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ज्योति- भाग 1: क्या सही था उसका भरोसा

‘‘हां मां, खाना खा लिया था औफिस की कैंटीन में. तुम बेकार ही इतनी चिंता करती हो मेरी. मैं अपना खयाल रखता हूं,’’ एक हाथ से औफिस की मोटीमोटी फाइलें संभालते हुए और दूसरे हाथ में मोबाइल कान से लगाए सुमित मां को समझाने की कोशिश में जुटा हुआ था.

‘‘देख, झूठ मत बोल मुझ से. कितना दुबला गया है तू. तेरी फोटो दिखाती रहती है छुटकी फेसबुक पर. अरे, इतना भी क्या काम होता है कि खानेपीने की सुध नहीं रहती तुझे.’’ घर से दूर रह रहे बेटे के लिए मां का चिंतित होना स्वाभाविक ही था, ‘‘देख, मेरी बात मान, छुटकी को बुला ले अपने पास, बहन के आने से तेरे खानेपीने की सब चिंता मिट जाएगी. वैसे भी 12वीं पास कर लेगी इस साल, तो वहीं किसी कालेज में दाखिला मिल जाएगा,’’ मां उत्साहित होते हुए बोलीं.

जिस बात से सुमित को सब से ज्यादा कोफ्त होती थी वह यही बात थी. पता नहीं मां क्यों नहीं समझतीं कि छुटकी के आने से उस की चिंताएं मिटेंगी नहीं, उलटे, बहन के आने से सुमित के ऊपर जिम्मेदारी का एक और बोझ आ पड़ेगा.

अभी तो वह परिवार से दूर अपने दोस्तों के साथ आजाद पंछी की तरह बेफिक्र जिंदगी का आनंद ले रहा था. उस के औफिस में ही काम करने वाले रोहन और मनीष के साथ मिल कर उस ने एक किराए पर फ्लैट ले लिया था. महीने का सारा खर्च तीनों तयशुदा हिसाब से बांट लेते थे. अविवाहित लड़कों को घरगृहस्थी का कोई ज्ञान तो था नहीं, मनमौजी में दिन गुजर रहे थे. जो जी में आता करते, किसी तरह की बंदिश, कोई रोकटोक नहीं थी उन की जिंदगी में. कपड़े धुले तो धुले, वरना यों ही पहन लिए. हफ्ते में एक बार मन हुआ तो घर की सफाई हो जाती थी, वरना वह भी नहीं.

सुमित से जब भी उस की मां छोटी बहन को साथ रखने की बात कहती, वह घोड़े सा बिदक जाता. छुटकी रहने आएगी तो सुमित को दोस्तों से अलग कमरा ले कर रहना पड़ेगा और ऊपर से उस की आजादी में खलल भी पड़ेगा. यही वजह थी कि वह कोई न कोई बहाना बना कर मां की बात टाल जाता.

‘‘मां, अभी बहुत काम है औफिस में, मैं बाद में फोन करता हूं,’’ कह कर सुमित ने फोन रख दिया.

वह सोच रहा था, कहीं मां सचमुच छुटकी को न भेज दें.

तीनों दोस्तों को यों तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन खाना पकाने के मामले में तीनों ही अनाड़ी थे, ब्रैड, अंडा, दूध पर गुजारा करने वाले. रोजरोज एक ही तरह का खाना खा कर सुमित उकता गया था. बाहर का खाना अकसर उस का हाजमा खराब कर देता था. परिवार से दूर रहने का असर सचमुच उस की सेहत पर पड़ रहा था. मां का इस तरह चिंता करना वाजिब भी था. इस समस्या का कोई स्थायी हल निकालना पड़ेगा, वह मन ही मन सोचने लगा. फिलहाल तो 4 बजे उस की एक मीटिंग थी. खाने की चिंता से ध्यान हटा, वह एक बार फिर से फाइलों के ढेर में गुम हो गया.

सुमित के अलावा रोहन और मनीष की भी यही समस्या थी. उन के घर वाले भी अपने लाड़लों की सेहत की फिक्र में घुले जाते थे.

शाम को थकहार कर सुमित जब घर आया तो बड़ी देर तक घंटी बजाने पर भी दरवाजा नहीं खुला. एक तो दिनभर औफिस में माथापच्ची करने के बाद वह बुरी तरह थक गया था, उस पर घर की चाबी ले जाना आज वह भूल गया था. फ्लैट की एकएक चाबी तीनों दोस्तों के पास रहती थी, जिस से किसी को असुविधा न हो.

थकान से बुरी तरह झल्लाए सुमित ने एक बार फिर बड़ी जोर से घंटी पर हाथ दे मारा.

थोड़ी ही देर में इंचभर दरवाजे की आड़ से मनीष का चेहरा नजर आया. सुमित को देख कर उस ने हड़बड़ा कर दरवाजा पूरा खोल दिया.

‘‘क्यों? इतना टाइम लगता है क्या? बहरा हो गया था क्या जो घंटी सुनाई नहीं दी?’’ अंदर घुसते ही सुमित ने उसे आड़ेहाथों लिया.

गले में बंधी नैकटाई को ढीला कर सुमित बाथरूम की तरफ जा ही रहा था कि मनीष ने उसे टोक दिया, ‘‘यार, अभी रुक जा कुछ देर.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ सुमित ने पूछा, फिर मनीष को बगले झांकते देख कर वह सबकुछ समझ गया, ‘‘कोई है क्या, वहां?’’

‘‘हां यार, वह नेहा आई है. वही है बाथरूम में.’’

‘अरे, तो ऐसा बोल न,’’ सुमित ने फ्रिज खोल कर पानी की ठंडी बोतल निकाल ली.

मनीष की प्रेमिका नेहा नौकरी करती थी और एक वुमेन होस्टल में रह रही थी. जब भी सुमित और रोहन घर पर नहीं होते, मनीष नेहा को मिलने के लिए बुला लेता.

सुमित को इस बात से कोई एतराज नहीं था, मगर रोहन को यह बात पसंद नहीं आती थी. उस का मानना था कि मालिकमकान कभी भी इस बात को ले कर उन्हें घर खाली करने को कह सकता है.

जब कभी नेहा को ले कर मनीष और रोहन के बीच में तकरार होती, सुमित बीचबचाव से मामला शांत करवा लेता.

‘‘यार, बड़ी भूख लगी है, खाने को कुछ है क्या?’’ सुमित ने फ्रिज में झांका.

‘‘देख लो, सुबह की ब्रैड पड़ी होगी,’’ नेहा के जाने के बाद मनीष आराम से सोफे पर पसरा टीवी देख रहा था.

सुमित को जोरों की भूख लगी थी.इस वक्त उसे मां के हाथ का बना गरमागरम खाना याद आने लगा. वह जब भी कालेज से भूखाप्यासा घर आता था, मां उस की पसंद का खाना बना कर बड़े लाड़ से उसे खिलाती थीं. ‘काश, मां यहां होतीं,’ मन ही मन वह सोचने लगा.

‘‘बहुत हुआ, अब कुछ सोचना पड़ेगा. ऐसे काम नहीं चलने वाला,’’ सुमित ने कहा तो मनीष बोला, ‘‘मतलब?’’

‘‘यार, खानेपीने की दिक्कत हो रही है, मैं ने सोच लिया है किसी खाना बनाने वाले को रखते हैं,’’ सुमित बोला.

‘‘और उस को पगार भी तो देनी पड़ेगी?’’ मनीष ने कहा.

‘‘हां, तो दे देंगे न, आखिर कमा किसलिए रहे हैं.’’

‘‘लेकिन, हमें मिलेगा कहां कोई खाना बनाने वाला,’’ मनीष ने कहा.

‘‘मैं पता लगाता हूं,’’ सुमित ने जवाब दिया.

दूसरे दिन सुबह जब सुमित काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा, किसी ने दरवाजा खटखटाया. करीब 30-32 साल की मझोले कद की एक औरत दरवाजे पर खड़ी थी.

सुमित के कुछ पूछने से पहले ही वह औरत बोल पड़ी, ‘‘मुझे चौकीदार ने भेजा है, खाना बनाने का काम करती हूं.’’

‘‘ओ हां, मैं ने ही चौकीदार से बोला था.’’

‘‘अंदर आ जाइए,’’ सुमित उसे रास्ता देते हुए बोला और कमरे में रखी कुरसी की तरफ बैठने का इशारा किया.

कठिनाइयां- भाग 3: लड़ाकू फौज के जवान ने उसके साथ क्या किया?

नई दिल्ली पहुंचने में 2 दिन और एक रात लगनी थी. गाड़ी की स्पीड अच्छी थी. तीनतीन घंटे कोई स्टेशन नहीं आता था. दूर की गाड़ियां हमेशा लेट हो जाती हैं. यह गाड़ी सुबह 4 बजे पहुंचनी थी पर 8 बजे पहुंची. शान ए पंजाब, जिस में मेरी अमृतसर जाने की सीट बुक थी, निकल चुकी थी. अमृतसर के लिए रिजर्वेशन करवाना जरूरी था. क्वार्टरमास्टर ने मुझ से हाथ मिलाया. मैं ने उन का धन्यवाद किया. उन की गाड़ी और उन के कुछ जवानों की गाड़ी शाम को थी. उन की रैजिमैंट के 2 जवान मेरे साथ जालंधर तक जाने थे. क्वार्टरमास्टर ने उन को आदेश दिया कि मेजर का ख़याल रखना. इन का सामान उठा लेना. यह न हो कि इन को कुली करना पड़े. मैं ने कहा, ‘नहीं क्वार्टरमास्टर साहब, सामान बहुत हलका है, मैं उठा लूंगा.’

गाड़ी 9 नंबर प्लेटफौर्म पर आई थी और एमसीओ 12 नंबर प्लेटफौर्म पर था. मैं ने एक जवान से कहा, ‘इस का रेलवे वारंट और अपना रेलवे वारंट ले कर चलो. एमसीओ में आगे की गाड़ी के लिए रिजर्वेशन करवा कर आते हैं.’

एमसीओ ने 11 बजे अमृतसर जाने वाली डीलक्स गाड़ी में 3 बर्थें रिजर्व कर दीं. 2 जालंधर के लिए, एक मेरी अमृतसर के लिए. गाड़ी 1 नंबर प्लेटफौर्म से चलनी थी. सामान में मेरा एक बिस्तरबंद था और बैग. बैग मैं ने उठा लिया और बिस्तरबंद एक जवान ने उठा लिया था.

अभी 9 बजे थे. गाड़ी आने में बहुत समय था. सामान 1 नंबर प्लेटफौर्म पर रख दिया. जवानों से मैं ने नाश्ते के लिए पूछा. वे कहने लगे, ‘नाश्ता हमारे पास है. आप को मैं अभी देता हूं.’ मैं ने कहा, ‘नहीं, आप करें. मैं नाश्ता रेलवे रैस्टोरैंट में जा कर करूंगा.’

‘ठीक है, मेजर. आप नाश्ता कर के आएं. आप सामान की फिक्र न करें.’ मैं समझ गया था कि नाश्ता उन के पास केवल अपने लिए था, तभी उन्होंने जोर नहीं दिया. मैं रेलवे रैस्टोरैंट में गया और लंचब्रंच इकठ्ठा कर लिया.

11 बजे गाड़ी आई और अपनीअपनी बर्थों पर सो गए. बीच में टिकटचेकर आया. उस के बाद फिर सो गए. कहांकहां गाड़ी रुकी, पता नहीं चला. जब लुधियाना से गाड़ी चली तो मैं ने डोगरा रैजिमैंट के जवान से पूछा, ‘यह कौन सा स्टेशन निकला है?’

‘मेजर, लुधियाना निकला है.’

‘आप की मंजिल तो आने वाली है.’

‘हां, मेजर, फखवाडा और गौरयां में 2-2 मिनट का स्टौपेज है. फिर जालंधर.’

‘गाड़ी लेट चल रही है?’

‘जी, टीटी कह रहा था कि गाड़ी कोई एक घंटा लेट चल रही है.’

‘ओह, आप को पठानकोट के लिए गाड़ी मिल जाएगी?’

‘नहीं, मेजर जो गाड़ी पकड़नी थी, वह तो 5 बजे निकल जाती है. जब तक यह गाड़ी जालंधर पहुंचेगी, 8 बज जाएंगे. पता नहीं आगे की गाड़ी कब मिलेगी?’

‘8 बजे तो अमृतसर पहुंचने का टाइम है.’

‘हिंदुस्तान की गाड़ियों का यही हाल है. हमेशा लेट हो जाती हैं. कभी प्लैनिंग के मुताबिक हम घर नहीं पहुंचे हैं. आगे हम दोनों को कांगड़े के लिए गाड़ी पकड़नी है. पठानकोट अगर हम 9 बजे तक पहुंच गए तो आगे की गाड़ी मिल जाएगी वरना दोपहर 2 बजे तक इंतजार करना पड़ेगा.’

‘वहां से तो नैरोगेज की गाड़ी चलती है न?’

‘जी, मेजर.’

रात 8 बजे गाड़ी जलंधर पहुंची. फगवाड़ा और गौरयां में बहुत देर तक रुकी रही. अगर लगातार चले तो जलंधर से अमृतसर में गाड़ी को 2 घंटे लग जाते हैं. इस हिसाब से गाड़ी 10 बजे पहुंच जानी चाहिए. लेकिन गाड़ी पहुंची रात 11 बजे. मेरा घर स्टेशन से बहुत दूर था. इतनी रात को किसी हालत में पहुंचा नहीं जा सकता था. रात को मैं ने हालबाजार में अपने ससुराल रुकने का फसला किया. सुबहसुबह उठ कर घर चला जाऊंगा. पत्नी को डिलीवरी के लिए यहीं के सरकारी अस्पताल में ले कर आना पड़ेगा. मिलिटरी अस्पताल कैंट में दूर था. वहां का कार्ड भी नहीं बना था. सरकारी अस्पताल नजदीक भी था और मेरे मामा के लड़के वहीं डाक्टर भी थे.

मैं ससुराल पहुंचा तो वे बड़े खुश हुए कि मैं समय पर आ गया हूं. हालबाजार में इतनी रात को खाने के लिए मिल जाता है. छोलेकुलचे मंगवाए और खा कर लेट गया. लंबे सफर की थकावट के कारण सो नहीं पाया. सुवह 5 बजे घर के लिए बस चलती थी. मैं उस में जाने के लिए तैयार था. चाय पीने के लिए पूछा. मैं ने कहा, ‘घर जा कर पिऊंगा.’ उन्होंने मुझे रोका नहीं. शन्नो, मेरी पत्नी का हौसला बढ़ जाएगा. पति अगर साथ में हो तो पत्नी बड़े से बड़ा दर्द सह लेती है.

2 दिनों बाद मुझे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई. खुशी के साथ रास्ते की पूरी थकान मिट गई. उन सब के मुंह भी बंद जो कहते थे कि लड़की होगी. शन्नो के महल्ले वालों ने तो खबर भी फैला दी कि शन्नो के लड़की हुई है, जैसे, लड़की होना कोई अभिशाप हो.

मेरा चचेरा भाई मुझे बहुत प्यार करता है, क्या करूं कृपया मेरा मार्गदर्शन करें?

सवाल

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं. वह भी मुझे प्यार करता है. पर समस्या यह है कि मेरा चचेरा भाई भी मुझे बहुत प्यार करता है, मैं उसे नहीं चाहती. लेकिन यह बात कह कर मैं उसे दुखी भी नहीं करना चाहती हूं. फिर यदि मैं ने अपने बौयफ्रैंड से इस प्रेम संबंध को समाप्त करने की बात कही तो उसे तो दुख होगा ही, साथ ही मैं भी उस से जुदा हो कर जी नहीं पाऊंगी. मैं अजीब उलझन में हूं. किसी का भी दिल नहीं तोड़ना चाहती. कृपया मेरा मार्गदर्शन करें.

जवाब

आप को अपने चचेरे भाई को किसी मुगालते में नहीं रखना चाहिए. उस से साफ साफ कह दें कि आप दोनों भाईबहन हैं और आप का खून का रिश्ता है. आप की उस के प्रति जो चाहत है वह सिर्फ एक बहन की अपने भाई के प्रति है. यह सुन कर वह दुखी होगा, हो सकता है कि आप से नफरत भी करने लगे, पर इस के अलावा आप के पास कोई चारा भी नहीं है. प्यार के इस भ्रम को जितनी जल्दी तोड़ देंगी, तकलीफ उतनी ही कम होगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

रिवर राफ्टिंग: मौत का खेल

राफ्टिंग के रोमांचक खेल के जानलेवा पहलू को दरकिनार करने वाले यह भूल जाते हैं कि यह खेल सरकारी सुस्ती और बदइंतजामियों के चलते अब तक कइयों की जान ले चुका है.

सुबह का वक्त था. अखबार पढ़तेपढ़ते मेरी नजर एक खबर पर जा कर ठहर गई. खबर थी कि 4 छात्रों की मौत ऋषिकेश में गंगा नदी में डूबने से हो गई. वे नदी की डरावनी लहरों के बीच ‘रिवर राफ्टिंग’ करने के लिए गए थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि उन की मौत का न कोई जिम्मेदार था और न ही उन के शव ही बरामद हुए थे. मरने वाले छात्रों में विशाल, निश्चिंत, पंकज व प्रशांत शामिल थे. सभी हरियाणा प्रांत के रहने वाले थे. उन में से एक इंजीनियरिंग कालेज का छात्र था. मृतकों समेत 7 छात्रों का दल उत्तराखंड राज्य की पर्यटक नगरी ऋषिकेश घूमने के लिए गया था कि तभी 12 अप्रैल को यह हादसा घटित हो गया.

यह कोई पहला हादसा नहीं था. इस से पहले भी इस तरह के कई हादसे हो चुके हैं. हादसों की हकीकत व बेवजह जाती जान के पीछे की सचाई को जड़ से परखने की जिज्ञासा मुझे ऋषिकेश खींच कर ले गई. पता चला कि चारों छात्र पढ़ाई में होनहार थे. वे बीटेक की शिक्षा हासिल कर रहे थे. सामाजिक ढांचे व देश के भविष्य की बुनियाद ऐसे ही युवाओं के कंधों पर टिकी होती है.

मृतक छात्रों ने कलकल बहती गंगा नदी की उफनती लहरों के बीच दोस्तों के साथ रोमांचकारी राफ्टिंग करने का आनंद उठाया. बाद में डूबने से बचाने वाली लाइफ जैकेट को उतार कर नीम बीच के नजदीक 21 वर्षीय विशाल स्नान के लिए गंगा में उतर गया, तभी वह तेज बहाव की चपेट में आ कर बहने लगा तो उस ने शोर मचाया. साथी को डूबता देख कर उस के अन्य दोस्तों ने गंगा के तेज बहाव व गहराई का अंदाजा लगाए बिना उसे बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी. कुछ ही मिनटों में वे चारों डूब गए, और कहां गए यह उस वक्त किसी को पता नहीं लग पाया.

लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दी. तटरक्षक (जल पुलिस) दल ने बचाव अभियान चलाया, लेकिन किसी का शव नहीं मिल सका. अगले 4 दिनों में अलगअलग स्थानों से जल पुलिस, नैशनल डिजास्टर रेसपौंस फोर्स यानी एनडीआरएफ व स्थानीय गोताखोरों ने सर्च औपरेशन के दौरान शव बरामद कर लिए. रोतेबिलखते परिजन जवान बेटों की लाशें ले कर वापस हो गए. ऐसे दुखों की कोई भरपाई नहीं होती. वहां इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था कि मौतों के लिए आखिर जिम्मेदार किसे ठहराया जाए.

इस से पहले 15 मार्च को भी एक हादसा हुआ. दरअसल, अर्जेंटीना का 32 वर्षीय निकोलस भारत घूमने के लिए आया था. ऋषिकेश पहुंचा तो वह रोमांच के लिए राफ्टिंग करने लगा, लेकिन उस की राफ्ट पलट गई जिस से उस की मौत हो गई. इस हादसे को अभी 1 ही दिन बीता था कि 17 मार्च को राफ्ट के पलटने से दिल्ली के रोहिणी इलाके के रहने वाले जेट एअरवेज के एअरक्राफ्ट इंजीनियर प्रशांत पांडेय की मौत हो गई. वहीं 29 मार्च को राफ्ट पलटने से गाइड राम पाठक की मौत हो गई. दरअसल, सरकारी सुस्ती व बदइंतजामियों के चलते पर्यटकों की जान जोखिम में रहती है.

क्या है रिवर राफ्टिंग

रिवर राफ्टिंग को रोमांच व साहस के खेल का नाम दिया जाता है. प्राकृतिक सौंदर्य, हिमालय की हरीभरी घाटियों से लबरेज ऋषिकेश में अथाह जल वाली गंगा नदी के कई स्थानों पर भंवर बनते हैं, पानी की ऊंची तूफानी लहरें उठतीगिरती हैं. चट्टानों के बीच से पानी निकलता है. उन के बीच प्लास्टिक व अन्य मैटीरियल से बनी नावनुमा राफ्ट को चलाया जाता है. नाव चलाने के इसी खतरनाक खेल को राफ्टिंग का नाम दिया गया.

राफ्टिंग का एरिया 20 किलोमीटर तक का है. सड़क मार्ग से राफ्ट को जीप पर लाद कर नदी तट पर ले जाया जाता है फिर नदी में उतार दिया जाता है. नदी के तूफानी वेग के शोर में लहरों से खेलने की हिमाकत हर कोई नहीं कर पाता. एक राफ्ट पर 6 से 15 लोग सवार होते हैं. सभी के हाथों में चप्पू होता है और राफ्ट को गाइड के दिशानिर्देशन में सामूहिक रूप से संचालित किया जाता है.

लहरों के बीच राफ्ट हिचकोले लेती आगे बढ़ती है. रास्ते में वौल रैपिड (ऐसी चट्टानें जहां पानी आ कर तेजी से टकराता है) पड़ते हैं. राफ्ट हिचकोले लेती है, यही रोमांच है परंतु खतरा हर पल बना ही रहता है. राफ्ट पलट सकती है, सिर पत्थरों से टकरा सकता है और डूबने या मुंह में पानी भरने से मौत हो सकती है.

गंगा की गहराई 50 से 80 फुट होती है. लहरें ऐसी कि पेशेवर गोताखोर भी हार मान जाते हैं. राफ्टिंग करने वाले पर्यटक डूबें नहीं, इस के लिए उन्हें लाइफ जैकेट पहनाई जाती है. सिर पत्थरों से न टकराए, इस के लिए ठोस प्लास्टिक वाला हैल्मैट पहनाया जाता है. सैकड़ों कंपनियां इस कारोबार से जुड़ी हैं. देशीविदेशी पर्यटक 500 से 1,500 रुपए शुल्क अदा कर के नदी में राफ्टिंग का आनंद लेते हैं. ऋषिकेश में राफ्टिंग का सीजन 1 सितंबर से 30 जून तक होता है. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों के पर्यटकों के अलावा भारत घूमने आने वाले विदेशी पर्यटक भी राफ्टिंग करते हैं.

राफ्टिंग का खतरनाक खेल

अथाह जल व लहरों से लबरेज गंगा में राफ्टिंग पर्यटक जान हथेली पर ले कर करते हैं. इसी दौरान कभी ऐसा हादसा हो जाता है कि कुछ लोग मर जाते हैं. ऐसे में गलती कई बार राफ्टिंग करने वालों की होती है, तो कई बार कराने वालों की. लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हादसा होने पर किसी के भी खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं होती. यह भी सच है कि राफ्टिंग साहस का खेल है. कमजोर दिल वालों की सांसें थम जाती हैं. नदी में उतरने से पहले गाइड पूछता है कि किसी को दिल की या अन्य बीमारी हो तो वह न बैठे, लेकिन लोग रोमांच के लिए उसे छिपा भी लेते हैं.

राफ्टिंग के लिए तैरना आना पहली शर्त है, लेकिन सभी जानते हैं कि अधिकांश को तैरना नहीं आता. लहरें कब हालात बदल दें, इस बात को कोई नहीं जानता. पहाड़ों के बीच होने के चलते मोबाइल नैटवर्क काम नहीं करता. नजदीक कोई मैडिकल उपचार नहीं होता. यदि एंबुलैंस को सूचना दी भी जाए तो भी उसे पहुंचने में डेढ़ घंटे का समय लग जाता है.

हालांकि राफ्ट को नदी में उतारने से पहले उस में सवार होने वाले पर्यटकों को गाइड प्राथमिक ज्ञान देता है. मसलन, चप्पू कैसे चलाना है, राफ्ट पलटने पर क्या करना है, बचाव के लिए क्याक्या किया जा सकता है. कई वर्षों से लाइसैंसधारी गाइड का काम कर रहे विपिन शर्मा कहते हैं कि अपनी तरफ से वे पूरी सावधानी बरतते हैं. कई बार लोग घबरा कर चिल्लाते हैं जिस से मुंह में पानी चला जाता है और पानी अंदर जाने से मृत्यु हो जाती है. गाइड प्रशिक्षित हो तो वह जान बचा सकता है. जिन लोगों ने गाइड का कोर्स नहीं किया होता वे भी राफ्टिंग कराते हैं. असलीनकली को चैक करने की जिम्मेदारी सरकारी विभागों की होती है परंतु उन्हें इस की परवा नहीं.

इन बातों का रखें खास ध्यान
– राफ्टिंग का प्राथमिक प्रशिक्षण हासिल जरूर करें.
– अगर आप को पानी से डर लगता है तो राफ्टिंग कतई न करें.
– अगर आप दिल या ब्लडप्रैशर के मरीज हैं तो जोश में आ कर पानी में उतरने की गलती न करें.
– गाइड के भरोसे जिंदगी न सौंपें क्योंकि वह अप्रशिक्षित होगा तो उसे आप से पहले अपनी जान ज्यादा प्यारी है.
– दोस्तों के कहने में आ कर परिजनों को बिना बताए राफ्टिंग न करें.
– पता कर लें कि गाइड व राफ्ट लाइसैंसधारी हैं या नहीं.
– शरीर भारी या थुलथुल है तो भी राफ्टिंग न करें क्योंकि बचाव के लिए शरीर का फुर्तीला होना बेहद जरूरी है, साथ ही बचाव की प्रवृत्ति भी होनी चाहिए.
– नदी में गिरने पर हाथ उठा कर चिल्लाएं, पर ध्यान रहे, मुंह में पानी न जाए क्योंकि यह मौत की वजह बन सकता है.
– एकांत स्थान पर स्नान न करें.

अनट्रेंड गाइडों के भरोसे पर्यटक

नदियों व समुद्रों में उफनती लहरों के बीच रोमांच का मजा लेने के लिए विदेशी खूब जाने जाते हैं. रोमांच के लिए खतरों से खेलने का शौक रिवर राफ्टिंग के रूप में भी उन के लिए पुराना है. पाश्चात्य संस्कृति की अन्य नकल के साथ रिवर राफ्टिंग की भी नकल हुई. वहां राफ्टिंग नियमों का पालन कर के मानकों के अनुरूप होती है, लेकिन ऋषिकेश में देशी तड़का लगाया जाता है. राफ्ट, लाइफ जैकेट या उस से जुड़ी अन्य सामग्री मानकों के अनुरूप है या नहीं, इस की कोई गारंटी नहीं होती. कई लोगों को पता भी नहीं होता कि राफ्टिंग होती क्या है, लेकिन शौकियाना तौर पर नए अनुभव के लिए पहुंच जाते हैं क्योंकि खतरों का उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं होता. 2-3 महीने किसी के साथ काम करने वाले खुद ही गाइड बन जाते हैं. उन के पास न तो कोई लाइसैंस होता है और न ही प्रशिक्षण का कोई अनुभव.

गाइड बनने के लिए पर्वतारोहण का बेसिक, एडवांस, बचाव जैसा कोर्स करना जरूरी होता है परंतु कुछ महीने किसी के साथ हैल्पर रहने वाले भी गाइड बन जाते हैं. कुछ के पास तो बुनियादी प्रशिक्षण भी नहीं होता.

छोटी नांव पर चलने वाला एक काकर, जो डूबते लोगों को बचाने में पूर्ण प्रशिक्षित होता है, होना चाहिए लेकिन नहीं होता. गाइड आप को बचने की सलाह देता है लेकिन बचाने की गारंटी नहीं. जो लाइफ जैकेट पहनने को दी जाती है वह हर सूरत में बचा लेगी, इस का कोई भरोसा नहीं होता है. खास बात यह है कि गाइड के पास महंगी जैकेट होती है जबकि पर्यटकों को सस्ती दी जाती है, इस विश्वास के साथ कि उन्हें बचा लिया जाएगा. राफ्ट के साथ एक बचाव दल अलग से होना चाहिए लेकिन देशी स्टाइल में पर्यटकों को मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है.

नियम के मुताबिक एक राफ्ट में 7 लोगों को बैठाया जाना चाहिए लेकिन 10 से 18 लोगों को बैठा कर उसे ओवरलोड कर दिया जाता है. राफ्टिंग कारोबार से जुड़े लोगों का लालच जोखिम को बढ़ा देता है. पैसा कमाने की चाह में लोगों की जिंदगी दांव पर लगा दी जाती है. मानकों पर खरे न उतरने वाले कामचलाऊ सुरक्षा उपकरणों से पर्यटकों की जान को खतरे में डाल दिया जाता है. किसी भी राफ्ट में 2 गाइड, 2 हैल्पर, थ्रोबैग, ड्राई बैग, पंप, फर्स्ट एड किट व रिपेयर किट होना अनिवार्य है. इसे नोटों की चमक कहें या कुछ और, सुरक्षा उपायों को कोई चैक नहीं करता. नियमों का खुला उल्लंघन होता है. इस कारोबार से जुड़े शुभम का कहना है कि लाइसैंस देने से पूर्व सभी जरूरी उपकरणों को चैक किया जाता है. प्रशिक्षित गाइड हमारे पास हैं, इस का भी ब्योरा दाखिल करना होता है.

हर साल जाती हैं कई जानें गंगा की धारा में हर साल 2 दर्जन से ज्यादा लोगों की जिंदगी खत्म हो जाती है. कुछ लोग नहाते वक्त डूब कर मर जाते हैं, तो कई बार राफ्टिंग के दौरान हादसों में मौत हो जाती है. मरने वालों में अधिकांश देशीविदेशी युवा होते हैं. हालांकि, शव मिलने पर पुलिस मृतकों के परिजनों को सूचना देती है. घाटों पर जल पुलिस के सिपाही बचाव उपकरणों के साथ तैनात रहते हैं. हादसा होने पर वे डूबने वालों को बचाने की कोशिश करते हैं. लेकिन लगभग 15 पुलिसकर्मी गंगा के इतने बड़े दायरे की निगरानी कर सकें, यह संभव नहीं.

लोग निर्धारित घाटों के अलावा उत्साह में कहीं भी नहाने लगते हैं, इस से कब जान चली जाए, कोई नहीं जानता. राफ्टिंग के दौरान लोग गिर जाते हैं व अन्य कारणों से उन की मौत हो जाती है. पुलिस का काम बरामद शवों का पोस्टमार्टम कराना भर तक सिमट कर रह गया है क्योंकि पुलिस विभाग इस के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है ही नहीं.

इस मामले के थाना लक्ष्मण?ाला में इंस्पैक्टर डी एस रावत कहते हैं कि राफ्टिंग के मामलों में निगरानी बेहद जरूरी है. पुलिस को पता हादसा होने के बाद या शव बरामदगी पर ही लगता है. जिन युवकों को भविष्य संवारना होता है वे कभी अपनी तो कभी दूसरों की लापरवाही से अपनों को रोने के लिए छोड़ जाते हैं. बकौल सब इंस्पैक्टर विवेक राठी, नदी में उतरने से पूर्व बुनियादी ज्ञान तो पर्यटक को होना ही चाहिए वरना छोटी सी भी चूक मौत का कारण बन जाती है. बाहरी लोग आते हैं और कहीं पर भी नहाने लगते हैं. दूसरी तरफ इस दर्द की हकीकत वे लोग बखूबी जानते हैं जिन्होंने अपने घर के चिरागों को हमेशा के लिए खो दिया.

सरकार की कोई नीति ही नहीं

ऋषिकेश में हर साल लाखों लोग रिवर राफ्टिंग करते हैं, करोड़ों का कारोबार होता है. 1,500 के आसपास वैधअवैध राफ्ट संचालित होती हैं और हजारों लोग इस से जुड़े हुए हैं. यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है साथ ही, मौत का खतरा भी उन के सिर पर मंडराता है. इस का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इतना सब होने के बावजूद उत्तराखंड सरकार के पास इस को ले कर कोई ठोस नीति नहीं है.

वर्ष 1985 में राफ्टिंग की केवल 3 कंपनियां काम करती थीं. सिर्फ विदेशी पर्यटक ही राफ्टिंग के लिए आते थे. उत्तराखंड तब उत्तर प्रदेश में ही आता था. 25 सितंबर, 1999 में रिवर राफ्टिंग का शासनादेश जारी किया गया. अब 140 रजिस्टर्ड कंपनियां हैं व इस से ज्यादा अवैध कंपनियों की भी राफ्ट चलती हैं. लेकिन एक दशक बाद भी उत्तराखंड सरकार कोई नीति नहीं बना सकी. न तो राफ्ट वालों की किसी तरह की निगरानी होती है और न ही लाइसैंस देने के बाद किसी तरह की उन की जांच की जाती है.

पर्यटन सचिव उमाकांत पंवार कहते हैं कि सरकार इस कारोबार व हादसों को ले कर गंभीर हो रही है. यही वजह है कि नई गाइडलाइन बनाई जा रही है जिसे जल्द लागू कर दिया जाएगा.

मौत का जिम्मेदार कौन

रिवर राफ्टिंग के दौरान होने वाली मौतों के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, इस सवाल का जवाब भी आज तक शायद सरकार या पुलिस को नहीं मिल सका है. यही वजह है कि जब भी कोई डूब कर मरता है तो उस के लिए किसी को जिम्मेदार मान कर कार्यवाही तक नहीं की जाती. रिवर राफ्टिंग के दौरान पूरे मानक थे या नहीं, उसे संचालित करने वाले लाइसैंसशुदा थे या नहीं, इन बातों की भी जांच नहीं की जाती. सरकार पर दब्बू रवैया अपनाने का आरोप भले ही लगे लेकिन राजनीति का चश्मा और वोटबैंक कोई खराब नहीं करना चाहता. हजारों परिवार इस धंधे से जुड़े हैं. स्थानीय स्तर पर उन की नाराजगी कोई नहीं चाहता. इस के लिए स्थानीय नेता या संगठन भी आवाज नहीं उठाते. दूरदराज से आ कर खतरनाक खेल खेलने वालों को भी सोचना जरूर चाहिए कि जिंदगी सस्ती नहीं है. लहरों में रोमांच के साथ मौत भी टहलती है.

Crime: लिफ्ट का बहाना, कहीं लुट न जाना

अगर आप राष्ट्रीय राजमार्गों पर अपने या अनजान वाहनों से सफर करते हैं और लिफ्ट लेने या देने में यकीन रखते हैं तो सावधान हो जाइए. क्योंकि इन दिनों राह चलते लूटमारी करने वाले गैंग विविध वेशों और परिस्थितियों में आप को लूट या हत्या का शिकार बनाने के लिए मंडरा रहे हैं. पढि़ए नितिन सबरंगी का लेख.

आप घर से दफ्तर, किसी टूर या अन्य काम से निकलते हैं तो घर सुरक्षित वापस आ जाएंगे या किसी अनहोनी का शिकार नहीं होंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं. वाहन नहीं है तो हो सकता है रास्ते में कहीं लिफ्ट लें और यदि वाहन है तो हो सकता है दयाभाव मन में आए और आप किसी को लिफ्ट दे दें लेकिन लिफ्ट का चक्कर कई बार माल और जान दोनों पर भारी पड़ जाता है. राहजनी करने वालों की गिद्ध दृष्टि सड़कों पर शिकार तलाशती रहती है और आप को पता भी नहीं चलता. जो जाल में फंसता है उसे कोई नहीं बचा सकता.

राष्ट्रीय राजमार्गों पर ऐसे कई खतरनाक गिरोह सक्रिय हैं जो लिफ्ट दे कर लोगों को लूटते हैं. मामूली लालच में वे हत्या करने से भी नहीं चूकते. चारपहिया वाहन चालकों से लिफ्ट लेने में भी ये माहिर खिलाड़ी होते हैं. वाहन चालक झांसे में आ जाए, इस के लिए वे अपने साथ महिला व बच्चों को भी रखते हैं. लूटने वालों ने अनोखे तरीके ईजाद किए हुए हैं. अनजाने में लोग इन के शिकार हो जाते हैं.

डा. सुमन त्यागी, उत्तर प्रदेश के कसबा किठौर में निजी क्लीनिक चलाती थीं. एक दिन वे क्लीनिक के लिए निकलीं, लेकिन रहस्यमय हालात में लापता हो गईं. उन का मोबाइल भी स्विच औफ हो गया. परिजनों को चिंता हुई. इंतजार के बाद गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुई. जम कर खोजबीन हुई. पार्षद पति डा. ब्रजेश त्यागी व उन से जुड़े लोगों ने हंगामा किया, जाम लगाया और पुलिस पर नाकामी का आरोप लगाया.

पुलिस ने अपहरण की धाराओं में मामला भी दर्ज कर लिया. सुमन को जमीन निगल गई थी या आसमान, कोई नहीं जानता था. कई महीने तक भी उन के जिंदा या मुर्दा होने का कुछ पता न चला. परिजनों ने सूचना देने वाले को 5 लाख रुपए का इनाम देने के पोस्टर भी कई स्थानों पर चस्पां कराए. डेढ़ साल के बाद भी सुमन का कोई सुराग नहीं लगा. परिजन व पुलिस दोनों ही थक कर शांत बैठ गए थे कि अचानक 13 जून को इस का राज खुल गया.

गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद पुलिस ने बावरिया गिरोह के 5 बदमाशों को गिरफ्तार किया. उन्होंने राजमार्गों पर होने वाली लूट व हत्याओं की कई वारदातों का इकबाल किया. इसी गिरोह ने कुबूल किया कि डा. सुमन त्यागी को भी उस ने ही अपनी जीप में लिफ्ट दे कर पहले लूट का शिकार बनाया और फिर गला दबा कर हत्या कर के शव को नहर में फेंक दिया.

फेंक देते थे नहर में शव

बेहद खूंखार इस गैंग ने दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत, अलीगढ़, नोएडा व हापुड़ जैसे स्थानों को अपने निशाने पर रखा हुआ था. गिरोह का लूट का तरीका बिलकुल अलग था. ये लोग अपने पास बोलेरो जीप रखते थे. बस अड्डों पर बस के इंतजार में खड़े लोगों को बैठा लेते थे. लोग आसानी से झांसे में आ जाएं, इस के लिए अपनी पत्नी व बच्चों को भी बैठा कर रखते थे. रास्ते में लूटपाट कर के उन्हें सड़क पर हत्या कर के किसी जंगल या नहर में शव फेंक देते थे. गिरोह ने इसी तरह 100 से ज्यादा वारदातें कीं. पकड़े जाने के डर से ये इलाका बदलते रहते थे. हत्या व लूट के कई मामलों से परदा तो उठ गया, लेकिन इस के सरगना को पुलिस नहीं पकड़ सकी.

गाजियाबाद के तत्कालीन एसएसपी नितिन तिवारी का कहना है, ‘‘लोगों को अनजान लोगों व डग्गामारी करने वालों के वाहनों में बैठने से बचना चाहिए. पकड़े गए बदमाशों के अलावा और भी बदमाश हैं जो ऐसी ही वारदातें करते हैं. हम उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं.’’

नएनए हथकंडे

हाईवे पर लूट के कई तरीके हैं. कोई लिफ्ट दे कर लूटता है तो कोई ले कर. कोई पंक्चर होने की बात कर के तो कोई पैर पर गाड़ी चढ़ने की बात कह कर. कुश शर्मा नोएडा की एक मोबाइल कंपनी में जौब करता है. अपने परिजनों से मिल कर वह स्विफ्ट कार में सवार हो कर मेरठ से औफिस जा रहा था. वह जैसे ही मुरादनगर पहुंचा तो हलका जाम लग गया. इसी बीच एक युवक शीशे पर हाथ मार कर बाईं ओर से चिल्लाया कि मेरे पैर पर गाड़ी चढ़ा दी. कुश घबराहट में गाड़ी रोक कर नीचे उतर गया. युवक ने बेवजह शोर मचाया, ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था. वह वापस सीट पर आ कर बैठ गया. लेकिन इसी बीच डैशबोर्ड पर रखे उस के 2 महंगे मोबाइल गायब हो चुके थे. गाड़ी पैर पर चढ़ने की बात करने वाला युवक भी पलक झपकते ही नदारद हो गया.

दरअसल, कुश लूटपाट करने वाले गिरोह का शिकार हो गया था. यूपी के नैशनल हाईवे पर पड़ने वाले मोदीनगर व मुरादनगर थाने में इसी तरह के कई मामले दर्ज हैं. लूट करने वालों का दूसरा तरीका होता है आप की कार में पंक्चर बता कर. यह गिरोह कार में चलता है और उस के कुछ सदस्य पैदल होते हैं. गिरोह के सदस्य चालक को बताते हैं कि उस की कार के पिछले पहिए में पंक्चर हो गया है या पैट्रोल लीक हो रहा है. चालक नीचे उतर कर देखता है तो लूट का शिकार हो जाता है. एनसीआर के इंदिरापुरम थाने की पुलिस ने ऐसे गिरोह के 4 सदस्यों को गिरफ्तार कर के कुछ मामलों का खुलासा किया. बकौल इंस्पैक्टर राजेश द्विवेदी, ‘‘हम ने जिस गिरोह को पकड़ा वह लोगों की कार के डैशबोर्ड पर रखे महंगे मोबाइल फोन लूटता था. यह गिरोह उन्हीं को निशाना बनाता था जो अधिकांश अकेले होते थे या जिन के डैशबोर्ड पर मोबाइल रखे होते थे. महंगे मोबाइल को डैशबोर्ड पर रखना लुटेरों को न्यौता देने जैसा साबित हो रहा है.’’

छात्र बन कर लेते हैं लिफ्ट

युवकों का ऐसा भी गिरोह होता है जो छात्र बन कर पहले लिफ्ट लेता है फिर लूटता है. चैकिंग के दौरान गाजियाबाद पुलिस ने शादाब, वसीम व अंकित को गिरफ्तार किया. इन तीनों बदमाशों के पास चोरी की 2 बाइकें व कुछ हथियार मिले. यह गिरोह रात को पीठ पर बैग लटका कर छात्रों की ड्रैस पहन कर खड़ा हो जाता था और कार चालकों से लिफ्ट लेता था. लिफ्ट देने वालों को लूट लिया जाता था. कई बार मोटरसाइकिल से कार को ओवरटेक कर के भी लूटपाट करते थे. जब अंकित से पूछा गया कि यह आइडिया कहां से आया तो उस ने बताया कि कार चालक जल्दी विश्वास करें, इसलिए वे छात्र बन कर रहते थे, ताकि लिफ्ट मिल जाए.

अंडामार लुटेरे

वाहन चालकों को लूट का शिकार बनाने के लिए अनोखे तरीके अपनाए जाते हैं. सड़कों पर अंडामार लुटेरे भी होते हैं. आप की चलती कार के शीशे पर यदि कोई मुरगी का अंडा फेंक दे तो उसे साफ करने के लिए कार रोकने, पानी डाल कर वाइपर चलाने की तत्काल गलती न करें. इस से लुटेरे आप को अपना शिकार बना सकते हैं. दरअसल, जैसे ही अंडे की जर्दी को साफ करने के लिए वाइपर चलाया जाता है, उस की सफेदी पूरे शीशे पर फैल जाती है. इस से शीशा बुरी तरह धुंधला हो जाता है मजबूरन कार रोकनी पड़ती है और इसी बीच पीछा करता गिरोह लूटपाट शुरू कर देता है.

लुटेरी हसीनाएं

सुनसान सड़क या बस स्टौप पर, कोई जींसटौप पहने खूबसूरत युवती आप से मोहक मुसकान के साथ लिफ्ट मांगे तो कई बार सोच लें, क्योंकि यह नुकसानदेह हो सकता है. ऐसी युवतियां लूट करने वाले गिरोह की सदस्य भी हो सकती हैं. कई बार वे अपने साथियों से लुटवा देती हैं तो कई बार हथियार की नोंक व इज्जत से खिलवाड़ करने का आरोप लगाने की धमकी दे कर खुद ही लूट लेती हैं. मामला लड़की का होता है, इसलिए शर्मिंदगी में कई बार लूट का शिकार व्यक्ति किसी से कुछ कह भी नहीं पाता. कई हाईवेज पर ऐसी लड़कियां सक्रिय हैं जिन्हें हर वक्त अपने शिकार की तलाश रहती है.

रिटर्न गिफ्ट- भाग 3: अंकिता को बर्थडे पर क्या गिफ्ट मिला

ये अगर कोई उलटीसीधी बात मुंह से न निकालें तो कितना अच्छा हो. तब मैं इन से अपने संबंध सदा के लिए तोड़ने की पीड़ा से बच जाऊंगी. मुझे अपनी प्रेमिका बनाने की इच्छा को जबान पर मत लाना, प्लीज. मन ही मन ऐसी प्रार्थना करते हुए मैं राकेशजी के साथ पार्क में प्रवेश कर गई थी.

मेरा हाथ पकड़ कर कुछ दूर चलने के बाद उन्होंने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘अपने जन्मदिन पर क्या तुम मुझे एक रिटर्न गिफ्ट दोगी?’’

‘‘मेरे बस में होगा तो जरूर दूंगी,’’ आगे पैदा होने वाली स्थिति का सामना करने के लिए मैं गंभीर हो गई.

कुछ पलों की खामोशी के बाद उन्होंने कहा, ‘‘अंकिता, जिंदगी में कभी ऐसे मौके भी आते हैं जब हमें पुरानी मान्यताओं और अडि़यल रुख को त्याग कर नए फैसले करने पड़ते हैं. नई परिस्थितियों को स्वीकार करना पड़ता है. क्या तुम्हें थोड़ाबहुत अंदाजा है कि मैं तुम से रिटर्न गिफ्ट में क्या चाहता हूं?’’

‘‘आप के मन की बात मैं कैसे बता सकती हूं,’’ मैं ने उन्हें आगे कुछ कहने से रोकने के लिए रूखे लहजे में जवाब दिया.

‘‘इस का जवाब मैं तुम्हें एक छोटी सी कहानी सुना कर देता हूं. किसी राज्य की राजकुमारी रोज सुबह भिखारियों को धन और कपड़े दोनों दिया करती थी. एक दिन महल के सामने एक फकीर आया और गरीबों की लाइन से हट कर चुपचाप एक तरफ खड़ा हो गया.

‘‘राजकुमारी के सेवकों ने उस से कई बार कहा कि वह लाइन में न भी लगे पर अपने मुंह से राजकुमारी से जो भी चाहिए उसे मांग तो ले. फकीर ने तब सहज भाव से उन लोगों को जवाब दिया था, ‘क्या तुम्हारी राजकुमारी को मेरा भूख से पिचका हुआ पेट, फटे कपड़े और खस्ता हालत नजर नहीं आ रही है? मुझे उस के सामने फिर भी हाथ फैलाने पड़ें या गिड़गिड़ाना पड़े तो बात का मजा क्या. और फिर मुझे ऐसी नासमझ राजकुमारी से कुछ नहीं चाहिए.’

‘‘अंकिता, जब कभी तुम्हें भी एहसास हो जाए कि मुझे रिटर्न गिफ्ट में क्या चाहिए तो खुद ही उसे मुझे दे देना. उस फकीर की तरह मैं भी कभी तुम्हें अपने मन की इच्छा अपने मुंह से नहीं बताना चाहूंगा,’’ उन्होंने बड़ी चालाकी से सारे मामले में पहल करने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी थी.

‘‘जब मुझे आप की पसंद की गिफ्ट का एहसास हो जाएगा तो मैं अपना फैसला आप को जरूर बता दूंगी, अब यहां से चलें?’’

‘‘हां,’’ उन के चेहरे पर एक उदास सी मुसकान उभरी और हम वापस गेट की तरफ चल पड़े थे.

‘‘अब आप मुझे मेरे घर छोड़ दो, प्लीज,’’ मेरी इस प्रार्थना को सुन कर वह अचानक जोर से हंस पड़े थे.

‘‘अरे, अभी एक बढि़या सरप्राइज तुम्हारे लिए बचा कर रखा है. उस का मजा लेने के बाद घर जाना,’’ वह एकदम से सहज नजर आने लगे तो मेरा मन भी तनावमुक्त होने लगा था.

मुझे सचमुच उन के घर पहुंच कर जबरदस्त सरप्राइज मिला.

उन के ड्राइंगरूम में मेरी शानदार बर्थडे पार्टी का आयोजन शिखा ने बड़ी मेहनत से किया था. उस ने बड़ी शानदार सजावट की थी. मेरी खास सहेलियों को उस ने मुझ से छिपा कर बुलाया हुआ था.

‘‘हैप्पी बर्थडे, अंकिता,’’ मेरे अंदर घुसते ही सब ने तालियां बजा कर मेरा स्वागत किया तो मेरा मन खुशी से नाच उठा था.

अचानक मेरी नजर अपनी मम्मी पर पड़ी तो मैं जोशीले अंदाज में चिल्ला उठी, ‘‘अरे, आप यहां कैसे? इस शानदार पार्टी के बारे में आप को तो कम से कम मुझे जरूर बता देना चाहिए था.’’

‘‘हैप्पी बर्थडे, माई डार्लिंग. मुझे ही शिखा ने 2 घंटे पहले फोन कर के इस पार्टी की खबर दी तो मैं तुम्हें पहले से क्या बताती?’’ उन्होंने मुझे छाती से लगाने के बाद जब मेरा माथा प्यार से चूमा तो मेरी पलकें भीग उठी थीं.

कुछ देर बाद मैं ने चौकलेट वाला केक काटा. मेरी सहेलियों ने मौका नहीं चूका और मेरे गालों पर जम कर केक मला.

खाने का बहुत सारा सामान वहां था. हम सब सहेलियों ने डट कर पेट भरा और फिर डांस करने के मूड में आ गए. सब ने मिल कर सोफे दीवार से लगाए और कमरे में डांस करने की जगह बना ली.

मस्त हो कर नाचते हुए अचानक मेरी नजर राकेशजी पर पड़ी. वह मंत्रमुग्ध से हो कर मेरी मम्मी को देख रहे थे. तालियां बजा कर हम सब का उत्साह बढ़ा रही मम्मी को कतई अंदाजा नहीं था कि वह किसी की प्रेम भरी नजरों का आकर्षण केंद्र बनी हुई थीं.

उसी पल में बहुत सी बातें मेरी समझ में अपनेआप आ गईं, राकेशजी पिछले दिनों मम्मी को पाने के लिए मेरा दिल जीतने की कोशिश कर रहे थे और मैं कमअक्ल इस गलतफहमी का शिकार हो गई कि वह मुझ से इश्क लड़ाने के चक्कर में थे.

‘तो क्या मम्मी भी उन्हें चाहती हैं?’ अपने मन में उभरे इस सवाल का जवाब पाना मेरे लिए एकाएक ही बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया.

‘‘मैं पानी पी कर अभी आई,’’ अपनी सहेलियों से यह बहाना बना कर मैं ने नाचना रोका और सीधे राकेशजी के पास पहुंच गई.

‘‘तो आप मुझ से और ज्यादा गहरे और मजबूत संबंध मेरी मम्मी को अपनी जीवनसंगिनी बना कर कायम करना चाहते हैं?’’ मेरा यह स्पष्ट सवाल सुन कर राकेशजी पहले चौंके और फिर झेंपे से अंदाज में मुसकराते हुए उन्होंने अपना सिर कई बार ऊपरनीचे हिला कर ‘हां’ कहा.

‘‘और मम्मी क्या कहती हैं आप को अपना जीवनसाथी बनाने के बारे में?’’ मैं तनाव से भर उठी.

‘‘पता नहीं,’’ उन्होंने गहरी सांस छोड़ी.

‘‘इस ‘पता नहीं’ का क्या मतलब है, सर?’’

‘‘सारा आफिस जानता है कि तुम उन की जिंदगी में अपने सौतेले पिता की मौजूदगी को स्वीकार करने के हमेशा से खिलाफ रही हो. फिलहाल तो हम बस अच्छे सहयोगी हैं. अब तुम्हारी ‘हां’ हो जाए तो मैं उन का दिल जीतने की कोशिश शुरू करूं,’’ वह मेरी तरफ आशा भरी नजरों से देख रहे थे.

‘‘क्या आप उन का दिल जीतने में सफल होने की उम्मीद रखते हैं?’’ कुछ पलों की खामोशी के बाद मैं ने संजीदा लहजे में पूछा.

‘‘अगर मैं ने बेटी का दिल जीत लिया है तो फिर यह काम भी कर लूंगा.’’

‘मेरा तो बाजा ही बजवा दिया था आप ने,’ मैं मुंह ही मुंह में बड़बड़ा उठी और फिर उन के बारे में अपने मनोभावों को याद कर जोर से शरमा भी गई.

‘‘क्या कहा तुम ने?’’ मेरी बड़बड़ाहट को वह समझ नहीं सके और मेरे शरमाने ने उन्हें उलझन का शिकार बना दिया था.

‘‘मैं ने कहा है कि मैं अभी ही आप के सवाल पर मम्मी का जवाब दिलवा देती हूं. वैसे क्या शिखा को आप के दिल की यह इच्छा मालूम है, अंकल?’’ बहुत दिनों के बाद मैं ने उन्हें उचित ढंग से संबोधित किया था.

‘‘तुम ने हरी झंडी दिखा दी तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा,’’ उन्होंने बड़े अधिकार से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे उन के स्पर्श में सिर्फ स्नेह और अपनापन ही महसूस हुआ.

‘‘आप चलो मेरे साथ,’’ उन्हें साथ ले कर मैं मम्मी के पास आ गई.

मैं ने मम्मी से थोड़ा इतराते हुए पूछा, ‘‘मौम, अगर अपने साथ के लिए मैं एक हमउम्र बहन बना लूं तो आप को कोई एतराज होगा?’’

‘‘बिलकुल नहीं होगा,’’ मम्मी ने मुसकराते हुए फौरन जवाब दिया.

‘‘राकेश अंकल रिटर्न गिफ्ट मांग रहे हैं.’’

‘‘तो दे दो.’’

‘‘आप से पूछना जरूरी है, मौम.’’

‘‘समझ ले मैं ने ‘हां’ कर दी है.’’

‘‘बाद में नाराज मत होना.’’

‘‘नहीं होऊंगी, मेरी गुडि़या.’’

‘‘रिटर्न गिफ्ट में अंकल आप की दोस्ती चाहते हैं. आप संभालिए अपने इस दोस्त को और मैं चली अपनी नई बहन को खुशखबरी देने कि उस की जिंदगी में बड़ी प्यारी सी नई मां आ गई हैं,’’ मैं ने अपनी मम्मी का हाथ राकेशजी के हाथ में पकड़ाया और शिखा से मिलने जाने को तैयार हो गई.

‘‘इस रिटर्न गिफ्ट को मैं सारी जिंदगी बड़े प्यार से रखूंगा,’’ राकेशजी के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर मम्मी जिस अंदाज में लजाईंशरमाईं, वह मेरी समझ से उन के दिल में अपने नए दोस्त के लिए कोमल भावनाएं होने का पक्का सुबूत था.

क्या आपको पता है गरमी के मौसम में शहतूत खाने के ये फायदे

गरमी के मौसम में बाजार में शहतूत की आवक खूब होती?है और इस के स्वाद के दीवानों की भी कमी नहीं है. खट्टामीठा, रसीला शहतूत स्वाद में तो मजेदार है ही, सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है.  शहतूत 2 प्रकार के पाए जाते हैं, एक काला और दूसरा हरा. हरे शहतूत के फायदों में हड्डियों को मजबूत करना, दिल की सुरक्षा करना और मूत्रवर्धक प्रभाव शामिल है. यह बहुत पौष्टिक भी होता है. यह एंटीऔक्सीडैंट का एक अच्छा स्रोत है.

  1. शहतूत में प्रोटीन और विटामिन ए, विटामिन ई, विटामिन सी भरपूर होता है.
  2. यह कैल्शियम, आयरन, फोलेट, थायमिन और नियासिन का अच्छा स्रोत है.
  3. दिल के लिए शहतूत के सेवन से एचडीएल (अच्छा कोलैस्ट्रोल) बढ़ता है और कुल कोलैस्ट्रोल कम होता है.
  4. इस प्रकार यह एथोस्क्लेरोसिस यानी दिल का दौरा, स्ट्रोक और कोरोनरी हार्ट रोग के जोखिम को कम करता है.
  5. शहतूत में पाए जाने वाले रेस्वेराट्रोल के बारे में माना जाता है कि यह शरीर में फैले प्रदूषण को साफ कर के संक्रमित चीजों को बाहर निकालता है.
  6. अगर आप झुर्रियों से परेशान हैं, तो अब चिंता करने की कोई बात नहीं. इस के लिए शहतूत का जूस पीजिए. आप का चेहरा चमकदार और ताजा हो जाएगा.
  7. शहतूत में एंटी एज यानी उम्र को रोकने वाला गुण होता है. साथ ही, यह त्वचा को जवानी की तरह जवां बना देता है और झुर्रियों को चेहरे से गायब कर देता है.
  8. यह आप के तनाव को दूर करता है.
  9. साथ ही, शरीर में रक्त के थक्के बनने से रोकता है, जिस से खून का बहाव निर्बाध रूप से सभी अंगों तक होता है.
  10. खून में मौजूद शर्करा पर भी यह नियंत्रण करता है.
  11. इतना ही नहीं, शहतूत में और भी कई गुण पाए जाते हैं, जैसे इस के नियमित प्रयोग से आंखों की गड़बड़ी, फेफड़े के कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर से बचा जा सकता है.
  12. शहतूत खाने से पाचनशक्ति अच्छी रहती है.
  13. ये सर्दीजुकाम में भी बेहद फायदेमंद है.
  14. यूरिन से जुड़ी कई समस्याओं में भी शहतूत बेहद फायदेमंद होता है.
  15. शहतूत खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती?है.
  16. गरमियों में शहतूत के सेवन से लू लगने का खतरा कम हो जाता है.
  17. शहतूत खाने से लिवर से जुड़ी बीमारियों में राहत मिलती है.

वैसे, गरमी के मौसम में खीरा, तरबूज,  लस्सी और छाछ का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए. इस के प्रयोग से हमारे शरीर में जल तत्त्व बढ़ता है. जल तत्त्व के चलते यह सभी रोगों को नियंत्रित करता है. गरमियों के मौसम में जल ही जीवन है.

डा. नवीन सिंह  

एक गलती- भाग 3: क्या उन समस्याओं का कोई समाधान निकला?

फिर अंजन बोला, ‘‘पर कोई बात नहीं. सारी परिस्थितियों को देखते हुए अंकल और आप को इतना दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता है. हां, गलती आप की सिर्फ इतनी है कि आप ने यह बात इतने दिनों तक पापा से छिपा कर उन का विश्वास तोड़ा है, जो वे आप और अंकल पर करते थे. आप को यह बात उसी समय पापा को बता देनी चाहिए थी.’’

अमिता बोली, ‘‘भैया, तुम भी कैसी बात करते हो. क्या पापा आज जिस बात को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं उसे उस समय सहजता से सुन लेते?’’

अंजन बोला, ‘‘सुन लेते, इस समय उन्हें ज्यादा धक्का इस बात का लगा है कि मम्मी ने यह सच उन से इतने दिनों तक छिपाया.’’

‘‘तुम गलत कह रहे हो. अगर मम्मी न छिपातीं तो यकीनन दोनों परिवारों का विघटन हो जाता. पापा और आंटी दोनों ही इस बात को सहजता से न ले पाते.’’

अंजन बोला, ‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो, मम्मी ने ठीक ही किया. चलो, हम लोग पापा को समझाते हैं और संकर्षण को भी.’’

‘‘मम्मी, आप संकर्षण के पास हौस्पिटल जाओ हम लोग थोड़ी देर में आते हैं.’’

मेरे हौस्पिटल जाने के बाद अंजन आशीष के पास जा कर बोला, ‘‘मम्मी ने हम लोगों को सारी बात बता दी है. अब आप यह बताइए कि आप को मम्मी की किस बात पर अधिक गुस्सा है, मम्मी और अंकल के बीच जो कुछ हुआ उस पर अथवा उन्होंने यह बात आप से छिपाई उस पर?’’

‘‘दोनों पर.’’

‘‘अधिक किस बात पर गुस्सा है?’’

‘‘बात छिपाने पर.’’

‘‘अगर वे उस समय सच बता देतीं तो क्या आप मम्मी और अंकल को माफ कर देते?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो कितनी जिंदगियां बरबाद हो जातीं, यह आप ने कभी सोचा है? यह सत्य आज पता चला है. तब भी संकर्षण, आप और मम्मी मानसिक यंत्रणा से गुजर रहे हैं जबकि आप को मम्मी और अंकल पर कभी शक तक नहीं हुआ. इतना तो तय है कि वह क्षणिक गलती मात्र थी. उस गलती की आप मम्मी को और स्वयं को इतनी बड़ी सजा कैसे दे सकते हैं?’’

आशीष बोले, ‘‘पता नहीं. दिमाग तो तुम्हारी बात मान रहा है, पर दिल नहीं.’’

‘‘दिल को समझाएं. पापा, देखिए मम्मी कितनी परेशान हैं.’’

मैं हौस्पिटल में अमिता और अंजन का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. ऐसा लग रहा था मेरी परीक्षा का परिणाम निकलने वाला है. तभी अमिता और अंजन मुझे आते दिखाई दिए. पास आए तो मैं ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘धैर्य रखें समय लगेगा,’’ अंजन ने कहा और फिर संकर्षण से बोला, ‘‘क्या हालचाल है?’’

संकर्षण ने बिना उन लोगों की ओर देखे कहा, ‘‘ठीक हूं.’’

अमिता और अंजन ने मुझे घर जाने को कहा. बोले, ‘‘आप घर जा कर आराम करिए हम लोग संकर्षण के पास हैं.’’

अमिता और अंजन के समझाने और मनोचिकित्सक के इलाज से संकर्षण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह दवा लेने लगा. साथ ही यह भी पता चला कि उस की बीमारी जेनेटिक न हो कर उस दवा की ऐलर्जी है, जो दवा वह खा रहा था. हालांकि उस दवा से ऐलर्जी के चांसेज .001% होते हैं, पर संकर्षण को थी. कारण पता चल जाने पर उस का इलाज सही होने लगा और वह स्वस्थ होने लगा. आशीष भी ऊपर से सामान्य दिखने लगे.

संकर्षण को हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई. उसे घर ले जाने का समय आ गया. हम सभी बहुत बड़े चक्रवात से निकल आए थे. घर जाने से पूर्व आशीष हौस्पिटल का बिल भरने गए थे और मैं मैडिकल स्टोर से संकर्षण की दवा खरीदने. तभी गेट पर मुझे संन्यासी की वेशभूषा में एक आदमी मिला जो मुझे देख कर बोला, ‘‘संकर्षण कैसा है?’’

मैं ने चौंक कर उस की ओर देखा तो पता चला कि वह संन्यासी कोई और नहीं गगन ही हैं.

‘‘ठीक है, आप इतने दिनों तक कहां थे?’’

वे बोले, ‘‘यह सब न पूछिए. आप का ई-मेल पूरे ग्रुप में घूम रहा है. पता चला तो चला आया. आशीष सब कुछ जान गए होंगे? क्या प्रतिक्रिया रही उन की? मैं तो उन से नजरें मिलाने के काबिल भी न रहा. संकर्षण की जिंदगी का सवाल नहीं होता तो मैं यहां कभी न आता. चलिए डाक्टर से कह कर डीएनए टैस्ट करवा लूं.’’

‘‘नहीं, अब उस की कोई जरूरत नहीं है. उस की बीमारी जेनेटिक नहीं थी.’’

‘‘क्या संकर्षण भी जान गया है कि मैं उस का पिता हूं?’’

‘‘हां.’’

‘‘संकर्षण को कब तक हौस्पिटल से छुट्टी मिलेगी? कितना समय लगेगा उस के ठीक होने में?’’

‘‘अब संकर्षण बिलकुल ठीक है. बस थोड़ी कमजोरी है. आज हम लोग उसे घर ले जा रहे हैं.’’

‘‘ठीक है फिर मैं चलता हूं,’’ कह कर गगन जाने को तैयार हो गए.

मैं ने कहा, ‘‘संकर्षण से मिलेंगे नहीं?’’

‘‘नहीं, जो उथलपुथल इस सत्य को जान कर आप सभी की जिंदगी में मची होगी और किसी प्रकार सब कुछ शांत हुआ होगा, वह सब मुझे देख कर पुन: होने की संभावना है. वैसे भी मैं मोहमाया का परित्याग कर चुका हूं और एक एनजीओ में गांव के बच्चों के लिए काम कर रहा हूं. संकर्षण को मेरा प्यार कहिएगा और आशीष से कहिएगा कि हो सके तो मुझे क्षमा कर दें,’’ इतना कह कर वे वहां से चले गए. मैं उन्हें जाते हुए तब तक देखती रही जब तक नजरों से ओझल नहीं हो गए.

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