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राजनीतिक मेहनत

राजनीति में भी उसी तरह रातदिन मेहनत की जरूरत है जैसे किसी किराने की दुकान को सफल बनाने में होती है. राजनीति जागीरदारी नहीं होती जिस में पिछले पुरखों की कमाई पर मौजमस्ती या सिर्फ आराम किया जा सके.

शिवसेना के टूटने की भारी वजह में से एक है कि उद्धव ठाकरे का आलसीपन, जो न ज्यादा दौरों पर गए और शायद अपने मंत्रालय के दफ्तर में तो कभी गए ही नहीं. वे पिता की तरह आरामकुरसी पर बैठ कर राज करना चाह रहे थे. उन्हें एकनाथ शिंदे ने जता दिया कि यह जनता को तो दूर, विधायकों और सांसदों को संभालने के लिए भी काफी नहीं है. नतीजा सामने है.

मायावती भी एक ऐसा ही उदाहरण हैं जिन्होंने न केवल बहुजन समाज पार्टी को मरने दिया बल्कि दलितों के हकों के रास्तों को बेच खाया भी. वहां अब ऊंची जातियों की फर्राटेदार बड़ी गाडिय़ां दौड़ रही हैं.

कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, प्रजा समाजवादी पार्टी, अकाली दल और कुछ हद तक कांग्रेस का भी यही हाल है कि उन के आज के नए नेता सोच रहे हैं कि क्योंकि उन का इतिहास और नाम बड़ा है, इसलिए लोग अपनेआप उन की ओर आकर्षित होंगे.

आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, वाई एस रेड्डी की तेलगांना प्रजा समिति अगर जिंदा हैं और लगातार राज में हैं तो इसलिए कि इन के नेता हर समय जनता के बीच मौजूद दिखते हैं.

भारतीय जनता पार्टी की सफलता के पीछे भी यही कहानी है. पिछले 70-80 सालों से पौराणिक परंपरा को फिर से लागू करने के लिए लाखों पंडोंपुजारियों और उन के भक्तों व ऊंची जातियों की वर्णव्यवस्था के समर्थकों ने रातदिन मेहनत की. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सुबह ही शाखाएं लगाना अपनेआप में आसान नहीं है जिस के लिए लाखों लोगों को घरों से निकाल कर पास के बाग में जमा किया जाता है. राज आने पर भी यह काम बंद नहीं हुआ. हां, कम जरूर हो गया है क्योंकि जो लोग त्याग करने के लिए जमा किए जाते रहे हैं आज मंदिरों, आश्रमों, स्कूलों, पार्टी दफ्तरों, कांवड़ यात्राओं, रामनवमी यात्राओं, तीर्थयात्राओं, गौरक्षक दलों में राज करने का मजा ले रहे हैं.

राहुल गांधी कुछ दिन कुछ सक्रिय होते हैं और फिर कहीं छुट्टी पर चले जाते हैं. सोनिया, प्रियंका और राहुल कांग्रेस की जनता के बीच रहने की परंपरा को कुछ हद तक कायम रख रहे हैं पर पार्टी के दूसरे नेता घरों में बैठ कर सत्तासुख भोगने के आदी हो चुके हैं.

भारतीय जनता पार्टी रातदिन सोनिया और राहुल के पीछे इसीलिए पड़ी रहती है कि वह समझती है कि इन्होंने कैसे 1970 से सत्ता खो कर 1981 में पा ली, 1900 में खो कर 1991 में पा ली, 1996 में खो कर 2004 में फिर छीन ली.

आज भी राहुत गांधी को घेरने, सोनिया को ईडी में उलझाए रखने की वजह यह है कि भाजपाई सत्ताधारी इन से डरते हैं कि कहीं ये सरकार से नाराज जनता को अपने झंडे के नीचे जमा न कर लें.

भारतीय जनता पार्टी का हाल अब उस बाबरी मसजिद का सा है जो ऊंची खड़ी तो है पर उस के टिकने का भरोसा नहीं. केवल 2 जनों की मनमरजी से चल रही पार्टी में नए नेता पैदा नहीं हो रहे. ये दोनों जनता के बीच नहीं जा रहे पर इन के प्यादे लाखों की गिनती में इन का काम कर रहे हैं. जैसे बाबरी मसजिद मुसलिम भक्तों की सुरक्षा का भाव न बचा सकी, लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने धर्मभक्तों की आस्था को आर्थिक संकटों पूरी तरह निकाल नहीं पाएगी. भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में बहुत फर्क नहीं है जिन के नेताओं के दर्शन टीवी या मंच पर होते हैं, अपनों के बीच नहीं.

एरोल मस्क का स्पर्म चाहती हैं महिलाएं, सौतेली बेटी से था अफेयर

टेक्नोलौजी की दुनिया के अरबपति एलन मस्क के 76 वर्षीय इंजीनियर पिता एरोल मस्क सुर्खियों में तब आ गए, जब उन्होंने अपनी सौतेली बेटी के साथ अफेयर की बात कुबूलते हुए उस के दूसरे बच्चे का पिता होने की बात का खुलासा कर दिया. फिर तो उन के स्पर्म की मांग की झड़ी के साथसाथ डिजाइनर बेबी की भी चर्चा गर्म हो गई.

एलन मस्क अरबपति दुनिया का वह नाम है, जो हमेशा टेक्नोलौजी और साइंस जगत में नए प्रयोग करने की वजह से चर्चा में बने रहते हैं. कुल 9 बच्चों के पिता एलन मस्क की पर्सनल लाइफ भी सुर्खियां बटोरने में कुछ कम नहीं है, कारण उन की एक संतान ट्रांसजेंडर है.

पिछले दिनों उन की चर्चा उन के इंजीनियर पिता 76 वर्षीय एरोल मस्क को ले कर हुई, जिन से वह नफरत करते हैं. नफरत ऐसी कि उन्हें एलन ने यहां तक कह दिया था, ‘‘मेरे पिता शैतान हैं.’’  कारण उन के अफेयर सौतेली बेटी से रहे हैं. यह बात एलन ने तब कही थी, जब उन्हें पता चला कि पिता एरोल मस्क ही उस की सौतेली बहन जाना के बच्चों के पिता हैं. हालांकि इस बारे में जब उस के बच्चों की शक्ल पिता एरोल और उस से मिलतीजुलती नजर आई, तभी उन्हें संदेह हो गया था. किंतु इस बारे में कुछ भी कहने से कतराते रहे थे.

लेकिन एक दिन उन्होंने इस का खुलासा करते हुए ब्रिटिश वेबसाइट ‘द सन’ को एक इंटरव्यू में कहा था कि 3 साल पहले सौतेली बेटी जाना से जन्मी बेटी अनप्लांड थी. इस से पहले भी वह एक बेटे को जन्म दे चुकी है. इसी के साथ एरोल ने स्वीकारा कि वह अपनी सौतेली बेटी जाना बेजुइडेनहाट के बेटे और बेटी के पिता हैं. इस तरह दोनों बच्चे टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क के भाईबहन ही हुए.

यही नहीं एरोल ने चौंकाने वाली एक बात और कही कि हम धरती पर केवल एक चीज बच्चे पैदा करने के लिए ही आए हैं. उन का यह कहना था कि संभ्रांत महिलाएं उन के स्पर्म की मांग कर बैठीं. उन में भारत की महिलाएं भी शामिल हैं.

उन महिलाओं को लगता है कि एरोल के स्पर्म से पैदा होने वाला बच्चा एक डिजाइर बेबी होगा, जो जितना स्वस्थ और बुद्धिमान होगा, उतना ही वह धनवान भी होगा. आने वाले दिनों में उस में एलन मस्क जैसे गुण विकसित होने में कोई कमी नहीं रहेगी.

यह तो आने वाले वक्त की बात होगी, जिस का अनुमान लगाया जा रहा है. किंतु अपनी दूसरी पत्नी हीड के परिवार के साथ दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया में रह रहे एरोल मस्क को जब अपने बेटे एलन मस्क की नाराजगी के बारे में मालूम हुआ, तब उन्होंने अपनी मजबूरी दर्शाते हुए अपना दर्द कुछ इस तरह से बयां किया—

‘‘मैं इसे एक गलती नहीं कहूंगा, क्योंकि कोई भी बच्चा यह नहीं सुनना चाहेगा कि वो एक गलती से पैदा हुआ. आप को समझना होगा कि मैं 20 साल से अकेला था. आखिर मैं भी आदमी हूं, जो गलतियां करता है.’’

हीड की बेटी ही 3 साल पहले एरोल के बच्चे की मां बनी थी, जिसे छिपा कर रखा गया था. एलन के पिता एरोल मस्क साउथ अफ्रीका में इंजीनियर हैं. उन के मुताबिक दूसरा बच्चा भी अनप्लांड था, लेकिन उस के पैदा होने के बाद से ही वह 35 साल की जाना के साथ रह रहे हैं.

उन के उस सीक्रेट बेबी का जन्म 2018 में हुआ था. तब जाना ने अपने 10 महीने के बच्चे के साथ सितंबर 2018 में फेसबुक पर अपनी फोटो शेयर की थी. उस की शक्ल बिलकुल एलन मस्क से मिलती थी. इसे ले कर लोगों को संदेह हुआ, किंतु लोगों ने उन के रुतबे की वजह से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई थी.

एलन मस्क की सौतेली बहन जाना बेजुइडेनहाट की उम्र महज 4 साल थी, जब एरोल मस्क ने पहली पत्नी मेय हेल्डमेन से शादी तोड़ कर जाना की मां हीड बेजुइडेनहाट से दूसरी शादी की थी. उस वक्त हीड 25 साल की थी और एरोल 45 वर्ष के थे. एरोल और मेय हेल्डमेन के 3 बच्चे एलन, टोस्का और किंबल हैं. एरोल और हीड से भी 2 बच्चे हैं एलेक्जेंड्रा एली और एशा रोज मस्क.

यह जानते हुए कि जाना हीड के पहले पति की बेटी हैं, एरोल ने उस के साथ अफेयर किया. नतीजा साल 2017 में एरोल के बेटे इलियट रश मस्क का जन्म हुआ. उस के बाद 2018 में बेटी का जन्म हुआ.

एलन को अपने पिता की करतूत की जानकारी पहली बार 2017 में ही तब हो गई थी, जब मालूम हुआ था कि अविवाहित जाना पिता एरोल के बच्चे की ही मां बनने वाली हैं.

उस के बाद से ही एलन के संबंध अपने पिता से बिगड़ गए थे, जबकि एरोल की दूसरी पत्नी हीड बेजुइडेनहाट ने बच्चे के जन्म के बाद भी उस के पिता की पहचान छिपा ली थी. उन्हें डर था कि इस खबर के सामने आते ही उन के परिवार में सभी रिश्तों के हालात बिगड़ जाएंगे.

फिर भी एरोल के संबंध सौतेली बेटी के साथ बने रहे. साथ ही उन्होंने 2018 में दिए एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि जाना का बच्चा एक गलती का परिणाम था. यह तब हुआ जब उस के बौयफ्रैंड ने उसे घर से निकाल दिया था और वह एरोल के घर रुकने आ गई थी.

उन्हीं दिनों एलन ने भी एक इंटरव्यू में अपने पिता से रिश्तों और सौतेले भाई के जन्म पर बात की थी. तब एलन ने कहा था, ‘‘वह इतने भयानक इंसान हैं, आप को पता नहीं है. मेरे पिता के पास वह करने का पूरा प्लान रहा होगा. वह आगे भी घिनौनी प्लानिंग करेंगे. लगभग हर अपराध जिस के बारे में आप सोच सकते हैं, उन्होंने किया है. लगभग हर बुराई जो आप सोच सकते हैं, उन्होंने की है. यह सच इतना भयानक है कि आप इस पर विश्वास नहीं कर सकते.’’

इस नाराजगी को खत्म करने के लिए एरोल मस्क ने पहल की और उन्होंने चौंकाने वाला खुलासा कर दिया.

इस बात को लंबे समय तक गुप्त रखने के बाद अचानक क्या हो गया, जो एरोल ने अपनी गलती कुबूल ली? इस बारे में जब उन से पूछा तो उन्होंने बड़े ही अलग अंदाज में बताया कि इस धरती पर हम इंसान प्रजनन के लिए ही हैं.

साथ ही स्वीकार किया कि बच्चे को उस के पिता का नाम देना भी जरूरी था. वैसे उन का यह भी कहना था कि उन्होंने कभी बेटी का डीएनए चैक नहीं किया, लेकिन वह बिलकुल मेरी दूसरी बेटियों रोज और टोस्का की तरह ही दिखती है.

इस विवाद के बाद एरोल अपने स्पर्म के कारण भी चर्चा आ गए हैं. कारण, कई संभ्रांत महिलाएं चाहती हैं कि वह एरोल के स्पर्म से गर्भवती हों, ताकि उन का प्रभावशाली बच्चा पैदा हो.

इसे ले कर कोलंबिया की एक कंपनी ने उन से संपर्क किया है. कंपनी के माध्यम से उच्च श्रेणी की महिलाएं चाहती हैं कि एरोल मस्क के स्पर्म से अगली पीढ़ी का एलन मस्क पैदा हो सके.

इस पेशकश पर एरोल का कहना है कि यदि ऐसा हुआ तो वह इस का कोई पैसा नहीं लेंगे. यह उन का एक दान होगा. उन्हें बदले में सिर्फ अन्य सुविधाएं मिलनी चाहिए, जैसे प्रथम श्रेणी की यात्रा और पांच सितारा आवास.

यह कहना गलत नहीं होगा कि एरोल के स्पर्म की बदौलत डिजाइनर बेबी पैदा करने की ललक फिर से पैदा हो गई है.

आईवीएफ तकनीक से न केवल जरूरत के मुताबिक बच्चे पैदा करने की सहूलियत मिल गई है, बल्कि भविष्य में बच्चे के लिए स्पर्म को सुरक्षित रखना भी संभव है. इस के लिए स्पर्म डोनर से सुविधाएं ली जाती हैं.

जब कपल बच्चे की चाहत में आईवीएफ क्लीनिक जाते हैं तो डाक्टर से कई तरह की डिमांड  करते हैं. इस के पीछे का उद्देश्य डिजाइनर बेबी ही होता है.

डिजाइनर बेबी वह बच्चा होता है, जिस के जींस में बदलाव किए जाते हैं. इसे जींस का मेकअप भी कहा जा सकता है. कपल्स की डिमांड के मुताबिक बच्चे को आंखों, बालों का रंग, लंबाई, स्किन कलर और गुण दिए जाते हैं.

यह काम इन विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ तकनीक के जरिए किया जाता है. हालांकि कई देशों में यह काम गैरकानूनी है. आईवीएफ स्पैशलिस्ट डाक्टर के सामने अधिकतर कपल इस तरह की मांग रखते जरूर हैं, लेकिन भारत में आईवीएफ टेक्नोलौजी इतनी एडवांस नहीं हुई है. आईवीएफ टेक्नोलौजी का मकसद हेल्दी बेबी पैदा करना है.

भारत, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जरमनी और स्विटजरलैंड समेत 40 देशों में इनहैबिटेबल जेनेटिक मोडिफिकेशन तकनीक पर रोक है. बच्चे का लुक एग-स्पर्म पर निर्भर करता है. उस के गुण और ब्लड ग्रुप जींस पर. लेकिन आईक्यू उस की परवरिश और आसपास के माहौल पर निर्भर करती है.

शरीर में कुछ जींस प्रभावकारी होते हैं, जिन से बच्चे की लंबाई और आंखों का रंग प्रभावित होता है. यही कारण है कि स्पर्म डोनर की मांग उसी के अनुरूप होती है. आंखों का रंग हरा, काला, भूरा, नीला तभी होता है जब बच्चे के मम्मीपापा या दादीदादा की आंखों का रंग ऐसा हो.

भारत में एआरटी बैंक (एसिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलौजी क्लिनिक) से स्पर्म और एग आते हैं. उन के डोनर की पहचान गुप्त रखी जाती है. पुरुषों के लिए स्पर्म डोनर बनना आसान है, लेकिन महिलाओं को एग डोनर बनने के लिए पूरी आईवीएफ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इस में सर्जरी की जाती है.

इंडियन मैडिकल काउंसिल औफ रिसर्च की गाइडलाइंस के अनुसार डोनर की उम्र 21 से 40 साल के बीच होनी चाहिए. लेकिन महिलाएं एरोल मस्क के स्पर्म के लिए बेकरार हुई जा रही हैं लेकिन वे उन की उम्र को नहीं देख रहीं कि वह 76 साल के हो चुके हैं.

Manohar Kahaniya: सरपंच न बनने पर बना जल्लाद

सोमवार 6 दिसंबर, 2021 का दिन था. कड़कड़ाती ठंड छत्तीसगढ़ की हवाओं को सर्द बनाए हुए थी.  शाम के लगभग 7 बज रहे थे. इंजीनियर शिवांग चंद्राकर अपने फार्महाउस से धीमी गति से बाइक चलाते हुए अपने घर मरौदा की ओर जा रहा था. तभी उस ने देखा कि कोई उसे हाथ दे रहा है, सामने अशोक खड़ा था. उसे देख कर शिवांग ने बाइक रोक दी.

शिवांग अशोक देशमुख को अच्छी तरह जानता था, जिसे वह अच्छी तरह जानता था. अशोक ने शिवांग चंद्राकर ने कहा, ‘‘भाई, मेरी बाइक खराब हो गई है. क्या तुम मुझे लिफ्ट दे सकते हो?’’

शिवांग चंद्राकर जानता था कि अशोक  गांव का नामचीन व्यक्ति है, उस की उस से कभी नहीं बनी. मगर इंसानियत भी कोई चीज होती है, यह सोच कर उस ने मुसकरा कर  कहा, ‘‘हांहां क्यों नहीं भाई, आओ बैठो बताओ कहां चलना है.’’

यह सुनना था कि अशोक देशमुख उछल कर शिवांग की बाइक पर बैठ गया.

अशोक ने शिवांग के कंधे पर हाथ रखा तो उसे महसूस हुआ मानो उस के हाथ में कोई कठोर चीज है. शिवांग को जाने क्यों महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ है, मगर अब वह क्या कर सकता था. चुपचाप बाइक चला रहा था, देखा सामने 2 लोग और खड़े मिले. वह भी उसे रुकने के लिए इशारा कर रहे थे.

उन्हें देख कर के शिवांग ने बाइक की गति तेज कर दी. मगर अशोक ने कंधे पर थपथपा कर कहा, ‘‘नहींनहीं, रुको.’’

मजबूर शिवांग ने बाइक रोकी. वही दोनों लोग उस के पास आ गए जो हाथ के इशारे से बाइक रुकवा रहे थे. शिवांग उन्हें थोड़ाथोड़ा जानता था.

तभी अशोक देशमुख ने शिवांग को कस कर पीछे से जकड़ लिया. शिवांग को महसूस हुआ मानो वह किसी बड़े खतरे में फंस चुका है. थोड़ी ही देर में उस के मस्तिष्क में अशोक देशमुख के साथ सारे विवाद घूमने लगे. उस ने अशोक के चंगुल से छूटने की कोशिश की. लेकिन उस ने पूरी ताकत से उसे जकड़ रखा था इसलिए छूट नहीं सका.

इसी बीच सामने खड़े दोनों व्यक्तियों ने आगे बढ़ कर उसे पकड़ा. उन में से एक ने उस के गले में नायलोन की रस्सी डाल कर कस दी. थोड़ी ही देर में दम घुटने से शिवांग की मौत हो गई.

इस के बाद अशोक देशमुख ने अपने साथियों के साथ मिल कर शिवांग के हाथ और पैर पकड़ कर लाश झाडि़यों के पास डाल दी. फिर अशोक अपने साथियों से बोला, ‘‘तुम लोग यहां रुको, मैं अभी कार ले कर आता हूं.’’

उस के दोनों साथियों में एक बसंत साहू था और दूसरा विक्की उर्फ मोनू देशमुख.

इस पर बसंत साहू ने कहा, ‘‘भैया जल्दी आना, यहां लोग आतेजाते रहते हैं किसी को भी शक हो सकता है.’’

‘‘हां, मैं जल्द ही कार ले कर आता हूं.’’

अशोक तेजी से चला गया. थोड़ी ही देर में अपनी कार ले कर के वहां आ गया और तीनों ने मिल कर शिवांग चंद्राकर के शव को कार की डिक्की में डाल दिया.

अशोक देशमुख कार चलाते हुए झरझरा में हरीश पटेल की खाली पड़ी जमीन पर ले गया. वहां हार्वेस्टर चलने से गड््ढे बने हुए थे. एक गड्ढे में शिवांग की लाश जलाने की व्यवस्था उन्होंने पहले ही कर रखी थी.

वहीं दोनों अन्य आरोपी अपनी मोटर बाइक से आ गए. फिर तीनों ने मिल कर मिट्टी का तेल डाल कर शिवांग चंद्राकर के शव में आग लगा दी.

दिसंबर का महीना था. लोग भीषण ठंड के कारण अपनेअपने घरों में दुबके हुए थे. कहीं ऐसे में लोगों को आग जलती हुई दिखती है तो दूसरे लोग यही समझते हैं कि ठंड दूर करने के लिए किसी ने अलाव जला रखा है.

यही वजह थी कि जब ये लोग शिवांग के शव को जला रहे थे तो लोगों ने कोई शक नहीं किया. जब आग बुझी तो शिवांग का शव आधा जल चुका था. तब वह उसे मिट्टी से ढक कर अपनेअपने घर चले गए.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का चंदखुरी गांव अपनी खेतीकिसानी के कारण जिले भर में प्रसिद्ध है. लगभग 3 हजार की जनसंख्या का यह हरित अनुपम गांव शहर से लगा हुआ है. यहां के धनाढ्य लोगों को दाऊजी कह कर सम्मान के साथ संबोधित किया जाता है. अधिकांश लोगों का जीवनयापन खेतीकिसानी और शहर में नौकरी से गुजरबसर करना होता है.

31 वर्षीय अशोक देशमुख गांव की राजनीति करते हुए खेतीकिसानी करता था. हाल ही में हुए ग्राम पंचायत चुनाव में वह सरपंच का चुनाव चंद मतों से हार गया था. जिस का दोषी वह शिवांग चंद्राकर और उस के परिवार को ही मानता था. यही कारण था कि अशोक शिवांग से बदला लेने का मौका ढूंढ रहा था.

उस ने गांव के ही रहने वाले अपने खास दोस्त विक्की उर्फ मोनू देशमुख (20 वर्ष) और बसंत साहू (उम्र 24 वर्ष) जोकि गांव चंद्रपुरी में ही रहते थे, से एक दिन मौका देख कर बात की.

‘‘यार मोनू, आज मैं सरपंच होता, मेरी गांव में अच्छीखासी चलती. दो पैसे कमाता, तुम लोगों को भी हमेशा खिलातापिलाता, मगर एक आदमी की वजह से पूरा प्लान धरा का धरा रह गया.’’

इस पर मोनू और बसंत साहू ने उस की ओर देखा तो मोनू ने कहा, ‘‘भैया, मैं जानता हूं लेकिन अब क्या किया जा सकता है. चुनाव में इस ने तो आप का बैंड बजा दिया.’’

यह सुन कर के अशोक ने कहा, ‘‘अगर तुम लोग मेरे सच्चे दोस्त हो तो मेरा साथ दो, मैं इस को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि जिंदगी में कभी हमारा कोई विरोध नहीं करेगा.’’

‘‘क्याक्या करना होगा, बताओ.’’

इस पर विक्की उर्फ मोनू ने गुस्से से भर कर  कहा, ‘‘शिवांग के बड़े भाई धर्मेश ने मुझे थप्पड़ मारा था, इसलिए मैं भी इन से बदला लेना चाहता हूं. मैं तुम्हारे साथ हूं. शिवांग इंजीनियर क्या बन गया है, इस के घर के लोग अपने आप को बड़ा आदमी समझने लगे हैं.’’

यह सुन कर अशोक खुश होते हुए बोला, ‘‘बस, मेरे दोस्त, तुम ने मेरा दिल जीत लिया. मैं एक योजना बनाता हूं और इस को सबक सिखाते हैं.’’

इस पर बसंत साहू  ने कहा, ‘‘हां, क्या है आखिर तुम्हारी योजना, भाई. बताओ?’’

‘‘यह बात है तो सुनो. मेरे दिमाग में बहुत दिनों से एक कीड़ा कुलबुला रहा है. सरपंच चुनाव में तो हार गया हूं. मगर इन से हम 25-50 लाख रुपए वसूल सकते हैं. इस से तुम दोनों की भी जिंदगी बन जाएगी. फिर जिंदगी भर ऐश करोगे.’’

यह सुन कर के दोनों खुशी से उछल पड़े और एक साथ बोले, ‘‘ऐसा है तो हम तुम्हारे साथ हैं जब जैसा कहोगे वैसा करेंगे.’’

7 दिसंबर, 2021 सुबह लगभग 11 बज रहे थे कि थाना पुलगांव के टीआई नरेश पटेल के पास 2 लोग आए.

उन में से एक ने थानाप्रभारी से कहा, ‘‘साहब, मैं दीपराज चंद्राकर हूं और गांव चंदखुरी से आया हूं. मेरा भांजा शिवांग चंद्राकर कल शाम से लापता है उस का कोई पता नहीं चल रहा है.’’

यह कहते दीपराज रोआंसा हो गया. उस की आंखें भर आई थीं.

थानाप्रभारी नरेश पटेल मामले की गंभीरता को समझ कर उन्हें भरोसा दिलाते हुए बोले, ‘‘तुम लोग चिंता मत करो, हम पूरी मदद करेंगे. तुम अभी गुमशुदगी दर्ज करवाओ.’’

इस के बाद दीपराज ने शिवांग चंद्राकर की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के पुलिस ने अपने स्तर से इंजीनियर शिवांग को ढूंढना शुरू कर दिया.

एक हफ्ता बीत गया था. शिवांग चंद्राकर का कहीं कोई पता नहीं चल रहा था. रिश्तेदारों के यहां मातापिता ने पता किया, मगर शिवांग की कोई जानकारी नहीं मिल रही थी.

धीरेधीरे लोगों में आक्रोश पैदा हो रहा था कि पुलिस शिवांग को आखिर क्यों नहीं ढूंढ पा रही है. मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचा. जब स्थिति बिगड़ने लगी तो पुलिस के आईजी ओ.पी. पाल के निर्देश पर एसएसपी ने केस को गंभीरता से लिया. इस के अलावा उस के पैंफ्लेट छपवा कर बताने वाले को 10 हजार रुपए का ईनाम देने की घोषणा की.

टीम में थानाप्रभारी नरेश पटेल, गौरव तिवारी, एसआई डुलेश्वर सिंह चंद्रवंशी, एएसआई राधेलाल वर्मा, नरेंद्र सिंह राजपूत, समीत मिश्रा, अजय सिंह, हैडकांस्टेबल संतोष मिश्रा, कांस्टेबल जावेद खान, प्रदीप सिंह, जगजीत सिंह, धीरेंद्र यादव, चित्रसेन, केशव साहू, लव पांडे, अलाउद्दीन, हीरामन, तिलेश्वर राठौर को शामिल किया गया.

इस सब के बावजूद पुलिस को शिवांग चंद्राकर की गुमशुदगी के बारे में कहीं कोई सुराग नहीं मिल रहा था और पुलिस हाथ पर हाथ धरे मानो बैठी हुई थी कि 5 जनवरी, 2022 को शिवांग चंद्राकर के बड़े भाई धर्मेश चंद्राकर ने थानाप्रभारी को सनसनीखेज जानकारी दी.

धर्मेश ने बताया, ‘‘सर, झरझरी कैनाल रोड के पास एक खेत में एक कंकाल और हड्डियां मिली हैं, टाइमैक्स घड़ी मिली है, जले हुए कपड़े हैं, देख कर लगता है कि यह शिवांग के ही होंगे.’’

थानाप्रभारी नरेश पटेल ने यह जानकारी उच्चाधिकारियों को दी. इस के बाद पुलिस अधिकारी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां खुदाई कर के अस्थियां और एक मानव मुंड बरामद किया. फोरैंसिक विशेषज्ञ मोहन पटेल ने सूक्ष्मता से जांच शुरू की.

कंकाल और जले हुए कपड़ों व बालों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता था कि यह आखिर किस का शव है.

शिवांग चंद्राकर का पूरा परिवार चिंतित था और लोगों द्वारा यह कयास लगाया जा रहा था कि यह शिवांग का कंकाल और अवशेष हो सकता है.

नरेश पटेल ने उच्चाधिकारियों को जानकारियां दे कर अवशेष की जांच डीएनए हेतु रायपुर भेजने की काररवाई शुरू कर दी.

इस के साथ ही जिले भर में यह चर्चा होने लगी कि 6 दिसंबर को लापता हुए शिवांग चंद्राकर की जब कोई जानकारी नहीं मिल रही है तो जरूर 5 जनवरी को मिले हुए कंकाल से उस का संबंध हो सकता है.

इस संदर्भ में स्थानीय समाचार पत्रों में भी इसी तरह की खबरें प्रकाशित हो रही थीं. और जब डीएनए जांच रिपोर्ट सामने आई तो यह स्पष्ट हो गया कि वह अस्थियां शिवांग की ही हैं.

पुलिस के सामने अब इस केस को खोलने की चुनौती थी. इस के लिए 5 जांच टीमें बनाई गईं और आईजी ओ.पी. पाल और एसएसपी बद्रीनारायण मीणा ने पुलिस टीमों के साथ मीटिंग करने के बाद दिशानिर्देश दिए.

पुलिस ने इस केस में करीब 500 लोगों से पूछताछ की. पुलिस ने जोरशोर से विवेचना प्रारंभ कर दी.

पुलिस ने इसी दरमियान छत्तीसगढ़ के चंद्रखुरी गांव के रहने वाले अशोक देशमुख से भी पूछताछ की. पुलिस को पता चला था कि सरपंच के चुनाव में अशोक की शिवांग से खटपट हुई थी. लेकिन अशोक खुद को बेकुसूर बताता रहा.

पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स की जांच की तो पाया कि उस दिन वह अपने घर में ही था. ऐसे में वह पुलिस की जांच से बाहर हो गया था.

इसी दरमियान एक दिन दूसरे संदिग्ध आरोपी विक्की उर्फ मोनू देशमुख से जब पूछताछ चल रही थी तो वह टूट गया. उस ने पुलिस को बताया कि शिवांग चंद्राकर की हत्या उस ने अशोक देशमुख  और बसंत साहू के साथ मिल कर की थी.

पुलिस को उस ने अपने बयान में बताया कि शिवांग चंद्राकर के भाई धर्मेश ने एक विवाद में उसे थप्पड़ जड़ दिया था. जिस का बदला लेने के लिए वह अशोक देशमुख के साथ इस हत्याकांड में शामिल हो गया था.

उस ने अपने इकबालिया बयान में यह भी बता दिया कि अशोक देशमुख पिछला पंचायत पंच चुनाव हारने के कारण शिवांग चंद्राकर से बदला लेना चाहता था और उस से 30 लाख रुपए  फिरौती की योजना बनाई थी.

मगर पुलिस की सक्रियता और गांव का सख्त माहौल देखते हुए उन लोगों ने फिरौती की योजना को दरकिनार कर के मौन रहना ही उचित समझा था.

यह जानकारी मिलने के बाद तत्परता दिखाते हुए टीआई नरेश पटेल की टीम ने उसी रात अशोक देशमुख और विक्की चंद्राकर को हिरासत में ले लिया और जब इन दोनों से पूछताछ की तो दोनों ही पुलिस जांच के सामने टूट गए और सब कुछ सचसच बयां कर दिया.

अशोक देशमुख ने बताया कि पंचायत चुनाव में वह सरपंच का चुनाव लड़ रहा था. मगर शिवांग देशमुख के पिता राजेंद्र देशमुख के कारण वह चुनाव हार गया था.

इस के साथ ही रेगहा में स्थित 15 एकड़ के कृषि फार्महाउस का विवाद भी इस का एक कारण था, जिसे राजेंद्र चंद्राकर ने उस से हथिया लिया था.

यहां एक रोचक बात यह भी सामने आई कि जांच में यह पाया गया कि अशोक देशमुख घर पर ही था तो फिर अब कैसे हत्यारा हो गया. पुलिस ने उस की पत्नी रजनी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि पति घर पर ही था. मोबाइल में 7 मिस काल दिखाई दे रही थीं.

अब सवाल यह था कि आखिर जब अशोक घर पर था तो पत्नी ने काल क्यों किया था और अशोक ने काल रिसीव क्यों नहीं कीं.

अशोक ने इस संदर्भ में खुलासा करते हुए बताया कि शिवांग चंद्राकर की हत्या के लिए उस ने लंबे समय तक एक योजना बनाई थी कि किस तरह हम हत्या के इस केस से बच सकते हैं और फिरौती भी हासिल कर सकते हैं?

इसी तारतम्य में यह सोचीसमझी योजना बनाई गई थी कि हत्या के दिन मोबाइल को घर में रखना है. ताकि कभी पुलिस वेरिफिकेशन हो तो एक नजर में यह माना जाए कि वह तो घर पर ही था. फिर भला हत्या कैसे कर सकता है.

इस तरह आरोपियों ने इंजीनियर शिवांग की बाइक पर लिफ्ट ले कर एकांत में गला घोट कर हत्या कर दी थी.

जांच के बाद पुलिस ने हत्याकांड में प्रयुक्त कार, मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. गला घोटने में प्रयुक्त हुई नायलौन की रस्सी भी आरोपियों की निशानदेही पर बरामद कर ली.

तीनों आरोपियों अशोक देशमुख पुत्र रामनारायण देशमुख, विक्की उर्फ मोनू देशमुख और बसंत साहू को भादंवि की धारा 364, 365, 201, 120बी और 302 के तहत मामला दर्ज कर के 10 फरवरी, 2022 को गिरफ्तार कर लिया और अगले दिन 11 फरवरी को उन्हें मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, दुर्ग, छत्तीसगढ़ के समक्ष पेश किया.

जहां मामले की गंभीरता को देखते हुए मजिस्ट्रैट ने तीनों आरोपियों को जेल भेजने का आदेश जारी कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों और चर्चा पर आधारित

Anupamaa से होगी काव्या की छुट्टी? देखें Video

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में इन दिनों खूब धमाल हो रहा है. ये सीरियल लगातार टीआरपी लिस्ट में भी टॉप पर बना हुआ है. इसी बीच काव्या यानी मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) को लेकर एक पोस्ट सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोर रही है. सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, जिसे फैंस देख कन्फ्यूज हो गये हैं कि मदालसा शर्मा ‘अनुपमा’ छोड़ रही हैं या नहीं?  आइए बताते हैं, क्या पूरा मामला…

दरअसल इस वीडियो में मदालसा शर्मा ‘जाती हूं मैं’ गाना गाती नजर आईं, जिसपर सुधांशु पांडे ने कहा, अरे तू जा रे.. इस बात पर ही दोनों झगड़ा करने लगे.  काव्या ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है कि ‘जाते-जाते किसी को ‘जा रे’ कहने से उसकी ईगो हर्ट हो सकती है और वो आपके ऊपर जानलेवा प्रहार कर सकता है.

 

सीरियल ‘अनुपमा’ की बात करे तो शो में इन दिनों दिखाया गया कि तोषू अचानक हॉस्पिटल आ जाता है, जिसे देखकर किंजल और बाकी परिवार तो खुश हो जाता है, लेकिन राखी दवे का खून खौल जाता है. वह अनुपमा से बातें बताने की कोशिश करती हैं, लेकिन कुछ भी नहीं कह पाती हैं.

 

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शो में आप देखेंगे कि अनुपमा किंजल के चक्कर में अपने पति अनुज और छोटी अनु को भूल जाती है तो दूसरी ओर अनुज उससे कहता है कि अगर उसका मन हो तो वह वहां पर रुक सकती है. अनुज इसके अलावा भी अनुपमा से कुछ कहने की कोशिश करता है, लेकिन तभी वहां तोषू आ जाता है, जिससे अनुपमा अपने पति का फोन काट देती है.

 

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शो में ये भी दिखाया जाएघा कि राखी दवे तोषू को अपने साथ अकेले लेकर जाती हैं और उससे पूछती हैं कि वह होटल में किसी लड़की के साथ क्या कर रहा था. इस बात पर तोषू बहाने बनाने लगता है. वह राखी दवे से कहता है कि लड़की के साथ उसका कोई भी इमोशनल अटैचमेंट नहीं है.

 

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राखी दवे तोषु की तुलना वनराज से करती है और कहती है कि तुम्हारी रगों में तो वनराज शाह का खून बह रहा है जो उसने अपनी बीवी के साथ किया वो तू अपनी बीवी के साथ कर रहा है. लेकिन मैं अपनी बेटी को अनुपमा नहीं बनने दूंगी.

द्रौपदी मुर्मू का चयन

भारत में राष्ट्रपति केवल संवैधानिक प्रतीक है कि वह शासक है. सरकार उसी के नाम पर चलती है और 1950 से ही राष्ट्रपति के पास न्यायालय के अधिकार रहे है. भारत में अब तक ऐसा मौका नहीं आया जब राष्ट्रपति को शासन की असली बागडोर संभालनी हो. इसलिए द्रौपदी मुर्मू के निर्वाचन को किसी लोकतांत्रिक क्रांति का नाम देना गलत ही होगा.

भारतीय जनता पार्टी के नेता दौपदी मुर्मू के सफल चुनाव पर जो कसीदे पढ़ रहे हैं असल में नरेंद्र मोदी का मुंह देख कर उसी धुन पर बांसुरी बजा रहे हैं. द्रौपदी मुर्मू जैसी कोई आदिवासी महिला नेता बिना किसी बड़ी पार्टी के सहयोग से अगर किसी राज्य की मुख्यमंत्री भी बनती तो एक छोटीमोटी क्रांति कहा जा सकता था जैसा मायावती, जयललिता या ममता बनर्जी ने कर दिखाया.

भारतीय समाज प्रतीकों में बहुत विश्वास करता है और इतना करता है कि प्रतीक की मौजूदगी को वास्तव में ठोस मानने लगता है. चमत्कारों में विश्वास पैदा करना हर धर्म का मुख्य हथकंडा है पर जब इसे राष्ट्रीय राजनीति में ले आया जाए तो इस का खोखलापन स्पष्ट हो जाता है.

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रपति मनोनीत द्रौपदी मुर्मू और कांग्रेस की मनोनीत प्रतिभा पाटिल में कोई खास फर्क नहीं है. दोनों योग्यता और सौभाग के कारण बहुमत के मतों वाली पार्टी की देन हैं पर न प्रतिभा पाटिल से आशा थी कि वे देश को बदलेंगी न द्रौपदी मुर्मू से की जानी चाहिए. हां, कोई अप्रत्याशित घटना घट जाए और यूक्रेन के ऐक्टर कौमेडियन वोलोदोमीर जेलेंस्की की तरह संकट के दौरान देश का नेतृत्व करने का मौका मिल जाए, तो बात दूसरी होगी.

आदिवासियों महिलाओं को तो छोडि़ए, अभी तो स्वर्ण महिलाओं की इस समाज में पूछ नहीं है. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बने रहने के दौरान ऐसा कुछ नहीं हुआ कि कहा जा सके कि देश में औरतों के लिए कोई बदलाव आया. वर्ष 2004 से 2014 तक सोनिया गांधी की राजनीति पर पूरी पकड़ रही पर वे भी औरतों को सवर्ण या असवर्ण भेदभाव, परंपराओं, संकीर्णता के गहरे गढ़े से नहीं निकाल पाईं.

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना इतना सुखद है कि यह प्रतीकात्मक पद भी ऊंचे घर से संबधित हस्ती को नहीं दिया गया. द्रौपदी मुर्मू को निर्वाचन के लिए बधाई और यह आशा की जाए कि कम से कम वे अब वंचितों की सुनेंगी तो सही.

मेरी गर्लफ्रेंड शादी नहीं करना चाहती है, क्या करूं?

सवाल

मैं 26 वर्षीय युवक हूं. 3 महीने पहले मेरी अपनी 5 साल पुरानी गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो गया. उस का और मेरा रिश्ता आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि उस के घर वाले किसी और से उस की शादी करवा रहे हैं और घर वालों के खिलाफ वह जाना नहीं चाहती. उस ने कहा कि मेरी ऐसी नौकरी भी नहीं है कि वह मेरे साथ रहने का कोई बोल्ड स्टैप उठा ले.

पहले मु?ो इस से ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, सोचा कि अगर उसे मेरी फिक्र नहीं तो मैं क्यों उस की फिक्र करूं. मैं न रोया, न भावुक हुआ, बल्कि गुस्से में लगा कि जो हुआ सही ही हुआ लेकिन जैसेजैसे टाइम बीत रहा है वैसेवैसे मु?ो उस की अहमियत सम?ा आने लगी है. अब चाह रहा हूं कि वह मेरे साथ ही रहे. मु?ो उस की याद आती है. उसे कई बार फोन किया पर उस ने एकदो रिंग के बाद मु?ो ब्लौक कर दिया. आप ही बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

अफसोस है कि आप को ऐसे समय से गुजरना पड़ रहा है. दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर इस तरह के मामलों में एक बात यह कौमन देखी गई है कि ब्रेकअप के बाद शुरूशुरू में लड़कियां रोती हैं, उदास होती हैं और लड़कों पर इस का कम असर होता है. वे या तो जोश में या ईगो में अपने इमोशन को सम?ा नहीं पाते पर जैसेजैसे समय बीतता है, लड़कियां खुद को स्ट्रौंग बना लेती हैं और लड़के बाद में रोपीट रहे होते हैं.

खैर, आप के मामले में 2-3 चीजें सम?ा आ रही हैं. लड़की प्रैक्टिकली चीजों को ले रही है. एक, आप की जौब के चलते वह कौन्फिडैंट नहीं है, जोकि आप ने बताया भी कि आप की नौकरी पर उसे संशय है. दूसरा, वह घरपरिवार में अपने प्रेम संबंधों को ले कर किसी तरह का विवाद नहीं चाह रही. तीसरा, वह आप की कौल या मैसेज का अब जवाब नहीं दे रही मतलब अब वह इस रिश्ते को आगे ले जाने के बिलकुल भी मूड में नहीं.

अब सवाल है कि आप कितनी उम्मीद लगा कर रख सकते हैं. आप कह रहे हैं कि वह आप के कौल मैसेज का जवाब नहीं दे रही है, यानी वह अब आगे बढ़ गई है और आप के अनुसार किसी और से शादी भी कर रही है.

बात मानिए अब समय है अपने ऊपर फोकस करने का. जिन भी कारणों से वह आप को छोड़ कर गई उन कारणों को खत्म करने का. ब्रेकअप दुख देता है, बहुत परेशान करता है पर आप चाहें तो इस से उबर सकते हैं. इस के लिए कुछ टिप्स हैं.

पहले तो स्वीकार करें कि आप का ब्रेकअप हो गया है. फिर कोशिश करें कि सकारात्मक रहा जाए. आप की एक्स गर्लफ्रैंड अगर आप से रिश्ता नहीं रखना चाहती तो यह उस का फैसला है. कोशिश करें कि जलन, भावुकता या गुस्से में कोई गलत कदम न उठा लें. ब्रेकअप के दर्द को भूलने का सब से बेहतर तरीका है कि खुद को व्यस्त रखें. अपनेआप को खाली न होने दें. दोस्तों के साथ घूमने जाएं, भाईबहनों के साथ टाइम स्पैंड करें. कुछ न कुछ काम करते रहें. जो दुखदर्द है उसे कमजोरी नहीं अपनी ताकत बनाएं और अपनी लाइफ को बेहतर बनाएं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

दिल्लगी: बेरोजगार शख्स की प्रेम कहानी

यों ही मैं घूमने निकला तो बस स्टौप पर एक सुंदर सी कन्या को देख रुक सा गया. वह बेहद सुंदर थी. साड़ी पहने उस की लंबी सी चोटी, सुंदर आंखें, छरहरी बदन को मैं बस देखता ही रह गया. तभी एक बस आई और वह उस में बैठ कर चली गई. मैं हक्काबक्का बस को जाते देखता रह गया. झट से अपनेआप को संभाला और घड़ी देखी तो 11 बजे थे. वहां से चल तो दिया लेकिन दूसरे दिन इसी वक्त वहां पहुंचने के इरादे के साथ.

वैसे भी पढ़ाई पूरी हो गई थी मगर नौकरी या कामधंधा नहीं था तो इस दौरान इश्क की पींगे ही चढ़ा ली जाएं, यह सोच कर दूसरे दिन बनठन कर बस स्टौप पर पहुंचा तो वह भी बस में चढ़ने की कतार में खड़ी थी. उसे देख कर दिल बहुत जोर से धड़का जैसे गले से बाहर ही आ जाएगा. मैं भी कतार मैं खड़ा हो उस की ओर देख उस के सौंदर्य का नजरों से ही पान करने लगा. कल जो सुंदरता देखी थी वह और भी ज्यादा दिखनी शुरू हो गई और खयालों की दुनिया में जाने से ज्यादा उस के हुस्न का अवलोकन करना ज्यादा बेहतर समझा. बस आई तो हाथ में टिफिन ले वह बस में जा बैठी तो हम भी पीछे हो लिए.

एक ही सीट खाली देख थोड़ी उदारता का प्रदर्शन करते हुए उसे बैठने दे पास में खड़े हो कर आंखों से उस के सौंदर्य का हवाई अवलोकन करने लगा. अब वह भी थोड़ी बेतकल्लुफ सी बैठीबैठी मेरी गतिविधियों से अवगत होते हुए भी मुझे नजरअंदाज कर रही थी. मगर अब मेरी हिम्मत खुल गई थी और अब तो बेधड़क देखता रहा उस की सुहानी मूरत को. बस, एक ही बात का दुख था कि जब से देखा है उसे, इतनी बार बस में मिला उस से लेकिन उस की आवाज नहीं सुनी जो मेरे हिसाब से चांदी की घंटी सी मीठी होनी चाहिए थी.

उस का स्टैंड आ गया था तो वह उतर गई. पीछेपीछे मैं भी उतर गया और कुछ खुल कर उस के सामने हंस दिया. जवाब में उस के भी होंठ हलके से फङफङाए थे.

दूसरे दिन मिलने की आशा के साथ मैं भी घर की ओर चल पड़ा. सुबह उठते ही उसी के खयालों से दिनचर्या शुरू की और 10 बजते ही बस स्टौप पहुंच इंतजार में लग गया. सामने से होंठों पर मुसकान लिए वह आ गई और बस की लाइन में खड़ी हो गई तो मैं भी पीछे जा कर खड़ा हो गया. थोड़ी देर में बस आई तो आगे वह और पीछे मैं बस में चढ़ गया. संयोग से आज एक सीट पूरी खाली थी. मैं ने भी नारी सम्मान को मान देते हुए उसे बैठ जाने के लिए इशारे से बोला. वह खिड़की के पास बैठ गई और मैं उस के साथ में बैठ इतरा रहा था.

कंडक्टर आया तो उस ने अपने पर्स से पैसे निकाले तो कंडक्टर ने बिना पूछे ही टिकट पकड़ा दी. इस पर वह मुसकरा कर रह गई. मेरा उस की आवाज सुन पाने का जो ख्वाब था वह टूट गया.

टिकट के पैसे दे उस ने पर्स हम दोनों के बीच में रख दिया तो अपनी भी हिम्मत बढ़ी और पर्स को छू कर ऐसा महसूस होने लगा जैसे उस के गरम हाथों को छू लिया हो. मैं ने हिम्मत इक्कठी की और जेब में से पेन निकाला और एक छोटी सी परची पर लिखा और उसे दूसरे दिन बस स्टौप के पास वाले बगीचे में मिलने बुला लिया. चिट्ठी उस के पर्स के बाहर वाले पौकेट में डाला और उस के उतरने से पहले ही बस से उतर गया.

सारी रात सो नहीं पाया मैं कि पता नहीं वह आएगी भी या नहीं. दूसरे दिन समय होते ही बगीचे की ओर चल दिया जहां वह पहले से ही बैठी थी. सुंदर साड़ी, बालों में गजरा लगाए और होंठों पर हलकी सी लाली शायद कुदरती ही थी. मैं भी इधरउधर देख उस की ओर चल दिया और जा कर उस के बगल में बेंच पर बैठ गया तो वह थोड़ी अदा से मुसकराई. मैं भी जवाब में हंस दिया.

मैं अपनी ओर से पता नहीं क्याक्या पूछता रहा और बताता रहा. लेकिन वह हंस कर सिर हलके से हां या न कहती रही. इस से मेरे सब्र ने जवाब दे दिया. मैं झुंझला कर बोल ही पड़ा,”आप जवाब क्यों नहीं दे रही हो, गूंगी हो क्या?”

इस पर उस ने उंगली से मेरी जेब की ओर इशारा किया जहां पेन था, तो मैं ने भी दे दिया. उस ने अपने बैग में से एक छोटा सा कागज का टुकड़ा निकाल कुछ लिखा और मेरी ओर बढ़ा दिया. लिखा था,’मैं पूर्णतया सुन सकती हूं लेकिन बोल पाने में असमर्थ हूं. क्या आप मुझ से शादी करेंगे?’

अपनी तो बैंड बज गई. सोचा, वैसे भी बेकार हूं, दोस्त लोग ताना मारेंगे कि गूंगी ही मिली. मैं एक झटके से उठ कर बिना पूछे बिना देखे चल पड़ा. मैं वहां जल्द से जल्द भाग जाना चाहता था. पेन भी लेने नहीं रुका. तभी पीछे से एक मधुर चांदी की घंटी सी आवाज आई,” अपना पेन तो लेते जाएं जनाब…”

मैं जड़वत वहीं खङा रह गया. काटो तो खून नहीं, मगर अब कर भी क्या सकता था. उस ने मेरी परीक्षा ली थी जिस में मैं फेल हो चुका था. पेन लेने की हिम्मत नहीं थी. कैसे करता उस का सामना और अब तो मुट्ठियां बांध पहले धीरेधीरे और बाद में झट से दौड़ बगीचे से बाहर भागा और बाहर आ कर देखा तो कलेजा गले को आया हुआ था और पसीने से कपड़े गीले हो गए थे. इश्क का बुखार उतर चुका था.

राइटर- जयश्री बिरमी

भारत भूमि युगे युगे: टैक्सोडिगामा

किसी और ने पहल नहीं की तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने खुद को फादर औफ टोल टैक्स की उपाधि से बिना किसी ताम?ाम के विभूषित कर लिया. इस की वजहें भी उन्होंने गिनाईं कि चूंकि टोल टैक्स प्रणाली उन्होंने 30 साल पहले महाराष्ट्र के पीडब्लूडी मंत्री रहते पैदा की थी, इस नाते वे इस के जनक हैं. अब भविष्य में उन्हें देख कहा यह जाएगा कि वो देख, टोल टैक्स का पापा जा रहा है. टोल टैक्स नाम का उन का मानद पुत्र अब 25 साल का उद्दंड जवान हो चुका है और महंगा भी बहुत है, आखिर इतने बड़े मिनिस्टर का बेटा जो ठहरा.

क्या बेटे की अरबोंखरबों की कमाई में से वे कुछ लेते हैं और उस के व अपने वंश को और बढ़ाएंगे, पता नहीं. लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक नितिन के छोटेबड़े बेटों का जलवा है जो तादाद में कौरवों से भी ज्यादा हैं. दिक्कत तब खड़ी होगी जब सड़क परिवहन मंत्री कोई नेत्री बने और टोल की मौम बनने से इनकार कर दे.

पर्स पर नजर क्यों

महिलाओं का अपने पर्स से मोह किसी सुबूत का मुहताज नहीं. चोरउचक्कों से इसे बचाए रखना किसी टास्क से कम नहीं होता. हालत तो यह है कि संसद में भी पर्स महफूज नहीं जहां  टीएमसी की स्टाइलिश सांसद महुआ मोइत्रा अपना पर्स छिपा रही थीं. पड़ने वालों की नजर इस पर भी पड़ गई तो बेकार का बवाल मच गया कि देखो, महंगाई पर हल्ला मचाने वाली महुआ डेढ़ लाख का पर्स रखती हैं. यह और बात है कि आजकल तो बैंक में एक लाख की नौकरी करने वाली महिला भी महंगे से महंगा पर्स रखती है.

बात संभालने के लिए महुआ ने ट्वीट कर दिया कि ?ाले वाला फकीर. यह धमकी या सूचना 3 दिसंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुरादाबाद में दी थी कि हम तो फकीर हैं, कभी भी अपना ?ाला ले कर चल देंगे. देखना दिलचस्प होगा कि ईडी की नजर इस पर्स पर कब पड़ेगी.

हिंदू वीर

उत्तर प्रदेश में भाजपा की रिकौर्डतोड़ जीतों में हिंदू युवा वाहिनी संगठन का बड़ा योगदान रहा है जिसे साल 2002 में सांसद रहते योगी आदित्यनाथ ने बनाया था. तभी से वे इस के हमेव माता च पिता हमेव और हमेव गुरु और बंधु, सखा बने हुए हैं. ऐसा नहीं है कि अब न हों बल्कि उन्होंने धर्मप्रेमी युवाओं के इस संगठन को भंग कर दिया है. अब शायद नए सिरे से हिंदू रंगरूटों की भरती होगी जो हिंदू राष्ट्र निर्माण के आंदोलन में पुरु की तरह अपने यौवन की आहुति देते यज्ञ, हवन, भंडारों और कांवड़ यात्राओं में भगवा गमछा लपेट अपना जीवन सार्थक कर सकें.

हकीकत में यही हिंदूवीर इमेज बिगाड़ने का काम करने लगे थे. यानी उद्दंडता और मनमानी पर उतारू होने लगे थे. विधर्मियों की गौमांस की कथित तस्करी और प्रेमियों को पकड़ना इन का पसंदीदा काम होता जा रहा था जिसे ले कर आदित्यनाथ चिंतित थे. अब आगे वे क्या करते हैं, देखना दिलचस्प होगा.

देवी शरणम गच्छामि

भरी संसद में सोनिया गांधी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को ?ाड़ यह कहते पिला दी कि ‘डौंट टाक टू मी.’ यह ठीक वैसी ही लताड़ थी जैसे किसी कसबे की टपरिया पर ठाकुर साहब या पंडितजी ने किसी शूद्र को यह कहते हड़का दिया हो कि हमारे मुंह मत लग.

असहनीय दुख और दर्द से तिलमिलाई स्मृति इस बार नरेंद्र मोदी या अमित शाह की चौखट पर जाने के बजाय तुरंत और सीधे दतिया स्थित पीतांबरा पीठ बगुलामुखी मां के दरबार में जा पहुंचीं, जो तंत्रमंत्र के लिए कुख्यात है और शत्रु का नाश भी करता है. सोनिया गांधी के यह तेवर देख भगवा गैंग हैरान है कि इतनी प्रताड़नाओं के बाद भी कांग्रेसी मुखिया की हिम्मत क्यों नहीं टूटी. लिहाजा, मुमकिन है आने वाले दिनों में उन पर शिकंजा और कसा जाए.

त्यौहार 2022: घर पर बनाएं बादशाही आलू, मखनी लौकी और मलाई पनीर

त्योहारों का मौसम आया नहीं कि पकवानों की बहार शुरू हो जाती है. खुशी के माहौल में खानपान की विविधता जायका बढ़ा देती है. तो फिर देर किस बात की. आप भी इस दीवाली पर ऐसा कुछ विशेष बनाएं जो हर बार से कुछ हट कर हो. लीजिए, आप की दीवाली को खास बनाने के लिए पेश हैं कुछ विशेष पकवान.

  1. बादशाही आलू

सामग्री

2 आलू, 1 कप क्रीम, 2-3 कली लहसुन, 1 प्याज, 1-2 हरी मिर्चें, 1 क्यूब चीज, नमक स्वादानुसार, 1 बड़ा चम्मच पामेसान चीज, 1/4 बड़ा चम्मच कालीमिर्च पाउडर, थाइम की पत्तियां.

विधि

आलू को छील कर पतली स्लाइस में काट कर पानी में रखें. कड़ाही में क्रीम गरम कर बारीक कटी लहसुन, प्याज, हरीमिर्च मिलाएं. इसी में कटे आलू की स्लाइस व नमक मिलाएं. थाइम की पत्तियां डाल कर आंच बंद करें. एक बेकिंग डिश में डाल कर ऊपर से चीज गे्रट कर के डालें. 180 डिगरी पर गरम ओवन में 15-20 मिनट तक बेक करें.

2. मखनी लौकी

सामग्री

1 कप उबली लौकी, 1/2-1/2 कप सूजी, दही, 3-4 ब्रैड स्लाइस, 1 हरी मिर्च, 1-2 कली लहसुन, नमक स्वादानुसार, 1-1 बड़ा चम्मच क्रीम, नीबू रस, 2 बड़े चम्मच मक्खन, 1/4 चम्मच कालीमिर्च पाउडर.

विधि  

मिक्सी में उबली लौकी, सूजी, दही, ब्रैड, नमक, हरीमिर्च व लहसुन एकसाथ पीसें. इस मिश्रण को गरम तवे पर चीले की तरह दोनों तरफ तेल लगा कर सुनहरा होने तक सेकें. एक पैन में मक्खन गरम कर क्रीम डालें. आंच बंद कर नीबू रस व कालीमिर्च पाउडर डालें. इस सौस को प्लेट में डालें उस पर इन चीलों को रख कर परोसें.

3. मलाई पनीर

सामग्री

2 बड़े चम्मच घी, 1 प्याज, 5-6 काजू, 1 कप कोकोनट मिल्क, 3 बड़े चम्मच मलाई, 150 ग्राम पनीर, 1-1 तेजपत्ता, साबुत लालमिर्च, हरीमिर्च, 2-3 लौंग, 1 टुकड़ा दालचीनी, नमक स्वादानुसार, 1/4 बड़े चम्मच गरममसाला.

विधि   

प्याज का पेस्ट बनाएं. काजू पानी में भिगो कर पेस्ट बना लें. कड़ाही में घी गरम कर इस में तेजपत्ता, लौंग, दालचीनी, मिर्च डाल कर भूनें और प्याज का पेस्ट भुनने पर इस में काजू पेस्ट व कोकोनट मिल्क डाल कर पकाएं. पनीर के टुकड़े डालें. इसी के साथ नमक, गरममसाला व मलाई डालें. मलाई गे्रवी में मिलने तक पकाएं. गरमागरम परांठों के साथ परोसें.

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