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कोरा कागज: आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

कोरा कागज: भाग 2- आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

Writer- साहिना टंडन

“चलो मम्मी, केक भी तो इंतजार कर रहा होगा. तू चल मैं आया,” राजन रितेश के कंधे पर हाथ रख कर गाता हुआ टेबल के पास पहुंच गया.

जैसे ही मोमबत्तियां बुझाने के लिए वो झुका, वैसे ही

सामने से एक खूबसूरत लड़की ने प्रवेश किया.

राजन की निगाहें जैसे उस पर थम गई हों. रितेश भी एकटक उसे ही देख रहा था. गुलाबी रंग के सूट में वह खिला हुआ गुलाबी प्रतीत हो रही थी. बड़ीबड़ी आंखें, नाजुक होंठ, कंधे पर बिखरे स्याहा काले बाल, सारी कायनात की खूबसूरती जैसे उस में समा गई थी.

“अरे देविका… आओ बेटा,”

देविका के साथ उस की मां आशा भी थी. पूनम ने उन का अभिवादन किया और उसे अपने पास ही बुला लिया.

“चलो बरखुरदार, मोमबत्तियां पिघल कर आधी हो चुकी हैं,” नवीन बोले.

“ओ हां,” राजन जैसे होश में आया हो. उस ने फूंक मार कर मोमबत्तियां बुझाईं, तो हाल तालियों की

गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

केक काट कर सब से पहले उस ने पूनम और नवीन को खिलाया और फिर

रितेश को खिलाने लगा.

जवाब में रितेश ने भी केक का एक बड़ा सा टुकड़ा उस के मुंह में डाल दिया.

यह देख कर सभी जोर से हंस पड़े, पर राजन के कानों तक जो हंसी पहुंची, वह देविका की थी. चूड़ियों

की खनखनाहट जैसी हंसी उसे सीधे अपने दिल में उतरती लगी. जितनी देर पार्टी चलती रही, उतनी

देर राजन की निगाहें चोरीछुपे देविका को ही निहारती रहीं.

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घर सामने ही होने की वजह से उस दिन के बाद से देविका कभीकभी राजन के घर आ जाती थी.।वहपाककला में काफी निपुण थी, तो अलगअलग तरह के व्यंजन पूनम को चखाने चली आती थी.

इस बीच राजन से कभी आमनासामना होता था, तो कुछ औपचारिक बातें ही होती थीं. पूनम को तो वह शुरू में ही पसंद थी. उस ने मन ही मन में उसे राजन के लिए पसंद भी कर लिया था, पर बापबेटे से बात करने के लिए वह देविका का मन भी टटोल लेना चाहती थी और उस के लिए वह किसी उपयुक्त मौके की तलाश में थी.

ऐसे ही लगभग 6 माह बीत गए. एक दिन राजन ने घर के बाहर अपनी गाड़ी स्टार्ट की तो देखा कि सामने देविका खड़ी थी. राजन गाड़ी ले कर उस के सामने पहुंचा.

“हेलो देविका, कैसे खड़ी हो, आज कालेज नहीं जाना क्या?”

“जाना तो है, पर आज पापा की कार नहीं है. उन्हें किसी जरूरी काम से कहीं जाना था, तो आज वे जल्दी ही निकल गए. अब टैक्सी का इंतजार है.”

“तो मैं छोड़ देता हूं. रास्ता तो वही है.”

“अरे, अभी मिल जाएगी कोई टैक्सी. तुम क्यों तकलीफ करते हो?”

“तो तुम भी यह तकल्लुफ रहने दो,” कह कर राजन ने गाड़ी का दरवाजा खोल दिया. देविका मुसकरा

के बैठ गई.

गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी थी कि कुछ ही दूरी पर एक रैड लाइट पर देविका की खिड़की के पास गुलाब के फूल बेचने वाला एक बच्चा आ कर खड़ा हो गया और उस से फूल खरीदने की गुहार सी लगाने लगा, तो देविका ने उस से फूल ले लिया.

“इस फूल का तुम क्या करोगी?” अचानक राजन के मुंह से निकल गया.

“क्या मतलब…?” देविका ने सवालिया नजरों से उस की ओर देख कर पूछा.

“मतलब… मतलब तो कुछ भी नहीं. लीजिए, आप फूल.”

“अरे यार, फूल को फूल की क्या जरूरत है?” राजन मुंह ही मुंह में बुदबुदाता हुआ बोला.

“कुछ कहा तुम ने?”

“ना… ना, कुछ भी तो नहीं.”

कुछ ही देर में राजन ने गाड़ी कालेज के गेट के सामने रोक दी.

“थैंक यू सो मच.”

“वेलकम.”

देविका मुसकराती हुई गेट की ओर चली गई. राजन उसे जाता हुआ देख ही रहा था कि अचानक उस की नजरें देविका की सीट के नीचे गिरे हुए एक कागज पर पड़ी. उस ने झट से कागज उठाया और सोचा कि देविका का ही कोई जरूरी कागज होगा. उस ने उसे आवाज लगानी चाहिए, पर तब तक देविका उस की आंखों से ओझल हो चुकी थी.

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‘है क्या यह…’ राजन ने खुद से ही सवाल किया और कागज खोल कर देखा. जैसे ही पहली पंक्ति पर राजन की नजर गई, वह आश्चर्य से भर उठा. वह एक खत था.

राजन ने तूफान की तेजी से वह खत पढ़ डाला. खत समाप्त होते ही वह खुशी के मारे चिल्ला सा उठा. उस ने गाड़ी स्टार्ट की और वापस घर की ओर दौड़ा दी. पूरे रास्ते उस के दिलोदिमाग में वह खत छाया रहा. घर पहुंचते ही उस ने पूनम को पुकारा.

“मम्मी, ओ मम्मी, तू कब सास बनेगी,” राजन पूरे जोशखरोश भरे स्वर में चिल्लाने लगा.

पूनम आई तो उस ने कानों पर हाथ रख लिए.

“पहले चिल्लाना तो बंद कर. और यह क्या कर रहा है, अच्छा है तेरे पापा घर पर नहीं हैं, वरना अभी

तूफान आ जाता.”

“तूफान ही तो आ गया है मम्मी. आप मेरी शादी की बात करती थीं तो अब करवा दीजिए.”

“ऐसे ही करवा दूं, शादी के लिए कोई लड़की भी चाहिए होती है मेरे बच्चे,” पूनम लाड़ भरे स्वर में बोली.

“लड़की तो है, देविका.”

“सच, देविका तुझे पसंद है,” पूनम खुशी से झूम सी उठी.

“बहुत पसंद है और आज ही पता चला कि मैं भी उसे पसंद हूं.”

“क्या कह रहा है, तुझे कैसे पता? क्या उस ने कहा है तुझ से?”

“ऐसा ही कुछ, अच्छा शादी की तैयारियां करो,” राजन कुछ उतावला सा हो रहा था और उस का उतावलापन देख कर पूनम हंसती जा रही थी.

“अरे पागल, ये काम क्या चुटकी बजाते ही हो जाता है, तेरे पापा से बात करनी है और देविका के घर वालों से भी तो…”

“अच्छा. काश, चुटकी बजाते ही हो जाता,” चुटकी बजातेबजाते राजन अपने कमरे में चला गया.

उसे जाता हुआ देख कर पूनम की आंखों में जैसे लाड़ का सागर हिलोरे लेने लगा.

कमरे में पहुंच कर राजन पलंग पर औंधा गिर पड़ा और जेब से खत निकाल कर फिर से पढ़ने लगा.

प्यारे “R”,

आज हमें मिले पूरे 6 महीने हो चुके हैं. वह पार्टी का ही दिन था, जब हम ने एकदूसरे को पहली बार देखा था. उस दिन ऐसा लगा था, जैसे तुम्हारी नजरों ने मेरी रूह तक को छू लिया हो. तब से आज तक हुई चंद मुलाकातें ही मेरे मौन प्रेम की साक्षी रही हैं. आधीअधूरी उन मुलाकातों में जो छोटीछोटी बातें हुईं, जैसे तुम ने मुझे देखा उन्हीं पर मेरा विश्वास टिका है. अब मुझे लगता है कि

इस पवित्र प्रेम को शब्दों की जरूरत नहीं है, बस अब हमारे मातापिता भी इस खूबसूरत रिश्ते को अपनी मंजूरी दे दें. घर पर मेरी शादी की बात चलने लगी है. तुम अपने मातापिता को इस बारे में बता दो, ताकि वह रिश्ते की बात करने घर आ सके.

दिल से सदा ही तुम्हारी,

“D”

न जाने वो खत राजन ने कितनी ही बार पढ़ डाला. पढ़तेपढ़ते ही उस की आंख लग गई. रात हो गई

थी. डाइनिंग टेबल पर नवीन ने राजन के बारे में पूछा, तो पूनम ने बताया कि “आज तो वह बिना

खाए ही सो गया है.”

“क्यों, ऐसा क्या हो गया?”

“वही, जो इस उम्र में हो जाया करता है.”

“पहेलियां ना बुझाओ. पहले पूरी बात बताओ.”

“हमें देविका के मातापिता से बात कर लेनी चाहिए. राजन और देविका एकदूसरे को चाहने लगे हैं.”

“यह कब हुआ…?”

“क्या आप भी… प्यार किया नहीं जाता हो जाता है.”

“जैसी मां वेसा ही बेटा. अरे, पहले कारोबार में मेरा हाथ बटाए, फिर प्यारमुहब्बत में पड़े. शादी तो दूर की बात है.”

“शादी होती है तो जिम्मेदारी का एहसास खुदबखुद जग जाता है और फिर राजन ने कौन सी नौकरी ढूंढ़नी है. अपना कारोबार ही तो संभालना है.”

वार्तालाप यहीं समाप्त हो गया.

इधर देविका बेहद परेशान हो रही थी. अपने कमरे की एकएक चीज… एकएक किताब… वह ढेरों बार छान चुकी थी. पर उस का खत उसे नहीं मिल रहा था. किताब में ही तो रखा था. अंत में थक कर वह पलंग पर बैठ गई. उस के सब्र का बांध टूट गया और वह फूटफूट कर रोने लगी. आखिर कहां गया खत. वह खत रितेश के लिए था.

रितेश और देविका की प्रेम कहानी राजन के जन्मदिन की पार्टी में आरंभ हुई थी. जब वे राजन के।घर पहुंची थी, तो सब से पहले उस की नजरें रितेश से ही मिली थीं. रितेश भी उसे ही देख रहा था.

फिर पूरी पार्टी में वह कभी खाना एकसाथ लेते हुए टकराते, तो कभी अपने परिजनों के साथ आपस

में हुए परिचय के दौरान एकदूजे को देखते रहे.

उस दिन शब्दों की सीमा चाहे “हैलो” में ही खत्म हो गई, पर दिल से दिल की बातें ऐसी थीं कि मानो लगता हो जैसे उन का अंत ही नहीं है.

पूनम के घर जब भी कोई महफिल जमती तो लता के साथ आशा भी शामिल होती थी. इस तरह आशा और लता की भी अच्छी बातचीत हो गई. पूनम सभी के सामने देविका की पाककला की खूब तारीफ करती थी. तो ऐसे में

लता एक दिन बोल उठी, “अरे तो कभी हमें भी खिलाओ ना.”

यह सुन कर आशा बोली, “क्यों नहीं, यह भी कोई कहने की बात है.”

फिर एक दिन देविका लता के घर पहुंची, तो शायद लता वहां नहीं थी. दरवाजा रितेश ने ही खोला था. दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकरा दिए.

“आओ देविका.”

“आंटी नहीं हैं घर पर क्या?”

Winters 2021: सर्दियों में फौलो करें ये 5 डायट

मौसम में जैसे ही नमी, ठंड आती है.. रंग बिरंगे स्वेटर, ढेर सारी खाने पीने की चीजें और घूमने के आलावा कुछ चिंता भी लाती है क्योंकि इस समय थोड़ी सी लापरवाही से सर्दी जुकाम की समस्या होने लगती है. यहां हम आपको बताते हैं कुछ सलाह और कुछ खास टिप्स.. जिन पर अमल करके आप सर्दियों के मौसम को  खूबसूरत और यादगार बन सकती हैं.

सर्दियों के मौसम में ऐसा हो आपका खानपान

  1. सर्दियों में भी खूब पानी पिये जिससे त्वचा में नमी बरकरार रहें . ज्यादा सर्दी होने पर पीने के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल करें .

2. सर्द मौसम में आम समस्या सर्दी जुकाम की होती है.  विटामिन सी युक्त फल और सब्जी लेनी चाहिए और आंवला एक बेहतर उपाय है इसे कच्चा, सब्जी या मुरब्बे में ले सकते हैं. बेहतर होगा कि मार्केट से मुरब्बा खरीदने के बजाय घर में ही बना लिया जाए.. आंवला की जैली भी बना सकते हैं इसके लिए बस आंवले को कद्दूकस करना है और कढ़ाई में स्वादानुसार चीनी डालकर कुछ देर धीमी आंच पर पकाना है.. जब नर्म हो जाए तो ठंडा करके जार में रख ले.. इसे ब्रेड, बिस्किट या खाने के साथ खा सकते हैं.. एक बार बनाकर हफ्ते भर के लिए स्टोर कर सकते हैं. इसके अलावा आंवले की चटनी या फिर छोटा छोटा काटकर लहसून के साथ फ्राई करके खाया जा सकता है.

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3 . तिल, गुड़ और मूंगफली का सेवन भी सर्दी को दूर करता है. मूंगफली तो हमें जगह जगह ठेलों पर मिल जाती है, खुद भी घर में भूनकर पैकेट बनाकर पर्स में रखा जा सकता है और भूख लगने पर इससे बेहतर और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता है .

4. हमारे घरों में बड़े बुजुर्ग हमेशा ही सर्दियों में शुद्ध घी और मावे युक्त गोंद के लड्डू खाने की सलाह देते हैं जो कि इस मौसम में सबसे उत्तम होता है खासकर बच्चों के लिए .

5 . सर्दियों में मार्केट में तरह तरह के सब्जी, साग और फल मिलने लगते हैं जो कि कुदरत ने सेहत के तैयार किए होते हैं.. अगर बच्चों के लिए मैगी या माइक्रोनी जैसा भी कुछ बना रहे हैं तो भी उसमें टमाटर, गाजर, शिमला मिर्च, मटर के दाने डाले और बच्चों को हेल्दी फूड खाने के बारें में जरूर जागरूक करें.

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कोरा कागज: भाग 1- आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

Writer- साहिना टंडन

1996, अब से 25 साल पहले. सुबह के 9 बजने को थे. नाश्ते की मेज पर नवीन और पूनम मौजूद थे. नवीन

अखबार पढ़ रहे थे और पूनम चाय बना रही थी, तभी राजन वहां पहुंचा और तेजी से कुरसी खींच कर उस पर जम गया.

“गुड मौर्निंग मम्मीपापा,” राजन ने कहा.

“गुड मौर्निंग बेटा,” पूनम ने मुसकरा कर जवाब दिया और उस के लिए ब्रैड पर जैम लगाने लगी.

“मम्मी, सामने वाली कोठी में लोग आ गए क्या…? अभी मैं ने देखा कि लौन में एक अंकल कुरसीपर बैठे हैं.”

“हां, कल ही वे लोग यहां आए हैं. तीन ही लोगों का परिवार है. माता, पिता और एक बेटी है, देविका नाम हैउस का. कल जब सामने सामान उतर चुका था, तब मैं वहां जाने ही वाली थी उन से चायपानी पूछने के लिए कि तभी वह बच्ची देविका आ गई. वह पानी लेने आई थी. बड़ी प्यारी है. दिखने में बहुत सुंदर और बहुत मीठा बोलती है. उस ने बताया कि वे लोग इंदौर से यहां शिफ्ट हुए हैं.”

“ओके. अच्छा मम्मी मैं चलता हूं. रितेश मेरा इंतजार कर रहा होगा,” सेब खाता हुआ राजन लगभग वहां से भागा.

“अरे, नाश्ता तो ठीक से करता जा,” पूनम ने पीछे से आवाज दी.

“उस ने कभी सुनी है तुम्हारी कोई बात. उस के कानों तक पहुंचे तो बात ही क्या है,” नवीन चाय का घूंट भरते हुए बोले.

“आप भी हमेशा उस के पीछे पड़े रहते हैं. यही तो उम्र है उस की मौजमस्ती करने की.”

“कालेज खत्म हुए सालभर हो चला है और कितनी मौज करेगा. रितेश को देखो, आनंद के साथ अब उस ने उस का सारा काम संभाल लिया है.”

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“आप का बिजनैस कहीं भागा नहीं जा रहा है, राजन ने ही संभालना है. देख लेना, एक बार जिम्मेदारियों में रम गया, तो फिर साथ बैठ कर बात करने को भी तरस जाएंगे.”

“चलो, देखते हैं, ऐसा कब होता है और आज कहां गए हैं तुम्हारे साहबजादे?”

“संडे है, बताया तो उस ने कि रितेश के साथ गया है,” पूनम बरतन समेटते हुए बोली.

रितेश राजन के घर से चंद ही घर छोड़ कर रहता था. उन के मातापिता आनंद और लता और राजन के मातापिता नवीन और पूनम, सभी का आपस में अच्छा व्यवहार था. सालों पहले आनंद दिल्ली में नवीन के महल्ले में आए थे.

रितेश के अलावा उन की एक बेटी भी थी, जिस का नाम अनु था. बचपन में ही रितेश की बूआ ने उसे गोद ले लिया था. हालांकि इस बात से कोई अनजान नहीं रहा कि असल में अनु

आनंद बाबू की बिटिया है. बेऔलाद और विधवा सीमा ने अनु को सगी मां से ज्यादा चाहा. मध्यमवर्गीय परिवार था आनंद बाबू का, पर चूंकि अब उन के पास केवल रितेश ही था, इसलिए ठीकठाक गुजारा हो जाता था सब का.

तत्पश्चात पार्क में, त्योहारों में एकदूसरे से मिलने पर लता और पूनम की भी अच्छी बनने लगी. रितेश का दाखिला भी राजन के स्कूल में ही हो गया था, फिर तो पहले स्कूल, फिर कालेज, दोनों की दोस्ती परवान चढ़ती ही गई.

हालांकि दोनों काफी विपरीत प्रवृत्ति के थे. जहां रितेश कुछ गंभीर और अंतर्मुखी था, वहीं राजन मस्तमौला किस्म का था. जीवनयात्रा के सफर को हंसतेगाते पार करना चाहता था. सभी से चुहलबाजी करना उस की आदत में

शुमार था. कुल मिला कर अलग स्वभाव होने पर भी दोनों में गहरी छनती थी.

रितेश के घर के बाहर राजन ने जोरजोर से हौर्न बजाना शुरू कर दिया, तो रितेश तेजी से सीढ़ियां उतरते हुए

और लता को बाय करता हुआ बाहर की ओर लपका.

“अरे, अब बंद भी कर. पूरे महल्ले को घर से बाहर निकालना है क्या…?”

“अरे, यह तो मेरे दोस्त के लिए है. तू मेरा मैं तेरा दुनिया से क्या लेना,” राजन गुनगुनाते हुए बोला. रितेश उसे देख कर हंस पड़ा.

“और बता, जन्मदिन की तैयारियां कैसी चल रही हैं.”

“वैसे ही जैसी हर साल होती है. पापा के दोस्त, मम्मी की सहेलियां, रिश्तेदार, पड़ोसी सभी होंगे, पर मेरी तरफ से

बस एक ही बंदा है, जो पार्टी में ना हो तो पूरी पार्टी कैंसिल कर दूं. समझा कि अभी और समझाऊं.”

“समझ गया यार. तेरा जन्मदिन हो और मैं ना आऊं, ऐसा कभी हो सकता है. अच्छा अभी यह तो बता की हम जा कहां रहे हैं?”

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“इतनी देर से जन्मदिन की बात चल रही है तो क्या जन्मदिन का केक मैं नाइट सूट में काटूंगा. हम अपने

लिए कपड़े खरीदने जा रहे हैं.”

पार्टी राजन के घर पर ही थी. घर का हाल रोशनी से नहा चुका था. मेहमानों की चहलपहल जारी थी. राजन और रितेश भी अपने अन्य दोस्तों के साथ मशगूल थे. तभी पूनम राजन के पास आई.

चलो बेटा, केक नहीं काटना क्या, सब इंतजार कर रहे हैं.”

यूपी में युवाओं को मिली डिजी शक्ति

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती पर प्रदेश के एक करोड़ युवाओं को फ्री स्मार्टफोन और टैबलेट योजना की शुरूआत की.

युवाओं से खचाखच भरे स्टेडियम में हर जिले से आए 60 हजार युवाओं को फ्री स्मार्टफोन और टैबलेट की सौगात दी गई. इस दौरान सीएम योगी ने अब हर कमिश्नरी पर फ्री स्मार्टफोन और टैबलेट देने की घोषणा की.

सीएम योगी ने पूर्व प्रधानमंत्री ‘भारत रत्न’ श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी ईकाना स्टेडियम में आयोजित समारोह में डिजी शक्ति पोर्टल और डिजी शक्ति अध्ययन ऐप का भी शुभारंभ किया. ओलंपियन मीरा बाई चानू और उनके कोच विजय शर्मा को भी सम्मानित किया.

सीएम योगी ने दर्जनों युवाओं का उदाहरण देकर युवाओं को प्रेरित किया. उन्होंने कहा कि दुनिया के अंदर जब भी भारत के युवाओं को अवसर मिला है, तो उन्होंने अपनी प्रतिभा का छाप वैश्विक मंच पर पूरी मजबूती के साथ रखा है. सीएम योगी ने एक कविता से अपनी संबोधन को समाप्त किया.

‘नए युग का सृजन युवकों तुम्हारे हाथ में है,

समूचा जग युवा पीढ़ी तुम्हारे साथ में है’.

प्रबल फौलाद सच मानो तुम्हारे गात में है

नए युग का सृजन युवकों तुम्हारे हाथ में है

सफलता तो तुम्हारी बात में है, जज्बात में है

नए युग का सृजन युवकों तुम्हारे हाथ में है

12 बजे सोकर उठने वाले युवा नहीं, इनसे उम्मीद मत करना : सीएम योगी

सीएम योगी ने विपक्षी दलों के नेताओं का बिना नाम लिए उन पर बड़ा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि 12 बजे सोकर उठने वाले युवा नहीं हैं. प्रदेश की जनता को कोरोना महामारी में गुमराह करके वैक्सीन का विरोध करने वाले युवा नहीं हैं. यह सब टायर्ड हैं और रिटायर्ड हैं. इनसे उम्मीद मत करना, क्योंकि इन्होंने तो प्रदेश की जनता और प्रदेश के युवाओं के सामने पहचान का संकट खड़ा किया था.

2017 के पहले बेरोजगारी दर करीब 18 फीसदी थी, आज साढ़े चार फीसदी है : सीएम

सीएम योगी ने कहा कि हमारा युवा 2017 के पहले कहीं जाता था, तो कुछ जिले ऐसे थे कि उनके नाम पर होटल में कमरे नहीं मिलते थे और बाकी युवा कहीं जाता था, तो यह मान लिया जाता था कि नकल करके आया होगा या सिफारिशी होगा, इसलिए उसे प्रतियोगी परीक्षाओं से बाहर कर दिया जाता था. 2017 के पहले बेरोजगारी दर करीब 18 फीसदी थी और आज साढ़े चार फीसदी है. यह दिखाता है हमारे प्रयास सही दिशा की ओर आगे बढ़ रहे हैं. हमें नए भारत के नए उत्तर प्रदेश की ओर आगे कैसे बढ़ना है, यह प्रधानमंत्री की ईमानदार सोच को दमदारी के साथ प्रदेश के अंदर लागू करने का कार्य किया गया है.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अभ्युदय कोचिंग अब हर जिले स्तर पर: योगी

सीएम योगी ने कहा कि मुझे याद है जब लॉकडाउन शुरू हुआ था, सबसे पहली चुनौती हमारे सामने आई थी, जो बच्चे कोटा में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, उन बच्चों को कैसे उनके घर में सुरक्षित लाया जाए. राजस्थान सरकार सहयोग के लिए तैयार नहीं थी. मुझे उत्तर प्रदेश से बसें कोटा भेजनी पड़ी थीं. सभी 15 हजार बच्चों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाने का कार्य किया गया था. तब हमने तय किया था कि अब हमारे प्रदेश के बच्चों को परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए प्रदेश के बाहर न जाना पड़े. इसके लिए हर कमिश्नर हेडक्वार्टर पर व्यवस्था होनी चाहिए. आज हमने अभ्युदय कोचिंग की व्यवस्था हर कमिश्नरी में की है, उसे अब हर जिले स्तर पर ले जा रहे हैं. ऐसे 10 हजार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों को भी फ्री में स्मार्टफोन और टैबलेट से जोड़ा जा रहा है.

युवाओं के जीवन से खिलवाड़ करने वालों की जगह जेल होगी: सीएम

सीएम योगी ने कहा कि सरकार की नीयत साफ होती है, तो काम भी दमदार दिखता है. सोच ईमानदार, तो काम दमदार. यह काम दमदार का ही परिणाम है. 2017 के पहले नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद होता था. कुछ जगहों पर तो ऐसा होता था कि कोई नौकरी निकली और एक खानदान के लोग चाचा, भतीजा और मामा भी वसूली में निकल पड़ते थे. महाभारत का कोई रिश्ता नहीं था, जो वसूली में न निकलता हो, लेकिन 2017 के बाद हमने कहा कि युवाओं के जीवन से जो भी खिलवाड़ करेगा, उसकी जगह जेल होगी. प्रदेश में पूरी पारदर्शिता के साथ भर्ती की प्रक्रिया होगी और भर्ती की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया.

पिछली सरकारों ने 10 वर्षों में दो लाख और साढ़े चार वर्षों में साढ़े चार लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी: सीएम

सीएम योगी ने कहा कि पिछली सरकारों में 10 वर्षों में दो लाख भर्ती नहीं हो पाई थी. हमने अभी पांच वर्ष भी नहीं हुए हैं. साढ़े चार लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी है. प्रदेश में कानून व्यवस्था की बेहतरीन स्थिति दी, तो परिणाम सामने आ गए. एक तरफ जो माफिया पहले गरीबों की संपत्ति को हड़पते थे और व्यापारियों की संपत्ति पर कब्जा करते थे. सत्ता उन्हें संरक्षित करती थी, उन माफिया के अवैध कमाई पर प्रदेश सरकार का जब बुलडोजर चलता हुआ दिखाई दिया, तो माफिया और अपराधियों के संरक्षणदाताओं के भी होश उड़ते हुए दिखाई दिए.

दो करोड़ से ज्यादा युवाओं को स्वत: रोजगार से जोड़ा: सीएम

सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश में निवेश बढ़ा है. एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) की नीति हमने लागू की और परिणाम था एक करोड़ 59 लाख नौजवानों को उन्हीं के गांव और उन्हीं के जिले में रोजगार भी उपलब्ध होता हुआ दिखाई दिया. यही नहीं, स्वत: रोजगार के साथ विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना से जोड़कर 60 लाख युवाओं को स्वत: रोजगार से जोड़ा है. लोग भौचक हैं.

एक सप्ताह में हर कमिश्नरी में बंटेंगे स्मार्टफोन और टैबलेट

सीएम योगी ने कहा कि यह केवल स्मार्टफोन और टैबलेट नहीं है. इसके साथ आपको फ्री में डिजिटल एक्सेस की सुविधा भी उपलब्ध कराने जा रहे हैं. फ्री में कंटेंट उपलब्ध होंगे. नई शिक्षा नीति के साथ जुड़कर हम भारत को दुनिया में एक महाशक्ति की ओर अग्रसर करने में कामयाब होंगे. अब हर कमिश्नरी में इस तरह के कार्यक्रम हो जाएं. डिजिटल क्रांति को गांव-गांव तक पहुंचाने, आनलाइन एजूकेशन से लेकर आनलाइन एक्जामिनेशन और प्रतियोगी परीक्षाओं को भी युवाओं को इसके साथ जोड़ेंगे.

यूपी को नई पहचान दिलाएगा ‘काशी फिल्म महोत्सव’

उत्तर भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में पहचानी जानी वाली काशी नगरी में पहली बार होने वाला काशी फिल्म महोत्सव दुनिया में अपनी पहचान बनाने जा रहा है.

भगवान शिव की नगरी में 27 से 29 दिसम्बर तक होने वाले इस 03 दिवसीय आयोजन में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और नृत्य के दर्शन तो होंगे ही साथ में यहां रहकर देश में विख्यात हुए दार्शनिक कवि, लेखक, संगीतज्ञों और बनारस घराने की यादें भी ताजा होंगी.

मंदिरों के शहर में हंसी से गुदगुदाने के लिए महशूर हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव भी मौजूद रहेंगे तो शाम को यादगार बनाने के लिए ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की प्रस्तुतियां भी दर्शकों के लिए यादगार बन जाएंगी.

भगवान शिव की नगरी में फिल्म बंधु, उत्तर प्रदेश सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से पहली बार काशी फिल्म महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. दीपों के शहर के रूप में विख्यात काशी नगरी में 27 दिसम्बर को शाम 04 बजे महोत्सव का शुभारंभ मुख्य अतिथि पर्यटन, संस्कृति, धर्मार्थ कार्य, प्रोटोकॉल राज्य मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी और विशिष्ट अतिथि के रूप में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव अपूर्व चंद्रा करेंगे.

इस दौरान वाराणसी के इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड कन्वेंशन सेंटर में मनोज जोशी की प्रस्तुति आकर्षण का केन्द्र बनेगी. शाम छह बजे से डॉ. सम्पूर्णानन्द स्पोट्स स्टेडियम, सिगरा में हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव और गायक कैलाश खेर के लाइव शो शाम को खुशनुमा बना देंगे.

ज्ञान नगरी के रूप में भी मशहूर वाराणसी में 28 दिसम्बर को होने वाले काशी फिल्म महोत्सव के मुख्य अतिथि भारत सरकार के केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर रहेंगे. इस दौरान 10:30 बजे से 12 बजे तक “वाराणसी- एक सांस्कृतिक, पौराणिक और एतिहासिक विरासत से एक आधुनिक शहर की यात्रा” विषय पर पैनल चर्चा का आयोजन होगा.

दूसरी पैनल की चर्चा का विषय ‘संगीत और गीत-बनारस की विरासत’ पर होगी जिसका समय दोपहर 12:30 बजे से दोपहर 02 बजे तक रहेगा. शाम 04 बजे समापन समारोह के साथ ही सब्सीडी का वितरण होगा. गुरुवार की शाम मशहूर फिल्म अभिनेत्री और भारतीय जनता पार्टी की सांसद हेमा मालिनी के नाम रहेगी. इस दौरान उनकी ओर से पेश की जाने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुति सबका दिल मोह लेगी.

यह कार्यक्रम वाराणसी के इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड कन्वेंशन सेंटर में ही होंगे. 29 दिसम्बर को “फिल्म निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में उत्तर प्रदेश और क्षेत्रीय सिनेमा की संभावनाएं” विषय पर पैनल चर्चा आयोजित होगी. और इस दिन की शाम गायक रवि त्रिपाठी, अभिनेता रवि किशन की पेशकश के रूप में पहली बार काशी में हो रहे फिल्म महोत्सव को यादगार बना देगी.

दंगल टीवी का नया शो रंग जाउं तेरे रंग में: क्या भाग्य बदलेगा 3 जिंदगियां

दंगल टीवी पर 27 दिसम्बर से शुरू होगा नया पारिवारिक सीरियल ‘‘रंग जाऊं तेरे रंग में‘‘ जिसकी कहानी अनूठी भले हो, मगर इस तरह की घटनाएं हम अक्सर सुना करते हैं. सीरियल ‘‘रंग जाउं तेरे रंग में’’ एक सामाजिक सीरियल है. जिसकी कहानी के केंद्र में लखनऊ के रहने वाले अमीर काशी पांडे परिवार का लड़का और बनारस़ निवासी गरीब चौबे परिवार की लड़की है.

सीरियल ‘रंग जाऊं तेरे रंग में’ एक ऐसा सीरियल है, जिसमें किस्मत का महत्वपूर्ण किरदार निभाती है, जो दो परिवारों के जीवन को बदल कर रख देता है. सूत्रों के अनुसार सीरियल की कहानी में बड़ी बहन की शादी तय होती है. पंडित जी लड़के व लड़की दोनों की कुंडली ठीक से देखकर इस शादी को सहमति देते हैं. पर शादी उसकी छोटी बहन से हो जाती है.उसके बाद कहानी में कई रोचक मोड़ आते हैं.

कुछ लोग इसे किस्मत का खेल नाम देते है. मगर लड़के का परिवार इसे कुछ और ही कहता है. इस सीरियल में सवाल उठाया गया है कि क्या इंसान का भाग्य उसके जीवन को बदलता है?

पिछले चालिस वर्षों से बौलीवुड में सक्रिय तथा अब सौ से अघिक फिल्मों और ‘सुराग’, ‘अंदाज’,‘अगले जनम मुझे बिटिया ही कीजो’ जैसे कई टेलीविजन सीरियलों में अभिनय कर चुके अभिनेता सुदेश बेरी इस संदर्भ में कहते हैं- ‘‘पांडे परिवार का स्तम्भ काशीनाथ पांडे है.इस सीरियल में कई उतार चढ़ाव और टर्न व ट्विस्ट हैं, जो दर्शकों का मनोरंजन करेंगे. दंगल टीवी के इस सीरियल के माध्यम से हम दर्शकों को मनोरंजन देने के साथ साथ समाज को एक संदेष भी देना चाहते हैं. मगर यहां सब कुछ बताकर हम दर्शकों के मनोरंजन के मजे को किरकिरा नही करना चाहते.’’

काशी पांडे की बड़ी बहू पूजा पांडे का किरदार निभा रही अभिनेत्री दीक्षा धामी ने कहा- ‘‘मैं चुलबुली, सीधी सादी सी बहू का किरदार कर रही हूं.वह ससुराल में सभी से इतना प्यार करती है कि वह 2-3 साल से मायके नही गई है.’’

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उदित शुक्ला ने कहा- ‘‘मैं इस सीरियल में काशी पांडे के बड़े बेटे अभिषेक पांडे का किरदार निभा रहा हूं, जो कि परिवार का जिम्मेदार बेटा है. परिवार के पूरे व्यापार को वह संभाल रहा है.’’ जबकि काशी के छोटे बेटे ध्रुव पांडे का किरदार निभाने वाले अभिनेता करम राजपाल ने बताया-‘‘ ध्रुव बहुत ही शांत स्वभाव का किरदार है. वह सब समझता है.पर ध्रुव अपनी माँ, भाई, भाभी का लाड़ला है.’’

केतकी कदम- ‘‘मैं इसमें सृष्टि चौबे नाम की बेहद सीधी सादी गांव की लड़की का किरदार अदा कर रही हूं,जो कि सभी का बहुत ख्याल रखती है.

मेघा रे ने कहा- ‘‘मैं इसमें धानी चौबे का किरदार निभा रही हॅूं, जो कि अपनी बड़ी बहन सृष्टि के विपरीत स्वभाव वाली पटाखा लड़की है. उसके दिल में जो कुछ होता है, वह उसे बिंदास बोल देती है. कभी कभी लोगों को लगता है कि वह बदतमीज है. मगर उसका इरादा किसी को दुःख पहुंचाना नहीं होता.’’

बनारस के चौबे परिवार के मुखिया और सृष्टि व धामी के पिता सुरेंद्र चौबे का किरदार निभा रहे अभिनेता चैतन्य अदीब कहते हैं- ‘‘मैं गांव का एक किसान हॅूं. हम बनारस के रहने वाले हैं.हमने अपनी दोनों बेटियों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाया है. अब हमें उनके लिए अच्छे वर की तलाश है.

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काशीनाथ पांडे से हमारी मुलाकात होती है और कहानी आगे बढ़ती है. इससे अधिक अभी नही बता सकता. पर यह सीरियल बहुत ही अलग किस्म का है. इसकी स्टोरीलाइन यूनिक है. दर्शकों ने इस तरह का सीरियल टीवी पर अब तक नही देखा है, मगर इसे देखते हुए वह अहयसास करेंगे कि यह सब उनके आस पास होता रहा है. जमीन से जुड़ी हुई कहानी है, आम परिवार में जिस तरह की चीजें होती हैं, वैसा ही दिखाया गया है.इसलिए लोग इस कहानी से खुद को जोड़कर देखेंगें. ’’

काशीनाथ पांडे की बहन और अभिषेक व धुव्र की बुआ का किरदार निभा रही अदाकारा मीना मीर ने कहा- ‘‘मैने काशी की बहन का किरदार निभाया है. मेरे भाई काशी औरतों की इज्जत करते हैं. इसलिए उन्होंने अपेन परिवार में सारी जिम्मेदारी मुझे दे रखी है. यह बुआ अपने भाई, भतीजों से खूब प्यार करती है, भाभी के साथ भी उसका अच्छा रिश्ता है. यह बुआ ऐसी है, जो कि पूरे परिवार के हर सदस्य को एकजुट रखती है.’’

ध्रुव की मां रुपा पांडे का किरदार निभा रही उर्वशी उपाध्याय ने कहा- ‘‘मेरा किरदार ऐसा है, जिसे सजना सवरना काफी पसंद है. वह अपने संजने संवरने पर काफी पैसे खर्च करती है. रसोई तो मेरी ननद यानी कि बच्चों की बुआ संभाल लेगी, मैं जीवन के मजे लेना चाहती हूं.’’

सीरियल ‘‘रंग जाऊं तेरे रंग में ’’ के बारे में बात करते हुए ‘‘दंगल’’ टीवी के एमडी मनीष सिंघल ने कहा, “हम दंगल टीवी के जरिए भारतीय दर्शकों से लंबे अर्से से जुड़े हुए है और हम जानते हैं कि उन्हें किस तरह की कहानी जोड़े रखेगी.सीरियल रंग जाऊं तेरे रंग में’ एक सोशल ड्रामा है,जो इस गहरी समझ को दर्शाता है कि कैसे हमारे देश में शादी का अर्थ दो परिवारों का मिलन है, न कि सिर्फ दो इंसानों का मिलन है.‘‘

सत्ता पाने के लिए धर्म को बनाया हथियार

धर्म के हथियार बना कर सत्ता, पाने का जो सफल एक्सपैरीमैंट किया गया है उस में दोस्तों में भी किस तरह की खाई पैदा हो जाती है. उस का उदाहरण दिसंबर में अंत में हरियाणा के पलवल इलाके में किया. इस घटना में 4 युवा दोस्त जिन में एक मुसलिम था, एक शादी में गए और पीकर अपने गांव लौटते हुए उन का एक मोबाइल को लेकर झगड़ा हो गया. 3 हिंदू युवकों को पता चला कि मोबाइल मुसलिम दोस्त ने छिपाया है तो उसे दोस्ताना मामला न समझ कर उस की पिटाई यह वह कर शुरू कर दी कि वह मुसलिम है.

हिंदूमुसलिम जहर उस तरह भर डाला गया है जो 4 जने साथसाथ एक शादी में गए, वहां साथ खायापिया, साथ लौटे पर रास्ते में उनका झगड़ा हो गया तो धर्म बीच में टपक पड़ा.

धर्म के दुकानदारों ने अपनी दानदक्षिणा, अपने मंदिरों के लिए चंदा उगाहने अपने मंदिरों में औरतों की लाइनें लगवाने और आखिर में वोट पाने की खातिर घरघर में धर्म का जहर कि बोतलें बांट दी है. इनका इस्तेमाल खुलेआम ही रहा है.

अभी तक केवल हिंदू  और केवल मुसलिम स्कूल नहीं खुल रहे हैं और इसलिए स्कूलोंकालेजों में हिंदू मुसलिम युवा खुल कर मिलते है और लडक़पन का मजाक, हंसी दिनलगी, छेडख़ानी करते हैं जहां लड़कियां साथ पढ़ती हो वहां प्रेम प्रसंग और दोस्तियां भी होती है पर जहां जरा सी खटास हो, जो किसी भी दोस्तों या सहयोगी के साथ आम बात है, अचानक धर्म का जहर की दी गई बोतल खुल जाती है. एकदूसरे पर धर्म को लेकर तूतू मैंमैं होने लगती है.

यह अफसोस ही है कि हर बच्चा चाहे या न चाहे उसे बचपन में ही धर्म का लबादा ओड़ा दिया जाता है. अब वह कितनी ही कोशिश कर ले, कितना ही समझदार हो जाए, कितना ही समझ ले कि धर्म उसे बेवकूफ बना रहा है, वह इस से निकल नहीं सकता. इन पलवल के चुनावों के साथ भी साथ यही हुआ, पलवल जिले का गांव खटाला पिछड़ा सा कच्चे अध्यपक्के मकानों का गांव है जहां से चंदा भी नहीं मिलता होगा पर लडऩेमारने के युवा जरूर मिल जाते हैं.

इन बेरोजगार, खाली दिमाग वाले, अनपढ़े या अनपढ़े युवाओं को धर्म का पिट्टू बना लेना कठिन नहीं है. बजाए इस के कि आज की सरकारें इस खाई को दूर करें, हर मुख्यमंत्री, हर केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री किसी न किसी तरह हिंदू  का बखान इस तरह करता रहता है कि बोतलों में भरा जहर और ज्यादा जहरीला होता जा रहा है.

यह न भूलें कि यह जहर केवल मुसलिमों पर डाला जाएगा, उसे घरों में भी इस्तेमाल किया जाता है. यही औरतों को कंट्रोल करता है, यही बेटीबहन को जाति के बाहर या घरवालों की इजाजत के बिना प्रेम या शादी करने में इस्तेमाल होता है. यही जहर पिलाकर मंदिरों में भेजा जाता है. इसी जहर के बल पर लड़कियों का हक लूटा जाता है. घर में रखी टौयलेट क्लीनर की बोतल कब किसी के सिर पर उड़ेलने के काम आ जाए, क्या गारंटी है.

खेती किसानी में गंवई महिलाएं पड़ रही हैं पुरुषों पर भारी

आज भी गंवई इलाकों में रहने वाली ज्यादातर महिलाओं की हालत कमोबेश पहले जैसी ही रही है. गांवों में अभी भी महिलाओं की ज्यादातर आबादी चौकाचूल्हा और उपले बनाने में उलझी रहती है, जबकि महिलाओं को कई मामले में समान अधिकार भी प्राप्त हैं.

इन सब के बीच जिन महिलाओं ने आज के समाज में अपनी समान भागीदारी के महत्त्व को समझा?है, वे आज के दौर में न केवल अलग पहचान रखती हैं, बल्कि आज वे परिवार और समाज को मजबूत बनाने में भी भागीदारी निभा रही हैं.

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के ऐसे तमाम गांव हैं, जहां की महिलाएं आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही हैं. और यह सब संभव हुआ है, आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम भारत व जॉन डियर इंडिया के कारण.

मुजफ्फरपुर के तमाम गांवों में आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम भारत द्वारा जॉन डियर इंडिया के सहयोग से छोटे और मझोले किसानों की आय में इजाफा करने, गंवई महिलाओं के हालात में सुधार लाने, ग्रामीण ढांचे को मजबूत बनाने सहित कई ऐसे काम किए जा रहे हैं, जो गांवों से पलायन को रोकने में काफी मददगार साबित हुए हैं.

एकेआरएसपीआई द्वारा गंवई महिलाओं को कई तरीके से मजबूत बनाने का काम किया जा रहा?है, जिस में महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ कर बचत की आदत डालना, स्किल आधारित ट्रेनिंग, उन्नत खेती के तरीकों में निपुण बनाने जैसे तमाम काम शामिल हैं.

यही वजह है कि ये महिलाएं आज चौकेचूल्हे से ऊपर उठ कर परिवार की आमदनी को बढ़ाने में घर के मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं.

महिलाओं की भागीदारी से खेती में आई क्रांति

बिहार के मुजफ्फरपुर के गांव हरपुर उर्फ अजीतपुर की रहने वाली बबली देवी शिव गंगा सिंचाई समूह के सदस्य के रूप में जुड़ कर घर की माली हालत को सुधारने का काम कर रही हैं. वे घर के कामकाज के साथसाथ उन्नत खेती के तरीके सीख कर खेती से तिगुनी आमदनी ले रही हैं.

बबली का कहना है कि उन के गांव में पहले सिंचाई के साधन न होने से कम पानी में होने वाली हलदी और दलहन जैसी फसलों की खेती होती थी, जिस से घर का खर्च मुश्किल से ही चल पाता था.

ऐसे में एकेआरएसपीआई द्वारा गांव की महिलाओं को संगठित कर एक महिला समूह की स्थापना की गई, जिस के जरीए गांव में सोलर पंप की स्थापना के साथ ही मधुमक्खीपालन और सब्जियों की खेती को बढ़ावा दिया गया.

आज हरपुर उर्फ अजीतपुर गांव की लगभग सभी घरों की महिलाएं सब्जियों की अगेती खेती, मधुमक्खीपालन जैसे तमाम काम कर रही हैं, जिस से बाजार में सब्जियों की आवक पहले होने से उन्हें अच्छा रेट मिलता है.

इसी गांव की शिव गंगा सिंचाई समूह से जुड़ी महिलाएं रेखा देवी, सुनैना देवी, शिव दुलारी देवी, धर्मशीला देवी, सरिता देवी जैसी तमाम महिलाएं अगेती गोभी, सेम, नेनुआ, लौकी, चिनिया केला की खेती कर रही हैं, जिस से इन महिलाओं के परिवार की सभी बुनियादी जरूरतें तो पूरी हो ही रही हैं, साथ ही ये महिलाएं समूह और बैंक के जरीए बचत भी कर रही हैं.

वर्मी कंपोस्ट से तैयार होती हैं सब्जियां

हरपुर गांव में एकेआरएसपीआई द्वारा जॉन डियर इंडिया के सहयोग से संचालित परियोजना के क्रम में गांव की महिलाओं को वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की ट्रेनिंग दे कर गांव में ही इसे तैयार कराया जा रहा है, जिस से यहां के लोग अपनी सब्जियों की खेती में वर्मी कंपोस्ट का ही प्रयोग करते हैं. जैविक तरीके से सब्जियों की खेती करने के चलते सब्जियों की मांग और रेट अधिक होता है.

अलगअलग फ्लेवर में शहद को तैयार कर रही हैं महिलाएं

इसी गांव की रहने वाली पूनम देवी को एकेआरएसपीआई रोजगार से जोड़ने के लिए मधुमक्खीपालन की ट्रेनिंग दिलाई गई और उन्हें मधुमक्खीपालन के लिए बक्से मुहैया कराए गए.

पूनम देवी के पास आज मधुमक्खीपालन के लिए 125 बक्से हैं, जिन से वे लीची, जामुन और तोरिया के फ्लेवर में शहद तैयार करती हैं.

विभिन्न फ्लेवर में शहद तैयार करने के सवाल पर पूनम ने बताया कि वे शहद में सुगंध और स्वाद लाने के लिए मधुमक्खीपालन के डब्बों को जामुन, लीची और तोरिया की फसल में रखती हैं, जहां मधुमक्खियां इन फसलों से पराग इकट्ठा कर के शहद तैयार करती हैं.

उन्होंने बताया कि उन के जैसी तमाम महिलाएं हैं, जो भारी मात्रा में फ्लेवर वाले शहद का उत्पादन कर रही हैं.

एफपीओ द्वारा शहद की मार्केटिंग

पूनम देवी ने बताया कि स्थानीय लैवल पर स्वतंत्र फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड द्वारा गांव की महिलाओं द्वारा तैयार शहद की खरीदारी वाजिब दाम पर की जाती है, जिस से प्रोडक्ट को बेचने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता है.

उन्होंने बताया कि एक बक्से से 19 लिटर से ले कर 24 लिटर तक शहद तैयार होता है. यह शहद 300 रुपए प्रति लिटर में थोक रेट में आसानी से बिक जाता है. इस तरह से वे 125 बक्से में अच्छीखासी आमदनी हासिल कर लेती हैं.

हलदी की प्रोसैसिंग से तैयार किया जाता है हलदी पाउडर

मुजफ्फरपुर के तमाम गांव ऐसे हैं, जहां किसानों द्वारा सब्जियों की खेती के साथ ही हलदी की खेती प्रमुख रूप से की जाती है. किसानों द्वारा कच्ची हलदी का रेट उतना अच्छा नहीं मिल पाता है.

ऐसे में समूह से जुड़ी महिलाओं ने एकेआरएसपीआई और जॉन डियर के सहयोग से हलदी प्रोसैसिंग प्लांट लगाने का निर्णय लिया, जिस से हलदी का पाउडर तैयार कर उसे मार्केट में अच्छे रेट पर बेचा जा सके.

इसी तरह बंदरा प्रखंड के मेघ रतवारा गांव में एक हलदी प्रोसैसिंग प्लांट लगाया गया है, जहां कच्ची हलदी को सुखाने और उस के छिलके छुड़ाने के लिए मशीनें लगाई गई हैं. इस के अलावा हलदी पाउडर तैयार करने के लिए अलग से मशीन लगाई गई है.

इस प्रोसैसिंग प्लांट का संचालन भी सामूहिक रूप से किया जाता है, जहां समूह से जुड़े लोग हलदी पाउडर तैयार करने के बाद उस के पैकेट बना कर स्थानीय मार्केट में सप्लाई देते हैं. इस से उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो रही है.

गांव के ढांचागत विकास पर जोर

आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम (भारत) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अपूर्वा ओ  झा ने बताया कि एकेआरएसपीआई ने बिहार के कई जिलों से पलायन को रोकने के कई प्रयास किए हैं. इस के लिए छोटे, म  झोले और कम आय वर्ग को खेती, शिक्षा, रहनसहन आदि में सुधार के लिए तैयार कर उन के जीवनस्तर को ऊंचा उठाया जा रहा है.

एकेआरएसपीआई के बिहार प्रदेश के रीजनल मैनेजर सुनील कुमार पांडेय  ने बताया कि मुजफ्फरपुर के जिन गांवों में एकेआरएसपीआई द्वारा जॉन डियर इंडिया के सहयोग से परियोजना चलाई जा रही है, वहां गांव के पूरे ढांचागत विकास पर जोर दिया जाता है.

उन्होंने बताया कि गांव में स्कूल, आंगनबाड़ी, पंचायत भवन, साफसफाई, ऊर्जा के वैकल्पिक साधन आदि के स्थायीकरण पर जोर दिया जा रहा है. इस के लिए सामूहिक भागीदारी के साथ एकेआरएसपीआई द्वारा संसाधनों की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है.

खेती को घाटे से उबारने में कामयाब

एकेआरएसपीआई में बिहार प्रदेश के कृषि प्रबंधक डा. बंसत कुमार ने बताया कि किसानों को खेती में घाटे से उबारने के लिए उन को गांव में ही समयसमय पर उन्नत खेती के लिए जरूरी टिप्स दिए जाते हैं. इस के लिए गांव में ही किसान खेत पाठशाला बनाई गई है, जिस में किसान खेतीबारी के गुर सीखते हैं.

गांव में सोलर पंप, पौलीहाउस, सोलर कोल्ड स्टोर आदि की उपलब्धता कराई जा रही है. इस से किसान खेती में जोखिम और लागत को कम करने में कामयाब रहे हैं और उन्हें अधिक उत्पादन भी मिल रहा है. इस से गांव वालों की आमदनी में काफी बढ़ोतरी हुई है.

प्यार में मिली मौत की सौगात

सौजन्य- सत्यकथा

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद के औरास थाना क्षेत्र के टिकरा सामद गांव के रहने वाले परमेश्वर कनौजिया का नाम खुशहाल लोगों में गिना जाता था. इस के साथ ही उन की गांव में अच्छी धाक भी थी. इस का एक कारण यह भी था कि उन की पत्नी उर्मिला देवी टिकरा सामद गांव की पूर्व प्रधान रह चुकी थी.

जब तक परमेश्वर कनौजिया के परिवार में ग्राम प्रधानी रही, तब तक वह गांव वालों के हर सुखदुख में शुमार होते रहे लेकिन अगले चुनाव में हाथ से ग्राम प्रधानी चली जाने के बाद वह अपने 3 बेटों जिस में बड़े रिंकू, मझले जितेंद्र व 18 वर्षीय छोटे बेटे धर्मेंद्र के साथ मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन के पास रेलवे कालोनी में लौंड्री का काम करने लगे थे.

यहां रहते हुए उन का छोटा बेटा धर्मेंद्र काम के साथ पढ़ाई भी करता रहा और साल 2020 में उस ने 12वीं की परीक्षा भी दी थी.

लेकिन साल 2020 लगते ही कोरोना के चलते देश के हालात खराब होने लगे तो सरकार ने देश भर में लौकडाउन लगाने का फैसला कर लिया तो लोग शहरों से वापस अपने गांव में पलायन करने लगे.

चूंकि मुंबई में लौकडाउन होने से सारे कामधंधे बंद होने लगे थे, ऐसे में परमेश्वर कनौजिया को भी लौंड्री का बिजनैस अस्थाई रूप से बंद करना पड़ा.

शुरू में परमेश्वर कनौजिया को लगा कि सरकार कुछ दिनों बाद लौकडाउन खोल देगी. लेकिन बाद में जब उन्हें लौकडाउन में ढील के कोई आसार नहीं दिखे तो उन्होंने अप्रैल 2020 में अपने तीनों बेटों के साथ गांव वापस आने का फैसला कर लिया और किसी तरह लौकडाउन के समय में ही मुंबई से गांव लौट आए.

मुंबई से गांव वापस आने के बाद लौकडाउन के चलते कोई कामधंधा करना संभव नहीं था. इसलिए परमेश्वर कनौजिया अपनी पत्नी और बच्चों के साथ पूरा दिन घर पर ही बिता रहे थे. लेकिन उन का छोटा बेटा धर्मेंद्र कनौजिया अकसर ही गांव में टहलने निकल जाता था.

उधर जैसेजैसे देश में कोरोना के केस कम हुए तो सरकार ने भी लौकडाउन में छूट देनी शुरू कर दी थी, जिस से धीरेधीरे कामकाज भी पटरी पर आना शुरू हो चुका था.

साल 2020 का जुलाई आतेआते तमाम लोग जो मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों से वापस गांव आ गए थे, वे फिर से कामकाज की तलाश में वापस जाना शुरू कर चुके थे.

लेकिन परमेश्वर कनौजिया अभी भी गांव से वापस मुंबई नहीं गए थे. ऐसे में वह अपने बेटों के साथ घर के कामकाज निबटाते रहे.

रोज की तरह परमेश्वर कनौजिया का छोटा बेटा धर्मेंद्र कनौजिया दोपहर का खाना खा कर 19 अगस्त, 2020 को भी घर से टहलने निकला था, लेकिन हर रोज की तरह वह जब शाम तक वापस न लौटा तो परिजन धर्मेंद्र के मोबाइल पर काल लगाने लगे. लेकिन उस का फोन भी स्विच्ड औफ बताया जा रहा था.

ऐसे में परमेश्वर कनौजिया अपने परिजनों के साथ धर्मेंद्र की तलाश में घर से निकल कर आसपास पता करने लगे, लेकिन धर्मेंद्र के बारे में किसी से कुछ भी पता नहीं चला.

परमेश्वर कनौजिया को धर्मेंद्र के गायब होने का कोई कारण भी समझ नहीं आ रहा था, क्योंकि वह और उन के परिवार के सभी सदस्य धर्मेंद्र से बेहद प्यार करते थे, इसलिए कभी उसे डांटफटकार भी नहीं पड़ती थी.

वह ज्यादा परेशान हो उठे थे. वहीं उन की किसी से दुश्मनी भी नहीं थी जिस से लगे कि किसी ने दुश्मनी निकालने के लिए उन के बेटे को गायब कर दिया हो. रही बात कहीं जाने की तो वह हाल में ही लौकडाउन के चलते मुंबई से आया था.

वह अपने घर के लोगों के साथ धर्मेंद्र के दोस्तों और परिचितों के यहां जब देर रात तक उसे खोजते रहे और उस का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने पुलिस को बेटे की गुमशुदगी की सूचना देने का निर्णय लिया और 20 अगस्त की सुबह थाना औरास पहुंचे.

थानाप्रभारी राजबहादुर को घटना की जानकारी दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करने की मांग की. लेकिन थानाप्रभारी ने जांच की बात कह कर उन्हें लौटा दिया.

थाने से पुलिस से अपेक्षित सहयोग न मिलने से निराश हो कर धर्मेंद्र के पिता गांव वापस लौट आए और फिर से आसपास तलाश करने लगे. परमेश्वर कनौजिया अपने दोनों बेटों के साथ धर्मेंद्र की तलाश कर ही रहे थे कि उन्हें अपने घर से करीब 300 मीटर दूर धर्मेंद्र की चप्पलें पड़ी हुई मिल गईं.

धर्मेंद्र के चप्पल मिलने के बाद उस के घर वालों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं. घर वाले किसी अनहोनी के अंदेशे के साथ चप्पल मिलने वाली जगह से आगे बढ़े तो 200 मीटर दूर गिरिजाशंकर द्विवेदी के आम के बाग के पास से निकले सकरैला नाले में धर्मेंद्र का औंधे मुंह शव पड़ा देखा, जहां धर्मेंद्र का पूरा शरीर पानी में और सिर बाहर था. इसे देख कर सभी बदहवास हो रोने लगे.

इस के बाद रोतेबिलखते धर्मेंद्र  के पिता परमेश्वर कनौजिया ने औरास थानाप्रभारी राजबहादुर को घटना की सूचना दी. धर्मेंद्र की हत्या की सूचना पा कर थानाप्रभारी राजबहादुर ने इस की  सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दी और वह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल पर पहुंचने के बाद थानाप्रभारी ने ग्रामीणों की मदद से धर्मेंद्र कनौजिया के शव को बाहर निकलवाया. उधर घटना की सूचना पा कर बांगरमऊ सीओ गौरव त्रिपाठी भी मौके पर पहुंच चुके थे.

नाले से धर्मेंद्र की लाश बाहर निकालने के बाद पिता परमेश्वर व मां उर्मिला देवी का कहना था कि उन के बेटे की हत्या की गई है और शरीर में मारपीट जैसे चोट के निशान भी हैं क्योंकि धर्मेंद्र के चेहरे पर सूजन, पैंट की जेब में मिले मोबाइल में खून के निशान थे. जिस के आधार पर वे बारबार बेटे की हत्या किए जाने की बात दोहरा रहे थे.

वहीं दूसरी ओर पुलिस का कहना था कि मृतक धर्मेंद्र की लाश पर किसी तरह के चोट का निशान नहीं दिखाई पड़ रहा था. लिहाजा पोस्टमार्टम से पहले कहना मुश्किल था कि उस की हत्या की गई है. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक पुलिस ने जांच शुरू कर दी थी और मृतक के पिता परमेश्वर कनौजिया से किसी से दुश्मनी होने की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि उन का या उन के परिवार के किसी भी सदस्य का किसी से भी झगड़ा या दुश्मनी नहीं थी.

इधर पुलिस धर्मेंद्र की मौत के कारणों को ले कर छानबीन कर ही रही थी कि अगले दिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पुलिस को मिल गई. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में धर्मेंद्र की मौत का कारण स्पष्ट नहीं था. इस वजह से धर्मेंद्र का विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया गया. जिस के कुछ दिनों बाद ही विसरा की जांच रिपोर्ट भी आ गई. विसरा रिपोर्ट में धर्मेंद्र की मौत जहर से होनी बताई गई थी.

विसरा रिपोर्ट मिलने के बाद यह तो साफ हो गया था कि धर्मेंद्र की हत्या की गई है. लेकिन पुलिस को हत्या का कोई कारण नजर नहीं आ रहा था जिस के आधार पर हत्यारों तक पहुंचा जा सके. इसलिए पुलिस के सामने हत्या के कारण और हत्यारों तक पहुंचना चुनौती बना हुआ था.

ऐसे में पुलिस ने सर्विलांस की मदद से धर्मेंद्र के हत्यारों तक पहुचने का प्रयास शुरू कर दिया और मृतक के मोबाइल नंबर की पिछले एक सप्ताह की काल डिटेल्स खंगालनी शुरू कर दी.

धर्मेंद्र की हत्या के लगभग एक महीना बीतने को था, लेकिन पुलिस अभी भी हत्या के कारणों का पता लगाने व हत्यारों तक पहुंचने में नाकाम रही थी. धर्मेंद्र की काल डिटेल्स के आधार पर भी हत्यारों तक पहुंचना पुलिस को कठिन लग रहा था.

इधर पुलिस धर्मेंद्र की हत्या के मामले की जांच कर ही रही थी, इसी दौरान परमेश्वर कनौजिया को पता चला कि धर्मेंद्र के गायब होने वाले दिन आखिरी बार उसे गांव के ही रहने वाले लक्ष्मण, राहुल कनौजिया, संजीत कुमार, उस के भाई रंजीत कनौजिया के साथ देखा गया था.

यह जानकारी मिलते ही परमेश्वर कनौजिया ने 17 सितंबर, 2020 को औरास थाने पहुंच कर संजीत व रंजीत, राहुल और लक्ष्मण के खिलाफ बेटे की हत्या में शामिल होने की नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी.

जब पुलिस आरोपियों के घर पहुंची तो सभी हत्यारोपी घर से फरार मिले. इस के आधार पर आरोपियों पर पुलिस का शक और भी पुख्ता हो गया. पुलिस ने आरोपियों की धरपकड़ के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन आरोपी हाथ नहीं आए.

धर्मेंद्र की हत्या के कई माह बीत चुके थे और पुलिस लगातार आरोपियों के घर और संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही थी लेकिन इस मामले में पुलिस के हाथ अब भी खाली थे.

इसे ले कर मृतक के घर वाले आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कई बार एसपी सुरेशराव आनंद कुलकर्णी के साथसाथ उच्चाधिकारियों से गुहार भी लगा चुके थे.

इसी बीच थानाप्रभारी राजबहादुर की जगह औरास थाने की कमान तेजतर्रार हरिप्रसाद अहिरवार को सौंप दी गई थी.

चूंकि इस मामले का परदाफाश न होना पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ था. ऐसे में एसपी सुरेशराव आनंद कुलकर्णी और एएसपी शशिशेखर ने खुद इस मामले पर नजर रखते हुए थानाप्रभारी हरिप्रसाद अहिरवार को केस का जल्द से जल्द खुलासा करने का निर्देश दिया.

अब नए थानाप्रभारी हरिप्रसाद अहिरवार  ने नए सिरे से आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जाल बिछाना शुरू किया. इसी बीच उन्हें 20 मई, 2021 को मुखबिरों से खबर मिली कि लक्ष्मण, राहुल, संजीत रंजीत उन्नाव की मड़ैचा तिराहे के पास हैं और कहीं भागने की फिराक में हैं.

इस सूचना के बाद थानाप्रभारी हरिप्रसाद अहिरवार ने हैडकांस्टेबल दिलीप सिंह, कांस्टेबल प्रशांत, हर्षदीप व आशीष के साथ जाल बिछा कर मड़ैचा तिराहे से चारों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस आरोपियों को पकड़ कर थाने ले आई और धर्मेंद्र कनौजिया की हत्या के बारे में पूछताछ करने लगी. लेकिन चारों ही धर्मेंद्र की हत्या में शामिल होने की बात से नकारते रहे.

जब पुलिस को लगा कि आरोपी आसानी से हत्या की बात कुबूलने वाले नहीं हैं तो कड़ाई से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में चारों टूट गए और उन्होंने धर्मेंद्र की हत्या की बात कुबूल ली.

आरोपी लक्ष्मण ने बताया कि उन लोगों ने वारदात वाले दिन राहुल, संजीत व रंजीत की मदद से धर्मेंद्र को गांव के बगीचे में बुला कर मछली के साथ शराब पार्टी रखी थी. जहां पहले से ही धर्मेंद्र की हत्या करने के लिए जहर खरीद कर रख लिया था.

आरोपियों ने धर्मेंद्र को जम कर शराब पिलाई और जब वह नशे में धुत हो गया तो मौका देख राहुल ने उस के शराब के गिलास में जहर मिला दिया. जहर मिली शराब पीने के बाद धर्मेंद्र अचेत हो कर गिर पड़ा. इस के बाद धर्मेंद्र की मौत का इंतजार करते रहे और जब उस की मौत हो गई तो धर्मेंद्र की लाश सकरैला नाले में फेंक दी.

पुलिस ने जब आरोपियों से हत्या का कारण पूछा तो आरोपी लक्ष्मण ने बताया कि धर्मेंद्र कनौजिया उस की बेटी से प्रेम करता था और वह अकसर उस के घर उस की बेटी से मिलने आया करता था.

लक्ष्मण ने बताया कि वह अकसर दोनों को समझाता रहता था. लेकिन धर्मेंद्र के सिर पर प्रेम का मानो भूत सवार था.

धर्मेंद्र लगातार उस की बेटी के साथ नजदीकियां बढ़ाता जा रहा था. इसी बीच लक्ष्मण के घर पर गांव के ही राहुल का आनाजाना शुरू हो गया, उस ने भी जब पहली बार लक्ष्मण की बेटी को देखा तो उस की खूबसूरती और चढ़ती जवानी को देख उस पर लट्टू हो गया.

अब राहुल लक्ष्मण के बेटी को देखने अकसर बहाने से उस के घर आने लगा था. वह जब भी आता तो लक्ष्मण की बेटी को देख अपनी सुधबुध खो बैठता था. उस के मन में लक्ष्मण की बेटी को ले कर कब प्यार की कोपलें पनपने लगीं, उसे पता ही नहीं चला.

लेकिन उस के सामने एक बड़ी समस्या धर्मेंद्र था. क्योंकि वह भी उसी के चक्कर में अकसर लक्ष्मण के घर आया करता था. इधर लगातार राहुल के घर आने से लक्ष्मण की बेटी का प्यार धर्मेंद्र से कम होता गया और वह राहुल की तरफ आकर्षित होने लगी.

अब वह धर्मेंद्र की जगह राहुल से प्यार करने लगी और दोनों में काफी नजदीकियां भी बढ़ चुकी थीं. इस वजह से अब वह धर्मेंद्र से दूरी बनाने लगी थी. लेकिन धर्मेंद्र दूरी नहीं बनाना चाहता था क्योंकि वह उस से हद से ज्यादा प्यार करने लगा था.

लक्ष्मण ने बताया कि उस की बेटी राहुल से प्यार के चलते धर्मेंद्र से पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन धर्मेंद्र उस से दूर जाने के बजाय और करीब आने की कोशिश करने लगा था.

कई बार मना करने के बावजूद भी धर्मेंद्र का रोजाना घर आना उसे बरदाश्त नहीं था. इसलिए उस ने धर्मेंद्र को रास्ते से हटाने का खौफनाक निर्णय ले लिया. इस के लिए लक्ष्मण ने बेटी के दूसरे प्रेमी राहुल के साथ ही संजीत कुमार, उस के भाई रंजीत को भी धर्मेंद्र की हत्या की साजिश में शामिल कर लिया.

फिर तय प्लान के अनुसार धर्मेंद्र को विश्वास में ले कर उसे शराब और मछली की पार्टी के लिए गांव से सटे बगीचे में बुलाया, जहां 19 अगस्त, 2020 को पार्टी के दौरान उस के शराब के पैग में जहर मिला कर उस की हत्या कर दी और लाश पास के नाले में फेंक दी.

पुलिस ने धर्मेंद्र की हत्या के नौवें महीने में साजिश का परदाफाश कर दिया और आरोपियों के बयान दर्ज कर धारा 302, 201, 34 भादंवि के तहत न्यायलय में पेश कर जेल भेज दिया है. कथा लिखे जाने तक आरोपी जेल में ही थे.

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