का काम 4-5 साडि़यों में ही चल जाता था, लेकिन कार्यालय के लिए अब 15-20 साडि़यां भी कम पड़ती हैं. वर्ष में 2-3 जोड़ी चप्पलें घिस ही जाती हैं. ऊपर से पाउडर, क्रीम, लिपस्टिक का खर्चा अलग से. पतिपत्नी दोनों कमाऊ हों तो ससुराल वाले भी कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करते हैं. वह तो बस सुखसुविधा के साधन जुटाने की मशीन बन कर रह गई है और दिनरात पिस रही है, इसी चक्की में. पारिवारिक स्नेह और प्यार की जगह अब टीवी और स्टीरियो ने ले ली है. किसी को एकदूसरे से बात करने तक की फुरसत नहीं है.

‘उफ, नहीं करूंगी मैं ऐसी नौकरी,’ वान्या के होंठों से कुछ अस्फुट स्वर निकल पड़े. आसपास की सवारियों ने उसे चौंक कर देखा, तो उस की विचारतंद्रा रुकी. अब उस की आंखें बस की खिड़की से कहीं दूर कुछ तलाश रही थीं.

उसे फैसला करने में 4-5 दिन लगे. साथ काम करने वाली महिलाओं ने विरोध किया, ‘‘क्या मियां की पैर की जूती बन कर रहेगी?’’

चटकमटक वीना ने कहा, ‘‘लीना का पति रोज उस से झगड़ता था. उस ने पिछले 3 साल से अलग मकान ले रखा है.’’

‘‘हमारे पास इतनी दौलत कहां कि नौकरी छोड़ सकें,’’ यह सरोज का कहना था. कांतिहीन चेहरे वाली सरोज घर और दफ्तर के बीच पिस रही थी. वान्या को दोनों की सलाह में स्वार्थ नजर आया. फिर भी उस ने जी कड़ा कर के त्यागपत्र दे दिया. 2-4 दिन घर पर बेफिक्री से बीते. ढेरों काम थे, रसोई सड़ी हुई थी. पहले घर में डब्बाबंद सामान ही खाया जाता था, अब वह खुद बनाने लगी. बेटी भी अब संयत होने लगी. 7-8 दिन बाद अक्षत बोला, ‘‘मैं 4 दिनों के लिए टूर पर जा रहा हूं. तुम्हें दिक्कत तो न होगी?’’

‘लो बोलो, घर बैठी नहीं कि पति के पर निकलने लगे,’ वान्या ने सोचा. फिर विवाद न खड़ा करने की नीयत से बोली, ‘‘दिक्कत क्यों होगी, आप निश्चिंत हो कर जाइए.’’ अक्षत के बिना 4 दिन काफी लगने लगे. पहले वह टूर पर जाना टाल देता था कि वान्या को दिक्कत होगी. वह घर का जो छोटामोटा काम कर देता था, वह कौन करेगा… 

4 दिन बाद जब अक्षत लौटा तो बहुत खिलाखिला था, बोला, ‘‘मेरे अधिकारी भी साथ थे. मेरे काम से बहुत खुश थे. वहीं मेरी तरक्की भी कर दी और यह लो 5 हजार रुपए बोनस भी दिया है.’’

थोड़ी देर बाद अक्षत फिर बोला, ‘‘अधिकारी कह रहे थे कि पहले घरेलू कठिनाइयों के कारण ही वे मुझे जिम्मेदारियां देने से कतरा रहे थे. वे नहीं चाहते थे कि बाहर जाने के कारण घर में विवाद हो.’’ वान्या सन्न रह गई. वह तो सोचती थी कि उस की नौकरी से घर में बरकत थी, पर यह तो उलटा था. उसे अपने निर्णय पर गर्व हो आया. उस ने सोचा कि नौकरी नहीं तो क्या, वह भी तो अक्षत की कमाई में हिस्सा देती ही है. Family Story 

Social Story : पानी चोर – कल्पना उस रात ठाकुर के घर से क्या चुरा कर लाई

Social Story : रात के तकरीबन 2 बजे थे. कल्पना ने अपना कई दिनों से खाली पड़ा घड़ा उठाया और उसे साड़ी के पल्लू से ढक कर दबे पैर घर से चल पड़ी. करीब 15 मकानों के बाद वह एक कोठी के सामने रुक गई.

कल्पना को कोठी की एक खिड़की अधखुली नजर आई. उस ने धीरे से पल्ला धकेला, तो खिड़की खुल गई. उस की आंखें खुशी से चमक उठीं. वह उस खिड़की को फांद कर कोठी में घुस गई. कोठी के अंदर पंखों व कूलरों की आवाजों के अलावा एकदम खामोशी थी. लोग गहरी नींद में सो रहे थे.

कल्पना एक कमरा पार कर के दूसरे कमरे में पहुंची. वहां अलमारी अधखुली थी, जिस में से नोटों की गड्डियां व सोने के गहने साफ दिखाई दे रहे थे. कल्पना उन्हें नजरअंदाज करती हुई आगे बढ़ गई और तीसरे कमरे में पहुंची. वहां कई टंकियों में पानी भरा हुआ था.

कल्पना ने अपना घड़ा एक टंकी में डुबोया और पानी भर कर जिस तरह से कोठी में दाखिल हुई थी, उसी तरह से पानी ले कर अपने घर लौट आई.

‘‘पानी ले आई कल्पना. जब मैं ने देखा कि घड़ा घर पर नहीं है, तो सोचा कि तू पानी लेने ही गई होगी,’’ कल्पना के अधेड़ पति शंकर ने कहा, जो 2 महीने से मलेरिया से पीडि़त हो कर चारपाई पर पड़ा था.

‘‘जी, पानी मिल गया. आप पानी पी कर अपनी प्यास बुझाएं. मैं दूसरा घड़ा भर कर लाती हूं. अजीत उठे, तो उसे भी पानी पिला दीजिएगा,’’ कल्पना ने पानी से भरा गिलास देते हुए कहा.

शंकर ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई. 2 दिनों से इस घर के तीनों लोगों ने एक बूंद पानी भी नहीं पीया था. अजीत तो कल्पना का दूध पी लेता था, मगर कल्पना और शंकर प्यास से बेचैन हो गए थे.

कल्पना ने पानी से भरा हुआ दूसरा घड़ा भी ला कर रख दिया. जब वह तीसरा घड़ा उठा कर बाहर जाने लगी, तब शंकर ने पूछा, ‘‘आज भीड़ नहीं है क्या? तू ने पानी पीया? टैंकर कहां खड़ा है? क्या आज सरपंच ने टैंकर अपने घर में खाली नहीं किया?’’

‘‘आप आराम कीजिए, मैं अभी यह घड़ा भी भर कर लाती हूं,’’ कह कर कल्पना तीसरा घड़ा उठा कर चली गई.

इस बार भी कल्पना उसी तरह कोठी में दाखिल हुई और घड़ा टंकी में डुबोया. घड़े में पानी भरने की आवाज से अब की बार कोठी का कुत्ता जाग कर भूंकने लगा.

तभी कल्पना को बासी रोटी के टुकड़े एक थाली में पड़े दिखाई दिए. कल्पना ने रोटी का टुकड़ा उठा कर कुत्ते की ओर फेंका और घड़ा उठा कर तीर की मानिंद कोठी के बाहर हो गई.

तभी एक काले से आदमी ने वहां आ कर तेज आवाज में कल्पना से पूछा, ‘‘कौन हो?’’

कल्पना बिना कुछ कहे आगे बढ़ती गई. वह आवाज पहचान गई थी. वह सरपंच राम सिंह ठाकुर की आवाज थी.

सरपंच ने कल्पना का पीछा करते हुए कहा, ‘‘चोर कहीं की, पानी चोर. शर्म नहीं आती पानी चुराते हुए.’’

इतना कह कर सरपंच ने कल्पना को दबोच लिया. उस ने खुद को छुड़ाना चाहा, तो सरपंच बोला, ‘‘मैं अभी ‘पानी चोर’ कह कर शोर मचा कर सारे गांव वालों को जमा कर दूंगा. भलाई इसी में है कि तू वापस कोठी चल और मुझे खुश कर दे. मैं तेरी हर मुराद पूरी करूंगा.’’

‘‘चल हट,’’ हाथ छुड़ाते हुए कल्पना ने कहा. सरपंच ने जब देखा कि कल्पना नहीं मान रही है, तो उस ने ‘चोरचोर, पानी चोर’ कह कर जोरजोर से आवाजें लगानी शुरू कर दीं.

आवाज सुन कर गांव वाले लाठी व फरसा ले कर कोठी के पास जमा हो गए. कुछ लोग लालटेनें ले कर आए. मामला जानने के बाद कुछ लोग कल्पना से हमदर्दी जताते हुए कह रहे थे कि बेचारी क्या करती, 2 दिनों से उसे पानी नहीं मिला था. दूसरी ओर सरपंच के चमचे कह रहे थे कि इस पानी चोर को पुलिस के हवाले करो.

‘‘ऐसा मत करो, बेचारी गरीब है. छोड़ दो बेचारी को,’’ एक बूढ़ी औरत ने हमदर्दी जताते हुए कहा.

किसी ने कल्पना के पति शंकर को जा कर बताया कि कल्पना सरपंच के घर से पानी चुराते हुए पकड़ ली गई है और उसे थाना ले जा रहे हैं.

बीमार शंकर भागाभागा आया और सरपंच के पैरों पर गिर कर कल्पना की ओर से माफी मांगने लगा. मगर ठाकुर ने उसे पैरों की ठोकर मार दी और कल्पना को ले कर थाने की ओर चल पड़ा. बेचारा शंकर यह सदमा बरदाश्त न कर सका और वहीं हमेशा के लिए सो गया.

कल्पना को ले कर जब सरपंच और उस के चमचे थाने पहुंचे, तो थानेदार ने पूछा, ‘‘क्या हो गया? यह लड़की कौन है? इसे बांध कर क्यों लाए हो?’’

सरपंच ने थानेदार को नमस्ते करते हुए कहा, ‘‘जी, मैं गांव डोगरपुर का सरपंच ठाकुर राम सिंह हूं. इस औरत ने मेरी हवेली में घुस कर चोरी की है. मैं ने इसे रंगे हाथों पकड़ा है और आप के पास शिकायत करने आया हूं,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘कितना माल यानी मेरा मतलब है कि कितना सोनाचांदी व रुपए चोरी किए हैं इस ने?’’ थानेदार ने पूछा.

‘‘जी, रुपए या सोनाचांदी नहीं, इस ने तो एक घड़ा पानी मेरे घर में घुस कर चुराया है.

‘‘समूचे इलाके के लोग बूंदबूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, वे 15 किलोमीटर पैदल चल कर मुश्किल से एक घड़ा पानी ले कर लौटते हैं.

‘‘इस की हिम्मत तो देखिए साहब, खिड़की फांद कर पानी चुरा कर ले जा रही थी,’’ सरपंच ने बताया.

‘‘क्या चाहते हो तुम?’’

‘‘आप रिपोर्ट लिख कर इस औरत को जेल भेज दो,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘जाओ मुंशीजी के पास रिपोर्ट लिखवा दो.’’

‘‘मुंशीजी, रिपोर्ट लिखाने से पहले सरपंच को अच्छी तरह समझा देना,’’ थानेदार ने मुंशीजी को आवाज लगा कर कहा.

मुंशीजी ने सरपंच को एक ओर ले जा कर उस के कान में कुछ कहा.

‘‘अरे हैड साहब, मैं कई सालों से सरपंच हूं. मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि बिना लिएदिए आजकल कोई काम नहीं होता है,’’ सरपंच ने जेब से नोटों की 2 गड्डियां निकाल कर मुंशीजी के हवाले कर दीं.

मुंशीजी ने सरपंच की एफआईआर दर्ज कर ली. कल्पना को थानेदार के सामने पेश किया, ‘‘श्रीमानजी, यह वही लड़की है, जिस ने मेरे घर से एक घड़ा पानी चुराया है.’’

थानेदार ने कल्पना को नीचे से ऊपर तक घूरा और बोला, ‘‘क्या तू ने चोरी की? चोरी करते वक्त तुझे शर्म नहीं आई?’’

कल्पना पत्ते की तरह कांप रही थी. उस के रोने से मुरझाए हुए चेहरे पर आंसुओं की लाइनें नजर आ रही थीं.

दूसरे दिन कल्पना को अदालत में पेश किया गया. वहां सरपंच के साथ उस के चमचे कल्पना के खिलाफ गवाही देने के लिए आए हुए थे.

पुलिस ने पानी से भरा हुआ वह घड़ा अदालत में पेश किया, जो कल्पना के पास से जब्त किया गया था. जज ने सब से पहले कल्पना की ओर देखा, जो कठघरे में सिर नीचा किए खड़ी थी.

अदालत ने गवाहों के लिए पुकार लगवाई. सरपंच के चमचों ने अदालत को बताया कि कल्पना ने पानी चुराया, जिसे सरपंच ने रंग हाथों पकड़ लिया. मगर मौके पर कोई गवाह नहीं था. सभी गवाहों ने यही बताया कि सरपंच ने उन्हें बताया.

जज ने कल्पना से पूछा, ‘‘क्यों, क्या तुम ने एक घड़ा पानी सरपंच के घर से चुराया?’’

‘‘जी, एक घड़ा नहीं, बल्कि 3 घड़े पानी मैं सरपंच के घर से लाई. पर उसे चुराया नहीं, बल्कि अपने हिस्से का ले कर आई,’’ कल्पना ने बेधड़क हो कर बताया.

‘‘अपने हिस्से का… चुराया नहीं, लाई का क्या मतलब है?’’ जज ने पूछा.

‘‘इस भयंकर गरमी में गांव के सारे कुएं, हैंडपंप व तालाब सूख गए हैं. एकएक बूंद पानी के लिए गांव वाले तरस रहे हैं. प्यास से मर रहे हैं.

‘‘पंचायत ने गांव में पानी का इंतजाम किया है. हमारे गांव में पानी के लिए सिर्फ 2 टैंकरों का इंतजाम है, जिस में से एक टैंकर सरपंच अपने घर खाली करा लेता है, जिसे वह चोरी से बेचता है. दूसरे टैंकर का पानी गांव वाले छीनाझपटी कर के लेते हैं.

‘‘मैं वह अभागी औरत हूं, जिसे कई दिनों से एक बूंद पानी नहीं मिला. बीमार पति घर में हैं. मैं सरपंच के घर से अपने हिस्से का पानी ही लाई हूं.

‘‘मेरी बातों पर यकीन न हो, तो इन गांव वालों से पूछ लीजिए. मैं अदालत से गुजारिश करती हूं कि मैं पानी चोर नहीं हूं, बल्कि असली पानी चोर तो सरपंच है. सरपंच के घर की टंकियां पानी से भरी पड़ी हैं.’’

अदालत में गांव वालों ने भी कहा कि यह बात सच है. कल्पना सही कह रही है. वह 50 रुपए प्रति घड़े की दर से पानी बेचता है. अभी इस वक्त भी सरपंच के घर पानी के लिए ग्राहकों की लंबी कतार लगी है.

सरपंच बगलें झांकने लगा. जज को सरपंच व पुलिस की जालसाजी की बू इस मुकदमे में आने लगी. कल्पना को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया और असली चोर को पकड़ने के लिए जांच के आदेश जारी कर दिए गए.

कल्पना जब अपने गांव पहुंची, तो उसे पता चला कि किसी ने रात में ही उस के पति शंकर, जो सदमे से उसी दिन चल बसा था, की लाश फूंक दी थी.

जब कल्पना अपने घर पहुंची, तो उस का अबोध लड़का अजीत भी हमेशा के लिए सोया हुआ मिला. कल्पना ने जैसे ही अपने बेटे की लाश को देखा, तो उस की जोर से चीख निकल पड़ी.

‘‘अजीत… अजीत…’’ कह कर वह बेहोश हो गई. गांव वाले जो कल्पना के खिलाफ थे, अब सरपंच के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, ‘पानी चोर… सरपंच पानी चोर… असली चोर सरपंच…’

कल्पना पागल हो चुकी थी. वह अपने बेटे की लाश को बता रही थी, ‘‘बेटे, मैं पानी चोर नहीं हूं, असली पानी चोर सरपंच है.’’

इतना कह कर कल्पना कभी हंसती, तो कभी रोने लगती थी. पुलिस ने सरपंच के घर से लबालब भरी पानी की कई टंकियों को जब्त किया. जो पानी खरीदने आए थे, उन्हें गवाह बना कर ठाकुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.  Social Story

Stories In Hindi Love : मूसलाधार बारिश में बहते आंसू

Stories In Hindi Love : पूरे 2 वर्षों के बाद उसे देखा, सरेराह, भीड़ भरे बाजार में, रोमरोम से मानो आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा था. बमुश्किल नयनों के कोरों पर उन्हें सहेजा. पिछली बार जब मिली थी, उसे दो बोल धन्यवाद के फूल भी अर्पित नहीं कर पाई थी. कितना एहसान था उस का मुझ पर. कालेज से लौट रही थी, जैसे ही गली की नुक्कड़ पर सहेली के अपने घर मुड़ने पर अकेली हुई थी कि इंसानी खाल में छिपे कुछ दरिंदों ने हमला कर दिया था. इस से पहले कि उन के नाखून मेरी अस्मिता को क्षतविक्षत करते, जाने कहां से यह रक्षक प्रकट हुआ था.

जहां अकेली नारी का बल कौडि़यों का मोल होता है वहीं एक पुरुष की उपस्थिति उसे दस हाथियों का बल दे जाती है. हुआ भी यही, उस के आते ही सभी नरपिशाच अपने पंजे समेट अदृश्य हो गए. जब दुपट्टा खींचा गया, किसी ने नहीं देखा, पर जब उसे ओढ़ाया गया, लोगों ने देख लिया. उस के नाम से मैं अपने दकियानूसी परिवार में बदनाम हो गई. जिस की हिम्मत और नेकदिली की ढाल ने परिवार की बेटी के स्वाभिमान की रक्षा की थी, उसी ढाल को गलत समझा गया.

बड़ी मुश्किल से मां को सारा हाल बताया था. मां ने मेरे होंठों पर चुप्पी का ताला टांग ताकीद की कि यदि गली वाली बात का जिक्र घर में किया तो कल से ही पढ़ाई रोक दी जाएगी. बिना किसी गुनाह के अगले दिन से गुनाहगारों सरीखी सिर झुकाए कालेज जाना अनवरत चलता रहा. कभी 7 वर्षीय भाई मेरा अंगरक्षक बनता तो कभी 80 वर्षीया दादी.

हां, एक साया था जो बिला नागा, मेरा हमसाया बना चलता था. कभी नजरें भी नहीं मिलती थीं पर मालूम रहता था कि वह है. उस के होने का एहसास मात्र ही मुझे अगले कुछ महीने कालेज जाने और परीक्षा देने की हिम्मत देता रहा. नहीं जानती कि उस के लिए मेरा क्या महत्त्व था पर वह तो मेरे लिए कुछ खास ही था, जिस की उपस्थिति मात्र की परिकल्पना मुझे उन भेडि़यों व नरपिशाचों के बीच से गुजरने का हौसला देती थी.

बहरहाल, येनकेनप्रकारेण स्टडी सैशन पूरा किया, आती गरमी में मेरी शादी करा दी गई. अब गायबकरियों या भेड़ों से राय तो ली नहीं जाती है, सो मुझ से पूछने का तो कोई औचित्य ही नहीं था. सुन रही थी बड़ा ही भरापूरा परिवार है. पति का बहुत बड़ा कारोबार है. काफी संपन्न लोग हैं. रोका की रस्म के वक्त एक बड़े भारी जरीदार दुपट्टे से लंबा घूंघट कर एक वजनी सतलड़ा हार को गले में डाल दिया गया. इसी पगहे को पकड़ मायके के खूंटे से खोल ससुराल के खूंटे में बांध दी गई.

यों कहा जाए कि एक जेल से दूसरे जेल में शिफ्ंिटग हो गई. मायके में भी सिर झुका जमीन ताकती ही चलती थी, यहां भी घूंघट से बस उतनी ही धरती दिखती थी जहां अगला पग रखना होता था. सुना था आसमान का रंग नीला होता है पर मैं ने तो आज तक कभी देखा ही नहीं था.

नए परिवार में सामंजस्य बैठाने में कोई खास समस्या नहीं आई क्योंकि बचपन से बस यही तो सिखाया गया था कि जब शादी हो, अपने घर जाऊंगी तो कैसे तालमेल बैठाना है. बस, एक बात खटकती थी, घर के पुरुषों की नीयत. मुझे हर वक्त लगता जैसे आज भी मायके की उन्हीं गलियों से कालेज जा रही हूं. हर वक्त देवर का स्पर्श गलत जगह हो जाना अनायास तो नहीं था. मानसिक रूप से अविकसित कुंआरे जेठ की लोलुपता से बचना दिनोंदिन दूभर हो रहा था. फिर सास का बारबार मुझे गाहेबगाहे बिना मतलब जेठजी के पास भेजना, अब मुझे खटकने लगा था. घर में हर वक्त लगता मैं किसी दोधारी तलवार पर चल रही थी. आज बच भी गई तो जाने कल क्या होगा.

मेरे पति का घर में बड़ा रोब था. उन के आते सब पलकपांवड़े बिछा शालीनता की प्रतिमूर्ति बन जाते. पर उन के रोब तले मेरा दम घुटता था. हमारा आपसी संबंध मित्रवत न हो कर दासी और मालिक का होता था.

मैं ने कई बार बताना चाहा कि आज देवर की दृष्टता सीमा लांघ गई या सास ने उसी वक्त मुझे जेठ के पास जाने को मजबूर किया जब वे नहा रहे थे. पर मेरे अतिसफल समृद्घ कारोबारी पति के लिए ये सारी बातें मेरी कपोलकल्पना थीं. मैं हर दिन उन गंदी कामुक निगाहों से दोचार होती, बचतीबचाती एकएक दिन काटती. इतने सफल, समृद्ध पति के होते हुए भी मुझे पुरसुकून मयस्सर नहीं था.

उन दिनों 2 बातें हुई, एक अच्छी और एक बुरी. मैं मां बनने वाली हूं, यह मेरे लिए एक बड़ी खुशी की बात थी. नन्हे की आहट ने मुझे फिर से उसी बल से समृद्ध कर दिया जो मुझे कालेज जाते वक्त उस अनजान हमसाए से मिलती थी. एक नवीन ऊर्जा और बल से संचारित मैं, अनचाहे स्पर्शों को झटकने और कामुक नजरों को आंखें दिखाने का साहस करने लगी. मेरे बदलते अंदाज जाने किनकिन लांछनों के साथ नमकमिर्च छिड़क मेरे पति को परोसे जाने लगे. पति नाम का वह महान, बलशाली व्यक्तित्व न पहले मेरा था, न अब. उस के समक्ष मेरी हैसियत तुच्छ थी.

दूसरी बुरी बात यह हुई कि मेरे मायके में विभिन्न कारणों से द्वेष और कलह की अग्नि भड़क गई. उस की आंच से मैं भी अछूती नहीं रह पाई. यह उन दिनों की बात थी, जब मेरे बेटे के जन्म को अभी 2 महीने ही हुए थे और उस दिन मैं खुद को एक अर्धविकसित मानसिक पुरुष के पाश्विक पंजों से आजाद नहीं कर पाई थी.

पर गोद के बालक के बल से संचारित ऊर्जावान मैं ने इस बात पर बहुत कुहराम मचाया. मूक गुडि़या की जबान उस दिन देख सभी चकित थे. दुख इसी बात का था कि मेरे भगवान, मेरे देव, मेरे पतिदेव ने एक रहस्यमय चुप्पी लगा ली थी.

इस बीच, मायके में रिश्तों के बीच घमासान हुआ और आग लग गई मेरी गृहस्थी में. ताऊ के बेटे ने मेरे पति के जाने क्या कान भरे कि बीच आंगन में मेरे बेटे की वैधता को फिर उस के नाम से कलंकित किया गया, उसी के नाम से जिसे 2 सालों से देखा भी नहीं था.

सीता, अहल्या के बाद अब मेरी बारी थी. गृह निष्कासन की सजा सुनाई गई थी. आज फिर इज्जत की चीथड़ों में लिपटी मैं जीवन के मुहाने पर खड़ी थी कि वह दिख गया. अपने आंसुओं को तो मैं ने जज्ब कर लिया पर उसी वक्त कुदरत मूसलाधार बारिश के रूप में बिलख पड़ी. दीवार की ओट में बेटे को गोद में लिए बारिश से बचने का प्रयास विफल साबित हो रहा था कि अचानक भीगना बंद हो गया. दरअसल, वह छतरी थामे, खुद भीगता, मुझे बचा रहा था. उस के एहसानों की बारिश तले मैं सुकूनमंद हो, नयनों से मोती लुटाने लगी. Stories In Hindi Love

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