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धर्म की जड़

एक धर्म प्रचारक टैलीग्राम चैनल पर एक महानुभाव, जो अपना नाम विलाव दावड़ा लिखते हैं, दावा करते हैं कि एक मंदिर के पास 10,80,00,000 रुपए की संपति थी जिसे ब्राह्मणों ने कुछ हजार रुपए के लालच में लूटने दिया और अपना चोरी का हिस्सा ले कर पूरे विश्व में वर्ण ब्रहता को बदनाम कर दिया.

मंदिरों की संपत्ति को ले कर इस तरह के बेसिरपैर के दावे आज भी हो रहे हैं और पहले भी होते रहे हैं. फर्क यह है कि आधुनिक टैक्नोलौजी के कारण आज ये दूरदूर तक फैलाए जा सकते है. पहले अपनेअपने धर्म का चोगा पहन कर इस तरह के झूठ प्रचारक घरघर पहुंचाते थे. वह काम कठिन था और उस के लिए प्रचारकों को अपने खानेपीने, पहनने व रहने की व्यवस्था करनी पड़ती थी.

हर धर्म में चमत्कारों का बहुत महत्त्व रहा है. हर धर्म के ग्रंथों में कहानियों का भंडार है जिन में रहस्य, रोमांच, प्रेम, हत्या, पुनर्जीवित होना, भूतप्रेत बनना सब शामिल हैं. हर धर्म कहता रहता है कि उस के पास अमर रहने का फार्मूला है. वह बीमारियों को ठीक कर सकता है, पहाड़ों को हिला सकता है, समुद्र को सुखा सकता है, आसमान में उड़ सकता है.

लेकिन हर धर्म का असल उद्देश्य वही है जो विलाव दावड़ा ने बताया- पैसा जमा करना. अगर ऐसा कोई मंदिर कहीं था जिस के पास अरबों रुपयों की संपत्ति थी तो सवाल उठता है कि वह संपत्ति आखिर जमा कैसे हुई? इस भारीभरकम संख्या का उद्देश्य यही है कि हर गांव, कसबे या मंदिर उतना नहीं तो लाखों तो मंदिर के नाम पर जमा करे.

मंदिरों में जमा पैसों की कहानियां सुनसुन कर बहुत से लुटेरे मंदिरों पर आक्रमण करते थे. आक्रमणकारियों में कुछ विद्यर्मी होते थे, कुछ विदेशी. हर आक्रमण में कुछ निर्दोष भक्त भी मारे जाते रहे हैं. सोमनाथ के मंदिर की कहानियां आज भी भारतीयों के मस्तिष्क में बैठी हैं जबकि उस का इतिहास घटना के कई दशकों बाद एक मुसलिम इतिहासकार ने लिखा था. सोमनाथ मंदिर की संपत्ति का बढ़ाचढ़ा कर वर्णन आज भी आम हिंदू को बेहद टीस होने वाला है पर यही टीस भक्त को अपने निकट के मंदिर या अपने इष्ट देवता के मंदिर को भरपूर चढ़ावा देने को प्रेरित करती है.

इस सपंत्ति का क्या होता है, यह भी भक्त प्रचारक ने 5 लाइनों के मैसेज में लिख दिया कि कुछ हजारों के लालच में मंदिर के रखवालों ने ही लुटवा दिया. यह आज भी हो रहा है.

धर्म की जड़ भक्तों का पैसा है. इसी मुफ्त के पैसे को पाने के लिए हर धर्म के भक्तों और प्रचारकों की भीड़ जमा होती है. भक्त देते और प्रचारक बिना काम किए खाते हैं. भक्त अनाज उगाते, जानवर पालते, शिकार करते, जोखिम लेते, शरीर तोड़ते, जबकि प्रचारक कहानियों के बदले अपने मंदिरों के लिए पैसा जमा करते हैं.

हर क्षेत्र में राजा के बाद सब से ज्यादा बड़ा भवन धर्म का होता है. वहीं, कई जगह धर्म का भवन राजा के भवन से भी बड़ा होता है. धर्म के नाम पर लोगों को उकसा कर एकदूसरे को मारने को तैयार किया जाता रहा है. सब से नए युद्ध रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को उकसाने वाला और्थोडौक्स क्रिश्चियन चर्च था. …???पैट्रियार्क किरील दी है…??? वह नहीं चाहता कि यूक्रेन का और्थोडौक्स चर्च उस का प्रभुत्व मानने से इनकार कर दे.

लाल भिंडी: वैज्ञानिक तकनीक से बंपर कमाई

डा. शैलेंद्र सिंह, डा. एसके तोमर, डा. एसपी सिंह, डा. एसके सिंह, डा. कंचन

भारतीय किसान पारंपरिक फसलों की खेती से परे अब नईनई फसलें और तकनीकों से खेती कर रहे हैं. किसान नई फसलों को अपने खेतों में स्थान दे कर अच्छी कमाई कर रहे हैं.

ड्रैगन फ्रूट की खेती के बाद अब भारतीय किसान लाल भिंडी की खेती करने के लिए उत्सुक हैं. आप ने हरी भिंडी के बारे में जरूर सुना होगा, लेकिन लाल भिंडी के बारे में शायद ही पहली बार पढ़ रहे होंगे. इसे ‘काशी लालिमा’ भी कहा जाता है.

भिंडी की इस किस्म की कीमत बाजार में काफी ज्यादा है. बड़े शहरों के लोग इसे ऊंचे दामों पर भी खरीदने के लिए तैयार हैं यानी इस की खेती कर के किसान बंपर कमाई कर सकते हैं.

लाल भिंडी की खेती कैसे करें

बाजार में हरी भिंडी की डिमांड हमेशा रहती है और अब लाल भिंडी की ओर लोग आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि हरी भिंडी के मुकाबले इस में पोषक तत्त्वों की मात्रा ज्यादा होती है.

भिंडी की इस नई किस्म की खेती कर के किसान बाजार से अच्छा पैसा कमाना चाहते हैं. लेकिन ऐसे कई किसान हैं, जो यह नहीं जानते कि लाल भिंडी की खेती कैसे की जाती है.

हरी सब्जी सेहत के लिए अच्छी मानी जाती है, लेकिन अब इन के रंगों में बदलाव किया जा रहा है. हरी दिखने वाली भिंडी अब आप को लाल रंग में भी दिखाई देगी. उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने भिंडी को लाल रंग में उगाया और वे ऐसा करने में कामयाब भी हुए. इसे ‘काशी लालिमा’ नाम दिया गया.

भिंडी की इस नई किस्म ‘काशी लालिमा’ में हरी भिंडी के मुकाबले ज्यादा पोषक तत्त्व होते हैं. बाजार में इस के बीज उपलब्ध होने के बाद से मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में किसानों ने इस की खेती करना शुरू कर दिया है.

अनुकूल जलवायु और उपयुक्त मिट्टी

जलवायु और तापमान : साल में 2 बार लाल भिंडी की खेती की जा सकती है. फरवरीमार्च व जूनजुलाई महीने में आप इस की खेती कर सकते हैं. इस की खेती के लिए गरम और कम आर्द्र जलवायु अनुकूल होती है. पौधों के विकास के लिए 5-6 घंटे की धूप आवश्यक होती है. साथ ही, इसे ज्यादा पानी की जरूरत भी नहीं होती.

मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के किसानों ने लाल भिंडी की खेती करना शुरू कर दिया है. देश में लगभग सभी राज्यों में इस की खेती की जा सकती है.

उपयुक्त मिट्टी : बलुई दोमट मिट्टी लाल भिंडी की खेती के लिए उपयुक्त है. ध्यान रहे कि मिट्टी जीवांश व कार्बनिक पदार्थ वाली होनी चाहिए. बीज/पौध रोपण करने से पूर्व मिट्टी के पीएच मान की जांच अवश्य करा लें. इस की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान सामान्य होना चाहिए.

खेत तैयार करने की प्रक्रिया

*  किसान मानसून व ग्रीष्म ऋतु के समय लाल भिंडी की खेती कर सकते हैं.

* बोआई से पहले अच्छी तरह खेत की जुताई करें और कुछ समय के लिए खेत को खुला छोड़ दें.

* यदि आप इस की खेती कर रहे हैं,

तो इस में गोबर की सड़ी खाद डालें और अच्छी तरह खेत की जुताई कर दें. ऐसा

करने से गोबर की खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएगी.

* प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश खेत में डाल दें.

* अब खेत में पानी दें और पलेवा कर दें.

* 2-3 दिन बाद जब जमीन की ऊपरी सतह सूखने लगे, तब दोबारा इस की जुताई कर दें.

* इस के बाद खेत को समतल करने के लिए पाटा चला दें.

बीज रोपण की विधि

खेत तैयार करने के बाद अब बीज रोपण की बारी आती है. इस के लिए सब से पहले ‘काशी लालिमा’ के बीजों को 10-12 घंटे के लिए पानी में भिगो कर रख दें. बीज का अच्छी तरह से अंकुरण हो, इस के लिए इन्हें छाया में सुखा दें.

लाल भिंडी के पौधों को लाइन से रोपित करें. लाइन से लाइन की दूरी 45-60 सैंटीमीटर व लाइन में पौधे से पौधे के बीच 25-30 सैंटीमीटर की दूरी रखें.

औनलाइन खरीद सकते हैं

लाल भिंडी के बीज

अगर आप अपने खेत में लाल भिंडी के बीज लगाना चाहते हैं, तो इस समय आप के स्थानीय बाजार में ये शायद ही उपलब्ध हों. लेकिन आप औनलाइन माध्यम से इस के बीज हासिल कर सकते हैं. औनलाइन ई-कौमर्स वैबसाइट से आप इन बीजों की खरीदी कर सकते हैं.

रोग व बचाव

वैसे तो अन्य सब्जियों के मुकाबले लाल भिंडी में कम रोग लगते हैं. भिंडी की इस किस्म में मच्छर, इल्ली और दूसरे कीट जल्दी नहीं लगते, लेकिन इस के पौधे को लाल मकड़ी से खतरा रहता है. ये पौधों की पत्तियों के नीचे की सतह पर झुंड बना कर रहने लगती हैं और इन का रस चूसते रहते हैं. इस से पौधे का विकास रुक जाता है और धीरेधीरे पूरा पौधा पीला हो कर सूख जाता है.

इस से बचने के लिए पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 10 मिलीलिटर दवा प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

लाल भिंडी की कीमत व कमाई

बाजार में मिलने वाली सामान्य भिंडी की अपेक्षा लाल भिंडी की कीमत काफी ज्यादा है. हरी भिंडी जहां 50 रुपए प्रति किलोग्राम तक की कीमत पर मिलती है, वहीं लाल भिंडी की कीमत 80 से 100 रुपए किलोग्राम तक जाती है. एक एकड़ में तकरीबन 40 से 50 क्विंटल तक उत्पादन हो सकता है.

इस की फसल भी सामान्य भिंडी की अपेक्षा जल्दी तैयार हो जाती है. 45 से 50 दिनों में यह फसल पक कर तैयार हो जाती है. इस की खेती से आप कम समय में ही अच्छी कमाई कर सकते हैं.

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त्यौहार 2022: बंद मुट्ठी- पंडितजी ने नीता से क्या कहा?

रविवार का दिन था. पूरा परिवार साथ बैठा नाश्ता कर रहा था. एक खुशनुमा माहौल बना हुआ था. छुट्टी होने के कारण नाश्ता भी खास बना था. पूरे परिवार को इस तरह हंसतेबोलते देख रंजन मन ही मन सोच रहे थे कि उन्हें इतनी अच्छी पत्नी मिली और बच्चे भी खूब लायक निकले. उन का बेटा स्कूल में था और बेटी कालेज में पढ़ रही थी. खुद का उन का कपड़ों का व्यापार था जो बढि़या चल रहा था.

पहले उन का व्यापार छोटे भाई के साथ साझे में था, पर जब दोनों की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो बिना किसी मनमुटाव के दोनों भाई अलग हो गए. उन का छोटा भाई राजीव पास ही की कालोनी में रहता था और दोनों परिवारों में खासा मेलजोल था. उन की पत्नी नीता और राजीव की पत्नी रिचा में बहनापा था.

रंजन नाश्ता कर के बैठे ही थे कि रमाशंकर पंडित आ पहुंचे.

‘‘यहां से गुजर रहा था तो सोचा यजमान से मिलता चलूं,’’ अपने थैले को कंधे से उतारते हुए पंडितजी आराम से सोफे पर बैठ गए. रमाशंकर वर्षों से घर में आ रहे थे. अंधविश्वासी परिवार उन की खूब सेवा करता था.

‘‘हमारे अहोभाग्य पंडितजी, जो आप पधारे.’’

कुछ ही पल में पंडितजी के आगे नीता ने कई चीजें परोस दीं. चाय का कप हाथ में लेते हुए वे बोले, ‘‘बहू, तुम्हारा भी जवाब नहीं, खातिरदारी और आदर- सत्कार करना तो कोई तुम से सीखे. हां, तो मैं कह रहा था यजमान, इन दिनों ग्रह जरा उलटी दिशा में हैं. राहुकेतु ने भी अपनी दिशा बदली है, ऐसे में अगर ग्रह शांति के लिए हवन कराया जाए तो बहुत फलदायी होता है,’’ बर्फी के टुकड़े को मुंह में रखते हुए पंडितजी बोले.

‘‘आप बस आदेश दें पंडितजी. आप तो हमारे शुभचिंतक हैं. आप की बात क्या हम ने कभी टाली है  अगले रविवार करवा लेते हैं. जो सामान व खर्चा आएगा, वह आप बता दें.’’

रंजन की बात सुन पंडितजी की आंखों में चमक आ गई. लंबीचौड़ी लिस्ट दे कर और कुल 10 हजार का खर्चा बता वे निकल गए.

इस के 2 दिन बाद दोपहर में पंडितजी राजीव के घर बैठे कोल्ड डिं्रक पी रहे थे, ‘‘आप को आप के भाई ने तो बताया होगा कि वे अगले रविवार को हवन करवा रहे हैं ’’

पंडितजी की बात सुन कर राजीव हैरान रह गया, ‘‘नहीं तो पंडितजी, मुझे नहीं पता. क्यों रिचा, क्या भाभी ने तुम्हें कुछ बताया है इस बारे में ’’ अपनी पत्नी की ओर उन्होंने सवालिया नजरों से देखा.

‘‘नहीं तो, कल ही तो भाभी से मेरी फोन पर बात हुई थी, पर उन्होंने इस बारे में तो कोई जिक्र नहीं किया. कुछ खास हवन है क्या पंडितजी ’’ रिचा ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘दरअसल वे इसलिए हवन कराने के लिए कह रहे थे ताकि कामकाज में और तरक्की हो. छोटी बहू, तुम तो जानती हो, हर कोई अपना व्यापार बढ़ाना चाहता है. आप लोगों का व्यापार क्या कम फैला हुआ है उन से, पर आप लोग जरा ठहरे हुए लोग हैं. इसलिए जितना है उस में खुश रहते हैं. बड़ी बहू का बस चले तो हर दूसरे दिन पूजापाठ करवा लें. उन्हें तो बस यही डर लगा रहता है कि किसी की बुरी नजर न पड़ जाए उन के परिवार पर.’’

अपनी बात को चाशनी में भिगोभिगो कर पंडितजी ने उन के सामने परोस दिया. उन के कहने का अंदाज इस तरह का था कि राजीव और रिचा को लगे कि शायद यह बात उन्हीं के संदर्भ में कही गई है.

‘‘हुंह, हमें क्या पड़ी है नजर लगाने की. हम क्या किसी से कम हैं,’’ रिचा को गुस्से के साथ हैरानी भी हो रही थी कि जिस जेठानी को वह बड़ी बहन का दर्जा देती है और जिस से दिन में 1-2 बार बात न कर ले, उसे चैन नहीं पड़ता, वह उन के बारे में ऐसा सोचती है.

‘‘पंडितजी, आप की कृपा से हमें तो किसी चीज की कमी नहीं है, पर आप कहते हैं तो हम भी पूजा करवा लेते हैं,’’ एक मिठाई का डब्बा और 501 रुपए उन्हें देते हुए राजीव ने कहा. उन्हें 15 हजार रुपए का खर्चा बता और उन के गुणगान करते पंडितजी तो वहां से चले गए पर राजीव और रिचा के मन में भाईभाभी के प्रति एक कड़वाहट भर गए. मन ही मन पंडितजी सोच रहे थे कि इन दोनों भाइयों को मूर्ख बनाना आसान है, बस कुनैन की गोली खिलाते रहना होगा.

अगले रविवार जब रंजन के घर वे हवन करा रहे थे तो नीता से बोले, ‘‘बड़ी बहू, मुझे जल्दी ही यहां से जाना होगा. देखो न, क्या जमाना आ गया है. तुम लोगों ने हवन कराने की बात की तो राजीव भैया मेरे पीछे पड़ गए कि हम भी आज ही पूजा करवाएंगे. बताया तो होगा, तुम्हें छोटी बहू ने इस बारे में ’’

‘‘नहीं, पंडितजी, रिचा ने तो कुछ नहीं बताया.’’

नीता उस के बाद काम में लग गई पर उसे बहुत बुरा लग रहा था कि रिचा उस से यह बात छिपा गई. जब उस ने उन्हें हवन पर आने का न्योता दिया था तो उस ने यह कह कर मना कर दिया था कि रविवार को तो उस के मायके में एक समारोह है और वहां जाना टाला नहीं जा सकता.

हालांकि तब नीता को इस बात पर भी हैरानी हुई थी कि आज तक रिचा बिना उसे साथ लिए मायके के किसी समारोह तक में नहीं गई थी तो इस बार अकेली कैसे जा रही है, पर यह सोच कर कुछ नहीं बोली थी कि हर बार हो सकता है साथ ले जाना मुमकिन न हो.

रिचा के झूठ से नीता के मन में एक फांस सी चुभ गई थी.

2 दिन बाद नीता मंदिर गई तो आशीष देते हुए पंडितजी बोले, ‘‘आओ बड़ी बहू. भक्तन हो तो तुम्हारे जैसी. कैसे सेवाभाव से उस दिन भोजन खिलाया था और दक्षिणा देने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी थी. छोटी बहू ने तो 2 चीजें बना कर ही निबटारा कर दिया और दक्षिणा में भी सिर्फ 251 रुपए दिए. मैं तो कहता हूं कि पैसा होने से क्या होता है, दिल होना चाहिए. तुम्हारा दिल तो सोने जैसा है, बड़ी बहू. तुम तो साक्षात अन्नपूर्णा हो.’’

उस के बाद नीता ने तुरंत 501 रुपए निकाल कर पंडितजी की पूजा की थाली में रख दिए.

कुछ दिनों बाद जब रिचा मंदिर आई तो वे उस की प्रशंसा करने लगे, ‘‘छोटी बहू, तुम आती हो तो लगता है कि जैसे साक्षात लक्ष्मी के दर्शन हो गए हैं. कितने प्रेमभाव से तुम सब काम करती हो. तुम्हारे घर पूजा करवाई तो मन प्रसन्न हो गया. कहीं कोई कमी नहीं थी और बड़ी बहू के हाथ से तो पैसा निकलने का नाम ही नहीं लेता. हर सामग्री तोलतोल कर रखती हैं. तुम दोनों बहुओं के बीच क्या कोई कहासुनी हुई है  बड़ी बहू तुम से काफी नाराज लग रही थीं. काफी कुछ उलटासीधा भी बोल रही थीं तुम लोगों के बारे में.’’

रिचा ने तब तो कोई जवाब नहीं दिया, पर उस दिन के बाद से दोनों परिवारों में बातचीत कम हो गई. कहां दोनों परिवारों में इतना अपनापन और प्रेम था कि दोनों भाई और देवरानीजेठानी जब तक एकदो दिन में एकदूसरे से मिल न लें, उन्हें चैन नहीं पड़ता था. यहां तक कि बच्चे भी एकदूसरे से कटने लगे थे.

पंडितजी इस मनमुटाव का फायदा उठा जबतब किसी न किसी भाई के घर पहुंच जाते और कोई न कोई पूजा करवाने के बहाने पैसे ऐंठ लेते. साथ में कभी खाना तो कभी मिठाई, वस्त्र अपने साथ बांध कर ले जाते.

नीता ने एक दिन उन्हें हलवा परोसा तो वे बोले, ‘‘वाह, क्या हलवा बनाती हो बहू. छोटी बहू ने भी कुछ दिन पहले हलवा खिलाया था, पर उस में शक्कर कम थी और मेवा का तो नाम तक नहीं था. जब भी उस से तुम्हारी बात या प्रशंसा करता हूं तो मुंह बना लेती है. क्या कुछ झगड़ा चल रहा है आपस में  यह तो बहू सब संस्कारों की बात है जो गुरु और ब्राह्मणों की सेवा से ही आते हैं. अच्छा, चलता हूं. आज रंजन भैया ने दुकान पर बुलाया है. कह रहे थे कि कहीं पैसा फंस गया है, उस का उपाय करना है.’’

धीरेधीरे पंडितजी दोनों भाइयों के बीच कड़वाहट पैदा करने में तो कामयाब हो ही गए साथ ही उन्हें भ्रमित कर मनचाहे पैसे भी ऐंठ लेते. एकदूसरे की सलाह पर काम करने वाले भाई जब अपनीअपनी दिशा चलने लगे तो व्यापार पर भी इस का असर पड़ा और कमाई का एक बड़ा हिस्सा पंडित द्वारा बताए उपाय और पूजापाठ पर खर्च होने लगा.

नीता और रिचा, जो अपने सुखदुख बांट गृहस्थी और दुनियादारी कुशलता से निभा लेती थीं, अब अपनेअपने ढंग से जीने का रास्ता ढूंढ़ने लगीं जिस के कारण उन की गृहस्थी में भी छेद होने लगे.

पहले कभी पतिपत्नी के बीच शिकवेशिकायत होते थे तो दोनों आपसी सलाह से उसे सुलझा लेती थीं. अकसर नीता राजीव को समझा देती थी कि वह रिचा से गलत व्यवहार न किया करे या फिर रिचा को ही सही सलाह दे दिया करती थी.

बंद मुट्ठी के खुलते ही रिश्तों के साथसाथ धन का रिसाव भी बहुत शीघ्रता से होने लगता है. बेशक दोनों परिवार अलग रहते थे, पर मन से वे कभी दूर नहीं थे. अब उन के बीच इतनी दूरियां आ गई थीं कि एक की बरबादी की खबर दूसरे को आनंदित कर देती. वे सोचते, उन के साथ ऐसा ही होना चाहिए था.

धीरेधीरे उन दोनों का ही व्यापार ठप होने लगा और आपसी प्यार व विश्वास की दीवारें गिरने लगीं. उन के बीच दरारें पैदा कर और पैसे ऐंठ कर पंडितजी ने एक फ्लैट खरीद लिया और घर में हर तरह की सुविधाएं जुटा लीं. उन के बच्चे अंगरेजी स्कूल में जाने लगे.

जब पंडितजी ने देखा कि अब दोनों परिवार खोखले हो गए हैं और उन्हें देने के लिए उन के पास धन नहीं है तो उन का आनाजाना कम होने लगा. अब राजीव और रंजन उन्हें सलाह लेने के लिए बुलाते तो वे काम का बहाना बना टाल जाते. आखिर, उन्हें तो अपनी कमाई का और कोई जरिया ढूंढ़ना था, इसलिए बहुत जल्दी ही उन्होंने दवाइयों के व्यापारी मनक अग्रवाल के घर आनाजाना आरंभ कर दिया.

‘‘क्या बताऊं यजमान, कैसा जमाना आ गया है. आप कपड़ा व्यापारी भाई रंजन और राजीव भैया को तो जानते ही होंगे, कितना अच्छा व्यापार था दोनों का. पैसों में खेलते थे, पर विडंबना तो देखो, दोनों भाइयों की आपस में बिलकुल नहीं बनती. आपसी लड़ाईझगड़ों के चलते व्यापार तो लगभग ठप ही समझो.

‘‘आप भी तो हैं, कितना स्नेह है तीनों भाइयों में. अगलबगल 3 कोठियों में आप लोग रहते हो, पर मजाल है कि आप के दोनों छोटे भाई आप की कोई बात टाल जाएं. यहां आ कर तो मन प्रसन्न हो जाता है. मैं तो कहता हूं कि मां लक्ष्मी की कृपा आप पर इसी तरह बनी रहे,’’ काजू की बर्फी के 2-3 पीस एकसाथ मुंह में रखते हुए पंडितजी ने कहा.

‘‘बस, आप का आशीर्वाद चाहिए पंडितजी,’’ सेठ मनक अग्रवाल ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘वह तो हमेशा आप के साथ है. मेरी मानो तो इस रविवार लक्ष्मीपूजन करवा लो.’’

‘‘जैसी आप की इच्छा,’’ कह मनक अग्रवाल ने उन के सामने हाथ जोड़ लिए. वहां से कुछ देर बाद जब पंडितजी निकले तो उन के हाथ में काजू की बर्फी का डब्बा और 2100 रुपए का एक लिफाफा था.

आने वाले रविवार को तो तगड़ी दक्षिणा मिलेगी, इसी का हिसाबकिताब लगाते पंडितजी अपने घर की ओर बढ़ गए.

उन के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान खेल रही थी और आंखों से धूर्तता टपक रही थी. बस, उन्हें तो अब तीनों भाइयों की बंद मुट्ठी को खोलना था. उन का हाथ जेब में रखे लिफाफे पर गया. लिफाफे की गरमाहट उन्हें एक सुकून दे रही थी.

त्यौहार 2022: घर पर ऐसे बनाये चटपटी और टेस्टी सिंघाड़े के आटे की पकौड़ी

पकौड़ी का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले प्याज़ की पकौड़ी ,आलू की पकौड़ी, पनीर की पकौड़ी और भी न जाने कितनी तरह की पकौड़ियों का ख्याल आता है.जो की सभी बेसन से बनती है. पर क्या कभी आपने सिंघाड़े के आटे की पकौड़ी का स्वाद चखा है.ये खाने में जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही ज्यादा ये फायदेमंद भी होती है.

जी हाँ ,सिंघाड़ा , जिसे वाटर कैलट्रोप या वाटर चेस्टनट के रूप में भी जाना जाता है, एक जलीय फल होता है. जिसे कच्चा, उबला हुआ या आटे के रूप में खाया जाता है. सिंघाड़े का आटा हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद होता है. इसका उपयोग मुख्य रूप से उपवास और त्यौहारों के दौरान विभिन्न व्यंजनों को तैयार करने में किया जाता है.

सिंघाड़े के आटे का सेवन करने से बॉडी को एनर्जी मिलती है .सिंघाड़ा में मौजूद पोषक तत्व जैसे विटामिन ए, प्रोटीन, सिट्रिक एसिड, फॉस्फोरस, निकोटिनिक एसिड, कार्बोहाइड्रेट , डाइटरी फाइबर, कैल्शियम, जिंक हमारी बॉडी को हेल्थी रखने के लिए बेहद फायदेमंद है यानी ये हमारे सम्पूर्ण सेहत के लिए बहुत अच्छा होता है .

तो अगर आप भी इस फेस्टिव सीजन गर्म चाय के साथ इन कुरकुरी पकौड़ियों का स्वाद चखना चाहते है तो हम आज आपसे इसकी रेसिपी शेयर करने जा रहे है .तो चलिए जानते है की चटपटी और कुरकुरी सिंघाड़े के आटे की पकौड़ी कैसे बनाये-

कितने लोगों के लिए-3 से 4
समय-10 से 15 मिनट
मील टाइप -वेज

हमें चाहिए-
सिघाड़े या कूटू का आटा – 200 ग्राम
आलू उबले हुए – 200 ग्राम
काली मिर्च – आधा छोटी चम्मच
हरा धनिया – एक टेबल स्पून
हरी मिर्च – 2 बारीक कटी हुई
सेंधा नमक – स्वादानुसार
घी या तेल – पकोड़े तलने के लिये आवश्यकतानुसार

बनाने का तरीका-
-सबसे पहले एक बाउल में उबले हुए आलू को मैश कर ले. अब इसमें हरी मिर्च और हरा धनिया मिलाएं.
-अब इसमें सिंघाड़े का आटा , पिसी हुई काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर इन सभी को अच्छे से मिक्स कर ले.
(ध्यान रहे की इसमें पानी बिलकुल भी नहीं डालना है)
-अब एक कढाई में पकौड़ी तलने के लिए तेल गर्म करे.तेल गर्म हो जाने के बाद इसमें एक छोटे चम्मच की सहायता से मिक्सचर को लेकर धीरे धीरे एक एक करके कढाई में डालते जाये.
(आप चाहे तो आप हाथ से इसकी गोलियां बनाकर भी कढाई में डाल सकती है)
-अब थोड़ी देर के बाद कलछी से एक पकौड़ी को उठा कर देखे .

(अगर ये पक गयी होगी तो आसानी से तली से छूट जायेगी.ज्यादा ज़ल्दिबाज़ी न करें)
-अब उसे दूसरी तरफ पलट दे और हल्का लाल होने तक पकाते रहे.
-. पकौड़ियों की साइड बदलते रहें ताकि दोनों ओर से गोल्डन ब्राउन हो जाए.
-अब इसे कढाई से निकालकर गर्मागर्म परोसे.तैयार है सिंघाड़े के आटे की स्वादिष्ट पकौड़ी.
-आप इसे चाय या धनिये और पुदीने की चटनी के साथ खा सकते है.

झारखंड: राज्यपाल बनाम हास्यपाल!

आज राज्यपाल राज्यपाल न रहकर के हास्यपाल बनकर रह गए हैं या फिर कहें केंद्र सरकार की कठपुतली से ज्यादा की औकात नहीं रह गई है. इसका सबसे बड़ा सत्य है कि राज्यपाल रमेश बैस का दिल्ली दौड़ कर जाना. राज्यपाल के पास पूरा प्रशासनिक अमला होता है वह राज्य की संवैधानिक प्रमुख की हैसियत रखता है ऐसे में संविधानिक चर्चा के लिए वे राज्य में वरिष्ठ अधिवक्ताओं व न्यायाधीश से सलाह ले सकते हैं मगर दिल्ली की दौड़ उनकी हकीकत को बयां करती है.

हाल ही में जो घटना क्रम झारखंड में देखा गया है उसे देख समझकर के यह जन चर्चा है कि राज्यपाल अपने पद की गरिमा को स्वयं खत्म कर रहे हैं.यह कुछ  वैसे ही है, जैसे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना.

दरअसल, आज राजनीति राजशाही की तरह गंदी और बदतर स्थिति में पहुंचती जा रही  है जो भी संविधानिक पद हैं उनको एक शुचिता गरिमा के तहत एक अच्छी सोच के तहत बनाया गया ताकि देश में लोकतंत्र की स्थापना के साथ देश हित में जनता के हित में चलता रहे मगर धीरे-धीरे जिन लोगों के हाथों में सत्ता की चाबी आ गई वह यह सोचने लगे कि अब हमें ही आजीवन पदों में रहना है, यह वही सोच है जिसे हम राजतंत्र की परिभाषा में बांध सकते हैं .

अगर गंभीर विवेचना की दृष्टि से देखा जाए तो यह पाते हैं कि राज्यपाल का पद अब पूरी तरीके से अपनी गरिमा को समाप्त प्राय कर  चुका है. झारखंड में देखें अथवा पश्चिम बंगाल में, दक्षिण राज्यों में देखें या बिहार में अथवा छत्तीसगढ़ में हमें जहां विपक्ष की सरकार है ऐसे राज्यपालों की पदस्थापना की जाती है जो पक्षपाती हों, वर्तमान सरकार और मुख्यमंत्री के लिए रास्ते में सिर्फ रोड़े अटकाएं. यह सोच और दृष्टि लोकतंत्र के लिए नुकसान पर है और देश की जनता खामोशी से यह सब देख रही है यह नहीं समझना चाहिए.

महामहिम झारखंड के रंग ढंग

वर्तमान में झारखंड में महामहिम पद पर रमेश बैंस विराजमान है. जोकि लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे हैं और केंद्र में मंत्री भी एक तरह से कहा जा सकता है कि आप भाजपा के एक कट्टर कार्यकर्ता है. अब जब झारखंड में आप की पदस्थापना हुई है तो झारखंड सरकार हेमंत सोरेन को परेशान हलाकान होना पड़ रहा है . राज्यपाल की कुपित दृष्टि से झारखंड की सरकार हिल रही है मुख्यमंत्री पद पर बहुमत की सरकार होने के बाद भी हेमंत सोरेन को पटना और रायपुर की दौड़ लगानी पड़ रही है ताकि उनकी सरकार बच जाए . हालात यह है कि 5 सितंबर 2022 को हेमंत सोरेन को झारखंड विधानसभा का विशेष सत्र बुलाना पड़ा और बहुमत सिद्ध करना पड़ा इसके बावजूद सब कुछ सामान्य रहने की संभावना नहीं है और महामहिम राज्यपाल रमेश बैस के एक निर्णय के बाद आगे राजनीतिक का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है.

आज राज्यपाल अपनी राजनीति करने के लिए देश भर में चर्चा का विषय बन गए हैं. ऐसे में आवश्यकता यह है कि विवेकपूर्ण निर्णय लेने वाले सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक और न्यायालयीन क्षेत्र में कार्य करने वाले वरिष्ठ और निष्पक्ष लोगों को राज्यपाल पद से शोभायमान किया जाना चाहिए.

Anupamaa: अनुज की जाएगी याददाश्त! तोषु को धमकी देगी अनुपमा

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में इन दिनों धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है, जिससे दर्शकों का फुल एंटरटेनमेंट हो रहा है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुज की एक्सिडेंट के बाद अनुपमा हालात को सुधारने की कोशिश कर रही है. तो अब तोषु को लेकर नया बखेड़ा खड़ा होने वाला है. अनुपमा की जिंदगी में एक के बाद एक मुसीबत दस्तक दे रही है. अनुपमा चाहकर भी इन परेशानियों से उबर नहीं पा रही है.

 

पिता बनने के बाद तोषु अपनी बेटी को गले लगाता है. जिसके बाद राखी तोषु की क्लास लगाती है. राखी दावा करती है कि तोषु का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा है. राखी तोषु को अकेले में लेकर धमकी देती है. इसी बीच अनुपमा वहां पहुंच जाएगी.

 

शो में आप देखेंगे कि अनुपमा को देखते ही राखी और तोषु चुप हो जाएंगे. अनुपमा राखी से पूरी बात जानने की कोशिश करेगी. राखी अनुपमा को कुछ नहीं बताएगी. राखी के जाने के बाद अनुपमा तोषु से बात करेगी. अनुपमा तोषु को अपनी कसम देगी कि वह उसे सच-सच बताएं कि आखिर क्या हुआ है?

 

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अनुपमा तोषु से सच उगलवाने की कोशिश करेगी. तोषु कहेगा कि वो अपनी बेटी का पूरा ख्याल रखेगा. तोषु की हरकतें देखकर अनुपमा चिढ़ जाएगी. अनुपमा तोषु को धमकी देगी. अनुपमा कहेगी कि अगर तोषु ने कुछ गलत किया तो वो उसको पूरी तरह से बर्बाद कर देगी.

 

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रिपोर्ट के अनुसार, शो में दिखाया जाएगा कि अनुज अचानक ही बीमार पड़ने वाला है. वह रात को सोते समय बिस्तर से गिर जाएगा. अनुपमा अनुज के गिरते ही चिल्लाएगी. परिवार के लोग मिलकर अनुज को उठाएंगे. होश आने के बाद अनुज किंजल की डिलीवरी के बारे में पूछेगा. अनुपमा को एहसास होगा कि अनुज की याददास्त चली गई है.

GHKKPM: विराट-पाखी को साथ देखकर सई होगी हर्ट, होगी बड़ी गलतफहमी

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ लगातार बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो का ट्रैक इन दिनों दर्शकों को खूब पसंद आ रहा है. शो का अपकमिंग एपिसोड कॉफी दिलचस्प होने वाला है. शो में जल्द ही सई और विराट का आमना-सामना होगा. आइए बताते हैं, शो के अपकमिंग एपिसोड में…

शो में आप देखेंगे कि पाखी विनायक के इलाज के लिए मालदीव जाने का प्लान कैंसिल कर देती है. वह चाहती है पहले उसके बेटे का इलाज हो जाए. पाखी के इस बात से घर के सभी लोग खुश हो जाते हैं. विराट बताता है कि वीनू की डॉक्टर ने बताया है कि उसे कणकवली वाली डॉक्टर के इलाज से फायदा मिल रहा है. इसलिए उन दोनों ने फैसला लिया है कि पहले वीनू का इलाज करवाएंगे.

 

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तो वहीं दूसरी तरफ विराट विनायक को सई के पास इलाज के लिए लेकर जाएगा. विनायक इस बात से खुश हो जाएगा कि उसे सवी और डॉक्टर आंटी से मिलने का मौका मिलेगा. शो में आप देखेंगे कि विराट विनायक को लेकर सवि के पास जा रहा है. रास्ते में वह वीनू से पता पूछने के लिए कहेगा. विनायक मोबाइल फोन को स्पीकर पर डाल देगा और सई से पता पूछेगा. जब सई बोलेगी कि मैं डॉक्टर सई बोल रही हूं. ये सुनकर विराट चौंक जाएगा.

 

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खबरों के मुताबिक सई विराट और पाखी को पार्क में पति-पत्नी की तरह प्यार में देखेगी और हर्ट हो जाएगी. सई और विराट के बीच बड़ी गलतफहमी होगी.

 

त्यौहार 2022: बदली परिपाटी- मयंक को मिली अपनी करनी की सजा 

लगता है रात में जतिन ने फिर बहू पर हाथ उठाया. मुझ से यह बात बरदाश्त नहीं होती. बहू की सूजी आंखें और शरीर पर पड़े नीले निशान देख कर मेरा दिल कराह उठता है. मैं कसमसा उठता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. काश, पूजा होती और अपने बेटे को समझाती पर पूजा को तो मैं ने अपनी ही गलतियों से खो दिया है.

यह सोचतेसोचते मेरे दिमाग की नसें फटने लगी हैं. मैं अपनेआप से भाग जाना चाहता हूं. लेकिन नहीं भाग सकता, क्योंकि नियति द्वारा मेरे लिए सजा तय की गई है कि मैं पछतावे की आग में धीरेधीरे जलूं.

‘‘अंतरा, मैं बाजार की तरफ जा रहा हूं, कुछ मंगाना तो नहीं.’’

‘‘नहीं पापाजी, आप हो आइए.’’ मैं चल पड़ा यह सोच कर कि कुछ देर बाहर निकलने से शायद मेरा मन थोड़ा बहल जाए. लेकिन बाहर निकलते ही मेरा मन अतीत के गलियारों में भटकने लगा…

‘मुझ से जबान लड़ाती है,’ एक भद्दी सी गाली दे कर मैं ने उस पर अपना क्रोध बरसा दिया.

‘आह…प्लीज मत मारो मुझे, मेरे बच्चे को लग जाएगी, दया करो. मैं ने आखिर किया क्या है?’ उस ने झुक कर अपनी पीठ पर मेरा वार सहन करते हुए कहा.

कोख में पल रहे बच्चे पर वह आंच नहीं आने देना चाहती थी. लेकिन मैं कम क्रूर नहीं था. बालों से पकड़ते हुए उसे घसीट कर हौल में ले आया और अपनी बैल्ट निकाल ली. बैल्ट का पहला वार होते ही जोरों की चीख खामोशी में तबदील होती चली गई. वह बेहोश हो चुकी थी.

‘पागल हो गया क्या, अरे, उस के पेट में तेरी औलाद है. अगर उसे कुछ हो गया तो?’ मां किसी बहाने से उसे मेरे गुस्से से बचाना चाहती थीं.

‘कह देना इस से, भाड़े पर लड़कियां लाऊं या बियर बार जाऊं, यह मेरी अम्मा बनने की कोशिश न करे वरना अगली बार जान से मार दूंगा,’ कहते हुए मैं ने 2 साल के नन्हे जतिन को धक्का दिया, जो अपनी मां को मार खाते देख सहमा हुआ सा एक तरफ खड़ा था. फिर गाड़ी उठाई और निकल पड़ा अपनी आवारगी की राह.

उस पूरी रात मैं नशे में चूर रहा. सुबह के 6 बज रहे होंगे कि पापा के एक कौल ने मेरी शराब का सारा नशा उतार दिया. ‘कहां है तू, कब से फोन लगा रहा हूं. पूजा ने फांसी लगा ली है. तुरंत आ.’ जैसेतैसे घर पहुंचा तो हताश पापा सिर पर हाथ धरे अंदर सीढि़यों पर बैठे थे और मां नन्हे जतिन को चुप कराने की बेहिसाब कोशिशें कर रही थीं.

अपने बैडरूम का नजारा देख मेरी सांसें रुक सी गईं. बेजान पूजा पंखे से लटकी हुई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मांपापा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. पूजा ने अपने साथ अपनी कोख में पल रहे मेरे अंश को भी खत्म कर लिया था. पर इतने खौफनाक माहौल में भी मेरा शातिर दिमाग काम कर रहा था. इधरउधर खूब ढूंढ़ने के बाद भी पूजा की लिखी कोई आखिरी चिट्ठी मुझे नहीं मिली.

पुलिस को देने के लिए हम ने एक ही बयान को बारबार दोहराया कि मां की बीमारी के चलते उसे मायके जाने से मना किया तो जिद व गुस्से में आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. वैसे भी मेरी मां का सीधापन पूरी कालोनी में मशहूर था, जिस का फायदा मुझे इस केस में बहुत मिला. कुछ दिन मुझे जरूर लौकअप में रहना पड़ा, लेकिन बाद में सब को देदिला कर इस मामले को खत्म करने में हम ने सफलता पाई, क्योंकि पूजा के मायके में उस की खैरखबर लेने वाला एक शराबी भाई ही था जिसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाने में कोई खास रुचि न थी.

थोड़ी परेशानी से ही सही, लेकिन 8-10 महीने में केस रफादफा हो गया पर मेरे जैसा आशिकमिजाज व्यक्ति ऐसे समय में भी कहां चुप बैठने वाला था. इस बीच मेरी रासलीला मेरे एक दोस्त की बहन लिली से शुरू हो गई. लिली का साथ मुझे खूब भाने लगा, क्योंकि वह भी मेरी तरह बिंदास थी. पूजा की मौत के डेढ़ साल के भीतर ही हम ने शादी कर ली. वह तो शादी के बाद पता चला कि मैं सेर, तो वह सवा सेर है. शादी होते ही उस ने मुझे सीधे अपनी अंटी में ले लिया.

बदतमीजी, आवारगी, बदचलनी आदि गुणों में वह मुझ से कहीं बढ़ कर निकली. मेरी परेशानियों की शुरुआत उसी दिन हो गई जिस दिन मैं ने पूजा समझ कर उस पर पहली बार हाथ उठाया. मेरे उठे हाथ को हवा में ही थाम उस ने ऐसा मरोड़ा कि मेरे मुंह से आह निकल गई. उस के बाद मैं कभी उस पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर पाया.

घर के बाहर बनी पुलिया पर आसपास के आवारा लड़कों के साथ बैठी वह सिगरेट के कश लगाती जबतब कालोनी के लोगों को नजर आती. अपने दोस्तों के साथ कार में बाहर घूमने जाना उस का प्रिय शगल था. रात को वह शराब के नशे में धुत हो घर आती और सो जाती. मैं ने उसे अपने झांसे में लेने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उस ने मेरे वार का ऐसा प्रतिवार किया कि मैं बौखला गया. उस ने साफ शब्दों में मुझे चेतावनी दी कि अगर मैं ने उस से उलझने की कोशिश की तो वह मुझे मरवा देगी या ऐसा फंसाएगी कि मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं उस के गदर से तभी तक बचा रहता जब तक कि उस के कामों में हस्तक्षेप न करता.

तो इस तरह प्रकृति के न्याय के तहत मैं ने जल्द ही वह काटा, जो बोया था. घर की पूरी सत्ता पर मेरी जगह वह काबिज हो चुकी थी. शादी के सालभर बाद ही मुझ पर दबाव बना कर उस ने पापा से हमारे घर को भी अपने नाम करवा लिया. और फिर हमारा मकान बेच कर उस ने पौश कालोनी में एक फ्लैट खरीदा और मुझे व जतिन को अपने साथ ले गई. मेरे मम्मीपापा मेरी बहन यानी अपनी बेटी के घर में रहने को मजबूर थे. यह सब मेरी ही कारगुजारियों की अति थी जो आज सबकुछ मेरे हाथ से मुट्ठी से निकली रेत की भांति फिसल चुका था.

अपना मकान बिकने से हैरानपरेशान पापा इस सदमे को न सह पाने के कारण हार्टअटैक के शिकार हो महीनेभर में ही चल बसे. उन के जाने के बाद मेरी मां बिलकुल अकेली हो गईं. प्रकृति मेरे कर्मों की इतनी जल्दी और ऐसी सजा देगी, मुझे मालूम न था.

नए घर में शिफ्ट होने के बाद भी उस के क्रियाकलाप में कोई खास अंतर नहीं आया. इस बीच 5 साल के हो चुके जतिन को उस ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया. उस के सान्निध्य में पलताबढ़ता जतिन भी उस के नक्शेकदम पर चल पड़ा. पढ़ाई-लिखाई से उस का खास वास्ता था नहीं. जैसेतैसे 12वीं कर उस ने छोटामोटा बिजनैस कर लिया और अपनी जिंदगी पूरी तरह से उसी के हवाले कर दी. उन दोनों के सामने मेरी हैसियत वैसे भी कुछ नहीं थी. किसी समय अपनी मनमरजी का मालिक मैं आजकल उन के हाथ की कठपुतली बन, बस, उन के रहमोकरम पर जिंदा था.

इसी रफ्तार से जिंदगी के कुछ और वर्ष बीत गए. इस बीच लिली एक भयानक बीमारी एड्स की चपेट में आ गई और अपनेआप में गुमसुम पड़ी रहने लगी. अब घर की सत्ता मेरे बेटे जतिन के हाथों में आ गई. हालांकि इस बदलाव का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था. हां, जतिन की शादी होने पर उस की पत्नी अंतरा के आने से अलबत्ता मुझे कुछ राहत जरूर हो गई, क्योंकि मेरी बहू भी पूजा जैसी ही एक नेकदिल इंसान थी.

वह लिली की सेवा जीजान से करती और जतिन को खुश करने की पूरी कोशिश भी. पर जिस की रगों में मेरे जैसे गिरे इंसान का लहू बह रहा हो, उसे भला किसी की अच्छाई की कीमत का क्या पता चलता. सालभर पहले लिली ने अपनी आखिरी सांस ली. उस वक्त सच में मन से जैसे एक बोझ उतर गया और मेरा जीवन थोड़ा आसान हो गया.

इस बीच, जतिन के अत्याचार अंतरा के प्रति बढ़ते जा रहे थे. लगभग रोज रात में जतिन उसे पीटता और हर सुबह अपने चेहरे व शरीर की सूजन छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए वह फिर से अपने काम पर लग जाती. कल रात भी जतिन ने उस पर अपना गुस्सा निकाला था.

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ये सब क्यों सहती है, क्यों नहीं वह जतिन को मुंहतोड़ जवाब देती, आखिर उस की क्या मजबूरी है? तमाम बातें मेरे दिमाग में लगातार चलतीं. मेरा मन उस के लिए इसलिए भी परेशान रहता क्योंकि इतना सबकुछ सह कर भी वह मेरा बहुत ध्यान रखती थी. कभीकभी मैं सोच में पड़ जाता कि आखिर औरत एक ही समय में इतनी मजबूत और मजबूर कैसे हो सकती है?

ऐसे वक्त पर मुझे पूजा की बहुतयाद आती. अपने 4 वर्षों के वैवाहिक जीवन में मैं ने एक पल भी उसे सुकून का नहीं दिया. शादी की पहली रात जब सजी हुई वह छुईमुई सी मेरे कमरे में दाखिल हुई थी, तो मैं ने पलभर में उसे बिस्तर पर घसीट कर उस के शरीर से खेलते हुए अपनी कामवासना शांत की थी.

काश, उस वक्त उस के रूपसौंदर्य को प्यारभरी नजरों से कुछ देर निहारा होता, तारीफ के दो बोल बोले होते तो वह खुशी से अपना सर्वस्व मुझे सौंप देती. उस घर में आखिर वह मेरे लिए ही तो आई थी. पर मेरे लिए तो प्यार की परिभाषा शारीरिक भूख से ही हो कर गुजरती थी. उस दौरान निकली उस की दर्दभरी चीखों को मैं ने अपनी जीत समझ कर उस का मुंह अपने हाथों से दबा कर अपनी मनमानी की थी. वह रातों में मेरे दिल बहलाने का साधनमात्र थी. और फिर जब वह गर्भवती हुई तो मैं दूसरों के साथ इश्क लड़ाने लगा, क्योंकि वह मुझे वह सुख नहीं दे पा रही थी. वह मेरे लिए बेकार हो चुकी थी. इसलिए मुझे ऐसा करने का हक था, आखिर मैं मर्द जो था. मेरी इस सोच ने मुझे कभी इंसान नहीं बनने दिया.

हे प्रकृति, मुझे थोड़ी सी तो सद्बुद्धि देती. मैं ने उसे चैन से एक सांस न लेने दी. अपनी गंदी हरकतों से सदा उस का दिल दुखाया. उस की जिंदगी को मैं ने वक्त से पहले खत्म कर दिया.

उस दिन उस ने आत्महत्या भी तो मेरे कारण ही की थी, क्योंकि उसे मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया था और उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि इस बारे में मुझ से पूछ बैठी थी. बदले में मैं ने जीभर कर उस की धुनाई की थी. ये सब पुरानी यादें दिमाग में घूमती रहीं और कब मैं घर लौट आया पता ही नहीं चला.

‘‘पापा, जब आप मार्केट गए थे. उस वक्त बूआजी आई थीं. थोड़ी देर बैठीं, फिर आप के लिए यह लिफाफा दे कर चली गईं.’’ बाजार से आते ही अंतरा ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया.

‘‘ठीक है बेटा,’’ मैं ने लिफाफा खोला. उस में एक छोटी सी चिट और करीने से तह किया हुआ एक पन्ना रखा था. चिट पर लिखा था, ‘‘मां के जाने के सालों बाद आज उन की पुरानी संदूकची खोली तो यह खत उस में मिला. तुम्हारे नाम का है, सो तुम्हें देने आई थी.’’ बहन की लिखावट थी. सालों पहले मुझे यह खत किस ने लिखा होगा, यह सोचते हुए कांपते हाथों से मैं ने खत पढ़ना शुरू किया.

‘‘प्रिय मयंक,

‘‘वैसे तो तुम ने मुझे कई बार मारा है, पर मैं हमेशा यह सोच कर सब सहती चली गई कि जैसे भी हो, तुम मेरे तो हो. पर कल जब तुम्हारे इतने सारे नाजायज संबंधों का पता चला तो मेरे धैर्य का बांध टूट गया. हर रात तुम मेरे शरीर से खेलते रहे, हर दिन मुझ पर हाथ उठाते रहे. लेकिन मन में एक संतोष था कि इस दुखभरी जिंदगी में भी एक रिश्ता तो कम से कम मेरे पास है. लेकिन जब पता चला कि यह रिश्ता, रिश्ता न हो कर एक कलंक है, तो इस कलंक के साथ मैं नहीं जी सकती. सोचती थी, कभी तो तुम्हारे दिल में अपने लिए प्यार जगा लूंगी. लेकिन अब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. मायके में भी तो कोई नहीं है, जिसे मेरे जीनेमरने से कोई सरोकार हो. मैं अपनी व्यथा न ही किसी से बांट सकती हूं और न ही उसे सह पा रही हूं. तुम्हीं बताओ फिर कैसे जिऊं. मेरे बाद मेरे बच्चों की दुर्दशा न हो, इसलिए अपनी कोख का अंश अपने साथ लिए जा रही हूं. मासूम जतिन को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुश रहो तुम, कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना. जाने से पहले एक बात तुम से जरूर कहना चाहूंगी. ‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं.’

‘‘तुम्हारी चाहत के इंतजार में पलपल मरती…तुम्हारी पूजा.’’

पूरा पत्र आंसुओं से गीला हो चुका था, जी चाह रहा था कि मैं चिल्लाचिल्ला कर रो पड़ूं. ओह, पूजा माफ कर दे मुझे. मैं इंसान कहलाने के काबिल नहीं, तेरे प्यार के काबिल भला क्या बनूंगा. हे प्रकृति, मेरी पूजा को लौटा दे मुझे, मैं उस के पैर पकड़ कर अपने गुनाहों की माफी तो मांग लूं उस से. लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिडि़या चुग गई खेत.

भावनाओं का ज्वार थमा तो कुछ हलका महसूस हुआ. शायद मां को पूजा का यह सुसाइड लैटर मिला हो और मुझे बचाने की खातिर यह पत्र उन्होंने अपने पास छिपा कर रख लिया हो. यह उन्हीं के प्यार का साया तो था कि इतना घिनौना जुर्म करने के बाद भी मैं बच गया. उन्होंने मुझे कालकोठरी की सजा से तो बचा लिया, परंतु मेरे कर्मों की सजा तो नियति से मुझे मिलनी ही थी और वह किसी भी बहाने से मुझे मिल कर रही.

पर अब सबकुछ भुला कर पूजा की वही पंक्ति मेरे मन में बारबार आ रही थी, ‘‘कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना.’’ अंतरा के मायके में भी तो उस की बुजुर्ग मां के अलावा कोई नहीं है. हो सकता है इसलिए वह भी पूजा की तरह मजबूर हो. पर अब मैं मजबूर नहीं बनूंगा…कुछ सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ. अंतरा को आवाज दी.

‘‘जी पापा,’’ कहते हुए अंतरा मेरे सामने मौजूद थी. बहुत देर तक मैं उसे सबकुछ समझाता रहा और वह आंखें फाड़फाड़ कर मुझे हैरत से देखती रही. शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जतिन का पिता होने के बावजूद मैं उस का दर्द कैसे महसूस कर रहा हूं या उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक मैं यह क्या और क्यों कर रहा हूं, क्योंकि वह मासूम तो मेरी हकीकत से हमेशा अनजान थी.

पास के पुलिस स्टेशन पहुंच कर मैंने अपनी बहू पर हो रहे अत्याचार की धारा के अंतर्गत बेटे जतिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. मेरे कहने पर अंतरा ने अपने शरीर पर जख्मों के निशान उन्हें दिखाए, जिस से केस पुख्ता हो गया. थोड़ा वक्त लगा, लेकिन हम ने अपना काम कर दिया था. आगे का काम पुलिस करेगी. जतिन को सही राह पर लाने का एक यही तरीका मुझे कारगर लगा, क्योंकि सिर्फ मेरे समझाने भर से बात उस के पल्ले नहीं पड़ेगी. पुलिस, कानून और सजा का खौफ ही अब उसे सही रास्ते पर ला सकता है.

पूजा के चिट्ठी में कहे शब्दों के अनुसार, मैं उसे रिश्तों की इज्जत करना सिखाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा, ताकि फिर कोई पूजा किसी मयंक के अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करने को मजबूर न हो. औटो में वापसी के समय अंतरा के सिर पर मैं ने स्नेह से हाथ फेरा. उस की आंखों में खौफ की जगह अब सुकून नजर आ रहा था. यह देख मैं ने राहत की सांस ली.

मेरे टीचर गलत हरकत करते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 10वीं जमात में पढ़ती हूं. मेरे ट्यूशन के सर हमेशा मेरे अंगों को छूने की कोशिश करते हैं और अकसर वे इस में कामयाब हो जाते हैं. वे मुझसे ‘आई लव यू’ भी कहते हैं. यह बात मैं अपने घर वालों से कैसे कहूं?

जवाब

आप को यह बात फौरन अपनी मम्मी को खुल कर बतानी चाहिए. वे आप के पापा से सलाह कर के उस टीचर की खबर ले लेंगी. मम्मी से कह दें कि आप उस टीचर से कतई नहीं पढ़ेंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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