Life After Divorce: अगर तलाक हुआ तो जिंदगी में क्या क्या और कैसे कैसे बदलाव तनाव और अवसाद की शक्ल में आएंगे और उन्हें कैसे मेनेज करना है इसकी ट्रेनिंग कहीं कोई नहीं देता. नतीजतन लाखों लोग हताशा और निराशा के गर्त में डूब जाते हैं. जबकि होना यह चाहिए कि तलाक को कलंक मानने की मानसिकता जो मूलतय धर्म के दुकानदारों की देन है को हर स्तर पर हतोत्साहित किया जाए. ताकि लोग तलाक के बाद भी खुशहाल जिंदगी जी पाएं. 

अपने मरीजों को तनाव व डिप्रेशन से उबारने बाली और सटीक मनोवैज्ञानिक सलाह और इलाज  देने बाली मनोचिकत्सक डाक्टर हेमिका अग्रवाल खुद को समझाने में नाकाम रहीं और इस तरह रहीं कि बीती 3 अगस्त की शाम उन्होंने सातवी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. गाजियाबाद में हेमिका और उनके पिता आरके चंद्रा जो खुद भी जानेमाने  वरिष्ठ मनोचिकत्सक हैं को हर कोई जानता था.

लेकिन यह कम ही लोग जानते थे कि इस खूबसूरत युवा डाक्टर की जिन्दगी में विकट की उथल पुथल मची हुई है. जिसका इलाज किसी के पास नहीं. आम हैरान परेशान लोगों की तरह उपर से सामान्य दिखने बाली हेमिका बीते डेढ़ साल से न तो ढंग से खा पी पा रहीं थीं और न ही सुकून भरी नींद ले पा रहीं थीं.

गाजियाबाद एक्सटेंसन की आफीसर सिटी सोसाइटी में अभिजात्य और संभ्रांत लोग रहते हैं जो हेमिका की आत्महत्या की खबर सुनते ही हैरान और सकते की स्थिति में आ गए. लेकिन जब आरके चंद्रा ने मीडिया और पुलिस को दिए अपने बयान में यह बताया कि हेमिका का तलाक कोई डेढ़ साल पहले हुआ था और पिछले कुछ दिनों से वह भारी मानसिक तनाव से गुजर रही थी तो हर किसी को समझ आ गया कि हेमिका तलाक के बाद के अवसाद से जूझती खुद को और हालातों को मेनेज नहीं कर पा रहीं थीं.

तलाक के बाद या उसकी मुकदमेवाजी के दौरान ही अक्सर लोग डिप्रेशन की गिरफ्त में आ जाते हैं. यह सोचना बेमानी है कि इस अवसाद के पुरुष शिकार नहीं होते. गुरुग्राम के सेक्टर 65 में स्थित एमथ्रीएम एमराल्ड हिल्स सोसाइटी में 45 वर्षीय निशांत कुमार ने भी हेमिका की तर्ज पर बीती 2 मई की रात लगभग 9 बजे आठबी मंजिल से कूदकर जान दे दी थी.

निशांत की शादी अब से कोई 12 साल पहले हुई थी. शादी के बाद ही वह पत्नी सहित अमेरिका चले गए थे जहाँ पति पत्नी दोनों ही एक कंपनी में नौकरी करते थे. लेकिन कुछ दिन पहले ही दोनों में विवाद होने लगे थे.जो बढ़ते बढ़ते अलगाव की दहलीज तक आ गए. मामला अदालत तक पहुंचा जिसकी अभी सुनवाई और पेशियाँ चल ही रहीं थीं. मौत से चंद दिन पहले ही निशांत भारत आ गए थे और गुरुग्राम में अपने पेरेंट्स और बहन के साथ रहने लगे थे. लेकिन तलाक के दंश ने यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा तो उन्हें `ऐसी` जिंदगी से आजादी ही बेहतर लगी

आए दिन कोई न कोई तलाकशुदा या मुकदमा लड़ रहे पति पत्नी में से किसी न किसी के आत्महत्या कर लेने की खबर आम होती है तो यह सोचना बेहद स्वभाविक है कि क्या इसके लिए सिर्फ वही जिम्मेदार थे. या यह समाज, कानून और धर्म भी इसके जिम्मेदार हैं. जिन्होंने तलाक को धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कलंक करार देते तलाक के बारे में कई पूर्वाग्रह भी पैदा और प्रचलित कर रखे हैं

 जरुरी है तलाक के बाद की ट्रेनिंग

मुमकिन है दोनों ही बराबरी के जिम्मेदार हों, लेकिन इन दो उच्च शिक्षित और खासा कमा रहे कई अभिजात्यों की आत्महत्या से एहसास यह भी होता है कि इन्हें या इनके जैसों को कोई यह ट्रेनिंग नहीं देता कि अगर वैवाहिक जीवन सफल न हुआ या पार्टनर से पटरी नही बैठी जिसके चलते नौबत तलाक की आई तो उसके बाद की जिंदगी कैसे जीना है और तलाक के बाद के डिप्रेशन को कैसे मेनेज करना है.  न केवल इन्हें बल्कि सभी को नसीहत बचपन से यही दी जाती है कि शादी का टूटना यानि तलाक होना कोई पाप या अपराध है जिससे बचना चाहिए. जाहिर है ये स्थापित मान्यताएं वैवाहिक घुटन की बड़ी वजह होती हैं.

इसके बाद भी जिस तेजी से तलाक की तादाद बढ़ रही है उन्हें देख लगता तो यही है कि अब वक्त है कि युवाओं को आगाह कर दिया जाए या वे खुद ही दिमागी तौर पर शादी के साथ ही तलाक के लिए भी तैयार रहें. ऐसा कहने की वजह जानने समझने से पहले आंकड़ों पर नजर डालना अहम और जरुरी है

बेंगलुरु स्थित एक प्रमुख ला फर्म `प्राइम लीगल` के मुताबिक पिछले कुछ सालों में खासतौर से महानगरों में तलाक के मामलों में 30 से 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है. इसमें भी हैरान कर देने बाली बात यह है कि 50 साल से ज्यादा उम्र बाले कपल्स की तादाद भी 30 फीसदी के लगभग है  ( यानी ऐसे कपल्स जो 15 साल से ज्यादा का वक्त लाइफ पार्टनर के साथ गुजार चुके हैं ).  इस उम्र से ज्यादा के कपल्स के तलाक को बोलचाल की भाषा में `ग्रे डिवोर्स`या `सिल्वर स्प्लिटर्स` या फिर `डायमंड डिवोर्स`  भी बाल काले से सफ़ेद होने के चलते कहा जाता है

यह संख्या जाहिर है अब दिनों दिन बढ़ना ही है क्योंकि लोग जागरूक हो रहे हैं और शादी को सात जन्मो का बंधन करार देने और थोपने की रूढ़ि को नहीं मानते है. दो टूक कहा जाए तो वह दौर मेट्रोज से विदा हो चुका है और बी टियर शहरों की सीमाएं लाँघ रहा है जिसमे न केवल महिलाएं बल्कि पुरुष भी खूंटे के बैल की तरह शादी के बंधन में बंधे घुटते रहते थे. लेकिन समाज के दबाब और डर के चलते शादी निभाने मजबूर रहते थे.

नए दौर के कपल्स बेहतर समझते हैं कि शादी एक एग्रीमेंट या काप्रोमाइज है जिसे निभाना या जबरजस्ती ढोना किसी भी तरह की अनिवार्यता नहीं है. और ठीक इसी तरह तलाक कोई कलंक नहीं बल्कि 24 X 7 की घुटन भरी जिंदगी से आजादी है जिसकी इजाजत और सहूलियत भारत का संविधान और कानून देता है.

अगर यह घुटन से आजादी है तो फिर क्यों हेमिका और निशांत जैसे हजारों लाखों आत्महत्या कर लेते हैं जबकि उन्हें तो जश्न मनाना चाहिए. इस सवाल का जवाव बेहद साफ़ है कि हमारे यहाँ तलाक के बाद के हालातों और जिंदगी का किसी को अंदाजा या तजुर्बा नहीं होता. इसलिए कुछ लोग यह आत्मघाती कदम उठा लेते हैं. अगर वे शादी से पहले की सी जिंदगी की तरह तलाक के बाद की जिंदगी भी जी पाते तो कोई वजह नहीं कि उन्हें जान गंवाना पड़ती.

खुद को प्रशिक्षित करें

प्री और पोस्ट मेरिज काउंसलिंग की दुकानें अब गली गली खुल गई हैं. जाहिर है फेमिली स्ट्रक्चर ऐसा नहीं रहा कि वहीँ से यह सलाह मिले. युवा इन एजेंसियों की सेवाएं ले भी रहे हैं. जिससे एक खुशहाल शादीशुदा जिंदगी गुजारने के टिप्स उन्हें मिल सकें. लेकिन कहीं भी पोस्ट डायवोर्स काउंसलिंग एजेंसी नाम की चीज नहीं है जो यह बता पाए कि तलाक अगर हो जाए तो जिंदगी, समाज, परिवार और खुद की मानसिकता में क्या क्या बदलाव आते हैं और उन्हें कैसे मेनेज करना है. जिससे कम से कम हेमिका और निशांत की तरह आत्महत्या करने की नौबत न आए.

बिलाशक शादी जिंदगी की एक अहम घटना या आयोजन कुछ भी कह लें है लेकिन इसके सफल होने की गारंटी कोई नहीं ले सकता. यह कब अलगाव और तलाक की हद तक जा पहुंचे यह भी कोई नहीं बता सकता. यह ठीक है कि पश्चिमी देशों की तरह भारत में बात बात पर तलाक नहीं होते यही वजह है कि यहाँ तलाक की दर महज एक फीसदी है.

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कपल्स तलाक नहीं लेना चाहते या अपनी मेरिड लाइफ एंजॉय कर रहे होते हैं. दरअसल में धर्म, समाज और कानून तलाक की राह में बड़ा रोड़ा हैं. इस तिकड़ी की हर मुमकिन कोशिश यह रहती है कि कम से कम तलाक हों जिससे संस्कृति और संस्कारों की आड़ में चलने बाली धर्म की दुकान से आमदनी होती रहे. फिर भले ही कपल्स नारकीय घुटन भरी जिंदगी ढोते खुशियों से दूर और महफूज रहें. इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जो जितनी ज्यादा तकलीफ में रहेगा, तनाव और दुख झेलेगा वह इनसे निजात पाने दान पुण्य और पूजा पाठ भी ज्यादा करेगा.

ऐसा इसलिए कि देश की अदालतें भी सनातनी और धार्मिक टाइप की हैं जिनकी हर मुमकिन  कोशिश तलाक को हतोत्साहित करने की ही रहती है. इसलिए तलाक के मुकदमो में जानबूझ कर देर लगाई जाती है .हालाँकि कभी कभार राहत देने बाले कुछ ऐसे फैसले भी आ जाते हैं जो कपल्स की व्यक्तिगत इच्छाओं, आजादी और भविष्य को गौर करते होते हुए होते हैं. लेकिन ऐसे फैसले अक्सर सुप्रीम कोर्ट से ही ज्यादा आते हैं. निचली अदालतों में तो पति पत्नी सालों एडियाँ रगड़ते अधेड़ से बूढ़े हो जाते हैं. लेकिन तलाक की डिक्री उन्हें नसीब नहीं होती. इसलिए अधिकतर कपल्स को बिना अदालत बाला नर्क यानी मौजूदा जिंदगी ही ज्यादा बेहतर लगती है.

फसते या मरते वे हैं जो तलाक तो ले लेते हैं लेकिन इसके बाद की जिंदगी की दुश्वारियों का अंदाजा नहीं लगा पाते. एक त्रासदी , उपेक्षा अकेलापन और कुछ मामलों में अधूरापन भी उन्हें निगलने को तैयार बैठा रहता है. हेमिका बेहतर जानती समझती थीं कि इन हालातों से कैसे निबटना है लेकिन वे खुद पर मनोविज्ञान के नियम, सिद्धांत और उपचार लागू नहीं कर पा रहीं थीं.

शादी के बाद बदली जिंदगी अक्सर लोग सहज स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उसमे उल्लास उत्साह और पूरे समाज की मौजूदगी रहती है. लेकिन तलाक लेते वक्त और बाद की जिंदगी में कोई साथ नहीं होता. देखते ही देखते दूसरे तो दूसरे खुद का नजरिया ही खुद के प्रति बदल जाता है. मानो कोई भारी गलती या गुनाह तलाक लेकर कर दिया हो. यह गिल्ट या आत्मग्लानि तलाकशुदाओं को बेहद भारी पडती है यदि वे वक्त रहते इससे मुक्त न हो पाएं.

ऐसे हों मुक्त

तलाक के बाद जिंदगी में तेजी लाएं और किसी भी तरह के भार या अपराधबोध से बचने ये टिप्स अपनाएं –  

1 – तलाक लेना कोई गुनाह, पाप या अधर्म नहीं है यह घुटन भरी जिन्दगी से छुटकारा पाने का इकलौता रास्ता है.

2 – तलाक की बात किसी से छिपाने की जबरन कोशिश न करें. उलटे जो भी संपर्क में आए उसे इसकी सूचना जरुर दें. हर्ज की बात नहीं अगर व्हाट्सएप के फेमिली व फ्रेंड्स ग्रुप्स में इसे शेयर किया जाए और संभावित सवालों के नपेतुल्रे जबाब तैयार रखे जाए. लेकिन यह याद रखें कि आपको किसी को कोई स्पष्टीकरण नहीं देना है.

3 – तलाक के बाबत किसी से भी सहानुभति बटोरने की कोशिश न करें. अगर कोई पहले से हमदर्दी दिखाए तो उसे विनम्रता से टाल दें.

4 – अपने शौक व इच्छाएं जिंदा रखे, उन्हें पूरा किया जाने में कोई लिहाज किसी का न करें.

5 – एकांत से बचें और ज्यादा सोचें नहीं. कडवा अतीत अपने जीवन व व्यक्तित्व पर हावी न होने दें.

6 – लोग अगर उपेक्षित कर रहें हों तो इसे अन्यथा न लें न ही इससे आहत हों बल्कि उन पर तरस खाएं क्योंकि तलाक के प्रति उनका नजरिया पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है. इसलिए नए नए दोस्त बनाएं.

7 – सोशल मीडिया पर एक्टिव रहें अच्छी अच्छी रील्स देखें

8 – जब भी वक्त मिले घूमने फिरने निकल जाएँ. पहाड़ी इलाके व हिल स्टेशन बेहद सुकून ऐसे दिनों में देते हैं.

9 – अपने छोटे बड़े काम खुद करने की आदत डालें. इससे वक्त अच्छा कटेगा.

10 -तलाक के बाद दिनचर्या अक्सर अस्त व्यस्त हो जाती है इसे व्यवस्थित करें. एक्सरसाइज करें जिम जाएँ और सुबह शाम टहलें.

11 – किचिन में जाएँ नई नई डिश ट्राई करें . गार्डनिंग करें, लान अगर न हो तो ढेर से गमले लाएं उनमे तरह तरह के पेड पौधे लगाएं.

12 – शराब या किसी भी तरह के नशे का सहारा न लें इससे गम गलत नहीं होता बल्कि और बढ़ता है.

13 -अलगाव या तलाक के मुकदमे के दौरान पति पत्नी दोनों को ही अपनी यौनेच्छाओ को ज्यादा नहीं दबाना चाहिए. इससे यौन कुंठाएं जन्म लेती हैं जो घातक ही साबित होती हैं. इन्हें क़ानूनी दायरे में रहते सहूलियत के मुताबिक सुरक्षित तरीके से पूरा करना हर्ज की बात नहीं.

14 – तलाक के बाद के विकल्पों अर्थात दूसरी शादी के बारे में गंभीरतापूर्वक न केवल सोचें बल्कि उस पर अमल भी वक्त रहते शुरू कर दें. इससे भी तनाव और अवसाद कम होते हैं. यह याद रखें कि दूसरी शादी कोई गुनाह नहीं बल्कि जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए जरुरी है.

15 – अगर इसके बाद भी राहत न मिले तो मनोचिकित्सक या काउंसलर की सलाह लें जो आजकल हर जगह आसानी से उपलब्ध हैं.

15 – और सबसे अहम बात अच्छा साहित्य और पत्रिकाए पढ़ने की आदत डालें. अच्छा सामयिक साहित्य सोशल मीडिया के इस दौर में बहुत राहत देने बाला साबित हो रहा है. क्योंकि उसकी छाप स्थाई होती है और सोशलमीडियाई छिछोरापन उसमे नहीं होता.

उमर और आमिर जैसों से सबक लें

निशांत तय है इस डर से घिर गए थे कि लोग क्या कहेंगे और तलाक के बाद की जिंदगी वे सहजता से जी पाएंगे या नहीं और अदालत आसानी से तलाक देगी या नहीं . यह काल्पनिक डर अक्सर महंगा साबित होता है. इसलिए इससे दूर रहने उन तलाकशुदाओ पर नजर डालना चाहिए जो पहले से बेहतर और खुशनुमा जिंदगी गुजर कर रहे हैं.

तलाक के बाद और पहले मुकदमे के दौरान खुद को तनाव मुक्त कैसे रखा जाए इसकी एक ताज़ी मिसाल जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हैं जो राजनीति और व्यक्तिगत जिंदगी दोनों को लेकर उथल पुथल का शिकार रहे. लेकिन उन्होंने सब्र नहीं खोई और अपने काम व कैरियर पर फोकस उन्होंने ढीला नहीं पड़ने दिया.

उमर अब्दुल्ला की शादी 32 साल पहले एक सितम्बर 1994 को दिल्ली की जानी मानी बिजनेस वुमेन पायल नाथ से हुई थी. लेकिन आपसी अनबन और मतभेदों के चलते दोनों साल 2011 से अलग रह रहे थे. शादी के वक्त दोनों ही दिल्ली की नामी ओबेराय होटल में जॉब करते थे. यहीं दोनों की जान पहचान हुई जो प्यार में तब्दील हो गई. उमर मुसलमान थे और पायल सिख थीं.  लेकिन दोनों के परिवारजनों को कोई एतराज उनकी शादी से नहीं था. एतराज और बबाल का डर कश्मीरी पंडितों का था सो दोनों ने इंग्लेंड जाकर शादी की.

वजहें कुछ भी हों के चलते अनबन शुरू हुई तो तलाक के लिए उमर ने फेमिली कोर्ट में अर्जी दी. इसके लिए उन्होंने पायल पर परित्याग सहित क्रूरता का आरोप लगाया था. जिसे साल 2016 में अदालत ने ख़ारिज कर दिया था. मामला हाईकोर्ट पहुंचा जिसने निचली अदालत का फैसला बरक़रार रखा. हाईकोर्ट ने पायल व दोनों बेटों के लिए गुजारा भत्ते का आदेश भी उमर को दिया यह दिसम्बर 2023 की बात है

लेकिन अब तक उमर और पायल दोनों अदालती काररवाई से आजिज आ चुके थे. लिहाजा उन्होंने समझदारी भरा फैसला यह लिया कि बजाय अदालतों में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढ़ने के बाहर समझौता कर लिया जाए. दोनों ने एक दूसरे पर दायर मुकदमे वापस लेते आपसी सहमति से तलाक ले लिया. इस बाबत दोनों ने संविधान के अनुच्छेद 142 जो सुप्रीम कोर्ट को असाधारण शक्ति देता है का सहारा लिया .इसकी वजह यह थी कि विवाह कानूनों चाहे वह हिन्दू विवाह अधिनियम हो या फिर अन्य व्यक्तिगत कानून हों में सीधे तौर पर तलाक का कोई क़ानूनी आधार नहीं है

यह बिलाशक बड़ी क़ानूनी खामी है कि तलाक के लिए कोई न कोई आधार जो आरोप के सिवाय कुछ और हो भी नहीं सकता का होना जरुरी है. दरअसल में उमर और पायल की शादी इंग्लेंड में वहां के नागरिक कानून के तहत हुई थी. प्रसंगवश यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं कि शुरू में उमर ने विदेशी विवाह अधिनयम 1969 की धारा 18 के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की थी. जिसे विशेष विवाह अधिनियम 1954 की धारा 27 (1) (ख) और 27 (1) (घ) के साथ पढ़ा गया था. चूँकि वे अपने लगाए आरोप साबित नहीं कर पाए थे इसलिए उनका मुकदमा ख़ारिज होता रहा

बहरहाल नामी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के दखल से सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत दोनों का तलाक सम्पन्न कराया यानी डिक्री दी. लेकिन यह आसान नहीं था क्योंकि क़ानूनी तौर पर मामला उलझा हुआ था. अब अगर उमर भी थकहार कर बैठ जाते तो उन्हें तलाक नहीं मिलता और कागजों में वे पायल के पति बने रहने मजबूर रहते. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी इसलिए आख़िरकार रास्ता निकल ही आया.

हालाँकि इसमें दोनों के 17 साल अदालतों में जाया हुए. ऐसे में निशांत जैसों का एक दो पेशी या तारीखों में घबरा जाना और आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लेना बताता है कि कपल्स को अदालती प्रक्रिया की जानकारी होना भी जरुरी है. .और इसका अंदाजा या आईडिया शादी के पहले से ही हो तो डिप्रेशन गिरफ्त में नही ले सकता.

नामी फिल्म अभिनेता आमिर खान ने तीसरी शादी गौरी सप्रेट से की थी तो हर कोई चौंका था क्योंकि आमिर अपनी पहली दोनों बीबियों को तलाक दे चुके थे और बिना किसी लिहाज या हिचक के सठियाई उम्र में तीसरी शादी कर रहे थे. इस विषय पर पाठक सरिता के जुलाई प्रथम 2026 के अंक में विस्तार से रिपोर्ट `आमिर खान या निकाह खान` शीर्षक से पढ़ चुके हैं.

13 (बी) में जाएँ

आमिर ने कोई सरदर्दी तलाको में नहीं ली. उन्होंने दोनों पत्नियों से आपसी सहमति से तलाक लिया. यह तलाक का विवाद रहित आसान क़ानूनी तरीका है. हिन्दू मेरिज एक्ट 1955 की धारा 28 में इसका प्रावधान है. जिसमे एक संयुक्त आवेदन पति पत्नी को देना होता है कि हम दोनों का साथ रहना अब संभव नहीं व हमारे बीच कोई विवाद नहीं है, इसलिए हम तलाक चाहते हैं. अदालत एक या ज्यादा से ज्यादा दो तारीखें कपल्स को देती हैं. इस बीच सब कुछ ठीकठाक रहता है यानी दोनों पक्षों में से कोई पक्ष एतराज नहीं जताता है तो छह महीने के अंदर तलाक की डिक्री दे दी जाती है.

कई मामलों में तो अदालतों ने इस 6 महीने की अवधि जिसे कूलिंग आफ पीरियड भी कहते हैं से भी कपल्स को छूट दी है. अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर ( 2017) में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते यह कहा था कि 6 महीने की अवधि निर्देशात्मक है अनिवार्य नहीं. अगर सब कुछ ठीकठाक हो और पति पत्नी दोनों सहमत हों तो फेमिली कोर्ट भी इससे छूट दे सकते हैं.

लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पति पत्नी दोनों अपने विवाद अदालत के बाहर सुलझा लें मसलन मेंटेनेस , दहेज़ व उपहारों का बंटबारा और बच्चे अगर हों तो उनकी कस्टडी का मसला. इससे फायदा यह है कि पति पत्नी दोनों एक दूसरे पर सच्चे झूठे आरोप लगाने से बच जाते हैं जिनके चलते मुकदमे के दौरान और तलाक के बाद भी जो तनाव और अवसाद रहता है उस की आशंका खत्म हो जाती है.  आमिर खान की तीसरी शादी में पहली दोनों पत्नियाँ बच्चों सहित मौजूद थीं इसका सीधा सा मतलब यह है कि सहमति से तलाक में दोस्ताना संबंध बने रहते हैं. अदालत में आरोप लगाने से बैर, कड़वाहट या दुश्मनी कुछ भी कह लें हर तारीख पर बढ़ता जाता है. क्योंकि दोनों को लगता है कि इसके यानी हो रही परेशानी के लिए सामने बाला जिम्मेदार है क़ानूनी लेटलतीफी नहीं.

यह अच्छी बात है कि नये दौर के कपल्स इस धारा के तहत ही तलाक लेना पसंद कर रहे हैं. जाहिर है वे किसी तरह की लेट लतीफी क़ानूनी या सामाजिक या दूसरी कोई भी नहीं चाहते जो  टेंशन ही देती है. 13 (बी) का घोषित फायदा यह है कि कपल्स को तलाक ही मिलता है. तनाव और अवसाद नहीं जो कभी कभी आत्महत्या की वजह भी बन जाते हैं. वक्त के साथ साथ पैसों की बचत भी इससे होती है. इसलिए वकील आमतौर पर इसकी सलाह अपने क्लाइंट्स को नहीं देते क्योंकि फिर हर तारीख पर पैसे ऐंठने की जुगाड़ खत्म हो जाती है.

महानगरों के कपल्स अब आपसी सहमति से तलाक ज्यादा ले रहे हैं. सरकार और उसकी  एजेंसियां भले ही 13 बी के तहत होने बाले आंकड़ो को अलग से जारी न करती हों लेकिन जानकारों का मानना है कि मुंबई , दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में 50 फीसदी तलाक इसी धारा के तहत हो रहे हैं.

सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य केरल जहाँ देश में सबसे ज्यादा तलाक होते हैं में भी आपसी सहमति से लिए जाने बाले तलाकों की तादाद 50 फीसदी ही आंकी जाती है. चंडीगढ़ का आंकड़ा एक सुखद हैरानी देता है जहाँ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में जनबरी 2024 से लेकर मई 2024 तक 35 में से 32 मामले आपसी सहमति से तलाक लेने के थे. भोपाल के नजदीक सीहोर जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता रामनारायण ताम्रकर की मानें तो अब तो छोटे शहरों में भी जागरूकता आ रही है और कपल्स 13 ( बी) के तहत लेने लगे हैं इसमें एक अच्छी बात यह भी है कि विवादित तलाक के मामलों को भी सहमति में तब्दील किया जा सकता है.जो कपल्स मुकदमेबाजी से तंग आ चुके हों वे अपने वकील से बात कर अपने मुकदमे को 13 ( बी) में ला सकते हैं.

जो कपल्स तलाक के बाद टेंशन और डिप्रेशन नहीं चाहते हैं वक्त और पैसे बचाना चाहते हैं उन्हें समझदारी भरा यही रास्ता चुनना चाहिए. जिसमे तलाक की वजह बताना भी कोई क़ानूनी वाध्यता नहीं है.

नोट – कुछ अहम बातें व आंकड़े जिनके लेख में मुनासिब जगह बोक्स बनाना पाठकों का ध्यान खींचेगा

1 –  नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी ) के मुताबिक भारत में पारिवारिक और विवाह सम्बन्धी समस्याओं के चलते हर साल हजारों लोग अपनी जान गंवाते हैं. इनमे तलाक अलगाव और वैवाहिक कलह मानसिक तनाव के प्रमुख कारण होते हैं.

2 –  एनसीआरबी के अनुसार ही साल 2015 में 2497 पुरुषों ने वैवाहिक कारणों के चलते आत्महत्याए की थीं या संख्या साल 2024 तक बढ़कर 4536 हो गई यानी 9 साल में लगभग 82 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

3 –   आस्ट्रेलिया की मेलबर्न यूनिवर्सिटी की जुलाई 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तलाकशुदा पुरुषों में विवाहित पुरुषों की तुलना में आत्महत्या कर की संभावना 2.8 गुना ज्यादा होती है.

4 – `द जर्नल आफ मेन्स हेल्थ` की रिपोर्ट बताती है कि शादीशुदा पुरुषों के मुकाबले तलाकशुदा पुरुषों कीई मृत्यु दर 250 फीसदी ज्यादा होती है. इस रिपोर्ट के ही मुताबिक अमेरिका में हर दिन दस तलाकशुदा पुरुष आत्महत्या करते हैं.

5 – एनसीआरबी के एक आंकड़े की मानें तो वैवाहिक समस्याओं के चलते भारत में 2016 से 2020 के बीच प्रतिदिन औसतन 20 लोगों ने आत्महत्या की थी जाहिर है यह संख्या और बढ़ी ही होगी. इस दौरान 37591 आत्महत्याओं में से 2688 ने यानी महज 7 फीसदी ने तलाक के चलते आत्महत्या की थी.  लेकिन इस आंकड़े का एक पहलू यह भी है कि 93 फीसदी ने वैवाहिक कलह या विवादों में फसे रहने के चलते आत्महत्या की. अगर वे वक्त रहते तलाक ले लेते तो सभी न सही कुछ तो बच सकते थे. Life After Divorce  .

 

 

 

 

 

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