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हमारे विवाह को 11 साल हो चुके हैं लेकिन अब तक मेरी गोद नहीं भरी, कोई समाधान बताएं

सवाल

हमारे विवाह को 11 साल हो चुके हैं. अब तक मेरी गोद नहीं भरी. डाक्टरी जांच पड़ताल करवाने पर पता चला है कि समस्या मेरे पति को है, लेकिन वे अपना इलाज नहीं करवाना चाहते. कृपया कोई समाधान बताएं?

जवाब

न सिर्फ आप के पति, बल्कि ऐसे अनेक पुरुष जिन्हें पिता बनने के लिए इलाज की जरूरत होती है, समस्या को स्वीकारने के बजाय सच को झुठलाते रहते हैं. उन के भीतर संतानोत्पत्ति को ले कर अनेक प्रकार की मानसिक कुंठाएं बैठी रहती हैं, जिन के कारण वे यह रवैया अपनाते हैं.

भारतीय पुरुषप्रधान समाज में न केवल पुरुष, बल्कि अधिकांश स्त्रियां भी यह मानती हैं कि संतानोत्पत्ति का पूरा दायित्व स्त्री पर होता है. अगर किसी के घर बच्चा नहीं होता है, तो बिना डाक्टरी जांचपड़ताल किए ही स्त्री की कमी समझ ली जाती है. जिन मामलों में जांचपड़ताल से यह पता भी चल जाता है कि पुरुष में कमी है या उसे इलाज की जरूरत है, उन में भी सचाई को प्राय: छिपाने की कोशिश की जाती है. बहुत से पुरुष इसे अपनी मर्दानगी से जोड़ लेते हैं, तो कुछ यह कह कर सचाई को झुठलाते हैं कि उन की सैक्सुअल ताकत भलीचंगी है. जबकि सच यह है कि पुरुष की सैक्सुअल पावर और उस के वीर्य में संतानोत्पत्ति के लायक स्वस्थ मात्रा में स्पर्म का होना पुरुष प्रजनन जीवन के 2 अलग अलग पहलू हैं.

जिन पतिपत्नी के बीच संतान का योग नहीं बन पाता, उन की जांचपड़ताल करने पर 40% मामलों में समस्या पुरुष में होती है. पुरुष वीर्य में कई प्रकार के रोग विकारों के कारण स्पर्म नदारद या कम हो सकते हैं. कुछ विकारों का आसानी से इलाज किया जा सकता है और कुछ विकारों में उन्नत प्रजनन तकनीक का लाभ ले कर पुरुष पिता बनने के योग्य हो जाता है. जिन मामलों में कोई इलाज काम नहीं आता, उन में भी पतिपत्नी की सहमति होने पर डोनर स्पर्म काम में लाए जा सकते हैं.

पर यह इलाज तभी कामयाब हो पाता है जब पतिपत्नी पूरे विश्वास और धैर्य के साथ इलाज करवाएं और एकदूसरे की हिम्मत बंधाते रहें. कोई किसी पर छींटाकशी करे, ताने मारे उस से बात नहीं बनती.

कोशिश करें कि पति को प्यार से पूरी बात समझाएं. आप का डाक्टर भी यह काउंसलिंग कर सकता है. पर आप को मामले की नाजुकता का ध्यान रखना होगा. यह विशेष सावधानी बरतनी होगी कि किसी भी समय पति के अहम को ठेस न पहुंचे. तभी आप उपचार के लिए उन का पूरा समर्थन प्राप्त कर सकेंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मैं एक युवक से प्यार करती हूं लेकिन मेरे पापा कहते हैं कि यदि मैंने उससे बात भी की तो वो सुसाइड कर लेगे, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं एक युवक से बहुत प्यार करती हूं. वह भी मुझ से प्यार करता है. हम दोनों इस बारे में अपनी फैमिली को बता चुके हैं. हम आगे की पढ़ाई साथ करना चाहते थे, लेकिन मुझे पटना भेज दिया गया और उसे कोटा. उस की फैमिली मुझे स्वीकार करती है लेकिन मेरी फैमिली कहती है कि वह मांसाहारी है और मुझे उस से बात करने से भी मना करते हैं. मेरे पापा कहते हैं कि यदि मैं ने उस युवक से बात की तो वे अपना गला काट लेंगे. मैं किसी को खोना नहीं चाहती. क्या करूं?

जवाब

‘जब मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी,’ लेकिन जब बात अपने अजीज की हो तो दुविधा होती ही है. आप की स्थिति भी कुछकुछ ऐसी ही है. यह अच्छी बात है कि आप पेरैंट्स की इज्जत समझती हैं, लेकिन उन का आप पर उस युवक को छोड़ने हेतु आत्महत्या की धमकी देते हुए दबाव बनाना एकदम गलत है. ऐसे में आप को अपने प्रेम की परीक्षा देनी होगी.

अपने प्रेमी से कुछ दिन अगर दूर रहना पड़े तो कोई हर्ज नहीं. इस बीच अपने पिता को कौन्फिडैंस में लीजिए. जब उन्हें लगे कि वाकई युवक अच्छा है तभी बात बढ़ाइए. किसी अन्य के जरिए उन से बात करेंगी तो अच्छा रहेगा.

साथ ही अपने प्रेमी से कहें कि अच्छा कैरियर बनाए और सब को इंप्रैस करे. फिर तो जीत आप की ही होगी, क्योंकि युवती के पिता सिर्फ यही चाहते हैं कि युवक पढ़ालिखा और अच्छी कमाई व ओहदे वाला हो. जब समाज में उस की इज्जत होगी तो पिता भी स्टेटस व मांसाहारी होने पर एतराज नहीं करेंगे और आप का प्यार भी परवान चढ़ेगा.

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कोरा कागज: भाग 3- आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

Writer- साहिना टंडन

“नहीं, कहीं बाहर गई हैं. पर बस अभी आती ही होंगी.”

“यह मैं ने खीर बनाई थी. सो, मैं उन के लिए लाई हूं.”

“बस, आंटी के लिए, मेरे लिए नहीं.”

“नहीं, ऐसा नहीं है. तुम खा लो,” अचकचा कर बोल उठी वह.

उस की हालत देख और उस की बात सुन कर रितेश की हंसी छूट पड़ी.

“अरे, घबराओ मत. बैठो तो सही, मैं पानी लाता हूं.”

देविका ने कटोरा मेज पर रखा और सोफे पर बैठ गई. उस का दिल सीने में इस कदर धड़क रहा था, जैसे उछल कर बाहर आ जाएगा.

तभी रितेश पानी ले आया. देविका ने एक ही सांस में गिलास खाली कर दिया.

“अच्छा, मैं चलती हूं,” कह कर वे तेजी से वहां से निकलने को हुई.

“अरे देविका, सुनो तो… रुको देविका.”

देविका के कदम वहीं जम गए. मुश्किल से उस ने पीछे घूम कर देखा.

रितेश सधे कदमों से देविका के पास पहुंचा.

देविका की पलकें मानो टनों भरी हो उठीं. वे खामोश पर खूबसूरत पल शायद उन दोनों के लिए उन अनमोल मोतियों के समान हो चुके थे, जिन्हें वे सदा सहेज कर रखना चाहते थे. ऐसा लग रहा था जैसे वक्त वहीं थम गया हो.

तभी रितेश ने खुद को संभाला.

“ओ, हां, ठीक है देविका, मम्मी आएंगी तो मैं उन्हें बता दूंगा कि तुम आई थी.”

यह सुन कर देविका की नजरें ऊपर उठीं, तो फिर वह मुसकरा कर वापस लौट गई.

एक दिन रितेश को रास्ते में देविका के पिता मोहन मिल गए थे. रितेश ने उन्हें घर छोड़ने के लिए अपने स्कूटर पर बिठा लिया.

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तब बातों ही बातों में उन्होंने रितेश से देविका की पढ़ाई में एक कठिन विषय का जिक्र किया, तो रितेश ने कहा कि वह एक दिन घर आ कर कुछ जरूरी नोट्स दे देगा, जिस से देविका की काफी मदद हो जाएगी.

तब 3-4 बार रितेश ने उस के घर जा कर उस की फाइल पूरी बनवा दी थी. इन्हीं कुछ मुलाकातों

में देविका उस के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित हो चुकी थी. एक दिन उस ने शरारत करते हुए रितेश की

चाय में नमक मिला दिया, सोचा था कि गुस्सा करेगा, पर वह बिना शिकायत करे जब पूरी चाय पी गया, तो देविका की आंखें भर आईं. अपने प्रति ग्लानि से और उस के प्रति प्यार से.

आज शाम को भी रितेश घर आने वाला था, इसलिए देविका ने अपने मनोभाव खत में उतार दिए थे और आज वह एक उपयुक्त मौका देख कर वह खत उसे देना चाहती थी.

शाम को रितेश घर आया, तो आशा ने उसे बिठा कर देविका को आवाज लगाई.

देविका का मुरझाया चेहरा देख कर रितेश असमंजस में पड़ गया.

“बेटा, सवेरे से अपनी फाइल ढूंढ़ रही है, मिल नहीं रही. तो देख कैसे रोरो कर अपनी आंखें सुजा ली हैं. तू जरा समझा, मैं चाय ले कर आती हूं,” आशा रसोई में गई तो रितेश ने पूछा, “कहां खो गई फाइल, क्या कालेज में?”

देविका की आंखों से फिर आंसू बहने लगे. तब धीरे से रितेश ने उस के हाथ पर हाथ रख कर बेहद आत्मीय स्वर में कहा, “रोओ मत, किताब ले आओ. कोशिश कर के दोबारा बना लेते हैं.”

अब देविका से रोका ना गया. उस ने धीमे स्वर में कहा, “आई लव यू. मैं तुम से प्यार करती हूं. तुम्हारे

बिना रह नहीं सकती. तुम भी मुझे चाहते हो ना…?”

रितेश उस की ओर हैरानपरेशान निगाहों से देख रहा था.

“तुम कुछ कहते क्यों नहीं. कुछ तो कहो?”

रितेश के मुंह से कोई बोल ना निकला.

देविका को जैसे उस का जवाब मिल गया. अपनी रुलाई रोकने के लिए उस ने दुपट्टा अपने मुंह में दबा लिया और तेज कदमों से वहां से चली गई.

रितेश अवाक खड़ा रह गया और कुछ पलों बाद वहां से चला गया.

अगले दिन उस ने देविका के घर फोन लगाया. ज्यादातर फोन आशा ही उठाती थी, पर उस दिन देविका ने उठाया.

“हैलो,” देविका की आवाज बेहद उदासीन थी.

“हैलो देविका,”  रितेश की आवाज गंभीर थी.

“रितेश तुम…” देविका एक अनजानी सी खुशी से भर उठी.

“देविका, जानता हूं, जो कल तुम पर बीती, जो कल तुम ने महसूस किया, पर देविका, मैं मजबूर हूं या

शायद तुम्हारे निश्चल प्रेम का मैं हकदार नहीं. तुम सुन रही हो देविका?”

“हां, सुन रही हूं,” देविका को अपनी ही आवाज जैसे एक कुएं से आती प्रतीत हुई.

“पापा अब बेहद कमजोर हो चुके हैं. उन्हें उन की जिंदगी की शाम में अब आराम देना है. अनु दी की

जिम्मेदारी से भी मैं मुंह नहीं मोड़ सकता.

“देविका, इस वक्त अपने सुनहरे सपने साकार करने का माद्दा मुझ में नहीं है. मुझे माफ कर देना, शायद मैं ही बदनसीब हूं.कोई बहुत खुशनसीब होगा जिस की जिंदगी में तुम उजाला करोगी…”

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फोन कट चुका था. देविका जड़वत हो कर रह गई. शायद अर्धविक्षिप्त सी हो कर नीचे ही गिर पड़ती, अगर आशा ने उस के

पीछे आ कर उसे संभाला नहीं होता.

“क्या हुआ देविका? तू पथरा सी क्यों गई है?” आशा ने घबराए स्वर में पूछा.

“मम्मी, शायद मैं अब इम्तिहान पास ना कर पाऊं. रितेश के साथ अब दोबारा फाइल तैयार करना मुमकिन नहीं है,” देविका शून्य में देखती हुई बोली.

“अरे बेटे, इस समय इम्तिहान को भूल जा और एक खुशखबरी सुन. पूनम का फोन आया था सवेरे,

उन्होंने तुझे राजन के लिए मांगा है बेटी.”

आशा का स्वर खुशी से सराबोर था.

“फिर आप ने क्या जवाब दिया मम्मी?” यह सुन कर देविका कुछ सुन्न सी पड़ गई थी.

‘यह कोई समय ले कर सोचने की बात है. मैं ने झट से हां कर दी.”

“यह क्या किया आप ने? मैं और राजन हम दोनों बिलकुल अलग हैं. मैं राजन से प्यार नहीं करती. मैं

यह शादी नहीं कर सकती,” देविका ने भर्राए स्वर में कहा.

“अरे, यह प्यारमुहब्बत फिल्मी कहानियों में ही अच्छे लगते हैं, हकीकत में नहीं. और फिर आखिर

क्या कमी है लड़के में, अच्छा परिवार है, राजन उन का इकलौता बेटा है और फिर सब से बड़ी बात,

पहल उन की तरफ से हुई है, और क्या चाहिए.”

देविका जैसे कुछ भी सोचनेसमझने की ताकत खो चुकी थी. सबकुछ जैसे हाथ में सिमटी रेत की

तरह फिसलता जा रहा था.

“देविका, हम तेरे मांबाप हैं. कभी तेरा बुरा नहीं सोच सकते. मुझे पूरा विश्वास है तू वहां बहुत खुश रहेगी. वे लोग तुझे बहुत प्यार देंगे,” आशा उस के सिर पर हाथ फेरती हुई बोली.

उस के बाद कब रस्में निभाई गईं और कब वह दुलहन बन कर राजन के घर आई, यह सब जैसे उस के होशोहवास में नहीं था.

कोरा कागज: भाग 4- आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

Writer- साहिना टंडन

इस दौरान रितेश वहां उपस्थित नहीं था. वह सीधा राजन के घर पहुंचा था.

विदाई के बाद राजन के घर में हुई रस्मों में जब देविका ने रितेश को राजन के साथ हंसतेबोलते देखा, तो उस के दिल में एक हूंक सी उठी.

“क्या कोई एहसास नहीं है इसे मेरी भावनाओं का, मेरे

जज्बातों का, क्या कभी भी एक दिन के लिए, एक पल के लिए भी इस ने मुझे नहीं चाहा. मैं ने तो अपना सर्वस्व प्रेम इस पर अर्पित कर देना चाहा था, पर यह इस कदर निष्ठुर क्यों है, क्या मैं इस की जिम्मेदारियां निभाने में सहभागी नहीं बन सकती थी. इस ने मुझे इस काबिल भी नहीं समझा.

“उफ्फ, अगर यह मेरे सामने रहा तो मैं पागल हो जाऊंगी,” देविका और बरदाश्त ना कर सकी. संपूर्ण ब्रह्मांड जैसे उसे घूमता सा लग रहा था. अगले ही पल वह बेहोश हो चुकी थी.

आंखें खुलीं, तो एक सजेधजे कमरे में उस ने खुद को पाया. वह उठी तो चूड़ियों और पायलों की

आवाज से राजन भी जाग गया, जो उस के साथ ही अधलेटी अवस्था में था.

“अब कैसी हो? यह

रिश्तेदार भी ना, यह रस्में, वह रिवाज, ऐसा लगता है जैसे शादी इस जन्म में हुई है और साथ रहना अगले जन्म में नसीब होगा. सारी रस्में निभातेनिभाते तुम तो बेहोश हो गई थी.”

देविका बिलकुल मौन थी.

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“आराम से लेट जाओ. अभी सुबह होने में कुछ वक्त है. मैं लाइट बुझा देता हूं,” राजन ने प्यार से

कहा और लाइट बंद कर कमरे से बाहर चला गया.

सुबह तैयार हो कर देविका सीधे पूनम के पास रसोई में पहुंची.

“कैसी हो तुम? रात को थकावट की वजह से

तुम्हारी तबीयत ही बिगड़ गई थी,” पूनम ने लाड़ से कहा.

“जी, अब ठीक हूं,” देविका ने धीमे से जवाब दिया, “आप यह रहने दीजिए. मैं करती हूं.”

“अभी तो नाश्ता टेबल पर लग चुका है, तो अब बस यह चाय की ट्रे ले चलो.”

चाय ले कर देविका टेबल पर पहुंची. नवीन और राजन वहां बैठे थे. देविका ने नवीन के पैर छुए, तो

नवीन ने उस के सिर पर हाथ फेर दिया और मुसकराते हुए पूनम से बोले, ”बस उलझा दिया बहू को पहले ही दिन रसोई में. सास का रोल अच्छे से निभा रही हो.”

“अरे, ऐसा नहीं है. बहू नहीं यह तो बेटी है मेरी,” पूनम ने मुसकराते हुए कहा.

“देविका यह सब कहने की बातें हैं. अच्छा सुनो, अब सब से पहले अपने इम्तिहान की तैयारी करना.

मैं तो चाहता था, शादी परीक्षा होने के बाद ही हो, पर यह मांबेटी की जोड़ी कहां मानने वाली थी

भला,” नवीन सहज भाव से बोले.

“जी, पापा,” देविका हलके से मुसकरा के रह गई.

देविका ने पूरा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया था. इम्तिहान भी हो गए और देविका अच्छे नंबरों से पास भी हो गई.

तब नवीन और पूनम ने उन दोनों के बाहर जाने का प्रोग्राम बना दिया. ऊंटी की मनमोहक वादियों में भी जब देविका का चेहरा ना खिला तो शाम को राजन ने उस से पूछ ही लिया, “देविका, क्या बात

है? तुम शादी के बाद इतनी चुपचुप क्यों रहती हो? क्या तुम्हें मुझ से कोई शिकायत है?” राजन ने भोलेपन से पूछा.

यह सुन कर देविका कुछ पल उसे देखती रही. इस सब में राजन का क्या दोष है, उस ने तो सच्चे मन

से मुझ से प्यार किया है. क्यों मैं इस के प्यार का जवाब प्यार से नहीं दे सकती. मैं क्यों इसे वही

एहसास करवाऊं, जो मुझे हुआ है. नहीं, मैं इस का दिल नहीं तोड़ सकती. इसे जरूर एक खुशहाल जिंदगी का हक है.

देविका का दिलोदिमाग अब पूरी तरह से स्पष्ट था. राजन का हाथ उस के हाथ पर ही था. उस ने भी राजन के हाथ की पकड़ को और मजबूत करते हुए कहा, “ऐसी कोई बात नहीं है. मैं बहुत खुश हूं.”

देविका के चेहरे पर आंतरिक चमक थी. राजन को काफी हद तक संतुष्टि महसूस हुई और उस के

चेहरे पर एक निश्चल मुसकराहट आ गई. इस के बाद देविका ने राजन के सीने में अपना चेहरा छुपा

लिया.

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अगली सुबह वह बहुत हलका महसूस कर रही थी. शावर के नीचे जिस्म पर पड़ती पानी की फुहारों ने

जैसे उस का रोमरोम खिला दिया था. उस के नए जीवन की शुरुआत हो चुकी थी.

हनीमून से राजन और देविका काफी खुशहाल वापस लौटे. कुछ दिनों बाद रितेश के साथ एक अनहोनी घटना घट गई. एक रात आनंद बाबू की तबीयत काफी खराब हो गई. अस्पताल पहुंचने से

पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया. लता अब वहां रहना नहीं चाहती थी क्योंकि कुछ दिनों से आनंद अनु को बहुत याद कर रहे थे, इसलिए अब वो अनु से मिलने के लिए बेचैन हो उठी थी. उसे अपने

पास बुलाना चाहती थी. इस पर रितेश की बूआ ने कहा कि अभी अनु के लिए माहौल बदलना सही

नहीं है, क्यों ना वे लोग ही अब मकान बेच कर उन के पास आ जाएं. ऐसे हालात में लता को भी यही सही लगा. जल्दी ही रितेश का परिवार वहां से चला गया.

देविका शांत भाव से यह सब घटित होते देखती रही.

इस के बाद राजन और रितेश की दोस्ती सिर्फ फोन पर हुई बातों पर चलती रही और समय के साथ

साथ एक दिन सिर्फ दिल में ही बस गई. शायद रितेश का फोन नंबर बदल चुका था जो राजन के पास नहीं था.

देविका को लगभग डेढ़ वर्ष बाद पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई. अपूर्व बहुत प्यारा था. राजन की जान बसती थी उस में. अपनी तोतली भाषा में जब वो राजन को ‘पापा’ पुकारता था, तो राजन का दिल बल्लियों उछलने लगता था. इस तरह 5 वर्ष बीत गए.

इस बीच बिजनैस की एक जरूरी मीटिंग के लिए एक बार राजन को एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा.

उस दिन वह वापस आने ही वाला था कि दरवाजे की डोरबेल बजी. दरवाजा देविका ने ही खोला. सामने रितेश खड़ा था. देविका जैसे बुत समान हो गई.

“रितेश…” देविका के पीछे से उसे देख कर पूनम के मुख से तेज स्वर में उस का नाम गूंजा. देविका झट

से संभली. वह दरवाजे से एक तरफ हट गई.

रितेश भीतर आते ही पूनम के पैरों में झुका. पूनम ने

उसे गले से लगा लिया, दोनों की आंखें भर आईं. ड्राइंगरूम में बैठे दोनों देर तक बातें करते रहे. इस

दौरान देविका रसोई में ही रही. रितेश अपूर्व के साथ खेलने में व्यस्त रहा. नवीन घर आए तो वह भी उसे देख कर बहुत खुश हुए. आनंद बाबू को भी बेहद याद किया नवीन और पूनम ने. तभी दोबारा डोरबेल बजी.

“पापा आ गए, पापा आ गए,” कहता हुआ अपूर्व दरवाजे की ओर भागा. वह गिर ना पड़े, इस के लिए

रितेश उस के पीछे गया. अपूर्व को गोद में ले कर दरवाजा रितेश ने खोला. राजन ही था सामने. एकदूसरे को देखते ही दोनों मौन हो कर रह गए.

कुछ पल यों ही बीत गए. तभी अपूर्व “पापा… पापा…” पुकारने लगा. राजन ने उसे अपनी गोद में ले कर प्यार किया और फिर नीचे उतारा. उस के हाथ में खिलौना था, जिसे देखते ही अपूर्व ने लपक कर वह छीन लिया.

“दादी दादी. देखो, पापा क्या लाए हैं,” अपूर्व पूनम की ओर भाग गया.

राजन और रितेश गले मिल कर जैसे दुनियाजहान को भूल गए. खाने की मेज पर भी उन्हीं की बात चलती रही. देर रात उन दोनों को छोड़ कर सभी सोने चले गए.

“पर यार तू ने अब तक शादी क्यों नहीं की? मैं तो सोचता था कि अब तक तो तू 2-3 बच्चों का बाप बन चुका होगा. कोई पसंद नहीं आई क्या?”

बरतन समेटती देविका के गले में जैसे कुछ अटक सा गया हो.

“अरे, तेरे जैसी किस्मत नहीं है मेरी. हमें तो कोई पसंद ही नहीं करता.”

“क्या कमी है मेरे यार में, वैसे, देविका की कोई छोटी बहन नहीं है, वरना अपनी आधी घरवाली को

तेरी पूरी बनवा देता. क्यों देविका,” यह कह कर राजन खुद ही हंस पड़ा.

देविका बरतन समेट कर रसोई में चली गई.

कोरा कागज: भाग 5- आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

Writer- साहिना टंडन

बात खत्म करने की नीयत से रितेश उठा और बोला, “चल यार चलता हूं, होटल में कमरा लिया हुआ है. रात वही रुकूंगा. कल 12 बजे की फ्लाइट है वापसी की.”

“शर्म नाम की चीज नहीं है तुझ में, अपना घर होते हुए भी क्या कोई होटल में रुकता है. यहां रुक रहा है तू. अब इस के आगे कोई एक्सक्यूज नहीं देना. तू बैठ, मैं अभी आता हूं,” कह कर राजन अपने कमरे की ओर चला गया.

रातभर रितेश करवटें बदलता रहा. सवेरे सवा 5 बजे के करीब वह बाहर निकला तो देखा देविका लौन में पानी दे रही थी. रितेश उसी ओर चला गया.

“गुड मौर्निंग.”

“तुम यहां कैसे?”

“तुम से कुछ बात करनी है.”

“कुछ बात नहीं बची है करने के लिए. अब वक्त बदल चुका है.”

“नहीं देविका, जो वक्त हम जीना चाहते हैं, वो कभी नहीं बदलता. बदलते तो हम खुद हैं, क्योंकि खुद

को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेते हैं. आओ, मेरे साथ उधर बैठें, आज बहुत कुछ है तुम्हें बताने

के लिए.”

ना जाने किस भावना के वशीभूत हो कर देविका उस के पीछे चल दी.

कोने में रखी कुरसियों पर दोनों बैठ गए. रितेश ने बोलना शुरू किया. जिस दिन तुम्हें पहली बार

देखा था, उसी दिन से दिल से अपना मान लिया था तुम्हें, पर इजहार करने का न तो कोई मौका मिला और ना ही हिम्मत पड़ी. या यों कहूं कि चाह कर भी मना न कर सका.

“क्यों…?” देविका जैसे शून्य में देखती हुई बोली.

“शायद तुम्हें पता नहीं है कि मेरी बड़ी बहन अनु दी, जो सीमा बूआ के पास है, वो चलनेफिरने में असमर्थ है. उन के जन्म के समय मम्मी जैसे मौत के मुंह से बाहर आई थीं. कितने ही हफ्ते वे बिस्तर में ही रहीं, तभी से अनु दी बूआ के पास ही पलीबढ़ी है और मम्मी जब घर आई थीं, तब भी वे बेहद कमजोर थीं. उन्हे स्वयं देखभाल की सख्त जरूरत थी. ऐसे में अनु दी का ध्यान रखने में वे असक्षम थीं.”

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देविका पूरे ध्यान से उस की बात सुन रही थी.

वह अकेली थी और अनु दी से उन का लगाव अब एक मां से ज्यादा हो चला था. ऐसे में हालात को देखते हुए बूआ ने अनु दी को अपने साथ ले जाना चाहा, तो मम्मीपापा मना ना कर सके.

वक्त के साथ भी मां कमजोरी से उबर नहीं पा रही थीं. उन के इलाज का खर्चा और अन्य खर्चों ने जैसे पापा को समय से पहले कमजोर कर दिया हो. धीरेधीरे मम्मी की तबीयत में सुधार हुआ, फिर मेरे जन्म

के कुछ वर्ष बाद मम्मीपापा पुराना शहर छोड़ कर यहां आ गए. यहां की जलवायु मम्मी को रास आ गई थी. सभी कुछ सुचारु रूप से चलने लगा. पापा की दुकान भी यहां जम गई थी कि उन्हीं दिनों पापा को पहला दिल का दौरा पड़ा. जान बच गई थी उन की, पर डाक्टरों के हिसाब से अब उन का दिल बेहद कमजोर हो चुका था. अपने कालेज के फौरन बाद मैं ने उन का सारा काम संभाल लिया था.

तभी तुम से मुलाकात हुई. जो थोड़ाबहुत भी तुम्हें जाना, वही बहुत था मेरे लिए. तुम्हारे लिए प्यार

बढ़ता ही जा रहा था. तब तो और भी भर गया, जब चाय नमकीन मिली,” रितेश उस की ओर देख कर धीमे से हंस पड़ा.

देविका की आंखों से जैसे आंसुओं की झड़ी बह निकली.

एक दिन बूआ का फोन आया कि अनु दी की तबीयत खराब हो गई है, उन्हे वहां अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. मम्मी और मैं गए थे बूआ के घर, तब वहां जा कर पता लगा कि अनु दी की तबीयत संभल चुकी है और उन्हें डिस्चार्ज कर रहे हैं. तब बहुत मुश्किल से मैं तुम्हारी शादी वाली रात तक पहुंच सका था, सिर्फ राजन की वजह से.

“पर, पापा को जैसे आते वक्त के कुछ ऐसे एहसास हो चुके थे. एक दिन अनु दी को देखने की इच्छा के साथ ही उन्होंने प्राण त्याग दिए, फिर तो मम्मी का भी यहां रहना बहुत मुश्किल हो चला था.”

रितेश कुरसी से उठ खड़ा हुआ, कुछ कदम चला और फिर दोबारा बैठा. देविका दम साधे उसे ही देख रही

थी. एक गहरी सांस लेने के बाद रितेश ने दोबारा कहना शुरू किया, “फिर तो आगे जो हुआ तुम्हें पता ही है. अब मम्मी भी यहां रहना नहीं चाह रही थी, तो जल्दी हम यहां से चले गए. वहां पहुंचने पर देखा कि अनु दी काफी कमजोर लग रही थी, बहुत इलाज के बाद भी साल बीते ना बीते वह हम

सब को छोड़ कर चली गई.

देविका की जबान जैसे तालू से चिपक गई हो, “रितेश” बमुश्किल उस के मुंह से निकला.

इस अनहोनी घटना के बाद मैं ने एक छोटी सी कंपनी में नौकरी कर ली. अनुभव बढ़ता गया और अब बीते वर्ष से एक बड़ी कंपनी में मैनेजर के पद पर हूं. इस शहर में आने का मौका मिला तो भला तुम लोगों से मिले बिना कैसे रहता.

देविका अब भी नि:शब्द ही थी.

“देविका, अनजाने में ही सही, कभी तुम्हारा दिल दुखाया हो तो माफ कर देना मुझे. पर, सच तो यही

है कि सदा तुम्हें ही चाहा है. यहां अब और ज्यादा नहीं रुक पाऊंगा. फौरन ही निकल रहा हूं. मोबाइल अभी बंद ही रखूंगा. प्लीज, राजन को तुम संभाल लेना. अच्छा, चलता हूं.”

कुछ भी ना कह सकी देविका, बस उसे जाता हुआ देखती रही.

“क्यों होता है ऐसा, क्यों जो हम चाहते हैं वही हमें नहीं मिलता. काश, सब वैसा ही होता जैसा वह चाहती थी.”

प्लेन टेक औफ हो चुका था. कुछ देर बाद रितेश की नजर खिड़की से बाहर गई. जिस तरह सब धुंधला होता जा रहा था, हर शै जैसे छोटी होतेहोते आंखों से ओझल हो रही थी. काश, इनसानी जिंदगी भी वैसा ही होती. काश, अतीत को भूल कर ऊपर उठ जाना इतना ही आसान होता.

राजन उस के जाने की बात सुन कर कुछ व्यक्त ना कर सका. वह जानता था कि रितेश यहां ज्यादा ना रुक पाएगा. देविका से आमनासामना उसे सहेज ना होने देगा.

काश, राजन के जीवन से उस की सुहागरात निकल जाती. जब उस ने अर्धबेहोशी की अवस्था में देविका के मुंह से रितेश का नाम सुना था.

“मेरा खत कहां गया, रितेश तुम क्यों मुझे छोड़ कर चले गए, आई लव यू रितेश,” यह सुन कर राजन के कानों के पास जैसे कोई जोरदार धमाका हुआ हो.

उस के दिमाग में खत का पूरा नजारा घूम गया. खत में सिर्फ “R” लिखा था. ‘ओह’ तो वह खत

रितेश के लिए था और उस ने समझा कि उस के लिए है. काश, वह यह सच ना जान पाता.

यह एक ‘काश’ सदा के लिए उन तीनों की जिंदगियों में घर कर गया था, पर परिस्थितियों के चलते

जिस ने जो किया वही सही साबित हुआ.

यह सच है कि ‘काश’ ही जीवन का वह भाव है, जिस के जरीए सपने बुने भी जाते हैं और टूट भी जाते हैं, पर जीवन का दूसरा सब से बड़ा सच यह है कि हमें

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हकीकत के धरातल पर हंसतेमुसकराते हुए ही चलना होगा. पथरीले रास्तों में आने वाली कठिनाइयों

और चुनौतियों को महज वक्ती अवरोध समझ कर सामना करना होगा. यही जीवन की सचाई है.

जीवन तो एक ऐसे ‘कोरे कागज’ के समान है, जिस की प्रत्येक इबारत हम स्वयं लिखते हैं. स्वयं चुनाव करते हैं कि किस राह पर यह जीवन सफर तय करना है और कौन इस में हमसफर बनेगा.

मंजिल यकीनन हमारे अनुरूप ही आकार लेगी. बस, इसी विश्वास की जड़ें जमानी होंगी.

एयर होस्टेस ने रितेश के पास जा कर चाय के लिए पूछा.

“चीनी नहीं, एक चम्मच नमक,” रितेश ने हंसते हुए कहा.

“जी, क्या…?” सुन कर वह चौंक पड़ी और रितेश खुल कर हंस पड़ा.

इधर देविका अपूर्व की खास फरमाइश पर आलू का परांठा बनाने रसोई में चली गई और राजन तो

बारबार रितेश को फोन मिला रहा था.

“अरे, तुम देर से सो कर उठे हो. वह तो अभी फ्लाइट में होंगे. कुछ देर बाद फोन मिला लेना,” देविका

ने कहा.

“अब फोन क्या मिलाना, अगले हफ्ते हम भी चलते हैं ना. एक सरप्राइज लता आंटी को हम भी दे देते हैं और इस बार पक्का इस की शादी का जश्न मना कर ही लौटेंगे. क्यों ठीक है ना.”

राजन के इस सवाल का जवाब देविका ने एक निश्चल मुसकराहट के साथ ‘हां’ के इशारे में सिर हिला

कर दिया.

सबको साथ चाहिए- भाग 3: पति की मौत के बाद माधुरी की जिंदगी में क्या हुआ?

Writer- Vinita Rahurikar

‘मैं बूढ़ी आखिर कब तक तेरी गृहस्थी की गाड़ी खींच पाऊंगी. और फिर कुछ सालों बाद तेरे बच्चों का ब्याह होगा. कौन करेगा वह सब भागदौड़ और उन के जाने के बाद तेरा ध्यान रखने को और सुखदुख बांटने को भी तो कोई चाहिए न. अपनी मां की इस बात पर सुधीर निरुत्तर हो गए और वही सब बातें दोहरा कर माधुरी की मां ने जैसेतैसे उसे विवाह के लिए तैयार करवा लिया.

‘बेटी अकेलापन बांटने कोई नहीं आता. यह मत सोच कि लोग क्या कहेंगे? लोग तो अच्छेबुरे समय में बस बोलने आते हैं. साथ देने के लिए आगे कोई नहीं आता. अपना बोझ आदमी को खुद ही ढोना पड़ता है. सुधीर अच्छा इंसान है. वह भी अपने जीवन में एक त्रासदी सह चुका है. मुझे पूरा विश्वास है कि वह तेरा दुख समझ कर तुझे संभाल लेगा. तुम दोनों एकदूसरे का सहारा बन सकोगे.’

माधुरी ने भी मां के तर्कों के आगे निरुत्तर हो कर पुनर्विवाह के लिए मौन स्वीकृति दे दी. वैसे भी वह अब अपनी वजह से मांपिताजी को और अधिक दुख नहीं देना चाहती थी.

लेकिन तब से वह मन ही मन ऊहापोह में जी रही थी. सवाल उस के या सुधीर के आपस में सामंजस्य निभाने का नहीं था. सवाल उन 4 वयस्क होते बच्चों के आपस में तालमेल बिठाने का है. वे आपस में एकदूसरे को अपने परिवार का अंश मान कर एक घर में मिलजुल कर रह पाएंगे? सुधीर और माधुरी को अपना मान पाएंगे?

यही सारे सवाल कई दिनों से माधुरी के मन में चौबीसों घंटे उमड़तेघुमड़ते रहते. जैसेजैसे विवाह के लिए नियत दिन पास आता जा रहा था ये सवाल उस के मन में विकराल रूप धारण करते जा रहे थे.

माधुरी अभी इन सवालों में उलझी बैठी थी कि मां ने उस के कमरे में आ कर सुधीर की मां के आने की खबर दी. माधुरी पलंग से उठ कर बाहर जाने के लिए खड़ी ही हुई थी कि सुधीर की मां स्वयं ही उस के कमरे में चली आईं. उन के साथ 14-15 साल की एक प्यारी सी लड़की भी थी. माधुरी को समझते देर नहीं लगी कि यह सुधीर की बेटी स्नेहा है. माधुरी ने उठ कर सुधीर की मां को प्रणाम किया. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘मैं समझती हूं माधुरी बेटा, इस समय तुम्हारी मनोस्थिति कैसी होगी? मन में अनेक सवाल घुमड़ रहे होंगे. स्वाभाविक भी है.

‘मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी कि अपने मन से सारे संशय दूर कर के नए विश्वास और पूर्ण सहजता से नए जीवन में प्रवेश करो. हम सब अपनीअपनी जगह परिस्थिति और नियति के हाथों मजबूर हो कर अधूरे रह गए हैं. अब हमें एकदसूरे को पूरा कर के एक संपूर्ण परिवार का गठन करना है. इस के लिए हम सब को ही प्रयत्न करना है. मेरा विश्वास है कि इस में हम सफल जरूर होंगे. आज मैं अपनी ओर से पहली कड़ी जोड़ने आई हूं. एक बेटी को उस की मां से मिलाने लाई हूं. आओ स्नेहा, मिलो अपनी मां से,’ कह कर उन्होंने स्नेहा का हाथ माधुरी के हाथ में दे दिया.

स्नेहा सकुचा कर सहमी हुई सी माधुरी की बगल में बैठ गई तो माधुरी ने खींच कर उसे गले से लगा लिया. मां के स्नेह को तरस रही स्नेहा ने माधुरी के सीने में मुंह छिपा लिया. दोनों के प्रेम की ऊष्मा ने संशय और सवालों को बहुत कुछ धोपोंछ दिया.

‘बस, अब आगे की कडि़यां हम मां- बेटी मिल कर जोड़ लेंगी,’ सुधीर की मां ने कहा तो पहली बार माधुरी को लगा कि उस के मन पर पड़े हुए बोझ को मांजी ने कितनी आसानी से उतार दिया.

जल्द ही एक सादे समारोह में माधुरी और सुधीर का विवाह हो गया. माधुरी के मन का बचाखुचा भय और संशय तब पूरी तरह से दूर हो गया, जब सुधीर से मिलने वाले पितृवत स्नेह की छत्रछाया में उस ने प्रिया को प्रशांत के जाने के बाद पहली बार खुल कर हंसते देखा. अपने बच्चों को ले कर माधुरी थोड़ी असहज रहती, मगर सुधीर ने पहले दिन से ही मधुर और प्रिया के साथ एकदम सहज पितृवत व स्नेहपूर्ण व्यवहार किया. सुधीर बहुत परिपक्व और सुलझे हुए इंसान थे और मांजी भी. घर में उन दोनों ने इतना सहज और अनौपचारिक अपनेपन का वातावरण बनाए रखा कि माधुरी को लगा ही नहीं कि वह बाहर से आई है. सुधीर का बेटा सुकेश और मधुर भी जल्दी ही आपस में घुलमिल गए. कुछ ही महीनों में माधुरी को लगने लगा कि जैसे यह उस का जन्मजन्मांतर का परिवार है.

मेरी उम्र 16 वर्ष है, मैं लड़कियों से बात करने में घबराता हूं मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल

मेरी उम्र 16 वर्ष है. मैं लड़कियों से बात करने में घबराता हूं. अभी तक मैं ऐसे स्कूल में पढ़ता था जहां सिर्फ लड़के ही थे, पर यह कोऐजुकेशन है. जब अन्य लड़के लड़कियों से बिंदास बातें करते हैं, तो मुझे खुद पर खीझ होती है. मैं क्या करूं?

जवाब

पहले तो अपने को सहज कीजिए और लड़का लड़की का फर्क दिमाग से निकाल कर सहपाठी जैसी मानसिकता बनाइए. फिर लड़की हो या लड़का आप को उस से बात करने में हिचक नहीं होगी. ठीक उसी तरह लड़कियों से बात करें जिस तरह दोस्तों से करते हैं, परेशानी अपनेआप हल हो जाएगी. लड़कियां कोई हौआ तो हैं नहीं जो आप को डर लगे. साथ ही अपने को अंतर्मुखी के बजाय बहिर्मुखी बनाइए. जब आप सब से बोलने लगेंगे तो वे भी आप से बात करेंगे, फिर धीरेधीरे आप भी बिंदास हो जाएंगे.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

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गंदी नजरों से बचना इतना दर्दनाक क्यों ?

मैट्रो स्टेशन में हों या भीड़भरी सड़कों पर, बस में हों या बाइक अथवा रिकशे पर आप ने अकसर देखा होगा कि लड़कियां अकसर दुपट्टे या स्टोल से अपने पूरे चेहरे और बालों को ढक कर रखती हैं. सिर्फ उन की आंखें दिखती हैं. कभीकभी तो उन पर भी गौगल्स चढ़े होते हैं. इन लड़कियों की उम्र होती है 15 से 35 साल के बीच.

अब आप के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि आखिर ये लड़कियां डाकू की तरह अपना चेहरा क्यों छिपाए रखती हैं? आखिर प्रदूषण, धूलमिट्टी से तो पुरुषों और अधिक उम्र की महिलाओं को भी परेशानी होती है. फिर ये लड़कियां किस से बचने के लिए ऐसा करती हैं?

दरअसल, ये लड़कियां बचती हैं गंदी नजरों से. पुरुष जाति यों तो महिलाओं के प्रति बहुत सहयोगी होती है पर कई दफा भीड़ में इन लड़कियों का सामना ऐसी नजरों से भी हो जाता है जो कपड़ों के साथसाथ शरीर का भी पूरा ऐक्सरे लेने लगती हैं. उन नजरों से वासना की लपटें साफ नजर आती हैं. मौका मिलते ही ऐसी नजरों वाले लोग लड़कियों को दबोच कर उन के अरमानों, सपनों के परों को क्षतविक्षत कर फेंक डालते हैं.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में हर एक घंटे में 4 रेप यानी हर 14 मिनट में 1 रेप होता है. ऐसे में लड़कियों को खुद ही अपनी हिफाजत करने का प्रयास करना होगा. उन निगाहों से पीछा छुड़ाना होगा जो उन के स्वतंत्र वजूद को नकारती हैं. उन के हौसलों को जड़ से मिटा डालती हैं. यही वजह है कि  अब लड़कियां जूडोकराटे सीख रही हैं. छुईमुई बनने के बजाय दंगल में लड़कों को चित करना पसंद कर रही हैं. पायलट बन कर सपनों को उड़ान देना सीख रही हैं, नेता बन कर पूरे समाज को अपने पीछे चलाने का जज्बा बटोर रही हैं.

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मगर सच यह भी है कि उदाहरण बनने वाली ऐसी महिलाएं अब भी ज्यादा नहीं हैं. अभी भी ऐसी महिलाओं की भरमार है, जिन के साथ भेदभाव और क्रूरता का नंगा खेल खेला जाता है. उन के मनोबल को गिराया जाता है और यह काम सिर्फ पुरुष ही नहीं करते, अकसर महिलाएं भी महिलाओं के साथ ऐसा करती हैं. सुरक्षा के नाम पर उन की जिंदगी से खेलती है.

ऐसी ही एक दिल दहलाने वाली प्रथा है. मर्दों की गंदी नजरों से बचाने के लिए ब्रैस्ट आयरनिंग.

ब्रैस्ट आयरनिंग

ब्रैस्ट आयरनिंग यानी सीने को गरम प्रैस से दबा देना. इस पंरपरा के तहत लड़कियों के सीने को किसी गरम चीज से दबा दिया जाता है ताकि उन के उभारों को रोका जा सके और उन्हें मर्दों की गंदी नजरों से बचाया जा सके.

अफ्रीका महाद्वीप के कैमरून, नाइजीरिया और साउथ अफ्रीका के कुछ समुदायों में माना जाता है कि महिलाओं की ब्रैस्ट को जलाने से उस की वृद्धि नहीं होती. तब पुरुषों का ध्यान लड़कियों पर नहीं जाएगा. इस से रेप जैसी घटनाएं कम होंगी. किशोरियों के पेरैंट्स ही उन के साथ यह घिनौनी हरकत करते हैं. ब्रैस्ट आयरनिंग के

58% मामलों में लड़की की मां ही इसे अंजाम देती है. पत्थर, हथौड़े या चिमटे को आग में तपा कर बच्चियों की ब्रैस्ट पर लगाया जाता है ताकि उन की ब्रैस्ट के सैल्स हमेशा के लिए नष्ट हो जाएं.

यह दर्दभरी प्रक्रिया सिर्फ इसलिए ताकि लड़कियों को जवान दिखने से रोका जा सके. ज्यादा से ज्यादा दिनों तक वे बच्ची ही लगें और उन पुरुषों से बची रहें जो उन्हें अगवा करते हैं, उन का यौनशोषण करते हैं या उन पर भद्दे कमैंट करते हैं. यानी इसे बचाव का तरीका माना जाता है. बचाव यौन शोषण से, बचाव रेप से, बचाव मर्दों की लड़कियों में इंटरैस्ट से.

कैमरून की अधिकतर लड़कियां 9-10 साल की उम्र में ब्रैस्ट आयरनिंग की प्रक्रिया से गुजर चुकी होती हैं. ब्रैस्ट आयरनिंग की यह बीभत्स प्रक्रिया लड़कियों के साथ 2-3 महीनों तक लगातार की जाती है.

अफ्रीका के गिनियन गल्फ में स्थित कैमरून की आबादी करीब 1.5 करोड़ है और यहां करीब 250 जनजातियां रहती हैं. टोगो, बेनिन और इक्काटोरिअल गुनिया से सटे इस देश को ‘मिनिएचर अफ्रीका’ भी कहा जाता है. इस अजीबोगरीब प्रथा के कारण पिछले कुछ समय से कैमरून काफी चर्चा में है.

मूल रूप से पश्चिमी अफ्रीफा में शुरू हुई यह परंपरा अब ब्रिटेन समेत कुछ अन्य यूरोपीय देशों तक पहुंच गई है. एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में भी करीब 1 हजार लड़कियों को इस प्रक्रिया से गुजरता पड़ा है.

इस प्रथा का लड़कियों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है, सिर्फ शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी. ब्रैस्ट आयरनिंग की वजह से उन्हें इन्फैक्शन, खुजली, ब्रैस्ट कैंसर जैसी बीमारियां हो जाती हैं. आगे चल कर स्तनपान कराने में भी काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है.

गौरतलब है कि अन्य अफ्रीकी देशों की तुलना में कैमरून की साक्षरता दर सब से अधिक है. सैक्सुअल आकर्षण और दिखावे से बचाने के लिए की जाने वाली इस बीभत्स प्रथा के बावजूद यहां लड़कियों के कम उम्र में गर्भवती होने के मामले सामने आते रहते हैं.

जाहिर है, ब्रैस्ट आयरनिंग से इस धारणा को जोर मिलता है कि लड़कियों के शरीर का आकर्षण ही पुरुषों को बेबस करता है कि वे इस तरह की हरकतें करें, यौन हमलों या रेप जैसी घटनाओं में पुरुषों की कोई गलती नहीं होती.

यह प्रथा जैंडर वायलैंस के तहत आती है. एक ऐसा वायलैंस जिसे सुरक्षा के नाम पर घर वाले ही अंजाम देते हैं और अपनी ही बच्ची की जिंदगी तबाह कर डालते हैं.

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दुनियाभर में लड़कियों को ऐसी दर्दनाक प्रथाओं से गुजरना पड़ता है ताकि उन की इज्जत बची रहे. जैसे इज्जत कोईर् चीज है जिसे ऐसी ऊलजलूल प्रथाओं द्वारा चोरी हो जाने से बचाया जा सकता है.

कुप्रथाओं का काला इतिहास

महिलाओं पर अत्याचार की कहानी बहुत पुरानी है और तरीके भी बहुत सारे हैं. तरहतरह से प्रथाओं और परंपराओं के नाम पर उन के साथ ज्यादतियां की जाती हैं, उन्हें सताया जाता है और पीड़ा पहुंचाई जाती है. उन के तन के साथसाथ उन के मन को भी कुचला जाता है. हम बता रहे हैं कुछ ऐसी प्रथाओं के बारे में जिन का मकसद कभी महिलाओं की पवित्रता की जांच करना होता है तो कभी उन की सुरक्षा, कभी उन की खूबसूरती बढ़ाना तो कभी बदसूरत बनाना. यानी वजह कुछ भी हो मगर मूल रूप में मकसद होता है उन्हें प्रताडि़त करना और पुरुषों के अधीन रखना:

  1. औरतों को खतना जैसी कुप्रथा का भी शिकार होना पड़ता है. इस में औरतों का क्लाइटोरिस काट दिया जता है ताकि उन का सैक्स करने का मन न करे. भारत में इस प्रथा का चलन बोहरा मुसलिम समुदाय में है. भारत में बोहरा आबादी आमतौर पर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में है. 10 लाख से अधिक आबादी वाला यह समाज काफी समृद्ध है और दाऊदी बोहरा समुदाय भारत के सब से ज्यादा शिक्षित समुदायों में से एक है. पढ़ेलिखे होने के बावजूद वे इस तरह की बेसिरपैर की बातों में यकीन करते हैं.
  2. लड़कियों का खतना किशोरावस्था से पहले यानी 6-7 साल की उम्र में ही करा दिया जाता है. इस के कई तरीके हैं जैसे ब्लेड या चाकू का इस्तेमाल कर क्लाइटोरिस के बाहरी हिस्से में कट लगाना या बाहरी हिस्से की त्वचा निकाल देना. खतना से पहले ऐनेस्थीसिया भी नहीं दिया जाता. बच्चियां पूरे होशोहवास में रहती हैं और दर्द से चीखती रहती हैं.
  3. खतना के बाद हलदी, गरम पानी और छोटेमोटे मरहम लगा कर दर्द कम करने की कोशिश की जाती है. माना जाता है कि क्लाइटोरिस हटा देने से लड़की की यौनेच्छा कम हो जाएगी और वह शादी से पहले यौन संबंध नहीं बनाएगी.
  4. खतना से औरतों को शारीरिक तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है, इस के अलावा तरहतरह की मानसिक परेशानियां भी होती हैं. उन की सैक्स लाइफ पर भी असर पड़ता है और वे भविष्य में सैक्स ऐंजौय नहीं कर पातीं.
  5. द्य थाईलैंड की केरन जनजाति में लंबी गरदन महिलाओं की खूबसूरती की निशानी मानी जाती है. उन की गरदन लंबी करने के लिए उन्हें एक दर्दभरी प्रक्रिया से गुजारा जाता है.
  6. 5 साल की उम्र से उन के गले में रिंग पहना दी जाती है. इस से गरदन भले ही लंबी हो जाती हो, लेकिन जिस दर्द और तकलीफ से गुजरना होता है उसे पीडि़ताएं ही समझ सकती हैं. वे अपनी गरदन पूरी तरह घुमा भी नहीं पातीं और यह रिंग उन्हें उम्रभर पहननी पड़ती है.
  7. द्य रोमानिया, इटली, संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा अन्य कई देशों में रोमन जिप्सी समुदाय के लोग रहते है. इस समुदाय में किसी लड़की से शादी की इच्छा हो तो लड़के को उस का अपहरण करना होता है. लड़का यदि 3-4 दिनों तक लड़की को उस के मातापिता से छिपा कर रखने में सफल हो जाता है तो वह लड़की उस की संपत्ति मानी जाती हैऔर फिर उन दोनों की शादी कर दी जाती है.
  8. भारत में लंबे समय तक बहुविवाह प्रथा कायम रही. इस के तहत पुरुष को यह आजादी थी कि वह जब चाहे जितनी चाहे महिलाओं को अपनी स्त्री बना सकता था. इस के कारण औरतें अपने पति के लिए भोग की वस्तु बन कर रह गई थीं.
  9. इसी तरह केरल और हिमाचल में बहुपतित्व की परंपरा कायम है, जिस में एक स्त्री को 1 से अधिक पतियों की पत्नी बनना स्वीकार करना पड़ता है. इस व्यवस्था के तहत पहले ही निश्चित कर लिया जाता है कि स्त्री कितने दिन तक किस पति के साथ रहेगी.
  10. दक्षिण भारत की आदिवासी जनजाति टोडा, उत्तरी भारत के जौनसर भवर में, त्रावणकोर और मालाबार के नायरों में, हिमाचल के किन्नोर और पंजाब के मालवा क्षेत्र में भी यह प्रथा देखने को मिल जाती है. जहां पहले बहुपतित्व जैसी परंपरा स्त्री को भावनात्मक और मानसिक रूप से तोड़ देती थी, वहीं अब बहुपतित्व की यह प्रथा उसे शारीरिक रूप से भी झकझोर देती है.
  11. केन्या, घाना और युगांडा जैसे देशों में एक विधवा औरत को यह साबित करना होता है कि उस के पति की मौत उस की वजह से नहीं हुई है. ऐसे में उस विधवा औरत को क्लिनजर के साथ सोना पड़ता है. कहींकहीं विधवा को अपने मृत पति के शरीर के साथ ही 3 दिनों तक सोना पड़ता है. परंपरा के नाम पर उसे पति के भाइयों के साथ सैक्स करने पर भी मजबूर किया जाता है.
  12. सुमात्रा की मैनताइवान जनजाति में औरतों के दांतों को ब्लेड से नुकीला बनाया जाता है. यहां ऐसी मान्यता है कि नुकीले दांतों वाली औरत ज्यादा खूबसूरत लगती है.
  13. इसी तरह अफ्रीका की मुर्सी और सुरमा जनजाति की महिलाएं जब प्यूबर्टी की उम्र में आ जाती हैं तो उन के नीचे के सामने के 2 दांतों को तोड़ कर निचले होंठ में छेद कर के उसे खींच कर एक प्लेट लगाई जाती है. दर्द सहने के लिए कोई दवा भी नहीं दी जाती. हर साल इस लिप प्लेट का आकार बढ़ाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि जितनी बड़ी प्लेट और जितने बड़े होंठ होंगे वह महिला उतनी ही खूबसूरत होगी.
  14. सोमालिया और इजिप्ट के कुछ पिछड़े समुदायों में बहुत ही अजीब कारण से क्लिटोरल को विकृत कर दिया जाता है. किशोरियों की वर्जिनिटी की रक्षा के लिए बिना दवा दिए वैजाइना को सील कर दिया जाता है. यह आज भी लागू हो रही है हालांकि कम हो चुकी है.
  15. इसलामिक गणराज्य मौरिटानिया के कुछ हिस्सों में माना जाता है कि अधिक वजन वाली पत्नी खुशी और समृद्धि लाती है. ऐसे में यहां शादी से पहले युवतियों को जबरदस्ती रोज लगभग 16,000 कैलोरी की डाइट दी जाती है ताकि उन का वजन बढ़ जाए.
  16. अरुणाचल प्रदेश की जीरो वैली की अपातानी ट्राइब की महिलाओं की नाक के छेद में वुडन प्लग्स इन्सर्ट कर दिए जाते थे. ऐसा उन्हें बदसूरत दिखाने के लिए किया जाता था ताकि कोई ट्राइब महिला को किडनैप न करें. हालांकि अब इस पर काफी हक तक रोक लग गई है.

क्या पुरुष दूध के धुले होते हैं

भारतीय इतिहास में चाणक्य और उस के अर्थशास्त्र का काफी नाम है. जरा स्त्रियों के प्रति उस के विचारों पर गौर करें-

स्त्रियां एक के साथ बात करती हुईं दूसरे की ओर देख रही होती हैं और चिंतन किसी और का हो रहा होता है. इन्हें किसी एक से प्यार नहीं होता.

कहने का मतलब यह है कि स्त्री जैसा पतित और व्यभिचारी और कोई नहीं होता. मगर क्या चाणक्य से यह नहीं पूछा जाना चाहिए था कि क्या पुरुष दूध के धुले होते हैं?

कामवासना तो मानव प्रवृति का एक स्वाभाविक हिस्सा है और मर्यादा का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति स्त्री और पुरुष दोनों में समान रूप से मिलती है. परंतु धर्मशास्त्रों में सदा से व्यभिचार के लिए स्त्री चरित्र को ही दोष दिया गया है. पुरुष अपने दुष्कर्मों को आसानी से छिपा सकता है. समाज में उस की स्थिति मजबूत होती है, इसलिए वह दोषमुक्त हो जाता है, जबकि स्त्री को हमेशा शोषण सहना पड़ा है.

जरूरी है कि हम सदियों पुरानी अपनी मानसिकता में बदलाव लाएं. जरा आंखें खोल कर देखें कि शारीरिक रूप से भिन्न होने के बावजूद स्त्री और पुरुष प्रकृति की 2 एकसमान रचनाएं हैं. दोनों के मिल कर और एक स्तर पर आगे बढ़ने से ही समाज की प्रगति संभव है. स्त्री हो या पुरुष दोनों को समान अवसर और समान दर्जा दिया जाना वक्त की मांग है.

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क्षितिज ने पुकारा- भाग 3: क्या पति की जिद के आगे नंदिनी झुक गई

अब तक आप ने पढ़ा:
दिल की कोमल नंदिनी थिएटर आर्टिस्ट थी. नंदिनी का थिएटर में काम करना पति रूपेश को पसंद नहीं था. एक दिन रिहर्सल के दौरान देर हो गई. घर जाने के लिए बस नहीं मिली तो उस के साथ काम करने वाला प्रीतम अपने स्कूटर पर उसे घर तक छोड़ने गया. घर पर उस का पति रूपेश गुस्से से भरा बैठा उस का इंतजार कर रहा था, जिस ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. रूपेश उसे बहुत कष्ट देता था. सास की मृत्यु के बाद घर में बूआ सास की हुकूमत चलती थी, जिस की खुद की जिंदगी काफी संघर्ष से बीती थी.
अभाव में पलीबढ़ी जिंदगी से बूआ सास हमेशा नकारात्मक सोच ही रखती थीं, जिस का प्रतिबिंब पति रूपेश पर भी गहरा पड़ा था.

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ज्योत्सना की खिलीखिली अनुभूतियां कितनी ही रातें नंदिनी को आसमान की सैर करा देती थीं, मगर आज रिसते दर्द पर शूल सा चुभ रहा था यह चांद. भूखीप्यासी वह तंद्राच्छन्न होने लगी ही थी कि अचानक लड़ाकू सैनिक सा रूपेश कमरे में आ धमका. बत्ती जला दी उस ने. वितृष्णा और प्रतिशोध से धधकते रूपेश को नंदिनी की शीलहीनता और कृतध्नता ही दिखाई देने लगी थी.

टूटी, तड़पती नंदिनी उठ कर बिस्तर परबैठ गई. ‘‘महारानी इधर आराम फरमा रही हैं… यह नहीं कि देखे बूआ सास और पति को क्या दिक्कतें हैं? बहुत सह ली मैं ने तुम्हारी मनमानी… बूआ ने सही चेताया है… ब्राह्मण परिवार की बहू को पराए मर्दों के साथ हजारों लोगों के सामने नौटंकी कराना हमारी बिरादरी में नहीं सुहाता. हमारे घर बेटी है. कभी बेटी की फिक्र भी करती हो? तुम्हारे 4-5 हजार रुपयों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला… सोच लो वरना चली जाना हमेशा के लिए.’’

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रूपेश ने नंदिनी के थिएटर के प्रेम पर, उस के काम पर दफन की आखिरी मिट्टी डाल दी थी. थिएटर का काम अब फायदे वाला नहीं रह गया. इस में खर्चे तो बहुत पर कला के कद्रदान कम हो गए हैं. ऐसे में थिएटर में काम करने वालों को बहुत कम पैसे दिए जाते हैं. जो पुराने कलाकार हैं, जो कला के प्रति समर्पित हैं, उन्हें अपने फायदे का त्याग करना पड़ता है.

औडिटोरियम, लाइट्स, स्टेज सज्जा, वस्त्र सज्जा, साउंड इफैक्ट, स्पैशल इफैक्ट पर हर स्टेज शो के लिए कम से कम क्व30-40 हजार का खर्चा बैठता ही है और वह भी कम पैमाने के नाटक के लिए. ऊपर से प्रचार और विज्ञापन का खर्चा अलग से. ऐसे में शुभंकर दा या प्रीतम जैसे लोग अपना पैसा तो लगाते ही हैं, बाहर से भी मदद का जुगाड़ करते हैं. उन के समर्पण को देखते हुए नंदिनी जैसे कलाकार जो सिर्फ अपना थोड़ा समय और थोड़ी सी कला ही दे सकते हैं कैसे उन के साथ पैसे के लिए जिद करें?

अपने परिवार की ओछी सोच के आगे अगर नंदिनी जैसे लोग हार मान लें तो थिएटर जैसा रचनात्मक क्षेत्र लुप्तप्राय हो जाए. नंदिनी निढाल सी बिस्तर पर पड़ी रही. रूपेश नीचे जा चुका था.

सुबह के 5 बज रहे थे. नंदिनी बिस्तर समेट नहाधो आई. फिर वेणु को उठाया,

सोई निबटा कर वेणु को स्कूल बस तक छोड़ आई. आ कर सब को नाश्ता कराया. किसी ने उस से नहीं पूछा. वह खा नहीं पाई. घर के बाकी काम निबटाती रही.

रूपेश के औफिस जाने से पहले जिस का फोन आया, उस से वह बहुत उत्साहित हो कर बातें करने लगा. नंदिनी के पास इतना अधिकार नहीं रह गया था कि वह रूपेश से कुछ पूछ सके. फोन रख कर जैसाकि हमेशा बात करता था एक बौस की तरह अभी भी उसी अंदाज में नंदिनी से बोला, ‘‘ये रुपए पकड़ो, बाजार से जो भी इच्छा लगे ले आना. बढि़या व्यंजन बना कर रखना. शाम को मेरा दोस्त नयन और उस की पत्नी शहाना आ रहे हैं. कहीं जाने की गलती न करना वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’ यह कहीं का मतलब थिएटर ही था.

पत्नी से बात करना रूपेश ने कभी सीखा ही नहीं. अत: नंदिनी ने भी अपनी जिंदगी के अभावों से समझौता कर लिया था. मगर कल तक उस के नाटक का आखिरी रिहर्सल था. परसों से शो. कोलकाता के 2 हौल्स में टिकट बिकने को दिए गए थे. अब यह धोखा नंदिनी कैसे करे?

शाम को घर का माहौल काफी बदला सा था. करीने से सजे घर में महंगे डिजाइनर सैटों की साजसज्जा के बीच सलीके से सजी नंदिनी इतने शोर के बीच बड़ी शांत सी थी. शहाना शोरगुल के बीच भी नंदिनी पर नजर रखे थी. वेणु को भी वह काफी कटाकटा सा पा रही थी. कौफी का कप हाथ में लिए शहाना नंदिनी के पास जा पहुंची. फिर उस का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘‘चलो कहीं घूम आती हैं. अभी तो शाम के 6 ही बजे हैं… खाना 10 बजे से पहले खाएंगे नहीं.’’ ‘‘आप कहें तो मेरी पसंदीदी जगह चलें?’’

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‘‘नंदिनी मुझे तुम आप न कहो. चलो, चलें.’’ शहाना नंदिनी को ले पति बिरादरी के पास पहुंच चुकी थी. उन की बातें सुन नंदिनी अवाक रह गई. नयन भी तो पुरुष हैं, पति हैं, यह कैसे संभव हो पाया.

‘नथ: जेवर या जंजीर’ फेम करण खन्ना का बड़ा बयान- टीवी का उसूल है, ‘जो दिखता है वही बिकता है’

‘‘मुकद्दर का सिकंदर’’ सहित चार सौ फिल्मों के एक्शन डायरेक्टर रवि खन्ना के पोते और ‘जंजीर’,‘सुहाग’, ‘शपथ’,‘शराबी’ सहित तीन सौ से अधिक फिल्मों के एक्शन डायरेक्टर बब्बू खन्ना के बेटे करण खन्ना को लोग बतौर अभिनेता पहचानते हैं. जबकि करण खन्ना बतौर सहायक एक्शन डायरेक्टर व सहायक डांस डायरेक्टर के रूप में भी काफी काम कर चुके हैं.

सीरियल ‘महाभारत’ में एक्शन डिजायनर के रूप में काम करने के बाद करण खन्ना ने सीरियल ‘मनमर्जियां’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था. वह ‘इश्कबाज’, ‘दिव्यदृष्टि’ और ‘बहू बेगम’ जैसे सीरियलों में निगेटिब किरदार निभाकर जबरदस्त शोहरत बटोर चुके हैं. अब वह ‘दंगल’ टीवी पर प्रसारित हो रहे ‘नथ उतराई ’ की कुप्रथा पर आधारित सीरियल ‘‘नथः जेवर या जंजीर’’ में अधिराज का निगेटिव किरदार निभा रहे हैं.

प्स्तुत है करण खन्ना से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश..

आपके दादा व पिता एक्शन निर्देशक थे, इसलिए आपने भी बौलीवुड से जुड़ने का फैसला लिया?

– मैं बचपन से उनके साथ सेट पर जाता रहा हूं. तो मेरी परवरिश फिल्मी माहौल व फिल्मों के सेट पर ही हुई है. पढ़ाई का माहौल मेरे घर पर कभी नही रहा. हम हर दिन अपने आस पास जिस माहौल में रहते हैं, उसी से प्रेरित होते रहते हैं. मैं अपने पिता जी का काम देखकर ही प्रेरित हुआ हूं. क्योंकि दादा जी के साथ जब सेट पर जाता था, तब मेरी उम्र इतनी छोटी थी कि उस वक्त हम खेल में ही मस्त रहते थे. उस वक्त एक्शन वगैरह की बात समझ से परे थी. मेरे पिता जिस तरह से सेट पर काम करते थे, उनके अंदर जो लीडरशिप क्वालिटी थी, उससे मुझे काफी कुछ सीखने को मिला.

यह मनोरंजन जगत है, पर यहां भी लीडरशिप व अनुशासन का गुण आवश्यक है. मुझे लीड करना अच्छा लगता था. मेरा स्वभाव ऐसा है कि मैं किसी के अंदर काम नहीं कर सकता. वहां से ही कहीं न कहीं मेरी शुरूआत हुई थी. मगर मेरे पिता जी नही चाहते थे कि मैं स्टंट मैन बनूं. वह मुझे बतौर अभिनेता देखना चाहते थे. वह मुझसे कहते थे कि मेरे अंदर अभिनेता बनने के गुण हैं. मेरे पिता मेरे लिए सच का आइना हैं. यदि मैं खराब काम करता हूं, तो मेरे पिता मुझे सीधे जमीन पर गिरा देते हैं और कहते हैं कि यह तूने बहुत गंदा काम किया है. मेरे पिता जी बड़ी इमानदारी के साथ मेरे काम की समीक्षा करते हैं. इस कारण मुझे बाहरी आलोचकों की जरुरत नही पड़ती. तो कहीं न कहीं मैने भी अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए अभिनय को कैरियर बनाया.

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वैसे आज भी जब बतौर अभिनेता मैं काम नहीं कर रहा होता हूं, तो अपने पिता के साथ बतौर सहायक काम करने के लिए जाता हूं. पर पिता की बात मानकर एक्शन डायरेक्टर के रूप में कैरियर नहीं बनाया. दूसरी बात सीरियल ‘महाभारत’ के सेट पर सिद्धार्थ कुमार तिवारी ने मुझे एक्शन डिजाइन करते देखकर कहा कि मुझे अभिनेता होना चाहिए और उन्होंने मुझे सबसे पहले सीरियल ‘मनमर्जियां’ में अभिनय करने का अवसर दिया. इस सीरियल के सेट पर एक सीन को अंजाम देते समय मेरे अंदर से भी अभिनेता बनने की आवाज आयी, तो दोनों का मिश्रण है कि मैं अभिनय में ही धीरे धीरे कदम आगे बढ़ा रहा हूं.

पर आपने तो नृत्य का प्रशिक्षण हासिल किया और कुछ नृत्य निर्देशन भी किया है?

-जब मैं कालेज में पढ़ रहा था,उन दिनों मेरी रूचि नृत्य में काफी थी. मेरे पिता भी मेरा डांस देखकर कहते थे कि ‘यू आर फैंटास्टिक डांसर. अभिनेता बनने के लिए तुझे फाइट व डांस सहित सब कुछ आना चाहिए. ’नृत्य सीखने के लिए मैं टेरिंस लुईस की कक्षा में जाया करता था. मेरी प्रतिभा को देखकर टेरेंस लुईस सर ने मुझे तीन वर्ष की स्कॉलरशिप दी. इस तरह मुझे तीन वर्ष तक उनके साथ मुफ्त में डांस सीखने व काम करने का अवसर मिला था. तो मेरी डांस की यात्रा वहां से शुरू हुई, जब तक मेरी कालेज की पढ़ाई चल रही थी, तब तक मैने डांस सीखा और टेंरेस लुईस सर के साथ काम किया. उसके बाद नृत्य का प्रशिक्षण लेने के लिए मैं छह माह के लिए अमरीका भी गया था. अमरीका से वापस आते ही मुझे टीवी के रियालिटी शो ‘‘जस्ट डांस’’ से जुड़ने का अवसर मिला. इसमें रितिक रोशन, फरहा खान व वैभवी मर्चेंट जज थीं. इस शो का मैं फाइनालिस्ट था.फिर मैने अभिनय के क्षेत्र में कदम रख दिया.

उसके बाद फिर काफी नृत्य निर्देशन की इच्छा नहीं हुई?

मैने अपने पिता द्वारा निर्मित दो तीन म्यूजिक वीडियो में नृत्य निर्देशन किया. हम लोग राजेश खन्ना की अंतिम फिल्म ‘रियासत’ कर रहे थे, उसमें एक छोटा सा आइटम नंबर था, मैं सेट पर था, तो फिल्म के निर्देशक के कहने पर मैने उसका नृत्य निर्देशन किया था. इसके अलावा मैने एक वेब सीरीज के लिए एक गाने में कोरियाग्राफी किया था,बाद में वह वेब सीरीज में नजर नहीं आया. मैने डांस सीखा है. कैमरे की समझ है, तो उसे करने में तकलीफ नहीं होती. मैं घर पर खाली बैठने की बनिस्बत अपने ज्ञान का उपयोग करता रहता हूं.

एक बेहतरीन डांसर और कैमरे की समझ होना अभिनय में किस तरह से मदद करता है?

-सबसे पहले तो अच्छा डांसर होने पर कलाकार का पॉस्चर ही बदल जाता है. आपके अंदर एक ग्रेस आ जाता है. किसी भी किरदार को निभाते समय उसके पॉस्चर को पकड़ कर कलाकार पूरा गेम बदल सकता है. इसके लिए संवाद बोलना भी आवश्यक नही है. डांस मे महारत होने से आपका पॉस्चर, आपका अलाइनमेंट, आपका फ्लो व रिदम सटीक बन जाता है. हम संवाद अदायगी भी एक रिदम में ही करते हैं. हर चीज संगीत व रिदम पर आधारित है. मेरा मानना है कि नृत्य हर क्षेत्र में मदद करता है. मान लीजिए एक कलाकार बूढ़े इंसान का किरदार निभा रहा है. आपको पता है कि आपका यह पॉस्चर होना चाहिए.

बतौर अभिनेता सीरियल ‘‘मनमर्जिया’’ के बाद आपकी यात्रा कैसी रही?

-यूं तो ‘जस्ट डांस’ के बाद मुझे काफी आफर आए थे. पर वह कुछ वजहों से कर नहीं पाया. उस दौरान मेरे पिता जी का काम भी कुछ ज्यादा ही चल रहा था. उन दिनों मेरे पिता अंग्रेजी फिल्म ‘फारेन बी’ कर रहे थे. फिर सीरियल ‘महाभारत’ मिल गया था. सीरियल ‘महाभारत’ में मुझे स्पेशल पद दिया गया था. मैं इस सीरियल के लिए एक्शन को कागज पर डिजाइन करता था. सात आठ माह तो इसी में चले गए थे. फिर सिद्धार्थ तिवारी ने मुझे ‘मनमर्जिया’ में अभिनेता बनाया था.

‘मनमर्जिया’ के बाद मेरा अलग तरह का संघर्ष शुरू हुआ. इतना ही नहीं मुझे पैसे की तंगी का भी सामना करना पड़ा. मैने उन्नीस वर्ष की उम्र से ही कमाना शुरू कर दिया था. इसलिए पिता जी के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहता था. पर मैं अपनी मर्जी के अनुसार खर्च नहीं कर पा रहा था. फिर मुझे सीरियल ‘इश्कबाज’ का ऑफर मिला. मुझे निगेटिव किरदार दक्ष खुराना करने के लिए कहा गया. मैने बिना कुछ सोचे ऑडीशन दे दिया.

सच कह रहा हूं मैने ‘इश्कबाज’ में निगेटिव किरदार दक्ष खुराना के लिए ऑडीशन महज पैसे के लिए दिया था. लेकिन इस सीरियल की टीम बहुत अच्छी थी. इसके निर्देशक ललित मोहन व आतिफ सर से काफी कुछ सीखने को मिला. इस सीरियल में मेरा एंट्री का सीन आतिफ सर ने फिल्माया था, जो कि आज तक का मेरा फेवरेट एंट्री सीन है. इस सीरियल से मेरे काम को सराहना मिली. सीरियल ‘इश्कबाज’ से ही मुझे बतौर अभिनेता पहचान मिली. लोग आज भी मुझे दक्ष के नाम से बुलाते हैं. मैं अभी यूट्यूब के लिए एक विज्ञापन फिल्म की शूटिंग कर रहा था. उनका पहला एडी बार बार कह रहा था कि दक्ष थोड़ा लेफ्ट में आ जाएं. जब मैंने टोका, तो उसने कहा कि करण भाई, मेरे दिमाग में तो दक्ष ही घुसा हुआ है. मैं सीरियल ‘इश्कबाज़’ की निर्माता गुल मैम का शुक्रगुजार हूं कि मुझे एक बेहतरीन टीम के साथ काम करने का मौका दिया और एक कलाकार के तौर पर मुझे विकसित होने का भी अवसर मिला. मुझे समझ में आया कि मेरी सीमाएं कितना पीछे हैं और उसे आगे ले जाना है.

‘इश्कबाज’ के बाद भी कुछ दिन का संघर्ष रहा. इसके बाद मुझे सीरियल ‘बहू बेगम’ करने का अवसर मिला. फिर मैने ‘दिव्य दृष्टि’ किया. आप यकीन नही करेंगे मेरे पास पूरे एक वर्ष तक काम नहीं था. मैं छुट्टी मनाने के लिए अपने दोस्त के घर पर दिल्ली में था. वहां पर मुझे फोन आया कि सीरियल ‘दिव्य दृष्टि’ के लिए मैं ऑडीशन दे दूं. मैं सिर्फ ऑडीशन देने के लिए पैसे खर्च कर दिल्ली से आना नहीं चाहता था. पर उसने कहा कि सीरियल की निर्माता मुक्ता मैम को सेल्फ टेस्ट चाहिए, तो मैने दिल्ली से ही सेल्फ टेस्ट वीडियो बनाकर भेजा. दूसरे दिन फोन आया कि मेरा चयन हो गया है और मैं दिल्ली से मुंबई आ गया. मैने काम किया, पर संघर्ष रहा है. मैं सोने का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुआ. लोग आरोप लगाते हैं कि यहां पर नेपोटिजम है.

आपके दादा व पिता दोनो इसी इंडस्ट्री से हैं, तो फिर आपको संघर्ष क्यों करना पड़ा?

-मेरे दादा जी बोलते थे कि ‘किस्मत से बढ़कर,मुकद्दर से ज्यादा न कभी किसी को मिला है और न कभी किसी को मिलेगा.मेरे दादा रवि खन्ना जी ने ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में एक्षन किया था,तो वह हमेषा यही संवाद सुनाया करते थे.जबकि मेरे पिता जी कहते हैं कि ‘यदि मैने तुझे किसी के पास सिफारिष लगाकर भेजा,पर तेरी किस्मत में नहीं होगा,तो वह काम नही मिलेगा.’ऐसे में हमने इतने वर्षों में जो इज्जत कमायी है, उसे दांव पर लगाएं.इसलिए तू खुद मेहनत कर.यदि तेरी किस्मत मंे लिखा होगा,तो तेरी मेहनत से तुझे काम मिलेगा.और उस काम में तुझे ज्यादा खुषी मिलेगी.इसलिए मेेरे पिता ने मेरे लिए किसी फिल्म या सीरियल वगैरह मेें पैसा लगाने से भी मना कर दिया.जब लोग नेपोटिजम की बात करते हैं,तो मुझे लगता है कि हर जगह नेपोटिजम काम नहीं करता,आपके अंदर टैलेंट का होना जरुरी है.मैं सीरियल ‘महाभारत’ में एक्षन डिजायनर था. सिद्धार्थ सर ने देखा,तो उन्होने ‘मनमर्जिया’ में मुझे अभिनेता बना दिया.

सीरियल ‘‘नथ जेवर या जंजीर’’ से जुड़ने की वजह क्या महज यह रही कि आपको काम की जरुरत थी?

-सर, टीवी का उसूल है ‘जो दिखता है,वही बिकता है.’टीवी की पहचान ऐसी होती है कि सीरियल का प्रसारण बंद होने के पांच छह माह बाद लोग कलाकार को भूल जाते हैं. लाक डाउन व कोरोना की वजह से मेरा पूरा परिवार बहुत गंदे फेज से गुजरा था.हमारे घर पर नौकरानी सहित सब कोरोना पाॅजीटिब हो गए थे. मैं पच्चीस दिन तक घर के अंदर कैद था.उससे पहले ‘‘अम्मा के बाबू की बेबी’ की पंद्रह पंद्रह घंटे चलने वाली षूटिंग पूरी हुई थी. उस वक्त जिम भी करता था.लेकिन फिर घर पर बैठ जाना मानसिक रूप से परेषान कर देने वाली स्थिति थी.मेरे मन में बार बार आ रहा था कि मुझे घर नही बैठना है.कोरोना का डर भी कम हो चुका था.मेरा वजन बढ़ गया था.मुझे दो सीरियल मिले थे,पर एन वक्त पर मेरे हाथ से निकल गए थे.ऐसे वक्त में मुझे ‘नथः जेवर या जंजीर’ का आफर मिला.इस सीरियल के निर्माता के साथ मैं पिछला सीरियल कर चुका था.इसलिए मैने इसे स्वीकार कर लिया.लोग कहते है कि कलाकार स्टीरियो टाइप काम कर रहा हे,मगर हकीकत में कलाकार को नही पता होता है कि उसे कौन देख रहा है? मैने सोचा कि हमारी झोली मंे जो गिर रहा है,उसे लपक लेना चाहिए.

सीरियल ‘‘नथः जेवर या जंजीर’’ में आपका किरदार क्या है?

-इसमें मैं अधिराज का किरदार निभा रहा हॅंू. आप नथ उतराई के बारे में तो जानेही है.गांव के ठाकुर अवतार ने अपने परिवार की वारिस के लिए तेजो संग नथ उतराई करता है और दो बच्चे पैदा होते हैं.एक बच्चे षंभू को लेकर ठाकुर चले जाते हैं,उन्हे लगता है कि दूसरा बच्चा मरा हुआ है.जबकि वह जिंदा था और वह अधिराज है.अधिराज अपनी मां तेजो के पास ही रहता है.वह नथ उतराई का परिणाम होता है,इसलिए काफी जलील किया जाता है.उसके मन में बार बार सवाल उठता है कि उसकी मां के साथ ही ऐसा क्यों हुआ?यदि ठाकुर मुझे भी अपने साथ ले जाते तो मेरा नाम व वजूद कुछ अलग होता.अब उसकी मां पागल हो गयी है.इसलिए अधिराज को वह खुन्नस है और वह ठाकुर खानदान से बदला लेना चाहता है.इसलिए वह बदला लेने के लिए अपने जुड़वा भाई षंभू और उसके परिवार से बदला लेने आया है.वह षतरंज का खेल खेलते हुए परिवार के एक एक सदस्य की वाट लगाने वाला है.

आपने एक स्क्रिप्ट भी लिखी है.तो आपको लिखने का शौक कब से है?

-सच कहॅंू तो मुझे लिखने का षौक नही रहा.मैं सोच सकता हॅूं,वीज्युलाइज कर सकता हॅंू.पर मुझसे लिखा नही जाता.लेकिन कोरोना के चलते कमरे में बंद था.अपने माता पिता से भी वीडियो काल पर ही बात कर पाता था.मैं बगल के कमरे मंे मौजूद अपने पिता से स्क्रिप्ट पर विचार विमर्ष भी फोन पर ही कर पाता था.उस दौरान मैने फिल्म ‘कभी खुषी कभी गम’ पांच बार देखी.तो करने को कुछ था नही.तो फरसत में मैने जो कुछ दिमाग मंे था,उसी पर स्क्रिप्ट लिख डाली.

क्या आपकी यह स्क्रिप्ट किसी सत्य घटनाक्रम पर है?

-जी हाॅ!ऐसा ही है.यह एक लड़की की यात्रा है.उसका काॅफीडेंस का स्तर षून्य पर होता है और कैसे उसका काॅफीडेंस का स्तर सौ पर पहुॅचता है. पर वह जमीन से जुड़ी रहती है.उसी की कहानी है.यह कहानी लोगों के लिए संदेष भी है कि आपको जो मुकाम मिल जाता है,वह कई बार आपकी प्रतिभा पर नहीं,बल्कि ईष्वर की मेहरबानी से मिलता है.उसका आप नाजायज फायदा मत उठाओ.सोषल मीडिया की वजह से एक रात में ही स्टार बन जाने वाले लोग यह नही जानते कि लोगों के साथ किस तरह सेव्यवहार किया जाए,तो ऐसे लोगों को मेरी यह फिल्म सीख देने वाली है.हम आज कल देख रहे हंै कि सोषल मीडिया की वजह से स्टार बने कलाकार को निर्माता अनुबंधित कर लेता है,जबकि उन्हे अभिनय का ‘ए’ भी नही पता होता.यह देखकर प्रतिभाषाली कलाकार को दुख पहुॅचता है.

सोशल मीडिया के फालोवअर्स कलाकार की फिल्म या सीरियल देखते हैं,यह कैसे माना जा सकता है?

-इसकी कोई गारंटी नही है.यह बात निर्माता निर्देषक को समझनी चाहिए कि केवल सोषल मीडिया पर फालोवअर्स आने से कलाकार की प्रतिभा को अंाकना गलत है.फालोवअर्स फिल्म या सीरियल देखेगा, यह सोचना भी पूरी तरह से गलत है. मुझे लगता है कि सोषल मीडिया को बहुत ही अलग अंदाज में लिया जा रहा है. नायरा बनर्जी के साथ आपके रिष्ते की भी चर्चाएं रही हैं? -वास्तव में हम आठ वर्ष पहले मिले थे.हमने ‘जय हो’’ गाने के नृत्य निर्देषक लाॅजनिस फर्नाडिष के एक षो को किया था.यह डांस षो ‘इफ्फी’ मंे हुआ था और इसमें मैं मुख्य डांसर था.इसमें नायरा ने दक्षिण की अदाकारा के रूप में डांस करने आयी थी.तब हम अच्छे दोस्त बन गए थे.फिर बात आयी गयी हो गयी.कुछ समय बाद मेरे पिता जी एक फिल्म बनाने वाले थे,उसकी कहानी सुनने के लिए वह हमारे घर आयी थी.पर बाद में यह फिल्म नही बनी.फिर चार वर्ष बाद हमारी मुलाकात सीरियल ‘‘दिव्यदृष्टि’’ मंे हुई.तब से हम अच्छे दोस्त हैं.फिर सना के साथ भी अच्छे संबंध रहे हैं. ‘दिव्यदृष् िट’ में नायर व मेरी जोड़ी थी,तो स्वाभाविक तौर पर हम ज्यादा करीब आते गए.लेकिन रिष्ते वाली बात नही हुई.पर हमारे बीच कोई रिष्ता नही रहा.

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