किसी तरह की संवेदना प्रगट करने या श्रद्धांजलि देने से पहले उन लगभग दौ सौ श्रद्धालुओं को कोसा जाना बहुत जरूरी है जो ना जाने किस अज्ञात शक्ति या रक्षक कहे जाने वाले भगवान भरोसे रेल की पटरी पर खड़े जलते रावण की मौत का तमाशा देख रहे थे लेकिन खुद काल के गाल में समा गये. अपनी दुखद मौत के जिम्मेदार ये लोग खुद थे, किसी और के सर इस हादसे का ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता और अगर किसी के सर फोड़ा जा सकता है तो वह भगवान है जो खामोशी से अपने भक्तों की दर्दनाक मौत का तमाशा देखता रहा.

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