Education System: बहुत ज़्यादा पढ़ाई ने समाज को बिगाड़ दिया है. चौंकिए मत, आजकल यह कहना कौमन बात हो गई है अपने देश में. लेकिन यह निष्कर्ष उतना ही गलत है जितना यह कहना कि अस्पताल बढ़ गए, इसलिए बीमारियां बढ़ गईं. असली सवाल यह है कि क्या वास्तव में शिक्षा बची भी है?
जिस समाज में ज्ञान की जगह सर्टिफिकेट ले लें, वहां विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र नहीं, प्रमाणपत्र उत्पादन केंद्र बन जाते हैं. फिर धीरेधीरे डिग्री वस्तु मात्र बन जाती है, जिस की कीमत तय होती है. कोई 30 हजार रुपए में विशेषज्ञता खरीद लेता है, कोई एक लाख रुपए में शोधकर्ता बन जाता है और कोई कुछ वर्षों बाद उसी कागज के सहारे विश्वविद्यालय का शिक्षक भी बन जाता है. ऐसे समाज में यह संकट क्यों नहीं होगा कि डिग्री पाने वाला व्यक्ति शिक्षित ही हो, यह जरूरी नहीं?
एमडी-एमएस की थीसिस 30-35 हजार रुपए में और पीएचडी की तैयार थीसिस 80 हजार से एक लाख रुपए में बिक रही है. 24 घंटे में पूरी थीसिस दे दी जा रही है. इस चोरी को पकड़ने वाले सौफ्टवेयर से बच निकलने के तरीके भी बताए जा रहे हैं. बस, आप की जेब में पैसा होना चाहिए.
पिछले 3 दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार अभूतपूर्व रहा है. आज देश में लगभग 1,200 विश्वविद्यालय, 45,000 से अधिक कालेज और 2.5 करोड़ से अधिक उच्च शिक्षा के विद्यार्थी हैं. यह दुनिया की सब से बड़ी उच्च शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है. संख्या बढ़ी है, लेकिन क्या गुणवत्ता भी उसी अनुपात में बढ़ी? यदि ऐसा होता, तो उद्योग जगत लगातार यह शिकायत क्यों करता कि बड़ी संख्या में स्नातक नौकरी के लिए आवश्यक कौशल तक नहीं रखते?
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