Asian Games 2026: एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के गले में चमचमाते मेडल पूरे देश को गौरवान्वित कर रहे हैं. मगर इन मेडल्स की चमक के पीछे हमारी खेल व्यवस्था की बदहाली का अंधकार भी क्या कोई देखता है? भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो उस प्रतिभा को बचपन में पहचानने, उसे मैदान देने, प्रशिक्षित करने, पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने और दस-पंद्रह साल तक उसका हाथ थामे रखने वाली व्यवस्था की. 140 करोड़ से ज्यादा आबादी और दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनने का अवसर आखिर कितने बच्चों को मिलता है?
जापान के आइची-नागोया में हुए 2026 एशियाई खेल भारत के लिए केवल मेडल्स की गिनती का उत्सव नहीं, बल्कि वह आईना दिखाने का अवसर भी है कि एशिया के दूसरे देशों के मुकाबले हमने पिछले सात दशकों में अपने बच्चों, युवाओं और खेल संस्कृति में कितना निवेश किया है.
एशियन गेम्स में नि:संदेह हमारे खिलाड़ियों ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया. महिला क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को फाइनल में 147 रन से हराकर भारत को पहला स्वर्ण दिलाया. स्मृति मंधाना ने 45 गेंदों में 79 रन की शानदार पारी खेल कर लड़कियों की प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया.
शूटिंग में एलावेनिल वलारिवन, हिमांशु ढिल्लों, रुद्रांक्ष पाटिल और दूसरे निशानेबाजों ने मेडल्स जीते. मैतेयी समुदाय से आने वाली मीराबाई चानू ने वेटलिफ्टिंग में सिल्वर मेडल हासिल किया. मणिपुर की नाओरेम रोशिबिना देवी, जो एक किसान परिवार से आती हैं, ने वुशु में सिल्वर जीता और सतनाम सिंह-सलमान खान की जोड़ी ने रोइंग के पुरुष डबल स्कल्स में ब्रॉन्ज हासिल किया.
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