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‘देखो बेटा, ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं आते... और तुम अपने पापा का स्वभाव भी अच्छी तरह जानते हो, उन्होंने अगर रिश्ते को मंजूरी दे दी है, तो बस अब उनकी बात टल नहीं सकती....’ संजीव की मां अपने इकलौते बेटे को समझाते हुए बोलीं.

‘मगर मां...’ संजीव झुंझलाया, ‘तुम समझती क्यों नहीं...? मैं निकहत को नहीं छोड़ सकता... वह मुझसे बहुत प्यार करती है....’

‘तो ठीक है, तू घर आ रही लक्ष्मी को ठुकरा दे... बंद कर दे अपने भाग्य के दरवाजे.... करोड़ों की जायदाद छोड़ दे, बंगला, गाड़ी, फार्म हाउस और इतना बड़ा लगा-लगाया बिजनेस जो तुझे मिलने वाला है, उसे भी छोड़ दे... न कर दे इस रिश्ते को... और हमें भी छोड़ दे....’ रजनीदेवी की आवाज में तेजी आ गयी, ‘हम दोनों बूढ़े-बुढ़िया सोच लेंगे कि हमारी कोई औलाद ही नहीं हुई...’ रजनीदेवी झटके से उठ खड़ी हुईं.

‘मां...’ संजीव ने बेचारगी से मां का हाथ थाम लिया.

रजनीदेवी ठिठक गयीं. उन्होंने एक नजर अपने लाडले बेटे की ओर देखा और फिर उसका सिर सहलाते हुए ममता भरे शब्दों में बोलीं, ‘मैं जानती हूं, तू अपने मां-बाप का दिल नहीं तोड़ेगा... और फिर ऐसा है ही क्या उस लड़की में, जो तू... और सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसी और धर्म की लड़की से तेरी शादी करा के हम अपनी बिरादरी में क्या मुंह दिखाएंगे... ये सोचा है तूने?’

‘मां, निकहत को सिर्फ मेरा ही सहारा है. मेरे सिवा उसका दुख-दर्द बांटने वाला कोई भी नहीं है, वो मुझसे बहुत प्यार करती है....’ संजीव मां को कुर्सी पर वापस बिठाते हुए अपने एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला.

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