अमृतसर में दशहरे के दिन शाम को जब रावण को जलाया जा रहा तभी आज के रावणरूपी लापरवाहों की लापरवाही ने कईयों की जिंदगी छिन ली. पंजाब के अमृतसर में जोड़ा रेल फाटक के पास रावण दहन देख रहे लोगों पर ट्रेन के चढ़ जाने से अब तक मिली जानकारी के अनुसार लगभग 70 से अधिक लोगों के मरने की खबर है, वहीं लगभग इतने ही लोग घायल हैं, जिनमें कईयों की हालत गंभीर है.

जानकारी के मुताबिक रेलवे ट्रैक के पास भारी भीड़ जमा होकर रावण दहन का कार्यक्रम देख रही थी. रावण जल रहा कि तभी अचानक उसका अधजला भाग टूटकर गिर गया. लोग डर कर इधरउधर भागने लगे और अचानक भगदङ मच गई. तभी अचानक ट्रेन आ गई और देखते ही देखते लोगों को अपनी चपेट में ले लिया. लोगों की भीड़ पर ट्रेन चढ़ गई जिससे 70 लोगों की मौत होने की अब तक खबर है. ट्रेन पठानकोट से अमृतसर आ रही थी.

वीभत्स नजारा

घटना में बड़ी संख्या में लोग बुरी तरह घायल भी हुए हैं जिससे मृतकों की संख्या बढ़ने का अंदेशा है. घटना इतना वीभत्स था कि कहीं किसी के हाथ तो कहीं किसी के पैर यहां वहां कटे पड़े थे.

इस वीभत्स और दिल दहला देने वाली घटना ने एक बार फिर धर्म का काला चेहरा उजागर कर दिया है, जहां जानें जाती हैं, लोग घायल होते हैं, सरकार मुआवजे का एलान करती है, 2-4 दिन दुख प्रकट किया जाता है और फिर सब शांत. पीछे रह जाता है दर्द, सूनापन और कभी न लौट कर आने वाले वे लोग जिनसे एकएक घर एकएक परिवार खुशहाल रहता था.

लोगों की जिंदगी पर भारी आयोजकों की कमाई

हर साल रावण जलाने के नाम पर आयोजकों की कमाई का जरीया बना यह रावण दहन न सिर्फ पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का काम करता है, बल्कि बिना सरकारी अनुमति के यहांवहां ऐसे आयोजन कईयों की जिंदगीमौत की वजह भी बनती है.

जिस जगह यह हादसा हुआ वहां इसकी अनुमति ली गई थी या नहीं यह तो जांच का विषय है पर दुखद तो यह है कि जब यहां रावण जलाया जा रहा था, उस वक्त 2 रेलगाड़ियों का एकसाथ अगलबगल से गुजरना रेलवे कर्मचारियों और अधिकारियों पर भी सवालिया निशान लगाता है कि क्या इतने बङे कार्यक्रम की जानकारी उन्हें नहीं थी?

मालूम हो कि सैकड़ों की संख्या में पहुंचे लोगों के बीच कई नेता भी थे जिन्हें बतौर चीफ गेस्ट बुलाया गया था.

कब रुकेगा यह सिलसिला

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इस क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू, जो पंजाब सरकार में मंत्री भी हैं, की पत्नी नवजोत कौर बतौर अतिथि शामिल थीं मगर घटना के तुरंत बाद वे वहां से निकल गईं, तब जब उनको घायलों को मदद करनी चाहिए थी.

आयोजकों की टोली भी जो लोगों को धर्म के नाम पर मंच पर खड़े होकर रावण को बुराई का प्रतीक बताते रहे वे भी धीरे-धीरे खिसक लिए और वहां रह गया मातम, चीखपुकार और साथ ही एक प्रश्नचिह्न भी कि आखिर कब तक लोगों की जिंदगियों से इस तरह खिलवाड़ चलता रहेगा?

जिम्मेदार कौन

रामरावण की कथा के अनुसार रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण सृष्टि के लिए विनाशक थे जिन्हें खत्म किया जाना जरूरी था. पर आज के रावणरूपी राक्षसों का क्या जो 3 साल की मासूम बच्चियों तक को हवस का शिकार  बना डालते हैं. धर्म अगर यह कहता है कि इनको जलाना बुराई पर अच्छाई की जीत है तो फिर आज की घटती घटनाओं पर धर्म और धर्म के तथाकथित ठेकेदार खामोश क्यों हैं? क्यों धर्म के ठेकेदार समाज में घट रही वीभत्स घटनाओं पर लामबंद हो इसकी मुखालफत नहीं करते? क्यों धर्म के नाम पर सिर्फ चढावा, पूजापाठ और पाखंड भर रह गया है?

जाहिर है, इससे धर्म के पंडितों और भक्तों की झोली नहीं भरेगी जो ऐसे आयोजनों के बंद होने से और भी बेहाल हो जाएंगे.

दूसरी ओर ऐसे हादसे बहुत कुछ अंधविश्वास और धर्मभीरू होने की वजह से भी होते हैं. रावण को जलते देखने से शारीरिक कष्ट दूर हो जाते, तो न फिर विज्ञान की जरूरत थी और न ही डाक्टरों की. रेल की बीच पटरियों पर खड़े होकर रावण को जलते देखना मौत को जानबूझकर गले लगाने जैसा ही है.

भीङ अधिक थी और रावण जल रहा था. तभी उसका अधजला आधा भाग अचानक गिर गया जिसकी वजह से मची भगदङ में लोग इधरउधर भागने लगे. लोग डर कर नही भागते तो इतना बङा हादसा नहीं होता.

धर्म का कुरूप चेहरा

अमृतसर हादसा भी धर्म का एक कुरूप चेहरा ही है, जिसने न जाने कितनों की न सिर्फ जिंदगी छीन ली, बल्कि कितनों का घर उजाङ दिया.

माफी तो उन्हें भी नहीं मिलनी चाहिए जिन्होंने सबकुछ होते देख लापरवाही बरती जिसका परिणाम रेलगाड़ी के रूप में मौत बनकर आया.

क्या समाज, सरकार, आयोजक, नौकरशाह और धर्म के तथाकथित गुरू इस दर्दनाक मौत की जिम्मेदारी लेंगे?

पिछले 10 सालों के हादसे

धार्मिक स्थलों पर पिछले 10 सालों में जितनी घटनाएं हुईं हैं वह रोंगटे खड़े करता है. इन घटनाओं में सैकड़ों जानें गई हैं :

*2006 को नैना देवी में भगदङ. 160 मरे 400 से अधिक घायल हुए.

*2008 को राजस्थान में जोधपुर के चामुंडा देवी मंदिर में भगदङ से 120 लोग मारे गए थे और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे. यह भगदङ नवरात्र के समय हुआ था.

*2010 को उत्तर प्रदेश के रामजानकी मंदिर में भगदङ से 63 लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.

*2011 को हरिद्वार में हर की पौङी पर भगदङ से 22 की जान गई थी और कई घायल हुए थे.

*2012 को बिहार के पटना में अदालत गंज में छठ पूजा के दौरान भगदङ से 20 लोगों की मौत हुई थी. दर्जनों लोग घायल हुए थे.

*2013 को मध्यप्रदेश के रत्नगढ मंदिर में भगदङ से 89 लोग मारे गए थे और 100 से अधिकलोग घायल हुए थे.

*2015 को झारखंड के बैद्यनाथ धाम में भगदङ से 11 की मौत हुई थी और 50 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.

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